Obesity Hypoventilation Syndrome: क्या मोटापा ले सकता है जान? 160 किलो की महिला का सांस लेना हुआ मुश्किल, डॉक्टरों ने ऐसे बचाया

Obesity Related Breathing Disorder: कभी- कभी कुछ मामले ऐसे आते हैं अस्पतालों में,  जिनमें अगर मरीज जिंदा बच जाए, तो वह किसी चमत्कार से कम नहीं माना जाता है. ऐसा ही कुछ गुरुग्राम के सीके बिड़ला अस्पताल में हुआ, जहां डॉक्टरों की टीम ने एक बेहद मुश्किल और जोखिम भरे केस में 75 वर्षीय महिला की जान बचाकर उसे सुरक्षित डिस्चार्ज कर दिया. चलिए आपको बताते हैं कि आखिर मामला क्या है.  किस बीमारी से जूझ रही थी महिला?  160 किलो वजन की उस महिला कोओबेसिटी हाइपोवेंटिलेशन सिंड्रोम नाम की गंभीर बीमारी थी, जिसमें शरीर पर्याप्त रूप से सांस नहीं ले पाता और खून में ऑक्सीजन का स्तर गिरने लगता है, जबकि कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ जाती है. महिला को कई अन्य बीमारियां भी थीं, जैसे डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, एंग्जायटी और लंबे समय तक बिस्तर पर रहने की वजह से बेडसोर की समस्या थी.  वह अस्पताल के इमरजेंसी विभाग में गंभीर हालत में लाई गई थीं, जहां उन्हें दोनों फेफड़ों में निमोनिया और हार्ट की गंभीर समस्या का सामना करना पड़ रहा था. हालत इतनी नाजुक थी कि तुरंत वेंटिलेटर सपोर्ट देना पड़ा.  इसे भी पढ़ें- सावधान! 30 की उम्र पार करते ही 'बूढ़ा' होने लगा आपका दिल, कहीं आप भी तो नहीं कर रहे ये गलतियां? धीरे- धीरे हुआ सुधार ICU में पहले 24 घंटों के इलाज के दौरान उनकी स्थिति में कुछ सुधार दिखा. बुखार और इंफेक्शन कम होने लगे, छाती के एक्स-रे में भी सुधार नजर आया और दिल से जुड़े संकेतक भी बेहतर होने लगे.  इन पॉजिटिव संकेतों के आधार पर डॉक्टरों ने करीब 36 घंटे बाद वेंटिलेटर हटाने का फैसला लिया. लेकिन जैसे ही वेंटिलेटर हटाया गया, मरीज की हालत अचानक बिगड़ गई. उनके शरीर में ऑक्सीजन का स्तर तेजी से गिरा और उन्हें फिर से तुरंत वेंटिलेटर पर रखना पड़ा. डॉक्टरों ने क्या कहा? इस पूरे मामले में अस्पताल में पल्मोनोलॉजी और क्रिटिकल केयर के एसोसिएट डायरेक्टर डॉ. कुलदीप कुमार ग्रोवर ने बताया कि यह समस्या मोटापे से जुड़ी सांस लेने की गंभीर बाधा की वजह से हुई. उन्होंने कहा कि ऐसे मरीजों में लंग्स की क्षमता कम हो जाती है और शरीर खुद से पर्याप्त सांस नहीं ले पाता. डॉ. ग्रोवर ने आगे बताया कि इस केस में मरीज के इंफेक्शन और दिल से जुड़े पैरामीटर तो सुधर रहे थे, लेकिन मोटापे के कारण उनकी सांस लेने की क्षमता बहुत कमजोर थी. यही वजह रही कि पहली बार वेंटिलेटर हटाने की कोशिश असफल रही. ऐसे बची जान इसके बाद डॉक्टरों की टीम ने अपनी रणनीति बदली. मरीज को लंबे समय तक धीरे-धीरे खुद सांस लेने की ट्रेनिंग दी गई, प्रेशर सपोर्ट को धीरे-धीरे कम किया गया और ब्रोंकोस्कोपी की मदद से एयरवे को पूरी तरह तैयार किया गया. इस सावधानी और प्लानिंग के बाद दूसरी बार वेंटिलेटर हटाने की प्रक्रिया सफल रही. भारत में मोटापे के बढ़ते मामलों के साथ OHS जैसी बीमारियां भी तेजी से सामने आ रही हैं. कई स्टडीज के मुताबिक, स्लीप से जुड़ी सांस की समस्याओं वाले मरीजों में इसका प्रतिशत 5 से 16 फीसदी तक पाया गया है, लेकिन अक्सर यह बीमारी तब तक पहचान में नहीं आती जब तक स्थिति गंभीर न हो जाए. डॉक्टरों का कहना है कि समय रहते जांच, वजन नियंत्रित रखना और नियमित मेडिकल चेकअप ही ऐसी गंभीर स्थितियों से बचने का सबसे अच्छा तरीका है. इसे भी पढ़ें- Vitamin Side Effects: सावधान! बिना डॉक्टरी सलाह के यह विटामिन लेना पड़ सकता है भारी, जा सकती है आंखों की रोशनी Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Apr 11, 2026 - 01:30
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Obesity Hypoventilation Syndrome: क्या मोटापा ले सकता है जान? 160 किलो की महिला का सांस लेना हुआ मुश्किल, डॉक्टरों ने ऐसे बचाया

Obesity Related Breathing Disorder: कभी- कभी कुछ मामले ऐसे आते हैं अस्पतालों में,  जिनमें अगर मरीज जिंदा बच जाए, तो वह किसी चमत्कार से कम नहीं माना जाता है. ऐसा ही कुछ गुरुग्राम के सीके बिड़ला अस्पताल में हुआ, जहां डॉक्टरों की टीम ने एक बेहद मुश्किल और जोखिम भरे केस में 75 वर्षीय महिला की जान बचाकर उसे सुरक्षित डिस्चार्ज कर दिया. चलिए आपको बताते हैं कि आखिर मामला क्या है. 

किस बीमारी से जूझ रही थी महिला?

 160 किलो वजन की उस महिला कोओबेसिटी हाइपोवेंटिलेशन सिंड्रोम नाम की गंभीर बीमारी थी, जिसमें शरीर पर्याप्त रूप से सांस नहीं ले पाता और खून में ऑक्सीजन का स्तर गिरने लगता है, जबकि कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ जाती है. महिला को कई अन्य बीमारियां भी थीं, जैसे डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, एंग्जायटी और लंबे समय तक बिस्तर पर रहने की वजह से बेडसोर की समस्या थी.  वह अस्पताल के इमरजेंसी विभाग में गंभीर हालत में लाई गई थीं, जहां उन्हें दोनों फेफड़ों में निमोनिया और हार्ट की गंभीर समस्या का सामना करना पड़ रहा था. हालत इतनी नाजुक थी कि तुरंत वेंटिलेटर सपोर्ट देना पड़ा. 

इसे भी पढ़ें- सावधान! 30 की उम्र पार करते ही 'बूढ़ा' होने लगा आपका दिल, कहीं आप भी तो नहीं कर रहे ये गलतियां?

धीरे- धीरे हुआ सुधार

ICU में पहले 24 घंटों के इलाज के दौरान उनकी स्थिति में कुछ सुधार दिखा. बुखार और इंफेक्शन कम होने लगे, छाती के एक्स-रे में भी सुधार नजर आया और दिल से जुड़े संकेतक भी बेहतर होने लगे.  इन पॉजिटिव संकेतों के आधार पर डॉक्टरों ने करीब 36 घंटे बाद वेंटिलेटर हटाने का फैसला लिया. लेकिन जैसे ही वेंटिलेटर हटाया गया, मरीज की हालत अचानक बिगड़ गई. उनके शरीर में ऑक्सीजन का स्तर तेजी से गिरा और उन्हें फिर से तुरंत वेंटिलेटर पर रखना पड़ा.

डॉक्टरों ने क्या कहा?

इस पूरे मामले में अस्पताल में पल्मोनोलॉजी और क्रिटिकल केयर के एसोसिएट डायरेक्टर डॉ. कुलदीप कुमार ग्रोवर ने बताया कि यह समस्या मोटापे से जुड़ी सांस लेने की गंभीर बाधा की वजह से हुई. उन्होंने कहा कि ऐसे मरीजों में लंग्स की क्षमता कम हो जाती है और शरीर खुद से पर्याप्त सांस नहीं ले पाता. डॉ. ग्रोवर ने आगे बताया कि इस केस में मरीज के इंफेक्शन और दिल से जुड़े पैरामीटर तो सुधर रहे थे, लेकिन मोटापे के कारण उनकी सांस लेने की क्षमता बहुत कमजोर थी. यही वजह रही कि पहली बार वेंटिलेटर हटाने की कोशिश असफल रही.

ऐसे बची जान

इसके बाद डॉक्टरों की टीम ने अपनी रणनीति बदली. मरीज को लंबे समय तक धीरे-धीरे खुद सांस लेने की ट्रेनिंग दी गई, प्रेशर सपोर्ट को धीरे-धीरे कम किया गया और ब्रोंकोस्कोपी की मदद से एयरवे को पूरी तरह तैयार किया गया. इस सावधानी और प्लानिंग के बाद दूसरी बार वेंटिलेटर हटाने की प्रक्रिया सफल रही. भारत में मोटापे के बढ़ते मामलों के साथ OHS जैसी बीमारियां भी तेजी से सामने आ रही हैं. कई स्टडीज के मुताबिक, स्लीप से जुड़ी सांस की समस्याओं वाले मरीजों में इसका प्रतिशत 5 से 16 फीसदी तक पाया गया है, लेकिन अक्सर यह बीमारी तब तक पहचान में नहीं आती जब तक स्थिति गंभीर न हो जाए. डॉक्टरों का कहना है कि समय रहते जांच, वजन नियंत्रित रखना और नियमित मेडिकल चेकअप ही ऐसी गंभीर स्थितियों से बचने का सबसे अच्छा तरीका है.

इसे भी पढ़ें- Vitamin Side Effects: सावधान! बिना डॉक्टरी सलाह के यह विटामिन लेना पड़ सकता है भारी, जा सकती है आंखों की रोशनी

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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