'राज्य पुलिस केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों की जांच कर सकती है', बोला सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा कि रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार के अपराधों के मामले में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत राज्य पुलिस के अधिकारी केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ जांच कर सकते हैं और आरोप पत्र दाखिल कर सकते हैं. कोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि राज्य पुलिस द्वारा केंद्र सरकार के किसी कर्मचारी के खिलाफ मामला दर्ज करने से पहले केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) की पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं है. जस्टिस जे बी पारदीवाला और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने सोमवार (19 जनवरी, 2026) को कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अपराधों की जांच राज्य एजेंसी या केंद्रीय एजेंसी या किसी भी पुलिस एजेंसी द्वारा की जा सकती है, इस शर्त के साथ कि पुलिस अधिकारी एक विशेष रैंक का होना चाहिए. पीठ ने कहा कि इसका उल्लेख अधिनियम की धारा 17 में देखा जा सकता है. धारा 17 राज्य पुलिस या राज्य की किसी विशेष एजेंसी को केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार और कदाचार से संबंधित मामलों को दर्ज या जांच करने से नहीं रोकती है. पीठ ने कहा, 'सुविधा और काम के दोहराव से बचने के लिए, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को केंद्र सरकार और उसके उपक्रमों के कर्मचारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के मामलों की जांच का जिम्मा सौंपा गया है, और भ्रष्टाचार रोधी ब्यूरो - राज्य की एक विशेष जांच एजेंसी - को राज्य सरकार और उसके उपक्रमों के कर्मचारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के मामलों की जांच का जिम्मा सौंपा गया है.' कोर्ट ने कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अपराध संज्ञेय होते हैं और इसलिए राज्य पुलिस द्वारा इनकी जांच की जा सकती है. सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश राजस्थान हाईकोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखते हुए आया है, जिसमें केंद्र सरकार के एक कर्मचारी के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले को रद्द करने से इनकार कर दिया गया था. हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया था कि भले ही आरोपी केंद्रीय सरकारी कर्मचारी था, फिर भी राजस्थान एसीबी (भ्रष्टाचार रोधी ब्यूरो) को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के प्रावधानों के तहत आपराधिक मामला दर्ज करने का अधिकार था. सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'हाईकोर्ट ने यह कहते हुए सही दृष्टिकोण अपनाया कि यह कहना गलत है कि केवल सीबीआई ही अभियोजन शुरू कर सकती है.' यह भी पढ़ें:-आपने खुद क्या किया है? आवारा कुत्तों के मामले में मेनका गांधी पर भड़का सुप्रीम कोर्ट, कहा- आपकी भाषा, बॉडी लैंग्वेज कैसी....
सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा कि रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार के अपराधों के मामले में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत राज्य पुलिस के अधिकारी केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ जांच कर सकते हैं और आरोप पत्र दाखिल कर सकते हैं. कोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि राज्य पुलिस द्वारा केंद्र सरकार के किसी कर्मचारी के खिलाफ मामला दर्ज करने से पहले केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) की पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं है.
जस्टिस जे बी पारदीवाला और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने सोमवार (19 जनवरी, 2026) को कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अपराधों की जांच राज्य एजेंसी या केंद्रीय एजेंसी या किसी भी पुलिस एजेंसी द्वारा की जा सकती है, इस शर्त के साथ कि पुलिस अधिकारी एक विशेष रैंक का होना चाहिए. पीठ ने कहा कि इसका उल्लेख अधिनियम की धारा 17 में देखा जा सकता है.
धारा 17 राज्य पुलिस या राज्य की किसी विशेष एजेंसी को केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार और कदाचार से संबंधित मामलों को दर्ज या जांच करने से नहीं रोकती है. पीठ ने कहा, 'सुविधा और काम के दोहराव से बचने के लिए, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को केंद्र सरकार और उसके उपक्रमों के कर्मचारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के मामलों की जांच का जिम्मा सौंपा गया है, और भ्रष्टाचार रोधी ब्यूरो - राज्य की एक विशेष जांच एजेंसी - को राज्य सरकार और उसके उपक्रमों के कर्मचारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के मामलों की जांच का जिम्मा सौंपा गया है.'
कोर्ट ने कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अपराध संज्ञेय होते हैं और इसलिए राज्य पुलिस द्वारा इनकी जांच की जा सकती है. सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश राजस्थान हाईकोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखते हुए आया है, जिसमें केंद्र सरकार के एक कर्मचारी के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले को रद्द करने से इनकार कर दिया गया था.
हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया था कि भले ही आरोपी केंद्रीय सरकारी कर्मचारी था, फिर भी राजस्थान एसीबी (भ्रष्टाचार रोधी ब्यूरो) को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के प्रावधानों के तहत आपराधिक मामला दर्ज करने का अधिकार था. सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'हाईकोर्ट ने यह कहते हुए सही दृष्टिकोण अपनाया कि यह कहना गलत है कि केवल सीबीआई ही अभियोजन शुरू कर सकती है.'
What's Your Reaction?