'ये आपसी रंजिश निपटाने का प्लेटफॉर्म नही', सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक कानून का दुरुपयोग करने वालों को दी चेतावनी

सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी दी है कि व्यक्तिगत दुश्मनी निपटाने के लिए आपराधिक कानून का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए. कोर्ट ने कहा कि यह आपसी रंजिश के लिए प्रतिशोधात्मक कार्यवाही का प्लेटफॉर्म नहीं बन सकता है. कोर्ट ने सोमवार (24 नवंबर, 2025) को कुछ लोगों की ओर से अपने निहित स्वार्थों के लिए न्यायिक प्रणाली के दुरुपयोग की हालिया प्रवृत्ति की निंदा करते हुए यह टिप्पणी की है. पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच गुवाहाटी के एक व्यवसायी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 420 (धोखाधड़ी) और धारा 406 (आपराधिक विश्वासघात) के तहत दर्ज एक आपराधिक मामले पर सुनवाई कर रही थी. कोर्ट ने उनके खिलाफ मुकदमा खारिज करते हुए यह बात कही है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कुछ सालों में लोग अपने व्यक्तिगत स्वार्थ, मकसद और एजेंडा को पूरा करने के लिए आपराधिक कानून का दुरुपयोग कर रहे हैं. कोर्ट ने कहा, 'अदालतों को ऐसी प्रवृत्तियों के प्रति सतर्क रहना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारे समाज के ताने-बाने पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले चूक और अपराध के कृत्यों को शुरू में ही रोक दिया जाए.' सुप्रीम कोर्ट ने शिकायत और साक्ष्यों का अवलोकन करते हुए कहा कि व्यवसायी इंदर चंद बागड़ी के विरुद्ध धोखाधड़ी और आपराधिक विश्वासघात का पुख्ता मामला नहीं बनाया जा सका है और शिकायतकर्ता जगदीश प्रसाद बागड़ी के पास विवादित संपत्ति के विक्रय विलेख को रद्द करने और अपने संविदात्मक अधिकारों के उल्लंघन के लिए हर्जाना मांगने के लिए दीवानी कानून के तहत अन्य उपाय मौजूद हैं. बेंच ने कहा, 'आपराधिक कानून को आपसी रंजिश और प्रतिशोध की भावना से प्रतिशोधात्मक कार्यवाही शुरू करने का मंच नहीं बनना चाहिए.' कोर्ट ने यह भी कहा कि इंदर चंद बागड़ी को किसी भी तरह की आपराधिक मंशा का दोषी नहीं ठहराया जा सकता और इसलिए अभियोजन पक्ष की ओर से उनके ऊपर लगाए गए आरोप टिकने योग्य नहीं हैं. सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा बनाम भजन लाल मामले में 1992 के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट का मानना ​​है कि इंद्र चंद बागड़ी के खिलाफ आपराधिक इरादे और अन्य आरोप दुर्भावनापूर्ण इरादे से लगाए गए हैं और वर्तमान अभियोजन को जारी रखने की अनुमति देना न तो समीचीन है और न ही न्याय के हित में है.

Nov 25, 2025 - 15:30
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'ये आपसी रंजिश निपटाने का प्लेटफॉर्म नही', सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक कानून का दुरुपयोग करने वालों को दी चेतावनी

सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी दी है कि व्यक्तिगत दुश्मनी निपटाने के लिए आपराधिक कानून का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए. कोर्ट ने कहा कि यह आपसी रंजिश के लिए प्रतिशोधात्मक कार्यवाही का प्लेटफॉर्म नहीं बन सकता है. कोर्ट ने सोमवार (24 नवंबर, 2025) को कुछ लोगों की ओर से अपने निहित स्वार्थों के लिए न्यायिक प्रणाली के दुरुपयोग की हालिया प्रवृत्ति की निंदा करते हुए यह टिप्पणी की है.

पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच गुवाहाटी के एक व्यवसायी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 420 (धोखाधड़ी) और धारा 406 (आपराधिक विश्वासघात) के तहत दर्ज एक आपराधिक मामले पर सुनवाई कर रही थी. कोर्ट ने उनके खिलाफ मुकदमा खारिज करते हुए यह बात कही है.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कुछ सालों में लोग अपने व्यक्तिगत स्वार्थ, मकसद और एजेंडा को पूरा करने के लिए आपराधिक कानून का दुरुपयोग कर रहे हैं. कोर्ट ने कहा, 'अदालतों को ऐसी प्रवृत्तियों के प्रति सतर्क रहना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारे समाज के ताने-बाने पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले चूक और अपराध के कृत्यों को शुरू में ही रोक दिया जाए.'

सुप्रीम कोर्ट ने शिकायत और साक्ष्यों का अवलोकन करते हुए कहा कि व्यवसायी इंदर चंद बागड़ी के विरुद्ध धोखाधड़ी और आपराधिक विश्वासघात का पुख्ता मामला नहीं बनाया जा सका है और शिकायतकर्ता जगदीश प्रसाद बागड़ी के पास विवादित संपत्ति के विक्रय विलेख को रद्द करने और अपने संविदात्मक अधिकारों के उल्लंघन के लिए हर्जाना मांगने के लिए दीवानी कानून के तहत अन्य उपाय मौजूद हैं.

बेंच ने कहा, 'आपराधिक कानून को आपसी रंजिश और प्रतिशोध की भावना से प्रतिशोधात्मक कार्यवाही शुरू करने का मंच नहीं बनना चाहिए.' कोर्ट ने यह भी कहा कि इंदर चंद बागड़ी को किसी भी तरह की आपराधिक मंशा का दोषी नहीं ठहराया जा सकता और इसलिए अभियोजन पक्ष की ओर से उनके ऊपर लगाए गए आरोप टिकने योग्य नहीं हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा बनाम भजन लाल मामले में 1992 के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट का मानना ​​है कि इंद्र चंद बागड़ी के खिलाफ आपराधिक इरादे और अन्य आरोप दुर्भावनापूर्ण इरादे से लगाए गए हैं और वर्तमान अभियोजन को जारी रखने की अनुमति देना न तो समीचीन है और न ही न्याय के हित में है.

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