बाबर से लेकर औरंगजेब तक, किस मुगल बादशाह को आती थी हिंदी; उज्बेकिस्तान से कौन-सी भाषा भारत में लाए?
आज हिंदी दिवस है. ऐसे में यह सवाल दिलचस्प हो जाता है कि क्या मुगलों को हिंदी आती थी या नहीं? दरअसल, मुगल भारत में आए तो वे अपनी मातृभाषा के साथ आए थे, लेकिन समय के साथ स्थानीय भाषाओं और संस्कृति से उनका गहरा जुड़ाव भी हुआ. साल 1526 में पानीपत की पहली लड़ाई में इब्राहिम लोदी को पराजित करने के बाद बाबर ने भारत में मुगल साम्राज्य की नींव रखी. बाबर फरगना घाटी (आज का उज्बेकिस्तान) से आया था और अपने साथ तुर्की और चगताई भाषाएं लेकर आया. मुगल साम्राज्य के संस्थापक बाबर की मातृभाषा चगताई थी, जिसका स्पष्ट प्रमाण उसकी आत्मकथा बाबरनामा है, जो इसी भाषा में लिखी गई. प्रशासन की आधिकारिक भाषा क्या थी? समय बीतने के साथ मुगल सम्राट भारतीय कला, संस्कृति और स्थानीय भाषाओं से गहराई से जुड़ने लगे. बावजूद इसके, प्रशासन और दरबार की आधिकारिक भाषा फारसी ही रही, जबकि तुर्की को उन्होंने अपनी पारिवारिक और मातृभाषा के रूप में संभाले रखा. मुगल वंश के संस्थापक बाबर की मातृभाषा चगताई और तुर्की थी. लेकिन मध्य एशिया में फारसी का गहरा प्रभाव होने और राजनीतिक संबंधों के चलते मुगलों ने अपनी आधिकारिक भाषा फारसी बनाई. बाबर की बाबरनामा चगताई में लिखी गई. अकबर के दरबारी इतिहासकार अबुल फज़ल ने अकबरनामा और आइन-ए-अकबरी फारसी में लिखीं. जहांगीर की आत्मकथा जहांगीरनामा भी फारसी में है. दारा शिकोह ने उपनिषदों और गीता का फारसी अनुवाद कराया. हिंदी और हिंदुस्तानी से जुड़ाव भारत में साम्राज्य बढ़ने के साथ मुगलों का स्थानीय लोगों और संस्कृति से संपर्क गहरा हुआ. संवाद की जरूरत ने उन्हें हिंदुस्तानी भाषा की ओर खींचा. हिंदुस्तानी संस्कृतनिष्ठ हिंदी, स्थानीय बोलियों, फारसी और तुर्की का मिश्रण थी. सैनिक शिविरों में यही भाषा और विकसित होकर उर्दू कहलाने लगी. उस दौर में हिंदुस्तानी और उर्दू लगभग एक ही मानी जाती थीं, फर्क सिर्फ लिपि का था- हिंदुस्तानी देवनागरी में, उर्दू अरबी-फारसी लिपि में लिखी जाती थी. हिंदी साहित्य का संरक्षण मुगलों ने भले ही प्रशासनिक कामकाज के लिए फारसी का इस्तेमाल किया, लेकिन हिंदी साहित्य और कवियों को भी संरक्षण दिया. इसी दौर में भक्ति आंदोलन अपने चरम पर था. तुलसीदास ने रामचरितमानस लिखकर भक्ति और समाज दोनों को दिशा दी. सूरदास ने कृष्ण भक्ति साहित्य रचा और अकबर के दरबार से जुड़े रहे. कबीर ने दोहों और पदों से समाज की बुराइयों पर चोट की. बहादुरशाह जफर और हिंदुस्तानी साहित्य आखिरी मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर खुद अच्छे कवि थे. कुछ लोग उन्हें उर्दू शायर मानते हैं, तो कुछ हिंदुस्तानी कवि. कुल मिलाकर, वे उस भाषा के रचनाकार थे जो हिंदुस्तान की जमीन पर पली-बढ़ी थी. ये भी पढ़ें- 'आपरेशन सिंदूर के समय कांग्रेस PAK आर्मी के साथ खड़ी थी', असम से PM मोदी का बड़ा हमला
आज हिंदी दिवस है. ऐसे में यह सवाल दिलचस्प हो जाता है कि क्या मुगलों को हिंदी आती थी या नहीं? दरअसल, मुगल भारत में आए तो वे अपनी मातृभाषा के साथ आए थे, लेकिन समय के साथ स्थानीय भाषाओं और संस्कृति से उनका गहरा जुड़ाव भी हुआ.
साल 1526 में पानीपत की पहली लड़ाई में इब्राहिम लोदी को पराजित करने के बाद बाबर ने भारत में मुगल साम्राज्य की नींव रखी. बाबर फरगना घाटी (आज का उज्बेकिस्तान) से आया था और अपने साथ तुर्की और चगताई भाषाएं लेकर आया. मुगल साम्राज्य के संस्थापक बाबर की मातृभाषा चगताई थी, जिसका स्पष्ट प्रमाण उसकी आत्मकथा बाबरनामा है, जो इसी भाषा में लिखी गई.
प्रशासन की आधिकारिक भाषा क्या थी?
समय बीतने के साथ मुगल सम्राट भारतीय कला, संस्कृति और स्थानीय भाषाओं से गहराई से जुड़ने लगे. बावजूद इसके, प्रशासन और दरबार की आधिकारिक भाषा फारसी ही रही, जबकि तुर्की को उन्होंने अपनी पारिवारिक और मातृभाषा के रूप में संभाले रखा.
मुगल वंश के संस्थापक बाबर की मातृभाषा चगताई और तुर्की थी. लेकिन मध्य एशिया में फारसी का गहरा प्रभाव होने और राजनीतिक संबंधों के चलते मुगलों ने अपनी आधिकारिक भाषा फारसी बनाई.
- बाबर की बाबरनामा चगताई में लिखी गई.
- अकबर के दरबारी इतिहासकार अबुल फज़ल ने अकबरनामा और आइन-ए-अकबरी फारसी में लिखीं.
- जहांगीर की आत्मकथा जहांगीरनामा भी फारसी में है.
- दारा शिकोह ने उपनिषदों और गीता का फारसी अनुवाद कराया.
हिंदी और हिंदुस्तानी से जुड़ाव
भारत में साम्राज्य बढ़ने के साथ मुगलों का स्थानीय लोगों और संस्कृति से संपर्क गहरा हुआ. संवाद की जरूरत ने उन्हें हिंदुस्तानी भाषा की ओर खींचा.
- हिंदुस्तानी संस्कृतनिष्ठ हिंदी, स्थानीय बोलियों, फारसी और तुर्की का मिश्रण थी.
- सैनिक शिविरों में यही भाषा और विकसित होकर उर्दू कहलाने लगी.
- उस दौर में हिंदुस्तानी और उर्दू लगभग एक ही मानी जाती थीं, फर्क सिर्फ लिपि का था- हिंदुस्तानी देवनागरी में, उर्दू अरबी-फारसी लिपि में लिखी जाती थी.
हिंदी साहित्य का संरक्षण
मुगलों ने भले ही प्रशासनिक कामकाज के लिए फारसी का इस्तेमाल किया, लेकिन हिंदी साहित्य और कवियों को भी संरक्षण दिया. इसी दौर में भक्ति आंदोलन अपने चरम पर था. तुलसीदास ने रामचरितमानस लिखकर भक्ति और समाज दोनों को दिशा दी. सूरदास ने कृष्ण भक्ति साहित्य रचा और अकबर के दरबार से जुड़े रहे. कबीर ने दोहों और पदों से समाज की बुराइयों पर चोट की.
बहादुरशाह जफर और हिंदुस्तानी साहित्य
आखिरी मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर खुद अच्छे कवि थे. कुछ लोग उन्हें उर्दू शायर मानते हैं, तो कुछ हिंदुस्तानी कवि. कुल मिलाकर, वे उस भाषा के रचनाकार थे जो हिंदुस्तान की जमीन पर पली-बढ़ी थी.
ये भी पढ़ें-
'आपरेशन सिंदूर के समय कांग्रेस PAK आर्मी के साथ खड़ी थी', असम से PM मोदी का बड़ा हमला
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