रोड एक्सीडेंट मामले में पीड़ित परिवार को मिलेगा 60 लाख रुपये का मुआवजा, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- ये न होता तो इनके बेटे की सैलरी...

सुप्रीम कोर्ट ने 20 साल पुराने रोड एक्सीडेंट के मामले में पीड़ित के परिवार की मुआवजा राशि को बढ़ाकर 60 लाख रुपये कर दिया है और चार महीने के अंदर पीड़ित की मां को यह राशि देने का निर्देश दिया है. इस एक्सीडेंट में 20 साल के एक लड़के को बहुत बुरी तरह चोटें आई थीं और वह विकलांग हो गया था. एक्सीडेंट की वजह से 20 साल वह कुछ नहीं कर सका और 2021 में उसने आखिरकार दम तोड़ दिया. उसकी मां ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी, जिस पर कोर्ट ने यह फैसला सुनाया है. पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार यह मामला 2001 का है, जब 20 साल के शरद सिंह का एक्सीडेंट हुआ था. वह जिस बाइक पर पीछे बैठा था, उसे एक कार ने टक्कर मार दी थी. शरद उस समय बीकॉम थर्ड ईयर में था. शरद सिंह दो दशकों तक निष्क्रिय रहा और उसके बाद 2021 में बीमारी के कारण उसने दम तोड़ दिया. उसकी मां ने कानूनी प्रतिनिधि के रूप में सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी. जस्टिस के. विनोद चंद्रन और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की बेंच ने युवक की मां की अपील स्वीकार कर ली. शरद की ग्रीवा कशेरुका (Cervical Vertebra) (C4-C5) में उस वक्त फ्रैक्चर हो गया था. एक्सीडेंट की वजह से वह शत-प्रतिशत स्थायी विकलांगता के साथ लकवाग्रस्त हो गया, जिससे उसे जीवन भर बिस्तर पर रहना पड़ा. कोर्ट ने कहा, 'इस दुर्घटना के कारण युवक लकवाग्रस्त हो गया और उसकी आकांक्षाएं मिट्टी में मिल गईं. इस दुर्घटना के कारण उसके माता-पिता को भी दूसरे शहर में जाकर बसना पड़ा.' बेंच ने कहा, 'हमारा मानना ​​है कि अगर उसने चार्टर्ड अकाउंटेंट का प्रमाणपत्र प्राप्त नहीं भी किया होता, तो स्नातक होने पर उसे एक अकाउंटेंट के रूप में नियुक्त किया जा सकता था और अगर एक कुशल श्रमिक के लिए निर्धारित न्यूनतम मजदूरी 3,352 रुपये होती, तो उसे वर्ष 2001 में किसी भी उचित अनुमान के अनुसार 5,000 रुपये मासिक आय प्राप्त होती.' कोर्ट के समक्ष प्रमुख मुद्दों में से एक चिकित्सा व्यय की प्रतिपूर्ति का था. बीमा कंपनी ने कई लाख रुपये के बिल का यह कहते हुए विरोध किया कि कुछ बिल हाईकोर्ट की अपील के निपटारे से पहले के थे और अन्य बिल पीड़ित के स्थायी निवास दिल्ली के बाहर के अस्पतालों के थे. बेंच की ओर से फैसला लिखते हुए जस्टिस चंद्रन ने इस दलील को खारिज कर दिया और कहा कि बीमा कंपनी का देशभर में कार्यालय है और वह सत्यापन करा सकती थी. अदालत ने परिवार के इस स्पष्टीकरण को स्वीकार कर लिया कि दिल्ली की प्रतिकूल जलवायु परिस्थितियों के कारण पीड़ित को गोवा ले जाना पड़ा. परिवार का कहना था कि दिल्ली की प्रतिकूल जलवायु परिस्थितियों के कारण उसे बार-बार होने वाला निमोनिया बढ़ गया था. सत्यापन के बाद, बीमा कंपनी ने 21 लाख रुपये के चिकित्सा बिल को सही माना. हाईकोर्ट की ओर से पपहले ही मंजूर एक लाख रुपये के हिसाब-किताब के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने 2001 से 2021 के बीच हुए चिकित्सा व्यय के लिए 20 लाख रुपये का अतिरिक्त भुगतान करने का निर्देश दिया. आय के नुकसान के मुद्दे पर, मोटर दुर्घटना न्यायाधिकरण ने मूल रूप से पीड़ित की मासिक आय 3,339 रुपये आंकी थी. दिल्ली हाईकोर्ट ने दुर्घटना के समय पेशेवर योग्यता के अभाव का हवाला देते हुए इसे बढ़ाकर 3,352 रुपये कर दिया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इससे असहमति जताई और पीड़ित की मजबूत शैक्षणिक संभावनाओं का हवाला दिया. चार्टर्ड अकाउंटेंट स्तर की कमाई मानने से बचते हुए, पीठ ने कहा कि ग्रेजुएट होने के बावजूद, वह 2001 में कम से कम 5,000 रुपये प्रति माह कमा सकता था, जबकि कुशल श्रमिक का वेतन 3,352 रुपये था. सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के 32.46 लाख रुपये के मुआवजे के फैसले को संशोधित करते हुए भविष्य की चिकित्सा लागतों सहित इसे 60 लाख रुपये से अधिक कर दिया. पीठ ने निर्देश दिया कि पूरी राशि पीड़िता की मां को चार महीने के भीतर वितरित की जाए.

Sep 30, 2025 - 17:30
 0
रोड एक्सीडेंट मामले में पीड़ित परिवार को मिलेगा 60 लाख रुपये का मुआवजा, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- ये न होता तो इनके बेटे की सैलरी...

सुप्रीम कोर्ट ने 20 साल पुराने रोड एक्सीडेंट के मामले में पीड़ित के परिवार की मुआवजा राशि को बढ़ाकर 60 लाख रुपये कर दिया है और चार महीने के अंदर पीड़ित की मां को यह राशि देने का निर्देश दिया है. इस एक्सीडेंट में 20 साल के एक लड़के को बहुत बुरी तरह चोटें आई थीं और वह विकलांग हो गया था. एक्सीडेंट की वजह से 20 साल वह कुछ नहीं कर सका और 2021 में उसने आखिरकार दम तोड़ दिया. उसकी मां ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी, जिस पर कोर्ट ने यह फैसला सुनाया है.

पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार यह मामला 2001 का है, जब 20 साल के शरद सिंह का एक्सीडेंट हुआ था. वह जिस बाइक पर पीछे बैठा था, उसे एक कार ने टक्कर मार दी थी. शरद उस समय बीकॉम थर्ड ईयर में था. शरद सिंह दो दशकों तक निष्क्रिय रहा और उसके बाद 2021 में बीमारी के कारण उसने दम तोड़ दिया. उसकी मां ने कानूनी प्रतिनिधि के रूप में सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी.

जस्टिस के. विनोद चंद्रन और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की बेंच ने युवक की मां की अपील स्वीकार कर ली. शरद की ग्रीवा कशेरुका (Cervical Vertebra) (C4-C5) में उस वक्त फ्रैक्चर हो गया था. एक्सीडेंट की वजह से वह शत-प्रतिशत स्थायी विकलांगता के साथ लकवाग्रस्त हो गया, जिससे उसे जीवन भर बिस्तर पर रहना पड़ा.

कोर्ट ने कहा, 'इस दुर्घटना के कारण युवक लकवाग्रस्त हो गया और उसकी आकांक्षाएं मिट्टी में मिल गईं. इस दुर्घटना के कारण उसके माता-पिता को भी दूसरे शहर में जाकर बसना पड़ा.' बेंच ने कहा, 'हमारा मानना ​​है कि अगर उसने चार्टर्ड अकाउंटेंट का प्रमाणपत्र प्राप्त नहीं भी किया होता, तो स्नातक होने पर उसे एक अकाउंटेंट के रूप में नियुक्त किया जा सकता था और अगर एक कुशल श्रमिक के लिए निर्धारित न्यूनतम मजदूरी 3,352 रुपये होती, तो उसे वर्ष 2001 में किसी भी उचित अनुमान के अनुसार 5,000 रुपये मासिक आय प्राप्त होती.'

कोर्ट के समक्ष प्रमुख मुद्दों में से एक चिकित्सा व्यय की प्रतिपूर्ति का था. बीमा कंपनी ने कई लाख रुपये के बिल का यह कहते हुए विरोध किया कि कुछ बिल हाईकोर्ट की अपील के निपटारे से पहले के थे और अन्य बिल पीड़ित के स्थायी निवास दिल्ली के बाहर के अस्पतालों के थे. बेंच की ओर से फैसला लिखते हुए जस्टिस चंद्रन ने इस दलील को खारिज कर दिया और कहा कि बीमा कंपनी का देशभर में कार्यालय है और वह सत्यापन करा सकती थी.

अदालत ने परिवार के इस स्पष्टीकरण को स्वीकार कर लिया कि दिल्ली की प्रतिकूल जलवायु परिस्थितियों के कारण पीड़ित को गोवा ले जाना पड़ा. परिवार का कहना था कि दिल्ली की प्रतिकूल जलवायु परिस्थितियों के कारण उसे बार-बार होने वाला निमोनिया बढ़ गया था. सत्यापन के बाद, बीमा कंपनी ने 21 लाख रुपये के चिकित्सा बिल को सही माना.

हाईकोर्ट की ओर से पपहले ही मंजूर एक लाख रुपये के हिसाब-किताब के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने 2001 से 2021 के बीच हुए चिकित्सा व्यय के लिए 20 लाख रुपये का अतिरिक्त भुगतान करने का निर्देश दिया. आय के नुकसान के मुद्दे पर, मोटर दुर्घटना न्यायाधिकरण ने मूल रूप से पीड़ित की मासिक आय 3,339 रुपये आंकी थी.

दिल्ली हाईकोर्ट ने दुर्घटना के समय पेशेवर योग्यता के अभाव का हवाला देते हुए इसे बढ़ाकर 3,352 रुपये कर दिया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इससे असहमति जताई और पीड़ित की मजबूत शैक्षणिक संभावनाओं का हवाला दिया.

चार्टर्ड अकाउंटेंट स्तर की कमाई मानने से बचते हुए, पीठ ने कहा कि ग्रेजुएट होने के बावजूद, वह 2001 में कम से कम 5,000 रुपये प्रति माह कमा सकता था, जबकि कुशल श्रमिक का वेतन 3,352 रुपये था. सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के 32.46 लाख रुपये के मुआवजे के फैसले को संशोधित करते हुए भविष्य की चिकित्सा लागतों सहित इसे 60 लाख रुपये से अधिक कर दिया. पीठ ने निर्देश दिया कि पूरी राशि पीड़िता की मां को चार महीने के भीतर वितरित की जाए.

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow