'हिरासत में हिंसा और मौत सिस्टम पर धब्बा, देश बर्दाश्त नहीं करेगा', सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को हिरासत में हिंसा और मौत को लेकर सख्त टिप्पणी की है. कोर्ट की तरफ से कहा गया है, "हिंसा और मौत व्यवस्था पर एक धब्बा है. देश इसे बर्दाश्त नहीं करेगा." मामले में सुनवाई न्यायमूर्ति विक्रमनाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने की है. इस मामले में पारित अपने आदेश में माननीय अदालत ने कहा, कि राजस्थान में आठ महीनों में पुलिस हिरासत में 11 मौते हुई हैं. पीठ ने सख्त लहजे में कहा है, 'अब देश इसे बर्दाश्त नहीं करेगा. यह व्यवस्था पर एक धब्बा है. आप हिरासत में मृत्यु नहीं होने दे सकते.' सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि कोई भी हिरासत में हुई मौतों को न तो उचित ठहरा सकता है और न ही उचित ठहराने का प्रयास कर सकता है. पीठ ने केंद्र से यह भी पूछा कि उसने इस मामले में अनुपालन हलफनामा क्यों नहीं दाखिल किया है. केंद्र अदालत को क्यों हल्के में ले रहा? न्यायमूर्ति विक्रमनाथ ने पूछा, 'केंद्र इस अदालत को बहुत हल्के में ले रहा है। क्यों?' मेहता ने कहा कि वह स्वतः संज्ञान मामले में पेश नहीं हो रहे हैं, लेकिन कोई भी अदालत को हल्के में नहीं ले सकता. उन्होंने कहा कि केंद्र तीन सप्ताह के भीतर अनुपालन हलफनामा दाखिल करेगा. सितंबर में, शीर्ष अदालत ने मीडिया की एक खबर का स्वतः संज्ञान लिया था, जिसमें कहा गया था कि 2025 के पहले आठ महीनों में राजस्थान में पुलिस हिरासत में 11 लोगों की मौत हुई. इनमें से सात मामले उदयपुर संभाग से आए थे. एक अलग मामले में, शीर्ष अदालत ने 2018 में मानवाधिकारों के हनन को रोकने के लिए पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरे लगाने का आदेश दिया था. मंगलवार को सुनवाई के दौरान, पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे की दलीलें भी सुनीं, जो एक अलग मामले में एमिकस क्यूरी (न्यायलय के मित्र) के रूप में शीर्ष अदालत की सहायता कर रहे हैं. इस मामले में शीर्ष अदालत ने दिसंबर 2020 में एक आदेश पारित किया था. उस आदेश में शीर्ष अदालत ने केंद्र को केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई), प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) सहित जांच एजेंसियों के कार्यालयों में सीसीटीवी कैमरे और रिकॉर्डिंग उपकरण लगाने का निर्देश दिया था. दवे ने मंगलवार को पीठ को बताया कि उन्होंने उस मामले में एक रिपोर्ट दाखिल कर दी है, जिसमें दिसंबर 2020 में आदेश पारित किया गया था. पीठ ने पूछा, 'पिछली तारीख पर, हमने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से कुछ विशिष्ट प्रश्न पूछे थे. क्या उन्होंने जवाब दिया है?' 11 राज्यों ने दाखिल किए हलफनामे पीठ को बताया गया कि स्वतः संज्ञान मामले में केवल 11 राज्यों ने ही अनुपालन हलफनामे दाखिल किए हैं. दवे ने कहा कि पहले के मामले में भी कई राज्यों ने अनुपालन हलफनामे दाखिल नहीं किए थे. पीठ ने कहा कि मध्यप्रदेश ने कदम उठाया है और राज्य का प्रत्येक पुलिस थाना और चौकी जिला नियंत्रण कक्ष स्थित केंद्रीकृत केंद्र से जुड़ा हुआ है. पीठ ने कहा, 'यह उल्लेखनीय है.' दवे ने कहा कि तीन केंद्रीय जांच एजेंसियों ने सीसीटीवी कैमरे लगवाए हैं, लेकिन अन्य तीन ने अब तक शीर्ष अदालत के निर्देशों का पालन नहीं किया है. मेहता ने कहा, 'यह अदालत का फैसला है, हम बाध्य हैं. लेकिन पुलिस थानों के अंदर सीसीटीवी होना भी जांच के लिए प्रतिकूल हो सकता है. अब फैसला आ गया है, हम बहस नहीं कर सकते.' पीठ ने कहा कि अमेरिका में फुटेज की ‘लाइव स्ट्रीमिंग’ होती है. सॉलिसिटर जनरल ने कहा, 'अमेरिका में निजी जेलें भी हैं, जहां लगभग रिसॉर्ट स्तर की सुविधाएं मिलती हैं.' पीठ ने कहा कि वह पहले से ही खुली जेल से संबंधित मामले पर विचार कर रही है. पीठ ने कहा, 'आपको किसी अन्य व्यवस्था की आवश्यकता नहीं है. जेलों में भीड़भाड़ और हिंसा की नियमित शिकायतों जैसी कई समस्याओं का यह सबसे अच्छा समाधान है.' पीठ ने यह भी कहा कि इससे वित्तीय बोझ कम करने में भी मदद मिलेगी. 16 दिसंबर को होगी अगली सुनवाई न्यायालय ने अब तक अनुपालन हलफनामे दाखिल नहीं करने वाले राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को ऐसा करने के लिए तीन सप्ताह का समय दिया तथा मामले की सुनवाई 16 दिसंबर के लिए निर्धारित की. पीठ ने कहा कि यदि उक्त तिथि तक शेष राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा अनुपालन हलफनामे दाखिल नहीं किए जाते हैं, तो गृह विभाग में उनके प्रधान सचिव आदेशों का अनुपालन न करने के अपने-अपने स्पष्टीकरण के साथ अदालत के समक्ष उपस्थित रहेंगे. मेहता ने कहा कि केंद्रीय गृह सचिव पूरी प्रक्रिया में शामिल नहीं हैं क्योंकि कोई भी पुलिस थाना उनके नियंत्रण में नहीं है. पीठ ने कहा कि शीर्ष अदालत का पिछला निर्देश केंद्रीय जांच एजेंसियों के लिए था. पीठ ने कहा कि अगर अनुपालन हलफनामा दाखिल नहीं किया जाएगा, तो केंद्रीय जांच एजेंसियों के संबंधित निदेशकों को अदालत में आना पड़ सकता है. पीठ ने कहा कि दवे स्वत: संज्ञान मामले में भी ‘एमिकस क्यूरी’ के रूप में उसकी सहायता करेंगे.
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को हिरासत में हिंसा और मौत को लेकर सख्त टिप्पणी की है. कोर्ट की तरफ से कहा गया है, "हिंसा और मौत व्यवस्था पर एक धब्बा है. देश इसे बर्दाश्त नहीं करेगा."
मामले में सुनवाई न्यायमूर्ति विक्रमनाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने की है. इस मामले में पारित अपने आदेश में माननीय अदालत ने कहा, कि राजस्थान में आठ महीनों में पुलिस हिरासत में 11 मौते हुई हैं. पीठ ने सख्त लहजे में कहा है, 'अब देश इसे बर्दाश्त नहीं करेगा. यह व्यवस्था पर एक धब्बा है. आप हिरासत में मृत्यु नहीं होने दे सकते.'
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि कोई भी हिरासत में हुई मौतों को न तो उचित ठहरा सकता है और न ही उचित ठहराने का प्रयास कर सकता है. पीठ ने केंद्र से यह भी पूछा कि उसने इस मामले में अनुपालन हलफनामा क्यों नहीं दाखिल किया है.
केंद्र अदालत को क्यों हल्के में ले रहा?
न्यायमूर्ति विक्रमनाथ ने पूछा, 'केंद्र इस अदालत को बहुत हल्के में ले रहा है। क्यों?'
मेहता ने कहा कि वह स्वतः संज्ञान मामले में पेश नहीं हो रहे हैं, लेकिन कोई भी अदालत को हल्के में नहीं ले सकता. उन्होंने कहा कि केंद्र तीन सप्ताह के भीतर अनुपालन हलफनामा दाखिल करेगा.
सितंबर में, शीर्ष अदालत ने मीडिया की एक खबर का स्वतः संज्ञान लिया था, जिसमें कहा गया था कि 2025 के पहले आठ महीनों में राजस्थान में पुलिस हिरासत में 11 लोगों की मौत हुई. इनमें से सात मामले उदयपुर संभाग से आए थे. एक अलग मामले में, शीर्ष अदालत ने 2018 में मानवाधिकारों के हनन को रोकने के लिए पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरे लगाने का आदेश दिया था.
मंगलवार को सुनवाई के दौरान, पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे की दलीलें भी सुनीं, जो एक अलग मामले में एमिकस क्यूरी (न्यायलय के मित्र) के रूप में शीर्ष अदालत की सहायता कर रहे हैं. इस मामले में शीर्ष अदालत ने दिसंबर 2020 में एक आदेश पारित किया था.
उस आदेश में शीर्ष अदालत ने केंद्र को केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई), प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) सहित जांच एजेंसियों के कार्यालयों में सीसीटीवी कैमरे और रिकॉर्डिंग उपकरण लगाने का निर्देश दिया था.
दवे ने मंगलवार को पीठ को बताया कि उन्होंने उस मामले में एक रिपोर्ट दाखिल कर दी है, जिसमें दिसंबर 2020 में आदेश पारित किया गया था. पीठ ने पूछा, 'पिछली तारीख पर, हमने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से कुछ विशिष्ट प्रश्न पूछे थे. क्या उन्होंने जवाब दिया है?'
11 राज्यों ने दाखिल किए हलफनामे
पीठ को बताया गया कि स्वतः संज्ञान मामले में केवल 11 राज्यों ने ही अनुपालन हलफनामे दाखिल किए हैं. दवे ने कहा कि पहले के मामले में भी कई राज्यों ने अनुपालन हलफनामे दाखिल नहीं किए थे.
पीठ ने कहा कि मध्यप्रदेश ने कदम उठाया है और राज्य का प्रत्येक पुलिस थाना और चौकी जिला नियंत्रण कक्ष स्थित केंद्रीकृत केंद्र से जुड़ा हुआ है. पीठ ने कहा, 'यह उल्लेखनीय है.'
दवे ने कहा कि तीन केंद्रीय जांच एजेंसियों ने सीसीटीवी कैमरे लगवाए हैं, लेकिन अन्य तीन ने अब तक शीर्ष अदालत के निर्देशों का पालन नहीं किया है.
मेहता ने कहा, 'यह अदालत का फैसला है, हम बाध्य हैं. लेकिन पुलिस थानों के अंदर सीसीटीवी होना भी जांच के लिए प्रतिकूल हो सकता है. अब फैसला आ गया है, हम बहस नहीं कर सकते.'
पीठ ने कहा कि अमेरिका में फुटेज की ‘लाइव स्ट्रीमिंग’ होती है. सॉलिसिटर जनरल ने कहा, 'अमेरिका में निजी जेलें भी हैं, जहां लगभग रिसॉर्ट स्तर की सुविधाएं मिलती हैं.'
पीठ ने कहा कि वह पहले से ही खुली जेल से संबंधित मामले पर विचार कर रही है. पीठ ने कहा, 'आपको किसी अन्य व्यवस्था की आवश्यकता नहीं है. जेलों में भीड़भाड़ और हिंसा की नियमित शिकायतों जैसी कई समस्याओं का यह सबसे अच्छा समाधान है.' पीठ ने यह भी कहा कि इससे वित्तीय बोझ कम करने में भी मदद मिलेगी.
16 दिसंबर को होगी अगली सुनवाई
न्यायालय ने अब तक अनुपालन हलफनामे दाखिल नहीं करने वाले राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को ऐसा करने के लिए तीन सप्ताह का समय दिया तथा मामले की सुनवाई 16 दिसंबर के लिए निर्धारित की.
पीठ ने कहा कि यदि उक्त तिथि तक शेष राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा अनुपालन हलफनामे दाखिल नहीं किए जाते हैं, तो गृह विभाग में उनके प्रधान सचिव आदेशों का अनुपालन न करने के अपने-अपने स्पष्टीकरण के साथ अदालत के समक्ष उपस्थित रहेंगे.
मेहता ने कहा कि केंद्रीय गृह सचिव पूरी प्रक्रिया में शामिल नहीं हैं क्योंकि कोई भी पुलिस थाना उनके नियंत्रण में नहीं है. पीठ ने कहा कि शीर्ष अदालत का पिछला निर्देश केंद्रीय जांच एजेंसियों के लिए था.
पीठ ने कहा कि अगर अनुपालन हलफनामा दाखिल नहीं किया जाएगा, तो केंद्रीय जांच एजेंसियों के संबंधित निदेशकों को अदालत में आना पड़ सकता है. पीठ ने कहा कि दवे स्वत: संज्ञान मामले में भी ‘एमिकस क्यूरी’ के रूप में उसकी सहायता करेंगे.
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