कैसे लागू होता है DLS नियम, इंटरनेशनल क्रिकेट में कैसे आया? जानें ICC के इस रूल के बारे में सबकुछ

क्रिकेट में निष्पक्षता बनाए रखने के लिए समय-समय पर नए नियम लाए जाते रहे हैं. इन्हीं में से एक नियम का नाम 'डकवर्थ लुईस' है, जो अपने नाम की तरह बहुत जटिल प्रतीत होता है. इसे DLS के नाम से भी जाना जाता है और इसका इस्तेमाल आमतौर पर बारिश से प्रभावित मैचों में किया जाता है. क्या आप डीएलएस को अच्छे से समझते हैं? क्या आपको पता है कि डीएलएस रूल लागू कैसे किया जाता है? अगर नहीं, तो यहां आपको इन सवालों के जवाब मिलेंगे. सबसे पहले जान लेते हैं कि आखिर यह DLS रूल है क्या? दरअसल जब किसी मैच में बारिश, तूफान या किसी अन्य कारण से ओवरों में कटौती कर दी जाती है, तब मुकाबले में निष्पक्षता बनाए रखते हुए लक्ष्य का पीछा कर रही टीम को DLS प्रक्रिया से एक नया टारगेट दिया जाता है. कैसे आया DLS नियम? क्रिकेट के खेल में बारिश से प्रभावित मैचों में निष्पक्षता बनाए रखने के लिए नए-नए नियम लाए जाते रहे, लेकिन समय-समय पर विवाद उठते रहे. फ्रैंक डकवर्थ और टोनी लुईस नाम के दो ब्रिटिश सांख्यिकीविदों ने डीएलएस नियम की खोज की थी. उन्होंने 1992 ODI वर्ल्ड कप के सेमीफाइनल मैच में हुए विवाद के बाद इस नियम पर विचार करना शुरू किया था. उस सेमीफाइनल मैच में दक्षिण अफ्रीका को 13 गेंद में 22 रन बनाने थे, वहीं जब बारिश के बाद दोबारा मैच शुरू हुआ तो दक्षिण अफ्रीका को 1 गेंद में 21 रन बनाने थे. फ्रैंक डकवर्थ और टोनी लुईस के उपनामों को जोड़कर 'डकवर्थ लुईस रूल' नाम दिया गया. अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (ICC) ने आखिरकार साल 1999 में टारगेट का स्कोर रीसेट करने के लिए DLS रूल को अपनाया था. पहली बार इस नियम का इस्तेमाल जनवरी 1997 में हुए इंग्लैंड बनाम जिम्बाब्वे मैच में किया गया था. इतने सालों तक इस्तेमाल होने के बाद भी DLS रूल को लेकर सवाल उठते रहे हैं. कैसे लागू होता है DLR रूल? DLS पद्धति में बचे हुए विकेट और बचे हुए ओवरों के आधार पर गणना की जाती है. इसमें रिसोर्स पर भी ध्यान दिया जाता है, जिसके लिए खास टेबल तैयार की गई है. जब भी मैच किसी कारणवश रोका जाता है, तब चेज करने वाली टीम के बचे हुए विकेट और बचे ओवरों के आधार पर नया टारगेट सेट किया जाता है. उदाहरण के तौर पर यदि कोई टीम 50 ओवरों में 300 रन बनाती है. इसके जवाब में दूसरी टीम ने 20 ओवरों के खेल में 2 विकेट गंवा दिए हैं और तभी बारिश मैच में विघ्न डाल देती है. तो टारगेट का पीछा करने वाली टीम के पास 88.1 प्रतिशत रिसोर्स बचे होंगे. नया टारगेट सेट करने के लिए पहली टीम के स्कोर को उस संख्या से गुणा किया जाएगा, जो दूसरी टीम के बचे रिसोर्स को 100 से भाग करने पर आएगी.  यह भी पढ़ें: टीम इंडिया पर टूटा मुसीबतों का पहाड़! दो तेज गेंदबाज पहले थे चोटिल, अब बुमराह को लेकर भी आई बुरी खबर

Jul 20, 2025 - 18:30
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कैसे लागू होता है DLS नियम, इंटरनेशनल क्रिकेट में कैसे आया? जानें ICC के इस रूल के बारे में सबकुछ

क्रिकेट में निष्पक्षता बनाए रखने के लिए समय-समय पर नए नियम लाए जाते रहे हैं. इन्हीं में से एक नियम का नाम 'डकवर्थ लुईस' है, जो अपने नाम की तरह बहुत जटिल प्रतीत होता है. इसे DLS के नाम से भी जाना जाता है और इसका इस्तेमाल आमतौर पर बारिश से प्रभावित मैचों में किया जाता है. क्या आप डीएलएस को अच्छे से समझते हैं? क्या आपको पता है कि डीएलएस रूल लागू कैसे किया जाता है? अगर नहीं, तो यहां आपको इन सवालों के जवाब मिलेंगे.

सबसे पहले जान लेते हैं कि आखिर यह DLS रूल है क्या? दरअसल जब किसी मैच में बारिश, तूफान या किसी अन्य कारण से ओवरों में कटौती कर दी जाती है, तब मुकाबले में निष्पक्षता बनाए रखते हुए लक्ष्य का पीछा कर रही टीम को DLS प्रक्रिया से एक नया टारगेट दिया जाता है.

कैसे आया DLS नियम?

क्रिकेट के खेल में बारिश से प्रभावित मैचों में निष्पक्षता बनाए रखने के लिए नए-नए नियम लाए जाते रहे, लेकिन समय-समय पर विवाद उठते रहे. फ्रैंक डकवर्थ और टोनी लुईस नाम के दो ब्रिटिश सांख्यिकीविदों ने डीएलएस नियम की खोज की थी. उन्होंने 1992 ODI वर्ल्ड कप के सेमीफाइनल मैच में हुए विवाद के बाद इस नियम पर विचार करना शुरू किया था. उस सेमीफाइनल मैच में दक्षिण अफ्रीका को 13 गेंद में 22 रन बनाने थे, वहीं जब बारिश के बाद दोबारा मैच शुरू हुआ तो दक्षिण अफ्रीका को 1 गेंद में 21 रन बनाने थे.

फ्रैंक डकवर्थ और टोनी लुईस के उपनामों को जोड़कर 'डकवर्थ लुईस रूल' नाम दिया गया. अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (ICC) ने आखिरकार साल 1999 में टारगेट का स्कोर रीसेट करने के लिए DLS रूल को अपनाया था. पहली बार इस नियम का इस्तेमाल जनवरी 1997 में हुए इंग्लैंड बनाम जिम्बाब्वे मैच में किया गया था. इतने सालों तक इस्तेमाल होने के बाद भी DLS रूल को लेकर सवाल उठते रहे हैं.

कैसे लागू होता है DLR रूल?

DLS पद्धति में बचे हुए विकेट और बचे हुए ओवरों के आधार पर गणना की जाती है. इसमें रिसोर्स पर भी ध्यान दिया जाता है, जिसके लिए खास टेबल तैयार की गई है. जब भी मैच किसी कारणवश रोका जाता है, तब चेज करने वाली टीम के बचे हुए विकेट और बचे ओवरों के आधार पर नया टारगेट सेट किया जाता है.

उदाहरण के तौर पर यदि कोई टीम 50 ओवरों में 300 रन बनाती है. इसके जवाब में दूसरी टीम ने 20 ओवरों के खेल में 2 विकेट गंवा दिए हैं और तभी बारिश मैच में विघ्न डाल देती है. तो टारगेट का पीछा करने वाली टीम के पास 88.1 प्रतिशत रिसोर्स बचे होंगे. नया टारगेट सेट करने के लिए पहली टीम के स्कोर को उस संख्या से गुणा किया जाएगा, जो दूसरी टीम के बचे रिसोर्स को 100 से भाग करने पर आएगी. 

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