'कॉलेजियम में क्या थी जस्टिस नागरत्ना की असहमति? पब्लिक हो', जजों की सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति पर बोले पूर्व जस्टिस ओका

कॉलेजियम में जस्टिस बी वी नागरत्ना की असहमति के बावजूद सुप्रीम कोर्ट में पटना हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस विपुल पंचोली की पदोन्नति किए जाने पर पूर्व जज जस्टिस अभय एस ओका ने अहम बात कही है. उन्होंने कहा कि इस मामले में जस्टिस नागरत्ना की असहमति के कारणों को पब्लिक किया जाना चाहिए क्योंकि जनता को ये कारण जानने का अधिकार है. जस्टिस ए एस ओका ने यह भी कहा कि जस्टिस पंचोली पर जस्टिस नागरत्ना की असहमति का विवरण भी रिकॉर्ड में दर्ज किया जाना चाहिए था. उनका कहना है कि कॉलेजियम में किसी भी असहमति पर गौर किये जाने की जरूरत है. जस्टिस ओका उड़ीसा हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एस मुरलीधर की ओर से संपादित पुस्तक '(इन)कम्प्लीट जस्टिस? द सुप्रीम कोर्ट एट 75' के विमोचन में शामिल हुए थे. सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह के सवाल के जवाब में उन्होंने यह बात कही. एडवोकेट जयसिंह ने जस्टिस मुरलीधर और जस्टिस ओका और राजनीतिक विज्ञानी गोपाल गुरु वाले पैनल से कॉलेजियम की कार्यप्रणाली के बारे में पूछा, जो 'गोपनीयता' में काम करता है और वह ऐसे समय में 'भारत के भावी प्रधान न्यायाधीशों के चयन के मानदंड' के बारे में जानना चाहती थीं, जब उच्चतम न्यायालय की एकमात्र महिला न्यायाधीश द्वारा असहमति जताई गई है. जस्टिस ओका ने कहा, 'यह सवाल बेहद चिंताजनक है, लेकिन मैं कहता रहा हूं कि हमें पारदर्शिता को परिभाषित करना होगा. आपका कहना सही है कि जब एक न्यायाधीश असहमति जताता है, तो हमें पता होना चाहिए कि वह असहमति क्या है- इसमें कुछ भी गलत नहीं है. आपको यह आलोचना करने का हक है कि वह असहमति सार्वजनिक क्यों नहीं है.' जस्टिस ओका ने स्पष्ट किया कि यदि कॉलेजियम के विचार-विमर्श और विवरण को सार्वजनिक किया जाता है, तो इससे उन वकीलों की गोपनीयता प्रभावित हो सकती है, जिन्होंने कॉलेजियम द्वारा विचार किए जाने के लिए सहमति दी है. उन्होंने कहा, 'अगर कॉलेजियम 10 या 15 वकीलों पर विचार करता है, जिनमें से 10 मामलों पर विचार किया जाता है और पांच की सिफ़ारिश नहीं की जाती, तो क्या हमें उन लोगों की निजता की चिंता नहीं है जिन्होंने स्वेच्छा से सहमति दी है? उन्हें वापस जाकर वकालत करनी होगी.' कर्नाटक उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि एक बार जब ये मामले सार्वजनिक हो जाते हैं, तो इन व्यक्तियों का पिछले तीन वर्षों का वेतन भी सार्वजनिक हो जाता है. उन्होंने कहा, 'इसलिए हमें इसे गोपनीयता के साथ संतुलित करना होगा.' प्रधान न्यायाधीश भूषण रामकृष्ण गवई की अध्यक्षता वाले पांच सदस्यीय कॉलेजियम ने 25 अगस्त को बॉम्बे हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश आलोक अराधे और जस्टिस विपुल पंचोली के नामों की पदोन्नति के लिए सिफ़ारिश की. यदि नियुक्तियां होती हैं, तो न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की सेवानिवृत्ति के बाद अक्टूबर 2031 में पंचोली प्रधान न्यायाधीश बनने की दौड़ में शामिल हो जाएंगे. सूत्रों ने बताया कि जस्टि नागरत्ना ने पंचोली की अपेक्षाकृत कम वरिष्ठता, जुलाई 2023 में गुजरात से पटना हाईकोर्ट में उनके स्थानांतरण पर सवाल और उच्चतम न्यायालय में प्रतिनिधित्व में क्षेत्रीय असंतुलन की चिंताओं का हवाला देते हुए सिफारिश का विरोध किया.

Aug 28, 2025 - 13:30
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'कॉलेजियम में क्या थी जस्टिस नागरत्ना की असहमति? पब्लिक हो', जजों की सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति पर बोले पूर्व जस्टिस ओका

कॉलेजियम में जस्टिस बी वी नागरत्ना की असहमति के बावजूद सुप्रीम कोर्ट में पटना हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस विपुल पंचोली की पदोन्नति किए जाने पर पूर्व जज जस्टिस अभय एस ओका ने अहम बात कही है. उन्होंने कहा कि इस मामले में जस्टिस नागरत्ना की असहमति के कारणों को पब्लिक किया जाना चाहिए क्योंकि जनता को ये कारण जानने का अधिकार है.

जस्टिस ए एस ओका ने यह भी कहा कि जस्टिस पंचोली पर जस्टिस नागरत्ना की असहमति का विवरण भी रिकॉर्ड में दर्ज किया जाना चाहिए था. उनका कहना है कि कॉलेजियम में किसी भी असहमति पर गौर किये जाने की जरूरत है. जस्टिस ओका उड़ीसा हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एस मुरलीधर की ओर से संपादित पुस्तक '(इन)कम्प्लीट जस्टिस? द सुप्रीम कोर्ट एट 75' के विमोचन में शामिल हुए थे. सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह के सवाल के जवाब में उन्होंने यह बात कही.

एडवोकेट जयसिंह ने जस्टिस मुरलीधर और जस्टिस ओका और राजनीतिक विज्ञानी गोपाल गुरु वाले पैनल से कॉलेजियम की कार्यप्रणाली के बारे में पूछा, जो 'गोपनीयता' में काम करता है और वह ऐसे समय में 'भारत के भावी प्रधान न्यायाधीशों के चयन के मानदंड' के बारे में जानना चाहती थीं, जब उच्चतम न्यायालय की एकमात्र महिला न्यायाधीश द्वारा असहमति जताई गई है.

जस्टिस ओका ने कहा, 'यह सवाल बेहद चिंताजनक है, लेकिन मैं कहता रहा हूं कि हमें पारदर्शिता को परिभाषित करना होगा. आपका कहना सही है कि जब एक न्यायाधीश असहमति जताता है, तो हमें पता होना चाहिए कि वह असहमति क्या है- इसमें कुछ भी गलत नहीं है. आपको यह आलोचना करने का हक है कि वह असहमति सार्वजनिक क्यों नहीं है.'

जस्टिस ओका ने स्पष्ट किया कि यदि कॉलेजियम के विचार-विमर्श और विवरण को सार्वजनिक किया जाता है, तो इससे उन वकीलों की गोपनीयता प्रभावित हो सकती है, जिन्होंने कॉलेजियम द्वारा विचार किए जाने के लिए सहमति दी है.

उन्होंने कहा, 'अगर कॉलेजियम 10 या 15 वकीलों पर विचार करता है, जिनमें से 10 मामलों पर विचार किया जाता है और पांच की सिफ़ारिश नहीं की जाती, तो क्या हमें उन लोगों की निजता की चिंता नहीं है जिन्होंने स्वेच्छा से सहमति दी है? उन्हें वापस जाकर वकालत करनी होगी.'

कर्नाटक उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि एक बार जब ये मामले सार्वजनिक हो जाते हैं, तो इन व्यक्तियों का पिछले तीन वर्षों का वेतन भी सार्वजनिक हो जाता है. उन्होंने कहा, 'इसलिए हमें इसे गोपनीयता के साथ संतुलित करना होगा.'

प्रधान न्यायाधीश भूषण रामकृष्ण गवई की अध्यक्षता वाले पांच सदस्यीय कॉलेजियम ने 25 अगस्त को बॉम्बे हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश आलोक अराधे और जस्टिस विपुल पंचोली के नामों की पदोन्नति के लिए सिफ़ारिश की. यदि नियुक्तियां होती हैं, तो न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की सेवानिवृत्ति के बाद अक्टूबर 2031 में पंचोली प्रधान न्यायाधीश बनने की दौड़ में शामिल हो जाएंगे.

सूत्रों ने बताया कि जस्टि नागरत्ना ने पंचोली की अपेक्षाकृत कम वरिष्ठता, जुलाई 2023 में गुजरात से पटना हाईकोर्ट में उनके स्थानांतरण पर सवाल और उच्चतम न्यायालय में प्रतिनिधित्व में क्षेत्रीय असंतुलन की चिंताओं का हवाला देते हुए सिफारिश का विरोध किया.

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