'बिल्डर की देरी की सजा नहीं भुगतेंगे खरीदार', SC का अहम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने एक कहा है कि हाउसिंग प्रोजेक्ट में हुई देरी के लिए पुराने बिल्डर पर लगने वाला जुर्माना मकान खरीदारों से नहीं वसूला जा सकता. इसे प्रोजेक्ट को पूरा कर रही नई कंपनी से भी नहीं वसूला जा सकता. इस अहम फैसले में कोर्ट ने नोएडा अथॉरिटी की तरफ से 2 प्रोजेक्ट पर लगाए गए शुल्क को हटा दिया है. क्या था मामला? मामला नोएडा के सेक्टर 100 और 110 के 'लोटस बुलेवार्ड' और 'लोटस पनाचे' प्रोजेक्ट से जुड़ा था. बिल्डर कंपनी 'ग्रेनाइट गेट प्रॉपर्टीज' को 2016 तक इन्हें काम पूरा करना था. कंपनी के आर्थिक संकट के कारण निर्माण अटक गया. इसके बाद कंपनी दिवालिया समाधान प्रक्रिया (CIRP) में चली गई. 'सभी विपक्षी पार्टियों से गठबंधन...', RLD को लेकर बीजेपी के मंत्री का बड़ा बयान नोएडा अथॉरिटी की मांग प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए घर खरीदारों ने खुद पैसा लगाया. 'एसएमवी एजेंसीज' नाम की नई कंपनी भी समाधान योजना के साथ आगे आई. इस बीच नोएडा अथॉरिटी ने पुराने बिल्डर की देरी के एवज में 'टाइम एक्सटेंशन चार्ज' की मांग की और लोटस पनाचे के तीन टावर सील कर दिए. सुप्रीम कोर्ट का फैसला इस मामले में नेशनल कंपनी लॉ एपिलेट ट्रिब्यूनल यानी NCLAT ने अथॉरिटी के इस शुल्क को सही ठहराया. NCLAT ने इसे दिवालिया प्रक्रिया का हिस्सा माना. इस आदेश के खिलाफ खरीदार सुप्रीम कोर्ट पहुंचे. अब सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जे. बी. पारडीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने NCLAT के आदेश को रद्द कर दिया है. जजों ने कहा है कि जुर्माने का मकसद बिल्डर को समय पर काम करने के लिए बाध्य करना होता है. जब बिल्डर दिवालिया हो चुका है, तब उसकी गलती का बोझ उन खरीदारों पर नहीं डाला जा सकता जो अपने पैसे से घर पूरा करवा रहे हैं. 'ग्रोथ मजबूत तो जॉब्स क्यों नहीं बढ़ रही', GDP पर रघुराम राजन ने किए सवाल

Sep 4, 2026 - 05:30
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'बिल्डर की देरी की सजा नहीं भुगतेंगे खरीदार', SC का अहम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने एक कहा है कि हाउसिंग प्रोजेक्ट में हुई देरी के लिए पुराने बिल्डर पर लगने वाला जुर्माना मकान खरीदारों से नहीं वसूला जा सकता. इसे प्रोजेक्ट को पूरा कर रही नई कंपनी से भी नहीं वसूला जा सकता. इस अहम फैसले में कोर्ट ने नोएडा अथॉरिटी की तरफ से 2 प्रोजेक्ट पर लगाए गए शुल्क को हटा दिया है.

क्या था मामला?

मामला नोएडा के सेक्टर 100 और 110 के 'लोटस बुलेवार्ड' और 'लोटस पनाचे' प्रोजेक्ट से जुड़ा था. बिल्डर कंपनी 'ग्रेनाइट गेट प्रॉपर्टीज' को 2016 तक इन्हें काम पूरा करना था. कंपनी के आर्थिक संकट के कारण निर्माण अटक गया. इसके बाद कंपनी दिवालिया समाधान प्रक्रिया (CIRP) में चली गई.

'सभी विपक्षी पार्टियों से गठबंधन...', RLD को लेकर बीजेपी के मंत्री का बड़ा बयान

नोएडा अथॉरिटी की मांग

प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए घर खरीदारों ने खुद पैसा लगाया. 'एसएमवी एजेंसीज' नाम की नई कंपनी भी समाधान योजना के साथ आगे आई. इस बीच नोएडा अथॉरिटी ने पुराने बिल्डर की देरी के एवज में 'टाइम एक्सटेंशन चार्ज' की मांग की और लोटस पनाचे के तीन टावर सील कर दिए.

सुप्रीम कोर्ट का फैसला

इस मामले में नेशनल कंपनी लॉ एपिलेट ट्रिब्यूनल यानी NCLAT ने अथॉरिटी के इस शुल्क को सही ठहराया. NCLAT ने इसे दिवालिया प्रक्रिया का हिस्सा माना. इस आदेश के खिलाफ खरीदार सुप्रीम कोर्ट पहुंचे. अब सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जे. बी. पारडीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने NCLAT के आदेश को रद्द कर दिया है. जजों ने कहा है कि जुर्माने का मकसद बिल्डर को समय पर काम करने के लिए बाध्य करना होता है. जब बिल्डर दिवालिया हो चुका है, तब उसकी गलती का बोझ उन खरीदारों पर नहीं डाला जा सकता जो अपने पैसे से घर पूरा करवा रहे हैं.

'ग्रोथ मजबूत तो जॉब्स क्यों नहीं बढ़ रही', GDP पर रघुराम राजन ने किए सवाल

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