'ये अदालत है युद्ध का मैदान नहीं', शादी खत्म करते हुए कपल से बोला सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (20 जनवरी, 2026) को कहा कि अदालतें कोई युद्ध का मैदान नहीं हैं कि दंपति लड़ते रहें और अपने गिले शिकवे निपटाने के लिए अदालतों का समय जाया करें. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि झगड़ते रहने वाले दंपतियों को अपने गिले शिकवे निपटाने के लिए अदालतों को युद्धक्षेत्र बनाकर व्यवस्था को बाधित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती. कोर्ट ने कहा कि उन्हें विवाद के जल्दी समाधान के लिए मध्यस्थता का रास्ता अपनाना चाहिए, क्योंकि अदालत में आरोप और प्रत्यारोप विवाद को और बढ़ाते हैं. जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने एक दंपति के बीच विवाह भंग करते हुए ये टिप्पणियां कीं. दंपति केवल 65 दिनों तक साथ रहा और दोनों एक दशक से अधिक समय से अलग रह रहे थे. विवाह में सुलह की कोई गुंजाइश नहीं देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्ति का प्रयोग करते हुए विवाह को भंग कर दिया. कोर्ट ने कहा, 'झगड़ने वाले दंपतियों को अदालतों को अपना युद्धक्षेत्र बनाकर और व्यवस्था को बाधित करके अपने विवादों को निपटाने की अनुमति नहीं दी जा सकती. अगर दोनों के बीच सामंजस्य नहीं हो सकता है तो विवादों के शीघ्र समाधान के लिए तरीके उपलब्ध हैं.' बेंच ने कहा, 'मध्यस्थता की प्रक्रिया मुकदमे की कार्यवाही शुरू होने से पहले और बाद में भी अपनाई जा सकती है. जब पक्षकार खासकर आपराधिक मामलों में एक-दूसरे के खिलाफ मुकदमा शुरू करते हैं तो सुलह की गुंजाइश कम हो जाती है, लेकिन इसे नकारा नहीं जा सकता.' सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक विवाद में जब भी पक्षों के बीच मतभेद होते हैं तो दूसरे पक्ष को सबक सिखाने की तैयारी शुरू हो जाती है. बेंच ने कहा, 'सबूत जुटाए जाते हैं और कुछ मामलों में तो गढ़े भी जाते हैं, जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) के युग में अधिक आम हो गया है. झूठे आरोप लगाना आम बात है क्योंकि किसी भी वैवाहिक विवाद का समाज की संरचना पर तत्काल प्रभाव पड़ता है, इसलिए सभी संबंधित पक्षों का यह कर्तव्य है कि वे पक्षों द्वारा कठोर और अड़ियल रुख अपनाने से पहले ही इसे जल्द से जल्द सुलझाने का भरसक प्रयास करें.' कोर्ट ने स्वीकार किया कि बच्चे या बच्चों के जन्म के बाद समस्या अधिक होती है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कई बार बच्चा झगड़ने वाले पक्षों के बीच विवाद का कारण बन जाता है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बदलते समय में वैवाहिक मुकदमों में कई गुना वृद्धि हुई है और इसमें शामिल सभी लोगों, जिनमें पक्षों के परिवार के सदस्य भी शामिल हैं, उनका यह कर्तव्य है कि वे किसी भी दीवानी या आपराधिक कार्यवाही शुरू होने से पहले विवादों को सुलझाने के लिए पूरी कोशिश करें.   यह भी पढ़ें:-Odisha: बम धमकी मिलने के बाद पुरी के जगन्नाथ मंदिर में कड़ी सुरक्षा, पूरे शहर में हाई अलर्ट घोषित

Jan 21, 2026 - 15:30
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'ये अदालत है युद्ध का मैदान नहीं', शादी खत्म करते हुए कपल से बोला सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (20 जनवरी, 2026) को कहा कि अदालतें कोई युद्ध का मैदान नहीं हैं कि दंपति लड़ते रहें और अपने गिले शिकवे निपटाने के लिए अदालतों का समय जाया करें.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि झगड़ते रहने वाले दंपतियों को अपने गिले शिकवे निपटाने के लिए अदालतों को युद्धक्षेत्र बनाकर व्यवस्था को बाधित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती. कोर्ट ने कहा कि उन्हें विवाद के जल्दी समाधान के लिए मध्यस्थता का रास्ता अपनाना चाहिए, क्योंकि अदालत में आरोप और प्रत्यारोप विवाद को और बढ़ाते हैं.

जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने एक दंपति के बीच विवाह भंग करते हुए ये टिप्पणियां कीं. दंपति केवल 65 दिनों तक साथ रहा और दोनों एक दशक से अधिक समय से अलग रह रहे थे. विवाह में सुलह की कोई गुंजाइश नहीं देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्ति का प्रयोग करते हुए विवाह को भंग कर दिया.

कोर्ट ने कहा, 'झगड़ने वाले दंपतियों को अदालतों को अपना युद्धक्षेत्र बनाकर और व्यवस्था को बाधित करके अपने विवादों को निपटाने की अनुमति नहीं दी जा सकती. अगर दोनों के बीच सामंजस्य नहीं हो सकता है तो विवादों के शीघ्र समाधान के लिए तरीके उपलब्ध हैं.'

बेंच ने कहा, 'मध्यस्थता की प्रक्रिया मुकदमे की कार्यवाही शुरू होने से पहले और बाद में भी अपनाई जा सकती है. जब पक्षकार खासकर आपराधिक मामलों में एक-दूसरे के खिलाफ मुकदमा शुरू करते हैं तो सुलह की गुंजाइश कम हो जाती है, लेकिन इसे नकारा नहीं जा सकता.'

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक विवाद में जब भी पक्षों के बीच मतभेद होते हैं तो दूसरे पक्ष को सबक सिखाने की तैयारी शुरू हो जाती है. बेंच ने कहा, 'सबूत जुटाए जाते हैं और कुछ मामलों में तो गढ़े भी जाते हैं, जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) के युग में अधिक आम हो गया है. झूठे आरोप लगाना आम बात है क्योंकि किसी भी वैवाहिक विवाद का समाज की संरचना पर तत्काल प्रभाव पड़ता है, इसलिए सभी संबंधित पक्षों का यह कर्तव्य है कि वे पक्षों द्वारा कठोर और अड़ियल रुख अपनाने से पहले ही इसे जल्द से जल्द सुलझाने का भरसक प्रयास करें.'

कोर्ट ने स्वीकार किया कि बच्चे या बच्चों के जन्म के बाद समस्या अधिक होती है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कई बार बच्चा झगड़ने वाले पक्षों के बीच विवाद का कारण बन जाता है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बदलते समय में वैवाहिक मुकदमों में कई गुना वृद्धि हुई है और इसमें शामिल सभी लोगों, जिनमें पक्षों के परिवार के सदस्य भी शामिल हैं, उनका यह कर्तव्य है कि वे किसी भी दीवानी या आपराधिक कार्यवाही शुरू होने से पहले विवादों को सुलझाने के लिए पूरी कोशिश करें.

 

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