Burnt Cash Recovery Case: डिप्टी चेयरमैन के अधिकारों पर जस्टिस वर्मा ने उठाए सवाल तो सुप्रीम कोर्ट ने कहा- जो नियुक्ति करता है वो रद्द भी...
कैश कांड मामले पर सुनवाई में गुरुवार (8 जनवरी, 2026) को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर एक उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति के अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए जज की नियुक्ति को मंजूरी दे सकते हैं तो वह नियुक्ति को रद्द भी कर सकते हैं. कोर्ट ने जस्टिस यशवंत वर्मा की उस दलील पर यह बात कही है, जिसमें उन्होंने कहा कि राज्यसाभा के चेयरमैन की अनुपस्थिति में डिप्टी चेयरमैन के अधिकार सीमित हैं. जस्टिस यशवंत वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि राज्यसभा के नए चेयरमैन चुने जाने तक जांच कमेटी बनाया जाना रोका जा सकता था. उन्होंने लोकसभा की तरफ से जांच कमेटी बनाने का यह कह कर विरोध किया है कि प्रस्ताव दोनों सदनों में पेश हुआ था, लेकिन राज्यसभा के डिप्टी स्पीकर ने उसको खारिज कर दिया तो सिर्फ लोकसभा अध्यक्ष कैसे जांच कमेटी बना सकते हैं. जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव 21 जुलाई को लाया गया था और उसी दिन राज्यसभा के चेयरमैन ने इस्तीफा दे दिया था, जिसके बाद 11 अगस्त को डिप्टी चेयरमैन ने प्रस्ताव खारिज कर दिया और 12 अगस्त को लोकसभा अध्यक्ष ने जांच कमेटी बनाने की मंजूरी दे दी. बुधवार को भी इस मामले में सुनवाई हुई थी और जस्टिस यशवंत वर्मा की दलीलों पर जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने पूछा था कि राज्यसभा के डिप्टी चेयरमैन की तरफ से प्रस्ताव खारिज करने के बाद लोकसभा स्पीकर की तरफ से कमेटी बनाने में गलत क्या है. जस्टिस वर्मा की तरफ से पेश सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा ने कहा, 'डिप्टी चेयरमैन ने बिना कारण बताए नोटिस को अस्वीकार किया. यानी यह सिर्फ तकनीकी आधार पर खारिज नहीं कहा जा सकता. ऐसे में कानूनन लोकसभा को भी जांच कमेटी का गठन नहीं करना चाहिए था. दोनों सदनों की सहमति से ही कमेटी बन सकती थी.' जस्टिस वर्मा की तरफ से सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी भी पेश हुए. रोहतगी ने कहा कि चेयरमैन की अनुपस्थिति में डिप्टी चेयरमैन के अधिकार सीमित हैं. वह सदन चला सकते हैं, लेकिन चेयरमैन के अधिकार क्षेत्र में आने वाले सभी फैसले नहीं ले सकते. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक सदन की तरफ से कमेटी गठित होना आपके प्रति पूर्वाग्रह कैसे हुआ? अगर लोकसभा ने कमेटी बनाई है, तब भी बाद में प्रस्ताव दोनों सदनों में जाएगा. दोनों सदनों की सहमति से ही जज को हटाया जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने एक पुराने मामले का जिक्र करते हुए कहा, 'इतिहास हमें क्या बताता है जब राष्ट्रपति फखऱुद्दीन अली अहमद का निधन हुआ तो उनके उत्तराधिकारी का चुनाव कब हुआ?' जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कहा, "जब कोई उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति के अधिकार का इस्तेमाल करते हुए जज की नियुक्ति पर हस्ताक्षर कर सकते हैं तो वह नियुक्ति रद्द भी कर सकते हैं.' यह भी पढ़ें:-Stray Dogs: 'जो डरते हैं उनको काटते हैं कुत्ते', SC की बात सुनकर सिर हिलाने लगे डॉग लवर्स तो जज ने टोका और कही ये बात
कैश कांड मामले पर सुनवाई में गुरुवार (8 जनवरी, 2026) को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर एक उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति के अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए जज की नियुक्ति को मंजूरी दे सकते हैं तो वह नियुक्ति को रद्द भी कर सकते हैं. कोर्ट ने जस्टिस यशवंत वर्मा की उस दलील पर यह बात कही है, जिसमें उन्होंने कहा कि राज्यसाभा के चेयरमैन की अनुपस्थिति में डिप्टी चेयरमैन के अधिकार सीमित हैं.
जस्टिस यशवंत वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि राज्यसभा के नए चेयरमैन चुने जाने तक जांच कमेटी बनाया जाना रोका जा सकता था. उन्होंने लोकसभा की तरफ से जांच कमेटी बनाने का यह कह कर विरोध किया है कि प्रस्ताव दोनों सदनों में पेश हुआ था, लेकिन राज्यसभा के डिप्टी स्पीकर ने उसको खारिज कर दिया तो सिर्फ लोकसभा अध्यक्ष कैसे जांच कमेटी बना सकते हैं.
जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव 21 जुलाई को लाया गया था और उसी दिन राज्यसभा के चेयरमैन ने इस्तीफा दे दिया था, जिसके बाद 11 अगस्त को डिप्टी चेयरमैन ने प्रस्ताव खारिज कर दिया और 12 अगस्त को लोकसभा अध्यक्ष ने जांच कमेटी बनाने की मंजूरी दे दी.
बुधवार को भी इस मामले में सुनवाई हुई थी और जस्टिस यशवंत वर्मा की दलीलों पर जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने पूछा था कि राज्यसभा के डिप्टी चेयरमैन की तरफ से प्रस्ताव खारिज करने के बाद लोकसभा स्पीकर की तरफ से कमेटी बनाने में गलत क्या है.
जस्टिस वर्मा की तरफ से पेश सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा ने कहा, 'डिप्टी चेयरमैन ने बिना कारण बताए नोटिस को अस्वीकार किया. यानी यह सिर्फ तकनीकी आधार पर खारिज नहीं कहा जा सकता. ऐसे में कानूनन लोकसभा को भी जांच कमेटी का गठन नहीं करना चाहिए था. दोनों सदनों की सहमति से ही कमेटी बन सकती थी.'
जस्टिस वर्मा की तरफ से सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी भी पेश हुए. रोहतगी ने कहा कि चेयरमैन की अनुपस्थिति में डिप्टी चेयरमैन के अधिकार सीमित हैं. वह सदन चला सकते हैं, लेकिन चेयरमैन के अधिकार क्षेत्र में आने वाले सभी फैसले नहीं ले सकते.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक सदन की तरफ से कमेटी गठित होना आपके प्रति पूर्वाग्रह कैसे हुआ? अगर लोकसभा ने कमेटी बनाई है, तब भी बाद में प्रस्ताव दोनों सदनों में जाएगा. दोनों सदनों की सहमति से ही जज को हटाया जा सकता है.
सुप्रीम कोर्ट ने एक पुराने मामले का जिक्र करते हुए कहा, 'इतिहास हमें क्या बताता है जब राष्ट्रपति फखऱुद्दीन अली अहमद का निधन हुआ तो उनके उत्तराधिकारी का चुनाव कब हुआ?' जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कहा, "जब कोई उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति के अधिकार का इस्तेमाल करते हुए जज की नियुक्ति पर हस्ताक्षर कर सकते हैं तो वह नियुक्ति रद्द भी कर सकते हैं.'
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