EXPLAINED: बिहार में 42% विधायक 'परिवार के वारिस', केंद्र में बीजेपी का 'परिवारवादी किला' ज्यादा मजबूत, कब खत्म होगी डायनेस्टी?
बिहार कई प्रगतिशील आंदलनों का घर है, लेकिन राजनीति में परिवारवाद के मामले में भी यह राज्य आगे है. परिवारवाद यानी जब नेता अपने बेटे, बेटी, भाइयों और रिश्तेदारों को राजनीति में आगे लाते हैं और उन्हें चुनाव लड़ने या पार्टी पद दिलवाते हैं. इंडियन एक्सप्रेस की हालिया सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक बिहार में 42% से ज्यादा निवर्तमान विधायक वंशवादी हैं. तो आइए ABP एक्सप्लेनर में समझते हैं कि बिहार में कितनी बड़ी है भाई-भतीजावाद की राजनीति, नेशनल पॉलिटिक्स में परिवारवाद की स्थिति क्या और कैसे बीजेपी इसमें टॉप पार्टी बन गई... सवाल 1- बिहार में राजनीति का 'फैमिली बिजनेस' क्या है?जवाब- इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार की 243 सदस्यीय विधानसभा में 70 विधायक ऐसे हैं, जो किसी न किसी पॉलिटिकल फैमिली से आते हैं. 28.81% यानी एक चौथाई विधायक परिवारवाद के हैं. रिपोर्ट में बिहार टॉप पोजिशन पर है. यह आंकड़ा इतना बड़ा है कि अरुणाचल प्रदेश, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर और उत्तराखंड जैसे 5 छोटे राज्यों की कुल विधानसभाओं की संख्या के बराबर है. बिहार में 23 मुख्यमंत्रियों में से कम से कम 7 की विरासत उनके परिवार के सदस्यों ने आगे बढ़ाई है. कई पूर्व सीएम के रिश्तेदार अभी विधायक हैं. सवाल 2- बिहार में कौन सी पार्टी सबसे ज्यादा परिवारवादी है?जवाब- बिहार में राष्ट्रीय जनता दल यानी राजद के 71 विधायकों में 30 परिवारवाद के हैं यानी 42.25%. राजद को लालू प्रसाद यादव की फैमिली चलाती है, जो लिस्ट में टॉप पर है. दरअसल, क्षेत्रीय पार्टियां अक्सर परिवार-केंद्रित होती हैं, जहां संस्थापक का परिवार की कंट्रोल रखता है. राजद के परिवारवाद विधायकों में- तेजस्वी यादव (लालू प्रसाद के बेटे, रघोपुर से विधायक) तेज प्रताप यादव (लालू के बड़े बेटे, हसनपुर से विधायक रहे लेकिन अब पार्टी से निष्कासित हैं) रोहिणी आचार्य (लालू प्रसाद की बेटी, लोकसभा चुनाव लड़ीं लेकिन हार गईं) राहुल तिवारी (पूर्व MP शिवानंद तिवारी के बेटे, शाहपुर से विधायक) ओसामा शहाब (पूर्व MP मोहम्मद शहाबुद्दीन के बेटे, रघुनाथपुर से विधायक) शिवानी शुक्ला, (पूर्व MLA मुन्ना शुक्ला की बेटी, लालगंज से विधायक) यूसुफ सलाहुद्दीन (तीसरी पीढ़ी- पिता मेहबूब अली कैसर MP थे और दादा चौधरी सलाहुद्दीन मंत्री) राजद का यह आंकड़ा जदयू और बीजेपी के परिवारवाद विधायकों के टोटल से सिर्फ 3 कम है. सवाल 3- बिहार की सत्ताधारी पार्टियों में परिवारवाद विधायकों का डेटा क्या है?जवाब- सत्ताधारी NDA में जदयू और बीजेपी पर भी परिवारवाद का साया है. जदयू के 44 विधायकों में 16 (36.36%) विधायक परिवारवाद के हैं. इनमें- सुमित कुमार सिंह (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री, पूर्व मंत्री नरेंद्र सिंह के बेटे और दादा श्रीकृष्ण सिंह भी मंत्री रहे) सुदर्शन कुमार (जदयू विधायक, माता सुनीला देवी और पिता संजय सिंह से विधायक रहे और दादा राजो सिंह विधायक-सांसद रहे) निवर्तमान विधानसभा से परिवारवाद के आधार पर जदयू-बीजेपी राज्य सरकार में 7 अन्य मंत्री हैं. इनमें विजय कुमार (जदयू), नितिन नवीन (बीजेपी), महेश्वर हजारी (जदयू), शीला कुमारी (जदयू), सुमित कुमार सिंह (जदयू), सुनील कुमार (जदयू) और जयंत राज (जदयू) शामिल हैं. वहीं, बीजेपी के 80 विधायकों में 17 विधायक (21.25%) परिवारवाद के हैं, जिनमें सम्राट चौधरी (डिप्टी सीएम, पूर्व MP शकुनी चौधरी के बेटे), नीतीश मिश्रा (पूर्व सीएम जगन्नाथ मिश्रा के बेटे) और अमरेंद्र प्रताप सिंह (पूर्व सीएम हरिहर सिंह के बेटे) समेत कई नाम शामिल हैं. इनमें केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी की बहू दीपा मांझी का भी नाम है. कांग्रेस के 17 विधायकों में से 4 परिवारवाद के हैं. यह ट्रेंड 2025 के चुनाव में भी जारी है, जैसे बीजेपी के संजीव चौरसिया (दीघा से). बिहार जैसे राज्यों में आर्थिक-शिक्षा पिछड़ापन परिवारवाद के बढ़ावे की वजह है, जिससे वोटर जागरूक नहीं होते और पार्टियां फैमिली कैंडिडेट्स को आसानी से ठोकती हैं. उदाहरण के लिए लालू प्रसाद यादव को बिना कंपीटिशन के राजद का 13वां लगातार प्रेसिडेंट चुना गया. सवाल 4- पूरे देश में परिवारवाद की स्थिति क्या है और कितने परिवार डायनेस्टी कंट्रोल कर रहे?जवाब- इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, देशभर में 149 परिवार ऐसे हैं, जिनके पास विधानसभाओं, लोकसभा और राज्यसभा में एक से ज्यादा डायनेस्टी विधायक या सांसद हैं. देशभर में कुल 337 विधायक या सांसद हैं. कुल 6,018 सासंदों-विधायकों में करीब 1,180 यानी 19.59% परिवारवादी हैं. एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स यानी ADR की सितंबर 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक, लोकसभा में 543 में से 167 सीटों (31%) पर परिवारवादी सांसद हैं. राज्यसभा में 224 में से 47 सीटों (21%), कुल राज्यों की 4,091 विधानसभाओं में 816 (20%) और विधान परिषदों में 346 में से 77 सीटों (22%) पर परिवारवादी हैं. देश में सबसे ज्यादा परिवारवादी नेता बिहार में हैं. इसके बाद- उत्तर प्रदेश: राज्य की 158 सीटों में 55 सीटों (34.81%) पर समाजवादी पार्टी के परिवारवादी विधायक हैं. मुलायम सिंह यादव के परिवार से अखिलेश यादव (पूर्व सीएम), शिवपाल यादव (पूर्व मंत्री), तेज प्रताप-अमर सिंह के रिश्तेदार. आंध्र प्रदेश: राज्य की 163 विधानसभा सीटों में 51 सीटें (31.28%) TDP के परिवारवादी विधायकों की है. यहां NTR परिवार का लंबा इतिहास रहा है.चंद्रबाबू नायडू-नारा लोकेश (पिता-पुत्र की जोड़ी) रही है. तमिलनाडु: राज्य की 172 विधानसभा सीटों में से 30 सीटों (17.44%) पर DMK के परिवारवादी नेता हैं. करुणानिधि परिवार के एम. के. स्टालिन सीएम हैं, कनिमोझी (सांसद), उधयनिधि स्टालिन (मंत्री), दयानिधि मारन (पूर्व मंत्री). इसके अलावा महाराष्ट्र में ठाकरे परिवार से उद्धव ठाकरे-आदित्य ठाकरे, राज ठाकरे, और एकनाथ शिंदे के बेटे श्रीकांत शिंदे भी परिवारवादी नेता हैं. यही हाल पश्चिम बंगाल मे
बिहार कई प्रगतिशील आंदलनों का घर है, लेकिन राजनीति में परिवारवाद के मामले में भी यह राज्य आगे है. परिवारवाद यानी जब नेता अपने बेटे, बेटी, भाइयों और रिश्तेदारों को राजनीति में आगे लाते हैं और उन्हें चुनाव लड़ने या पार्टी पद दिलवाते हैं. इंडियन एक्सप्रेस की हालिया सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक बिहार में 42% से ज्यादा निवर्तमान विधायक वंशवादी हैं.
तो आइए ABP एक्सप्लेनर में समझते हैं कि बिहार में कितनी बड़ी है भाई-भतीजावाद की राजनीति, नेशनल पॉलिटिक्स में परिवारवाद की स्थिति क्या और कैसे बीजेपी इसमें टॉप पार्टी बन गई...
सवाल 1- बिहार में राजनीति का 'फैमिली बिजनेस' क्या है?
जवाब- इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार की 243 सदस्यीय विधानसभा में 70 विधायक ऐसे हैं, जो किसी न किसी पॉलिटिकल फैमिली से आते हैं. 28.81% यानी एक चौथाई विधायक परिवारवाद के हैं. रिपोर्ट में बिहार टॉप पोजिशन पर है. यह आंकड़ा इतना बड़ा है कि अरुणाचल प्रदेश, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर और उत्तराखंड जैसे 5 छोटे राज्यों की कुल विधानसभाओं की संख्या के बराबर है. बिहार में 23 मुख्यमंत्रियों में से कम से कम 7 की विरासत उनके परिवार के सदस्यों ने आगे बढ़ाई है. कई पूर्व सीएम के रिश्तेदार अभी विधायक हैं.
सवाल 2- बिहार में कौन सी पार्टी सबसे ज्यादा परिवारवादी है?
जवाब- बिहार में राष्ट्रीय जनता दल यानी राजद के 71 विधायकों में 30 परिवारवाद के हैं यानी 42.25%. राजद को लालू प्रसाद यादव की फैमिली चलाती है, जो लिस्ट में टॉप पर है. दरअसल, क्षेत्रीय पार्टियां अक्सर परिवार-केंद्रित होती हैं, जहां संस्थापक का परिवार की कंट्रोल रखता है. राजद के परिवारवाद विधायकों में-
- तेजस्वी यादव (लालू प्रसाद के बेटे, रघोपुर से विधायक)
- तेज प्रताप यादव (लालू के बड़े बेटे, हसनपुर से विधायक रहे लेकिन अब पार्टी से निष्कासित हैं)
- रोहिणी आचार्य (लालू प्रसाद की बेटी, लोकसभा चुनाव लड़ीं लेकिन हार गईं)
- राहुल तिवारी (पूर्व MP शिवानंद तिवारी के बेटे, शाहपुर से विधायक)
- ओसामा शहाब (पूर्व MP मोहम्मद शहाबुद्दीन के बेटे, रघुनाथपुर से विधायक)
- शिवानी शुक्ला, (पूर्व MLA मुन्ना शुक्ला की बेटी, लालगंज से विधायक)
- यूसुफ सलाहुद्दीन (तीसरी पीढ़ी- पिता मेहबूब अली कैसर MP थे और दादा चौधरी सलाहुद्दीन मंत्री)
राजद का यह आंकड़ा जदयू और बीजेपी के परिवारवाद विधायकों के टोटल से सिर्फ 3 कम है.
सवाल 3- बिहार की सत्ताधारी पार्टियों में परिवारवाद विधायकों का डेटा क्या है?
जवाब- सत्ताधारी NDA में जदयू और बीजेपी पर भी परिवारवाद का साया है. जदयू के 44 विधायकों में 16 (36.36%) विधायक परिवारवाद के हैं. इनमें-
- सुमित कुमार सिंह (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री, पूर्व मंत्री नरेंद्र सिंह के बेटे और दादा श्रीकृष्ण सिंह भी मंत्री रहे)
- सुदर्शन कुमार (जदयू विधायक, माता सुनीला देवी और पिता संजय सिंह से विधायक रहे और दादा राजो सिंह विधायक-सांसद रहे)
निवर्तमान विधानसभा से परिवारवाद के आधार पर जदयू-बीजेपी राज्य सरकार में 7 अन्य मंत्री हैं. इनमें विजय कुमार (जदयू), नितिन नवीन (बीजेपी), महेश्वर हजारी (जदयू), शीला कुमारी (जदयू), सुमित कुमार सिंह (जदयू), सुनील कुमार (जदयू) और जयंत राज (जदयू) शामिल हैं.
वहीं, बीजेपी के 80 विधायकों में 17 विधायक (21.25%) परिवारवाद के हैं, जिनमें सम्राट चौधरी (डिप्टी सीएम, पूर्व MP शकुनी चौधरी के बेटे), नीतीश मिश्रा (पूर्व सीएम जगन्नाथ मिश्रा के बेटे) और अमरेंद्र प्रताप सिंह (पूर्व सीएम हरिहर सिंह के बेटे) समेत कई नाम शामिल हैं. इनमें केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी की बहू दीपा मांझी का भी नाम है. कांग्रेस के 17 विधायकों में से 4 परिवारवाद के हैं. यह ट्रेंड 2025 के चुनाव में भी जारी है, जैसे बीजेपी के संजीव चौरसिया (दीघा से).
बिहार जैसे राज्यों में आर्थिक-शिक्षा पिछड़ापन परिवारवाद के बढ़ावे की वजह है, जिससे वोटर जागरूक नहीं होते और पार्टियां फैमिली कैंडिडेट्स को आसानी से ठोकती हैं. उदाहरण के लिए लालू प्रसाद यादव को बिना कंपीटिशन के राजद का 13वां लगातार प्रेसिडेंट चुना गया.
सवाल 4- पूरे देश में परिवारवाद की स्थिति क्या है और कितने परिवार डायनेस्टी कंट्रोल कर रहे?
जवाब- इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, देशभर में 149 परिवार ऐसे हैं, जिनके पास विधानसभाओं, लोकसभा और राज्यसभा में एक से ज्यादा डायनेस्टी विधायक या सांसद हैं. देशभर में कुल 337 विधायक या सांसद हैं. कुल 6,018 सासंदों-विधायकों में करीब 1,180 यानी 19.59% परिवारवादी हैं.
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स यानी ADR की सितंबर 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक, लोकसभा में 543 में से 167 सीटों (31%) पर परिवारवादी सांसद हैं. राज्यसभा में 224 में से 47 सीटों (21%), कुल राज्यों की 4,091 विधानसभाओं में 816 (20%) और विधान परिषदों में 346 में से 77 सीटों (22%) पर परिवारवादी हैं.
देश में सबसे ज्यादा परिवारवादी नेता बिहार में हैं. इसके बाद-
- उत्तर प्रदेश: राज्य की 158 सीटों में 55 सीटों (34.81%) पर समाजवादी पार्टी के परिवारवादी विधायक हैं. मुलायम सिंह यादव के परिवार से अखिलेश यादव (पूर्व सीएम), शिवपाल यादव (पूर्व मंत्री), तेज प्रताप-अमर सिंह के रिश्तेदार.
- आंध्र प्रदेश: राज्य की 163 विधानसभा सीटों में 51 सीटें (31.28%) TDP के परिवारवादी विधायकों की है. यहां NTR परिवार का लंबा इतिहास रहा है.चंद्रबाबू नायडू-नारा लोकेश (पिता-पुत्र की जोड़ी) रही है.
- तमिलनाडु: राज्य की 172 विधानसभा सीटों में से 30 सीटों (17.44%) पर DMK के परिवारवादी नेता हैं. करुणानिधि परिवार के एम. के. स्टालिन सीएम हैं, कनिमोझी (सांसद), उधयनिधि स्टालिन (मंत्री), दयानिधि मारन (पूर्व मंत्री).
इसके अलावा महाराष्ट्र में ठाकरे परिवार से उद्धव ठाकरे-आदित्य ठाकरे, राज ठाकरे, और एकनाथ शिंदे के बेटे श्रीकांत शिंदे भी परिवारवादी नेता हैं. यही हाल पश्चिम बंगाल में भी है, जहां ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी की चाची-भतीजा जोड़ी चर्चा में रहती है.
सवाल 5- सबसे ज्यादा परिवारवादी नेताओं की पार्टी कौन सी है?
जवाब- भारत में बीजेपी सबसे ज्यादा परिवारवाद वाले नेताओं की पार्टी है. यानी बीजेपी के सबसे ज्यादा सत्ताधारी नेता परिवारवादी हैं.
- बीजेपी: कुल 2,078 सदस्यों में 387 सदस्य (18.62%) परिवारवादी नेता हैं.
- कांग्रेस: कुल 857 सदस्यों में 285 सदस्य (33.25%) परिवारवादी हैं. कांग्रेस का ज्यादा प्रतिशत है क्योंकि प्रति सदस्य अनुपात ज्यादा है.
- तृणमूल कांग्रेस (TMC): कुल 268 सदस्यों में 33 सदस्य (12.31%) परिवारवाद से हैं.
- द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK): कुल 172 सदस्यों में 33 सदस्य (17.44%) परिवारवादी नेता हैं.
- तेलुगू देशम पार्टी (TDP): कुल 163 सदस्यों में से 51 सदस्य (31.28%) परिवारवाद के हैं.
- समाजवादी पार्टी: कुल 158 सदस्यों में से 55 सदस्य (34.81%) परिवारवाद के हैं.
- आम आदमी पार्टी: कुल 134 सदस्यों में से 11 सदस्य (8.21%) परिवारवादी नेता हैं.
- राष्ट्रीय जनता दल (राजद): कुल 98 सदस्यों में से 30 सदस्य (30.61%) परिवारवादी नेता हैं.
- जनता दल यूनाइटेड (जदयू): कुल 81 सदस्यों में से 28 सदस्य (34.57%) परिवारवाद के हैं.
सवाल 6- कैसे देश की राजनीति में परिवारवाद बढ़ रहा है?
जवाब- एक्सपर्ट्स के मुताबिक, परिवारवाद बढ़ने की 4 बड़ी वजहें हैं...
1. नाम पहचान और वोट बैंक की आसानी: परिवार का नाम एक 'ब्रांड' की तरह काम करता है. वोटरों को जाना-पहचाना नाम भरोसेमंद लगता है, जिससे चुनाव अभियान का खर्च कम होता है. 2012 में उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव ने पिता मुलायम सिंह की विरासत से मुख्यमंत्री पद हासिल किया, जहां वोट शेयर 30% से ऊपर रहा.
2. संसाधनों और नेटवर्क तक आसान पहुंच: राजनीतिक परिवारों के पास पैसा, मीडिया और जमीनी नेटवर्क पहले से होता है. 2024 लोकसभा चुनाव में चुनावी खर्च औसतन 10-15 करोड़ रुपए प्रति उम्मीदवार था, जो नए लोगों के लिए बाधा बना.
3. पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र की कमी: कांग्रेस, सपा और डीएमके जैसी ज्यादातर पार्टियां प्राइमरी चुनाव या खुली प्रतियोगिता नहीं करातीं. टिकट वितरण नेताओं के हाथ में होता है, जो रिश्तेदारों को तवज्जोह देते हैं. ADR के मुताबिक, 80% पार्टियों में कोई ट्रांसपेरेंसी नहीं है, जिससे परिवारवाद बढ़ता है.
4. सांस्कृतिक विरासत और परंपरा: ब्रिटिश काल में नेहरू-गांधी जैसे परिवारों का प्रभाव रहा, जो आजादी के बाद भी जारी है. भारत की पारिवारिक संस्कृति में वंश परंपरा को स्थिरता का प्रतीक माना जाता है. जर्नल ऑफ पॉलिटिकल साइंस के मुताबिक, जाति-आधारित वोटिंग परिवारवाद को मजबूत करती है.
सवाल 7- परिवारवाद अच्छा है या बुरा और क्या यह खत्म होगा?
जवाब- पॉलिटिकल एक्सपर्ट्स के मुताबिक, परिवारवाद के पक्ष और विपक्ष दोनों हैं, लेकिन ज्यादातर लोग इसे लोकतंत्र के लिए नुकसानदायक मानते हैं. यह योग्यता-आधारित प्रोसेस यानी मेरिटोक्रेसी को कमजोर करता है और सत्ता को कुछ परिवारों तक सीमित रखता है.
अच्छे पहलू
- परिवार राजनीतिक विचारधारा और नीतियों को बनाए रखते हैं. जैसे पश्चिम बंगाल में ममता-अभिषेक ने बंगाली अस्मिता को मजबूत किया, जिससे पार्टी का वोट शेयर 45% रहा.
- परिवार में पलने से अगली पीढ़ी को राजनीतिक कौशल मिलता है. केटकिंग.इन की रिपोर्ट में कहा गया कि डायनेस्टी को बचपन से नेटवर्क मिलता है, जो नए नेताओं की तुलना में 15-20% बेहतर प्रदर्शन करते हैं.
- यह पिछड़े वर्गों और महिलाओं को राजनीति में लाता है. जैसे उत्तर प्रदेश और हरियाणा जैसे राज्यों में यादव और जाट परिवारों ने जाति-आधारित प्रतिनिधित्व बढ़ाया.
- पार्टियां परिवारवादी नेता को चुनती हैं क्योंकि उनकी जीत दर 25% से ज्यादा होती है, जो नतीजे पलट सकती है.
बुरे पहलू
- योग्यता की जगह वंशवाद को महत्व मिलता है, जिससे नए प्रतिभाशाली लोग बाहर रह जाते हैं. ADR के मुताबिक, यह 'जन्म-आधारित शासक वर्ग' बनता है, जहां 21% परिवारवादी 80% संसाधन कंट्रोल करते हैं.
- आंतरिक पार्टी से लोकतंत्र नष्ट होता है, सत्ता कुछ परिवारों तक सीमित रह जाती है. इससे समान अवसरों का उल्लघंन होता है और भ्रष्टाचार बढ़ता है.
- परिवारवाद बिजनेस को फायदा पहुंचाते हैं, जिससे कंपीटिशन कम होता है. जैसे महाराष्ट्र में ठाकरे-पवार परिवारों का प्रभाव नीतियों को प्रभावित करता है.
- परिवारवादी नेता जाति और धर्म कार्ड खेलते हैं, जिससे समाज बंटता है. इससे 'गंदी विभाजनकारी राजनीति' को बढ़ावा मिलता है. वोटरों को कम ऑप्शन मिलते हैं, जो लोकतंत्र की जड़ को कमजोर करता है.
एक्सपर्ट्स का मानना है कि परिवारवाद पूरी तरह खत्म नहीं होगा, लेकिन कम हो सकता है. पार्टियों में लोकतंत्र, चुनावी फंडिंग ट्रांसपेरेंसी और वोटर जागरूकता बढ़ेगी, तो परिवारवाद का हिस्सा 21% से कम होकर 15% रह सकता है. लेकिन सत्ता की भूख और ब्रांड वैल्यू की वजह से यह बनी रहेगी.
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