जंग की आग में झुलसा कश्मीर का कालीन उद्योग! खाड़ी देशों से 60% निर्यात ठप, लाखों की आजीविका दांव पर

Kashmir Handicraft Crisis: पश्चिम एशिया में ईरान, इज़राइल और अमेरिका के बीच चल रहे युद्ध के चलते जहां कश्मीर का हस्तशिल्प क्षेत्र एक बड़े संकट का सामना कर रहा है वहीं कश्मीर का कालीन उद्योग इससे विशेष रूप से प्रभावित हुआ है! जहां युद्ध ने इस उद्योग के सबसे अहम बाज़ारों को बुरी तरह प्रभावित किया है वहीं निर्यातकों का कहना है कि जहां पुराने ऑर्डर कैंसिल हो रहे है और नए ऑर्डर लगभग पूरी तरह से बंद हो गए हैं!  सरकारी की तरफ़ से दुबई के बाद अभ चीन और डेनमार्क में हस्तकला के लिए लगने वाली अंतरराष्ट्रीय प्रदीर्शैनियों के सीतागीत होने से नए ऑर्डर्स के मिलने की उम्मीद भी ख़त्म हो गई है और  व्यापार से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े लाखों लोगों की आजीविका दांव पर लग गई है. निर्यात और खाड़ी देशों पर भारी असर  कश्मीर के कालीन, जो अपनी बारीक कारीगरी और ऐतिहासिक महत्व के लिए जाने जाते हैं, लगभग 25 देशों को निर्यात किए जाते हैं, जिसमें पश्चिम एशिया एक प्रमुख बाजार के रूप में उभरा है. हाथ से बुने हुए कालीनों के साथ-साथ, पारंपरिक हस्तशिल्प-जैसे कि पैपियर-मैशे, पश्मीना शॉल, कानी बुनाई, सोज़नी कढ़ाई, खाताबंद लकड़ी का काम, और अखरोट की लकड़ी पर नक्काशी-घाटी की निर्यात अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं. लेकिन अभ खाड़ी संघर्ष ने कश्मीर की निर्यात अर्थव्यवस्था की रीढ़ पर ही चोट की है, जो खाड़ी देशों पर बहुत ज़्यादा निर्भर है; इन देशों की हिस्सेदारी कुल हस्तशिल्प निर्यात में लगभग 60 प्रतिशत है. युद्ध के चलते जहां नए शिपमेंट की लागत में भारी बढ़ोतरी और पुराने ऑर्डर के अटके हुए भुगतानों ने इस उद्योग को गंभीर आर्थिक संकट में भी डाल दिया है. व्यापारियों और कारीगरों की मुश्किल  कश्मीर चैम्बर ऑफ़ इंडस्ट्रीज के अध्यक्ष तारिक़ गाणी के अनुसार, इसका सबसे बड़ा और तत्काल प्रभाव यह हुआ है कि पूरे क्षेत्र के खरीदारों से आने वाले नए ऑर्डरों में अचानक भारी गिरावट आ गई है. अनिश्चितता, व्यापार के बाधित रास्ते और आर्थिक चिंताओं के चलते आयातकों ने भी खरीदारी रोक दी है. ईरान, इज़राइल और अमेरिका के बीच चल रहे युद्ध ने कश्मीर के हस्तशिल्प क्षेत्र को एक गहरा झटका दिया है. खाड़ी देशों की कुल मिलाकर कश्मीर से होने वाले निर्यात में लगभग 60 प्रतिशत की हिस्सेदारी है. इस लिहाज़ से ये देश कश्मीरी हस्तशिल्प, पश्मीना, कालीनों और इनसे जुड़े अन्य उत्पादों के लिए सबसे अहम बाज़ार हैं. शिपमेंट की लागत और हवाई मार्ग में बढ़ोतरी कश्मीर चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (KCC&I) के अध्यक्ष, जावेद अहमद टेंगा ने कहा कि यह स्थिति अभूतपूर्व है, और व्यापार का पारंपरिक चक्र पूरी तरह से बाधित हो गया है. "परंपरागत रूप से, रमज़ान का महीना खाड़ी देशों में बिक्री और भुगतान का सबसे व्यस्त और अहम समय माना जाता है. इसी दौरान, कश्मीरी निर्यातकों को पूरे साल किए गए शिपमेंट के बदले अपनी वार्षिक कमाई का एक बड़ा हिस्सा प्राप्त होता है. मौजूदा अस्थिरता के कारण, न केवल बैंकिंग और व्यापारिक भुगतान के रास्ते बाधित हुए हैं, बल्कि खरीदारों से आने वाले नए ऑर्डर भी लगभग पूरी तरह से ठप पड़ गए हैं." इससे कश्मीर के हज़ारों एक्सपोर्टर्स, कारीगरों और बुनकरों के लिए एक अभूतपूर्व लिक्विडिटी संकट पैदा हो गया है. इन्होंने भरोसे के साथ अपना सामान भेजा था, लेकिन अब उनके पास एक्सपोर्ट के बकाया बिल, बढ़ता ब्याज़ का बोझ और इस बात की कोई पक्की जानकारी नहीं है कि पेमेंट कब आएगी. ऑर्डर्स का आना बंद होना इस समय सबसे बड़ी चिंता है, क्योंकि इसका सीधा असर भविष्य के प्रोडक्शन साइकल और पूरे सेक्टर में रोज़गार पर पड़ता है. "इस व्यापार से हमारे कई परिवार जुड़े हुए हैं-बुनकरों से लेकर धोने वालों तक, और डीलरों से लेकर निर्यातकों तक. और अगर कोई ऑर्डर नहीं आता है, तो हम सभी को मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा." श्रीनगर के एक एक्सपोर्टर, फ़ारूक़ अहमद ने हालात की गंबीरता दर्शाते हुवे कहा कि पहलगाम हमले के बाद पर्यटकों की आमद में पहले ही कमी आ गई थी.  आमतौर पर पर्यटक सीज़न शुरू होने के साथ ही मांग में भी तेज़ी आती है, लेकिन इस साल स्थिति पूरी तरह से उलट थी. “ऑर्डर पूरी तरह से बंद हो गए हैं. इस क्षेत्र में बनी अनिश्चितता के कारण खरीदार नए सामान खरीदने का कोई पक्का वादा नहीं कर रहे हैं. यहां तक कि हमारे पुराने ग्राहक भी अपने फ़ैसले टाल रहे हैं. इसके अलावा, पेमेंट्स में भी देरी हो रही है, इसलिए हम दोनों तरफ़ से मार झेल रहे हैं – न तो पैसा आ रहा है और न ही कोई नया बिज़नेस मिल रहा है.” बढ़ोतरी के कारण बढ़ीं शिपमेंट की लागत उन्होंने कहा, इस संकट की गंभीरता शिपमेंट की लागत में हुई भारी बढ़ोतरी के कारण और भी बढ़ गई है. हवाई मार्गों में आई रुकावट, जोखिम की बढ़ी हुई आशंका और इंश्योरेंस प्रीमियम में हुई वृद्धि के चलते इंटरनेशनल कार्गो की दरें तेज़ी से बढ़ी हैं.  एक्सपोर्टर्स का कहना है कि युद्ध के कारण कच्चे माल की कीमतें तो बढ़ी ही हैं, साथ ही हवाई और समुद्री, दोनों तरह के माल-भाड़े में भी काफ़ी बढ़ोतरी हुई है. इससे वैश्विक बाज़ारों में उनकी प्रतिस्पर्धी क्षमता और भी कमज़ोर हो गई है. इन चुनौतियों को और भी बढ़ाने वाली बात यह है कि दुबई में स्थित ‘ग्लोबल विलेज’ लगभग 15 दिनों के लिए बंद हो गया है. यह एक प्रमुख इंटरनेशनल रिटेल प्लेटफ़ॉर्म है, जहां कश्मीर के कई व्यापारी अपने उत्पादों की प्रदर्शनी लगाते हैं और उन्हें बेचते हैं. इस बंदी के कारण बिक्री का एक अहम ज़रिया, ठीक ऐसे समय में बंद हो गया है जब उसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी. इसका सीधा असर व्यापारियों की आमदनी पर पड़ा है. इस संकट का असर पूरी उत्पादन से लेकर बिक्री तक की पूरी प्रक्रिया पर पड़ रहा है.  एक्सपोर्टर्स को अपना काम-काज जारी रखने में भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है, व्यापारियों की बिक्री में लगातार गि

Apr 2, 2026 - 00:30
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जंग की आग में झुलसा कश्मीर का कालीन उद्योग! खाड़ी देशों से 60% निर्यात ठप, लाखों की आजीविका दांव पर

Kashmir Handicraft Crisis: पश्चिम एशिया में ईरान, इज़राइल और अमेरिका के बीच चल रहे युद्ध के चलते जहां कश्मीर का हस्तशिल्प क्षेत्र एक बड़े संकट का सामना कर रहा है वहीं कश्मीर का कालीन उद्योग इससे विशेष रूप से प्रभावित हुआ है! जहां युद्ध ने इस उद्योग के सबसे अहम बाज़ारों को बुरी तरह प्रभावित किया है वहीं निर्यातकों का कहना है कि जहां पुराने ऑर्डर कैंसिल हो रहे है और नए ऑर्डर लगभग पूरी तरह से बंद हो गए हैं! 

सरकारी की तरफ़ से दुबई के बाद अभ चीन और डेनमार्क में हस्तकला के लिए लगने वाली अंतरराष्ट्रीय प्रदीर्शैनियों के सीतागीत होने से नए ऑर्डर्स के मिलने की उम्मीद भी ख़त्म हो गई है और  व्यापार से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े लाखों लोगों की आजीविका दांव पर लग गई है.

निर्यात और खाड़ी देशों पर भारी असर 

कश्मीर के कालीन, जो अपनी बारीक कारीगरी और ऐतिहासिक महत्व के लिए जाने जाते हैं, लगभग 25 देशों को निर्यात किए जाते हैं, जिसमें पश्चिम एशिया एक प्रमुख बाजार के रूप में उभरा है. हाथ से बुने हुए कालीनों के साथ-साथ, पारंपरिक हस्तशिल्प-जैसे कि पैपियर-मैशे, पश्मीना शॉल, कानी बुनाई, सोज़नी कढ़ाई, खाताबंद लकड़ी का काम, और अखरोट की लकड़ी पर नक्काशी-घाटी की निर्यात अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं.

लेकिन अभ खाड़ी संघर्ष ने कश्मीर की निर्यात अर्थव्यवस्था की रीढ़ पर ही चोट की है, जो खाड़ी देशों पर बहुत ज़्यादा निर्भर है; इन देशों की हिस्सेदारी कुल हस्तशिल्प निर्यात में लगभग 60 प्रतिशत है. युद्ध के चलते जहां नए शिपमेंट की लागत में भारी बढ़ोतरी और पुराने ऑर्डर के अटके हुए भुगतानों ने इस उद्योग को गंभीर आर्थिक संकट में भी डाल दिया है.

व्यापारियों और कारीगरों की मुश्किल 

कश्मीर चैम्बर ऑफ़ इंडस्ट्रीज के अध्यक्ष तारिक़ गाणी के अनुसार, इसका सबसे बड़ा और तत्काल प्रभाव यह हुआ है कि पूरे क्षेत्र के खरीदारों से आने वाले नए ऑर्डरों में अचानक भारी गिरावट आ गई है. अनिश्चितता, व्यापार के बाधित रास्ते और आर्थिक चिंताओं के चलते आयातकों ने भी खरीदारी रोक दी है.

ईरान, इज़राइल और अमेरिका के बीच चल रहे युद्ध ने कश्मीर के हस्तशिल्प क्षेत्र को एक गहरा झटका दिया है. खाड़ी देशों की कुल मिलाकर कश्मीर से होने वाले निर्यात में लगभग 60 प्रतिशत की हिस्सेदारी है. इस लिहाज़ से ये देश कश्मीरी हस्तशिल्प, पश्मीना, कालीनों और इनसे जुड़े अन्य उत्पादों के लिए सबसे अहम बाज़ार हैं.

शिपमेंट की लागत और हवाई मार्ग में बढ़ोतरी

कश्मीर चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (KCC&I) के अध्यक्ष, जावेद अहमद टेंगा ने कहा कि यह स्थिति अभूतपूर्व है, और व्यापार का पारंपरिक चक्र पूरी तरह से बाधित हो गया है. "परंपरागत रूप से, रमज़ान का महीना खाड़ी देशों में बिक्री और भुगतान का सबसे व्यस्त और अहम समय माना जाता है. इसी दौरान, कश्मीरी निर्यातकों को पूरे साल किए गए शिपमेंट के बदले अपनी वार्षिक कमाई का एक बड़ा हिस्सा प्राप्त होता है. मौजूदा अस्थिरता के कारण, न केवल बैंकिंग और व्यापारिक भुगतान के रास्ते बाधित हुए हैं, बल्कि खरीदारों से आने वाले नए ऑर्डर भी लगभग पूरी तरह से ठप पड़ गए हैं."

इससे कश्मीर के हज़ारों एक्सपोर्टर्स, कारीगरों और बुनकरों के लिए एक अभूतपूर्व लिक्विडिटी संकट पैदा हो गया है. इन्होंने भरोसे के साथ अपना सामान भेजा था, लेकिन अब उनके पास एक्सपोर्ट के बकाया बिल, बढ़ता ब्याज़ का बोझ और इस बात की कोई पक्की जानकारी नहीं है कि पेमेंट कब आएगी. ऑर्डर्स का आना बंद होना इस समय सबसे बड़ी चिंता है, क्योंकि इसका सीधा असर भविष्य के प्रोडक्शन साइकल और पूरे सेक्टर में रोज़गार पर पड़ता है.

"इस व्यापार से हमारे कई परिवार जुड़े हुए हैं-बुनकरों से लेकर धोने वालों तक, और डीलरों से लेकर निर्यातकों तक. और अगर कोई ऑर्डर नहीं आता है, तो हम सभी को मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा." श्रीनगर के एक एक्सपोर्टर, फ़ारूक़ अहमद ने हालात की गंबीरता दर्शाते हुवे कहा कि पहलगाम हमले के बाद पर्यटकों की आमद में पहले ही कमी आ गई थी. 

आमतौर पर पर्यटक सीज़न शुरू होने के साथ ही मांग में भी तेज़ी आती है, लेकिन इस साल स्थिति पूरी तरह से उलट थी. “ऑर्डर पूरी तरह से बंद हो गए हैं. इस क्षेत्र में बनी अनिश्चितता के कारण खरीदार नए सामान खरीदने का कोई पक्का वादा नहीं कर रहे हैं. यहां तक कि हमारे पुराने ग्राहक भी अपने फ़ैसले टाल रहे हैं. इसके अलावा, पेमेंट्स में भी देरी हो रही है, इसलिए हम दोनों तरफ़ से मार झेल रहे हैं – न तो पैसा आ रहा है और न ही कोई नया बिज़नेस मिल रहा है.”

बढ़ोतरी के कारण बढ़ीं शिपमेंट की लागत

उन्होंने कहा, इस संकट की गंभीरता शिपमेंट की लागत में हुई भारी बढ़ोतरी के कारण और भी बढ़ गई है. हवाई मार्गों में आई रुकावट, जोखिम की बढ़ी हुई आशंका और इंश्योरेंस प्रीमियम में हुई वृद्धि के चलते इंटरनेशनल कार्गो की दरें तेज़ी से बढ़ी हैं. 

एक्सपोर्टर्स का कहना है कि युद्ध के कारण कच्चे माल की कीमतें तो बढ़ी ही हैं, साथ ही हवाई और समुद्री, दोनों तरह के माल-भाड़े में भी काफ़ी बढ़ोतरी हुई है. इससे वैश्विक बाज़ारों में उनकी प्रतिस्पर्धी क्षमता और भी कमज़ोर हो गई है.

इन चुनौतियों को और भी बढ़ाने वाली बात यह है कि दुबई में स्थित ‘ग्लोबल विलेज’ लगभग 15 दिनों के लिए बंद हो गया है. यह एक प्रमुख इंटरनेशनल रिटेल प्लेटफ़ॉर्म है, जहां कश्मीर के कई व्यापारी अपने उत्पादों की प्रदर्शनी लगाते हैं और उन्हें बेचते हैं. इस बंदी के कारण बिक्री का एक अहम ज़रिया, ठीक ऐसे समय में बंद हो गया है जब उसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी. इसका सीधा असर व्यापारियों की आमदनी पर पड़ा है. इस संकट का असर पूरी उत्पादन से लेकर बिक्री तक की पूरी प्रक्रिया पर पड़ रहा है. 

एक्सपोर्टर्स को अपना काम-काज जारी रखने में भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है, व्यापारियों की बिक्री में लगातार गिरावट आ रही है, और कारीगरों व बुनकरों के पास काम कम हो गया है, साथ ही उन्हें अपनी मज़दूरी मिलने में भी देरी हो रही है.

उत्पादन और बिक्री पर असर

जम्मू-कश्मीर से होने वाले हस्तशिल्प के एक्सपोर्ट में पहले ही भारी गिरावट आ चुकी है. वर्ष 2013 में यह आंकड़ा लगभग 1700 करोड़ रुपये था, जो घटकर वर्ष 2024-25 में 733 करोड़ रुपये रह गया है – यानी इसमें लगभग 57 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की गई है. उद्योग से जुड़े लोगों ने चेतावनी दी है कि मौजूदा भू-राजनीतिक तनाव इस क्षेत्र को और भी गहरे संकट में धकेल सकता है.

पश्चिम एशिया में अनिश्चितता बनी रहने और निकट भविष्य में इसका कोई समाधान नज़र न आने के कारण, निर्यातकों को डर है कि लंबे समय तक जारी रहने वाली यह बाधा बाज़ारों को स्थायी रूप से खोने का कारण बन सकती है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय खरीदार सामान खरीदने के लिए दूसरे विकल्पों की ओर रुख कर सकते हैं.

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