बॉम्बे HC ने खारिज की ओवैसी की याचिका, कहा - 'भगवान राम का मजाक उड़ाने...'
बॉम्बे हाई कोर्ट ने AIMIM नेता अकबरुद्दीन ओवैसी की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने 2011 में एक जनसभा के दौरान भगवान राम और उनकी माता के बारे में कथित तौर पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने के लिए अपने खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग की थी. कोर्ट ने कहा कि संवैधानिक सहिष्णुता को किसी समुदाय की धार्मिक भावनाओं का जानबूझकर अपमान करने के लाइसेंस के रूप में गलत नहीं समझा जा सकता है. औरंगाबाद बेंच के जस्टिस आरएम जोशी ने निचली अदालत के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 295A और 298 के तहत अपराधों का संज्ञान लिया था. कोर्ट ने माना कि विधायक के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला बनता है. 2011 में नांदेड़ में चुनावी रैली में दिए भाषण से शुरू हुआ था मामला यह मामला 8 दिसंबर, 2011 को नांदेड़ में एक चुनावी रैली में ओवैसी की तरफ से दिए गए भाषण से जुड़ा है, जो इलाहाबाद हाई कोर्ट के श्रीराम जन्मभूमि फैसले की पृष्ठभूमि में दिया गया था. सोशल मीडिया पर भाषण का वीडियो देखने के बाद बीजेपी विधायक टी. राजा सिंह ने एक निजी शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद नांदेड़ जिले के अर्धापुर पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज किया गया. जांच के बाद पुलिस ने 15 मार्च, 2021 को चार्जशीट दाखिल की और ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास ने 15 नवंबर, 2021 को ओवैसी को समन जारी किया. AIMIM नेता ने इन कार्यवाहियों को चुनौती देते हुए तर्क दिया कि तीन साल की समयसीमा (लिमिटेशन पीरियड) समाप्त होने के बाद कोर्ट मामले का संज्ञान नहीं ले सकता, क्योंकि इन अपराधों के लिए अधिकतम सजा तीन साल की है. ओवैसी की दलील को हाई कोर्ट ने किया खारिज इस तर्क को खारिज करते हुए हाई कोर्ट ने 'घनश्याम सोनी बनाम राज्य' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया और कहा कि समयसीमा की गणना शिकायत दर्ज करने या कार्यवाही शुरू होने की तारीख से की जाती है, न कि संज्ञान लेने की तारीख से. कोर्ट ने कहा कि शिकायत निर्धारित समय के भीतर दर्ज की गई थी और धारा 298 के तहत आरोप, धारा 295A के तहत अधिक गंभीर अपराध के साथ-साथ आगे बढ़ सकता है. भाषण के मुख्य अंशों पर गौर करते हुए, जस्टिस जोशी ने कहा कि ओवैसी ने शुरुआत में इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले का जिक्र किया, लेकिन बाद में ऐसी बातें कहीं जो पहली नजर में भगवान श्रीराम का मजाक उड़ाने और उनके मानने वालों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने के इरादे से कही गई लगती थी. कोर्ट ने उन कथित टिप्पणियों को दोहराने से इनकार कर दिया, ताकि उन्हें और ज्यादा प्रचार न मिले, लेकिन यह भी कहा कि वे बयान न तो अनजाने में दिए गए थे और न ही अचानक. यह भाषण सोचा-समझा, नपा-तुला लगता है- जस्टिस जोशी जस्टिस जोशी ने कहा कि एक चुने हुए प्रतिनिधि से ऐसी टिप्पणियों के नतीजों को समझने की उम्मीद की जाती है और यह भाषण सोचा-समझा, नपा-तुला और पहले से तय लगता है. धारा 295A के प्रावधानों का जिक्र करते हुए, कोर्ट ने कहा कि जानबूझकर और बुरी नीयत का आकलन इस्तेमाल किए गए शब्दों के साथ-साथ उनके लहजे, आवाज के उतार-चढ़ाव और बोलने के तरीके के आधार पर किया जाना चाहिए. उन्होंने कहा, ‘सहिष्णुता का मतलब यह नहीं निकाला जा सकता कि दूसरों की धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर ठेस पहुंचाने की छूट मिल गई है. आजादी, सहिष्णुता और भाईचारे जैसे संवैधानिक मूल्य धार्मिक भावनाओं को भड़काने के इरादे से किए गए जानबूझकर किए गए कामों को सुरक्षा नहीं देते.’ हाई कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए क्या कहा? कोर्ट ने अभियोजन पक्ष की इस बात पर भी ध्यान दिया कि भाषण अभी भी ऑनलाइन उपलब्ध है, इसे गंभीर चिंता का विषय बताते हुए कहा गया कि इससे कथित अपमान का सिलसिला जारी रह सकता है. जरूरी पक्षों की गैर-मौजूदगी में कोई निर्देश जारी न करते हुए कोर्ट ने उम्मीद जताई कि सरकार उचित कार्रवाई करेगी. याचिका को खारिज करते हुए हाई कोर्ट ने साफ किया कि उसकी टिप्पणियां केवल शुरुआती (prima facie) हैं और मामले के गुण-दोष के आधार पर फैसला करते समय ट्रायल कोर्ट पर इनका कोई असर नहीं पड़ना चाहिए. ओवैसी के खिलाफ कार्यवाही अब अर्धापुर में ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास की अदालत में जारी रहेगी. यह भी पढे़ंः तेजाब की रिटेल बिक्री पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र-राज्यों से मांगी रिपोर्ट
बॉम्बे हाई कोर्ट ने AIMIM नेता अकबरुद्दीन ओवैसी की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने 2011 में एक जनसभा के दौरान भगवान राम और उनकी माता के बारे में कथित तौर पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने के लिए अपने खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग की थी. कोर्ट ने कहा कि संवैधानिक सहिष्णुता को किसी समुदाय की धार्मिक भावनाओं का जानबूझकर अपमान करने के लाइसेंस के रूप में गलत नहीं समझा जा सकता है.
औरंगाबाद बेंच के जस्टिस आरएम जोशी ने निचली अदालत के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 295A और 298 के तहत अपराधों का संज्ञान लिया था. कोर्ट ने माना कि विधायक के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला बनता है.
2011 में नांदेड़ में चुनावी रैली में दिए भाषण से शुरू हुआ था मामला
यह मामला 8 दिसंबर, 2011 को नांदेड़ में एक चुनावी रैली में ओवैसी की तरफ से दिए गए भाषण से जुड़ा है, जो इलाहाबाद हाई कोर्ट के श्रीराम जन्मभूमि फैसले की पृष्ठभूमि में दिया गया था. सोशल मीडिया पर भाषण का वीडियो देखने के बाद बीजेपी विधायक टी. राजा सिंह ने एक निजी शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद नांदेड़ जिले के अर्धापुर पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज किया गया.
जांच के बाद पुलिस ने 15 मार्च, 2021 को चार्जशीट दाखिल की और ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास ने 15 नवंबर, 2021 को ओवैसी को समन जारी किया. AIMIM नेता ने इन कार्यवाहियों को चुनौती देते हुए तर्क दिया कि तीन साल की समयसीमा (लिमिटेशन पीरियड) समाप्त होने के बाद कोर्ट मामले का संज्ञान नहीं ले सकता, क्योंकि इन अपराधों के लिए अधिकतम सजा तीन साल की है.
ओवैसी की दलील को हाई कोर्ट ने किया खारिज
इस तर्क को खारिज करते हुए हाई कोर्ट ने 'घनश्याम सोनी बनाम राज्य' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया और कहा कि समयसीमा की गणना शिकायत दर्ज करने या कार्यवाही शुरू होने की तारीख से की जाती है, न कि संज्ञान लेने की तारीख से. कोर्ट ने कहा कि शिकायत निर्धारित समय के भीतर दर्ज की गई थी और धारा 298 के तहत आरोप, धारा 295A के तहत अधिक गंभीर अपराध के साथ-साथ आगे बढ़ सकता है.
भाषण के मुख्य अंशों पर गौर करते हुए, जस्टिस जोशी ने कहा कि ओवैसी ने शुरुआत में इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले का जिक्र किया, लेकिन बाद में ऐसी बातें कहीं जो पहली नजर में भगवान श्रीराम का मजाक उड़ाने और उनके मानने वालों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने के इरादे से कही गई लगती थी. कोर्ट ने उन कथित टिप्पणियों को दोहराने से इनकार कर दिया, ताकि उन्हें और ज्यादा प्रचार न मिले, लेकिन यह भी कहा कि वे बयान न तो अनजाने में दिए गए थे और न ही अचानक.
यह भाषण सोचा-समझा, नपा-तुला लगता है- जस्टिस जोशी
जस्टिस जोशी ने कहा कि एक चुने हुए प्रतिनिधि से ऐसी टिप्पणियों के नतीजों को समझने की उम्मीद की जाती है और यह भाषण सोचा-समझा, नपा-तुला और पहले से तय लगता है. धारा 295A के प्रावधानों का जिक्र करते हुए, कोर्ट ने कहा कि जानबूझकर और बुरी नीयत का आकलन इस्तेमाल किए गए शब्दों के साथ-साथ उनके लहजे, आवाज के उतार-चढ़ाव और बोलने के तरीके के आधार पर किया जाना चाहिए.
उन्होंने कहा, ‘सहिष्णुता का मतलब यह नहीं निकाला जा सकता कि दूसरों की धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर ठेस पहुंचाने की छूट मिल गई है. आजादी, सहिष्णुता और भाईचारे जैसे संवैधानिक मूल्य धार्मिक भावनाओं को भड़काने के इरादे से किए गए जानबूझकर किए गए कामों को सुरक्षा नहीं देते.’
हाई कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए क्या कहा?
कोर्ट ने अभियोजन पक्ष की इस बात पर भी ध्यान दिया कि भाषण अभी भी ऑनलाइन उपलब्ध है, इसे गंभीर चिंता का विषय बताते हुए कहा गया कि इससे कथित अपमान का सिलसिला जारी रह सकता है. जरूरी पक्षों की गैर-मौजूदगी में कोई निर्देश जारी न करते हुए कोर्ट ने उम्मीद जताई कि सरकार उचित कार्रवाई करेगी.
याचिका को खारिज करते हुए हाई कोर्ट ने साफ किया कि उसकी टिप्पणियां केवल शुरुआती (prima facie) हैं और मामले के गुण-दोष के आधार पर फैसला करते समय ट्रायल कोर्ट पर इनका कोई असर नहीं पड़ना चाहिए. ओवैसी के खिलाफ कार्यवाही अब अर्धापुर में ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास की अदालत में जारी रहेगी.
यह भी पढे़ंः तेजाब की रिटेल बिक्री पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र-राज्यों से मांगी रिपोर्ट
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