दिमागी नक्सल: भड़के विपक्ष के तीखे सवाल और 'वोट बैंक' की छिपी हुई राजनीति
देश के नेता सिर्फ उन्हीं मुद्दों पर अपना दिमाग लगाते हैं, जहां उन्हें अपना सियासी हित दिखाई देता है. बाकी देश की जनता के ‘जीने-मरने’ से उन्हें कोई सरोकार नहीं है. ये बात कड़वी है, लेकिन गलत नहीं है. इस वक्त देश की पूरी राजनीति सिर्फ एक शब्द के जाल में उलझी है. वो शब्द है ‘दिमागी नक्सल’. ऐसे में सवाल उठता है कि क्यों हमारे देश की सरकारें और नेता भीड़ प्रबंधन सीखने में अपना ‘दिमाग’ नहीं लगाते? अगर वो ऐसा करते तो बिहार में 8 लोगों की जान नहीं जाती और मध्य प्रदेश के मंदिर में भगदड़ नहीं मचती. क्यों हमारे देश की सरकारें और नेता शिक्षा का ढांचा सुधारने में अपना ‘दिमाग’ नहीं लगाते? अगर ऐसा करते तो एक बार फिर NTA छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ नहीं कर पाता. दुर्भाग्य ये है कि आम आदमी और युवाओं के मुद्दों पर राजनीति अपना ‘दिमाग’ खर्च नहीं करना चाहती. वो सिर्फ ‘दिमागी नक्सल’ को ही देश के दिमाग में बिठाना चाहती है, क्योंकि इस एक शब्द में वोटबैंक की बड़ी राजनीति छिपी है. दिमाग नक्सल पर सियासत देश में तीन जगह हादस हुए, लेकिन सियासत का दिमाग इन घटनाओं की तरफ नहीं गया, क्योंकि उसे ‘दिमागी नक्सल’ में सियासी नफा ज्यादा दिखाई देता है. बाकी आम आदमी का क्या है? वो तो अक्सर मंदिर की भगदड़ में दम तोड़ता रहा है. शुरुआत बिहार से करते हैं, जहां प्रशासन ने श्रद्धालुओं को भीड़ में मरने के लिए छोड़ दिया, लेकिन पीड़ितों को राहत का चेक देने में वो रॉकेट की रफ्तार से भी तेज दिखा. ‘दिमागी नक्सल’ पर सियासी संग्राम प्रधानमंत्री ने ‘दिमागी नक्सल’ के विषय को उठाया. लेकिन मात्र 24 घंटे में ही किसके दिमाग में नक्सली दिमाग था, ये निकलकर सामने आ गया. पी. चिदंबरम कहते हैं कि उन्हें ‘दिमागी नक्सली’ होने पर गर्व है. मैं कांग्रेस से पूछना चाहता हूं कि मनमोहन सिंह सही हैं या पी. चिदंबरम? प्रमुख नक्सली नेता ने कहा था कि 2030 तक दिल्ली पर कब्जा होगा. आज नक्सल प्रभावित जिले जीरो हो गए हैं. चिदंबरम जी ने कहा था कि भारत में डिजिटल ट्रांजेक्शन नहीं हो सकते. जिसकी सोच ऐसी है, वो ‘दिमागी नक्सल’ है. सत्ता-विपक्ष में आरोप-प्रत्यारोप हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा, ‘‘पी. चिदंबरम ‘दिमागी नक्सल’ नहीं, बल्कि पूरी तरह से नक्सल हैं. अब जब देश के गृह मंत्री रहे पी. चिदंबरम ने खुद को ‘दिमागी नक्सल’ कहा है, तो इस बात की जांच होनी चाहिए कि क्या उन्होंने देश के गृह मंत्री के तौर पर अपने कार्यकाल के दौरान नक्सलवाद को खत्म करने के लिए जान-बूझकर कोई कदम नहीं उठाया.’’ ‘नक्सल’ से ‘दिमागी नक्सल’ तक नक्सल क्या है, ये देश को पिछले छह दशक से पता है. ‘अर्बन नक्सल’ के बारे में भी हम कई बार सुन चुके हैं. पीएम मोदी ने 2018 में छत्तीसगढ़ की एक चुनावी रैली में ‘अर्बन नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल किया था. ‘अर्बन नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल ऐसे शहरी बुद्धिजीवियों, कार्यकर्ताओं या समर्थकों के लिए किया जाता रहा है, जिन पर माओवादी विचारधारा से सहानुभूति रखने के आरोप लगाए जाते हैं. राज्यसभा में विपक्ष ने सरकार से ‘अर्बन नक्सल’ की परिभाषा भी पूछी थी. तब गृह मंत्रालय ने स्पष्ट किया था कि सरकार आधिकारिक दस्तावेजों या कानूनी तौर पर ‘अर्बन नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल नहीं करती है. लेकिन ‘दिमागी नक्सल’ शब्द का प्रयोग पहली बार हुआ है. अब विपक्ष पूछ रहा है कि क्या आपके लिए ‘दिमागी नक्सल’ वो पढ़ा-लिखा युवा है, जो अपने हक की बात कर रहा है? इस पर बीजेपी कह रही है कि जो माओवादियों का समर्थन करते हैं, वो ‘दिमागी नक्सल’ हैं. विपक्ष पूछ रहा है कि क्या ‘दिमागी नक्सल’ वो युवा है, जो पेपर लीक की बात करता है? बीजेपी कह रही है कि ‘दिमागी नक्सल’ वो है, जो भारत के संविधान को नहीं मानता. कांग्रेस पूछ रही है कि क्या ‘दिमागी नक्सल’ वो पढ़े-लिखे लोग हैं, जो आपकी विफलताओं पर आपको आईना दिखाते हैं? बीजेपी कह रही है कि ‘दिमागी नक्सल’ वो हैं, जो चिकन नेक को काटकर नॉर्थ ईस्ट को भारत से अलग करना चाहते हैं. विपक्ष ने भी साधा निशाना इस बीच आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह एक कदम आगे चले गए. उन्होंने सीधे पीएम मोदी के ‘दिमागी नक्सली’ शब्द का मतलब बता दिया. संजय सिंह ने X पर पोस्ट करते हुए लिखा, ‘‘प्रधानमंत्री ने देश के नौजवानों को ‘दिमागी नक्सल’ कहा है.’’ विपक्ष के आक्रामक तेवर ‘दिमागी नक्सल’ पर विपक्ष बेहद आक्रामक है. पी. चिदंबरम और अरविंद केजरीवाल के बाद महबूबा मुफ्ती ने भी अपने आपको ‘दिमागी नक्सली’ बताया है. यानी खुद को ‘दिमागी नक्सल’ कहने वाले नेताओं की लिस्ट अब लंबी होती जा रही है. प्रधानमंत्री ने देश के नौजवानों को ‘दिमागी नक्सल’ कहा. क्या पेपर लीक के खिलाफ आवाज उठाने वाली Gen Z ‘दिमागी नक्सल’ है? क्या अपने स्कूलों को ठीक करने की मांग करने वाले छोटे-छोटे बच्चे ‘दिमागी नक्सल’ हैं? या फिर लड़ाई कराने वाली ‘भारतीय झगड़ा पार्टी’ ‘दिमागी नक्सल’ है? कांग्रेस सांसद राजीव शुक्ला ने कहा, ‘‘पहले तो ‘दिमागी नक्सल’ की परिभाषा बताई जाए कि ये क्या है? आप किसे ‘दिमागी नक्सल’ कह रहे हैं?’’ बीजेपी सांसद रविशंकर प्रसाद ने कहा, ‘‘दिमागी नक्सल का मतलब होता है- वे लोग, जो दिल्ली, मुंबई, पटना, कोलकाता के AC कमरों में बैठते हैं और माओवादियों की विचारधारा को खाद-पानी देते हैं, जो इनके लिए पैसा और व्यवस्थ
देश के नेता सिर्फ उन्हीं मुद्दों पर अपना दिमाग लगाते हैं, जहां उन्हें अपना सियासी हित दिखाई देता है. बाकी देश की जनता के ‘जीने-मरने’ से उन्हें कोई सरोकार नहीं है. ये बात कड़वी है, लेकिन गलत नहीं है. इस वक्त देश की पूरी राजनीति सिर्फ एक शब्द के जाल में उलझी है. वो शब्द है ‘दिमागी नक्सल’. ऐसे में सवाल उठता है कि क्यों हमारे देश की सरकारें और नेता भीड़ प्रबंधन सीखने में अपना ‘दिमाग’ नहीं लगाते?
अगर वो ऐसा करते तो बिहार में 8 लोगों की जान नहीं जाती और मध्य प्रदेश के मंदिर में भगदड़ नहीं मचती. क्यों हमारे देश की सरकारें और नेता शिक्षा का ढांचा सुधारने में अपना ‘दिमाग’ नहीं लगाते? अगर ऐसा करते तो एक बार फिर NTA छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ नहीं कर पाता. दुर्भाग्य ये है कि आम आदमी और युवाओं के मुद्दों पर राजनीति अपना ‘दिमाग’ खर्च नहीं करना चाहती. वो सिर्फ ‘दिमागी नक्सल’ को ही देश के दिमाग में बिठाना चाहती है, क्योंकि इस एक शब्द में वोटबैंक की बड़ी राजनीति छिपी है.
दिमाग नक्सल पर सियासत
देश में तीन जगह हादस हुए, लेकिन सियासत का दिमाग इन घटनाओं की तरफ नहीं गया, क्योंकि उसे ‘दिमागी नक्सल’ में सियासी नफा ज्यादा दिखाई देता है. बाकी आम आदमी का क्या है? वो तो अक्सर मंदिर की भगदड़ में दम तोड़ता रहा है.
शुरुआत बिहार से करते हैं, जहां प्रशासन ने श्रद्धालुओं को भीड़ में मरने के लिए छोड़ दिया, लेकिन पीड़ितों को राहत का चेक देने में वो रॉकेट की रफ्तार से भी तेज दिखा. ‘दिमागी नक्सल’ पर सियासी संग्राम प्रधानमंत्री ने ‘दिमागी नक्सल’ के विषय को उठाया. लेकिन मात्र 24 घंटे में ही किसके दिमाग में नक्सली दिमाग था, ये निकलकर सामने आ गया. पी. चिदंबरम कहते हैं कि उन्हें ‘दिमागी नक्सली’ होने पर गर्व है. मैं कांग्रेस से पूछना चाहता हूं कि मनमोहन सिंह सही हैं या पी. चिदंबरम? प्रमुख नक्सली नेता ने कहा था कि 2030 तक दिल्ली पर कब्जा होगा. आज नक्सल प्रभावित जिले जीरो हो गए हैं. चिदंबरम जी ने कहा था कि भारत में डिजिटल ट्रांजेक्शन नहीं हो सकते. जिसकी सोच ऐसी है, वो ‘दिमागी नक्सल’ है.
सत्ता-विपक्ष में आरोप-प्रत्यारोप
हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा, ‘‘पी. चिदंबरम ‘दिमागी नक्सल’ नहीं, बल्कि पूरी तरह से नक्सल हैं. अब जब देश के गृह मंत्री रहे पी. चिदंबरम ने खुद को ‘दिमागी नक्सल’ कहा है, तो इस बात की जांच होनी चाहिए कि क्या उन्होंने देश के गृह मंत्री के तौर पर अपने कार्यकाल के दौरान नक्सलवाद को खत्म करने के लिए जान-बूझकर कोई कदम नहीं उठाया.’’ ‘नक्सल’ से ‘दिमागी नक्सल’ तक नक्सल क्या है, ये देश को पिछले छह दशक से पता है. ‘अर्बन नक्सल’ के बारे में भी हम कई बार सुन चुके हैं. पीएम मोदी ने 2018 में छत्तीसगढ़ की एक चुनावी रैली में ‘अर्बन नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल किया था.
‘अर्बन नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल ऐसे शहरी बुद्धिजीवियों, कार्यकर्ताओं या समर्थकों के लिए किया जाता रहा है, जिन पर माओवादी विचारधारा से सहानुभूति रखने के आरोप लगाए जाते हैं. राज्यसभा में विपक्ष ने सरकार से ‘अर्बन नक्सल’ की परिभाषा भी पूछी थी. तब गृह मंत्रालय ने स्पष्ट किया था कि सरकार आधिकारिक दस्तावेजों या कानूनी तौर पर ‘अर्बन नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल नहीं करती है. लेकिन ‘दिमागी नक्सल’ शब्द का प्रयोग पहली बार हुआ है. अब विपक्ष पूछ रहा है कि क्या आपके लिए ‘दिमागी नक्सल’ वो पढ़ा-लिखा युवा है, जो अपने हक की बात कर रहा है? इस पर बीजेपी कह रही है कि जो माओवादियों का समर्थन करते हैं, वो ‘दिमागी नक्सल’ हैं.
विपक्ष पूछ रहा है कि क्या ‘दिमागी नक्सल’ वो युवा है, जो पेपर लीक की बात करता है? बीजेपी कह रही है कि ‘दिमागी नक्सल’ वो है, जो भारत के संविधान को नहीं मानता. कांग्रेस पूछ रही है कि क्या ‘दिमागी नक्सल’ वो पढ़े-लिखे लोग हैं, जो आपकी विफलताओं पर आपको आईना दिखाते हैं? बीजेपी कह रही है कि ‘दिमागी नक्सल’ वो हैं, जो चिकन नेक को काटकर नॉर्थ ईस्ट को भारत से अलग करना चाहते हैं. विपक्ष ने भी साधा निशाना इस बीच आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह एक कदम आगे चले गए. उन्होंने सीधे पीएम मोदी के ‘दिमागी नक्सली’ शब्द का मतलब बता दिया. संजय सिंह ने X पर पोस्ट करते हुए लिखा, ‘‘प्रधानमंत्री ने देश के नौजवानों को ‘दिमागी नक्सल’ कहा है.’’
विपक्ष के आक्रामक तेवर
‘दिमागी नक्सल’ पर विपक्ष बेहद आक्रामक है. पी. चिदंबरम और अरविंद केजरीवाल के बाद महबूबा मुफ्ती ने भी अपने आपको ‘दिमागी नक्सली’ बताया है. यानी खुद को ‘दिमागी नक्सल’ कहने वाले नेताओं की लिस्ट अब लंबी होती जा रही है. प्रधानमंत्री ने देश के नौजवानों को ‘दिमागी नक्सल’ कहा. क्या पेपर लीक के खिलाफ आवाज उठाने वाली Gen Z ‘दिमागी नक्सल’ है? क्या अपने स्कूलों को ठीक करने की मांग करने वाले छोटे-छोटे बच्चे ‘दिमागी नक्सल’ हैं? या फिर लड़ाई कराने वाली ‘भारतीय झगड़ा पार्टी’ ‘दिमागी नक्सल’ है? कांग्रेस सांसद राजीव शुक्ला ने कहा, ‘‘पहले तो ‘दिमागी नक्सल’ की परिभाषा बताई जाए कि ये क्या है? आप किसे ‘दिमागी नक्सल’ कह रहे हैं?’’
बीजेपी सांसद रविशंकर प्रसाद ने कहा, ‘‘दिमागी नक्सल का मतलब होता है- वे लोग, जो दिल्ली, मुंबई, पटना, कोलकाता के AC कमरों में बैठते हैं और माओवादियों की विचारधारा को खाद-पानी देते हैं, जो इनके लिए पैसा और व्यवस्था उपलब्ध कराते हैं.’’ टीएमसी सांसद कीर्ति आजाद ने कहा, ‘‘प्रधानमंत्री का कमाल है, जो पढ़ा-लिखा है, वो नक्सल है और जो अनपढ़ और अज्ञानी है, वो देशभक्त है. छह लाख सरकारी स्कूलों में से 1.5 लाख सरकारी स्कूल बंद हो चुके हैं. एक लाख ऐसे स्कूल हैं, जहां लड़कियों के लिए बाथरूम नहीं हैं. 1.25 लाख स्कूलों में सिर्फ एक शिक्षक है. तभी ये पढ़े-लिखे लोगों को अर्बन नक्सल बोलते हैं.’’
राजनीतिक फायदे के लिए गढ़े जाने वाले शब्द
राजनीतिक शब्दों की लंबी टाइमलाइन ‘दिमागी नक्सल’, ‘अर्बन नक्सल’ या ‘आंदोलनजीवी’- ये सब राजनीति में इस्तेमाल किए जाने वाले शब्द हैं. इस तरह के शब्द राजनीतिक दल अपने फायदे और विपक्ष को घेरने वाले नैरेटिव के तहत गढ़ते और इस्तेमाल करते रहे हैं. इन शब्दों की टाइमलाइन भी लंबी है.
साल 2016 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में छात्रों का प्रदर्शन हुआ था. JNU में संसद हमले के दोषी अफजल गुरु की बरसी पर हुए एक कार्यक्रम के दौरान कथित तौर पर देश-विरोधी नारे लगे थे. उस वक्त बीजेपी ने इसे ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ कहा था. आज भी बीजेपी इन शब्दों के जरिए विपक्ष को घेरती है. साल 2018 में पुणे पुलिस ने भीमा-कोरेगांव दंगों के मामले में देश के अलग-अलग हिस्सों से कई बुद्धिजीवियों को हिरासत में लिया था. पुलिस के मुताबिक, इनके पास से एक पत्र बरामद हुआ था, जिसमें कथित तौर पर प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश का जिक्र था. इन्हें ‘अर्बन नक्सल’ कहा गया. ऐसा ही एक शब्द ‘आंदोलनजीवी’ भी है. किसान आंदोलन के समय ये शब्द खूब चर्चा में रहा था, जिसका सियासी दल अब भी अपनी सुविधा के अनुसार इस्तेमाल करते रहते हैं.
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