'नाबालिग भाई-बहनों की जमीन नहीं बेच सकते', गुवाहटी HC का बड़ा फैसला
असम के गुवाहाटी स्थित हाई कोर्ट ने हाल ही में साल 1975 में खरीदी गई जमीन पर महिला की दावेदारी को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर अपना फैसला सुनाया है. कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करते हुए टिप्पणी की कि जमीन बिक्री को चुनौती देने वाले परिवार के सदस्यों ने इस पर दावा करने में काफी देरी कर दी. हालांकि, गुवाहाटी हाई कोर्ट ने मामले में सुनवाई के दौरान यह पाया कि जब संबंधित जमीन बेची गई थी, उस वक्त बड़े भाई की तरफ से की गई नाबालिग भाई-बहनों के हिस्से की जमीन की बिक्री वैध नहीं थी, लेकिन पिछले 30 सालों से ज्यादा समय से महिला उक्त जमीन पर काबिज है. इसके साथ ही, कोर्ट ने बड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि इस्लामी कानून के तहत बड़े भाई को अपने नाबालिग भाई-बहनों के हिस्से की जमीन बेचने का हक नहीं है. गुवाहाटी हाई कोर्ट ने इस मामले में इसी महीने की 24 तारीख यानी 24 अगस्त, 2026 को अपना अंतिम फैसला सुना दिया है. कैसे खड़ा हुआ पूरा विवाद? दरअसल, कोर्ट के आदेश से मिली जानकारी के मुताबिक, तारुबाला साहा ने 18 फरवरी, 1975 को एक रजिस्टर्ड सेल डीड के जरिए 4 बीघा, 2 कट्ठा और 10 लेचा जमीन खरीदी थी. इस जमीन के उस वक्त असली मालिक याद अली थे, जिनके कई बच्चे थे, जो उनकी मौत के वक्त नाबालिग थे, लेकिन याद अली के बड़े बेटे नागर अली ने अपने और अपने नाबालिग भाई-बहनों की तरफ से वह जमीन तारुबाला साहा को बेच दी. साहा ने अदालत को बताया कि नागर अली से जमीन खरीदारी करने के बाद उन्होंने उस जमीन पर कब्जा बनाए रखा था और उस जमीन पर मजदूरों से खेती भी करवाती थी. इसके साथ ही, उनका नाम जमीन के रिकॉर्ड्स में भी दर्ज था. उन्होंने आरोप लगाया कि प्रतिवादियों ने 15 फरवरी, 2008 को उन्हें जमीन से बाहर निकाल दिया और वहां अपना मकान बना लिया था. वहीं, दूसरी तरफ नागर अली के प्रतिवादी भाई-बहनों ने अदालत में उक्त की जमीन की बिक्री को अवैध करार दिया और कहा कि नागर अली को अपने नाबालिग भाइयों और बहनों के हिस्से की जमीनों को बेचने को कोई हक नहीं था. नागर अली को कोर्ट की तरफ से उनके भाई-बहनों का गार्जियन भी नियुक्त नहीं किया गया था. ऐसे में उन्होंने जमीन की सेल डीड को कैंसिल करने की मांग की और उस पर अपना मालिकाना हक जताया. दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद असम की एक निचली अदालत ने इस मामले में पक्षकार तारुबाला साहा के हक पर फैसले सुनाया और उन्हें उक्त जमीन के मालिकाना हक देने का आदेश दिया. साथ ही, कोर्ट ने प्रतिवादियों के दावों और उनकी तरफ से की गई अपील को भी खारिज कर दिया गया. गुवाहाटी हाई कोर्ट ने मामले में क्या कहा? गुवाहाटी हाई कोर्ट में जस्टिस कल्याण राय सुराना ने सुनवाई के दौरान इस बात पर सहमति जताई कि नागर अली सिर्फ बड़ा भाई होने के नाते अपने नाबालिग भाई-बहनों के हिस्से की जमीनों को कानूनी रूप से नहीं बेच सकता था, लेकिन अदालत ने यह भी माना कि करीब 30-33 सालों से तारुबाला साहा ने अपना कब्जा बनाए रखा, उस पर मजदूरों से खेती भी करवाई थी और उन लोगों के जरिए जमीन पर अपना कब्जा भी साबित कराया, जो उनके लिए जमीन पर खेती करते थे. लिहाजा अदालत ने जमीन पर तारुबाला साहा की फिर से कब्जा देने का आदेश दिया. जस्टिस सुराना ने आगे कहा, ‘प्रतिवादियों को कानून के तहत निर्धारित समय सीमा के अंदर जमीन की बिक्री को चुनौती नहीं दी. उन्हें अपने बालिग होने के बाद या जमीन को साहा को सौंपे जाने के बाद एक तय समयसीमा में ही इस पर अपना दावा करना चाहिए था. उन्होंने इस मामले में काफी देरी कर दी, जिसका मतलब है कि अब जमीन के सेल डीड को कैंसिल नहीं किया जा सकता है और न ही वे जमीन वापस लेने का दावा कर सकते हैं.’ यह भी पढ़ेंः तेजाब की रिटेल बिक्री पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र-राज्यों से मांगी रिपोर्ट
असम के गुवाहाटी स्थित हाई कोर्ट ने हाल ही में साल 1975 में खरीदी गई जमीन पर महिला की दावेदारी को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर अपना फैसला सुनाया है. कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करते हुए टिप्पणी की कि जमीन बिक्री को चुनौती देने वाले परिवार के सदस्यों ने इस पर दावा करने में काफी देरी कर दी.
हालांकि, गुवाहाटी हाई कोर्ट ने मामले में सुनवाई के दौरान यह पाया कि जब संबंधित जमीन बेची गई थी, उस वक्त बड़े भाई की तरफ से की गई नाबालिग भाई-बहनों के हिस्से की जमीन की बिक्री वैध नहीं थी, लेकिन पिछले 30 सालों से ज्यादा समय से महिला उक्त जमीन पर काबिज है.
इसके साथ ही, कोर्ट ने बड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि इस्लामी कानून के तहत बड़े भाई को अपने नाबालिग भाई-बहनों के हिस्से की जमीन बेचने का हक नहीं है. गुवाहाटी हाई कोर्ट ने इस मामले में इसी महीने की 24 तारीख यानी 24 अगस्त, 2026 को अपना अंतिम फैसला सुना दिया है.
कैसे खड़ा हुआ पूरा विवाद?
दरअसल, कोर्ट के आदेश से मिली जानकारी के मुताबिक, तारुबाला साहा ने 18 फरवरी, 1975 को एक रजिस्टर्ड सेल डीड के जरिए 4 बीघा, 2 कट्ठा और 10 लेचा जमीन खरीदी थी. इस जमीन के उस वक्त असली मालिक याद अली थे, जिनके कई बच्चे थे, जो उनकी मौत के वक्त नाबालिग थे, लेकिन याद अली के बड़े बेटे नागर अली ने अपने और अपने नाबालिग भाई-बहनों की तरफ से वह जमीन तारुबाला साहा को बेच दी.
साहा ने अदालत को बताया कि नागर अली से जमीन खरीदारी करने के बाद उन्होंने उस जमीन पर कब्जा बनाए रखा था और उस जमीन पर मजदूरों से खेती भी करवाती थी. इसके साथ ही, उनका नाम जमीन के रिकॉर्ड्स में भी दर्ज था. उन्होंने आरोप लगाया कि प्रतिवादियों ने 15 फरवरी, 2008 को उन्हें जमीन से बाहर निकाल दिया और वहां अपना मकान बना लिया था.
वहीं, दूसरी तरफ नागर अली के प्रतिवादी भाई-बहनों ने अदालत में उक्त की जमीन की बिक्री को अवैध करार दिया और कहा कि नागर अली को अपने नाबालिग भाइयों और बहनों के हिस्से की जमीनों को बेचने को कोई हक नहीं था. नागर अली को कोर्ट की तरफ से उनके भाई-बहनों का गार्जियन भी नियुक्त नहीं किया गया था. ऐसे में उन्होंने जमीन की सेल डीड को कैंसिल करने की मांग की और उस पर अपना मालिकाना हक जताया.
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद असम की एक निचली अदालत ने इस मामले में पक्षकार तारुबाला साहा के हक पर फैसले सुनाया और उन्हें उक्त जमीन के मालिकाना हक देने का आदेश दिया. साथ ही, कोर्ट ने प्रतिवादियों के दावों और उनकी तरफ से की गई अपील को भी खारिज कर दिया गया.
गुवाहाटी हाई कोर्ट ने मामले में क्या कहा?
गुवाहाटी हाई कोर्ट में जस्टिस कल्याण राय सुराना ने सुनवाई के दौरान इस बात पर सहमति जताई कि नागर अली सिर्फ बड़ा भाई होने के नाते अपने नाबालिग भाई-बहनों के हिस्से की जमीनों को कानूनी रूप से नहीं बेच सकता था, लेकिन अदालत ने यह भी माना कि करीब 30-33 सालों से तारुबाला साहा ने अपना कब्जा बनाए रखा, उस पर मजदूरों से खेती भी करवाई थी और उन लोगों के जरिए जमीन पर अपना कब्जा भी साबित कराया, जो उनके लिए जमीन पर खेती करते थे. लिहाजा अदालत ने जमीन पर तारुबाला साहा की फिर से कब्जा देने का आदेश दिया.
जस्टिस सुराना ने आगे कहा, ‘प्रतिवादियों को कानून के तहत निर्धारित समय सीमा के अंदर जमीन की बिक्री को चुनौती नहीं दी. उन्हें अपने बालिग होने के बाद या जमीन को साहा को सौंपे जाने के बाद एक तय समयसीमा में ही इस पर अपना दावा करना चाहिए था. उन्होंने इस मामले में काफी देरी कर दी, जिसका मतलब है कि अब जमीन के सेल डीड को कैंसिल नहीं किया जा सकता है और न ही वे जमीन वापस लेने का दावा कर सकते हैं.’
यह भी पढ़ेंः तेजाब की रिटेल बिक्री पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र-राज्यों से मांगी रिपोर्ट
What's Your Reaction?