World Diabetes Day 2025: हार्ट-किडनी के साथ फ्लेक्सिबिलिटी पर भी असर डालता है हाई ब्लड शुगर, जानें कितना होता है नुकसान?
भारत में डायबिटीज का संकट तेजी से बढ़ रहा है. अब यह सिर्फ बुजुर्गों की बीमारी नहीं रही, बल्कि युवा पीढ़ी भी इससे प्रभावित हो रही है. आईसीएमआर-इंडियाबी अध्ययन के अनुसार, 2000 में भारत में 32 मिलियन लोग डायबिटीज से पीड़ित थे, जबकि आज यह संख्या बढ़कर 101 मिलियन हो गई है. सबसे चिंता की बात यह है कि युवा लोग भी टाइप 2 डायबिटीज की चपेट में आ रहे हैं. इसका मुख्य कारण हमारा डेली रूटीन और लाइफस्टाइल में बदलाव है. जैसे कि ज्यादा बैठने वाला डेली रूटीन, मोटापा, ज्यादा कार्बोहाइड्रेट वाला खाना और पारिवारिक इतिहास. ज्यादातर लोग जानते हैं कि डायबिटीज आंखों, दिल, किडनी और नर्वस को नुकसान पहुंचा सकती है. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि यह हमारी मोबिलिटी और शरीर की फ्लेक्सिबिलिटी को भी प्रभावित करती है. हेल्थकेयर लिमिटेड के ऑर्थोपेडिक और मोबिलिटी एड्स एक्सपर्ट, बताते हैं कि हम अक्सर डायबिटीज को आंखों, किडनी और नसों की समस्या से जोड़ते हैं. लेकिन यह शरीर के जोड़ों और रीढ़ की हड्डी को भी धीरे-धीरे प्रभावित करती है, जिससे फ्लेक्सिबिलिटी कम होती है और रोजमर्रा की एक्टिविटी मुश्किल हो जाती हैं. हाई ब्लड शुगर और किडनी का कनेक्शन जब शरीर में ब्लड शुगर बहुत ज्यादा रहता है, तो यह सिर्फ आंखों और किडनी की माइक्रोस्कोपिक ब्लड वेसल्स को ही नुकसान नहीं पहुंचाता, बल्कि रीढ़ की हड्डी तक पोषण पहुंचाने वाली ब्लड वेसल्स को भी प्रभावित करता है. अनकंट्रोल शुगर रीढ़ की डिस्क और Vertebral Column तक पोषक तत्व नहीं पहुंचने देता, समय के साथ, इससे डिस्क कमजोर हो जाती हैं, कुशनिंग क्षमता कम हो जाती है और पीठ दर्द या चोट का खतरा बढ़ जाता है. अध्ययन बताते हैं कि डायबिटीज वाले लोगों में रीढ़ की डिस्क का खतरा तेज होता है, जिससे लंबे समय में पठ्ठियों और रीढ़ में दर्द बढ़ जाता है. हाई ब्लड शुगर से फ्लेक्सिबिलिटी प्रभावित लंबे समय तक डायबिटीज रहने से हाथ और उंगलियों में एक बीमारी हो सकती है जिसे डायबिटिक काइरोआर्थ्रोपैथी कहते हैं. इसके शुरुआत में यह हल्का दर्द या थकान लग सकता है. इससे धीरे-धीरे उंगलियों और हाथों की फ्लेक्सिबिलिटी कम हो जाती है. रोजमर्रा के काम जैसे बटन लगाना, वस्तुएं पकड़ना या हाथ हिलाना मुश्किल हो जाता है. इसके पीछे मुख्य कारण कोलेजन प्रोटीन में बदलाव है. हाई ब्लड शुगर कोलेजन को कठोर और कम फ्लेक्सिबल बना देता है. साथ ही छोटी ब्लड वेसल्स भी प्रभावित होती हैं, जिससे हाथ और स्किन सख्त हो जाते हैं. हाई ब्लड शुगर में मोबिलिटी और फ्लेक्सिबिलिटी कैसे बनाए 1. एक्सरसाइज और योग – नियमित चलना, तेज चलना, स्विमिंग और हल्की एक्सरसाइज 2. बैलेंस डाइट - कम चीनी और हाई ग्लाइसेमिक फूड्स से बचें. 3. आर्थोपेडिक सहायता – विशेष उपकरण जोड़ों और रीढ़ की हड्डी की सुरक्षा के लिए सहायक बेल्ट और रैप, रीढ़ को स्थिर रखते हैं और पीठ पर दबाव कम करते हैं. एर्गोनोमिक कुशन बैठने और सोने के दौरान रीढ़ के उचित संरेखण को बनाए रखते हैं. कलाई और अंगूठे के ब्रेसेज हाथों और कलाई पर दबाव कम करते हैं. 4. एक्सपर्ट्स की राय - नियमित एक्सरसाइज और सही लाइफस्टाइल के साथ आर्थोपेडिक सहायता जोड़ने से हाई ब्लड शुगर के कारण जोड़ों और हड्डियों के नुकसान को कम किया जा सकता है. यह भी पढ़ें Eyelash Lice Case Gujarat: गुजरात की इस महिला की पलकों में 250 जुओं ने बनाया घर, जानें इससे कैसे मिली निजात? Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
भारत में डायबिटीज का संकट तेजी से बढ़ रहा है. अब यह सिर्फ बुजुर्गों की बीमारी नहीं रही, बल्कि युवा पीढ़ी भी इससे प्रभावित हो रही है. आईसीएमआर-इंडियाबी अध्ययन के अनुसार, 2000 में भारत में 32 मिलियन लोग डायबिटीज से पीड़ित थे, जबकि आज यह संख्या बढ़कर 101 मिलियन हो गई है. सबसे चिंता की बात यह है कि युवा लोग भी टाइप 2 डायबिटीज की चपेट में आ रहे हैं. इसका मुख्य कारण हमारा डेली रूटीन और लाइफस्टाइल में बदलाव है. जैसे कि ज्यादा बैठने वाला डेली रूटीन, मोटापा, ज्यादा कार्बोहाइड्रेट वाला खाना और पारिवारिक इतिहास.
ज्यादातर लोग जानते हैं कि डायबिटीज आंखों, दिल, किडनी और नर्वस को नुकसान पहुंचा सकती है. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि यह हमारी मोबिलिटी और शरीर की फ्लेक्सिबिलिटी को भी प्रभावित करती है. हेल्थकेयर लिमिटेड के ऑर्थोपेडिक और मोबिलिटी एड्स एक्सपर्ट, बताते हैं कि हम अक्सर डायबिटीज को आंखों, किडनी और नसों की समस्या से जोड़ते हैं. लेकिन यह शरीर के जोड़ों और रीढ़ की हड्डी को भी धीरे-धीरे प्रभावित करती है, जिससे फ्लेक्सिबिलिटी कम होती है और रोजमर्रा की एक्टिविटी मुश्किल हो जाती हैं.
हाई ब्लड शुगर और किडनी का कनेक्शन
जब शरीर में ब्लड शुगर बहुत ज्यादा रहता है, तो यह सिर्फ आंखों और किडनी की माइक्रोस्कोपिक ब्लड वेसल्स को ही नुकसान नहीं पहुंचाता, बल्कि रीढ़ की हड्डी तक पोषण पहुंचाने वाली ब्लड वेसल्स को भी प्रभावित करता है.
अनकंट्रोल शुगर रीढ़ की डिस्क और Vertebral Column तक पोषक तत्व नहीं पहुंचने देता, समय के साथ, इससे डिस्क कमजोर हो जाती हैं, कुशनिंग क्षमता कम हो जाती है और पीठ दर्द या चोट का खतरा बढ़ जाता है. अध्ययन बताते हैं कि डायबिटीज वाले लोगों में रीढ़ की डिस्क का खतरा तेज होता है, जिससे लंबे समय में पठ्ठियों और रीढ़ में दर्द बढ़ जाता है.
हाई ब्लड शुगर से फ्लेक्सिबिलिटी प्रभावित
लंबे समय तक डायबिटीज रहने से हाथ और उंगलियों में एक बीमारी हो सकती है जिसे डायबिटिक काइरोआर्थ्रोपैथी कहते हैं. इसके शुरुआत में यह हल्का दर्द या थकान लग सकता है. इससे धीरे-धीरे उंगलियों और हाथों की फ्लेक्सिबिलिटी कम हो जाती है. रोजमर्रा के काम जैसे बटन लगाना, वस्तुएं पकड़ना या हाथ हिलाना मुश्किल हो जाता है. इसके पीछे मुख्य कारण कोलेजन प्रोटीन में बदलाव है. हाई ब्लड शुगर कोलेजन को कठोर और कम फ्लेक्सिबल बना देता है. साथ ही छोटी ब्लड वेसल्स भी प्रभावित होती हैं, जिससे हाथ और स्किन सख्त हो जाते हैं.
हाई ब्लड शुगर में मोबिलिटी और फ्लेक्सिबिलिटी कैसे बनाए
1. एक्सरसाइज और योग – नियमित चलना, तेज चलना, स्विमिंग और हल्की एक्सरसाइज
2. बैलेंस डाइट - कम चीनी और हाई ग्लाइसेमिक फूड्स से बचें.
3. आर्थोपेडिक सहायता – विशेष उपकरण जोड़ों और रीढ़ की हड्डी की सुरक्षा के लिए सहायक बेल्ट और रैप, रीढ़ को स्थिर रखते हैं और पीठ पर दबाव कम करते हैं. एर्गोनोमिक कुशन बैठने और सोने के दौरान रीढ़ के उचित संरेखण को बनाए रखते हैं. कलाई और अंगूठे के ब्रेसेज हाथों और कलाई पर दबाव कम करते हैं.
4. एक्सपर्ट्स की राय - नियमित एक्सरसाइज और सही लाइफस्टाइल के साथ आर्थोपेडिक सहायता जोड़ने से हाई ब्लड शुगर के कारण जोड़ों और हड्डियों के नुकसान को कम किया जा सकता है.
यह भी पढ़ें Eyelash Lice Case Gujarat: गुजरात की इस महिला की पलकों में 250 जुओं ने बनाया घर, जानें इससे कैसे मिली निजात?
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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