Explained: मोटापे के बिना दुनिया कैसी दिखेगी? कैटरीना कैफ के ओवरवेट से बहस
बॉलीवुड एक्ट्रेस कैटरीना कैफ 14 सितंबर 2026 को मुंबई के एंटीलिया में गणेश चतुर्थी के जश्न में शामिल हुईं. वे पति विक्की कौशल और बेटे वियान के साथ पहुंची. कैटरीना की प्रेग्नेंसी से पहले और बाद की तस्वीरों को जोड़कर 'बिफोर-आफ्टर' कोलाज बनने लगे और लोग उनके शरीर में आए बदलावों पर बहस करने लगे. कैटरीना के आलावा कान्स 2026 में ऐश्वर्या राय बच्चन को भी ट्रोल किया गया. आखिर मोटापे को इतना बुरा क्यों माना जाता है और दिक्कत कहां है... मोटापे को बुरा क्यों माना जाता है? इसे सोशल साइंस में फैटफोबिया कहते हैं. ये सिर्फ व्यक्तिगत नफरत नहीं है. ये एक पूरी सिस्टम है जो शरीर के साइज के आधार पर लोगों को नीचा दिखाती है. भारतीय सिनेमा में मोटे किरदार को अक्सर कॉमेडी का पात्र बनाया जाता है. मलयालम सिनेमा पर एक 2025 के शोध में पाया गया कि मोटे किरदार को 'हास्य का स्रोत' दिखाकर फैटफोबिक रवैये को और मजबूत किया जाता है. यह भारतीय समाज में बॉडी शेमिंग को नॉर्मल बनाता है. भारत में कितना गहरा है ये मोटापा भारत में पहली बार इंटरनलाइज्ड वेट स्टिग्मा पर स्टडी हुई. जो लोग बैरिएट्रिक सर्जरी के लिए तैयारी कर रहे थे, उनमें: 71% से ज्यादा लोगों में वजन को लेकर अंदरूनी नफरत थी. 74.6% अपने वजन को लेकर डिप्रेस्ड महसूस करते थे. आधे से ज्यादा लोग खुद से नफरत करते थे. 50% मानते थे कि जब तक वजन कम नहीं होगा, उन्हें अच्छी सोशल लाइफ नहीं मिलनी चाहिए. मुंबई की बैरिएट्रिक सर्जन डॉ. अपर्णा गोविल भास्कर कहती हैं कि वजन से जुड़ी बुलिंग बचपन से शुरू होती है और बड़े होने तक चलती रहती है. मोटे लोगों को अक्सर आलसी या कमजोर इच्छाशक्ति वाला माना जाता है. ऑफिस में भी यही होता है. दिल्ली-NCR की मल्टीनेशनल कंपनियों में कर्मचारियों पर एक स्टडी में पाया गया कि वेट-बेस्ड टीजिंग साइकोलॉजिकल डिस्ट्रेस का सबसे बड़ा प्रेडिक्टर है. ये नफरत कहां से आई? 1967 में न्यूयॉर्क के सेंट्रल पार्क में करीब 500 लोगों ने 'फैट-इन' प्रोटेस्ट किया. उन्होंने डाइट बुक्स जलाईं और फैटफोबिया के खिलाफ नारे लगाए. 1973 में फैट अंडरग्राउंड नाम के एक ग्रुप ने 'फैट लिबरेशन मेनिफेस्टो' पब्लिश किया. इसमें लिखा था, 'हम मानते हैं कि मोटे लोगों को पूरी इंसानी इज्जत और पहचान का हक है.' 2001 में येल यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स रेबेका पुहल और केली ब्राउनेल ने दिखाया कि मोटे लोगों के साथ नौकरी, एजुकेशन और हेल्थकेयर तीनों जगह भेदभाव होता है. ये भी पता चला कि 28% टीचर्स मानते थे कि मोटा होना किसी इंसान के साथ होने वाली सबसे बुरी चीज है. 24% नर्सें मोटे मरीजों से 'घृणा' महसूस करती थीं. हेल्थकेयर में भी भेदभाव सबसे दुखद ये है कि डॉक्टर के पास जाना भी मोटे लोगों के लिए डर का कारण बन जाता है. कई लोग इसलिए इलाज टालते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि डॉक्टर उन्हें जज करेगा. भारत में फैटफोबिया पर 2026 के एक रिसर्च में पाया गया कि हेल्थकेयर सिस्टम में मेडिकल एलिजिबिलिटी के लिए वजन कम करने की शर्त जैसी प्रैक्टिस डॉक्यूमेंट की गई है. तो फिर 'हेल्दी एट एवरी साइज' क्या है? हेल्थ एक्सपर्ट्स अब एक नया फ्रेमवर्क सुझा रहे हैं- हेल्थ एट एवरी साइज (HAES). इसका मतलब ये नहीं कि वजन मायने नहीं रखता. इसका मतलब ये है कि हेल्थ का फोकस वजन घटाने के बजाय माइंडफुल ईटिंग, सुरक्षित मूवमेंट और सम्मानजनक देखभाल पर होना चाहिए. तो मोटापे के बिना दुनिया कैसी दिखेगी? इसका मतलब मोटापे का न होना नहीं है, बल्कि मोटापे से नफरत के बिना दुनिया है. ऐसी दुनिया जहां किसी औरत को बच्चे को जन्म देने के बाद अपने शरीर के लिए माफी न मांगनी पड़े. जहां डॉक्टर के पास जाने से पहले कोई ये न सोचे कि 'वो मुझे जज करेगा.' जहां ऑफिस में किसी के खाने की प्लेट और शरीर के साइज पर कोई कमेंट न करे. जहां बच्चा स्कूल में बॉडी शेमिंग के डर से न रोए. नेशनल ईटिंग डिसऑर्डर एसोसिएशन (NEDA) एक पूरी कैंपेन चलाती है जिसका नाम ही है- 'Imagine a World Without Weight Hate.'
बॉलीवुड एक्ट्रेस कैटरीना कैफ 14 सितंबर 2026 को मुंबई के एंटीलिया में गणेश चतुर्थी के जश्न में शामिल हुईं. वे पति विक्की कौशल और बेटे वियान के साथ पहुंची. कैटरीना की प्रेग्नेंसी से पहले और बाद की तस्वीरों को जोड़कर 'बिफोर-आफ्टर' कोलाज बनने लगे और लोग उनके शरीर में आए बदलावों पर बहस करने लगे. कैटरीना के आलावा कान्स 2026 में ऐश्वर्या राय बच्चन को भी ट्रोल किया गया. आखिर मोटापे को इतना बुरा क्यों माना जाता है और दिक्कत कहां है...
मोटापे को बुरा क्यों माना जाता है?
इसे सोशल साइंस में फैटफोबिया कहते हैं. ये सिर्फ व्यक्तिगत नफरत नहीं है. ये एक पूरी सिस्टम है जो शरीर के साइज के आधार पर लोगों को नीचा दिखाती है.
भारतीय सिनेमा में मोटे किरदार को अक्सर कॉमेडी का पात्र बनाया जाता है. मलयालम सिनेमा पर एक 2025 के शोध में पाया गया कि मोटे किरदार को 'हास्य का स्रोत' दिखाकर फैटफोबिक रवैये को और मजबूत किया जाता है. यह भारतीय समाज में बॉडी शेमिंग को नॉर्मल बनाता है.
भारत में कितना गहरा है ये मोटापा
भारत में पहली बार इंटरनलाइज्ड वेट स्टिग्मा पर स्टडी हुई. जो लोग बैरिएट्रिक सर्जरी के लिए तैयारी कर रहे थे, उनमें:
- 71% से ज्यादा लोगों में वजन को लेकर अंदरूनी नफरत थी.
- 74.6% अपने वजन को लेकर डिप्रेस्ड महसूस करते थे.
- आधे से ज्यादा लोग खुद से नफरत करते थे.
- 50% मानते थे कि जब तक वजन कम नहीं होगा, उन्हें अच्छी सोशल लाइफ नहीं मिलनी चाहिए.
मुंबई की बैरिएट्रिक सर्जन डॉ. अपर्णा गोविल भास्कर कहती हैं कि वजन से जुड़ी बुलिंग बचपन से शुरू होती है और बड़े होने तक चलती रहती है. मोटे लोगों को अक्सर आलसी या कमजोर इच्छाशक्ति वाला माना जाता है.
ऑफिस में भी यही होता है. दिल्ली-NCR की मल्टीनेशनल कंपनियों में कर्मचारियों पर एक स्टडी में पाया गया कि वेट-बेस्ड टीजिंग साइकोलॉजिकल डिस्ट्रेस का सबसे बड़ा प्रेडिक्टर है.
ये नफरत कहां से आई?
1967 में न्यूयॉर्क के सेंट्रल पार्क में करीब 500 लोगों ने 'फैट-इन' प्रोटेस्ट किया. उन्होंने डाइट बुक्स जलाईं और फैटफोबिया के खिलाफ नारे लगाए. 1973 में फैट अंडरग्राउंड नाम के एक ग्रुप ने 'फैट लिबरेशन मेनिफेस्टो' पब्लिश किया. इसमें लिखा था, 'हम मानते हैं कि मोटे लोगों को पूरी इंसानी इज्जत और पहचान का हक है.'
2001 में येल यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स रेबेका पुहल और केली ब्राउनेल ने दिखाया कि मोटे लोगों के साथ नौकरी, एजुकेशन और हेल्थकेयर तीनों जगह भेदभाव होता है. ये भी पता चला कि 28% टीचर्स मानते थे कि मोटा होना किसी इंसान के साथ होने वाली सबसे बुरी चीज है. 24% नर्सें मोटे मरीजों से 'घृणा' महसूस करती थीं.
हेल्थकेयर में भी भेदभाव
सबसे दुखद ये है कि डॉक्टर के पास जाना भी मोटे लोगों के लिए डर का कारण बन जाता है. कई लोग इसलिए इलाज टालते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि डॉक्टर उन्हें जज करेगा. भारत में फैटफोबिया पर 2026 के एक रिसर्च में पाया गया कि हेल्थकेयर सिस्टम में मेडिकल एलिजिबिलिटी के लिए वजन कम करने की शर्त जैसी प्रैक्टिस डॉक्यूमेंट की गई है.
तो फिर 'हेल्दी एट एवरी साइज' क्या है?
हेल्थ एक्सपर्ट्स अब एक नया फ्रेमवर्क सुझा रहे हैं- हेल्थ एट एवरी साइज (HAES). इसका मतलब ये नहीं कि वजन मायने नहीं रखता. इसका मतलब ये है कि हेल्थ का फोकस वजन घटाने के बजाय माइंडफुल ईटिंग, सुरक्षित मूवमेंट और सम्मानजनक देखभाल पर होना चाहिए.
तो मोटापे के बिना दुनिया कैसी दिखेगी?
इसका मतलब मोटापे का न होना नहीं है, बल्कि मोटापे से नफरत के बिना दुनिया है. ऐसी दुनिया जहां किसी औरत को बच्चे को जन्म देने के बाद अपने शरीर के लिए माफी न मांगनी पड़े. जहां डॉक्टर के पास जाने से पहले कोई ये न सोचे कि 'वो मुझे जज करेगा.' जहां ऑफिस में किसी के खाने की प्लेट और शरीर के साइज पर कोई कमेंट न करे. जहां बच्चा स्कूल में बॉडी शेमिंग के डर से न रोए.
नेशनल ईटिंग डिसऑर्डर एसोसिएशन (NEDA) एक पूरी कैंपेन चलाती है जिसका नाम ही है- 'Imagine a World Without Weight Hate.'
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