सरपट भाग रही 'कांदा एक्सप्रेस', फिर क्यों नहीं थम रहे प्याज के दाम; कब होगी सस्ती?

लोकल सब्जी मार्केट में, किराने की दुकान या ठेले पर प्याज अभी भी 70 रुपये प्रति किलो के लगभग बेची जा रही है. जबकि कीमतें कम करने की सरकार की कोशिश लगातार बनी हुई है. बफर स्टॉक से बाजार में भारी सप्लाई बढ़ाई गई है, 'कांदा एक्सप्रेस' जैसी विशेष ट्रेनों के जरिए शहरों तक प्याज पहुंचाने का काम किया जा रहा है. फिर भी दाम नहीं घट रहे हैं. जानकारों का कहना है कि देर से आए मॉनसून की वजह से खरीफ की नई फसल आने में देरी हुई है इसलिए सितंबर और अक्टूबर में भी बाजार में कीमतें ऊंची रहने की संभावना है. हालांकि, नवंबर से कुछ राहत मिलने की उम्मीद है.  थोक और रिटेल प्राइस में बड़ा अंतर कंज्यूमर अफेयर्स डिपार्टमेंट के डेटा के अनुसार, 18 सितंबर को प्याज की ऑल-इंडिया औसत रिटेल कीमत 53.86 रुपये प्रति किलो थी, जो एक साल पहले की 27.6 रुपये की कीमत से 95% ज्यादा है. कहीं-कहीं बाजारों में कीमतें अभी भी 70 रुपये के आसपास बनी हुई हैं. 18 सितंबर को ही औसत होलसेल कीमत 45.76 रुपये प्रति किलो रही, जो एक साल पहले की 21.51 रुपये की कीमत से दोगुनी से भी ज्यादा है.  सरकार NCCF (नेशनल कोऑपरेटिव कंज्यूमर्स फेडरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड) और Nafed (नेशनल एग्रीकल्चरल कोऑपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड) जैसी कोऑपरेटिव संस्थाओं, केंद्रीय भंडार आउटलेट्स और मोबाइल वैन के जरिए अपने प्राइस-स्टेबिलाइजेशन बफर से 35 रुपये प्रति किलो की सब्सिडी वाली कीमत पर प्याज सप्लाई कर रही है. उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, इस साल सरकार के 1,20,000 टन के बफ़र स्टॉक से अब तक लगभग 9,200 टन प्याज भेजा जा चुका है. इन सबके बावजूद थोक और खुदरा बाजार के बीच भारी अंतर देखा जा रहा है.  क्याें कीमतें नहीं हो रहीं कम? हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, क्रिसिल में रिसर्च डायरेक्टर पूषण शर्मा ने कहा, "हाल ही में रिटेल मार्केट में प्याज की कीमतों में जो तेजी आई है, वह मुख्य रूप से सप्लाई की वजह से है." सालाना प्याज उत्पादन में रबी फसल का हिस्सा लगभग 60-70% होता है और आमतौर पर सितंबर के आखिर तक बाजार में इसकी सप्लाई होती है. लेकिन इस साल मानसून में देरी और बेमौसम अत्यधिक बारिश के चलते खेतों और गोदामों में रखी रबी प्याज की क्वालिटी खराब हो गई है. ये खराब स्टॉक बाजारों में बेचने लायक नहीं रहे. अब खरीफ की नई आवक अक्टूबर के अंत या नवंबर में ही शुरू हो पाएगी. तब तक बाजार पूरी तरह से पुराने सीमित बफर स्टॉक पर ही निर्भर है.  ये भी पढ़ें: NTPC ने कैंसिल किया 400 करोड़ का टेंडर, सोमवार को फोकस में रहेंगे शेयर 

Sep 20, 2026 - 16:30
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सरपट भाग रही 'कांदा एक्सप्रेस', फिर क्यों नहीं थम रहे प्याज के दाम; कब होगी सस्ती?

लोकल सब्जी मार्केट में, किराने की दुकान या ठेले पर प्याज अभी भी 70 रुपये प्रति किलो के लगभग बेची जा रही है. जबकि कीमतें कम करने की सरकार की कोशिश लगातार बनी हुई है. बफर स्टॉक से बाजार में भारी सप्लाई बढ़ाई गई है, 'कांदा एक्सप्रेस' जैसी विशेष ट्रेनों के जरिए शहरों तक प्याज पहुंचाने का काम किया जा रहा है. फिर भी दाम नहीं घट रहे हैं.

जानकारों का कहना है कि देर से आए मॉनसून की वजह से खरीफ की नई फसल आने में देरी हुई है इसलिए सितंबर और अक्टूबर में भी बाजार में कीमतें ऊंची रहने की संभावना है. हालांकि, नवंबर से कुछ राहत मिलने की उम्मीद है. 

थोक और रिटेल प्राइस में बड़ा अंतर

कंज्यूमर अफेयर्स डिपार्टमेंट के डेटा के अनुसार, 18 सितंबर को प्याज की ऑल-इंडिया औसत रिटेल कीमत 53.86 रुपये प्रति किलो थी, जो एक साल पहले की 27.6 रुपये की कीमत से 95% ज्यादा है. कहीं-कहीं बाजारों में कीमतें अभी भी 70 रुपये के आसपास बनी हुई हैं. 18 सितंबर को ही औसत होलसेल कीमत 45.76 रुपये प्रति किलो रही, जो एक साल पहले की 21.51 रुपये की कीमत से दोगुनी से भी ज्यादा है. 

सरकार NCCF (नेशनल कोऑपरेटिव कंज्यूमर्स फेडरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड) और Nafed (नेशनल एग्रीकल्चरल कोऑपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड) जैसी कोऑपरेटिव संस्थाओं, केंद्रीय भंडार आउटलेट्स और मोबाइल वैन के जरिए अपने प्राइस-स्टेबिलाइजेशन बफर से 35 रुपये प्रति किलो की सब्सिडी वाली कीमत पर प्याज सप्लाई कर रही है.

उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, इस साल सरकार के 1,20,000 टन के बफ़र स्टॉक से अब तक लगभग 9,200 टन प्याज भेजा जा चुका है. इन सबके बावजूद थोक और खुदरा बाजार के बीच भारी अंतर देखा जा रहा है. 

क्याें कीमतें नहीं हो रहीं कम?

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, क्रिसिल में रिसर्च डायरेक्टर पूषण शर्मा ने कहा, "हाल ही में रिटेल मार्केट में प्याज की कीमतों में जो तेजी आई है, वह मुख्य रूप से सप्लाई की वजह से है."

सालाना प्याज उत्पादन में रबी फसल का हिस्सा लगभग 60-70% होता है और आमतौर पर सितंबर के आखिर तक बाजार में इसकी सप्लाई होती है. लेकिन इस साल मानसून में देरी और बेमौसम अत्यधिक बारिश के चलते खेतों और गोदामों में रखी रबी प्याज की क्वालिटी खराब हो गई है. ये खराब स्टॉक बाजारों में बेचने लायक नहीं रहे. अब खरीफ की नई आवक अक्टूबर के अंत या नवंबर में ही शुरू हो पाएगी. तब तक बाजार पूरी तरह से पुराने सीमित बफर स्टॉक पर ही निर्भर है. 

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NTPC ने कैंसिल किया 400 करोड़ का टेंडर, सोमवार को फोकस में रहेंगे शेयर 

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