'उदयपुर फाइल्स' को रोकने कोर्ट पहुंचा मुस्लिम संगठन, मद्रास हाईकोर्ट में जमीअत उलमा ने दायर की याचिका
जमीअत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी के निर्देश और दारुल उलूम देवबंद के मोहतमिम मौलाना अबुल कासिम नोमानी की सलाह पर, जमीअत उलमा तमिलनाडु ने फिल्म 'उदयपुर फाइल्स' की प्रस्तावित रिलीज के खिलाफ मद्रास हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका (पीआईएल) दायर की है. यह याचिका जमीयत उलमा तमिलनाडु के महासचिव हाजी हसन अहमद की तरफ से दायर की गई है. याचिकाकर्ता ने अदालत से अनुरोध किया है कि वह राज्य सरकार, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) को निर्देश दें कि फिल्म की रिलीज को तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाए और इसकी विषयवस्तु की कानूनी दायरे के भीतर दोबारा समीक्षा कर आवश्यक संशोधन किए जाएं. याचिकाकर्ता ने आशंका जताई है कि फिल्म की विषयवस्तु अत्यधिक भड़काऊ और घृणास्पद है, जो देश में सांप्रदायिक सद्भाव को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचा सकती है. मुसलमानों को गलत दिखाने की कोशिश ट्रेलर और मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, फिल्म में एक संवेदनशील सांप्रदायिक घटना को सनसनीखेज तरीके से पेश किया गया है और मुसलमानों को एक कट्टरपंथी, निर्दयी और आतंकवाद से जुड़े समुदाय के रूप में दिखाया गया है. सबसे दुखद बात यह है कि फिल्म के ट्रेलर में दारुल उलूम देवबंद जैसे प्रतिष्ठित धार्मिक संस्थान को निशाना बनाया गया है. वहीं रिपोर्ट के मुताबिक, 'सर तन से जुदा' के नारे को सीधे देवबंद से जोड़ते हुए, एक ऐसे व्यक्ति को दिखाया गया है, जो दारुल उलूम के एक प्रमुख जिम्मेदार से मिलता-जुलता है और केवल एक संस्थान नहीं, बल्कि मुस्लिम समुदाय के एक शैक्षणिक और आध्यात्मिक केंद्र पर गंभीर हमला है. भाजपा की पूर्व प्रवक्ता का बयान भी फिल्म में शामिल याचिकाकर्ता ने कहा कि फिल्म का सबसे आपत्तिजनक पहलू यह है कि भाजपा की एक पूर्व प्रवक्ता की ओर से पैगंबर मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की शान में उस आपत्तिजनक बयान को शामिल किया गया है, जिस पर वैश्विक पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन हुए और उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया. केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड फिर से करे फिल्म का मूल्यांकनयाचिकाकर्ता का कहना है कि हालांकि भारत का संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है, लेकिन इस स्वतंत्रता के लिए सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और राष्ट्रीय एकता की सुरक्षा के लिए संवैधानिक सीमाएं भी निर्धारित हैं. उन्होंने पक्ष रखा है कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) ने फिल्म के मूल्यांकन और मंजूरी देने में अपनी संवैधानिक और कानूनी जिम्मेदारियों का पालन करने में लापरवाही बरती है. ये भी पढ़ें:-
जमीअत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी के निर्देश और दारुल उलूम देवबंद के मोहतमिम मौलाना अबुल कासिम नोमानी की सलाह पर, जमीअत उलमा तमिलनाडु ने फिल्म 'उदयपुर फाइल्स' की प्रस्तावित रिलीज के खिलाफ मद्रास हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका (पीआईएल) दायर की है. यह याचिका जमीयत उलमा तमिलनाडु के महासचिव हाजी हसन अहमद की तरफ से दायर की गई है.
याचिकाकर्ता ने अदालत से अनुरोध किया है कि वह राज्य सरकार, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) को निर्देश दें कि फिल्म की रिलीज को तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाए और इसकी विषयवस्तु की कानूनी दायरे के भीतर दोबारा समीक्षा कर आवश्यक संशोधन किए जाएं. याचिकाकर्ता ने आशंका जताई है कि फिल्म की विषयवस्तु अत्यधिक भड़काऊ और घृणास्पद है, जो देश में सांप्रदायिक सद्भाव को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचा सकती है.
मुसलमानों को गलत दिखाने की कोशिश
ट्रेलर और मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, फिल्म में एक संवेदनशील सांप्रदायिक घटना को सनसनीखेज तरीके से पेश किया गया है और मुसलमानों को एक कट्टरपंथी, निर्दयी और आतंकवाद से जुड़े समुदाय के रूप में दिखाया गया है. सबसे दुखद बात यह है कि फिल्म के ट्रेलर में दारुल उलूम देवबंद जैसे प्रतिष्ठित धार्मिक संस्थान को निशाना बनाया गया है.
वहीं रिपोर्ट के मुताबिक, 'सर तन से जुदा' के नारे को सीधे देवबंद से जोड़ते हुए, एक ऐसे व्यक्ति को दिखाया गया है, जो दारुल उलूम के एक प्रमुख जिम्मेदार से मिलता-जुलता है और केवल एक संस्थान नहीं, बल्कि मुस्लिम समुदाय के एक शैक्षणिक और आध्यात्मिक केंद्र पर गंभीर हमला है.
भाजपा की पूर्व प्रवक्ता का बयान भी फिल्म में शामिल
याचिकाकर्ता ने कहा कि फिल्म का सबसे आपत्तिजनक पहलू यह है कि भाजपा की एक पूर्व प्रवक्ता की ओर से पैगंबर मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की शान में उस आपत्तिजनक बयान को शामिल किया गया है, जिस पर वैश्विक पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन हुए और उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया.
केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड फिर से करे फिल्म का मूल्यांकन
याचिकाकर्ता का कहना है कि हालांकि भारत का संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है, लेकिन इस स्वतंत्रता के लिए सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और राष्ट्रीय एकता की सुरक्षा के लिए संवैधानिक सीमाएं भी निर्धारित हैं. उन्होंने पक्ष रखा है कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) ने फिल्म के मूल्यांकन और मंजूरी देने में अपनी संवैधानिक और कानूनी जिम्मेदारियों का पालन करने में लापरवाही बरती है.
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