बच्चा गोद लेने वाली सभी महिलाओं को मिल सकेगा मातृत्व अवकाश, सुप्रीम कोर्ट ने इसे मां और बच्चे के मौलिक अधिकार से जोड़ा
अब बच्चा गोद लेने वाली सभी माताओं को मातृत्व अवकाश मिल सकेगा. सुप्रीम कोर्ट ने उस कानूनी प्रावधान को निरस्त कर दिया है जिसके तहत 3 महीने तक के बच्चे को गोद लेने पर ही अवकाश मिलने की व्यवस्था थी. कोर्ट ने इसे समानता के अधिकार (संविधान के अनुच्छेद 14) का हनन माना है. कोर्ट ने यह भी कहा है कि मातृत्व एक मौलिक मानव अधिकार है. उसे इस तरह की सीमा में नहीं बांधा जा सकता. जस्टिस जे बी पारडीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने गोद लिए गए बच्चे के अधिकार की चर्चा अपने फैसले में की है. उन्होंने कहा है कि मां का स्नेह पाना बच्चे का अधिकार है. उसे नए परिवार से जुड़ने में समय लगता है. संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत बच्चे और अभिभावकों को गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार है, लेकिन यह कानून उसका भी उल्लंघन करता है. हंसानंदिनी नंदूरी नाम की याचिकाकर्ता ने मूल रूप से 1961 के मैटरनिटी बेनेफिट एक्ट 1961 की धारा 5(4) की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी थी. सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि 2020 में लागू सोशल सिक्योरिटी कोड ने 1961 के कानून की जगह ले ली है. इसकी धारा 60(4) में वही लिखा है, जो 1961 के कानून की धारा 5(4) में था. 2020 के सोशल सिक्योरिटी कोड की धारा 60(4) में बच्चा गोद लेने वाली महिलाओं को अधिकतम 12 सप्ताह की मैटरनिटी लीव का प्रावधान है, लेकिन यह लाभ उन्हीं महिलाओं के लिए है जिन्होंने 3 महीने से कम आयु का बच्चा गोद लिया हो. इस धारा को सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया है. याचिकाकर्ता का कहना था कि गोद लिए गए बच्चे को नए परिवेश में सहज करना जरूरी है. मां के साथ बच्चे का रिश्ता विकसित करने के लिए गोद लेने वाली सभी महिलाओं को बिना शर्त मातृत्व अवकाश दिया जाना चाहिए. कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार किया है. जजों ने माना है कि परिवार और मातृत्व सिर्फ जैविक कारकों पर निर्भर नहीं होता. यह भावनाओं से जुड़ा होता है. कोर्ट में यह दलील भी दी गई थी कि खुद बच्चा पैदा करने वाली महिलाओं को 26 हफ्ते तक का मातृत्व अवकाश देने का प्रावधान है. जजों ने कहा है कि कानून बायोलॉजिकल मदर (प्राकृतिक रूप से मां बनने) और अडॉप्टिव मदर (बच्चा गोद लेकर मां बनने) में अंतर करता है. कोर्ट इस पर नहीं जाना चाहता, लेकिन यह शर्त गलत है कि बच्चा गोद लेने वाली महिला को 12 हफ्ते का अवकाश तभी मिलेगा, जब गोद लिए गए बच्चे की उम्र 3 महीने से कम हो. कोर्ट ने यह भी कहा है कि सरकार को बच्चा गोद लेने वाले पुरुषों को भी पितृत्व अवकाश देने पर विचार करना चाहिए. यह भी पढ़ें:-CM Yogi Challenge Islamic Influencer: 'संभल ही नहीं पूरे हिंदुस्तान में सड़कों पर पढ़ी जाएगी नमाज, इंशाअल्लाह...', किसने CM योगी को दे डाला चैलेंज
अब बच्चा गोद लेने वाली सभी माताओं को मातृत्व अवकाश मिल सकेगा. सुप्रीम कोर्ट ने उस कानूनी प्रावधान को निरस्त कर दिया है जिसके तहत 3 महीने तक के बच्चे को गोद लेने पर ही अवकाश मिलने की व्यवस्था थी. कोर्ट ने इसे समानता के अधिकार (संविधान के अनुच्छेद 14) का हनन माना है. कोर्ट ने यह भी कहा है कि मातृत्व एक मौलिक मानव अधिकार है. उसे इस तरह की सीमा में नहीं बांधा जा सकता.
जस्टिस जे बी पारडीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने गोद लिए गए बच्चे के अधिकार की चर्चा अपने फैसले में की है. उन्होंने कहा है कि मां का स्नेह पाना बच्चे का अधिकार है. उसे नए परिवार से जुड़ने में समय लगता है. संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत बच्चे और अभिभावकों को गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार है, लेकिन यह कानून उसका भी उल्लंघन करता है.
हंसानंदिनी नंदूरी नाम की याचिकाकर्ता ने मूल रूप से 1961 के मैटरनिटी बेनेफिट एक्ट 1961 की धारा 5(4) की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी थी. सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि 2020 में लागू सोशल सिक्योरिटी कोड ने 1961 के कानून की जगह ले ली है. इसकी धारा 60(4) में वही लिखा है, जो 1961 के कानून की धारा 5(4) में था.
2020 के सोशल सिक्योरिटी कोड की धारा 60(4) में बच्चा गोद लेने वाली महिलाओं को अधिकतम 12 सप्ताह की मैटरनिटी लीव का प्रावधान है, लेकिन यह लाभ उन्हीं महिलाओं के लिए है जिन्होंने 3 महीने से कम आयु का बच्चा गोद लिया हो. इस धारा को सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया है.
याचिकाकर्ता का कहना था कि गोद लिए गए बच्चे को नए परिवेश में सहज करना जरूरी है. मां के साथ बच्चे का रिश्ता विकसित करने के लिए गोद लेने वाली सभी महिलाओं को बिना शर्त मातृत्व अवकाश दिया जाना चाहिए. कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार किया है. जजों ने माना है कि परिवार और मातृत्व सिर्फ जैविक कारकों पर निर्भर नहीं होता. यह भावनाओं से जुड़ा होता है.
कोर्ट में यह दलील भी दी गई थी कि खुद बच्चा पैदा करने वाली महिलाओं को 26 हफ्ते तक का मातृत्व अवकाश देने का प्रावधान है. जजों ने कहा है कि कानून बायोलॉजिकल मदर (प्राकृतिक रूप से मां बनने) और अडॉप्टिव मदर (बच्चा गोद लेकर मां बनने) में अंतर करता है. कोर्ट इस पर नहीं जाना चाहता, लेकिन यह शर्त गलत है कि बच्चा गोद लेने वाली महिला को 12 हफ्ते का अवकाश तभी मिलेगा, जब गोद लिए गए बच्चे की उम्र 3 महीने से कम हो. कोर्ट ने यह भी कहा है कि सरकार को बच्चा गोद लेने वाले पुरुषों को भी पितृत्व अवकाश देने पर विचार करना चाहिए.
What's Your Reaction?