दावोस में नजर आएगा भारत का डिप्लोमैटिक पावर शो! पॉलिटिक्स, इकोनॉमी और डिप्लोमेसी की तय होगी नई दिशा

स्विट्जरलैंड के दावोस में होने वाले वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) की सालाना बैठक इस बार भारत के लिए सिर्फ एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन नहीं, बल्कि अपनी वैश्विक ताकत दिखाने का बड़ा मंच बनने जा रही है. पांच दिन तक चलने वाले इस शिखर सम्मेलन में दुनिया की राजनीति, अर्थव्यवस्था और कूटनीति की दिशा तय करने वाले नेता जुटेंगे और भारत की मौजूदगी इस बार पहले से कहीं ज्यादा मजबूत और प्रभावशाली होगी. दावोस में इस बार भारत की भूमिका सिर्फ निवेश बुलाने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि टैरिफ यानी आयात-निर्यात पर लगने वाले टैक्स को लेकर भी कूटनीति का बड़ा खेल दिखेगा. अब तक के सबसे बड़ी प्रतिनिधिमंडल के साथ दावोस पहुंचेंगे ट्रंप एक तरफ अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने अब तक के सबसे बड़े प्रतिनिधिमंडल के साथ दावोस पहुंच रहे हैं, तो दूसरी ओर भारत भी केंद्रीय मंत्रियों, कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों और देश के शीर्ष उद्योगपतियों के साथ ग्लोबल पावर टेबल पर अपनी दावेदारी पेश करने जा रहा है. यह साफ संकेत है कि दुनिया की बड़ी ताकतें अब भारत को केवल एक उभरती अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि वैश्विक संतुलन का अहम स्तंभ मानने लगी हैं. केंद्रीय मंत्रियों, कई राज्यों के CM और उद्योगपतियों के साथ पहुंचेगा भारत भारत की तरफ से रेल, आईटी, ऊर्जा, उद्योग और नागरिक उड्डयन जैसे अहम विभागों के केंद्रीय मंत्रियों के साथ महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, असम, मध्य प्रदेश, तेलंगाना और झारखंड जैसे राज्यों के मुख्यमंत्री भी दावोस में निवेशकों से सीधा संवाद करेंगे. इसके साथ ही रिलायंस, टाटा, महिंद्रा, इंफोसिस, विप्रो, भारती, JSW, बजाज, पेटीएम, जेरोधा जैसे कॉरपोरेट दिग्गजों की मौजूदगी यह दिखाती है कि भारत सिर्फ सरकारी स्तर पर नहीं, बल्कि निजी क्षेत्र के दम पर भी वैश्विक अर्थव्यवस्था को दिशा देने की स्थिति में है. दावोस में भारत के लिए सबसे बड़ा सवाल क्या? दावोस में भारत को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही गूंजेगा, ‘क्या भारत आने वाले सालों में चीन के विकल्प के रूप में दुनिया का नया मैन्युफैक्चरिंग और इन्वेस्टमेंट हब बन सकता है?’ भू-राजनीतिक तनाव, सप्लाई चेन में बदलाव और पश्चिमी देशों की चीन पर निर्भरता घटाने की रणनीति के बीच भारत खुद को एक भरोसेमंद, लोकतांत्रिक और स्थिर साझेदार के तौर पर पेश कर रहा है. वहीं, चर्चा इस बात पर भी होगी कि क्या भारत जल्द दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर बढ़ रहा है. इंफ्रास्ट्रक्चर, डिजिटल इकॉनमी, स्टार्टअप इकोसिस्टम, सेमीकंडक्टर, ग्रीन एनर्जी और मैन्युफैक्चरिंग में हो रहे निवेश को भारत अपनी ग्रोथ स्टोरी के सबूत के तौर पर रखेगा. जबकि कूटनीतिक नजरिए से देखें तो दावोस में भारत की यह मजबूत मौजूदगी एक स्पष्ट संदेश देती है कि भारत अब सिर्फ क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि वैश्विक नीति-निर्धारण में सक्रिय भूमिका निभाने को तैयार है. WEF के मंच में भारत किस मुद्दे पर देगा ज्यादा जोर? अमेरिका, यूरोप, चीन और वैश्विक संस्थाओं के शीर्ष नेताओं के बीच भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता, आर्थिक ताकत और राजनीतिक स्थिरता के साथ एक संतुलनकारी शक्ति के रूप में उभर रहा है. दावोस का मंच इस बार भारत के लिए निवेश आकर्षित करने से कहीं आगे की भूमिका निभाएगा. यहां भारत यह दिखाने की कोशिश करेगा कि 21वीं सदी की वैश्विक व्यवस्था में वह सिर्फ भागीदार नहीं, बल्कि दिशा देने वाला देश बनने की ओर बढ़ रहा है. हालांकि, सवाल अब यही है कि क्या दुनिया वाकई भारत को चीन के विकल्प और आने वाले दशक की आर्थिक धुरी के रूप में देखने के लिए तैयार है? दावोस की बहसें इसी सवाल का जवाब तलाशेंगी. यह भी पढ़ेंः 'मुझे नोबेल नहीं मिला, अब मुझे ग्रीनलैंड चाहिए', डोनाल्ड ट्रंप ने नॉर्वे के PM को लिखी धमकी भरी चिट्ठी

Jan 19, 2026 - 19:30
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दावोस में नजर आएगा भारत का डिप्लोमैटिक पावर शो! पॉलिटिक्स, इकोनॉमी और डिप्लोमेसी की तय होगी नई दिशा

स्विट्जरलैंड के दावोस में होने वाले वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) की सालाना बैठक इस बार भारत के लिए सिर्फ एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन नहीं, बल्कि अपनी वैश्विक ताकत दिखाने का बड़ा मंच बनने जा रही है. पांच दिन तक चलने वाले इस शिखर सम्मेलन में दुनिया की राजनीति, अर्थव्यवस्था और कूटनीति की दिशा तय करने वाले नेता जुटेंगे और भारत की मौजूदगी इस बार पहले से कहीं ज्यादा मजबूत और प्रभावशाली होगी.

दावोस में इस बार भारत की भूमिका सिर्फ निवेश बुलाने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि टैरिफ यानी आयात-निर्यात पर लगने वाले टैक्स को लेकर भी कूटनीति का बड़ा खेल दिखेगा.

अब तक के सबसे बड़ी प्रतिनिधिमंडल के साथ दावोस पहुंचेंगे ट्रंप

एक तरफ अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने अब तक के सबसे बड़े प्रतिनिधिमंडल के साथ दावोस पहुंच रहे हैं, तो दूसरी ओर भारत भी केंद्रीय मंत्रियों, कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों और देश के शीर्ष उद्योगपतियों के साथ ग्लोबल पावर टेबल पर अपनी दावेदारी पेश करने जा रहा है. यह साफ संकेत है कि दुनिया की बड़ी ताकतें अब भारत को केवल एक उभरती अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि वैश्विक संतुलन का अहम स्तंभ मानने लगी हैं.

केंद्रीय मंत्रियों, कई राज्यों के CM और उद्योगपतियों के साथ पहुंचेगा भारत

भारत की तरफ से रेल, आईटी, ऊर्जा, उद्योग और नागरिक उड्डयन जैसे अहम विभागों के केंद्रीय मंत्रियों के साथ महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, असम, मध्य प्रदेश, तेलंगाना और झारखंड जैसे राज्यों के मुख्यमंत्री भी दावोस में निवेशकों से सीधा संवाद करेंगे.

इसके साथ ही रिलायंस, टाटा, महिंद्रा, इंफोसिस, विप्रो, भारती, JSW, बजाज, पेटीएम, जेरोधा जैसे कॉरपोरेट दिग्गजों की मौजूदगी यह दिखाती है कि भारत सिर्फ सरकारी स्तर पर नहीं, बल्कि निजी क्षेत्र के दम पर भी वैश्विक अर्थव्यवस्था को दिशा देने की स्थिति में है.

दावोस में भारत के लिए सबसे बड़ा सवाल क्या?

दावोस में भारत को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही गूंजेगा, ‘क्या भारत आने वाले सालों में चीन के विकल्प के रूप में दुनिया का नया मैन्युफैक्चरिंग और इन्वेस्टमेंट हब बन सकता है?’ भू-राजनीतिक तनाव, सप्लाई चेन में बदलाव और पश्चिमी देशों की चीन पर निर्भरता घटाने की रणनीति के बीच भारत खुद को एक भरोसेमंद, लोकतांत्रिक और स्थिर साझेदार के तौर पर पेश कर रहा है.

वहीं, चर्चा इस बात पर भी होगी कि क्या भारत जल्द दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर बढ़ रहा है. इंफ्रास्ट्रक्चर, डिजिटल इकॉनमी, स्टार्टअप इकोसिस्टम, सेमीकंडक्टर, ग्रीन एनर्जी और मैन्युफैक्चरिंग में हो रहे निवेश को भारत अपनी ग्रोथ स्टोरी के सबूत के तौर पर रखेगा. जबकि कूटनीतिक नजरिए से देखें तो दावोस में भारत की यह मजबूत मौजूदगी एक स्पष्ट संदेश देती है कि भारत अब सिर्फ क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि वैश्विक नीति-निर्धारण में सक्रिय भूमिका निभाने को तैयार है.

WEF के मंच में भारत किस मुद्दे पर देगा ज्यादा जोर?

अमेरिका, यूरोप, चीन और वैश्विक संस्थाओं के शीर्ष नेताओं के बीच भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता, आर्थिक ताकत और राजनीतिक स्थिरता के साथ एक संतुलनकारी शक्ति के रूप में उभर रहा है. दावोस का मंच इस बार भारत के लिए निवेश आकर्षित करने से कहीं आगे की भूमिका निभाएगा. यहां भारत यह दिखाने की कोशिश करेगा कि 21वीं सदी की वैश्विक व्यवस्था में वह सिर्फ भागीदार नहीं, बल्कि दिशा देने वाला देश बनने की ओर बढ़ रहा है. हालांकि, सवाल अब यही है कि क्या दुनिया वाकई भारत को चीन के विकल्प और आने वाले दशक की आर्थिक धुरी के रूप में देखने के लिए तैयार है? दावोस की बहसें इसी सवाल का जवाब तलाशेंगी.

यह भी पढ़ेंः 'मुझे नोबेल नहीं मिला, अब मुझे ग्रीनलैंड चाहिए', डोनाल्ड ट्रंप ने नॉर्वे के PM को लिखी धमकी भरी चिट्ठी

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