AI in Healthcare: क्या चैटजीपीटी के भरोसे मरीजों की जिंदगी? भारत में 54% डॉक्टर कर रहे हैं AI का इस्तेमाल

ChatGPT vs Medical AI In Healthcare: भारत में डॉक्टरों के बीच आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का यूज लगातार बढ़ रहा है. मेडिकल रिसर्च, क्लिनिकल नोट्स तैयार करने, मरीजों को बीमारी के बारे में समझाने और इलाज से जुड़े फैसलों में मदद लेने के लिए कई डॉक्टर अब एआई टूल्स का सहारा ले रहे हैं. हालांकि एक्सपर्ट का कहना है कि इस बढ़ते इस्तेमाल के साथ एक बड़ा जोखिम भी जुड़ा है, क्योंकि कई डॉक्टर ऐसे सामान्य एआई चैटबॉट्स का उपयोग कर रहे हैं जिन्हें मेडिकल निर्णय लेने के लिए तैयार नहीं किया गया है. एआई के भरोसे इतने प्रतिशत डॉक्टर साइंटफिक पब्लिकेशन संस्था एल्सेवियर की क्लिनिशियन ऑफ द फ्यूचर 2026 रिपोर्ट के अनुसार, भारत में सर्वे में शामिल 48 प्रतिशत डॉक्टर और क्लिनिशियन अपने काम में एआई का उपयोग कर रहे हैं. इनमें 54 प्रतिशत डॉक्टर अक्सर चैटजीपीटी और क्लाउड जैसे सामान्य एआई टूल्स का इस्तेमाल करते हैं, जबकि केवल 26 प्रतिशत डॉक्टर ही मेडिकल रिसर्च और क्लिनिकल डेटा पर आधारित स्पेशल एआई प्लेटफॉर्म का नियमित उपयोग करते हैं। नर्सों में भी यही स्थिति देखने को मिली, जहां सामान्य एआई का उपयोग विशेष मेडिकल एआई की तुलना में अधिक पाया गया. क्या इससे कोई दिक्कत है? एल्सेवियर के लीड क्लिनिकल एग्जीक्यूटिव और चिकित्सक डॉ. राहुल गोयल का कहना है कि सामान्य एआई टूल्स इंटरनेट पर उपलब्ध अलग-अलग स्रोतों से जानकारी लेते हैं, जिनमें कई बार अप्रमाणित या गैर-साइंटफिक जानकारी भी शामिल हो सकती है. इसके विपरीत, मेडिकल एआई प्लेटफॉर्म प्रमाणित मेडिकल किताबों, रिसर्च जर्नल और क्लिनिकल गाइडलाइंस पर आधारित होते हैं.यदि किसी सवाल का पर्याप्त साइंटफिक प्रमाण उपलब्ध नहीं होता, तो ऐसे प्लेटफॉर्म स्पष्ट रूप से इसकी जानकारी देते हैं, बजाय इसके कि अनुमान के आधार पर जवाब तैयार करें. डॉ. गोयल ने कहा कि जब डॉक्टर किसी मरीज के इलाज या बीमारी का फैसला कर रहे होते हैं, तब छोटी-सी गलती भी गंभीर परिणाम दे सकती है. यदि कोई डॉक्टर सामान्य एआई की गलत सलाह पर भरोसा करता है, तो कानूनी जिम्मेदारी एआई की नहीं बल्कि डॉक्टर की ही होगी. उन्होंने इसे लायबिलिटी सिंक की स्थिति बताया, जिसमें अंतिम जवाबदेही हमेशा चिकित्सक पर रहती है.  इसे भी पढ़ेंः  Quit Smoking: ये 4 तरीके अपना लिए तो तुरंत छूट जाएगी सिगरेट, गलती से भी नहीं लगाएंगे हाथ इन लोगों को किया गया शामिल रिपोर्ट में 118 देशों के 2,757 स्वास्थ्यकर्मियों को शामिल किया गया. इनमें भारत से सबसे अधिक 426 डॉक्टर और 112 पैरामेडिक्स शामिल थे. भारतीय डॉक्टर एआई का सबसे ज्यादा उपयोग मेडिकल रिसर्च, नई जानकारी हासिल करने, दवाओं की जानकारी खोजने, मरीजों को शिक्षित करने, क्लिनिकल डिसीजन सपोर्ट और डॉक्यूमेंटेशन जैसे कामों में कर रहे हैं. एक्सपर्ट का मानना है कि एआई डॉक्टरों की जगह नहीं ले सकता, लेकिन सही तरीके से इस्तेमाल होने पर यह इलाज की क्वालिटी बेहतर बना सकता है. खासकर भारत जैसे बड़े देश में, जहां एक्सपर्ट डॉक्टरों की उपलब्धता हर जगह समान नहीं है, वहां प्रमाणित मेडिकल एआई छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में भी बेहतर इलाज सुनिश्चित करने में मदद कर सकता है.  रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय डॉक्टर ऐसे एआई सिस्टम पर ज्यादा भरोसा करेंगे जो इस्तेमाल में आसान हों, स्वतंत्र एक्सपर्ट द्वारा सत्यापित हों, अपने जवाबों के साथ भरोसेमंद संदर्भ दें, नुकसान से बचाने के लिए प्रशिक्षित हों और कई हाई क्वालिटी वाले मेडिकल सोर्स से जानकारी लेते हों. किन बात का रखना चाहिए ध्यान? एक्सपर्ट का मानना है कि एआई डॉक्टरों का एक अच्छा सहायक बन सकता है, लेकिन अंतिम फैसला हमेशा डॉक्टर के अनुभव, क्लिनिकल समझ और मरीज की वास्तविक स्थिति को ध्यान में रखकर ही लिया जाना चाहिए. मरीजों की गोपनीयता और सुरक्षित इलाज की जिम्मेदारी भी अंततः डॉक्टर की ही रहेगी. इसे भी पढ़ेंः Palamu Mustard Oil Incident: मिलावटी सरसों का तेल कितना खतरनाक, जिसने झारखंड में छीन लीं 6 लोगों की सांसें?

Jul 22, 2026 - 15:30
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AI in Healthcare: क्या चैटजीपीटी के भरोसे मरीजों की जिंदगी? भारत में 54% डॉक्टर कर रहे हैं AI का इस्तेमाल

ChatGPT vs Medical AI In Healthcare: भारत में डॉक्टरों के बीच आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का यूज लगातार बढ़ रहा है. मेडिकल रिसर्च, क्लिनिकल नोट्स तैयार करने, मरीजों को बीमारी के बारे में समझाने और इलाज से जुड़े फैसलों में मदद लेने के लिए कई डॉक्टर अब एआई टूल्स का सहारा ले रहे हैं. हालांकि एक्सपर्ट का कहना है कि इस बढ़ते इस्तेमाल के साथ एक बड़ा जोखिम भी जुड़ा है, क्योंकि कई डॉक्टर ऐसे सामान्य एआई चैटबॉट्स का उपयोग कर रहे हैं जिन्हें मेडिकल निर्णय लेने के लिए तैयार नहीं किया गया है.

एआई के भरोसे इतने प्रतिशत डॉक्टर

साइंटफिक पब्लिकेशन संस्था एल्सेवियर की क्लिनिशियन ऑफ द फ्यूचर 2026 रिपोर्ट के अनुसार, भारत में सर्वे में शामिल 48 प्रतिशत डॉक्टर और क्लिनिशियन अपने काम में एआई का उपयोग कर रहे हैं. इनमें 54 प्रतिशत डॉक्टर अक्सर चैटजीपीटी और क्लाउड जैसे सामान्य एआई टूल्स का इस्तेमाल करते हैं, जबकि केवल 26 प्रतिशत डॉक्टर ही मेडिकल रिसर्च और क्लिनिकल डेटा पर आधारित स्पेशल एआई प्लेटफॉर्म का नियमित उपयोग करते हैं। नर्सों में भी यही स्थिति देखने को मिली, जहां सामान्य एआई का उपयोग विशेष मेडिकल एआई की तुलना में अधिक पाया गया.

क्या इससे कोई दिक्कत है?

एल्सेवियर के लीड क्लिनिकल एग्जीक्यूटिव और चिकित्सक डॉ. राहुल गोयल का कहना है कि सामान्य एआई टूल्स इंटरनेट पर उपलब्ध अलग-अलग स्रोतों से जानकारी लेते हैं, जिनमें कई बार अप्रमाणित या गैर-साइंटफिक जानकारी भी शामिल हो सकती है. इसके विपरीत, मेडिकल एआई प्लेटफॉर्म प्रमाणित मेडिकल किताबों, रिसर्च जर्नल और क्लिनिकल गाइडलाइंस पर आधारित होते हैं.यदि किसी सवाल का पर्याप्त साइंटफिक प्रमाण उपलब्ध नहीं होता, तो ऐसे प्लेटफॉर्म स्पष्ट रूप से इसकी जानकारी देते हैं, बजाय इसके कि अनुमान के आधार पर जवाब तैयार करें.

डॉ. गोयल ने कहा कि जब डॉक्टर किसी मरीज के इलाज या बीमारी का फैसला कर रहे होते हैं, तब छोटी-सी गलती भी गंभीर परिणाम दे सकती है. यदि कोई डॉक्टर सामान्य एआई की गलत सलाह पर भरोसा करता है, तो कानूनी जिम्मेदारी एआई की नहीं बल्कि डॉक्टर की ही होगी. उन्होंने इसे लायबिलिटी सिंक की स्थिति बताया, जिसमें अंतिम जवाबदेही हमेशा चिकित्सक पर रहती है. 

इसे भी पढ़ेंः  Quit Smoking: ये 4 तरीके अपना लिए तो तुरंत छूट जाएगी सिगरेट, गलती से भी नहीं लगाएंगे हाथ

इन लोगों को किया गया शामिल

रिपोर्ट में 118 देशों के 2,757 स्वास्थ्यकर्मियों को शामिल किया गया. इनमें भारत से सबसे अधिक 426 डॉक्टर और 112 पैरामेडिक्स शामिल थे. भारतीय डॉक्टर एआई का सबसे ज्यादा उपयोग मेडिकल रिसर्च, नई जानकारी हासिल करने, दवाओं की जानकारी खोजने, मरीजों को शिक्षित करने, क्लिनिकल डिसीजन सपोर्ट और डॉक्यूमेंटेशन जैसे कामों में कर रहे हैं.

एक्सपर्ट का मानना है कि एआई डॉक्टरों की जगह नहीं ले सकता, लेकिन सही तरीके से इस्तेमाल होने पर यह इलाज की क्वालिटी बेहतर बना सकता है. खासकर भारत जैसे बड़े देश में, जहां एक्सपर्ट डॉक्टरों की उपलब्धता हर जगह समान नहीं है, वहां प्रमाणित मेडिकल एआई छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में भी बेहतर इलाज सुनिश्चित करने में मदद कर सकता है.  रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय डॉक्टर ऐसे एआई सिस्टम पर ज्यादा भरोसा करेंगे जो इस्तेमाल में आसान हों, स्वतंत्र एक्सपर्ट द्वारा सत्यापित हों, अपने जवाबों के साथ भरोसेमंद संदर्भ दें, नुकसान से बचाने के लिए प्रशिक्षित हों और कई हाई क्वालिटी वाले मेडिकल सोर्स से जानकारी लेते हों.

किन बात का रखना चाहिए ध्यान?

एक्सपर्ट का मानना है कि एआई डॉक्टरों का एक अच्छा सहायक बन सकता है, लेकिन अंतिम फैसला हमेशा डॉक्टर के अनुभव, क्लिनिकल समझ और मरीज की वास्तविक स्थिति को ध्यान में रखकर ही लिया जाना चाहिए. मरीजों की गोपनीयता और सुरक्षित इलाज की जिम्मेदारी भी अंततः डॉक्टर की ही रहेगी.

इसे भी पढ़ेंः Palamu Mustard Oil Incident: मिलावटी सरसों का तेल कितना खतरनाक, जिसने झारखंड में छीन लीं 6 लोगों की सांसें?

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