इंटरफेथ डायलॉग में RSS और मुस्लिम नेताओं ने की शांति की बात, सोशल मीडिया और हिंदी सिनेमा समेत कई मुद्दों पर हुई चर्चा
देश के कुछ वर्गों में बढ़ती सामाजिक-सांप्रदायिक बेचैनी, सोशल मीडिया के ज़रिए फैलती नफरत, फ्रिंज एलिमेंट्स की उकसावे वाली गतिविधियों और अल्पसंख्यकों में गहराती असुरक्षा की भावना के मुद्दे पर दिल्ली में इंटर फेथ हार्मनी फाउंडेशन ऑफ इंडिया के मंच से एक महत्वपूर्ण इंटरफेथ डायलॉग आयोजित किया गया. नेहरू के भाषण की मिसाल इस डायलॉग के दौरान एकता, समावेश और शांति की आवश्यकता पर ज़ोर देते हुए नफरत की राजनीति, फ्रिंज एलिमेंट्स की भूमिका और ऐसे मौकों पर शीर्ष नेतृत्व विशेषकर प्रधानमंत्री की चुप्पी जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भी चर्चा हुई. वक्ताओं ने इस चीज पर जोर दिया कि भारत की असली ताकत उसका संवाद और समावेश की परंपरा है, जिसकी ऐतिहासिक मिसाल देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने आज़ादी के ठीक एक साल बाद 24 जनवरी 1948 को अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में दिए अपने भाषण में दी थी, जहां उन्होंने युवाओं से उनकी विरासत, परंपरा और राष्ट्र के प्रति गर्व की भावना पर आत्ममंथन करने का आह्वान करते हुए राष्ट्रवाद को धर्म से ऊपर रखा. इसी सोच का हवाला देते हुए वक्ताओं ने कहा कि आज भी भारत को जोड़ने का रास्ता संवाद, आपसी सम्मान और साझा राष्ट्रीय चेतना से होकर ही जाता है न कि डर, नफरत और अविश्वास से. RSS के वरिष्ठ नेता रामलाल ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि देश के किसी कोने में दो-चार जगह पत्थरबाज़ी हो जाए तो उसे पूरे देश की राष्ट्रीय समस्या बताना सही नहीं है. उन्होंने कहा कि ऐसी घटनाएं होनी नहीं चाहिए लेकिन यह भी सच है कि भारत जैसे विविध समाज में सभी की सोच एक जैसी नहीं हो सकती. इसी विविधता की वजह से बातचीत जरूरी हो जाती है. उन्होंने क्रिसमस का उदाहरण देते हुए कहा कि देश में लाखों जगह क्रिसमस शांतिपूर्वक मनाया गया, लेकिन यदि 5-6 स्थानों पर विरोध हुआ तो उसे स्थानीय मुद्दा माना जाना चाहिए न कि पूरे देश का संकट मानना चाहिए. क्या बोले RSS नेता? RSS से जुड़े वरिष्ठ नेता डॉ. कृष्ण गोपाल ने इस चर्चा को वैचारिक गहराई देते हुए कहा कि फ्रिंज एलिमेंट्स खुद समस्या नहीं, बल्कि किसी गहरी बीमारी के लक्षण हैं. उन्होंने कहा, अगर हम सिर्फ लक्षणों से लड़ते रहे और बीमारी को नहीं पहचानेंगे तो समाधान भी नहीं निकलेगा. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संवाद का अर्थ यह नहीं कि कोई अपनी बात मनवा ले बल्कि संवाद का असली मतलब है दूसरे को सुनना. भारत की परंपरा निष्कर्ष से ज़्यादा संवाद को महत्व देती है. डॉ. कृष्ण गोपाल ने एक अहम वैचारिक तर्क रखते हुए कहा कि ‘हिंदुत्व’ शब्द से ज्यादा सही शब्द ‘हिंदूनेस’ है क्योंकि यह पूरी तरह समावेशी है. उन्होंने कहा कि हिंदू परंपरा किसी को बाहर नहीं करती. कबीर, तुलसी, विवेकानंद, खुसरो, चिश्ती परंपरा, सब भारतीय सांस्कृतिक ढांचे का हिस्सा हैं. हिंदूनेस एक फ्रेम है, जिसकी कोई सीमा नहीं. यह प्रेम और स्वीकार्यता पर आधारित है. जमीरुद्दीन शाह ने जताई चिंता लेफ्टिनेंट जनरल (रि.) जमीरुद्दीन शाह ने बेहद गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि पिछले 3 वर्षों में सोशल मीडिया के ज़रिए नफरत का ज़हर असाधारण रूप से बढ़ा है. उन्होंने कहा कि आज हालात ऐसे हैं कि सिर्फ नाम पूछकर पीटा जाना आम होता जा रहा है. यह किसी भी सभ्य समाज के लिए खतरनाक संकेत है. उन्होंने RSS से अपील की कि यदि संगठन मानता है कि 20 प्रतिशत लोग फ्रिंज हैं तो उन्हें पहचानकर नियंत्रित करना ज़रूरी है क्योंकि मशीन का छोटा-सा खराब पुर्जा भी पूरी मशीन को जाम कर देता है. संवाद में कई वक्ताओं ने इस बात पर सहमति जताई कि सोशल मीडिया और हिंदी सिनेमा नफरत फैलाने में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं. कहा गया कि अगर शीर्ष नेतृत्व सख्ती से संदेश दे तो हेट स्पीच अपने-आप बंद हो सकती है, क्योंकि समाज आज भी नेतृत्व की बात सुनता है. दिल्ली के पूर्व एलजी के तीखे सवाल इस पूरे कार्यक्रम में सबसे तीखा और संवेदनशील सवाल पूर्व LG नजीब जंग ने उठाया. उन्होंने कहा, “जब अल्पसंख्यकों पर हमले होते हैं, घर गिराए जाते हैं, झूठ फैलाया जाता है, तब देश के प्रधानमंत्री चुप क्यों रहते हैं? हर मुद्दे पर बोलने वाले प्रधानमंत्री यह क्यों नहीं कहते कि हम सब बराबर हैं?” उन्होंने कहा कि जब बात होती है कि हम सबका डीएनए एक है तो फिर मुसलमानों से बार-बार उनकी राष्ट्रभक्ति पर सवाल क्यों किया जाता है देश में भी और विदेशों में भी. नजीब जंग ने आगे कहा कि इतिहास को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है. अगर अतीत में मंदिर टूटे तो वह नई सत्ता या नई संस्कृति के दौर में हुआ. आज के मुसलमानों को उस इतिहास के लिए दोषी ठहराना न तो न्यायसंगत है और न ही तार्किक. नजीब जंग ने यह भी कहा कि गाय का वध पूरी तरह से निंदनीय है और मुसलमानों को देश की व्यापक भावनाओं का सम्मान करना चाहिए. साथ ही उन्होंने ‘काफ़िर’ जैसे शब्दों के इस्तेमाल की भी कड़ी निंदा की. उनका कहना था कि सहिष्णुता एकतरफा नहीं हो सकती यह दोनों ओर से आनी चाहिए. यूनिटी फॉर पीस एंड प्रोग्रेस थीम पर हुए इस डायलॉग में RSS के वरिष्ठ पदाधिकारी डॉ. कृष्ण गोपाल और रामलाल, दिल्ली के पूर्व LG नजीब जंग, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी, रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल जमीरुद्दीन शाह, ख्वाजा इफ्तिखार अहमद, फैज़ान मुस्तफा, सईद शेरवानी, शाहिद सईद (राष्ट्रीय संयोजक, मुस्लिम राष्ट्रीय मंच) के अलावा तमाम वर्गों और विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करने वाले कई वक्ता एक ही मंच पर मौजूद रहे. ये भी पढ़ें 'भ्रष्टाचार की पार्टी है TMC, घुसपैठियों को वोटर...', प्रधानमंत्री मोदी ने मालदा से ममता बनर्जी पर साधा निशाना
देश के कुछ वर्गों में बढ़ती सामाजिक-सांप्रदायिक बेचैनी, सोशल मीडिया के ज़रिए फैलती नफरत, फ्रिंज एलिमेंट्स की उकसावे वाली गतिविधियों और अल्पसंख्यकों में गहराती असुरक्षा की भावना के मुद्दे पर दिल्ली में इंटर फेथ हार्मनी फाउंडेशन ऑफ इंडिया के मंच से एक महत्वपूर्ण इंटरफेथ डायलॉग आयोजित किया गया.
नेहरू के भाषण की मिसाल
इस डायलॉग के दौरान एकता, समावेश और शांति की आवश्यकता पर ज़ोर देते हुए नफरत की राजनीति, फ्रिंज एलिमेंट्स की भूमिका और ऐसे मौकों पर शीर्ष नेतृत्व विशेषकर प्रधानमंत्री की चुप्पी जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भी चर्चा हुई. वक्ताओं ने इस चीज पर जोर दिया कि भारत की असली ताकत उसका संवाद और समावेश की परंपरा है, जिसकी ऐतिहासिक मिसाल देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने आज़ादी के ठीक एक साल बाद 24 जनवरी 1948 को अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में दिए अपने भाषण में दी थी, जहां उन्होंने युवाओं से उनकी विरासत, परंपरा और राष्ट्र के प्रति गर्व की भावना पर आत्ममंथन करने का आह्वान करते हुए राष्ट्रवाद को धर्म से ऊपर रखा. इसी सोच का हवाला देते हुए वक्ताओं ने कहा कि आज भी भारत को जोड़ने का रास्ता संवाद, आपसी सम्मान और साझा राष्ट्रीय चेतना से होकर ही जाता है न कि डर, नफरत और अविश्वास से.
RSS के वरिष्ठ नेता रामलाल ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि देश के किसी कोने में दो-चार जगह पत्थरबाज़ी हो जाए तो उसे पूरे देश की राष्ट्रीय समस्या बताना सही नहीं है. उन्होंने कहा कि ऐसी घटनाएं होनी नहीं चाहिए लेकिन यह भी सच है कि भारत जैसे विविध समाज में सभी की सोच एक जैसी नहीं हो सकती. इसी विविधता की वजह से बातचीत जरूरी हो जाती है. उन्होंने क्रिसमस का उदाहरण देते हुए कहा कि देश में लाखों जगह क्रिसमस शांतिपूर्वक मनाया गया, लेकिन यदि 5-6 स्थानों पर विरोध हुआ तो उसे स्थानीय मुद्दा माना जाना चाहिए न कि पूरे देश का संकट मानना चाहिए.
क्या बोले RSS नेता?
RSS से जुड़े वरिष्ठ नेता डॉ. कृष्ण गोपाल ने इस चर्चा को वैचारिक गहराई देते हुए कहा कि फ्रिंज एलिमेंट्स खुद समस्या नहीं, बल्कि किसी गहरी बीमारी के लक्षण हैं. उन्होंने कहा, अगर हम सिर्फ लक्षणों से लड़ते रहे और बीमारी को नहीं पहचानेंगे तो समाधान भी नहीं निकलेगा. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संवाद का अर्थ यह नहीं कि कोई अपनी बात मनवा ले बल्कि संवाद का असली मतलब है दूसरे को सुनना. भारत की परंपरा निष्कर्ष से ज़्यादा संवाद को महत्व देती है.
डॉ. कृष्ण गोपाल ने एक अहम वैचारिक तर्क रखते हुए कहा कि ‘हिंदुत्व’ शब्द से ज्यादा सही शब्द ‘हिंदूनेस’ है क्योंकि यह पूरी तरह समावेशी है. उन्होंने कहा कि हिंदू परंपरा किसी को बाहर नहीं करती. कबीर, तुलसी, विवेकानंद, खुसरो, चिश्ती परंपरा, सब भारतीय सांस्कृतिक ढांचे का हिस्सा हैं. हिंदूनेस एक फ्रेम है, जिसकी कोई सीमा नहीं. यह प्रेम और स्वीकार्यता पर आधारित है.
जमीरुद्दीन शाह ने जताई चिंता
लेफ्टिनेंट जनरल (रि.) जमीरुद्दीन शाह ने बेहद गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि पिछले 3 वर्षों में सोशल मीडिया के ज़रिए नफरत का ज़हर असाधारण रूप से बढ़ा है. उन्होंने कहा कि आज हालात ऐसे हैं कि सिर्फ नाम पूछकर पीटा जाना आम होता जा रहा है. यह किसी भी सभ्य समाज के लिए खतरनाक संकेत है. उन्होंने RSS से अपील की कि यदि संगठन मानता है कि 20 प्रतिशत लोग फ्रिंज हैं तो उन्हें पहचानकर नियंत्रित करना ज़रूरी है क्योंकि मशीन का छोटा-सा खराब पुर्जा भी पूरी मशीन को जाम कर देता है.
संवाद में कई वक्ताओं ने इस बात पर सहमति जताई कि सोशल मीडिया और हिंदी सिनेमा नफरत फैलाने में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं. कहा गया कि अगर शीर्ष नेतृत्व सख्ती से संदेश दे तो हेट स्पीच अपने-आप बंद हो सकती है, क्योंकि समाज आज भी नेतृत्व की बात सुनता है.
दिल्ली के पूर्व एलजी के तीखे सवाल
इस पूरे कार्यक्रम में सबसे तीखा और संवेदनशील सवाल पूर्व LG नजीब जंग ने उठाया. उन्होंने कहा, “जब अल्पसंख्यकों पर हमले होते हैं, घर गिराए जाते हैं, झूठ फैलाया जाता है, तब देश के प्रधानमंत्री चुप क्यों रहते हैं? हर मुद्दे पर बोलने वाले प्रधानमंत्री यह क्यों नहीं कहते कि हम सब बराबर हैं?” उन्होंने कहा कि जब बात होती है कि हम सबका डीएनए एक है तो फिर मुसलमानों से बार-बार उनकी राष्ट्रभक्ति पर सवाल क्यों किया जाता है देश में भी और विदेशों में भी.
नजीब जंग ने आगे कहा कि इतिहास को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है. अगर अतीत में मंदिर टूटे तो वह नई सत्ता या नई संस्कृति के दौर में हुआ. आज के मुसलमानों को उस इतिहास के लिए दोषी ठहराना न तो न्यायसंगत है और न ही तार्किक. नजीब जंग ने यह भी कहा कि गाय का वध पूरी तरह से निंदनीय है और मुसलमानों को देश की व्यापक भावनाओं का सम्मान करना चाहिए. साथ ही उन्होंने ‘काफ़िर’ जैसे शब्दों के इस्तेमाल की भी कड़ी निंदा की. उनका कहना था कि सहिष्णुता एकतरफा नहीं हो सकती यह दोनों ओर से आनी चाहिए.
यूनिटी फॉर पीस एंड प्रोग्रेस थीम पर हुए इस डायलॉग में RSS के वरिष्ठ पदाधिकारी डॉ. कृष्ण गोपाल और रामलाल, दिल्ली के पूर्व LG नजीब जंग, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी, रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल जमीरुद्दीन शाह, ख्वाजा इफ्तिखार अहमद, फैज़ान मुस्तफा, सईद शेरवानी, शाहिद सईद (राष्ट्रीय संयोजक, मुस्लिम राष्ट्रीय मंच) के अलावा तमाम वर्गों और विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करने वाले कई वक्ता एक ही मंच पर मौजूद रहे.
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