US Iran War: 6 महीने बाद भी क्यों नहीं झुका ईरान?
US Iran War: अमेरिका और इजरायल के हमलों को छह महीने हो चुके हैं. ईरान को भारी सैन्य और आर्थिक नुकसान हुआ. उसके शीर्ष नेतृत्व को भी चोट पहुंची. तेल कारोबार पर दबाव बढ़ा. अमेरिका ने प्रतिबंधों और नौसैनिक नाकेबंदी से उसे घेरने की कोशिश की. इसके बाद भी ईरान ने हथियार नहीं डाले. इसकी एक बड़ी वजह होर्मुज जलडमरूमध्य है. ईरान के पास अभी भी इस अहम समुद्री रास्ते को प्रभावित करने की क्षमता है. उसकी सत्ता और सैन्य ढांचा भी पूरी तरह नहीं टूटा है. तेहरान को यह भी भरोसा है कि अमेरिका लंबे समय तक इतने महंगे युद्ध का बोझ नहीं उठाना चाहेगा. ईरान की कुंडली में भी आत्मसमर्पण से अधिक नुकसान सहकर मुकाबला जारी रखने के संकेत मिलते हैं. फिलहाल 9 सितंबर तक का समय अधिक संवेदनशील दिखाई देता है. इसके बाद युद्ध तुरंत समाप्त होने के बजाय बातचीत की मेज पर जा सकता है. पहली ठोस राहत नवंबर के अंतिम सप्ताह से बनती दिख रही है. #BREAKING | अमेरिका और ईरान के बीच फिर जंग शुरू, अमेरिका ने लारक द्वीप पर बोला हमला@aparna_journo | https://t.co/SMm0dUypVm#BreakingNews #WarAlertOnABP #USIran #IranWar #DonaldTrump pic.twitter.com/WOPnMcQRl6 — ABP News (@ABPNews) August 31, 2026 यह भी पढ़ें- SCO Summit 2026: ईरान संकट के बीच PM मोदी का बड़ा दांव, क्या Putin खोलेंगे सस्ते तेल का रास्ता? एक महीने बाद फिर आमने-सामने अमेरिका और ईरान 30 अगस्त को अमेरिकी सेना ने होर्मुज के पास स्थित ईरान के लारक द्वीप पर दो रॉकेट लॉन्चरों को निशाना बनाया. अमेरिका का दावा है कि ईरानी सेना समुद्र में बारूदी सुरंगें बिछाने की तैयारी कर रही थी. जवाब में ईरान ने जॉर्डन में मौजूद अमेरिकी ठिकानों की ओर बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं. यह एक महीने से अधिक समय बाद अमेरिका और ईरान के बीच पहला सीधा सैन्य टकराव था. इसके बाद ब्रेंट क्रूड की कीमत 90 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर चली गई. इससे साफ है कि होर्मुज में एक हमला भी पूरी दुनिया के तेल बाजार को हिला सकता है. छह महीने बाद युद्ध ऐसे मोड़ पर है जहां दोनों पक्षों को भारी नुकसान हो रहा है, लेकिन कोई पीछे हटने को तैयार नहीं है. अमेरिका चाहता है कि ईरान होर्मुज पर अपना दबाव छोड़ दे. ईरान चाहता है कि अमेरिकी नाकेबंदी हटे और किसी समझौते को उसकी हार न माना जाए. इसी खींचतान ने युद्ध को महंगे गतिरोध में बदल दिया है. यह भी पढ़ें- मोदी, पुतिन और शी एक मंच पर... भारत को सस्ता तेल या सीमा पर राहत? आखिर ईरान अब तक क्यों नहीं झुका? ईरान को सैन्य नुकसान पहुंचाना और उसकी सत्ता को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर करना दो अलग बातें हैं. छह महीने के हमलों के बाद भी ईरान की सत्ता, मिसाइल क्षमता और होर्मुज को प्रभावित करने की ताकत पूरी तरह खत्म नहीं हुई है. तेहरान यह भी मानता है कि समय उसके पक्ष में जा सकता है. लंबा युद्ध अमेरिका के हथियार भंडार, सैन्य खर्च और घरेलू राजनीति पर दबाव डाल रहा है. दूसरी तरफ ईरान चीन और भारत जैसे देशों से जुड़े अपने आर्थिक रिश्तों को सुरक्षा कवच की तरह देखता है. इन देशों पर पूरी ताकत से सेकेंडरी प्रतिबंध लगाना अमेरिका के लिए भी आसान फैसला नहीं होगा. सबसे बड़ी बात यह है कि ईरान ऐसा समझौता नहीं चाहता जिसे देश के भीतर आत्मसमर्पण समझा जाए. इससे सरकार की साख और सत्ता दोनों पर सवाल उठ सकते हैं. इसलिए वह नुकसान सहकर भी होर्मुज को सौदेबाजी के हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है. यह भी पढ़ें- Weather Prediction: सितंबर में फिर बिगड़ेगा मौसम? मंगल-शनि दे रहे भारी बारिश के संकेत ईरान की कुंडली में संघर्ष इतना लंबा क्यों? यह विश्लेषण 1 अप्रैल 1979, दोपहर 3 बजे, तेहरान की कुंडली पर आधारित है. इस कुंडली में सिंह लग्न है. लग्न में शनि और राहु बैठे हैं. यह योग ईरान के राजनीतिक चरित्र की बड़ी कमजोरी और ताकत दोनों दिखाता है. शनि-राहु सत्ता के भीतर भय, अविश्वास, कट्टरता और अलगाव बढ़ाते हैं. लेकिन यही मेल दबाव के सामने अड़ जाने की प्रवृत्ति भी पैदा करता है. ऐसे में नेतृत्व नुकसान का व्यावहारिक आकलन करने के बजाय पीछे हटने को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना सकता है. कुंडली में लग्नेश सूर्य सबसे अधिक षड्बली ग्रह है. सूर्य का षड्बल 9.89 रूप है. यह सत्ता की पकड़ और शासन के बने रहने की क्षमता दिखाता है. यही एक बड़ा कारण है कि शीर्ष स्तर पर नुकसान के बाद भी ईरान की व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त नहीं हुई. उच्च का चंद्रमा बचा रहा सत्ता ! चंद्रमा वृषभ राशि में उच्च होकर दशम भाव में है. दशम भाव सरकार और देश की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा से जुड़ा है. इसका भावबल भी अपेक्षाकृत मजबूत है. इसलिए संकट के बीच शासन राष्ट्रवाद और बाहरी खतरे के नाम पर जनता को अपने साथ रखने की कोशिश कर सकता है. लेकिन सिंह लग्न में चंद्रमा द्वादश भाव का स्वामी भी है. उसका दशम भाव में होना बताता है कि युद्ध की कीमत सीधे सरकार, अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय प्रतिष्ठा को चुकानी पड़ सकती है. इसलिए उच्च चंद्रमा केवल मजबूती नहीं देता. वह भारी नुकसान के बाद सत्ता को बचाए रखने की स्थिति भी बनाता है. यह भी पढ़ें- 400 अधिकारियों के साथ भारत आएंगे शी जिनपिंग? सीमा विवाद पर ग्रहों का चौंकाने वाला संकेत गुरु दे रहा संकट से निकलने का रास्ता गुरु कर्क राशि में उच्च होकर द्वादश भाव में है. सिंह लग्न में गुरु पंचम और अष्टम भाव का स्वामी है. इसकी यह स्थिति गुप्त रणनीति, पर्दे के पीछे मध्यस्थता और अचानक मिलने वाले बचाव से जुड़ती है. ईरान को युद्ध और प्रतिबंधों पर बहुत पैसा खर्च करना पड़ रहा है. इसके बावजूद वह वैकल्पिक कारोबारी रास्तों, गुप्त समझौतों और मित्र देशों के सहयोग से खुद को संभाल रहा है. कुंडली में गुरु का षड्बल 7.94 रूप है. इससे संकेत मिलता है कि बड़े संकट के बीच ईरान को समय-समय पर ऐसा रास्ता मिलता रहेगा, जो उसे पूरी तरह टूटने से बचा सके. बातचीत बार-बार क्यों टूट रही? ईरान पर गुरु की महा
US Iran War: अमेरिका और इजरायल के हमलों को छह महीने हो चुके हैं. ईरान को भारी सैन्य और आर्थिक नुकसान हुआ. उसके शीर्ष नेतृत्व को भी चोट पहुंची. तेल कारोबार पर दबाव बढ़ा. अमेरिका ने प्रतिबंधों और नौसैनिक नाकेबंदी से उसे घेरने की कोशिश की. इसके बाद भी ईरान ने हथियार नहीं डाले.
इसकी एक बड़ी वजह होर्मुज जलडमरूमध्य है. ईरान के पास अभी भी इस अहम समुद्री रास्ते को प्रभावित करने की क्षमता है. उसकी सत्ता और सैन्य ढांचा भी पूरी तरह नहीं टूटा है. तेहरान को यह भी भरोसा है कि अमेरिका लंबे समय तक इतने महंगे युद्ध का बोझ नहीं उठाना चाहेगा. ईरान की कुंडली में भी आत्मसमर्पण से अधिक नुकसान सहकर मुकाबला जारी रखने के संकेत मिलते हैं.
फिलहाल 9 सितंबर तक का समय अधिक संवेदनशील दिखाई देता है. इसके बाद युद्ध तुरंत समाप्त होने के बजाय बातचीत की मेज पर जा सकता है. पहली ठोस राहत नवंबर के अंतिम सप्ताह से बनती दिख रही है.
#BREAKING | अमेरिका और ईरान के बीच फिर जंग शुरू, अमेरिका ने लारक द्वीप पर बोला हमला@aparna_journo | https://t.co/SMm0dUypVm#BreakingNews #WarAlertOnABP #USIran #IranWar #DonaldTrump pic.twitter.com/WOPnMcQRl6 — ABP News (@ABPNews) August 31, 2026
यह भी पढ़ें- SCO Summit 2026: ईरान संकट के बीच PM मोदी का बड़ा दांव, क्या Putin खोलेंगे सस्ते तेल का रास्ता?
एक महीने बाद फिर आमने-सामने अमेरिका और ईरान
30 अगस्त को अमेरिकी सेना ने होर्मुज के पास स्थित ईरान के लारक द्वीप पर दो रॉकेट लॉन्चरों को निशाना बनाया. अमेरिका का दावा है कि ईरानी सेना समुद्र में बारूदी सुरंगें बिछाने की तैयारी कर रही थी. जवाब में ईरान ने जॉर्डन में मौजूद अमेरिकी ठिकानों की ओर बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं.
यह एक महीने से अधिक समय बाद अमेरिका और ईरान के बीच पहला सीधा सैन्य टकराव था. इसके बाद ब्रेंट क्रूड की कीमत 90 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर चली गई. इससे साफ है कि होर्मुज में एक हमला भी पूरी दुनिया के तेल बाजार को हिला सकता है.
छह महीने बाद युद्ध ऐसे मोड़ पर है जहां दोनों पक्षों को भारी नुकसान हो रहा है, लेकिन कोई पीछे हटने को तैयार नहीं है. अमेरिका चाहता है कि ईरान होर्मुज पर अपना दबाव छोड़ दे. ईरान चाहता है कि अमेरिकी नाकेबंदी हटे और किसी समझौते को उसकी हार न माना जाए. इसी खींचतान ने युद्ध को महंगे गतिरोध में बदल दिया है.
यह भी पढ़ें- मोदी, पुतिन और शी एक मंच पर... भारत को सस्ता तेल या सीमा पर राहत?
आखिर ईरान अब तक क्यों नहीं झुका?
ईरान को सैन्य नुकसान पहुंचाना और उसकी सत्ता को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर करना दो अलग बातें हैं. छह महीने के हमलों के बाद भी ईरान की सत्ता, मिसाइल क्षमता और होर्मुज को प्रभावित करने की ताकत पूरी तरह खत्म नहीं हुई है.
तेहरान यह भी मानता है कि समय उसके पक्ष में जा सकता है. लंबा युद्ध अमेरिका के हथियार भंडार, सैन्य खर्च और घरेलू राजनीति पर दबाव डाल रहा है. दूसरी तरफ ईरान चीन और भारत जैसे देशों से जुड़े अपने आर्थिक रिश्तों को सुरक्षा कवच की तरह देखता है. इन देशों पर पूरी ताकत से सेकेंडरी प्रतिबंध लगाना अमेरिका के लिए भी आसान फैसला नहीं होगा.
सबसे बड़ी बात यह है कि ईरान ऐसा समझौता नहीं चाहता जिसे देश के भीतर आत्मसमर्पण समझा जाए. इससे सरकार की साख और सत्ता दोनों पर सवाल उठ सकते हैं. इसलिए वह नुकसान सहकर भी होर्मुज को सौदेबाजी के हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है.
यह भी पढ़ें- Weather Prediction: सितंबर में फिर बिगड़ेगा मौसम? मंगल-शनि दे रहे भारी बारिश के संकेत
ईरान की कुंडली में संघर्ष इतना लंबा क्यों?
यह विश्लेषण 1 अप्रैल 1979, दोपहर 3 बजे, तेहरान की कुंडली पर आधारित है. इस कुंडली में सिंह लग्न है. लग्न में शनि और राहु बैठे हैं. यह योग ईरान के राजनीतिक चरित्र की बड़ी कमजोरी और ताकत दोनों दिखाता है.
शनि-राहु सत्ता के भीतर भय, अविश्वास, कट्टरता और अलगाव बढ़ाते हैं. लेकिन यही मेल दबाव के सामने अड़ जाने की प्रवृत्ति भी पैदा करता है. ऐसे में नेतृत्व नुकसान का व्यावहारिक आकलन करने के बजाय पीछे हटने को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना सकता है.
कुंडली में लग्नेश सूर्य सबसे अधिक षड्बली ग्रह है. सूर्य का षड्बल 9.89 रूप है. यह सत्ता की पकड़ और शासन के बने रहने की क्षमता दिखाता है. यही एक बड़ा कारण है कि शीर्ष स्तर पर नुकसान के बाद भी ईरान की व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त नहीं हुई.
उच्च का चंद्रमा बचा रहा सत्ता !
चंद्रमा वृषभ राशि में उच्च होकर दशम भाव में है. दशम भाव सरकार और देश की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा से जुड़ा है. इसका भावबल भी अपेक्षाकृत मजबूत है. इसलिए संकट के बीच शासन राष्ट्रवाद और बाहरी खतरे के नाम पर जनता को अपने साथ रखने की कोशिश कर सकता है.
लेकिन सिंह लग्न में चंद्रमा द्वादश भाव का स्वामी भी है. उसका दशम भाव में होना बताता है कि युद्ध की कीमत सीधे सरकार, अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय प्रतिष्ठा को चुकानी पड़ सकती है. इसलिए उच्च चंद्रमा केवल मजबूती नहीं देता. वह भारी नुकसान के बाद सत्ता को बचाए रखने की स्थिति भी बनाता है.
यह भी पढ़ें- 400 अधिकारियों के साथ भारत आएंगे शी जिनपिंग? सीमा विवाद पर ग्रहों का चौंकाने वाला संकेत
गुरु दे रहा संकट से निकलने का रास्ता
गुरु कर्क राशि में उच्च होकर द्वादश भाव में है. सिंह लग्न में गुरु पंचम और अष्टम भाव का स्वामी है. इसकी यह स्थिति गुप्त रणनीति, पर्दे के पीछे मध्यस्थता और अचानक मिलने वाले बचाव से जुड़ती है.
ईरान को युद्ध और प्रतिबंधों पर बहुत पैसा खर्च करना पड़ रहा है. इसके बावजूद वह वैकल्पिक कारोबारी रास्तों, गुप्त समझौतों और मित्र देशों के सहयोग से खुद को संभाल रहा है. कुंडली में गुरु का षड्बल 7.94 रूप है. इससे संकेत मिलता है कि बड़े संकट के बीच ईरान को समय-समय पर ऐसा रास्ता मिलता रहेगा, जो उसे पूरी तरह टूटने से बचा सके.
बातचीत बार-बार क्यों टूट रही?
ईरान पर गुरु की महादशा में राहु की अंतरदशा 10 जून 2027 तक चल रही है. गुरु समाधान चाहता है, लेकिन राहु शर्तों को उलझाता है. इसीलिए एक तरफ शांति वार्ता होती है, दूसरी तरफ अचानक हमला या नया अल्टीमेटम सामने आ जाता है.
30 जुलाई से 24 दिसंबर 2026 तक शुक्र की प्रत्यंतर दशा है. शुक्र तीसरे और दशम भाव का स्वामी होकर सप्तम भाव में केतु के साथ बैठा है. सप्तम भाव दूसरे देशों, संधि और खुले युद्ध का भाव है. शुक्र बातचीत कराता है, लेकिन केतु भरोसा तोड़ता है. इसलिए समझौते की कोशिशें जारी रहेंगी, पर किसी पक्ष को दूसरे की शर्तें स्वीकार्य नहीं होंगी.
अष्टकवर्ग में सप्तम भाव की कुंभ राशि को केवल 20 अंक मिले हैं. यह कुंडली के सबसे कमजोर अंकों में है. बुध का षड्बल भी निर्धारित आवश्यकता से कम है. ये दोनों स्थितियां बताती हैं कि कूटनीति इस समय ईरान की सबसे कमजोर कड़ी है. बातचीत होगी, लेकिन गलत संदेश, कठोर भाषा और अविश्वास उसे पटरी से उतार सकते हैं.
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9 सितंबर तक क्यों है ज्यादा खतरा?
ईरान के 2026 के वर्षफल में भी सिंह लग्न है. जन्मकुंडली और वर्षफल में एक ही लग्न होना बताता है कि इस साल देश की पहचान, सत्ता और नेतृत्व सीधे संकट के केंद्र में हैं.
वर्षफल में केतु लग्न में है. मंगल, बुध और राहु सप्तम भाव में हैं. सूर्य और शनि अष्टम भाव में बैठे हैं. वर्ष की मुंथा द्वादश भाव में है. ये योग युद्ध पर भारी खर्च, अचानक हमला, नेतृत्व पर दबाव और दूसरे देशों के साथ टूटते संबंध दिखाते हैं.
26 अगस्त से 9 सितंबर तक शनि की मुद्दा दशा है. शनि वर्षफल के अष्टम भाव में मौजूद है. मौजूदा गोचर में भी शनि ईरान की जन्मकुंडली से अष्टम भाव में चल रहा है. मुद्दा दशा और गोचर का एक ही भाव सक्रिय करना इस अवधि की गंभीरता बढ़ाता है. 30 अगस्त 2026 का अमेरिकी हमला इसी समय हुआ.
इसलिए 9 सितंबर तक सैन्य ठिकानों, होर्मुज, तेल प्रतिष्ठानों या वरिष्ठ अधिकारियों से जुड़ी किसी अचानक घटना का खतरा सामान्य से अधिक माना जा सकता है. इसे युद्ध समाप्त होने की तारीख नहीं कहा जा सकता. यह तत्काल सैन्य खतरे के पहले कठिन चरण का अंतिम बिंदु है.
9 सितंबर के बाद युद्ध किस तरफ जाएगा?
9 सितंबर से 31 अक्टूबर 2026 तक बुध की मुद्दा दशा चलेगी. बुध सप्तम भाव में है. इससे युद्ध मैदान के साथ बातचीत की मेज भी सक्रिय होगी. ओमान, कतर या किसी अन्य मध्यस्थ देश की भूमिका बढ़ सकती है. होर्मुज से जहाजों की आवाजाही और प्रतिबंधों में राहत पर नए प्रस्ताव सामने आ सकते हैं.
लेकिन बुध के साथ मंगल और राहु भी हैं. इसलिए यह शांत वार्ता नहीं होगी. इसमें धमकी, अल्टीमेटम, गलत सूचना और अचानक शर्त बदलने जैसी स्थिति बनी रह सकती है. समझौते की घोषणा होने के बाद भी उसका उल्लंघन संभव है.
31 अक्टूबर से 21 नवंबर 2026 तक केतु की मुद्दा दशा फिर अनिश्चितता बढ़ाएगी. इस दौरान बातचीत टूटने, भ्रम फैलने या बिना चेतावनी किसी कार्रवाई का खतरा रहेगा.
21 नवंबर से शुक्र की मुद्दा दशा शुरू होगी. शुक्र समझौते और कूटनीति का ग्रह है. इसलिए नवंबर के अंतिम सप्ताह से जनवरी 2027 के तीसरे सप्ताह तक सीमित युद्धविराम, कैदियों की रिहाई, होर्मुज पर अस्थायी व्यवस्था या प्रतिबंधों में आंशिक राहत का बेहतर अवसर बन सकता है.
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युद्ध कब खत्म होने की संभावना?
ईरान की कुंडली बिना शर्त आत्मसमर्पण नहीं दिखा रही. 9 सितंबर तक तत्काल सैन्य खतरा अधिक है. इसके बाद 31 अक्टूबर तक बातचीत तेज हो सकती है, लेकिन स्थायी शांति कठिन रहेगी. 31 अक्टूबर से 21 नवंबर के बीच एक बार फिर हालात उलझ सकते हैं.
ठोस राहत की पहली मजबूत संभावना 21 नवंबर के बाद बनती है. फिर भी गुरु-राहु का दौर 10 जून 2027 तक चलेगा. इसलिए 2026 के अंत में युद्धविराम या सीमित समझौता संभव है, लेकिन अमेरिका और ईरान के बीच टकराव का पूरी तरह समाप्त होना अभी कठिन दिखाई देता है.
FAQs
अमेरिका-ईरान युद्ध कब खत्म हो सकता है?
ईरान की कुंडली के अनुसार 9 सितंबर 2026 तक सैन्य तनाव अधिक रह सकता है. इसके बाद बातचीत बढ़ने और नवंबर के अंतिम सप्ताह से सीमित समझौते की संभावना बनती है.
छह महीने बाद भी ईरान ने आत्मसमर्पण क्यों नहीं किया?
ईरान की सत्ता और सैन्य क्षमता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है. होर्मुज जलडमरूमध्य पर उसका प्रभाव भी अमेरिका के खिलाफ बड़ा दबाव बनाने वाला हथियार है.
ईरान की कुंडली में अभी कौन-सी दशा चल रही है?
ईरान की कुंडली में गुरु की महादशा और राहु की अंतरदशा चल रही है. राहु की अंतरदशा 10 जून 2027 तक रहेगी.
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