Cancer Cases In Elderly: क्या बुजुर्गों में बढ़ रहा कैंसर का खतरा? जानें सच

Elderly Cancer Detection Warning Signs: उम्र बढ़ने के साथ कैंसर का खतरा भी तेजी से बढ़ता है. अमेरिका और ब्रिटेन से सामने आए आंकड़े बताते हैं कि बुजुर्गों में कैंसर न केवल बड़ी स्वास्थ्य समस्या बन रहा है, बल्कि कई मामलों में बीमारी की पहचान भी काफी देर से हो रही है. स्थिति यह है कि बड़ी संख्या में बुजुर्ग मरीजों को कैंसर का पता तब चलता है, जब उनकी हालत बिगड़ने के बाद उन्हें इमरजेंसी में अस्पताल पहुंचाना पड़ता है. देर से बीमारी का पता चलने के कारण इलाज मुश्किल हो सकता है और मरीज के बचने की संभावना भी कम हो जाती है. जर्नल ऑफ द नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट में 14 जुलाई को ऑनलाइन प्रकाशित एक स्टडी में बुजुर्ग कैंसर मरीजों में इमरजेंसी प्रेजेंटेशन यानी आपात स्थिति में कैंसर का पता चलने और इससे जुड़ी मृत्यु दर का स्टडी किया गया. यूनिवर्सिटी ऑफ नॉर्थ कैरोलिना, चैपल हिल की कैरोलिन ए. थॉम्पसन और उनके सहयोगियों ने अमेरिका के नेशनल मेडिकेयर समूह के आंकड़ों का विश्लेषण किया. इसमें 2008 से 2017 के बीच 16 प्रमुख प्रकार के कैंसर से पीड़ित 9,29,378 मरीजों को शामिल किया गया. स्टडी में सामने आया कि करीब 28 फीसदी मामलों में कैंसर का पता इमरजेंसी प्रेजेंटेशन के दौरान चला. इनमें 22 फीसदी मरीज इनपेशेंट और 6 फीसदी आउटपेशेंट इमरजेंसी प्रेजेंटेशन वाले थे. हालांकि कैंसर के प्रकार के हिसाब से इसमें बड़ा अंतर देखने को मिला. ब्रेस्ट और प्रोस्टेट कैंसर में इमरजेंसी प्रेजेंटेशन की दर 10 फीसदी से कम थी. वहीं लिवर, फेफड़े, पेट, कोलन, ओवेरियन और पैंक्रियाटिक कैंसर में यह आंकड़ा 40 फीसदी से ज्यादा था. इसे भी पढ़ें - हार्ट अटैक जितना तेज हो सकता है पीरियड्स का दर्द इमरजेंसी में कैंसर का पता चलना बढ़ा रहा मौत का खतरा रिसर्च में मरीजों की सर्वाइवल रेट में भी बड़ा अंतर सामने आया. जिन मरीजों में कैंसर का पता इमरजेंसी की स्थिति में नहीं चला था, उनमें एक साल तक जीवित रहने की दर 81 फीसदी थी. आउटपेशेंट इमरजेंसी प्रेजेंटेशन वाले मरीजों में यह 60 फीसदी और इनपेशेंट इमरजेंसी प्रेजेंटेशन वाले मरीजों में केवल 36 फीसदी रही. इनपेशेंट इमरजेंसी प्रेजेंटेशन वाले मरीजों में 30 दिनों के भीतर मृत्यु का एडजस्टेड जोखिम सामान्य तरीके से कैंसर का पता चलने वाले मरीजों की तुलना में करीब चार गुना था. रिसर्च के मुताबिक, यह अंतर मरीज की उम्र, कैंसर की स्टेज, दूसरी बीमारियों और शारीरिक कमजोरी जैसे कारणों को ध्यान में रखने के बाद भी बना रहा. रिसर्चर कैरोलिन थॉम्पसन के मुताबिक, कैंसर का पता किस तरह और किन परिस्थितियों में चलता है, इससे भी मरीज की आगे की स्थिति के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है. 70 साल से ज्यादा उम्र वालों में आधे से अधिक मामले ब्रिटेन में कैंसर रिसर्च यूके की एक रिपोर्ट भी बुजुर्गों में कैंसर को लेकर गंभीर स्थिति की ओर इशारा करती है. रिपोर्ट के अनुसार, कैंसर का खतरा उम्र के साथ तेजी से बढ़ता है. ब्रिटेन में कैंसर के आधे से ज्यादा मामले 70 साल से अधिक उम्र के लोगों में सामने आते हैं, जबकि कुल आबादी में इस आयु वर्ग की हिस्सेदारी केवल 14 फीसदी है. कैंसर के 10 में से 9 मामले 50 साल या उससे अधिक उम्र के लोगों में पाए जाते हैं. इसके बावजूद बुजुर्गों में कैंसर की पहचान कई बार बीमारी के काफी आगे बढ़ने के बाद होती है. 80 साल से अधिक उम्र के लोगों में हर तीन में से करीब एक कैंसर का मामला इमरजेंसी एडमिशन के बाद सामने आया. इसके मुकाबले 50 साल से कम उम्र के लोगों में यह आंकड़ा 15 फीसदी है. बुजुर्ग मरीजों को कम मिल रहा इलाज रिपोर्ट में इलाज को लेकर भी उम्र के आधार पर अंतर सामने आया है. बुजुर्ग मरीजों को कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी मिलने की संभावना कम पाई गई. अंतरराष्ट्रीय आंकड़ों के मुताबिक, ब्रिटेन में 85 साल या उससे अधिक उम्र के कैंसर मरीजों में केवल 2.4 फीसदी को कीमोथेरेपी दी गई. ऑस्ट्रेलिया में यह आंकड़ा 8.1 फीसदी और कनाडा के ओंटारियो में 14 फीसदी था. ब्रिटेन में इस आयु वर्ग के 6.2 से 9.6 फीसदी कैंसर मरीजों को रेडियोथेरेपी मिली, जबकि कनाडा के कुछ हिस्सों में यह दर 20 फीसदी से ज्यादा और ऑस्ट्रेलिया के कुछ क्षेत्रों में 16 फीसदी से अधिक रही. हालांकि दूसरी बीमारियों के कारण कुछ बुजुर्ग मरीज कठिन इलाज के लिए शारीरिक रूप से फिट नहीं हो सकते हैं. रिपोर्ट में चिंता जताई गई कि कई बार मरीज की वास्तविक फिटनेस के बजाय केवल उसकी उम्र को आधार बनाकर इलाज का फैसला किया जाता है. इसे भी पढ़ें - Mustard Oil vs Olive Oil Benefits: सरसों या जैतून... हार्ट पेशेंट के लिए कौन सा तेल सही? Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Jul 29, 2026 - 04:30
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Cancer Cases In Elderly: क्या बुजुर्गों में बढ़ रहा कैंसर का खतरा? जानें सच

Elderly Cancer Detection Warning Signs: उम्र बढ़ने के साथ कैंसर का खतरा भी तेजी से बढ़ता है. अमेरिका और ब्रिटेन से सामने आए आंकड़े बताते हैं कि बुजुर्गों में कैंसर न केवल बड़ी स्वास्थ्य समस्या बन रहा है, बल्कि कई मामलों में बीमारी की पहचान भी काफी देर से हो रही है. स्थिति यह है कि बड़ी संख्या में बुजुर्ग मरीजों को कैंसर का पता तब चलता है, जब उनकी हालत बिगड़ने के बाद उन्हें इमरजेंसी में अस्पताल पहुंचाना पड़ता है. देर से बीमारी का पता चलने के कारण इलाज मुश्किल हो सकता है और मरीज के बचने की संभावना भी कम हो जाती है.

जर्नल ऑफ द नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट में 14 जुलाई को ऑनलाइन प्रकाशित एक स्टडी में बुजुर्ग कैंसर मरीजों में इमरजेंसी प्रेजेंटेशन यानी आपात स्थिति में कैंसर का पता चलने और इससे जुड़ी मृत्यु दर का स्टडी किया गया. यूनिवर्सिटी ऑफ नॉर्थ कैरोलिना, चैपल हिल की कैरोलिन ए. थॉम्पसन और उनके सहयोगियों ने अमेरिका के नेशनल मेडिकेयर समूह के आंकड़ों का विश्लेषण किया. इसमें 2008 से 2017 के बीच 16 प्रमुख प्रकार के कैंसर से पीड़ित 9,29,378 मरीजों को शामिल किया गया.


स्टडी में सामने आया कि करीब 28 फीसदी मामलों में कैंसर का पता इमरजेंसी प्रेजेंटेशन के दौरान चला. इनमें 22 फीसदी मरीज इनपेशेंट और 6 फीसदी आउटपेशेंट इमरजेंसी प्रेजेंटेशन वाले थे. हालांकि कैंसर के प्रकार के हिसाब से इसमें बड़ा अंतर देखने को मिला. ब्रेस्ट और प्रोस्टेट कैंसर में इमरजेंसी प्रेजेंटेशन की दर 10 फीसदी से कम थी. वहीं लिवर, फेफड़े, पेट, कोलन, ओवेरियन और पैंक्रियाटिक कैंसर में यह आंकड़ा 40 फीसदी से ज्यादा था.

इसे भी पढ़ें - हार्ट अटैक जितना तेज हो सकता है पीरियड्स का दर्द

इमरजेंसी में कैंसर का पता चलना बढ़ा रहा मौत का खतरा

रिसर्च में मरीजों की सर्वाइवल रेट में भी बड़ा अंतर सामने आया. जिन मरीजों में कैंसर का पता इमरजेंसी की स्थिति में नहीं चला था, उनमें एक साल तक जीवित रहने की दर 81 फीसदी थी. आउटपेशेंट इमरजेंसी प्रेजेंटेशन वाले मरीजों में यह 60 फीसदी और इनपेशेंट इमरजेंसी प्रेजेंटेशन वाले मरीजों में केवल 36 फीसदी रही.


इनपेशेंट इमरजेंसी प्रेजेंटेशन वाले मरीजों में 30 दिनों के भीतर मृत्यु का एडजस्टेड जोखिम सामान्य तरीके से कैंसर का पता चलने वाले मरीजों की तुलना में करीब चार गुना था. रिसर्च के मुताबिक, यह अंतर मरीज की उम्र, कैंसर की स्टेज, दूसरी बीमारियों और शारीरिक कमजोरी जैसे कारणों को ध्यान में रखने के बाद भी बना रहा. रिसर्चर कैरोलिन थॉम्पसन के मुताबिक, कैंसर का पता किस तरह और किन परिस्थितियों में चलता है, इससे भी मरीज की आगे की स्थिति के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है.

70 साल से ज्यादा उम्र वालों में आधे से अधिक मामले

ब्रिटेन में कैंसर रिसर्च यूके की एक रिपोर्ट भी बुजुर्गों में कैंसर को लेकर गंभीर स्थिति की ओर इशारा करती है. रिपोर्ट के अनुसार, कैंसर का खतरा उम्र के साथ तेजी से बढ़ता है. ब्रिटेन में कैंसर के आधे से ज्यादा मामले 70 साल से अधिक उम्र के लोगों में सामने आते हैं, जबकि कुल आबादी में इस आयु वर्ग की हिस्सेदारी केवल 14 फीसदी है. कैंसर के 10 में से 9 मामले 50 साल या उससे अधिक उम्र के लोगों में पाए जाते हैं.

इसके बावजूद बुजुर्गों में कैंसर की पहचान कई बार बीमारी के काफी आगे बढ़ने के बाद होती है. 80 साल से अधिक उम्र के लोगों में हर तीन में से करीब एक कैंसर का मामला इमरजेंसी एडमिशन के बाद सामने आया. इसके मुकाबले 50 साल से कम उम्र के लोगों में यह आंकड़ा 15 फीसदी है.

बुजुर्ग मरीजों को कम मिल रहा इलाज

रिपोर्ट में इलाज को लेकर भी उम्र के आधार पर अंतर सामने आया है. बुजुर्ग मरीजों को कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी मिलने की संभावना कम पाई गई. अंतरराष्ट्रीय आंकड़ों के मुताबिक, ब्रिटेन में 85 साल या उससे अधिक उम्र के कैंसर मरीजों में केवल 2.4 फीसदी को कीमोथेरेपी दी गई. ऑस्ट्रेलिया में यह आंकड़ा 8.1 फीसदी और कनाडा के ओंटारियो में 14 फीसदी था.

ब्रिटेन में इस आयु वर्ग के 6.2 से 9.6 फीसदी कैंसर मरीजों को रेडियोथेरेपी मिली, जबकि कनाडा के कुछ हिस्सों में यह दर 20 फीसदी से ज्यादा और ऑस्ट्रेलिया के कुछ क्षेत्रों में 16 फीसदी से अधिक रही. हालांकि दूसरी बीमारियों के कारण कुछ बुजुर्ग मरीज कठिन इलाज के लिए शारीरिक रूप से फिट नहीं हो सकते हैं. रिपोर्ट में चिंता जताई गई कि कई बार मरीज की वास्तविक फिटनेस के बजाय केवल उसकी उम्र को आधार बनाकर इलाज का फैसला किया जाता है.

इसे भी पढ़ें - Mustard Oil vs Olive Oil Benefits: सरसों या जैतून... हार्ट पेशेंट के लिए कौन सा तेल सही?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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