दिल्ली-एनसीआर की जहरीली हवा से 70% बढ़ा प्रीमेच्योर डिलीवरी का खतरा, IIT-Delhi की रिपोर्ट में हुआ खुलासा

दिल्ली एनसीआर में लगातार बढ़ते स्मॉग और खराब एयर क्वालिटी इंडेक्स का असर अब सिर्फ सांस की बीमारियों या हार्ट प्रॉब्लम तक सीमित नहीं है. एक नई रिसर्च में सामने आया है कि प्रदूषित हवा प्रेग्नेंट महिलाओं और उनके गर्भ में पल रहे बच्चे के लिए भी गंभीर खतरा बन चुकी है. आईआईटी दिल्ली, इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ पॉपुलेशन साइंसेज, मुंबई, ब्रिटेन और आयरलैंड की संस्थाओं की ओर से की गई स्टडी में सामने आया है कि हवा में मौजूद बारीक पार्टिकुलेट मैटर प्रेग्नेंट महिलाओं के लिए खतरनाक साबित हो रहे हैं.  70 प्रतिशत तक बढ़ा प्रीमेच्योर डिलीवरी का खतरा  रिसर्च के अनुसार, जो महिलाएं प्रेग्नेंसी के दौरान ज्यादा प्रदूषित हवा में सांस लेती है, उनमें समय से पहले बच्चों के जन्म का खतरा 70 प्रतिशत तक बढ़ जाता है. वहीं कम वजन वाले बच्चों के जन्म की संभावना भी 40 प्रतिशत ज्यादा होती है. स्टडी के अनुसार, हवा में हर 10 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर पीएम 2.5 की वृद्धि के साथ प्रीमेच्योर बर्थ की संभावना 12 प्रतिशत तक बढ़ जाती है. नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के आंकड़े भी बताते हैं कि साल 2019 से 21 के बीच भारत में 13 प्रतिशत बच्चे समय से पहले पैदा हुए जबकि 17 प्रतिशत बच्चों का वजन सामान्य से कम था. एक्सपर्ट्स के अनुसार, इसका बड़ा कारण देश की जहरीली हवा है.  क्या है पीएम 2.5 और यह कितना होता है खतरनाक? पीएम 2.5 बहुत सूक्ष्म कण होते हैं, जिनका आकार 2.5 माइक्रोन से भी कम होता है. इसका मतलब है कि एक इंसान के बाल की चौड़ाई से करीब 30 गुना छोटे यह कण होते हैं. वहीं यह कण वाहन उत्सर्जन में, फैक्ट्री से निकलने वाला धुंआ, निर्माण कार्य की धूल और जीवाश्म ईंधन के जलने से निकलते हैं. इसके अलावा इनका आकार इतना छोटा होता है कि यह फेफड़ों के गहरे हिस्से तक पहुंचकर ब्लडस्ट्रीम में प्रवेश कर जाते हैं. इससे शरीर में ऑक्सीजन का प्रवाह प्रभावित होता है और सूजन बढ़ती है जो गर्भ में पल रहे बच्चे तक पोषक तत्व और ऑक्सीजन पहुंचाने की प्रक्रिया को बाधित कर देती है.  प्रदूषण से बच्चे पर क्या पड़ता है असर? आईआईटी-आईआईपीएस की रिपोर्ट के अनुसार, प्रेग्नेंसी के दौरान प्रदूषण के संपर्क में आने से शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और इन्फ्लेमेशन बढ़ता है. जिससे प्लेसेंटा का काम प्रभावित होता है. इसका सीधा असर बच्चों के विकास पर पड़ता है. यह प्रभाव प्रेग्नेंसी के दूसरे और तीसरे ट्राइमेस्टर में सबसे ज्यादा देखने को मिला है, जब बच्चा गर्भ में तेजी से बढ़ रहा होता है. इस दौरान प्रदूषण के संपर्क में आने से समय से पहले डिलीवरी, स्टीलबर्थ और बच्चे के विकास में रुकावट जैसी समस्या हो सकती है. इसे लेकर एक्सपर्ट्स बताते हैं कि यह प्रदूषण ऑक्सीजन और पोषक तत्वों के प्रवाह को बाधित करते हैं जिससे बच्चों के अंगों का विकास प्रभावित हो सकता है और जन्मजात होने वाली समस्याओं का खतरा भी बढ़ जाता है.  सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले राज्य  रिसर्च के अनुसार इससे दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे उत्तरी राज्य सबसे ज्यादा प्रभावित हैं. इन राज्य में प्रदूषण का स्तर अक्सर बहुत खराब या गंभीर श्रेणी में रहता है. वहीं इसके उलट पूर्वोत्तर भारत की साफ हवा जन्म लेने वाले बच्चों की सेहत सेहत के लिए बेहतर पाई गई है.  कम वजन और समय से पहले जन्मे बच्चे शुरुआत में ही नहीं बल्कि आगे चलकर भी कई सेहत से जुड़ी समस्याओं का सामना करते हैं. ऐसे में शिशु मृत्यु दर, विकास में देरी, डायबिटीज, हाइट ब्लड प्रेशर और हार्ट डिजीज जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है. इसके अलावा रिपोर्ट के अनुसार मांओं के लंबे समय तक प्रदूषण के संपर्क में रहने से प्रीक्लेम्पसिया, हाई ब्लड प्रेशर और गर्भपात का खतरा बढ़ सकता हैं. प्रेग्नेंट महिलाओं के प्रदूषण से बचने के उपाय  प्रेग्नेंट महिलाओं को ज्यादा प्रदूषण वाले दिनों में बाहर निकलने से बचाना चाहिए.  वहीं घर में एयर प्यूरीफायर का इस्तेमाल करना चाहिए.  इसके अलावा बाहर निकलते समय और एन95 या केएन99 मास्क जरूर पहनना चाहिए.  वहीं घर के खिड़की और दरवाजे बंद रखें और घर में वेंटिलेशन कंट्रोल करें.  समय-समय पर प्रेगनेंसी चेकअप करवाते रहे. ये भी पढ़ें-हर 9 में से 1 भारतीय किसी न किसी बीमारी की चपेट में, ICMR की चौंकाने वाली रिपोर्ट Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Nov 5, 2025 - 19:30
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दिल्ली-एनसीआर की जहरीली हवा से 70% बढ़ा प्रीमेच्योर डिलीवरी का खतरा, IIT-Delhi की रिपोर्ट में हुआ खुलासा

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