नेताओं की दानवी पहचान By Shyamanand Mishra
कुछ समय से तुलसीदास जी के रामायण के दोहे को अनर्थ शब्दों में परोस कर अपना दानवी पहचान नेताओं ने दिखा रखा है। रामायण का दोहा ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी यह सब हैं तारण के अधिकारी। यह दोहे का एक शब्द तारण यानी उध्दार करना होता है। परंतु दानवी नेताओं ने उसे प्रतारण यानी दंड देना बता रखा है। सबसे बड़ी बात यह है कि उन दानव नेताओं ने ढोल, गवार, पशु, नारी को इस तरह छोड़ा हैं- जैसे अल्पसंख्यकों में बौद्ध, सिख, इसाई, जैन, आदि को छोड़कर सिर्फ मुसलमान को ही अल्पसंख्यक मानते हैं। मुसलमान के हितैषी जैसे सिर्फ शुद्र शब्द नजर आते हैं। दानवी नेता तारण को प्रताड़ना बातकर देश का माहौल बिगड़ना चाहता है। इसी तरह कभी कुंभकरण ने भी अपने वरदान में इंद्रासन के बदले निद्रासन मांगकर अपना जीवन बर्बाद कर लिया था।
सच्चाई तो यह है कि शुद्र यानी जो सबकी सुनता हो वह अपने आप में महान है। मानव शरीर का मुख ब्राह्मण, हाथ छत्रीय,पेट वैश्य, एवं पैर शुद्र माना गया है। सनातन धर्म में इस शुद्र रूपी पैर को छूकर प्रणाम करते हैं। फिर उसकी धुली को ब्राह्मण रूपी माथे पर लगाते हैं। ऐसे शुद्र को नीचा दिखाने वाले खुद अपनी दानवी पहचान दिखा रहे हैं। तुलसीदास जी के दोहे का असली अर्थ यह है कि जिस तरह ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी, वह नारी तन की हो या घर की नारी सभी पर अधीन से ही पहचान दिखता है। उसे असहाय माना गया है। इसलिए भगवान ने ऐसे असहाय को स्वतः तारण यानी उध्दार होने का अधिकार दिए है। यही बात समुद्र भी प्रभु श्री राम जी से कहते हैं, हे प्रभु आप मुझे भी उसी श्रेणी में रखते स्वतः तारण यानी उद्धार कर दें। जो भी इस सच्चाई को छुपा कर शुद्र को नीचा दिखाकर अपना वोट बैंक बनाना चाहता है। उसे नहीं धर्म माफ करेगा, ना ही भारत की जनता ऐसे दानव नेताओं को स्वीकार करेगी, ना हीं उन्हें अपने परिवार से कभी सम्मान मिलेगा। वह खुद क्षुद्र यानी पापी बनकर रह जाएंगे।
What's Your Reaction?