13 अबॉर्शन के बाद 14वीं बार में प्रेग्नेंट हुई महिला, डॉक्टर ने दी चेतावनी
सोशल मीडिया पर जूनियर डॉक्टर डॉ. हितार्थ सिमारिया का एक वीडियो इन दिनों खूब चर्चा बटोर रहा है. डॉ. हितार्थ सिमारिया ने अपनी NICU - नियोनेटल इंटेंसिव केयर यूनिट पोस्टिंग के दौरान सामने आए एक केस का हवाला देते हुए बताया कि एक महिला ने 13 बार गर्भपातहोने के बाद 14वीं बार गर्भधारण किया. उन्होंने वीडियो के जरिए जानकारी दी कि इस अत्यधिक जोखिम वाली स्थिति में महिला ने एक बेहद कमजोर नवजात को जन्म दिया है, जिसका वजन केवल 1 किलो है. डॉ. हितार्थ ने इस केस के जरिए बार-बार गर्भधारण और अबॉर्शन से महिला के शरीर पर पड़ने वाले भारी शारीरिक और मानसिक आघात पर गहरी चिंता जताई है. शरीर में खून की भारी कमी वीडियो में डॉक्टर ने बताया कि बार-बार गर्भपात होने और अत्यधिक ब्लीडिंग के कारण महिला के शरीर में हीमोग्लोबिन का स्तर बहुत तेजी से गिर जाता है. जब एक महिला बार-बार इस प्रक्रिया से गुजरती है तो उसके शरीर को खून की कमी को पूरा करने का पर्याप्त समय नहीं मिल पाता. गंभीर एनीमिया के कारण महिला को लगातार कमजोरी, चक्कर आना और थकान जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है. ऐसी स्थिति में यदि महिला दोबारा गर्भवती होती है तो गर्भ में पल रहे बच्चे तक सही मात्रा में ऑक्सीजन और पोषण नहीं पहुंच पाता, जिससे होने वाला बच्चा भी कुपोषित और कमजोर पैदा होता है. गर्भाशय का कमजोर होना बार-बार गर्भपात (चाहे वह सर्जिकल हो या मेडिकल दवाओं के जरिए) होने से गर्भाशय की अंदरूनी दीवारें, जिन्हें एंडोमेट्रियम कहा जाता है, बहुत कमजोर और पतली हो जाती है. सर्जिकल अबॉर्शन के दौरान बार-बार की जाने वाली क्लीनिंग से गर्भाशय की मांसपेशियों को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है. इसके कारण भविष्य में होने वाली प्रेगनेंसी में गर्भनाल के गर्भाशय की दीवार से गलत तरीके से जुड़ने का खतरा बढ़ जाता है, जिससे डिलीवरी के वक्त अत्यधिक और जानलेवा ब्लीडिंग हो सकती है. View this post on Instagram A post shared by Dr. Hitarth Simaria (@dr.hitarth_simaria) यह भी पढ़ें: कैसे बनाएं पीएम मोदी के पसंदीदा मोरिंगा के पराठे? जानें आसान रेसिपी संक्रमण और बांझपन का खतरा डॉक्टर के अनुसार, यदि गर्भपात असुरक्षित तरीके से या बिना डॉक्टर की सही देखरेख के किया जाए, तो गर्भाशय और पेल्विक हिस्से में गंभीर बैक्टीरियल संक्रमण फैल सकता है. इस स्थिति को पेल्विक इंफ्लेमेटरी डिजीज कहा जाता है. बार-बार होने वाले संक्रमण के कारण महिलाओं का फैलोपियन ट्यूब ब्लॉक हो सकती हैं, जिससे आगे चलकर हमेशा के लिए मां बनने की क्षमता खत्म होने यानी बांझपन का खतरा भी काफी हद तक बढ़ जाता है. इसके अलावा अंदरूनी अंगों में घाव होने की आशंका भी रहती है. कमजोर बच्चों का जन्म और प्री-मैच्योर डिलीवरी बार-बार गर्भपात की प्रक्रिया से गुजरने के कारण गर्भाशय का निचला हिस्सा यानी सर्विक्स ढीला और कमजोर हो जाता है. इसे मेडिकल भाषा में सरवाइकल इलसफिशिएंसी कहते हैं. इसके कारण गर्भाशय बच्चे का वजन संभालने में असमर्थ हो जाता है, जिससे समय से पहले डिलीवरी हो जाती है. ऐसी स्थिति में पैदा होने वाले बच्चों का वजन बेहद कम होता है और उनके फेफड़े व अन्य अंग पूरी तरह विकसित नहीं हो पाते, जिससे नवजात को ICU में रखना पड़ता है. यह भी पढ़ें: CPR कब देना चाहिए और कब नहीं? जानें सही तरीका, इन बातों का रखें ध्यान
सोशल मीडिया पर जूनियर डॉक्टर डॉ. हितार्थ सिमारिया का एक वीडियो इन दिनों खूब चर्चा बटोर रहा है. डॉ. हितार्थ सिमारिया ने अपनी NICU - नियोनेटल इंटेंसिव केयर यूनिट पोस्टिंग के दौरान सामने आए एक केस का हवाला देते हुए बताया कि एक महिला ने 13 बार गर्भपातहोने के बाद 14वीं बार गर्भधारण किया.
उन्होंने वीडियो के जरिए जानकारी दी कि इस अत्यधिक जोखिम वाली स्थिति में महिला ने एक बेहद कमजोर नवजात को जन्म दिया है, जिसका वजन केवल 1 किलो है. डॉ. हितार्थ ने इस केस के जरिए बार-बार गर्भधारण और अबॉर्शन से महिला के शरीर पर पड़ने वाले भारी शारीरिक और मानसिक आघात पर गहरी चिंता जताई है.
शरीर में खून की भारी कमी
वीडियो में डॉक्टर ने बताया कि बार-बार गर्भपात होने और अत्यधिक ब्लीडिंग के कारण महिला के शरीर में हीमोग्लोबिन का स्तर बहुत तेजी से गिर जाता है. जब एक महिला बार-बार इस प्रक्रिया से गुजरती है तो उसके शरीर को खून की कमी को पूरा करने का पर्याप्त समय नहीं मिल पाता. गंभीर एनीमिया के कारण महिला को लगातार कमजोरी, चक्कर आना और थकान जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है. ऐसी स्थिति में यदि महिला दोबारा गर्भवती होती है तो गर्भ में पल रहे बच्चे तक सही मात्रा में ऑक्सीजन और पोषण नहीं पहुंच पाता, जिससे होने वाला बच्चा भी कुपोषित और कमजोर पैदा होता है.
गर्भाशय का कमजोर होना
बार-बार गर्भपात (चाहे वह सर्जिकल हो या मेडिकल दवाओं के जरिए) होने से गर्भाशय की अंदरूनी दीवारें, जिन्हें एंडोमेट्रियम कहा जाता है, बहुत कमजोर और पतली हो जाती है. सर्जिकल अबॉर्शन के दौरान बार-बार की जाने वाली क्लीनिंग से गर्भाशय की मांसपेशियों को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है. इसके कारण भविष्य में होने वाली प्रेगनेंसी में गर्भनाल के गर्भाशय की दीवार से गलत तरीके से जुड़ने का खतरा बढ़ जाता है, जिससे डिलीवरी के वक्त अत्यधिक और जानलेवा ब्लीडिंग हो सकती है.
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यह भी पढ़ें: कैसे बनाएं पीएम मोदी के पसंदीदा मोरिंगा के पराठे? जानें आसान रेसिपी
संक्रमण और बांझपन का खतरा
डॉक्टर के अनुसार, यदि गर्भपात असुरक्षित तरीके से या बिना डॉक्टर की सही देखरेख के किया जाए, तो गर्भाशय और पेल्विक हिस्से में गंभीर बैक्टीरियल संक्रमण फैल सकता है. इस स्थिति को पेल्विक इंफ्लेमेटरी डिजीज कहा जाता है. बार-बार होने वाले संक्रमण के कारण महिलाओं का फैलोपियन ट्यूब ब्लॉक हो सकती हैं, जिससे आगे चलकर हमेशा के लिए मां बनने की क्षमता खत्म होने यानी बांझपन का खतरा भी काफी हद तक बढ़ जाता है. इसके अलावा अंदरूनी अंगों में घाव होने की आशंका भी रहती है.
कमजोर बच्चों का जन्म और प्री-मैच्योर डिलीवरी
बार-बार गर्भपात की प्रक्रिया से गुजरने के कारण गर्भाशय का निचला हिस्सा यानी सर्विक्स ढीला और कमजोर हो जाता है. इसे मेडिकल भाषा में सरवाइकल इलसफिशिएंसी कहते हैं. इसके कारण गर्भाशय बच्चे का वजन संभालने में असमर्थ हो जाता है, जिससे समय से पहले डिलीवरी हो जाती है. ऐसी स्थिति में पैदा होने वाले बच्चों का वजन बेहद कम होता है और उनके फेफड़े व अन्य अंग पूरी तरह विकसित नहीं हो पाते, जिससे नवजात को ICU में रखना पड़ता है.
यह भी पढ़ें: CPR कब देना चाहिए और कब नहीं? जानें सही तरीका, इन बातों का रखें ध्यान
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