World Lung Cancer Day: भारत में लंग कैंसर के 50% मरीज नॉन स्मोकर्स, फिर क्यों हो रहे बीमार?

Lung Cancer Causes In Non Smokers: हर साल 1 अगस्त को वर्ल्ड लंग कैंसर डे मनाया जाता है. लंग कैंसर का नाम सुनते ही सबसे पहले सिगरेट और स्मोकिंग का ख्याल आता है. लंबे समय से स्मोकिंग को लंग कैंसर का सबसे बड़ा रिस्क फैक्टर माना जाता रहा है. लेकिन भारत में अब इस बीमारी की तस्वीर बदल रही है. डॉक्टरों के मुताबिक, महिलाओं, कम उम्र के लोगों और ऐसे लोगों में भी लंग कैंसर के मामले सामने आ रहे हैं, जिन्होंने जिंदगी में कभी सिगरेट नहीं पी. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के मुताबिक, लंग कैंसर दुनियाभर में कैंसर से होने वाली मौतों के प्रमुख कारणों में शामिल है. भारत में भी डॉक्टर अब ऐसे मरीजों को देख रहे हैं, जो लंग कैंसर के पारंपरिक हाई रिस्क ग्रुप में शामिल नहीं हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि नॉन-स्मोकर्स को लंग कैंसर क्यों हो रहा है और किन टेस्ट की मदद से बीमारी को समय रहते पकड़ा जा सकता है? नॉन-स्मोकर्स को क्यों हो रहा लंग कैंसर? आकाश हेल्थकेयर में रेस्पिरेटरी एंड स्लीप मेडिसिन के सीनियर कंसल्टेंट और हेड डॉ. अक्षय बुधराजा के मुताबिक, लंग कैंसर के मरीजों की प्रोफाइल में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है. डॉ. अक्षय बुधराजा का कहना है कि स्मोकिंग न करने वाली महिलाओं में भी लंग कैंसर के मामले सामने आ रहे हैं. इसके पीछे इंडोर एयर पॉल्यूशन, खाना पकाने के लिए बायोमास फ्यूल का इस्तेमाल, सेकेंड हैंड स्मोक और काम करने की जगह पर हानिकारक चीजों के संपर्क में आना जैसी वजहें हो सकती हैं. उनके मुताबिक, भारतीय महिलाओं में तंबाकू का इस्तेमाल 10 प्रतिशत से कम है. ऐसे में खराब होती एयर क्वालिटी और घर के अंदर मौजूद पॉल्यूशन को इसकी संभावित वजहों में देखा जा रहा है. डॉ. बुधराजा का कहना है कि अब अस्पतालों में केवल 60 साल से ज्यादा उम्र के ऐसे मरीज नहीं आ रहे, जिन्होंने लंबे समय तक स्मोकिंग की हो. कम उम्र के लोग, महिलाएं और जिंदगी में कभी सिगरेट न पीने वाले लोग भी लंग कैंसर के साथ अस्पताल पहुंच रहे हैं. एयर पॉल्यूशन, काम की जगह पर हानिकारक चीजों का संपर्क और जेनेटिक कारण इसमें बड़ी भूमिका निभा सकते हैं. स्मोकिंग अभी भी सबसे बड़ा खतरा नॉन-स्मोकर्स में लंग कैंसर के मामले सामने आने का मतलब यह नहीं है कि सिगरेट से होने वाला खतरा कम हो गया है. डॉ. अक्षय बुधराजा के मुताबिक, स्मोकिंग करने वालों में नॉन-स्मोकर्स के मुकाबले लंग कैंसर का खतरा करीब 20 गुना ज्यादा हो सकता है. वहीं, खुद सिगरेट न पीने के बावजूद दूसरे लोगों की सिगरेट के धुएं के संपर्क में रहना यानी सेकेंड हैंड स्मोक भी खतरा बढ़ा सकता है. घर या काम की जगह पर लगातार सिगरेट के धुएं के संपर्क में रहने वाले लोगों को भी इसका नुकसान हो सकता है. इसके अलावा रेडॉन गैस भी लंग कैंसर का एक रिस्क फैक्टर है. यह घर के अंदर मौजूद हो सकती है और आमतौर पर इसका आसानी से पता नहीं चलता. घर में रेडॉन गैस की मौजूदगी का पता टेस्ट के जरिए लगाया जा सकता है. एयर पॉल्यूशन भी बढ़ा रहा खतरा सिर्फ बाहर का एयर पॉल्यूशन ही नहीं, घर के अंदर की खराब हवा भी लंग्स के लिए नुकसानदायक हो सकती है. खाना बनाने के दौरान लकड़ी, कोयला या दूसरे बायोमास फ्यूल से निकलने वाला धुआं और घर में हवा की आवाजाही ठीक न होना लंबे समय तक लंग्स को प्रभावित कर सकता है. कुछ लोगों को काम के दौरान धूल, धुएं, केमिकल और दूसरी हानिकारक चीजों के संपर्क में रहना पड़ता है. इसे ऑक्यूपेशनल एक्सपोजर कहा जाता है. डॉक्टर इसे भी लंग कैंसर के संभावित रिस्क फैक्टर में शामिल करते हैं. इसके अलावा कुछ लोगों में जेनेटिक कारण भी बीमारी का खतरा बढ़ा सकते हैं. इसे भी पढ़ेंः Exam Preparation: क्या रातभर जागकर पढ़ते हैं? जानें बड़े नुकसान 70 से 80 प्रतिशत मरीज देर से पहुंचते हैं अस्पताल भारत में लंग कैंसर के इलाज की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बीमारी का देर से पता चलना है. एक्शन कैंसर हॉस्पिटल, दिल्ली के एक्शन इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल ऑन्कोलॉजी एंड इम्यूनोथेरेपी के डायरेक्टर डॉ. जे.बी. शर्मा के मुताबिक, करीब 70 से 80 प्रतिशत मरीज अस्पताल तब पहुंचते हैं, जब लंग कैंसर स्टेज 3 या स्टेज 4 तक पहुंच चुका होता है. इसकी एक बड़ी वजह शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज करना है. लगातार खांसी, सीने में परेशानी और सांस फूलने जैसे लक्षणों को कई लोग सामान्य इंफेक्शन या पॉल्यूशन से होने वाली एलर्जी समझ लेते हैं. इसी वजह से सही जांच और इलाज शुरू होने में देरी हो सकती है. कौन-से टेस्ट कराने चाहिए? एक्सपर्ट मुताबिक, लो-डोज सीटी यानी एलडीसीटी स्कैन और मॉलिक्यूलर बायोमार्कर टेस्टिंग जैसी जांच लंग कैंसर को जल्दी पकड़ने में मदद कर सकती हैं. इनकी मदद से कुछ मामलों में ट्यूमर को शरीर के दूसरे हिस्सों में फैलने से पहले पहचाना जा सकता है. हालांकि, हर व्यक्ति को अपने आप एलडीसीटी स्कैन कराने की जरूरत नहीं होती. उम्र, स्मोकिंग हिस्ट्री और दूसरे रिस्क फैक्टर को देखकर डॉक्टर तय कर सकते हैं कि किस व्यक्ति को लंग कैंसर की स्क्रीनिंग की जरूरत है. अगर लंबे समय से खांसी बनी हुई है, सांस लेने में परेशानी हो रही है या सीने में लगातार तकलीफ है तो इसे केवल पॉल्यूशन या सामान्य इंफेक्शन मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. जेनेटिक टेस्ट से कैसे तय होता है इलाज? स्पर्श हॉस्पिटल, बेंगलुरु के सीनियर कंसल्टेंट-सर्जिकल ऑन्कोलॉजी डॉ. पलानीअप्पन रामनाथन के मुताबिक, लंग कैंसर का इलाज अब हर मरीज के लिए एक जैसा नहीं रह गया है. अब कैंसर की खासियत को समझकर मरीज के लिए इलाज तय किया जा सकता है. जीनोमिक प्रोफाइलिंग की मदद से ईजीएफआर, एएलके और आरओएस1 जैसे म्यूटेशन की पहचान की जा सकती है. इनके मिलने पर डॉक्टर कुछ मरीजों को टारगेटेड ओरल थेरेपी दे सकते हैं. वहीं, एडवांस स्टेज के मरीजों में इम्यूनोथेरेपी ने भी इलाज के तरीके को बदला है. इसमें शरीर के इम्यून सिस्टम की मदद से कैंसर सेल्स से लड़ने की कोशिश की जाती है. कैंसर का डर भी करा

Aug 1, 2026 - 22:30
 0
World Lung Cancer Day: भारत में लंग कैंसर के 50% मरीज नॉन स्मोकर्स, फिर क्यों हो रहे बीमार?

Lung Cancer Causes In Non Smokers: हर साल 1 अगस्त को वर्ल्ड लंग कैंसर डे मनाया जाता है. लंग कैंसर का नाम सुनते ही सबसे पहले सिगरेट और स्मोकिंग का ख्याल आता है. लंबे समय से स्मोकिंग को लंग कैंसर का सबसे बड़ा रिस्क फैक्टर माना जाता रहा है. लेकिन भारत में अब इस बीमारी की तस्वीर बदल रही है. डॉक्टरों के मुताबिक, महिलाओं, कम उम्र के लोगों और ऐसे लोगों में भी लंग कैंसर के मामले सामने आ रहे हैं, जिन्होंने जिंदगी में कभी सिगरेट नहीं पी.

वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के मुताबिक, लंग कैंसर दुनियाभर में कैंसर से होने वाली मौतों के प्रमुख कारणों में शामिल है. भारत में भी डॉक्टर अब ऐसे मरीजों को देख रहे हैं, जो लंग कैंसर के पारंपरिक हाई रिस्क ग्रुप में शामिल नहीं हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि नॉन-स्मोकर्स को लंग कैंसर क्यों हो रहा है और किन टेस्ट की मदद से बीमारी को समय रहते पकड़ा जा सकता है?

नॉन-स्मोकर्स को क्यों हो रहा लंग कैंसर?

आकाश हेल्थकेयर में रेस्पिरेटरी एंड स्लीप मेडिसिन के सीनियर कंसल्टेंट और हेड डॉ. अक्षय बुधराजा के मुताबिक, लंग कैंसर के मरीजों की प्रोफाइल में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है. डॉ. अक्षय बुधराजा का कहना है कि स्मोकिंग न करने वाली महिलाओं में भी लंग कैंसर के मामले सामने आ रहे हैं. इसके पीछे इंडोर एयर पॉल्यूशन, खाना पकाने के लिए बायोमास फ्यूल का इस्तेमाल, सेकेंड हैंड स्मोक और काम करने की जगह पर हानिकारक चीजों के संपर्क में आना जैसी वजहें हो सकती हैं.

उनके मुताबिक, भारतीय महिलाओं में तंबाकू का इस्तेमाल 10 प्रतिशत से कम है. ऐसे में खराब होती एयर क्वालिटी और घर के अंदर मौजूद पॉल्यूशन को इसकी संभावित वजहों में देखा जा रहा है.


डॉ. बुधराजा का कहना है कि अब अस्पतालों में केवल 60 साल से ज्यादा उम्र के ऐसे मरीज नहीं आ रहे, जिन्होंने लंबे समय तक स्मोकिंग की हो. कम उम्र के लोग, महिलाएं और जिंदगी में कभी सिगरेट न पीने वाले लोग भी लंग कैंसर के साथ अस्पताल पहुंच रहे हैं. एयर पॉल्यूशन, काम की जगह पर हानिकारक चीजों का संपर्क और जेनेटिक कारण इसमें बड़ी भूमिका निभा सकते हैं.

स्मोकिंग अभी भी सबसे बड़ा खतरा

नॉन-स्मोकर्स में लंग कैंसर के मामले सामने आने का मतलब यह नहीं है कि सिगरेट से होने वाला खतरा कम हो गया है. डॉ. अक्षय बुधराजा के मुताबिक, स्मोकिंग करने वालों में नॉन-स्मोकर्स के मुकाबले लंग कैंसर का खतरा करीब 20 गुना ज्यादा हो सकता है. वहीं, खुद सिगरेट न पीने के बावजूद दूसरे लोगों की सिगरेट के धुएं के संपर्क में रहना यानी सेकेंड हैंड स्मोक भी खतरा बढ़ा सकता है. घर या काम की जगह पर लगातार सिगरेट के धुएं के संपर्क में रहने वाले लोगों को भी इसका नुकसान हो सकता है.


इसके अलावा रेडॉन गैस भी लंग कैंसर का एक रिस्क फैक्टर है. यह घर के अंदर मौजूद हो सकती है और आमतौर पर इसका आसानी से पता नहीं चलता. घर में रेडॉन गैस की मौजूदगी का पता टेस्ट के जरिए लगाया जा सकता है.

एयर पॉल्यूशन भी बढ़ा रहा खतरा

सिर्फ बाहर का एयर पॉल्यूशन ही नहीं, घर के अंदर की खराब हवा भी लंग्स के लिए नुकसानदायक हो सकती है. खाना बनाने के दौरान लकड़ी, कोयला या दूसरे बायोमास फ्यूल से निकलने वाला धुआं और घर में हवा की आवाजाही ठीक न होना लंबे समय तक लंग्स को प्रभावित कर सकता है. कुछ लोगों को काम के दौरान धूल, धुएं, केमिकल और दूसरी हानिकारक चीजों के संपर्क में रहना पड़ता है. इसे ऑक्यूपेशनल एक्सपोजर कहा जाता है. डॉक्टर इसे भी लंग कैंसर के संभावित रिस्क फैक्टर में शामिल करते हैं. इसके अलावा कुछ लोगों में जेनेटिक कारण भी बीमारी का खतरा बढ़ा सकते हैं.

इसे भी पढ़ेंः Exam Preparation: क्या रातभर जागकर पढ़ते हैं? जानें बड़े नुकसान

70 से 80 प्रतिशत मरीज देर से पहुंचते हैं अस्पताल

भारत में लंग कैंसर के इलाज की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बीमारी का देर से पता चलना है. एक्शन कैंसर हॉस्पिटल, दिल्ली के एक्शन इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल ऑन्कोलॉजी एंड इम्यूनोथेरेपी के डायरेक्टर डॉ. जे.बी. शर्मा के मुताबिक, करीब 70 से 80 प्रतिशत मरीज अस्पताल तब पहुंचते हैं, जब लंग कैंसर स्टेज 3 या स्टेज 4 तक पहुंच चुका होता है. इसकी एक बड़ी वजह शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज करना है. लगातार खांसी, सीने में परेशानी और सांस फूलने जैसे लक्षणों को कई लोग सामान्य इंफेक्शन या पॉल्यूशन से होने वाली एलर्जी समझ लेते हैं. इसी वजह से सही जांच और इलाज शुरू होने में देरी हो सकती है.

कौन-से टेस्ट कराने चाहिए?

एक्सपर्ट मुताबिक, लो-डोज सीटी यानी एलडीसीटी स्कैन और मॉलिक्यूलर बायोमार्कर टेस्टिंग जैसी जांच लंग कैंसर को जल्दी पकड़ने में मदद कर सकती हैं. इनकी मदद से कुछ मामलों में ट्यूमर को शरीर के दूसरे हिस्सों में फैलने से पहले पहचाना जा सकता है. हालांकि, हर व्यक्ति को अपने आप एलडीसीटी स्कैन कराने की जरूरत नहीं होती. उम्र, स्मोकिंग हिस्ट्री और दूसरे रिस्क फैक्टर को देखकर डॉक्टर तय कर सकते हैं कि किस व्यक्ति को लंग कैंसर की स्क्रीनिंग की जरूरत है.

अगर लंबे समय से खांसी बनी हुई है, सांस लेने में परेशानी हो रही है या सीने में लगातार तकलीफ है तो इसे केवल पॉल्यूशन या सामान्य इंफेक्शन मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.

जेनेटिक टेस्ट से कैसे तय होता है इलाज?

स्पर्श हॉस्पिटल, बेंगलुरु के सीनियर कंसल्टेंट-सर्जिकल ऑन्कोलॉजी डॉ. पलानीअप्पन रामनाथन के मुताबिक, लंग कैंसर का इलाज अब हर मरीज के लिए एक जैसा नहीं रह गया है. अब कैंसर की खासियत को समझकर मरीज के लिए इलाज तय किया जा सकता है. जीनोमिक प्रोफाइलिंग की मदद से ईजीएफआर, एएलके और आरओएस1 जैसे म्यूटेशन की पहचान की जा सकती है. इनके मिलने पर डॉक्टर कुछ मरीजों को टारगेटेड ओरल थेरेपी दे सकते हैं. वहीं, एडवांस स्टेज के मरीजों में इम्यूनोथेरेपी ने भी इलाज के तरीके को बदला है. इसमें शरीर के इम्यून सिस्टम की मदद से कैंसर सेल्स से लड़ने की कोशिश की जाती है.

कैंसर का डर भी करा रहा इलाज में देरी

एक्सपर्ट के मुताबिक, टियर-2 शहरों में केवल जागरूकता की कमी ही परेशानी नहीं है. कैंसर को लेकर लोगों के मन में मौजूद डर भी मरीजों को समय पर डॉक्टर के पास जाने से रोकता है. कई मरीज लंग कैंसर का मतलब निश्चित मौत समझ लेते हैं और इसी डर से इलाज में देरी करते हैं. हालांकि, अब वीडियो-असिस्टेड थोरेकोस्कोपिक सर्जरी यानी वीएटीएस और रोबोटिक सर्जरी जैसी तकनीकें उपलब्ध हैं. क्षेत्रीय अस्पतालों में भी कैंसर के इलाज की सुविधाएं बढ़ने से मरीजों को अपने शहर के करीब बेहतर इलाज मिल सकता है.

दूसरे अंगों तक भी फैल सकता है लंग कैंसर

एडवांस स्टेज में लंग कैंसर केवल लंग्स तक सीमित नहीं रहता. यह शरीर के दूसरे अंगों में भी फैल सकता है. एड्रिनल ग्लैंड्स उन जगहों में शामिल हैं, जहां लंग कैंसर फैल सकता है. बीमारी ज्यादा बढ़ने पर किडनी भी प्रभावित हो सकती है. ऐसे मामलों में अलग-अलग विभागों के डॉक्टरों को मिलकर मरीज के इलाज की योजना बनानी पड़ती है.

इसे भी पढ़ेंः Does Paan Cause Cancer: क्या पान खाने से सच में होता है कैंसर? जानिए सच्चाई

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow