Urban Heat Island Effect: हीट आइलैंड इफेक्ट! शहरों में तापमान गांव से 5 डिग्री ज़्यादा क्यों है?

शहरों में तापमान का बढ़ना अब एक आम समस्या बन गई है. ग्रामीण इलाकों की तुलना में शहरों का तापमान कई डिग्री ज़्यादा रहता है. इस स्थिति को ही शहरी हीट आइलैंड प्रभाव कहा जाता है. दिन के समय यह अंतर लगभग 3 डिग्री सेल्सियस और रात में 10 डिग्री तक हो सकता है. इसका मुख्य कारण यह है कि शहरों में इमारतें, सड़कें और वाहन गर्मी को सोख लेते हैं और उसे देर तक रोक कर रखते हैं. दूसरी तरफ, हरियाली और पेड़ों की कमी से प्राकृतिक ठंडक खत्म हो जाती है. यही वजह है कि शहर दिन-रात गर्म बने रहते हैं. हीट आइलैंड की स्थिति तब बनती है जब इंसान की ओर से बनाई गई चीजें प्रकृति पर हावी होने लगती हैं. शहरों की सड़कों पर डामर और कंक्रीट की मोटी परतें सूरज की किरणों को सोख लेती हैं. ऊंची इमारतें हवा के रास्ते को रोक देती हैं, जिससे गर्मी बाहर नहीं निकल पाती. गाड़ियों, कारखानों और AC जैसी मशीनों से निकलने वाली गर्मी भी तापमान को लगातार बढ़ाती रहती है. ऊपर से पेड़-पौधों की कमी इस गर्मी को संतुलित नहीं कर पाती. परिणामस्वरूप पूरा शहर एक गर्म द्वीप की तरह महसूस होने लगता है. बढ़ते तापमान के नुकसान शहरी हीट आइलैंड प्रभाव केवल असुविधा नहीं लाता, बल्कि यह लोगों की सेहत, पर्यावरण और अर्थव्यवस्था पर भी असर डालता है. तेज गर्मी के कारण एयर कंडीशनर का इस्तेमाल बढ़ता है, जिससे बिजली की खपत और खर्च दोनों बढ़ जाते हैं. मानव शरीर पर भी इसका गंभीर असर पड़ता है. लू लगना, थकावट, सांस और हृदय संबंधी बीमारियां आम हो जाती हैं. गर्म हवा और धूल मिलकर प्रदूषण का स्तर बढ़ाती हैं, जिससे ओज़ोन और स्मॉग जैसी समस्याएं पैदा होती हैं.  इसके अलावा, इस प्रभाव से वर्षा का पैटर्न बिगड़ता है, मिट्टी की नमी घटती है और आसपास के पारिस्थितिक तंत्र पर बुरा असर पड़ता है. शहरों को ठंडा रखने के उपाय अगर शहरों की योजना समझदारी से बनाई जाए तो हीट आइलैंड के असर को कम किया जा सकता है. इमारतों की छतों पर पौधे लगाए जा सकते हैं, जिन्हें “ग्रीन रूफ” कहा जाता है. ये न केवल ठंडक बनाए रखते हैं बल्कि हवा को भी शुद्ध करते हैं. सफेद या परावर्तक छतों का उपयोग भी सूरज की किरणों को वापस भेजने में मदद करता है. सड़कों और पार्कों में पेड़ लगाना, जलाशयों को सुरक्षित रखना और खुले स्थान छोड़ना भी बेहद जरूरी है. एनर्जी इफिसिएंट बिल्डिंग जिनमें प्राकृतिक रोशनी और वेंटिलेशन का ध्यान रखा गया हो, गर्मी को काफी हद तक कम कर सकती हैं. अहमदाबाद और ठाणे जैसे शहरों ने हीट एक्शन प्लान बनाकर इस दिशा में सराहनीय कदम उठाए हैं. ये भी पढ़ें: खालिस्तानी समर्थकों की दिलजीत दोसांझ को खुली धमकी- 'शो रद्द कर दो वरना...'

Nov 10, 2025 - 13:30
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Urban Heat Island Effect: हीट आइलैंड इफेक्ट! शहरों में तापमान गांव से 5 डिग्री ज़्यादा क्यों है?

शहरों में तापमान का बढ़ना अब एक आम समस्या बन गई है. ग्रामीण इलाकों की तुलना में शहरों का तापमान कई डिग्री ज़्यादा रहता है. इस स्थिति को ही शहरी हीट आइलैंड प्रभाव कहा जाता है. दिन के समय यह अंतर लगभग 3 डिग्री सेल्सियस और रात में 10 डिग्री तक हो सकता है. इसका मुख्य कारण यह है कि शहरों में इमारतें, सड़कें और वाहन गर्मी को सोख लेते हैं और उसे देर तक रोक कर रखते हैं. दूसरी तरफ, हरियाली और पेड़ों की कमी से प्राकृतिक ठंडक खत्म हो जाती है. यही वजह है कि शहर दिन-रात गर्म बने रहते हैं.

हीट आइलैंड की स्थिति तब बनती है जब इंसान की ओर से बनाई गई चीजें प्रकृति पर हावी होने लगती हैं. शहरों की सड़कों पर डामर और कंक्रीट की मोटी परतें सूरज की किरणों को सोख लेती हैं. ऊंची इमारतें हवा के रास्ते को रोक देती हैं, जिससे गर्मी बाहर नहीं निकल पाती. गाड़ियों, कारखानों और AC जैसी मशीनों से निकलने वाली गर्मी भी तापमान को लगातार बढ़ाती रहती है. ऊपर से पेड़-पौधों की कमी इस गर्मी को संतुलित नहीं कर पाती. परिणामस्वरूप पूरा शहर एक गर्म द्वीप की तरह महसूस होने लगता है.

बढ़ते तापमान के नुकसान

शहरी हीट आइलैंड प्रभाव केवल असुविधा नहीं लाता, बल्कि यह लोगों की सेहत, पर्यावरण और अर्थव्यवस्था पर भी असर डालता है. तेज गर्मी के कारण एयर कंडीशनर का इस्तेमाल बढ़ता है, जिससे बिजली की खपत और खर्च दोनों बढ़ जाते हैं. मानव शरीर पर भी इसका गंभीर असर पड़ता है. लू लगना, थकावट, सांस और हृदय संबंधी बीमारियां आम हो जाती हैं. गर्म हवा और धूल मिलकर प्रदूषण का स्तर बढ़ाती हैं, जिससे ओज़ोन और स्मॉग जैसी समस्याएं पैदा होती हैं.  इसके अलावा, इस प्रभाव से वर्षा का पैटर्न बिगड़ता है, मिट्टी की नमी घटती है और आसपास के पारिस्थितिक तंत्र पर बुरा असर पड़ता है.

शहरों को ठंडा रखने के उपाय

अगर शहरों की योजना समझदारी से बनाई जाए तो हीट आइलैंड के असर को कम किया जा सकता है. इमारतों की छतों पर पौधे लगाए जा सकते हैं, जिन्हें “ग्रीन रूफ” कहा जाता है. ये न केवल ठंडक बनाए रखते हैं बल्कि हवा को भी शुद्ध करते हैं. सफेद या परावर्तक छतों का उपयोग भी सूरज की किरणों को वापस भेजने में मदद करता है. सड़कों और पार्कों में पेड़ लगाना, जलाशयों को सुरक्षित रखना और खुले स्थान छोड़ना भी बेहद जरूरी है. एनर्जी इफिसिएंट बिल्डिंग जिनमें प्राकृतिक रोशनी और वेंटिलेशन का ध्यान रखा गया हो, गर्मी को काफी हद तक कम कर सकती हैं. अहमदाबाद और ठाणे जैसे शहरों ने हीट एक्शन प्लान बनाकर इस दिशा में सराहनीय कदम उठाए हैं.

ये भी पढ़ें: खालिस्तानी समर्थकों की दिलजीत दोसांझ को खुली धमकी- 'शो रद्द कर दो वरना...'

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