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    <title>Attention India Hindi &amp; : टेक्नोलॉजी</title>
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    <description>Attention India Hindi &amp; : टेक्नोलॉजी</description>
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    <dc:rights>Copyright 2024 Attention India&amp; All Rights Reserved.</dc:rights>
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        <title>स्मार्टवॉच की हरी लाइट का राज खुला! जानें हर वक्त जलती क्यों रहती है?</title>
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        <description><![CDATA[ अगर आपके पास स्मार्टवॉच या फिटनेस बैंड है तो आपने इसके पीछे लगी हरी रोशनी जरूर देखी होगी. कई बार ये लाइट लगातार जलती रहती है और देखकर लगता है कि आखिर इसका काम क्या है. क्या ये सिर्फ डिजाइन का हिस्सा है या फिर इसके पीछे कोई खास टेक्नोलॉजी काम करती है? आइए जानते हैं कि आखिर क्यों जलती रहती है ये लाइट.
हरी लाइट क्यों जलती है?
जानकारी के अनुसार, स्मार्टवॉच के पीछे लगी हरी LED मेन रूप से हार्ट रेट यानी दिल की धड़कन मापने के लिए इस्तेमाल होती है. इसके लिए घड़ी में एक टेक्नोलॉजी होती है जिसे फोटोपीथिस्मोग्राफी (PPG) कहा जाता है.
ये टेक्नोलॉजी आपकी स्किन पर रोशनी डालकर शरीर में बह रहे खून की मात्रा में होने वाले बदलावों को पहचानती है. जब दिल धड़कता है तो उस समय ब्लड का फ्लो थोड़ा बढ़ जाता है. इसी बदलाव को सेंसर लगातार रिकॉर्ड करता है और उसके आधार पर आपकी हार्ट रेट का अंदाजा लगाया जाता है.
हरी रोशनी ही क्यों होती है?
अब सवाल आता है कि स्मार्टवॉच में हरी LED ही क्यों लगाई जाती है? इसकी वजह हरी रोशनी का खून में मौजूद हीमोग्लोबिन के साथ खास तरह से इंटरैक्ट करना है. हरी रोशनी स्किन में प्रवेश करने के बाद ब्लड के फ्लो में होने वाले बदलाव को पहचानने में सेंसर की मदद करती है.
घड़ी की LED स्किन पर रोशनी डालती है और साथ मौजूद फोटोडायोड ये देखता है कि कितनी रोशनी वापस आ रही है. इस डेटा को सॉफ्टवेयर प्रोसेस करता है और उससे दिल की धड़कन की गणना की जाती है.
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हर वक्त क्यों जलती रहती है?
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि आपको ये हरी लाइट हर समय जलती हुई इसलिए दिखाई देती है क्योंकि स्मार्टवॉच लगातार आपकी हार्ट रेट मॉनिटर कर रही होती है. खासकर जब आप वर्कआउट कर रहे हों, तब सेंसर ज्यादा एक्टिव हो जाता है.
कुछ स्मार्टवॉच आराम की कंडिशन में भी समय-समय पर हार्ट रेट चेक करती हैं. इस वजह से LED थोड़ी देर के लिए जलती और फिर बंद होती दिखाई दे सकती है. लगातार जलती हुई दिखने का मतलब ये जरूरी नहीं कि सेंसर में कोई खराबी है.
क्या इससे आंखों या स्किन को नुकसान होता है?
नॉर्मली स्मार्टवॉच में इस्तेमाल होने वाली ये LED कम पावर वाली होती है और नॉर्मल इस्तेमाल के लिए डिजाइन की जाती है. इसे सीधे आंखों में चमकाने के लिए नहीं बनाया गया है. हालांकि, अगर घड़ी पहनने पर स्किन में लगातार जलन, लालिमा या असहजता महसूस हो तो उसे कुछ समय के लिए उतार देना बेहतर है.
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        <pubDate>Sun, 13 Sep 2026 13:30:11 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>यमन के आतंकियों ने AI से बनाई मिसाइल, Anthropic का चौंकाने वाला खुलासा</title>
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        <description><![CDATA[ तकनीक की दुनिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर एक बेहद चौंकाने वाला और डराने वाला मामला सामने आया है. अब तक हम सभी जानते थे कि एआई इंसानों के काम को आसान बना रहा है, लेकिन अब इसका इस्तेमाल खतरनाक हथियारों को बनाने में भी होने लगा है.
हाल ही में Anthropic ने अपनी एक रिपोर्ट में यह खुलासा किया है कि यमन के एक थ्रेट एक्टर यानी आतंकी गुट ने इंसानी सॉफ्टवेयर इंजीनियर्स की जगह उनके एआई टूल Claude AI का इस्तेमाल करके मिसाइल प्रोग्राम के लिए सॉफ्टवेयर तैयार कर लिया. इस खबर के सामने आने के बाद पूरी दुनिया के सुरक्षा विशेषज्ञों और टेक जगत में खलबली मच गई है.
तीन बड़े मिसाइल प्रोजेक्ट्स पर चल रहा था काम
Anthropic की सुरक्षा रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तरी यमन के एक सक्रिय सेल ने क्लोड एआई का इस्तेमाल तीन अलग-अलग हथियारों के प्रोग्राम को एक साथ चलाने के लिए किया. यह गुट एक गाइडेड रॉकेट, 2,000 किलोमीटर से ज्यादा की मारक क्षमता वाली बैलिस्टिक मिसाइल और आर-2000 नाम की मिसाइल सीरीज पर काम कर रहा था, जिसमें एक हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल भी शामिल है. सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इस गुट ने किसी इंसानी सॉफ्टवेयर इंजीनियर की मदद नहीं ली, बल्कि Claude AI के कई अकाउंट्स को एक साथ मिलाकर एक पूरी टीम की तरह काम पर लगा दिया.
एआई अकाउंट्स को बांट दी गई थी जिम्मेदारी
इस आतंकी सेल ने एआई का इस्तेमाल करने के लिए एक बेहद शातिर तरीका अपनाया. उन्होंने Claude AI के अलग-अलग अकाउंट को एक सीनियर इंजीनियर की तरह काम सौंप दिया. इनमें से एक एआई अकाउंट मिसाइल का कोड लिख रहा था, दूसरा अकाउंट जरूरी रिसर्च कर रहा था और तीसरा अकाउंट पहले अकाउंट द्वारा लिखे गए कोड की कमियों को चेक कर रहा था. इस तरह बिना किसी इंसानी दिमाग के ही एआई ने मिलकर मिसाइल की दिशा तय करने वाला बेहद जटिल सॉफ्टवेयर तैयार कर दिया.
चालाकी से बायपास किए गए सुरक्षा फीचर्स
हैरानी की बात यह है कि इस काम के लिए उन्होंने किसी बहुत महंगे कंप्यूटर का इस्तेमाल नहीं किया, बल्कि आम लोगों के काम आने वाले छोटे डिवाइस पर ही ओपन-सोर्स ऑटोपायलट सिस्टम को इंटीग्रेट करने के लिए क्लोड एआई की मदद ली. एआई ने न सिर्फ इस सिस्टम के लिए कोड लिखा, बल्कि उसकी सेटिंग्स तय कीं और कंप्यूटर के अंदर ही इसकी उड़ानों का डिजिटल ट्रायल यानी फ्लाइट सिमुलेशन भी करके देख लिया.&amp;nbsp;
कंपनी के सुरक्षा फिल्टर ने कई संदिग्ध रिक्वेस्ट को ब्लॉक भी किया, लेकिन इस गुट ने अपने असली मकसद को छुपाए रखा और काम को छोटे टुकड़ों में बांट दिया, जिससे एआई को कभी पता ही नहीं चल पाया कि उससे मिसाइल का सॉफ्टवेयर बनवाया जा रहा है..
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टेस्ट फेल होने पर पकड़ी गई आतंकियों की चालाकी
हालांकि, कंपनी का कहना है कि उनके पास इस बात का कोई सबूत नहीं है कि यह आतंकी गुट पूरी तरह से काम करने वाला हथियार जमीन पर तैयार कर पाया है. रिपोर्ट में बताया गया है कि इस गुट ने एक गाइडेड रॉकेट का फील्ड टेस्ट किया था जो पूरी तरह फेल हो गया.&amp;nbsp;इस टेस्ट के फेल होने के कुछ ही घंटों के भीतर यह गुट दोबारा क्लोड एआई के पास पहुंच गया और रॉकेट के फेल होने के बाद मिले डेटा को एआई के सामने रखकर खराबी का पता लगाने की कोशिश करने लगा. इसी हरकत की वजह से एंथ्रोपिक कंपनी को इस पूरे खेल की भनक लगी.
अकाउंट बैन होने पर भी कम नहीं हुआ खतरा
जैसे ही कंपनी को इस घटना का पता चला, उसने तुरंत कार्रवाई करते हुए उस सेल से जुड़े सभी क्लोड अकाउंट्स को हमेशा के लिए बैन कर दिया और इसकी जानकारी सुरक्षा एजेंसियों को बताई गई. लेकिन सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि बैन लगने से पहले ही इस गुट ने अपना काम काफी हद तक पूरा कर लिया था.&amp;nbsp;
उन्होंने मिसाइल सिस्टम का एक ऐसा डिजिटल मॉडल तैयार कर लिया है, जो अब बिना क्लोड एआई और बिना इंटरनेट के भी सीधे कंप्यूटर पर काम कर सकता है. इसका मतलब है कि एआई का एक्सेस छिन जाने के बाद भी वे इस मिसाइल प्रोग्राम पर आगे का काम जारी रख सकते हैं.
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        <pubDate>Sun, 13 Sep 2026 13:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>iPhone 17 Pro पर बड़ा ऑफर, 69,990 में खरीदने का मौका</title>
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        <description><![CDATA[ Apple ने नई iPhone 18 Pro सीरीज हाल ही में लॉन्च कर दी है. इसके साथ ही पिछले साल के Pro मॉडल को लेकर भी लोगों की दिलचस्पी बढ़ गई है. आमतौर पर नया iPhone आने के बाद पुराने मॉडल की कीमत कम होने की उम्मीद रहती है, लेकिन इस बार थोड़ा अलग है. iPhone 17 Pro पर रिटेलर Croma ने ऐसा ऑफर दिया है , जिसमें अलग-अलग फायदे जोड़ने के बाद इसकी कीमत ₹69,990 तक पहुंच रही है. यानी अगर आपके पास एक्सचेंज करने के लिए अच्छा पुराना फोन है तो यह डील आपके लिए काफी फायदेमंद हो सकती है.
पुराने मॉडल पर क्यों आया इतना बड़ा फायदा?
नई iPhone सीरीज आने के बाद ग्राहक अक्सर पिछले मॉडल की कीमत कम होने का इंतजार करते हैं. iPhone 17 Pro के मामले में भी अब यही मौका देखने को मिल रहा है. Croma पर इसके 256GB मॉडल को अलग-अलग ऑफर्स के साथ कम कीमत में खरीदा जा सकता है. यानी जिन लोगों को Apple का Pro मॉडल चाहिए, लेकिन नया iPhone 18 Pro खरीदने के लिए करीब ₹1.65 लाख खर्च नहीं करना चाहते, उनके लिए पिछली सीरीज का फोन एक ऑप्शन बन सकता है.&amp;nbsp;
&amp;nbsp;69,990 की कीमत पर मिल रहा iPhone 17 Pro
Croma की डील में iPhone 17 Pro 256GB की कीमत ₹69,990 बताई गई है. इसके फोन को एक्सचेंज करना जरूरी है. उदाहरण के तौर पर कुछ पुराने iPhone मॉडल पर ₹44,500 तक की एक्सचेंज वैल्यू मिल सकती है. इसके ऊपर ₹12,000 तक का एक्सचेंज बोनस और कुछ कार्ड पर ₹4,000 तक का बैंक कैशबैक मिल सकता है. इन सभी फायदों को जोड़ने पर कीमत काफी नीचे आ जाती है. लेकिन आपके पुराने फोन की हालत, मॉडल और एक्सचेंज वैल्यू के हिसाब से अंतिम कीमत अलग हो सकती है.
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पुराना iPhone है तो डील और भी काम की
इस ऑफर का सबसे बड़ा फायदा उन लोगों को हो सकता है जिनके पास पहले से कोई अच्छा पुराना iPhone है. मान लीजिए आपके पास ऐसा फोन है जिसकी एक्सचेंज वैल्यू अच्छी मिल रही है, तो नए iPhone के लिए अपनी जेब से देने वाले पैसे कम हो जाते है.&amp;nbsp; &amp;nbsp;फोन की कंडीशन, मॉडल और लागू ऑफर के हिसाब से मिलने वाली रकम बदल सकती है. इसलिए हर खरीदार के लिए ₹69,990 की कीमत एक जैसी नहीं होगी.
&amp;nbsp;iPhone 17 Pro अभी भी क्यों खरीदा जा सकता है?
अगर आपको सिर्फ नया मॉडल दिखाने के लिए फोन नहीं खरीदना है, तो iPhone 17 Pro अभी भी एक दमदार विकल्प है. इसमें Pro सीरीज वाला प्रीमियम हार्डवेयर और कैमरा सेटअप मिलता है. इसलिए कम कीमत पर मिलने की वजह से यह उन लोगों के लिए दिलचस्प हो सकता है जो Apple का Pro फोन चाहते हैं लेकिन नए मॉडल पर ज्यादा पैसा खर्च नहीं करना चाहते. वहीं अगर आपके लिए लेटेस्ट चिप, नए कैमरा सुधार और नए फीचर्स ज्यादा जरूरी हैं, तो iPhone 18 Pro पर जाना ज्यादा सही रहेगा. Apple के मुताबिक iPhone 18 Pro में A20 Pro चिप और नया vapor chamber भी दिया गया है.
&amp;nbsp;खरीदने से पहले बस ये हिसाब जरूर लगा लें
इस डील को लेने से पहले सबसे पहले अपने पुराने फोन की एक्सचेंज वैल्यू चेक करें. इसके बाद देखें कि आपके कार्ड पर बैंक कैशबैक लागू है या नहीं और एक्सचेंज बोनस की शर्तें क्या हैं. अगर इन सभी फायदों के बाद कीमत आपके बजट में आ रही है, तभी डील लेना फायदेमंद रहेगा. दूसरी तरफ अगर आपके पास एक्सचेंज करने के लिए फोन नहीं है, तो ₹69,990 वाली कीमत आपके लिए लागू नहीं होगी. ऐसे में iPhone 17 Pro और नए iPhone 18 Pro की कीमत और फीचर्स की तुलना करके फैसला लेना बेहतर रहेगा.
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&amp;nbsp; ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 13 Sep 2026 13:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>iPhone Duo सबसे सस्ता कहां? जानें US और Dubai में भारत से कितना फर्क</title>
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        <description><![CDATA[ Apple ने आखिरकार अपना पहला फोल्डेबल iPhone लॉन्च कर दिया है. कंपनी ने इसे iPhone Duo नाम दिया है और इसके साथ Apple ने फोल्डेबल स्मार्टफोन की दुनिया में कदम रखा है. फोन की शुरुआती कीमत ने भारत में काफी चर्चा पैदा कर दी है. ऐसे में सवाल उठता है कि iPhone Duo को भारत, अमेरिका, दुबई और हांगकांग में से कहां खरीदना सबसे सस्ता पड़ेगा? आइए जानते हैं पूरा जोड-गणित.
अमेरिका में सबसे कम कीमत
आपको बता दें कि अमेरिका में iPhone Duo की शुरुआती कीमत 1,999 डॉलर है जो भारतीय रूपये में करीब 1.90 लाख रुपये होती है. हालांकि अमेरिका में Apple की बताई कीमत में लोकल सेल्स टैक्स शामिल नहीं होता है इसलिए खरीदारी के समय फाइनल पेमेंट राज्य के हिसाब से कुछ बढ़ सकती है. फिर भी भारतीय शुरुआती कीमत के मुकाबले में अमेरिका में यही मॉडल काफी सस्ता दिखाई देता है.
दुबई में भी मिल सकता है बड़ा फायदा
वहीं, दुबई यानी UAE की बात करें तो iPhone Duo के 256GB मॉडल की कीमत 8,499 UAE दिरहम बताई गई है. भारतीय रुपये में ये करीब 2.2 लाख रुपये होती है. यानी यहां भी फोन भारत की कीमत से काफी कम पड़ता है.
दुबई से iPhone खरीदने का एक फायदा ये भी है कि भारत के मुकाबले कई Apple डिवाइस वहां कम कीमत पर मिलते हैं. हालांकि विदेश से फोन लाने पर टैक्स और कस्टम नियमों को ध्यान में रखना जरूरी है.
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हांगकांग में कैसी है कीमत?
हांगकांग में 256GB iPhone Duo की कीमत 17,499 हांगकांग डॉलर बताई गई है जो भारतीय रुपये में करीब 2.12 लाख रुपये होती है. इस लिहाज से हांगकांग भी भारत के मुकाबले में ये फोन काफी सस्ते में बेच रहा है.
भारत में कितनी है iPhone Duo की कीमत
जानकारी के मुताबिक, भारत में iPhone Duo की शुरुआती कीमत 2,99,900 रुपये रखी गई है. ये कीमत 256GB स्टोरेज वाले मॉडल की है. वहीं, इसके 512GB वेरिएंट की कीमत 3,24,900, 1TB वेरिएंट की कीमत 3,74,900 और टॉप वेरिएंट 2TB की कीमत 4,49,900 रुपये रखी है. इसका मतलब साफ है कि भारतीय यूजर्स के लिए Apple का पहला फोल्डेबल फोन प्रीमियम स्मार्टफोन से कहीं आगे निकलकर लग्जरी सेगमेंट में पहुंच गया है.
तो सबसे सस्ता iPhone Duo कहां?
इस हिसाब से देखा जाए तो अमेरिका में iPhone Duo को सबसे कम कीमत में खरीदा जा सकता है. इसके बाद हांगकांग और दुबई जैसे बाजार आते हैं जबकि भारत में इसकी कीमत सबसे ज्यादा है. भारत और अमेरिका के बीच शुरुआती कीमत का अंतर करीब 1 लाख रुपये तक पहुंच जाता है.
हालांकि, आपको बता दें कि विदेश से फोन खरीदते समय केवल कीमत देखना काफी नहीं होता है. लोकल टैक्स, कस्टम ड्यूटी, वारंटी, नेटवर्क बैंड और SIM सपोर्ट जैसी चीजों को भी ध्यान में रखना चाहिए.
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        <pubDate>Sun, 13 Sep 2026 13:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>iPhone 18 Pro: हर टाइम जोन में कब शुरू होगा प्री&amp;ऑर्डर? यहां देखें पूरी लिस्ट</title>
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        <description><![CDATA[ स्मार्टफोन मार्केट में इस समय नए डिजाइन, कैमरा और नई टेक्नोलॉजी वाले फोन को लेकर काफी चर्चा है. Apple भी अपने नए iPhone मॉडल लगातार लांच कर रहा है. कंपनी ने अब iPhone 18 Pro और iPhone 18 Pro Max को लॉन्च कर दिया है, जिसके बाद लोगों की नजर इसकी बिक्री और प्री-ऑर्डर पर है. खास बात यह है कि अलग-अलग देशों में iPhone की बुकिंग एक ही समय पर शुरू होती है, लेकिन टाइम जोन अलग होने की वजह से वहां घड़ी में समय अलग दिखाई देता है. ऐसे में जानिए कि भारत में कितने बजे, अमेरिका में कितने बजे और दूसरे देशों में कब प्री-ऑर्डर शुरू होगा.
भारत में कब शुरू होगा प्री-ऑर्डर?
भारत में iPhone 18 Pro और iPhone 18 Pro Max के प्री-ऑर्डर 12 सितंबर 2026 को शाम 5:30 बजे से शुरू हो गए हैं. भारतीय ग्राहक Apple की वेबसाइट और Apple Store ऐप के जरिए फोन की बुकिंग कर सकेंगे. अगर आप नया iPhone खरीदने का प्लान बना रहे हैं तो प्री-ऑर्डर शुरू होने से पहले ही अपना Apple अकाउंट, पेमेंट और डिलीवरी से जुड़ी जानकारी तैयार रखना बेहतर रहेगा. इससे बुकिंग के समय ज्यादा परेशानी नहीं होगी और पसंद का मॉडल चुनना भी आसान रहेगा.
अमेरिका में सुबह अलग-अलग समय पर खुलेगी बुकिंग
अमेरिका में iPhone 18 Pro और iPhone 18 Pro Max प्री-ऑर्डर 12 सितंबर को सुबह 5 बजे Pacific Time से शुरू होगा। इसके बाद Mountain Time में सुबह 6 बजे, Central Time में सुबह 7 बजे और Eastern Time में सुबह 8 बजे बुकिंग खुलेगी. यानी अमेरिका के चार प्रमुख टाइम जोन में समय अलग रहेगा, लेकिन तारीख 12 सितंबर ही होगी.
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&amp;nbsp;UK, France और यूरोप में दोपहर में शुरू होगी बुकिंग
UK में iPhone 18 Pro का प्री-ऑर्डर दोपहर 1 बजे BST से शुरू होगा. France और Central European Time वाले देशों में करीब 2 बजे बुकिंग खुलेगी. वहीं Eastern European Time वाले कुछ देशों में यह समय करीब 3 बजे रहेगा. इसलिए यूरोप के हर देश में स्थानीय घड़ी का समय उसके टाइम जोन के हिसाब से अलग हो सकता है.
&amp;nbsp;China और Japan में शाम-रात को खुलेगा प्री-ऑर्डर
China और Hong Kong में प्री-ऑर्डर स्थानीय समय के हिसाब से करीब रात 8 बजे शुरू होगा, जबकि Japan में रात 9 बजे बुकिंग खुलेगी. यानी भारत में शाम 5:30 बजे शुरू होने वाली बुकिंग एशिया के दूसरे हिस्सों में शाम से रात के समय दिखाई देगी. इससे पता चलता है कि अलग-अलग देशों में एक ही ग्लोबल लॉन्च का समय स्थानीय टाइम जोन के कारण बदल जाता है.
&amp;nbsp;Australia में रात को बुकिंग, 18 सितंबर से बिक्री
Australia के कुछ प्रमुख शहरों में प्री-ऑर्डर स्थानीय समय के हिसाब से रात करीब 10 बजे या उसके आसपास शुरू हो सकता है. इसके बाद iPhone 18 Pro और iPhone 18 Pro Max की बिक्री 18 सितंबर 2026 से शुरू होगी. भारत में ग्राहक इसे सुबह 8 बजे से खरीद सकेंगे. यानी 12 सितंबर को अलग-अलग टाइम जोन में प्री-ऑर्डर खुलने के बाद 18 सितंबर से फोन की बिक्री शुरू होगी.
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        <pubDate>Sun, 13 Sep 2026 13:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>Meta के नए हेडसेट का लुक आया सामने, जानें खासियत</title>
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        <description><![CDATA[ Meta के अपकमिंग मिक्स्ड रियलिटी हेडसेट को लेकर एक बड़ा लीक सामने आया है. कंपनी के इस डिवाइस को फिलहाल Project Phoenix के कोडनेम से जाना जा रहा है. सामने आई तस्वीरों से यह साफ पता चलता है कि Meta इस बार अपने Quest सीरीज वाले भारी डिजाइन से अलग हटकर ज्यादा पतले और चश्मे जैसे डिजाइन पर काम कर रही है. हालांकि, Meta ने अभी तक इस डिवाइस को ऑफिशियली लॉन्च नहीं किया है. ऐसे में आइए जानते है क्या है Meta के नए हेडसेट की खासियत.
चश्मे जैसा डिजाइन देखने को मिला
लीक हुई तस्वीरों में Project Phoenix का डिजाइन सामान्य VR हेडसेट की तुलना में काफी अलग दिखाई दे रहा है. इसमें मोटे फेस कवर की जगह ग्लासेज जैसी फ्रेम नजर आ रही हैं. डिवाइस में अलग-अलग नोज पैड दिए गए हैं, जिससे यह चेहरे पर सामान्य चश्मे की तरह टिक सकता है. बताया जा रहा है कि इस डिजाइन की वजह से हेडसेट को हल्का और लंबे समय तक पहनने के लिए ज्यादा आरामदायक बनाना है.
हैंड और आई ट्रैकिंग पर जोर
लीक से यह भी संकेत मिलता है कि Meta इस डिवाइस में हैंड और आई ट्रैकिंग जैसी तकनीकों को अहम भूमिका दे रही है. इसका मतलब यह है कि यूजर को कई कामों के लिए पूराने कंट्रोलर की जरूरत कम पड़ सकती है. डिवाइस के किनारों और नीचे की तरफ सेंसर या कैमरा भी दिखाई दे रहा है. इनका इस्तेमाल ट्रैकिंग और मिक्स्ड रियलिटी अनुभव को बेहतर बनाने के लिए हो सकता है. हालांकि, इन सेंसर का सही काम Meta की ऑफिशियल घोषणा के बाद ही साफ होगा.
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प्रिस्क्रिप्शन लेंस का भी सपोर्ट
Project Phoenix से जुड़ी तस्वीरें Meta के HorizonOS के एक प्रिस्क्रिप्शन लेंस पैकेज में सामने आईं. इनमें अलग-अलग प्रिस्क्रिप्शन लेंस इंसर्ट्स को हेडसेट के ऑप्टिक्स के सामने फिट करते हुए दिखाया गया है. बताया जा रहा है कि मेटा के Horizon OS के प्रिस्क्रिप्शन लेंस पैकेज और सेटअप फाइल अपडेट के दौरान यह विजुअल्स लीक हो गए.
कब लॉन्च होगा हेडसेट?
अभी तक Meta ने Project Phoenix का ऑफिशियल नाम, कीमत और लॉन्च डेट की घोषणा नहीं की है. हालांकि कुछ रिपोर्ट्स में इसे 2027 में आने वाला प्रीमियम और अल्ट्रालाइट मिक्स्ड रियलिटी डिवाइस बताया जा रहा है. वहीं, Meta Connect 2026 इवेंट 23 सितंबर से शुरू होने वाला है, इसलिए आने वाले दिनों में कंपनी इस प्रोजेक्ट से जुड़ी अधिक जानकारी सामने ला सकती है.
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        <pubDate>Sun, 13 Sep 2026 01:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>अब iPhone और AirPods बताएंगे जिम में आपकी हर एक्टिविटी का राज! जानें कैसे</title>
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        <description><![CDATA[ Apple में यूजर्स को GymKit नाम का एक फीचर देखने को मिल जाता है. बता दें कि कंपनी ने इसे पहली बार 2017 में पेश किया था. इसका मकसद Apple Watch और जिम में मौजूद एक्सरसाइज मशीन के बीच डेटा शेयर करना था. यूजर अपनी Apple Watch को मशीन के NFC सेंसर पर टैप करके कनेक्ट कर सकता था. इसके बाद मशीन और वॉच दोनों एक-दूसरे के साथ वर्कआउट से जुड़ी जानकारी शेयर करते थे.
हालांकि, GymKit को बड़े लेवल पर अपनाया नहीं जा सका. इसकी एक बड़ी वजह ये रही कि हर जिम मशीन इस टेक्नोलॉजी को सपोर्ट नहीं करती है. अब iOS 27 के साथ Apple ने इस सिस्टम को iPhone तक पहुंचा दिया है.
iPhone बनेगा वर्कआउट का कंट्रोल सेंटर
आपको बता दें कि iOS 27 में iPhone को GymKit से जोड़ने का तरीका काफी आसान है. अगर आपके जिम की मशीन GymKit सपोर्ट करती है तो iPhone को उसके NFC या GymKit कनेक्शन पॉइंट पर टैप करना होगा. इसके बाद वर्कआउट का टाइप चुनकर एक्सरसाइज शुरू की जा सकती है.
इस दौरान iPhone वर्कआउट से जुड़ा डेटा रिकॉर्ड करेगा और उसे Apple के Fitness ऐप में सेव किया जा सकेगा. यानी अब GymKit का इस्तेमाल करने के लिए हर बार Apple Watch पहनना जरूरी नहीं रहेगा.
ट्रेडमिल, एलिप्टिकल, इंडोर बाइक और सीढ़ियां चढ़ने वाली मशीन जैसे कार्डियो डिवाइस इसका हिस्सा होते हैं. हालांकि, इसका असली फायदा तभी मिलेगा जब उससे जुड़ी मशीन में Apple का GymKit सपोर्ट मौजूद हो.
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AirPods Pro 3 कैसे करेंगे मदद?
iOS 27 के इस सेटअप में AirPods Pro 3 भी अहम भूमिका निभाते हैं. अगर यूजर इन्हें पहनकर एक्सरसाइज करता है तो ईयरबड्स हार्ट रेट जैसी जानकारी उपलब्ध करा सकते हैं. ये डेटा iPhone तक पहुंचता है और फिर वर्कआउट मशीन के डेटा के साथ मिलकर Fitness ऐप में दर्ज होता है.
इस तरह पूरे प्रोसेस में तीन डिवाइस मिलकर काम करते हैं वर्कआउट मशीन अपने आंकड़े देती है, AirPods Pro 3 हार्ट रेट जैसी जानकारी उपलब्ध कराते हैं और iPhone इन सभी डेटा को संभालता है.
Apple के अनुसार, वर्कआउट खत्म होने के बाद कनेक्टेड मशीन से सेशन का डेटा हटा दिया जाता है. हालांकि, अगर यूजर ने उस मशीन में अलग से साइन-इन किया है तो कंडिशन अलग हो सकती है.
क्या Apple Watch की जरूरत खत्म हो गई?
जी नहीं, ऐसा बिलकुल भी नहीं है. iOS 27 का नया GymKit फीचर उन लोगों के लिए काम का साबित हो सकता है जो Apple Watch नहीं रखते या कभी-कभी वॉच घर पर भूल जाते हैं. अगर वॉच की बैटरी खत्म हो गई है, तब भी जिम मशीन, iPhone और AirPods Pro 3 की मदद से वर्कआउट रिकॉर्ड किया जा सकता है.
लेकिन Apple Watch अभी भी ज्यादा बेहतर हेल्थ और फिटनेस डिवाइस माना जाता है. ये सिर्फ वर्कआउट के दौरान ही नहीं बल्कि पूरे दिन और रात में भी कई तरह का डेटा रिकॉर्ड करती है. इसलिए iPhone और AirPods का नया सेटअप Apple Watch का पूरा ऑप्शन नहीं है.
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        <pubDate>Sun, 13 Sep 2026 01:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>iPhone 18 Pro Max या Galaxy S26 Ultra! जानें दोनों में से किसे खरीदने में है फायदा</title>
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        <description><![CDATA[ Apple ने अपने नए फ्लैगशिप iPhone 18 Pro Max को प्रीमियम स्मार्टफोन सेगमेंट में उतारा है. फोन का डिजाइन देखने में पिछले मॉडल से बहुत अलग नहीं लगता है लेकिन इसके अंदर कई बड़े अपग्रेड देखने को मिलते हैं. दूसरी तरफ Samsung का Galaxy S26 Ultra पहले से ही हाई-एंड Android स्मार्टफोन के तौर पर अपनी जगह बना चुका है. ऐसे में दोनों फोन की तुलना होना लाजिमी है.
दोनों ही कंपनियों के ये सबसे पावरफुल नॉन-फोल्डेबल स्मार्टफोन हैं. इसलिए इनमें से किसी एक को चुनना सिर्फ स्पेसिफिकेशन पर निर्भर नहीं करता है बल्कि यूजर की जरूरत, ऑपरेटिंग सिस्टम और पसंद भी काफी मायने रखती है.
डिजाइन में किसका पलड़ा भारी?
आपको बता दें कि iPhone 18 Pro Max और Galaxy S26 Ultra दोनों ही बड़े स्क्रीन वाले ट्रेडिशनल स्मार्टफोन हैं. दोनों में 6.9 इंच का डिस्प्ले मिलता है. हालांकि, iPhone के किनारे और कॉर्नर थोड़े ज्यादा कर्व्ड हैं जबकि Samsung ने अपने इसस डिवाइस को सीधा और ज्यादा बॉक्सी डिजाइन दिया है.
बिल्ड क्वालिटी के मामले में भी दोनों प्रीमियम फील देते हैं. iPhone में एल्यूमिनियम और ग्लास का इस्तेमाल किया गया है जबकि Galaxy S26 Ultra में ग्लास बैक मिलता है.
वजन की बात करें तो Samsung यहां आगे निकलता है. Galaxy S26 Ultra का वजन करीब 214 ग्राम है जबकि iPhone 18 Pro Max करीब 249 ग्राम का है. लंबे समय तक फोन इस्तेमाल करने पर ये अंतर महसूस किया जा सकता है. Samsung का फोन 7.9mm पतला है, वहीं iPhone की मोटाई 8.75mm है.
दोनों के डिस्प्ले में कितना अंतर?
Apple ने iPhone 18 Pro Max में OLED पैनल दिया है जिसका रिजॉल्यूशन 2868x1320 पिक्सल है. इसमें 120Hz रिफ्रेश रेट मिलता है और स्क्रीन की पीक ब्राइटनेस 3,000 निट्स तक पहुंचती है. यानी तेज धूप में भी डिस्प्ले को देखने में काफी मदद मिल सकती है.
Galaxy S26 Ultra में 3120x1440 पिक्सल रिजॉल्यूशन वाला AMOLED डिस्प्ले दिया गया है. कागज पर Samsung की स्क्रीन ज्यादा रिजॉल्यूशन वाली है लेकिन रोजमर्रा के इस्तेमाल में दोनों के बीच अंतर आसानी से नजर नहीं आएगा. इसमें भी 120Hz रिफ्रेश रेट मिलता है जबकि पीक ब्राइटनेस 2,600 निट्स तक है.
Samsung का एक बड़ा फायदा S Pen है. इससे नोट्स लिखने, स्क्रीन पर ड्रॉ करने और कुछ खास काम करने में सुविधा मिलती है. Apple की तरफ से Pencil सपोर्ट चाहिए तो इसके लिए अलग और महंगे iPhone Duo की जरूरत पड़ती है.
कैमरा में सबसे बड़ा मुकाबला
कैमरा दोनों फ्लैगशिप फोन की सबसे बड़ी खासियतों में से एक है. iPhone 18 Pro Max में ट्रिपल रियर कैमरा सिस्टम दिया गया है. इसमें वाइड, अल्ट्रा-वाइड और टेलीफोटो कैमरा शामिल हैं और तीनों में 48MP सेंसर दिए गए हैं.
इस बार iPhone के मेन कैमरे में वेरिएबल अपर्चर इस डिवाइस को ज्यादा खास बनाता है. ज्यादातर स्मार्टफोन कैमरों में अपर्चर फिक्स रहता है लेकिन यहां यूजर जरूरत के हिसाब से इसे बदल सकता है. इससे अलग-अलग रोशनी की कंडिशन में फोटोग्राफी पर ज्यादा कंट्रोल मिलने के साथ-साथ क्रिएटिव शॉट्स लेने के ऑप्शन बढ़ जाते हैं.
Samsung Galaxy S26 Ultra कैमरा हार्डवेयर के मामले में अलग प्लानिंग अपनाता है. इसमें 200MP का मेन कैमरा है. हाई-रिजॉल्यूशन सेंसर की वजह से फोटो को क्रॉप करने पर भी ज्यादा डिटेल बच सकती हैं. फोन में 50MP अल्ट्रा-वाइड कैमरा भी मिलता है.
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बैटरी और चार्जिंग में मुकाबला बराबर
बैटरी क्षमता के मामले में दोनों फोन करीब 5,000mAh के आसपास हैं. नॉर्मल इस्तेमाल में दोनों से पूरे दिन की बैटरी लाइफ मिलने की उम्मीद की जा सकती है. चार्जिंग में भी इस बार दोनों फ्लैगशिप लगभग बराबरी पर हैं. 60W चार्जर की मदद से दोनों फोन करीब 15 मिनट में 0 से 50 प्रतिशत तक चार्ज हो सकते हैं. यानी जल्दी में फोन को चार्ज करने वाले यूजर्स के लिए दोनों ही ऑप्शन अच्छे हैं.
परफॉर्मेंस में Apple की नई छलांग
Galaxy S26 Ultra में 3nm प्रोसेस पर बना Snapdragon 8 Elite Gen 5 चिपसेट दिया गया है. ये बेहद शक्तिशाली प्रोसेसर है और कुछ टेस्ट में Apple के A19 Pro को भी पीछे छोड़ चुका है.
हालांकि, iPhone 18 Pro Max में Apple का नया A20 Pro चिपसेट मिलता है जिसे कंपनी ने 2nm प्रोसेस पर तैयार किया है. छोटे प्रोसेस नोड का फायदा बेहतर परफॉर्मेंस और पावर एफिशिएंसी के तौर पर मिल सकता है. हालांकि, असली इस्तेमाल में दोनों की क्षमता का सही अंदाजा लंबे समय के टेस्ट के बाद ही लगाया जा सकेगा.
RAM की बात करें तो Galaxy S26 Ultra में स्टोरेज वेरिएंट के हिसाब से 12GB और 16GB RAM मिलती है. iPhone 18 Pro Max में सभी कॉन्फिगरेशन में 12GB RAM दी गई है.
कीमत और किसके लिए कौन सा फोन?
अमेरिका में दोनों फोन की शुरुआती कीमत 256GB मॉडल के लिए करीब 1,299 डॉलर है. इसलिए कीमत के आधार पर इनके बीच बड़ा अंतर नहीं है. अगर आप Apple के दूसरे डिवाइस जैसे AirPods और Apple Watch इस्तेमाल करते हैं तो iPhone 18 Pro Max आपके लिए ज्यादा बेहतर ऑप्शन साबित हो सकता है. वहीं Android की आजादी, S Pen और ज्यादा जूम क्षमता पसंद करने वालों के लिए Galaxy S26 Ultra आकर्षक ऑप्शन हो सकता है.
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        <pubDate>Sun, 13 Sep 2026 01:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>चार्जर पर बना Qi का निशान का क्या मतलब होता? जानिए वजह</title>
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        <description><![CDATA[ चार्जर पर बना Qi का निशान का क्या मतलब होता? जानिए वजह ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 13 Sep 2026 01:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>Chrome में सेव पासवर्ड देखने का आसान तरीका, ऐसे करें चेक</title>
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        <description><![CDATA[ आज के समय में ज्यादातर लोग अलग-अलग वेबसाइट और ऐप्स के लिए अलग पासवर्ड इस्तेमाल करते हैं. इतने सारे पासवर्ड याद रखना किसी के लिए भी आसान नहीं होता. इसी वजह से Google Chrome का Password Manager काफी उपयोगी फीचर माना जाता है. Chrome में यूजर अपनी अनुमति से वेबसाइटों के पासवर्ड सेव कर सकता है और जरूरत पड़ने पर उन्हें दोबारा देख भी सकता है. ऐसे में अगर आप किसी वेबसाइट का पासवर्ड भूल गए हैं तो पहले से Chrome में सेव होने पर पासवर्ड को आसानी से चेक किया जा सकता है.
मोबाइल में ऐसे देखें सेव पासवर्ड
Android फोन में Chrome के जरिए सेव पासवर्ड देखने के लिए सबसे पहले Google Chrome खोलें. इसके बाद ऊपर दाईं तरफ दिखाई देने वाले तीन डॉट्स पर टैप करें. अब Settings में जाएं और Google Password Manager का विकल्प चुनें. यहां आपको उन वेबसाइट और ऐप्स की लिस्ट दिखाई देगी, जिनके लॉगिन डिटेल्स आपने Chrome में सेव किए हैं. आप जिस वेबसाइट का पासवर्ड देखना चाहते है, उसके ऊपर पर टैप करें. इसके बाद Chrome आपकी फोन की सुरक्षा जांच के लिए PIN, पैटर्न, पासवर्ड या फिंगरप्रिंट मांगेगा. वेरिफिकेशन पूरा होने के बाद पासवर्ड के सामने मौजूद आंख के आइकन पर टैप करके आप पासवर्ड देख सकते हैं.
कंप्यूटर पर ऐसे चेक करें पासवर्ड
कंप्यूटर या लैपटॉप पर भी Chrome में सेव पासवर्ड देखना आसान है. इसके लिए Chrome ब्राउजर को ऑपन करें और ऊपर मौजूद तीन डॉट्स पर क्लिक करें. इसके बाद Settings में जा कर, Passwords and Autofill सेक्शन में जाएं और Google Password Manager को ऑपन करें. अब सेव किए गए अकाउंट्स की लिस्ट में उस वेबसाइट को चुनें, जिसका पासवर्ड आप देखना चाहते है. पासवर्ड देखने के लिए कंप्यूटर का PIN, पासवर्ड या अन्य स्क्रीन-लॉक वेरिफिकेशन मांगा जाता है. वेरिफिकेशन के बाद आंख के आइकन पर क्लिक करके आप पासवर्ड देख सकते हैं.
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Google Password Manager के फायदें
Google Password Manager का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह यूजर को हर वेबसाइट का पासवर्ड अलग से याद रखने की परेशानी से बचाता है. फिर भी पासवर्ड मैनेजर का इस्तेमाल करते समय सुरक्षा का ध्यान रखना बेहद जरूरी है. फोन और कंप्यूटर में मजबूत स्क्रीन लॉक रखें और Google Account पर 2-Step Verification हमेशा चालू रखें. वहीं अपने पासवर्ड या OTP को कभी भी किसी के साथ शेयर न करें.
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        <pubDate>Sun, 13 Sep 2026 01:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>कैसे बनाएं अपने घर का डिजिपिन? ये टिप्स आएंगे आपके काम</title>
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        <description><![CDATA[ आज के समय में किसी को अपनी लोकेशन बताना हर बार आसान नहीं होता है. कई जगहों पर घर का नंबर, सड़क या गली का नाम साफ तौर पर पता नहीं होता है. गांवों और दूर-दराज के इलाकों में यह समस्या और ज्यादा देखने को मिलती है, जहां सही पता बताना मुश्किल हो जाता है. ऐसे में भारतीय डाक ने डिजिटल एड्रेसिंग को आसान बनाने के लिए DIGIPIN सिस्टम शुरू किया है, जो हर लोकेशन को 10 अक्षरों और अंकों का एक खास डिजिटल कोड देता है.
अब डाक विभाग ने अपना DIGIPIN जानें और अपना PIN Code जानें जैसी सुविधाएं भी शुरू की हैं, जिससे लोग अपनी लोकेशन और मौजूदा पिन कोड की जानकारी आसानी से हासिल कर सकते हैं. साथ ही DIGIPIN को लेकर जन-जागरूकता अभियान भी चलाया जाएगा. तो आइए जानते हैं कि अपने घर का डिजिपिन कैसे बनाएं.&amp;nbsp;
क्या है DIGIPIN?
DIGIPIN यानी Digital Postal Index Number भारतीय डाक विभाग की डिजिटल एड्रेसिंग व्यवस्था है. इसे डाक विभाग ने IIT हैदराबाद और इसरो के National Remote Sensing Centre (NRSC) के साथ मिलकर तैयार किया है. यह एक ओपन-सोर्स, जियो-कोडेड और ग्रिड आधारित सिस्टम है, जिसमें भारत के करीब 4 मीटर बाय 4 मीटर के हिस्से को एक यूनिक 10-अक्षर वाला अल्फान्यूमेरिक कोड दिया जाता है.
यह कोड किसी जगह के अक्षांश और देशांतर यानी latitude और longitude के आधार पर तैयार होता है. खास बात यह है कि DIGIPIN आपके मौजूदा पते या PIN Code को खत्म नहीं करता, बल्कि उसके साथ एक अतिरिक्त डिजिटल लेयर की तरह काम करता है.&amp;nbsp;
अपने घर का डिजिपिन कैसे बनाएं?
अपना DIGIPIN पता करना काफी आसान है. इसके लिए भारतीय डाक विभाग की अपना डिजिपिन जानें सुविधा पर जाना होगा. पोर्टल पर पहुंचने के बाद अपनी लोकेशन एक्सेस की अनुमति देनी होगी. इसके बाद स्क्रीन पर आपकी मौजूदा जगह का 10-अक्षर वाला DIGIPIN दिखाई देगा. अगर आप लोकेशन एक्सेस नहीं देना चाहते हैं, तो अक्षांश और देशांतर यानी latitude-longitude को मैन्युअली भी दर्ज कर सकते हैं. कोड मिलने के बाद इसे सेव या नोट करके रखा जा सकता है.&amp;nbsp;
DIGIPIN को ऐसे कर सकते हैं शेयर
DIGIPIN मिलने के बाद इसे किसी दोस्त या उस व्यक्ति के साथ शेयर किया जा सकता है, जिसे आपकी सही लोकेशन पर पहुंचना है. इसके साथ QR Code का ऑप्शन भी मिलता है. इसे Google Maps या Mappls Maps के जरिए खोला जा सकता है, जिससे लोकेशन तक पहुंचना आसान हो जाता है.&amp;nbsp;
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डिलीवरी और इमरजेंसी में आएगा काम
DIGIPIN का इस्तेमाल डाक और पार्सल डिलीवरी से लेकर ई-कॉमर्स और नेविगेशन तक में किया जा सकता है. खासकर ऐसे इलाकों में जहां घर का नंबर या सड़क की जानकारी साफ नहीं है, यह सही लोकेशन पहचानने में मदद कर सकता है. &amp;nbsp;एंबुलेंस, पुलिस, फायर ब्रिगेड और राहत टीमों के लिए भी यह यूजफुल हो सकता है.
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        <pubDate>Sat, 12 Sep 2026 07:30:19 +0530</pubDate>
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        <title>ये फोन यूज करते हैं तो सबसे सस्ता होगा रिचार्ज, देख लें पूरी लिस्ट</title>
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        <description><![CDATA[ आज के समय में मोबाइल नंबर को एक्टिव रखना भी एक खर्च बन गया है. पहले जहां छोटे से रिचार्ज से काम चल जाता था, वहीं अब ज्यादातर यूजर्स को नंबर की वैलिडिटी बनाए रखने के लिए एक तय रकम खर्च करनी पड़ती है. खासकर उन लोगों के लिए यह परेशानी ज्यादा है जो दूसरा SIM सिर्फ बैंक OTP, Aadhaar verification या कभी-कभार कॉल के लिए रखते हैं.
ऐसे में सबसे सस्ता रिचार्ज कौन सा है और किस नेटवर्क पर नंबर को कम खर्च में एक्टिव रखा जा सकता है, यह जानना जरूरी हो जाता है. तो आइए जानते हैं कि कौन-से फोन यूज पर सबसे सस्ता रिचार्ज होगा.&amp;nbsp;
2015 से 2026 तक कितना बदला रिचार्ज?
2015 में 10 रुपए का टॉप-अप भी काफी था. इससे पूरा टॉक टाइम मिलता था और इनकमिंग की वैलिडिटी बनी रहती थी. अब स्थिति काफी बदल चुकी है. 2026 में प्राइवेट टेलीकॉम कंपनियों के स्मार्टफोन यूजर्स के लिए कम कीमत वाले टॉकटाइम प्लान काफी सीमित हो गए हैं. अब Jio का न्यूनतम प्लान 189 रुपए , जबकि Airtel और Vi का शुरुआती प्लान 199 रुपए है.
कौन-से फोन यूज पर सबसे सस्ता रिचार्ज होगा?
सबसे सस्ता रिचार्ज फोन के ब्रांड से ज्यादा आपके नेटवर्क और प्लान पर निर्भर करता है. हालांकि 4G फीचर फोन-कीपैड फोन यूज करने वालों के लिए कुछ खास रिचार्ज प्लान सस्ते पड़ सकते हैं. खासकर Jio Phone, Jio Bharat, Lava, itel और Nokia के 4G फीचर फोन पर Jio के 123 रुपए, 234 रूपए, &amp;nbsp;369 रूपए और 1,234 रूपए वाले प्लान इस्तेमाल किए जा सकते हैं. वहीं सामान्य स्मार्टफोन यूजर्स के लिए Jio का 189 रुपए और BSNL का 107 रूपए वाला प्लान कम कीमत वाले ऑप्शन मे शामिल हैं.&amp;nbsp;
Jio का 189 रुपए वाला प्लान
Jio यूजर्स के लिए 189 रुपए का प्लान 28 दिनों की वैलिडिटी के साथ आता है. इसमें अनलिमिटेड वॉइस कॉलिंग, कुल 2GB डेटा और 300 SMS मिलते हैं. यह प्राइवेट नेटवर्क पर 4G और 5G स्मार्टफोन यूजर्स के लिए कम कीमत वाला एंट्री-लेवल ऑप्शन है. हालांकि, 4G फीचर फोन यूजर्स के लिए Jio के कुछ अलग प्लान भी उपलब्ध हैं. 123 रूपए वाले प्लान में 28 दिनों की वैलिडिटी के साथ अनलिमिटेड कॉलिंग, रोज 0.5GB डेटा और कुल 300 SMS मिलते हैं.&amp;nbsp;
234 और 369 रुपए वाले फीचर फोन प्लान
Jio का 234 रुपए &amp;nbsp;वाला प्लान 56 दिनों की वैलिडिटी देता है. इसमें रोज 0.5GB डेटा और अनलिमिटेड कॉलिंग मिलती है, जबकि 300 SMS का इस्तेमाल शुरुआती 28 दिनों तक किया जा सकता है. 369 रूपए &amp;nbsp;वाले प्लान की वैलिडिटी 84 दिन है. इसमें रोज 0.5GB डेटा, अनलिमिटेड कॉलिंग और 28 दिनों के लिए 300 SMS मिलते हैं.&amp;nbsp;
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1,234 रुपए वाला लंबी वैलिडिटी प्लान
Jio का 1,234 रुपए वाला प्लान 336 दिनों की वैलिडिटी के साथ आता है. इसमें पूरी वैलिडिटी के दौरान अनलिमिटेड कॉलिंग और रोज 0.5GB डेटा मिलता है. इस हिसाब से कुल 168GB 4G डेटा मिलता है. इन प्लान्स के साथ JioSaavn और JioTV का फ्री सब्सक्रिप्शन भी दिया जाता है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Sat, 12 Sep 2026 07:30:17 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>ये, फोन, यूज, करते, हैं, तो, सबसे, सस्ता, होगा, रिचार्ज, देख, लें, पूरी, लिस्ट</media:keywords>
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        <title>iPhone Duo के कवर की कीमत ने चौंकाया,  इतने में आता है Android फोन</title>
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        <description><![CDATA[ Apple ने अपना पहला फोल्डेबल iPhone Duo लॉन्च कर दिया है. इसे कंपनी ने iPhone 18 Pro और iPhone 18 Pro Max के साथ पेश किया है. लंबे समय से जिस फोल्डेबल iPhone का इंतजार किया जा रहा था, उसके सामने आने के बाद अब सबसे ज्यादा चर्चा इसकी कीमत की हो रही है. भारत में iPhone Duo की शुरुआती कीमत 2,99,900 रुपये है, लेकिन बात सिर्फ फोन की कीमत तक सीमित नहीं है. Apple ने के पहले फोल्डेबल iPhone के साथ एक खास Folio कवर भी लॉन्च किया है, जिसकी कीमत इतनी है कि उस बजट में एक अच्छा Android फोन खरीदा जा सकता है. तो आइए जानते हैं कि इस कवर की कीमत कितनी है.&amp;nbsp;
iPhone Duo Folio कवर की कीमत कितनी है?
Apple ने इस कवर को iPhone Duo Folio नाम दिया है. इसकी कीमत 14,900 रुपए रखी गई है. कवर में बिल्ट-इन किकस्टैंड दिया गया है, जिससे फोन को अलग-अलग एंगल पर खड़ा किया जा सकता है. इसका इस्तेमाल वीडियो देखने, पढ़ने या FaceTime कॉल के दौरान किया जा सकता है. यह कवर दो कलर ऑप्शन Taupe और Navy Blue में मिलेगा. Apple के मुताबिक iPhone Duo Folio की बिक्री 16 अक्टूबर से शुरू होगी.&amp;nbsp;
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कैसा है iPhone Duo?
iPhone Duo Apple का पहला फोल्डेबल iPhone है, जिसे कंपनी ने iPhone 18 Pro और iPhone 18 Pro Max के साथ लॉन्च किया है. फोन को बंद करने पर 5.4 इंच की आउटर डिस्प्ले मिलती है, जबकि खोलने पर 7.6 इंच की इनर डिस्प्ले सामने आती है. इसमें Apple का नया A20 Pro चिपसेट दिया गया है.
फोन की दोनों डिस्प्ले ProMotion, Always-On और 3,000 निट्स तक पीक ब्राइटनेस सपोर्ट करती हैं. इसमें 48MP Fusion प्राइमरी और 48MP अल्ट्रा-वाइड कैमरा दिया गया है. सेल्फी के लिए 12MP सेंसर मिलता है. इसके अलावा फोल्डेबल डिजाइन के साथ Duo Preview और Split View जैसे मल्टीटास्किंग फीचर्स भी मिलते हैं.&amp;nbsp;
3 लाख से शुरू है iPhone Duo
भारत में iPhone Duo की शुरुआती कीमत 2,99,900 रुपए है. 256GB मॉडल की कीमत 2,99,900 रुपए , 512GB की₹3,24,900 रुपए , 1TB की 3,74,900 रुपए &amp;nbsp;और 2TB मॉडल की कीमत 4,49,900 रुपए है. फोन Star White और Night Sky कलर में आता है. अगर बेस मॉडल के साथ 14,900 का Folio कवर जोड़ दिया जाए, तो कुल कीमत 3,14,800 रुपए हो जाती है. अमेरिका में इसकी शुरुआती कीमत 1,999 डॉलर यानी करीब 1.90 लाख रुपए है.&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;यह भी पढ़ें - चांद की बर्फ और क्रेटर मैप करेगा IBM-NASA का AI, जानें कैसे? ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 12 Sep 2026 07:30:15 +0530</pubDate>
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        <title>AI बना बड़ी मुसीबत! जानें वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने क्यों दी चेतावनी?</title>
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        <description><![CDATA[ वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और आधुनिक टेक्नोलॉजी को लेकर एक बड़ा बयान दिया है. मुंबई में आयोजित ग्लोबल फिनटेक फेस्ट 2026 को संबोधित करते हुए वित्त मंत्री ने साफ शब्दों में कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एक दोधारी तलवार की तरह है.&amp;nbsp;
उन्होंने आगाह किया कि जहां एक तरफ इस तकनीक की मदद से डिजिटल धोखाधड़ी और फ्रॉड को पकड़ा जा सकता है, वहीं दूसरी तरफ अपराधी इसका इस्तेमाल बड़े घोटालों को अंजाम देने के लिए भी कर रहे हैं. वित्त मंत्री ने टेक कंपनियों और फिनटेक सेक्टर को सलाह दी कि वे नई तकनीकों को इस तरह विकसित करें जिससे सिस्टम की कार्यकुशलता तो बढ़े, लेकिन उससे सुरक्षा को लेकर कोई नया खतरा पैदा न हो.
समाज और चुनावों को प्रभावित कर सकती है टेक्नोलॉजी
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने AI, लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स LLMs और साइबर स्पेस से जुड़े खतरों पर गहरी चिंता व्यक्त की. उन्होंने कहा कि आज की आधुनिक तकनीक इतनी ताकतवर हो चुकी है कि यह न सिर्फ आम समाज को प्रभावित कर सकती है, बल्कि लोकतांत्रिक देशों में होने वाले चुनावों के नतीजों तक को बदल सकती है.
उन्होंने बताया कि आज के नए डिजिटल मॉडल्स जमीनी स्तर पर लोगों की राय और जनमत को इस तरह प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं, जिसके बारे में आम जनता को अंदाजा तक नहीं हो पाता. यही वजह है कि तकनीक के इन बढ़ते जोखिमों को समय रहते नियंत्रित करना बेहद जरूरी हो गया है.
रेगुलेशन और नई खोजों के बीच संतुलन जरूरी
ग्लोबल फिनटेक फेस्ट के मंच से वित्त मंत्री ने कहा कि सरकारों और केंद्रीय बैंक को एआई से जुड़े इन खतरों से निपटने के लिए सख्त कदम उठाने होंगे. हालांकि, उन्होंने यह भी साफ किया कि नियम ऐसे होने चाहिए जो बाजार में नई खोजों को बढ़ावा दें, न कि उन्हें दबाएं.
वित्त मंत्री ने बताया कि उन्होंने RBI के साथ इस विषय पर चर्चा की है. उन्होंने आरबीआई से सॉफ्ट-टच रेगुलेशन अपनाने की बात की है ताकि फिनटेक सेक्टर बिना किसी रुकावट के आगे बढ़ सके. उन्होंने इस बात पर खुशी जताई कि हाल ही में आरबीआई ने फिनटेक सेक्टर के लिए यूनिफाइड फिनटेक फोरम को एक सेल्फ-रेगुलेटरी ऑर्गनाइजेशन के रूप में मान्यता दे दी है, जो इस बदलते दौर की बड़ी जरूरत थी.
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भारत की युवा आबादी और डिजिटल इकोनॉमी की तारीफ
अपने संबोधन के दौरान वित्त मंत्री ने भारत के युवाओं की क्षमता और देश के युवा आबादी के फायदे पर भी खुलकर बात की. उन्होंने उन लोगों को आड़े हाथों लिया जो भारत की युवा आबादी की ताकत पर संदेह करते हैं. उन्होंने कहा कि भारत की युवा पीढ़ी आज निराशा से आगे निकल चुकी है और देश के भविष्य का निर्माण कर रही है.
उन्होंने गर्व से कहा कि हमारे युवा आज कल के लिए कोडिंग लिख रहे हैं, बड़े और टिकाऊ बिजनेस खड़े कर रहे हैं. आज भारत की UPI जैसी डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर व्यवस्था पूरी दुनिया में सबसे ताकतवर बनकर उभरी है, जिसके जरिए हर महीने अरबों रुपयों का डिजिटल लेनदेन हो रहा है. इसके साथ ही भारत अंतरिक्ष क्षेत्र में नए मुकाम हासिल कर रहा है और दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बना हुआ है.
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        <pubDate>Sat, 12 Sep 2026 07:30:13 +0530</pubDate>
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        <title>स्विच दबाते ही दिखती है चिंगारी, कब सिर्फ ढीला कनेक्शन और कब खतरे का संकेत?</title>
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        <description><![CDATA[ घर में लाइट ऑन करने के लिए स्विच दबाना हमारी रोजमर्रा की आदत है, लेकिन अगर हर बार स्विच दबाते ही चिंगारी दिखाई दे, चटकने की आवाज आए या जलने जैसी गंध महसूस हो, तो इसे नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है. स्विच के अंदर बहुत छोटी इलेक्ट्रिक स्पार्किंग कई बार सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा हो सकती है, लेकिन बाहर दिखाई देने वाली तेज चिंगारी या बार-बार होने वाली स्पार्किंग बिजली की समस्या का संकेत भी हो सकती है. ऐसे में यह समझना जरूरी है कि कौन-सी चिंगारी सामान्य है और कब सावधान होने की जरूरत है. तो आइए जानते हैं कि स्विच दबाते ही चिंगारी दिखती है तो कब सिर्फ ढीला कनेक्शन और कब खतरे का संकेत है.&amp;nbsp;
स्विच दबाते ही चिंगारी दिखती है तो कब सिर्फ ढीला कनेक्शन?
लाइट स्विच के कॉन्टैक्ट जब सर्किट को खोलते या बंद करते हैं, तो अंदर बहुत छोटे इलेक्ट्रिकल आर्क बन सकते हैं. आमतौर पर ये इतने छोटे होते हैं कि दिखाई भी नहीं देते है. कई लाइट बल्ब, पुराने इनकैंडेसेंट बल्ब, ज्यादा वाट वाले फिक्स्चर या लंबे लाइट सर्किट को कंट्रोल करने वाले स्विच में यह ज्यादा हो सकता है. हल्की क्लिक की आवाज भी सामान्य हो सकती है.&amp;nbsp;
कब चिंगारी खतरे का संकेत है?
अगर स्विच से साफ दिखाई देने वाली चमक निकल रही है, तेज चटकने या फूटने की आवाज आ रही है, जलने की गंध या धुआं दिखाई दे रहा है, या स्विच छूने पर गर्म लग रहा है, तो यह सामान्य नहीं है. ऐसे संकेत ढीली वायरिंग, खराब स्विच कॉन्टैक्ट, ओवरलोडेड सर्किट, खतरनाक वायरिंग या इलेक्ट्रिकल आर्क की ओर इशारा कर सकते हैं.&amp;nbsp;
स्पार्किंग के पीछे क्या वजह हो सकती है?
स्विच के पीछे ढीले तार या टर्मिनल कनेक्शन होने पर बिजली का प्रवाह प्रभावित हो सकता है और स्पार्किंग हो सकती है. समय के साथ स्विच के अंदर मौजूद मेटल कॉन्टैक्ट भी घिस सकते हैं, जिससे आर्क बढ़ सकता है. इसके अलावा ज्यादा बिजली का लोड, खराब वायरिंग और डिमर या स्मार्ट स्विच की गलत इंस्टॉलेशन भी समस्या पैदा कर सकती है.&amp;nbsp;
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चिंगारी दिखे तो क्या करें?
अगर स्विच से चिंगारी, धुआं या जलने की गंध आ रही है, तो सबसे पहले संबंधित सर्किट का ब्रेकर बंद करें और स्विच का इस्तेमाल न करें. बार-बार स्विच चलाकर जांच करने की कोशिश न करें. किसी स्विच को खोलने या तार छूने से पहले बिजली पूरी तरह बंद होना सुनिश्चित करना जरूरी है.&amp;nbsp;
इलेक्ट्रीशियन को कब बुलाएं?&amp;nbsp;अगर जले हुए तार दिखाई दें, ब्रेकर बार-बार ट्रिप हो, जलने की गंध आए या स्विच बदलने के बाद भी चिंगारी जारी रहे, तो लाइसेंस प्राप्त इलेक्ट्रीशियन की मदद लेना बेहतर है. खासकर दिखाई देने वाली चिंगारी, तेज आवाज और गर्म स्विच को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Sat, 12 Sep 2026 07:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>स्विच, दबाते, ही, दिखती, है, चिंगारी, कब, सिर्फ, ढीला, कनेक्शन, और, कब, खतरे, का, संकेत</media:keywords>
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        <title>Telegram के ये Bots बदल देंगे काम करने का तरीका, 2026 में जरूर आजमाएं</title>
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        <description><![CDATA[ Telegram के ये Bots बदल देंगे काम करने का तरीका, 2026 में जरूर आजमाएं ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 11 Sep 2026 19:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>कहां बेचें अपना पुराना आईफोन? इन वेबसाइट्स पर मिलेगा अच्छा दाम</title>
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        <description><![CDATA[ नया iPhone खरीदने का मन है लेकिन पुराना फोन घर में पड़ा है तो उसे आप उसे बेचकर नए फोन का खर्च कम कर सकते हैं. खासकर अभी Apple ने iPhone 18 Pro, Pro Max और पहला फोल्डेबल iPhone Duo लॉन्च किया है, ऐसे में कई लोग अपना पुराना iPhone बेचकर नया मॉडल लेने की तैयारी कर सकते हैं. पुराना iPhone बेचने के लिए आज कई ऑनलाइन प्लेटफॉर्म मौजूद हैं, जहां फोन की जानकारी और हालत के आधार पर पुराने फोन की कीमत बताई जाती है. Cashify जैसे प्लेटफॉर्म पर फोन की डिटेल भरकर पुराने फोन की &amp;nbsp;कीमत का पता लगाया जा सकता है और कई वेबसाइट पर घर से फोन पिकउप की सुविधाएं भी मिलती है.
&amp;nbsp;Cashify पर बेच सकते हैं पुराना iPhone
पुराना iPhone बेचने के लिए Cashify &amp;nbsp;एक अच्छा ऑप्शन सकता है और यह काफी पुराना भी है. यहां आपको सबसे पहले अपने फोन का मॉडल, उसकी हालत कैसी है और फोन किस साल में खरीदा है उसकी जानकारी देनी होगी .इसके बाद Cashify &amp;nbsp;प्लेटफॉर्म उनके अनुमान के हिसाब से आपके फोन की कीमत बताता है. Cashify, फोन की जांच के बाद पिकअप की सुविधा और आपके डूरस्टेप पर पेमेंट का आप्शन भी मिलता है. अपना पुराना फोन बेचने से पहले अलग-अलग जगहों पर कीमत जरूर चेक कर लें.
&amp;nbsp;Flipkart पर भी मिल सकता है बेचने का विकल्प
Flipkart भी पुराने स्मार्टफोन के लिए buyback और sell करने से जुड़े ऑप्शन देता है. यहां अपने फोन की जानकारी देकर उसकी कीमत का अंदाजा आप लगा सकते हैं. कई बार पुराने फोन को नए फोन की खरीद के साथ एक्सचेंज करने पर अलग-अलग &amp;nbsp;ऑफर भी मिलते है. इसलिए अगर आप नया iPhone खरीदने वाले हैं तो एक्सचेंज और सीधे बेचने, दोनों ऑप्शन चेक करे.
यह भी पढ़ें :&amp;nbsp;iPhone के साथ Apple ने और क्या फोड़ा बम? पूरी लॉन्च लिस्ट देखें
&amp;nbsp;Apple का Trade-In भी देख सकते हैं
अगर आप सीधे नया iPhone खरीदना है तो Apple के Trade In के आप्शन को भी देख सकते हैं. इसमें पुराने फोन की अनुमानित कीमत नए Apple डिवाइस की खरीददारी में एडजस्ट किया जा सकता है.हालांकि हर पुराने iPhone की कीमत एक जैसी नहीं होती. मॉडल, स्टोरेज, फोन की हालत और दूसरी चीजों के आधार पर कीमत बदल सकती है. इसलिए पहले उसकी अनुमानित वैल्यू देखना जरूरी है.
Ovantica पर भी बेच सकते हैं पुराना iPhone
पुराना iPhone बेचने के लिए Ovantica भी एक अच्छा ऑप्शन है. यहां आप अपने फोन की जानकारी देकर उसकी कीमत का पता लगा सकते हैं. फोन का मॉडल, स्टोरेज और उसकी हालत जैसी चीजों के आधार पर कीमत तय होती है. अगर आपका iPhone अच्छी कंडीशन में है और उसमें कोई बड़ी खराबी नहीं है, तो आपको अच्छी कीमत मिलने की उम्मीद है. नया iPhone लेने से पहले Ovantica पर मिलने वाली कीमत की तुलना दूसरे प्लेटफॉर्म से जरूर कर लें, ताकि आपको बेहतर डील मिल सके.
&amp;nbsp;फोन की हालत से तय होती है कीमत
पुराना iPhone बेचते समय उसकी कीमत सिर्फ मॉडल से तय नहीं होती. फोन की स्क्रीन पर खरोंच है या नहीं, बॉडी की हालत कैसी है, कैमरा और स्पीकर ठीक काम कर रहे हैं या नहीं और बैटरी की स्थिति कैसी है, इन चीजों का भी असर पड़ सकता है. अगर फोन साफ-सुथरा है और उसमें कोई बड़ी खराबी नहीं है तो आपको बेहतर कीमत मिलने की उम्मीद रहती है.
यह भी पढ़ें :&amp;nbsp;Siri की आवाज से हो गए हैं बोर? सेकेंडों में ऐसे बदलें Voice! ये है तरीका ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 11 Sep 2026 19:30:09 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>चांद की बर्फ और क्रेटर मैप करेगा IBM&amp;NASA का AI, जानें कैसे?</title>
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        <description><![CDATA[ चांद को समझने की कोशिश अब सिर्फ फोटो और पुराने मेप्स तक सीमित नहीं रहेगी. वैज्ञानिकों के पास चांद से जुड़ा दशकों का डेटा मौजूद है, लेकिन अलग-अलग मिशनों और डिवाइसों से मिले इस डेटा को समझना और उसका इस्तेमाल करना आसान नहीं है. इसी चुनौती को आसान बनाने के लिए IBM और NASA ने एक नया AI मॉडल पेश किया है.
इसे NASA-IBM Lunar Foundation Model नाम दिया गया है. यह एक ओपन-सोर्स AI मॉडल है, जिसे वैज्ञानिक चांद की सतह से जुड़े डेटा का विश्लेषण करने के लिए इस्तेमाल कर सकेंगे. तो आइए जानते हैंं कि NASA-IBM Lunar Foundation Model कैसे कम करेगा.&amp;nbsp;
NASA-IBM Lunar Foundation Model कैसे कम करेगा
रिपोर्ट के अनुसार, IBM और NASA ने 10 सितंबर 2026 को इस AI मॉडल को सार्वजनिक किया है. इसे चांद के अध्ययन के लिए तैयार किया गया है और इसकी ट्रेनिंग में NASA के चार मिशनों के नौ डिवाइसों से जुटाए गए डेटा की 30 से ज्यादा लेयर्स का इस्तेमाल हुआ है. इसमें Lunar Reconnaissance Orbiter (LRO) से मिला डेटा भी शामिल है. यह मॉडल IBM और NASA के ओपन फाउंडेशन मॉडल परिवार का हिस्सा है, जिसमें भू-स्थानिक और मौसम से जुड़े मॉडल भी शामिल हैं.&amp;nbsp;&amp;nbsp;चांद की बर्फ खोजने में मिलेगी मदद
NASA और IBM का यह मॉडल चांद के उन हिस्सों को समझने में मदद कर सकता है, जहां स्थायी रूप से छाया रहती है. वैज्ञानिक इन क्षेत्रों में संभावित बर्फ के भंडार की तलाश कर रहे हैं. चंद्रमा पर मौजूद बर्फ जरूरी मानी जाती है क्योंकि इससे पानी और ऑक्सीजन जैसे संसाधनों तक पहुंच मिल सकती है. फ्यूचर में इन्हीं संसाधनों का इस्तेमाल चांद पर मानव उपस्थिति और मंगल मिशनों के लिए रॉकेट ईंधन तैयार करने में किया जा सकता है.&amp;nbsp;
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क्रेटर की मैपिंग और लैंडिंग साइट की पहचान
AI मॉडल चांद की सतह पर मौजूद क्रेटर्स की पहचान और मैपिंग में भी मदद कर सकता है. इससे संभावित सुरक्षित लैंडिंग साइट चुनने में वैज्ञानिकों को मदद मिल सकती है. इसके अलावा, मॉडल चांद की ज्वालामुखीय विशेषताओं का अध्ययन करने में भी इस्तेमाल किया जा सकता है. NASA और IBM के मुताबिक, बेंचमार्क टेस्ट में इस मॉडल ने चांद की सतह की जरूरी विशेषताओं को आमतौर पर इस्तेमाल होने वाले मॉडल की तुलना में 23 प्रतिशत ज्यादा सटीकता से पहचाना है.&amp;nbsp;
2028 के Artemis मिशन के लिए जरूरी&amp;nbsp;
NASA का Artemis कार्यक्रम 2028 में अंतरिक्ष यात्रियों को फिर से चांद पर भेजने की योजना पर काम कर रहा है. इस कार्यक्रम का उद्देश्य चांद पर लंबे समय तक मानव मौजूदगी के लिए तकनीकों का परीक्षण करना और फ्यूचर के मंगल मिशनों की तैयारी करना है. ऐसे में NASA-IBM Lunar Foundation Model वैज्ञानिकों को चांद की सतह, संभावित बर्फ और क्रेटर्स से जुड़े बड़े डेटा को तेजी से समझने में मदद कर सकता है.
यह भी पढ़ें - Apple से Samsung तक, किस कंपनी का फोन सबसे महंगा? यहां देखें रेट लिस्ट ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 11 Sep 2026 19:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>AI से लेकर न्यू टेक तक, BRICS में बनेगी Tech Strategy</title>
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        <description><![CDATA[ दुनिया की अर्थव्यवस्था तेजी से बदल रही है और इसी के साथ टेक्नोलॉजी भी ग्लोबल सहयोग का बड़ा हिस्सा बनती जा रही है. नई दिल्ली में हो रहे BRICS Summit 2026 में ट्रेड और निवेश के साथ AI, सेमीकंडक्टर, डिजिटल सर्विसेज और स्टार्टअप जैसे टेक सेक्टर्स पर भी खास फोकस देखने को मिल रहा है. भारत की BRICS अध्यक्षता में इन क्षेत्रों में सदस्य देशों के बीच सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है. ऐसे में यह समिट सिर्फ आर्थिक मुद्दों तक सीमित नहीं है, बल्कि नई टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में साथ मिलकर आगे बढ़ने की दिशा भी तय कर रहा है. &amp;nbsp;
AI और डिजिटल सर्विसेज पर बढ़ेगा सहयोग
जितिन प्रसाद ने AI और डिजिटल सर्विसेज को BRICS देशों के लिए नए अवसरों वाला सेक्टर बताया. उन्होंने कहा कि सदस्य देशों को एक-दूसरे के सहयोग से आगे बढ़ना चाहिए और ट्रेड साथ ही सर्विसेज में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की जरूरत है. डिजिटल सर्विसेज में नए मौके पैदा हो रहे हैं और AI के क्षेत्र में मिलकर काम करने से इसका फायदा उठाया जा सकता है. उन्होंने AI को ग्लोबल साउथ के लिए जरूरी टेक्नोलॉजी बताया.&amp;nbsp;
BRICS में Tech Strategy&amp;nbsp;
BRICS में Tech Strategy बनाने के लिए सदस्य देश AI, सेमीकंडक्टर, डिजिटल सर्विसेज, डेटा सेंटर और स्टार्टअप जैसे टेक क्षेत्रों में आपसी सहयोग बढ़ाने पर काम करेंगे. इसमें टेक्नोलॉजी और इनोवेशन को शेयर करने, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने और सदस्य देशों के बीच नई टेक पहल को जोड़ने पर जोर रहेगा. भारत अपनी BRICS अध्यक्षता में AI और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों को खास प्राथमिकता दे रहा है, जिससे सदस्य देश मिलकर टेक्नोलॉजी और डिजिटल इकोनॉमी में आगे बढ़ सकें.
BRICS में सेमीकंडक्टर भी एजेंडा
BRICS Summit में सेमीकंडक्टर सेक्टर को भी जरूरी माना गया है. भारत इस क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है और Semiconductor Mission 2.0 की शुरुआत कर चुका है. भारत ने BRICS सदस्य देशों को इस सेक्टर में साथ जुड़ने के लिए आमंत्रित किया है. भारत अपनी सेमीकंडक्टर पहल को BRICS के सभी सदस्य देशों के साथ साझा करने के लिए तैयार है.&amp;nbsp;
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स्टार्टअप और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर पर जोर
टेक्नोलॉजी के साथ स्टार्टअप और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर भी चर्चा के केंद्र में हैं. भारत ने Digital Public Infrastructure को बढ़ावा देने के लिए कई जरूरी कदम उठाए हैं. वहीं भारत की BRICS अध्यक्षता के दौरान BRICS Incubator Network और BRICS Startup Innovation Fund जैसे प्रस्ताव भी संभावित नतीजों में शामिल हैं. इनका उद्देश्य स्टार्टअप और इनोवेशन के लिए सहयोग का रास्ता मजबूत करना है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Fri, 11 Sep 2026 19:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>iPhone Duo महंगा क्यों? Software में छिपा है असली खेल</title>
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        <description><![CDATA[ फोल्डेबल फोन की दुनिया में Apple की एंट्री भले देर से हुई हो, लेकिन iPhone Duo के साथ कंपनी ने एक ऐसा फोन पेश करने की कोशिश की है, जिसमें सिर्फ फोल्ड होने वाली स्क्रीन पर ध्यान नहीं दिया गया है. इसका डिजाइन और कई हार्डवेयर फीचर्स Android फोल्डेबल फोन में पहले से देखने को मिल चुके हैं. ऐसे में असली फर्क उस सॉफ्टवेयर एक्सपीरियंस का है, जिसे Apple ने खासतौर पर फोल्डेबल स्क्रीन के हिसाब से तैयार किया है.
भारत में iPhone Duo शुरुआती कीमत 2,99,900 रुपये है, ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर इस फोन की इतनी ज्यादा कीमत की वजह क्या है. तो आइए जानते हैं कि iPhone Duo इतना महंगा क्यों है.&amp;nbsp;
iPhone Duo के हार्डवेयर में क्या है खास?
iPhone Duo का डिजाइन चौड़ा और पासपोर्ट जैसा है, हालांकि Samsung, Huawei और Xiaomi जैसे ब्रांड इसी तरह के फोल्डेबल फोन पहले ही बाजार में ला चुके हैं. Apple ने डिस्प्ले की क्रीज को कम दिखाई देने वाली बनाने पर भी काफी काम किया है. इसमें 100 से ज्यादा कंपोनेंट वाला हिंज, खास एडहेसिव और मैट फिनिश का इस्तेमाल किया गया है. Duo में 5.4 इंच का बाहरी और 7.6 इंच का अंदरूनी Super Retina XDR डिस्प्ले मिलता है. वहीं दोनों स्क्रीन 120Hz ProMotion, Always-On Display और 3,000 निट्स तक की आउटडोर ब्राइटनेस सपोर्ट करती हैं. फोन में Grade 5 Titanium फ्रेम, Ceramic Shield 2 और IP68 रेटिंग भी है.&amp;nbsp;
iPhone Duo इतना महंगा क्यों है?
iPhone Duo की सबसे खास बात इसका सॉफ्टवेयर है. Apple ने iOS 27 को फोल्डेबल स्क्रीन के लिए अलग तरह से डिजाइन किया है. इंटरफेस में कंट्रोल और नेविगेशन को किनारे की तरफ ले जाया गया है, जिससे बड़ी स्क्रीन पर कंटेंट के लिए ज्यादा जगह मिलती है. फोन को खोलने पर बाहर और अंदर स्क्रीन के बीच बदलाव भी काफी सहज रखा गया है. Dynamic Island को भी दोनों डिस्प्ले के हिसाब से दोबारा डिजाइन किया गया है. स्क्रीन खुलते समय इंटरफेस में डायनेमिक ब्लर इफेक्ट दिखाई देता है, जिससे पूरा एक्सपीरियंस ज्यादा फ्लूइड लगता है.
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डेवलपर्स के लिए भी बड़ा बदलाव
Apple सिर्फ अपने सॉफ्टवेयर तक सीमित नहीं रहना चाहता है. कंपनी चाहती है कि डेवलपर्स भी Duo की फोल्डेबल स्क्रीन का पूरा फायदा उठाएं. Netflix, Slack और Zoom जैसे ऐप्स में Duo के लिए कस्टम सपोर्ट दिखाया गया है, जो फोन के हिंज के एंगल के हिसाब से भी बदल सकता है.&amp;nbsp;
कैमरा और बैटरी भी खास
Duo में 48MP का Dual Fusion कैमरा सिस्टम है. इसमें 48MP Fusion Main और 48MP Fusion Ultra Wide कैमरा मिलता है. बाहरी स्क्रीन रियर कैमरे से फोटो लेते समय लाइव प्रीव्यू की तरह काम कर सकती है. &amp;nbsp;फोन में Dual Battery Architecture दिया गया है. Apple के मुताबिक अंदरूनी स्क्रीन पर 31 घंटे और बाहरी स्क्रीन पर 44 घंटे तक वीडियो प्लेबैक मिल सकता है. A20 Pro चिप और C2 मॉडेम भी इसकी पावर एफिशिएंसी में मदद करते हैं.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Fri, 11 Sep 2026 19:30:06 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>iPhone 18 Pro में आया गजब का फीचर! अब Apple खुद बताएगा फोटो असली है या नकली</title>
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        <description><![CDATA[ iPhone 18 Pro में आया गजब का फीचर! अब Apple खुद बताएगा फोटो असली है या नकली ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 11 Sep 2026 03:30:09 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>3 लाख वाला iPhone Duo खरीदना कितना सही, क्या यह दुनिया का सबसे महंगा फोन?</title>
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        <description><![CDATA[ Apple ने अपना पहला फोल्डेबल iPhone लॉन्च कर दिया है. कंपनी ने iPhone Duo को iPhone 18 Pro और iPhone 18 Pro Max के साथ पेश किया है. फोल्डेबल iPhone को लेकर लंबे समय से चर्चा थी, लेकिन लॉन्च के बाद अब सबसे ज्यादा बात इसके फीचर्स से ज्यादा इसकी कीमत को लेकर हो रही है. भारत में iPhone Duo की शुरुआती कीमत 2,99,900 रुपये है. iPhone Duo खरीदने के लिए आपको एक महंगी कार या किसी बड़े निवेश जितनी रकम खर्च करनी पड़ सकती है.
कई लोगों के लिए यह रकम पूरे साल की कमाई या सालभर के पैकेज के बराबर हो सकती है. ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि आखिर एक स्मार्टफोन पर इतने पैसे खर्च करना कितना सही है. खासकर जब iPhone Duo के टॉप वेरिएंट की कीमत 4,49,900 रुपये तक पहुंच जाती है. ऐसे में आइए जानते हैं कि 3 लाख वाला iPhone Duo खरीदना कितना सही है और क्या यह दुनिया का सबसे महंगा फोन है.&amp;nbsp;
iPhone Duo की कीमत कितनी है?
भारत में iPhone Duo चार स्टोरेज वेरिएंट में लॉन्च हुआ है. इसके 256GB मॉडल की कीमत 2,99,900 रुपये है. 512GB के लिए 3,24,900 रुपये, 1TB मॉडल के लिए 3,74,900 रुपये और 2TB वेरिएंट के लिए 4,49,900 रुपये देने होंगे. फोन स्टार व्हाइट और नाइट स्काई दो कलर ऑप्शन में उपलब्ध है. अमेरिका में इसकी शुरुआती कीमत 1,999 डॉलर यानी करीब 1.90 लाख रुपये बताई गई है. इस हिसाब से भारत में बेस मॉडल के लिए अमेरिकी कीमत की तुलना में करीब 1.09 लाख रुपये ज्यादा चुकाने पड़ते हैं.&amp;nbsp;
3 लाख वाला iPhone Duo खरीदना कितना सही है?
3 लाख रुपये वाला iPhone Duo खरीदना उन लोगों के लिए ही सही कहा जा सकता है जिन्हें फोल्डेबल डिजाइन, बड़ी इनर डिस्प्ले और Apple के नए फीचर्स की खास जरूरत है. अगर आपकी प्रिफरेंस सामान्य फोन, कैमरा, सोशल मीडिया और रोजमर्रा के काम तक सीमित है, तो इतनी रकम खर्च करने जरूरी नहीं है, लेकिन अगर आप Apple के पहले फोल्डेबल एक्सपीरियंस के लिए प्रीमियम कीमत देने को तैयार हैं, तो iPhone Duo अच्छा ऑप्शन हो सकता है.
यह भी पढ़ें - iPhone 18 Pro में ये 10 बड़े बदलाव, पुराने मॉडल से कितना एडवांस्ड?
क्या है iPhone Duo में खास?
iPhone Duo Apple का पहला फोल्डेबल iPhone है. फोल्ड होने पर इसमें 5.4 इंच की Super Retina XDR आउटर डिस्प्ले मिलती है, जबकि अनफोल्ड करने पर 7.6 इंच की बड़ी स्क्रीन मिलती है. इन दोनों डिस्प्ले ProMotion, Always-On और 3,000 निट्स तक पीक ब्राइटनेस सपोर्ट करती हैं. फोन में 48MP Fusion प्राइमरी और 48MP अल्ट्रा-वाइड कैमरा दिया गया है. सेल्फी के लिए 12MP सेंसर मिलता है. फोल्डेबल डिजाइन के साथ Duo Preview और Split View मल्टीटास्किंग जैसे फीचर्स भी दिए गए हैं.&amp;nbsp;
क्या यह दुनिया का सबसे महंगा फोन?
iPhone Duo दुनिया का सबसे महंगा फोन नहीं है. यह Apple का अब तक का सबसे महंगा iPhone जरूर है, जिसकी भारत में शुरुआती कीमत 2,99,900 रुपए और 2TB मॉडल की कीमत 4,49,900 रुपए तक है. हालांकि, दुनिया में कुछ ऐसे प्रीमियम और लग्जरी फोन भी मौजूद हैं जिनकी कीमत iPhone Duo से कहीं ज्यादा है.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ें - iPhone के साथ Apple ने और क्या फोड़ा बम? पूरी लॉन्च लिस्ट देखें ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 11 Sep 2026 03:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>लाख, वाला, iPhone, Duo, खरीदना, कितना, सही, क्या, यह, दुनिया, का, सबसे, महंगा, फोन</media:keywords>
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        <title>Cloud के बिना चलेगा AI? Nvidia के नए सिस्टम ने चौंकाया</title>
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        <description><![CDATA[ AI के लिए हर बार Cloud का सहारा लेना जरूरी नहीं होगा. आपके घर में मौजूद अलग-अलग कंप्यूटर भी मिलकर AI के काम को संभाल सकते हैं. NVIDIA ने IFA 2026 में अपने नए Personal AI Router यानी PAIR का ऐलान किया है. खास बात यह है कि PAIR कोई Hardware Router नहीं, बल्कि एक Free और Open-Source Software है, जो घर के PCs को आपस में जोड़कर लोकल AI इंटरफेरेंस टास्क को पूरा करने में मदद करता है. यह Ollama और LM Studio जैसे टूल्स के साथ काम करता है. तो आइए जानते हैं कि NVIDIA PAIR कैसे काम करेगा.&amp;nbsp;
NVIDIA PAIR कैसे करेगा काम?
PAIR Local Network पर मौजूद कम्पेटेबल कंप्यूटर को अपने आप ढूंढता है और उन्हें AI वर्कलोड के लिए कनेक्ट करता है. इसकी खासियत यह है कि यह उन कंप्यूटर की प्रोसेसिंग पावर का इस्तेमाल करता है, जब किसी PC पर गेमिंग या दूसरा काम चल रहा है, तो PAIR दूसरे अवेलेबल सिस्टम पर AI का काम भेज सकता है.
Agentic AI में बड़े कामों को कई छोटे टास्क में बांटा जा सकता है. PAIR इन अलग-अलग टास्क को नेटवर्क पर मौजूद कंप्यूटर में डिस्ट्रिब्यूट कर सकता है, जिससे एक ही GPU पर सारा प्रोसेसिंग लोड नहीं पड़ता. NVIDIA के मुताबिक, डिवाइस नेटवर्क में जुड़ते या हटते रहें, PAIR उसके हिसाब से भी अडेप्ट कर सकता है.
किन कंप्यूटर पर चलेगा PAIR?
PAIR मुख्य रूप से NVIDIA GeForce RTX GPUs वाले सिस्टम के साथ काम करता है. इसमें RTX 20 Series और उसके बाद के GPUs, RTX Pro GPUs और DGX Spark Systems शामिल हैं. इसके अलावा Apple M4 या उससे नए चिप वाले सिस्टम भी इसका इस्तेमाल कर सकते हैं. NVIDIA के मुताबिक, PAIR Beta Windows, Linux और macOS के लिए उपलब्ध है. इसे ग्राफिकल और टर्मिनल दोनों इंटरफेस के जरिए इस्तेमाल किया जा सकता है.
क्या PAIR सुरक्षित है?
NVIDIA ने PAIR में Devices को कनेक्ट करने के लिए &amp;nbsp;6 डिजिट पैरिंग कोड का इस्तेमाल किया है. इसके बाद कंप्यूटर के बीच कम्युनिकेशन को mTLS यानी Mutual Transport Layer Security के जरिए सिक्योर किया जाता है. इससे दोनों सिस्टम के बीच Encrypted Communication Channel तैयार होता है.
यह भी पढ़ें - YouTube Videos कैसे डाउनलोड करें? जानें कौन-सा तरीका है पूरी तरह Legal&amp;nbsp;Local AI को मिलेगा नया Boost
NVIDIA के मुताबिक, PAIR घर के Idle PCs की अनयूज्ड कंप्यूटर पावर को एक साथ जोड़कर लोकल AI टास्क को तेज करने में मदद करेगा. इसके साथ llama.cpp और vLLM के नए ऑप्टिमाइजेशन भी पेश किए गए हैं, जिससे लोकल AI इंफेरेंस की परफॉर्मेंस बेहतर हो सकती है. वहीं Hermes Agent, OpenClaw और Perplexity Portable Computer के लिए लोकल सेटअप को आसान बनाया गया है.
अक्टूबर में आएंगे RTX Spark PCs
NVIDIA के नए RTX Spark Windows PCs अक्टूबर 2026 में लॉन्च होंगे. कंपनी इन्हें AI Agents और Local AI Workloads के लिए तैयार कर रही है, जिससे यूजर्स को AI को अपने ही System पर चलाने के लिए नए ऑप्शन मिलेंगे.
यह भी पढ़ें - Meta Muse करेगा Email से Payment तक का काम, कैसे चलेगा AI Agent? ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 11 Sep 2026 03:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>Apple Wallet और Apple Pay में क्या है फर्क? कहीं आप भी तो नहीं कर रहे बड़ी गलती</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/apple-wallet-और-apple-pay-में-क्या-है-फर्क-कहीं-आप-भी-तो-नहीं-कर-रहे-बड़ी-गलती</link>
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        <description><![CDATA[ Apple Wallet और Apple Pay में क्या है फर्क? कहीं आप भी तो नहीं कर रहे बड़ी गलती ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 11 Sep 2026 03:30:05 +0530</pubDate>
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        <title>Apple का Siri AI अब 3 लाख ऐप्स से जुड़ेगा, फोन का इस्तेमाल कैसे बदलेगा?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/apple-का-siri-ai-अब-3-लाख-ऐप्स-से-जुड़ेगा-फोन-का-इस्तेमाल-कैसे-बदलेगा</link>
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        <description><![CDATA[ Apple ने Siri को वॉयस असिस्टेंट से आगे ले जाने की तैयारी कर ली है. कंपनी का नया Siri AI अब यूजर्स की बात समझकर अलग-अलग ऐप्स के अंदर मौजूद जानकारी और फीचर्स के साथ काम कर सकेगा. Apple के मुताबिक, ये सिस्टम 3 लाख से ज्यादा ऐप्स के साथ काम करने की क्षमता रखता है. इससे iPhone इस्तेमाल करने का तरीका काफी बदल सकता है.
सिर्फ कमांड नहीं, काम भी करेगा Siri
आपको बता दें कि पुराने Siri में नॉर्मली अलार्म लगाने, मौसम पूछने या कॉल करने जैसे लिमिटेड काम किए जाते थे. नया Siri AI ज्यादा नैचुरल लैंग्वेज समझने के लिए डिजाइन किया गया है. यानी यूजर को किसी खास कमांड को याद रखने की जरूरत नहीं होगी.
Apple के मुताबिक Siri AI स्क्रीन पर मौजूद जानकारी को समझ सकता है, पर्सनल कॉन्टेक्स्ट के आधार पर जवाब दे सकता है और जरूरत पड़ने पर अलग-अलग ऐप्स में बदलाव भी कर सकता है.
ऐप खोलने की जरूरत होगी कम
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इस बदलाव का सबसे बड़ा असर डेली के ऐप इस्तेमाल पर पड़ सकता है. जैसे यूजर Siri से कह सकता है कि किसी मैसेज के आधार पर रिमाइंडर बना दो या किसी फोटो को एडिट करके शेयर कर दो. Siri जरूरत के मुताबिक उस ऐप के फीचर तक खुद पहुंच सकती है.
Apple ने बताया है कि Siri AI Messages, Music, Reminders जैसे ऐप्स में एक्शन या बदलाव भी कर सकती है. बता दें कि कंपनी का गोल है कि यूजर को हर छोटे काम के लिए ऐप खोलकर अलग-अलग स्क्रीन पर जाने की जरूरत न पड़े.
यह भी पढ़ें: 9 सितंबर को लॉन्च हुआ iPhone, 18 सितंबर से क्यों बिकेगा? जानें वजह
3 लाख ऐप्स से जुड़ने का मतलब क्या है?
दरअसल, यहां 3 लाख ऐप्स का मतलब ये नहीं है कि Siri हर ऐप का हर काम अपने आप कर पाएगी. ऐप डेवलपर्स को अपने ऐप के कंटेंट और फीचर्स को Apple Intelligence के लिए उपलब्ध कराने के लिए App Intents और संबंधित स्कीमा का इस्तेमाल करना होगा. Apple के डेवलपर डॉक्यूमेंट के मुताबिक, इससे ऐप के डेटा और एक्शन Siri और Apple Intelligence के लिए खोजने योग्य बनते हैं. यानी धीरे-धीरे ज्यादा ऐप्स Siri के साथ गहराई से जुड़ेंगे और यूजर नैचुरल लैंग्वेज में उनसे जुड़े काम कर सकेगा.
एक ऐप से दूसरे ऐप तक पहुंचेगा AI
बताते चलें कि Siri AI का एक और बड़ा बदलाव है क्रॉस-ऐप काम करना. Apple Intelligence ऐप्स के डेटा और एक्शन को समझकर जरूरत के मुताबिक उन्हें एक साथ इस्तेमाल कर सकता है. जैसे Siri किसी जानकारी को एक ऐप से लेकर दूसरे ऐप में इस्तेमाल करने में मदद कर सकती है.
इससे iPhone केवल ऐप्स का कलेक्शन नहीं बल्कि एक ऐसा सिस्टम बन सकता है जहां यूजर काम बताएगा और Siri उसके लिए जरूरी ऐप्स को पीछे से इस्तेमाल करेगी.
यह भी पढ़ें:
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        <pubDate>Fri, 11 Sep 2026 03:30:04 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>iPhone के साथ Apple ने और क्या फोड़ा बम? पूरी लॉन्च लिस्ट देखें</title>
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        <description><![CDATA[ Apple के Surprise and Shine इवेंट में इस बार सिर्फ नए iPhone की एंट्री नहीं हुई, बल्कि कंपनी ने अपनी iPhone लाइनअप में एक बड़ा बदलाव भी किया है. 9 सितंबर को हुए Apple Event में iPhone 18 Pro और iPhone 18 Pro Max के साथ कंपनी ने अपना पहला फोल्डेबल iPhone Duo भी पेश किया है. इसके अलावा नई जनरेशन के Apple Watch और AirPods भी लॉन्च किए गए हैं.
वहीं Apple ने नए AirPods 5 और Apple Watch Series 12 के साथ Watch Ultra 4 को भी लॉन्च किया है. &amp;nbsp;Apple का यह इवेंट एक साथ कई प्रोडक्ट कैटेगरी के लिए बड़ा अपडेट लेकर आया है. नए CEO John Ternus ने भी इवेंट में Apple के नए iPhone Duo और दूसरी डिवाइस को कंपनी के Intelligent Personal Hub के तौर पर पेश किया.&amp;nbsp;
iPhone 18 Pro और 18 Pro Max हुए लॉन्च
इवेंट की सबसे बड़ी लॉन्चिंग iPhone 18 Pro और iPhone 18 Pro Max रही. इन दोनों मॉडल में A20 Pro चिप दी गई है, जिसे Apple ने iPhone की अब तक की सबसे तेज चिप बताया है. कंपनी ने Intelligence, Performance, Battery और Camera में बड़े बदलाव किए हैं. iPhone 18 Pro चार कलर ऑप्शन Deep Black, Silver, Glacier और Burgundy में आया है.
A20 Pro चिप को मिला बड़ा अपग्रेड
iPhone 18 Pro में नई A20 Pro चिप दी गई है, जो 2nm Architecture पर आधारित है. इसमें 6-Core CPU, 7-Core GPU और 32-Core Neural Engine दिया गया है. Apple के मुताबिक नए Super Cores 20 प्रतिशत तक तेज हैं और GPU Performance में 40 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हुई है. Neural Engine की Compute Power भी 2 गुना हुई है.&amp;nbsp;
AirPods 5 भी हुए लॉन्च
Apple ने AirPods 5 भी पेश किए हैं. इनमें Redesigned Open-Ear Design, नया Multi-Port Acoustic Architecture और Next-Generation Adaptive EQ दिया गया है. कंपनी के मुताबिक नए AirPods में Active Noise Cancellation के साथ पिछली पीढ़ी की तुलना में 50 प्रतिशत ज्यादा Noise Reduction मिलता है.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ें - Apple iPhone 18 Launch : कितनी फास्ट है Apple की नई A20 प्रो चिप, फोन को कितना करेगी तेज?
Apple का पहला फोल्डेबल iPhone Duo लॉन्च 
Apple ने आखिरकार अपना पहला फोल्डेबल iPhone, iPhone Duo लॉन्च कर दिया है. यह डिवाइस दो स्क्रीन के साथ पेश किया गया है और खुलने पर 7.6 इंच का बड़ा इनर डिस्प्ले देता है. इसका डिजाइन पासपोर्ट जैसा है, जबकि फोल्ड होने पर इसे आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है. Apple ने इसमें ऐसा फोल्डेबल डिजाइन दिया है, जिसमें डिस्प्ले को फ्लैट रखने और क्रीज को कम दिखाने पर खास फोकस किया गया है. iPhone Duo में डुअल रियर कैमरा सेटअप दिया गया है और यह Apple के नए चिपसेट के साथ आता है.&amp;nbsp;
Apple Watch Series 12 और Ultra 4 की एंट्री
इवेंट में Apple Watch Series 12 और Apple Watch Ultra 4 भी लॉन्च किए गए. इनमें नया Health Sensing System दिया गया है. Apple के मुताबिक अब Background Heart Rate Readings हर पांच सेकंड में ली जाएंगी. इसके साथ Heart Rate Variability यानी HRV को भी ज्यादा बार Sample किया जाएगा.
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        <pubDate>Thu, 10 Sep 2026 11:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>Apple का पहला फोल्डेबल iPhone Duo लॉन्च! कीमत से फीचर्स तक जानें सबकुछ</title>
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        <description><![CDATA[ Apple का बहुप्रतिक्षित फोल्डेबल फोन आखिरकार लॉन्च हो गया है. हालांकि, इस फोन को लेकर कई सारी चर्चाएं चल रही थीं. लेकिन कंपनी ने अपने पहले फोल्डेबल फोन को iPhone Duo नाम से लॉन्च किया है. बता दें कि कंपनी ने इस फोन को इस तरह से डिजाइन किया है कि यूजर्स को बंद होने पर कॉम्पैक्ट iPhone का एक्सपीरिएंस मिले जबकि खोलने पर बड़ी स्क्रीन का फायदा मिल सके. कंपनी का कहना है कि ये फोन मल्टीटास्किंग, गेमिंग और वीडियो देखने के लिए यूजर्स को बेस्ट एक्सपीरिएंस देगा.
शानदार कैमरा सेटअप
इस फोन के कैमरा सेटअप पर नजर डालें तो इसमें कंपनी ने ट्रिपल कैमरा की जगह पर डुआल कैमरा सेटअप दिया है. इसमें 48 मेगापिक्सल का Fusion Main कैमरा है और 48MP का Fusion Ultra Wide कैमरा दिया गया है.
इसके अलावा फोन में Apple Intelligence और Siri AI का सपोर्ट भी मिलता है. इन फीचर्स के जरिए Apple यूजर्स को ज्यादा पर्सनलाइज्ड और स्मार्ट एक्सपीरिएंस देने की कोशिश कर रहा है.
मिले जबरदस्त फीचर्स

This is the iPhone Duo, starting at $1,999 #AppleEvent pic.twitter.com/5VithPkI5v
&amp;mdash; Apple Hub (@theapplehub) September 9, 2026



आपको बता दें कि iPhone Duo की सबसे बड़ी खासियत इसका फोल्डेबल डिस्प्ले है. इस फोन में कंपनी ने 7.6 इंच का Super Retina XDR डिस्प्ले उपलब्ध कराया है जो अब तक किसी भी आईफोन में नहीं दिया गया था. इसके अलावा इस फोन के बाहर में 5.4 इंच की डिस्प्ले दी गई है. दोनों डिस्प्ले में ProMotion, Always-On Display और आउटडोर में 3,000 निट्स तक की ब्राइटनेस का सपोर्ट मिल जाता है. इसके अलावा फोन में IP68 रेटिंग मिलती है जिसका मतलबब है कि ये फोल्डेबल फोन पानी और धूल से सुरक्षित रहेगा.
दमदार प्रोसेर
iPhone Duo में Apple का नया A20 Pro चिपसेट प्रोसेसर दिया गया है. इसके अलावा फोन में कस्टम वेपर चैंबर भी दिया गया है जो फोन को हीट होने से बचाने में मदद करता है. साथ ही फोन में डुअल-बैटरी सिस्टम मौजूद है. कंपनी का दावा है कि ये फोन यूजर्स को करीब 24 घंटों का जबरदस्त बैकअप देने में सक्षम होगा.
यह भी पढ़ें: Apple का AI अब सिर्फ iPhone में नहीं? Siri से लेकर Smart Home तक बड़ा प्लान
कितनी है iPhone Duo की कीमत
कंपनी ने भारत में Apple iPhone Duo की शुरुआती कीमत 2,99,900 रुपये रखी गई है. ये फोन 256GB से लेकर 2TB तक के स्टोरेज ऑप्शनों में उपलब्ध होगा. कंपनी ने इस फोन को Star White और Night Sky शेड में पेश किया है. इसके अलावा इस फोन के प्री-ऑर्डर 16 अक्टूबर से शुरू होंगे और इसकी बिक्री 23 अक्टूबर से शुरू होगी.
Apple का फोल्डेबल सेगमेंट में बड़ा कदम
बता दें कि iPhone Duo के साथ Apple ने फोल्डेबल स्मार्टफोन बाजार में अपनी पहली मौजूदगी दर्ज कराई है. बड़ी स्क्रीन, प्रीमियम डिजाइन, A20 Pro चिप और iOS 27 के नए फीचर्स इसे कंपनी के मौजूदा iPhone मॉडल्स से अलग बनाते हैं. अब देखना होगा कि करीब 3 लाख रुपये की शुरुआती कीमत वाला ये फोल्डेबल iPhone ग्राहकों के बीच कितना फेमश होता है.
यह भी पढ़ें:
1199 डॉलर की कीमत के साथ लॉन्च हुआ iPhone 18 Pro और Pro Max! जानें फीचर्स ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 10 Sep 2026 11:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>$1299 वाला iPhone 18 Pro Max भारत में कितने का मिलेगा? 4 साल के डेटा से समझें</title>
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        <description><![CDATA[ Apple ने iPhone 18 Pro Max को अमेरिका में 1,299 डॉलर की शुरुआती कीमत के साथ लॉन्च किया है. ये कीमत पिछले साल के iPhone 17 Pro Max के मुकाबले 100 डॉलर ज्यादा है. ऐसे में भारतीय ग्राहकों के मन में सबसे बड़ा सवाल है कि आखिर ये फोन भारत में कितने रुपये का पड़ेगा? पिछले चार साल में iPhone Pro Max की अमेरिका और भारत की लॉन्च कीमतों को देखें तो इसका एक दिलचस्प पैटर्न सामने आता है.
चार साल में अमेरिका और भारत की कीमत का अंतर
अगर 2022 से 2025 तक के आंकड़ों पर नजर डालें तो iPhone Pro Max की अमेरिकी शुरुआती कीमत और भारत में इसकी कीमत के बीच अच्छा-खासा अंतर रहा है. 2022 में iPhone 14 Pro Max की अमेरिकी कीमत 1,099 डॉलर थी जबकि भारत में इसका शुरुआती दाम 1,39,900 रुपये था.
2023 में Apple ने iPhone 15 Pro Max की अमेरिकी कीमत 1,199 डॉलर रखी. भारत में इसका 256GB मॉडल 1,59,900 रुपये में लॉन्च हुआ.
2024 में iPhone 16 Pro Max की अमेरिकी कीमत 1,199 डॉलर पर ही रही लेकिन भारत में शुरुआती कीमत घटकर 1,44,900 रुपये हो गई. ये 256GB मॉडल के लिए थी.
2025 में iPhone 17 Pro Max की अमेरिकी कीमत फिर 1,199 डॉलर रही जबकि भारत में इसका शुरुआती दाम 1,49,900 रुपये था.
यानी पिछले चार साल में भारत में Pro Max की शुरुआती कीमत 1,39,900 रुपये से बढ़कर 1,49,900 रुपये तक पहुंची है. बीच में 2024 में कीमत में कमी भी देखने को मिली.
अब 1,299 डॉलर की कीमत से कितना बढ़ेगा दाम?
iPhone 18 Pro Max के लिए कंडीशन थोड़ी अलग है. इस बार अमेरिका में ही Apple ने कीमत 100 डॉलर बढ़ाकर 1,299 डॉलर कर दी है. यानी सिर्फ डॉलर की कीमत में बदलाव नहीं हुआ है बल्कि भारत में भी इसका असर देखने को मिलेगा.
अगर पिछले वर्षों में अमेरिका और भारत के बीच बने कीमत के अंतर को आधार मानें तो 1,299 डॉलर वाले iPhone 18 Pro Max की भारतीय शुरुआती कीमत करीब 1,64,900 रुपये से 1,69,900 रुपये के बीच हो सकती है.
यह भी पढ़ें: 1199 डॉलर की कीमत के साथ लॉन्च हुआ iPhone 18 Pro और Pro Max! जानें फीचर्स
इसके अलावा अगर iPhone 17 Pro Max भारत में 1,49,900 रुपये से शुरू हुआ था. अगर Apple अमेरिकी कीमत में 100 डॉलर की बढ़ोतरी का एक बड़ा हिस्सा भारतीय कीमत में भी जोड़ता है तो करीब 10,000 से 15,000 रुपये की बढ़ोतरी संभव दिखाई देती है. इस हिसाब से कीमत लगभग 1,59,900 से 1,64,900 रुपये तक पहुंच सकती है.
1.7 लाख रुपये तक जा सकती है शुरुआती कीमत
हालांकि टैक्स, करेंसी एक्सचेंज रेट, भारत में Apple की प्राइसिंग प्लानिंग और इंपोर्ट/लोकल मैन्युफैक्चरिंग जैसे कारण डिवाइस की फाइनल कीमत पर असर डाल सकते हैं. दिलचस्प बात ये है कि लॉन्च से पहले कुछ रिपोर्ट्स में iPhone 18 Pro Max की भारत में कीमत करीब 1,59,900 रुपये बताई गई थी, जबकि कुछ अनुमानों में ये 1,69,900 रुपये तक जाने की बात कही गई.
भारत में कितनी बढ़ सकती है कीमत?
अगर पिछले चार साल के ट्रेंड और इस साल अमेरिका में हुई 100 डॉलर की बढ़ोतरी को मिलाकर देखें तो iPhone 18 Pro Max की भारत में शुरुआती कीमत लगभग 1.60 लाख से 1.70 लाख रुपये के बीच बैठ सकती है. यानी iPhone 17 Pro Max के 1,49,900 रुपये के मुकाबले करीब 10,000 से 20,000 रुपये तक की बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है.
इसका मतलब है कि भारतीय ग्राहकों को इस बार Pro Max खरीदने के लिए पहले के मुकाबले ज्यादा बजट रखना पड़ सकता है. वहीं, 512GB और 1TB जैसे ज्यादा स्टोरेज वेरिएंट की कीमत इससे काफी ऊपर जा सकती है.
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        <pubDate>Thu, 10 Sep 2026 11:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>Siri की आवाज से हो गए हैं बोर? सेकेंडों में ऐसे बदलें Voice! ये है तरीका</title>
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        <description><![CDATA[ अगर आप लंबे समय से iPhone इस्तेमाल कर रहे हैं और Siri की एक ही आवाज सुन-सुनकर बोर हो चुके हैं तो आपके लिए अच्छी खबर है. Apple iPhone में Siri की आवाज बदलने का ऑप्शन देता है. इतना ही नहीं, आप उपलब्ध ऑप्शनों के अनुसार Siri की Voice और Language भी बदल सकते हैं. इसके लिए किसी थर्ड-पार्टी ऐप की जरूरत नहीं पड़ती है. आइए जानते हैं क्या है तरीका.
Siri की आवाज बदलना है बेहद आसान
Siri की आवाज बदलने का प्रोसेस काफी आसान है. इसके लिए सबसे पहले अपने iPhone में Settings ऐप खोलें. इसके बाद नीचे स्क्रॉल करके Siri या Apple Intelligence &amp;amp; Siri वाले ऑप्शन पर जाएं. iOS के वर्जन के हिसाब से इस सेटिंग का नाम थोड़ा अलग हो सकता है. अब यहां आपको Siri से जुड़ी कई सेटिंग्स दिखाई देंगी. इनमें Voice या Siri Voice का ऑप्शन सर्च करें और उस पर टैप करें.
कुछ सेकेंड में चुनें नई Voice
आपको बता दें कि Siri Voice के अंदर जाने के बाद आपको उपलब्ध अलग-अलग Voice ऑप्शन दिखाई दे सकते हैं. यहां किसी Voice पर टैप करके उसे चुना जा सकता है. कुछ ऑप्शनों में अलग-अलग Variety/Accent भी उपलब्ध होते हैं.
किसी Voice को चुनने के बाद iPhone उसे डाउनलोड कर सकता है. इसके लिए इंटरनेट कनेक्शन की जरूरत पड़ती है. डाउनलोड पूरा होने के बाद Siri आपकी चुनी हुई आवाज में जवाब देने लगेगी.
Language भी बदल सकते हैं
अगर आप Siri को किसी दूसरी लैंग्वेज में इस्तेमाल करना चाहते हैं तो ये ऑप्शन भी इसी सेटिंग सेक्शन में मिल जाएगा. Settings &gt; Siri/Apple Intelligence &amp;amp; Siri &gt; Language पर जाकर उपलब्ध भाषा में से अपनी पसंद की लैंग्वेज चुन सकते हैं.
यह भी पढ़ें: Foldable iPhone में नहीं मिलेंगे ये फीचर्स! Face ID भी हो सकता है गायब
Siri की आवाज बदलने से क्या बदलेगा?
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि Voice बदलने से आपके iPhone की बाकी आवाजों पर कोई असर नहीं पड़ता है. बदलाव मुख्य रूप से Siri के बोलने के तरीके और आवाज तक सीमित रहता है. यानी म्यूजिक, रिंगटोन, नोटिफिकेशन या दूसरे ऑडियो की आवाज पहले जैसी ही रहती है.
ये फीचर खासतौर पर उन लोगों के लिए फायदेमंद है जो रोजाना Siri का इस्तेमाल करते हैं और अपने iPhone के एक्सपीरिएंस में थोड़ा बदलाव चाहते हैं.
अगर Voice का ऑप्शन दिखाई न दे तो?
अगर आपके iPhone में Siri Voice का ऑप्शन नहीं दिख रहा है तो सबसे पहले iOS अपडेट चेक करें. साथ ही ये भी ध्यान रखें कि Siri की कुछ Voice और Language सभी देशों या क्षेत्रों में उपलब्ध नहीं होतीं हैं.
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        <pubDate>Thu, 10 Sep 2026 11:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>iPhone 18 Pro में ये 10 बड़े बदलाव, पुराने मॉडल से कितना एडवांस्ड?</title>
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        <description><![CDATA[ Apple ने आखिरकार अपने नए Pro iPhone से पर्दा उठा दिया है. कंपनी के Surprise and Shine इवेंट में iPhone 18 Pro और iPhone 18 Pro Max को लॉन्च किया गया. इस बार Apple ने सिर्फ डिजाइन या कैमरा पर ही फोकस नहीं किया, बल्कि नए A20 Pro चिप, ज्यादा पावरफुल AI, बेहतर कूलिंग और कैमरा कंट्रोल जैसे कई बड़े बदलाव किए हैं. खास बात यह है कि पहली बार iPhone 18 Pro को Apple के नए CEO John Ternus ने पेश किया. &amp;nbsp;वहीं, इस बार कंपनी ने रेगुलर iPhone 18 को लॉन्च नहीं किया है. ऐसे में आइए जानते हैं कि iPhone 18 Pro में कौन-से 10 बड़े बदलाव हुए और पुराने मॉडल से कितना एडवांस्ड है.&amp;nbsp;
iPhone 18 Pro में ये 10 बड़े बदलाव
1. नया 2nm A20 Pro चिप - iPhone 18 Pro सीरीज का सबसे बड़ा अपग्रेड इसका A20 Pro चिप है. यह 2nm टेक्नोलॉजी पर तैयार किया गया है. इसमें 6-कोर CPU है, जिसमें दो नए Super Cores और चार Efficiency Cores हैं. Apple के मुताबिक Super Cores 20 प्रतिशत तक तेज हैं.&amp;nbsp;
2. 7-कोर GPU और बेहतर AI - A20 Pro में 7-कोर GPU दिया गया है, जिससे ग्राफिक्स परफॉर्मेंस 40 प्रतिशत तक बढ़ सकती है. चिप में Neural Engine को भी बड़ा अपग्रेड मिला है. अब इसमें दूसरा Neural Engine भी है और कुल 32 कोर दिए गए हैं. इससे ऑन-डिवाइस AI प्रोसेसिंग को ज्यादा ताकत मिलती है.&amp;nbsp;
3. नया कूलिंग सिस्टम - पावरफुल चिप के साथ Apple ने फोन की थर्मल मैनेजमेंट पर भी काम किया है. iPhone 18 Pro में नया Vapour Chamber कूलिंग सिस्टम दिया गया है, जो पिछले मॉडल की तुलना में काफी बड़ा है. इसका मकसद गेमिंग और AI जैसे भारी काम के दौरान फोन को ज्यादा ठंडा रखना है.&amp;nbsp;
4. Dynamic Island - Dynamic Island अब पहले से छोटा है. Apple ने इसे ज्यादा यूजफुल बनाया है और यह एक साथ तीन Live Activities दिखा सकता है यानी फ्लाइट स्टेटस, Maps नेविगेशन और टाइमर जैसी अलग-अलग जानकारी एक साथ देखी जा सकती है.&amp;nbsp;
5. 48MP कैमरा - कैमरा सिस्टम में इस बार बड़ा बदलाव Variable Aperture का है. 48MP Fusion Main Camera में मैकेनिकल Variable Aperture दिया गया है. इससे लेंस में आने वाली रोशनी और Depth of Field पर ज्यादा कंट्रोल मिलता है.&amp;nbsp;
6. तीन 48MP रियर कैमरे - दोनों Pro मॉडल में Triple Rear Camera Setup मिलता है. इसमें 48MP Main, 48MP Telephoto और 48MP Ultra Wide कैमरा शामिल हैं. Apple का कहना है कि यह उसका सालों में सबसे बड़ा कैमरा अपग्रेड है.
7. AI वाला नया Siri - iPhone 18 Pro में iOS 27 के साथ नया Siri AI मिलता है. यह यूजर के Personal Context को समझकर ज्यादा Personal और Conversational तरीके से काम कर सकता है. Apple के अनुसार Siri AI 300,000 से ज्यादा ऐप्स के साथ काम कर सकता है.&amp;nbsp;
8. बैटरी - iPhone 18 Pro में 36 घंटे तक और iPhone 18 Pro Max में 45 घंटे तक वीडियो प्लेबैक का दावा किया गया है. Pro Max को Apple ने अब तक की सबसे बेहतर iPhone Battery Life वाला मॉडल बताया है.&amp;nbsp;
9. नया डिजाइन और रंग - फोन में Color-Matched Aluminum और Back Glass दिया गया है. नए Burgundy और Glacier रंग के साथ Black और Silver ऑप्शन भी मिलते हैं. साथ ही Dynamic Island को भी छोटा किया गया है.&amp;nbsp;
10. AI फोटो की पहचान - Apple ने AI से बनी या बदली गई तस्वीरों को लेकर भी नया फीचर पेश किया है. iPhone 18 Pro से क्लिक की गई तस्वीरों के लिए Apple Reference Image नाम का नया स्टैंडर्ड दिया गया है, जिससे फोटो की ऑथेंटिसिटी को पहचानने में मदद मिलेगी.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ें - iPhone के साथ Apple ने और क्या फोड़ा बम? पूरी लॉन्च लिस्ट देखें
iPhone 18 Pro और &amp;nbsp;Pro Max की कीमत
भारत में iPhone 18 Pro की शुरुआती कीमत 1,64,900 रुपए और iPhone 18 Pro Max की शुरुआती कीमत 1,79,900 रुपए है. इन दोनों मॉडल 256GB, 512GB, 1TB और 2TB स्टोरेज ऑप्शन में आते हैं. इनके प्री-ऑर्डर 12 सितंबर से शुरू होंगे और बिक्री 18 सितंबर से शुरू होगी.&amp;nbsp;
पुराने मॉडल से कितना एडवांस्ड है?
पुराने मॉडल के मुकाबले iPhone 18 Pro में A20 Pro चिप, बेहतर AI, Variable Aperture कैमरा, छोटा Dynamic Island और ज्यादा बैटरी लाइफ जैसे बड़े अपग्रेड मिले हैं. इसके साथ बेहतर कूलिंग भी दी गई है, जिससे यह परफॉर्मेंस और कैमरा के मामले में ज्यादा एडवांस्ड बनता है.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ें - Apple का पहला फोल्डेबल iPhone Duo लॉन्च! कीमत से फीचर्स तक जानें सबकुछ ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 10 Sep 2026 11:30:05 +0530</pubDate>
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        <title>YouTube Videos कैसे डाउनलोड करें? जानें कौन&amp;सा तरीका है पूरी तरह Legal</title>
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        <description><![CDATA[ YouTube Videos कैसे डाउनलोड करें? जानें कौन-सा तरीका है पूरी तरह Legal ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 09 Sep 2026 23:30:13 +0530</pubDate>
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        <title>घर के Wi&amp;Fi की स्पीड कितनी होनी चाहिए? ऐसे फटाफट करें टेस्ट</title>
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        <description><![CDATA[ घर के लिए नया इंटरनेट कनेक्शन लेते समय सबसे बड़ा सवाल यही रहता है कि आखिर कितनी Mbps स्पीड काफी होगी. बहुत कम स्पीड वाला प्लान लेने पर डेली के कामों में परेशानी हो सकती है, वहीं जरूरत से ज्यादा स्पीड के लिए पैसे खर्च करने का भी कोई खास फायदा नहीं होता है. इसलिए प्लान चुनने से पहले ये समझना जरूरी है कि आपकी जरूरत के हिसाब से कितनी इंटरनेट स्पीड सही रहेगी.
इंटरनेट स्पीड में Download और Upload क्या है?
आपको बता दें कि इंटरनेट की स्पीड नॉर्मली दो चीजों से तय होती है एक Download Speed और दूसरी Upload Speed. Download का मतलब इंटरनेट से आपके फोन, लैपटॉप या दूसरे डिवाइस तक डेटा आने की रफ्तार है. वहीं Upload Speed बताती है कि आपके डिवाइस से इंटरनेट पर डेटा कितनी तेजी से भेजा जा सकता है.
इसे Mbps या Gbps में मापा जाता है. यहां ध्यान रखें कि Mbps में छोटा b का मतलब bits होता है जबकि फाइल का साइज MB यानी Megabytes में बताया जाता है.
Ping या Latency भी है बेहद जरूरी
बताते चलें कि सिर्फ Download और Upload Speed देखकर इंटरनेट कनेक्शन को अच्छा नहीं कहा जा सकता है. Ping या Latency भी जरूरी होते हैं. ये बताता है कि आपके डिवाइस से सर्वर तक डेटा पहुंचने और वापस आने में कितना समय लग रहा है.
इसे मिलीसेकंड यानी ms में मापा जाता है और नॉर्मली कम Ping बेहतर माना जाता है. खासकर ऑनलाइन गेमिंग, वीडियो कॉल और दूसरी रियल-टाइम एक्टिविटी में कम Latency का काफी अहम रोल होता है.
कितनी इंटरनेट स्पीड आपके लिए काफी है?
आपकी जरूरत इस बात पर निर्भर करती है कि घर में कितने लोग इंटरनेट इस्तेमाल करते हैं और उनका इस्तेमाल किस तरह का है. जैसे Netflix जैसी स्ट्रीमिंग सर्विसेज पर Full HD वीडियो के लिए करीब 5 Mbps और 4K वीडियो के लिए लगभग 15 Mbps की स्पीड काफी होती है. वीडियो कॉल के लिए भी बहुत ज्यादा स्पीड की जरूरत नहीं होती है.
लेकिन घर में एक साथ कई डिवाइस इंटरनेट इस्तेमाल कर रहे हों तो जरूरत तेजी से बढ़ जाती है. मसलन, एक व्यक्ति 4K वीडियो देख रहा है, दूसरा वीडियो कॉल पर है और तीसरा गेम डाउनलोड कर रहा है तो 50 Mbps कनेक्शन पर नेटवर्क स्लो महसूस होता है.
Fiber और Cable में क्या अंतर है?
जानकारी के लिए बता दें कि इंटरनेट की टेक्नोलॉजी भी स्पीड पर असर डालती है. Cable इंटरनेट में अक्सर Download Speed, Upload Speed से काफी ज्यादा होती है. वहीं Fiber इंटरनेट में दोनों डॉयरेक्शन में लगभग एक जैसी स्पीड मिलना आम बात है.
ग्रामीण या दूरदराज के क्षेत्रों में Fiber या Cable उपलब्ध नहीं होने पर 5G Home Internet या Satellite Internet ऑप्शन बेहतर साबित हो सकते हैं. इनकी स्पीड और Latency जगह और नेटवर्क की कंडिशन के अनुसार बदल सकती है. नया प्लान लेते समय ISP की स्पीड, Upload पावर और दूसरे डिटेल्स को ध्यान से देखना जरूरी है.
यह भी पढ़ें: क्या Router के पास सबसे तेज इंटरनेट चलता है? जानिए क्या है सच्चाई
इंटरनेट स्पीड कैसे टेस्ट करें?
अगर आपको अपनी मौजूदा इंटरनेट स्पीड का पता नहीं है तो सबसे पहले अपने Internet Service Provider के अकाउंट या प्लान की जानकारी देखें. इसके बाद ऑनलाइन Speed Test की मदद से असली स्पीड को चेक किया जा सकता है.
Speedtest.net जैसी सर्विसेज Download, Upload और Ping की जानकारी देती हैं. वहीं, Cloudflare का Speed Test कनेक्शन की स्थिरता, Jitter और Packet Loss जैसी एक्सट्रा जानकारी भी दिखा सकता है.
अगर आपका फोकस Gaming या दूसरे रियल-टाइम कामों पर है तो अलग-अलग सर्वर पर Ping चेक करना भी फायदेमंद रहेगा.
एक बार नहीं, कई बार करें स्पीड टेस्ट
इंटरनेट स्पीड हर समय एक जैसी नहीं रहती. दिन के व्यस्त समय में आपके इलाके में ज्यादा लोग इंटरनेट इस्तेमाल कर रहे हों तो स्पीड कम हो सकती है. इसलिए बेहतर रिजल्ट्स के लिए सुबह, दोपहर और शाम जैसे अलग-अलग समय पर कई बार टेस्ट करें और उनका औसत देखें. साथ ही टेस्ट के दौरान घर में कोई बड़ी फाइल डाउनलोड या अपलोड न कर रहा हो, इसका भी ध्यान रखें.
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        <pubDate>Wed, 09 Sep 2026 23:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>महंगा Mic खरीदने से पहले जानें, iPhone का ये Audio Feature</title>
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        <description><![CDATA[ वीडियो बनाते समय अक्सर लोग कैमरा क्वालिटी, लाइटिंग और फ्रेमिंग पर तो पूरा ध्यान देते हैं, लेकिन अच्छी वीडियो को बेहतर बनाने में ऑडियो का भी बड़ा रोल होता है. रील्स, व्लॉग, इंटरव्यू या किसी इवेंट की रिकॉर्डिंग के दौरान अगर आसपास ट्रैफिक, हवा या लोगों की बातचीत का शोर ज्यादा हो, तो आपकी आवाज साफ सुनाई नहीं देती है.
ऐसे में कई लोगों को लगता है कि बेहतर साउंड के लिए अलग से महंगा माइक्रोफोन खरीदना जरूरी है, हालांकि अगर आप iPhone से वीडियो रिकॉर्ड करते हैं, तो फोन में मौजूद कुछ ऑडियो फीचर्स आपकी आवाज को ज्यादा साफ रिकॉर्ड करने में मदद कर सकते हैं. तो आइए जानते हैं कौन-सी सेटिंग आपके काम आ सकती है.&amp;nbsp;
iPhone का ये Audio Feature सुधारेगा आवाज&amp;nbsp;
अगर आपका iPhone iOS 26 या उसके बाद के वर्जन पर चल रहा है, तो वीडियो रिकॉर्डिंग के दौरान Voice Isolation का इस्तेमाल किया जा सकता है. यह फीचर आपकी आवाज पर ज्यादा फोकस करता है और आसपास के शोर को कम करने की कोशिश करता है. इसे इस्तेमाल करने के लिए Camera ऐप खोलकर Video मोड चुनें और रिकॉर्डिंग शुरू करें. इसके बाद स्क्रीन के ऊपर से Control Center खोलें. यहां Audio Controls या Mic Mode पर टैप करें और Voice Isolation चुन लें. इसके बाद रिकॉर्डिंग के दौरान iPhone आपकी आवाज को प्रेफरेंस देगा.&amp;nbsp;
कौन-सा Mic Mode चुनें?
iPhone में रिकॉर्डिंग के लिए अलग-अलग माइक्रोफोन मोड मिलते हैं. Automatic मोड में iPhone खुद तय करता है कि कौन-सा मोड बेहतर रहेगा. Standard सामान्य ऑडियो रिकॉर्डिंग के लिए है, जबकि Voice Isolation बोलने वाली वीडियो में आवाज को साफ रखने और बैकग्राउंड नॉइस कम करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है. वहीं, Wide Spectrum आसपास की आवाजों को भी रिकॉर्ड करने के लिए यूजफुल है. इसका इस्तेमाल कॉन्सर्ट, लाइव इवेंट या नेचर साउंड रिकॉर्ड करते समय किया जा सकता है.&amp;nbsp;
रिकॉर्डिंग के बाद भी कैसे Audio सुधार सकते हैं?
अगर वीडियो पहले ही रिकॉर्ड हो चुकी है, तो Photos ऐप के ऑडिया मिक्स फीचर से ऑडियो को बेहतर करने की कोशिश की जा सकती है. इसके लिए Photos ऐप में वीडियो खोलें, एडिट पर जाएं और ऑडियो मिक्स में इन-फ्रेम, स्टूडियो या उपलब्ध दूसरे प्रोफाइल्स को आजमाएं.
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External Mic है तो ये सैटिंग्स देखें
अगर आप USB-C या किसी दूसरे External Mic का इस्तेमाल करते हैं, तो नए iOS वर्जन में इनपुट गेन को भी एडजस्ट किया जा सकता है. इससे माइक्रोफोन की सेंसिटिविटी बढ़ाई या घटाई जा सकती है. अगर एक से ज्यादा ऑडियो डिवाइस जुड़े हैं, तो कंट्रोल सेंटर से ऑडियो इनपुट बदलकर रिकॉर्डिंग के लिए माइक्रोफोन चुना जा सकता है.&amp;nbsp;
Stereo Audio को लेकर क्या करें?
Mono Audio को बैकग्राउंड नॉइस कम करने वाली सेटिंग नहीं समझना चाहिए. यह Accessibility फीचर है, जो लेफ्ट और राइट ऑडियो चैनल को एक साथ मिला देता है. वीडियो रिकॉर्डिंग के लिए Stereo Sound ऑन रखना बेहतर होता है, क्योंकि इससे ऑडियो ज्यादा नेचुरल रिकॉर्ड होती है. रिकॉर्डिंग के दौरान Mic को हाथ से न ढकें, तेज हवा में रिकॉर्डिंग से बचें या Wind Muff इस्तेमाल करें और कैमरे को अपनी आवाज के करीब रखें. प्रोफेशनल रिकॉर्डिंग के लिए External Mic का इस्तेमाल किया जा सकता है. रिकॉर्डिंग शुरू करने से पहले Mic Mode चेक करना भी न भूलें.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Wed, 09 Sep 2026 23:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>AI से इंसानों के अस्तित्व पर खतरा? Anthropic रिसर्चर ने जताई बड़ी चिंता</title>
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        <description><![CDATA[ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI पूरी दुनिया में काफी तेजी से अपने पैर पसार रहा है. टेक कंपनियों से लेकर आम यूजर्स तक एआई का इस्तेमाल काफी तेजी से बढ़ा है. लेकिन अब एआई की सुरक्षा को लेकर भी कई सारे सवाल उठ रहे हैं. Anthropic के एक प्रमुख AI सेफ्टी रिसर्चर ने ऐसा दावा किया है जिसने टेक्नोलॉजी की दुनिया में नई बहस छेड़ दी है. उनका मानना है कि आने वाले दशक में AI के इतना शक्तिशाली हो जाने का खतरा है कि ये पूरी ह्यूमन प्रजाति के लिए गंभीर खतरा बन सकता है.
इंसानों को खत्म कर देगा AI?
दरअसल, Anthropic के AI Alignment रिसर्चर Evan Hubinger ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपनी चिंता जाहिर की है. उनके मुताबिक, फिलहाल जो मौजूदा AI मॉडल्स हैं उनसे इंसानों को ज्यादा खतरा नहीं है लेकिन आने वाले समय में अगर एआई अपने आप को बेहतर बना लेता है तो ये इंसानों के लिए खतरा साबित हो सकता है. Hubinger का अंदाजा है कि अगले 10 सालों में एआई के इंसानी सभ्यता को खत्म करने का प्रतिशत 10 फीसदी से भी ज्यादा हो सकता है. उनका मानना है कि अगर एआई अपनी ताकत को बढ़ा लेता है और अपने आप में सुधार लाता है तो ये इंसानों के लिए बहुत बड़ा खतरा बन सकता है.
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AI एजेंट्स के साइबर अटैक ने बढ़ाई चिंता
जानकारी के अनुसार, AI सेफ्टी को लेकर चिंता ऐसे समय बढ़ी है जब कई कंपनियों के AI सिस्टम से जुड़े साइबर सुरक्षा मामले सामने आए हैं. AI एजेंट्स ऐसे सिस्टम हैं जो इंसान के कमांड्स के बिना कई काम खुद करने में सक्षम होते हैं.
हाल के महीनों में OpenAI, Anthropic और Meta ने अपने AI टूल्स से जुड़े हैकिंग या साइबर एक्टिविटी के मामलों का खुलासा किया है.
क्या Superintelligence के लिए तैयार है हम?
आपको बता दें कि Hubinger ने ये भी कहा कि AI को इंसानों के इच्छाओं के अनुरूप बनाए रखने के लिए अभी जितने समाधान की जरूरत है उतने मौजूद नहीं हैं. इसे AI Alignment कहा जाता है जिसका मकसद ये सुनिश्चित करना है कि ज्यादा पावरफुल AI सिस्टम इंसानों के हितों के लिए काम करे न की उनके खिलाफ.
उनके अनुसार, AI कंपनियां सुरक्षा पर काम कर रही हैं लेकिन सुपरइंटेलिजेंस के सामने आने वाले खतरों को पूरी तरह कंट्रोल करने की क्लियर प्लानिंग फिलहाल तैयार नहीं है. इसीलिए हम अभी सुपरइंटेलिजेंस के लिए अच्छी तरह से तैयार नहीं हैं.
Anthropic की रिपोर्ट में भी चेतावनी
दरअसल, Anthropic ने अगस्त में जारी अपनी एक सेफ्टी रिपोर्ट जारी की थी जिसमें एआई को लेकर आगे आने वाले समय में खतरों के बारे में बताया गया था. इस रिपोर्ट में साफ बताया गया था कि अगर एआई अपने आप को ज्यादा पावरफुल बना लेता है तो ये इंसानों के लिए भविष्य में खतरा बन सकता है.
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        <pubDate>Wed, 09 Sep 2026 23:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>Shopping के बाद Tracking आसान, Google Wallet दिखाएगा पूरा ऑर्डर स्टेटस</title>
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        <description><![CDATA[ ऑनलाइन Shopping करने के बाद सबसे ज्यादा झंझट ऑर्डर को Track करने में होती है. कभी Retailer की Website खोलनी पड़ती है, तो कभी कोरियर की App या फिर Gmail में आए Confirmation Email को ढूंढना पड़ता है. अलग-अलग जगहों पर ऑर्डर की जानकारी चेक करने की यह प्रक्रिया अब थोड़ी आसान हो सकती है.
Google Wallet में एक ऐसा फीचर आया है, जो Eligible Online ऑर्डर की रिसिप्ट , ट्रैकिंग नंबर और शिपिंग अपडेट्स को एक ही जगह दिखा सकता है. Google Wallet यह जानकारी Gmail से लेता है और App की होम स्क्रीन पर आने वाली Deliveries को दिखाता है. हालांकि फिलहाल यह सुविधा सिर्फ अमेरिका में उपलब्ध है और इसका इस्तेमाल करने के लिए Gmail की कुछ सेटिंग को On रखना जरूरी है.
Google Wallet में ऑर्डर Tracking कैसे शुरू करें?
1. इस फिचर को इस्तेमाल करने से पहले Gmail में कुछ जरूरी सैटिंग्स Enable करनी होंगी. इसके लिए Gmail App खोलें और सैटिंग्स में जाकर अपना Google Account Select करें.
2. यहां Package Tracking को On करें. इसके बाद स्मार्ट फीचर्स और पर्सनलाइजेशन को भी Enable करना होगा.
3. कुछ Google Products में इसे सिर्फ स्मार्ट फीचर्स के नाम से भी दिखाया जा सकता है.
4. इन सैटिंग्स को On करने के बाद Google Wallet में अलग से कोई सेटअप करने की जरूरत नहीं है. Wallet Gmail से Eligible ऑर्डर की जानकारी लेकर उसे अपने आप दिखा सकता है.
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Google Wallet में Online ऑर्डर कैसे देखें?
जब कोई Eligible Online Purchase किया जाता है और उसका Confirmation Email Gmail पर आता है, तो Google Wallet Delivery की जानकारी अपने आप Add कर सकता है. इसके लिए Wallet App खोलें. होम स्क्रीन पर अपकमिंग डिलीवरी दिखाई दे सकती हैं.
किसी ऑर्डर पर Tap करने के बाद उसकी रिसिप्ट , शिपिंग डिटेल्स और मौजूदा डिलीवरी स्टेटस देखा जा सकता है. अगर पुराने ऑर्डर देखने हैं, तो View More पर जाकर Eligible Online Purchases की लंबी हिस्ट्री देख सकते हैं. वहीं Track Package पर Tap करने से कोरियर की ऑफिशियल ट्रैकिंग पैज खुल जाएगी, जहां शिपमेंट से जुड़े ज्यादा डिटेल्स मिल सकते हैं.
किन बातों का रखना होगा ध्यान?
यह फीचर Gmail में आने वाले Eligible ऑर्डर Confirmation Emails को स्कैन करके उनमें मौजूद ट्रैकिंग की जानकारी निकालता है. अगर स्मार्ट फीचर्स और पर्सनलाइजेशन या पैकेज ट्रैकिंग इनेबल नहीं है, तो Google Wallet में डिलीवरी की जानकारी दिखाई नहीं देगी.
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        <pubDate>Wed, 09 Sep 2026 23:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>फोन में मौजूद ये फाइलें बन सकती हैं Hackers का आसान निशाना! जानें कैसे बचें</title>
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        <description><![CDATA[ आज स्मार्टफोन सिर्फ कॉल और मैसेज करने का जरिया बनकर नहीं रह गया है. इसमें हमारी पर्सनल फोटोज, वीडियो, बैंकिंग से जुड़े डॉक्यूमेंट्स, पासवर्ड, पहचान पत्र और कई जरूरी फाइलें सेव रहती हैं. यही वजह है कि अगर फोन की सुरक्षा में थोड़ी भी लापरवाही हो जाए तो साइबर अपराधियों के लिए पर्सनल डेटा तक पहुंचने का रास्ता आसान हो सकता है.
कौन-सी फाइलें ज्यादा संवेदनशील हैं?
जानकारी के अनुसार, फोन में मौजूद हर फाइल से एक जैसा खतरा नहीं रहता है. खासतौर पर PDF, डॉक्यूमेंट, ZIP फाइल, APK और डाउनलोड पर सावधानी बरतनी चाहिए. बैंक स्टेटमेंट, आधार या पैन कार्ड की कॉपी, पासपोर्ट, ऑफिस के डॉक्यूमेंट्स और पर्सनल फोटोज जैसी फाइलों में संवेदनशील जानकारी होती है.
इसके अलावा, अनजान सोर्स से मिली कोई APK फाइल भी खतरनाक साबित हो सकती है. इसे इंस्टॉल करने पर किसी संदिग्ध ऐप को फोन की जरूरी परमिशन मिल सकती है.
WhatsApp और ईमेल से आई फाइलों पर रहें सावधान
आपको बता दें कि Hackers अक्सर भरोसेमंद दिखने वाले मैसेज के जरिए फाइल भेजते हैं. जैसे कोई व्यक्ति बैंक, कुरियर, नौकरी, बिजली बिल या इनाम से जुड़ा PDF या लिंक भेज सकता है. फाइल खोलने या उसमें दिए लिंक पर क्लिक करने के बाद यूजर को फर्जी वेबसाइट पर ले जाया जाता है.
इसलिए अनजान नंबर या ईमेल से आई फाइल को बिना चेक किए नहीं खोलना चाहिए. सिर्फ इसलिए किसी फाइल पर भरोसा न करें क्योंकि उसे किसी परिचित के नाम या प्रोफाइल से भेजा गया है.
डाउनलोड फोल्डर भी करें चेक
कई बार हम इंटरनेट से कोई फाइल डाउनलोड करके भूल जाते हैं. फोन के Downloads फोल्डर में पुरानी और गैरजरूरी फाइलें लंबे समय तक पड़ी रहती हैं. इनमें कोई संदिग्ध फाइल मौजूद हो तो वह भविष्य में परेशानी का कारण बन सकती है. इसीलिए समय-समय पर Downloads, Documents और दूसरे फोल्डर को चेक करते रहना चाहिए और गैरजरूरी फाइलों को डिलीट कर दें.
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फाइलों को सुरक्षित रखने के आसान तरीके
सबसे पहले फोन में स्क्रीन लॉक जरूर लगाएं और मजबूत PIN या पासकोड का इस्तेमाल करें. ऑपरेटिंग सिस्टम और ऐप्स को भी समय पर अपडेट करते रहें क्योंकि अपडेट में सुरक्षा से जुड़े सुधार शामिल होते हैं.
अनजान वेबसाइट से APK या दूसरे ऐप डाउनलोड न करें. किसी फाइल को खोलने के लिए अगर वह अचानक पासवर्ड, परमिशन या किसी ऐप को इंस्टॉल करने के लिए कहे तो सावधान हो जाएं.
जरूरी डॉक्यूमेंट्स का बैकअप किसी भरोसेमंद और सुरक्षित क्लाउड स्टोरेज या दूसरे सुरक्षित माध्यम में रखें. साथ ही, संवेदनशील फाइलों को बिना जरूरत किसी के साथ शेयर न करें.
फोन में इन बातों का भी रखें ध्यान
किसी भी फाइल को खोलने से पहले उसके नाम, एक्सटेंशन और भेजने वाले व्यक्ति की जांच करें.
अगर फाइल का नाम अजीब है या उसमें ऐसा एक्सटेंशन है जिसकी आपको जानकारी नहीं है तो उसे खोलने से बचना चाहिए. साथ ही, फोन में मौजूद किसी भी ऐप को जरूरत से ज्यादा परमिशन न दें. खासकर फाइल, फोटो, माइक्रोफोन, कैमरा और कॉन्टैक्ट्स जैसी संवेदनशील परमिशन देने से पहले सोचें.
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        <pubDate>Wed, 09 Sep 2026 07:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>न OTP, न PIN, न CVC… फिर भी FD से निकल गए 5.99 लाख, जानें कैसे?</title>
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        <description><![CDATA[ साइबर ठगी के मामले अब सिर्फ बैंक अकाउंट या UPI तक सीमित नहीं रह गए हैं. ठग लोगों की जमा पूंजी तक पहुंचने के नए तरीके अपना रहे हैं. भोपाल में ऐसा ही एक मामला सामने आया है, जहां 61 वर्षीय बुजुर्ग की फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) से करीब 6 लाख रुपये निकाल लिए गए. रकम ट्रांसफर होने के दौरान व्यक्ति के मोबाइल पर कोई OTP नहीं आया. उन्होंने अपना पासवर्ड, PIN, CVC या बैंकिंग से जुड़ी कोई जानकारी भी किसी के साथ शेयर नहीं की थी. ऐसे में आइए जानते हैं कि आखिर FD से इतनी बड़ी रकम कैसे निकल गई.&amp;nbsp;&amp;nbsp;तीन ट्रांजेक्शन में निकले 5.99 लाख रुपये
पुलिस के मुताबिक, भोपाल की अफकार कॉलोनी निवासी 61 वर्षीय शरीफ अहमद कुरैशी का ICICI बैंक की अशोका गार्डन शाखा में सेविंग अकाउंट और FD है. 4 सितंबर को दोपहर 12 बजे से 12:30 बजे के बीच उनकी FD से नेट बैंकिंग के जरिए तीन ऑनलाइन ट्रांजेक्शन किए गए. इन ट्रांजेक्शन के जरिए कुल 5,99,009.62 रुपये दूसरे खाते में ट्रांसफर कर दिए गए.
रकम निकलने की जानकारी मिलने के बाद शरीफ अहमद ने तुरंत राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन नंबर 1930 पर शिकायत की. इसके बाद साइबर सेल से मिली ई-जीरो FIR के आधार पर ऐशबाग पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ धोखाधड़ी का मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है.&amp;nbsp;एफडी खाते में नेटबैंकिंग नहीं होती तो ठगी कैसे हुई?&amp;nbsp;FD की अलग नेट बैंकिंग नहीं होती है, लेकिन वह बैंक के सेविंग अकाउंट से जुड़ी होती है. अगर FD मोबाइल बैंकिंग ऐप के जरिए बनाई गई है, तो उसे उसी ऐप से तोड़ा भी जा सकता है. ठग इसी प्रक्रिया का फायदा उठा सकते हैं. साइबर और बैंकिंग एक्सपर्ट्स के मुताबिक, जालसाज रिफंड या पैसे वापस दिलाने जैसे बहाने बनाकर ग्राहक को अपने जाल में फंसाते हैं. इसके बाद मोबाइल में स्क्रीन शेयरिंग या रिमोट एक्सेस ऐप डाउनलोड करवाते हैं और बैंकिंग ऐप खोलने के लिए कहते हैं.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ें - Apple का AI अब सिर्फ iPhone में नहीं? Siri से लेकर Smart Home तक बड़ा प्लान&amp;nbsp;ठगों को कैसे मिल रहा आपके मोबाइल ऐप का एक्सेस?&amp;nbsp;ठग आमतौर पर सीधे बैंकिंग ऐप का एक्सेस नहीं लेते, बल्कि ग्राहक को रिफंड, पैसे वापस दिलाने या किसी दूसरी वजह का झांसा देकर स्क्रीन शेयरिंग या रिमोट एक्सेस ऐप डाउनलोड करवाते हैं. इसके बाद ग्राहक से बैंकिंग ऐप खोलने और बताए गए स्टेप्स करने के लिए कहते हैं. स्क्रीन शेयर होने पर ठग मोबाइल पर दिखाई देने वाली बैंकिंग जानकारी देख सकते हैं, जिसमें खाते में मौजूद रकम और FD की जानकारी भी शामिल हो सकती है. इसके बाद इसी जानकारी का फायदा उठाकर FD तोड़ने और रकम को दूसरे खाते में ट्रांसफर करने की कोशिश करते हैं.&amp;nbsp;&amp;nbsp;साइबर ठगी से बचने के तरीके क्या हैं?
1. किसी अनजान व्यक्ति के कहने पर मोबाइल में कोई भी स्क्रीन शेयरिंग या रिमोट एक्सेस ऐप डाउनलोड न करें.
2. रिफंड के लिए इंटरनेट पर मिले किसी अनजान नंबर से संपर्क करने की जगह बैंक या कंपनी की ऑथोराइज्ड ऐप या वेबसाइट का इस्तेमाल करें.
3. किसी के कहने पर बैंकिंग ऐप खोलकर PIN भी न डालें.
4. अगर ठगी हो जाए तो तुरंत 1930 पर शिकायत दर्ज कराएं और बैंक से संपर्क करें.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Wed, 09 Sep 2026 07:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>iPhone 18 Pro के रंग लीक, लॉन्च से पहले खुला बड़ा राज!</title>
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        <description><![CDATA[ Apple के नए iPhone को लेकर लॉन्च से पहले चर्चाएं तेज हैं. इस बार कंपनी के Pro मॉडल के रंगों ने लोगों का ध्यान खींच लिया है. iPhone 18 Pro और iPhone 18 Pro Max के लॉन्च से कुछ घंटे पहले एक छोटा वीडियो ऑनलाइन सामने आया है. इसमें कथित तौर पर दोनों फोन के रिटेल डेमो यूनिट दिखाई दे रहे हैं. वीडियो में iPhone 18 Pro Max बरगंडी शेड में नजर आ रहा है, जबकि iPhone 18 Pro को हल्के नीले रंग में देखा गया है. इसके सामने आने के बाद Apple के नए Pro मॉडल के कलर को लेकर चर्चाएं और तेज हो गई हैं.&amp;nbsp;
iPhone 18 Pro Max में दिखा Dark Cherry कलर
करीब 14 सेकंड का यह वीडियो दक्षिण कोरियाई ब्लॉगिंग प्लेटफॉर्म Naver पर सामने आया है. इसे टिप्स्टर yeux1122 ने शेयर किया है. वीडियो में कथित iPhone 18 Pro Max बरगंडी रंग में दिखाई देता है. इस शेड को पहले सामने आई रिपोर्ट्स में Dark Cherry बताया गया है. &amp;nbsp;वीडियो में खास बात यह है कि कथित iPhone 18 Pro Max के साथ iPhone 17 Pro Max का डार्क ब्लू मॉडल भी दिखाई देता है.&amp;nbsp;
iPhone 18 Pro में दिखा Sky Blue शेड
वीडियो में iPhone 18 Pro हल्के नीले रंग में नजर आ रहा है. इस कलर को लेकर पहले भी कई रिपोर्ट्स सामने आ चुकी हैं. माना जा रहा है कि यह रंग काफी हल्का हो सकता है और कुछ लाइटिंग कंडीशन में सिल्वर जैसा भी दिखाई दे सकता है.&amp;nbsp;

hands on video of iPhone 18 Pro and Pro Max demo units in Dark Cherry and Blue repectively#Apple #iPhone18 #iPhone18ProMax pic.twitter.com/nr008cEsFo
&amp;mdash; Piyush Bhasarkar (@TechKard) September 7, 2026



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Pro मॉडल में मिल सकते हैं तीन कलर
iPhone 18 Pro सीरीज के कलर को लेकर पहले सामने आए लीक्स में Dark Cherry और Sky Blue के अलावा तीसरे कलर का भी जिक्र किया गया है. एक लीक में कथित iPhone 18 Pro के सिम ट्रे दिखाई दिए थे, जिनसे Silver, Dark Cherry Red और Sky Blue कलर की ओर इशारा मिला था, हालांकि बाद की जानकारी में Silver की जगह Black कलर मिलने की बात कही गई है. Apple ने अभी तक इन कलर ऑप्शन की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है.&amp;nbsp;
क्या सच में हैं ये रिटेल डेमो यूनिट?
इस वीडियो को पूरी तरह आधिकारिक नहीं माना जा सकता है. वीडियो में यह जानकारी नहीं दी गई है कि ये डिवाइस कहां से आए हैं, हालांकि Apple के 9 सितंबर के इवेंट से पहले रिटेलर्स को डेमो यूनिट मिलने की उम्मीद को देखते हुए इनके असली होने की अटकलें लगाई जा रही हैं.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Wed, 09 Sep 2026 07:30:05 +0530</pubDate>
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        <title>Galaxy Tab S10+ पर Samsung का फेस्टिव धमाका, मिल रहा ये खास ऑफर</title>
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        <description><![CDATA[ फेस्टिव सीजन शुरू होने से पहले Samsung ने अपने प्रीमियम टैबलेट Galaxy Tab S10+ पर खास ऑफर पेश किया है. कंपनी इस टैबलेट को काम, क्रिएटिविटी और स्मार्ट लाइफस्टाइल के लिए एक ऑल-राउंड डिवाइस के रूप में पेश कर रही है. बड़े Dynamic AMOLED 2X डिस्प्ले, AI फीचर्स और बॉक्स में मिलने वाले S Pen के साथ Galaxy Tab S10+ प्रोफेशनल्स, क्रिएटिव यूजर्स और टेक पसंद करने वाले लोगों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है. तो आइए जानते हैं कि &amp;nbsp;Samsung के फेस्टिव ऑफर पर क्या खास मिल रहा है.&amp;nbsp;
Galaxy Tab S10+ में क्या खास है?
Galaxy Tab S10+ में 31.47 सेंटीमीटर का Dynamic AMOLED 2X डिस्प्ले दिया गया है. इसमें एंटी-रिफ्लेक्टिव टेक्नोलॉजी भी मौजूद है, जिससे स्क्रीन पर पड़ने वाली चमक कम होती है और विजुअल ज्यादा साफ दिखाई देते हैं. टैबलेट में क्वाड-स्पीकर सेटअप मिलता है, जिसे AI Dialogue Boost का सपोर्ट दिया गया है. इससे आवाज को ज्यादा साफ बनाने में मदद मिलती है. डिवाइस को IP68 रेटिंग मिली है, जबकि Armor Aluminium construction इसे मजबूती देने का काम करता है.&amp;nbsp;
फेस्टिव ऑफर में इतनी हुई कीमत
1. Samsung ने Galaxy Tab S10+ के दोनों वेरिएंट पर फेस्टिव कीमत पेश की है.12GB रैम और 256GB स्टोरेज वाला Wi-Fi मॉडल अब 1,05,999 रुपए की जगह 88,999 रुपए में मिल रहा है,
2. 5G वेरिएंट की कीमत 1,20,999 रुपए से घटाकर 1,03,999 रूपए कर दी गई है. इसके साथ कंपनी ने No-Cost EMI की सुविधा भी दी है.
3. Wi-Fi मॉडल को बैंक के जरिए 14,833 रूपए &amp;nbsp;प्रति महीने, NBFC के जरिए 7,417 रुपए &amp;nbsp;प्रति महीने और Samsung Finance+ के जरिए 6,877 रुपए प्रति महीने की EMI पर लिया जा सकता है.
4. Samsung Finance+ में 15 प्रतिशत डाउन पेमेंट देना होगा. वहीं, 5G मॉडल के लिए बैंक से 17,333, रूपए NBFC से 8,667 रुपए &amp;nbsp;और Samsung Finance+ के जरिए 8,036 रूपए &amp;nbsp;प्रति महीने की EMI उपलब्ध है. इस ऑप्शन में भी 15 प्रतिशत डाउन पेमेंट लागू है.&amp;nbsp;
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S Pen के साथ मिलेंगे AI वाले फीचर्स
Galaxy Tab S10+ के साथ S Pen भी मिलता है. इसकी मदद से यूजर्स को कई प्रोडक्टिवीटी फीचर्स मिलते हैं. इनमें नोटिड असिस्ट शामिल है, जो नोट्स को ट्रांसक्राइब करने और उनका सार तैयार करने में मदद करता है. इसके अलावा PDF Overlay Translation की मदद से अलग-अलग भाषाओं वाले डॉक्यूमेंट को समझना आसान होता है. Handwriting Help फीचर लिखे हुए नोट्स को व्यवस्थित करने में मदद करता है. टैबलेट में Circle to Search और Air Command जैसे AI-powered features भी दिए गए है. ये फीचर्स Samsung के Bixby और Google के Gemini के साथ काम करते हैं.
Galaxy Tab S10+ में &amp;nbsp;10090mAh बैटरी
परफॉर्मेंस के लिए टैबलेट में MediaTek Dimensity 9300+ प्रोसेसर दिया गया है. इसमें 12GB RAM और 256GB स्टोरेज मिलता है, जिसे बढ़ाया जा सकता है. पावर के लिए 10090mAh की बैटरी दी गई है, जो 45W फास्ट चार्जिंग सपोर्ट करती है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Wed, 09 Sep 2026 07:30:04 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Apple Watch Series 12 में क्या नया मिलेगा, क्या अल्ट्रा&amp;4 का डिजाइन बदलेगा?</title>
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        <description><![CDATA[ Apple के नए iPhone के साथ अब अगली जनरेशन की Apple Watch पर भी सबकी नजर है. Apple 9 सितंबर को होने वाले अपने Surprise and Shine इवेंट में Apple Watch Series 12 और Apple Watch Ultra 4 पेश कर सकता है, हालांकि कंपनी ने अभी तक नई Apple Watch को इस इवेंट में लॉन्च करने की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है, लेकिन नई Apple Watch को लेकर सामने आई लीक और रिपोर्ट्स &amp;nbsp;से संकेत मिलता है कि इस साल Apple का फोकस बड़े डिजाइन बदलाव की जगह परफॉर्मेंस, हेल्थ ट्रैकिंग और वेलनेस एक्सपीरियंस को बेहतर करने पर हो सकता है. ऐसे में आइए जानते हैं कि Apple Watch Series 12 में क्या नया मिलेगा और क्या अल्ट्रा-4 का डिजाइन बदलेगा.&amp;nbsp;
Apple Watch Series 12 में क्या नया मिलेगा?
1. नया और तेज चिप - Series 12 में S11 या उससे नई चिप मिलने की उम्मीद है, जिससे परफॉर्मेंस और पावर एफिशिएंसी बेहतर हो सकती है.&amp;nbsp;
2. हार्ट रेट ट्रैकिंग - Apple लगातार हार्ट रेट मॉनिटरिंग फीचर की टेस्टिंग कर रही है. इससे दिनभर हार्ट रेट का ज्यादा लगातार डेटा मिल सकता है.&amp;nbsp;
3. Ceramic केस की वापसी - Series 12 में सफेद और डार्क ग्रे कलर में Ceramic केस का ऑप्शन मिल सकता है.
4. हेल्थ और फिटनेस ऐप में बदलाव - वेलनेस से जुड़े ज्यादा मैट्रिक्स को बेहतर तरीके से दिखाने के लिए हेल्थ और फिटनेस ऐप्स में बदलाव की उम्मीद है.&amp;nbsp;
5. बैटरी और एफिशिएंसी में सुधार - नए चिप की बेहतर पावर एफिशिएंसी से बैटरी बैकअप में सुधार मिल सकता है, हालांकि बड़े बदलाव की उम्मीद नहीं है.&amp;nbsp;
6. नए बैंड और फिनिश - Apple Series 12 के साथ नए बैंड कलर और अलग-अलग कॉन्फिगरेशन पेश कर सकती है, जिससे यूजर्स को ज्यादा ऑप्शन मिलेंगे.&amp;nbsp;
क्या अल्ट्रा-4 का डिजाइन बदलेगा?
Apple Watch Ultra 4 के डिजाइन में इस बार कोई बड़ा बदलाव होने की उम्मीद नहीं है. रिपोर्ट्स के मुताबिक इसका लुक और मौजूदा Ultra मॉडल की मजबूत डिजाइन काफी हद तक बरकरार रह सकती है. Apple का फोकस इस साल बाहरी डिजाइन बदलने की जगह परफॉर्मेंस, हेल्थ और फिटनेस ट्रैकिंग जैसे इंटरनल अपग्रेड पर रहने की संभावना है. हालांकि छोटे-मोटे बदलाव या नए फिनिश देखने को मिल सकते हैं, लेकिन पूरी तरह नया डिजाइन या बड़ा रीडिजाइन फिलहाल उम्मीद में नहीं है.&amp;nbsp;
नया चिप बेहतर परफॉर्मेंस
Apple Watch Series 12 और Ultra 4 में नई पीढ़ी का चिप मिलने की उम्मीद है. इसका नाम S11 या इससे नया चिप हो सकता है. Series 11 और Ultra 3 में S10 चिप दिया गया है, जो इससे पहले Series 10 और Ultra 2 में भी इस्तेमाल हुआ था.&amp;nbsp;
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हेल्थ ट्रैकिंग पर रहेगा ज्यादा फोकस
नई Apple Watch में हेल्थ मॉनिटरिंग को पहले से ज्यादा यूजफुल बनाने की कोशिश की जा सकती है. रिपोर्ट्स के मुताबिक Apple लगातार हार्ट रेट मॉनिटरिंग की क्षमता का टेस्ट कर रहा है. इससे वॉच पूरे दिन हार्ट रेट से जुड़ा ज्यादा लगातार डेटा जुटा सकती है.&amp;nbsp;
Touch ID और SE 4 की उम्मीद कम
नई Apple Watch में Touch ID मिलने की संभावना फिलहाल कम बताई जा रही है. Apple Watch SE 4 के इस साल लॉन्च होने की उम्मीद भी नहीं है. Apple ब्लड-शुगर डिटेक्शन फीचर पर भी काम कर रहा है, जिसे 2030 तक पेश करने का लक्ष्य बताया गया है. वहीं Apple Watch का बड़ा डिजाइन बदलाव अभी डेवलपमेंट में है और इसे आने में एक या दो साल लग सकते हैं.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Tue, 08 Sep 2026 23:30:17 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Apple का AI अब सिर्फ iPhone में नहीं? Siri से लेकर Smart Home तक बड़ा प्लान</title>
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        <description><![CDATA[ Apple का AI प्लान अब सिर्फ iPhone तक सीमित नहीं रहना वाला है. कंपनी अपने स्मार्ट होम प्रोडक्ट्स में भी AI को बड़ी भूमिका देने की तैयारी में है. खासकर Siri AI के आने के बाद Apple के पुराने HomePod और Apple TV जैसे डिवाइसेज को नए तरीके से इस्तेमाल करने की उम्मीद बढ़ गई है. ऐसे में Apple के 9 सितंबर को होने वाले लॉन्च इवेंट Surprise and Shine &amp;nbsp;में नए स्मार्ट होम डिवाइसेज की एंट्री की चर्चा है, जबकि आगे चलकर Apple एक ऐसे स्मार्ट होम हब पर भी काम कर सकता है जो घर के अलग-अलग डिवाइसेज को एक ही जगह से कंट्रोल करने का काम करेगा.&amp;nbsp;
Siri से लेकर Smart Home तक बड़ा प्लान
रिपोर्ट्स के मुताबिक, Apple इसी सीजन में नए HomePod Mini और Apple TV 4K को लॉन्च कर सकता है. मौजूदा HomePod Mini और Apple TV कई साल पुराने हो चुके हैं और अब Siri AI के तैयार होने के बाद इनके नए वर्जन आने की उम्मीद है. नए HomePod Mini में S5 चिप की जगह S9 चिप मिल सकती है.
इसके साथ नए कलर ऑप्शन, नया वायरलेस चिप और बेहतर ऑडियो क्वालिटी मिलने की बात कही जा रही है. हालांकि सबसे बड़ा बदलाव Siri AI का सपोर्ट हो सकता है, जिससे HomePod Mini पहले के मुकाबले ज्यादा स्मार्ट तरीके से काम कर सकेगा. वहीं, नए Apple TV 4K में A15 Bionic की जगह A17 Pro चिप मिलने की उम्मीद है. इसके अलावा इसके रिमोट को भी नए डिजाइन और Siri AI से जुड़े फीचर्स के साथ अपडेट किया जा सकता है.
7 इंच स्क्रीन वाला स्मार्ट होम हब
Apple का स्मार्ट होम प्लान यहीं खत्म नहीं होता है. कंपनी एक नए स्मार्ट होम हब पर भी काम कर रही है. रिपोर्ट्स के अनुसार, इसके दो वर्जन हो सकते हैं. एक मॉडल स्क्रीन के साथ आएगा, जिसे मैग्नेटिक सिस्टम की मदद से दीवार पर लगाया जा सकेगा, जबकि दूसरे मॉडल में स्पीकर बेस दिया जा सकता है. इस डिवाइस में 7 इंच का स्क्वायर डिस्प्ले और homeOS नाम का नया ऑपरेटिंग सिस्टम मिलने की उम्मीद है. इसमें Siri AI से बातचीत, फेसटाइम कॉल और स्मार्ट होम डिवाइसेज को मैनेज करने जैसे काम किए जा सकते हैं. इसे HomePod नाम से भी पेश किए जाने की चर्चा है और इसमें A18 चिप मिलने की उम्मीद है.
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Siri AI बनेगा पूरे Home Ecosystem का हिस्सा
इस स्मार्ट होम हब का सबसे अहम हिस्सा इसका AI एक्सपीरियंस हो सकता है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, डिवाइस में पर्सनल प्रोफाइल, फेशियल रिकग्निशन और प्रेजेंस डिटेक्शन जैसे फीचर्स भी मिल सकते हैं. इससे अलग-अलग यूजर्स को उनकी जरूरत के हिसाब से कैलेंडर, रिमाइंडर्स, फोटो और दूसरे विजेट्स दिखाए जा सकते हैं. इसके अलावा Widget Gallery और Smart Stack जैसे फीचर्स भी इसका हिस्सा हो सकते हैं.&amp;nbsp;
कैमरा और स्मार्ट डोरबेल भी आ सकते हैं
Apple के स्मार्ट होम प्लान में आगे सिक्योरिटी कैमरा और स्मार्ट डोरबेल जैसे प्रोडक्ट्स भी शामिल हो सकते हैं. इसके साथ स्मार्ट डिस्प्ले का एक एडवांस वर्जन भी आने की चर्चा है, जिसमें बड़ी 9 इंच स्क्रीन और रोबोटिक आर्म दिया जा सकता है.
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        <pubDate>Tue, 08 Sep 2026 23:30:16 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>पुराना फोन फेंकने की गलती न करें! Google Store पर मिलेगी तगड़ी कीमत</title>
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        <description><![CDATA[ अगर आपके पास पुराना स्मार्टफोन पड़ा है और आपको लगता है कि अब इसकी कोई खास कीमत नहीं बची तो उसे फेंकने या कबाड़ में देने से पहले एक बार जरूर सोच लें. पुराने फोन से छुटकारा पाने के साथ-साथ आप उसकी अच्छी-खासी कीमत भी हासिल कर सकते हैं. Google अपने Google Store पर ट्रेड-इन सुविधा देता है जिसके जरिए पुराने डिवाइस को अच्छी कीमत पर एक्सचेंज किया जा सकता है. आइए जानते हैं कि कैसे आप इसका फायदा उठा सकते हैं.
पुराने फोन के बदले मिल सकता है अच्छा ऑफर
दरअसल, Google Store का ट्रेड-इन प्रोग्राम उन यूजर्स के लिए फायदेमंद होता है जो नया स्मार्टफोन खरीदना चाहते हैं. इसमें पुराने फोन की कंडिशन, मॉडल और दूसरी डिटेल्स के आधार पर उसकी कीमत तय की जाती है. खास बात ये है कि कुछ पुराने फोन उम्मीद से बेहतर वैल्यू हासिल कर सकते हैं. यानी ऐसा जरूरी नहीं कि कई साल पुराना स्मार्टफोन पूरी तरह बेकार हो चुका हो. अगर डिवाइस अच्छी कंडीशन में है तो उसकी कीमत आपके अनुमान से ज्यादा निकल सकती है.
कैसे काम करता है Google Store Trade-In?
जानकारी के अनुसार, ट्रेड-इन का प्रोसेस नॉर्मली काफी आसान होता है. नया डिवाइस खरीदते समय यूजर को अपने पुराने फोन की जानकारी देनी होती है. इसमें फोन का मॉडल, स्टोरेज और उसकी कंडिशन जैसी जानकारी शामिल है.
इसके बाद पुराने फोन की ट्रेड-इन वैल्यू दिखाई जाती है. अगर यूजर ऑफर एक्सेप्ट करता है तो पुराने डिवाइस को तय प्रोसेस के अनुसार जमा या शिप किया जाता है. फाइनल वैल्यू फोन की असली कंडिशन को चेक करने के बाद ही तय की जाती है.
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फोन की कंडिशन से तय होती है कीमत
आपको बता दें कि पुराने फोन की कीमत केवल उसके मॉडल से तय नहीं होती है. उसकी फिजिकल कंडीशन भी बहुत जरूरी होती है. स्क्रीन पर ज्यादा क्रैक, बॉडी पर डैमेज, खराब बटन या चार्जिंग से जुड़ी समस्या होने पर ट्रेड-इन वैल्यू कम हो जाती है. लेकिन अगर फोन साफ-सुथरी कंडिशन में मौजूद है और सही तरीके से काम करने वाला फोन है तो उसकी बेहतर कीमत मिल सकती है. इसलिए ट्रेड-इन से पहले फोन की कंडिशन को अच्छी तरह से चेक कर लेना चाहिए.
नया फोन खरीदने पर मिलेगा फायदा
ट्रेड-इन का सबसे बड़ा फायदा ये है कि पुराने फोन की वैल्यू को नए डिवाइस की खरीद के साथ जोड़ा जाता है. इससे नए फोन की कीमत कम हो जाती है. जैसे अगर आपके पुराने फोन की ट्रेड-इन वैल्यू अच्छी निकलती है तो आपको नए स्मार्टफोन के लिए अपनी जेब से कम पैसे खर्च करने पड़ेंगे. यही वजह है कि पुराना फोन सीधे बेचने या फेंकने से पहले ट्रेड-इन ऑप्शन को चेक करना फायदेमंद रहता है.
फोन देने से पहले ये काम जरूर करें
पुराना फोन ट्रेड-इन करने से पहले उसमें मौजूद पर्सनल जानकारी को सुरक्षित करना बेहद जरूरी होता है. फोटो, वीडियो, कॉन्टैक्ट और जरूरी फाइलों का बैकअप लें. इसके बाद अपने Google या दूसरे अकाउंट से साइन आउट करें और फोन को फैक्ट्री रीसेट करें.
साथ ही, ट्रेड-इन की शर्तों और फाइनल वैल्यू को ध्यान से पढ़ें. क्योंकि ऑनलाइन दिखाई गई कीमत और डिवाइस को चेक करने के बाद की कीमत अलग हो सकती है.
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        <pubDate>Tue, 08 Sep 2026 23:30:14 +0530</pubDate>
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        <title>iPhone 17 Pro पर आया जबरदस्त Price Drop! यहां मिल रहा बेहद सस्ता</title>
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        <description><![CDATA[ iPhone 17 Pro पर आया जबरदस्त Price Drop! यहां मिल रहा बेहद सस्ता ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 08 Sep 2026 23:30:13 +0530</pubDate>
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        <title>बिना WhatsApp अकाउंट के भी कर सकेंगे कॉल! जल्द आ रहा है ये नया फीचर</title>
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        <pubDate>Tue, 08 Sep 2026 23:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>वंदे भारत कवच ब्रेकिंग सिस्टम से लैस, 160 की स्पीड में खुद कैसे रुकेगी ट्रेन?</title>
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        <description><![CDATA[ वंदे भारत ट्रेनें अब 160 किलोमीटर प्रति घंटे तक की रफ्तार से दौड़ने लगी हैं और इसी के साथ भारतीय रेलवे ने अपना स्वदेशी सुरक्षा कवच सिस्टम भी और मजबूत कर दिया है. यह सिस्टम अब इतना तेज और भरोसेमंद बना दिया गया है कि तेज रफ्तार में भी अगर कोई खतरा दिखे तो ट्रेन खुद ही ब्रेक लगा लेगी, चाहे ड्राइवर समय पर प्रतिक्रिया दे या नहीं.
हाल ही में रेलवे ने इसका एक बड़ा और सफल ट्रायल पूरा किया है, जिसमें ट्रेन ने एक नया रिकॉर्ड बनाया. आइए जानते हैं कि यह तकनीक क्या है, यह कैसे काम करती है और इसके आने से रेल यात्रियों का सफर कितना सुरक्षित होने वाला है.
कवच सिस्टम आखिर है क्या?
कवच भारतीय रेलवे का बनाया हुआ ऑटोमैटिक ट्रेन प्रोटेक्शन यानी ATP सिस्टम है. इसे रिसर्च डिजाइन एंड स्टैंडर्ड्स ऑर्गेनाइजेशन (RDSO) ने भारतीय कंपनियों के साथ मिलकर तैयार किया है. इसका मकसद ट्रेन हादसों को कम से कम करना है. खासकर सिग्नल पार करने की गलती और तय सीमा से ज्यादा स्पीड की वजह से होने वाले हादसों को कम रोकना. अब इसका नया वर्जन कवच 4.0 तैयार किया गया है, जो खासतौर पर हाई स्पीड ट्रेनों के लिए बनाया गया है.&amp;nbsp;
160 की स्पीड में कैसे लगेगा ब्रेक?
कवच सिस्टम ट्रेन, पटरी और सिग्नल के बीच लगातार डिजिटल तरीके से जानकारी का आदान-प्रदान करता है. अगर कोई ट्रेन तय स्पीड से ज्यादा तेज चल रही हो, या खतरे वाले सिग्नल के पास पहुंच रही हो और ड्राइवर ने समय पर ब्रेक नहीं लगाया, तो यह सिस्टम खुद-ब-खुद ट्रेन की ब्रेक प्रणाली को सक्रिय कर देता है. यानी 160 किलोमीटर प्रति घंटे जैसी तेज रफ्तार में भी अगर इंसानी चूक हो जाए तो मशीन खुद संभाल लेती है और ट्रेन को सुरक्षित रूप से रोक देती है.&amp;nbsp;
टक्कर रोकने की तकनीक कैसे काम करती है?
इस सिस्टम को काम करने के लिए पटरियों पर हजारों की संख्या में RFID टैग लगाए जाते हैं. साथ ही टावर, ऑप्टिकल फाइबर केबल और खास कवच हट भी बनाई जाती हैं. ट्रेन में लगा उपकरण अल्ट्रा हाई फ्रिक्वेंसी रेडियो के जरिए पटरी और सिग्नल सिस्टम से लगातार जुड़ा रहता है. इससे यह पता चलता रहता है कि आगे या पीछे कोई दूसरी ट्रेन तो नहीं आ रही. इसी वजह से यह सिस्टम आमने-सामने की टक्कर और पीछे से होने वाली टक्कर, दोनों तरह के हादसों को रोकने में सक्षम है.&amp;nbsp;
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कितना भरोसेमंद है यह सिस्टम
कवच को सेफ्टी इंटीग्रिटी लेवल-4 यानी SIL-4 मानक पर बनाया गया है. इसका मतलब है कि इस सिस्टम में गलती होने की संभावना 10,000 साल में सिर्फ एक बार जितनी कम है. यह दुनिया के सबसे ऊंचे सुरक्षा मानकों में गिना जाता है. इसके अलावा यह सिस्टम रेलवे कंट्रोल रूम को हर ट्रेन की लाइव लोकेशन और स्पीड की जानकारी भी लगातार भेजता रहता है, जिससे पूरे नेटवर्क की निगरानी करना आसान हो जाता है.
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        <pubDate>Tue, 08 Sep 2026 02:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>4 साल में बदल गया टीवी देखने का तरीका, इस फॉर्मेट में बढ़े 3 गुना व्यूअर्स</title>
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        <description><![CDATA[ भारत में Connected TV (CTV) और Free Ad-Supported Streaming Television (FAST) का दायरा लगातार बढ़ रहा है. देश में डिजिटल वीडियो और टीवी काफी तेजी से मजबूत हो रहा है. लेकिन अब इनको संचालित करने के लिए एक संस्था की जरूरत हो रही है. WPP Media और The Trade Desk की Ormax Media के साथ की गई रिसर्च के मुताबिक, भारत में CTV की पहुंच करीब 207 मिलियन दर्शकों तक हो चुकी है. ये संख्या लगभग 6.2 करोड़ से 6.5 करोड़ घरों से जुड़ी है.
रिपोर्ट के अनुसार 2022 के मुकाबले CTV ऑडियंस करीब तीन गुना बढ़े हैं. भारत में लोग औसतन रोजाना 2.9 घंटे CTV पर वीडियो कंटेंट देखते हैं. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि बड़ी स्क्रीन पर इंटरनेट बेस्ड कंटेंट देखने का चलन कितनी तेजी से बढ़ रहा है.
ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ रहा क्रेज
रिपोर्ट के मुताबिक, देश में कनेक्टेड टीवी के यूजर्स करीब तीन गुना बढ़ चुके हैं, वहीं, ग्रामीण क्षेत्रों में पिछले कुछ सालों में सीटीवी के यूजर्स दोगुना हो चुके हैं. ये बढ़ोतरी मैट्रो शहरों के मुकाबले ग्रामीण एरिया में ज्यादा देखने को मिल रही है. इसके अलावा एडवर्टाइजर्स के लिए भी ये एक अहम बढ़ोतरी है. इसका ये मतलब नहीं है कि लोग लीनियर टीवी को छोड़ते जा रहे हैं बल्कि अब लोग कनेक्टेड टीवी को भी अपनाने लगे हैं.
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रोज करीब 3 घंटे बड़ी स्क्रीन पर कंटेंट
रिपोर्ट के अनुसार CTV दर्शक औसतन 2.9 घंटे प्रतिदिन बड़ी स्क्रीन पर कंटेंट देखते हैं. वेब सीरीज सबसे फेमश कंटेंट फॉर्मेट है जिसे 69 फीसदी दर्शक पसंद करते हैं. इसके बाद क्रिकेट 64 फीसदी और थिएट्रिकल फिल्में 63 फीसदी दर्शकों की पसंद हैं. रिपोर्ट के मुताबिक CTV पर क्रिकेट देखने वाले 84 फीसदी मामलों में को-व्यूइंग यानी एक से ज्यादा लोग साथ बैठकर मैच देखते हैं.
युवाओं में भी बढ़ रहा क्रेज
अक्सर लोग कहते हैं कि युवा पीढ़ी बड़ी स्क्रीन से दूर हो चुकी है लेकिन ऐसा बिलकुल भी नहीं है. रिपोर्ट के मुताबिक Gen Z यूजर्स औसतन 3.1 घंटे रोज CTV पर बिताते हैं. इनमें 46 फीसदी ने पिछले एक साल में अपना CTV इस्तेमाल बढ़ाया है. वहीं 77 फीसदी Gen Z यूजर्स परिवार या दोस्तों के साथ CTV देखते हैं. ऐसे में अब एडवर्टाइजर्स के लिए मोबाइल और सोशल मीडिया के साथ Smart TV को भी युवाओं तक पहुंचने का एक जरूरी जरिया बन चुका है.
FAST प्लेटफॉर्म क्या है
आपको बता दें कि CTV इकोसिस्टम में FAST यानी Free Ad-Supported Streaming TV भी तेजी से जरूरी हो रहा है. करीब एक-तिहाई CTV दर्शक FAST के बारे में जानते हैं जबकि हर पांच में से एक दर्शक इसका इस्तेमाल करता है. FAST यूजर्स औसतन 3.4 घंटे रोज CTV पर बिताते हैं जो पूरे CTV दर्शकों के 2.9 घंटे के औसत से ज्यादा है.
ऐसे में 20.7 करोड़ दर्शकों तक पहुंच चुका CTV भारत के TV और advertising ecosystem को नई दिशा दे रहा है. खासकर ये ग्रामीण क्षेत्रों में तेजी से बढ़ रहा है, परिवार के साथ देखने की आदत और OTT कंटेंट भी फेमश हो रहे हैं जो ये संकेत दे रहा है कि आगे आने वाले समय में टीवी की परिभाषा सिर्फ पुराने चैनलों तक सीमित नहीं रहने वाली है.
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        <pubDate>Tue, 08 Sep 2026 02:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>Web Cookies कितने समय तक रहती हैं? जानें लॉगआउट के बाद भी क्यों बना रहता है खतरा</title>
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        <description><![CDATA[ आज के समय में इंटरनेट का इस्तेमाल करते हुए हम लगभग हर वेबसाइट पर लॉगिन करते हैं. बैंकिंग से लेकर सोशल मीडिया और शॉपिंग वेबसाइट तक, कई सर्विसेज हमें पहचानने के लिए Web Cookies का इस्तेमाल करती हैं. नॉर्मली लगता है कि किसी वेबसाइट से लॉगआउट करते ही अकाउंट पूरी तरह सुरक्षित हो गया है लेकिन कहानी इतनी सीधी नहीं है. कुछ Cookies लंबे समय तक आपके ब्राउजर में मौजूद रहते हैं और यही बात प्राइवेसी व सिक्योरिटी के लिए चिंता बढ़ाती है.
क्या होती हैं Web Cookies?
जानकारी के अनुसार, Web Cookies छोटी-छोटी डेटा फाइलें होती हैं जिन्हें वेबसाइट आपके ब्राउजर में सेव करती हैं. इनका इस्तेमाल वेबसाइट को आपकी पहचान याद रखने, आपकी पसंद सेव करने, शॉपिंग कार्ट बनाए रखने और लॉगिन सेशन को मैनेज करने के लिए किया जाता है.
हर Cookie एक जैसी नहीं होती. कुछ Cookies ब्राउजर बंद करते ही हट जाती हैं जबकि कुछ को एक समय तक स्टोर किया जाता है. इन्हें आमतौर पर Persistent Cookies कहा जाता है.
सालों तक कैसे रह सकती हैं Cookies?
आपको बता दें कि किसी Cookie की लाइफ इस बात पर निर्भर करती है कि वेबसाइट ने उसे कितने समय के लिए सेट किया है. अगर उसकी Expiration Date काफी आगे की रखी गई है तो वह लंबे समय तक ब्राउजर में मौजूद रहती है.
लेकिन कई वेबसाइटें सुरक्षा के लिए पुराने Session या Authentication Cookies को समय-समय पर खत्म कर देती हैं. फिर भी लंबे समय तक रहने वाली पहचान या ट्रैकिंग Cookies आपकी ऑनलाइन एक्टिविटी और प्राइवेसी से जुड़ी जानकारी के लिए जरूरी होती हैं.
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सिर्फ Logout करना हमेशा काफी क्यों नहीं?
जब आप किसी वेबसाइट से लॉगआउट करते हैं तो नॉर्मली वेबसाइट आपके मौजूदा लॉगिन सेशन को खत्म कर देती है. लेकिन इसका मतलब ये जरूरी नहीं कि ब्राउजर में मौजूद हर Cookie तुरंत डिलीट हो जाए. कुछ Cookies केवल वेबसाइट को आपकी पसंद या पहचान याद रखने के लिए होती हैं. वहीं अगर किसी हमलावर के हाथ कोई वैध Authentication Token लग जाए और वह अभी भी एक्टिव हो तो स्थिति गंभीर हो सकती है. हालांकि सुरक्षित वेबसाइटें ऐसे जोखिम को कम करने के लिए Logout के समय Session Token को सर्वर पर खत्म कर देती हैं.
असली खतरा कब बढ़ता है?
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि सबसे बड़ा खतरा तब होता है जब आपके डिवाइस या ब्राउजर तक किसी दूसरे व्यक्ति की पहुंच हो या कोई सॉफ्टवेयर आपके ब्राउजर डेटा तक पहुंच जाए. खास तौर पर पब्लिक या शेयर्ड कंप्यूटर पर लॉगिन करना खतरनाक साबित हो सकता है. ऐसे डिवाइस पर ब्राउजर में सेव Cookies और दूसरे डेटा आपकी प्राइवेसी को प्रभावित कर सकते हैं.
खुद को कैसे रखें सुरक्षित?
सुरक्षा के लिए समय-समय पर ब्राउजर की Cookies और Site Data साफ करें. संवेदनशील वेबसाइटों पर काम करने के बाद Logout जरूर करें और पब्लिक कंप्यूटर पर अपने पासवर्ड सेव न करें. ब्राउजर और ऑपरेटिंग सिस्टम को अपडेट रखना भी जरूरी है. इसके अलावा Two-Factor Authentication (2FA) या Passkeys जैसे सेफ्टी फीचर्स का इस्तेमाल करें. अगर किसी अकाउंट में Log out of all devices या Sign out everywhere ऑप्शन उपलब्ध है तो कुछ कंडिशन में उसका इस्तेमाल करना चाहिए.
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        <pubDate>Tue, 08 Sep 2026 02:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>Smartwatch के हेल्थ नंबर कितने सही हैं? क्या हर आंकड़ा होता है सही, जानें सच्चाई</title>
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        <description><![CDATA[ आज स्मार्टवॉच सिर्फ समय देखने वाली डिवाइस नहीं रह गई है. एडवांस स्मार्टवॉच में कई सारे फीचर्स देखने को मिल जाते हैं जो यूजर्स के लिए काफी फायदेमंद साबित होते हैं. हार्ट रेट, कदमों की संख्या, नींद, एक्सरसाइज, कैलोरी और यहां तक कि रिकवरी जैसी कई जानकारियां भी ये आपकी कलाई पर दिखाती है. लेकिन स्क्रीन पर दिखाई देने वाला हर नंबर शरीर से सीधे मापा गया आंकड़ा हो ये जरूरी नहीं होता है.
कई आंकड़े होते हैं सिर्फ अनुमान
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन के शोधकर्ताओं के मुताबिक, स्मार्टवॉच से मिलने वाले कई हेल्थ डेटा असली में सेंसर से मिले संकेतों और कंप्यूटर एल्गोरिदम की मदद से तैयार किया गया अंदाजा होता है.
वैज्ञानिकों ने बताया कि लोगों को ये समझना जरूरी है कि घड़ी कौन-सी चीज सीधे माप रही है और किन रिजल्ट्स को अलग-अलग डेटा के आधार पर कैलकुलेट किया जा रहा है. इस स्टडी का कंल्यूजन Sensors जर्नल में पब्लिश हुए हैं.
सेंसर कैसे जुटाते हैं जानकारी?
आपको बता दें कि स्मार्टवॉच में मौजूद अलग-अलग सेंसर शरीर और आसपास के वातावरण से संकेत लेते हैं. जैसे ऑप्टिकल सेंसर स्किन पर रोशनी डालकर कलाई में ब्लड फ्लो से जुड़े बदलावों को पहचानते हैं. इसी डेटा के आधार पर हार्ट रेट का अनुमान लगाया जाता है.
इसी तरह मोशन सेंसर शरीर की एक्टिविटी को पहचानते हैं जबकि GPS बाहर चलते या दौड़ते समय दूरी, स्थान और स्पीड जैसी जानकारी देता है. इसके बाद घड़ी का सॉफ्टवेयर इन संकेतों को प्रोसेस करके स्क्रीन पर अलग-अलग आंकड़े दिखाता है.
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कौन-से आंकड़ों पर ज्यादा भरोसा?
हर स्मार्टवॉच फीचर की सटीकता एक जैसी नहीं होती है. नॉर्मली यूजर के आराम करने की कंडिशन में हार्ट रेट, लगातार एक्सरसाइज के दौरान हार्ट रेट, स्टेप काउंट और बाहर की एक्टिविटी की स्पीड जैसे सरल आंकड़े ज्यादा भरोसेमंद हो सकते हैं.
इसके मुकाबले कैलोरी बर्न, नींद के अलग-अलग लेवल, शरीर में पानी की मात्रा, रिकवरी और बॉडी कंपोजिशन जैसे मुश्किल रिजल्ट्स कई तरह के डेटा और अनुमान पर निर्भर करते हैं. इसलिए इन्हें बिल्कुल सटीक मान लेना सही नहीं होता है.
एक ही व्यक्ति को अलग-अलग नंबर क्यों मिलते हैं?
दरअसल, स्मार्टवॉच की रीडिंग पर कई बाहरी चीजों का असर पड़ सकता है. घड़ी का ढीला होना, ज्यादा हाथ हिलाना, पसीना, टेंपरेचर, टैटू, स्किन का रंग और शरीर की बनावट जैसी परिस्थितियां सेंसर के रिजल्ट्स को प्रभावित कर सकती हैं.
इसके अलावा अलग-अलग कंपनियां अलग सेंसर, टेक्नोलॉजी और अपने पर्सनल एल्गोरिदम इस्तेमाल करती हैं. इसी वजह से दो ब्रांड की घड़ियां एक ही व्यक्ति के लिए अलग-अलग आंकड़े दिखा सकती हैं.
ट्रेंड पर रखनी चाहिए नजर
वैज्ञानिकों के अनुसार, स्मार्टवॉच का सबसे अच्छा इस्तेमाल लंबे समय के बदलावों को समझने के लिए किया जाता है. जैसे एक दिन हार्ट रेट नॉर्मल से थोड़ा अलग दिखने के बजाय कई दिनों या हफ्तों में लगातार हो रहा बदलाव ज्यादा जरूरी होता है. इसी तरह नींद, रोजाना की एक्टिविटी या आराम की कंडिशन में हार्ट रेट के पैटर्न को लंबे समय तक देखना ज्यादा कारगर साबित होता है.
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        <pubDate>Tue, 08 Sep 2026 02:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>AI Search और Google Search में क्या अंतर, किस सवाल के लिए कौन बेहतर?</title>
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        <description><![CDATA[ पिछले 25 साल से इंटरनेट पर कुछ भी खोजने का मतलब था- गूगल खोलना, कीवर्ड टाइप करना और नीचे लिंक्स की लिस्ट में से जवाब ढूंढना. अब यह तरीका बदल रहा है. लोग सवाल पूछकर सीधे जवाब पाना चाहते हैं और यही काम AI सर्च टूल्स जैसे ChatGPT, Perplexity और Google के अपने AI Overviews कर रहे हैं. दोनों तरीके आज साथ-साथ इस्तेमाल हो रहे हैं, लेकिन इनका काम करने का ढंग बिल्कुल अलग है.
गूगल सर्च कैसे काम करता है?
गूगल सर्च एक कीवर्ड-बेस्ड सिस्टम है. जब कोई सवाल टाइप किया जाता है तो गूगल उससे मिलते-जुलते शब्दों वाले लाखों वेब पेज खोजता है और उन्हें रैंकिंग के हिसाब से लिस्ट में दिखाता है. यूजर को खुद अलग-अलग लिंक खोलकर, पढ़कर और तुलना करके अपना जवाब निकालना पड़ता है. यानी गूगल जवाब नहीं, बल्कि जवाब तक पहुंचने के रास्ते दिखाता है.
AI सर्च कैसे अलग तरीके से काम करता है?
AI सर्च टूल्स बड़े लैंग्वेज मॉडल यानी LLM पर चलते हैं. ये सवाल के पीछे की मंशा समझने की कोशिश करते हैं, इंटरनेट से जुड़ी जानकारी इकट्ठा करते हैं और फिर उसे एक सीधे, आसान जवाब में बदलकर पेश कर देते हैं. यूजर को अलग-अलग वेबसाइट खोलने की जरूरत नहीं पड़ती. कई बार जवाब के साथ सोर्स लिंक भी दिए जाते हैं, ताकि यूजर चाहे तो असली जानकारी वहां जाकर जांच सके.
लिंक की लिस्ट बनाम सीधा जवाब
यही दोनों में सबसे बड़ा फर्क है. गूगल सर्च संभावित जवाब वाले पेज दिखाता है, जबकि AI सर्च सीधे तैयार जवाब देता है. सीधी और आसान जानकारी के लिए, जैसे किसी शहर का मौसम या किसी शब्द का मतलब, दोनों तरीके तेजी से काम करते हैं. लेकिन जब सवाल जटिल हो और कई पहलुओं को जोड़कर समझना हो, तो AI सर्च का जवाब ज्यादा व्यवस्थित और पढ़ने में आसान होता है.
सावधानी है जरूरी
AI सर्च का एक बड़ा जोखिम भी है. कई बार AI मॉडल गलत या भ्रामक जानकारी को भी उतने ही भरोसेमंद अंदाज में पेश कर देते हैं, जितना सही जानकारी को. इसे तकनीकी भाषा में हैलुसिनेशन कहा जाता है. वहीं गूगल सर्च में यूजर खुद अलग-अलग स्रोतों को देखकर तय कर सकता है कि कौन सी जानकारी भरोसेमंद है. इसलिए जरूरी और संवेदनशील मामलों में, जैसे सेहत, पैसा या कानून से जुड़े सवाल, जवाब को एक से ज्यादा जगह जांचना समझदारी है.
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कौन सा है बेहतर?
रोजमर्रा के छोटे-मोटे सवालों, जैसे किसी जगह का पता, किसी दुकान का समय या किसी वेबसाइट का लिंक ढूंढने के लिए गूगल सर्च तेज और भरोसेमंद है. वहीं रिसर्च, तुलना करने वाले सवाल, या ऐसे मुद्दे जिनमें कई जानकारियों को जोड़कर समझना हो, जैसे किसी नौकरी को चुनना चाहिए या नहीं या दो प्रोडक्ट्स में क्या फर्क है, वहां AI सर्च ज्यादा उपयोगी साबित होता है. ताजा खबरों और ठीक इसी वक्त की जानकारी के लिए अब भी पारंपरिक सर्च इंजन और सीधे न्यूज वेबसाइट ज्यादा भरोसेमंद माने जाते हैं.
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        <pubDate>Tue, 08 Sep 2026 02:30:05 +0530</pubDate>
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        <title>अब फोन से निकालकर चलाएं Action Camera, RugOne का अनोखा स्मार्टफोन</title>
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        <description><![CDATA[ RugOne ने बर्लिन में आयोजित IFA 2026 में अपना नया Xsnap 7 Pro पेश किया है. यह एक अनोखा स्मार्टफोन है, जिसमें फोन के साथ अलग से इस्तेमाल किया जा सकने वाला Modular Action Camera दिया गया है. RugOne का Xsnap 7 कैमरा मॉड्यूल सिर्फ 39 ग्राम का है और यह मैग्नेट की मदद से सीधे फोन से जुड़ जाता है. जरूरत पड़ने पर इसे फोन से अलग करके भी कैमरे की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है. कंपनी का कहना है कि यह मोबाइल फोटोग्राफी के एक्सपीरियंस को एक नया अंदाज देने वाला है.&amp;nbsp;
फोन से कैसे अलग हो जाएगा Action Camera?
RugOne Xsnap 7 Pro का सबसे खास फीचर इसका Magnetic Camera Module है. करीब 39 ग्राम वजन वाला यह छोटा मॉड्यूल फोन से आसानी से अलग किया जा सकता है. इसे हेलमेट, बाइक या दूसरे गियर पर भी लगाया जा सकता है. कंपनी ने इसे all-weather, all-terrain imaging system के तौर पर पेश किया है. कैमरा बिना किसी एक्स्ट्रा केसिंग के 5 मीटर तक पानी के अंदर भी काम कर सकता है.&amp;nbsp;
यह कैमरा 30fps पर 2.7K तक वीडियो रिकॉर्डिंग कर सकता है. इसमें 133 डिग्री का फील्ड ऑफ व्यू मिलता है. साथ ही SteadyX Stabilization, Horizon Lock, Timelapse और HDR Photo जैसे फीचर्स दिए गए हैं. हालांकि इसमें RAW फाइल सपोर्ट नहीं मिलता और वीडियो MP4 फॉर्मेट में रिकॉर्ड होता है.
40 मिनट तक अलग से चलेगा कैमरा
Xsnap 7 Camera Module में 64GB की Built-in Storage दी गई है. यह फोन से अलग होकर करीब 40 मिनट तक काम कर सकता है और जरूरत पड़ने पर फोन से ही रिचार्ज हो जाता है. इसके अलावा Xsnap Go App की मदद से कैमरे को 50 मीटर तक की दूरी से रिमोट तरीके से कंट्रोल किया जा सकता है.
Rugged Smartphone में भी दमदार फीचर्स
Xsnap 7 Pro में 6.67 इंच की 1.5K AMOLED डिस्पले दी गई है. फोन MediaTek Dimensity 8400 5G चिपसेट पर चलता है और इसमें 512GB स्टोरेज मिलती है. यह फोन 2 मीटर गहरे पानी में 30 मिनट तक रह सकता है और 1.5 मीटर की ऊंचाई से गिरने के बाद भी टिकने के लिए बनाया गया है. डिस्पले पर Corning Gorilla Glass Victus की प्रोटेक्शन दी गई है.
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50MP और 64MP कैमरा सेटअप
फोन में 50MP का मेन कैमरा दिया गया है, जिसमें Samsung GN9 Sensor मिलता है. इसके साथ 64MP का इंफेयर्ड नाइट विजन कैमरा भी है, जो OV64B1B सेंसर के साथ आता है. फोन Android 16 पर चलता है और इसमें Google Gemini AI के साथ RugOne के अपने AI Tools भी शामिल हैं.
Rugged Smartphone की कीमत
Xsnap 7 Pro को 7 सितंबर से Kickstarter पर Early-Bird Price में करीब 76,000 रुपए में खरीदा जा सकेगा. इसका Global Launch अक्टूबर में होगा. यूरोप में फोन की रिटेल कीमत करीब रुपए 1 लाख और अमेरिका में इसकी कीमत करीब 84,000 रुपए रखी गई है.
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        <pubDate>Mon, 07 Sep 2026 13:30:15 +0530</pubDate>
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        <title>UPI Payment करते हैं? ये 6 Security Tips जरूर जानें</title>
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        <description><![CDATA[ UPI Payment करते हैं? ये 6 Security Tips जरूर जानें ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 07 Sep 2026 13:30:14 +0530</pubDate>
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        <title>क्या है Hugging Face Hack जिसने बढ़ा दी चिंता? आपका डेटा भी है खतरे में</title>
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        <description><![CDATA[ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI का इस्तेमाल पूरी दुनिया में तेजी से बढ़ रहा है. Chatbot से लेकर कोडिंग, रिसर्च और कंटेंट क्रिएशन तक, आज लाखों लोग AI टूल्स पर निर्भर हैं. ऐसे में AI से जुड़ी किसी बड़ी कंपनी या प्लेटफॉर्म पर साइबर हमला सिर्फ एक वेबसाइट की समस्या नहीं रह जाता बल्कि इसका असर पूरी AI इंडस्ट्री पर पड़ता है. हाल ही में Hugging Face से जुड़ी हैकिंग की घटना ने इसी चिंता को फिर से सामने ला दिया है. आइए जानते हैं आखिर ये है क्या.
क्या है Hugging Face?
जानकारी के अनुसार, Hugging Face को AI और मशीन लर्निंग की दुनिया के सबसे जरूरी प्लेटफॉर्म्स में गिना जाता है. यहां डेवलपर्स और रिसर्चर्स हजारों AI मॉडल, डेटासेट और दूसरी मशीन लर्निंग संसाधनों को शेयर और इस्तेमाल करते हैं.
खास बात ये है कि ओपन-सोर्स AI इकोसिस्टम में Hugging Face की बड़ी भूमिका है. यानी यहां मौजूद किसी मॉडल या सॉफ्टवेयर में छेड़छाड़ होने पर उसका असर सिर्फ प्लेटफॉर्म तक सीमित नहीं रहता है बल्कि उन प्रोजेक्ट्स तक भी पहुंच सकता है जो इन संसाधनों पर निर्भर हैं.
हैक के बाद क्यों बढ़ी चिंता?
साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों की सबसे बड़ी चिंता ये है कि AI इकोसिस्टम एक-दूसरे से काफी जुड़ा हुआ है. डेवलपर किसी मॉडल को डाउनलोड करके अपने सर्वर या ऐप में इस्तेमाल कर सकता है. ऐसे में अगर किसी भरोसेमंद सोर्स से मिलने वाली फाइल या मॉडल में बदलाव कर दिया जाए तो यूजर अनजाने में जोखिम वाला कोड अपने सिस्टम में पहुंचा सकता है. यही वजह है कि Hugging Face जैसी सर्विस होने वाली सुरक्षा घटना को नॉर्मल डेटा चोरी की घटना से अलग नजर से देखा जा रहा है.
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AI मॉडल भी बन सकते हैं साइबर हमले का रास्ता
आपको बता दें कि नॉर्मली साइबर हमले में वेबसाइट, पासवर्ड या सर्वर को निशाना बनाया जाता है. लेकिन AI की दुनिया में खतरा थोड़ा अलग है. यहां मॉडल और डेटा खुद सॉफ्टवेयर सप्लाई चेन का हिस्सा बन चुके हैं.
अगर हमलावर किसी फेमश AI मॉडल, पैकेज या डेटासेट के साथ छेड़छाड़ करने में सफल हो जाए तो वह उन डेवलपर्स तक पहुंचने की कोशिश करता है जो उस संसाधन को अपने प्रोजेक्ट में इस्तेमाल करते हैं. इसे AI सप्लाई-चेन सुरक्षा की बड़ी चुनौती माना जा रहा है.
क्या आपका AI डेटा भी खतरे में है?
इसका मतलब ये नहीं है कि Hugging Face इस्तेमाल करने वाला हर व्यक्ति तुरंत खतरे में है. किसी सुरक्षा घटना में असली जोखिम इस बात पर निर्भर करता है कि कौन-सा सिस्टम प्रभावित हुआ, किस तरह की जानकारी तक पहुंच बनी और सुरक्षा तरीके कितने मजबूत थे.
ऐसे में AI टूल्स पर आंख बंद करके भरोसा करना सही नहीं माना जाता है. खासकर कंपनियों और डेवलपर्स को थर्ड-पार्टी मॉडल, पैकेज और डेटासेट इस्तेमाल करते समय उनकी सुरक्षा को जरूर चेक करना चाहिए.
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        <pubDate>Mon, 07 Sep 2026 13:30:13 +0530</pubDate>
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        <title>Fold नहीं, अब Roll होगी लैपटॉप स्क्रीन! Lenovo ने दिखाया नया टेक कमाल</title>
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        <description><![CDATA[ लैपटॉप की स्क्रीन को अब तक आपने खुलते और बंद होते ही देखा होगा, लेकिन Lenovo ने इसके डिजाइन को एक कदम आगे ले जाने की कोशिश की है. कंपनी ने IFA 2026 में Project Swan नाम का एक नया प्रोटोटाइप लैपटॉप दिखाया है, जिसकी स्क्रीन मुड़ने की जगह रोल होकर बड़ी हो जाती है. ऐसे में जरूरत के हिसाब से एक ही लैपटॉप की स्क्रीन का साइज बढ़ाया जा सकता है. इस कॉन्सेप्ट की मदद से आने वाले समय में लैपटॉप का डिजाइन सिर्फ पतला और हल्का होने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि स्क्रीन का साइज भी जरूरत के हिसाब से बदला जा सकेगा. तो आइए जानते हैं कि इसमें क्या खास होगा.&amp;nbsp;
14 इंच की स्क्रीन बन जाएगी 17 इंच
Lenovo का Project Swan फिलहाल एक प्रोटोटाइप है. इसमें 14 इंच की स्क्रीन को रोल करके 17 इंच तक बढ़ाया जा सकता है. इसमें 16:9 आस्पेक्ट रेशियो दिया गया है, जिससे स्क्रीन पारंपरिक वाइडस्क्रीन लैपटॉप जैसी दिखाई देती है. Lenovo के मुताबिक, स्क्रीन 2,258 बाय 1,672 पिक्सल से बढ़कर 2,850 बाय 1,672 पिक्सल तक पहुंचती है. कंपनी ने इसे लगभग 4K डिस्प्ले बताया है. यह कॉन्सेप्ट Lenovo के पिछले ThinkBook Plus Rollable से अलग है. पिछले मॉडल में स्क्रीन ऊपर की तरफ बढ़कर 14 इंच से 16.7 इंच हो जाती थी. वहीं Project Swan में स्क्रीन की चौड़ाई बढ़ाई जाती है.
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कैसा है इसका डिजाइन?
Lenovo इससे पहले CES 2026 में Legion Pro Rollable भी दिखा चुकी है. उस मॉडल में स्क्रीन 16 इंच से 21.5 इंच और फिर 23.8 इंच तक बढ़ती थी. &amp;nbsp;Project Swan का डिजाइन आसान इस्तेमाल और बेहतर काम के लिए बनाया गया है. इसके फंक्शन भी कीबोर्ड के ऊपर दिए गए फंक्शन बटन से कंट्रोल किए जाते हैं. Lenovo के अनुसार, वाइडस्क्रीन डिजाइन लैपटॉप को ज्यादा बैलेंस और कंर्फटेबल बनाता है और पारंपरिक लैपटॉप के साइज को भी बनाए रखता है.&amp;nbsp;
कीमत और लॉन्च कितनी हो सकती है?
Project Swan अभी सिर्फ एक प्रोटोटाइप कॉन्सेप्ट है. कंपनी ने इसकी कीमत, कॉन्फिगरेशन और बाजार में उपलब्ध होने की तारीख की जानकारी नहीं दी है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Mon, 07 Sep 2026 13:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>IFA 2026 के Top Gadgets, Laptop से Robot तक सब खास</title>
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        <description><![CDATA[ IFA 2026 में इस बार टेक्नोलॉजी का काफी अलग और नया अंदाज देखने को मिल रहा है. बर्लिन में चल रहे इस बड़े टेक शो में रोबोट, लैपटॉप, स्मार्ट लाइट, सिक्योरिटी कैमरा, प्रोजेक्टर और कई तरह के नए गैजेट्स लोगों का ध्यान खींच रहे हैं. शो में अगली पीढ़ी के ऑटोनॉमस फ्लोर क्लीनर से लेकर ह्यूमनॉइड रोबोट और नए कंप्यूटिंग हार्डवेयर तक कई दिलचस्प टेक्नोलॉजी पेश की जा रही हैं. कुछ गैजेट्स अपने अनोखे डिजाइन की वजह से चर्चा में हैं, तो कुछ नई टेक्नोलॉजी और खास फीचर्स के कारण सुर्खियां बटोर रहे हैं. IFA 2026 में नजर आ रहे इन खास गैजेट्स में से कुछ ऐसे हैं, जो आने वाले समय की टेक्नोलॉजी की झलक दिखाते हैं. तो आइए जानते हैं कि IFA 2026 के Top Gadgets क्या है.&amp;nbsp;
iRobot Roomba Max 875
iRobot Roomba Max 875 एक ऐसा रोबोट क्लीनर है, जो ऑटोमैटिक सफाई के साथ गहरी क्लीनिंग पर फोकस करता है. इसमें SealForce टेक्नोलॉजी है, जो कारपेट पर सफाई करते समय नीचे से एक सील बनाकर सक्शन को सीधे फाइबर तक पहुंचाती है. इसमें सेल्फ-क्लीनिंग रोलर मॉप, दाग ढीले करने वाला स्टीम नोजल और ऐसा बेस भी है जो डस्टबिन खाली करने के साथ मॉप को धोकर सुखाता है.. इसकी कीमत 1,199 डॉलर है.&amp;nbsp;
Philips Hue Liane 360
स्मार्ट लाइटिंग में Philips Hue Liane 360 ने अलग डिजाइन पेश किया. यह रोप लाइट OmniGlow टेक्नोलॉजी के जरिए चारों तरफ एक जैसी रोशनी देती है. इसे मोड़ा, लटकाया या अलग-अलग जगहों पर लगाया जा सकता है. यह 1.6 करोड़ रंग दिखा सकती है और Hue ऐप से इसकी ब्राइटनेस और कलर कंट्रोल किए जा सकते हैं.&amp;nbsp;
PrimeBOT Prime Q1
PrimeBOT Prime Q1 एक छोटा ह्यूमनॉइड रोबोट है, जिसकी लंबाई करीब 3 फीट है. यह चल सकता है, घूम सकता है, डांस कर सकता है और 10 से ज्यादा मार्शल आर्ट मूवमेंट कर सकता है. इसमें 22 डिग्री ऑफ फ्रीडम दिए गए हैं और इसके लुक को 3D प्रिंटिंग व मॉड्यूलर हेड से बदला जा सकता है.&amp;nbsp;
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Lenovo Project AeroBlade
लैपटॉप की दुनिया में Lenovo Project AeroBlade खास रहा. यह सिर्फ 10mm मोटा और करीब 1.85 पाउंड वजन वाला फैन लेस लैपटॉप प्रोटोटाइप है. इसमें Frore Systems की AirJet टेक्नोलॉजी इस्तेमाल की गई है, जो फैन की जगह अल्ट्रासोनिक वाइब्रेशन से हवा को मूव करती है.&amp;nbsp;
Lenovo Project Swan
Lenovo Project Swan में 14 इंच की स्क्रीन है, जो बटन दबाने पर साइड की तरफ खुलकर 17 इंच की हो जाती है. इसमें 16:9 आस्पेक्ट रेशियो दिया गया है. इसका मकसद लैपटॉप को कॉम्पैक्ट रखते हुए ज्यादा स्क्रीन स्पेस देना है.&amp;nbsp;
दूसरे खास गैजेट्स
IFA 2026 में Reolink OMVI 2i Ultra सिक्योरिटी कैमरा भी खास रह. इसमें 8MP वाइड कैमरा और 5MP पैन-टिल्ट कैमरा है, जो किसी ऑब्जेक्ट को पहचानने पर उस पर ऑटोमेटिक जूम कर सकता है. वहीं DJI Osmo 360 II 8K वीडियो के साथ आया है. Acer Predator Atlas 7 में 7 इंच का फॉर्म फैक्टर और Intel Arc G3 Extreme प्रोसेसर दिया गया है. इसके अलावा Lexar Muse Ultra-Slim Portable SSD सिर्फ 3.8mm तक पतला है, जबकि Oukitel RG14-P लैपटॉप के ढक्कन पर लगे सोलर पैनल से 10W तक चार्जिंग कर सकता है.
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        <pubDate>Mon, 07 Sep 2026 13:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>Laptop में Screenshot लेने के 8 प्रो तरीके, नहीं जानते होंगे</title>
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        <pubDate>Sun, 06 Sep 2026 21:30:14 +0530</pubDate>
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        <title>क्या Router के पास सबसे तेज इंटरनेट चलता है? जानिए क्या है सच्चाई</title>
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        <description><![CDATA[ अक्सर आपने सुना होगा कि Wi-Fi Router के जितना पास बैठेंगे, इंटरनेट उतना ही तेज चलेगा. यही वजह है कि जब घर में इंटरनेट धीमा होता है तो लोग Router के पास जाकर बैठ जाते हैं. लेकिन क्या वाकई Router के बिल्कुल पास इंटरनेट की स्पीड सबसे ज्यादा होती है? इसका जवाब थोड़ा दिलचस्प है. दरअसल, दूरी का असर जरूर पड़ता है लेकिन सिर्फ Router के पास होना ही तेज इंटरनेट की गारंटी नहीं है.
Router से दूरी का क्या है कनेक्शन?
Wi-Fi Router रेडियो सिग्नल के जरिए आपके फोन, लैपटॉप, स्मार्ट टीवी और दूसरे डिवाइस को इंटरनेट से जोड़ता है. जैसे-जैसे आप Router से दूर जाते हैं, Wi-Fi सिग्नल की ताकत आमतौर पर कम होती जाती है. दीवारें, दरवाजे, फर्नीचर और दूसरी इलेक्ट्रॉनिक चीजें भी सिग्नल को प्रभावित कर सकती हैं.
इसलिए अगर आपका फोन Router से काफी दूर है तो कमजोर सिग्नल के कारण स्पीड कम और कनेक्शन अनस्टेबल हो सकता है. खासकर बड़े घरों या कई कमरों वाले फ्लैट में ये समस्या ज्यादा दिखाई देती है.
क्या बिल्कुल Router के पास बैठने से सबसे ज्यादा स्पीड मिलेगी?
ऐसा जरूरी नहीं है. दरअसल, Router के ठीक बगल में बैठने से सिग्नल बहुत मजबूत मिल सकता है लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि इंटरनेट की असली स्पीड हमेशा वहीं सबसे ज्यादा होगी. आपकी इंटरनेट स्पीड आपके ब्रॉडबैंड प्लान, Router की क्षमता, Wi-Fi बैंड, नेटवर्क ट्रैफिक और सर्वर जैसे कई फैक्टर पर निर्भर करती है. जैसे अगर आपका प्लान 100 Mbps का है तो Router के पास बैठने से वह अचानक 500 Mbps नहीं हो जाएगा. इसके अलावा कुछ Router के बिल्कुल नजदीक होने पर भी परफॉर्मेंस में खास फायदा नहीं मिलता है.
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2.4GHz और 5GHz में भी है फर्क
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि Wi-Fi Router में इस्तेमाल होने वाला बैंड भी काफी जरूरी है. नॉर्मली 2.4GHz Wi-Fi ज्यादा दूरी तक पहुंच सकता है और दीवारों को बेहतर तरीके से पार करता है लेकिन इसमें भीड़ और interference ज्यादा हो सकती है. वहीं 5GHz Wi-Fi ज्यादा स्पीड दे सकता है लेकिन इसकी रेंज कम होती है और दीवारों से गुजरते समय सिग्नल ज्यादा कमजोर हो जाता है. यानी Router से कुछ दूरी पर 5GHz की स्पीड घट सकती है जबकि 2.4GHz उसी जगह ज्यादा स्टेबल कनेक्शन दे सकता है.
Router कहां रखना सबसे बेहतर है?
Router को घर के किसी एक कोने में रखने के बजाय घर के बीच के हिस्से में, थोड़ी ऊंचाई पर और खुले स्थान में रखना बेहतर होता है. उसे अलमारी के अंदर, टीवी के पीछे या जमीन पर रखने से Wi-Fi सिग्नल प्रभावित हो सकता है. अगर घर बड़ा है और कुछ कमरों में Wi-Fi कमजोर रहता ह तो Wi-Fi Mesh System या Range Extender जैसे ऑप्शन भी मदद कर सकते हैं.
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        <pubDate>Sun, 06 Sep 2026 21:30:13 +0530</pubDate>
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        <title>2,666 रुपए की EMI में 12GB RAM वाला फोन, फीचर्स जानकर चौंक जाएंगे!</title>
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        <description><![CDATA[ Tecno ने पिछले महीने भारतीय बाजार में Tecno Spark Go 3 Pro लॉन्च किया था. अब 4 सितंबर से यह फोन बिक्री के लिए उपलब्ध हो गया है. कंपनी ने इसे 15,999 रुपए की शुरुआती कीमत में पेश किया है. इसे सिर्फ 2,666 रुपए प्रति महीने की किस्त देकर फोन खरीदा जा सकता है. फोन में 4GB RAM के साथ 8GB Extended RAM का सपोर्ट मिलता है, जिससे कुल 12GB RAM की ताकत मिलती है. इसके अलावा इसमें 5200mAh की Battery और 120Hz Display जैसे फीचर्स भी दिए गए हैं.&amp;nbsp;
Tecno Spark Go 3 Pro की कीमत
Tecno Spark Go 3 Pro के 4GB RAM + 64GB Storage वेरिएंट की कीमत 15,999 रुपए है. वहीं 4GB RAM + 128GB Storage मॉडल को 16,999 रुपए के लॉन्च प्राइस में लाया गया है. फोन खरीदने वालों के लिए कंपनी 6 महीने की No Cost EMI भी दे रही है. इसके तहत सिर्फ 2,666 रुपए प्रति महीने की किस्त देकर फोन खरीदा जा सकता है.
ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों जगह सेल
यह 4G स्मार्टफोन Amazon और Flipkart जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के साथ ऑफलाइन रिटेल स्टोर्स पर भी उपलब्ध होगा. फोन को बरगंडी रेड, एक्लिप्स ब्लैक, बेसाल्ट टाइटेनियम और सनराइज ऑरेंज कलर में खरीदा जा सकता है. इसके साथ 1 साल की मेन्यू फैक्चर वारंटी भी मिलेगी.
Tecno Spark Go 3 Pro फीचर्स&amp;nbsp;
फोन में 1526 बाय 720 पिक्सल रेजोल्यूशन वाली 6.78 इंच की HD+ IPS LCD डिस्पले दी गई है. इसमें वॉटर ड्रॉप नोच स्टाइल के साथ 120Hz रिफ्रेश रेट, 240Hz &amp;nbsp;टच सैम्पलिंग रेट और 580 निट्स की हाई ब्राइटनेस मिलती है. फोन को IP68 + IP69 रेटिंग भी मिली है, जो इसे डस्ट और वॉटर प्रोटेक्शन देती है.&amp;nbsp;
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इसका प्रोसेसर भी है खास&amp;nbsp;
परफॉर्मेंस के लिए फोन में MediaTek Helio G81 चिपसेट दिया गया है. यह 12nm तकनीक से तैयार ऑक्टा-कोर प्रोसेसर है, जिसकी क्लोक स्पीड 1.8GHz से 2.0GHz तक है. 91Mobiles की टेस्टिंग में फोन ने 3,71,151 का स्कोर हासिल किया है. ग्राफिक्स के लिए ARM Mali-G52 MC2 GPU दिया गया है.
5200mAh बैटरी और 13MP कैमरा
पावर बैकअप के लिए फोन में 5200mAh बैटरी दी गई है, जिसे 10W फास्ट चार्जिंग का सपोर्ट मिलता है. इसमें OTG, Wi-Fi, Bluetooth और Infrared Sensor भी दिया गया है, जिससे फोन को TV रिमोट की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है.
कैमरे में पीछे LED फ्लैश के साथ 13MP का f1.8 मेन कैमरा मिलता है, जो ऑटोफोकस सपोर्ट करता है. वहीं सेल्फी और वीडियो कॉलिंग के लिए 8MP का f2.0 फ्रंट कैमरा दिया गया है. सिक्योरिटी के लिए फोन में Side-Mounted Fingerprint Sensor भी मौजूद है.
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        <pubDate>Sun, 06 Sep 2026 21:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>कौन सा App खत्म कर रहा iPhone की Battery? चुटकियों में ऐसे करें पता</title>
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        <description><![CDATA[ अगर आपके iPhone की बैटरी पहले के मुकाबले तेजी से खत्म हो रही है तो हर बार इसकी वजह खराब बैटरी नहीं होती. कई बार कुछ ऐप्स बैकग्राउंड में लगातार एक्टिव रहते हैं और चुपचाप काफी बैटरी खर्च करते रहते हैं. अच्छी बात ये है कि iPhone में ऐसा फीचर मौजूद है जिससे आप आसानी से पता लगा सकते हैं कि कौन-सा ऐप सबसे ज्यादा बैटरी खा रहा है.
Battery खाने वाले ऐप की ऐसे करें पहचान
सबसे पहले अपने iPhone में Settings ऐप खोलें. इसके बाद नीचे स्क्रॉल करके Battery ऑप्शन पर टैप करें. यहां आपको पिछले 24 घंटे या पिछले कई दिनों में बैटरी इस्तेमाल से जुड़ी जानकारी दिखाई देगी.
इस स्क्रीन पर ऐप्स की एक लिस्ट भी मिलती है. हर ऐप के सामने ये जानकारी होती है कि उसने कुल बैटरी खपत में कितने प्रतिशत का इस्तेमाल किया. जिस ऐप का प्रतिशत ज्यादा है, वह आपकी बैटरी पर ज्यादा असर डाल रहा हो सकता है.
सिर्फ Percentage देखकर फैसला न करें
आपको बता दें कि ये जरूरी नहीं कि सबसे ज्यादा Battery इस्तेमाल करने वाला ऐप हमेशा खराब या बेकार ही हो. जैसे अगर आपने लंबे समय तक YouTube पर वीडियो देखे हैं तो उसका बैटरी इस्तेमाल ज्यादा होना नॉर्मल है. इसी तरह गेमिंग ऐप्स, कैमरा और वीडियो एडिटिंग ऐप्स भी ज्यादा पावर ले सकते हैं क्योंकि वे प्रोसेसर, डिस्प्ले और दूसरे हार्डवेयर का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं. इसलिए Battery सेक्शन में दिखाई देने वाले आंकड़ों को आपके इस्तेमाल के हिसाब से समझना जरूरी है.
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Screen और Background Activity पर दें ध्यान
iPhone की Battery सेटिंग्स में आपको ये भी देखने को मिल सकता है कि कोई ऐप स्क्रीन पर इस्तेमाल होने के दौरान कितनी बैटरी ले रहा है और बैकग्राउंड में कितना एक्टिव था.
अगर कोई ऐप आपने बहुत कम इस्तेमाल किया लेकिन फिर भी उसका बैकग्राउंड बैटरी इस्तेमाल काफी ज्यादा दिखाई दे रहा है तो उस पर ध्यान देना चाहिए. हो सकता है वह बैकग्राउंड में लोकेशन, सिंकिंग या दूसरी एक्टिविटी कर रहा हो.
ज्यादा Battery खाने वाले ऐप के साथ क्या करें?
अगर कोई ऐप जरूरत से ज्यादा बैटरी इस्तेमाल कर रहा है तो सबसे पहले उसे अपडेट करें. कई बार ऐप के नए वर्जन में बैटरी से जुड़ी समस्याओं को ठीक किया जाता है. जरूरत न होने पर आप उस ऐप की Background App Refresh सेटिंग को भी लिमिटेड कर सकते हैं.
इसके अलावा जिन ऐप्स को लगातार आपकी लोकेशन की जरूरत नहीं है, उनके Location Access को भी सीमित करना मददगार साबित हो सकता है. अगर कोई ऐप बेहद ज्यादा बैटरी खर्च कर रहा है और आपको उसकी जरूरत भी नहीं है तो उसे हटाना एक आसान ऑप्शन हो सकता है.
Battery Health भी जरूर चेक करें
अगर सभी ऐप्स का इस्तेमाल नॉर्मल है फिर भी iPhone की बैटरी बहुत तेजी से खत्म हो रही है तो Settings में जाकर Battery ऑप्शन में जाएं और यहां पर Battery Health में जाकर बैटरी की कंडिशन को चेक करें. पुरानी या कमजोर बैटरी होने पर फोन का बैकअप कम हो जाता है.
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        <title>GPT&amp;6 vs Claude vs Gemini : Context Window से Price तक, जानें कौन&amp;सा AI बेस्ट?</title>
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        <description><![CDATA[ AI अब हमारी डेली लाइफ का हिस्सा बन चुका है. जैसे-जैसे इसका यूज बढ़ रहा है, वैसे-वैसे AI कंपनियां भी अपने मॉडल्स को ज्यादा बेहतर बनाने पर काम कर रही हैं. इसी कड़ी में OpenAI ने अपना नया AI मॉडल GPT-6 लॉन्च किया है. कंपनी के मुताबिक, यह दुनिया का सबसे इंटेलिजेंट और अलाइंड मॉडल है. GPT-6 के आने के बाद AI की दुनिया में इसकी तुलना Claude Fable 5.1 और Gemini 3.8 Flash जैसे मॉडल्स से की जा रही है. यह तीनों मॉडल अपने-अपने खास फीचर्स के साथ आते हैं, लेकिन Context Window, Output Capacity, Benchmark Performance और Pricing के मामले में इनमें अंतर है. ऐसे में आइए जानते हैं GPT-6, Claude Fable 5.1 और Gemini 3.8 Flash में क्या फर्क है.
Context Window में कौन आगे?
AI का Context Window उसकी Short-Term Memory की तरह काम करता है. यह बताता है कि AI एक समय में कितना टेक्सट पढ़, याद और समझ सकता है. GPT-6 में 1,050,000 टोकन का Context Window दिया गया है. वहीं Gemini 3.8 Flash में 1,048,576 &amp;nbsp;टोकन और Claude Fable 5.1 में 1,000,000 &amp;nbsp;टोकन का Context Window मिलता है. इस मामले में GPT-6 सबसे आगे है.
Output और Knowledge Cutoff
एक रिस्पॉन्स में कितना Output जनरेट किया जा सकता है, इस मामले में GPT-6 और Claude Fable 5.1 बराबरी पर हैं. दोनों मॉडल 128,000 टोकन तक Output जनरेट कर सकते हैं. वहीं Gemini 3.8 Flash 65,536 टोक्नस यानी करीब 66K &amp;nbsp;टोकन तक Output दे सकता है. GPT-6 और Claude Fable 5.1, Gemini 3.8 Flash की तुलना में करीब दोगुना Output एक रिस्पॉन्स में जनरेट कर सकते हैं.
वहीं Knowledge Cutoff की बात करें तो GPT-6 का Cutoff 30 अप्रैल 2026 तक है. Claude Fable 5.1 का Knowledge Cutoff जून 2026 और Gemini 3.8 Flash का मार्च 2026 तक है. हालांकि Google का कहना है कि कुछ क्षेत्रों में जानकारी जनवरी 2025 तक ही हो सकती है.
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Benchmark Scores में कौन-सा AI बेस्ट?
1. OpenAI के मुताबिक GPT-6 ने ARC-AGI-2 में 95.0 प्रतिशत , ARC-AGI-3 में 99.9 प्रतिशत और अपने साइबर सिक्योरिटी टेस्ट एक्सप्लॉइट बेंच में 100 प्रतिशत स्कोर किया है. एजेंट्स लास्ट एग्जाम में इसका स्कोर 59.3 प्रतिशत बताया गया है, जबकि पुराने GPT-5.6 Sol का स्कोर 53.6 प्रतिशत था.
2. Anthropic के अनुसार Claude Fable 5.1 ने Terminal-Bench 4.0 में 55.8 प्रतिशत और CursorBench 3.2.0 में 73.4 प्रतिशत स्कोर किया है. Humanity लास्ट एग्जाम &amp;nbsp;में इसका स्कोर बिना Tools के 60.9 प्रतिशत और Tools के साथ 65 प्रतिशत बताया गया है.
3. Google के मुताबिक Gemini 3.8 Flash ने Terminal-Bench 2.1 में 90.8 प्रतिशत स्कोर हासिल किया है, जबकि पिछले फ्लैश मॉडल का स्कोर 81.6 प्रतिशत था. HLE-Verified में इसका स्कोर 54.9 प्रतिशत रहा.
AI मॉडल की कीमत
इन तीनों मॉडल अपने-अपने सब्सक्रिप्शन प्लान के जरिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं. भारत में GPT-6 को ChatGPT Plus Plan के साथ इस्तेमाल किया जा सकता है, जिसकी कीमत 1,999 रुपए प्रति महीने से शुरू होती है. Claude Fable 5.1 के लिए Claude Pro Plan की कीमत 2,399 रुपए प्रति महीना है. वहीं Gemini 3.8 Flash Google AI Pro Plan के साथ उपलब्ध है, जिसकी कीमत भारत में 1,950 रुपए प्रति महीना है.
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        <pubDate>Sun, 06 Sep 2026 21:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>Windows PC की Storage हो रही है फुल? जानें कौन सी Files खा रहीं सारी जगह</title>
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        <description><![CDATA[ Windows PC की Storage हो रही है फुल? जानें कौन सी Files खा रहीं सारी जगह ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 06 Sep 2026 09:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>WhatsApp पर अपनी प्रोफाइल फोटो किससे छिपाएं, ये प्राइवेसी सेटिंग काम आएगी</title>
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        <description><![CDATA[ WhatsApp का इस्तेमाल आज लगभग हर कोई करता है. यहां लोग दोस्तों और परिवार के साथ चैट करने के अलावा अपनी फोटो भी प्रोफाइल पर लगाते हैं. लेकिन जरूरी नहीं कि आप अपनी प्रोफाइल फोटो हर WhatsApp कांटेक्ट को दिखाना चाहें. अगर आप चाहते हैं कि आपके द्वारा चुने हुए खास लोग ही आपकी फोटो देख पाएं, तो WhatsApp में इसके लिए एक आसान प्राइवेसी सेटिंग दी गई है. इसकी मदद से आप अपनी प्रोफाइल फोटो को अपनी पसंद के लोगों से छिपा सकते हैं और कुछ पसंद लोगों को दिखा सकते हैं.
WhatsApp में प्रोफाइल फोटो छिपाने की सेटिंग&amp;nbsp;
WhatsApp में प्रोफाइल फोटो की प्राइवेसी बदलने का विकल्प मिलता है. इसमें आप खुद तय कर सकते हैं कि आपकी प्रोफाइल फोटो कौन देख सकता है और कौन नहीं . अगर आप फोटो को कुछ खास लोगों से छिपाना चाहते हैं, तो इसके लिए My Contacts Except का विकल्प काम आता है. इस सेटिंग को चुनने के बाद आपकी कॉन्टैक्ट लिस्ट में मौजूद जिन लोगों को आप चुनेंगे, उन्हें आपकी प्रोफाइल फोटो दिखाई नहीं देगी.
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ऐसे छिपाएं प्रोफाइल फोटो
इसके लिए सबसे पहले WhatsApp खोलें और सेटिंग्स में जाएं और इसके बाद WhatsApp में सबसे ऊपर कोने में एक तीन डॉट वाला विकल्प दिखेगा. उसमें&amp;nbsp; Privacy वाले विकल्प पर टैप करें. यहां आपको Profile Photo का ऑप्शन दिखाई देगा. अब Profile Photo पर टैप करने के बाद My Contacts Except... चुनें. इसके बाद उन लोगों को सिलेक्ट कर दें, जिनसे आप अपनी प्रोफाइल फोटो छिपाना चाहते हैं. लोगों को चुनने के बाद सेटिंग सेव कर दें.अब जिन लोगों को आपने चुना है, वे आपकी WhatsApp प्रोफाइल फोटो नहीं देख पाएंगे.
फोटो सभी से छिपानी हो तो क्या करें?
अगर आप अपनी प्रोफाइल फोटो किसी को भी नहीं दिखाना चाहते तो Nobody विकल्प चुन सकते हैं. इसके बाद आपकी प्रोफाइल फोटो किसी भी WhatsApp यूजर को दिखाई नहीं देगी. वहीं, अगर आप चाहते हैं कि सिर्फ आपके सेव किए हुए कॉन्टैक्ट्स ही फोटो देखें तो My Contacts विकल्प चुन सकते हैं. इस तरह WhatsApp आपको प्रोफाइल फोटो की प्राइवेसी अपनी जरूरत के हिसाब से बदलने की सुविधा देता है.
प्राइवेसी के लिए काम की है ये सेटिंग
कई बार हम ऐसे लोगों का नंबर सेव कर लेते हैं जिनसे ज्यादा बात नहीं होती, लेकिन हम नहीं चाहते कि वे हमारी फोटो देखें. ऐसे में सभी कॉन्टैक्ट्स से फोटो छिपाने की जरूरत नहीं है. My Contacts Except... विकल्प से आप सिर्फ कुछ लोगों को चुनकर अपनी फोटो उनसे छिपा सकते हैं. इसलिए अगर आप WhatsApp पर अपनी प्रोफाइल फोटो को लेकर ज्यादा प्राइवेसी रखना चाहते हैं, तो यह छोटी सी सेटिंग आपके काफी काम आ सकती है.
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&amp;nbsp; ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 06 Sep 2026 09:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>गाड़ी कहां पार्क है? भूल जाते हैं तो ऑन कर लें Google Map की ये सेटिंग</title>
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        <description><![CDATA[ बड़े मॉल, एयरपोर्ट, मेट्रो स्टेशन या किसी बड़े इवेंट की पार्किंग में अक्सर लोग अपनी गाड़ी पार्क करके भूल जाते हैं कि वे किस फ्लोर या किस लाइन में खड़ी की थी. बाद में गाड़ी ढूंढने में काफी समय बर्बाद हो जाता है. इस दिक्कत को दूर करने के लिए गूगल मैप्स में एक बेहद काम का फीचर दिया गया है, जिसकी मदद से पार्किंग की सही लोकेशन सेव की जा सकती है और बाद में आसानी से गाड़ी तक पहुंचा जा सकता है.
मैन्युअली पार्किंग लोकेशन कैसे सेव करें
इस फीचर को इस्तेमाल करने के लिए सबसे पहले फोन में लोकेशन सर्विस ऑन करनी होती है. इसके बाद गूगल मैप्स ऐप खोलें, जहां मैप पर आपकी मौजूदा लोकेशन एक नीली बिंदी के रूप में दिखाई देती है. इस नीली बिंदी पर टैप करते ही कुछ ऑप्शन खुलते हैं, जिनमें से पार्किंग सेव करें या सेट एज पार्किंग लोकेशन पर टैप करना होता है. ऐसा करते ही उस जगह पर एक छोटा सा &#039;P&#039; आइकन दिखने लगता है, जो बताता है कि गाड़ी वहां खड़ी है.
अपने आप सेव हो जाएगी पार्किंग लोकेशन
अगर बार-बार मैन्युअली सेव करना झंझट लगता है, तो एंड्रॉयड फोन में एक ऑटोमैटिक सेटिंग भी मौजूद है. इसके लिए मैप्स ऐप में प्रोफाइल फोटो पर टैप करके सेटिंग्स में जाएं, वहां नेविगेशन ऑप्शन चुनें और ऑटोमैटिकली सेव पार्किंग को ऑन कर दें. इसके बाद गूगल मैप्स फोन के मोशन सेंसर या गाड़ी के ब्लूटूथ कनेक्शन की मदद से खुद समझ जाता है कि आप कब गाड़ी चलाना बंद करके पार्क कर चुके हैं, और अपने आप उस जगह को आपने यहां पार्क किया के तौर पर मार्क कर देता है.
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फोटो, नोट और टाइमर जोड़ने की सुविधा
पार्किंग लोकेशन सेव करने के बाद गूगल मैप्स कुछ और भी सुविधाएं देता है। सेव की गई जगह पर टैप करके more info में जाकर पार्किंग स्पॉट की एक फोटो खींची जा सकती है, ताकि आसपास की पहचान याद रहे. इसके अलावा फ्लोर नंबर, गाड़ी की जगह या किसी खास पहचान का नोट भी लिखा जा सकता है. अगर पेड पार्किंग में गाड़ी खड़ी की है, तो वहां टाइमर भी सेट किया जा सकता है, जिससे तय समय खत्म होने से पहले फोन पर याद दिलाने वाला नोटिफिकेशन आ जाता है.
गाड़ी तक वापस कैसे पहुंचें
गाड़ी की तरफ लौटते समय बस मैप्स के सर्च बार में जाकर सेव की गई पार्किंग लोकेशन पर टैप करना होता है. इसके बाद हाउ टू गेट देयर ऑप्शन पर टैप करने से पैदल चलने का पूरा रास्ता और अनुमानित समय दिखने लगता है, जिससे बड़ी और भीड़भाड़ वाली पार्किंग में भी आसानी से गाड़ी तक पहुंचा जा सकता है.
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        <pubDate>Sun, 06 Sep 2026 09:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>कैमरा लवर्स के लिए बेस्ट! 200MP वाले 6 नए स्मार्टफोन, जानें पूरी लिस्ट</title>
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        <description><![CDATA[ स्मार्टफोन कैमरे काफी आगे बढ़ चुके हैं, लेकिन 200MP सेंसर की डिमांड अब भी बनी हुई है. कंपनियां इसे हाई-एंड कैमरा एक्सपीरिएंस के तौर पर पेश कर रही हैं 2026 में कई कंपनियां 200MP सेंसर वाले स्मार्टफोन लेकर आई हैं. खास बात यह है कि इस सेगमेंट में सिर्फ प्रीमियम फ्लैगशिप ही नहीं, बल्कि मिड-रेंज और किफायती फोन भी शामिल हैं. अगर आप नया कैमरा फोन खरीदने का सोच रहे हैं, तो 200MP कैमरे वाले इन स्मार्टफोन्स पर नजर डाल सकते हैं.&amp;nbsp;
Xiaomi 17 Ultra
Xiaomi 17 Ultra में 200MP टेलीफोटो कैमरा मिलता है. इसके साथ 50MP मेन और 50MP अल्ट्रा वाइड कैमरा दिया गया है. फोन में 50MP फ्रंट कैमरा, Snapdragon 8 Elite Gen 5 चिपसेट, 6.9 इंच OLED डिस्प्ले, 6,000mAh बैटरी और 90W Hyper Charging सपोर्ट है.
Oppo Reno 15 Pro
Oppo Reno 15 Pro में 200MP मेन कैमरे के साथ 50MP पेरिस्कोप और 50MP टेलीफोटो कैमरा दिया गया है. फ्रंट में 50MP कैमरा मिलता है.इसमें MediaTek Dimensity 8450 प्रोसेसर, 6.78 इंच LTPO AMOLED डिस्प्ले, 6,500mAh बैटरी और 80W फास्ट चार्जिंग सपोर्ट है.
Samsung Galaxy Z Fold 8 Ultra
फोल्डेबल फोन में 200MP कैमरा चाहने वालों के लिए Samsung Galaxy Z Fold 8 Ultra एक ऑप्शन है. इसमें 200MP मेन कैमरा के साथ 50MP और 10MP के दो अन्य रियर कैमरे मिलते हैं. फोन में 8 इंच Dynamic AMOLED 2X मेन डिस्प्ले, Snapdragon 8 Elite Gen 5 for Galaxy चिपसेट, 5,000mAh बैटरी और 45W चार्जिंग है.&amp;nbsp;
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Vivo X300 Ultra
Vivo X300 Ultra में 200MP मेन और 200MP टेलीफोटो कैमरा दिया गया है. इसके अलावा 50MP का तीसरा सेंसर और 50MP फ्रंट कैमरा मिलता है. फोन में Snapdragon 8 Elite Gen 5 प्रोसेसर, 6.82 इंच AMOLED डिस्प्ले, 6,600mAh बैटरी और 100W फास्ट चार्जिंग सपोर्ट है.&amp;nbsp;
Samsung Galaxy S26 Ultra
Samsung Galaxy S26 Ultra 2026 के प्रीमियम 200MP कैमरा फोन में शामिल है. इसमें 200MP मेन कैमरे के साथ 50MP अल्ट्रा वाइड, 50MP टेलीफोटो और 10MP टेलीफोटो कैमरा मिलता है. फोन में 6.9 इंच का Dynamic AMOLED 2X डिस्प्ले, Snapdragon 8 Elite Gen 5 चिपसेट, 5,000mAh बैटरी और 60W फास्ट चार्जिंग दी गई है.
Oppo Find X9 Ultra
Oppo Find X9 Ultra की सबसे खास बात इसका डुअल 200MP कैमरा सेटअप है. इसमें 200MP मेन और 200MP टेलीफोटो कैमरा के साथ 50MP अल्ट्रा वाइड और 50MP टेलीफोटो सेंसर मिलता है. फोन में 6.82 इंच LTPO AMOLED डिस्प्ले, Snapdragon 8 Elite Gen 5 चिपसेट और 7,050mAh बैटरी है, जो 100W SuperVOOC चार्जिंग सपोर्ट करती है. इसके अलावा Oppo Reno 15 Pro Mini, Realme 16 Pro+, Realme 16 Pro, Redmi Note 15 Pro और Vivo V70 FE भी 200MP कैमरा वाले 2026 के मॉडल्स में शामिल हैं. इनमें अलग-अलग कीमत और फीचर्स के साथ 200MP मेन कैमरा दिया गया है.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ें - OpenAI ने शुरू किया GPT-6 Astra का रोलआउट! जानें कितना ताकतवर है ये नया मॉडल ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 06 Sep 2026 09:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>फोन नहीं हो रहा ऑन? इन 6 तरीकों से करें Fix</title>
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        <description><![CDATA[ फोन नहीं हो रहा ऑन? इन 6 तरीकों से करें Fix ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 06 Sep 2026 09:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>iPhone 18 Pro का कैमरा कितना दमदार होगा? जान लें एक&amp;एक डिटेल</title>
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        <description><![CDATA[ Apple 9 सितंबर 2026 को अपना बड़ा इवेंट आयोजित करने जा रहा है. जहां iPhone 18 Pro और iPhone 18 Pro Max पेश किए जाने की उम्मीद है, वहीं&amp;nbsp; iPhone 18 Pro को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा इसके कैमरा अपग्रेड्स की हो रही है. Apple के नए Pro मॉडल्स में इस बार कैमरा सिर्फ ज्यादा मेगापिक्सल तक सीमित नहीं रहने वाला है. इस बार फोटोग्राफी को ज्यादा कंट्रोल देने वाली तकनीक भी देखने को मिल सकती है.
खासतौर पर Variable Aperture को लेकर कई रिपोर्ट्स सामने आई हैं. इसके अलावा Telephoto Camera में सुधार, बेहतर लो-लाइट फोटोग्राफी, पोर्ट्रेट फोटोग्राफी और Pro यूजर्स के लिए नए सॉफ्टवेयर फीचर्स मिलने की उम्मीद है. हालांकि इन कैमरा फीचर्स को लेकर अभी तक Apple की ओर से आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है. तो आइए जानते हैं कि iPhone 18 Pro का कैमरा कितना दमदार होगा.&amp;nbsp;
iPhone 18 Pro का कैमरा कितना दमदार होगा.
1. Variable Aperture कैमरा - iPhone 18 Pro सीरीज के कैमरे में Variable Aperture सबसे बड़ा अपग्रेड हो सकता है. 48MP Main Camera के साथ इस तकनीक के मिलने की चर्चा है. Variable Aperture लेंस में जाने वाली रोशनी को जरूरत के हिसाब से कम या ज्यादा करने में मदद करता है. इससे अलग-अलग शूटिंग कंडीशन में कैमरे को ज्यादा कंट्रोल मिल सकता है.&amp;nbsp;
2. &amp;nbsp;पोर्ट्रेट फोटोग्राफी बेहतर - Variable Aperture का फायदा पोर्ट्रेट फोटो में भी देखने को मिल सकता है. यूजर फोकस और Depth of Field को अपनी जरूरत के अनुसार एडजस्ट कर सकेगा. इससे सब्जेक्ट और बैकग्राउंड के बीच बेहतर सेप्रेशन मिल सकता है और बैकग्राउंड ब्लर ज्यादा नेचुरल दिखाई देने की उम्मीद है.&amp;nbsp;
3. लो-लाइट फोटोग्राफी - कम रोशनी में फोटोग्राफी के दौरान Variable Aperture कैमरे में आने वाली रोशनी को कंट्रोल करने में मदद कर सकता है. इससे लो-लाइट फोटो में बेहतर परिणाम मिलने की उम्मीद है. खासतौर पर ऐसे सीन में यह फीचर यूजफुल हो सकता है, जहां सही रोशनी उपलब्ध नहीं होती है.&amp;nbsp;
Telephoto Camera में भी हो सकता है बड़ा सुधार
iPhone 18 Pro में Telephoto Camera को भी अपग्रेड किए जाने की उम्मीद है. रिपोर्ट्स के अनुसार इसमें ज्यादा Wide Aperture दिया जा सकता है. इससे कैमरा सेंसर तक ज्यादा रोशनी पहुंच सकती है और कम रोशनी में जूम करते समय बेहतर फोटो लेने में मदद मिल सकती है. Pro मॉडल्स में 48MP Telephoto Camera की चर्चा है, जबकि Optical Zoom को 5x से 6x तक बढ़ाए जाने की संभावना बताई जा रही है. Pro Max में 6x Optical Zoom मिलने की चर्चा है.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ें - Apple के Tracking Rules पर उठे सवाल, 2.7 अरब डॉलर का केस
Pro यूजर्स को मिल सकते हैं नए कैमरा कंट्रोल
Apple iPhone 18 Pro में नए Pro-focused Software Features भी दे सकता है. कैमरा ऐप के अंदर ज्यादा एडवांस कंट्रोल मिलने की उम्मीद है, जिससे यूजर्स को शूटिंग के दौरान कैमरे पर ज्यादा कंट्रोल मिल सकेगा. iOS 27 में Camera Interface को भी आसान बनाने की बात सामने आई है.
बड़ा हो सकता है Camera Module
इन सभी संभावित कैमरा अपग्रेड्स का असर फोन के Camera Module पर भी दिखाई दे सकता है. रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि Pro मॉडल का Camera Bump करीब 2mm तक बड़ा हो सकता है.
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        <pubDate>Sat, 05 Sep 2026 17:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>iPhone Ultra को टक्कर देने आ रहा Xiaomi 18 Fold! इस दिन होगा लॉन्च, जानें फीचर्स</title>
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        <description><![CDATA[ स्मार्टफोन मार्केट में बहुत ही जल्द एक नया डिवाइस लॉन्च होने वाला है. दरअसल, 9 सितंबर को एप्पल अपना डिवाइस लॉन्च करने की तैयारी में है लेकिन उससे पहले ही 7 सितंबर को शाओमी अपना एक फोल्डेबल स्मार्टफोन मार्केट में उतारने वाली है. माना जा रहा है कि कंपनी का ये नया फोन आईफोन अल्ट्रा को सीधी टक्कर देने में भी सक्षम होगा. हालांकि, इस फोन को 7 सितंबर को चीन में लॉन्च किया जाएगा. आइए जानते हैं कि इसमें कौन से फीचर्स मिलेंगे.
कैसे होगा डिजाइन
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, Xiaomi 18 Fold का डिजाइन इसे दूसरे बड़े फोल्डेबल फोन से अलग बनाता है. कंपनी के मुताबिक, फोल्ड होने के बाद इसका साइज लगभग एक पासपोर्ट जितना हो जाएगा. इसका फायदा ये है कि फोन को जेब या बैग में रखना आसान रहेगा और रोजमर्रा के कामों के लिए एक हाथ से भी इस्तेमाल किया जा सकेगा.
इसके अलावा इस फोन में बाहर की तरफ 5.38 इंच का कवर डिस्प्ले दिए जाने की संभावना है वहीं, इसके अंदर 7.58 इंच की बड़ी इनर स्क्रीन देखने को मिल सकती है. इस बड़े डिस्प्ले का इस्तेमाल मल्टीटास्किंग, वीडियो देखने, गेमिंग और दूसरे कामों के लिए किया जा सकता है.
मिलेगी दमदार बैटरी
लीक्स के मुताबिक, Xiaomi 18 Fold में 6,000mAh की बैटरी देखने को मिल सकती है जो 67W के वायर्ड और 50W के वायरलेस चार्जिंग को भी सपोर्ट करेगी. अगर ये आंकड़े सही होते हैं तो बड़ी स्क्रीन वाले फोल्डेबल फोन के लिए ये एक मजबूत बैटरी पैकेज हो सकता है.
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कैमरा सेटअप
Xiaomi 18 Fold में मिलने वाले कैमरा सेटअप की बात करें तो इस डिवाइस में ट्रिपल कैमरा सेटअप देखने को मिल जाएगा जिसमें एक LED फ्लैश मिलेगा. माना जा रहा है कि इस फोन में 200 मेगापिक्सल का प्राइमरी कैमरा देखने को मिलेगा. इसके अलावा कैमरा सेटअप के लिए Xiaomi ने Leica के साथ साझेदारी की है.
इतना ही नहीं, माना जा रहा है कि Xiaomi 18 Fold के अंदर कंपनी का नया Xring O3 फ्लैगशिप प्रोसेसर दिया जाएगा. ये Xiaomi के लिए बड़ा बदलाव माना जा रहा है क्योंकि उसके पुराने Mix Fold मॉडल्स में Qualcomm Snapdragon चिपसेट का इस्तेमाल किया गया था.
कितनी होगी कीमत
आपको बता दें कि फिलहाल कंपनी की ओर से इसकी कीमत को लेकर कोई आधिकारीक जानकारी सामने नहीं आई है लेकिन टिप्स्टर Digital Chat Station के मुताबिक, फोन को कंपनी 10,000 चीनी युआन से ज्यादा कीमत में उतार सकती है. ये कीमत भारतीय रुपये में करीब 1.40 लाख रुपये होता है.
iPhone Ultra को मिलेगी टक्कर
1 सितंबर 2026 से John Ternus ने Apple के नए CEO के रूप में कमान संभाली है. इसी कड़ी में बता दें कि एप्पल का पहला फोल्डेबल फोन आईफोन अल्ट्रा को लेकर काफी समय से लीक्स सामने आ रही है. बताया जा रहा है कि कंपनी इसे भी अपने नए फोन के साथ लॉन्च कर सकती है. लेकिन कुछ रिपोर्ट्स का मानना है कि इस फोन को कंपनी अगले साल पेश कर सकती है. हालांकि, लीक्स में इस फोन को लेकर कई सारी जानकारी सामने आई हैं जैसे माना जा रहा है कि इसकी अमेरिका में कीमत 2000 डॉलर से 2500 डॉलर के बीच हो सकती है. इसके अलावा इसमें दमदार बैटरी और पावरफुल प्रोसेसर भी देखने को मिल सकता है. ऐसे में शाओमी का ये नया फोन iPhone Ultra के लिए एक चुनौती जरूर बन सकता है.
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        <pubDate>Sat, 05 Sep 2026 17:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>OpenAI ने शुरू किया GPT&amp;6 Astra का रोलआउट! जानें कितना ताकतवर है ये नया मॉडल</title>
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        <description><![CDATA[ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की दुनिया में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है. ChatGPT बनाने वाली कंपनी OpenAI ने अपने नए और अब तक के सबसे ताकतवर AI मॉडल GPT-6 का रोलआउट शुरू करने का ऐलान किया है. इस नए मॉडल को GPT-6 Astra के नाम से जाना जा रहा है. कंपनी के मुताबिक, शुरुआती स्टेड में इसे चुनिंदा यूजर्स के लिए उपलब्ध कराया जाएगा.
OpenAI का कहना है कि GPT-6 को पहले के मुकाबले ज्यादा फीचर्स और बेहतर परफॉर्मेंस को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है. हालांकि, कंपनी ने इसके साथ सेफ्टी का भी ध्यान रखा है जिससे बढ़ती AI क्षमताओं के साथ संभावित जोखिमों को कम किया जा सके.
चुनिंदा यूजर्स को मिलेगा पहले एक्सेस
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, OpenAI ने GPT-6 Astra को फिलहाल सभी यूजर्स के लिए एक साथ उपलब्ध कराने के बजाय लिमिटेड यूजर्स के साथ रोलआउट शुरू करने का फैसला किया है. इस तरह कंपनी नए मॉडल की क्षमताओं और उसके इस्तेमाल से जुड़े खतरों को करीब से समझ सकेगी.
बता दें कि धीरे-धीरे तरीके से रोलआउट करने से मॉडल में किसी टेक्निकल समस्या या सुरक्षा से जुड़े खतरे की कंडिशन को तेजी से खत्म किया जा सकता है. इसके बाद मॉडल को ज्यादा यूजर्स तक पहुंचाया जा सकता है.
सुरक्षा को बताया सबसे बड़ी प्राथमिकता
GPT-6 के ऐलान के दौरान OpenAI के प्रेसिडेंट Greg Brockman ने AI सुरक्षा को लेकर कंपनी की सोच साफ कर दी है. उन्होंने कहा कि इस लेवल की क्षमता वाले AI सिस्टम के लिए सुरक्षा सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए.
कंपनी ने GPT-6 में ऐसे सुरक्षा उपाय शामिल करने की बात कही है जिनका मकसद AI की ताकतवर क्षमताओं से जुड़े खतरों को कम करना है. जैसे-जैसे AI मॉडल ज्यादा मुश्किल काम करने में सक्षम हो रहे हैं, वैसे-वैसे उनके गलत इस्तेमाल को लेकर भी चिंताएं भी बढ़ी हैं.
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पहले के मॉडल से कितना अलग होगा GPT-6?
GPT-6 Astra को OpenAI के पिछले AI मॉडल्स के मुकाबले में ज्यादा पावरफुल सिस्टम के तौर पर पेश किया जा रहा है. ऐसे मॉडल से उम्मीद की जाती है कि वह मुश्किल सवालों को बेहतर तरीके से समझ सके, लंबे और मुश्किल कमांड्स पर काम कर सके और अलग-अलग तरह के कामों में ज्यादा बेहतर रिजल्ट्स दे सके.
हालांकि, किसी नए मॉडल की असली क्षमता का अंदाजा केवल कंपनी के दावों से नहीं लगाया जा सकता है. इसके लिए बेहतर टेस्टिंग, बेंचमार्क और आम यूजर्स के एक्सपीरिएंस भी जरूरी होते हैं.
आम यूजर्स को कब मिलेगा GPT-6?
फिलहाल OpenAI ने GPT-6 Astra के शुरुआती रोलआउट को चुनिंदा यूजर्स तक सीमित रखने की जानकारी दी है. हालांकि, सभी यूजर्स के लिए ये कब रोलआउट होगा इसके बारे में फिलहाल कोई जानकारी सामने नहीं आई है. लेकिन माना जा रहा है कि जल्द ही इसे आम यूजर्स के लिए भी उपलब्ध कराया जा सकता है.
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        <pubDate>Sat, 05 Sep 2026 17:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>Airtel के 449 और Jio के 450 रुपये वाले पैक में क्या है अंतर, जानें किसमें ज्यादा फायदा</title>
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        <description><![CDATA[ टेलीकॉम कंपनियों के बीच सस्ते और ज्यादा फायदे वाले रिचार्ज प्लान को लेकर मुकाबला लगातार बढ़ रहा है. अगर आप भी हर महीने मोबाइल रिचार्ज पर ज्यादा खर्च नहीं करना चाहते लेकिन भरपूर डेटा, अनलिमिटेड कॉलिंग और दूसरे बेनिफिट्स चाहते हैं तो Airtel और Jio के करीब-करीब समान कीमत वाले प्लान आपके लिए दिलचस्प हो सकते हैं. खास बात ये है कि दोनों प्लान की कीमत में सिर्फ 1 रुपये का अंतर है लेकिन इनके डेटा बेनिफिट में बड़ा फर्क देखने को मिलता है. आइए जानते हैं कि किसमें यूजर्स को ज्यादा बेनिफिट्स मिलते हैं.
Airtel का 449 रुपये वाला प्लान
Airtel का 449 रुपये वाला प्रीपेड प्लान उन यूजर्स को ध्यान में रखकर पेश किया गया है जिन्हें रोजाना ज्यादा इंटरनेट डेटा की जरूरत पड़ती है. इस प्लान में यूजर्स को अनलिमिटेड वॉयस कॉलिंग के साथ रोजाना 4GB डेटा दिया जाता है.
इसके अलावा यूजर्स को हर दिन 100 SMS भी मिलते हैं. इसके साथ ही इस प्लान में यूजर्स को अनलिमिटेड 5जी की भी सुविधा मिल जाती है. बता दें कि इस प्लान की वैलिडिटी 28 दिनों की है.
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Jio का 450 रुपये वाला प्लान
दूसरी तरफ Jio के 450 रुपये वाले रिचार्ज प्लान की बात करें तो इसमें यूजर्स को अनलिमिटेड वॉयस कॉलिंग के साथ ही डेली 2जीबी डेटा मिलता है. इसका मतलब साफ है कि एयरटेल महज 1 रुपये के अंतर में आपको डबल इंटरनेट डेटा उपलब्ध करा रहा है. जियो के इस प्लान में भी यूजर्स को अनलिमिटेड 5जी डेटा की सुविधा मिलती है. लेकिन वैलिडिटी के मामले में जियो एयरटेल से आगे निकल गया है. जहां एयरटेल 449 रुपये में यूजर्स को 28 दिन की वैलिडिटी दे रहा है. वहीं, जियो यूजर्स से 1 रुपये ज्यादा लेकर उन्हें 36 दिन की वैलिडिटी दे रहा है.
किसके लिए कौन सा प्लान बेहतर?
आपको बता दें कि ये पूरी तरह से आपकी जरूरत पर निर्भर करता है. अगर आपको ज्यादा इंटरनेट डेटा चाहिए है और आप रोजाना कई GB डेटा इस्तेमाल करते हैं तो Airtel का ₹449 प्लान आपके लिए ज्यादा फायदेमंद साबित होगा. लेकिन वहीं अगर आप पहले से Jio नेटवर्क का इस्तेमाल कर रहे हैं और आपके इलाके में Jio की कनेक्टिविटी बेहतर है तो आपके लिए 450 रुपये वाला पैक एक बेहतरीन ऑप्शन साबित हो सकता है. इसके अलावा जियो के प्लान में यूजर्स को ज्यादा वैलिडिटी भी मिल जाती है. इसके अलावा यूजर्स को इस प्लान में एक्सट्रा बेनिफिट्स भी मिलते हैं.
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        <pubDate>Sat, 05 Sep 2026 17:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>क्या बदल सकते हैं Google Maps में बोलने वाली आवाज? जानिए पूरी सच्चाई</title>
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        <description><![CDATA[ Google Maps आज सिर्फ रास्ता दिखाने वाला ऐप नहीं है बल्कि ड्राइविंग के दौरान टर्न-बाय-टर्न नेविगेशन, ट्रैफिक अपडेट और रास्ते की जानकारी देने वाला एक जरूरी टूल बन चुका है. नेविगेशन के दौरान लगातार एक आवाज आपको बताती रहती है कि कब मुड़ना है, किस रास्ते पर जाना है और कितनी दूरी बाकी है. ऐसे में कई लोगों के मन में सवाल आता है कि क्या Google Maps की बोलने वाली आवाज को बदला जा सकता है? अगर आप भी Google Maps की आवाज को अपनी पसंद के हिसाब से बदलना चाहते हैं तो पहले इसकी पूरी सच्चाई जान लीजिए.
क्या Google Maps में Voice बदलने का ऑप्शन है?
दरअसल, Google Maps में सीधे तौर पर अपनी पसंद की कोई भी आवाज चुनने का ऑप्शन उपलब्ध नहीं है. यानी आप ऐप की सेटिंग में जाकर किसी सेलिब्रिटी, दोस्त या अपनी रिकॉर्ड की हुई आवाज को नेविगेशन वॉयस के रूप में सेट नहीं कर सकते हैं. हालांकि, Google Maps में लैंग्वेज और कुछ मामलों में Voice/Voice selection से जुड़े ऑप्शन उपलब्ध हो सकते हैं. ये ऑप्शन आपके फोन, ऑपरेटिंग सिस्टम, एरिया और Google Maps के मौजूदा वर्जन पर निर्भर कर सकते हैं.
Android फोन में कैसे बदलें भाषा?
अगर आप Google Maps की नेविगेशन आवाज को दूसरी लैंग्वेज में सुनना चाहते हैं तो सबसे पहले Google Maps खोलें. इसके बाद ऊपर दाईं ओर अपनी प्रोफाइल फोटो पर टैप करें और Settings में जाएं.
अब Navigation settings या इससे जुड़े ऑप्शन को खोलें. यहां आपको Voice selection जैसा ऑप्शन मिल सकता है. उपलब्ध ऑप्शनों में से अपनी पसंद की लैंग्वेज या वॉयस चुन सकते हैं. ध्यान रखें कि हर लैंग्वेज में एक जैसी आवाज या सभी फीचर्स उपलब्ध हों ये जरूरी नहीं है.
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क्या अपनी आवाज रिकॉर्ड करके लगा सकते हैं?
आपको बता दें कि अक्सर लोगों के मन में सवाल आता है कि क्या कोई अपनी आवाज में Google Maps में ऑफिशियल तौर पर ऐसा कोई नॉर्मल फीचर नहीं है जिससे आप अपनी आवाज रिकॉर्ड करके उसे नेविगेशन के दौरान इस्तेमाल कर सकें.
इंटरनेट पर कुछ थर्ड-पार्टी ऐप्स या अनऑफिशियल तरीके Google Maps की आवाज बदलने का दावा कर सकते हैं लेकिन ऐसे ऐप्स इस्तेमाल करते समय सावधान रहना चाहिए. अनजान ऐप को माइक्रोफोन, स्टोरेज या दूसरी संवेदनशील परमिशन देना आपकी प्राइवेसी के लिए खतरा पैदा कर सकता है.
आवाज नहीं आ रही तो क्या करें?
कई बार यूजर आवाज बदलने की कोशिश करते हैं लेकिन असली समस्या वॉयस सेटिंग नहीं बल्कि म्यूट या कम वॉल्यूम होती है. नेविगेशन शुरू करने के बाद स्क्रीन पर स्पीकर आइकन जरूर जांचें. अगर आवाज बंद है तो उसे अनम्यूट करें.
फोन का मीडिया वॉल्यूम बढ़ाना भी जरूरी है क्योंकि नेविगेशन की आवाज नॉर्मली मीडिया ऑडियो के जरिए सुनाई देती है. अगर Bluetooth से कार का सिस्टम जुड़ा है तो कार के ऑडियो सिस्टम का वॉल्यूम और सही आउटपुट भी जांचें.
तो क्या है पूरी सच्चाई?
इस हिसाब से देखा जाए तो Google Maps की आवाज को पूरी तरह अपनी पसंद की कस्टम आवाज में बदलना नॉर्मली संभव नहीं है. आप उपलब्ध लैंग्वेज ऑप्शनों में से चुनाव कर सकते हैं लेकिन अपनी रिकॉर्ड की हुई आवाज या किसी मनपसंद व्यक्ति की आवाज को ऑफिशियल तरीके से नेविगेशन वॉयस बनाना अलग बात है और Google Maps इसका ऑप्शन नहीं देता है.
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        <pubDate>Sat, 05 Sep 2026 17:30:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>अब WhatsApp से भरें बिजली&amp;पानी का Bill, नया फीचर लॉन्च</title>
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        <description><![CDATA[ हर महीने बिजली, पानी, गैस और दूसरे जरूरी बिल भरने के लिए अलग-अलग ऐप खोलना पड़ता है. अब WhatsApp इस काम को भी आसान बनाने जा रहा है. कंपनी ने भारत में Bill Payments फीचर लॉन्च किया है, जिसकी मदद से यूजर्स WhatsApp के अंदर ही कई तरह के बिल देख, मैनेज और उनका पेमेंट कर सकेंगे. बिल भरने के लिए बार-बार दूसरे ऐप पर जाने की जरूरत नहीं होगी. यह फीचर भारत में धीरे-धीरे रोलआउट किया जा रहा है और आने वाले हफ्तों में Android और iOS यूजर्स के लिए उपलब्ध होगा. ऐसे में आइए जानते हैं कि अब WhatsApp से बिजली-पानी का Bill कैसे भरें.&amp;nbsp;
WhatsApp का नया Bill Payments फीचर क्या है?
WhatsApp का नया Bill Payments फीचर Bharat Connect (BBPS) नेटवर्क पर काम करता है. इसके जरिए यूजर्स को 30 अलग-अलग कैटेगरी में 22,722 बिलर्स का एक्सेस मिलेगा. इनमें बिजली, पानी, गैस, FASTag, इंश्योरेंस, क्रेडिट कार्ड और लोन रिपेमेंट जैसे बिल शामिल हैं. कंपनी के मुताबिक, यह फीचर WhatsApp की मौजूदा पेमेंट सर्विस का दायरा भी बढ़ाता है. इससे पहले ऐप पर मोबाइल रिचार्ज और दूसरी ट्रांजेक्शन से जुड़ी सुविधाएं उपलब्ध थीं.&amp;nbsp;
WhatsApp से ऐसे भरें बिल
बिल पेमेंट करने के लिए सबसे पहले WhatsApp खोलना होगा. इसके बाद होम स्क्रीन के ऊपर दिए गए रूपए वाले आइकन पर टैप करना होगा. यहां अपनी जरूरत के हिसाब से बिल कैटेगरी और बिलर चुनना होगा. इसके बाद कस्टमर या अकाउंट से जुड़ी जरूरी जानकारी दर्ज करके उसे कन्फर्म करना होगा. डिटेल दर्ज करने के बाद WhatsApp बिल की रकम अपने आप दिखाएगा. रकम और बिल की जानकारी चेक करने के बाद यूजर UPI, डेबिट कार्ड या क्रेडिट कार्ड से पेमेंट कर सकेगा.&amp;nbsp;
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एक जगह मैनेज होंगे कई बिल
नए फीचर में Household Bills Summary भी दी गई है. इसमें पहले से भुगतान किए गए बिलर्स दिखाई दे सकते हैं, जिससे अगली बार उन्हें एक टैप में एक्सेस किया जा सकेगा. एक ही बिलर के तहत कई अकाउंट भी मैनेज किए जा सकेंगे. इसके अलावा Payments Home स्क्रीन पर लोकप्रिय बिल कैटेगरी भी दिखाई जाएंगी, जबकि See All ऑप्शन से 20 से ज्यादा कैटेगरी देखी जा सकेंगी.&amp;nbsp;
कैसे यूजर्स तक पहुंचेगा फीचर?
WhatsApp का Bill Payments फीचर अभी सभी यूजर्स को एक साथ नहीं मिला है. कंपनी इसे भारत में धीरे-धीरे रोलआउट कर रही है. आने वाले हफ्तों में यह Android और iOS पर ज्यादा यूजर्स के लिए उपलब्ध कराया जाएगा.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Sat, 05 Sep 2026 04:30:14 +0530</pubDate>
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        <title>ब्लर फोटो को ऐसे करें क्लियर, Google Photos का ये फीचर आएगा काम</title>
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        <description><![CDATA[ कभी-कभी फोटो क्लिक करने का सही मौका तो मिल जाता है, लेकिन फोटो सेव होने के बाद पता चलता है कि वह ब्लर हो गई है. कभी हाथ हिलने की वजह से फोटो धुंधली हो जाती है, तो कभी किसी के मूवमेंट या सही फोकस न होने के कारण फोटो की डिटेल साफ नहीं दिखती है. पुरानी फोटो में भी लो-क्वालिटी कैमरे की वजह से ऐसी परेशानी देखने को मिल सकती है.
ऐसी ब्लर फोटो को दोबारा इस्तेमाल करने लायक बनाने के लिए Google Photos में एक AI फीचर दिया गया है, जो फोटो की क्लेरिटी और डिटेल को बेहतर करने में मदद करता है. इस फीचर का नाम Photo Unblur है. तो आइए जानते हैं कि &amp;nbsp;Google Photos का ये फीचर क्या है और इससे ब्लर फोटो को कैसे क्लियर करें.
क्या है Google Photos का Photo Unblur फीचर?
Photo Unblur, Google Photos में मौजूद AI editing tools का हिस्सा है. यह Magic Eraser और Portrait Light जैसे फीचर्स के साथ काम करता है. Photo Unblur मशीन लर्निंग की मदद से फोटो में मौजूद ब्लर को पहचानता है. यह खास तौर पर मोशन या फोकस से जुड़ी समस्या की पहचान करके फोटो की शार्पनेस, लाइटिंग और डिटेल को बेहतर करता है. इसका मकसद फोटो को ज्यादा साफ बनाना है, जिससे पहले धुंधली दिख रही फोटो को बेहतर तरीके से इस्तेमाल और शेयर किया जा सके. यह फीचर फोटो में मौजूद नेचुरल टोन और टेक्सचर को बनाए रखते हुए क्लेरिटी सुधारने की कोशिश करता है.
Photo Unblur से ब्लर फोटो कैसे करें क्लियर?
1. Google Photos में Photo Unblur इस्तेमाल करना काफी आसान है. इसके लिए सबसे पहले अपने Android, iOS या Chromebook डिवाइस पर Google Photos खोलें.
2. अब जिस फोटो को ठीक करना है, उसे चुनें. इसके बाद स्क्रीन के नीचे दिए गए एडिट आइकन पर टैप करें.
3. अब एडिटिंग टूल्स में जाकर Photo Unblur ऑप्शन चुनें.
4. Google Photos इसके बाद AI की मदद से फोटो पर शार्पनिंग लागू करेगा. अगर इफेक्ट ज्यादा या कम रखना चाहते हैं, तो स्ट्रेंथ स्लाइडर की मदद से इसकी इंटेसिटी को एडजस्ट किया जा सकता है.
5. चेज पसंद आने के बाद सेव कॉपी पर टैप करें. इससे एडिटिड फोटो की अलग कॉपी सेव होगी और ओरिजिनल फोटो पहले की तरह सुरक्षित रहेगी.
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किन डिवाइस पर चलेगा Photo Unblur?
Photo Unblur Android, iOS और Chromebook Plus डिवाइस पर उपलब्ध है. Android के लिए कम से कम 3GB RAM और Android 8.0 या उससे ऊपर का वर्जन चाहिए. iPhone या iPad पर iOS 15 या उससे ऊपर जरूरी है. Chromebook Plus पर ChromeOS version 118 या बाद का वर्जन होना चाहिए.
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        <pubDate>Sat, 05 Sep 2026 04:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>लॉन्च होंने जा रहे ये नए टेक गैजेट्स, देखें पूरी डिटेल</title>
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        <description><![CDATA[ सितंबर की शुरुआत टेक्नोलॉजी और गैजेट्स की दुनिया के लिए काफी खास नजर आ रही है. आज यानी 4 सितंबर को कई नए टेक प्रोडक्ट्स लॉन्च होने जा रहे हैं. इनमें स्मार्टफोन से लेकर स्मार्ट बैंड, AI लैपटॉप, रोबोट और स्मार्ट ग्लासेस तक शामिल हैं. वहीं, Berlin में आज से IFA 2026 की शुरुआत भी हो रही है, जहां कंपनियां अपनी नई टेक्नोलॉजी और प्रोडक्ट्स को दुनिया के सामने पेश कर रही हैं. ऐसे में आज का दिन टेक्नोलॉजी पसंद करने वालों के लिए काफी खास है. तो आइए जानते हैं कि आज कौन-से नए टेक गैजेट्स लॉन्च होंगे.&amp;nbsp;
आज लॉन्च होगा 9,000mAh बैटरी वाला POCO X8 5G
POCO आज भारत में अपनी X8 सीरीज का बेस मॉडल POCO X8 5G लॉन्च करने जा रही है. इस फोन की सबसे बड़ी खासियत इसकी 9,000mAh की बैटरी होगी. कंपनी के मुताबिक, यह सिंगल चार्ज में 3 दिन से ज्यादा का बैकअप दे सकती है. फोन में Snapdragon 6s Gen 4 प्रोसेसर और 8GB तक रैम मिलने की उम्मीद है.&amp;nbsp;
POCO X8 Power में 10,000mAh की बैटरी
POCO X8 Power 5G आज लॉन्च होने वाला कंपनी का ज्यादा बैटरी वाला मॉडल है. इसमें 10,000mAh की बड़ी बैटरी दी गई है, जिसे 100W फास्ट चार्जिंग से चार्ज किया जा सकेगा. फोन में Snapdragon 6 Gen 5 प्रोसेसर और 1.5K AMOLED डिस्प्ले के साथ 120Hz रिफ्रेश रेट मिल सकता है.&amp;nbsp;
Infinix Hot 70 Pro 5G+ भी होगा लॉन्च
Infinix Hot 70 Pro 5G+ भी आज भारत में लॉन्च होगा. इसमें 6.76 इंच का Full HD+ डिस्प्ले दिया जाएगा, जो 144Hz एडेप्टिव रिफ्रेश रेट सपोर्ट करेगा. फोन में MediaTek Dimensity 7100 5G चिपसेट और 50 मेगापिक्सल Sony IMX882 मेन कैमरा मिलेगा. पावर के लिए 6,000mAh बैटरी और 45W फास्ट चार्जिंग दी जाएगी.&amp;nbsp;
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IFA 2026 में दिखेंगे नए AI गैजेट्स
Berlin में आज से IFA 2026 की शुरुआत हो रही है. यहां AI, रोबोटिक्स और स्मार्ट टेक्नोलॉजी से जुड़े कई प्रोडक्ट्स पेश किए जा रहे हैं. ASUS ने ProArt P16 और P14 AI लैपटॉप पेश किए हैं, जो NVIDIA RTX Spark से लैस हैं. इनमें 120B पैरामीटर तक के LLM, 90GB से ज्यादा 3D सीन रेंडरिंग और 4K AI वीडियो जनरेशन जैसे काम किए जा सकते हैं.
इसके अलावा ECOVACS ने नए DEEBOT और WINBOT रोबोट पेश किए हैं. UGREEN ने MagFlow चार्जिंग लाइनअप लॉन्च किया है, जिसमें 10,000mAh का 25W मैग्नेटिक पावर बैंक शामिल है. वहीं, ACEMATE S10 Pro AI Tennis Robot भी IFA 2026 में पेश किया गया है, जो AI की मदद से टेनिस ट्रेनिंग के लिए बनाया गया है. IFA 2026 में RayNeo iO और GT Max स्मार्ट ग्लासेस भी चर्चा में हैं.&amp;nbsp;
Xiaomi Smart Band 11 की चर्चा&amp;nbsp;
Xiaomi ने Smart Band 11 Active को ग्लोबल मार्केट में लॉन्च करना शुरू कर दिया है. Xiaomi Smart Band 11 चीन में आज लॉन्च हुआ है. इसमें 2,000 निट्स ब्राइट AMOLED डिस्प्ले और Sleep HRV Tracking जैसे फीचर्स दिए गए हैं. इसकी बैटरी 21 दिन तक चलने का दावा है. इसमें NFC वर्जन के साथ Ceramic और Metal Edition भी मिलेंगे. इसकी शुरुआती कीमत करीब 289 युआन है. हालांकि इसके भारत लॉन्च की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं मिली है.
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        <pubDate>Sat, 05 Sep 2026 04:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>एक क्लिक में खुलेंगे Chrome के सारे Tabs, ऐसे करें इस्तेमाल</title>
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        <description><![CDATA[ कई बार कंप्यूटर पर काम करते-करते Chrome में इतने सारे Tabs खुल जाते हैं कि उन्हें संभालना मुश्किल हो जाता है. रिसर्च हो, ऑफिस का कोई काम हो या फिर किसी पर्सनल प्लानिंग से जुड़ा काम, हम अक्सर जरूरी जानकारी के लिए कई Tabs एक साथ खोलकर रखते हैं. हालांकि, अगर काम के बीच गलती से पूरी Browser Window बंद हो जाए तो एक-एक करके उन सभी Tabs को दोबारा खोलना काफी परेशान करने वाला काम हो सकता है.
इसमें समय भी जाता है और काम का फ्लो भी टूट जाता है. ऐसी स्थिति में Google Chrome का एक फीचर काम आ सकता है. इसकी मदद से हर Tab को अलग-अलग खोलने की जरूरत नहीं पड़ती. तो आइए जानते हैं कि ये कौन-सा फीचर है और इसे कैसे इस्तेमाल करें.&amp;nbsp;
इस फीचर से एक क्लिक में खुलेंगे Chrome के सारे Tab
अगर Chrome की कोई window बंद हो जाती है, तो जरूरी Tabs को एक-एक करके ढूंढने और दोबारा खोलने में समय लग सकता है. ऐसी स्थिति में Google Chrome का Tab Grouping फीचर काम आ सकता है. इसकी मदद से एक जैसे या एक ही काम से जुड़े Tabs को एक Group में रखा जा सकता है. इसके बाद पूरे Tab Group को सेव करके बाद में दोबारा खोला जा सकता है. यह तरीका खास तौर पर तब यूजफुल है, जब किसी प्रोजेक्ट या रिसर्च के लिए कई Tabs एक साथ खुले हों. इससे ब्राउजर में Tabs को आसानी से मैनेज किया जा सकता है.&amp;nbsp;
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ऐसे बनाएं और इस्तेमाल करें Tab Group
Chrome में Tab Group बनाने के लिए सबसे पहले किसी खुले हुए Tab पर Right-click करें. इसके बाद Add tab to group ऑप्शन चुनें. अब उस Tab Group को पहचानने के लिए एक नाम दिया जा सकता है. इसके बाद उसी काम या विषय से जुड़े दूसरे Tabs को भी इस Group में जोड़ें. जब सभी जरूरी Tabs एक ही Group में आ जाएं, तो इस Tab Group को बाद में दोबारा खोला जा सकता है. इस तरह एक-एक Tab को अलग से खोलने के बजाय पूरा सेट एक साथ वापस पाया जा सकता है. Chrome में Tab Group से जुड़े ऑप्शन आपके इस्तेमाल किए जा रहे Chrome version और device के हिसाब से अलग हो सकते हैं.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Sat, 05 Sep 2026 04:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>Canva को टक्कर देने आया Google Pics, ऐसे करेगा काम</title>
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        <description><![CDATA[ अब डिजाइन तैयार करने के लिए घंटों बैठकर बड़े-बड़े सॉफ्टवेयर सीखने की जरूरत कम होने वाली है. Google ने क्रिएटिव डिजाइनिंग की दुनिया में अपना नया AI टूल Google Pics लॉन्च किया है. इसकी मदद से यूजर्स सिर्फ अपनी जरूरत को एक Prompt में लिखकर फोटो, पोस्टर, सोशल मीडिया पोस्ट और दूसरे विजुअल तैयार कर सकेंगे. Google का यह नया टूल Canva और Adobe Express जैसे फेमस डिजाइन प्लेटफॉर्म्स को टक्कर देने की कोशिश कर रहा है. खास बात यह है कि यहां यूजर को शुरुआत से डिजाइन तैयार करने के बजाय AI को बताना होगा कि उसे किस तरह का विजुअल चाहिए. ऐसे में आइए जानते हैं कि Google Pics कैसे काम करेगा.
Google Pics कैसे काम करेगा?
Google Pics का काम करने का तरीका काफी आसान है. यूजर को अपनी जरूरत के हिसाब से Prompt देना होगा और AI उसे समझकर फोटो, पोस्टर, इलस्ट्रेशन या दूसरे विजुअल तैयार करेगा. इसके लिए Google के Nano Banana इमेज-जेनरेशन मॉडल का इस्तेमाल किया गया है. Canva या Adobe Express की तरह शुरुआत से डिजाइन तैयार करने की जगह Google Pics में यूजर अपनी जरूरत को शब्दों में बता सकता है. इसके बाद AI उसी के आधार पर डिजाइन तैयार करेगा.&amp;nbsp;Google Pics में AI से करें फोटो एडिट
Google Pics में नई फोटो बनाने के साथ उसे एडिट करने के ऑप्शन भी दिए गए हैं. यूजर किसी इमेज में मौजूद टेक्स्ट को बदल या दूसरी भाषा में ट्रांसलेट कर सकेंगे. इसके अलावा फोटो में मौजूद किसी ऑब्जेक्ट को अलग करने, उसमें बदलाव करने या उसे बदलने का ऑप्शन भी मिलेगा. टूल एक ही Prompt से कई अलग-अलग इमेज भी तैयार कर सकता है. इससे यूजर अपनी पसंद के हिसाब से सबसे बेहतर ऑप्शन चुन सकेंगे.
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टीम के साथ मिलकर कर सकेंगे काम
Google Pics में Collaborative Editing का फीचर भी दिया गया है. इसकी मदद से एक विजुअल प्रोजेक्ट पर टीम के कई सदस्य साथ मिलकर काम कर सकेंगे. यह सुविधा खास तौर पर उन लोगों के लिए यूजफुल हो सकती है, जो टीम के साथ डिजाइन या प्रेजेंटेशन पर काम करते हैं.
Google Workspace में मिलेगा Google Pics
Google Pics को Google Workspace का हिस्सा बनाया जा रहा है. शुरुआत में इसे Google Docs और Google Slides के साथ उपलब्ध कराया गया है. कंपनी के मुताबिक इसे आने वाले कुछ हफ्तों में ज्यादातर Workspace यूजर्स के साथ-साथ Google AI Pro और Ultra का सब्सक्रिप्शन लेने वाले यूजर्स के लिए रोल आउट किया जाएगा. इसके बाद इसे Google Drive में भी लाया जाएगा.
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        <pubDate>Sat, 05 Sep 2026 04:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>OnePlus Nord CE 6 पर बड़ा प्राइस ड्रॉप, यहां मिल रहा डिस्काउंट</title>
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        <description><![CDATA[ अगर आप नया स्मार्टफोन खरीदने की तैयारी कर रहे हैं और आपकी प्रिफरेंस दमदार प्रोसेसर के साथ बड़ी बैटरी और हाई-रिफ्रेश-रेट डिस्प्ले है, तो OnePlus Nord CE 6 पर मिल रहा मौजूदा ऑफर आपके लिए खास हो सकता है. Qualcomm Snapdragon 7s Gen 4 प्रोसेसर से लैस यह फोन फिलहाल ई-कॉमर्स साइट Flipkart पर डिस्काउंट के साथ लिस्टेड है. बैंक ऑफर और कीमत में मिल रहे &amp;nbsp;डिस्काउंट &amp;nbsp;के बाद फोन की प्रभावी कीमत 35 हजार रुपये से कम हो जाती है. इसके अलावा पुराने फोन को एक्सचेंज करने पर कीमत और कम हो सकती है. तो आइए जानते हैं कि &amp;nbsp;OnePlus Nord CE 6 की कीमत, ऑफर और इसके खास फीचर्स क्या हैं.&amp;nbsp;
OnePlus Nord CE 6 की कीमत और ऑफर
OnePlus Nord CE 6 का 8GB RAM और 128GB स्टोरेज वाला Lunar Pearl वेरिएंट Flipkart पर 40,999 रुपए की लिस्टेड कीमत की जगह 36,750 रुपए में मिल रहा है, ऑफर लागू करने के बाद इसकी सबसे कम प्रभावी कीमत 34,912 बताई गई है. इसके अलावा Flipkart Axis और SBI क्रेडिट कार्ड जैसे बैंक ऑफर्स पर 1,838 तक की बचत, BHIM और Mobikwik पर 100 तक का कैशबैक भी मिल सकता है. इसके अलावा एक्सचेंज ऑफर के तहत पुराने फोन को देने पर 29,250 रुपये तक की अतिरिक्त कीमत कम हो सकती है.&amp;nbsp;
OnePlus Nord CE 6 &amp;nbsp;के खास फीचर्स क्या हैं?
OnePlus Nord CE 6 में 6.78 इंच की 1.5K FHD+ AMOLED स्क्रीन दी गई है, इसका रेजोल्यूशन 2772 बाय 1272 पिक्सल है और यह 144Hz रिफ्रेश रेट सपोर्ट करती है. डिस्प्ले में 450ppi पिक्सल डेंसिटी, 19.6:9 आस्पेक्ट रेशियो और 3840Hz PWM डिमिंग मिलती है. इसकी पीक ब्राइटनेस 3600 निट्स तक है.&amp;nbsp;
Snapdragon 7s Gen 4 प्रोसेसर
परफॉर्मेंस के लिए फोन में Qualcomm Snapdragon 7s Gen 4 प्रोसेसर और Adreno 810 GPU दिया गया है. सॉफ्टवेयर की बात करें तो यह Android 16 पर आधारित OxygenOS 16 पर चलता है.फोन में इन-डिस्प्ले फिंगरप्रिंट सेंसर भी दिया गया है.&amp;nbsp;
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8000mAh की बड़ी बैटरी
OnePlus Nord CE 6 में 8000mAh की बैटरी दी गई है. इसे 80W SuperVOOC फास्ट चार्जिंग का सपोर्ट मिलता है. साथ ही फोन 27W रिवर्स चार्जिंग भी सपोर्ट करता है. कनेक्टिविटी के लिए इसमें 5G, डुअल 4G VoLTE, Wi-Fi 6, Bluetooth 5.4, GPS और USB Type-C 2.0 पोर्ट दिए गए हैं.&amp;nbsp;
कैसा है इसका कैमरा?
फोटोग्राफी के लिए रियर पैनल पर 50MP का प्राइमरी कैमरा मिलता है, जो f1.8 अपर्चर और OIS सपोर्ट करता है. इसके साथ 2MP का मोनोक्रोम कैमरा दिया गया है. सेल्फी और वीडियो कॉलिंग के लिए फोन में 32MP का फ्रंट कैमरा मिलता है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Fri, 04 Sep 2026 11:30:14 +0530</pubDate>
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        <title>साइबर ठगी में फंसा पैसा? MRM Portal करेगा मदद, ऐसे करें Claim</title>
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        <description><![CDATA[ आज के समय में साइबर ठगी के मामले लगातार बढ़ रहे हैं. OTP के जरिए होने वाले फ्रॉड से लेकर डिजिटल अरेस्ट जैसे मामलों में लोगों के पैसे ठग लिए जाते हैं. ऐसे मामलों में अगर समय रहते शिकायत की जाए और ठगी की रकम आरोपी के बैंक अकाउंट में फ्रीज हो जाए, तो अब लोगों के लिए पैसा वापस पाने की प्रक्रिया आसान हो सकती है.
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने साइबर क्राइम का शिकार व्यक्ति के लिए Mobile Restoration Module (MRM) नाम का नया सब-पोर्टल शुरू किया है. इसके जरिए व्यक्ति घर बैठे अपने फंसे हुए पैसे की वापसी के लिए रिफंड रिक्वेस्ट कर सकते हैं. हालांकि, MRM के जरिए रिफंड तभी प्रोसेस होगा, जब ठगी की रकम आरोपी के बैंक अकाउंट में पहले से फ्रीज हो चुकी हो. तो आइए जानते हैं कि साइबर ठगी में फंसा पैसा MRM Portal की मददसे कैसे क्लेम करें.&amp;nbsp;
क्या है Mobile Restoration Module?
गृह मंत्रालय के Indian Cybercrime Coordination Centre (I4C) ने MRM साइट लॉन्च की है. इसका मकसद साइबर ठगी का शिकार व्यक्ति को रिफंड के लिए अलग-अलग सरकारी दफ्तरों और बैंकों के चक्कर लगाने से बचाना है. &amp;nbsp;व्यक्ति घर बैठे इस पोर्टल पर रिफंड रिक्वेस्ट उठा सकते हैं. MRM को National Cybercrime Reporting Portal (NCRP) का हिस्सा बनाया गया है. इसका इस्तेमाल वही &amp;nbsp;व्यक्ति कर सकते हैं, जिन्होंने ठगी के तुरंत बाद 1930 हेल्पलाइन या NCRP पोर्टल के जरिए शिकायत दर्ज की हो और ठगी की रकम फ्रीज हो गई हो.&amp;nbsp;
MRM पर रिफंड कैटेगरी क्या है?
MRM पर रिफंड के लिए तीन कैटेगरी हैं. अगर फ्रीज रकम 50,000 रुपये से कम है, तो FIR या कोर्ट ऑर्डर की कॉपी अपलोड करने की जरूरत नहीं है और पुलिस शिकायत के आधार पर रकम सीधे वापस की जा सकती है. वहीं दूसरी स्थिति में अगर 50,000 रुपये से ज्यादा रकम अलग-अलग बैंक अकाउंट में फ्रीज है और किसी एक अकाउंट में रकम 50,000 रुपये से ज्यादा नहीं है, तब भी FIR और कोर्ट ऑर्डर की जरूरत नहीं है. वहीं, अगर किसी एक बैंक अकाउंट में 50,000 रुपये से ज्यादा रकम फ्रीज है, तो रिफंड रिक्वेस्ट से पहले FIR दर्ज कराना और कोर्ट ऑर्डर लेना जरूरी होगा.&amp;nbsp;
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MRM Portal पर ऐसे करें Claim
1. रिफंड रिक्वेस्ट के लिए बैंक अकाउंट नंबर, PAN कार्ड की डिजिटल कॉपी, 14 अंकों का शिकायत नंबर और रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर तैयार रखें.
2. MRM पोर्टल पर जाकर Citizen Login चुनें और NCRP में दर्ज मोबाइल नंबर से OTP के जरिए लॉगिन करें.&amp;nbsp;
3. इसके बाद Raise Refund Request में जाकर 14 अंकों का Complaint ID डालें.
4. स्क्रीन पर फ्रीज रकम दिखाई देगी. PAN कार्ड अपलोड करने के बाद बैंक अकाउंट नंबर और IFSC कोड भरें. जरूरत होने पर Court Order की डिजिटल कॉपी भी अपलोड की जा सकती है.&amp;nbsp;
5. Declaration पर टिक करके स्बमीट करें. इसके बाद पोर्टल MR2026 से शुरू होने वाली Unique Request ID जनरेट करेगा, जिससे रिफंड रिक्वेस्ट का स्टेटस ट्रैक किया जा सकेगा.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Fri, 04 Sep 2026 11:30:13 +0530</pubDate>
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        <title>Fast Charging vs Battery Life, क्या है असली कनेक्शन?</title>
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        <description><![CDATA[ Fast Charging vs Battery Life, क्या है असली कनेक्शन? ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 04 Sep 2026 11:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>नया AI फोन लिया? ये 10 फीचर्स करें ट्राई, आपका काम करेंगे आसान</title>
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        <description><![CDATA[ नया AI फोन लिया है तो सिर्फ कैमरा और प्रोसेसर तक सीमित न रहें. इसमें मौजूद AI फीचर्स आपके रोजमर्रा के कई काम आसान कर सकते हैं. फोटो से अनचाही चीज हटाने, आवाज को टेक्स्ट में बदलने, लाइव ट्रांसलेशन, अनजान कॉल की स्क्रीनिंग और स्क्रीन पर दिख रही चीजों को समझने जैसे फीचर्स काफी काम आ सकते हैं, हालांकि फोन में मौजूद हर AI फीचर हर व्यक्ति के लिए जरूरी नहीं होता है. कुछ फीचर्स कभी-कभार काम आते हैं, जबकि कुछ ऐसे हैं जिनकी जरूरत बार-बार महसूस हो सकती है. ऐसे में आइए जानते हैं कि कौन-से 10 फीचर्स ट्राई करें जो आपका काम आसान करेंगे.&amp;nbsp;
नया AI फोन लिया? ये 10 फीचर्स करें ट्राई
1. &amp;nbsp;Circle to Search - स्क्रीन पर दिख रही किसी फोटो, प्रोडक्ट, जूते या कपड़े के बारे में जानकारी चाहिए तो Circle to Search काम आ सकता है. स्क्रीन पर मौजूद चीज को घेरकर बिना ऐप बंद किए उसकी जानकारी खोजी जा सकती है. अब एक फोटो में कई चीजों को चुनकर भी सर्च करने की सुविधा दी जा रही है. यह ऑनलाइन शॉपिंग, पढ़ाई और किसी चीज की पहचान में यूजफुल है.&amp;nbsp;
2. &amp;nbsp;फोटो में ऑब्जेक्ट बदलें &amp;nbsp;- कुछ फोन AI की मदद से फोटो में मौजूद किसी ऑब्जेक्ट को दूसरी जगह ले जाने, उसका आकार बदलने या फोटो के हिस्से को दोबारा तैयार करने की सुविधा देते हैं. हालांकि हर बार रिजल्ट बिल्कुल सही मिले, यह जरूरी नहीं है.&amp;nbsp;
3. लाइव ट्रांसलेशन - अलग भाषा बोलने वाले व्यक्ति से बातचीत के दौरान कुछ फोन रियल टाइम में भाषा का ट्रांसलेशन कर सकते हैं. यात्रा या अलग भाषा बोलने वाले लोगों से बातचीत में यह फीचर काफी काम आ सकता है.&amp;nbsp;
4. अनजान कॉल की स्क्रीनिंग - AI की मदद से कुछ फोन अनजान कॉल करने वाले से जानकारी लेने और कॉल आने की वजह समझने में मदद कर सकते हैं. इससे जरूरी और बेवजह की कॉल में अंतर करना आसान हो सकता है.&amp;nbsp;
5. &amp;nbsp;आवाज को टेक्स्ट में बदलें - मीटिंग, इंटरव्यू या क्लास की रिकॉर्डिंग को पूरा सुनने की जगह AI उसे टेक्स्ट में बदल सकता है. कुछ फोन बातचीत का छोटा सार भी तैयार कर देते हैं. यह स्टूडेंट, पत्रकार और ऑफिस यूजर्स के लिए काफी काम का है.&amp;nbsp;
6. फोटो से अनचाही चीज हटाएं - फोटो में पीछे कोई अनजान व्यक्ति या ऐसी चीज आ गई है जो फोटो खराब कर रही है, तो AI की मदद से उसे हटाया जा सकता है. फोन खाली जगह को खुद भरने की कोशिश करता है, जिससे अलग फोटो एडिटिंग ऐप की जरूरत कम हो सकती है.&amp;nbsp;
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7. AI असिस्टेंट से करवाएं काम - AI असिस्टेंट अब सिर्फ सवालों के जवाब देने तक सीमित नहीं है. नए फोन में AI को अलग-अलग ऐप्स और कामों से जोड़ने की कोशिश हो रही है. कुछ फीचर्स में सर्विस बुकिंग या पिछली ऑर्डर जानकारी के आधार पर दोबारा ऑर्डर जैसे कई चरणों वाले काम करने की सुविधा भी दी जा रही है. हालांकि ये सुविधाएं अभी हर फोन और हर ऐप में उपलब्ध नहीं हैं.&amp;nbsp;
8. स्क्रीन और कैमरे की चीजें समझना - AI कैमरे या स्क्रीन पर दिखाई दे रही चीजों को समझकर उनके बारे में जवाब दे सकता है. किसी पौधे की पहचान करनी हो या किसी चीज का इस्तेमाल समझना हो, तो उसकी फोटो दिखाकर सवाल पूछा जा सकता है.&amp;nbsp;
9. AI Writing Assist - ईमेल या मैसेज लिखते समय AI टेक्स्ट को छोटा करने, भाषा सुधारने या अलग अंदाज में लिखने में मदद कर सकता है. लंबे ईमेल और ऑफिस के जवाब तैयार करने में इससे समय बच सकता है.&amp;nbsp;
10. नोट्स का सारांश - लंबे नोट्स या डॉक्यूमेंट को पूरा पढ़ने में समय लगता है. AI जरूरी बातों को अलग करते हुए उसका छोटा सार तैयार कर सकता है. स्टूडेंट और ऑफिस यूजर्स के लिए यह खास तौर पर यूजफुल है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Fri, 04 Sep 2026 11:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>Smart TV का Mic बन सकता है प्राइवेसी का खतरा, ऐसे बचें</title>
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        <pubDate>Fri, 04 Sep 2026 11:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>Xप्लेन: डेटिंग ऐप पर मिला &amp;apos;प्यार&amp;apos; कहीं ठगी तो नहीं? रोमांस स्कैम का पूरा खेल समझिए</title>
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        <description><![CDATA[ आप डेटिंग ऐप पर किसी से मैच करते हैं. बातचीत अच्छी चलती है, केमिस्ट्री बनती है और लगता है कि शायद यह &#039;द&#039; मैच है. कुछ दिनों या हफ्तों बाद सामने वाला किसी इमरजेंसी या इन्वेस्टमेंट की बात करता है. आप भरोसा करके पैसे ट्रांसफर कर देते हैं और फिर वह हो जाता है गायब. फोन बंद, प्रोफाइल डिलीट और आपका बैंक बैलेंस भी जीरो. यह है आज के दौर की तेजी से बढ़ती ऑनलाइन ठगी- रोमांस स्कैम या डेटिंग ऐप फ्रॉड. आखिर ठगी होती कैसे है और आप इससे बच क्यों नहीं पाते...
कैसे काम करते हैं ये ठग?
डेटिंग ऐप पर 5 बड़े तरीकों से ठगी होती है...
1. कैटफिशिंग और फेक प्रोफाइल
यह सबसे आम तरीका है. ठग फर्जी तस्वीरों और झूठी पहचान के साथ प्रोफाइल बनाते हैं. वे खुद को डॉक्टर, इंजीनियर, बिजनेसमैन, फिल्म प्रोड्यूसर या NRI बताते हैं.
मैकफी के सर्वे के मुताबिक, 75% भारतीयों ने डेटिंग ऐप्स या सोशल मीडिया पर AI से बनाई गई फेक प्रोफाइल या तस्वीरें देखी हैं. 46% लोगों को पता चला कि वे AI बॉट या फेक प्रोफाइल से बात कर रहे थे. 33% कैटफिशिंग (किसी और की पहचान चुराना) के शिकार हुए.
दिल्ली पुलिस ने आनंद कुमार नाम के एक शख्स को गिरफ्तार किया, जिसने डेटिंग और मैट्रिमोनियल ऐप्स पर खुद को डॉक्टर, फिल्म प्रोड्यूसर, वकील और बिजनेसमैन बनाकर 500 से ज्यादा महिलाओं से करीब 2 करोड़ रुपए की ठगी की.
2. इमोशनल मैनिपुलेशन और भरोसा जीतना
ठग पहले हफ्तों या महीनों तक रोज बात करते हैं, इमोशनल कनेक्शन बनाते हैं और पीड़ित का पूरा भरोसा जीत लेते हैं. वे पीड़ित की सोशल मीडिया प्रोफाइल, फैमिली बैकग्राउंड, प्रोफेशन और लाइफस्टाइल की गहराई से स्टडी करते हैं. खासतौर पर वे तलाकशुदा, अलग-अलग रह रहे या भावनात्मक रूप से कमजोर लोगों को निशाना बनाते हैं.
बेंगलुरु के 42 साल के जगदीश सी नाम के शख्स ने QuackQuack डेटिंग ऐप पर एक महिला से दोस्ती की. महिला मेघना रेड्डी ने उसे बताया कि वह उसके पिता के नाम पर एक वृद्धाश्रम बनाना चाहती है. इस इमोशनल बात ने जगदीश का भरोसा जीत लिया. फिर उसे अंतरराष्ट्रीय शेयर बाजार में निवेश का ऑफर दिया गया.
जगदीश ने दो दिनों में कई RTGS और NEFT ट्रांजेक्शन के जरिए 1.29 करोड़ रुपए ट्रांसफर कर दिए. पैसे जाते ही महिला और उसके साथी गायब हो गए.
3. क्रिप्टो, शेयर और फॉरेक्स से इन्वेस्टमेंट का झांसा
यह सबसे महंगा स्कैम है. भरोसा जीतने के बाद ठग क्रिप्टोकरेंसी, शेयर बाजार या फॉरेक्स ट्रेडिंग में कम समय में बड़ा मुनाफा दिखाने वाले प्लेटफॉर्म पर इन्वेस्ट करने के लिए कहते हैं. वे फर्जी वेबसाइट और ऐप बनाते हैं जो बिल्कुल असली लगते हैं. शुरू में थोड़ा मुनाफा भी दिखाते हैं ताकि और पैसा डलवा सकें.
फरीदाबाद के एक डॉक्टर ने डेटिंग वेबसाइट पर एक युवती से दोस्ती की. युवती ने खुद को फॉरेक्स ट्रेडिंग एक्सपर्ट बताया. अप्रैल से जून 2025 के बीच उस डॉक्टर ने अलग-अलग ट्रांजेक्शन में 4 करोड़ 43 लाख 68 हजार 974 रुपए इन्वेस्ट कर दिए. जब पैसे निकालने की कोशिश की तो कुछ नहीं निकला.
मुंबई के 52 साल के एक बिजनेसमैन के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. डेटिंग ऐप पर दोस्ती करने वाली महिला ने शादी का झांसा देकर उससे 53 लाख रुपए की ठगी की.
4. रेस्टोरेंट या कैफे स्कैम पर हनीट्रैप बिलिंग फ्रॉड
इस स्कैम में ठग पीड़ित को किसी खास कैफे या रेस्टोरेंट में बुलाते हैं. वहां मामूली ऑर्डर (2 कॉफी, 1 हुक्का) का बिल हजारों रुपए का आता है. ठग बीच में ही बहाना बनाकर गायब हो जाता है और पीड़ित को भारी-भरकम बिल चुकाने के लिए मजबूर कर दिया जाता है. कई बार तो कैफे वाले भी ठगों के साथ मिले होते हैं.
कोलकाता के रानीकुठी इलाके में Bumble ऐप पर मिली एक लड़की ने एक युवक को &#039;कपल कैफे जोन&#039; नाम के कैफे में बुलाया. दोनों ने दो कॉफी और एक हुक्का ऑर्डर किया. बिल आया- 8,500 रुपए! लड़के के पैरों तले जमीन खिसक गई और लड़की हंसती हुई वहां से चली गई.
दिल्ली के कड़कड़डूमा में भी ऐसा ही हुआ. Tinder पर मिली डेट ने एक शख्स को कैफे में बुलाया और 50,000 रुपए का बिल चुकाने पर मजबूर कर दिया. बेंगलुरू में भी एक महिला Bumble पर मिले एक शख्स के साथ ऐसे ही स्कैम में फंस गई.
5. ब्लैकमेल और सेक्सटॉर्शन के जरिए अश्लील वीडियो से ठगी
इस तरीके में ठग वीडियो कॉल पर पीड़ित को अश्लील हरकतों के लिए उकसाते हैं, उसे रिकॉर्ड कर लेते हैं और फिर उस वीडियो को सोशल मीडिया पर वायरल करने की धमकी देकर पैसे ऐंठते हैं.

तो फिर पीड़ित क्यों नहीं करते शिकायत?
पीड़ित 5 बड़ी वजहों से चुप रहना पसंद करते हैं:
1. शर्म, बदनामी और सामाजिक कलंक
ये तीनों एक ही सिक्के के पहलू हैं और इस चुप्पी की सबसे बड़ी वजह हैं. पीड़ितों को सबसे ज्यादा डर अपनी इज्जत और समाज में रुतबा खोने का डर होता है.

लोग क्या कहेंगे: रोमांस स्कैम का शिकार होने का मतलब है कि आपने फीलिंग्स में बहकर कोई बेवकूफी भरा काम किया. पीड़ितों को लगता है कि उन्हें &#039;लालची&#039;, &#039;लापरवाह&#039; या &#039;बेवकूफ&#039; ठहराएंगे.
प्रोफेशनल इमेज का खतरा: ये डर सिर्फ आम लोगों तक सीमित नहीं है. डॉक्टरों, वकीलों, कंपनी डायरेक्टर्स और हाई-रैंकिंग अधिकारियों जैसे प्रोफेशनल्स को भी इस बात का डर सताता है कि अगर मामला सामने आया तो उनकी प्रोफेशनल इमेज बर्बाद हो जाएगी.
शादी पर असर: अहमदाबाद पुलिस के एक मामले में शादीशुदा डॉक्टरों और वकीलों ने बदलनामी के डर से शिकायत करने से इनकार कर दिया, एक और मामले में पीड़ित की सगाई हो चुकी महिलाओं ने सोशल स्टिग्मा के डर से शिकायत नहीं की.
परिवार का डर: कई पीड़ित ठग से भी ज्यादा परिवार के रिएक्शन से डरते हैं. उन्हें डर होता है कि परिवार उन्हें जिम्मेदार ठहराएगा या उन पर भोसा करना बंद कर देगा.
छिपी पहचान का खतरा: LGBTQ+ यानी क्विर कम्युनिटी के लिए ये डर और भी गहरा है. इन्हें अपनी सेक्शुअलिटी उजागर होने का डर सताता है. इससे भेदभाव या परिवार से बेदखली भी झेलनी पड़ती है. कई रिपोर्ट्स के मुताबिक, 91% पीड़ितों ने ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 03 Sep 2026 23:30:09 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>जन्माष्टमी गिफ्टिंग गाइड: Samsung Galaxy Z Fold8 और vivo S2 – विवरण, कीमत और त्योहार पर खास EMI ऑफर</title>
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        <description><![CDATA[ पुणे, 02 सितंबर 2026: जन्माष्टमी नए आरंभ और खुशियों का उत्सव मनाने का अवसर है, और इस मौके पर स्मार्टफोन उपहार में देना भी एक खास तरीका बन गया है. चाहे आप किसी टेक्नोलॉजी प्रेमी के लिए प्रीमियम फोल्डेबल फोन चुन रहे हों या रोजमर्रा के इस्तेमाल के लिए स्टाइलिश मिड-रेंज डिवाइस, यह जन्माष्टमी गिफ्टिंग गाइड Samsung Galaxy Z Fold8 और vivo S2 के विवरण, कीमत और आसान EMI ऑफर्स की जानकारी देता है, ताकि खरीदार सोच-समझकर सही विकल्प चुन सकें.
Galaxy Z Fold8 अपने अनोखे फोल्डेबल डिजाइन, बड़े AMOLED डिस्प्ले और फ्लैगशिप परफॉर्मेंस के साथ खास पहचान बनाता है. यह काम और मनोरंजन, दोनों के लिए एक बेहतरीन विकल्प है.
vivo S2 स्लिम डिजाइन, शानदार AMOLED स्क्रीन और दमदार कैमरा क्षमताओं के साथ अधिक किफायती कीमत में बेहतर अनुभव प्रदान करता है.
दोनों डिवाइस बजाज फाइनेंस की आसान EMI लोन सुविधा के जरिए खरीदे जा सकते हैं. इसके तहत 5 लाख रुपये तक का लोन, 40 महीने तक की फ्लेक्सिबल अवधि और 4,000 से अधिक शहरों में 1.5 लाख से ज्यादा पार्टनर स्टोर्स तक पहुंच मिलती है.
मुख्य विवरण एक नजर में
Samsung Galaxy Z Fold8

कीमत: 1,80,249 रुपये (12GB + 256GB), 2,00,849 रुपये (12GB + 512GB)
डिस्प्ले: बड़ा फोल्डेबल AMOLED डिस्प्ले, हाई रिफ्रेश रेट के साथ
प्रोसेसर: फ्लैगशिप स्नैपड्रैगन चिपसेट
कैमरा: हाई MP सेंसर वाला मल्टी-लेंस कैमरा सेटअप
बैटरी: 4,800 mAh, फास्ट चार्जिंग सपोर्ट के साथ
खास फीचर्स: फोल्डेबल डिजाइन, S Pen सपोर्ट और मल्टीटास्किंग की सुविधा

Vivo S2

कीमत: 39,999 रुपये (8GB + 128GB), 44,999 रुपये (8GB + 256GB)
डिस्प्ले: AMOLED डिस्प्ले, हाई रिफ्रेश रेट के साथ
प्रोसेसर: रोजमर्रा के इस्तेमाल के लिए बेहतर मिड-रेंज चिपसेट
कैमरा: हाई-रिजॉल्यूशन फ्रंट और रियर कैमरे
बैटरी: 4,500 mAh, फास्ट चार्जिंग के साथ
खास फीचर्स: स्लिम डिजाइन और पोर्ट्रेट फोटोग्राफी को बेहतर बनाने वाले फीचर्स

दोनों स्मार्टफोन की अपनी-अपनी खासियतें हैं. Fold 8 मल्टीटास्किंग और प्रीमियम बिल्ड के मामले में बेहतर है, जबकि S2 कैमरा क्वालिटी और किफायती कीमत पर ज्यादा ध्यान देता है.
परफॉर्मेंस और डिस्प्ले
Samsung Galaxy Z Fold8 में बड़ा फोल्डेबल AMOLED डिस्प्ले है, जो एक कॉम्पैक्ट फोन से टैबलेट जैसी बड़ी स्क्रीन में बदल जाता है. यह प्रोडक्टिविटी, मीडिया देखने और एक साथ कई काम करने के लिए बेहतर है. हाई रिफ्रेश रेट की वजह से स्क्रॉलिंग स्मूथ रहती है और टच बहुत रेस्पॉन्सिव है.
vivo S2 में सामान्य AMOLED डिस्प्ले है, जो शानदार रंग और साफ तस्वीर देता है. यह रोजमर्रा के इस्तेमाल, वीडियो स्ट्रीमिंग और सोशल मीडिया के लिए अच्छा है. इसका स्लिम डिजाइन इसे लंबे समय तक इस्तेमाल करने में आसान बनाता है.
कैमरा क्षमताएं
सैमसंग के इस फोल्डेबल फोन में वाइड, अल्ट्रा-वाइड और टेलीफोटो सेंसर वाला बहुउपयोगी मल्टी-लेंस कैमरा सिस्टम दिया गया है. यह एडवांस्ड कम्प्यूटेशनल फोटोग्राफी, 8K वीडियो रिकॉर्डिंग और प्रोफेशनल स्तर के मैनुअल कंट्रोल्स को सपोर्ट करता है. इसका फोल्डेबल डिजाइन अलग-अलग एंगल से फ़ोटो और वीडियो लेने की सुविधा भी देता है.
vivo S2 में AI से बेहतर की गई सुविधाओं, हाई-रिजॉल्यूशन सेंसर और कम रोशनी में बेहतर प्रदर्शन के साथ पोर्ट्रेट फोटोग्राफी पर खास जोर दिया गया है. इसका फ्रंट कैमरा प्राकृतिक स्किन टोन के साथ साफ़ सेल्फी लेने के लिए तैयार किया गया है, जिससे यह कंटेंट क्रिएटर्स के लिए एक अच्छा विकल्प बन जाता है.
बैटरी और चार्जिंग
Galaxy Z Fold8 में 4,800 mAh की बैटरी है, जो फास्ट वायर्ड और वायरलेस चार्जिंग को सपोर्ट करती है. बड़ी स्क्रीन और शक्तिशाली प्रोसेसर को देखते हुए, इसकी बैटरी को ज्यादा इस्तेमाल के लिए बेहतर तरीके से ऑप्टिमाइज किया गया है.
vivo S2 में 4,500 mAh की बैटरी है, जो फास्ट चार्जिंग को सपोर्ट करती है. इससे दिनभर जरूरत पड़ने पर फोन को जल्दी चार्ज किया जा सकता है. इसका मिड-रेंज प्रोसेसर कम पावर इस्तेमाल करता है, जिससे बैटरी पूरे दिन बेहतर तरीके से चलती है.
कीमत और त्योहार पर खास ऑफर
इस जन्माष्टमी पर स्मार्टफोन गिफ्ट करना किफायती हो गया है, क्योंकि ग्राहकों को बजाज फाइनेंस से आसान फाइनेंस विकल्प मिल रहे हैं. टेक्नोलॉजी पसंद करने वाले किसी खास व्यक्ति के लिए प्रीमियम Galaxy Z Fold8 चुनें या रोजमर्रा के इस्तेमाल के लिए स्टाइलिश Vivo S2, खरीदार जीरो डाउन पेमेंट, कम मासिक EMI और त्योहार पर खास छूट जैसे ऑफर का लाभ उठा सकते हैं. इन ऑफर्स के साथ त्योहार को एक खास और लंबे समय तक याद रहने वाले तोहफे के साथ मनाना आसान हो जाता है.
Samsung Galaxy Z Fold8

12GB + 256GB: 1,80,249 रुपये
12GB + 512GB: 2,00,849 रुपये
चुनिंदा मॉडल्स पर ज़ीरो डाउन पेमेंट
4,506 रुपये से शुरू होने वाली आसान EMI
अवधि: 3&amp;ndash;40 महीने
चुनिंदा फ़ोन्स पर 60% तक की छूट

Vivo S2

8GB + 128GB: 39,999 रुपये
8GB + 256GB: 44,999 रुपये
चुनिंदा मॉडल पर जीरो डाउन पेमेंट
1,667 रुपये से शुरू होने वाली आसान EMI
अवधि: 3&amp;ndash;24 महीने
चुनिंदा फ़ोन्स पर 60% तक की छूट

डिस्क्लेमर: कीमतें उपलब्धता, ऑफर्स और स्थान के आधार पर बदल सकती हैं. खरीदारी करने से पहले नवीनतम कीमत जरूर जांच लें.
आसान EMI पर खरीदारी कैसे करें?
किसी भी डिवाइस को आसान EMI पर लेना एक आसान और सुरक्षित प्रक्रिया है, जिसे सुविधा को ध्यान में रख कर बनाया गया है. 4,000+ शहरों में 1.5 लाख+ पार्टनर स्टोर्स की सुविधा के साथ, खरीदार अपने फाइनेंस का प्रबंधन करते हुए आसान और ग्राहक-अनुकूल अनुभव का लाभ उठा सकते हैं.

उपलब्ध डिवाइस देखने के लिए बजाज फाइनेंस की वेबसाइट या नजदीकी पार्टनर स्टोर पर जाएं.
पसंदीदा स्मार्टफोन और वेरिएंट चुनें.
चेकआउट के समय आसान EMI का विकल्प चुनें.
कम से कम दस्तावेज़ों के साथ आवेदन पूरा करें और तुरंत K ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 03 Sep 2026 23:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>जन्माष्टमी, गिफ्टिंग, गाइड:, Samsung, Galaxy, Fold8, और, vivo, –, विवरण, कीमत, और, त्योहार, पर, खास, EMI, ऑफर</media:keywords>
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        <title>Stockity क्या है? ऑनलाइन ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म इस्तेमाल करने से पहले जानें ये जरूरी बातें</title>
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        <description><![CDATA[ भारत में डिजिटल फाइनेंस का दायरा तेजी से बढ़ा है. मोबाइल बैंकिंग, UPI और निवेश से जुड़े ऐप्स के बाद अब बड़ी संख्या में लोग ऑनलाइन ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म के बारे में भी जानकारी तलाश रहे हैं. स्मार्टफोन और इंटरनेट की आसान उपलब्धता ने बाजार से जुड़ी जानकारी तक पहुंच को पहले की तुलना में काफी सरल बना दिया है.
इसी डिजिटल ट्रेडिंग स्पेस में Stockity जैसे प्लेटफॉर्म का नाम भी सामने आता है. यह एक ऑनलाइन ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म है, जहां यूजर्स बाजार की गतिविधियों को समझने, प्राइस चार्ट देखने और उपलब्ध ट्रेडिंग फीचर्स को एक्सप्लोर करने जैसे काम कर सकते हैं.
हालांकि, किसी भी ऑनलाइन ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल केवल उसके आसान इंटरफेस या मोबाइल उपलब्धता को देखकर नहीं करना चाहिए. ट्रेडिंग में वित्तीय जोखिम शामिल होता है और भारतीय यूजर्स के लिए प्लेटफॉर्म की प्रकृति, नियमों और रेगुलेटरी स्थिति को समझना भी उतना ही जरूरी है.
Stockity क्या है?
Stockity एक डिजिटल ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म है जिसे वेब और मोबाइल डिवाइस के जरिए एक्सेस किया जा सकता है. इसका इंटरफेस इस तरह बनाया गया है कि मार्केट से जुड़ी जरूरी जानकारी एक ही जगह दिखाई दे.
आमतौर पर ऑनलाइन ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म पर यूजर को प्राइस चार्ट, अलग-अलग उपलब्ध एसेट, ट्रेड से संबंधित सेटिंग और अपनी गतिविधियों का रिकॉर्ड देखने जैसी सुविधाएं मिलती हैं.पुराने दौर के प्रोफेशनल ट्रेडिंग टर्मिनल की तुलना में आज के कई ऑनलाइन प्लेटफॉर्म ज्यादा विजुअल और आसान इंटरफेस पर जोर देते हैं. इसका फायदा यह है कि नए यूजर भी अपेक्षाकृत जल्दी समझ सकते हैं कि प्लेटफॉर्म के अलग-अलग सेक्शन किस काम आते हैं.
यहां एक बात समझना जरूरी है&amp;mdash;इंटरफेस आसान होने का मतलब यह नहीं है कि ट्रेडिंग भी आसान या बिना जोखिम वाली हो जाती है. मार्केट में कीमतें कई कारणों से ऊपर या नीचे जा सकती हैं और किसी भी ट्रेड का परिणाम पहले से तय नहीं होता.
Demo Account का क्या फायदा है?
ऑनलाइन ट्रेडिंग सीखने वाले नए यूजर्स के लिए Demo Account उपयोगी फीचर हो सकता है. Stockity में भी डेमो मोड उपलब्ध है, जिसमें वर्चुअल फंड के जरिए प्लेटफॉर्म की कार्यप्रणाली को समझा जा सकता है. इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि यूजर बिना वास्तविक पैसे का जोखिम लिए यह सीख सकता है कि चार्ट कैसे काम करता है, ट्रेडिंग स्क्रीन पर अलग-अलग विकल्प कहां मौजूद हैं और मार्केट में कीमतों की चाल किस तरह बदलती है.
डेमो अकाउंट का इस्तेमाल रणनीति को समझने और प्लेटफॉर्म से परिचित होने के लिए किया जा सकता है. हालांकि, डेमो ट्रेडिंग और वास्तविक पैसे से की जाने वाली ट्रेडिंग के बीच एक बड़ा फर्क मनोवैज्ञानिक दबाव का होता है. वर्चुअल पैसे के साथ नुकसान होने पर यूजर को वास्तविक आर्थिक नुकसान नहीं होता, जबकि अपने पैसे से ट्रेड करते समय डर, लालच और जल्दी फैसला लेने जैसी भावनाएं निर्णय को प्रभावित कर सकती हैं. इसलिए डेमो अकाउंट पर मिले अच्छे नतीजों को भविष्य में होने वाले मुनाफे की गारंटी नहीं माना जाना चाहिए.
मोबाइल पर ट्रेडिंग की सुविधा क्यों बढ़ रही है?
भारत में बड़ी संख्या में लोग इंटरनेट एक्सेस करने के लिए मुख्य रूप से स्मार्टफोन का इस्तेमाल करते हैं. यही वजह है कि बैंकिंग से लेकर निवेश तक लगभग हर डिजिटल सेवा मोबाइल-फर्स्ट होती जा रही है. Stockity जैसे प्लेटफॉर्म को भी अलग-अलग डिवाइस से इस्तेमाल किया जा सकता है. मोबाइल एक्सेस का फायदा यह है कि यूजर बाजार से जुड़ी गतिविधि को कहीं से भी देख सकता है. लेकिन यही सुविधा कई बार नुकसान का कारण भी बन सकती है.
फोन हमेशा हाथ में होने के कारण कुछ यूजर बिना पर्याप्त विश्लेषण के तेजी से ट्रेड लेने लगते हैं. ट्रेडिंग में हर समय मार्केट में मौजूद रहना जरूरी नहीं है. कई स्थितियों में कोई ट्रेड न लेना भी एक निर्णय होता है. इसलिए मोबाइल की सुविधा को जल्दबाजी में निर्णय लेने का कारण नहीं बनाना चाहिए.
चार्ट देखने से क्या बाजार का अनुमान लगाया जा सकता है?
किसी भी ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म में प्राइस चार्ट महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. चार्ट यह दिखाता है कि किसी एसेट की कीमत समय के साथ किस तरह बदली है. इसके आधार पर ट्रेडर ट्रेंड और बाजार की गतिविधि को समझने की कोशिश करते हैं. लेकिन पिछले प्राइस मूवमेंट को देखकर भविष्य का परिणाम निश्चित रूप से बताना संभव नहीं है.
मार्केट की दिशा पर आर्थिक खबरें, कंपनियों से जुड़ी जानकारी, वैश्विक घटनाएं, ब्याज दरें, निवेशकों का सेंटीमेंट और कई दूसरे कारक असर डाल सकते हैं. इसलिए Technical Analysis या किसी एक इंडिकेटर को ऐसी तकनीक के रूप में नहीं देखना चाहिए जो हर बार सही परिणाम दे. ट्रेडिंग में संभावना होती है, निश्चितता नहीं.
नए ट्रेडर्स के लिए Risk Management क्यों जरूरी है?
ट्रेडिंग में केवल यह सोचना पर्याप्त नहीं है कि कितना फायदा हो सकता है. उससे पहले यह तय करना जरूरी है कि संभावित नुकसान कितना हो सकता है. यही Risk Management का आधार है. नए ट्रेडर्स की सामान्य गलतियों में एक है कि वे शुरुआती कुछ सफल ट्रेड के बाद ट्रेडिंग अमाउंट तेजी से बढ़ा देते हैं. इसके उलट कुछ लोग नुकसान होने के बाद अगली ट्रेड में ज्यादा रकम लगाकर तुरंत नुकसान वापस पाने की कोशिश करते हैं. इसे अक्सर &amp;ldquo;chasing losses&amp;rdquo; कहा जाता है और इससे जोखिम तेजी से बढ़ सकता है.
ट्रेडिंग के लिए इस्तेमाल की जाने वाली रकम ऐसी होनी चाहिए जिसके नुकसान से रोजमर्रा की आर्थिक जरूरतें प्रभावित न हों. घर का खर्च, EMI, बच्चों की पढ़ाई, मेडिकल जरूरत या इमरजेंसी फंड जैसी रकम को हाई-रिस्क गतिविधियों के लिए इस्तेमाल करना समझदारी नहीं है.
किसी भी प्लेटफॉर्म की जांच कैसे करें?
ऑनलाइन किसी वेबसाइट या ऐप का उपलब्ध होना अपने आप यह साबित नहीं करता कि वह भारत में किसी विशेष वित्तीय गतिविधि के लिए अधिकृत या रेगुलेटेड है. इसलिए Stockity हो या कोई दूसरा विदेशी या घरेलू ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 03 Sep 2026 23:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Stockity, क्या, है, ऑनलाइन, ट्रेडिंग, प्लेटफॉर्म, इस्तेमाल, करने, से, पहले, जानें, ये, जरूरी, बातें</media:keywords>
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    <item>
        <title>ऐप्स परमिशन और डेटा पर बढ़ा कंट्रोल, Ai+ ने लॉन्च किया NxtQuantum OS v1.1</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/ऐप्स-परमिशन-और-डेटा-पर-बढ़ा-कंट्रोल-ai-ने-लॉन्च-किया-nxtquantum-os-v11</link>
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        <description><![CDATA[ Ai+ Smartphone ने अपने ऑपरेटिंग सिस्टम NxtQuantum OS का नया वर्जन v1.1 पेश किया है. कंपनी के मुताबिक, इस अपडेट में प्राइवेसी और यूजर कंट्रोल को पहले के मुकाबले ज्यादा आसान बनाया गया है. NxtQuantum OS v1.1 के साथ कंपनी ने NxtPrivacy Dashboard पेश किया है, जहां ऐप्स की परमिशन को एक ही जगह से देखा, बदला और वापस लिया जा सकता है.
इसके अलावा बैकग्राउंड एक्टिविटी की जानकारी और प्राइवेसी अलर्ट जैसे फीचर्स भी दिए गए हैं.कंपनी ने डेटा सिक्योरिटी के लिए नेटवर्क ट्रैफिक की जांच से जुड़े आंकड़े भी शेयर किए हैं, जिसमें 1,000 से ज्यादा कनेक्शन और 172 यूनिक डेस्टिनेशन IP की जांच शामिल है. तो आइए जानते हैं कि NxtQuantum OS v1.1 में यूजर्स को कौन-कौन से नए प्राइवेसी फीचर्स मिलेंगे.&amp;nbsp;NxtQuantum OS v1.1 में यूजर्स को कौन-कौन से नए प्राइवेसी फीचर्स मिलेंगे
NxtQuantum OS v1.1 में यूजर्स को प्राइवेसी से जुड़े कई नए कंट्रोल मिलेंगे. अपडेट के साथ NxtPrivacy Dashboard दिया गया है, जहां ऐप्स की परमिशन को एक ही जगह से देखा, बदला और जरूरत पड़ने पर रद्द किया जा सकेगा. इसके अलावा Background Activity Visibility से यूजर्स यह समझ सकेंगे कि कोई ऐप बैकग्राउंड में संवेदनशील डिवाइस रिसोर्स का इस्तेमाल कब कर रहा है. प्राइवेसी अलर्ट ऐसी परमिशन के बारे में जानकारी देंगे जो जरूरत से ज्यादा या अब जरूरी नहीं हैं. कंपनी के मुताबिक, इन फीचर्स का मकसद ऐप्स की डिवाइस और निजी डेटा तक पहुंच को ज्यादा साफ बनाना और यूजर्स को अपनी प्राइवेसी पर बेहतर कंट्रोल देना है.&amp;nbsp;
1,000 से ज्यादा कनेक्शन की जांच
नेटवर्क सिक्योरिटी को लेकर Ai+ ने बताया कि NxtQuantum OS ने 1,000 से ज्यादा कनेक्शनों और 172 यूनिक डेस्टिनेशन IPs से जुड़े सोर्स रूल्स का ऑटोमेटेड एनालिसिस किया. कंपनी की शेयर की गई Network Traffic Security Review रिपोर्ट में कुल 1,226 कनेक्शन रिकॉर्ड और 172 यूनिक डेस्टिनेशन IPs दर्ज किए गए. रिपोर्ट के अनुसार, सोर्स रूल्स ने 94 कनेक्शन रिकॉर्ड्स को 17 यूनिक IPs पर फ्लैग किया. इनमें कोई हाई या क्रिटिकल IP नहीं पाया गया. रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि किसी डेस्टिनेशन IP की सीधे तौर पर चीन या हांगकांग से पहचान नहीं हुई.
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ज्यादातर ट्रैफिक भारत में क्यों
कंपनी के मुताबिक, NxtQuantum एक सॉवरेन डेटा बाउंड्री लागू करता है, जिसके तहत एप्लिकेशन डेटा ट्रैफिक को लोकल, भारत में होस्ट किए गए इंफ्रास्ट्रक्चर के जरिए रूट किया जाता है. कंपनी ने कहा कि डेटा ट्रैफिक और IP पिंग्स भारत के अंदर ही रखे गए हैं. बाहरी ट्रैफिक सिर्फ जरूरी Google core services तक सीमित है, जो कैलिफोर्निया और सिंगापुर की ओर जाता है और ऑपरेटिंग सिस्टम के सामान्य कामकाज के लिए जरूरी बताया गया है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Thu, 03 Sep 2026 23:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>iPhone Air vs Galaxy S25 Edge.... कौन है ज्यादा पावरफुल?</title>
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        <description><![CDATA[ स्मार्टफोन अब मार्केट में बड़ा डिस्प्ले, ज्यादा कैमरा या बड़ी बैटरी ही चर्चा में नहीं है, फ्लैगशिप यूजर्स के लिए बड़ा अट्रेक्शन बन चुका यह भी है कि फोन कितना पतला और हल्का है . ऐसे में कॉम्पैक्ट और स्लीक स्मार्टफोन्स की रेस तेज हो गई है. इस सेगमेंट में Apple का iPhone Air और Samsung Galaxy S25 Edge खास तौर पर चर्चा में हैं.
यह दोनों फोन करीब 1 लाख रुपये के प्रीमियम सेगमेंट में आते हैं और बेहद पतली बॉडी के साथ पेश किए गए हैं. हालांकि सिर्फ डिजाइन ही नहीं, दोनों में दमदार प्रोसेसर, हाई-रिफ्रेश-रेट डिस्प्ले और एडवांस कैमरा फीचर्स भी मिलते हैं. ऐसे में आइए जानते हैं कि कीमत, डिजाइन, डिस्प्ले, परफॉर्मेंस, कैमरा और बैटरी के मामले में कौन-सा फोन ज्यादा पावरफुल है.&amp;nbsp;
कीमत में कौन आगे?
iPhone Air के 256GB मॉडल की कीमत 1,19,900 रुपये, 512GB मॉडल की कीमत 1,39,900 रुपये और 1TB वेरिएंट की कीमत 1,59,900 रुपये है. वहीं Galaxy S25 Edge का 256GB मॉडल 1,09,999 रुपये और 512GB मॉडल 1,21,999 रुपये में आता है. ऐसे में शुरुआती कीमत के मामले में Samsung का फोन सस्ता है.&amp;nbsp;
डिजाइन, डिस्प्ले और परफॉर्मेंस में कौन-सा फोन ज्यादा पावरफुल?
iPhone Air की मोटाई सिर्फ 5.64mm है, जबकि Galaxy S25 Edge 5.8mm मोटा है. यह दोनों में Titanium फ्रेम मिलता है और दोनों ही IP68 रेटिंग के साथ आते हैं. iPhone Air 165 ग्राम और Galaxy S25 Edge 163 ग्राम का है. iPhone Air में 6.5-इंच 120Hz Super Retina XDR OLED डिस्प्ले और Apple A19 Pro चिप मिलती है. वहीं Galaxy S25 Edge में 6.7-इंच 120Hz 2X Dynamic AMOLED डिस्प्ले और Snapdragon 8 Elite प्रोसेसर दिया गया है. स्क्रीन साइज और रेजोल्यूशन में Samsung आगे है, जबकि iPhone Air में 3000 nits की पीक ब्राइटनेस दी गई है.&amp;nbsp;
किस फोन का कैमरा है सबसे बेस्ट?
iPhone Air में 48MP रियर और 18MP Center Stage फ्रंट कैमरा है. Galaxy S25 Edge में 200MP + 12MP का डुअल रियर कैमरा सेटअप और 12MP सेल्फी कैमरा मिलता है. रियर कैमरा सेटअप और फोटोग्राफी ऑप्शन के मामले में Galaxy S25 Edge ज्यादा पावरफुल नजर आता है.&amp;nbsp;
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बैटरी और चार्जिंग
iPhone Air में अनुमानित 3,149mAh बैटरी बताई गई है और कंपनी 27 घंटे तक वीडियो प्लेबैक का दावा करती है. फोन 20W फास्ट और 30W MagSafe चार्जिंग सपोर्ट करता है. Galaxy S25 Edge में 3,900mAh बैटरी, 25W फास्ट चार्जिंग और 15W वायरलेस चार्जिंग मिलती है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Thu, 03 Sep 2026 23:30:05 +0530</pubDate>
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        <title>Bluetooth बंद करते ही Wi&amp;Fi हो जाएगा सुपरफास्ट? जानें क्या है ये वायरल ट्रिक</title>
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        <description><![CDATA[ Bluetooth बंद करते ही Wi-Fi हो जाएगा सुपरफास्ट? जानें क्या है ये वायरल ट्रिक ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 03 Sep 2026 07:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>Google का AI धमाका! आने वाला है नया Gemini, जानें यूजर्स को क्या मिलेगा नया</title>
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        <description><![CDATA[ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की दुनिया में लगातार नए-नए मॉडल्स आ रहे हैं. बता दें कि गूगल भी एआई पर काफी समय से काम कर रही है. लेकिन OpenAI और Anthropic से गूगल को कड़ी टक्कर मिल रही है. इसी को ध्यान में रखते हुए अब Google एक नए Gemini मॉडल के जरिए अपनी स्थिति मजबूत करने की तैयारी में है. खासतौर पर Coding के क्षेत्र में कंपनी का अगला AI मॉडल बड़ा बदलाव ला सकता है.
आने वाला है नया Gemini मॉडल
एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, Google एक नए AI मॉडल पर काम कर रहा है जिसे कंपनी के अंदर Skimaki नाम से जाना जा रहा है. रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इसका फोकस बेहतर Coding क्षमता पर है. वहीं, जानकारी के अनुसार, इस मॉडल को कंपनी मार्केट में Gemini 3.8 Flash के नाम से उतार सकती है.
Flash मॉडल क्यों है खास?
आपको बता दें कि Gemini Flash सीरीज को Google नॉर्मली तेज और कम लागत वाले AI मॉडल के तौर पर पेश करता है. ये मॉडल बड़े Frontier AI मॉडल के मुकाबले में छोटे होते हैं लेकिन उनकी कम लागत और तेज रिएक्शन उन्हें व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए काफी कारगर बनाती है.
बता दें कि छोटे मॉडल के साथ एक फायदा ये होता है कि उनपर गूगल की कई टीमें अलग-अलग एक्सपेरिमेंट भी कर सकती हैं. वहीं, दूसरी ओर, बड़े और Pro मॉडल को ट्रेन और अपडेट करने में काफी ज्यादा कंप्यूटिंग पावर की जरूरत पड़ती है.
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किसे मिलेगी टक्कर
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि AI Coding आज कंपनियों के लिए सबसे जरूरी इस्तेमालों में शामिल हो चुका है. इस क्षेत्र में Anthropic और OpenAI के मॉडल काफी मजबूत माने जाते हैं. ऐसे में Google का नया Flash मॉडल कंपनी के लिए काफी अहम हो सकता है.
रिपोर्ट के अनुसार, Google के Coding प्लेटफॉर्म Jetski में हुए कुछ इंटरनल टेस्ट में इंजीनियर्स ने Gemini 3.8 Flash को Anthropic के Opus मॉडल के मुकाबले में बेहतर पसंद किया है. हालांकि, इसका मतलब ये नहीं है कि Google ने सभी बेंचमार्क में बढ़त हासिल कर ली है.
AI Coding की रेस में बढ़ रहा कंप्टीशन
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि Google को सिर्फ OpenAI और Anthropic से ही मुकाबला नहीं करना है. AI Coding के क्षेत्र में दूसरी कंपनियां भी तेजी से आगे बढ़ रही हैं. Elon Musk की कंपनी SpaceXAI ने भी Coding पर फोक्स्ड नए Grok मॉडल पेश किए हैं.
इसके अलावा Meta ने भी Muse Code नाम का AI Coding Agent लॉन्च किया है. इसे Alexandr Wang की Superintelligence Labs टीम से जुड़ा बताया जा रहा है. ऐसे माहौल में Gemini 3.8 Flash Google के लिए सिर्फ एक नया AI मॉडल नहीं बल्कि Coding की तेज होती रेस में अपनी कंडिशन दोबारा मजबूत करने की कोशिश भी हो सकता है.
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        <pubDate>Thu, 03 Sep 2026 07:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>फुल नेटवर्क फिर भी Call Drop? जानिए इसकी टेक्निकल वजह</title>
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        <description><![CDATA[ फोन की स्क्रीन पर नेटवर्क के पूरे बार देखकर अक्सर हमें लगता है कि अब कॉल में किसी तरह की परेशानी नहीं आएगी, लेकिन कई बार सिग्नल फुल होने के बाद भी बात करते-करते अचानक कॉल कट जाती है. ऐसे में हर बार इसके लिए कमजोर नेटवर्क को बड़ी वजह माना जाता है, लेकिन फोन में दिखने वाले नेटवर्क बार और कॉल की असली क्वालिटी एक जैसी चीजें नहीं हैं.
नेटवर्क बार सिर्फ यह बताते हैं कि फोन तक सिग्नल की पावर कितनी पहुंच रही है, जबकि कॉल को बनाए रखने के लिए कई दूसरी टेक्निकल चीजें भी काम करती हैं. तो आइए जानते हैं कि फुल नेटवर्क के बाद भी Call Drop क्यों होती है और इसकी टेक्निकल वजह क्या हैं.&amp;nbsp;
फुल नेटवर्क के बाद भी Call Drop क्यों?
कॉल ड्रॉप की सबसे बड़ी वजहों में Network Congestion शामिल है. जब किसी इलाके में एक ही समय पर बहुत ज्यादा लोग मोबाइल नेटवर्क या कॉलिंग का इस्तेमाल करने लगते हैं, तो टावर पर दबाव बढ़ सकता है. ऐसी स्थिति में फोन पर सिग्नल फुल दिखाई दे सकते हैं, लेकिन नेटवर्क पर ज्यादा लोड होने की वजह से कॉल अचानक डिस्कनेक्ट हो सकती है. ऐसे में सिर्फ नेटवर्क बार देखकर यह तय नहीं किया जा सकता कि उस समय कॉलिंग भी उतनी ही अच्छी रहेगी. फोन तक सिग्नल की पावर अच्छी होने के बाद भी टावर पर ज्यादा ट्रैफिक होने से कॉल प्रभावित हो सकती है.&amp;nbsp;
इसकी टेक्निकल वजह क्या हैं?
Call Drop की एक और वजह फोन का नेटवर्क बैंड या एक टावर से दूसरे टावर पर स्विच होना हो सकता है. खासकर जब आप ट्रैवल कर रहे हों या तेज स्पीड से चल रहे हों, तब फोन लगातार अलग-अलग मोबाइल टावर से कनेक्ट होता रहता है. इस दौरान नेटवर्क को एक टावर से दूसरे टावर पर कॉल का सही तरीके से हैंडओवर करना होता है. अगर इस प्रक्रिया में हैंडओवर ठीक से नहीं हो पाता, तो कॉल अचानक ड्रॉप हो सकती है. इसलिए चलते समय या किसी दूसरे इलाके में जाते समय होने वाली हर Call Drop का कारण सिर्फ कमजोर सिग्नल नहीं होता है.&amp;nbsp;
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VoLTE, Wi-Fi Calling और नेटवर्क स्विचिंग का असर
VoLTE और Wi-Fi Calling जैसी सुविधाओं में भी कभी-कभी Call Drop की समस्या सामने आ सकती है. अगर फोन लगातार 5G से 4G या किसी दूसरे नेटवर्क पर स्विच कर रहा है, तो कॉल प्रभावित हो सकती है. इसी तरह इंटरनेट कनेक्शन अचानक कमजोर होने पर भी कॉलिंग पर असर पड़ सकता है. फोन का पुराना Software, Network Settings में गड़बड़ी या SIM Card से जुड़ी समस्या भी Call Drop की वजह बन सकती है.&amp;nbsp;
Call Drop की समस्या कैसे करें Fix?
अगर फोन में बार-बार Call Drop हो रही है, तो सबसे पहले फोन को Restart करें. इसके बाद कुछ सेकंड के लिए Airplane Mode ऑन करके उसे फिर ऑफ किया जा सकता है. साथ ही फोन का Software Update और Carrier Settings भी चेक करें. अगर इसके बाद भी समस्या बनी रहती है, तो Network Settings को Reset किया जा सकता है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Thu, 03 Sep 2026 07:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>टचस्क्रीन कंप्यूटर सबसे पहले किसने बनाया था? जानिए क्या थे फीचर्स</title>
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        <description><![CDATA[ आज स्मार्टफोन, टैबलेट, लैपटॉप और यहां तक कि कारों में भी टचस्क्रीन आम हो चुकी है. स्क्रीन पर उंगली रखते ही ऐप खुल जाता है, फोटो बदल जाती है और कमांड भी दी जा सकती है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि टचस्क्रीन का आईडिया आज से कई दशक पुराना है? जिस टेक्नोलॉजी को हम एडवांस गैजेट्स की पहचान मानते हैं, उसकी शुरुआत कंप्यूटर की दुनिया में काफी पहले हो गई थी. आइए जानते हैं विस्तार से.
टचस्क्रीन कंप्यूटर का आइडिया कहां से आया?
जानकारी के अनुसार, टचस्क्रीन कंप्यूटर के शुरुआती स्टेज का श्रेय ब्रिटिश इंजीनियर ई. ए. जॉनसन (E. A. Johnson) को दिया जाता है. उन्होंने 1960 के दशक में टच-सेंसिटिव स्क्रीन पर काम किया था. जॉनसन ने 1965 में पब्लिश एक पेपर में बताया था कि उंगली के टच से कंप्यूटर सिस्टम को कंट्रोल किया जाता है.
इसके अलावा उनका काम एयर ट्रैफिक कंट्रोल सिस्टम के लिए इस्तेमाल होने वाली टेक्नोलॉजी को ध्यान में रखकर किया गया था. उस दौर में टचस्क्रीन का मकसद मनोरंजन या मोबाइल इस्तेमाल नहीं बल्कि कंप्यूटर से बातचीत को आसान और तेज बनाना था.
पहला टचस्क्रीन कंप्यूटर कैसा था?
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि शुरुआती टचस्क्रीन सिस्टम आज के स्मार्टफोन की तरह बेहद तेज या मल्टीटच नहीं थे. इनमें फिंगर टच के जरिए स्क्रीन पर मौजूद ऑप्शन को चुनने की सुविधा थी.
यानी यूजर को हर काम के लिए कीबोर्ड या माउस पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं पड़ती थी. स्क्रीन पर किसी ऑप्शन को छूकर सीधे कमांड दी जा सकती थी. ये उस समय के हिसाब से काफी बड़ी टेक्निकल उपलब्धि मानी जा रही थी.
कैसे काम करती थी ये टेक्नोलॉजी?
बताते चलें कि शुरुआती टचस्क्रीन में कैपेसिटिव टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया गया था. इसमें स्क्रीन के ऊपर एक ऐसी सतह होती थी जो उंगली के टच से इलेक्ट्रिक ताकत में होने वाले बदलाव को पहचान सकती थी.
जब यूजर स्क्रीन को छूता था तो सिस्टम उस प्लेस को पहचानकर संबंधित कमांड को एक्टिव कर देता था. हालांकि इसकी ताकत आज की टचस्क्रीन के मुकाबले काफी सीमित थीं.
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क्या थे शुरुआती टचस्क्रीन के फीचर्स?
उस दौर की टचस्क्रीन टेक्नोलॉजी में आज के मुकाबले कम सुविधाएं थीं लेकिन इसके कुछ फीचर्स काफी खास थे.

उंगली से कमांड देने की सुविधा
माउस या कीबोर्ड पर कम निर्भरता
स्क्रीन पर किसी खास ऑप्शन को सीधे चुनने की ताकत
तेज इंटरैक्शन के लिए डिजाइन
एयर ट्रैफिक कंट्रोल जैसे जरूरी सिस्टम में इस्तेमाल की संभावना
हालांकि इसमें आज की तरह स्वाइप, पिंच-टू-जूम और मल्टीटच जेस्चर मौजूद नहीं थे.

टचस्क्रीन से स्मार्टफोन तक का सफर
टचस्क्रीन टेक्नोलॉजी को फेमश होने में कई साल लगे. शुरुआत में इसका इस्तेमाल खास औद्योगिक और स्पेशल कंप्यूटिंग सिस्टम में हुआ था. बाद में ATM, POS मशीन, कार सिस्टम, मेडिकल डिवाइस और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस में टच इंटरफेस दिखाई देने लगा.
इसके बाद टचस्क्रीन तकनीक ने मोबाइल फोन की दुनिया को पूरी तरह बदल दिया. आज स्मार्टफोन में मिलने वाली मल्टीटच स्क्रीन उसी लंबे टेक्निकल सफर का नतीजा है.
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        <pubDate>Thu, 03 Sep 2026 07:30:05 +0530</pubDate>
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        <title>Meta कैसे तय करेगा बच्चों की उम्र, इसमें कितना पैसा होगा खर्च?</title>
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        <description><![CDATA[ सोशल मीडिया पर बच्चों और टीनएजर्स की सुरक्षा को लेकर Meta लंबे समय से सवालों के घेरे में है. Facebook और Instagram पर कम उम्र के यूजर्स को लेकर अमेरिका के कई राज्यों ने कंपनी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू की थी. कंपनी पर आरोप था कि उसके प्लेटफॉर्म बच्चों की सुरक्षा के लिए सही कदम नहीं उठा रहे थे.
अब इस विवाद को खत्म करने के लिए Meta ने अमेरिका के कई राज्यों के साथ बड़ा समझौता किया है. साथ ही Facebook और Instagram पर बच्चों और टीनएजर्स के इस्तेमाल को भी सीमित किया जाएगा. इसके तहत कंपनी को बच्चों की उम्र पहचानने और उनके सोशल मीडिया इस्तेमाल को सीमित करने के लिए कई बड़े बदलाव करने होंगे. ऐसे में आइए जानते हैं कि Meta कैसे बच्चों की उम्र तय करेगा और इसमें कितना पैसा खर्च होगा.&amp;nbsp;
Meta कैसे बच्चों की उम्र तय करेगा?
Meta को 18 साल से कम उम्र के यूजर्स की पहचान के लिए उम्र जांच की व्यवस्था मजबूत करनी होगी, हालांकि समझौते में कंपनी को हर यूजर से फोटो ID या वीडियो सेल्फी लेकर उम्र साबित करने के लिए मजबूर नहीं किया गया है. खासतौर पर 13 साल से कम उम्र के बच्चों की पहचान पर ज्यादा ध्यान दिया जाएगा. Meta संदिग्ध कम उम्र वाले अकाउंट्स के फ्रेंड नेटवर्क की भी जांच कर सकेगा और यूजर्स के लिए बच्चों के अकाउंट की रिपोर्ट करना आसान बनाया जाएगा. Meta की उम्र जांचने की प्रक्रिया पर एक स्वतंत्र ऑडिटर भी नजर रखेगा और इसकी समीक्षा करेगा.&amp;nbsp;
AI से भी होगी बच्चों की पहचान
समझौते के तहत Meta को फ्यूचर में 13 साल से कम उम्र के यूजर्स की पहचान करने वाला AI मॉडल तैयार करने के लिए कुछ डेटा का अस्थायी इस्तेमाल करने की अनुमति है. कंपनी इसी तरह की तकनीक का इस्तेमाल संदिग्ध टीनएजर्स अकाउंट्स की पहचान के लिए भी करती है.&amp;nbsp;
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Meta कितनी रकम देगा?
इस समझौते की रकम को लेकर अलग-अलग आंकड़े सामने आए हैं. Meta ने कुल भुगतान करीब 18 अरब डॉलर बताया है, जबकि कैलिफोर्निया के अटॉर्नी जनरल के मुताबिक राज्यों को 17 अरब डॉलर तक मिल सकते हैं. विदेशी मीडिया रिपोर्ट्स में समझौते की अधिकतम रकम करीब 16.68 अरब डॉलर बताई गई है. Meta ने कहा है कि इस समझौते के लिए 2026 में करीब 10 अरब डॉलर का कानूनी खर्च दर्ज किया जाएगा. समझौते के तहत भुगतान 10 साल की अवधि में सालाना किस्तों में किया जाएगा.
Facebook और Instagram में क्या बदलेगा?
18 साल से कम उम्र के यूजर्स के लिए Facebook और Instagram को मिलाकर रोजाना 2 घंटे की डिफॉल्ट लिमिट होगी. इसे हटाने के लिए पेरेंट्स की अनुमति जरूरी होगी. रात 12 बजे से सुबह 6 बजे तक Night Mode के तहत नोटिफिकेशन ब्लॉक रहेंगे.&amp;nbsp;
इसके अलावा सुबह 8 बजे से दोपहर 3 बजे तक नोटिफिकेशन डिफॉल्ट रूप से म्यूट रहेंगे. लगातार इस्तेमाल के दौरान ब्रेक रिमाइंडर भी मिलेंगे. लाइक काउंट छिपाने, कुछ ब्यूटी फिल्टर सीमित करने और बिना एल्गोरिदम वाला फीड चुनने जैसे बदलाव भी किए जाएंगे.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Thu, 03 Sep 2026 07:30:04 +0530</pubDate>
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        <title>WhatsApp का नया फीचर! अब यूजर्स पहचान सकेंगे AI कंटेंट, जानें कैसे</title>
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        <description><![CDATA[ WhatsApp देश में खूब इस्तेमाल किया जाता है. ये मैसेजिंग प्लेटफॉर्म बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक यूज किया जाता है. इसके अलावा मेटा अपने यूजर्स के एक्सपीरिएंस को बेहतर बनाने के लिए समय-समय पर नए फीचर्स पेश करती रहती है. इसी कड़ी में बता दें कि अब कंपनी ने iPhone यानी iOS यूजर्स के लिए एक नया फीचर पेश करने जा रही है जिसकी मदद से चैनल एडमिन ये बता सकेंगे कि किसी पोस्ट में इस्तेमाल किया गया फोटो, वीडियो या दूसरी मीडिया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI की मदद से बनाया या एडिट किया गया है या नहीं.
ये नया AI Content Label फिलहाल चुनिंदा बीटा टेस्टर्स को दिखाई दे रहा है. माना जा रहा है कि इसका रोलआउट Android के बाद iOS पर शुरू किया गया है. हालांकि अभी ये सुविधा सभी यूजर्स के लिए उपलब्ध नहीं हुई है.
अब दिखे AI कंटेंट का लेबल
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, WhatsApp इस फीचर को iOS बीटा वर्जन 26.34.10.70 के जरिए कुछ TestFlight यूजर्स तक पहुंचा रहा है. इसके आने के बाद चैनल एडमिन किसी अपडेट में मौजूद AI से बनाए या बदले गए मीडिया को लेबल कर सकेंगे.
आपको बता दें कि इसके लिए एडमिन को चैनल अपडेट के Context Menu में AI Content Label का ऑप्शन मिल सकता है. लेबल लगाने के बाद इसे कन्फर्म करना होगा. एक बार लेबल जुड़ जाने के बाद उसे हटाने का कोई ऑप्शन नहीं मिलेगा.
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कब तक मिलेगा सभी को फीचर?
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अभी WhatsApp ने ये साफ नहीं किया है कि ये फीचर किन-किन देशों में शुरू होने वाला है और कब तक ये फीचर सभी यूजर्स के लिए रोलआउट होने शुरू हो जाएगा.
इस समय अगर किसी iPhone यूजर को चैनल में AI Content Label का ऑप्शन दिखाई नहीं दे रहा है तो उसे परेशान होने की जरूरत नहीं है. संभव है कि WhatsApp धीरे-धीरे इस सुविधा को अलग-अलग अकाउंट्स तक पहुंचा सकता है.
कुछ देशों में जरूरी हो सकता है AI डिस्क्लोजर
जानकारी के मुताबिक, AI कंटेंट काफी तेजी से ज्यादातर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर फैल रहा है. इसी को देखते हुए कई जगहों पर लोगों को ये बताने की जरुरत पड़ रही है कि कोई फोटो या वीडियो एआई से बना है या नहीं.
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि कुछ देशों में चैनल एडमिन के लिए AI-generated मीडिया की जानकारी देना कानूनी रूप से जरूरी हो सकता है. ऐसे मामलों में WhatsApp चैनल इंटरफेस के ऊपर एक बैनर दिखाकर एडमिन को इस जरूरी चीज के बारे में जानकारी दे सकता है.
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        <pubDate>Wed, 02 Sep 2026 19:30:13 +0530</pubDate>
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        <title>4.5mm पतला होगा Apple का पहला Foldable iPhone, Samsung को देगा टक्कर!</title>
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        <description><![CDATA[ Apple के फैंस जिस डिवाइस का लंबे समय से इंतजार कर रहे हैं, उसकी चर्चा अब लॉन्च से कुछ दिन पहले और तेज हो गई है. Apple पहली बार फोल्डेबल फोन की दुनिया में कदम रख सकता है. कंपनी के 9 सितंबर के बड़े लॉन्च इवेंट में iPhone 18 Pro और iPhone 18 Pro Max के साथ एक नए फोल्डेबल iPhone को पेश किए जाने की उम्मीद है.
रिपोर्ट्स और लीक्स में इसे iPhone Ultra, iPhone Fold या iPhone Fold Ultra जैसे नामों से बताया जा रहा है. अगर Apple इस फोन को लॉन्च करता है, तो उसका सीधा मुकाबला Samsung की Galaxy Z Fold सीरीज से हो सकता है.&amp;nbsp;
Apple का सबसे बड़ा दांव क्या होगा?
Apple पहली बार फोल्डेबल स्मार्टफोन बाजार में कदम रखने की तैयारी में है और इसे कंपनी का अब तक का सबसे बड़ा iPhone दांव माना जा रहा है. हालांकि Apple ने अभी तक फोल्डेबल iPhone के नाम और फीचर्स की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है. लीक्स के मुताबिक, फोन अनफोल्ड होने पर सिर्फ 4.5mm पतला हो सकता है, जबकि फोल्ड होने पर इसकी मोटाई करीब 9mm बताई जा रही है. iPhone Fold में 48MP के दो रियर कैमरे दिए जा सकते हैं.
क्या Samsung को टक्कर देगा Apple Foldable iPhone?
Apple की फोल्डेबल एंट्री सीधे तौर पर Samsung जैसे पहले से मजबूत फोन के सामने होगी. Samsung की Galaxy Z Fold सीरीज फोल्डेबल फोन कैटेगरी में लंबे समय से मौजूद है और इस दौरान कंपनी ने डिजाइन, हिंज और स्क्रीन क्रीज जैसी तकनीकों में लगातार सुधार किया है. ऐसे में Apple का iPhone Ultra अगर बाजार में आता है, तो मुकाबला दोनों कंपनियों की फोल्डेबल टेक्नोलॉजी और प्रीमियम स्मार्टफोन रणनीति के बीच होगा. Apple के बड़े iPhone यूजर बेस की वजह से इसकी एंट्री फोल्डेबल फोन को ज्यादा लोगों तक पहुंचाने में भी जरूरी हो सकती है.&amp;nbsp;
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कितना बदलेगा बाजार?
फोल्डेबल बाजार में Apple की एंट्री जरूरी मानी जा रही है. Samsung समेत कई कंपनियां पहले से इस सेगमेंट में मौजूद हैं, लेकिन Apple अब तक इससे दूर रहा है. iPhone Ultra को लेकर रिपोर्ट्स में पतले डिजाइन, बड़े इंटरनल डिस्प्ले और कम दिखाई देने वाली क्रीज जैसे फीचर्स की चर्चा है. ऐसे में अगर Apple अपने फोल्डेबल फोन को iPhone के प्रीमियम एक्सपीरियंस के साथ पेश करता है, तो यह मौजूदा Fold डिवाइसेज के लिए नई चुनौती बन सकता है. Apple की एंट्री से कंपनियों के बीच डिजाइन, कीमत और फोल्डेबल डिस्प्ले टेक्नोलॉजी को लेकर मुकाबला और तेज होने की संभावना है.&amp;nbsp;
2 लाख से ज्यादा का हो सकता है Foldable iPhone&amp;nbsp;
iPhone Ultra की कीमत भी इसकी सबसे बड़ी चर्चाओं में से एक है. रिपोर्ट्स में इसकी शुरुआती कीमत 2,000 डॉलर से 2,500 डॉलर के बीच होने का अनुमान लगाया गया है, यानी भारतीय बाजार में इसकी कीमत 2 लाख रुपये से ऊपर जा सकती है. रिपोर्ट्स के मुताबिक Apple का पहला फोल्डेबल फोन बुक-स्टाइल डिजाइन में आ सकता है. फोल्ड होने पर इसमें करीब 5.3 से 5.5 इंच की बाहरी स्क्रीन और खोलने पर 7.8 इंच की LTPO OLED डिस्प्ले मिलने की बात कही जा रही है. इसमें 120Hz रिफ्रेश रेट भी हो सकता है. &amp;nbsp;
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        <pubDate>Wed, 02 Sep 2026 19:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>AI का ज्यादा इस्तेमाल बना देगा आपको रोबोट! स्टडी में हैरान करने वाला खुलासा</title>
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        <description><![CDATA[ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आज के समय में लोगों की जिंदगी का हिस्सा बनती जा रही है. ज्यादातर लोग अब अपने काम के लिए एआई का सहारा लेने लगे हैं. इसी के साथ ही अब कई सारे एआई चैटबॉट मौजूद हैं जो लोगों के लिए अलग-अलग काम करते हैं. इसी कड़ी में एक स्टडी सामने आई है जहां बताया गया है कि जरूरत से ज्यादा एआई के इस्तेमाल से लोगों के दिमाग पर खराब असर पढ़ सकता है. आइए जानते हैं कि क्या है पूरा मामला.
AI से ज्यादा बातचीत का इंसानों की भाषा पर असर
रिपोर्ट के मुताबिक, अगर कोई व्यक्ति लंबे समय तक AI चैटबॉट्स के साथ बातचीत करता है तो संभव है कि वह धीरे-धीरे अपनी बात रखने का तरीका बदलने लगेगा. वजह ये हो सकती है कि AI को साफ, व्यवस्थित और सीधे निर्देश ज्यादा आसानी से समझ आते हैं.
मसलन, अगर कोई व्यक्ति बार-बार AI कस्टमर सर्विस चैटबॉट का इस्तेमाल करता है तो उसे ये एक्सपीरिएंस हो सकता है कि छोटी, साफ और सीधे मुद्दे पर कही गई बात का जवाब बेहतर मिलता है. ऐसे में वह इंसानों से बात करते समय भी अनजाने में इसी तरह संवाद करने लगेगा.
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क्या है Robotoid Humanness?
AI &amp;amp; Society में पब्लिश एक नए स्टडी पेपर में रिसर्सर्च ने इस बदलाव को Robotoid Humanness नाम दिया है. इसका मतलब ये नहीं है कि इंसान सचमुच रोबोट बन जाएंगे. बल्कि ये एक ऐसी कंडिशन होती है जिसमें लोग मशीनों के लिए अपनी लैंग्वेज, नेचर और खुद को पेश करने के तरीके को ज्यादा बेहतर बनाने लगते हैं.
AI और इंसान के बीच बन सकता है फीडबैक लूप
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि शोधकर्ताओं ने इस प्रोसेस को एक तरह के फीडबैक लूप के रूप में समझाया है. AI हमारी पिछली बातचीत और उपलब्ध जानकारी के आधार पर जवाबों को व्यक्तिगत बनाने की कोशिश करता है. वहीं, यूजर भी AI के जवाबों को देखकर अपनी बातचीत का तरीका बदल लेता है. ये प्रोसेस लगातार चलती रहे तो दोनों पक्ष एक-दूसरे के नेचर के अनुसार ढलते जाते हैं. बता दें कि वैज्ञानिकों ने इस प्रोसेस को तीन स्टेज में बांटा है.

AI सिर्फ टूल नहीं, सोशल प्रेजेंस जैसा लगने लगता है
AI यूजर की एक तस्वीर तैयार करता है
यूजर भी AI के हिसाब से खुद को ढाल सकता है

इंसानों और AI के बीच सबसे बड़ा अंतर
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि शोधकर्ताओं के मुताबिक, इंसानों के बातचीत करने में काफी अंतर होता है. इंसान आपकी बात से कई बार असहमत भी हो सकता है या फिर आपकी बात को चैलेंज भी कर सकता है. लेकिन दूसरी तरफ, AI सिस्टम पैटर्न, डेटा, अनुमान और व्यक्तिगत रिएक्शन पर काफी हद तक काम करते हैं. इसीलिए एआई से ज्यादा बातचीत इंसानों को भी उनके तरीके से बात करने के लिए तैयार कर सकती है.
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        <pubDate>Wed, 02 Sep 2026 19:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>Android फोन में खतरा! आपके डेटा हो रहा चोरी? ऐसे पूरी तरह सुरक्षित रखें फोन</title>
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        <description><![CDATA[ Android फोन में खतरा! आपके डेटा हो रहा चोरी? ऐसे पूरी तरह सुरक्षित रखें फोन ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 02 Sep 2026 19:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>7050mAh बैटरी वाला Vivo T5 5G लॉन्च, जानें इसमें क्या&amp;क्या खास?</title>
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        <description><![CDATA[ स्मार्टफोन मार्केट में Vivo ने अपनी T-Series का नया स्मार्टफोन Vivo T5 5G भारत में लॉन्च कर दिया है. फोन को बड़ी बैटरी, हाई रिफ्रेश रेट डिस्प्ले और MediaTek के Dimensity 7500 Turbo चिपसेट के साथ पेश किया गया है. इसकी सबसे बड़ी खासियत 7050mAh की बैटरी है, जबकि डिस्प्ले में 144Hz रिफ्रेश रेट वाली 3D कर्व्ड AMOLED स्क्रीन मिलती है. फोन में 50MP Sony सेंसर वाला प्राइमरी कैमरा दिया गया है. तो आइए जानते हैं कि Vivo T5 5G की कीमत और खास फीचर्स क्या है.&amp;nbsp;
Vivo T5 5G की कीमत और ऑफर्स
Vivo T5 5G को भारत में चार स्टोरेज वेरिएंट में लॉन्च किया गया है. इसके 6GB RAM और 128GB स्टोरेज मॉडल की कीमत 34,999 है. वहीं 8GB RAM और 128GB स्टोरेज वेरिएंट 39,999 में आता है. 8GB RAM और 256GB स्टोरेज मॉडल की कीमत 44,999 है. इसके टॉप वेरिएंट में 12GB RAM और 256GB स्टोरेज मिलता है, जिसकी कीमत 49,999 रखी गई है.
इस पर लोगों को 4,000 तक का इंस्टेंट बैंक डिस्काउंट भी मिल सकता है. Axis Bank, SBI और HDFC Bank कार्ड से पेमेंट करने पर यह ऑफर उपलब्ध है. फोन की बिक्री 9 सितंबर से Flipkart पर शुरू होगी. इसे Royal Bronze और Silver Green कलर ऑप्शन में खरीदा जा सकेगा.&amp;nbsp;
Vivo T5 5G में क्या-क्या खास है?
Vivo T5 5G में 50MP Sony IMX882 प्राइमरी कैमरा दिया गया है, जो OIS सपोर्ट करता है. इसके साथ 8MP का अल्ट्रा-वाइड एंगल कैमरा मिलता है. सेल्फी और वीडियो कॉलिंग के लिए फोन में 32MP का फ्रंट कैमरा दिया गया है. कंपनी के मुताबिक, फ्रंट और रियर दोनों कैमरों से 4K वीडियो रिकॉर्डिंग की जा सकती है.&amp;nbsp;
7050mAh बैटरी बनेगी बड़ी खासियत
फोन में 7,050mAh की बड़ी बैटरी दी गई है, जो 44W Fast Charging सपोर्ट करती है. कंपनी का दावा है कि इसकी बैटरी हेल्थ पांच साल तक बनी रह सकती है. Vivo के मुताबिक, सिंगल चार्ज में फोन 85 घंटे तक म्यूजिक प्लेबैक, 34.7 घंटे तक लोकल वीडियो प्लेबैक और 7.9 घंटे तक गेमिंग का बैकअप दे सकता है.&amp;nbsp;
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144Hz 3D कर्व्ड AMOLED डिस्प्ले
Vivo T5 5G में 3D कर्व्ड AMOLED डिस्प्ले दी गई है. इसका रेजोल्यूशन 1.5K है और स्क्रीन 144Hz रिफ्रेश रेट सपोर्ट करती है. डिस्प्ले की पीक ब्राइटनेस 2,000 निट्स तक है. वहीं फोन में परफॉर्मेंस के लिए MediaTek Dimensity 7500 Turbo चिपसेट दिया गया है. इसमें 12GB तक LPDDR4x RAM और 256GB तक UFS 3.1 स्टोरेज मिलता है.&amp;nbsp;
Android 16 और सिक्योरिटी अपडेट
Vivo T5 5G Android 16 पर आधारित OriginOS 6 पर चलता है. कंपनी फोन के साथ तीन बड़े Android अपडेट और पांच साल तक सिक्योरिटी अपडेट देने का वादा करती है. सुरक्षा के लिए इसमें IP68 और IP69 रेटिंग मिलती है. इसके अलावा फोन में Stereo Speakers और Hi-Res Audio का सपोर्ट भी दिया गया है.
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        <pubDate>Wed, 02 Sep 2026 19:30:09 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>TV की पिक्चर क्वालिटी हो जाएगी जबरदस्त! बस बदलें ये 5 सेटिंग्स</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/tv-की-पिक्चर-क्वालिटी-हो-जाएगी-जबरदस्त-बस-बदलें-ये-5-सेटिंग्स</link>
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        <description><![CDATA[ TV की पिक्चर क्वालिटी हो जाएगी जबरदस्त! बस बदलें ये 5 सेटिंग्स ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 02 Sep 2026 03:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>सर्च और लोकेशन हिस्ट्री खुद मिटाएगा Google, जानें तरीका</title>
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        <description><![CDATA[ सर्च और लोकेशन हिस्ट्री खुद मिटाएगा Google, जानें तरीका ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 02 Sep 2026 03:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>Apple से IFA तक बड़े लॉन्च और AI इवेंट्स, जानें सितंबर में क्या&amp;क्या होगा खास?</title>
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        <description><![CDATA[ सितंबर 2026 टेक्नोलॉजी की दुनिया के लिए कई बड़े लॉन्च और नए अपडेट लेकर आने वाला है. एक तरफ Apple अपने नए iPhone और दूसरे गैजेट्स को लेकर चर्चा में है, तो दूसरी तरफ Vivo, Infinix, POCO, Redmi, iQOO, Xiaomi और Samsung जैसे बड़े ब्रांड भी अपने नए स्मार्टफोन पेश करने की तैयारी में हैं. इसके अलावा AI, रोबोटिक्स, साइबर सिक्योरिटी, स्मार्ट होम और इंडस्ट्रियल टेक्नोलॉजी से जुड़े कई बड़े इवेंट भी सितंबर में होने वाले हैं. ऐसे में टेक लवर्स के लिए पूरे महीने कई खास लॉन्च और इवेंट देखने को मिलेंगे.&amp;nbsp;
सितंबर में क्या-क्या होगा खास?&amp;nbsp;
1. &amp;nbsp;स्मार्टफोन लॉन्च - 1 सितंबर को POCO F9 Pro और F9 Ultra का ग्लोबल लॉन्च. होगा, हालांकि भारत में लॉन्च की तारीख अभी सामने नहीं आई है. 2 सितंबर को Vivo T5 5G और 4 सितंबर को Infinix Hot 70 Pro 5G+ की एंट्री होगी.&amp;nbsp;
2. Apple इवेंट - 9 सितंबर को Apple Event में iPhone 18 Pro, iPhone 18 Pro Max और फोल्डेबल iPhone Ultra पर नजर रहेगी. Apple Watch Series 12, नए Apple Watch Ultra मॉडल, AirPods और स्मार्ट होम डिवाइस से जुड़े अपडेट भी देखने को मिल सकते हैं. iPhone की बिक्री भारत में 18 सितंबर से शुरू होने की उम्मीद है.&amp;nbsp;
3. &amp;nbsp;Redmi, iQOO और Vivo के नए फोन - 15 सितंबर को Redmi Note 17 Pro सीरीज के भारत लॉन्च की उम्मीद है. सितंबर में चीन में iQOO 16 और Vivo X500 सीरीज भी दस्तक दे सकती हैं.&amp;nbsp;
4. &amp;nbsp;Xiaomi के फोल्डेबल और फ्लैगशिप फोन &amp;nbsp;- सितंबर के आखिर में चीन में Xiaomi 18 Pro सीरीज और Xiaomi 18 Fold के लॉन्च की तैयारी है.&amp;nbsp;
5. &amp;nbsp;IFA 2026 में AI और रोबोटिक्स &amp;nbsp;- 2 से 8 सितंबर तक Berlin में IFA 2026 होगा. यहां AI, स्मार्ट होम, वियरेबल्स और ह्यूमनॉइड रोबोट्स के साथ Acer, AMD, Hisense और दूसरे ब्रांड्स की टेक्नोलॉजी देखने को मिलेगी.&amp;nbsp;
6. &amp;nbsp;AI और टेक कॉन्फ्रेंस - &amp;nbsp;Global Fintech Fest, Industrial AI Summit, Meta Connect, IMTS, ROSCon, IROS और Tech Week Singapore जैसे बड़े इवेंट सितंबर में होंगे. Microsoft-HUMAIN का AI PC भी 20 सितंबर से इंटरप्राइज अवेलेबिलिटी के लिए तैयार है.&amp;nbsp;
IFA 2026 में AI और रोबोटिक्स&amp;nbsp;
IFA Berlin 2026 का आयोजन 2 से 8 सितंबर तक होगा. यहां AI, स्मार्ट होम, वियरेबल्स, रोबोटिक्स और नई कंज्यूमर टेक्नोलॉजी पर खास फोकस रहेगा. इस बार ह्यूमनॉइड रोबोट्स को खास जगह दी गई है. 2 सितंबर को Acer की Global Press Conference होगी, जबकि 4 सितंबर को AMD के Jack Huynh Personal AI के भविष्य पर बात करेंगे. Robots on the Runway और RoboCup भी IFA के खास अट्रेक्शन रहेंगे.&amp;nbsp;
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सितंबर में AI और टेक इवेंट्स की भरमार
1. Global Fintech Fest 2026, 8 से 11 सितंबर तक मुंबई में होगा, जहां Agentic AI, Tokenisation और Quantum जैसे विषय चर्चा में रहेंगे. वहीं Industrial AI Summit 9 से 10 सितंबर को ऑनलाइन होगा.&amp;nbsp;
2. Meta Connect 2026, &amp;nbsp;23 से24 सितंबर को होगा, जिसमें AI, AI ग्लासेस और VR से जुड़ी नई टेक्नोलॉजी दिखाई जाएगी. इसके अलावा IMTS 14-19 सितंबर, Autodesk University 15 से 17 सितंबर, The Things Conference 22 से 23 सितंबर, ROSCon 22-24 सितंबर और IROS 27 सितंबर से 1 अक्टूबर तक आयोजित होंगे.&amp;nbsp;
3. आखिर में Tech Week Singapore 29 से 30 सितंबर को होगा, जहां Cloud, AI, Cyber Security, Data Centres और Big Data जैसे विषयों पर फोकस रहेगा.&amp;nbsp;
Microsoft और HUMAIN की नई AI साझेदारी
सितंबर शुरू होने से ठीक पहले Microsoft और HUMAIN ने enterprise AI को लेकर अपनी रणनीतिक साझेदारी बढ़ाने का ऐलान किया है. इन दोनों कंपनियां HUMAIN ONE को Microsoft 365 Copilot के साथ जोड़कर AI productivity bundle देने की योजना बना रही हैं. HUMAIN AI PC की enterprise availability 20 सितंबर 2026 से शुरू होने की योजना है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Wed, 02 Sep 2026 03:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Apple, से, IFA, तक, बड़े, लॉन्च, और, इवेंट्स, जानें, सितंबर, में, क्या-क्या, होगा, खास</media:keywords>
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        <title>बारिश की बूंदों से कैसे बन सकती है बिजली? जानें नई तकनीक का दावा</title>
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        <description><![CDATA[ अब तक सोलर एनर्जी का नाम सुनते ही धूप और सोलर पैनल का ख्याल आता था, लेकिन वैज्ञानिक अब बारिश को भी बिजली बनाने के एक सोर्स के तौर पर देख रहे हैं. स्पेन के सेविले में रिसर्चर्स ने ऐसी तकनीक विकसित की है, जिसमें बारिश की बूंदों की स्पीड से बिजली पैदा करने की कोशिश की गई है. इसके लिए सोलर पैनल की सतह पर सिर्फ 100 नैनोमीटर पतली एक विशेष कोटिंग का इस्तेमाल किया गया है.
रिसर्चर्स के मुताबिक, यह सिस्टम धूप और बारिश दोनों से एनर्जी हासिल करने की दिशा में काम करता है. हालांकि फिलहाल इसके नतीजे लैब टेस्ट तक सीमित हैं और असली सोलर पैनलों पर इसका परीक्षण होना बाकी है.&amp;nbsp;
बारिश की बूंदों से कैसे बन सकती है बिजली?&amp;nbsp;
इस तकनीक के पीछे Triboelectric Effect काम करता है. जब दो सतहें आपस में टकराकर अलग होती हैं तो उनके बीच इलेक्ट्रिक चार्ज का आदान-प्रदान होता है. इसी का इस्तेमाल बारिश की बूंदों के साथ किया गया है. &amp;nbsp;जब बारिश की बूंद विशेष रूप से तैयार की गई फ्लोरीनेटेड सतह पर गिरती है और फिर उस पर फिसलती है, तो पानी और सतह पर अलग-अलग इलेक्ट्रिक चार्ज पैदा होते हैं. बूंद के सिर्फ सतह पर पड़े रहने से बिजली नहीं बनती है. चार्ज तब पैदा होता है जब बूंद सतह पर आगे बढ़ती है, जिससे सर्किट में करंट पैदा हो सकता है.&amp;nbsp;
100 नैनोमीटर की कोटिंग है खास
रिसर्चर्स ने 100 नैनोमीटर मोटी फ्लोरीनेटेड पॉलीमर कोटिंग तैयार की है. यह 90 फीसदी से ज्यादा ट्रांसपेरेंट है, इसलिए बारिश न होने पर सोलर सेल तक धूप पहुंचने में बड़ी रुकावट नहीं आती है. टेस्टिंग में एक बारिश की बूंद से 110 वोल्ट तक का पीक वोल्टेज पैदा होने की बात सामने आई है. ऐसे में बारिश के दौरान सोलर पैनल अपनी सामान्य सोलर पावर के साथ बारिश की बूंदों से अतिरिक्त इलेक्ट्रिकल आउटपुट हासिल करने की कोशिश कर सकता है.&amp;nbsp;
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Perovskite Solar Cells के साथ इस्तेमाल
इस तकनीक को Halide Perovskite सोलर सेल्स के साथ इस्तेमाल किया जा सकता है. ये सेल ज्यादा रोशनी सोखने और हाई एफेसियंसी के लिए जाने जाते हैं, लेकिन इन सोलर सेल्स की एक बड़ी कमी यह है कि नमी से ये जल्दी प्रभावित हो सकते हैं. ऐसे में यह खास कोटिंग दो काम एक साथ कर सकती है. एक तरफ यह Perovskite सेल को पानी से बचाने में मदद करती है, वहीं दूसरी तरफ बारिश की बूंदों से एनर्जी हासिल करने का रास्ता भी देती है.&amp;nbsp;
कहां आ सकती है काम?
इस तकनीक से फिलहाल इतनी बिजली पैदा होने की उम्मीद नहीं है कि पूरे घर के डिवाइस चलाए जा सकें, लेकिन इसका इस्तेमाल रिमोट सेंसर, वेदर मॉनिटरिंग स्टेशन, हाईवे साइनेज और छोटी ऑक्सिलरी लाइट्स जैसी चीजों को पावर देने में किया जा सकता है. हालांकि अभी यह तकनीक लैब में ही टेस्ट हुई है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Wed, 02 Sep 2026 03:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>25 घंटे की बैटरी और Galaxy AI, Samsung का नया लैपटॉप लॉन्च</title>
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        <description><![CDATA[ Samsung ने अपनी Galaxy Book 6 सीरीज का नया मॉडल लॉन्च किया है. Samsung Galaxy Book 6 को डेली यूजर्स के लिए डिजाइन किया गया है और इसमें Galaxy Ecosystem के साथ AI फीचर्स भी दिए गए हैं. कंपनी ने इसमें 14 इंच की डिस्प्ले, Intel प्रोसेसर और 25 घंटे तक चलने वाली बैटरी दी है. ऐसे में आइए जानते हैं कि 25 घंटे की बैटरी और Galaxy AI के साथ Samsung का नया लैपटॉप कितना खास है और इसमें क्या-क्या फीचर्स मिलेंगे.&amp;nbsp;
Samsung का नया लैपटॉप कितना खास है?
Samsung Galaxy Book 6 में 14 इंच की LCD WUXGA डिस्प्ले दी गई है. इसका रेजोल्यूशन 1920 बाय 1200 पिक्सेल और ब्राइटनेस 350 निट्स है. डिस्प्ले का 16:10 आस्पेक्ट रेशियो ज्यादा स्क्रीन स्पेस देता है, जिससे काम और मल्टीटास्किंग में सुविधा मिलती है. इसमें एंटी-रिफ्लेक्टिव फिनिश भी दिया गया है.&amp;nbsp;
इसमें क्या-क्या फीचर्स मिलेंगे?
परफॉर्मेंस के लिए Galaxy Book 6 में Intel Core 3 और Intel Core 5 प्रोसेसर के ऑप्शन मिलते हैं. इसके साथ Intel Graphics और Intel NPU दिया गया है, जो 15 TOPS तक AI परफॉर्मेंस दे सकता है. लैपटॉप में 8GB और 16GB LPDDR5X RAM के विकल्प हैं, जबकि स्टोरेज 256GB, 512GB और 1TB तक मिलती है.&amp;nbsp;
25 घंटे तक की बैटरी
Galaxy Book 6 में 61.2Wh बैटरी दी गई है. Samsung के मुताबिक, यह एक बार चार्ज करने पर 25 घंटे तक चल सकती है. लैपटॉप में 45W USB Type-C फास्ट चार्जिंग सपोर्ट है. कंपनी के अनुसार करीब 30 मिनट में बैटरी लगभग 33 प्रतिशत तक चार्ज हो सकती है.&amp;nbsp;
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Galaxy AI फीचर्स और कनेक्टिविटी
इस लैपटॉप में AI Select, AI Cut Out और Note Assist जैसे Galaxy AI फीचर्स मिलते हैं. Note Assist नोट्स को समरी करने और जरूरी जानकारी सामने लाने में मदद करता है. Galaxy Book 6 से दूसरे Galaxy डिवाइसेज के बीच फाइल शेयर और एक्सेस की सुविधा भी मिलती है. Galaxy Tab को सेकेंड डिस्प्ले के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है. कनेक्टिविटी के लिए दो USB Type-C, एक USB Type-A, HDMI 1.4, Wi-Fi 6E, Bluetooth 5.4 और 3.5mm हेडफोन जैक मिलता है. इसमें 2MP 1080p FHD कैमरा और Dolby Atmos सपोर्ट वाले स्टीरियो स्पीकर्स दिए गए हैं.&amp;nbsp;
Samsung Galaxy Book 6 की कीमत
Samsung Galaxy Book 6 की कीमत 799.99 डॉलर यानी करीब 76,125 रुपये है. यह 5 अक्टूबर 2026 से Samsung की आधिकारिक वेबसाइट और Amazon पर उपलब्ध होगा. इसे वोयलेट सिल्वर और ग्रे कलर में पेश किया गया है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Wed, 02 Sep 2026 03:30:06 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Apple Watch में SE का क्या मतलब होता है? जानकर रह जाएंगे हैरान</title>
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        <description><![CDATA[ अगर आप Apple Watch खरीदने का प्लान कर रहे हैं तो आपको उसके कई सारे मॉडल देखने को मिलेंगे. इसी दौरान आपने Apple Watch SE का नाम भी जरूर सुना होगा. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर इस मॉडल के नाम में SE का मतलब क्या होता है? कई लोग मानते हैं कि ये किसी खास टेक्नोलॉजी या फीचर का शॉर्ट फॉर्म है. हालांकि, इसकी कहानी थोड़ी अलग है. आइए जानते हैं क्या है पूरी सच्चाई.
क्या है SE का मतलब?
जानकारी के अनुसार, Apple ने SE नाम का इस्तेमाल अपने ऐसे प्रोडक्ट्स के लिए किया है जो कंपनी के प्रीमियम मॉडल्स के मुकाबले में कम कीमत में यूजर्स को ज्यादा फीचर्स उपलब्ध कराते हैं. Apple ने SE का कोई आधिकारिक फुल फॉर्म स्पष्ट रूप से तय नहीं किया है.
यानी SE को किसी निश्चित शब्द का ऑफिशियल रूप मानना सही नहीं होगा. इसे नॉर्मली एक ऐसे मॉडल लाइनअप के तौर पर समझा जा सकता है जो कम कीमत में Apple Watch का एक्सपीरिएंस देने के लिए तैयार किया गया है.
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Apple Watch SE क्यों है खास?
Apple Watch SE को उन यूजर्स के लिए डिजाइन किया जाता है जो Apple Watch के स्मार्ट फीचर्स को पसंद तो करते हैं लेकिन बजट के चलते खरीद नहीं पाते हैं. इसमें नोटिफिकेशन, फिटनेस ट्रैकिंग, वर्कआउट रिकॉर्डिंग, हार्ट रेट मॉनिटरिंग और Apple के दूसरे स्मार्ट फीचर्स जैसे ऑप्शन मिल जाते हैं.
हालांकि, SE मॉडल में प्रीमियम Apple Watch के मुकाबले में कुछ एडवांस फीचर्स और हार्डवेयर लिमिटेड हो सकते हैं. यही वजह है कि इसकी कीमत भी ज्यादातर कम रखी जाती है.
क्या SE का मतलब Special Edition है?
ज्यादातर लोगों को लगता है कि Apple Watch SE को Special Edition कहा जाता है लेकिन Apple ने आधिकारिक तौर पर ये नहीं कहा है कि SE का फुल फॉर्म Special Edition है. इसके अलावा दिलचस्प बात ये है कि SE नाम सिर्फ Apple Watch तक सीमित नहीं है. Apple ने iPhone जैसे दूसरे प्रोडक्ट्स में भी SE ब्रांडिंग का इस्तेमाल किया है.
इसका मकसद ऐसे यूजर्स तक पहुंचना है जो Apple का डिवाइस तो चाहते हैं लेकिन फ्लैगशिप मॉडल पर ज्यादा पैसा खर्च नहीं करना चाहते हैं. इस तरह SE लाइनअप Apple के प्रीमियम और ज्यादा किफायती ऑप्शनों के बीच एक तरह का बैलेंस बनाने की कोशिश करता है.
क्या Apple Watch SE खरीदना सही है?
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अगर आपको फिटनेस ट्रैकिंग, नोटिफिकेशन और Apple के इकोसिस्टम का हिस्सा बनना है तो SE मॉडल आपके लिए एक बेहतरीन ऑप्शन साबित हो सकता है. लेकिन अगर आपको सबसे एडवांस हेल्थ फीचर्स, प्रीमियम डिस्प्ले या अन्य हाई-एंड फीचर्स पसंद हैं तो Apple Watch के प्रीमियम मॉडल खरीद सकते हैं.
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        <pubDate>Tue, 01 Sep 2026 11:30:17 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>बैन होने के बाद भी कैसे बच्चे इस्तेमाल करने लगते हैं Social Media? जानें टेक्नोलॉजी</title>
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        <description><![CDATA[ कई देशों में बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को सीमित करने के लिए उम्र की पाबंदी, पैरेंटल कंट्रोल और अकाउंट वेरिफिकेशन जैसे कदम उठाए जा रहे हैं. लेकिन सिर्फ बैन या उम्र की सीमा तय कर देने से बच्चों की सोशल मीडिया तक पहुंच पूरी तरह खत्म नहीं होती है. टेक्नोलॉजी की मदद से बच्चे कई बार इन बैन को चकमा देने की कोशिश करते हैं. आइए समझते हैं कि इसके पीछे कौन-सी टेक्नोलॉजी काम करती है और माता-पिता के लिए चुनौती इतनी बड़ी क्यों है.
VPN से बदल जाती है लोकेशन
बच्चे जो बैन से बचने के लिए टेक्नोलॉजी इस्तेमाल करते हैं, उसमें VPN का नाम सबसे पहले आता है. VPN इंटरनेट कनेक्शन को दूसरे सर्वर के जरिए रूट कर सकता है जिससे किसी वेबसाइट या ऐप को यूजर की असली लोकेशन का पता लगाना मुश्किल हो सकता है.
जैसे कि अगर किसी देश में कोई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म बैन है तो VPN के जरिए कनेक्शन किसी दूसरे एरिया से आता हुआ दिखाई दे सकता है. हालांकि, VPN हर कंडिशन में बैन को पार करने की गारंटी नहीं देता और कई सर्विसेज VPN ट्रैफिक को पहचानने की कोशिश करती हैं.
उम्र की जांच में टेक्नोलॉजी की चुनौती
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म बच्चों की उम्र पता करने के लिए अलग-अलग तरीकों का इस्तेमाल करते हैं. इनमें जन्मतिथि, पहचान डॉक्यूमेंट्स, सेल्फी बेस्ड अनुमान और डिजिटल वेरिफिकेशन जैसी टेक्नोलॉजी शामिल हैं.
अब समस्या ये है कि केवल जन्मतिथि पूछना काफी नहीं होता है. कोई यूजर गलत उम्र डालकर अकाउंट बना कर प्लेटफॉर्म इस्तेमाल कर सकता है. इसी वजह से उम्र को वेरिफाई करने वाली तकनीक को ज्यादा बेहतर बनाने पर लगातार काम किया जा रहा है.
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दूसरे के अकाउंट से लॉगिन
अगर किसी बच्चे का अपना अकाउंट बैन है तो वह परिवार के किसी बड़े व्यक्ति के अकाउंट का इस्तेमाल कर सकता है. ऐसे मामलों में प्लेटफॉर्म के लिए ये पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि असल में फोन या अकाउंट कौन चला रहा है.
यही कारण है कि केवल अकाउंट की उम्र जांचना काफी नहीं माना जाता है. डिवाइस, लॉगिन पैटर्न और इस्तेमाल के तरीके जैसे कई संकेत भी जरूरी होते हैं.
ऐप हटने के बाद भी ब्राउजर का रास्ता
किसी फोन से सोशल मीडिया ऐप हटाने पर भी उसकी वेबसाइट ब्राउजर के जरिए इस्तेमाल की जाती है. अगर नेटवर्क लेवल पर वेबसाइट को ब्लॉक नहीं किया गया है तो ऐप हटाना अकेले कोई बेहतर समाधान नहीं है. इसके अलावा कुछ प्लेटफॉर्म मोबाइल वेबसाइट और अलग-अलग ऐप एक्सपीरिएंस उपलब्ध कराते हैं जिससे बच्चों के लिए बैन से बचने के रास्ते बढ़ जाते हैं.
क्या पैरेंटल कंट्रोल मदद करता है?
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि माता-पिता फोन में मौजूद पैरेंटल कंट्रोल, ऐप लिमिट और कंटेंट फिल्टर का इस्तेमाल कर सकते हैं. कई डिवाइस में ऐप इंस्टॉल करने, वेबसाइट खोलने और स्क्रीन टाइम को कंट्रोल करने के ऑप्शन भी मिलते हैं. लेकिन टेक्नोलॉजी के साथ बच्चों की समझ भी बदल रही है. इसलिए केवल सॉफ्टवेयर बेस्ड रोक लगाने के बजाय बच्चों से इंटरनेट सुरक्षा, ऑनलाइन प्राइवेसी और सोशल मीडिया के खतरों के बारे में बातचीत करना भी जरूरी है.
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        <pubDate>Tue, 01 Sep 2026 11:30:15 +0530</pubDate>
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        <title>AI वीडियो देखकर हो जाएं सावधान! जानें असली या नकली पहचानने की ट्रिक</title>
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        <description><![CDATA[ आज के समय में AI (Artificial Intelligence) की मदद से वीडियो बनाना पहले के मुकाबले में काफी आसान हो चुका है. कुछ टूल्स की मदद से किसी व्यक्ति के चेहरे, आवाज और बोलने के अंदाज को बदलकर ऐसा वीडियो तैयार किया जा सकता है जिसे पहली नजर में देखकर असली और नकली में फर्क करना मुश्किल हो जाता है. ऐसे वीडियो को नॉर्मली डीपफेक (Deepfake) कहा जाता है.
सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल होने वाले वीडियो पर तुरंत भरोसा बिलकुल भी नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसे वीडियो आपको ठगी का शिकार भी बना सकते हैं. इसलिए किसी भी संदिग्ध वीडियो को शेयर करने से पहले इन 5 तरीकों से उसकी जांच जरूर करना चाहिए.
चेहरे और आंखों की हरकत पर दें ध्यान
दरअसल, AI-generated वीडियो में चेहरा कई बार अजीब तरीके से दिखाई देता है. खासकर आंखों की पलकें, चेहरे के भाव और होंठों की मूवमेंट को ध्यान से देखें. बोलते समय होंठ और आवाज का तालमेल सही न होना, चेहरे के कुछ हिस्सों का अचानक बदलना या आंखों की एक्टिविटी अजीब लगना वीडियो के नकली होने का संकेत होता है.
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आवाज और होंठों को मैच करें
Deepfake वीडियो में किसी व्यक्ति की आवाज की नकल करना भी संभव है. इसलिए वीडियो देखते समय ये चेक करें कि आवाज के साथ होंठ सही समय पर हिल रहे हैं या नहीं.
कई बार AI वीडियो में आवाज थोड़ी रोबोटिक, भावनाओं से अलग लगती है. आवाज के उतार-चढ़ाव और व्यक्ति के चेहरे के भावों में अंतर भी संदेह पैदा कर सकता है.
वीडियो का सोर्स जरूर चेक करें
अगर कोई वीडियो अचानक सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है तो ये जरूरी नहीं कि उसमें दिखाई गई जानकारी सही हो. वीडियो किस अकाउंट से पोस्ट किया गया है और उसका असली सोर्स क्या है, इन सब चीजों को जरूर चेक करना चाहिए. अगर वीडियो में किसी बड़े नेता, अभिनेता या कंपनी से जुड़ा दावा किया गया है तो उस व्यक्ति या संस्था के आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट और वेबसाइट पर भी जानकारी को वेरिफाई करना चाहिए.
वीडियो की क्वालिटी में गड़बड़ी तलाशें
AI-generated वीडियो में कभी-कभी हाथ, उंगलियां, दांत, बाल, कान या बैकग्राउंड अजीब दिखाई देते हैं. चेहरे और गर्दन के आसपास भी हल्का धुंधलापन या बदलाव नजर आ सकता है. इसीलिए अगर आपको थोड़ा सा भी शक हो तो वीडियो को रोककर अलग-अलग फ्रेम को चेक करें. अगर किसी फ्रेम में चेहरा अचानक बदलता है या बैकग्राउंड की चीजों का साइज बिगड़ता दिखाई देता है तो समझ जाएं कि वीडियो एआई से बनाया गया है.
खबर को दूसरे भरोसेमंद सोर्स से वेरिफाई करें
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि किसी वायरल वीडियो के आधार पर तुरंत फैसला बिलकुल भी नहीं लेना चाहिए. उसमें किए गए दावे को कई विश्वसनीय न्यूज वेबसाइट या ऑफिशियल सोर्स चेक करना चाहिए. अगर वीडियो में किसी बड़ी घटना की बात कही गई है लेकिन किसी भरोसेमंद सोर्स पर उसका जिक्र नहीं मिलता है तो सावधान हो जाना चाहिए.
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        <pubDate>Tue, 01 Sep 2026 11:30:13 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>इन नंबर्स से आए कॉल तो हो जाएं सावधान, खाली हो सकता है खाता</title>
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        <description><![CDATA[ फोन पर आने वाली हर कॉल अब भरोसे लायक नहीं रह गई है. साइबर ठग अलग-अलग तरीकों से लोगों को झांसे में लेकर उनके बैंक खाते खाली कर रहे हैं. हैरानी की बात यह है कि इनमें से कई कॉल्स ऐसे नंबरों से आती हैं, जिन्हें पहचानकर आप शुरुआत में ही सतर्क हो सकते हैं. आइए जानते हैं कि किन नंबरों या कोड से आई कॉल पर आपको खास सावधानी बरतनी चाहिए.
विदेशी कोड वाले नंबरों से आने वाली कॉल
पिछले कुछ समय से +92, +84, +62 और +60 जैसे अंतरराष्ट्रीय कोड से आने वाली कॉल्स और व्हाट्सऐप कॉल्स को लेकर लगातार चेतावनी दी जा रही है. +92 पाकिस्तान का कंट्री कोड है, जबकि +84, +62 और +60 क्रमशः वियतनाम, इंडोनेशिया और मलेशिया के कोड माने जाते हैं. इन नंबरों से आने वाली कॉल्स में स्कैमर्स फ्री गिफ्ट, लॉटरी जीतने या किसी अनजान स्कीम का लालच देकर बातचीत शुरू करते हैं. हालांकि जरूरी नहीं कि ये कॉल्स सच में उन्हीं देशों से आ रही हों, क्योंकि वर्चुअल नंबरों के जरिए भी ऐसी कॉल्स जनरेट की जा सकती हैं, लेकिन विशेषज्ञों की सलाह यही है कि ऐसे कोड वाले किसी भी अनजान नंबर की कॉल न उठाई जाए.
सरकारी अधिकारी या पुलिस बनकर आने वाली कॉल
एक और आम तरीका है, जिसमें स्कैमर खुद को पुलिस अधिकारी, कस्टम विभाग या साइबर सेल का अधिकारी बताकर कॉल करते हैं. इसे डिजिटल अरेस्ट स्कैम भी कहा जाता है. इसमें पीड़ित को बताया जाता है कि उसके नाम पर कोई पार्सल पकड़ा गया है या उसका आधार-मोबाइल नंबर किसी अपराध में इस्तेमाल हुआ है. डराकर पीड़ित को वीडियो कॉल पर बनाए रखा जाता है और पैसे ट्रांसफर करने या ओटीपी शेयर करने के लिए मजबूर किया जाता है.
बैंक और कस्टमर केयर के नाम पर कॉल
कई स्कैमर बैंक अधिकारी, क्रेडिट कार्ड कंपनी या किसी शॉपिंग ऐप का कस्टमर केयर बनकर कॉल करते हैं. ये कॉल आमतौर पर रिफंड, कैशबैक या केवाईसी अपडेट के बहाने की जाती हैं. बातचीत के दौरान स्कैमर स्क्रीन शेयरिंग ऐप डाउनलोड कराने या सीधे यूपीआई पिन, ओटीपी पूछने की कोशिश करते हैं. असली बैंक कभी भी फोन पर पिन, ओटीपी या पूरा कार्ड नंबर नहीं मांगते.
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शक होने पर क्या करें?
अगर किसी अनजान नंबर से इस तरह की कोई कॉल आती है और आपको शक होता है, तो सबसे पहले शांत रहकर कोई भी निजी जानकारी, ओटीपी या पिन शेयर न करें. सरकार ने ऐसी फर्जी कॉल्स की शिकायत के लिए संचार साथी पोर्टल पर चक्षु सुविधा शुरू की है, जहां जाकर कोई भी व्यक्ति संदिग्ध कॉल या मैसेज की रिपोर्ट दर्ज करा सकता है.&amp;nbsp;
इसके अलावा नेशनल साइबर क्राइम हेल्पलाइन नंबर 1930 पर भी कॉल करके तुरंत मदद ली जा सकती है. समय पर सही कदम उठाने से न सिर्फ आपका बैंक खाता सुरक्षित रह सकता है, बल्कि ऐसे स्कैमर्स पर लगाम लगाने में भी मदद मिलती है.
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        <pubDate>Tue, 01 Sep 2026 11:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>Screen Sharing Scam क्या है, एक कॉल से कैसे हो जाता है UPI Fraud?</title>
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        <description><![CDATA[ पिछले कुछ समय में स्क्रीन शेयरिंग स्कैम के मामले तेजी से बढ़े हैं, जिनमें एक फोन कॉल पर लोग अपनी पूरी जिंदगी की कमाई गंवा बैठे हैं. यह फ्रॉड इतनी चालाकी से किया जाता है कि पढ़े-लिखे और टेक्नोलॉजी समझने वाले लोग भी इसका शिकार बन जाते हैं. आइए समझते हैं कि आखिर यह स्कैम काम कैसे करता है और सिर्फ एक कॉल से कैसे बैंक अकाउंट खाली हो जाता है.
कैसे शुरू होता है स्कैम?
आमतौर पर स्कैमर्स किसी बैंक, कस्टमर केयर, बीमा कंपनी या किसी शॉपिंग ऐप के कर्मचारी बनकर कॉल करते हैं. कई बार यह कॉल किसी फर्जी कस्टमर केयर नंबर पर की गई सर्च से भी शुरू होता है, जो गूगल पर असली नंबर जैसा दिखता है. स्कैमर्स कॉल पर भरोसा दिलाने के लिए बैंकिंग जैसी भाषा और शब्दावली का इस्तेमाल करते हैं, जिससे सामने वाले को शक नहीं होता.
कई मामलों में स्कैमर्स रिफंड, कैशबैक, केवाईसी अपडेट या किसी फर्जी सब्सक्रिप्शन चार्ज को वापस दिलाने के बहाने कॉल करते हैं. जैसे ही व्यक्ति को लगता है कि उसके पैसे वापस मिलने वाले हैं या कोई परेशानी दूर होने वाली है, वह स्कैमर की हर बात मानने लगता है.
स्क्रीन शेयरिंग ऐप की एंट्री
असली खेल यहीं से शुरू होता है। स्कैमर व्यक्ति को AnyDesk, TeamViewer या Quick Support जैसी कोई स्क्रीन शेयरिंग ऐप डाउनलोड करने को कहता है. यह कहा जाता है कि समस्या ठीक करने या रिफंड प्रोसेस करने के लिए स्क्रीन शेयर करना जरूरी है. ये ऐप्स असल में ऑफिस मीटिंग या टेक्निकल सपोर्ट के लिए बनाई गई हैं, लेकिन स्कैमर्स इनका गलत इस्तेमाल करते हैं. जैसे ही ऐप डाउनलोड होकर एक कोड जनरेट होता है और व्यक्ति वह कोड स्कैमर को बता देता है, स्कैमर को उस फोन की पूरी स्क्रीन दिखनी शुरू हो जाती है.&amp;nbsp;
UPI पिन और OTP बनते हैं हथियार
स्क्रीन शेयर होने के बाद स्कैमर व्यक्ति से कहता है कि रिफंड पाने के लिए एक छोटी-सी UPI रिक्वेस्ट अप्रूव करनी है या किसी ऐप में एक फॉर्म भरना है. असल में यह रिक्वेस्ट पैसे वापस लेने की नहीं, बल्कि पैसे भेजने की होती है. चूंकि व्यक्ति की स्क्रीन पहले से ही स्कैमर को दिख रही होती है, इसलिए जैसे ही वह UPI पिन डालता है, स्कैमर वह पिन भी लाइव देख लेता है.
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कुछ ही सेकंड में खाली हो जाता है अकाउंट
एक बार UPI पिन या OTP स्कैमर के पास पहुंच जाए, तो वह चंद सेकंड में एक के बाद एक कई ट्रांजैक्शन करके अकाउंट से पैसे निकाल लेता है. चूंकि स्क्रीन शेयरिंग एक्टिव रहती है, इसलिए स्कैमर को यह भी पता होता है कि अकाउंट में कितनी रकम बची है और कहां-कहां से पैसे ट्रांसफर किए जा सकते हैं. ज्यादातर मामलों में पीड़ित को तब तक कुछ समझ नहीं आता, जब तक बैंक से पैसे कटने के मैसेज नहीं आने लगते.
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        <pubDate>Mon, 31 Aug 2026 23:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>WhatsApp का नया फीचर! Chat करते समय बदल जाएगा पूरा लुक, जानें कैसे</title>
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        <description><![CDATA[ WhatsApp देश में काफी ज्यादा इस्तेमाल होने वाला मैसेजिंग प्लेटफॉर्म है. इसी को देखते हुए कंपनी अपने यूजर्स के एक्सपीरिएंस को बेहतर बनाने के लिए नए-नए फीचर्स जोड़ती रहती है. इसी कड़ी में कंपनी ने प्लेटफॉर्म में फिर से एक नया फीचर पेश किया है जिसकी मदद से यूजर्स का चैट करने का एक्सपीरिएंस पूरी तरह से बदल जाएगा. आइए जानते है कि ये नया फीचर कैसे काम करता है.
मिले नए फीचर्स
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, व्हाट्सऐप में कंपनी ने नए चैट थीम पेश किया है जहां इसे 5 अलग-अलग पार्ट्स में बांटा गया है. इनमें Featured, Nature, Live, Minimal और Doodle शामिल हैं. हर कैटेगरी का अपना अलग डिजाइन और अंदाज है जिससे यूजर्स को चैट का लुक बदलने के लिए ज्यादा ऑप्शन मिल जाएंगे. हालांकि, आपको बता दें कि ये नया अपडेट सिर्फ आईफोन यूजर्स के लिए पेश किया गया है. लेकिन माना जा रहा है कि जल्द ही ये फीचर एंड्रॉयड यूजर्स को भी मिल सकता है. हालांकि, कंपनी की ओर से इसको लेकर कोई आधिकारीक जानकारी शेयर नहीं की गई है.
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ये वाला है सबसे खास
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इस कैटेगरी में सबसे खास लाइव कैटेगरी माना जा रहा है. इस कैटेगरी में यूजर्स को बैकग्राउड में ऐसे वॉलवेपर मिलेंगे जिसमें स्लो एनीमेशन भी चलता रहेगा जो यूजर्स के चैट्स को और भी आकर्षक बनाने का काम करेंगे. इसके अलावा इस नए एनिमेटेड वॉलपेपर से यूजर्स का चैट करने का एक्सपीरिएंस भी काफी बेहतर होगा.
अलग-अलग वॉलपेपर लगा सकेंगे यूजर्स
अगल-अलग कैटेगरी में अलग-अलग थीम्स यूजर्स को मिलेंगी जिससे वो अपनी जरूरत के हिसाब से चैट में थीम्स का इस्तेमाल कर सकेंगे. जैसे नेचर वाले कैटगरी में यूजर्स को प्राकृतिक नजारों और आउटडोर लैंडस्केप वाले वॉलपेपर मिलेंगे. वहीं, अगर आपको ज्यादा रंग-बिरंगा या व्यस्त बैकग्राउंड पसंद नहीं है तो Minimal कैटेगरी आपके लिए बढ़िया साबित होगा.
कैसे बदलें व्हाट्सऐप थीम
अब अगर आप भी iPhone यूजर हैं और इस नए फीचर का इस्तेमाल करना चाहते हैं तो बता दें कि इसे यूज करना भी काफी आसान है. इसके लिए सबसे पहले WhatsApp की Chat Theme Settings में जाकर नई थीम्स देखें. इसके बाद यहां मौजूद Gallery में से अपनी पसंद की थीम चुनकर उसे चैट के लिए लागू किया कर सकते हैं.
हालांकि, ऐसा भी हो सकता है कि कुछ आईफोन यूजर्स को ये फीचर अभी न दिखाई दे. ऐसा इसलिए है क्योंकि कंपनी इस फीचर को धीरे-धीरे रोलआउट कर रही है. ऐसे में ये नया फीचर अपडेटेड व्हाट्सऐप वर्जन में मिलेगा. इसके अलावा अगर आपके फोन में ये फीचर नहीं आया है तो थोड़ा इंतजार करना ही बेहतर ऑप्शन रहेगा.
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        <pubDate>Mon, 31 Aug 2026 23:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>Google Play Store से हो गए हैं बोर? इन ऑप्शन को कर सकते हैं ट्राई</title>
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        <description><![CDATA[ Google Play Store से हो गए हैं बोर? इन ऑप्शन को कर सकते हैं ट्राई ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 31 Aug 2026 23:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>कैसे बढ़ाई जाती है 5G टावर की क्षमता, कितना पैसा होता है खर्च?</title>
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        <description><![CDATA[ आज के समय में 5G नेटवर्क तेजी से फैल रहा है. लेकिन किसी इलाके में 5G की शुरुआत कर देना ही काफी नहीं होता. जैसे-जैसे यूजर्स की संख्या बढ़ती है और इंटरनेट पर डेटा की खपत बढ़ती है, वैसे-वैसे मोबाइल नेटवर्क की क्षमता बढ़ाने की जरूरत पड़ती है. इसके लिए टेलीकॉम कंपनियां टावर और नेटवर्क इंफ्रास्ट्रक्चर में कई तरह के अपग्रेड करती हैं.
5G टावर की क्षमता बढ़ाने की जरूरत क्यों पड़ती है?
एक मोबाइल टावर की क्षमता अनलिमिटेड नहीं होती है. किसी इलाके में कम यूजर्स होने पर मौजूदा नेटवर्क आसानी से काम कर सकता है लेकिन यूजर्स बढ़ने के साथ टावर पर डेटा ट्रैफिक भी बढ़ जाता है.
खासकर वीडियो स्ट्रीमिंग, ऑनलाइन गेमिंग, वीडियो कॉल और 5G पर बड़ी फाइल डाउनलोड करने से नेटवर्क पर लोड बढ़ता है. इसका असर इंटरनेट स्पीड और नेटवर्क की स्थिरता पर दिखाई दे सकता है. ऐसे में ऑपरेटर को मौजूदा साइट की क्षमता बढ़ानी पड़ती है.
ज्यादा स्पेक्ट्रम से बढ़ती है क्षमता
5G नेटवर्क की क्षमता बढ़ाने का एक आसान तरीका एक्सट्रा स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल है. टेलीकॉम कंपनियों के पास अलग-अलग बैंड में स्पेक्ट्रम होता है. किसी इलाके में ज्यादा ट्रैफिक होने पर उपलब्ध स्पेक्ट्रम को बेहतर तरीके से इस्तेमाल किया जा सकता है.
कई मामलों में ऑपरेटर अलग-अलग 5G बैंड को एक साथ इस्तेमाल करके ज्यादा क्षमता हासिल करते हैं. इसे स्पेक्ट्रम एग्रीगेशन जैसी टेक्नोलॉजी के जरिए किया जाता है.
टावर पर नए डिवाइस लगाए जाते हैं
क्षमता बढ़ाने के लिए केवल टावर की ऊंचाई बढ़ाना जरूरी नहीं होता है. कई बार मौजूदा साइट पर नए रेडियो यूनिट, एंटीना या अन्य नेटवर्क डिवाइस लगाए जाते हैं.
एडवांस 5G नेटवर्क में Massive MIMO जैसे सिस्टम का इस्तेमाल भी किया जाता है. इसमें कई एंटीना एलिमेंट एक साथ काम करते हैं जिससे एक ही साइट से ज्यादा यूजर्स को बेहतर तरीके से सर्व किया जाता है.
बैकहॉल भी होना चाहिए मजबूत
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि टावर की क्षमता बढ़ाने के बाद उसका बैकहॉल कमजोर हो तो कोई फायदा नहीं होता है. बैकहॉल वह कनेक्शन है जो मोबाइल साइट को ऑपरेटर के मेन नेटवर्क तक कनेक्ट करता है.
इसके लिए फाइबर ऑप्टिक कनेक्शन का इस्तेमाल किया जाता है. ज्यादा ट्रैफिक वाले टावर पर फाइबर लिंक की क्षमता बढ़ाई जा सकती है ताकि टावर से आने-जाने वाला बड़ा डेटा ट्रैफिक आसानी से संभाला जा सके.
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जरूरत पड़ने पर छोटे सेल लगाए जाते हैं
अगर किसी इलाके में एक टावर पर लगातार बहुत ज्यादा ट्रैफिक रहता है तो वहां एक्सट्रा Small Cells लगाए जाते हैं. ये छोटे नेटवर्क स्टेशन कम दूरी के क्षेत्र में नेटवर्क क्षमता बढ़ाते हैं.
शॉपिंग मॉल, स्टेडियम, बाजार, एयरपोर्ट और घनी आबादी वाले इलाकों में इस तरह का नेटवर्क ज्यादा काम आते हैं. इससे मेन टावर पर दबाव कम होता है.
कितना पैसा होता है खर्च?
आपको बता दें कि 5G नेटवर्क की क्षमता बढ़ाने का खर्च किसी एक तय रकम में नहीं बताया जा सकता. ये इस बात पर निर्भर करता है कि ऑपरेटर को केवल सॉफ्टवेयर अपग्रेड करना है या नए रेडियो, एंटीना, फाइबर और दूसरे डिवाइस लगाने हैं.
एक नॉर्मल साइट पर मामूली अपग्रेड का खर्च कम होता है जबकि नए रेडियो डिवाइस, Massive MIMO सिस्टम, पावर सिस्टम और फाइबर बैकहॉल लगाने पर लागत लाखों रुपये तक पहुंच सकती है. नई साइट बनाने पर खर्च और बढ़ जाता है. इसके अलावा साइट का किराया, बिजली, मेंटेनेंस, परमिट और बैकहॉल जैसे लगातार होने वाले खर्च भी शामिल होते हैं.
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        <pubDate>Mon, 31 Aug 2026 23:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>Smart TV में कितनी होती है Storage? सच जानकर रह जाएंगे हैरान</title>
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        <description><![CDATA[ आज के समय में Smart TV सिर्फ टीवी चैनल देखने तक सीमित नहीं रह गए हैं. Netflix, YouTube, Prime Video जैसे OTT ऐप्स के साथ-साथ गेमिंग, वेब ब्राउजिंग और कई दूसरे स्मार्ट फीचर्स भी इनमें मिलते हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आपके Smart TV में आखिर कितनी Storage होती है? अगर आप मानते हैं कि टीवी में भी स्मार्टफोन की तरह 64GB या 128GB स्टोरेज होती होगी तो ऐसा बिलकुल नहीं है. आइए जानते हैं कि स्मार्ट टीवी में कितनी स्टोरेज मिलती है.
Smart TV में कितनी होती है Storage?
जानकारी के मुताबिक, Smart TV की Storage पावर उसके ऑपरेटिंग सिस्टम, मॉडल और कीमत के हिसाब से अलग-अलग होती है. नॉर्मली कई Smart TV में 8GB या 16GB की इंटरनल स्टोरेज देखने को मिलती है. कुछ एंट्री-लेवल मॉडल में इससे कम उपलब्ध स्टोरेज भी हो सकती है जबकि प्रीमियम टीवी में ज्यादा स्टोरेज मिलती है.
8GB लिखी है तो पूरी 8GB क्यों नहीं मिलती?
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अगर किसी Smart TV में 8GB इंटरनल Storage दी गई है तो इसका मतलब ये नहीं है कि आपके पास ऐप्स और दूसरे डेटा के लिए पूरे 8GB मौजूद हैं. TV का ऑपरेटिंग सिस्टम और पहले से इंस्टॉल किए गए सिस्टम ऐप्स Storage का एक हिस्सा इस्तेमाल करते हैं.
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TV में Storage का इस्तेमाल कहां होता है?
Smart TV की इंटरनल Storage कई कामों में इस्तेमाल होती है. इसमें ऑपरेटिंग सिस्टम, प्री-इंस्टॉल्ड ऐप्स, डाउनलोड किए गए ऐप्स और उनके डेटा शामिल हैं. इसके अलावा ऐप्स के कैश और कुछ बेकार की फाइलें भी स्टोरेज घेर लेती हैं.
अगर आप लगातार कई OTT या दूसरे ऐप्स इंस्टॉल करते रहते हैं तो उपलब्ध जगह धीरे-धीरे कम होती है. इससे कुछ मामलों में ऐप अपडेट करने या नया ऐप डाउनलोड करने में परेशानी भी आती है.
क्या Smart TV में Storage बढ़ाई जा सकती है?
ये आपके टीवी के मॉडल और ऑपरेटिंग सिस्टम पर निर्भर करता है. कई Smart TV में USB पोर्ट दिए जाते हैं जिनकी मदद से बाहरी USB ड्राइव या स्टोरेज डिवाइस का इस्तेमाल कुछ कामों के लिए किया जाता है. हालांकि इसे हर टीवी में इंटरनल Storage बढ़ाने का सीधा तरीका नहीं माना जाता है. इसलिए टीवी खरीदते समय केवल स्क्रीन साइज, Resolution और Picture Quality ही नहीं बल्कि RAM, इंटरनल Storage और ऑपरेटिंग सिस्टम पर भी ध्यान देना चाहिए.
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CEO के पद पर Tim Cook का आज आखिरी दिन! जानें अब कौन होगा नया लीडर ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 31 Aug 2026 23:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>कल रिटायर हो जाएंगे Tim Cook! जानें कंपनी के वो प्रोडक्ट्स जिसने इनके सफर को बनाया यादगार</title>
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        <description><![CDATA[ करीब 15 साल तक Apple की कमान संभालने के बाद Tim Cook अब कंपनी के CEO पद से हटने की तैयारी में हैं. जानकारी के अनुसार, कल यानी 31 अगस्त को कंपनी में उनका आखिरी दिन होगा. बता दें कि इससे पहले Steve Jobs ने कंपनी की कमान संभाली थी लेकिन 2011 के बाद से टिम कुक कंपनी को लेकर आ रहे थे. टिम कुक के दौर में कंपनी ने कई नए मुकाम भी हासिल किए हैं. इसी कड़ी में आज हम कंपनी के ऐसे प्रोडक्ट्स के बारे में बताने जा रहे हैं जिसने टिम कुक के सफर को काफी यादगार बनाया है.
नई जनरेशन वाला मैकबुक
आपको बता दें कि 2020 में Apple ने Mac कंप्यूटरों में Intel प्रोसेसर की जगह अपने डिजाइन किए हुए Apple Silicon चिप्स का इस्तेमाल करना शुरू किया था जो कि टिम कुक के दौर की एक बड़ी उपलब्धि में शामिल हो चुका है. इन चिप्स ने बेहतरीन परफॉर्मेंस के साथ बेहतर पावर एफिशिएंसी भी देने का काम किया है जो यूजर्स को काफी पसंद भी आ रहा है. आगे चलकर कंपनी ने इन चिप्स का इस्तेमाल iPad Pro और iPad Air जैसे डिवाइसों में भी किया है.
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कंपनी का छोटा सा ब्लूटूथ ट्रैकर
टेक्नोलॉजी की दुनिया में ज्यादातर लोग स्मार्ट डिवाइस का इस्तेमाल कर रहे हैं. इसी कड़ी में एप्पल एयरटैग कंपनी का एक बेहतरीन डिवाइस साबित हुआ है. हालांकि, इसका साइज बहुत छोटा है लेकिन ये लोगों को काफी पसंद आता है. बता दें कि ये एक Bluetooth बेस्ड ट्रैकर है जिसकी मदद से यूजर चाबी, बैग, सामान या दूसरी जरूरी चीजों की लोकेशन पता कर सकते हैं. इसके अलावा बता दें कि AirTag को Apple के Find My नेटवर्क से जोड़ने की वजह से ये काफी ज्यादा फायदेमंद बन जाता है.
कंपनी की स्मार्टवॉच
जानकारी के अनुसार, कंपनी ने 2015 में पहली बार Apple Watch को बाजार में उतारा था. इस प्रोडक्ट को मार्केट में काफी बेहतरीन रिस्पांस भी मिला जिससे ये प्रोडक्ट कंपनी के लिए एक बेहतरीन डिवाइस बन गया. बता दें कि एप्पल वॉच में यूजर्स को कई सारे प्रीमियम फीचर्स देखने को मिल जाते हैं जिनका यूजर अपनी जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल भी कर सकते हैं.
Cook की सबसे बड़ी विरासत क्या रही?
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि Tim Cook के दौर में Apple ने खुद को केवल प्रीमियम हार्डवेयर बनाने वाली कंपनी के रूप में सीमित नहीं रखा. वियरेबल्स से लेकर वायरलेस ऑडियो, कस्टम चिप्स, डिजिटल सर्विसेज और स्पैटियल कंप्यूटिंग तक कंपनी ने अपना दायरा काफी बढ़ाया.
Steve Jobs ने Apple को जिन प्रोडक्ट्स के दम पर नई पहचान दी थी, Cook ने उसी नींव को एक विशाल और आपस में जुड़े टेक्नोलॉजी इकोसिस्टम में बदलने का काम किया है. यही उनके करीब 15 साल के कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक मानी जाती है.
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        <pubDate>Mon, 31 Aug 2026 07:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>Apple TV हुआ महंगा, फिर भी नहीं देगा Ads का झंझट</title>
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        <description><![CDATA[ Apple की स्ट्रीमिंग सर्विस Apple TV, जो Ted Lasso और Severance &amp;nbsp;जैसी लोकप्रिय सीरीज के लिए जानी जाती है, उसने अपनी subscription कीमतों में बढ़ोतरी कर दी है. नई कीमतें तुरंत प्रभाव से लागू हो गई हैं. खास बात यह है कि कीमत बढ़ने के बाद भी Apple TV अपने यूजर्स को कम कीमत वाला ad-supported प्लान नहीं देगा. सब्सक्राइबर्स को पहले की तरह बिना विज्ञापनों के कंटेंट देखने के लिए ज्यादा पैसे खर्च करने होंगे.&amp;nbsp;
Apple TV की कीमत कितनी बढ़ी?
Apple TV के मंथली सब्सक्रिप्शन की कीमत अब 14.99 डॉलर यानी करीब 1,433 रुपये प्रति महीना हो गई है. इसमें पहले के मुकाबले 2 डॉलर यानी करीब 191 रुपये की बढ़ोतरी हुई है. वहीं, इसका सालाना प्लान भी महंगा हो गया है. Annual subscription की कीमत अब 119.99 डॉलर यानी करीब 11,470 रुपये प्रति साल होगी, जो पहले से 20 डॉलर यानी करीब 1,912 रुपये ज्यादा है. यह पिछले चार वर्षों में Apple की ओर से Apple TV की कीमत में की गई चौथी बढ़ोतरी है.
Apple One भी हुआ महंगा
सिर्फ Apple TV की कीमत ही नहीं बढ़ी है. कंपनी के दूसरे बंडल्स प्लान पर भी इसका असर पड़ा है. Apple One के Individual Plan की कीमत अब 21.95 डॉलर प्रति महीना हो गई है, जो पहले के मुकाबले 2 डॉलर ज्यादा है. इस प्लान में Apple Music, Apple Arcade, cloud storage और दूसरी सुविधाओं का access मिलता है.&amp;nbsp;
Apple TV पर नहीं मिलेगा Ad-Supported प्लान
Apple TV की खास बात यह है कि कंपनी अपने कॉम्पिटिटर्स की तरह कोई सस्ता ad-tier नहीं देती है. कई स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म कम कीमत वाला सब्सक्रिप्शन ऑफर करते हैं, जिसमें यूजर्स को कंटेंट के दौरान advertisements देखने पड़ते हैं. Apple ने अभी ऐसा कोई ऑप्शन नहीं दिया है. कीमत बढ़ने के बाद भी Apple TV पर विज्ञापनों वाला सस्ता प्लान उपलब्ध नहीं होगा.&amp;nbsp;
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दूसरे स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म ने भी बढ़ाए दाम&amp;nbsp;Apple TV इस समय अकेली स्ट्रीमिंग सर्विस &amp;nbsp;नहीं है जिसने कीमत बढ़ाई है. इस महीने की शुरुआत में Peacock ने भी अपने स्ट्रीमिंग प्राइज बढ़ाए. NBA और NFL के नए सीजन से पहले इसके ad-tier की कीमत 10.99 डॉलर से बढ़कर 12.99 डॉलर यानी करीब 1,242 रुपये प्रति महीना हो गई है. वहीं, इसके सबसे महंगे प्लान की कीमत अब 19.99 डॉलर यानी करीब 1,912 रुपये प्रति महीना है, जो 3 डॉलर यानी करीब 287 रुपये बढ़ी है. इसके अलावा ESPN भी सितंबर में अपनी स्ट्रीमिंग प्राइज बढ़ाने वाला है. इइस साल Amazon Prime Video, Netflix और YouTube Premium भी अपनी कीमतों में बढ़ोतरी कर चुके हैं.
Apple TV की शुरुआत कितनी कीमत से हुई थी?
Apple TV+ को साल 2019 में 4.99 डॉलर प्रति महीना की शुरुआती कीमत के साथ लॉन्च किया गया था. उस समय इसे Apple यूजर्स के लिए कम कीमत वाली स्ट्रीमिंग &amp;nbsp;सुविधा के तौर पर देखा गया था. कंपनी अभी भी नया Apple डिवाइस खरीदने वाले यूजर्स को तीन महीने का free trial देती है.
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        <pubDate>Mon, 31 Aug 2026 07:30:10 +0530</pubDate>
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        <media:keywords>Apple, हुआ, महंगा, फिर, भी, नहीं, देगा, Ads, का, झंझट</media:keywords>
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        <title>PlayStation Plus यूजर्स की मौज! सितंबर में मिलेंगे ये 4 Games</title>
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        <description><![CDATA[ गेमर्स के लिए सितंबर की शुरुआत काफी खास होने वाली है. अगर आपके पास PlayStation Plus का सब्सक्रिप्शन है, तो आने वाले महीने में आपको अलग-अलग जॉनर के चार गेम अपनी लाइब्रेरी में जोड़ने का मौका मिलेगा. Sony Interactive Entertainment ने सितंबर 2026 के PlayStation Plus Monthly Games लाइनअप का ऐलान किया है. इस बार लिस्ट में स्पोर्ट्स, स्नाइपर-शूटर, ओपन-वर्ल्ड सैंडबॉक्स और JRPG जैसे अलग-अलग तरह के गेम शामिल हैं. खास बात यह है कि ये चारों गेम 1 सितंबर 2026 से 5 अक्टूबर 2026 तक लाइब्रेरी में ऐड किए जा सकेंगे. एक बार गेम को अपनी लाइब्रेरी में ऐड कर लिया, तो वह आपके पास लंबे समय तक रहेगा.&amp;nbsp;
सितंबर में मिलेंगे ये 4 Games
1. &amp;nbsp;Sniper Elite - इस लिस्ट में Sniper Elite, Resistance PS5 और PS4 के लिए उपलब्ध होगा. गेम में स्नाइपिंग, स्टील्थ और टेक्टिकल थर्ड-पर्सन कॉम्बेट का एक्सपीरियंस मिलता है. इसकी कहानी ऑक्यूपाइड फ्रांस में छिपी एक जंग पर आधारित है और यह Sniper Elite 5 की कहानी के साथ-साथ चलती है. गेम का पूरा campaign co-op में खेला जा सकता है. इसमें Axis Invasion mode भी वापस आया है, जहां खिलाड़ी दूसरे की Campaign में Axis sniper बनकर शामिल हो सकता है. इसके अलावा 16-player online battles और Survival mode भी मौजूद हैं.&amp;nbsp;
2. MLB The Show 26 - MLB The Show 26 PS5 पर उपलब्ध होगा. इसमें खिलाड़ी अपने करियर की शुरुआत MLB Draft Combine से कर सकते हैं और Road To The Show में आगे बढ़ सकते हैं. गेम में 11 नए college teams भी शामिल हैं. इसके अलावा Diamond Dynasty में अलग-अलग दौर के MLB खिलाड़ियों की टीम तैयार की जा सकती है. PlayStation Plus members को MLB The Show 26 Jump Start Bundle का एक्सक्लूसिव एक्सेस भी मिलेगा, जिसमें 5 The Show Packs, 1 Equipment Pack और Jumpstart Choice Pack शामिल हैं.&amp;nbsp;
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3. Wobbly Life - Wobbly Life PS5 और PS4 पर मिलेगा. इसमें खिलाड़ी अकेले या तीन अन्य खिलाड़ियों के साथ ऑनलाइन या लोकल स्प्लिट-स्क्रीन co-op खेल सकते हैं. यह एक open-world sandbox है, जिसमें mini-games, toys और secrets मौजूद हैं. गेम में स्टोरी मिशन के साथ Arcade mode भी है. Trash Zone, Hide &amp;amp; Seek, Wobble Run और Sandbox जैसे नए game modes भी खेले जा सकते हैं.&amp;nbsp;
4. Chained Echoes - Chained Echoes PS4 के लिए उपलब्ध होगा. यह एक story-driven single-player JRPG है, जिसमें हीरो का एक ग्रुप Valandis महाद्वीप में तीन kingdoms के बीच चल रहे युद्ध को खत्म करने के लिए सफर करता है. गेम में अलग-अलग इलाके और रहस्यमयी जगहें देखने को मिलती हैं. इसमें sword, magic और Mech का इस्तेमाल किया जा सकता है. इसका visual style 16-bit Golden Era RPG जैसा है, जबकि इसकी फैंटसी दुनिया में ड्रेगन्स और मैकेनिकल सूट्स दोनों मौजूद हैं.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Mon, 31 Aug 2026 07:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>boAt ने Earbuds को बनाया AI Gadget, Gemini करेगा बातचीत</title>
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        <description><![CDATA[ अब Earbuds सिर्फ गाने सुनने और कॉल रिसीव करने तक सीमित नहीं रहने वाले हैं. boAt ने ऑडियो डिवाइसेज को AI से जोड़ते हुए अपना नया Crest AI प्लेटफॉर्म लॉन्च किया है. इस प्लेटफॉर्म को Google Cloud के साथ मिलकर तैयार किया गया है और इसमें Google Gemini की AI क्षमता का इस्तेमाल किया गया है. कंपनी का कहना है कि Crest AI रियल टाइम में जटिल सवालों को समझकर यूजर्स के साथ बातचीत कर सकेगा. boAt का यह नया प्लेटफॉर्म कंपनी के ऑडियो डिवाइसेज को वॉयस आधारित और ज्यादा पर्सनलाइज्ड AI एक्सपीरियंस से जोड़ता है. इसके जरिए यूजर्स अपने डिवाइस के साथ सामान्य बातचीत की तरह बात कर सकेंगे.&amp;nbsp;
Gemini Live से होगी बातचीत
Crest AI में Gemini Live को इंटीग्रेट किया गया है. इसकी मदद से यूजर्स Crest AI वाले डिवाइसेज के साथ नेचुरल और लगातार बातचीत कर सकेंगे. इसका मकसद पारंपरिक हार्डवेयर और AI कंप्यूटिंग के बीच की दूरी को कम करना है. boAt और Google Cloud की यह साझेदारी भारत में अलग-अलग लैंग्वेज और बोलियों के यूजर्स तक प्रीमियम AI फीचर्स पहुंचाने पर भी फोकस करती है. इसके लिए Google Cloud के इंफ्रास्ट्रक्चर और Gemini Enterprise Agent Platform का इस्तेमाल किया जाएगा.&amp;nbsp;
Gmail और Calendar भी होंगे कंट्रोल
Crest AI डिवाइसेज को Google Workspace के साथ इंटीग्रेट किया जाएगा. इसके जरिए यूजर्स बिना हाथ लगाए Gmail, Google Tasks और Google Calendar जैसे टूल्स को मैनेज कर सकेंगे. ईमेल से जुड़े काम, टास्क और कैलेंडर से जुड़े जरूरी काम वॉयस कमांड के जरिए किए जा सकेंगे. इसके अलावा ईमेल का जवाब देने और मीटिंग शेड्यूल करने जैसे कामों के लिए भी वॉयस कमांड का इस्तेमाल किया जा सकेगा.&amp;nbsp;
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Crest Translate और Crest Ask क्या करेंगे?
Crest AI में दो खास फीचर्स भी शामिल हैं. Crest Translate रियल टाइम में दो तरफा लैंग्वेज ट्रांसलेशन की सुविधा देगा. इससे अलग-अलग लैंग्वेज बोलने वाले लोगों के बीच बातचीत आसान हो सकेगी. वहीं Crest Ask बातचीत के जरिए सवालों के जवाब देने, सीखने, नए आइडिया तैयार करने और रोजमर्रा के सवालों में मदद करेगा.
boAt और Google Cloud ने क्या कहा?
boAt के CEO गौरव नैयर के मुताबिक, Google Gemini को Crest AI डिवाइसेज में जोड़कर कंपनी सामान्य वॉयस असिस्टेंट से आगे बढ़कर ऐसे conversational agents तैयार कर रही है, जो वॉयस सवालों, डिवाइस कंट्रोल, म्यूजिक प्लेबैक, प्रोडक्टिविटी, लैंग्वेज और FAQ सपोर्ट में मदद कर सकें. Google Cloud के इंफ्रास्ट्रक्चर की मदद से boAt इस तकनीक को भारत में लाखों यूजर्स तक पहुंचाने की क्षमता रखता है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Mon, 31 Aug 2026 07:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>Subscription से EMI तक, ऐसे सेट करें UPI AutoPay</title>
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        <pubDate>Mon, 31 Aug 2026 07:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>BSNL में कितना Data बचा? चेक करने के ये हैं आसान तरीके</title>
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        <description><![CDATA[ BSNL में कितना Data बचा? चेक करने के ये हैं आसान तरीके ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 30 Aug 2026 18:30:18 +0530</pubDate>
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        <title>फोन का Cache कर दिया साफ फिर भी नहीं बढ़ी स्पीड! जानिए क्या है वजह</title>
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        <description><![CDATA[ स्मार्टफोन इस्तेमाल करते समय आपने अक्सर सुना होगा कि फोन स्लो हो गया है तो उसका Cache साफ कर दें. कई लोग इसे फोन की स्पीड बढ़ाने का आसान तरीका मानते हैं. लेकिन हर बार Cache हटाने से फोन तेज हो जाए, ऐसा जरूरी नहीं है. कई मामलों में Cache साफ करने के बाद कुछ समय के लिए फोन और स्लो काम करने लगता है. आखिर ऐसा क्यों होता है और Cache क्लियर करने की ट्रिक कब काम आती है? आइए समझते हैं.
क्या होता है फोन का Cache?
दरअसल, Cache असल में फोन या ऐप द्वारा छोड़े गए बेकार के डेटा को सेव करता है. इसका मकसद किसी ऐप या वेबसाइट को अगली बार तेजी से लोड करने में मदद करना है. जैसे मान लिजिए किसी सोशल मीडिया ऐप में इस्तेमाल होने वाली कुछ फोटोज, थंबनेल और दूसरे जरूरी डेटा का रिकॉर्ड Cache में रखा जा सकता है. इससे ऐप को हर बार वही डेटा इंटरनेट या स्टोरेज से दोबारा तैयार नहीं करना पड़ता और ऐप जल्दी खुल जाता है.
Cache साफ करने से Speed क्यों नहीं बढ़ती?
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि Cache को डिलीट करने से फोन की प्रोसेसिंग पावर अचानक नहीं बढ़ती है. न ही इससे प्रोसेसर तेज हो जाता है या RAM की पावर बढ़ जाती है. इसलिए अगर आपका फोन किसी दूसरे कारण से स्लो है तो Cache क्लियर करने से समस्या का समाधान नहीं होगा.
बल्कि Cache हटाने के बाद ऐप को जरूरी फाइलें दोबारा बनानी या डाउनलोड करनी पड़ती हैं. इस वजह से पहली बार ऐप खोलने पर वह नॉर्मल से थोड़ा स्लो लोड हो सकता है.
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फिर Cache साफ करने का फायदा क्या है?
इसका मतलब ये बिल्कुल नहीं है कि Cache क्लियर करना बेकार है. अगर किसी ऐप का Cache बहुत ज्यादा बढ़ गया है या उसमें खराब/पुराना डेटा जमा हो गया है तो उसे साफ करने से ज्यादातर केस में समस्या ठीक हो जाती है.
मसलन, अगर कोई ऐप बार-बार क्रैश हो रहा है, कंटेंट सही तरीके से लोड नहीं कर रहा या किसी फीचर में दिक्कत आ रही है तो Cache क्लियर करना एक आसान तरीका साबित हो सकता है.
फोन स्लो होने की असली वजह क्या हो सकती है?
बता दें कि फोन की Speed कम होने के पीछे कई कारण हो सकते हैं. सबसे आम वजहों में स्टोरेज का लगभग भर जाना, बहुत सारे बैकग्राउंड ऐप्स, पुराना सॉफ्टवेयर और कमजोर या पुरानी बैटरी शामिल हैं.
अगर फोन की Internal Storage लगभग पूरी भर चुकी है तो सिस्टम को फाइलें बनाने और दूसरे जरूरी काम करने में परेशानी होती है. ऐसे में सिर्फ Cache हटाने के बजाय गैर-जरूरी फोटो, वीडियो, डाउनलोड और ऐप्स को हटाना ज्यादा बेहतर ऑप्शन माना जाता है.
बार-बार Cache साफ करना सही है?
नॉर्मली हर दिन या बार-बार Cache साफ करने की जरूरत नहीं होती है. Android खुद भी कई कंडिशन में टेंपररी डेटा को मैनेज करता है. बिना जरूरत Cache हटाते रहने से ऐप्स को वही डेटा दोबारा तैयार करना पड़ता है जिससे एक्सट्रा प्रोसेसिंग और कभी-कभी डेटा की खपत होती है.
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        <pubDate>Sun, 30 Aug 2026 18:30:17 +0530</pubDate>
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        <title>Facebook पर कब वीडियो पोस्ट करने पर सबसे ज्यादा व्यूज आते हैं? जानें पूरा हिसाब</title>
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        <description><![CDATA[ Facebook पर वीडियो पोस्ट करने के बाद अगर व्यूज उम्मीद के मुताबिक नहीं आते हैं तो इसकी वजह हमेशा कंटेंट की क्वालिटी नहीं होती है. कई बार वीडियो पोस्ट करने का सही समय भी इसकी पहुंच और शुरुआती engagement पर असर डालता है. हालांकि, सभी क्रिएटर्स के लिए एक ही समय सबसे बेहतर नहीं माना जाता है. अलग-अलग ऑडियंस के ऑनलाइन आने का पैटर्न अलग होता है. इसीलिए आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि फेसबुक पर कब वीडियो पोस्ट करने पर सबसे ज्यादा व्यूज आएंगे.
सुबह का समय क्यों हो सकता है फायदेमंद?
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि कई सोशल मीडिया एनालिसिस में Facebook पर सुबह के घंटे अच्छे engagement वाले समय के रूप में सामने आए हैं. खासकर सप्ताह के दिनों में सुबह 8 बजे से दोपहर तक का समय वीडियो पोस्ट करने के लिए अच्छा शुरुआती स्लॉट माना जाता है. एक हालिया एनालिसिस में सुबह 9 बजे को खास तौर पर पोस्ट करने के लिए एक सही समय बताया जाता है.
अगर आपकी ऑडियंस नौकरी या पढ़ाई करती है तो सुबह उठने के बाद और काम शुरू करने से पहले लोग सोशल मीडिया चेक करते हैं. इसलिए सुबह 8 से 11 बजे के बीच वीडियो पोस्ट करके टेस्ट करना एक सही तरीका माना जाता है.
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शाम का समय भी हो सकता है गेमचेंजर
भारत में मनोरंजन, न्यूज, कॉमेडी और शॉर्ट वीडियो जैसे कंटेंट के लिए शाम का समय भी बहुत जरूरी होता है. काम या पढ़ाई खत्म होने के बाद लोग फोन पर ज्यादा समय बिताते हैं. कुछ 2026 के एनालिसिस शाम 6 से 8 बजे के बीच Facebook पर पोस्ट करने को शुरुआती टेस्टिंग विंडो के तौर पर सुझाते हैं. इसलिए अगर आपका कंटेंट मनोरंजन या वायरल वीडियो कैटेगरी में है तो इस समय को जरूर आजमाना चाहिए.
कौन से दिन वीडियो डालना बेहतर?
दरअसल, जानकारी के अनुसार, नॉर्मल आंकड़ों में मंगलवार से गुरुवार तक Facebook पर engagement ज्यादातर बेहतर दिखाई देती है. बुधवार को कई स्टडी में अच्छे परफॉर्मेंस वाला दिन बताया गया है. ऐसे में आप भी एक आसान शेड्यूल से शुरुआत कर सकते हैं.
असली राज Facebook Insights में छिपा है
सबसे जरूरी बात ये है कि दूसरों के बताए समय को आंख बंद करके फॉलो न करें. आपके Facebook पेज की ऑडियंस किस समय सबसे ज्यादा एक्टिव रहती है, इसके डेटा को चेक करना सही तरीका माना जाता है.
लगातार कुछ हफ्तों तक अलग-अलग समय पर वीडियो पोस्ट करें और देखें कि किस स्लॉट में ज्यादा views, watch time, reactions, comments और shares मिलते हैं. जिस समय लगातार बेहतर रिजल्ट्स आएं, उसी समय को अपने शेड्यूल में लाना चाहिए.
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        <pubDate>Sun, 30 Aug 2026 18:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>China का Kimi K3 vs OpenAI, AI रेस में कौन आगे?</title>
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        <description><![CDATA[ चीन की AI स्टार्टअप Moonshot AI ने Kimi K3 नाम का नया मॉडल पेश करके टेक इंडस्ट्री में हलचल बढ़ा दी है. मॉडल की चर्चा इतनी तेजी से हुई कि कुछ ही दिनों में अमेरिका की AI बढ़त को लेकर भी सवाल उठने लगे. अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या China AI की रेस में US के करीब पहुंच गया है. ऐसे में आइए जानते हैं कि China का Kimi K3 vs OpenAI के बीच AI रेस में कौन आगे है.&amp;nbsp;
Kimi K3 क्या है?
Moonshot AI का Kimi K3 एक बड़ा AI मॉडल है, जिसमें कुल 2.8 ट्रिलियन पैरामीटर हैं. इसे अब तक जारी किए गए सबसे बड़े ओपन मॉडल के तौर पर पेश किया गया है. हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि हर बार मॉडल के सभी 2.8 ट्रिलियन पैरामीटर इस्तेमाल होते हैं. Kimi K3 में Mixture of Experts यानी MoE तकनीक का इस्तेमाल किया गया है.
इसमें 896 छोटे एक्सपर्ट नेटवर्क हैं, जिनमें से किसी एक काम के लिए सिर्फ 16 एक्टिव किए जाते हैं. इससे इतने बड़े मॉडल को चलाने के लिए जरूरी कंप्यूटिंग कम रखी जा सकती है. मॉडल एक बार में करीब 10 लाख टोकन तक का टेक्स्ट पढ़ और याद रख सकता है. इससे लंबे कोडबेस या बड़ी संख्या में लीगल डॉक्यूमेंट्स जैसे कंटेंट को एक साथ समझने में मदद मिल सकती है.&amp;nbsp;
China का Kimi K3 vs OpenAI के बीच AI रेस में कौन आगे है?
Moonshot AI ने खुद माना है कि Kimi K3 ओवरऑल परफॉर्मेंस में OpenAI के नए GPT-5.6 Sol और Anthropic के Claude Fable 5 से पीछे है, हालांकि अंतर बहुत बड़ा नहीं है. टेस्टिंग में Kimi K3 ने Claude Opus 4.8 और OpenAI GPT-5.5 जैसे मॉडल्स को कड़ी टक्कर दी, कुछ कोडिंग बेंचमार्क में इसने दोनों से बेहतर प्रदर्शन भी किया. Arena AI की एक रैंकिंग में यह फ्रंट-एंड वेब डेवलपमेंट में Claude Fable 5 से आगे पहले नंबर पर रहा.यही वजह है कि Kimi K3 को लेकर AI इंडस्ट्री में चर्चा तेज हुई है.&amp;nbsp;
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China का Kimi K3 vs OpenAI कीमत और पहुंच
Kimi K3 की सबसे बड़ी खासियत इसकी कीमत भी है. Moonshot AI इनपुट के लिए 1 मिलियन टोकन पर 3 डॉलर और आउटपुट के लिए 15 डॉलर चार्ज कर रहा है. वहीं GPT-5.6 Sol के लिए OpenAI की कीमत 5 डॉलर और 30 डॉलर है. इसके अलावा Kimi K3 के पूरे मॉडल वेट्स को सार्वजनिक करने की भी योजना है. इससे डेवलपर्स हर बार क्लाउड सर्विस के लिए भुगतान करने की जगह इसे अपने सर्वर पर चला सकेंगे.&amp;nbsp;
OpenAI अभी भी क्यों मजबूत है?
China की AI स्टार्टअप Moonshot AI का Kimi K3 मॉडल लॉन्च होते ही AI इंडस्ट्री में चर्चा का बड़ा विषय बन गया है. इस मॉडल ने अपनी क्षमता, ओपन-वेट अप्रोच और कम कीमत की वजह से सबका ध्यान खींचा है. Kimi K3 की बढ़ती चर्चा के बाद भी OpenAI की बढ़त खत्म नहीं हुई है. GPT-5.6 के साथ ChatGPT, कोडिंग टूल्स, फाइल हैंडलिंग, वेब ब्राउजिंग और एंटरप्राइज फीचर्स का पूरा इकोसिस्टम मौजूद है. Kimi K3 अभी इन सभी सुविधाओं और पॉलिश के स्तर पर पीछे है. चीन का फोकस ज्यादा सस्ता और ओपन AI उपलब्ध कराने पर है, जबकि अमेरिका अभी भी फ्रंटियर AI रिसर्च, सेमीकंडक्टर डिजाइन, क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर और कमर्शियलाइजेशन में मजबूत स्थिति में है.
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        <pubDate>Sun, 30 Aug 2026 18:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>Xiaomi 18 Fold में होगी China की LPDDR6 Chip, जानें खासियत</title>
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        <description><![CDATA[ Xiaomi के अपकमिंग फोल्डेबल फोन को लेकर एक बड़ी जानकारी सामने आई है. कंपनी के नए फ्लैगशिप फोल्डेबल फोन Xiaomi 18 Fold में चीन की प्रमुख मेमोरी चिप कंपनी ChangXin Memory Technologies यानी CXMT की नई LPDDR6 DRAM चिप इस्तेमाल की जाएगी. इन दोनों कंपनियों ने इस बात की पुष्टि की है. यह फोन सितंबर 2026 में लॉन्च किया जाएगा. ऐले में आइए जानते हैं Xiaomi 18 Fold में मिलने वाली इस नई मेमोरी चिप की खासियत क्या है.&amp;nbsp;
Xiaomi 18 Fold में मिलेगी LPDDR6 चिप
CXMT ने अपनी नई LPDDR6 DRAM चिप का बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन शुरू कर दिया है. कंपनी के मुताबिक, यह चिप Xiaomi के नए 18 Fold फोल्डेबल फोन में इस्तेमाल की जाएगी. Xiaomi ने भी अपने आधिकारिक Weibo अकाउंट के जरिए इसकी पुष्टि की है. LPDDR6 को CXMT की मोबाइल डिवाइस के लिए सबसे एडवांस्ड DRAM मेमोरी चिप बताया गया है. खास बात यह है कि कंपनी ने पिछली पीढ़ी की LPDDR5 चिप का बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन शुरू करने के एक साल से भी कम समय बाद LPDDR6 का प्रोडक्शन शुरू किया है.&amp;nbsp;
Xiaomi 18 Fold में LPDDR6 चिप की खासियत क्या है?
नई LPDDR6 चिप के आने से CXMT मोबाइल मेमोरी टेक्नोलॉजी में Samsung और SK Hynix जैसी ग्लोबल कंपनियों के करीब पहुंच रही है. कंपनी ने LPDDR6 के सैंपल मोबाइल डिवाइस, सर्वर और स्मार्ट कारों के लिए यूजर्स को भेजे हैं. Xiaomi 18 Fold में कंपनी का अपना 3nm XRING O3 प्रोसेसर भी मिलने की उम्मीद है. Xiaomi के मुताबिक, प्रोसेसर LPDDR6 मेमोरी को सपोर्ट करेगा. रिपोर्ट के अनुसार, XRING O3 ने AnTuTu पर 52.2 लाख का स्कोर किया है.&amp;nbsp;
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नया GPU और तेज मेमोरी
ग्राफिक्स के लिए XRING O3 में नया G2-Ultra NX GPU दिया गया है. कंपनी का दावा है कि यह पुराने GPU की तुलना में 85 फीसदी बेहतर ग्राफिक्स दे सकता है. XRING O3 की एक खास बात इसका LPDDR6 सपोर्ट है. इससे मेमोरी स्पीड 113.8GB/s तक पहुंच सकती है, जो XRING O1 के मुकाबले करीब 48 फीसदी ज्यादा है. इसके अलावा नए यूनिफाइड फ्यूजन बस डिजाइन और बेहतर मेटल वायरिंग की वजह से लेटेंसी 82ns तक कम होने की बात कही गई है.&amp;nbsp;
सितंबर में लॉन्च होगा Xiaomi 18 Fold
Xiaomi ने पहले ही संकेत दिया है कि उसका नया फोल्डेबल फोन सितंबर 2026 में लॉन्च होगा. सामने आई तस्वीरों में फोन रेड कलर में नजर आया है और पीछे की तरफ लंबा कैमरा बार दिखाई देता है, जिसमें तीन कैमरे और एक LED फ्लैश मौजूद हैं. Xiaomi 18 Fold में LPDDR6 मेमोरी, XRING O3 प्रोसेसर और नया GPU इसे कंपनी के अब तक के खास फोल्डेबल डिवाइस में शामिल कर सकते हैं.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Sun, 30 Aug 2026 18:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Xiaomi, Fold, में, होगी, China, की, LPDDR6, Chip, जानें, खासियत</media:keywords>
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        <title>फोन अपडेट करने के बाद Restart करना जरूरी है? जानिए पूरी सच्चाई</title>
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        <description><![CDATA[ स्मार्टफोन में समय-समय पर सॉफ्टवेयर अपडेट आते रहते हैं. इन अपडेट के जरिए कंपनियां नए फीचर्स देने के साथ-साथ सिक्योरिटी कमजोरियों को ठीक करती हैं और फोन की परफॉर्मेंस बेहतर बनाने की कोशिश करती हैं. लेकिन अपडेट इंस्टॉल करने के बाद एक सवाल अक्सर सामने आता है कि क्या फोन को Restart करना भी जरूरी है? आइए समझते हैं कि अपडेट के बाद फोन रीस्टार्ट करने का क्या फायदा है और किन कंडिशन में ऐसा करना चाहिए.
हर अपडेट के बाद Restart जरूरी नहीं
आपको बता दें कि सबसे पहले ये समझना जरूरी है कि हर सॉफ्टवेयर अपडेट के बाद फोन को मैन्युअली Restart करना जरूरी नहीं होता है. आज के ज्यादातर Android और iPhone अपडेट इंस्टॉलेशन के दौरान ही जरूरी सिस्टम प्रोसेस को पूरा कर लेते हैं.
कई बार अपडेट इंस्टॉल करने के बाद फोन खुद ही Restart हो जाता है. ऐसी कंडिशन में दोबारा फोन बंद करके चालू करने की जरूरत नहीं होती है.
यह भी पढ़ें: फोन चार्जिंग से निकलते समय ज्यादातर लोग करते हैं ये गलती? जानें खतरा
फिर Restart करने की सलाह क्यों दी जाती है?
अपडेट के बाद Restart करने का सबसे बड़ा फायदा ये है कि फोन का सिस्टम नए सॉफ्टवेयर के साथ एक बार नए सिरे से लोड हो जाता है. इससे अपडेट के बाद बैकग्राउंड में चल रहे पुरानी प्रोसेस बंद हो सकते हैं और सिस्टम कंपोनेंट्स दोबारा सही तरीके से शुरू हो जाते हैं. अगर अपडेट के बाद फोन में हल्की परेशानी महसूस हो रही है तो Restart करना एक आसान उपाय माना जाता है.
इन समस्याओं में जरूर करें Restart
अगर अपडेट के बाद फोन पहले जैसा काम नहीं कर रहा है तो एक बार Restart करना फायदेमंद होता है.

फोन थोड़ा Slow या Lag कर रहा हो.
कोई ऐप बार-बार Crash हो रहा हो.
Wi-Fi या Bluetooth कनेक्शन में दिक्कत आ रही हो.
नोटिफिकेशन समय पर नहीं मिल रहे हों.
बैटरी या परफॉर्मेंस में अचानक अजीब बदलाव दिख रहा हो.
फोन के किसी नए फीचर ने काम करना बंद कर दिया हो.

अगर अपडेट के बाद आपको भी ऐसी समस्याएं सामने आ रही हैं तो ऐसी कंडिशन में Restart करने से सिस्टम की गड़बड़ियां दूर हो जाती हैं.
बड़े System Update में ज्यादा कारगर
अगर आपने केवल छोटा सिक्योरिटी पैच या मामूली अपडेट इंस्टॉल किया है तो अलग से Restart करने की जरूरत नॉर्मली नहीं होती है. वहीं, Android या iOS का बड़ा वर्जन अपडेट इंस्टॉल करने के बाद फोन को एक बार Restart करना कारगर साबित हो सकता है. खासकर तब जब फोन खुद Restart न हुआ हो.
बड़े अपडेट में सिस्टम के कई हिस्सों में बदलाव होते हैं. ऐसे में एक नया सिस्टम सेशन शुरू करने से ये सुनिश्चित करने में मदद मिलती है कि सभी जरूरी प्रोसेस ठीक से लोड हो गई हैं.
Restart करने से क्या फोन तेज हो जाएगा?
ऐसा बिलकुल भी जरूरी नहीं है. Restart कोई ऐसा जादुई तरीका नहीं है जिससे अपडेट के बाद फोन हमेशा तेजी से काम करने लगेगा. हालांकि, अगर समस्या किसी सिस्टम प्रोसेस, अटके हुए ऐप या बैकग्राउंड सर्विस की वजह से है तो Restart के बाद फोन नॉर्मल हो जाता है.
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        <pubDate>Sun, 30 Aug 2026 02:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>2026 के अपकमिंग Smartphones की पूरी लिस्ट, देखें कब होंगे लॉन्च</title>
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        <description><![CDATA[ अगर आप 2026 में नया स्मार्टफोन खरीदने का प्लान बना रहे हैं तो जल्दबाजी में फैसला लेना सही नहीं होगा. इस साल स्मार्टफोन कंपनियां AI फीचर्स, तेज प्रोसेसर, बेहतर कैमरा सिस्टम, ज्यादा पावरफुल और बेहतर बैटरी तकनीक के साथ कई नए मॉडल लाने की तैयारी में हैं. Apple, Samsung, OnePlus, Xiaomi, Vivo, Google, Oppo और Nothing जैसे बड़े ब्रांड्स के कई स्मार्टफोन बाजार में दस्तक देने वाले हैं.
हालांकि, दूसरी तरफ बढ़ती मेमोरी चिप की कीमतों का असर फोन की कीमतों पर भी दिखाई दे रहा है. ऐसे में नया फोन खरीदने से पहले यह जानना जरूरी है कि कौन-सा मॉडल कब लॉन्च हो सकता है और उसमें क्या खास मिल सकता है.&amp;nbsp;
2026 के अपकमिंग Smartphones की पूरी लिस्ट
1. 2026 के प्रमुख अपकमिंग Smartphones की लिस्ट में iPhone 18 Pro शामिल है, जिसकी अनुमानित शुरुआती कीमत 1,39,900 रुपये हो सकती है और इसे 9 सितंबर 2026 में लॉन्च किए जाने की उम्मीद है.
2. वहीं Samsung Galaxy S26 Ultra की कीमत 1,29,999 रुपये से शुरू होने की उम्मीद है और इसका लॉन्च जनवरी-फरवरी 2026 के दौरान बताया गया है.&amp;nbsp;
3. OnePlus 14 को अक्टूबर 2026 में लॉन्च किया जा सकता है और इसकी अनुमानित कीमत 69,999 रुपये से शुरू हो सकती है. इसमें high-refresh-rate AMOLED display, fast charging, Snapdragon processor और advanced cooling system मिलने की उम्मीद है.&amp;nbsp;
4. Xiaomi 16 Pro की अनुमानित कीमत 79,999 रुपये से शुरू हो सकती है और इसे 2026 की चौथी तिमाही में लॉन्च किए जाने की उम्मीद है. इसमें Leica-powered camera setup, HyperOS improvements, बड़ी battery और fast charging जैसे फीचर्स मिल सकते हैं.&amp;nbsp;
5. Vivo X300 Pro को अक्टूबर या नवंबर 2026 में लॉन्च किया जा सकता है. इसकी अनुमानित कीमत 94,999 रुपये से शुरू हो सकती है. &amp;nbsp;इसमें ZEISS camera system, AI portrait photography और enhanced night photography जैसे फीचर्स मिलने की उम्मीद है.&amp;nbsp;
किसके लिए कौन-सा फोन बेहतर?
अगर आपकी प्रिफरेंस कैमरा और पोट्रेट फोटोग्राफी है, तो ऐसे यूजर्स के लिए Vivo X300 Pro जैसा कैमरा-केंद्रित स्मार्टफोन बेहतर ऑप्शन हो सकता है. गेमिंग और हाई प्रफोर्मेंस चाहने वाले यूजर्स OnePlus 14 &amp;nbsp;पर नजर रख सकते हैं. इसमें तेज Performance और बेहतर गेमिंग एक्सपीरियंस पर फोकस रहने की उम्मीद है. AI फीचर्स और स्मार्ट सॉफ्टवेयर एक्सपीरियंस को प्रिफरेंस देने वाले यूजर्स के लिए iPhone 18 Pro फोन खास हो सकता है. अगर आप प्रीमियम डिजाइन और फ्लैगशिप जैसे फीचर्स चाहते हैं, लेकिन बहुत ज्यादा कीमत नहीं देना चाहते, तो Xiaomi 16 Pro बेहतर वैल्यू दा सकता है.
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Smartphones की कीमतें क्यों बढ़ सकती हैं?
2026 में स्मार्टफोन बाजार के लिए तस्वीर थोड़ी अलग है. Counterpoint Research के अनुसार, भारत में Q2 2026 में smartphone shipments सालाना आधार पर करीब 10 फीसदी कम हुईं. Omdia के tracking data में भी Q2 में 13 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई. इसके साथ ही DRAM और NAND flash memory की बढ़ती कीमतों का असर smartphones पर पड़ा है. Counterpoint Research के अनुसार, जून 2026 के लास्ट तक स्मार्टफोन की औसत कीमतों में करीब 15 फीसदी की बढ़ोतरी हो चुकी थी.
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        <pubDate>Sun, 30 Aug 2026 02:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>काम नहीं कर रहे Spy Camera Detector? स्टडी में हुआ चौकाने वाला खुलासा</title>
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        <description><![CDATA[ आज के समय में हिडन कैमरे, माइक्रोफोन और GPS ट्रैकर खरीदना पहले के मुकाबले काफी आसान हो गया है. ऐसे में प्राइवेसी को लेकर भी लोगों में चिंता बढ़ी है. अब ज्यादातर लोग ऐसे डिवाइस को सर्च करने के लिए बाजार में मिलने वाले स्पाई-डिवाइस डिटेक्टर का इस्तेमाल करते हैं. हालांकि, एक नई रिसर्च ने इन गैजेट्स के काम करने के ऊपर गंभीर सवाल खड़े किए हैं.
करीब 60% डिवाइस पकड़ नहीं पाए डिटेक्टर
यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन (UCL) के शोधकर्ताओं ने 19 अलग-अलग कमर्शियल डिटेक्टरों को चेक किया है. इसका मकसद ये पता लगाना था कि आम लोग असली कंडिशन में इन डिवाइस की मदद से छिपे हुए सर्विलांस गैजेट्स को कितनी अच्छी तरह खोज सकते हैं.
रिसर्च में सामने आया कि डिटेक्टर इस्तेमाल करने के बावजूद पार्टिसिपेंट्स करीब 58.8% छिपे हुए सर्विलांस डिवाइस खोजने में नाकाम रहे हैं. वहीं, जब लोगों ने सिर्फ अपनी आंखों से कमरे की तलाशी ली तो वे 66.7% डिवाइस नहीं खोज पाए थे.
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डिटेक्टर चलाना ही बन जाता है चुनौती
आपको बता दें कि कई स्पाई-डिवाइस डिटेक्टर रेडियो-फ्रीक्वेंसी या दूसरे इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल पर काम करते हैं. ऐसे में अब ज्यादातर लोग इन डिवाइस को आसानी से इस्तेमाल भी नहीं कर पाते हैं.
रिसर्च में शामिल 34 लोगों को ऐसे कमरों में छिपे डिवाइस खोजने का काम दिया गया जिनमें फर्नीचर, इलेक्ट्रॉनिक्स और रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली कई चीजें मौजूद थीं.
शोधकर्ताओं के अनुसार, डिटेक्टर स्क्रीन पर सिग्नल स्ट्रेंथ, रेडियो फ्रीक्वेंसी और टेक्निकल जानकारी तो दिखाते हैं लेकिन ये साफ नहीं करते कि यूजर को आगे क्या करना चाहिए.
कहां छिपाए जाते हैं कैमरे
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि छिपे हुए सर्विलांस डिवाइस अब कई नॉर्मल चीजों के अंदर लगाए जा सकते हैं. जैसे कैमरा या माइक्रोफोन को घड़ी, USB चार्जर, स्मोक अलार्म, फोटो फ्रेम और खिलौने जैसी चीजों में आसानी से छिपाया जा सकता है.
हालांकि, इन प्रोडक्ट्स को सेफ्टी के लिए तैयार किया जाता है लेकिन अब इन डिवाइस का गलत इस्तेमाल भी होने लगा है. बता दें कि रिसर्च में सामने आया है कि घरेलू हिंसा के मामलों में इस तरह के सिक्रेट डिवाइस लोगों पर नजर रखने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हैं.
ब्लूटूथ ट्रैकर हो रहे आम
वैज्ञानिकों के अनुसार, एडवांस डिवाइस जैसे ब्लूटूथ ट्रैकर मार्केट में आज काफी आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं. इन्हें इस्तेमाल करना भी आसान होता है. इसके अलावा, ये यूजर्स को उनके सामान खोजने में मदद करते हैं. इतना ही नहीं, ये यूजर्स को आगे क्या करना है, इसके बारे में भी जानकारी देते हैं जिससे यूजर्स को इसे इस्तेमाल करना काफी आसान हो जाता है.
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        <pubDate>Sun, 30 Aug 2026 02:30:06 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Gaming Phone vs iPhone... गेमर्स की पसंद कौन? जानें असली फर्क</title>
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        <description><![CDATA[ मोबाइल गेमिंग अब हाई-ग्राफिक्स गेम्स, लंबे गेमिंग सेशन और स्ट्रीमिंग ने स्मार्टफोन को एक तरह के पोर्टेबल गेमिंग डिवाइस में बदल दिया है. ऐसे में जब बात गेमिंग के लिए सही फोन चुनने की आती है, तो सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि गेमिंग फोन बेहतर है या iPhone. एक तरफ ASUS ROG जैसे गेमिंग स्मार्टफोन हैं, जिनमें खास ट्रिगर्स, बेहतर कूलिंग और गेमिंग-केंद्रित फीचर्स मिलते हैं. वहीं दूसरी तरफ iPhone है, जो अपने प्रोसेसर और हार्डवेयर-सॉफ्टवेयर ऑप्टिमाइजेशन के लिए जाना जाता है. तो आइए जानते हैं कि Gaming Phone vs iPhone गेमर्स की पसंद कौन है.
Gaming Phone vs iPhone गेमर्स की पसंद कौन है?
गेमिंग फोन को खासतौर पर लंबे और भारी गेमिंग सेशन को ध्यान में रखकर तैयार किया जाता है. ASUS ROG Phone 9 ऐसा ही एक गेमिंग फोन है. इसमें Snapdragon 8 Elite प्रोसेसर, 16GB तक RAM और GameCool 9 कूलिंग सिस्टम दिया गया है. फोन में 185Hz तक का रिफ्रेश रेट और 720Hz टच सैंपलिंग रेट भी मिलता है. इसके मुकाबले iPhone में Apple अपने हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर दोनों को खुद कंट्रोल करता है. इससे डेवलपर्स के लिए गेम्स को सीमित और अच्छी तरह परिभाषित हार्डवेयर के हिसाब से ऑप्टिमाइज करना आसान होता है. यही वजह है कि iPhone पर गेमिंग परफॉर्मेंस काफी कंसिस्टेंट रहती है.&amp;nbsp;
डिस्प्ले में Android गेमिंग फोन आगे
iPhone Pro मॉडल में 120Hz तक का ProMotion OLED डिस्प्ले मिलता है, जो तेज गेम्स के लिए काफी स्मूद एक्सपीरियंस देता है. वहीं गेमिंग-केंद्रित Android फोन 144Hz या उससे ज्यादा रिफ्रेश रेट तक पहुंच चुके हैं. ROG Phone 9 में 185Hz तक का रिफ्रेश रेट मिलता है. इसलिए अगर आपकी प्रिफरेंस सबसे ज्यादा रिफ्रेश रेट और तेज रिस्पॉन्स है, तो गेमिंग Android फोन बढ़त बना सकते हैं.&amp;nbsp;
गेम्स और ऐप्स में दोनों की अपनी ताकत
iPhone का App Store बेहतर क्यूरेशन और कंसिस्टेंट ऐप परफॉर्मेंस के लिए जाना जाता है. Apple Arcade भी प्रीमियम गेम्स की लाइब्रेरी उपलब्ध कराता है. वहीं Android में गेम्स और ऐप्स की वैरायटी ज्यादा है. इसमें साइडलोडिंग और एमुलेटर जैसे ऑप्शन भी मिलते हैं.
कंट्रोल और गेमिंग हार्डवेयर
ROG Phone 9 में AirTrigger जैसे गेमिंग कंट्रोल दिए गए है. &amp;nbsp;इसके साथ AeroActive Cooler X Pro और ROG Tessen जैसे एक्सेसरीज का इस्तेमाल किया जा सकता है. इससे फोन का एक्सपीरियंस काफी हद तक कंसोल जैसा हो जाता है. iPhone में ऐसे डेडिकेटेड गेमिंग ट्रिगर्स नहीं मिलते, लेकिन थर्ड-पार्टी कंट्रोलर और ट्रिगर इस्तेमाल किए जा सकते हैं.&amp;nbsp;
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बैटरी और कूलिंग का फर्क
गेमिंग के दौरान बैटरी और तापमान दोनों जरूरी होते हैं. ROG Phone 9 में 5800mAh बैटरी और 65W HyperCharge सपोर्ट है. कंपनी के मुताबिक यह 0 से 100 प्रतिशत तक करीब 46 मिनट में चार्ज हो सकता है. वहीं iPhone गेमिंग के दौरान बेहतर पावर मैनेजमेंट के लिए जाना जाता है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Sun, 30 Aug 2026 02:30:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Google पर दिखने वाले Ads से कैसे हो रहा बड़ा Scam?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/google-पर-दिखने-वाले-ads-से-कैसे-हो-रहा-बड़ा-scam</link>
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        <description><![CDATA[ Google पर कुछ ढूंढते समय ऊपर दिखाई देने वाला Sponsored Ad अक्सर हमें भरोसेमंद लगता है. कई लोग किसी वेबसाइट का एड्रेस खुद टाइप करने या बुकमार्क खोलने की जगह Google पर उसका नाम सर्च करके सबसे ऊपर आने वाले लिंक पर क्लिक कर देते हैं. आज साइबर अपराधी इसी आदत का फायदा उठा रहे हैं, यह Google Ads के जरिए ऐसी फर्जी वेबसाइटों को प्रमोट कर रहे हैं, जो देखने में बिल्कुल असली वेबसाइट जैसी लगती हैं. एक गलत क्लिक आपको फेक लॉगिन पेज तक ले जा सकता है, जहां दी गई जानकारी सीधे स्कैमर्स के पास पहुंच सकती है. ऐसे में आइए जानते हैं कि Google पर दिखने वाले Ads से कैसे बड़ा Scam हो रहा है.&amp;nbsp;
Google Ads के जरिए कितना हो रहा Scam?
Google की Ads Safety Report 2024 के मुताबिक, कंपनी ने नियम तोड़ने वाले करीब 41.5 करोड़ Ads को ब्लॉक या हटा दिया था. इसके अलावा करीब 50 लाख विज्ञापन अकाउंट्स पर भी कार्रवाई की गई. ऑनलाइन विज्ञापन के जरिए होने वाली धोखाधड़ी कितने बड़े स्तर पर पहुंच चुकी है. साइबर अपराधी सिर्फ आम यूजर्स को ही निशाना नहीं बना रहे हैं. SEO प्रोफेशनल्स और Google Ads अकाउंट चलाने वाले बिजनेस यूजर्स भी इनके निशाने पर हैं.&amp;nbsp;
कैसे हो रहा Scam?
साइबर अपराधी Google Ads में असली कंपनियों जैसे दिखने वाले फर्जी &amp;nbsp;Ads चलाते हैं. इन पर क्लिक करने पर यूजर नकली वेबसाइट या लॉगिन पेज पर पहुंच सकता है, जहां उसकी पासवर्ड और दूसरी संवेदनशील जानकारी चोरी हो सकती है. स्कैमर्स Google, Semrush या किसी बिजनेस की नकल करते हैं और जल्दी कार्रवाई करने का दबाव बनाते हैं.&amp;nbsp;
Google Ads Scam के तरीके&amp;nbsp;
1. Fake Semrush वेबसाइट - &amp;nbsp;Semrush SEO प्रोफेशनल्स के बीच लोकप्रिय टूल है. स्कैमर्स Semrush के असली लॉगिन पेज की नकल बनाकर उसे Google Ads के जरिए प्रमोट करते हैं. यूजर इसे असली समझकर लॉगिन कर सकता है.&amp;nbsp;
2. Semrush नाम वाले फर्जी डोमेन - फर्जी वेबसाइटों के डोमेन में भी Semrush नाम रखा जाता है, जिससे पहली नजर में वेबसाइट भरोसेमंद लगती है. Google से लॉगिन करने पर यूजर नकली Google पेज पर पहुंच सकता है.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ें - क्या होता है Android System Intelligence? जानें बंद करने पर फोन में क्या होता है
3. Fake Google Ads का इस्तेमाल - स्कैमर्स Google Sites जैसी सर्विस के जरिए ऐसा फर्जी पेज तैयार करते हैं, जो Google Ads की असली वेबसाइट जैसा दिखाई देता है. यहां लॉगिन डिटेल डालने पर डेटा चोरी हो सकता है.&amp;nbsp;
4. Fake Google Rep बनकर ठगी - साइबर ठग फोन या ईमेल के जरिए खुद को Google का कर्मचारी बताकर डराने की कोशिश करते हैं. वे अकाउंट बंद होने या Ads रुकने की बात कहकर तुरंत कार्रवाई करने को कहते हैं. Google का असली Rep आपसे कभी पासवर्ड, वेरिफिकेशन कोड या पेमेंट की जानकारी नहीं मांगता है.&amp;nbsp;
ऐसे &amp;nbsp;पहचानें Fake Google Ads&amp;nbsp;
Google पर दिखने वाला हर Ad जरूरी नहीं कि असली हो. किसी भी विज्ञापन पर क्लिक करने से पहले वेबसाइट का URL ध्यान से चेक करें और देखें कि उसमें कोई अजीब स्पेलिंग या अलग डोमेन तो नहीं है. अगर कोई Ad आपको तुरंत लॉगिन करने, पासवर्ड या दूसरी संवेदनशील जानकारी देने के लिए कह रहा है, तो सावधान रहें. Google के नाम पर आए संदिग्ध ईमेल या लिंक पर सीधे क्लिक करने की जगह Google Ads की वेबसाइट खुद खोलकर अकाउंट की जानकारी चेक करें.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Sun, 30 Aug 2026 02:30:03 +0530</pubDate>
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        <media:keywords>Google, पर, दिखने, वाले, Ads, से, कैसे, हो, रहा, बड़ा, Scam</media:keywords>
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        <title>फोन चार्जिंग से निकलते समय ज्यादातर लोग करते हैं ये गलती? जानें खतरा</title>
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        <description><![CDATA[ स्मार्टफोन लोगों की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है. कॉलिंग, इंटरनेट से लेकर बैंकिंग और मनोरंजन तक, लगभग हर काम के लिए फोन पर लोगों की निर्भरता बढ़ चुकी है. यही वजह है कि फोन की बैटरी और चार्जिंग को लेकर थोड़ी सी लापरवाही भी परेशानी खड़ी कर सकती है. खासतौर पर फोन को चार्जिंग से निकालते समय की जाने वाली एक आम गलती को लोग अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं.
चार्जर निकालते समय न करें ये गलती
कई लोग फोन चार्जिंग से निकालते वक्त चार्जिंग केबल को उसके तार से पकड़कर जोर से खींच देते हैं. ऐसा करना सही तरीका नहीं है. केबल को खींचने से उसके अंदर मौजूद तार और कनेक्टर पर अनावश्यक दबाव पड़ सकता है. बार-बार ऐसा करने से चार्जिंग केबल जल्द खराब हो सकती है और फोन में चार्जिंग की समस्या भी आने लगती है.
सही तरीका ये है कि चार्जिंग केबल को निकालते समय कनेक्टर के प्लास्टिक या मेटल वाले हिस्से को पकड़ें, न कि तार को. इससे केबल पर कम प्रेशर पड़ेगा और उसकी उम्र भी बढ़ सकती है.
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खराब केबल बन सकती है परेशानी की वजह
अगर चार्जिंग केबल बार-बार खींचने या मोड़ने से खराब हो गई है तो उसका इस्तेमाल जारी रखना ठीक नहीं है. कटे या टूटे हुए तार, ढीले कनेक्टर या गर्म होने वाली केबल चार्जिंग के दौरान परेशानी पैदा कर सकती है.
ऐसी कंडिशन में चार्जिंग के दौरान फोन या चार्जर जरूरत से ज्यादा गर्म हो सकता है. इसलिए केबल पर किसी तरह की कट दिखाई देने पर उसे बदल देना बेहतर होता है.
चार्जर को भी ऐसे न खींचें
सिर्फ फोन से केबल निकालने में ही सावधानी जरूरी नहीं है. वॉल सॉकेट से चार्जर निकालते समय भी लोग अक्सर चार्जर के तार को पकड़कर खींचते हैं. इससे केबल और प्लग के ज्वाइंट पर प्रेशर पड़ता है.
चार्जर हटाते समय उसके प्लग वाले हिस्से को पकड़कर सॉकेट से निकालना चाहिए. इससे तार और कनेक्शन पर अनावश्यक खिंचाव नहीं पड़ता.
फोन की बैटरी के लिए भी जरूरी है सावधानी
चार्जिंग केबल को सही तरीके से निकालने से एक्सेसरीज और चार्जिंग पोर्ट पर पड़ने वाला बेमतलब प्रेशर कम होता है. वहीं, लंबे समय तक बैटरी को अच्छी कंडिशन में रखने के लिए फोन को ज्यादा गर्म होने से बचाना और खराब चार्जर या केबल का इस्तेमाल न करना भी जरूरी है.
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        <pubDate>Sat, 29 Aug 2026 14:30:09 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>किस समय YouTube Shorts पोस्ट करने पर आते हैं सबसे ज्यादा व्यूज?</title>
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        <description><![CDATA[ YouTube Shorts आज के समय में एक चर्चित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म बन चुका है. ये खासतौर पर युवाओं के बीच सबसे ज्यादा फेमश प्लेटफॉर्म बन चुका है. लेकिन अक्सर देखा गया है कि कई क्रिएटर्स शानदार वीडियो बनाने के बावजूद उम्मीद के मुताबिक व्यूज नहीं ला पाते हैं. इसकी एक वजह वीडियो पोस्ट करने का गलत समय भी हो सकता है. हालांकि Shorts के लिए कोई एक ऐसा समय तय नहीं है, जब हर वीडियो को सबसे ज्यादा व्यूज मिलें. सही समय आपके ऑडिएंस की आदतों और उनके ऑनलाइन रहने पर निर्भर करता है.
शाम का समय माना जाता है सबसे बेहतर
अगर आपके चैनल पर भारतीय ऑडिएंस ज्यादा हैं तो शाम का समय Shorts पोस्ट करने के लिए अच्छा साबित हो सकता है. नॉर्मली शाम 6 बजे से रात 9 बजे के बीच लोग पढ़ाई या काम से फ्री होकर YouTube पर समय बिताते हैं.
इस दौरान यूजर्स प्लेटफॉर्म पर ज्यादा एक्टिव रहते हैं जिससे नए Shorts को शुरुआती ऑडिएंस मिलने का मौका मिलता है. खासकर मनोरंजन, कॉमेडी, गेमिंग और वायरल कंटेंट के लिए ये टाइम काफी बेहतर माना जाता है.
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दोपहर में भी मिल सकता है अच्छा रिस्पॉन्स
दोपहर 12 बजे से 2 बजे के बीच भी Shorts पोस्ट करके अच्छा परफॉर्मेंस हासिल किया जा सकता है. इस समय लंच ब्रेक के दौरान कई लोग सोशल मीडिया और वीडियो प्लेटफॉर्म देखते हैं. अगर आपका कंटेंट स्टूडेंट्स, ऑफिस कर्मचारियों या नॉर्मल मोबाइल यूजर्स को ध्यान में रखकर बनाया गया है तो इस समय को भी टेस्ट किया जा सकता है.
वीकेंड पर बदल जाता है गेम
शनिवार और रविवार को लोगों के पूरी दिन का शेड्यूल अलग होता है. छुट्टी होने के कारण ऑडिएंस दिन में भी YouTube पर ज्यादा समय बिता सकते हैं. ऐसे में सुबह 9 से 11 बजे और शाम 5 से 9 बजे के बीच Shorts पोस्ट करके देखा जा सकता है.
हालांकि हर चैनल की ऑडियंस अलग होती है, इसलिए सिर्फ नॉर्मल टाइमिंग पर निर्भर रहने के बजाय अपने चैनल के आंकड़ों को देखना ज्यादा जरूरी होता है.
सबसे सही समय YouTube खुद बताएगा
YouTube Studio में जाकर क्रिएटर्स अपने ऑडिएंस के व्यवहार से जुड़ी जानकारी देख सकते हैं. Analytics के Audience सेक्शन में ये पता लगाया जा सकता है कि आपके ऑडिएंस किस समय YouTube पर सबसे ज्यादा एक्टिव रहते हैं.
अगर आपके दर्शक रात में ज्यादा ऑनलाइन रहते हैं तो वीडियो को उसी हिसाब से शेड्यूल करना बेहतर होगा. इसी तरह अगर ऑडियंस दोपहर में एक्टिव है तो पोस्टिंग टाइम भी बदला जा सकता है.
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        <pubDate>Sat, 29 Aug 2026 14:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>क्या होता है Android System Intelligence? जानें बंद करने पर फोन में क्या होता है</title>
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        <description><![CDATA[ अगर आप अपने Android फोन की ऐप्स की लिस्ट को ध्यान से देखें तो आपको Android System Intelligence (ASI) नाम का एक सिस्टम कंपोनेंट दिखाई देता है. अक्सर ये नाम सुनकर काफी जरूरी सिस्टम लगता है लेकिन इसके काम के बारे में बहुत कम जानकारी सामने आती है. खास बात ये है कि कई फोन में इसे बंद करने का ऑप्शन भी मिलता है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर ASI क्या करता है और इसे Disable करने पर फोन पर क्या असर पड़ेगा?
Android System Intelligence क्या है?
जानकारी के मुताबिक, Android System Intelligence Google का एक सिस्टम कंपोनेंट है जो Android में कई स्मार्ट फीचर्स को चलाने में मदद करता है. ये कोई ऐसी ऐप नहीं है जिसे आप नॉर्मली खोलकर इस्तेमाल करते हैं. बल्कि ये फोन के बैकग्राउंड में काम करने वाली टेक्नोलॉजी है.
Google Pixel फोन में इसका इस्तेमाल कई फीचर्स के लिए किया जाता है. इनमें Live Caption, Now Playing, Smart Autorotate, Screen Attention, App Predictions, बेहतर Copy-Paste और Notification Actions जैसे फीचर्स शामिल होते हैं. हालांकि अलग-अलग कंपनियों और डिवाइस के हिसाब से ASI के फीचर्स बदल सकते हैं.
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फोन में ASI का क्या काम है?
इसे Android के कई स्मार्ट फीचर्स के पीछे काम करने वाली टेक्नोलॉजी समझ सकते हैं. जैसे Pixel फोन का Now Playing आसपास बज रहे गाने को पहचानता है. वहीं Screen Attention आपके स्क्रीन देखने के दौरान डिस्प्ले को जल्दी बंद होने से रोक सकता है.
इसी तरह नोटिफिकेशन में मिलने वाले कुछ स्मार्ट एक्शन, ऐप सुझाव और कॉपी-पेस्ट से जुड़े एडवांस फीचर्स भी Android System Intelligence पर निर्भर करते हैं. कुछ डिवाइस में Search Live, Live Translate, Assistant Voice Typing और App Search जैसे फीचर्स में भी इसका अहम रोल होता है.
Privacy के लिए कितना सुरक्षित है?
Android System Intelligence को Android के Private Compute Core के साथ काम करने के लिए डिजाइन किया गया है. ये सिस्टम Android 12 के साथ पेश किया गया था. Private Compute Core के अंदर मौजूद मशीन लर्निंग कंपोनेंट सीधे इंटरनेट से कनेक्ट नहीं होते.
जब क्लाउड से जानकारी या अपडेट की जरूरत होती है तो Private Compute Services इनके लिए नेटवर्क ब्रिज की तरह काम करती है. Google के मुताबिक ASI और Private Compute Services से क्रैश रिपोर्ट, डायग्नोस्टिक्स और डिवाइस से जुड़े कुछ डेटा ऐप एनालिटिक्स के लिए इकट्ठा किए जाते हैं. हालांकि यूजर Usage &amp;amp; Diagnostics कलेक्शन को बंद कर सकता है.
ASI को इतने परमिशन क्यों चाहिए?
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि कई यूजर्स को ASI की परमिशन देखकर चिंता होती है. Google के अनुसार, सिस्टम परमिशन का इस्तेमाल स्मार्ट सजेशन और प्रेडिक्शन देने के लिए किया जा सकता है. जैसे कॉन्टैक्ट्स की जानकारी का इस्तेमाल उन लोगों का सुझाव देने के लिए किया जाता है जिनसे आप अक्सर बातचीत करते हैं.
हालांकि हर फीचर को हर परमिशन की जरूरत हो, ऐसा जरूरी नहीं है. अगर किसी खास परमिशन को लेकर चिंता है तो पूरे Android System Intelligence को बंद करने के बजाय उस परमिशन फीचर को कंट्रोल करना ज्यादा बेहतर ऑप्शन होता है.
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        <pubDate>Sat, 29 Aug 2026 14:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>दुनिया के सबसे ज्यादा बिकने वाले 10 फोन, देखें पूरी लिस्ट</title>
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        <description><![CDATA[ दुनिया के सबसे ज्यादा बिकने वाले 10 फोन, देखें पूरी लिस्ट ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 29 Aug 2026 14:30:05 +0530</pubDate>
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        <title>काम वाली बाई से लेकर रेंट पर सामान तक...जिंदगी आसान कर देंगे ये Apps</title>
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        <description><![CDATA[ आजकल की बिजी लाइफस्टाइल में नौकरी, परिवार और घर के कामों को एक साथ संभालना आसान नहीं है. सफाई, बर्तन, कपड़े, किचन की तैयारी से लेकर घर के छोटे-मोटे कामों तक के लिए हर किसी को कभी न कभी मदद की जरूरत पड़ती है, लेकिन भरोसेमंद हाउस हेल्प ढूंढना भी अपने आप में एक चुनौती है. ऐसे में टेक्नोलॉजी ने इस काम को काफी आसान बना दिया है. अब मोबाइल ऐप्स के जरिए घर के कामों के लिए मदद बुक करने से लेकर फर्नीचर और जरूरी सामान किराए पर लेने तक की सुविधा मिल रही है. तो आइए आज हम आपको ऐसे ऐप्स के बारे में बताते हैं, जो काम वाली बाई से लेकर रेंट पर सामान तक डेली लाइफ के कामों को थोड़ा आसान बना सकते हैं.&amp;nbsp;
बिजी लाइफ में काम आएंगे ये स्मार्ट Apps
1. &amp;nbsp;RentoMojo - अगर आप किसी नए शहर में कुछ समय के लिए रह रहे हैं और फर्नीचर खरीदने पर ज्यादा पैसा खर्च नहीं करना चाहते, तो RentoMojo काम आ सकता है. यहां घर के जरूरी फर्नीचर को किराए पर लिया जा सकता है. &amp;nbsp;फर्नीचर को कम से कम 6 महीने के लिए किराए पर लेना होगा, जिसकी कीमत 1,500 रुपये प्रति महीने से शुरू होती है.&amp;nbsp;
2. &amp;nbsp;Snabbit - Snabbit का फोकस घर की सफाई और रोजमर्रा के कामों के लिए मदद उपलब्ध कराने पर है. ऐप के जरिए बर्तन धोने, किचन, बाथरूम, खिड़की और पंखे की सफाई, कपड़े धोने और दूसरे कामों के लिए मदद बुक की जा सकती है. कंपनी के मुताबिक, उसके Experts का बैकग्राउंड वेरिफिकेशन किया जाता है और उन्हें 2 दिन की प्रोफेशनल ट्रेनिंग भी दी जाती है. Snabbit के अनुसार, 15 लाख से ज्यादा परिवार इसका इस्तेमाल कर चुके हैं. इसकी सर्विस दिल्ली, गाजियाबाद, नोएडा, गुरुग्राम, मुंबई, पुणे, हैदराबाद समेत कई शहरों में उपलब्ध है.&amp;nbsp;
3. Pronto - Pronto भी घर के कामों के लिए हाउस हेल्प उपलब्ध कराता है. इसमें घंटे के हिसाब से बुकिंग, एक्सप्रेस क्लीनिंग और रोजाना के घरेलू काम शामिल हैं. बर्तन, किचन प्रेप, झाड़ू-पोंछा, कपड़े, लॉन्ड्री, आयरनिंग, बालकनी और विंडो क्लीनिंग जैसी करीब 20 सेवाएं दी जाती हैं.&amp;nbsp;
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4. Urban Company - Urban Company घर की सफाई, अप्लायंस रिपेयर, ब्यूटी और दूसरी होम सर्विसेज के लिए जाना जाता है. इसमें वेरिफाइड प्रोफेशनल्स और फिक्स्ड प्राइसिंग की सुविधा मिलती है. हालांकि, यह रियल-टाइम या घंटे के हिसाब से घरेलू मदद की जगह शेड्यूल की गई फुल-सर्विस जरूरतों के लिए ज्यादा यूजफुल है.
5. &amp;nbsp;YesMadam - YesMadam खासतौर पर घर पर ब्यूटी और सैलून सर्विस देने वाला प्लेटफॉर्म है. यहां वैक्सिंग, फेशियल, क्लीन-अप, मैनिक्योर-पेडिक्योर, हेयर स्पा, बॉडी पॉलिशिंग और दूसरी सेवाएं उपलब्ध हैं. इसके अलावा स्पा, मेकअप, प्री-ब्राइडल, मेहंदी और पुरुषों के लिए ग्रूमिंग सर्विस भी दी जाती हैं.
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        <pubDate>Fri, 28 Aug 2026 22:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>क्या है Dual Chip टेक्नोलॉजी? जानें कैसे इससे बदल जाएगा आपका पूरा स्मार्टफोन</title>
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        <description><![CDATA[ टेक्नोलॉजी की दुनिया में स्मार्टफोन एक ऐसा डिवाइस बन चुका है जिसकी ज्यादातर लोगों को जरूरत है. इसके अलावा अब एडवांस स्मार्टफोन में कई सारे ऐसे फीचर्स आ चुके हैं जो लोगों के काम को आसान बनाने का काम करते हैं. इतना ही नहीं, हर साल स्मार्टफोन में नई-नई टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल हो रहा है. कभी कैमरा बेहतर होता है तो कभी प्रोसेसर और बैटरी में बड़ा बदलाव देखने को मिलता है. अब Dual Chip टेक्नोलॉजी को लेकर चर्चा तेज हो रही है. माना जा रहा है कि ये टेक्नोलॉजी भविष्य के स्मार्टफोन में परफॉर्मेंस, बैटरी और AI फीचर्स को पहले से ज्यादा बेहतर बना सकती है. आइए जानते हैं कि क्या है ये नई टेक्नोलॉजी.
क्या है Dual Chip टेक्नोलॉजी?
दरअसल, Dual Chip टेक्नोलॉजी में स्मार्टफोन के अंदर दो अलग-अलग चिप्स का इस्तेमाल किया जाता है. हालांकि इसका मतलब ये नहीं है कि फोन में दो नॉर्मल प्रोसेसर लगा दिए जाएं. दोनों चिप्स को अलग-अलग काम के लिए डिजाइन किया जाता है. जैसे एक मेन चिप डेली के काम, गेमिंग और ऐप्स को संभाल सकती है जबकि दूसरी चिप AI प्रोसेसिंग, कैमरा प्रोसेसिंग, कनेक्टिविटी या किसी खास काम को संभाल सकती है. इससे मेन प्रोसेसर पर पड़ने वाला लोड कम किया जा सकता है.
फोन की परफॉर्मेंस होगी बेहतर
आपको बता दें कि आज स्मार्टफोन में एक साथ कई काम होते हैं. गेमिंग, वीडियो एडिटिंग, कैमरा प्रोसेसिंग और AI फीचर्स जैसे काम प्रोसेसर पर काफी प्रेशर डालते हैं. ऐसे में Dual Chip सिस्टम में काम को अलग-अलग चिप्स के बीच बांटा देगा जिससे प्रोसेसर पर कम लोड पड़ेगा.
इसका फायदा ये होगा कि फोन मल्टीटास्किंग के दौरान ज्यादा तेजी से काम करे और भारी ऐप्स चलाते समय भी परफॉर्मेंस स्टेबल बनी रहे. खासतौर पर गेमिंग और हाई-एंड स्मार्टफोन में इसका असर ज्यादा देखने को मिल सकता है.
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बैटरी की भी हो सकती है बचत
Dual Chip टेक्नोलॉजी का सबसे बड़ा फायदा पावर मैनेजमेंट में देखने को मिलता है. हर काम के लिए पावरफुल मेन प्रोसेसर को चलाने के बजाय कम पावर वाली दूसरी चिप नॉर्मल या बैकग्राउंड टास्क संभाल सकती है.
AI फीचर्स होंगे ज्यादा स्मार्ट
आने वाले समय में स्मार्टफोन में AI की भूमिका लगातार बढ़ने वाली है. फोटो एडिटिंग, वॉयस कमांड, लाइव ट्रांसलेशन, टेक्स्ट समरी और ऑन-डिवाइस AI जैसे फीचर्स के लिए ज्यादा प्रोसेसिंग पावर चाहिए.
Dual Chip डिजाइन में एक चिप को खास तौर पर AI से जुड़े कामों के लिए इस्तेमाल किया जाता है. इससे कुछ AI प्रोसेसिंग सीधे फोन पर हो सकेगी और हर छोटे काम के लिए क्लाउड सर्वर पर निर्भरता कम होती है.
क्या हर फोन में आएगी ये टेक्नोलॉजी?
फिलहाल Dual Chip टेक्नोलॉजी को हर स्मार्टफोन में जरूरी फीचर नहीं माना जा सकता है. दो चिप्स लगाने से डिजाइन, कॉस्ट, सॉफ्टवेयर ऑप्टिमाइजेशन और हीट मैनेजमेंट जैसी चुनौतियां भी बढ़ने लगी हैं
इसलिए शुरुआत में इसका इस्तेमाल प्रीमियम और फ्लैगशिप स्मार्टफोन में ज्यादा देखने को मिलता है. अगर कंपनियां लागत और पावर मैनेजमेंट की चुनौतियों को हल कर लेती हैं तो भविष्य में ये टेक्नोलॉजी मिड-रेंज फोन तक भी पहुंच सकती है.
बदल जाएगा स्मार्टफोन का एक्सपीरिएंस
Dual Chip टेक्नोलॉजी सिर्फ दो चिप्स लगाने का नाम नहीं है बल्कि स्मार्टफोन के अलग-अलग कामों को ज्यादा बेहतर तरीके से बांटने की दिशा में एक कदम है. बेहतर परफॉर्मेंस, कम बैटरी खपत और ज्यादा पावरफुल AI ताकत इसे भविष्य के स्मार्टफोन के लिए जरूरी टेक्नोलॉजी बना सकती हैं. हालांकि इसका असली फायदा तभी सामने आएगा, जब हार्डवेयर के साथ सॉफ्टवेयर भी इन दोनों चिप्स के बीच काम को सही तरीके से बांट सके.
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        <pubDate>Fri, 28 Aug 2026 22:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>दुनिया में AI की मदद से हुई पहली लाइव ब्रेन सर्जरी, ऐसे बची जान</title>
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        <description><![CDATA[ न्यूरोसर्जन्स ने पहली बार लाइव AI की मदद से ब्रेन ट्यूमर की सर्जरी की, जिसमें AI ने ऑपरेशन के दौरान जरूरी नसों और ब्लड वेसल्स को पहचान कर डॉक्टरों को बताया कि किन हिस्सों को छूने से बचना चाहिए. इस सर्जरी में 48 साल के Rhys Hibbert के ब्रेन से ट्यूमर निकाला गया और उनकी आंखों की रोशनी बची रही. यह ऑपरेशन मई में लंदन के National Hospital for Neurology and Neurosurgery में किया गया था. यह हॉस्पिटल University College London Hospitals का हिस्सा है. सर्जरी की जानकारी 27 अगस्त को सार्वजनिक की गई, जब Hibbert ऑपरेशन के बाद ठीक हो चुके थे.&amp;nbsp;
AI ने आसान की सर्जरी
Rhys Hibbert Bedfordshire के रहने वाले 48 वर्षीय कस्टमर सवर्सिस मेनेजर और एंबुलेंस वोलंटरी हैं. दिसंबर 2024 तक वह पूरी तरह फिट थे और हर दिन लंच के समय करीब दो मील पैदल चलते थे. एक दिन इसी दौरान वह अचानक बेहोश होकर सड़क पर गिर पड़े और उन्हें दौरा पड़ा. जांच के बाद पता चला कि उनकी पिट्यूटरी ग्लैंड पर 11mm का एक नॉन-केंसिरियस ट्यूमर है. शुरुआत में डॉक्टरों ने ट्यूमर को वहीं छोड़ दिया, लेकिन बाद में यह ऑप्टिक नर्व पर दबाव डालने लगा. इससे Hibbert की नजर का निचला हिस्सा प्रभावित होने लगा और उन्हें वॉकिंग स्टिक का सहारा लेना पड़ा.&amp;nbsp;
ऑपरेशन के दौरान AI ने लाइव वीडियो देखा
पिट्यूटरी ट्यूमर की सर्जरी डॉक्टर नाक के रास्ते करते हैं. इसके लिए एंडोस्कोप यानी पतली डंडी पर लगे कैमरे का इस्तेमाल होता है. पिट्यूटरी ग्रंथि कैरोटिड आर्टरी और ऑप्टिक नसों के बेहद करीब होती है, इसलिए सर्जरी काफी सावधानी से करनी पड़ती है. इस सर्जरी में AI ने पहले से लिए गए ब्रेन स्कैन की जगह ऑपरेशन का लाइव वीडियो देखा. इसने नसों और ब्लड वेसल्स को अलग-अलग रंगों से मार्क कर डॉक्टरों को सुरक्षित जगह पहचानने में मदद की.
AI खुद सर्जरी नहीं कर रहा था, बल्कि डिजिटल सहायक की तरह काम कर रहा था. &amp;nbsp;यह सिस्टम यूसीएल हॉक्स इंस्टीट्यूट में विकसित किया गया है, एनवीडिया के क्लारा आईजीएक्स प्लेटफॉर्म पर चलता है और पिट्यूटरी की सैकड़ों सर्जरी के चिन्हित किए गए डेटा से इसे प्रशिक्षित किया गया है.
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सर्जरी के बाद नजर में सुधार
ऑपरेशन के आठ हफ्ते बाद भी Rhys Hibbert की नजर में सुधार जारी है. उन्होंने बताया कि अब उन्हें आसपास की चीजें लगभग 360 डिग्री के पैनोरमिक व्यू की तरह दिखाई देती हैं. खास बात यह है कि ऑपरेशन के सिर्फ एक हफ्ते बाद ही वह बिना वॉकिंग स्टिक के चलने लगे थे.&amp;nbsp;
AI की पहली लाइव ब्रेन सर्जरी
पूरे ऑपरेशन के दौरान AI दूसरी स्क्रीन पर लाइव जानकारी देता रहा, लेकिन सर्जरी से जुड़े सभी अंतिम फैसले डॉक्टरों ने ही लिए. इस क्लिनिकल ट्रायल को नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ एंड केयर रिसर्च और गूगल ने फंड किया है. UCL अब इस तकनीक पर बड़ा ट्रायल करने की तैयारी कर रहा है, जिससे भविष्य में AI ऑपरेशन के दौरान डॉक्टरों को दूसरी राय देने वाले डिजिटल सहायक की तरह काम कर सके.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Fri, 28 Aug 2026 22:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Google अकाउंट हैक हुआ तो क्या&amp;क्या जा सकता है? Security Checkup ऐसे करें</title>
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        <description><![CDATA[ फोन में मौजूद कई जरूरी सेवाएं Google अकाउंट से जुड़ी होती हैं. Gmail, Google Photos, Drive, Contacts और Google Password Manager जैसी सेवाओं में आपकी पर्सनल और जरूरी जानकारी सेव हो सकती है. ऐसे में अगर किसी दूसरे व्यक्ति को आपके Google अकाउंट का एक्सेस मिल जाता है, तो परेशानी सिर्फ ईमेल तक सीमित नहीं रहती है. आपकी दूसरी जानकारी भी खतरे में पड़ सकती है.
इसी वजह से अपने Google अकाउंट की सिक्योरिटी पर नजर रखना जरूरी है Google की कुछ सुरक्षा सेटिंग्स ऐसी हैं, जिनकी मदद से आप अकाउंट में हुई संदिग्ध गतिविधि देख सकते हैं और अनजान डिवाइस या ऐप्स की एक्सेस को हटाकर सुरक्षा बढ़ा सकते हैं. तो आइए जानते हैं कि Google अकाउंट हैक हुआ तो क्या-क्या जा सकता है और Security Checkup कैसे करें
Google अकाउंट हैक हुआ तो क्या-क्या जा सकता है?
अगर किसी को आपके Google अकाउंट का एक्सेस मिल जाता है, तो Gmail के अलावा Google Photos, Drive, Contacts और सेव किए गए पासवर्ड जैसी जानकारी भी खतरे में पड़ सकती है. इसके अलावा जिन ऐप्स और वेबसाइट्स में आपने Google अकाउंट से साइन इन किया है, वहां भी जोखिम हो सकता है.&amp;nbsp;
Google Security Checkup कैसे करें?&amp;nbsp;Google का Security Checkup फीचर अकाउंट की सुरक्षा से जुड़ी जरूरी जानकारी एक जगह दिखाता है. Google अकाउंट की सुरक्षा जांचने के लिए अपने फोन या कंप्यूटर के ब्राउजर में Google Security Checkup खोलें और अपने अकाउंट में साइन इन करें.इसके बाद Google आपके अकाउंट की सुरक्षा स्थिति दिखाएगा.
यहां आप देख सकते हैं कि आपका अकाउंट किन डिवाइस में लॉगिन है, Two-Step Verification चालू है या नहीं, किन थर्ड-पार्टी ऐप्स और वेबसाइट्स को आपके Google अकाउंट का एक्सेस मिला हुआ है और आपका Recovery Phone Number साथ ही Email अपडेट है या नहीं. अगर कोई अनजान डिवाइस, ऐप या सुरक्षा से जुड़ी समस्या दिखाई देती है, तो वहीं से जरूरी बदलाव करके उसका एक्सेस हटाया जा सकता है.
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Google अकाउंट को सुरक्षित रखने के जरूरी तरीके
1. &amp;nbsp;कमजोर, एक जैसे या डेटा लीक में सामने आए पासवर्ड को तुरंत बदलें और हर अकाउंट के लिए अलग मजबूत पासवर्ड रखें.
2. पासवर्ड भूलने या अकाउंट लॉक होने पर रिकवरी नंबर और ईमेल काम आते हैं. इसलिए दोनों की जानकारी हमेशा अपडेट रखें.&amp;nbsp;
3. &amp;nbsp;2FA चालू करने के बाद लॉगिन के लिए पासवर्ड के साथ अतिरिक्त पुष्टि भी जरूरी होती है, जिससे अकाउंट की सुरक्षा बढ़ती है.&amp;nbsp;
4. Google अकाउंट से जुड़े थर्ड-पार्टी ऐप्स और वेबसाइट्स की समय-समय पर जांच करें और जिनकी जरूरत नहीं है, उनका एक्सेस हटा दें.&amp;nbsp;
5. पासवर्ड, रिकवरी जानकारी, 2FA और ऐप एक्सेस जैसी सेटिंग्स को समय-समय पर चेक करते रहें, जिससे किसी भी संदिग्ध बदलाव का तुरंत पता चल सके.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Fri, 28 Aug 2026 22:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>सिर्फ कॉल से लीक हो सकता है IMEI? फोन से डेटा लीक का खतरा</title>
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        <description><![CDATA[ फोन पर आने वाली एक नॉर्मल कॉल को हम आमतौर पर सिर्फ बातचीत का जरिया मानते हैं, लेकिन एक नई जांच ने मोबाइल नेटवर्क की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है. रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ परिस्थितियों में कॉल रिसीव होने से पहले ही फोन से जुड़ी तकनीकी जानकारी कॉल करने वाले तक पहुंच सकती है. इसमें स्मार्टफोन का 15 अंकों वाला IMEI नंबर, फोन का मॉडल और ऑपरेटिंग सिस्टम वर्जन जैसी जानकारी शामिल हो सकती है. ऐसे में अब बिना कॉल उठाए भी फोन की कुछ जरूरी जानकारी लीक होने का खतरा सामने आया है. तो आइए जानते हैं कि सिर्फ कॉल से IMEI कैसे लीक हो सकता है.&amp;nbsp;
सिर्फ कॉल से IMEI कैसे लीक हो सकता है?
Bayerischer Rundfunk (BR) की जांच के मुताबिक, यह समस्या तब सामने आती है जब दो अलग-अलग मोबाइल नेटवर्क के यूजर्स के बीच कॉल की जाती है. BR ने जर्मनी के Telekom, Vodafone और Telef&amp;oacute;nica (O2) नेटवर्क पर 70 टेस्ट कॉल करके इस समस्या की जांच की. रिपोर्ट में बताया गया कि कई मामलों में Telekom और Telef&amp;oacute;nica (O2) के नेटवर्क पर IMEI नंबर कॉल करने वाले तक पहुंचा. वहीं Telekom और Vodafone के नेटवर्क पर स्मार्टफोन का मॉडल और ऑपरेटिंग सिस्टम वर्जन सामने आने की बात कही गई. हालांकि Vodafone ने साफ किया कि उसके नेटवर्क पर किए गए टेस्ट में IMEI नंबर सामने नहीं आया.&amp;nbsp;
IMEI नंबर लीक होना क्यों चिंता की बात है?
IMEI किसी मोबाइल डिवाइस की पहचान करने वाला यूनिक नंबर होता है. BR के मुताबिक, इस तरह की जानकारी का इस्तेमाल डिवाइस की प्रोफाइल तैयार करने, ज्यादा टार्गेटेड फिशिंग और सोशल इंजीनियरिंग अटैक करने के साथ-साथ ऐसे डिवाइस और सॉफ्टवेयर की पहचान करने में किया जा सकता है, जिनमें सुरक्षा खामियां मौजूद हों.&amp;nbsp;
जर्मनी के पूर्व सैन्य अधिकारी और Bundestag सदस्य Roderich Kiesewetter के फोन पर भी टेस्ट कॉल की गई थी. उन्होंने पुष्टि की कि सामने आया IMEI नंबर उनके फोन का सही नंबर था. जर्मनी के Federal Office for the Protection of the Constitution ने भी इस मामले की पुष्टि की और माना कि खुफिया एजेंसियां ऐसी जानकारी का गलत इस्तेमाल कर सकती हैं.&amp;nbsp;
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1,000 से ज्यादा ऑपरेटरों को दी गई चेतावनी
इस मामले के सामने आने के बाद Global System for Mobile Communications Association (GSMA) ने 1,000 से ज्यादा मोबाइल नेटवर्क ऑपरेटरों को अलर्ट किया. GSMA ने कंपनियों से अपने नेटवर्क की जांच करने और गैर-जरूरी डेटा ट्रांसमिशन को फिल्टर करने की सलाह दी.&amp;nbsp;
जर्मनी में लीक को किया गया ठीक
रिपोर्ट सामने आने के बाद जर्मनी के मोबाइल नेटवर्क ऑपरेटरों ने तकनीकी बदलाव लागू कर इस समस्या को ठीक करने की बात कही है. हालांकि, BR की जांच सिर्फ जर्मनी के नेटवर्क तक सीमित थी. इसलिए दूसरे देशों के मोबाइल नेटवर्क में ऐसी ही दिक्कत मौजूद है या नहीं, इसकी पुष्टि नहीं हुई है. IETF के RFC 7254 और RFC 7255 में भी IMEI को लेकर चेतावनी दी गई है. इनमें बताया गया है कि IMEI डिवाइस की पहचान और ट्रैकिंग के लिए इस्तेमाल हो सकता है और इसे खुले तौर पर भेजने से यूजर्स की प्राइवेसी प्रभावित हो सकती है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Fri, 28 Aug 2026 22:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>भारत में हेट स्पीच कंटेंट क्यों नहीं पकड़ पा रहा मेटा, क्या है इसके पीछे की वजह?</title>
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        <description><![CDATA[ सोशल मीडिया पर हेट स्पीच की पहचान और उसे हटाना प्लेटफॉर्म कंपनियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती में से एक है. भारत के मामले में Meta के अपने आंकड़े इस चुनौती को और गंभीर बनाते हैं. कंपनी के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में Instagram पर हेट स्पीच की पहचान करने की proactive क्षमता में पिछले एक साल के दौरा तेज गिरावट देखने को मिली है. ऐसे में आइए जानते हैं कि इस तेज गिरावट के पीछे क्या वजहें हो सकती है.
क्या होता है Proactive rate?
Proactive rate का मतलब यह होता है कि किसी आपत्तिजनक पोस्ट को यूजर की शिकायत आने से पहले ही प्लेटफॉर्म की तकनीकी व्यवस्था पहचान ले और उस पर कार्रवाई करे. Meta के Community Standards Enforcement Report के अनुसार, 2025 में Instagram पर हेट स्पीच के लिए Proactive Detection Rate करीब 90 फीसदी के स्तर पर था. हालंकि, भारत के आंकड़ों में तस्वीर काफी अलग दिखाई देती है. भारत में जनवरी से जून 2026 के दौरान यह दर 30 फीसदी से भी नीचे रही. जून 2025 में Instagram पर हेट स्पीच के मामले में Proactive Rate करीब 82 फीसदी था, जो जून 2026 में घटकर करीब 25 फीसदी ही रह गया. यानी जिस कंटेंट को पहले बड़ी संख्या में Meta की व्यवस्था खुद पहचान लेती थी, उसका बड़ा हिस्सा अब यूजर रिपोर्ट या दूसरे तरीकों से सामने आ रहा है.
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भाषा विविधता हो सकती है चुनौती
यह अंतर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत Meta के सबसे बड़े यूजर बाजारों में से एक है. इतने बड़े यूजर बेस वाले देश में Moderation System की क्षमता में गिरावट का असर बड़ी संख्या में पोस्ट और यूजर्स पर पड़ सकता है. इस समस्या के पीछे सबसे अहम सवाल तकनीकी क्षमता का है. वहीं भारत में सोशल मीडिया पर इस्तेमाल होने वाली भाषाएं, स्थानीय शब्द और स्लैंग बेहद विविध हैं. किसी शब्द का अर्थ उसके संदर्भ के अनुसार बदल जाता है. यही वजह है कि केवल सामान्य भाषा आधारित Automated Systems के लिए भारतीय इंटरनेट की पूरी भाषाई और सांस्कृतिक विविधता को समझना आसान नहीं है.
मशीन को सिखाना भी है जरूरी
Meta ने समय के साथ Artificial Intelligence और Machine Learning आधारित सिस्टम का इस्तेमाल बढ़ाया है. लेकिन Automated Moderation को लगातार नए शब्दों, नए तरीकों और बदलते संदर्भों के हिसाब से प्रशिक्षित करनाभी जरूरी है. Hate speech भी अक्सर सीधे शब्दों में नहीं लिखी जाती. कई बार इमोजी, तस्वीरों, वीडियो या स्थानीय बोलियों के जरिए संदेश दिया जाता है. ऐसे मामलों में मशीन के लिए सही निर्णय लेना और मुश्किल हो जाता है. खास बात यह है कि वैश्विक स्तर पर Meta की Proactive Detection क्षमता और भारत के आंकड़ों के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है. इससे यह सवाल उठता है कि भारत जैसे बड़े और भाषा विविध बाजार में Automated Moderation के लिए पर्याप्त स्थानीय संसाधन और तकनीकी क्षमता मौजूद है या नहीं.
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        <pubDate>Fri, 28 Aug 2026 06:30:05 +0530</pubDate>
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        <title>9 सितंबर को कौन&amp;कौन से गैजेट लॉन्च करेगा Apple, क्या दे सकता है सरप्राइज?</title>
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        <description><![CDATA[ Apple के नए प्रोडक्ट्स को लेकर यूजर्स के बीच एक्साइटमेंट बढ़ गई है. कंपनी ने अपने बड़े लॉन्च इवेंट की तारीख तय कर दी है, जो 9 सितंबर 2026 को अमेरिका के कैलिफोर्निया स्थित Apple Park के Steve Jobs Theater में आयोजित होगा. Surprise and Shine टैगलाइन वाले इस इवेंट में iPhone 18 Pro और iPhone 18 Pro Max जैसे नए मॉडल पेश किए जाने की चर्चा है.
इसके अलावा Apple के पहले फोल्डेबल iPhone के लॉन्च को लेकर भी काफी अटकलें हैं. ऐसे में आइए आपको बातते हैं कि 9 सितंबर को Apple कौन-कौन से गैजेट लॉन्च करेगा और क्या बड़ा सरप्राइज दे सकता है.&amp;nbsp;
9 सितंबर को होगा Apple का बड़ा इवेंट
Apple का यह खास इवेंट 9 सितंबर 2026 को अमेरिका के कैलिफोर्निया स्थित Apple Park के Steve Jobs Theater में होगा. कार्यक्रम अमेरिका में सुबह 10 बजे PT पर शुरू होगा, जबकि भारत में इसे रात 10:30 बजे से देखा जा सकेगा. Apple इस इवेंट की लाइव स्ट्रीमिंग अपनी वेबसाइट, YouTube और Apple TV पर करेगा. कंपनी ने इवेंट के लिए Surprise and Shine टैगलाइन के साथ एक खास आर्टवर्क भी जारी किया है, जिसमें Apple का लोगो चमकता हुआ दिखाई देता है.
9 सितंबर को Apple कौन-कौन से गैजेट लॉन्च करेगा?
9 सितंबर को Apple इवेंट में iPhone 18 Pro और iPhone 18 Pro Max पेश किए जाने की उम्मीद है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, दोनों मॉडल में नई 2nm A20 Pro चिप मिल सकती है. डिजाइन में छोटा Dynamic Island, नए कलर और कैमरा से जुड़े अपग्रेड देखने को मिल सकते हैं. iPhone 18 Pro Max में 48MP मेन कैमरा और वैरिएबल अपर्चर मिलने की चर्चा है वहीं, अंडर-डिस्प्ले Face ID और नए C2 मॉडम की भी अटकलें हैं. Apple के पहले फोल्डेबल iPhone को लेकर भी काफी समय से चर्चा चल रही है. इसे iPhone Fold या iPhone Ultra नाम दिया जा सकता है. रिपोर्ट्स के अनुसार, इसमें अंदर की तरफ करीब 7.8 इंच और बाहर की तरफ लगभग 5.3 इंच का डिस्प्ले मिल सकता है.&amp;nbsp;
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क्या बड़ा सरप्राइज दे सकता है?
iPhone के अलावा Apple Watch Series 12 और Apple Watch Ultra के नए मॉडल भी लॉन्च किए जा सकते हैं. इनके साथ नए स्मार्ट होम डिवाइस और AirPods से जुड़े अपडेट भी देखने को मिल सकते हैं. हालांकि, कैमरा वाले AirPods के 2027 में लॉन्च होने की चर्चा है.&amp;nbsp;
नए CEO के दौर में पहला बड़ा iPhone लॉन्च
यह इवेंट Apple के लिए नेतृत्व के लिहाज से भी खास होगा. रिपोर्ट्स के अनुसार John Ternus 1 सितंबर 2026 से CEO की जिम्मेदारी संभालेंगे, जबकि Tim Cook Executive Chairman की भूमिका में रहेंगे. ऐसे में नए CEO के कार्यकाल में यह पहला बड़ा iPhone लॉन्च इवेंट होगा.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Fri, 28 Aug 2026 06:30:04 +0530</pubDate>
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        <title>महंगे Earbuds को टक्कर देगा CMF का नया Buds Neo? जानें खासियत</title>
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        <description><![CDATA[ आजकल अच्छे म्यूजिक, क्लियर कॉल और नॉइस कैंसिलेशन के लिए महंगे ईयरबड्स खरीदना जरूरी नहीं रह गया है. इसी सेगमेंट में CMF ने भारत में अपना नया CMF Buds Neo लॉन्च किया है. कंपनी ने इसे 1,999 रुपये की एक्सक्लूसिव लॉन्च कीमत पर पेश किया है. नए ईयरबड्स में अट्रैक्टिव डिजाइन के साथ 12.4mm डायनेमिक ड्राइवर, 35dB तक ANC और लंबी बैटरी जैसे फीचर्स दिए गए हैं. ऐसे में कम बजट में TWS खरीदने वालों के लिए यह एक अच्छा ऑप्शन बन सकता है तो आइए जानते हैं कि CMF Buds Neo में क्या खास है.&amp;nbsp;
CMF Buds Neo की कीमत और डिजाइन
CMF Buds Neo को भारत में 1,999 रुपये की लॉन्च कीमत पर उपलब्ध कराया गया है. इसे Black, White और Dark Blue कलर में खरीदा जा सकता है. ईयरबड्स का चार्जिंग केस CMF के खास ज्योमेट्रिक डिजाइन के साथ आता है. इसमें एक गोल डायल और स्ट्रैप लगाने के लिए लैनयार्ड होल दिया गया है.
CMF Buds Neo में क्या खास है?
CMF Buds Neo में 12.4mm डायनेमिक ड्राइवर दिया गया है. इसमें टाइटेनियम-कोटेड PET डोम का इस्तेमाल किया गया है, जो वोकल्स और डिटेल्स को साफ रखने में मदद करता है. PEEK + PU सराउंड ड्राइवर को बेहतर मूवमेंट देता है. इसके अलावा स्टैटिक स्पेशियल ऑडियो, छह EQ प्रीसेट, Custom EQ और तीन लेवल का Bass Enhancement भी मिलता है.
35dB तक ANC और चार माइक्रोफोन
नॉइस कैंसिलेशन के लिए इनमें 35dB तक Active Noise Cancellation दिया गया है. यूजर जरूरत के अनुसार ANC के तीन लेवल चुन सकता है. कॉलिंग के लिए चार HD माइक्रोफोन और Clear Voice Technology दी गई है, जो बाहर या चलते समय आवाज को साफ रखने में मदद करती है.
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बैटरी और फास्ट चार्जिंग
ANC बंद होने पर CMF Buds Neo 52 घंटे तक का कुल प्लेबैक दे सकता है. वहीं सिर्फ 10 मिनट की फास्ट चार्जिंग से 5.5 घंटे तक का प्लेबैक मिलने का दावा किया गया है. हर ईयरबड में 45mAh और चार्जिंग केस में 460mAh की बैटरी दी गई है.&amp;nbsp;
Nothing X ऐप से मिलेगा ज्यादा कंट्रोल
Nothing X ऐप के जरिए यूजर्स अल्ट्रा-लो लेटेंसी गेमिंग मोड, कस्टम टच कंट्रोल, डुअल-डिवाइस कनेक्शन, कस्टम EQ और बास एन्हांसमेंट जैसे फीचर्स इस्तेमाल कर सकते हैं. कनेक्टिविटी के लिए Bluetooth 6.0, Google Fast Pair और Microsoft Swift Pair का सपोर्ट मिलता है. भारत में इन्हें Flipkart के अलावा Croma, Reliance Digital और Vijay Sales जैसे रिटेल पार्टनर्स से खरीदा जा सकता है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Fri, 28 Aug 2026 06:30:03 +0530</pubDate>
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        <title>Nothing OS 5.0 हुआ लॉन्च, 80 से ज्यादा फीचर्स से और स्मार्ट हुआ फोन</title>
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        <description><![CDATA[ स्मार्टफोन में अब कैमरा, प्रोसेसर या बैटरी के साथ फोन का सॉफ्टवेयर एक्सपीरियंस भी उतना ही जरूरी हो गया है. इसी को ध्यान में रखते हुए UK-बेस्ड टेक कंपनी Nothing ने अपने स्मार्टफोन्स के लिए Nothing OS 5.0 लॉन्च किया है. नया ऑपरेटिंग सिस्टम Android 17 पर आधारित है और कंपनी के मुताबिक इसमें 80 से ज्यादा नए फीचर्स और सुधार किए गए हैं. इनमें डिजाइन में बदलाव से लेकर पर्सनलाइजेशन, परफॉर्मेंस और AI से जुड़े कई अपग्रेड शामिल हैं. इसका ओपन बीटा सबसे पहले Nothing Phone (3) के लिए 26 अगस्त को दोपहर 3:30 बजे से शुरू होगा. ऐसे में आइए जानते हैं कि Nothing OS 5.0 में क्या बदला और किन फोन में अपडेट मिलेगा.&amp;nbsp;
Nothing OS 5.0 में क्या बदला?
Nothing OS 5.0 में यूजर्स को नया होम स्क्रीन डिजाइन देखने को मिलेगा. इसमें ट्रांसपेरेंट विजेट्स और सर्च बार दिए गए हैं, जो स्क्रीन को अलग तरह का लेयर्ड लुक देते हैं. गैलरी &amp;nbsp;समेत कई ऐप्स के डिजाइन में भी बदलाव किया गया है. नया Adaptive Color System वॉलपेपर के रंग के हिसाब से ऐप आइकन्स, विजेट्स और क्विक सेटिंग में कलर टिंट जोड़ सकता है. इसके अलावा स्टेटस बार, सेटिंग कैमरा और गैलरी के आइकन्स, एनिमेशन और स्पेसिंग को भी अपडेट किया गया है. पूरे सिस्टम में Geist Typeface का इस्तेमाल किया गया है.&amp;nbsp;
नए विजेट्स और Glyph में बदलाव
Nothing OS 5.0 में Collector और Away Time नाम के दो नए विजेट्स जोड़े गए हैं. Collector से यूजर्स फोटो की विजुअल कलेक्शन बना सकते हैं, जबकि Away Time स्क्रीन से दूर बिताए गए समय और डिजिटल वेलबीइंग ट्रेंड्स को दिखाता है. लॉक स्क्रीन के लिए Gooey और Micrographics नाम के दो नए क्लॉक स्टाइल भी मिलेंगे. यूजर्स अब होम स्क्रीन एडिट करते समय कई ऐप्स और विजेट्स को एक साथ मूव कर सकेंगे. कंपनी के खास Glyph Interface के लिए अलग ऐप दिया गया है. वहीं नया Glyph Timer विजेट होम स्क्रीन से टाइमर शुरू करने की सुविधा देता है.&amp;nbsp;
किन फोन में मिलेगा अपडेट?
Nothing Phone (3) को 26 अगस्त से Open Beta मिलना शुरू होगा और इसका Stable अपडेट मिड अक्टूबर में आएगा. इसके बाद Phone (4a) Pro, Phone (4a), Phone (3a) Pro, Phone (3a), Phone (2a) और Phone (2a) Plus समेत दूसरे डिवाइसेज को स्टेप बाय स्टेप तरीके से अपडेट मिलेगा. Nothing Phone (3a) Lite और CMF Phone 2 Pro को Stable अपडेट दिसंबर 2026 और जनवरी 2027 में मिलने की योजना है.&amp;nbsp;
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AI और परफॉर्मेंस में भी अपग्रेड
Nothing के अनुसार नए OS में टच रिस्पॉन्स, बैकग्राउंड ऐप रिटेंशन और सिस्टम रिसोर्स मैनेजमेंट को बेहतर किया गया है. एसेंशियल वॉइस में तेज ट्रांसक्रिप्शन और बेहतर फॉर्मेटिंग दी गई है. वहीं एसेंशियल में स्मार्ट कलेक्शन फीचर कंटेंट को व्यवस्थित करता है. इसके अलावा एसेंशियल एप्स बिल्डर की मदद से यूजर्स बिना कोड लिखे साधारण AI-पावर्ड ऐप्स बना और इस्तेमाल कर सकेंगे.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Thu, 27 Aug 2026 18:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Top Tech Trends 2026: गेमिंग फोन से Mini AI PC तक, ये गैजेट्स हैं खास</title>
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        <description><![CDATA[ टेक्नोलॉजी की दुनिया में अब सिर्फ तेज प्रोसेसर और बड़ी स्क्रीन ही चर्चा में नहीं हैं. 2026 में गैजेट्स का फोकस ज्यादा खास जरूरतों पर दिखाई दे रहा है. कहीं गेमिंग के लिए स्मार्टफोन और टैबलेट को नए अंदाज में तैयार किया जा रहा है, तो कहीं छोटे साइज यानी मिनी कंप्यूटर में AI की ताकत दी जा रही है. इसी के साथ स्मार्ट वियरेबल्स, AI एडिटिंग टूल्स और स्क्रीन से दूरी बनाने वाले हेल्थ डिवाइस भी तेजी से सामने आ रहे हैं. 2026 के टेक ट्रेंड्स पर नजर डालें तो इस साल तेज परफॉर्मेंस, AI और रोजमर्रा की जरूरतों को ध्यान में रखकर नए गैजेट्स तैयार किए जा रहे हैं. तो आइए जानते हैं कि गेमिंग फोन से Mini AI PC तक कौन से गैजेट्स खास हैं.&amp;nbsp;
गेमिंग फोन से हैंडहेल्ड कंसोल तक&amp;nbsp;
गेमिंग और हाई-परफॉर्मेंस हार्डवेयर इस साल के प्रमुख ट्रेंड्स में शामिल हैं. Gaming Ecosystem Smartphones और Performance-Driven Gamer Tablets जैसे डिवाइस पोर्टेबल गेमिंग को ज्यादा पावरफुल बनाने पर फोकस कर रहे हैं. वहीं Pro-Level Mini Handheld Consoles छोटे साइज में डेस्कटॉप-क्लास परफॉर्मेंस देने की कोशिश कर रहे हैं. वहीं, ONEXPLAYER X2 Mini Pro इसी ट्रेंड का एक बेस्ट गैजेट है. इसमें AMD Ryzen AI Max+ 388 प्रोसेसर, Radeon 8060S ग्राफिक्स, 64GB तक RAM और 2TB तक स्टोरेज का ऑप्शन मिलता है. गेमिंग सेटअप को और खास बनाने के लिए Reactive Wireless Gamer Chairs और Cyberpunk Mechanical Keyboards जैसे प्रोडक्ट्स भी चर्चा में हैं.&amp;nbsp;
Mini AI PC में क्या खास है?
AI अब सिर्फ स्मार्टफोन के फीचर्स तक सीमित नहीं है. Mini AI Desktop PCs इस तकनीक को छोटे कंप्यूटिंग डिवाइस में ला रहे हैं. GMKtec EVO-X3 Mini PC में AMD AI Max+ 395 और Radeon 8060S ग्राफिक्स के साथ 128GB RAM और 4TB तक SSD का सपोर्ट दिया गया है. &amp;nbsp;यह सिस्टम लोकल LLM चलाने के साथ 3D रेंडरिंग, CAD, इमेज और वीडियो जनरेशन जैसे कामों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है. Wi-Fi 7 और Bluetooth 5.4 जैसे कनेक्टिविटी ऑप्शन भी इसमें दिए गए हैं.&amp;nbsp;
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AI फोटो और वीडियो एडिटिंग ट्रेंड&amp;nbsp;
AI का इस्तेमाल क्रिएटिव कामों में भी बढ़ रहा है. AI Photo Editors और AI Video Editors ऐसे टूल्स को दिखाते हैं, जहां एडिटिंग के काम में AI की मदद ली जा रही है. इसके अलावा AI Personal Finance Coaches और Practical AI-Driven Smartphone Models बताते हैं कि AI अब अलग-अलग जरूरतों वाले डिवाइस और सेवाओं में जगह बना रहा है.&amp;nbsp;
हेल्थ टेक में स्मार्ट वियरेबल्स
2026 के ट्रेंड्स में हेल्थ और वियरेबल टेक्नोलॉजी भी जरूरी है. Blood Pressure-Tracking Smart Rings, Early Illness-Detecting Wearables और Fitness-Focused Smartwatch Ranges शरीर और फिटनेस से जुड़ी निगरानी पर फोकस करते हैं. वहीं Mindful Screen-Free Health Trackers स्क्रीन पर निर्भरता कम रखते हुए वेलनेस ट्रैकिंग की दिशा दिखाते हैं.
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        <pubDate>Thu, 27 Aug 2026 18:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>AI से अब वॉशिंग मशीन भी हुई स्मार्ट, खुद करेगी कपड़ों की धुलाई</title>
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        <description><![CDATA[ वॉशिंग मशीन आने से पहले कपड़े धोने में काफी मेहनत और समय लगता था. इसके बाद ऑटोमैटिक वॉशिंग मशीनों ने यह काम काफी आसान कर दिया. अब नई तकनीक के साथ बाजार में ऐसी स्मार्ट वॉशिंग मशीनें भी मौजूद हैं, जो कपड़ों का वजन, फैब्रिक और गंदगी समझकर धुलाई का तरीका तय करने में मदद करती हैं. AI पावर्ड वॉशिंग मशीन का मकसद हर बार सही वॉश प्रोग्राम चुनने की परेशानी को कम करना है. इससे समय, पानी, बिजली और डिटर्जेंट की बचत हो सकती है. कुछ मॉडल में Wi-Fi कनेक्टिविटी भी मिलती है, जिससे स्मार्टफोन के जरिए मशीन की सेटिंग्स को कंट्रोल किया जा सकता है.&amp;nbsp;
टच स्क्रीन से लेकर AI वॉश तक यह मशीन है बेस्ट&amp;nbsp;
Haier F17 वॉशर-ड्रायर AI वॉश के साथ स्मार्ट डोजिंग, स्टीम वॉश और वॉश के साथ ड्रायर की सुविधा मिलती है. Haier F17 वॉशर-ड्रायर की कीमत 75,990 रुपये है. इसकी सबसे अलग खासियत 15, 20 और 25 डिग्री तक घूमने वाली टच स्क्रीन है. स्क्रीन को यूजर अपनी ऊंचाई और देखने की जगह के अनुसार ऊपर की तरफ झुका सकता है. इससे मशीन इस्तेमाल करते समय बार-बार नीचे झुकने की जरूरत कम हो सकती है. इसमें AI वॉश, स्मार्ट डोजिंग, स्टीम वॉश और वॉश के साथ ड्रायर भी मिलता है.&amp;nbsp;
AI खुद समझेगा कपड़ों की जरूरत
F17 में AI वॉश फीचर दिया गया है. कंपनी के अनुसार, यह कपड़ों के लोड, फैब्रिक और दाग जैसी चीजों के आधार पर वॉश प्रोग्राम सुझा सकती है. मिल्क, कॉफी, मड और स्वेट जैसे दागों के लिए मशीन अलग वॉश साइकिल चुन सकती है. यहां AI किसी चैटबॉट की तरह काम नहीं करता, बल्कि सेंसर से मिली जानकारी के आधार पर वॉश को एडजस्ट करता है.&amp;nbsp;
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ये 5 AI वॉशिंग मशीन भी हैं ऑप्शन
1. Haier HW70-IM12929BK में AI DBT, PuriSteam, 15 वॉश प्रोग्राम और 1200 RPM स्पिन स्पीड मिलती है. इसकी क्षमता 7 किलोग्राम है और यह 5 स्टार एनर्जी रेटिंग के साथ आती है.&amp;nbsp;
2. IFB DIVA GXN 6010 CMS 6 किलोग्राम की फ्रंट लोड मशीन है. इसमें AI, DeepClean, 30 मिनट Steam Refresh, 9 Swirl Wash और Eco Inverter जैसे फीचर मिलते हैं. इसकी एनर्जी रेटिंग 5 स्टार है.&amp;nbsp;
3. Godrej WTEON ALP 75 5.0 FDAG GPGR की क्षमता 7.5 किलोग्राम है. यह टॉप लोड मशीन है और इसमें AI तकनीक, इन-बिल्ट हीटर, 6 वॉश प्रोग्राम, Delay Start और Child Lock जैसे फीचर मिलते हैं.&amp;nbsp;
4. Samsung WW70T502NAN1TL 7 किलोग्राम की फ्रंट लोड मशीन है. इसमें Wi-Fi कनेक्टिविटी, डिजिटल इन्वर्टर मोटर, AI कंट्रोल, सेल्फ डाइगनोसिस और 20 वॉश प्रोग्राम मिलते हैं. इसकी स्पिन स्पीड 1200 RPM है.&amp;nbsp;
5. LG FHP1209Z5M की क्षमता 9 किलोग्राम है. इसमें AI Direct Drive, Steam, 6 Motion DD और Wi-Fi जैसे फीचर मिलते हैं. इसमें 14 वॉश प्रोग्राम और 1200 RPM स्पिन स्पीड दी गई है. &amp;nbsp;
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        <pubDate>Thu, 27 Aug 2026 18:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>ऑफिस के लिए चाहिए लॉन्ग&amp;टर्म प्रिंटर? ये मॉडल हैं खास</title>
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        <description><![CDATA[ ऑफिस में इनवॉइस, बिल, जरूरी रिकॉर्ड, रेगुलेटरी डॉक्यूमेंट्स और मार्केटिंग के लिए पंपलेट जैसे कामों में आज भी प्रिंटेड कॉपी की जरूरत पड़ती है. हालांकि कंपनियां अपने ज्यादातर वर्कफ्लो को डिजिटल बनाने की दिशा में बढ़ रही हों, लेकिन कई जरूरी डॉक्यूमेंट अब भी कागज पर ही संभालकर रखने पड़ते हैं. ऐसे में ऑफिस में अपना प्रिंटर होना काफी सुविधाजनक रहता है. इससे हर छोटे-बड़े प्रिंट के लिए आसपास की प्रिंटिंग शॉप पर निर्भर नहीं रहना पड़ता और खर्च भी कम किया जा सकता है. तो आइए आज हम आपको बताते हैं कि ऑफिस के लिए लॉन्ग-टर्म प्रिंटर के कौन से मॉडल खास हैं.&amp;nbsp;
ऑफिस के लिए लॉन्ग-टर्म प्रिंटर के कौन से मॉडल खास हैं?
1. HP 303dw Auto Duplex WiFi Laser Printer - HP 303dw Auto Duplex WiFi Laser Printer अपनी भरोसेमंद परफॉर्मेंस के लिए जाना जाता है. इसकी प्रिंटिंग स्पीड 30 पेज प्रति मिनट तक है, जिससे बिजनेस के रोजाना के प्रिंटिंग काम आसानी से किए जा सकते हैं. इसमें HP Smart ऐप के जरिए कंट्रोल करने की सुविधा भी मिलती है. यह प्रिंटर 60 GSM से 220 GSM तक के पेपर को सपोर्ट करता है और एक महीने में 30,000 पेज तक का आउटपुट देने का दावा किया गया है. इसकी कीमत 14,199 रुपये है.&amp;nbsp;
2. &amp;nbsp;HP 323dnw Auto Duplex WiFi Laser Printer - HP 323dnw भी 30 पेज प्रति मिनट तक की प्रिंटिंग स्पीड देता है. यह प्रिंटिंग के साथ स्कैनिंग और डॉक्यूमेंट की कॉपी बनाने का काम भी कर सकता है. इसके फ्रंट में मल्टी-इन्फॉर्मेशन LCD स्क्रीन दी गई है, जिससे प्रिंटर को इस्तेमाल करना आसान हो जाता है. इस मॉडल की भारत में कीमत 21,999 रुपये है.&amp;nbsp;
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3. &amp;nbsp;HP Laser 1008w Printer - HP Laser 1008w उन यूजर्स के लिए एक ऑप्शन है, जिन्हें रोजाना डॉक्यूमेंट प्रिंट करने होते हैं. यह 21 पेज प्रति मिनट तक की प्रिंटिंग स्पीड देता है. इसमें 150 A4 पेज की इनपुट ट्रे और 100 पेज की आउटपुट ट्रे मिलती है, जिससे बार-बार पेपर डालने की जरूरत कम होती है. HP के अनुसार इसका ड्यूटी साइकिल 10,000 पेज तक है. इसकी कीमत 12,999 रुपये है.&amp;nbsp;
4. Brother HL-L2440DW - अगर ऑफिस में रोजाना बड़ी संख्या में डॉक्यूमेंट प्रिंट करने होते हैं, तो Brother HL-L2440DW पर भी नजर डाली जा सकती है. यह मोनोक्रोम लेजर प्रिंटर है, जो 30 पेज प्रति मिनट तक की स्पीड से प्रिंट कर सकता है. इसमें ऑटोमेटिक डुप्लेक्स प्रिंटिंग की सुविधा मिलती है. कंपनी के मुताबिक इसका अधिकतम मासिक प्रिंट वॉल्यूम 35,000 पेज तक है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Thu, 27 Aug 2026 18:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>फेसबुक&amp;इंस्टाग्राम पर 2 घंटे की लिमिट, ये है Meta का नया प्लान</title>
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        <description><![CDATA[ सोशल मीडिया की दुनिया में अब बच्चों के लिए फेसबुक और इंस्टाग्राम का इस्तेमाल पहले जैसा नहीं रहने वाला है. Meta पर बच्चों और टिनेर्जस को सोशल मीडिया की लत लगाने वाले फीचर्स इस्तेमाल करने का आरोप लगते रहे हैं. इसी मामले को लेकर कंपनी ने अमेरिका में एक बड़े समझौते पर सहमति जताई है, जिसके तहत Meta करीब 17 अरब डॉलर तक का भुगतान कर सकती है. इसके साथ ही कंपनी अपने प्लेटफॉर्म्स पर नाबालिग यूजर्स के लिए कई बड़े बदलाव करने जा रही है.
इस नए प्लान में 18 साल से कम उम्र के यूजर्स के लिए रोजाना इस्तेमाल की डिफॉल्ट लिमिट, रात में ऐप्स का एक्सेस बंद करना और स्कूल के समय नोटिफिकेशन म्यूट करना जैसे बदलाव शामिल हैं. उम्र की जांच और पैरेंटल कंट्रोल को भी ज्यादा मजबूत किया जाएगा. हालांकि, Meta ने इस समझौते में किसी गलती या कानूनी जिम्मेदारी को स्वीकार नहीं किया है. ऐसे में आइए हम आपको बताते हैं कि बच्चों के लिए Meta का नया प्लान क्या है.&amp;nbsp;
Meta करेगा अरबों डॉलर का भुगतान
बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा से जुड़े मामले को खत्म करने के लिए Meta करीब 17.1 अरब डॉलर तक का भुगतान कर सकती है. हालांकि, कंपनी ने किसी गलती या कानूनी जिम्मेदारी को स्वीकार नहीं किया है. समझौते की अंतिम मंजूरी अभी अदालत से मिलनी बाकी है. इस मामले में Meta पर बच्चों और टिनेर्जस को फेसबुक और इंस्टाग्राम का ज्यादा इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित करने वाले फीचर्स तैयार करने का आरोप लगाया गया था. कंपनी ने इन आरोपों से इनकार किया है और कहा है कि टिनेर्जस के लिए सुरक्षित ऑनलाइन एक्सपीरियंस उसकी प्राथमिकता है.&amp;nbsp;बच्चों के लिए Meta का नया प्लान क्या है?
Meta के नए प्लान के तहत फेसबुक और इंस्टाग्राम को मिलाकर 18 साल से कम उम्र के यूजर्स के लिए रोजाना 2 घंटे की डिफॉल्ट टाइम लिमिट होगी. अगर इस लिमिट को हटाना है तो पेरेंट्स की अनुमति जरूरी होगी. साथ ही दोनों प्लेटफॉर्म पर बिताया गया समय इसी कुल लिमिट में गिना जाएगा.&amp;nbsp;&amp;nbsp;यह भी पढ़ें - Top Tech Trends 2026: गेमिंग फोन से Mini AI PC तक, ये गैजेट्स हैं खास
रात 12 से सुबह 6 बजे तक बंद रहेगा एक्सेस
बच्चों के रात में सोशल मीडिया इस्तेमाल को कम करने के लिए रात 12 बजे से सुबह 6 बजे तक फेसबुक और इंस्टाग्राम का इस्तेमाल नहीं किया जा सकेगा. इसके अलावा स्कूल टाइम के दौरान भी नोटिफिकेशन कम करने की तैयारी है. सुबह 8 बजे से दोपहर 3 बजे तक डिफॉल्ट रूप से नोटिफिकेशन म्यूट रहेंगे. हालांकि सीधे मैसेज और सुरक्षा से जुड़े जरूरी अलर्ट मिलते रहेंगे. लगातार ऐप इस्तेमाल करने पर ब्रेक लेने के रिमाइंडर भी दिखाए जाएंगे.&amp;nbsp;
उम्र की जांच और पैरेंटल कंट्रोल होंगे मजबूत
Meta उम्र की जांच के लिए ज्यादा सख्त तकनीक का इस्तेमाल करेगा. साथ ही पैरेंटल कंट्रोल को आसान बनाया जाएगा. बच्चों को नुकसान पहुंचाने वाले कंटेंट से बचाने के लिए भी अतिरिक्त सुरक्षा उपाय किए जाएंगे. नाबालिगों के पोस्ट पर लाइक और रिएक्शन की गिनती हटाने साथ ही कुछ ब्यूटी फिल्टर को सीमित करने की भी बात कही गई है.
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        <pubDate>Thu, 27 Aug 2026 18:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>WhatsApp का बड़ा सिक्योरिटी अपडेट! 2FA हुआ और एडवांस</title>
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        <description><![CDATA[ WhatsApp का बड़ा सिक्योरिटी अपडेट! 2FA हुआ और एडवांस ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 27 Aug 2026 02:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>TRAI का 1600 सीरीज नंबर क्या है? जानें क्यों है जरूरी और रोकेगा फ्रॉड</title>
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        <description><![CDATA[ अगर आपके फोन पर कभी बैंक, बीमा कंपनी या किसी सरकारी संस्था के नाम से कॉल आती है तो वो असली है या नकली है, अक्सर लोग पहचान नहीं पाते हैं. इसी समस्या को कम करने के लिए TRAI ने 1600 सीरीज के नंबर की व्यवस्था को बढ़ावा दिया है. इसका मकसद सर्विस और ट्रांजैक्शन से जुड़े असली कॉल को नॉर्मल मोबाइल नंबरों और स्पैम कॉल से अलग पहचान देना है.
क्या है 1600 सीरीज नंबर?
जानकारी के मुताबिक, 1600 एक खास नंबरिंग सीरीज है जिसे सरकारी संस्थाओं और BFSI यानी Banking, Financial Services and Insurance सेक्टर की सर्विस और ट्रांजैक्शनल वॉयस कॉल के लिए अलॉट किया गया है. इसका मतलब है कि बैंकिंग या उससे रिलेटेड संस्थाओं के सर्विस से संबंधित लोगों को एक अलग नंबर सीरीज से कॉल की जाएगी. TRAI का मानना है कि इससे ग्राहकों को ये समझने में आसानी होगी कि कॉल किसी संस्था की ओर से है या किसी नॉर्मल मोबाइल नंबर से आ रही है.
किन संस्थाओं के लिए लागू है?
1600 सीरीज का इस्तेमाल खासतौर पर फाइनेंशियल क्षेत्र से जुड़ी संस्थाओं के लिए किया जा रहा है. इसमें RBI के तहत आने वाले बैंक और SEBI से संबंधित संस्थाएं, PFRDA के अंतर्गत आने वाली संस्थाएं और बीमा कंपनियां शामिल हैं. TRAI ने अलग-अलग सेक्टर के लिए चरणबद्ध तरीके से इसे लागू करने की समयसीमा तय की है.
यह भी पढ़ें: स्पैम कॉल्स पर बड़ा बवाल! Truecaller और TRAI आमने-सामने, जानिए यूजर्स पर क्या पड़ेगा असर?
क्यों पड़ी इसकी जरुरत
आपको बता दें कि आज साइबर फ्रॉड में फोन कॉल का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर किया जाता है. ठग कभी बैंक कर्मचारी, इंश्योरेंस एजेंट या सरकारी अधिकारी बनकर लोगों को कॉल करते हैं और फिर OTP, बैंक डिटेल, कार्ड की जानकारी हासिल करने की कोशिश करते हैं.
एक बड़ी समस्या ये भी है कि कई असली संस्थाएं लंबे समय तक नॉर्मल 10 अंकों वाले मोबाइल नंबरों से सर्विस कॉल करती रही हैं. ऐसे में ग्राहकों के लिए असली और संदिग्ध कॉल के बीच अंतर करना मुश्किल हो जाता है. TRAI ने इसी वजह से 1600 सीरीज को अलग पहचान देने वाला जरिया बनाया है.
इस नंबर सीरीज से ग्राहकों को क्या होगा फायदा
बताते चलें कि इस व्यवस्था का सबसे बड़ा फायदा कॉल की पहचान और भरोसा बढ़ाना है. अगर किसी बैंक या वित्तीय संस्था की सर्विस या ट्रांजैक्शनल कॉल 1600 सीरीज से आती है तो ग्राहक उसे आसानी से समझ पाएगा कि कॉल कहां से की जा रही है.
इससे उन कॉल्स को अलग पहचानने में मदद मिल सकती है जो नॉर्मल मोबाइल नंबरों से की जाती हैं और जिनमें स्पैम या फ्रॉड का जोखिम ज्यादा रहता है.
हालांकि, सिर्फ नंबर देखकर आंख बंद करके भरोसा करना कभी भी सही नहीं रहता है. किसी भी कॉल पर OTP, UPI PIN, ATM PIN, पासवर्ड या बैंकिंग क्रेडेंशियल जैसी जरूरी जानकारी शेयर नहीं करनी चाहिए.
क्या 1600 नंबर वाली हर कॉल सुरक्षित है
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि 1600 सीरीज हमेशा आपको सेफ्टी की गारंटी नहीं देता है. ये बस कॉल की पहचान बेहतर करने के लिए बनाई गई व्यवस्था है. फिर भी किसी कॉल पर पर्सनल या पैसों से जुड़ी जानकारी शेयर करने से पहले सावधानी जरूरी है.
अगर कॉल करने वाला व्यक्ति आपको किसी संस्था से बताकर तुरंत पैसे भेजने, OTP बताने या किसी लिंक पर क्लिक करने के लिए कहे तो कॉल काटकर तुरंत संबंधित संस्था के आफिशियल ऐप, वेबसाइट से वेरिफाई करना ज्यादा बेहतर रहता है.
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        <pubDate>Thu, 27 Aug 2026 02:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>लॉन्च हुआ नया Mac Mini और Studio! जानें कीमत से लेकर फीचर्स तक सब कुछ</title>
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        <description><![CDATA[ Apple ने डिवाइसेज को देश में काफी ज्यादा पसंद किया जाता है. खासतौर पर युवाओं में एप्पल के डिवाइसेज का काफी क्रेज देखने को मिलता है. इसी कड़ी में आज एप्पल ने अपना नया Mac mini और Mac Studio मॉडल मार्केट में उतार दिया है. बता दें कि ये पहली बार है कि कंपनी ने Mac mini में 2nm प्रोसेसर M6 उपलब्ध कराया है.
कैसे है नया Mac Studio
एप्पल ने Mac Studio को पूरी तरह से यूनिक बनाया है. कंपनी ने इसे इस बार हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग की जरूरत वाले लोगों को ध्यान में रखकर डिजाइन किया है. M5 Ultra के टॉप मॉडल में 36-कोर CPU, 80-कोर GPU और 512GB तक यूनिफाइड मेमोरी उपलब्ध कराई गई है.
बता दें कि स्टोरेज को 16TB तक बढ़ाया जा सकता है. वहीं, दूसरी तरफ, M5 Max मॉडल को 40-कोर GPU, 128GB यूनिफाइड मेमोरी और 8TB स्टोरेज तक कॉन्फिगर किया जा सकता है.
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Mac mini में क्या मिला नया
जानकारी के मुताबिक, कंपनी ने इस बार नए Mac mini में एक बड़ा अपग्रेड दिया है. दरअसल, इस बार इसमें डिवाइस में कंपनी का पहला 2nm प्रोसेस पर तैयार किया गया प्रोसेसर दिया है. इसमें 12-कोर CPU और 12-कोर GPU भी मौजूद हैं.
इसके अलावा इस डिवाइस में दो 16-कोर Neural Engine भी कंपनी ने दिए हैं. कंपनी का दावा है कि इस डिवाइस में यूजर्स को बेहतरीन ग्राफिक्स और परफॉर्मेंस देखने को मिलेगा. बता दें कि कंपनी ने बेस मॉडल में 16GB यूनिफाइड मेमोरी और 256GB स्टोरेज दी है जिसे मैक्सिमम 32GB RAM और 2TB स्टोरेज तक कॉन्फिगर किया जा सकता है.
इसके अलावा कंपनी ने Mac mini को M5 Pro चिप के साथ भी पेश किया है. इसमें 15-कोर CPU और 12-कोर GPU मिलता है. इसका बेस कॉन्फिगरेशन 24GB मेमोरी और 512GB स्टोरेज के साथ आता है.
इस अपग्रेड भी है खास
दरअसल, कंपनी ने नए Mac mini के दोनों वेरिएंट में कनेक्टिविटी अपग्रेड भी दिए हैं जो यूजर्स के बहुत काम आने वाले हैं. जानकारी के मुताबिक, कंपनी ने मैक मिनी के दोनों वेरिएंट्स में Wi-Fi 7 और Bluetooth 6 का सपोर्ट उपलब्ध कराया है. इसके साथ ही इसके बेस मॉडल में अब 2.5Gb Ethernet मिलता है.
कितनी है कीमत
अब इन दोनों डिवाइस के कीमतों पर नजर डालें भारत में Mac Studio की शुरूआती कीमत 2,79,900 रुपये है. इसके टॉप वेरिएंट की कीमत 6,29,900 रुपये रखी गई है. Mac mini की शुरूआती कीमत 99,900 रुपये रखी गई है. वहीं, इसके टॉप वेरिएंट की कीमत 2,09,900 रुपये है. बता दें कि देश में इन डिवाइस की बिक्री 22 सितंबर 2026 से शुरू होने वाली है. इसे लोग एप्पल के स्टोर से खरीद सकते हैं.
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        <pubDate>Thu, 27 Aug 2026 02:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>रक्षाबंधन पर ऑनलाइन खरीदारी में न करें ये गलती, हो सकती है ठगी</title>
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        <description><![CDATA[ रक्षाबंधन पर ऑनलाइन खरीदारी करते समय छोटी सी लापरवाही भी आपको साइबर ठगी का शिकार बना सकती है. त्योहार के दिनों में राखी, मिठाई और तोहफों पर भारी छूट दिखाकर ठग नकली वेबसाइट और फर्जी भुगतान पन्नों तक लोगों को पहुंचाते हैं. भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र की सलाह है कि खरीदारी से पहले वेबसाइट और भुगतान की अच्छी तरह जांच करें. त्योहारों के दौरान खरीदारी बढ़ने के साथ ही ठग भी नए तरीके आजमाते हैं. सोशल मीडिया, संदेश और व्हाट्सऐप पर भारी छूट, मुफ्त घर पहुंच सेवा या बहुत कम कीमत पर सामान देने वाले संदेश भेजे जा सकते हैं. इनके साथ दिए गए लिंक असली दुकानों जैसी दिखने वाली नकली वेबसाइट पर ले जा सकते हैं.
रक्षाबंधन पर बढ़ जाता है ठगी का खतरा
नकली वेबसाइट पर सामान मंगाने के नाम पर पैसे तो ले लिए जाते हैं, लेकिन सामान नहीं पहुंचता है और लोग ठगे जाते हैं. कई बार इसी बहाने बैंक या भुगतान से जुड़ी जानकारी भी हासिल करने की कोशिश होती है, इसलिए किसी भी ऑफर को देखकर तुरंत भरोसा करना सही नहीं है.
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ऐसे करें&amp;nbsp;फर्जी वेबसाइट की पहचान
किसी अनजान वेबसाइट पर खरीदारी करने से पहले उसका पता ध्यान से देखें. नाम में मामूली बदलाव, गलत स्पेलिंग या अजीब सा पता दिखे तो सावधान हो जाएं. सुरक्षित वेबसाइट के पते में एचटीटीपीएस और ताले का निशान दिखाई दे सकता है, लेकिन केवल ताले के निशान को देखकर भरोसा न करें. बेहतर है कि वेबसाइट का पता खुद लिखकर खोलें या संबंधित कंपनी का ऑफिसियल मोबाइल ऐप इस्तेमाल करें.
तुरंत भुगतान न करें
त्योहार पर 70 या 80 फीसदी छूट जैसे ऑफर आकर्षक लग सकते हैं, लेकिन बहुत ज्यादा सस्ता सौदा दिखे तो पहले उसकी सच्चाई जांच कर लेंस. भुगतान करते समय बैंक खाते की जानकारी, कार्ड नंबर, सीवीवी, ओटीपी या यूपीआई पिन किसी के साथ साझा न करें. किसी अनजान व्यक्ति के कहने पर भुगतान करने की भी जरूरत नहीं है. खरीदारी के लिए ऐसे भुगतान जरिया का इस्तेमाल करें जिसमें सुरक्षा की अतिरिक्त सुविधा मौजूद हो.
ठगी हो जाए तो तुरंत उठाएं ये कदम
अगर ऑनलाइन खरीदारी के दौरान पैसे कट गए हैं और आपको ठगी का शक है तो देर न करें. इसके लिए तुरंत 1930 पर शिकायत दर्ज करें. इसके साथ ही राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर शिकायत की दर्ज करें. भुगतान से जुड़ा संदेश, लेनदेन की जानकारी, संदिग्ध लिंक और बातचीत के प्रमाण संभालकर रखें. जल्दी शिकायत करने से पैसे को रोकने या वापस पाने की कोशिश में मदद मिल सकती है.
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        <pubDate>Thu, 27 Aug 2026 02:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>iPhone 18 सीरीज लॉन्च होने की तारीख कंफर्म, इस बार &amp;apos;सरप्राइज&amp;apos; देने की तैयारी में Apple</title>
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        <description><![CDATA[ दुनिया की दिग्गज टेक कंपनी एप्पल ने अपने बहुप्रतीक्षित सालाना लॉन्च कार्यक्रम का औपचारिक ऐलान कर दिया है. यह खास कार्यक्रम 9 सितंबर 2026 को अमेरिका के क्यूपर्टिनो स्थित एप्पल पार्क के स्टीव जॉब्स थिएटर में आयोजित किया जाएगा. अमेरिकी समय के अनुसार यह समारोह सुबह 10 बजे शुरू होगा, जिसे भारतीय दर्शक उसी दिन रात 10:30 बजे से एप्पल की आधिकारिक वेबसाइट और विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर सीधे देख सकेंगे. कंपनी ने इस बार अपने लॉन्च इवेंट के लिए Surprise and Shine टैगलाइन को चुना है.
नए डिवाइस लॉन्च पर होगी नजर
सितंबर का यह लॉन्च इवेंट ऐपल के प्रशासनिक इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ने वाला है. यह पहला मौका होगा जब कंपनी के नए मुख्य कार्यकारी अधिकारी जॉन टर्नस इस वैश्विक मंच से नए प्रोडक्ट्स को पेश करेंगे. टर्नस 1 सितंबर 2026 को टिम कुक के स्थान पर एप्पल के सीईओ के रूप में कार्यभार संभालने वाले हैं. ऐसे में पूरी दुनिया की निगाहें न केवल आने वाले नए डिवाइसेज पर होंगी, बल्कि कंपनी की कमान संभालने वाले नए नेतृत्व के दृष्टिकोण पर भी टिकी रहेंगी.
iPhone 18 Pro सीरीज हो सकते हैं लॉन्च
इस इवेंट में iPhone 18 Pro और iPhone 18 Pro Max को पेश किए जाने की पूरी संभावना जताई जा रही है. रिपोर्ट्स के अनुसार, इन प्रीमियम मॉडल्स में एडवांस 2nm प्रोसेस पर आधारित A20 Pro चिपसेट और एप्पल का अपना इन-हाउस C2 मॉडम देखने को मिल सकता है. डिजाइन की बात करें तो इनमें अंडर-डिस्प्ले फेस आईडी और बड़ा कैमरा बंप मिल सकता है. साथ ही इन्हें एक नए डार्क चेरी कलर में उतारा जा सकता है. iPhone 18 Pro Max में बेहतर फोटोग्राफी के लिए वेरिएबल अपर्चर कैमरा मिलने की भी चर्चा है.
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एप्पल का पहला फोल्डेबल फोन लॉन्च होने की संभावना
इस बार के लॉन्च की सबसे मुख्य आकर्षण एप्पल का पहला फोल्डेबल स्मार्टफोन हो सकता है, जिसे लेकर टेक जगत में काफी समय से उत्सुकता है. ऐसा माना जा रहा है कि इसे iPhone Fold या iPhone Ultra नाम दिया जा सकता है. सामने आई रिपोर्ट्स के अनुसार, इस फोल्डेबल डिवाइस में अंदर की तरफ लगभग 7.8 इंच का बड़ा डिस्प्ले और बाहर की तरफ 5.3 इंच की कवर स्क्रीन दी जा सकती है. यह नया फॉर्म फैक्टर ऐपल के स्मार्टफोन सेगमेंट में एक बड़ा बदलाव साबित हो सकता है.
एप्पल के और कौन से डिवाइस हो सकते हैं लॉन्च?
स्मार्टफोन के अलावा, कंपनी अपने वियरेबल और ऑडियो पोर्टफोलियो को भी अपडेट करने की तैयारी में है. इवेंट के दौरान नई Apple Watch Series 12 के साथ-साथ अपग्रैडेड AirPods और अन्य एक्सेसरीज को भी मार्केट में उतारा जा सकता है. हालांकि, बेस iPhone 18 को लेकर एप्पल की रणनीति में बदलाव की खबर है. मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो स्टैंडर्ड iPhone 18 को इस इवेंट में पेश नहीं किया जाएगा, बल्कि इसे साल 2027 में लॉन्च करने की योजना बनाई गई है.
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        <pubDate>Thu, 27 Aug 2026 02:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>Galaxy AI और Apple Intelligence में कौन है ज्यादा बेहतर? जानें अंतर</title>
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        <description><![CDATA[ टेक्नोलॉजी की दुनिया में अब स्मार्टफोन भी काफी एडवांस हो चुके हैं. अब स्मार्टफोन में सिर्फ कैमरा, प्रोसेसर या बैटरी ही मायने नहीं रखता है बल्कि अब लोगों को उसमें आने वाले एआई फीचर्स पर ज्यादा फोकस रहता है. इस दौड़ में Samsung का Galaxy AI और Apple का Apple Intelligence नाम सामने आते हैं. दोनों कंपनियां अपने स्मार्टफोन में यूजर्स के काम आसान बनाने के लिए AI फीचर्स उपलब्ध कराती हैं. लेकिन सवाल है कि इन दोनों में कौन आगे निकल चुका है?
क्या है Galaxy AI की सबसे बड़ी ताकत
Samsung ने Galaxy AI को अपने फ्लैगशिप Galaxy स्मार्टफोन्स का अहम हिस्सा बना दिया है. इसका फोकस सिर्फ चैटबॉट या सवालों के जवाब देने तक सीमित नहीं रह गया है. अब AI का इस्तेमाल फोटो एडिटिंग, कॉल और मैसेजिंग, नोट्स, ट्रांसलेशन और सर्च जैसे कई कामों में किया जा रहा है.
बता दें कि Galaxy AI की सबसे बड़ी खासियत ये है कि Samsung अलग-अलग AI फीचर्स को फोन के कई हिस्सों में कनेक्ट करने पर ज्यादा फोकस कर रहा है. जैसे आपको बता दें कि फोटो में किसी ऑब्जेक्ट को हटाना, तस्वीर को बेहतर बनाना या किसी कंटेंट का सार निकालना जैसे काम अब कुछ टैप में किए जा रहे हैं.
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Apple Intelligence क्यों है खास?
वहीं, अब Apple Intelligence की बात करें तो इसका सबसे बड़ा फायदा Apple का हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर पर पूरा कंट्रोल माना जाता है. कंपनी AI को iPhone के ऑपरेटिंग सिस्टम में इस तरह जोड़ रही है कि यूजर्स को किसी काम के लिए अलग से कोई ऐप की जरूरत न पड़े. Writing tools, नोटिफिकेशन की समरी, ईमेल और मैसेज से जुड़े स्मार्ट सजेशन, फोटो एडिटिंग और Siri में AI के इस्तेमाल जैसे फीचर्स Apple के AI एक्सपीरिएंस का हिस्सा हैं.
इसके अलावा Apple Privacy पर भी काफी ज्यादा फोकस रखता है. कंपनी का दावा है कि ज्यादातर AI प्रोसेसिंग डिवाइस के अंदर ही होते हैं और मुश्किल कामों के लिए Private Cloud Compute जैसी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जाता है. इससे यूजर डेटा की सेफ्टी के लिए एप्पल अगल प्लान अपनाती है.
कौन है ज्यादा स्मार्ट
अब अगर इन दोनों पर नजर डालें तो दोनों ही अपनी जगह पर यूजर्स को बेहतर एक्सपीरिएंस देने पर फोकस कर रहे हैं. लेकिन अगर बात ज्यादा फीचर्स और AI को अलग-अलग जगह इस्तेमाल करने की हो तो Galaxy AI काफी बेहतरीन साबित होता है.
वहीं, Apple Intelligence की सबसे बड़ी ताकत उसका इकोसिस्टम और सिस्टम-लेवल इंटीग्रेशन है. iPhone, iPad और Mac के बीच Apple AI एक्सपीरिएंस को एक जैसा रखने की कोशिश कर रहा है.
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        <pubDate>Wed, 26 Aug 2026 13:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>क्या ट्रैफिक सिग्नल को हैक किया जा सकता है? जानिए सच्चाई</title>
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        <description><![CDATA[ Traffic Signal: बड़े शहरों की सड़कों पर ट्रैफिक सिग्नल यातायात को मैनेज करने के लिए एक अहम भूमिका निभाता है. सिग्नल में लगीं लाल, पीली और हरी बत्तियों ये बताती हैं कि किसी डॉयरेक्शन से आने वाली गाड़ियों को कब रुकना है और कब आगे बढ़ना है. लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि इन ट्रैफिक सिग्नल को भी हैक किया जा सकता है? बढ़ते टेक्नोलॉजी के साथ आज ज्यादातर चीजें डिजिटली कनेक्ट हो चुकी हैं जिससे साइबर हमले जैसी समस्या भी बढ़ चुकी हैं. आइए जानते हैं कि क्या सच में ट्रैफिक सिग्नल को हैक किया जा सकता है या फिर ये एक झूठ है.
कैसे काम करता है ट्रैफिक सिग्नल?
दरअसल, पुराने ट्रैफिक सिग्नल टाइमर के आधार पर काम करते थे. यानी एक निश्चित समय के बाद लाल बत्ती हरी और हरी बत्ती लाल हो जाती थी. लेकिन अब टेक्नोलॉजी के जमाने में बड़े शहरों में लगाए जाने वाले abplive.com/technology/here-s-how-youtube-views-will-be-counted-from-now-on-know-what-the-new-rule-is-3177047 पहले के मुकाबले काफी एडवांस हो चुके हैं.
कई जगहों पर सिग्नल कैमरा, सेंसर, ट्रैफिक कंट्रोल सेंटर और नेटवर्क से कनेक्ट रहते हैं. इनकी मदद से सड़क पर वाहनों की संख्या के हिसाब से सिग्नल का समय बदला जा सकता है. यही नेटवर्क कनेक्टिविटी इनके लिए साइबर सेफ्टी को जरूरी बनाता है.
क्या ट्रैफिक सिग्नल हैक हो सकता है?
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि कुछ कंडिशन में ट्रैफिक सिग्नल को हैक करना संभव है. बता दें कि अगर किसी ट्रैफिक कंट्रोल सिस्टम का नेटवर्क सेफ नहीं है, कमजोर सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया जाए या कोई साइबर अपराधी सिस्टम तक पहुंच जाए तो तो वह सिग्नल को कंट्रोल कर सकता है और अपने अनुसार चला भी सकता है.
हालांकि इसका मतलब ये नहीं है कि कोई भी व्यक्ति आसानी से सड़क पर लगे ट्रैफिक सिग्नल को अपने मोबाइल या लैपटॉप से हैक कर सकता है. एडवांस ट्रैफिक सिस्टम में कई सेफ्टी लेयर मौजूद होते हैं, नेटवर्क कंट्रोल और सर्वेलांस सिस्टम का भी इस्तेमाल किया जाता है.
हैकिंग से क्या खतरा हो सकता है?
बताते चलें कि अगर किसी ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम पर साइबर हमला हो जाए तो इसके बहुत बड़ा खतरा हो सकता है. जैसे ट्रैफिक सिग्नल का टाइमिंग गलत हो सकता है, किसी चौराहे पर ट्रैफिक का फ्लो गड़बड़ हो सकता है या कई सिग्नल के बीच तालमेल बिगड़ सकता है.
ऐसी स्थिति में ट्रैफिक जाम बढ़ने के साथ दुर्घटना का जोखिम भी बढ़ जाता है. इसके अलावा ट्रैफिक कैमरा और सेंसर से जुड़े सिस्टम खराब होने पर प्रशासन को असली समय में यातायात की सटीक जानकारी भी नहीं मिल पाएगी.
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        <pubDate>Wed, 26 Aug 2026 13:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>Apple Maps में दिखेंगे Ads! जानें क्यों नहीं मिला बंद करने का ऑप्शन</title>
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        <description><![CDATA[ आज के समय में नेविगेशन ऐप यूजर्स के रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है. खासतौर पर जो लोग ज्यादा ट्रैवल करते हैं उनके लिए नेविगेशन ऐप काफी मददगार साबित होता है. ऐसे में गूगल मैप्स और एप्पल डिवाइस वालों के लिए एप्पल मैप्स जैसे नेविगेशन ऐप मौजूद हैं. इसी कड़ी में बता दें कि अब एप्पल मैप्स में यूजर्स को विज्ञापन भी दिखाई देंगे. इसके अलावा सबसे बड़ी बात ये है कि ऐप में आने वाले विज्ञापन को यूजर्स बंद भी नहीं कर सकता है.
सर्च करते समय दिखाई देंगे विज्ञापन
जानकारी के अनुसार, Apple Maps में विज्ञापनों की जगह को इस तरह तैयार किया गया है कि वे सर्च रिजल्ट के बीच आसानी से दिखाई दे सकें. जब कोई यूजर किसी जगह, दुकान या बिजनेस को सर्च करता है और उस कीवर्ड के लिए किसी कंपनी ने विज्ञापन खरीदा है तो उसका प्रमोशनल रिजल्ट सबसे ऊपर दिखाई देता है.
इसके अलावा, यूजर जब Maps में सर्च शुरू करता है, तब Suggested Places सेक्शन में भी विज्ञापन दिखाई देते हैं. एक सर्च रिजल्ट सेट में फिलहाल एक विज्ञापन दिखाया जा रहा है. इससे कारोबारियों को ग्राहकों तक डॉयरेक्ट पहुंचने का नया तरीका मिलेगा.
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नहीं बंद कर सकते विज्ञापन
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि Apple Maps में विज्ञापन आने की सबसे बड़ी बात ये है कि यूजर्स के पास इन्हें पूरी तरह बंद करने का कोई ऑप्शन नहीं दिया गया है. यानी अगर आपके एरिया में किसी सर्च के लिए विज्ञापन उपलब्ध है तो उसे हटाने के लिए कोई अलग सेटिंग नहीं मिलेगी.
हालांकि Apple ने विज्ञापनों को नॉर्मल सर्च रिजल्ट से अलग पहचानने के लिए नीले रंग का Ad लेबल भी दिया हुआ है. इससे यूजर को आसानी से समझ आ जाएगा कि सामने जो दिखाई दे रहा है वो कोई ऑर्गेनिक सर्च रिजल्ट है या पेड प्रमोशन है.
यूजर्स के डेटा को लेकर Apple का दावा
विज्ञापन शुरू होने के बावजूद Apple ने प्राइवेसी को लेकर अपनी नीति साफ कर दी है. कंपनी के मुताबिक, Maps में यूजर जिस विज्ञापन के साथ इंटरैक्ट करता है, उसे उसके Apple Account से नहीं जोड़ा जाता है. साथ ही विज्ञापन से संबंधित डेटा थर्ड-पार्टी कंपनियों के साथ शेयर भी नहीं किया जा रहा है. इससे साफ होता है कि एप्पल अपने यूजर्स के डेटा सेफ्टी का भी ध्यान रख रही है.
हालांकि, Apple ने Maps Ads के लिए कुछ कैटेगरी पर प्रतिबंध भी लगाए हैं. कंपनी की Advertising Services Policy के तहत होम सर्विसेज, बेल बॉन्ड्स और क्रिप्टोकरेंसी ATM से जुड़े विज्ञापनों को परमिशन नहीं दी गई है.
वहीं मेडिकल सर्विसेज से जुड़े विज्ञापन कुछ कंडिशन में दिखाए जा सकते हैं. हालांकि, ऐसे विज्ञापनों का पहले मूल्यांकन किया जाएगा उसके बाद ही उन्हें चलाने की परमिशन दी जाएगी.
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        <pubDate>Wed, 26 Aug 2026 13:30:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Airplane Mode लगाने पर फोन में असल में क्या&amp;क्या बंद होता है? जानें सच्चाई</title>
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        <description><![CDATA[ Airplane Mode लगाने पर फोन में असल में क्या-क्या बंद होता है? जानें सच्चाई ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 26 Aug 2026 13:30:04 +0530</pubDate>
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        <title>किस देश में कितने दिन काम करके खरीद पाएंगे iPhone 18 Pro Max? समझें हिसाब</title>
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        <description><![CDATA[ iPhone 18 Pro &amp;nbsp;को लेकर चर्चाएं तेज हैं. इसके बार में लगातार नई जानकारी सामने आ रही है. Apple ने अभी तक नए iPhone के लॉन्च इवेंट की तारीख की आधिकारिक घोषणा नहीं की है, लेकिन कई लीक्स और रिपोर्ट्स में 9 सितंबर 2026 को संभावित लॉन्च डेट बताया जा रहा है. अगर यह तारीख सही होती है, तो iPhone 18 Pro सीरीज में पिछले मॉडल्स की तुलना में कई बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं. खासकर iPhone 18 Pro Max की कीमत को लेकर काफी चर्चा है.
वहीं iPhone की कीमत को कीमत अलग-अलग देशों में लोगों की कमाई और खरीदने की क्षमता काफी अलग होती है. इसलिए एक ही iPhone किसी देश में कुछ दिनों की कमाई में खरीदा जा सकता है, जबकि दूसरे देश में इसके लिए कई महीनों तक काम करना पड़ सकता है. ऐसे में आइए जानते हैं कि किस देश में कितने दिन काम करके iPhone 18 Pro Max खरीद पाएंगे.&amp;nbsp;
iPhone 18 Pro Max की कीमत कितनी हो सकती है?
Apple ने अभी iPhone 18 Pro और iPhone 18 Pro Max की कीमत की आधिकारिक जानकारी नहीं दी है. हालांकि, अलग-अलग रिपोर्ट्स और लिक्स के अनुमान कीमत बढ़ने की ओर इशारा कर रहे हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, iPhone 18 Pro की शुरुआती कीमत करीब 1,299 डॉलर और iPhone 18 Pro Max की कीमत करीब 1,399 डॉलर हो सकती है. वहीं, 1TB वाले iPhone 18 Pro Max की कीमत मौजूदा मॉडल से करीब 300 डॉलर ज्यादा होने का अनुमान भी सामने आया है. भारत में iPhone 17 Pro Max की शुरुआती कीमत करीब 1,34,900 रुपये है. ऐसे में टैक्स, इंपोर्ट ड्यूटी और Apple की भारतीय कीमत को देखते हुए iPhone 18 Pro Max की कीमत 1.60 लाख रुपये से ऊपर जा सकती है.&amp;nbsp;
किस देश में कितने दिन काम करके iPhone 18 Pro Max खरीद पाएंगे
iPhone Affordability Index 2026 के आंकड़ों के मुताबिक अलग-अलग देशों में iPhone 18 Pro Max खरीदने के लिए काम करने वाले दिनों में काफी बड़ा अंतर है. इसे खरीदने के लिए सबसे कम कामकाजी दिन स्विट्जरलैंड और लक्जमबर्ग में सिर्फ 3 दिन हैं. इसके बाद अमेरिका, बेल्जियम, डेनमार्क, नीदरलैंड और नॉर्वे में 4 दिन, जबकि फिनलैंड, कनाडा, जर्मनी, आयरलैंड, ऑस्ट्रिया और ऑस्ट्रेलिया में 5 दिन की कमाई चाहिए.
फ्रांस और स्वीडन में 6 दिन, यूके और न्यूजीलैंड में 7 दिन, साथ ही UAE, इटली और सिंगापुर में 8 दिन काम करना होगा. इसके बाद स्पेन में 9 दिन, चेकिया में 12 दिन, पोलैंड में 17 दिन, पुर्तगाल में 24 दिन, हंगरी में 27 दिन और चिली में 32 दिन लगते हैं. वहीं मलेशिया में 45 दिन, थाईलैंड में 61 दिन, ब्राजील में 77 दिन, तुर्की में 89 दिन, वियतनाम में 99 दिन और फिलीपींस में 101 दिन की कमाई चाहिए. हालांकि हर देश में काम का भार और तरीका अलग अलग हो सकता है. ये केवल सोशल मीडिया दावे हैं जो अक्सर चर्चा में रहते हैं.
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भारत में कितने दिन काम करना होगा?
iPhone Affordability Index 2026 में औसत वेतन और iPhone 18 Pro की कीमत के आधार पर अलग-अलग देशों का आंकड़ा दिया गया है. &amp;nbsp;इसके मुताबिक, भारत में एक औसत कर्मचारी को iPhone 18 Pro खरीदने के लिए करीब 160 दिन काम करना पड़ेगा. जहां कुछ अमीर देशों में कुछ ही दिनों की कमाई से यह फोन खरीदा जा सकता है, वहीं भारत में इसके लिए कई महीनों की कमाई की जरूरत पड़ती है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Tue, 25 Aug 2026 21:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>इंसान के दिमाग से चलेगा सुपरकंप्यूटर! इस देश की नई टेक्नोलॉजी</title>
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        <description><![CDATA[ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI लगातार लोगों की बीच तेजी से अपने पैर पसार रहा है. टेक्नोलॉजी की दुनिया में एआई ने लोगों के काम को काफी हद तक आसान बनाने का काम किया है. लेकिन इसी कड़ी में एक नई खबर सामने आई है जहां पर अब सुपरकंप्यूटर को दिमाग से चलाने का दावा किया जा रहा है. दरअसल, आपको बता दें कि आज के समय में ज्यादातर एआई सिस्टम कंप्यूटरों पर काम करते हैं जो पूरी तरह से इलेक्ट्रॉनिक्स और सिलिकॉन चिप्स पर निर्भर करते हैं.
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, सिंगापुर में एक ऐसा सिस्टम तैयार किया जा रहा है जिसमें कंप्यूटर के हिस्से की जगह पर अब इंसान की दिमाग यानी न्यूरॉन्स का इस्तेमाल किया जा रहा है.
सिंगापुर में तैयार हुआ अनोखा बायोलॉजिकल सर्वर
जानकारी के अनुसार, इस प्रोजेक्ट पर नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर (NUS) के Yong Loo Lin School of Medicine, डेटा सेंटर ऑपरेटर DayOne और ऑस्ट्रेलियाई बायोलॉजिकल कंप्यूटिंग कंपनी Cortical Labs मिलकर काम कर रहे हैं.
टीम ने 20 CL1 यूनिट्स को एक सर्वर रैक में लगाया है. इसके अलावा इस रैक की सबसे बड़ी खास बात ये है कि ये दुनिया का पहला अपने आप चलने वाला रैक बन गया है. इसके अलावा इस रैक में एक हिस्सा ह्यूमन न्यूरॉन्स से चलेगा.
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बताया जा रहा है कि इस पूरे सिस्टम में 20 CL1 यूनिट शामिल हैं. हर यूनिट में लैब में तैयार किए गए करीब 8 लाख ह्यूमन न्यूरॉन्स मौजूद हैं. इसका मतलब ये है कि इन न्यूरॉन्स को इलेक्ट्रिक सिग्नल मिलेगा और वे इस सिग्नल पर अपना रिएक्शन देंगे और मैसेज भेजने का काम करेंगे. इस प्रोसेस से ये होगा कि ये सिर्फ मैसेज ट्रांसफर करने के बजाय अपने आप रिएक्शन देना सीख जाएंगे.
एआई के लिए क्यों जरूरी ये टेक्नोलॉजी
दरअसल, इस रिसर्च का सबसे बड़ा मकसद बेहतर एनर्जी एफिशिएंसी वाली कंप्यूटिंग को समझना है. वैज्ञानिक ये पता लगाना चाहते हैं कि क्या ह्यूमन न्यूरॉन्स कुछ कंप्यूटिंग काम पुराने चिप्स के मुकाबले में कम एनर्जी लेते सकते हैं या नहीं.
बता दें कि अगर ये रिसर्च सफल होता है तो इसका इस्तेमाल सिर्फ एआई और कंप्यूटिंग तक ही सीमित नहीं रहने वाला है बल्कि इसे दवाओं की खोज, मेडिकल रिसर्च और दिमाग से जुड़ी बीमारियों को बेहतर तरीके से समझने के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है.
कैसे लगाए जाएंगे ह्यूमन न्यूरॉन्स
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि Cortical Labs इंसानी स्टेम सेल्स से न्यूरॉन्स तैयार करता है. इन्हें एक खास सिलिकॉन प्लेटफॉर्म पर रखा जाता है जिसमें बेहद छोटे इलेक्ट्रोड लगे होते हैं. अब ये इलेक्ट्रोड न्यूरॉन्स तक इलेक्ट्रिकल सिग्नल पहुंचाने के साथ-साथ उनसे मिलने वाले सिग्नल को रिकॉर्ड करने का भी काम करते हैं.
बता दें कि इसके बाद ये सेल्स एक बॉयोलॉजिकल ऑपरेटिंग सिस्टम से कनेक्ट होते हैं. बता दें कि इसमें एक सॉफ्टवेयर का भी काम होता है जो कंप्यूटर और ह्यूमन न्योरॉन्स के बीच एक फीडबैक तैयार करता है. जैसे ही कोई मैसेज ह्यूमन न्यूरॉन को कोई सिग्नल भेजा जाता है तो न्यूरॉन उस पर क्या रिएक्शन देता है, इसकी पूरी जानकारी सॉफ्टवेयर में स्टोर होती रहती है. इसी प्रोसेस से ह्यूमन न्यूरॉन अपने आप किसी सिग्नल को रिएक्शन देना सीख पाती है.
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        <pubDate>Tue, 25 Aug 2026 21:30:11 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>लोगों के बीच तेजी से फेमश हो रहा चैटिंग का ये नया ट्रेंड! सामने आई रिपोर्ट</title>
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        <description><![CDATA[ टेक्नोलॉजी की दुनिया में सिर्फ स्मार्ट डिवाइसे ने ही एंट्री नहीं ली है बल्कि लोगों के बातचीत करने का तरीका भी काफी एडवांस हुआ है. अब लोग सेकेंडों में दूसरे तक अपनी बात या मैसेज भेज सकते हैं, फाइलों को शेयर कर सकते हैं और यहां तक की वीडियो कॉल भी कर सकते हैं. लेकिन अब कुछ लोग इस टेक्नोलॉजी से परेशान होने लगे हैं. यही वजह है कि अब लोगों के बीच स्लो टेक यानी जानबूझकर स्लो टेक्नोलॉजी का ट्रेंड तेजी से बढ़ रहा है.
इस ट्रेंड में ऐसे ऐप्स फेमश हो रहे हैं जो मैसेज को तुरंत डिलीवर करने के बजाय यूजर को इंतजार करवाते हैं. यानी डिजिटल दुनिया में फिर से इंतजार करने का दौर लौट रहा है.
क्या है डिजिटल कबूतर
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इस नए ट्रेंड के बीच एक नया ऐप Carrier Pidge ऐप भी लोगों के बीच काफी फेमश हो रहा है. बता दें कि इस ऐप को अप्रैल में पेश किया गया था और अब तक इसके यूजर्स की संख्या करीब 75 हजार से ज्यादा पहुंच चुकी है.
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इस ऐप की सबसे बड़ी खास बात ये है कि इसमें यूजर डिजिटल कबूतर के जरिए अपने मैसेज भेज सकता है. स्क्रीन पर मैप्स के जरिए ये भी देखा जा सकता है कि कबूतर अभी कहां तक पहुंचा है. इसके अलावा इस ऐप में एक नियम भी है कि कबूतर रास्ते में गायब भी हो सकता है. हालांकि, उसकी संभावना ऐप में 0.2 प्रतिशत रखी गई है. लेकिन अगर ऐसा होता है तो यूजर को फिर से एक नया डिजिटल कबूतर भेजना होगा जिसके लिए उन्हें 99 सेंट खर्च करने पड़ेंगे.
क्यों लोगों को पसंद आ रहे ये ऐप
दरअसल, इसमें लोगों को कोई पक्षि पसंद आ रहा है, इसलिए लोग इसे नहीं इस्तेमाल कर रहे हैं बल्कि लोगों को अब पहले के जैसे इंतजार करना ज्यादा पसंद आ रहा है. हालांकि, शुरूआत में ये ऐप थोड़ अटपटा सा लग सकता है लेकिन लेकिन इनके पीछे एक गंभीर सोच छिपी हुई है. यहां जानबूझकर पैदा की गई रूकावट लोगों को ज्यादा पसंद आ रही है.
आज के डिजिटल समय में जहां एक तरफ लोग स्मार्टफोन से सेकेंडों में अपने मैसेज भेज रहे हैं, नोटिफिकेशन के जरिए मैसेज देख रहे हैं, वहीं, दूसरी तरफ ये ऐप इस फास्ट ट्रेंड को तोड़ने के लिए पेश किया गया है.
आपको बताते चलें कि कुछ रिसर्च में ये संकेत मिला है कि दिनभर बार-बार थोड़े समय के लिए फोन चेक करना लोगों की मेंटल हेल्थ पर भी बुरा असर डाल रहा है और इतना ही नहीं, ऐसा लंबे समय तक करते रहने से लोग मानसिक रोगी भी बन रहे हैं.
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        <pubDate>Tue, 25 Aug 2026 21:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>सफर में फोन चलाने पर आते हैं चक्कर? इस OS का फीचर दूर करेगा दिक्कत</title>
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        <description><![CDATA[ चलती कार या बस में सफर करते समय फोन चलाना कई लोगों के लिए आसान नहीं होता है. कई लोगों को कुछ देर तक स्क्रीन देखने के बाद चक्कर, मितली या बेचैनी जैसी परेशानी महसूस होने लगती है. ऐसे में अब Google इस समस्या को ध्यान में रखते हुए Android 17 में Motion Assist नाम का फीचर धीरे-धीरे रोलआउट कर रहा है. यह फीचर फोन की स्क्रीन के किनारों पर कुछ चलते हुए डॉट्स दिखाता है, जो गाड़ी की हलचल के साथ अपनी साइड बदलते हैं. इसका मकसद आंखों को भी वही मूवमेंट दिखाना है, जिसे शरीर महसूस कर रहा होता है. तो आइए जानते हैं कि Android 17 का Motion Assist क्या है और ये फीचर कैसे दिक्कत दूर करेगा.&amp;nbsp;
Android 17 का Motion Assist क्या है?
Motion Assist को खास तौर पर सफर के दौरान फोन इस्तेमाल करने से होने वाली Motion Sickness को कम करने के लिए तैयार किया गया है. Google का यह फीचर फिलहाल Pixel फोन से शुरुआत कर रहा है और इसका रोलआउट धीरे-धीरे किया जा रहा है. कुछ Pixel यूजर्स को यह फीचर मिलना शुरू हो गया है, जबकि एक ही Android 17 चलाने वाले सभी फोन में अभी यह उपलब्ध नहीं है. इस फीचर का आइडिया पूरी तरह नया नहीं है. Apple भी 2024 से Motion Cues नाम का इसी तरह का फीचर दे रहा है. इसके इस्तेमाल को लेकर किए गए परीक्षणों में स्क्रीन देखने के दौरान होने वाली मितली को कम करने, और कुछ मामलों में खत्म करने में मदद मिलने की बात सामने आई है.
ये फीचर कैसे दिक्कत दूर करेगा?
Motion Assist फोन के accelerometer और gyroscope का इस्तेमाल करता है. ये सेंसर फोन की हलचल और उसकी दिशा में होने वाले बदलाव को पहचानते हैं. इसके बाद स्क्रीन के किनारों पर दिखाई देने वाले डॉट्स उसी मूवमेंट के हिसाब से चलते हैं. जैसे अगर वाहन दाईं ओर मुड़ता है, तो डॉट्स बाईं ओर जाते दिखाई दे सकते हैं. वहीं वाहन के ब्रेक लगाने पर डॉट्स आगे की ओर खिसकते हैं. इसका मकसद आंखों को भी ऐसी विजुअल मूवमेंट देना है, जो शरीर के अंदरूनी कान से मिलने वाले संकेतों से मिलती हो. यही अंतर कम होने पर सफर के दौरान होने वाली परेशानी घट सकती है.
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Motion Assist में मिलेंगे ये ऑप्शन
1. Motion Assist इस्तेमाल करने के लिए सबसे पहले फोन की Google Play Settings में जाएं.&amp;nbsp;
2. इसके बाद अपने प्रोफाइल सेक्शन पर टैप करें. यहां आपको सभी उपलब्ध सर्विस का ऑप्शन मिलेगा.&amp;nbsp;
3. इस सेक्शन में सिक्योरिटी और डिवाइस से जुड़े फीचर्स मिलेंगे. अब Motion Assist के ऑप्शन पर टैप करें.&amp;nbsp;
4. इसमें ऐसा ऑप्शन भी है, जिससे फोन के चलती गाड़ी में होने का पता लगते ही फीचर अपने आप शुरू हो सकता है.
5. इसके अलावा Quick Settings में Motion Assist का टाइल जोड़कर इसे जरूरत के हिसाब से मैन्युअली भी चालू या बंद किया जा सकता है.
6. यूजर स्क्रीन पर दिखने वाले डॉट्स का कलर, शेप और opacity भी बदल सकता है. Randomization ऑप्शन इन सेटिंग्स को अपने आप बदल सकता है. फीचर चालू रहने पर फोन नोटिफिकेशन भी दिखाता है.
किन यूजर्स को मिल रहा ये फीचर
Motion Assist का रोलआउट अभी सीमित है. Android Authority के मुताबिक कुछ Pixel डिवाइस पर यह फीचर दिखाई दे रहा है, जबकि कुछ दूसरे Pixel फोन में Android 17 होने के बाद भी अभी उपलब्ध नहीं है. कंपनी ने सभी डिवाइस के लिए कोई तय रोलआउट शेड्यूल जारी नहीं किया है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Tue, 25 Aug 2026 21:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>फोन चोरी होने के बाद भी डेटा कैसे बच सकता है? जानें टेक्निक</title>
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        <description><![CDATA[ आज स्मार्टफोन सिर्फ कॉल और मैसेज करने वाला डिवाइस नहीं रह गया है. इसमें हमारे बैंकिंग ऐप्स, UPI, ईमेल, सोशल मीडिया, फोटो और कई जरूरी पर्सनल जानकारियां मौजूद रहती हैं. ऐसे में फोन चोरी या खो जाने पर चिंता सिर्फ डिवाइस की कीमत को लेकर नहीं होती है, बल्कि उसमें मौजूद डेटा और अकाउंट्स की सुरक्षा भी बड़ी चिंता बन जाती है. इसी वजह से Android में फोन चोरी होने की स्थिति में डेटा को सुरक्षित रखने के लिए कई सुरक्षा फीचर्स दिए जा रहे हैं. Android 17 में इन सुरक्षा उपायों को और मजबूत किया गया है, जिससे चोर फोन हाथ लगने के बाद भी आसानी से डेटा तक न पहुंच सके. ऐसे में आइए आज हम आपको बताते हैं कि फोन चोरी होने के बाद भी डेटा कैसे बच सकता है.&amp;nbsp;
फोन चोरी होने के बाद भी डेटा कैसे बच सकता है?
Android 17 में Failed Authentication Lock और Identity Check जैसी सुरक्षा सुविधाओं को मजबूत किया गया है. कुछ सपोर्टेड डिवाइस में गलत PIN या पासवर्ड डालकर बार-बार कोशिश करने की सीमा कम की गई है और गलत प्रयासों के बीच इंतजार का समय बढ़ाया गया है. इसका मकसद ऐसे लोगों को रोकना है, जो तेजी से अलग-अलग PIN डालकर फोन का लॉक तोड़ने की कोशिश करते हैं.
वहीं Google के Find Hub ऐप का Mark as lost फीचर में फोन को सामान्य PIN या पासकोड के साथ बायोमेट्रिक से भी लॉक करने का ऑप्शन दिया गया है. अगर चोर को आपका PIN पता भी हो, तब भी Mark as lost करने के बाद कुछ संवेदनशील कामों तक उसकी पहुंच मुश्किल हो सकती है. इसके साथ Quick Settings छिपाए जा सकते हैं और नए Wi-Fi साथ ही Bluetooth कनेक्शन को भी रोका जा सकता है.&amp;nbsp;
फोन चोरी होते ही क्या करें?
फोन चोरी होते ही सबसे पहले अपनी SIM को ब्लॉक कराना जरूरी है. मोबाइल ऑपरेटर के कस्टमर केयर से संपर्क करके SIM को सस्पेंड कराया जा सकता है, जिससे उस नंबर पर आने वाले OTP, कॉल और मैसेज रुक जाते हैं. इसके बाद फोन को लॉक या डेटा डिलीट करने के लिए Android में Find My Device और iPhone में Find My iPhone जैसे फीचर्स का इस्तेमाल किया जा सकता है. इससे फोन की लोकेशन देखने, उसे लॉक करने या जरूरी होने पर डेटा हटाने में मदद मिलती है.
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UPI और पासवर्ड की भी रखें सुरक्षा
फोन चोरी होने पर बैंक, UPI और वॉलेट ऐप्स को अस्थायी रूप से ब्लॉक या सस्पेंड कराने की सलाह दी गई है. इसके साथ किसी दूसरे डिवाइस से पहले ईमेल का पासवर्ड बदलें, फिर बैंकिंग, UPI, शॉपिंग और सोशल मीडिया अकाउंट्स के पासवर्ड अपडेट करें.&amp;nbsp;
IMEI और फोन की रिपोर्ट करें
चोरी हुए फोन की FIR दर्ज कराना और IMEI नंबर की जानकारी देना भी जरूरी है. IMEI की मदद से फोन की पहचान, ट्रैक या ब्लॉक कराने की प्रक्रिया में सहायता मिल सकती है. जरूरत पड़ने पर यही रिकॉर्ड इंश्योरेंस क्लेम में भी काम आ सकता है.
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        <pubDate>Tue, 25 Aug 2026 21:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>SIM कार्ड के बदल गए नियम! जानें आपके नाम पर मिली फर्जी सिम तो क्या होगा एक्शन</title>
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        <description><![CDATA[ मोबाइल SIM कार्ड को लेकर आज यानी 24 अगस्त 2026 से नया सिस्टम लागू हो गया है. दूरसंचार विभाग (DoT) ने टेलीकॉम कंपनियों को निर्देश दिया है कि किसी व्यक्ति के नाम पर पहले से तय लिमिट तक मोबाइल कनेक्शन होने पर उसे नया SIM जारी न किया जाए. देश के ज्यादातर हिस्सों में एक व्यक्ति के नाम पर अब मैक्सिमम 9 मोबाइल कनेक्शन की सीमा है जबकि जम्मू-कश्मीर, असम और नॉर्थ-ईस्ट के कुछ क्षेत्रों में ये लिमिट 6 है. आपको बता दें कि सरकार ने ये कदम फर्जी सिम को रोकने के लिए लागू किया गया है. लेकिन अब सवाल ये उठता है कि अगर किसी के नाम पर फर्जी सिम पाई जाती है तो सरकार उस व्यक्ति पर क्या एक्शन लेगी.
आपके नाम पर फर्जी SIM मिली तो क्यों है खतरा?
जानकारी के मुताबिक, मान लीजिए आपने कोई SIM कभी लिया ही नहीं लेकिन वह आपके आधार या दूसरे डॉक्यूमेंट्स पर आपके नाम पर एक्टिव है. ऐसी कंडिशन को हल्के में बिलकुल नहीं लेना चाहिए. फर्जी SIM का इस्तेमाल साइबर फ्रॉड, फर्जी कॉल, OTP से जुड़े अपराध या किसी भी गैरकानूनी एक्टिविटी में किया जा सकता है.
इसके अलावा सबसे बड़ी परेशानी ये हो सकती है कि शुरुआती रिकॉर्ड में मोबाइल कनेक्शन आपके नाम से जुड़ा दिखाई दे. इसलिए अपने नाम पर कितने मोबाइल नंबर एक्टिव हैं, इसकी समय-समय पर जांच करनी चाहिए.
पहले पता करें आपके नाम पर कितने नंबर हैं
आपको बता दें कि सरकार ने आपको एक सुविधा दी है जिससे आप ये पता लगा सकते हैं कि आपके नाम पर कितने मोबाइल नंबर चल रहे हैं. इसके लिए सरकार की Sanchar Saathi सर्विस में उपलब्ध TAFCOP सुविधा का इस्तेमाल किया जा सकता है. यहां आप मोबाइल नंबर की मदद से लॉगिन करके अपने नाम पर जारी कनेक्शनों की जानकारी देख सकते हैं.
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अगर लिस्ट में कोई ऐसा नंबर दिखाई देता है जिसे आपने कभी लिया ही नहीं या अब इस्तेमाल नहीं करते तो उसे रिपोर्ट करने की सुविधा भी उपलब्ध है. रिपोर्ट मिलने के बाद टेलीकॉम ऑपरेटर मामले की जांच करता है और जरूरी कार्रवाई की जाती है.
फर्जी SIM मिलने पर क्या करें
जानकारी के लिए बता दें कि अगर आपके नाम पर कोई अनजान मोबाइल नंबर दिखाई देता है तो सबसे पहले उसकी जानकारी नोट कर लें. इसके बाद Sanchar Saathi/TAFCOP के जरिए उस नंबर को रिपोर्ट करें. रिपोर्ट में आपको ये साफ तरीके से समझाना पड़ेगा कि नंबर आपका नहीं है.
इसके अलावा अगर कोई पुराना SIM अब इस्तेमाल में नहीं है तो उसे भी बंद कराना ही बेहतर ऑप्शन रहेगा. इससे आपके नाम पर चल रहे बेमतलब के मोबाइल कनेक्शन के नंबर कम हो जाएंगे और भविष्य में आपको अपने नाम पर कोई नया कनेक्शन लेने में कोई समस्या नहीं होगी.
9 SIM की सीमा पार होने पर क्या होगा एक्शन
बता दें कि 24 अगस्त से सरकार ने साफ कर दिया है कि 9 कनेक्शन की लिमिट को पूरा कर चुके ग्राहक को अब कोई भी नया मोबाइल कनेक्शन जारी नहीं किया जाएगा. अगर आपके पास अलग-अलग कंपनियों के SIM हैं तो भी लिमिट नहीं बढ़ेगी क्योंकि आपके नाम पर कुल 9 कनेक्शन पहले से ही एक्टिव शो होंगे.
हालांकि, आपको बता दें कि अगर आपके नाम पर कोई फर्जी सिम पाई जाती है तो उसे तुरंत बंद कर दिया जाएगा. लेकिन अगर उस सिम को बंद नहीं किया गया और उस नंबर का इस्तेमाल किसी साइबर अपराध में हुआ हो तो पुलिस सीधे आपसे सवाल-जवाब कर सकती है. इसीलिए अगर आपके नाम पर कोई फर्जी सिम चल रही है तो उसकी तुरंत रिपोर्ट करें.
DoT ने टेलीकॉम कंपनियों को Digital Intelligence Platform (DIP) के जरिए ऐसे ग्राहकों की पहचान करने के निर्देश दिए हैं. इसके अलावा आने वाले समय में सिस्टम रियल-टाइम वेरिफिकेशन भी करने में सक्षम होगा.
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        <pubDate>Tue, 25 Aug 2026 09:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>कैसे पता करें घर में लगा CCTV कैमरा हैक हो गया? जानें आसान तरीका</title>
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        <description><![CDATA[ टेक्नोलॉजी की दुनिया में स्मार्ट होम डिवाइसेज आजकल लोगों की जरूरत बन चुके हैं. लोग अब अपने घर की सेफ्टी के लिए CCTV कैमरों का इस्तेमाल करने लगे हैं. लेकिन जितनी ज्यादा एडवांस टेक्नोलॉजी उतना ज्यादा ही साइबर अटैक का खतरा. अक्सर देखा गया है कि लोगों के घरों में लगे सीसीटीवी कैमरे हैक हो जाते हैं. ऐसे में अगर आपके घर में भी सीसीटीवी कैमरा लगा हुआ तो आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि कैसे पता लगाएं कि डिवाइस हैक हो चुका है.
कैमरा खुद-ब-खुद घूमे तो रहें सावधान
अगर आपका CCTV कैमरा PTZ यानी Pan-Tilt-Zoom मॉडल है और वह बिना किसी कमांड के खुद डॉयरेक्शन बदल रहा है तो इसे नजरअंदाज न करें. खासकर तब, जब मोबाइल ऐप में किसी ने कैमरे के डॉयरेक्शन बदलने की परमिशन नहीं दी हो. इससे पता लगता है कि आपका सीसीटीवी कैमरा कोई और कंट्रोल कर रहा है. हालांकि, कुछ कैमरे ऑटो-ट्रैकिंग या प्रीसेट फीचर के कारण भी अपने आप घूमते हैं.
अनजान Login या Device को चेक करें
ज्यादातर स्मार्ट CCTV ऐप में ये देखने का ऑप्शन मिलता है कि आपका अकाउंट किन डिवाइस पर लॉगिन है. ऐप की Security, Account या Device Management सेटिंग में जाकर अनजान फोन, कंप्यूटर या दूसरे डिवाइस की जानकारी को चेक करना चाहिए. अगर आपको कोई ऐसा डिवाइस दिखाई देता है जिसे आप पहचानते नहीं हैं तो उसे तुरंत हटा देना चाहिए और डिवाइस का पासवर्ड बदल देना चाहिए.
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कैमरे की LED और आवाज पर दें ध्यान
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि कुछ CCTV कैमरों में एक्टिविटी या रिकॉर्डिंग के दौरान LED लाइट जलती है. अगर कैमरे की लाइट नॉर्मल से अलग तरीके से बार-बार एक्टिव हो रही है तो इसको चेक करना चाहिए. इसी तरह, माइक्रोफोन वाले कैमरे में अजीब सी आवाज या स्पीकर से अचानक आवाज आने जैसी एक्टिविटी को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.
अचानक बढ़ जाए इंटरनेट डेटा तो हो जाएं सावधान
दरअसल, CCTV कैमरा लगातार वीडियो डेटा भेजता है जिसके लिए डिवाइस कुछ इंटरनेट डेटा का भी इस्तेमाल करता है. लेकिन अगर अचानक से इंटरनेट डेटा की खपत बढ़ जाए और आपको लगे की कैमरा कुछ अजीब एक्टिविटी करने लगा है तो इसे नजरअंदाज न करें और तुरंत राउटर की Connected Devices और Data Usage डिटेल्स को चेक करें. अगर कोई अनजान डिवाइस नेटवर्क से कनेक्टेड है तो उसे तुरंत ब्लॉक करें.
पासवर्ड बदलना सबसे जरूरी कदम
अगर कैमरे के हैक होने का संदेह है तो सबसे पहले CCTV ऐप और उससे कनेक्टेड अकाउंट का मजबूत और अलग पासवर्ड बनाएं. जहां उपलब्ध हो, वहां Two-Factor Authentication यानी 2FA भी ऑन करें. कैमरे का डिफॉल्ट यूजरनेम और पासवर्ड इस्तेमाल करने से बचना चाहिए.
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        <pubDate>Tue, 25 Aug 2026 09:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>किसी और के डिवाइस में तो नहीं चल रहा आपका Google अकाउंट? ऐसे करें पता</title>
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        <description><![CDATA[ Google Account: आज के समय में Google अकाउंट सिर्फ ईमेल भेजने तक ही सीमित नहीं रह गया है. Gmail, Google Drive, Photos, YouTube, Contacts और कई सारी सर्विसेज का डेटा भी गूगल अकाउंट से कनेक्ट रहता है. ऐसे में अगर आपका Google अकाउंट किसी पुराने फोन, लैपटॉप या किसी दूसरे डिवाइस में लॉगिन है तो आपकी पर्सनल जानकारी खतरे में पड़ सकती है. हालांकि, गूगल आपके ये फीचर देता है कि आप पता लगा सकें कि आपका अकाउंट किन डिवाइसेज में लॉगइन है.
कैसे देखें कहां लॉगइन है आपका अकाउंट
दरअसल, आप गूगल की मदद से सभी डिवाइसेज के बारे में पता लगा सकते हैं जहां आपका गूगल अकाउंट खुला हुआ है. इसके लिए सबसे पहले अपने फोन या कंप्यूटर में Google अकाउंट खोलें. इसके बाद Manage your Google Account पर जाएं. यहां आपको Security सेक्शन दिखाई देगा. अब नीचे स्क्रॉल करके Your devices या Manage all devices ऑप्शन पर टैप करें.
यहां आपको उन डिवाइस की पूरी लिस्ट दिखाई देगी जिनमें आपका Google अकाउंट हाल ही में इस्तेमाल हुआ है. इसमें फोन, टैबलेट, कंप्यूटर या दूसरे डिवाइस शामिल हो सकते हैं.
डिवाइस की जानकारी भी मिलेगी
इसके साथ ही किसी डिवाइस पर टैप करने पर Google आपको उससे जुड़ी सभी जानकारी भी दे देता है. इसमें डिवाइस का नाम, आखिरी बार अकाउंट इस्तेमाल किए जाने का समय और कई बार लोकेशन की भी जानकारी उपलब्ध करा देता है. इससे आपको ये समझने में मदद मिल सकती है कि दिख रहा डिवाइस आपका अपना है या नहीं.
अनजान डिवाइस दिखे तो क्या करें?
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अगर लिस्ट में कोई ऐसा डिवाइस दिखाई देता है जिसे आप पहचान नहीं पा रहे हैं तो उसे नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है. ऐसे में उस डिवाइस को खोलकर Sign out का ऑप्शन चुनें जिससे उस डिवाइस में आपका अकाउंट अपने आप बंद हो जाएगा.
इसके बाद अपने अकाउंट का पासवर्ड बदल देना ज्यादा बेहतर ऑप्शन रहता है. इससे आपके डेटा लीक होने का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है.
पासवर्ड बदलने के साथ ये काम भी करें
बताते चलें कि सिर्फ पासवर्ड बदल देना ही अकाउंट की सेफ्टी के लिए काफी नहीं होता है. इसके साथ-साथ आपको कुछ एक्सट्रा सेफ्टी फीचर्स का भी इस्तेमाल करना चाहिए. अकाउंट की सुरक्षा स्ट्रांग करने के लिए 2-Step Verification जरूर ऑन रखें. इसमें पासवर्ड के अलावा एक्सट्रा वेरिफिकेशन की जरूरत पड़ती है. इससे किसी दूसरे व्यक्ति के लिए केवल पासवर्ड के आधार पर आपके अकाउंट का एक्सेस लेना मुश्किल हो जाता है.
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        <pubDate>Tue, 25 Aug 2026 09:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>आपके नाम पर 9 से ज्यादा सिम तो नहीं चल रहे? फटाफट ऐसे करें पता</title>
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        <description><![CDATA[ अगर आप मोबाइल यूजर हैं तो यह खबर आपके लिए बेहद जरूरी है. 24 अगस्त 2026 से सिम कार्ड को लेकर सख्त नियम लागू हो गए हैं. दूरसंचार विभाग के नए आदेश के मुताबिक, अब अगर देश का कोई भी नागरिक अपने नाम पर तय सीमा से ज्यादा सिम कार्ड रखता है, तो उसे नया सिम कार्ड जारी नहीं किया जाएगा. टेलीकॉम कंपनियों को साफ निर्देश दिए गए हैं कि वे नया कनेक्शन देने से पहले ग्राहक के पुराने सिम कार्ड का पूरा डेटा चेक करें. अगर आपके नाम पर पहले से ही अधिकतम सिम एक्टिव हैं, तो आपको तुरंत मना कर दिया जाएगा.&amp;nbsp;
आज से लागू हुआ नया नियम
दूरसंचार विभाग के नियमों के मुताबिक, देश के ज्यादातर राज्यों में एक व्यक्ति अपने नाम पर अधिकतम 9 सिम कार्ड रख सकता है. वहीं जम्मू-कश्मीर, असम और पूर्वोत्तर राज्यों में सुरक्षा कारणों से यह सीमा सिर्फ 6 सिम कार्ड तय की गई है. यह लिमिट पहले से मौजूद थी, लेकिन अब 24 अगस्त से इसकी निगरानी और सख्त कर दी गई है. अगर किसी व्यक्ति के नाम पर पहले से तय सीमा जितने सिम कार्ड मौजूद हैं, तो वह अब नया सिम आसानी से नहीं ले पाएगा. टेलीकॉम कंपनियां नया सिम देने से पहले ग्राहक के नाम पर मौजूद सभी मोबाइल कनेक्शनों का रिकॉर्ड जरूर जांचेंगी.
फर्जी सिम पर भी कड़ी कार्रवाई
फर्जी सिम पर भी कड़ी कार्रवाई नए नियमों में एक और अहम बात जोड़ी गई है. अगर सिम लेते समय किसी ने फर्जी या जाली दस्तावेज इस्तेमाल किए हैं, तो टेलीकॉम कंपनियों को तुरंत पुलिस या जांच एजेंसियों को इसकी जानकारी देनी होगी और सीधे FIR दर्ज कराई जाएगी. साथ ही सरकार ऐसे लोगों की जानकारी, जिनके नाम पर तय सीमा से ज्यादा सिम हैं, डिजिटल इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म पर भी दर्ज करेगी, जिसमें उनकी फोटो और अन्य जरूरी जानकारी शामिल होगी.
आपके नाम पर कितने सिम हैं? ऐसे करें पता
इसके लिए सरकार ने Sanchar Saathi पोर्टल पर एक खास सुविधा दी है, जिसे TAFCOP यानी Telecom Analytics for Fraud Management and Consumer Protection कहा जाता है. इसे चेक करने का तरीका बेहद आसान है:
1. अपने मोबाइल या कंप्यूटर के ब्राउजर में tafcop.sancharsaathi.gov.in वेबसाइट खोलें.
2. यहां अपना 10 अंकों का मोबाइल नंबर डालें, जो पहले से आपके नाम पर एक्टिव हो.
3. मोबाइल नंबर डालने के बाद आपके पास एक OTP आएगा, उसे वेबसाइट पर डालकर वेरिफाई करें.
4. वेरिफिकेशन पूरा होते ही स्क्रीन पर आपके नाम से रजिस्टर्ड सभी मोबाइल नंबरों की लिस्ट दिख जाएगी.
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लिस्ट में कोई अनजान नंबर दिखे तो क्या करें?
अगर लिस्ट में कोई ऐसा नंबर दिखे जिसे आप पहचानते नहीं हैं या इस्तेमाल नहीं कर रहे, तो वहीं से आप उसे Not My Number बताकर रिपोर्ट कर सकते हैं. इसके बाद संबंधित टेलीकॉम कंपनी उस नंबर की जांच करेगी और जरूरत पड़ने पर उसे बंद कर देगी. इसी पोर्टल पर CEIR सुविधा के जरिए चोरी हुए या गुम मोबाइल फोन को भी ब्लॉक कराया जा सकता है, और Chakshu सर्विस से फ्रॉड कॉल या मैसेज की शिकायत की जा सकती है.
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        <pubDate>Tue, 25 Aug 2026 09:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>क्या आपके इंस्टाग्राम अकाउंट पर भी आ रहा ग्रे टिक? जानिए इसका मतलब</title>
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        <description><![CDATA[ क्या आपके इंस्टाग्राम अकाउंट पर भी आ रहा ग्रे टिक? जानिए इसका मतलब ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 24 Aug 2026 17:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>खतरे से खाली नहीं Snapchat? इन फीचर्स से बढ़ सकती है आपकी मुसीबत</title>
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        <description><![CDATA[ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म आज के समय में काफी ज्यादा इस्तेमाल की जाती हैं. खासतौर पर युवाओं में इन प्लेटफॉर्म्स का काफी क्रेज देखने को मिलता है. ऐसे में Snapchat भी इन्हीं प्लेटफॉर्म में से एक है जो युवाओं के बीच काफी फेशम हो चुकी है. फोटो, वीडियो, स्टोरी और चैटिंग के लिए इस्तेमाल होने वाला ये ऐप कई दिलचस्प फीचर्स देता है. हालांकि, इन फीचर्स का गलत तरीके से इस्तेमाल आपकी प्राइवेसी और सुरक्षा के लिए परेशानी खड़ी कर सकता है. अगर आपने ऐप की प्राइवेसी सेटिंग्स को ठीक से नहीं समझा है तो आपकी लोकेशन, फोटो या दूसरी पर्सनल जानकारी दूसरों तक पहुंच सकती है.
Snap Map से सामने आ सकती है लोकेशन
आपको बता दें कि Snapchat का Snap Map फीचर दोस्तों की लोकेशन देखने और अपनी लोकेशन शेयर करने के लिए दिया गया एक फीचर है. ये फीचर यूजर्स के काफी काम जरूर आता है लेकिन इससे आपकी एक्टिविटी का भी अंदाजा लगाया जा सकता है. अगर लोकेशन शेयरिंग सभी दोस्तों या दूसरे लोगों के लिए खुली है तो ये आपकी प्राइवेसी के लिए जोखिम बन सकती है.
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ऐसे में बेहतर है कि जरूरत न होने पर लोकेशन शेयरिंग बंद रखें या Ghost Mode का इस्तेमाल करें. इससे आपकी लाइव लोकेशन दूसरों को दिखाई नहीं देगी.
Screenshot लेने पर भी सावधान रहें
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ज्यादातर लोग Snapchat का इसलिए इस्तेमाल करते हैं क्योंकि यहां पर फोटो भेजने के बाद वो अपने आप डिलीट हो जाती है. इसीलिए यहां लोग ज्यादा लापरवाह हो जाते हैं. बता दें कि फोटो अपने आप डिलीट होने जाने का ये मतलब नहीं होता है कि कोई आपकी फोटो का स्क्रीनशॉट या दूसरे फोन से रिकॉर्ड नहीं कर सकता है. इसलिए Snapchat पर भी ऐसी कोई तस्वीर या वीडियो शेयर न करें जिसे सार्वजनिक होने पर आपको परेशानी हो सकती है.
My AI से चैटिंग में रहें सावधान
Snapchat में मौजूद My AI फीचर यूजर्स के सवालों का जवाब देने और बातचीत करने में मदद करता है. हालांकि, किसी भी AI चैटबॉट के साथ बातचीत करते समय पर्सनल जानकारी शेयर करने से ज्यादातर बचना ही बेहतर होता है.
पासवर्ड, बैंकिंग जानकारी, OTP, घर का पता या दूसरी बहुत जरूरी जानकारी चैट में लिखना आपके लिए जोखिम भरा साबित हो सकता है. सोशल मीडिया पर इस्तेमाल होने वाले किसी भी AI फीचर को अपनी पर्सनल डायरी की तरह इस्तेमाल करने से बचना चाहिए.
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        <pubDate>Mon, 24 Aug 2026 17:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>इंसानों की परवाह करना कैसे सीखते हैं Robots? वैज्ञानिकों ने खोजा तरीका</title>
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        <description><![CDATA[ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पूरी दुनिया में तेजी से डेवलप हो रहा है. इसकी के साथ एआई की मदद से अब कंपनियां कई तरह के रोबोट्स भी तैयार कर रही हैं जो लोगों के काम को आसान बना सकते हैं. एआई लोगों के काम को काफी हद तक आसान बनाने के लिए तैयार किए गए हैं. लेकिन जैसे-जैसे मशीनें ज्यादा एडवांस लेवल पर पहुंच रहीं है वैसे ही एक सवाल खड़ा हो रहा है कि क्या ये मशीन इंसानों की भावनाओं को समझ सकते हैं या नहीं. वैज्ञानिक अब इसी सवाल का जवाब तलाश रहे हैं.
ह्यूमन इमोशन को समझना क्यों जरूरी
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, ChatGPT जैसे AI टूल्स ने ये साबित कर दिया है कि एआई इंसानों के साथ काफी अच्छे से और नॉर्मल तरीके से बातचीत कर सकते हैं. हालांकि, केवल सही जवाब देना और किसी व्यक्ति की इमोशनल कंडिशन को समझना दो अलग बातें हैं.
वैज्ञानिकों का मानना है कि भविष्य के रोबोट अगर घरों, अस्पतालों या दूसरी संवेदनशील जगहों पर इंसानों के साथ काम करेंगे तो उनमें भावनाओं और ह्यूमन एंगल को समझने की ताकत होना बहुत जरूरी है. इससे वे ऐसे फैसले लेने से बच सकेंगे जिनसे किसी इंसान को नुकसान पहुंच सकता है.
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इंसानों को कैसे समझते हैं रोबोट्स
जानकारी के मुताबिक, AI को ह्यूमन नेचर समझाने के लिए इंसानों के उदाहरणों का इस्तेमाल किया जाता है. मशीन को अलग-अलग कंडिशन दिखाई जाती हैं और बताया जाता है कि ऐसी स्थिति में इंसान आमतौर पर किस तरह से रिएक्ट करता है.
इसके अलावा, AI सिस्टम में कुछ नियम भी जोड़े जाते हैं जिससे वह सही और गलत के बीच आसानी से अंतर कर सके. लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि इस तरीके में empathy जैसी चीज छूट जाती है.
क्या है वैज्ञानिकों का नया
बता दें कि इसी के समाधान के लिए वैज्ञानिकों ने एक नया तरीका निकाला है. दरअसल, कई विश्वविद्यालयों से जुड़े शोधकर्ताओं ने रोबोट में सहानुभूति को डेवलप करने के लिए एक अलग तरीका निकाला है. उनके अनुसार, मशीन को ये समझाने की जरूरत है कि उसके अपने काम के भी नेगेटिव रिजल्ट्स हो सकते हैं.
इसका मतलब ये नहीं है कि रोबोट को असल में शारीरिक दर्द दिया जाए. इसके बजाय उसके सिस्टम में ऐसे एक्सपीरिएंस या रिजल्ट बनाए जाते हैं जिनसे उसे ये समझ आए कि किसी को नुकसान पहुंचाने की कीमत चुकानी पड़ सकती है.
सिर्फ इंसानों की नकल करना काफी नहीं
दरअसल, रोबोट्स को सिर्फ इंसानों जैसे करने के लिए नहहीं ट्रेन किया जाता है. जैसे किसी रोबोट को एक वीडियो दिखाया जाता है जिसमें कोई व्यक्ति गिरकर चोटिल हो जाता है. रोबोट उस व्यक्ति के चेहरे के भाव या रिएक्शन की नकल करता है. बाहर से देखने पर ऐसा लगता है कि मशीन उस व्यक्ति के दर्द को समझ रही है.
लेकिन असल में रोबोट ने दर्द महसूस नहीं किया होता है. उसने केवल पहले से सीखे पैटर्न के आधार पर अपना रिएक्शन दिया है. वैज्ञानिकों के मुताबिक, इसे असली इंपैथी नहीं कहा जा सकता है.
क्या रोबोट सच में इमोशन महसूस करेगा?
दरअसल, वैज्ञानिकों के अनुसार, इस आईडिया का ये मतलब नहीं है कि रोबोट्स इंसानों की तरह इमोशन को समझ सकें बल्कि उन्हें इस तरह ट्रेन करना है कि उन्हें ये समझ आ जाए कि उनके द्वारा किए गए काम के भी नेगेटिव रिजल्ट्स हो सकते हैं और इसीलिए वैसी गलती करने से बचा जा सके. रोबोट्स को अपने फैसलों को ज्यादा बेहतर तरीके से लेने के लिए तैयार करना ही इस आईडिया का मकसद बताया गया है.
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        <pubDate>Mon, 24 Aug 2026 17:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Rakshabandhan पर बहन को गिफ्ट करें ये गैजेट्स! काम हो जाएंगे आसान</title>
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        <description><![CDATA[ Rakshabandhan पर बहन को गिफ्ट करें ये गैजेट्स! काम हो जाएंगे आसान ]]></description>
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        <title>फोन में मौजूद वीडियो को Smart TV पर कैसे चलाएं? जानें ये आसान तरीका</title>
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        <description><![CDATA[ मार्केट में आज के समय में कई सारे स्मार्ट डिवाइस मौजूद हैं जिसका लोग अपनी जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल करते हैं. अक्सर देखा गया है कि लोग स्मार्टफोन में ही फिल्में, वेब सीरीज और वीडियो डाउनलोड करके रख लेते हैं. लेकिन फोन की छोटी स्क्रीन पर लंबी वीडियो या मूवी देखना थोड़ा मुश्किल हो जाता है. ऐसे में अगर आपके घर में Smart TV है तो आप फोन में मौजूद मूवी को बड़ी स्क्रीन पर आसानी से चला सकते हैं. इसके लिए आपको हर बार मूवी को TV में अलग से डाउनलोड करने की जरूरत नहीं होती है. आइए जानते हैं क्या है इसका तरीका.
Wi-Fi से फोन और TV को कनेक्ट करें
सबसे पहले अपने Smart TV और स्मार्टफोन को एक ही Wi-Fi नेटवर्क से कनेक्ट करें. ये जरूरी है क्योंकि कई स्क्रीन शेयरिंग और कास्टिंग फीचर्स एक ही नेटवर्क पर बेहतर तरीके से काम करते हैं.
इसके बाद फोन में वह मूवी या वीडियो खोलें जिसे आप TV पर देखना चाहते हैं. वीडियो प्लेयर में Cast, Screen Cast, Smart View या Wireless Display जैसे ऑप्शन को सर्च करें. अलग-अलग फोन में इस फीचर का नाम अलग हो सकता है.
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Cast फीचर से ऐसे चलाएं मूवी
आपको बता दें कि अगर आपका Smart TV Cast सपोर्ट करता है तो फोन में Cast आइकन पर टैप करें. इसके बाद आसपास मौजूद compatible डिवाइस की लिस्ट दिखाई देगी. यहां अपने Smart TV का नाम चुनें.
TV की स्क्रीन पर कनेक्शन की परमिशन मांगी जाती है. परमिशन देने के बाद फोन में चल रहा वीडियो TV की बड़ी स्क्रीन पर दिखाई देने लगेगा. इस दौरान फोन को रिमोट की तरह इस्तेमाल करके वीडियो को Play, Pause या आगे-पीछे किया जाता है.
Android फोन में Screen Mirroring
कई Android स्मार्टफोन में Screen Cast या Screen Mirroring का ऑप्शन पहले से मौजूद रहता है. ये ऑप्शन फोन के Quick Settings पैनल में मौजूद होता है.
Screen Cast पर टैप करने के बाद TV को चुनें. कनेक्शन होने पर फोन की पूरी स्क्रीन TV पर दिखाई देगी. अब आप फोन में मूवी चला सकते हैं और उसे TV पर बड़ी स्क्रीन में देख सकते हैं.
iPhone यूजर्स के लिए AirPlay
अगर आपके पास iPhone और AirPlay सपोर्ट करने वाला Smart TV है तो आप AirPlay की मदद से वीडियो TV पर भेज सकते हैं. इसके लिए iPhone और TV को एक ही Wi-Fi नेटवर्क से कनेक्ट करें. इसके बाद वीडियो में AirPlay ऑप्शन चुनें और अपने TV का नाम सिलेक्ट करें. कुछ TV में AirPlay को पहले Settings से ऑन करना पड़ता है.
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        <pubDate>Mon, 24 Aug 2026 17:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>क्या होती हैं लाल रोशनी वाली टॉर्च? जानें किन जगहों पर होता है इनका यूज</title>
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        <description><![CDATA[ रात के समय में अक्सर देखा गया है कि लोग टॉर्च का इस्तेमाल करते हैं. हालांकि, शहरों में इसका इस्तेमाल काफी कम हो चुका है लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी लोग रात के समय में टॉर्च का इस्तेमाल करते हैं. लेकिन नॉर्मल टॉर्च में सफेद या पीली रंग की रौशनी निकलती है. लेकिन क्या आपने कभी लाल रोशनी वाली टॉर्च या हेडलैंप देखी है? बता दें कि देखने में ये नॉर्मल टॉर्च से अलग लगती है लेकिन इसके पीछे एक खास वजह है.
दरअसल, Red Flashlight और Red Headlamp का इस्तेमाल खासतौर पर रात में देखने, कैंपिंग, ट्रेकिंग और सेफ्टी के लिए इस्तेमाल किया जाता है. आइए जानते हैं कि लाल रोशनी आखिर इतनी खास क्यों होती है.
क्यों आंखों के लिए बेहतर होती है लाल लाइट
जानकारी के मुताबिक, तेज सफेद रोशनी अंधेरे में हमारी आंखों की नाइट विजन को कम कर देती है. ऐसे में जब अचानक तेज सफेद रोशनी आंखों पर पड़ती है तो पुतलियां सिकुड़ जाती हैं और अंधेरे में दोबारा देखने में कुछ समय लगता है.
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लेकिन लाल रोशनी के साथ ऐसा नहीं होता है. ये उतनी तेज चमक के साथ आंखों पर नहीं लगती हैं. इसलिए अंधेरे में इसका इस्तेमाल करने के बाद आसपास देखने की की ताकत कम नहीं होती है. यही कारण है कि रात में लंबे समय तक काम करने वाले लोग Red Light का इस्तेमाल करते हैं.
कैंपिंग और ट्रेकिंग में क्यों आती है काम?
दरअसल, अगर आप जंगल, पहाड़ या कैंपिंग जैसी जगहों पर रात बिताते हैं तो लाल रोशनी वाली टॉर्च काफी ज्यादा फायदेमंद साबित होती है. हालांकि, कुछ लोग ऐसी जगहों पर दूर तक देखने के लिए सफेद रौशनी वाली लाइट का इस्तेमाल करते हैं. लेकिन कुछ लोगों का मानना है कि लाल रौशनी आसपास के लोगों की आंखों पर कम चुभती है, इसीलिए जंगलों में ज्यादातर लाल रौशनी वाली लाइट का इस्तेमाल करना चाहिए.
रात में तारों को देखने वालों के लिए खास
Astronomy यानी तारों और ग्रहों को देखने वाले लोगों के लिए लाल रोशनी काफी बेहतर ऑप्शन मानी जाती है. दरअसल, रात में तारों को देखने के दौरान अगर आप तेज सफेद टॉर्च जलाते हैं तो आंखों को ज्यादा सटीक तरीके से नहीं दिखाई देता है. वहीं, लाल रोशनी कम चकाचौंध पैदा करती है इसलिए स्टारगेजिंग के दौरान मैप्स, नोटबुक या किसी डिवाइस को देखने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है.
सुरक्षा और इमरजेंसी में भी आता है काम
बताते चलें कि लाल रोशनी का इस्तेमाल कुछ कंडिशन में मैसेज देने के लिए भी किया जाता है. कई एडवांस टॉर्च और हेडलैंप में Red Mode दिया जाता है जिसे जरूरत के अनुसार ऑन किया जा सकता है. हालांकि, लाल रोशनी हर काम के लिए सफेद रोशनी से बेहतर नहीं मानी जाती है. दूर तक रास्ता देखने या किसी इलाके को अच्छी तरह रोशन करने के लिए आज भी सफेद रोशनी का ही इस्तेमाल किया जाता है.
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        <pubDate>Mon, 24 Aug 2026 05:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>क्या है Bio Solar टेक्नोलॉजी? जानें कैसे इससे बढ़ जाती है सोलर पैनल की ताकत</title>
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        <description><![CDATA[ सोलर एनर्जी आज के समय में लोगों के लिए एक बेहतर ऑप्शन के रूप में सामने आई है. बढ़ती बिजली बिल से छुटकारा पाने के लिए अब ज्यादातर लोग सोलर एनर्जी का इस्तेमाल कर रहे हैं. मार्केट में आज के समय में कई टाइप के सोलर पैनल मौजूद हैं जो लोगों की जरुरत के अनुसार बिजली बनाने का काम करते हैं. इसी कड़ी में अब बॉयो सोलर टेक्नोलॉजी काफी तेजी से चर्चा का विषय बनी हुई है. आइए जानते हैं कि क्या ये सच में सोलर पैनल को पहले के मुकाबले ज्यादा पावरफुल बना सकती है या नहीं.
क्या है Bio Solar टेक्नोलॉजी?
Bio Solar टेक्नोलॉजी मूल रूप से Photosynthesis के प्रोसेस पर बेस्ड तकनीक है. बता दें कि पौधे सूर्य की रोशनी, पानी और कार्बन डाइऑक्साइड की मदद से अपना भोजन तैयार करते हैं. इस नैचुरल प्रोसेस में सूर्य की एनर्जी को कैमिकल एनर्जी में बदला जाता है.
अब वैज्ञानिक इसी सिद्धांत को टेक्नोलॉजी के साथ जोड़कर ऐसे सिस्टम तैयार करने पर काम कर रहे हैं जो जीवित पौधों की मदद से एनर्जी पैदा करे या फिर सोलर सिस्टम की ताकत को और बढ़ाने का काम करेगी. हालांकि, इसे अभी सोलर पैनल के ऑप्शन के रूप में देखना जल्दबाजी होगी.
कैसे बनेगी पौधों से बिजली
आपको बता दें कि जब पौधों के अंदर लाइट जाने के बाद जो प्रोसेस होता है उसमें इलेक्ट्रॉनों का ट्रांसफर भी शामिल है. अब इसी को ध्यान में रखते हुए इस नैचुरल प्रोसेस को बिजली बनाने के लिए भी इस्तेमाल किया जाने पर काम किया जा रहा है.
वैज्ञानिक इस प्रोसेस को बेहतर बनाने के लिए काम कर रहे हैं. कुछ एक्सपेरिमेंट में पौधों और दूसरे जैविक चीजों से निकलने वाले इलेक्ट्रॉनों को इलेक्ट्रोड के जरिए इकट्ठा करने की कोशिश की जाती है. इसके साथ ही इसे Plant Microbial Fuel Cell जैसी टेक्नोलॉजी से भी कनेक्ट किया जाता है. अब अगर ये टेस्ट सफल हो जाता है तो पौधे सिर्फ आपको ऑक्सिजन देने का काम नहीं करेंगे बल्कि ये आपके लिए बिजली भी बनाने का काम करेंगे.
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कैसे बढ़ेगी सोलर पैनल की ताकत
दरअसल, Bio Solar टेक्नोलॉजी में वैज्ञानिक नैचुरल प्रोसेस और एनर्जी को एक साथ इस्तेमाल करने पर काम कर रहे हैं. बता दें कि पौधों में सूर्य की रौशनी को अच्छे से मैनेज करने की ताकत होती है. ऐसे में वैज्ञानिक इस नैचुरल प्रोसेस को समझकर ऐसे नए फोटोवोल्टिक सिस्टम तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं जो सूरज की रौशनी का बेहतर तरीके से इस्तेमाल कर सके.
इसके बाद आने वाले समय में ऐसे हाइब्रिड सिस्टम तैयार हो सकेंगे जहां एक ही जगह से सोलर एनर्जी और जैविक प्रोसेस के जरिए एक्सट्रा एनर्जी मिल सकेगी. इससे लोग कम जगह पर भी ज्यादा बिजली बना सकेंगे.
टेस्टिंग फेज में है टेक्नोलॉजी
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि फिलहाल बॉयो सोलर टेक्नोलॉजी अपने टेस्टिंग फेज में चल रही है. इसे कॉमर्शियल तरीके से इस्तेमाल करने से पहले वैज्ञानिक इसके बिजली तैयार करने की मात्रा, सिस्टम की लागत, लंबे समय तक स्टेबल परफॉर्मेंस और मेंटेनेंस जैसे चीजों पर काम कर रहे हैं.
इसलिए फिलहाल Bio Solar को नॉर्मल सोलर पैनलों के ऑप्शन के रूप में नहीं देखना चाहिए. हालांकि, अगर ये टेस्ट सफल होता है तो लोग कम जगह में भी ज्यादा बिजली तैयार कर सकेंगे.
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        <pubDate>Mon, 24 Aug 2026 05:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>7 अंकों की ये संख्या क्यों हो रही वायरल? गूगल पर खूब सर्च कर रहे लोग</title>
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        <description><![CDATA[ पहली नजर में 5201314 सिर्फ सात अंकों की एक सामान्य संख्या लगती है। लेकिन इसका मतलब जानकर शायद आपको भी हैरानी होगी.दरअसल यह चीन के इंटरनेट कल्चर में इस्तेमाल होने वाला एक रोमांटिक नंबर कोड है. भारत में भी लोगों ने 2025 में गूगल पर इसका मतलब जानने के लिए खूब सर्च किया है.गूगल की एयर इन सर्च 2025 रिपोर्ट में 5201314 को भारत की मीनिंग केटेगरीमें पांचवां स्थान हासिल था. &amp;nbsp;
5201314 का क्या है मतलब
5201314 को चीनी भाषा के एक प्यार भरे संदेश से जोड़ा जाता है. इसमें 520 को आइ लव यू, यानी मैं तुमसे प्यार करता/करती हूं के अर्थ में इस्तेमाल किया जाता है. वहीं 1314 का मतलब पूरी जिंदगी या हमेशा के लिए समझा जाता है. दोनों को मिलाकर इसका मतलब होता है- मैं तुम्हें पूरी जिंदगी प्यार करूंगा/करूंगी.&amp;nbsp; यह अर्थ चीनी भाषा में नंबरों के खुलासा और कुछ शब्दों की मिलती जुलती आवाज पर निर्भर है. &amp;nbsp;यानी यहां नंबर अपने सामान्य गणित वाले मतलब में इस्तेमाल नहीं हो रहे है, बल्कि एक तरह के डिजिटल कोड की तरह इस्तेमाल किए जाते हैं.&amp;nbsp;
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नंबरों से प्यार जताने का अनुकह तरीका
चीनी इंटरनेट कल्चर में कुछ नंबरों को खास शब्दों या भावनाओं से जोड़कर इस्तेमाल किया जाता है. &amp;nbsp;520 भी इसका एक जाना पहचाना उदाहरण है. &amp;nbsp;20 मई यानी 5/20 को चीन में प्यार से जुड़े मौकों के लिए भी खास माना जाता है, इसलिए 520 को रोमांस का इजहार के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है. इसी तरह 5201314 ने भी सोशल मीडिया और मेससिगीनग के जरिए लोगों का ध्यान खींचा था. नंबर छोटा है याद रखना आसान है और बिना कुछ लिखे प्यार का मैसेज देने का तरीका बन जाता है.&amp;nbsp;
भारत में क्यों खोजने लगे लोग
भारत में 5201314 को लेकर लोगों की उत्साह इसलिए बढ़ी क्योंकि यह नंबर सोशल मीडिया और इंटरनेट पर दिखाई देने लगा था. जब किसी को इसका मतलब समझ नहीं आया तो लोगों ने सीधे गूगल पर इसे तलाश करना शुरू कर कर दिए. &amp;nbsp;इसी उत्साह की वजह से यह 2025 में भारत की सबसे ज्यादा खोजी गई मीनिंगसेयरचेस में शामिल हो गया था. तो पता चला &amp;nbsp;5201314 कोई रहस्यमयी या खुश किस्मती नहीं है. यह मुख्य रूप से चीनी इंटरनेट बोलचाल में प्यार जताने वाला नंबर कोड है इसका इस्तेमाल आमतौर पर रोमांटिक मैसेज के तौर पर किया जाता है.
नंबरों से मैसेज भेजना कैसे शुरू हुआ
चीन में इस तरह के नम्बर कोड का इस्तेमाल मुख्य रूप से चीनी भाषा के उच्चारण की वजह से हुआ है. &amp;nbsp;कुछ नम्बर को बोलने पर उनका उच्चारण किसी आम शब्द या जुमला से मिलता जुलता है. इसी वजह से लोग पूरे शब्द लिखने की जगह नुमबरों का इस्तेमाल करने लगे थे.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Mon, 24 Aug 2026 05:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>इंस्टाग्राम पर किस वक्त पोस्ट करने पर सबसे ज्यादा आते हैं व्यूज?</title>
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        <description><![CDATA[ आज के डिजिटल दौर में इंस्टाग्राम सिर्फ फोटो-वीडियो शेयर करने का जरिया नहीं रहा, बल्कि यह लाखों क्रिएटर्स और बिजनेस के लिए कमाई और पहचान बनाने का बड़ा प्लेटफॉर्म बन चुका है. ऐसे में हर कोई चाहता है कि उसकी पोस्ट या रील ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचे. लेकिन क्या आपको पता है कि पोस्ट करने का सही समय आपके व्यूज और एंगेजमेंट को काफी हद तक प्रभावित कर सकता है? आइए जानते हैं कि 2026 के ताजा डेटा के मुताबिक इंस्टाग्राम पर कब पोस्ट करना सबसे फायदेमंद है.
सुबह और शाम के समय में&amp;nbsp;
अलग-अलग सोशल मीडिया एनालिटिक्स कंपनियों की रिपोर्ट्स के मुताबिक, इंस्टाग्राम पर सबसे ज्यादा एंगेजमेंट वीकडेज यानी सोमवार से शुक्रवार के दौरान सुबह और शाम के वक्त देखने को मिलती है. एक रिपोर्ट के मुताबिक, वीकडेज पर सुबह 7 से 9 बजे, दोपहर 11 से 1 बजे और शाम 5 से 9 बजे के बीच पोस्ट करना सबसे बेहतर रहता है, क्योंकि इसी दौरान ज्यादातर लोग ऑफिस जाने से पहले, लंच ब्रेक में या शाम को फुर्सत के समय फोन स्क्रॉल करते हैं.
हफ्ते के कौन सा दिन हैं सबसे बेहतर
सिर्फ समय ही नहीं, हफ्ते का दिन भी बहुत मायने रखता है. ज्यादातर एनालिटिक्स रिपोर्ट्स इस बात पर सहमत हैं कि मंगलवार, बुधवार और गुरुवार को पोस्ट करने पर सबसे ज्यादा रीच और एंगेजमेंट मिलती है. इसके उलट सोमवार, शुक्रवार और वीकेंड यानी शनिवार-रविवार को एंगेजमेंट कम रहती है, क्योंकि इन दिनों लोगों की सोशल मीडिया एक्टिविटी थोड़ी कम हो जाती है.
रील्स के लिए अलग है टाइमिंग
अगर आप रील्स पोस्ट करते हैं, तो इसका पैटर्न फीड पोस्ट से थोड़ा अलग है. कई स्टडीज में पाया गया है कि सुबह जल्दी, करीब 5 बजे का समय भी रील्स के लिए काफी असरदार साबित हो रहा है, क्योंकि इस दौरान एल्गोरिदम कंटेंट को पहले इंडेक्स कर लेता है, जिससे बाद में सुबह के समय ज्यादा लोगों तक पोस्ट पहुंच जाती है. इसके अलावा सुबह 8 से दोपहर 12 बजे यानी ऑफिस आने-जाने के समय और शाम 6 से 9 बजे का विंडो भी रील्स के लिए अच्छा माना जाता है.&amp;nbsp;
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हर अकाउंट के लिए एक जैसा नियम नहीं
हालांकि यह समझना जरूरी है कि कोई भी एक ही सही समय सभी के लिए काम नहीं करता. हर क्रिएटर के फॉलोअर्स की अपनी आदतें होती हैं, जो उनकी इंडस्ट्री, उम्र और लोकेशन पर निर्भर करती हैं. इसलिए सबसे अच्छा तरीका यही है कि इंस्टाग्राम के प्रोफेशनल डैशबोर्ड में जाकर देखें कि आपके अपने फॉलोअर्स कब सबसे ज्यादा एक्टिव रहते हैं.
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        <pubDate>Mon, 24 Aug 2026 05:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>Laptop का Keyboard साफ करते समय न करें ये गलती, हो सकता है नुकसान</title>
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        <description><![CDATA[ लैपटॉप का कीबोर्ड रोजाना इस्तेमाल होता है, इसलिए इसकी बटन के बीच धूल, मिट्टी और खाने के छोटे टुकड़े जमा होना आम बात है. इसे समय समय पर साफ करना भी जरूरी है, लेकिन सफाई के दौरान की गई छोटी सी गलती लैपटॉप के कीबोर्ड को नुकसान पहुंचा सकती है. खासकर पानी या किसी लिक्विड का इस्तेमाल करना महंगा पड़ सकता है. आइए जानते हैं कीबोर्ड साफ करते समय किन गलतियों से बचना चाहिए और इसे सही तरीके से कैसे साफ करें.&amp;nbsp;
लपटॉपन को ऑन रखकर न करें सफाई
कीबोर्ड साफ करने से पहले लैपटॉप को पूरी तरह शट्डाउन कर दें और चार्जर भी निकाल दें. लैपटॉप ऑन रहने पर सफाई करते समय कोई कीज दब सकती है या फिर लिक्विड अंदर जाने पर नुकसान का हो सकता है.&amp;nbsp;
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कीबोर्ड पर कोई चीज न डालें
धूल हटाने के लिए कीबोर्ड पर कभी भी पानी या किसी &amp;nbsp;साफ करने वाली लिक्विड को स्प्रे न करें.लिक्विड कीबोर्ड में अंदर पहुंच सकता है, और अंदर का पार्ट्स को नुकसान पहुंचा सकता है. &amp;nbsp;अगर किसी क्लीनर की जरूरत है, तो उसे सीधे कीबोर्ड पर डालने की बजाय किसी नरम कपड़े पर लगाकर इस्तेमाल करें.&amp;nbsp;
कीबोर्ड को जोर से न झाड़ें
कीबोर्ड को उल्टा करके जोर जोर से झाड़ना या थपथपाना भी सही तरीका माना नहीं जाता है &amp;nbsp;इससे कीज या उनके नीचे लगे छोटे वायर और पार्ट्स को नुकसान पहुच सकता है. धूल और छोटे कण निकालने के लिए लैपटॉप को संभालकर रखें और हल्के हाथ से सफाई करें.&amp;nbsp;
इन चीजों का इस्तेमाल न करें
कीबोर्ड की सतह साफ करने के लिए बहुत हार्ड ब्रश , तेज केमिकल या किसी लिक्विड चीज का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. इससे बटन की सतह और उनकी मार्किंग बेकार &amp;nbsp;हो सकती है. सफाई के लिए नरम ,सूखे कपड़े बेहतर माना जाता है.&amp;nbsp;
कैसे करें कीबोर्ड को साफ
सबसे पहले लैपटॉप &amp;nbsp;को शट्डाउन करके &amp;nbsp;चार्ज से &amp;nbsp;निका दें &amp;nbsp;इसके बाद लैपटॉप को ऐसी रखें, जिससे बटन के बीच जमा ढीली धूल और छोटे कण आसानी से बाहर आ सकें. हल्के हाथ से नरम ब्रश का इस्तेमाल किया जा सकता है. अगर कॉमपोससेड एयर घर में हो, तो उसे बहुत सावधानी इस्तेमाल करें. इसके बाद सूखे नरम कपड़े से कीबोर्ड की ऊपर की सतह साफ करदे. अगर किसी जगह पर जमी हुई गंदगी हटानी हो, तो कपड़े को हल्का सा नम कर सकते है, लेकिन उसे इतना गीला न करें कि लिक्विड कीज के अंदर जाने लगे.
यह बातें ध्यान रखे
लैपटॉप कीबोर्ड की सफाई मुश्किल काम नहीं है, लेकिन जल्दबाजी में पानी डालना, तेज ब्रश चलाना या कीबोर्ड को जोर से झाड़ना नुकसान पहुंचा सकता है. इसलिए सफाई करते समय लैपटॉप को बंद रखें और कम लिक्विड , नरम कपड़े और हल्के हाथ का इस्तेमाल करें.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Mon, 24 Aug 2026 05:30:05 +0530</pubDate>
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        <title>Smartphone को कैसे पता चलता है आप सो रहे हैं या जगे हुए? जानें टेक्नोलॉजी</title>
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        <description><![CDATA[ आजकल स्मार्टफोन सिर्फ कॉल, मैसेज और इंटरनेट चलाने का ही काम नहीं करता. दरअसल, ये कई सारे ऐसे काम करता है जो आपको पता भी नहीं होता है. जी हां, आजकल के एडवांस स्मार्टफोन में कई सारे ऐसे फीचर्स मिलते हैं जो लोगों के बहुत काम आते हैं. ये आपकी नींद के समय भी रिकॉर्ड कर लेते हैं और बताते हैं कि आप कितनी देर सोए, कब जागे और कई बार नींद कितनी गहरी रही. लेकिन सवाल है कि फोन को आखिर कैसे पता चलता है कि आप सो रहे हैं या जाग रहे हैं? इसके पीछे कई सेंसर और स्मार्ट एल्गोरिदम मिलकर काम करते हैं. आइए जानते हैं क्या है पूरी टेक्नोलॉजी.
कैसे स्मार्टफोन को पता चलता है
दरअसल, सबसे पहले ये समझना जरूरी है कि नॉर्मल स्मार्टफोन आपकी आंखों या दिमाग को देखकर ये तय नहीं करता कि आप सो रहे हैं. फोन आपके शरीर और फोन के इस्तेमाल से जुड़े अलग-अलग चीजों को रिकॉर्ड करता है. इसके बाद सॉफ्टवेयर और मशीन लर्निंग इन मैसेज का एनॉलिसिस करके नींद का अंदाजा लगाता है.
अगर फोन रात में लंबे समय तक इस्तेमाल नहीं होता और उसके सेंसर बहुत कम एक्टिविटी को डिटेक्ट करते हैं तो सिस्टम इसे सोने की पीरियड से जोड़ सकता है.
Accelerometer करता है हलचल का पता
स्मार्टफोन में मौजूद Accelerometer सबसे जरूरी सेंसरों में से एक है. ये फोन की स्पीड और उसके हिलने-डुलने को मापता है. जब आप फोन को बेड पर रखकर सोते हैं तो उसमें होने वाली हलचल काफी कम हो जाती है. वहीं, फोन इस्तेमाल करते समय हाथों की एक्टिविटी और स्क्रीन पर टच के कारण सेंसर लगातार बदलाव रिकॉर्ड करता है. इसके साथ ही कुछ हेल्थ और स्लीप-ट्रैकिंग ऐप इसी तरह की एक्टिविटी का इस्तेमाल आपकी नींद का अंदाजा लगाने के लिए करते हैं.
Gyroscope भी देता है जानकारी
Accelerometer के साथ Gyroscope भी फोन की कंडिशन और घूमने की दिशा में होने वाले बदलावों को पहचान सकता है. इससे फोन को ये समझने में मदद मिलती है कि डिवाइस स्थिर है या लगातार अपनी कंडिशन बदल रहा है. हालांकि, अकेले Gyroscope से ये साबित नहीं किया जा सकता कि व्यक्ति सो रहा है. इसलिए कई सिस्टम इसे दूसरे मैसेजों के साथ मिलाकर इस्तेमाल करते हैं.
Smartwatch और ज्यादा सटीक जानकारी देती है
अगर स्मार्टफोन के साथ Smartwatch या fitness band इस्तेमाल किया जा रहा है तो नींद की जानकारी ज्यादा डिटेल्ड हो सकती है. इनमें Accelerometer के अलावा Heart Rate Sensor और कई मॉडलों में SpO2 जैसे सेंसर भी होते हैं.
घड़ी आपकी कलाई की एक्टिविटी और हर्ट स्पीड में होने वाले बदलावों को देखकर नींद के अलग-अलग लेवलों का अनुमान लगा सकती है. यही वजह है कि smartwatch से मिलने वाला sleep tracking डेटा नॉर्मली केवल फोन से मिलने वाले डेटा के मुकाबले ज्यादा काम का माना जाता है.
क्या फोन हमेशा सही बताता है?
ऐसा बिलकुल नहीं है. स्मार्टफोन ये तय नहीं कर सकता कि आप असल में सो रहे हैं या सिर्फ शांत होकर लेटे हुए हैं. अगर आप बिस्तर पर फोन से दूर रहकर कोई फिल्म देख रहे हैं तो फोन इसे नींद के रूप में समझ लेता है. इसी तरह रात में बार-बार जागने पर भी रिकॉर्डिंग पूरी तरह सटीक नहीं हो सकती है. इसलिए Sleep Tracking को सिर्फ एक नॉर्मल रिकॉर्ड डेटा के रूप में देखना चाहिए. इसे मेडिकल चेकअप के रूप में बिलकुल भी इस्तेमाल नहीं करना चाहिए.
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        <pubDate>Sun, 23 Aug 2026 13:30:18 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>24 अगस्त से बदलेंगे SIM कार्ड के नियम, जानें कितने नंबर रख सकेंगे आप</title>
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        <description><![CDATA[ अगर आप भी अपने नाम पर कई सारे मोबाइल नंबर रखते हैं, तो यह खबर आपके लिए बहुत जरूरी है. भारत सरकार के दूरसंचार विभाग यानी DoT ने SIM कार्ड को लेकर नए नियम लागू करने का फैसला लिया है, जो 24 अगस्त 2026 से देशभर में लागू हो जाएंगे. DoT ने सभी टेलीकॉम कंपनियों को एक सर्कुलर जारी करके निर्देश दिया है कि वे उन ग्राहकों की पहचान करें, जिनके नाम पर पहले से ही तय सीमा जितने मोबाइल कनेक्शन मौजूद हैं. ऐसे ग्राहकों को साफ बता दिया जाएगा कि वे अब अपने नाम पर कोई नया मोबाइल नंबर नहीं ले सकते. यह कदम फर्जी सिम कार्ड और धोखाधड़ी को रोकने के मकसद से लाया गया है, ताकि किसी एक व्यक्ति के नाम पर जरूरत से ज्यादा सिम कार्ड जारी न हों.&amp;nbsp;
कितने सिम कार्ड रख सकते हैं आप
मौजूदा नियमों के अनुसार, भारत में किसी भी व्यक्ति के नाम पर अलग-अलग टेलीकॉम कंपनियों और सर्विस एरिया को मिलाकर ज्यादा से ज्यादा 9 मोबाइल कनेक्शन हो सकते हैं. हालांकि कुछ खास इलाकों में यह सीमा इससे भी कम रखी गई है. जम्मू-कश्मीर, असम और नॉर्थ-ईस्ट के राज्यों में रहने वाले लोग अपने नाम पर अधिकतम 6 मोबाइल कनेक्शन ही रख सकते हैं. इसके अलावा ग्राहकों को कस्टमर एप्लीकेशन फॉर्म यानी CAF भरते समय यह भी बताना जरूरी है कि उनके नाम पर पहले से कौन-कौन से मोबाइल कनेक्शन मौजूद हैं.&amp;nbsp;
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कैसे काम करेगा नया सिस्टम
नई व्यवस्था में सबसे पहले सिस्टम पोस्ट-फैक्टो आधार पर काम करेगा, यानी टेलीकॉम कंपनियां नया कनेक्शन जुड़ने के बाद उसकी जांच करेंगी. अगर किसी दिन तय सीमा से ज्यादा कोई कनेक्शन एक्टिवेट हो जाता है, तो उसे तुरंत सस्पेंड कर दिया जाएगा. हालांकि सरकार ने कंपनियों को यह भी कहा है कि वे जल्द से जल्द रियल-टाइम सिस्टम की तरफ बढ़ें, ताकि ज्यादा सिम कार्ड की पहचान कनेक्शन जुड़ते ही हो सके. इस नए सिस्टम में ग्राहकों की फोटो का भी इस्तेमाल किया जाएगा. DoT 23 अगस्त से DIP पर उन ग्राहकों की तस्वीरें उपलब्ध कराएगा, जो पहले से ही अधिकतम सीमा तक पहुंच चुके हैं. टेलीकॉम कंपनियों को रोजाना ये तस्वीरें डाउनलोड करनी होंगी और इनकी मदद से ऐसे ग्राहकों की पहचान करनी होगी, जो सीमा से ज्यादा कनेक्शन लेने की कोशिश कर रहे हों.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Sun, 23 Aug 2026 13:30:17 +0530</pubDate>
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        <title>क्या आपका Smart Meter सही काम कर रहा या हो गया खराब? ऐसे करें पता</title>
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        <description><![CDATA[ आजकल कई घरों में बिजली की खपत को चेक करने के लिए Smart Meter लगाए जा रहे हैं. इन मीटरों की मदद से बिजली की रीडिंग अपने आप रिकॉर्ड होती है और कंज्यूमर्स ऐप या ऑनलाइन सिस्टम के जरिए उनके घर में कितनी बिजली की खपत हो रहा है या कितनी बिल आ रहा है, इसके बारे में भी देख सकते हैं. लेकिन अगर मीटर की रीडिंग अचानक बहुत ज्यादा आने लगे, खपत का डेटा अपडेट न हो या डिस्प्ले में दिक्कत दिखे तो सवाल उठता है कि मीटर सही काम कर रहा है या नहीं. आइए आपको बताते हैं कि किन चीजों से पता चलता है कि स्मार्ट मीटर सही तरीके से काम नहीं कर रहा है.
डिस्प्ले पर नजर डालें
आपको बता दें कि अगर आपको भी लगता है कि आपके घर में लगा स्मार्ट मीटर सही से काम नहीं करा रहा है तो सबसे पहले स्मार्ट मीटर की स्क्रीन को चेक करें. नॉर्मली डिस्प्ले पर बिजली की खपत, यूनिट या दूसरी जरूरी जानकारी दिखाई देती हैं. अगर स्क्रीन पूरी तरह बंद है, लगातार अजीब तरीके से चल रही है या रीडिंग बार-बार गायब हो रही है तो समझ जाएं कि मीटर में कुछ गड़बड़ी है.
हालांकि, केवल डिस्प्ले देखकर ये तय नहीं किया जा सकता कि मीटर खराब हो चुका है. कभी-कभी बिजली सप्लाई या मीटर की कम्युनिकेशन समस्या के कारण भी स्क्रीन या डेटा में परेशानी आ सकती है.
बिजली की खपत अचानक बढ़ी तो चेक करें
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अगर घर में पहले के मुकाबले अचानक बहुत ज्यादा यूनिट आने लगी है तो इसका ये मतलब नहीं होता है कि मीटर खराब हो गया है. सबसे पहले घर के बिजली डिवाइसों को चेक करें. AC, गीजर, हीटर, मोटर, फ्रिज जैसे डिवाइस ज्यादा बिजली की खपत करते हैं.
कुछ समय के लिए ऐसे डिवाइस को बंद कर दें जिसकी आपको फिलहाल जरूरत नहीं है. इसके बाद चेक करें कि मीटर में कुछ बदलाव दिख रहा है या नहीं. अगर घर का लोड कम होने के बावजूद मीटर अजीब तरीके से यूनिट बढ़ाता दिखे तो इसकी जांच कराना बेहतर ऑप्शन रहेगा.
कैसे करें लोड टेस्ट करें
आपको बताते चलें कि आप अपने घर का लोड टेस्ट भी कर सकते हैं. घर में चल रहे ज्यादातर डिवाइस बंद करके मीटर की रीडिंग देखें. इसके बाद ऐसे डिवाइस को ऑन करें जिसके वॉट और बिजली खपत के बारे में आपको पता है जैसे बल्ब या पंखे को कुछ समय के लिए चलाएं.
डिवाइस को चलाने के बाद मीटर की यूनिट और इंस्टेंट पावर जानकारी में बदलाव आना चाहिए. ध्यान रखें कि ये सिर्फ शुरुआती टेस्ट होता है. मीटर के अंदर छेड़छाड़ या किसी वायरिंग को खुद खोलने की कोशिश बिलकुल भी न करें.
Smart Meter ऐप या पोर्टल चेक करें
इसके अलावा अगर आपके बिजली विभाग ने स्मार्ट मीटर के साथ ऐप या ऑनलाइन पोर्टल की सुविधा दी है तो वहां खपत का डेटा चेक कर सकते हैं. मीटर पर दिखाई देने वाली जानकारी और ऐप में मौजूद डेटा में अगर आपको ज्यादा बड़ा अंतर दिखाई देता है तो तुरंत बिजली विभाग से कॉनटेक्ट करना चाहिए. हालांकि, कभी-कभी नेटवर्क या सर्वर की समस्या के कारण भी ऐप पर डेटा देर से अपडेट होता है.
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        <pubDate>Sun, 23 Aug 2026 13:30:15 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Google Photos में आने वाला है नया Map View, नक्शे पर ढूंढ सकेंगे पुरानी तस्वीरें</title>
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        <description><![CDATA[ आजकल हर किसी के फोन में हजारों फोटो जमा हो चुकी हैं, सुबह की चाय की तस्वीर से लेकर पिछले साल की पहाड़ों की ट्रिप तक, सब कुछ गैलरी में सेव रहता है. लेकिन असली परेशानी तब शुरू होती है, जब किसी खास फोटो को ढूंढना हो और वह मिल ही न रही हो. मान लीजिए कोई दोस्त आपसे दार्जिलिंग की तस्वीरें मांगता है, और आपको 2023 तक स्क्रॉल करके जाना पड़े, तो यह काफी थकाने वाला काम बन जाता है.
इसी दिक्कत को दूर करने के लिए गूगल ने अपने Google Photos ऐप में एक नया और शानदार फीचर लाने की तैयारी की है, जिसका नाम है Map View. कुछ लोगों को यह फीचर &#039;Places&#039; के नाम से भी दिखाई दे सकता है. इस फीचर के आने के बाद फोटो ढूंढने का तरीका पूरी तरह बदल जाएगा. आइए जानते हैं इसके बारे में पूरी जानकारी.
नक्शे पर कैसे दिखेंगी आपकी तस्वीरें
अब तक हम अपनी फोटो को तारीख या चेहरे के हिसाब से ढूंढते थे, लेकिन अब आप उन्हें जगह के हिसाब से भी खोज सकेंगे. जहां-जहां आपने फोटो खींची होंगी, वे सभी जगहें गूगल मैप पर छोटे-छोटे हीट पॉइंट यानी बिंदुओं के रूप में दिखाई देंगी. जब आप फोन में लोकेशन ऑन करके फोटो खींचते हैं, तो उस जगह की जानकारी अपने आप फोटो के साथ जुड़ जाती है, और गूगल इसी जानकारी का इस्तेमाल करके सारी तस्वीरों को नक्शे पर सही जगह पर दिखाता है. यहां तक कि अगर लोकेशन बंद भी हो, तो भी गूगल आपकी लोकेशन हिस्ट्री के आधार पर अंदाजा लगा लेता है कि फोटो कहां खींची गई थी. नक्शे पर कुछ जगहें ज्यादा गहरे रंग की दिखेंगी, इसका मतलब है कि आपने वहां सबसे ज्यादा फोटो खींची हैं, जैसे आपके घर या ऑफिस के आसपास का इलाका. वहीं घूमने की जगहें नक्शे पर अलग-अलग बिखरी हुई नजर आएंगी.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ेंः 5 महीने में करीब 3 लाख URL हुए ब्लॉक! सामने आ गई असली वजह
एक क्लिक में मिलेगा पूरी ट्रिप का एल्बम
इस फीचर की सबसे खास बात यह है कि आपको किसी फोटो की सही तारीख याद रखने की जरूरत नहीं पड़ेगी. मान लीजिए आप नक्शे पर किसी जगह, जैसे किसी समुद्री बीच पर टैप करते हैं, तो वहां खींची गई सारी फोटो और वीडियो एक साथ ग्रिड में सामने आ जाएंगी. इस फीचर को इस्तेमाल करना भी बहुत आसान है, सबसे पहले Google Photos ऐप को Play Store से अपडेट करें, फिर ऐप खोलकर नीचे दिए गए &#039;Search&#039; ऑप्शन पर जाएं वहां थोड़ा नीचे स्क्रॉल करने पर आपको &#039;Places&#039; नाम का ऑप्शन दिखेगा, जिसके सामने &#039;View Map&#039; लिखा होगा. उस पर क्लिक करते ही आपकी यादों का पूरा नक्शा खुल जाएगा. गूगल का यह नया अपडेट Android और iOS दोनों तरह के यूजर्स के लिए धीरे-धीरे रोलआउट होना शुरू हो चुका है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Sun, 23 Aug 2026 13:30:13 +0530</pubDate>
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        <title>टूट गया उसैन बोल्ट का रिकॉर्ड! इस देश के रोबोट ने रच दिया इतिहास</title>
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        <description><![CDATA[ टेक्नोलॉजी की दुनिया में अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने ज्यादातर चीजों को बदल दिया है. अब लोग एआई की मदद से पहले के मुकाबले काफी बेहतर तरीके से काम को कर पा रहे हैं. इतना ही नहीं, अब कई देश एआई की मदद से ऐसे रोबोट तैयार कर रहे हैं जो इंसानों से भी बेहतर तरीके से काम कर सकेंगे, युद्ध में भाग ले सकेंगे और यहां तक की घर के काम से लेकर दुकान चलाने तक के काम भी कर सकेंगे. इसी कड़ी में बता दें कि चीन में आयोजित World Humanoid Robot Games में एक ह्यूमनॉइड रोबोट ने 100 मीटर की दौड़ में ऐसी रफ्तार दिखाई कि उसने दुनिया के सबसे तेज दौड़ने वाले उसैन बोल्ट का रिकॉर्ड भी तोड़ दिया है.
टूट गया उसैन बोल्ट का रिकॉर्ड
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इस रोबोट ने महज 9.39 सेकेंड में 100 मीटर की दौड़ को पूरा कर लिया है. बताते चलें कि इंसानों की रेस में 100 मीटर की रेस में आज भी उसैन बोल्ट सबसे आगे हैं जिन्होंने 100 मीटर की दौड़ को महज 9.58 सेकेंड में पूरा किया है. हालांकि, आपको बता दें कि रोबोट की तुलना इंसानों की दौड़ से नहीं की जा सकती है लेकिन रोबोट्स की दुनिया में ये एक बड़ी कामयाबी मानी जा रही है.

A humanoid robot developed by China&amp;rsquo;s Beijing Innovation Center of Humanoid Robotics ran 100 meters in 9.39 seconds, beating the human world record held by Jamaican sprinting great Usain Bolt https://t.co/z0D4H4Vco6 pic.twitter.com/EYuum0iwA8
&amp;mdash; Reuters (@Reuters) August 22, 2026



किसने तैयार किया इतना तेज रोबोट?
दरअसल, इस रोबोट को Beijing Innovation Centre of Humanoid Robotics ने तैयार किया है. बता दें कि इस रोबोट को इस तरह से तैयार किया गया है कि ये अपने दोनों पैरों पर दौड़ सके और अपनी स्पीड को कंट्रोल भी कर सके.
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ह्यूमनॉइड रोबोट के लिए दो पैरों पर दौड़ना काफी मुश्किल काम होता है क्योंकि ऐसा करते समय इन्हें काफी बैलेंस बनाने की जरूरत पड़ती है जिसके लिए इनमें सेंसर, मोटर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रियल-टाइम कंट्रोल सिस्टम जैसी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करना पड़ता है.
आयोजित हुईं कई सारी प्रतियोगिताएं
जानकारी के मुताबिक, चीन में आयोजित World Humanoid Robot Games का मकसद सिर्फ रोबोट की स्पीड को चेक करना नहीं है. इस प्रोग्राम में रोबोट्स को अपनी अलग-अलग कामों को करने की ताकत दिखाने का मौका दिया जा रहा है. चीन में आयोजित हुए इस प्रोग्राम में सिर्फ दौड़ ही नहीं बल्कि बॉक्सिंग और फुटबॉल जैसे खेल भी शामिल हैं. इसके अलावा रोबोट्स को ऐसे घरेलू काम भी करने पड़ रहे हैं जो इंसानों की डेली जिंदगी में बड़े काम आते हैं.
भविष्य में कितने ताकतवर होंगे रोबोट
चीन में ह्यूमनॉइड रोबोट ने जो कारनामा किया है उससे ये अंदाजा लगाया जा सकता है कि आने वाले समय में रोबोट्स और भी ज्यादा एडवांस हो सकेंगे. रोबोटिक्स टेक्नोलॉजी पहले के मुकाबले अब काफी तेजी से एडवांस रूप ले रही है. इससे ये कहा जा सकता है कि आने वाले समय में सिर्फ दौड़ ही नहीं बल्कि घर में काम करने से लेकर किसी शॉप को चलाने तक या फिर घर पर सामान डिलीवरी करने तक, ज्यादातर जगहों पर आपको रोबोट्स काम करते हुए नजर आ सकते हैं.
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        <pubDate>Sun, 23 Aug 2026 13:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>फ्री में चलेगी TV? घर में लगी डिश को ऐसे बना सकते हैं एंटीना! जानें तरीका</title>
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        <description><![CDATA[ फ्री में चलेगी TV? घर में लगी डिश को ऐसे बना सकते हैं एंटीना! जानें तरीका ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 22 Aug 2026 21:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>नया SIM लेने वालों के लिए बड़ा बदलाव,  बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन जरूरी</title>
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        <description><![CDATA[ अब नया SIM कार्ड लेना पहले जैसा आसान नहीं होगा. दूरसंचार विभाग DoT ने यूजर की पहचान को लेकर नए नियम जारी किए हैं. &amp;nbsp;नए SIM कनेक्शन के लिए अब बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन जरूरी होगा, यानी SIM लेते समय सिर्फ KYC के लिए दस्तावेज देना ही काफी नहीं होगा. नए नियम के मुताबिक, यूजर की पहचान बायोमेट्रिक तरीके से भी जांची जाएगी. इसमें फिंगरप्रिंट, चेहरे या आंखों की पुतली यानी Iris जैसी जानकारी का इस्तेमाल किया जा सकता है.
सिर्फ नया SIM ही नहीं, नियमों का असर सिर्फ नया कनेक्शन लेने तक सीमित नहीं है. यूजर की जानकारी अपडेट करने, SIM बंद कराने और दोबारा पहचान सत्यापित करने के दौरान भी बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन की व्यवस्था रहेगी. सरकार का कहना है कि इस तरह की व्यवस्था से फर्जी नाम पर लिए गए SIM और गलत पहचान के इस्तेमाल को रोकने में मदद मिलेगी.
सरकार ने इस लिए बदला नियम&amp;nbsp;
आज मोबाइल नंबर सिर्फ कॉल या इंटरनेट के लिए नहीं है. बैंकिंग, UPI और कई दूसरी डिजिटल सेवाओं में भी मोबाइल नंबर का इस्तेमाल होता है. ऐसे में मोबाइल कनेक्शन किस व्यक्ति के नाम पर है इसकी सही पहचान काफी अहम हो जाती है. नए नियमों के बाद SIM लेने से लेकर यूजर की जानकारी बदलने और दोबारा वेरिफिकेशन तक, पहचान जांचने की प्रक्रिया और मजबूत होगी.
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तय लिमिट से ज्यादा नहीं रख पाएंगे सिम कार्ड
इसके अलावा दूरसंचार विभाग ने मोबाइल कनेक्शन की भी सीमा तय कर दी है. नए नियम के मुताबिक, टेलीकॉम कंपनियों को ऐसे ग्राहकों काी पहचान करनी होगी, जिनके पास नए नियम के तहत तय सीमा से ज्यादा मोबाइल कनेक्शन हैं. जानकारी के मुताबिक, एक व्यक्ति के नाम पर अधिकतम 9 मोबाइल कनेक्शन हो सकते हैं. जम्मू-कश्मीर, असम और नॉर्थ ईस्ट सर्विस एरिया में यह लिमिट 6 सिम की है. अगर किसी ग्राहक के पास उनके नाम पर इस तय लिमिट से ज्यादा मोबाइल कनेक्शन हैं तो उसे अतिरिक्त नंबर बंद करने होंगे.
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        <pubDate>Sat, 22 Aug 2026 21:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>Laptop का Fan तेज आवाज कर रहा? सर्विस सेंटर जाने से पहले करें ये काम</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/laptop-का-fan-तेज-आवाज-कर-रहा-सर्विस-सेंटर-जाने-से-पहले-करें-ये-काम</link>
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        <description><![CDATA[ आजकल लैपटॉप हर किसी की जिंदगी का जरूरी हिस्सा बन चुका है. ऑफिस का काम हो, पढ़ाई हो या एंटरटेनमेंट, हर काम के लिए लैपटॉप का इस्तेमाल होता है. लेकिन लगातार इस्तेमाल की वजह से कई बार लैपटॉप का फैन तेज आवाज करने लगता है. यह आवाज सुनकर ज्यादातर लोग घबरा जाते हैं और सीधे सर्विस सेंटर की तरफ भागते हैं, जहां अच्छा-खासा पैसा खर्च हो जाता है. जबकि हकीकत यह है कि फैन की तेज आवाज की समस्या को कई बार घर बैठे ही ठीक किया जा सकता है. आइए जानते हैं लैपटॉप के फैन की आवाज को कम करने के घरेलू उपाय.&amp;nbsp;
लैपटॉप का फैन से आवाज आती क्यों है?
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि लैपटॉप का फैन तेज आवाज क्यों करने लगता है. दरअसल, लैपटॉप के अंदर मौजूद प्रोसेसर और दूसरे पार्ट्स गर्मी पैदा करते हैं और यह फैन उसी गर्मी को बाहर निकालने का काम करता है. जब लैपटॉप ज्यादा गर्म होने लगता है तो फैन को ज्यादा तेज स्पीड से घूमना पड़ता है, जिससे आवाज बढ़ जाती है. कई बार यह समस्या धूल-मिट्टी जमने, पुराने सॉफ्टवेयर या गलत तरीके से इस्तेमाल की वजह से भी होती है.&amp;nbsp;
लैपटॉप के एयर वेंट्स को साफ करें
सबसे पहला और आसान तरीका है लैपटॉप के वेंट्स और एयर पास होने वाली जगहों को साफ रखना. दरअसल, लंबे समय तक इस्तेमाल के बाद इन वेंट्स में धूल जमा हो जाती है, जिससे हवा सही तरीके से अंदर-बाहर नहीं हो पाती और फैन को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है. इसके लिए एक छोटा ब्रश या कंप्रेस्ड एयर कैन इस्तेमाल करके वेंट्स को हल्के हाथों से साफ करें. इस दौरान लैपटॉप को पूरी तरह बंद रखना और पावर सोर्स से हटाना जरूरी है.
इस्तेमाल करने का तरीका बदलें
दूसरी बड़ी वजह है लैपटॉप को गलत सतह पर रखकर इस्तेमाल करना. बहुत से लोग लैपटॉप को बेड, तकिए या कंबल पर रखकर काम करते हैं, जिससे नीचे की तरफ मौजूद एयर वेंट्स ब्लॉक हो जाते हैं और गर्मी बाहर नहीं निकल पाती. ऐसे में लैपटॉप को हमेशा किसी सख्त और समतल सतह जैसे टेबल पर रखकर इस्तेमाल करना चाहिए. जरूरत पड़ने पर लैपटॉप कूलिंग पैड का इस्तेमाल भी किया जा सकता है, जो हवा की आवाजाही को बेहतर बनाने में मदद करता है.&amp;nbsp;
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बैकग्राउंड में चल रहे भारी ऐप्स को बंद करें
इसके अलावा, बैकग्राउंड में चल रहे भारी और गैरजरूरी ऐप्स भी फैन की आवाज बढ़ाने की एक बड़ी वजह होते हैं. कई बार यूजर को पता भी नहीं होता कि कौन-कौन से ऐप्स बैकग्राउंड में चलकर प्रोसेसर पर लोड डाल रहे हैं. इसके लिए विंडोज लैपटॉप में Task Manager खोलकर देखा जा सकता है कि कौन सा ऐप सबसे ज्यादा CPU इस्तेमाल कर रहा है. जो ऐप्स इस्तेमाल में नहीं हैं, उन्हें बंद करने से प्रोसेसर पर लोड कम होता है और फैन की स्पीड भी सामान्य हो जाती है.
अगर ये सभी तरीके अपनाने के बाद भी फैन की आवाज कम नहीं होती, तो ऐसी स्थिति में लैपटॉप को खुद खोलने की कोशिश करने के बजाय किसी अनुभवी टेक्नीशियन या सर्विस सेंटर से जांच करवाना सही रहता है, ताकि लैपटॉप को किसी तरह के नुकसान से बचाया जा सके.
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        <pubDate>Sat, 22 Aug 2026 21:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>कितने साल तक चलेगी फोन की बैटरी? Android और iPhone में ऐसे करें चेक</title>
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        <description><![CDATA[ स्मार्टफोन आज लोगों की जरूरत बन चुकी है. बाजार में स्मार्टफोन कैटेगरी में यूजर्स को दो ऑप्शन मिलते हैं एक एंड्रॉयड और दूसरा आईफोन यानी आईओएस. एप्पल का आईफोन ज्यादा महंगा होता है लेकिन इस डिवाइस का क्रेज लोगों में काफी देखने को मिलता है. लेकिन अक्सर लोग जब कोई नया स्मार्टफोन खरीदते हैं तो उस समय कैमरा, प्रोसेसर, डिस्प्ले और स्टोरेज जैसी चीजों पर खूब ध्यान देते हैं लेकिन फोन की बैटरी हेल्थ को अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं.
कुछ साल इस्तेमाल के बाद बैटरी तेजी से खत्म होने लगती है, फोन गर्म हो सकता है और बार-बार चार्ज करने की जरूरत पड़ती है. इसीलिए आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि आप कैसे अपने फोन की बैटरी हेल्थ के बारे में आसानी से पता कर सकते हैं.
कितने साल तक चलती है फोन की बैटरी?
जानकारी के मुताबिक, आजकल ज्यादातर स्मार्टफोन में Lithium-ion बैटरी देखने को मिलती है. नॉर्मल इस्तेमाल में फोन की बैटरी करीब 2 से 4 साल तक अच्छी परफॉर्मेंस देती है. हालांकि इसकी असली लाइफ चार्जिंग साइकल, टेंपरेचर, इस्तेमाल और चार्जिंग हैबिट पर निर्भर करती है.
समय के साथ बैटरी की पावर भी धीरे-धीरे कम होने लगती है. इसका मतलब है कि नया फोन जहां एक चार्ज में पूरे दिन चलता है, वहीं कुछ साल बाद उसी इस्तेमाल में ज्यादा जल्दी बैटरी खत्म होने लगती है.
बैटरी खराब होने के संकेत
आपको बता दें कि अगर फोन पहले के मुकाबले बहुत जल्दी डिस्चार्ज हो रहा है, अचानक बंद हो जाता है या चार्जिंग के दौरान जरूरत से ज्यादा गर्म होता है तो समझ जाएं कि आपके फोन की बैटरी कमजोर हो चुकी है. इसके अलावा बैटरी फूलने की कंडिशन में फोन का पिछला पैनल या स्क्रीन बाहर की ओर उभर जाती है. ऐसी कंडिशन में फोन इस्तेमाल करने के बजाय सर्विस सेंटर पर देना सही रहता है.
iPhone में ऐसे चेक करें Battery Health
iPhone में Apple ने बैटरी हेल्थ को चेक करने का भी ऑप्शन यूजर्स को दे रखा है. इसके लिए सबसे पहले Settings में जाएं और फिर Battery वाले ऑप्शन पर क्लिक करें. इसके बाद यहां आपको Battery Health &amp;amp; Charging ऑप्शन दिखाई देगा उस पर क्लिक करें.
यहां Maximum Capacity दिखाई देती है. ये बताता है कि बैटरी अपनी नई कंडिशन के मुकाबले में अब कितनी पावर रखती है. iPhone में इसी सेक्शन में बैटरी की परफॉर्मेंस से जुड़ी जानकारी भी मिल जाती है.
Android फोन में कैसे चेक करें Battery Health?
Android फोन में बैटरी हेल्थ चेक करने का तरीका कंपनी और मॉडल के हिसाब से अलग होता है. कुछ स्मार्टफोन में Settings में जाकर Battery और फिर Battery Health के ऑप्शन से बैटरी की हेल्थ पता चल जाती है.
वहीं, अगर आपके फोन में ये ऑप्शन मौजूद नहीं है तो फोन की Settings में Battery Information सर्च करके देखें. कुछ स्मार्टफोन ब्रांड बैटरी के पावर, चार्जिंग साइकल या बैटरी की कंडिशन की डिटेल्स अलग-अलग तरीके से दिखाते हैं.
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        <pubDate>Sat, 22 Aug 2026 21:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>5 महीने में करीब 3 लाख URL हुए ब्लॉक! सामने आ गई असली वजह</title>
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        <description><![CDATA[ देश में साइबर ठगी के मामले काफी तेजी से बढ़ रहे हैं. टेक्नोलॉजी की दुनिया में अब ठगों ने भी लोगों को ठगने के नए-नए तरीके निकाल लिए हैं. हालांकि, सरकार भी साइबर ठगी पर तेजी से एक्शन ले रही है. लोगों को जागरुक करने के साथ-साथ इस समस्या से लड़ने के लिए नए तरीकों को भी खोजा जा रहा है. इसी कड़ी में बता दें कि देश में गैरकानूनी ऑनलाइन कंटेंट पर सरकार ने नकेल कसी है. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, मार्च 2026 से जुलाई 2026 तक केंद्र और राज्य सरकारों की अलग-अलग एजेंसियों ने ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स को करीब 2.98 लाख URLs हटाने के लिए फ्लैग किया है.
राज्य सरकारों ने भेजीं सबसे ज्यादा रिक्वेस्ट
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, जितने URLs को ब्लॉक किया गया है उनमें से करीब 2.44 लाख URLs यानी लगभग 82 फीसदी राज्य सरकारों की ओर से फ्लैग किए गए हैं. इससे ये साफ पता चलता है कि ऑनलाइन गलत कंटेंट को रोकने और उनकी पहचान करने के लिए राज्य सरकारें भी लगातार काम कर रही हैं. इसके साथ ही Indian Cyber Crime Coordination Centre (I4C) ने अलग से करीब 51 हजार URLs की पहचान की है. इनमें साइबर अपराध और दूसरी तरह की गैरकानूनी ऑनलाइन एक्टिविटी से जुड़ें कंटेंट शामिल थे.
साइबर क्राइम और फ्रॉड पर भी नजर
आपको बता दें कि I4C की ओर से जिन कंटेंट की पहचान की गई हैं उनमें कई तरह के साइबर अपराध शामिल रहे हैं. इनमें ऑनलाइन ठगी, निवेश से जुड़े फ्रॉड, जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाने वाली धमकियां और दूसरे गैरकानूनी एक्टिविटीज शामिल बताई गई हैं.
भारत में सोशल मीडिया यूजर्स की बड़ी संख्या
दरअसल, सरकार ने ऑनलाइन कंटेंट की निगरानी को चुनौतीपूर्ण बताते हुए देश में सोशल मीडिया के बड़े यूजर बेस का भी हवाला दिया है. जानकारी के मुताबिक, देश में करीब 60 करोड़ सोशल मीडिया यूजर्स होने का अंदाजा लगाया गया है. ऐसे में सरकार का मानना है कि यूजर्स की ओर से बड़े वाल्यूम में कंटेंट को प्लेटफॉर्म पर पोस्ट किया जाता है. ऐसे में इतने सारे कंटेंट के बीच में गलत कंटेंट भी प्लेटफॉर्म पर फ्लो होने लगता है जिनकी पहचान करके उन्हें हटाना काफी मुश्किल हो जाता है.
हर अधिकारी नहीं भेज सकता कंटेंट हटाने की रिक्वेस्ट
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि Sahyog सिस्टम के जरिए कंटेंट हटाने के प्रोसेस में किसी भी सरकारी कर्मचारी को मनमाने तरीके से रिक्वेस्ट भेजने की परमिशन नहीं दी गई है.
इसके लिए संबंधित केंद्रीय मंत्रालय या राज्य सरकार की ओर से रजिस्टर्ड अधिकारी ही कार्रवाई शुरू कर सकते हैं. साथ ही, ऐसे अधिकारियों की ओर से जारी निर्देशों की समय-समय पर समीक्षा भी की जाएगी.
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        <pubDate>Sat, 22 Aug 2026 21:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>OpenAI बिना डेटा देखे AI मिसयूज पर रखेगा नजर, जानें कैसे?</title>
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        <description><![CDATA[ AI मॉडल जैसे-जैसे ज्यादा ताकतवर और सक्षम हो रहे हैं, इनके गलत इस्तेमाल को लेकर चिंता भी बढ़ रही है. ऐसे में कंपनियों के सामने एक बड़ी चुनौती यह है कि AI के मिसयूज पर नजर भी रखी जाए और यूजर्स की प्राइवेसी भी सुरक्षित रहे. इसी बीच ChatGPT बनाने वाली कंपनी OpenAI ने एक नए सिस्टम का प्रीव्यू किया है, जिसका नाम Private Safety Processing है.
कंपनी का कहना है कि यह सिस्टम यूजर की बातचीत का असली कंटेंट देखे बिना उसमें मौजूद ऐसे पैटर्न को पहचानने में मदद करेगा, जो AI के गलत इस्तेमाल की ओर इशारा कर सकते हैं. फिलहाल इसकी टेस्टिंग कुछ यूजर्स के साथ की जा रही है और सितंबर में इसे ज्यादा व्यापक स्तर पर शुरू करने की उम्मीद है. तो आइए जानते हैं कि Private Safety Processing क्या है और कैसे बिना डेटा देखे AI मिसयूज पर नजर रखेगा.&amp;nbsp;
क्या है Private Safety Processing?
OpenAI का Private Safety Processing सिस्टम उसके मौजूदा Zero Data Retention (ZDR) सिस्टम पर आधारित है. ZDR का इस्तेमाल योग्य API यूजर्स के लिए किया जाता है. इसके तहत AI सिस्टम हर इंटरैक्शन को अलग-अलग जांचकर संभावित गलत एक्टिविटी का पता लगा सकता है, जबकि यूजर का डेटा कंपनी के पास सामान्य तौर पर स्टोर नहीं रहता है. OpenAI के मुताबिक नया सिस्टम इसी सुरक्षा व्यवस्था को आगे बढ़ाता है. इसका मकसद ऐसे AI मॉडल्स से जुड़े नए जोखिमों को पहचानना है, जो ज्यादा जटिल और लंबे समय तक चलने वाले काम कर सकते हैं.
कैसे बिना डेटा देखे AI मिसयूज पर नजर रखेगा?
इस सिस्टम की खास बात यह है कि यूजर की बातचीत या दूसरे कंटेंट को OpenAI के कर्मचारी सीधे रिव्यू नहीं कर पाएंगे. कंपनी ने कहा है कि एंटरप्राइज यूजर्स का डेटा उसके AI मॉडल्स को ट्रेन करने के लिए भी इस्तेमाल नहीं किया जाता, जब तक यूजर खुद इसकी अनुमति न दें. OpenAI एक ऐसा ऑप्शन भी पेश करेगा, जिसमें इंटरैक्शन डेटा को एन्क्रिप्ट करके कंपनी के इंफ्रास्ट्रक्चर पर स्टोर किया जा सकेगा. इसकी एन्क्रिप्शन कीज यूज के कंट्रोल में रहेंगी.&amp;nbsp;
गलत एक्टिविटी मिलने पर क्या होगा?
अगर OpenAI के ऑटोमेटेड सिस्टम को कोई गलत इंटरैक्शन मिलता है, तो कंपनी के कर्मचारियों को उसका असली कंटेंट नहीं दिखेगा. इसकी जगह OpenAI को एक सीमित संकेत मिलेगा, जिससे यह पता चल सकेगा कि किस तरह की एक्टिविटी सामने आई है. इसी संकेत के आधार पर कंपनी तय कर सकेगी कि आगे कोई कार्रवाई जरूरी है या नहीं. हालांकि, सिस्टम गलत अलर्ट यानी false positives से कैसे निपटेगा, इसकी ज्यादा जानकारी अभी सामने नहीं आई है. यूजर अपने सिस्टम में उपलब्ध जानकारी के आधार पर अलर्ट या कार्रवाई की जांच कर सकेंगे. अगर वे अपील करना चाहते हैं या किसी वैध एक्टिविटी की जानकारी देना चाहते हैं, तो संबंधित जानकारी OpenAI के साथ शेयर कर सकते हैं.&amp;nbsp;
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सितंबर में ज्यादा स्तर पर शुरू हो सकता है सिस्टम
OpenAI फिलहाल Private Safety Processing की कुछ यूजर्स के साथ टेस्टिंग कर रहा है. कंपनी के मुताबिक इसे इस साल सितंबर में ज्यादा व्यापक रूप से उपलब्ध कराया जा सकता है. इसके साथ इस सिस्टम की तकनीकी जानकारी देने वाली एक रिपोर्ट भी जारी की जाएगी.&amp;nbsp;
OpenAI क्यों बढ़ा रहा है सुरक्षा?
OpenAI ने यह कदम ऐसे समय उठाया है, जब कंपनी ने अपने कुछ सबसे शक्तिशाली और अभी तक जारी न किए गए AI मॉडल्स की ट्रेनिंग को दो हफ्ते से ज्यादा समय के लिए रोक दिया है. इसके पीछे एक सुरक्षा घटना भी सामने आई, जिसमें OpenAI के दो अप्रकाशित मॉडल इंटरनल साइबर सिक्योरिटी टेस्ट के दौरान सैंडबॉक्स से बाहर निकल गए और Hugging Face के प्रोडक्शन सिस्टम को नुकसान पहुंचा. हाल के दिनों में Anthropic, Meta और चीन की Moonshot AI जैसी कंपनियों के साथ भी सुरक्षा से जुड़ी घटनाएं सामने आई हैं. ऐसे में AI के गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए सुरक्षा उपायों पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Sat, 22 Aug 2026 09:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>Google Firebase पर सरकार का बड़ा एक्शन, सैकड़ों अकाउंट होंगे बंद</title>
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        <description><![CDATA[ ऑनलाइन ठगी के मामले लगातार चर्चा में हैं. वहीं अब साइबर अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई का दायरा उन प्लेटफॉर्म्स तक पहुंच रहा है, जिनका इस्तेमाल इन ठगियों को अंजाम देने में किया जा रहा है. भारत सरकार ने Google को उसके Firebase वेब डेवलपमेंट प्लेटफॉर्म पर मौजूद सैकड़ों अकाउंट बंद करने का निर्देश दिया है.
यह कदम ऐसे मामलों की पहचान के बाद उठाया गया, जिनमें कथित तौर पर अपराधी बड़े बैंकों की नकल करने वाली वेबसाइट और सेवाएं बनाकर लोगों से वित्तीय जानकारी हासिल कर रहे थे. रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय अधिकारियों ने अगस्त में ही Firebase पर होस्ट की गई कम से कम 57 वेबसाइट और डेटाबेस हटाने का निर्देश दिया. इनका इस्तेमाल कथित तौर पर मैलवेयर फैलाने और लोगों की संवेदनशील वित्तीय जानकारी चोरी करने के लिए किया जा रहा था.&amp;nbsp;Firebase पर सरकार का बड़ा एक्शन क्या है?
भारतीय साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर (I4C) ने अगस्त में Google को कम से कम तीन नोटिस भेजे. इन नोटिस में 57 वेबसाइट और डेटाबेस को हटाने का निर्देश दिया गया था. अधिकारियों के मुताबिक, इन लिंक का इस्तेमाल मैलवेयर फैलाने और संवेदनशील जानकारी चोरी करने के लिए किया जा रहा था. नोटिस के अनुसार, अगर Google किसी बताए गए लिंक को नोटिस मिलने के तीन घंटे के अंदर नहीं हटाता, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है. हालांकि इन नोटिस में Google या Firebase को इन साइबर ठगी के लिए जिम्मेदार नहीं बताया गया है.&amp;nbsp;
कैसे की नकली वेबसाइट बनाकर ठगी?
अगस्त में जिन वेबसाइट और डेटाबेस की पहचान की गई, उनमें से 7 Firebase पर बनाई गई फिशिंग वेबसाइट थीं. इन वेबसाइटों पर भारतीय बैंकों की नकल की गई थी.इनमें SBI, ICICI Bank और Axis Bank जैसे प्रमुख बैंकों के नाम शामिल थे. बाकी वेबसाइटों और डेटाबेस का इस्तेमाल पीड़ितों के फोन से चोरी की गई जानकारी जमा करने के लिए किया जा रहा था. इसमें क्रेडिट कार्ड की जानकारी और वन-टाइम पासवर्ड (OTP) जैसी संवेदनशील जानकारी शामिल थी.&amp;nbsp;
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Android यूजर्स को ऐसे बनाया निशाना
I4C के 17 अगस्त के एक नोटिस के मुताबिक, ठग ऐसे Android मैलवेयर का इस्तेमाल कर रहे थे, जो खुद को असली बैंकिंग सेवा की तरह दिखाता था. लोगों को नए क्रेडिट कार्ड, रिवॉर्ड और क्रेडिट लिमिट बढ़ाने जैसे ऑफर देकर फंसाया जाता था. इसके बाद उन्हें ऐसी ऐप डाउनलोड करने के लिए कहा जाता था, जो देखने में बैंकिंग ऐप जैसी लगती थी. ऐप इंस्टॉल होने के बाद फोन से जानकारी Firebase डेटाबेस में भेजी जा सकती थी, जिसे ठग कंट्रोल करते थे. एक मामले में PM-KISAN योजना के नाम का भी इस्तेमाल किया गया. लोगों को भुगतान का फायदा लेने के लिए ऐप डाउनलोड करने के लिए कहा गया. इसके बाद ऐप के जरिए फोन की दूसरी ऐप्स से जानकारी तक पहुंच बनाई जा सकती थी.&amp;nbsp;
भारत में कैसे बढ़ रही साइबर ठगी पर कार्रवाई?
Firebase से जुड़े इन मामलों के बीच भारत में ऑनलाइन वित्तीय धोखाधड़ी के खिलाफ कार्रवाई तेज की जा रही है. &amp;nbsp;सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2025 में भारतीयों को कथित साइबर फ्रॉड में करीब 2.4 अरब डॉलर का नुकसान हुआ. सरकार ने मार्च में ऐसे मैलवेयर को लेकर भी एडवाइजरी जारी की थी, जिसे साइबर सुरक्षा शोधकर्ता Android God Mode कहते हैं. ऐसे मैलवेयर के जरिए ठग Android फोन पर काफी हद तक कंट्रोल हासिल कर सकते हैं. Google ने कहा है कि वह I4C समेत कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ मिलकर ऐसे मामलों की जांच और कार्रवाई करता है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Sat, 22 Aug 2026 09:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>Best Phones Under 30000: 30000 है बजट? गेमिंग से लेकर डेटा स्टोरेज तक... ये मोबाइल रहेंगे बेस्ट</title>
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        <description><![CDATA[ Best Phones Under 30000: 30000 है बजट? गेमिंग से लेकर डेटा स्टोरेज तक... ये मोबाइल रहेंगे बेस्ट ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 21 Aug 2026 17:30:15 +0530</pubDate>
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        <title>Fridge Buying Tips: 4 लोगों की फैमिली के लिए लेना है फ्रिज, जानें बजट और सही कैपेसिटी</title>
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        <pubDate>Fri, 21 Aug 2026 17:30:14 +0530</pubDate>
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        <title>Washing Machine Buying Guide: वॉशिंग मशीन खरीदने की सोच रहे हैं? जानें 25000 में बेस्ट ऑप्शन</title>
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        <description><![CDATA[ Washing Machine Buying Guide : वॉशिंग मशीन खरीदते समय सही मॉडल चुनना कई लोगों के लिए मुश्किल हो जाता है, खासकर जब बजट सीमित हो. अगर आपका बजट करीब 25,000 रुपये है तो इस कीमत में कई अच्छी वॉशिंग मशीन के ऑप्शन मिल जाते हैं. इनमें फुली ऑटोमैटिक ऑपरेशन के साथ इन-बिल्ट हीटर, इन्वर्टर मोटर, AI वॉश टेक्नोलॉजी और अलग-अलग वॉश प्रोग्राम जैसे फीचर्स भी दिए जाते हैं. हालांकि, बाजार में इतने सारे मॉडल और फीचर्स मौजूद होने की वजह से अपनी जरूरत और बजट के हिसाब से सही मशीन चुनना थोड़ा कंफ्यूजिंग हो सकता है. तो आइए आज हम आपको बताते हैं कि वॉशिंग मशीन खरीदने के लिए 25000 में बेस्ट ऑप्शन क्या है.&amp;nbsp;
1. Whirlpool 6.5 Kg Washing Machine - वॉशिंग मशीन खरीदने के लिए Whirlpool 6.5 किलोग्राम Stainwash फुली ऑटोमैटिक टॉप लोड वॉशिंग मशीन एक बेस्ट ऑप्शन हो सकती है. इसमें इन-बिल्ट हीटर और अलग-अलग वॉश प्रोग्राम दिए गए हैं. इसकी कीमत करीब 17000 &amp;nbsp;है. यह छोटे परिवारों के लिए परफेक्ट है और इसमें 4 स्टार एनर्जी रेटिंग भी मिलती है.&amp;nbsp;
2. LG 9 Kg Washing Machine - &amp;nbsp;बड़े परिवारों के लिए LG 9 किलोग्राम Smart Inverter फुली ऑटोमैटिक टॉप लोड वॉशिंग मशीन यूजफुल ऑप्शन है. इसमें स्मार्ट इन्वर्टर टेक्नोलॉजी, TurboDrum, Steam Wash और इन-बिल्ट हीटर मिलता है. साथ ही ऑटोमैटिक टब क्लीन और स्मार्ट डायग्नोसिस जैसे फीचर्स भी दिए गए हैं. इसकी कीमत 24 से 25 हजार के बीच है.&amp;nbsp;
3. IFB 8 Kg Washing Machine - &amp;nbsp;अगर आप AI टेक्नोलॉजी वाली मशीन लेना चाहते हैं, तो IFB 8 किलोग्राम AI Powered DeepClean मॉडल पर विचार कर सकते हैं. इसमें AI-संचालित DeepClean टेक्नोलॉजी के साथ इन-बिल्ट हीटर, Eco Inverter Motor और Aqua Energie सिस्टम मिलता है. इसकी कीमत 24,990 &amp;nbsp;है.
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4. Voltas Beko 6.5 Kg Washing Machine - फ्रंट-लोड मशीन पसंद करने वालों के लिए Voltas Beko 6.5 किलोग्राम फुली ऑटोमैटिक फ्रंट लोड वॉशिंग मशीन ऑप्शन है. इसमें इन-बिल्ट हीटर, 5 स्टार एनर्जी रेटिंग और पानी की बेहतर बचत जैसी खूबियां दी गई हैं. इसकी कीमत 20 से 23 हजार के बीच है. हालांकि इसकी क्षमता 6.5 किलोग्राम है और वॉश साइकल लंबे हो सकते हैं.&amp;nbsp;
5. Godrej 7.5 Kg Washing Machine - कम पानी के दबाव वाले घरों के लिए Godrej 7.5 किलोग्राम AI Powered फुली ऑटोमैटिक टॉप लोड वॉशिंग मशीन यूजफुल है. इसमें AI वॉश प्रोग्राम, इन-बिल्ट हीटर और कम पानी के दबाव में काम करने की क्षमता मिलती है. इसकी कीमत 17 से 18 हजार के बीच है और इसमें 5 स्टार एनर्जी रेटिंग है.&amp;nbsp;
मशीन खरीदते समय इन बातों का रखें ध्यान
वॉशिंग मशीन खरीदते समय सिर्फ कीमत पर ध्यान देना सही नहीं है. परिवार के साइज के अनुसार क्षमता चुनना जरूरी है. 6.5 या 7.5 किलोग्राम मशीन छोटे परिवारों के लिए, जबकि 8 और 9 किलोग्राम मॉडल बड़े परिवारों के लिए बेहतर हो सकते हैं. इसके अलावा एनर्जी रेटिंग, मोटर टेक्नोलॉजी, वॉश प्रोग्राम, हीटर, वारंटी और बिक्री के बाद मिलने वाली सर्विस को भी जरूर देखना चाहिए.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Fri, 21 Aug 2026 17:30:13 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Washing, Machine, Buying, Guide:, वॉशिंग, मशीन, खरीदने, की, सोच, रहे, हैं, जानें, 25000, में, बेस्ट, ऑप्शन</media:keywords>
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        <title>Smartwatch Technology : स्मार्ट वॉच को कैसे पता चलता है आपने 5000 कदम चल लिए, जानें टेक्नोलॉजी</title>
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        <description><![CDATA[ Smartwatch Technology : आजकल स्मार्ट वॉच सिर्फ समय देखने का गैजेट नहीं रह गई है. दिनभर में आपने कितने कदम चले, कितनी दूरी तय की और आपकी एक्टिविटी कैसी रही, इसकी जानकारी भी स्मार्ट वॉच कुछ ही सेकंड में दे देती है. कई बार स्क्रीन पर 5,000 या 10,000 कदम का आंकड़ा देखकर मन में सवाल आता है कि आखिर वॉच को कैसे पता चलता है कि हमने सच में इतने कदम चले हैं. इसके पीछे कई सेंसर और सॉफ्टवेयर मिलकर काम करते हैं. तो आइए आज हम आपको बताते हैं कि स्मार्ट वॉच को आपने 5000 कदम चल लिए कैसे पता चलता है.&amp;nbsp;
स्मार्ट वॉच को आपने 5000 कदम चल लिए कैसे पता चलता है?
स्मार्ट वॉच को आपके 5,000 कदम चलने का पता 3-एक्सिस एक्सेलेरोमीटर और दूसरे मोशन सेंसर की मदद से चलता है, एक्सेलेरोमीटर आपकी कलाई की X, Y और Z दिशाओं में होने वाली मूवमेंट को रिकॉर्ड करता है. जब आप चलते हैं, तो मूवमेंट का एक खास पैटर्न बनता है, जिसे स्मार्ट वॉच का सॉफ्टवेयर पहचानकर हर वैध मूवमेंट को एक कदम के रूप में गिनता है. जाइरोस्कोप भी कलाई की दिशा और घूमने की गति को पहचानने में मदद करता है, जिससे सामान्य हाथ हिलाने और चलने के बीच फर्क किया जा सके. इससे सेंसर से मिले डेटा और स्मार्ट एल्गोरिदम की मदद से वॉच पूरे दिन के कदमों को जोड़कर 5,000 का आंकड़ा दिखाती है.&amp;nbsp;
एक्सेलेरोमीटर करता है सबसे जरूरी काम
स्मार्ट वॉच में स्टेप काउंट करने के लिए सबसे जरूरी सेंसर 3-एक्सिस एक्सेलेरोमीटर होता है. यह सेंसर डिवाइस की X, Y और Z तीनों दिशाओं में होने वाली गति और एक्सीलेरेशन में बदलाव को रिकॉर्ड करता है. जब व्यक्ति चलता या दौड़ता है, तो शरीर और कलाई की गति में एक खास तरह का मूवमेंट दिखाई देता है. एक्सेलेरोमीटर इसी पैटर्न को पहचानने में मदद करता है. पुराने पेडोमीटर में कदम पहचानने के लिए मैकेनिकल स्विच जैसे साधारण तरीके इस्तेमाल होते थे. आज स्मार्ट वॉच में इसके लिए MEMS सेंसर का इस्तेमाल किया जाता है, जो कम जगह और कम पावर में ज्यादा सटीक तरीके से गति को माप सकते हैं.&amp;nbsp;
डेटा को फिल्टर करके पहचाने जाते हैं कदम
सेंसर लगातार कच्चा डेटा रिकॉर्ड करता है, लेकिन हर मूवमेंट को कदम नहीं माना जा सकता है. इसलिए स्मार्ट वॉच इस डेटा को फिल्टर करती है. इसमें लो-पास, हाई-पास और मूविंग एवरेज जैसे फिल्टर का इस्तेमाल करके बिना जरूरत मूवमेंट और शोर को कम किया जाता है. इसके बाद X, Y और Z तीनों दिशाओं से मिलने वाले डेटा को मिलाकर कुल एक्सीलेरेशन का अंदाजा लगाया जाता है.&amp;nbsp;
थ्रेशोल्ड पार होने पर काउंट होता है स्टेप
चलने के दौरान एक्सीलेरेशन में एक तय पैटर्न बनता है. स्मार्ट वॉच इस पैटर्न में आने वाले पीक को पहचानती है, जब एक्सीलेरेशन तय किए गए स्टेप थ्रेशोल्ड से ऊपर जाता है और दो कदमों के बीच का समय भी तय सीमा में होता है, तो उसे एक कदम माना जाता है. इस प्रक्रिया में डायनेमिक थ्रेशोल्ड का इस्तेमाल किया जा सकता है, जो सेंसर से मिलने वाले डेटा के आधार पर बदलता रहता है. इससे अलग-अलग गति से चलने पर भी कदम पहचानने में मदद मिलती है.&amp;nbsp;
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GPS और दूसरे सेंसर भी देते हैं मदद
कुछ स्मार्ट वॉच में GPS का इस्तेमाल मूवमेंट और स्थान को ट्रैक करने के लिए किया जाता है. इससे चलने या दौड़ने की एक्टिविटी की ज्यादा जानकारी मिल सकती है. वहीं कुछ मॉडर्न डिवाइस मशीन लर्निंग और सेंसर फ्यूजन जैसी तकनीकों का इस्तेमाल करके अलग-अलग तरह के मूवमेंट को पहचानने की कोशिश करते हैं, हालांकि स्टेप काउंट हमेशा 100 फीसदी सटीक नहीं होता है. हाथ को कम हिलाकर चलने, फोन या वॉच की स्थिति बदलने या दूसरी मूमेंट वाली एक्टिविटी के कारण कुछ कदम कम या ज्यादा गिने जा सकते हैं. सामान्य परिस्थितियों में हाई-एंड डिवाइस करीब 95 फीसदी तक सटीकता दे सकते हैं.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Fri, 21 Aug 2026 17:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Smartwatch, Technology, स्मार्ट, वॉच, को, कैसे, पता, चलता, है, आपने, 5000, कदम, चल, लिए, जानें, टेक्नोलॉजी</media:keywords>
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        <title>Gemini Free Student Plan: कॉलेज स्टूडेंट्स के लिए Google का बड़ा ऑफर, 1 साल के लिए AI प्लान बिल्कुल फ्री</title>
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        <description><![CDATA[ Gemini Free Student Plan: नए एकेडमिक सेशन की शुरुआत के साथ ही गूगल ने अपने AI असिस्टेंट Gemini को लेकर स्टूडेंट्स के लिए एक बड़ा ऑफर लॉन्च किया है. कंपनी ने ऐलान किया है कि योग्य कॉलेज स्टूडेंट्स अब पूरे एक साल तक Gemini का पेड प्लान बिल्कुल मुफ्त में इस्तेमाल कर सकते हैं. यह ऑफर 19 अगस्त 2026 से शुरू हो चुका है और गूगल ने इसके साथ ही Gemini ऐप के अंदर स्टूडेंट्स के लिए एक अलग से स्टूडेंट हब भी पेश किया है. यह वही प्रीमियम प्लान है जिसके लिए आम यूजर्स को हर महीने सैकड़ों रुपये खर्च करते हैं. आइए जानते है कि इस प्लान में क्या खास है और छात्र इसे कैसे हासिल कर सकते हैं.&amp;nbsp;
फ्री प्लान में क्या-क्या मिलेगा?&amp;nbsp;
गूगल का यह खास स्टूडेंट प्लान सिर्फ एक साधारण चैटबॉट नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह से पढ़ाई-लिखाई को आसान बनाने के लिए डिजाइन किया गया है. छात्र इसके जरिए सिर्फ टेक्स्ट ही नहीं, बल्कि हाई-क्वालिटी वीडियो, इमेज और ग्राफिक्स भी बना सकेंगे. साथ ही, आम फ्री यूजर्स के मुकाबले इस प्लान में आपको 2 गुना ज्यादा सर्च और यूसेज लिमिट मिलेगी, जिससे भारी-भरकम प्रोजेक्ट्स के दौरान टूल बार-बार बंद नहीं होगा.&amp;nbsp;
इसके अलावा गूगल ड्राइव, जीमेल और फोटोज के लिए आपको 400 GB का बड़ा स्टोरेज स्पेस मिलेगा. इसमें नया AI स्टडी हब शामिल है, जिसमें छात्र इंटरैक्टिव 3D मॉडल्स के जरिए फिजिक्स या मैथ्स की जटिल थ्योरी को लाइव देख और समझ सकते हैं. साथ ही, इसके जीमेल और गूगल डॉक्स इन-बिल्ट फीचर्स से नोट्स बनाना बहुत आसान हो जाएगा.&amp;nbsp;
कैसे क्लेम करें?
गूगल की तरफ से जारी की गई आधिकारिक जानकारी के मुताबिक, इस ऑफर का लाभ उठाने के लिए छात्रों को 31 दिसंबर 2026 से पहले खुद को वेरिफाई करना होगा. इसके लिए छात्रों को Google Gemini for Students Official Page या गूगल के दिए गए शार्ट-लिंक goo.gle/studentdeal पर जाना होगा. यहां आपको अपनी कॉलेज आईडी या ऑफिशियल कॉलेज ईमेल आईडी के जरिए अपनी पहचान वेरिफाई करनी होगी. वेरिफिकेशन सफल होते ही आपके अकाउंट पर 12 महीनों के लिए गूगल एआई प्लस प्लान एक्टिवेट हो जाएगा.&amp;nbsp;
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एक साल के लिए ही फ्री है प्लान
गूगल ने साफ किया है कि एक साल का फ्री पीरियड खत्म होने के बाद यह प्लान अपने आप पेड सब्सक्रिप्शन में बदल जाएगा, जब तक कि स्टूडेंट खुद इसे कैंसिल न करें. ऐसे में जो स्टूडेंट्स आगे पैसे देकर यह सर्विस जारी नहीं रखना चाहते, उन्हें एक साल पूरा होने से पहले सब्सक्रिप्शन कैंसिल करना जरूरी होगा, वरना अकाउंट से अपने आप पैसे कटने शुरू हो जाएंगे. गूगल ने यह कदम ऐसे समय पर उठाया है जब कुछ ही महीने पहले Gemini के मंथली एक्टिव यूजर्स की संख्या 1 अरब के पार पहुंची थी. कंपनी की कोशिश है कि बैक-टू-स्कूल सीजन में ज्यादा से ज्यादा स्टूडेंट्स को अपने प्लेटफॉर्म से जोड़ा जाए.
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        <pubDate>Fri, 21 Aug 2026 17:30:11 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Gemini, Free, Student, Plan:, कॉलेज, स्टूडेंट्स, के, लिए, Google, का, बड़ा, ऑफर, साल, के, लिए, प्लान, बिल्कुल, फ्री</media:keywords>
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        <title>Google Maps in China: चीन में क्यों नहीं चलता गूगल मैप, क्या है इसके पीछे की वजह?</title>
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        <description><![CDATA[ Google Maps in China: भारत में Google Maps का इस्तेमाल सड़क, रेस्टोरेंट, होटल या किसी दूसरी जगह का रास्ता पता करने के लिए आसानी से किया जा सकता है, लेकिन अगर आप चीन की यात्रा करने जा रहे हैं, तो वहां पहुंचने के बाद Google Maps का एक्सपीरियंस बिल्कुल अलग हो सकता है.
ऐप खुलने के बाद भी मैप का डेटा सही तरीके से लोड नहीं होता, लाइव ट्रैफिक और रूट जैसी सुविधाएं काम नहीं करतीं और कई बार आपकी लोकेशन भी सही जगह पर दिखाई नहीं देती है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर चीन में Google Maps सामान्य तरीके से क्यों नहीं चलता. तो आइए जानते हैं कि चीन में गूगल मैप क्यों नहीं चलता है और इसके पीछे की वजह क्या है.&amp;nbsp;
चीन में Google Maps क्यों नहीं चलता?
चीन में Google Maps सामान्य रूप से काम नहीं करता है. इसकी बड़ी वजह चीन का इंटरनेट सेंसरशिप सिस्टम यानी Great Firewall है. इसके तहत Google की कई सेवाओं तक पहुंच प्रतिबंधित है. Google Maps के अलावा Google Search, Gmail, Google Drive, YouTube और Google Photos जैसी कई सेवाएं भी चीन में सामान्य तरीके से उपलब्ध नहीं हैं. Google ने चीन के बाजार से अपनी ज्यादातर ऑनलाइन सेवाएं हटा ली थीं. इसके पीछे कंपनी और चीनी सरकार के बीच इंटरनेट सेंसरशिप, डेटा और सेवाओं के संचालन को लेकर लंबे समय से चले मतभेद बताए जाते हैं.&amp;nbsp;
इसके पीछे की वजह क्या है?&amp;nbsp;अगर आपके फोन में पहले से Google Maps इंस्टॉल है, तब भी चीन पहुंचने के बाद इसका एक्सपीरियंस भारत जैसा नहीं होगा. Google के सर्वर तक सामान्य पहुंच नहीं होने के कारण लाइव ट्रैफिक, नए बिजनेस अपडेट, पब्लिक ट्रांसपोर्ट और रूट जैसी सुविधाएं सही तरीके से काम नहीं कर सकती है. इसके अलावा चीन में GCJ-02 नाम के एक अलग कोऑर्डिनेट सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता है, जबकि Google Maps ग्लोबल WGS-84 सिस्टम पर आधारित है. इसी वजह से Google Maps में आपकी लोकेशन सही जगह से कुछ मीटर दूर दिखाई दे सकती है. कई बार ब्लू डॉट सड़क की जगह उसके आसपास या किसी दूसरी जगह पर नजर आ सकता है. VPN इस्तेमाल करने के बाद भी यह समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होती, क्योंकि यह मैप डेटा और कोऑर्डिनेट सिस्टम से जुड़ी है.&amp;nbsp;
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Offline Google Maps कितना काम आएगा?
यात्रा से पहले Google Maps में किसी शहर का ऑफलाइन मैप डाउनलोड किया जा सकता है. इससे इंटरनेट न होने पर पहले से सेव किया गया मैप देखा जा सकता है और सामान्य दिशा का अंदाजा लगाया जा सकता है. हालांकि, इसमें लाइव ट्रैफिक, पब्लिक ट्रांसपोर्ट रूट, बिजनेस अपडेट और कई दूसरी ऑनलाइन सुविधाएं उपलब्ध नहीं होंगी.&amp;nbsp;
चीन में कौन से मैप इस्तेमाल करें?
चीन में नेविगेशन के लिए Google Maps की जगह Amap (Gaode), Baidu Maps और Apple Maps जैसे लोकल मैप ऐप ज्यादा यूजफुल माने जाते हैं. Amap चीन के स्थानीय कोऑर्डिनेट डेटा के हिसाब से काम करता है और पैदल चलने, ड्राइविंग, पब्लिक ट्रांसपोर्ट और राइड-हेलिंग जैसी सुविधाएं देता है. इसमें अंग्रेजी इंटरफेस का ऑप्शन भी मौजूद है. वहीं iPhone यूजर्स के लिए Apple Maps भी एक आसान ऑप्शन है. चीन में यह स्थानीय डेटा प्रोवाइडर्स के साथ काम करता है, इसलिए इसकी लोकेशन सटीकता Google Maps की तुलना में बेहतर रहती है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Fri, 21 Aug 2026 01:30:18 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Google, Maps, China:, चीन, में, क्यों, नहीं, चलता, गूगल, मैप, क्या, है, इसके, पीछे, की, वजह</media:keywords>
    </item>
    <item>
        <title>DoT SIM Card limit: अब अपने नाम पर नहीं रख पाएंगे 9 से ज्यादा सिम, तय हो गई लिमिट</title>
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        <description><![CDATA[ DoT SIM Card limit : अगर आपके नाम पर एक से ज्यादा मोबाइल नंबर चल रहे हैं तो यह जानकारी आपके लिए जरूरी है. दूरसंचार विभाग (DoT) ने मोबाइल कनेक्शन की तय सीमा को लेकर नए निर्देश जारी किए हैं. अब टेलीकॉम कंपनियों को ऐसे ग्राहकों की पहचान करनी होगी, जिनके नाम पर तय सीमा से ज्यादा मोबाइल कनेक्शन हैं.
इसके लिए विभाग के Digital Intelligence Platform (DIP) पर उपलब्ध ग्राहक की फोटो का इस्तेमाल किया जाएगा. नए निर्देशों के तहत ज्यादा कनेक्शन रखने वाले ग्राहकों के नंबरों को तय सीमा के अंदर लाने की कार्रवाई की जाएगी. तो आइए हम आपको बताते हैं कि DoT का इस एक्शन में लिमिट से ज्यादा सिम की जांच कैसे होगी.&amp;nbsp;
कितने मोबाइल नंबर रखने की है लिमिट?
DoT के 7 दिसंबर 2021 के निर्देशों के मुताबिक, एक व्यक्ति अपने नाम पर देशभर में अलग-अलग टेलीकॉम कंपनियों और अलग-अलग सर्विस एरिया में अधिकतम 9 मोबाइल कनेक्शन रख सकता है. हालांकि जम्मू-कश्मीर, असम और नॉर्थ-ईस्ट लाइसेंस्ड सर्विस एरिया में यह सीमा 6 मोबाइल कनेक्शन है. अगर किसी ग्राहक के नाम पर तय सीमा से ज्यादा नंबर हैं, तो उसे अतिरिक्त नंबर बंद कराने होंगे. ऐसा नहीं करने पर बाद में लिए गए मोबाइल कनेक्शन को बंद किया जा सकता है, जिससे ग्राहक के नाम पर कुल नंबर तय सीमा के अंदर आ जाएं.&amp;nbsp;
DIP से होगी मोबाइल नंबरों की पहचान
DoT ने टेलीकॉम कंपनियों के सामने आने वाली उस परेशानी को दूर करने के लिए नई व्यवस्था तय की है, जिसमें यह पता लगाना मुश्किल होता था कि किसी व्यक्ति के नाम पर अलग-अलग कंपनियों और सर्विस एरिया में कितने मोबाइल नंबर चल रहे हैं. इसके लिए Digital Intelligence Platform (DIP) का इस्तेमाल किया जाएगा. टेलीकॉम कंपनियों की ओर से अपलोड किए गए ग्राहक डेटा के आधार पर DIP ऐसे मोबाइल कनेक्शनों की पहचान करेगा, जो अलग-अलग कंपनियों और सर्विस एरिया में एक ही व्यक्ति के नाम पर चल रहे हैं. इन कनेक्शनों को संबंधित ग्राहक के नाम से ग्रुप किया जाएगा और इसकी जानकारी टेलीकॉम कंपनियों को DIP के जरिए उपलब्ध होगी.&amp;nbsp;
लिमिट से ज्यादा सिम की जांच कैसे होगी?
DoT के 17 अगस्त 2026 के नए सर्कुलर के मुताबिक, 23 अगस्त 2026 से ऐसे ग्राहकों की फोटो का प्रतिनिधि इमेज DIP पर उपलब्ध कराया जाएगा, जो अपने नाम पर मोबाइल कनेक्शन की तय सीमा तक पहुंच चुके हैं. टेलीकॉम कंपनियों को इन तस्वीरों को रोजाना डाउनलोड करना होगा. इसका मकसद यह पहचानना है कि तय सीमा पूरी कर चुका व्यक्ति दोबारा नया मोबाइल कनेक्शन लेने की कोशिश तो नहीं कर रहा.&amp;nbsp;
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24 अगस्त से कंपनियों को करना होगा एक्शन
24 अगस्त 2026 से टेलीकॉम कंपनियों को तकनीकी और संगठनात्मक उपायों के जरिए ऐसे ग्राहकों की पहचान करनी होगी, जो तय सीमा से ज्यादा मोबाइल कनेक्शन लेने की कोशिश कर रहे हैं. पहचान होने पर ग्राहक को बताया जाएगा कि उसके नाम पर पहले से अधिकतम अनुमत मोबाइल कनेक्शन मौजूद हैं और इसलिए नया कनेक्शन नहीं दिया जा सकता है. शुरुआत में यह प्रक्रिया अगले दिन यानी D+1 आधार पर की जा सकती है. हालांकि, DoT ने इसे मोबाइल कनेक्शन लेने और एक्टिवेट करने की प्रक्रिया में रियल टाइम तरीके से लागू करने के लिए 30 नवंबर 2026 की समयसीमा तय की है.&amp;nbsp;
तय सीमा से ज्यादा नंबर पर क्या होगा?
जब तक टेलीकॉम कंपनी यह व्यवस्था पूरी तरह लागू नहीं करती, तब तक तय सीमा से ज्यादा एक्टिवेट होने वाला कोई भी मोबाइल कनेक्शन तुरंत सस्पेंड किया जा सकता है. इसके बाद तय सीमा से ज्यादा कनेक्शन रखने से जुड़ी समस्या का समाधान करना होगा. DoT के निर्देशों का उद्देश्य यह तय करना है कि हर व्यक्ति अपने नाम पर तय सीमा के अंदर ही मोबाइल कनेक्शन ले और उनका इस्तेमाल करें.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Fri, 21 Aug 2026 01:30:16 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Uber Eats Drone Delivery:पिज्जा हो या बर्गर, अब आसमान से होगी डिलीवरी! Uber Eats का नया प्लान</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/uber-eats-drone-deliveryपिज्जा-हो-या-बर्गर-अब-आसमान-से-होगी-डिलीवरी-uber-eats-का-नया-प्लान</link>
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        <description><![CDATA[ Uber Eats Drone Delivery: फूड डिलीवरी की दुनिया में एक बड़ा बदलाव आने वाला है. उबर ने ड्रोन डिलीवरी कंपनी जिपलाइन के साथ एक बड़ी पार्टनरशिप का ऐलान किया है, जिसके तहत उबर ईट्स पर ऑर्डर की गई पिज्जा, बर्गर और दूसरी चीजें अब सड़क की बजाय आसमान के रास्ते सीधे कस्टमर तक पहुंचेंगी. यह डील अमेरिका में फूड डिलीवरी सेक्टर की सबसे बड़ी ड्रोन पार्टनरशिप मानी जा रही है. आइए जानते हैं यह पूरा प्लान क्या है, और इससे डिलीवरी का अनुभव कैसे बदलने वाला है.
कहां से होगी शुरुआत?
उबर और जिपलाइन की यह पार्टनरशिप सबसे पहले अमेरिका के डलास और ह्यूस्टन शहरों में शुरू होगी, जहां जिपलाइन पहले से ही शुरू है. इस साल के आखिर तक इन दोनों शहरों में ड्रोन डिलीवरी की सुविधा शुरू हो जाएगी, इसके बाद कंपनियों की योजना अमेरिका के दर्जनों और शहरों में इस सर्विस को फैलाने की है.
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कितनी तेज होगी डिलीवरी
उबर के मुताबिक फिलहाल ग्राहकों को ऑर्डर मिलने में औसतन करीब 30 मिनट का समय लगता है, लेकिन जिपलाइन के ड्रोन इस समय को घटाकर सिर्फ 5 से 10 मिनट तक ला सकते हैं. यानी ऑर्डर करने के कुछ ही मिनटों में खाना सीधे घर की छत या बालकनी तक पहुंच सकता है.
2029 तक का बड़ी उम्मीद&amp;nbsp;
दोनों कंपनियों ने मिलकर साल 2029 के अंत तक रोजाना 10 लाख ड्रोन डिलीवरी करने का लक्ष्य रखा है. अगर यह लक्ष्य हासिल होता है, तो सालाना करीब 36.5 करोड़ से ज्यादा डिलीवरी सिर्फ ड्रोन के जरिए ही पूरी हो जाएंगी, जिससे ड्रोन डिलीवरी कोई खास तकनीक न रहकर रोजमर्रा का हिस्सा बन जाएगी.
जिपलाइन का पहले से है बड़ा नेटवर्क
जिपलाइन कोई नई कंपनी नहीं है, यह दुनिया के चार महाद्वीपों में काम करती है और अब तक करीब 27 लाख डिलीवरी कर चुकी है, जिसमें दो करोड़ से ज्यादा आइटम शामिल हैं. कंपनी हर 20 सेकंड में एक डिलीवरी पूरी करती है, और इसका नेटवर्क 5,000 से ज्यादा अस्पतालों को भी सेवा देता है, जिससे इसकी तकनीक और भरोसेमंदी दोनों पहले से साबित हैं. इस पार्टनरशिप के तहत उबर ने जिपलाइन में एक रणनीतिक भी किया है, हालांकि इसकी सटीक रकम अभी सार्वजनिक नहीं की गई है. उबर के सीईओ दारा खोसरोवशाही के मुताबिक क्विक कॉमर्स अब मूल फूड डिलीवरी मार्केट से भी बड़ा बाज़ार साबित हो रहा है और यह पार्टनरशिप उबर ईट्स के अगले ग्रोथ फेज के लिए एक बड़ा बूस्ट बन सकती है.
बाकी कंपनियां भी दौड़ में शामिल
ड्रोन डिलीवरी की यह रेस सिर्फ उबर तक सीमित नहीं है. दुरदैश भी अपना खुद का ड्रोन प्रोग्राम तैयार कर रहा है, और हाल ही में उसे इसके लिए फेडरल एविएशन एडमिनिस्ट्रेशन से जरूरी सर्टिफिकेशन भी मिल चुका है. इसके अलावा अमेजॉन और वॉलमार्ट भी कुछ चुनिंदा मार्केट्स में पहले से ड्रोन डिलीवरी सर्विस दे रहे हैं.
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        <pubDate>Fri, 21 Aug 2026 01:30:14 +0530</pubDate>
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        <title>OpenAI ने धीमी की AI मॉडल्स की ट्रेनिंग, हैकिंग के बाद बढ़ाई सुरक्षा</title>
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        <description><![CDATA[ OpenAI AI Training : AI की दुनिया में जहां हर दिन नए और ज्यादा ताकतवर मॉडल सामने आ रहे हैं, वहीं अब उनकी सुरक्षा को लेकर भी बड़ी चिंता सामने आई है. OpenAI ने अपने कुछ सबसे एडवांस AI मॉडल्स की ट्रेनिंग की स्पीड धीमी करने का फैसला किया है. कंपनी का कहना है कि यह कदम सुरक्षा को मजबूत करने के लिए उठाया गया है.
दरअसल, OpenAI के AI एजेंट्स ने एक सुरक्षा परीक्षण के दौरान सुरक्षा उपायों को पारकर टेक स्टार्टअप Hugging Face तक अनऑथराइज्ड पहुंच बना ली थी. इसके बाद कंपनी ने अपने सुरक्षा सिस्टम को और मजबूत करने का फैसला किया है.&amp;nbsp;
दो हफ्ते तक धीमी रहेगी ट्रेनिंग
OpenAI ने एक ब्लॉग पोस्ट में बताया कि वह करीब दो हफ्ते तक ट्रेनिंग धीमी रखेगी. इस दौरान कंपनी अपने AI सिस्टम में जरूरी सुरक्षा सुधार लागू करेगी. OpenAI ने कहा कि फ्रंटियर मॉडल्स की क्षमताएं बहुत तेजी से बढ़ रही हैं और उन्हें समझने साथ ही सुरक्षित रखने की क्षमता भी उससे आगे रहनी जरूरी है. हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि OpenAI ने AI का विकास पूरी तरह रोक दिया है. कंपनी ने साफ किया है कि ब्रेक मुख्य रूप से उसके नए मॉडल्स की Reinforcement Learning Training पर होगा.&amp;nbsp;
क्या है Reinforcement Learning?
Reinforcement learning AI को सीधे फीडबैक के जरिए बेहतर बनाने की एक ट्रेनिंग तकनीक है. इसमें मॉडल अपने काम और मिले फीडबैक से सीखता है. इससे उसकी अलग-अलग काम करने और यूजर्स को बेहतर तरीके से जवाब देने की क्षमता में सुधार होता है. OpenAI ने कहा कि वह खतरनाक व्यवहार पर नजर रखने वाले सिस्टम को भी बढ़ाएगा. इसके अलावा, बड़े स्तर पर ट्रेनिंग दोबारा शुरू करने से पहले अतिरिक्त सुरक्षा जांच भी की जाएगी.&amp;nbsp;
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AI ने कैसे किया था Hugging Face को हैक?
21 जुलाई को OpenAI ने बताया था कि उसके कुछ AI एजेंट्स एक सुरक्षा प्रयोग के दौरान एक ऐसी घटना में शामिल हुए, जिसे कंपनी ने पहले कभी न हुआ साइबर अटैक बताया था. कंपनी के मुताबिक, AI एजेंट्स ने टेस्ट के दौरान सुरक्षा उपायों को पार किया और टेक स्टार्टअप Hugging Face तक बिना अनुमति पहुंच हासिल कर ली. बाद में तीन अन्य कंपनियों के भी इस घटना में हैक होने की बात सामने आई, हालांकि उनके नाम नहीं बताए गए. AI एजेंट ऐसे सॉफ्टवेयर सिस्टम होते हैं जो इंसान के निर्देश मिलने के बाद कई काम खुद करने में सक्षम होते हैं.&amp;nbsp;
दूसरी कंपनियों के AI ने भी किए ऐसे हैक
OpenAI के इस खुलासे के बाद Anthropic और Meta ने भी अपने AI से जुड़े इसी तरह के हैक की जानकारी दी. इससे AI मॉडल्स की बढ़ती क्षमताओं के साथ उनकी सुरक्षा को लेकर चर्चा और तेज हो गई. OpenAI के CEO ने भी इन नए सुरक्षा उपायों को लेकर कहा कि मॉडल्स की क्षमता बहुत तेजी से बढ़ रही है. उन्होंने यह भी कहा कि अगर मॉडल्स की क्षमता सुरक्षा की रफ्तार से आगे निकलती महसूस होगी, तो कंपनी कार्रवाई करेगी.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Fri, 21 Aug 2026 01:30:13 +0530</pubDate>
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        <title>AI Electronic Nose: 10 साल के बच्चे ने बनाई AI इलेक्ट्रॉनिक नाक, जीता बेस्ट इन्वेंशन अवॉर्ड</title>
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        <description><![CDATA[ AI Electronic Nose: ताइवान के 10 साल के Hsu Ting-wei ने साल 2026 में कैलिफोर्निया में आयोजित Silicon Valley International Festival (SVIIF) में अपने अनोखे AI आविष्कार से सबका ध्यान खींचा है. इतनी कम उम्र में तैयार किए गए उनके इस आविष्कार को प्रतियोगिता में काफी तारीफ मिली और उन्होंने अपने आविष्कार का शानदार प्रदर्शन किया. Hsu के आविष्कार को गोल्ड मेडल से सम्मानित किया गया. इसके अलावा, उन्हें International Federation of Inventors&#039; Associations की ओर से Best Invention Award भी मिला. तो आइए जानते हैं कि 10 साल के Hsu Ting-wei का AI आविष्कार क्या है.&amp;nbsp;
क्या है 10 साल के बच्चे का AI आविष्कार?
Hsu Ting-wei ने Novel Artificial Electronic Nose नाम का एक स्मार्ट सुरक्षा जांच प्लेटफॉर्म तैयार किया है. यह सिस्टम बिना किसी चीज को छुए हवा के नमूने लेकर उसमें मौजूद गंध और रासायनिक संकेतों की पहचान करने के लिए बनाया गया है. इस तकनीक में रियल-टाइम एयर सैंपलिंग सिस्टम, गैस क्रोमैटोग्राफी-मास स्पेक्ट्रोमेट्री और AI आधारित गंध पहचान तकनीक का इस्तेमाल किया गया है. इसे एयरपोर्ट जैसी जगहों पर X-ray बैगेज स्कैनिंग मशीन के पीछे लगाया जा सकता है. इसका उद्देश्य सामान्य सामान जांच के साथ रासायनिक पहचान की एक और परत जोड़ना है.&amp;nbsp;
Hsu के आविष्कार को मिला गोल्ड मेडल
Hsu के आविष्कार को गोल्ड मेडल से सम्मानित किया गया. Hsu को मिला अवॉर्ड सिर्फ उनकी कम उम्र को देखते हुए नहीं दिया गया. जूरी के चेयरमैन Amin Ghafooripour ने कहा कि यह सम्मान उनकी उम्र के कारण प्रोत्साहन के तौर पर नहीं था. जूरी ने उनके आविष्कार का असली यूज देखा और उनके काम से प्रभावित हुई. समारोह से पहले Hsu ने बताया कि वह अपने आविष्कार की मदद से ऐसे पोर्क उत्पादों को देशों में पहुंचने से रोकने में मदद करना चाहते हैं, जिनसे African Swine Fever फैलने का खतरा हो सकता है. इसके अलावा वह अमेरिकी अधिकारियों को सीमा पर Fentanyl जैसी ड्रग्स पकड़ने में मदद करना चाहते हैं.&amp;nbsp;
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ताइवान के युवा आविष्कारकों का भी जलवा
Hsu की सफलता इस समारोह में ताइवान के शानदार प्रदर्शन का हिस्सा रही. इस साल SVIIF में 30 से ज्यादा देशों से आविष्कार शामिल हुए थे. प्रतियोगिता को दो वर्गों में रखा गया था. सामान्य आविष्कारक और 7 से 18 साल की उम्र के युवा आविष्कारक थे. Youth Talent Competition में ताइवान के छात्रों के AllerDetect GO नाम के आविष्कार ने पहला पुरस्कार जीता. यह बच्चों, बुजुर्गों और एलर्जी से प्रभावित लोगों के लिए बनाया गया हेल्थ प्रोटेक्शन सिस्टम है. इसमें एलर्जी के खतरे की पहचान, अलर्ट, रिकॉर्ड रखने और स्मार्ट होम रिस्पॉन्स जैसी सुविधाएं शामिल हैं.&amp;nbsp;
ताइवान ने जीते रिकॉर्ड 24 गोल्ड मेडल
इस साल ताइवान के आविष्कारकों ने कुल 35 एंट्री के साथ हिस्सा लिया. उन्होंने रिकॉर्ड 24 गोल्ड मेडल, 8 सिल्वर और 1 ब्रॉन्ज मेडल जीता. 2018 में SVIIF में भाग लेना शुरू करने के बाद यह ताइवान का सबसे ज्यादा गोल्ड मेडल जीतने वाला प्रदर्शन रहा.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Fri, 21 Aug 2026 01:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>Laptop Shortcuts Keys: लैपटॉप के ये पांच शॉर्टकट आपके काम को बना देंगे आसान, यहां देख लें लिस्ट</title>
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        <description><![CDATA[ Laptop Shortcuts Keys: लैपटॉप के ये पांच शॉर्टकट आपके काम को बना देंगे आसान, यहां देख लें लिस्ट ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 20 Aug 2026 12:30:13 +0530</pubDate>
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        <title>क्या फोन के फिंगरप्रिंट लॉक से खुल जाएगा लैपटॉप? जानें पूरा सच</title>
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        <description><![CDATA[ Tech Tips: टेक्नोलॉजी की दुनिया में कई सारे स्मार्ट डिवाइस मार्केट में आ चुके हैं. स्मार्टफोन आज के समय में सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाने वाला डिवाइस बन चुका है. अब बढ़ती टेक्नोलॉजी के साथ आजकल स्मार्टफोन कई सारे बेहतरीन फीचर्स भी देखने को मिलते हैं. बता दें कि डिजिटल दुनिया में डेटा की ज्यादा अहमियत होती है. इसीलिए डिवाइस में अब ज्यादा एडवांस सेफ्टी फीचर्स आने लगे हैं. इसी कड़ी में बता दें कि अक्सर ये सवाल आता है कि क्या फोन में मिलने वाले फिंगरप्रिंट सेंसर से लैपटॉप को अनलॉक किया जा सकता है या नहीं. आइए जानते हैं इसकी पूरी सच्चाई.
क्या फोन का फिंगरप्रिंट लैपटॉप खोल सकता है?
दरअसल, ऐसा नॉर्मली नहीं हो सकता है. आपके फोन में सेव फिंगरप्रिंट डेटा सीधे लैपटॉप के साथ शेयर नहीं हो सकता है. स्मार्टफोन में फिंगरप्रिंट की जानकारी बेहद सुरक्षित तरीके से डिवाइस के सिक्योर हार्डवेयर या सिक्योर एरिया में रखी जाती है. इसका इस्तेमाल फोन ये चेक करने के लिए करता है कि डिवाइस इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति ऑथराइज्ड है या नहीं. इसका मतलब ये है कि फोन में रजिस्टर्ड आपकी उंगली का फिंगरप्रिंट लैपटॉप में ट्रांसफर होकर उसे अनलॉक नहीं करता है.
क्यों शेयर नहीं होता फिंगरप्रिंट डेटा
आपको बता दें कि फिंगरप्रिंट बायोमेट्रिक जानकारी होती है इसलिए इसे नॉर्मल फोटो या किसी फाइल की तरह दूसरे डिवाइस पर भेजना किसी भी एंगल से सुरक्षित नहीं माना जाता है. एडवांस स्मार्टफोन नॉर्मली फिंगरप्रिंट की असली इमेज किसी ऐप या दूसरे डिवाइस को नहीं दे सकते हैं.
फोन का सिक्योरिटी सिस्टम सिर्फ ये पुष्टि करता है कि स्कैन किया गया फिंगरप्रिंट पहले से रजिस्टर्ड फिंगरप्रिंट से मेल खाता है या नहीं. इसके बाद डिवाइस या ऐप को परमिशन दी जाती है.
फिर फोन से लैपटॉप कैसे अनलॉक हो सकता है?
बताते चलें कि कुछ मामलों में स्मार्टफोन लैपटॉप को अनलॉक करने में मदद करता है लेकिन फोन के फिंगरप्रिंट से फोन को अनलॉक करना संभव नहीं है. दरअसल, कुछ ऐप्स और सॉफ्टवेयर स्मार्टफोन और कंप्यूटर के बीच सेफ कनेक्शन बनाकर फोन को एक तरह की ऑथेंटिकेशन डिवाइस की तरह इस्तेमाल करते हैं. जैसे फोन पर फिंगरप्रिंट से अपनी पहचान वेरिफाई करने के बाद ऐप लैपटॉप को अनलॉक करने की परमिशन देता है. ये सुविधा संबंधित ऑपरेटिंग सिस्टम, फोन, ऐप और सिक्योरिटी प्रोटोकॉल पर निर्भर करती है.
Windows और Mac में क्या हैं ऑप्शन?
टेक्नोलॉजी के जमाने में कई एडवांस लैपटॉप में अपना अलग बायोमेट्रिक सिक्योरिटी सिस्टम होता है. Windows वाले कंप्यूटर में कुछ डिवाइस Windows Hello के जरिए फिंगरप्रिंट या फेस ऑथेंटिकेशन सपोर्ट करते हैं. वहीं, कुछ MacBook मॉडल में Touch ID दिया जाता है. इनका फायदा ये है कि फिंगरप्रिंट सेंसर डॉयरेक्ट लैपटॉप के सिक्योरिटी सिस्टम से जुड़ा होता है, इसलिए डिवाइस को अनलॉक करने के लिए फोन की जरूरत नहीं होती है.
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        <pubDate>Thu, 20 Aug 2026 12:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>ATM कार्ड में आपकी डिटेल्स कैसे सेव होती हैं, जानें मशीन कैसे करती है प्रोसेस?</title>
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        <description><![CDATA[ ATM Card: ऑनलाइन पेमेंट और टेक्नोलॉजी की दुनिया में एटीएम कार्ड भी लोगों एक अहम जरूरत होती है जिसकी मदद से लोग किसी भी एटीएम मशीन से अपने बैंक अकाउंट से पैसा निकाल या जमा कर सकते हैं. लेकिन अक्सर ये सवाल आता है कि एटीएम कार्ड में यूजर की डिटेल्स कैसे सेव की जाती हैं और मशीन में जाते ही मशीन उसे कैसे प्रोसेस करती है. आइए समझते हैं इसकी पूरी टेक्नोलॉजी.
ATM कार्ड में कौन-कौन सी जानकारी होती है?
जानकारी के मुताबिक, ATM या डेबिट कार्ड पर दिखाई देने वाली जानकारी केवल कार्ड नंबर, नाम और एक्सपायरी डेट तक ही नहीं रहती है. इसके अंदर एक चिप या मैग्नेटिक स्ट्रिप होती है जिसमें कई तरह का डेटा स्टोर रहता है.
इस डेटा में कार्ड नंबर, बैंक की पहचान, कार्ड की वैलिडिटी, सुरक्षा संबंधी कोड और ट्रांजैक्शन से जुड़ी जरूरी जानकारी शामिल होती है. हालांकि, कार्ड में आपके बैंक खाते की पूरा डिटेल्स या बैंलेस से संबंधित जानकारी सेव नहीं होती है.
चिप और मैग्नेटिक स्ट्रिप कैसे काम करती हैं?
आपको बता दें कि पुराने ATM कार्ड में मैग्नेटिक स्ट्रिप का इस्तेमाल किया जाता था. ये एक काले रंग की पट्टी होती है जिसमें मैग्नेटिक तरीके से डेटा को रिकॉर्ड किया जाता है. जब कार्ड मशीन में स्वाइप किया जाता है तो मशीन इस स्ट्रिप को रीड करती है और इसकी डिटेल्स लेती है.
लेकिन अब टेक्नोलॉजी काफी एडवांस हो चुकी है. आज कल के एटीएम या डेबिट कार्ड में EMV चिप का इस्तेमाल होने लगा है. ये चिप एक छोटे कंप्यूटर की तरह काम करती है और हर ट्रांजैक्शन के लिए एक यूनिक सेफ्टी कोड तैयार करती है. इसी वजह से चिप वाले कार्ड पुराने कार्ड के मुकाबले में ज्यादा सुरक्षित माने जाते हैं.
ATM मशीन कार्ड को कैसे पहचानती है?
दरअसल, जब आप ATM मशीन में कार्ड डालते हैं तो मशीन सबसे पहले कार्ड की चिप या मैग्नेटिक स्ट्रिप को स्कैन करती है. इसके बाद कार्ड से मिली जानकारी को बैंक के सर्वर तक भेजा जाता है.
सर्वर ये चेक करता है कि कार्ड वैलिड है या नहीं, उसका स्टेटस एक्टिव है या नहीं और उससे जुड़ा खाता मौजूद है या नहीं. इसके बाद मशीन आपसे PIN दर्ज करने के लिए कहती है.
PIN डालने के बाद क्या होता है?
बताते चलें कि PIN दर्ज करने के बाद ATM मशीन उस जानकारी को एन्क्रिप्ट करके बैंक के सर्वर तक भेजती है. बैंक का सिस्टम PIN को अपने रिकॉर्ड से मैच करता है.
अगर PIN सही पाया जाता है तो सर्वर मशीन को आगे के प्रोसेस जारी रखने की परमिशन देता है. इसके बाद आप बैलेंस चेक, कैश निकालने जैसे जरूरी काम कर पाते हैं.
सुरक्षा के लिए अपनाई जाती हैं कई तकनीकें
आज के ATM कार्ड में एन्क्रिप्शन, EMV चिप, PIN वेरिफिकेशन और रियल-टाइम सर्वर वेरिफिकेशन जैसी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जाता है. ये सेफ्टी तरीके कार्ड क्लोनिंग और धोखाधड़ी के जोखिम को कम करने में मदद करते हैं.
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        <pubDate>Thu, 20 Aug 2026 12:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>Xप्लेन: ChatGPT का Teen Version क्यों जरूरी? सुरक्षा के लिए नए नियम जानिए</title>
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        <description><![CDATA[ शाम के 7 बज रहे हैं, टेबल पर स्कूल की किताबें और उनके पास होमवर्क की नोटबुक रखी है लेकिन 14 साल का लड़का अपनी किताबें नहीं खोलता. इसके बजाय, वह अपना फ़ोन निकालता है, सवाल की फ़ोटो खींचता है और उसे ChatGPT पर अपलोड कर देता है. कुछ ही सेकंड में, स्क्रीन पर पूरा जवाब आ जाता है. वह उसे अपनी नोटबुक में लिख लेता है, और उसका होमवर्क सिर्फ़ 10 मिनट में पूरा हो जाता है.
उसकी मां को शक होता है. वह पूछती है, &quot;इतनी जल्दी हो गया?&quot; लड़का मुस्कुराता है और सिर हिलाता है लेकिन एक बात है जो उसे पता नहीं है. उस दिन, उसके बेटे ने अपना होमवर्क तो पूरा कर लिया, लेकिन असल में उसने खुद से कुछ नया नहीं सीखा. यह सिर्फ़ एक दिन की समस्या नहीं है. क्या होगा अगर AI उसे मैथ के हर सवाल का जवाब दे दे? क्या होगा अगर वह उसके लिए हर एस्से लिख दे? क्या होगा अगर उसके सोचने से पहले ही AI उसके हर शक को दूर कर दे? कुछ समय बाद, हो सकता है कि बच्चा यह पूछना बंद कर दे कि &quot;इसका जवाब क्या है?&quot; और यह पूछने लगे कि &quot;मुझे ChatGPT से कैसे पूछना चाहिए?&quot;
यह माता-पिता के लिए एक बड़ी चिंता का विषय बनता जा रहा है. क्या AI बच्चों के लिए सीखना आसान बना रहा है? या यह धीरे-धीरे उनकी सोचने की ज़रूरत को खत्म कर रहा है? क्या बच्चे AI से मिलने वाले तैयार जवाबों पर बहुत ज़्यादा निर्भर हो सकते हैं?
OpenAI का कहना है कि अब उनके पास इस समस्या का समाधान है. कंपनी &#039;ChatGPT for Teens&#039; लॉन्च कर रही है, जिसे खास तौर पर 13 से 17 साल के यूज़र्स के लिए बनाया गया है. यह बच्चों के लिए ChatGPT का कोई साधारण वर्जन नहीं है. इसमें नए नियम शामिल हैं कि AI को टीनएजर्स के साथ कैसे बातचीत करनी चाहिए, होमवर्क में कैसे मदद करनी चाहिए और संवेदनशील स्थितियों में कैसे प्रतिक्रिया देनी चाहिए.

अब होमवर्क के सीधे जवाब नहीं मिलेंगे
Teen ChatGPT में यह सबसे बड़े बदलावों में से एक है. मान लीजिए कि कोई स्टूडेंट ChatGPT से मैथ का कोई सवाल हल करने के लिए कहता है. तुरंत पूरा जवाब देने के बजाय, AI स्टूडेंट को सवाल हल करने में स्टेप-बाय-स्टेप गाइड करेगा.
आसान शब्दों में कहें तो, यह &quot;यह रहा आपका जवाब&quot; से बदलकर &quot;पहले इसके बारे में सोचो. मैं तुम्हारी मदद करूंगा&quot; जैसा हो गया है. नया &#039;स्टडी मोड&#039; इसी मकसद से बनाया गया है. यह स्टूडेंट्स को सिर्फ़ जवाब कॉपी करने के बजाय सवाल को समझने के लिए प्रोत्साहित करता है.
इसमें &quot;ज़िम्मेदार होमवर्क रिमाइंडर&quot; भी होंगे. ये रिमाइंडर स्टूडेंट्स को तब याद दिलाएंगे जब ऐसा लगेगा कि वे AI का इस्तेमाल सिर्फ़ असाइनमेंट पूरा करने के लिए कर रहे हैं, न कि उससे कुछ सीखने के लिए. सोच सीधी-सी है: AI को बच्चों के लिए पढ़ाई नहीं करनी चाहिए. AI को बच्चों की पढ़ाई में मदद करनी चाहिए.
AI उन्हें ब्रेक लेने के लिए भी कहेगा
चिंता सिर्फ़ होमवर्क की नहीं है. टीनएजर्स ChatGPT से बात करने में भी काफ़ी समय बिता सकते हैं. इसलिए लंबे सेशन के दौरान, Teen ChatGPT उन्हें बार-बार ब्रेक लेने की याद दिलाएगा. अगर कोई टीनएजर बहुत ज़्यादा समय तक चैट करता है, तो AI उसे ब्रेक लेने का सुझाव दे सकता है. यह यूज़र्स को यह भी याद दिलाएगा कि वे AI से बात कर रहे हैं, किसी असली इंसान से नहीं क्योंकि AI चाहे कितना भी नैचुरल क्यों न लगे, वह असल में इंसान नहीं है.
ChatGPT को &amp;ldquo;दोस्त&amp;rdquo; नहीं बनना चाहिए
यह एक और ज़रूरी बदलाव है. &amp;nbsp;ChatGPT टीनएज यूज़र्स के साथ रोमांटिक भाषा या प्यार-भरे शब्दों का इस्तेमाल नहीं करेगा. इसे यह भी सख़्ती से हिदायत दी जाएगी कि वह टीनएजर्स को ऐसा न लगने दे कि उसमें भावनाएँ, इमोशन्स या चेतना है.
वजह साफ़ है, बच्चे को AI का इस्तेमाल एक टेक्नोलॉजी टूल के तौर पर करना चाहिए, न कि किसी असली इंसान की जगह पर. OpenAI टीनएजर्स के AI पर इमोशनली निर्भर होने के रिस्क को कम करने की कोशिश कर रहा है.
माता-पिता को ज़्यादा कंट्रोल मिलेगा
माता-पिता को नए कंट्रोल भी मिलेंगे. वे &#039;स्टडी आवर्स&#039; सेट कर सकते हैं, जिसके दौरान &#039;स्टडी मोड&#039; अपने आप चालू हो सकता है. वे &#039;क्वाइट आवर्स&#039; (शांत समय) भी सेट कर सकते हैं, जिसके दौरान ChatGPT को पूरी तरह से ब्लॉक किया जा सकता है. इसलिए, भले ही बच्चे के पास फोन हो, माता-पिता का इस बात पर कुछ कंट्रोल रहेगा कि ChatGPT का इस्तेमाल कब किया जा सकता है और कब नहीं.
अगर ChatGPT को कुछ खतरनाक चीज़ का पता चले तो क्या होगा?
यह नए सिस्टम के सबसे संवेदनशील हिस्सों में से एक है. अगर बातचीत में आत्महत्या, खुद को नुकसान पहुंचाना, ईटिंग डिसऑर्डर या हिंसा जैसे विषय शामिल हों, तो सिस्टम सुरक्षा से जुड़े नोटिफिकेशन भेज सकता है. इसका मतलब यह नहीं है कि माता-पिता अपने बच्चे की ChatGPT के साथ होने वाली हर सामान्य बातचीत को अपने आप देख पाएंगे लेकिन अगर सिस्टम को खतरे के गंभीर संकेत मिलते हैं, तो सुरक्षा सिस्टम को इस तरह से डिज़ाइन किया गया है कि मामले में बड़ों को शामिल किया जा सके. दूसरे शब्दों में, बच्चे से जुड़ी किसी गंभीर समस्या को संभालने का काम सिर्फ़ AI का नहीं होना चाहिए.
OpenAI इतनी सावधानी क्यों बरत रहा है?
यहीं से असली कहानी शुरू होती है. OpenAI को कुछ परिवारों के मुकदमों का सामना करना पड़ रहा है, जिनका दावा है कि ChatGPT के इस्तेमाल से उनके बच्चों को नुकसान पहुंचा है. साथ ही, ज़्यादा से ज़्यादा टीनएजर्स स्कूल के काम, सलाह और निजी सवालों के लिए AI का इस्तेमाल कर रहे हैं. इसलिए सुरक्षा और भी ज़रूरी हो जाती है.

एक वयस्क AI के जवाब पर सवाल उठा सकता है या उसे नज़रअंदाज़ कर सकता है लेकिन एक टीनएजर के लिए AI की बात पर यकीन करने की संभावना ज़्यादा होती है. इसीलिए OpenAI अब कम उम्र के यूज़र्स के साथ ChatGPT के बातचीत करने के तरीके को बदलने की कोशिश कर रहा है. मकसद बच्चों को AI से पूरी तरह दूर रखना नहीं है. इसके बजाय, कंपनी बच्चों के इसके इस्तेमाल के तरीके पर कुछ सीमाएं और सुरक्षा ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 20 Aug 2026 12:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>Google&amp;Spirit Airlines डील पर बड़ा खुलासा, कंपनी ने किया साफ</title>
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        <description><![CDATA[ Google Spirit Airlines Deal : Google और Spirit Airlines से जुड़ी एक बड़ी डील इन दिनों चर्चा में है. Google ने दिवालिया हो चुकी Spirit Airlines की नीलामी में 10 मिलियन डॉलर की बोली लगाकर कंपनी के इंटरनल बिजनेस डेटा और कस्टम सॉफ्टवेयर हासिल कर लिए हैं. Google के मुताबिक, इस डेटा का इस्तेमाल प्रोडक्ट डेवलपमेंट और AI मॉडल की ट्रेनिंग में किया जाएगा. हालांकि यह बिक्री अभी पूरी तरह फाइनल नहीं हुई है. इसके लिए 19 अगस्त को US Bankruptcy Court for the Southern District of New York में जज Sean Lane के सामने सुनवाई होनी है. कंपनी ने खुद साफ किया है कि इस खरीद में यात्रियों की निजी जानकारी और क्रेडिट कार्ड डेटा शामिल नहीं है. इस डील के सामने आने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर Google को Spirit Airlines से क्या मिला और क्या नहीं मिला.&amp;nbsp;
Google ने कैसे जीती नीलामी?
Spirit Airlines के डेटा की नीलामी में मुकाबला भी काफी दिलचस्प रहा. Google ने 5 मिलियन डॉलर से शुरुआत की. AI डेटा कंपनी Mercor ने 5.2 मिलियन डॉलर की बोली लगाई और बाद में 7 मिलियन डॉलर की पेशकश की, अगर उसे पहले कच्चा डेटा लेकर खुद उसे अनॉनिमाइज करने दिया जाए. &amp;nbsp;इसके बाद Google ने अपनी बोली बढ़ाकर 10 मिलियन डॉलर कर दी और नीलामी जीत ली. वहीं Mercor 7.5 मिलियन डॉलर की बैकअप खरीदार बनी हुई है.&amp;nbsp;
Google ने क्या खरीदा?
Google ने Spirit Airlines का इंटरनल डेटा और कस्टम सॉफ्टवेयर खरीदा है. कंपनी के प्रवक्ता ने Business Insider को बताया कि इसमें ग्राहक या क्रेडिट कार्ड की जानकारी शामिल नहीं है. &amp;nbsp;Google ने यह भी कहा कि उसे मिलने वाले डेटा से किसी भी व्यक्ति की पहचान से जुड़ी जानकारी हटाई जाएगी. इसके लिए एक थर्ड पार्टी काम करेगी और Google को डेटा मिलने से पहले उसे पूरी तरह स्क्रब किया जाएगा.&amp;nbsp;
डेटा कितना बड़ा है?
कोर्ट में जमा डॉक्यूमेंट्स के मुताबिक, Google को मिलने वाला डेटा काफी बड़ा है. इसमें करीब 100 मिलियन ईमेल और 500 मिलियन Microsoft Teams मैसेज शामिल हैं. इसके अलावा करीब 30 मिलियन लाइन का कोड, डेवलपमेंट से जुड़ा मेटाडेटा और सॉफ्टवेयर मॉडल भी इस पैकेज का हिस्सा हैं. इसमें 1986 से अब तक के 1.75 लाख से ज्यादा कर्मचारी रिकॉर्ड भी मौजूद हैं. &amp;nbsp;डेटा में कंपनी का रेवेन्यू, एयरक्राफ्ट ऑपरेशन, कर्मचारियों की प्रोडक्टिविटी, ऑडिट और फ्रॉड से जुड़ी सामग्री, मार्केटिंग कैंपेन, HR फाइलें, बोर्ड प्रेजेंटेशन और बजट डॉक्यूमेंट भी शामिल हैं.&amp;nbsp;
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यात्रियों से जुड़ा कौन-सा डेटा है?
डॉक्यूमेंट्स में करीब 7.2 अरब प्रतिस्पर्धी उड़ानों की कीमतों और 2008 से करीब 7.5 अरब पैसेंजर ट्रांजैक्शन रिकॉर्ड्स का भी जिक्र है. हालांकि Google को Spirit Airlines के 97.5 मिलियन पैसेंजर प्रोफाइल और अनुमानित 50.2 मिलियन Free Spirit लॉयल्टी रिकॉर्ड्स नहीं मिले हैं, लेकिन डॉक्यूमेंट्स में एक खास प्रावधान भी है. Spirit Airlines की एस्टेट को अपनी ग्राहक सूची बेचने का अधिकार बरकरार है. इसमें हर यात्री के सालाना खर्च को एकत्रित रूप में शामिल किया जा सकता है और इसे हॉस्पिटैलिटी या ट्रैवल बिजनेस से जुड़े खरीदारों को बेचा जा सकता है.&amp;nbsp;
डेटा को कैसे किया जाएगा सुरक्षित?
Google की ओर से डेटा स्क्रब करने की बात कही गई है, लेकिन बिक्री समझौते में इसकी प्रक्रिया को लेकर कुछ और जानकारी दी गई है. 14 अगस्त को दाखिल समझौते के मुताबिक, डेटा को डी-आइडेंटिफाई करने वाली एजेंसी Google को स्वीकार्य होनी चाहिए या Google के तहत तय की जानी चाहिए. इस पूरी प्रक्रिया का खर्च भी Google उठाएगा. डेटा मिलने से पहले कंपनी को इस प्रक्रिया की समीक्षा और उस पर टिप्पणी करने का सही मौका मिलेगा. डेटा से नाम और पहचान हटाने के बाद भी रिकॉर्ड्स के बीच संबंध बनाए रखे जाएंगे. यही कनेक्शन AI एजेंट्स की ट्रेनिंग के लिए इस डेटा को उपयोगी बना सकता है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Thu, 20 Aug 2026 12:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>4K या 4K Blu&amp;Ray! कौन देता है बेहतर पिक्चर क्वालिटी? कैसे पता करें अंतर</title>
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        <description><![CDATA[ 4K Vs 4K Blu-Ray: आजकल स्मार्ट टीवी और स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म की वजह से 4K वीडियो लोगों के बीच काफी नॉर्मल हो चुका है. Netflix, Amazon Prime Video, YouTube और दूसरे प्लेटफॉर्म पर लोग आसानी से 4K कंटेंट देख सकते हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि अगर 4K स्ट्रीमिंग और 4K Blu-ray दोनों का रिजॉल्यूशन 4K है तो इनकी पिक्चर क्वालिटी में फर्क क्यों दिखाई देता है? आइए जानते हैं क्या है इसका कारण.
4K Blu-ray क्या होता है?
दरअसल, 4K Blu-ray को Ultra HD Blu-ray कहा जाता है. इसमें फिल्मों और वीडियो को फिजिकल डिस्क पर स्टोर किया जाता है. इसका सबसे बड़ा फायदा ये है कि स्ट्रीमिंग की तरह वीडियो फाइल को इंटरनेट की स्पीड और डेटा लिमिट के हिसाब से ज्यादा कंप्रेस करने की जरूरत नहीं पड़ती है.
इसके अलावा Ultra HD Blu-ray डिस्क पर फिल्मों को काफी ज्यादा बिटरेट के साथ स्टोर किया जाता है. इसका मतलब है कि वीडियो में ज्यादा विजुअल डिटेल बरकरार रहती है.
4K Streaming कैसे काम करती है?
वहीं, 4K स्ट्रीमिंग की बात करें तो इसमें कंटेंट इंटरनेट के जरिए आपके टीवी तक पहुंचता है. हालांकि, इसका रिजॉल्यूशन 3840&amp;times;2160 पिक्सल होता है लेकिन वीडियो को इंटरनेट पर आसानी से फ्लो करने के लिए इसे कंप्रेस करने की जरूरत पड़ती है.
स्ट्रीमिंग सर्विसेज नॉर्मली वीडियो को ऐसे कंप्रेस करती हैं कि अच्छी क्वालिटी के साथ डेटा की खपत भी कंट्रोल में रहे. इसी वजह से एक ही फिल्म का 4K स्ट्रीमिंग वर्जन और 4K Blu-ray वर्जन एक ही रिजॉल्यूशन होने के बावजूद अलग दिखाई देता है.
क्या है असली अंतर
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इन दोनों के बीच असली अंतर बिटरेट का होता है. दरअसल, बिटरेट ये बताता है कि वीडियो के हर सेकंड में कितनी जानकारी इस्तेमाल की जा रही है. वहीं, ज्यादा बिटरेट का मतलब हमेशा बेहतर वीडियो नहीं होता है लेकिन नॉर्मल कंडिशन में ज्यादा डेटा उपलब्ध होने से ज्यादा विजुअल डिटेल देखने को मिलती है.
4K Blu-ray में स्ट्रीमिंग के मुकाबले में ज्यादा डेटा की खपत होती है. इसलिए तेज एक्शन, धुएं, बारिश, बालों, पत्तियों और अंधेरे जैसी फोटोज या वीडियो में Blu-ray ज्यादा साफ और स्टेबल नजर आता है.
तो कौन है बेहतर?
अगर सवाल सिर्फ पिक्चर क्वालिटी का है तो 4K Blu-ray को 4K स्ट्रीमिंग के मुकाबले ज्यादा बेहतर ऑप्शन माना जाता है. ऐसा इसलिए क्योंकि इसमें ज्यादा बिटरेट, कम कम्प्रेशन और डिस्क पर उपलब्ध ज्यादा वीडियो डेटा मिलता है.
हालांकि, 4K स्ट्रीमिंग भी काफी अच्छी क्वालिटी देती है और नॉर्मल टीवी देखने के लिए अंतर काफी कम होता है. इसीलिए इन दोनों के बीच के अंतर को बहुत ज्यादा ध्यान देने से समझ में आता है नहीं तो 4K स्ट्रीमिंग भी यूजर्स को एक बेहतर विजुअल एक्सपीरिएंस देने में सक्षम माना जाता है.
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        <pubDate>Wed, 19 Aug 2026 23:30:21 +0530</pubDate>
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        <title>Budget Friendly Laptop: कितने रुपये का आ जाता है सबसे सस्ता और अच्छा लैपटॉप</title>
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        <description><![CDATA[ Budget Friendly Laptop: नया लैपटॉप खरीदते वक्त सबसे बड़ा सवाल यही रहता है कि कम बजट में भी अच्छी परफॉर्मेंस वाला लैपटॉप मिल सकता है या नहीं. अच्छी बात यह है कि आज कई ब्रांड्स ऐसे बजट फ्रेंडली लैपटॉप ऑफर करते हैं, जो स्टूडेंट्स, ऑफिस वर्क और रोजमर्रा के इस्तेमाल के लिए बिल्कुल सही बैठते हैं. आइए जानते हैं अलग अलग बजट रेंज में कितने रुपये से लैपटॉप की शुरुआत होती है, और किस कीमत में सबसे अच्छी वैल्यू मिलती है.
सबसे सस्ता लैपटॉप कितने में आता है
भारत में एंट्री लेवल लैपटॉप की शुरुआत करीब 25,000 रुपये से हो जाती है. इस कीमत में बेसिक ब्राउजिंग, डॉक्यूमेंट वर्क और ऑनलाइन क्लास जैसे हल्के काम आसानी से हो जाते हैं, हालांकि हैवी मल्टीटास्किंग या गेमिंग की उम्मीद इस रेंज में नहीं करनी चाहिए.
यह भी पढे़ं: कितने टाइप के होते हैं Bluetooth? जानें कौन-सा वाला किस काम आता है
30 हजार से कम में मिलने वाले विकल्प
30,000 रुपये से कम कीमत वाले लैपटॉप किफायती दाम में जरूरी परफॉर्मेंस का अच्छा संतुलन देते हैं. यह रेंज खासतौर पर स्टूडेंट्स, कैजुअल यूजर्स या सेकेंडरी डिवाइस की तलाश करने वालों के लिए बेहतर मानी जाती है. इस बजट में हल्के और लंबी बैटरी लाइफ वाले मॉडल आसानी से मिल जाते हैं, जो लंबे स्टडी सेशन के लिए भी सही रहते हैं.
50 हजार तक की रेंज में क्या मिलता है फायदा
अगर बजट थोड़ा बढ़ाकर 50,000 रुपये तक किया जाए, तो लैपटॉप की परफॉर्मेंस में भी साफ फर्क दिखता है. इस रेंज में फुल एचडी स्क्रीन, फास्ट एस एस डी स्टोरेज और स्मूथ मल्टीटास्किंग जैसी सुविधाएं मिलने लगती हैं. इस बजट में लगभग 60 प्रतिशत भारतीय खरीदार अच्छी परफॉर्मेंस और आसानी से कैरी होने वाले डिजाइन का कॉम्बिनेशन पसंद करते हैं. वीडियो कॉल, ऑनलाइन क्लास, हल्की फोटो एडिटिंग और लाइट गेमिंग जैसे काम इस रेंज में आराम से हो जाते हैं.
लाख रुपये तक का बजट किनके लिए सही
जो लोग कोडिंग, वीडियो एडिटिंग या भारी मल्टीटास्किंग जैसे प्रोफेशनल काम करते हैं, उनके लिए 50,000 से 1,00,000 रुपये के बीच का बजट बेहतर विकल्प रहता है. इस रेंज में ज्यादा रैम, बेहतर प्रोसेसर और तेज एस एस डी स्टोरेज वाले लैपटॉप मिलते हैं, जो प्रोफेशनल और क्रिएटिव यूजर्स दोनों की जरूरतें पूरी कर सकते हैं.
गेमिंग लैपटॉप की कीमत इससे अलग
अगर मकसद सिर्फ गेमिंग है, तो बजट थोड़ा ऊंचा रखना पड़ता है. अच्छे गेमिंग लैपटॉप की कीमत आमतौर पर 2,00,000 रुपये तक जा सकती है, जिसमें दमदार कूलिंग सिस्टम, हाई रिफ्रेश डिस्प्ले और पावरफुल ग्राफिक्स कार्ड जैसी सुविधाएं मिलती हैं. गेमिंग के अलावा ऐसे लैपटॉप वीडियो एडिटिंग और हैवी मल्टीटास्किंग में भी बिना लैग के काम करते हैं.
लैपटॉप खरीदते वक्त किन बातों का रखें ध्यान
सिर्फ कीमत देखकर लैपटॉप खरीदना सही तरीका नहीं है. रैम, प्रोसेसर, स्टोरेज टाइप एस एसडी &amp;nbsp;या एचडी और बैटरी लाइफ जैसी चीजों को अपनी जरूरत के हिसाब से जांचना जरूरी है. स्टूडेंट्स के लिए हल्का और लंबी बैटरी लाइफ वाला लैपटॉप बेहतर रहता है, जबकि प्रोफेशनल्स के लिए ज्यादा रैम और तेज प्रोसेसर को प्राथमिकता देना बेहतर है.
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        <pubDate>Wed, 19 Aug 2026 23:30:18 +0530</pubDate>
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        <title>WhatsApp पर भेजी गई फोटो कितनी सुरक्षित है? जानें पूरी जानकारी</title>
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        <description><![CDATA[ WhatsApp पर भेजी गई फोटो कितनी सुरक्षित है? जानें पूरी जानकारी ]]></description>
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        <title>मोबाइल रिचार्ज फिर हो सकता है महंगा! ये बताई जा रही वजह</title>
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        <description><![CDATA[ Mobile Recharge Price Hike: देश की दो बड़ी टेलीकॉम कंपनी Airtel और Reliance Jio एक बार फिर लोगों को झटका देने की तैयारी में है. जी हां, दरअसल, एक रिपोर्ट के अनुसार, जल्द ही फिर से मोबाइल रिचार्ज की कीमतों में करीब 15 प्रतिशत का इजाफा देखने को मिल सकता है. बता दें कि हाल ही में एयरटेल ने अपने कुछ सस्ते प्रीपेड रिचार्ज प्लान्स को बंद कर दिया है जिसके बाद से यूजर्स को अब मजबूरन महंगे रिचार्ज कराने पड़ रहे हैं. अब ऐसे में आने वाले 3 से 4 महीनों में फिर से रिचार्ज की कीमतों में इजाफा लोगों के लिए काफी भारी पड़ सकता है. आइए जानते हैं इसके पीछे क्या वजह बताई जा रही है.
3-4 महीने में बढ़ सकते हैं रिचार्ज के दाम
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार ये अनुमाना लगाया जा रहा है कि Jio और Airtel अपने मोबाइल टैरिफ में 12 से 15 फीसदी तक की वृद्धि कर सकती हैं. हालांकि, अभी ये केवल एक मार्केट फोरकास्ट है. दोनों कंपनियों की ओर से ऐसी किसी कीमत बढ़ोतरी की आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है.
अगर अनुमान सही साबित होता है तो इसका सीधा असर प्रीपेड और पोस्टपेड दोनों तरह के ग्राहकों पर देखने को मिलेगा. खासतौर पर ऐसे यूजर्स जो हर महीने या तीन महीने में अपना मोबाइल रिचार्ज कराते हैं, उन्हें अब रिचार्ज के लिए ज्यादा पेमेंट करना पड़ेगा.
आखिर क्यों बढ़ सकते हैं टैरिफ?
दरअसल, टेलीकॉम कंपनियां समय-समय पर अपने टैरिफ में बदलाव करती रही हैं. इसके पीछे नेटवर्क विस्तार, 5G इंफ्रास्ट्रक्चर, स्पेक्ट्रम की लागत और प्रति ग्राहक औसत कमाई यानी ARPU बढ़ाने जैसे कारण हो सकते हैं.
अगर कंपनियां कीमत बढ़ाती हैं तो कम कीमत वाले प्लान भी महंगे हो सकते हैं. इसका मतलब है कि जिन ग्राहकों का बजट पहले से कम है उन्हें अपने मोबाइल खर्च को दोबारा मैनेज करना पड़ सकता है.
Jio और Airtel के मुनाफे पर भी सवाल
आपको बता दें कि मोबाइल रिचार्ज के महंगे होने की चर्चा इस वजह से भी तेज हो रही है क्योंकि Jio और Airtel दोनों ने पिछले साल 30,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का नेट प्रॉफिट दर्ज किया था. ऐसे में कई यूजर्स के मन में सवाल उठ रहा है कि जब कंपनियां इतना बड़ा मुनाफा कमा रही हैं तो मोबाइल रिचार्ज की कीमतें बढ़ाने की जरूरत क्यों पड़ रही है?
यूजर्स पर क्या होगा असर?
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि 12 से 15 फीसदी की बढ़ोतरी होने पर मौजूदा रिचार्ज प्लान की कीमत उसी के अनुसार बढ़ेंगी. जैसे अगर किसी रिचार्ज प्लान की कीमत 500 रुपये है और वह 12 प्रतिशत बढ़ जाती है तो अब यूजर को उसी प्लान के लिए 560 रुपये देने होंगे. वहीं, अगर ये बढ़ोतरी 15 प्रतिशत तक होती है तो यूजर को 575 रुपये देने पड़ सकते हैं.
टेलीकॉम सेक्टर में बढ़ रहा डुओपॉली
दरअसल, आपको बता दें कि भारत के टेलीकॉम बाजार में Jio और Airtel का दबदबा लगातार मजबूत होता जा रहा है. Vodafone Idea और BSNL जैसे दूसरे ऑपरेटर भी मौजूद हैं लेकिन प्राइवेट मोबाइल मार्केट में Jio और Airtel की स्थिति काफी मजबूत है. यही वजह है कि टेलीकॉम सेक्टर में डुओपॉली (Duopoly) को लेकर चर्चा होती रहती है. डुओपॉली का मतलब ऐसी मार्केट कंडिशन होती है जहां किसी सेक्टर में मेजर तौर पर दो बड़ी कंपनियों का दबदबा हो. ऐसे मार्केट में अगर दोनों कंपनियां अपने टैरिफ बढ़ाती हैं तो ग्राहकों के पास सर्विस लेने के लिए उन दोनों कंपनियों के अलावा कोई ऑप्शन नहीं रह जाता है.
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        <title>किताबें को क्यों नष्ट कर रही हैं AI कंपनियां? सामने आ गई वजह</title>
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        <description><![CDATA[ Artificial Intelligence: बढ़ती टेक्नोलॉजी के साथ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भी पूरी दुनिया में काफी तेजी से अपने पैर पसार रहा है. लोग एआई को अपनी जरूरत के अनुसार इस्तेमाल कर रहे हैं. वहीं, बड़ी-बड़ी एआई कंपनियां आज भी इनको और बेहतर बनाने के ऊपर काम कर रही हैं. इसी कड़ी में बता दें कि एक रिपोर्ट के अनुसार, एआई कंपनियां किताबों को खरीद कर उन्हें खत्म करने का काम कर रही हैं. आइए जानते हैं आखिर ऐसा क्यों हो रहा है.
Anthropic का Project Panama क्या है?
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, AI कंपनी Anthropic ने बड़ी संख्या में किताबें खरीदकर उन्हें स्कैन करने का एक खास प्रोसेस अपनाया है जिसे उसने Project Panama नाम दिया है.
रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि इस प्रोसेस में किताबों को नॉर्मल तरीके से स्कैन करने के बजाय उनकी रीढ़ यानी spine को काटकर पन्नों को अलग किया जाता है. इसके बाद अलग किए गए पन्नों को तेज रफ्तार स्कैनिंग मशीनों से डिजिटल रूप में बदला जाता है. यानी यहां किताबों को स्कैन करने के बाद उन्हें दोबारा इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है.
क्या सिर्फ Anthropic ही ऐसा कर रही है?
इसके बारे में अभी तक कोई पुष्टि नहीं हो पाई है कि ये प्रोसेस सिर्फ एंथ्रोपिक ने अपनाया है या फिर बाकी एआई कंपनियां भी इसे अपना चुकी हैं. हालांकि, कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि किताबों की दुकानों और विक्रेताओं को हाल के समय में ऐसी किताबों के बड़े ऑर्डर मिल रहे हैं जिनकी बिक्री काफी कम होती है. इससे ये अटकल जरूर लगाई गई कि AI कंपनियां बड़े पैमाने पर पुरानी और कम जगहों पर मिलने वाली किताबें खरीद रही हैं.
आखिर किताबों को काटने की जरूरत क्यों?
दरअसल, इसका कारण है समय और लागत. बताया जा रहा है कि नॉर्मल तरीके से किसी किताब को स्कैन करने के लिए हर पेज को संभालकर पलटना पड़ता है. अब बड़ी संख्या में अगर किताबों को स्कैन करना है तो इसमें काफी समय और लागत लगेगी. इसीलिए कंपनी ने किताबों को काटकर उसके सभी पन्नों को एक साथ अलग करना और उन्हें ऑटोमेटेड स्कैनर में डालने का तरीका अपनाया है.
AI मॉडल के लिए करोड़ों पन्नों को डिजिटल डेटा में बदलने की जरूरत को देखते हुए कंपनियां ऐसे प्रोसेस को ज्यादा बेहतर ऑप्शन के रूप में देख रही है. हालांकि, इसके चलते कंपनी की आलोचनाएं भी हो रही हैं और कई सवाल भी सामने आ रहे हैं कि क्या तेज और सस्ता तरीका सांस्कृतिक और ऐतिहासिक किताबों को नुकसान पहुंचाने की कीमत पर अपनाया जाना चाहिए?
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        <pubDate>Wed, 19 Aug 2026 23:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>How To Check TV Remote: TV Remote खराब है या बैटरी? मोबाइल कैमरे से ऐसे करें पता</title>
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        <description><![CDATA[ How To Check TV Remote: कई बार जब हम टीवी देख रहे होते हैं, तो अचानक रिमोट काम करना बंद कर देता है. हम बार-बार बटन दबाते हैं, रिमोट को हाथ पर ठोकते हैं, लेकिन टीवी का चैनल नहीं बदलता. ऐसे समय में सबसे बड़ा कन्फ्यूजन यह होता है कि रिमोट सच में अंदर से खराब हो गया है या सिर्फ उसकी बैटरी खत्म हुई है.&amp;nbsp;
अक्सर लोग इस परिस्थिति में सीधे नया रिमोट खरीद लाते हैं या बाजार में मैकेनिक के चक्कर काटने लगते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि आपके जेब में रखा स्मार्टफोन इस समस्या को चुटकियों में सुलझा सकता है. आप अपने मोबाइल के कैमरे की मदद से घर बैठे सिर्फ 10 सेकंड में रिमोट का लाइव टेस्ट कर सकते हैं.
TV Remote कैसे काम करता है?
दरअसल, बाजार में मिलने वाले ज्यादातर टीवी, एसी या सेट-टॉप बॉक्स के रिमोट इन्फ्रारेड लाइट तकनीक पर काम करते हैं. जब भी आप रिमोट का कोई बटन दबाते हैं, तो उसके आगे लगे छोटे से बल्ब से एक अदृश्य रोशनी निकलती है जो सीधे टीवी के सेंसर तक सिग्नल पहुंचाती है. यह इन्फ्रारेड लाइट की फ्रीक्वेंसी ऐसी होती है जिसे इंसान की नग्न आंखों से नहीं देखा जा सकता. लेकिन हमारे स्मार्टफोन के कैमरे में लगे सेंसर इस लाइट को बहुत आसानी से देख और रिकॉर्ड कर सकते हैं. इसी तकनीक का फायदा उठाकर हम रिमोट की जांच करते हैं.&amp;nbsp;
मोबाइल कैमरे से कैसे करें चेक?
सबसे पहले अपने स्मार्टफोन का प्राइमरी या फ्रंट कैमरा ऐप ओपन करें. अब कैमरे की स्क्रीन पर देखते हुए रिमोट का कोई भी बटन दबाकर रखें. बटन दबाते समय मोबाइल की स्क्रीन को ध्यान से देखें कि रिमोट के बल्ब में कोई हलचल हो रही है या नहीं.&amp;nbsp;
अगर बटन दबाने पर मोबाइल स्क्रीन पर रिमोट के बल्ब से बैंगनी, लाल या सफेद रंग की चमकती हुई रोशनी दिखाई देती है, तो इसका मतलब है कि आपका रिमोट बिल्कुल ठीक है और बैटरी भी चालू है. ऐसे में दिक्कत आपके टीवी के सेंसर में हो सकती है. यदि कैमरे में रोशनी तो दिख रही है लेकिन वह बहुत धुंधली या कमजोर है, तो समझ जाएं कि रिमोट के सेल खत्म होने वाले हैं. नई बैटरी डालते ही रिमोट पहले की तरह काम करने लगेगा. लेकिन अगर बटन दबाने के बाद भी मोबाइल स्क्रीन पर कोई रोशनी नहीं चमकती है, तो इसका मतलब है कि या तो रिमोट के अंदर का सर्किट खराब हो चुका है या उसकी बैटरी पूरी तरह से खत्म हो चुकी है.
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रिमोट को खोलकर देखें
इसके अलावा, कई बार रिमोट के भीतर जहां सेल लगाए जाते हैं, उस लोहे के स्प्रिंग या पोर्ट पर जंग या धूल जम जाती है. इसकी वजह से भी पावर सप्लाई रुक जाती है. सेल बदलने से पहले उस जगह को किसी सूखे कपड़े या माचिस की तीली से थोड़ा साफ करके देख लें. कई बार ऐसा करने से रिमोट काम करना शुरू कर देता है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Wed, 19 Aug 2026 07:30:15 +0530</pubDate>
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        <title>iPhone यूजर्स सावधान! Apple ने जारी किया बेहद जरूरी Security Update</title>
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        <description><![CDATA[ iOS 26.1.1: Apple ने अपने iPhone, iPad और Mac यूजर्स के लिए एक जरूरी सिक्योरिटी अपडेट जारी कर दिया है. जानकारी के अनुसार, कंपनी ने iOS 26.6.1, iPadOS 26.6.1 और macOS Tahoe 26.6.2 अपडेट को रोलआउट किया है. दरअसल, इस अपडेट को जारी करने के पीछे का मकसद यूजर्स की सेफ्टी है. जी हां, दरअसल, जारी किए गए अपडेट्स में कुल 29 सेफ्टी कमियों को दूर किया गया है. इसके साथ ही बता दें कि इनमें से कुछ कमी की पहचान एआई की मदद से की गई है.
तीन हफ्तों में तीसरा बड़ा सिक्योरिटी अपडेट
दरअसल, Apple के लिए ये हालिया अपडेट काफी जरूरी माना जा रहा है, क्योंकि कंपनी पिछले करीब तीन हफ्तों में तीसरी बार बड़ी संख्या में सिक्योरिटी समस्याओं को ठीक करने के लिए अपडेट जारी कर चुकी है. ऐसे में Apple डिवाइस इस्तेमाल करने वाले लोगों के लिए इस अपडेट को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है.
बता दें कि कंपनी ने अलग-अलग ऑपरेटिंग सिस्टम के लिए अपडेट जारी किए हैं जिनका मकसद डिवाइस की सुरक्षा को मजबूत करना और होने वाले साइबर हमलों के रास्तों को पूरी तरह से बंद करना है.
AI ने खोजीं 9 सुरक्षा कमजोरियां
इसमें सबसे बड़ी खास बात ये है कि पाई गई 29 सेफ्टी कमियों में से 9 कमियों को एआई की मदद से खोजा गया है. जी हां, इन कमियों की पहचान OpenAI Codex Security की मदद से की गई है. इससे ये साफ होता है कि साइबर सिक्योरिटी में एआई की भूमिका धीरे-धीरे बढ़ती जा रही है.
WebKit में मिलीं सबसे ज्यादा खामियां
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, 29 में से 21 सेफ्टी कमी सिर्फ WebKit से जुड़ी हुई हैं. दरअसल, WebKit का इस्तेमाल Safari समेत कई Apple फीचर्स और ऐप्स में होता है. ऐसे में इन कमियों का साइबर अपराधी आसानी से लोगों की जानकारी को चुराने के लिए उठा सकते थे. कुछ मामलों में Safari के अचानक क्रैश होने की स्थिति भी पैदा हो सकती थी.
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि जिन पुराने iPhone और iPad मॉडल में iOS 26 और iPadOS 26 का सपोर्ट नहीं है, उनके लिए भी Apple ने अपडेट जारी किया है. ऐसे डिवाइस के लिए iOS 18.7.10 और iPadOS 18.7.10 उपलब्ध कराए गए हैं.
यूजर्स को क्या करना चाहिए?
अगर आपके iPhone, iPad या Mac में अपडेट उपलब्ध है तो उसे जल्द से जल्द इंस्टॉल करना आपके लिए बेहतर होगा. एप्पल का नया अपडेट इंस्टॉल करने के लिए आपको सबसे पहले Settings में जाना होगा और इसके बाद यहां पर General ऑप्शन पर क्लिक करना है. इसके बाद आपको Software Update दिखाई देगा उसपर क्लिक करें.
यहां क्लिक करते ही आपको मौजूद अपडेट दिखाई देने लगेगा और आपके अपडेट स्टॉर्ट करते ही ये नया अपडेट डाउनलोड होकर आपके डिवाइस में इंस्टॉल हो जाएगा. इसके साथ ही बता दें कि इस सिक्योरिटी अपडेट को नजरअंदाज करने से आपका डिवाइस हैकर्स के निशाने पर आ सकता है.
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        <pubDate>Wed, 19 Aug 2026 07:30:14 +0530</pubDate>
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        <title>Induction Working Mechanism: Induction पर सिर्फ बर्तन गर्म होता है, चूल्हा क्यों नहीं? जानें टेक्नोलॉजी</title>
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        <description><![CDATA[ Induction Working Mechanism: आज के दौर में हर किचन में Induction रसोई बनाने का एक जरुरी हिस्सा बन चुका है. इसका इस्तेमाल करने वाले गैस सिलेंडर के खत्म होने की टेंशन से दूर हो जाते हैं. क्योंकि यह बिजली से चलने वाला चूल्हा बेहद तेजी से खाना बना देता है. लेकिन क्या आपने कभी गौर किया है कि इंडक्शन चूल्हे पर रखा बर्तन तो खौलने लगता है, लेकिन अगर आप उसके ठीक बगल में या बर्तन हटाकर चूल्हे की सतह पर हाथ रख दें, तो वह बिल्कुल ठंडी महसूस होती है. आम गैस चूल्हा या इलेक्ट्रिक हीटर खुद गर्म होकर बर्तन को गर्मी देते हैं, जिससे उनके ऊपर हाथ रखना नामुमकिन होता है. लेकिन इंडक्शन के मामले में ऐसा बिल्कुल नहीं होता.&amp;nbsp;
क्या है इसके पीछे की टेक्नोलॉजी?
इंडक्शन चूल्हे के इस अनोखे तरीके के पीछे कोई जादू नहीं, बल्कि विज्ञान का एक बेहद सीधा नियम काम करता है, जिसे इलेक्ट्रोमैग्नेटिक इंडक्शन या विद्युत चुंबकत्व कहते हैं. जब हम इंडक्शन का स्विच ऑन करते हैं, तो इसके सिरेमिक या कांच की ऊपरी सतह के नीचे छिपी तांबे की एक गोल कॉइल में बिजली की धारा दौड़ने लगती है. बिजली की यह लहर उस कॉइल के चारों ओर एक अदृश्य चुंबकीय क्षेत्र तैयार कर देती है. यह चुंबकीय क्षेत्र चूल्हे की ऊपरी सतह को बिना छुए सीधे पार कर जाता है.&amp;nbsp;
बर्तन कैसे गर्म होता है?
ऐसे में जब आप इस चुंबकीय क्षेत्र के ऊपर इंडक्शन सपोर्टेड बर्तन जैसे लोहे या स्टेनलेस स्टील का बर्तन रखते हैं, तो वह अदृश्य चुंबकीय क्षेत्र बर्तन के पेंदे से टकराता है. चुंबकीय क्षेत्र के टकराते ही बर्तन के धातु के अंदर बिजली के छोटे-छोटे गोल चक्कर घूमने लगते हैं, जिन्हें विज्ञान की भाषा में एडी करंट कहा जाता है. जब यह करंट बर्तन के पेंदे में दौड़ने की कोशिश करता है, तो भारी घर्षण और रुकावट पैदा होती है. इसी रुकावट के कारण बर्तन के अंदर ही गर्मी पैदा होने लगती है. यह गर्मी चूल्हे से बर्तन में नहीं आती, बल्कि खुद बर्तन के पेंदे के अंदर ही पैदा होती है और सीधे उसमें रखे दूध, पानी या सब्जी को गर्म कर देती है.
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चूल्हा ठंडा क्यों रहता है?
दरअसल, चूल्हे की ऊपरी सतह आमतौर पर सिरेमिक या एक खास किस्म के कांच से बनी होती है. कांच और सिरेमिक जैसी चीजें नॉन मैग्नेटिक होती हैं, यानी इन पर चुंबकीय क्षेत्र का कोई असर नहीं होता. हां, खाना पकने के बाद जब आप बर्तन हटाते हैं, तो बर्तन की अपनी गर्मी की वजह से वह कांच थोड़ा गुनगुना जरूर महसूस हो सकता है, लेकिन चूल्हा खुद से कोई गर्मी पैदा नहीं करता.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Wed, 19 Aug 2026 07:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>लीक हो गया कैमरा वाले AirPods का लुक! जानें कब होगा लॉन्च</title>
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        <description><![CDATA[ Apple AirPods With Camera: सितंबर 2026 में Apple का इवेंट होने वाला है जहां कंपनी अपनी नई iPhone 18 सीरीज को लॉन्च करने वाली है. इस इवेंट में आईफोन के साथ और भी कई प्रोडक्ट्स देखने को मिल जाएंगे. इसी बीच Apple के एक नए प्रोडक्ट की काफी चर्चा हो रही है. जी हां, दरअसल, कंपनी जल्द ही अपना कैमरे वाला AirPods को लॉन्च करने की तैयारी में है जिसका डिजाइन ऑनलाइन लीक हो गया है.
कैमरा वाले AirPods कैसे करेंगे काम?
MacRumors की रिपोर्ट के मुताबिक, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक वीडियो काफी तेजी से वायरल हो रहा है जिसमें कैमरे वाले एयरपॉड्स का इस्तेमाल करते हुए दिखाया जा रहा है. हालांकि, ये डेमो वीडियो माना जा रहा है.

Here is your first look at AirPods with Cameras in action using Visual Intelligence.This video file came from macOS 26.7 RC pic.twitter.com/yo7RI4MCeu
&amp;mdash; Aaron (@aaronp613) August 18, 2026



जानकारी के अनुसार, इन AirPods का मकसद सिर्फ फोटो या वीडियो रिकॉर्ड करना नहीं है बल्कि इनमें लगे कैमरे Visual Intelligence के साथ मिलकर काम करेंगे. इसका मतलब साफ है कि यूजर्स इस डिवाइस को पहनने के बाद जिस भी चीज को देखता है उसके बारे में वो Siri से सवाल भी पूछ सकता है.
ये है कोडनेम&amp;nbsp;
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, माना जा रहा है कि इस प्रोडक्ट को कंपनी B790 कोडनेम से तैयार कर रही है. इसके अलावा बताया जा रहा है कि कंपनी इस प्रोडक्ट पर पिछले करीब 4 सालों से काम कर रही है. हालांकि, कंपनी ने अभी तक अपने इस प्रोडक्ट को लेकर कोई भी आधिकारीक जानकारी शेयर नहीं की है.
इसके अलावा अभी तक ये भी साफ नहीं हो पाया है कि इस प्रोडक्ट में कितने और कैसे फीचर्स देखने को मिलेंगे. फिलहाल, अभी तक इतना ही सामने आया है कि इस एयरपॉड्स में लगा हुआ कैमरा किसी भी चीज को देखकर उसके बार में यूजर्स को जानकारी उपलब्ध करा देगा.
अगले महीने होगा लॉन्च?
बताया जा रहा है कि कंपनी का ये प्रोडक्ट फिलहाल टेस्टिंग फेज में चल रहा है. इसके साथ ही पहले इस प्रोडक्ट के साल के शुरूआत में ही लॉन्च होने की संभावना जताई जा रही थी. लेकिन अब कहा जा रहा है कि कंपनी इसे सितंबर 2026 यानी अगले महीने बाजार में उतार सकती है. इसका मतलब साफ है कि कंपनी इस नए प्रोडक्ट को आईफोन 18 सीरीज के साथ ही मार्केट में पेश कर सकती है. लेकिन अगर ऐसा नहीं होता है तो कंपनी इसे अगले साल की शुरूआत में बाजार में उतार सकती है. फिलहाल कंपनी ने इस प्रोडक्ट से जुड़ी कोई भी जानकारी शेयर नहीं की है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Wed, 19 Aug 2026 07:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>Home Theatre Buying Guide : होम थिएटर खरीद रहे हैं? पहले करें इन 5 चीजों की जांच</title>
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        <description><![CDATA[ Home Theatre Buying Guide : होम थिएटर खरीद रहे हैं? पहले करें इन 5 चीजों की जांच ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 19 Aug 2026 07:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>साल के अंत तक लॉन्च होगा BGMI Lite! जानें क्या होगा खास</title>
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        <description><![CDATA[ BGMI Lite: मोबाइल गेमिंग को देश में काफी ज्यादा पसंद किया जाता है. खासतौर पर युवाओं में मोबाइल गेमिंग का काफी क्रेज देखने को मिलता है. ऐसे में अब गेमर्स के लिए एक खुशखबरी सामने आई है. दरअसल, Krafton India ने BGMI Lite को भारत में लॉन्च करने का फैसला लिया है. जानकारी के अनुसार, इस गेम को कंपनी इस साल के अंत तक मार्केट में लॉन्च करने की तैयारी में है. बता दें कि इस गेम को लॉन्च करने का मकसद ऐसे गेमर्स तक अपनी पहुंच बनाना है जिनके पास ज्यादा पावरफुल स्मार्टफोन नहीं है लेकिन फिर भी वो गेम खेलना चाहते हैं. आइए जानते हैं कि इसमें गेमर्स को क्या नया मिलेगा.
कब लॉन्च होगा BGMI Lite?
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इस नए गेम के इस साल के अंत तक भारत में लॉन्च होने की संभावना जताई जा रही है. लेकिन कंपनी की ओर से इसकी सही तारीख के बारे में कोई जानकारी शेयर नहीं की गई है.
आपको बता दें कि BGMI Lite को लेकर युवाओं में काफी चर्चाएं भी चल रही हैं. ऐसा इसलिए है क्योंकि अब इस नए गेम के आने के बाद कम पावरफुल स्मार्टफोन वाले भी इस गेम का मजा उठा सकेंगे. बताते चलें BGMI का स्टैंडर्ड वर्जन पहले से ही देश में काफी इस्तेमाल हो रहा है. लेकिन उसे हाई-परफॉर्मेंस वाले स्मार्टफोन पर ही खेला जा सकता है. इसी को ध्यान में रखते हुए कंपनी ने इस गेम का एक लाइट वर्जन लॉन्च करने का फैसला लिया है.
हालांकि, कंपनी की ओर से अभी तक ये नहीं बताया गया है कि इस गेम को खेलने के लिए फोन में कितनी रैम होने चाहिए, कौन-सा प्रोसेसर या कितनी स्टोरेज की जरूरत होगी. इसके अलावा कंपनी ने गेम का डाउनलोड साइज और किन स्मार्टफोन मॉडल्स को सपोर्ट करेगा, इसके बारे में भी कोई जानकारी शेयर नहीं की है.
अभी ये जानकारियां आनी बाकी हैं
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि BGMI Lite को लेकर सिर्फ अभी ये बात सामने आई है कि इसे कंपनी इस साल के अंत तक भारत में लॉन्च कर सकती है. लेकिन इस गेम से जुड़ी कई जरूरी जानकारियों का सामने आने बाकी है. इनमें इसकी सटीक लॉन्च डेट, मिनिमम RAM और प्रोसेसर, डाउनलोड साइज, सपोर्टेड डिवाइस और ये BGMI से गेमप्ले में कितना अंतर होगा, इन सभी चीजों की जानकारी आना अभी बाकी है.
BGMI पहले ही बना चुका है बड़ा रिकॉर्ड
Krafton India के अनुसार, BGMI भारत में 260 मिलियन से ज्यादा डाउनलोड का आंकड़ा पार कर चुका है. ऐसे में Lite वर्जन कंपनी के लिए नए यूजर्स तक पहुंच बनाने का एक अहम जरिया बन सकता है. आपको बता दें कि अगर ये गेम बजट फोन में आसानी से चल सकता है और गेमर्स को बेहतरीन परफॉर्मेंस देने में सक्षम हुआ तो ये निश्चित है कि नए गेमर्स भी कंपनी के इस नए वर्जन से कनेक्ट हो जाएंगे.
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        <pubDate>Tue, 18 Aug 2026 15:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>अब आ गया AI टूथब्रश, दांतों की सफाई के साथ हेल्थ रिपोर्ट भी देगा</title>
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        <description><![CDATA[ आज के डिजिटल दौर में स्मार्टफोन और स्मार्टवॉच के बाद अब हमारे घरों के वॉशरूम में भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की एंट्री हो चुकी है. अगर आप अब तक साधारण टूथब्रश या नॉर्मल इलेक्ट्रिक ब्रश से दांत साफ करते आ रहे हैं, तो अब संभल जाइए. क्योंकि अब बाजार में ऐसे एआई पावर्ड स्मार्ट टूथब्रश आ चुके हैं, जो न सिर्फ आपके दांतों को चमकाएंगे, बल्कि एक पर्सनल डेंटिस्ट की तरह आपके पूरे मुंह की सेहत की लाइव रिपोर्ट भी तैयार करेंगे.&amp;nbsp;
ग्लोबल ब्रांड्स जैसे Philips Sonicare और Oral-B iO Series ने बाजार में ऑन-डिवाइस एआई और सेंसर्स से लैस ब्रश उतारे हैं. यह तकनीक तेजी से लोकप्रिय हो रही है और हेल्थ टेक इंडस्ट्री में इसे एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है.
कैसे काम करता है AI टूथब्रश?
एआई टूथब्रश दिखने में आम इलेक्ट्रिक ब्रश जैसा ही होता है, लेकिन इसके अंदर का मैकेनिज्म बेहद एडवांस है. इसमें लगे स्पेशल सेंसर यह भांप लेते हैं कि ब्रश मुंह के किस हिस्से में घूम रहा है. इसके अलावा यह ब्रश ब्लूटूथ के जरिए आपके मोबाइल फोन में मौजूद ऐप से कनेक्ट हो जाता है. और ब्रश करते समय आपके फोन की स्क्रीन पर 3D नक्शा दिखता है. यह बताता है कि दांत का कौन सा हिस्सा साफ हो गया है और कहां गंदगी छूटी हुई है.&amp;nbsp;
हेल्थ रिपोर्ट में क्या-क्या पता चलता है?
यह ब्रश केवल सफाई नहीं करता, बल्कि आपकी दैनिक आदतों का पूरा डेटा इकट्ठा करता है. जैसे की यह जानकारी देता है कि क्या ब्रश करते समय मसूड़ों पर ज्यादा दबाव तो नहीं पड़ रहा है. साथ ही अगर आप दांतों पर ज्यादा जोर से ब्रश रगड़ते हैं, तो इसमें लगी लाइट लाल हो जाती है या ब्रश की स्पीड अपने आप कम हो जाती है, ताकि मसूड़ों को नुकसान न पहुंचे. इसका ऐप आपके ब्रश करने के तरीके को एनालाइज करके एक स्कोरशीट देता है, जिसे आप अपने डॉक्टर को भी दिखा सकते हैं.&amp;nbsp;
आम लोगों के लिए कितना फायदेमंद?
अक्सर लोग सुबह काम पर जाने की जल्दबाजी में ठीक से ब्रश नहीं करते, जिससे पायरिया, कैविटी या मसूड़ों से खून आने जैसी समस्याएं होने लगती हैं. एआई टूथब्रश उन जगहों को भी साफ करने में मदद करता है जहां हमारा हाथ सामान्य रूप से नहीं पहुंच पाता. खासकर बच्चों और बुजुर्गों के लिए यह टूथब्रश बहुत उपयोगी साबित हो रहा है, क्योंकि यह उन्हें सही तरीके से ब्रश करना सिखाता है.&amp;nbsp;
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कितनी कीमत है AI टूथब्रश की?
भारत में अच्छे ब्रांड्स के एआई टूथब्रश की शुरुआती कीमत लगभग 7,000 से शुरू होकर 25,000 रुपये तक जाती है. इसके अलावा, समय-समय पर इसके ब्रश हेड को बदलना पड़ता है, जिसका खर्च अलग से होता है. हालांकि, डॉक्टरों का मानना है कि डेंटिस्ट के महंगे इलाज और सर्जरी के खर्च से बचने के लिए यह एक अच्छा और समझदारी भरा वन-टाइम इन्वेस्टमेंट हो सकता है.
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        <pubDate>Tue, 18 Aug 2026 15:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>Washing Machine में कौन सा मोड खाता है सबसे ज्यादा बिजली?</title>
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        <description><![CDATA[ Washing Machine: वॉशिंग मशीन आज लगभग हर घर की जरूरत बन चुकी है. ये मशीन लोगों के कपड़े धोने के काम को आसान बनाने का काम करती है. लेकिन एडवांस टेक्नोलॉजी के साथ अब वॉशिंग मशीन में लोगों को कई सारे मोड भी मिलने लगे हैं जिन्हें लोग अपनी जरूरत के अनुसार इस्तेमाल कर सकते हैं. लेकिन क्या आपको पता है कि हर मोड अलग-अलग बिजली खपत करता है. आइए जानते हैं कि वॉशिंग मशीन में कौन सा मोड सबसे ज्यादा बिजली खपत करता है.
कौन सा मोड खाता है सबसे ज्यादा बिजली?
दरअसल, ज्यादातर एडवांस वॉशिंग मशीन में Hot Wash या पानी गर्म करके कपड़े धोने वाला मोड मिलता है जो नॉर्मली सबसे ज्यादा बिजली खर्च करता है. इसकी वजह मोटर नहीं, बल्कि मशीन का हीटिंग एलिमेंट होता है. बता दें कि पानी को गर्म करने के लिए काफी बिजली की जरूरत होती है.
अगर मशीन में आपने 40&amp;deg;C, 60&amp;deg;C या उससे ज्यादा टेंपरेचर का ऑप्शन चुना है तो बिजली की खपत नॉर्मल मोड के मुकाबले काफी ज्यादा होती है. खासतौर पर 60&amp;deg;C या 90&amp;deg;C जैसे हाई-टेम्परेचर मोड लंबे समय तक चलने पर बहुत ज्यादा बिजली इस्तेमाल करते हैं.
क्या Heavy या Intensive Mode भी ज्यादा बिजली लेता है?
जी हां, वॉशिंग मशीन में Heavy, Intensive या Cotton जैसे लंबे वॉश साइकल भी नॉर्मल मोड के मुकाबले ज्यादा बिजली की खपत करते हैं. हालांकि, इनमें बिजली की खपत सिर्फ मोड के चयन पर निर्भर नहीं करता है बल्कि इस मोड में मशीन कितनी देर चलती है, पानी कितनी बार गर्म होता है और मशीन कितनी स्पीड से काम करती है, इन सभी चीजों का भी बिजली खपत पर असर पड़ता है. अगर Heavy Mode में गर्म पानी का इस्तेमाल हो रहा है तो ज्यादा बिजली का इस्तेमाल होता है.
Quick Wash में कितनी बिजली लगती है?
आपको बता दें कि वॉशिंग मशीन में Quick Wash मोड भी दिया जाता है जो नॉर्मली कम समय में कपड़े धोने के लिए तैयार किया जाता है. इसलिए ये लंबे वॉश साइकल के मुकाबले में कम बिजली खर्च करता है.
ऐसे में अगर कपड़े बहुत ज्यादा गंदे नहीं हैं और कम कपड़े हैं तो Quick Wash लोगों के लिए ज्यादा बेहतर ऑप्शन माना जाता है. लेकिन ज्यादा कपड़ों या ज्यादा गंदे कपड़ों के लिए इसे बार-बार चलाने पर बिजली की खपत बढ़ जाती है.
बिजली बचाने के लिए अपनाएं ये तरीके
कपड़े धोते समय जहां संभव हो तो Cold Wash का इस्तेमाल करना चाहिए. मशीन को बार-बार आधे लोड पर चलाने के बजाय उसके पावर के अनुसार कपड़े धोएं. बहुत ज्यादा गंदे न होने वाले कपड़ों के लिए Heavy Mode का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. साथ ही बिना जरूरत के हाई-टेम्परेचर वॉश का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए.
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        <pubDate>Tue, 18 Aug 2026 15:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>Google पर कुछ भी Search करने से पहले जान लें ये Privacy Risk</title>
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        <description><![CDATA[ Google Search: गूगल दुनिया का सबसे बड़ा सर्च इंजन माना जाता है. लोगों को कुछ भी पूछना होता है तो सीधे गूगल का इस्तेमाल करते हैं. खाने की रेसिपी से लेकर मेडिकल जानकारी, बैंकिंग और शॉपिंग तक, लोग हर तरह की जानकारी के लिए Google Search का इस्तेमाल करते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं गूगल सर्च से जुड़े कुछ रिस्क भी होते हैं जिसके बारे में ज्यादातर लोगों को नहीं पता होता है. आइए जानते हैं कि आपको किन चीजों का ध्यान रखना चाहिए.
Search History होती है सेव
आपको बता दें कि Google आपकी Search Activity को आपके अकाउंट की सेटिंग्स के आधार पर सेव करता है. आपने क्या Search किया, किन वेबसाइट्स पर गए और किन चीजों में इंट्रेस्ट दिखाया, इन सभी चीजों की जानकारी आपकी ऑनलाइन एक्टिविटी की तस्वीर बनाने में मदद करती है.
अगर आपका Google Account कई डिवाइस में लॉग-इन है तो आपकी Activity दूसरे डिवाइस पर भी दिखाई देती है. इसलिए प्राइवेट जानकारी Search करते समय सावधानी बरतना जरूरी होता है.
Search से सामने आ सकती है आपकी पर्सनल पसंद
इसके साथ ही आप Google पर जो चीजें Search करते हैं, उनसे आपकी पसंद और जरूरतों के बारे में जानकारी मिल जाती है. जैसे अगर कोई व्यक्ति लगातार किसी खास बीमारी, नौकरी, प्रोडक्ट या ट्रैवल से जुड़ी जानकारी Search करता है तो उसकी Search Activity उसके बारे में कई चीजें बता सकती है. इसी तरह बार-बार किए गए Searches से आपकी पसंद और ऑनलाइन एक्टिविटी की पूरी एक प्रोफाइल तैयार हो जाती है.
Incognito Mode पूरी Privacy नहीं देता
इसके अलावा कई लोगों का मानना है कि Incognito Mode इस्तेमाल करने से उनकी Search पूरी तरह Private हो जाती है. लेकिन ऐसा नहीं है. दरअसल, Incognito Mode आपको आपके डिवाइस पर Browsing History और कुछ लोकल डेटा सेव होने से रोकने में मदद करता है.
इसीलिए इसका मतलब ये नहीं होता है कि इंटरनेट पर आपकी पहचान पूरी तरह छिपी रहती है. वेबसाइट्स, नेटवर्क एडमिनिस्ट्रेटर या इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर इंटरनेट पर आपके द्वारी की जाने वाली सभी एक्टिविटी की जानकारी इकट्ठा करता है.
Sensitive जानकारी Search करने से बचें
इसीलिए एक्सपर्ट्स सलाह देते हैं कि गूगल पर अपना पासवर्ड, OTP, बैंक अकाउंट डिटेल, कार्ड नंबर, Aadhaar जैसी जरूरी जानकारी को सर्च या कहीं भी फिल करने से बचना चाहिए. इसके साथ ही किसी पर्सनल समस्या से जुड़ी जानकारी Search करते समय भी ये ध्यान रखें कि Search Query खुद आपकी पर्सनल जानकारी का हिस्सा बन सकती है.
Privacy बढ़ाने के लिए क्या करें?
Google Account की Web &amp;amp; App Activity और My Activity जैसी Privacy Settings को समय-समय पर जरूर चेक करें. जरूरत न होने पर Activity Saving को बंद भी किया जा सकता है और पुराने Search Data को भी हटाया जा सकता है. इसके अलावा, किसी दूसरे व्यक्ति के डिवाइस पर अपना Google Account लॉग-इन करने से बचना चाहिए.
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        <pubDate>Tue, 18 Aug 2026 15:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>iPhone के साथ अगले महीने इतने सारे प्रोडकट्स हो सकते हैं लॉन्च! देखें लिस्ट</title>
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        <description><![CDATA[ iPhone के साथ अगले महीने इतने सारे प्रोडकट्स हो सकते हैं लॉन्च! देखें लिस्ट ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 18 Aug 2026 15:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>क्यों अचानक बढ़ गई RAM की कीमतें? जानें महंगी मेमोरी का कारण</title>
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        <description><![CDATA[ What is RAM: पिछले कुछ समय से स्मार्टफोन की कीमतों में काफी इजाफा देखने को मिला है. अब ज्यादा रैम वाले फोन महंगे हो चुके हैं. इतना ही नहीं, मार्केट में बजट फोन स्मार्टफोन अब ज्यादातर ऑउट ऑफ स्टॉक चल रहे हैं. बता दें कि महंगे स्मार्टफोन के पीछे रैम या मेमोरी चिप की बढ़ती कॉस्ट को बताया गया है.
स्मार्टफोन बनाने वाली कंपनियों के अनुसार, महंगे मेमोरि चिप और दूसरे पार्ट्स की कमी के चलते स्मार्टफोन की कीमतों में इजाफा करना पड़ा है और अब कम कीमत वाले फोन पर कंपनियों को मुनाफा निकालना भी मुश्किल हो रहा है. लेकिन अब सवाल उठता है कि आखिर अचानक से कैसे रैम की कीमतें बढ़ गई हैं. आइए जानते हैं क्या है पूरा मामला.
क्या होता है RAM
दरअसल, RAM यानी Random Access Memory कंप्यूटर और स्मार्टफोन का एक बेहद जरूरी पार्ट माना जाता है. ये डिवाइस के प्रोसेसर को उस डेटा और फाइलों तक तेजी से पहुंचने में मदद करता है जिनकी उसे काम करते समय जरूरत पड़ती है. दरअसल, आपके स्टोरेज ड्राइव डेटा को लंबे समय तक सुरक्षित रखती है जबकि RAM उस डेटा को कुछ समय के लिए अपने पास रखती है ताकि CPU उस डेटा का तेजी से इस्तेमालल कर सके. इसी वजह से ज्यादा RAM होने पर एक साथ कई ऐप्स और प्रोग्राम चलाना काफी आसान हो जाता है.
RAM की कीमतों में कितना उछाल आया?
जानकारी के अनुसार, RAM की कीमतों में हाल के समय में जबरदस्त तेजी देखने को मिली है. बाजार के आंकड़ों के मुताबिक, 32GB DDR5-4800 मेमोरी किट की कीमत पहले 100 डॉलर से कम हुआ करती थी लेकिन अब ये कई गुना बढ़ चुकी है. ऐसे में कंप्यूटर इस्तेमाल करने वालों के लिए अब रैम खरीदना काफी महंगा हो चुका है.
क्या है RAM महंगी होने की वजह
आपको बता दें कि पिछले कुछ वर्षों में Artificial Intelligence के लिए बड़े पैमाने पर डेटा सेंटर और कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जा रहा है. AI मॉडल को ट्रेन करने और चलाने के लिए हजारों-लाखों हाई-परफॉर्मेंस GPU और मेमोरी की जरूरत होती है.
ऐसे में AI कंपनियां भारी निवेश के दम पर बड़े पैमाने पर कंप्यूटिंग हार्डवेयर खरीद रही हैं. इससे मेमोरी बनाने वाली कंपनियों की प्रोडक्टिविटी पावर का बड़ा हिस्सा डेटा सेंटर और AI से जुड़े ऑर्डरों की तरफ जा रहा है. इसी वजह से कंप्यूटर और स्मार्टफोन के लिए मेमोरी चिप तैयार नहीं हो पा रही हैं और इन डिवाइसों की कीमतों में इजाफा देखने को मिल रहा है.
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि दुनिया में ज्यादातर RAM को Samsung, SK Hynix और Micron जैसी कंपनियां तैयार करती हैं. ये कंपनियां अरबों डॉलर की लागत वाली फैक्ट्रियों में बेहद मुश्किल सेमीकंडक्टर टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके मेमोरी चिप तैयार करती हैं.
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        <pubDate>Tue, 18 Aug 2026 07:30:13 +0530</pubDate>
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        <title>अगर मिले ये संकेत तो, समझ जाएं लीक हो गया आपका मोबाइल नंबर!</title>
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        <description><![CDATA[ How Mobile Number Leaks: टेक्नोलॉजी की दुनिया में लोग अब ज्यादातर स्मार्ट डिवाइस का इस्तेमाल कर रहे हैं. इसमें स्मार्टफोन अब एक जरूरी डिवाइस बन चुका है जिसके बिना लोग अब एक कदम भी नहीं बढ़ सकते हैं. इसी कड़ी में बता दें कि डिजिटल दौर में फोन नंबर अब सिर्फ कॉल करने का जरिया नहीं रह गया है. सोशल मीडिया अकाउंट, बैंकिंग, ऑनलाइन शॉपिंग, ऐप्स और कई तरह की डिजिटल सर्विसेज में भी मोबाइल नंबर का इस्तेमाल होता है.
इसी वजह से अब मोबाइल नंबर लीक होने के मामले भी काफी बढ़ चुके हैं. अब अगर आपको भी ये संकेत मिलते हैं तो समझ जाएं कि मोबाइल नंबर लीक हो चुका है. आइए जानते हैं कि इससे कैसे बचा जाए.
मोबाइल नेटवर्क कंपनी के पास मौजूद होती है जानकारी
दरअसल, जब आप किसी टेलीकॉम कंपनी की सर्विस लेते हैं तो कंपनी के पास आपका नाम, मोबाइल नंबर और अकाउंट से जुड़ी कई सारी जानकारियां मौजूद होती हैं. कंपनी अपने नियमों के अनुसार इस डेटा का इस्तेमाल सर्विस और मार्केटिंग के लिए करती है.
कई बार कंपनियों के अलग-अलग डिपॉर्टमेंट्स के बीच भी कुछ जानकारी शेयर की जाती हैं. इसलिए मोबाइल कनेक्शन लेते समय प्राइवेसी पॉलिसी और डेटा-शेयरिंग ऑप्शन को अच्छे से पढ़ना जरूरी हो चुका है.
ऑनलाइन फॉर्म और रजिस्ट्रेशन भी वजह बन सकते हैं
आपको बताते चलें कि ऑनलाइन शॉपिंग, वेबसाइट रजिस्ट्रेशन, सर्वे और अलग-अलग सर्विसेज में आज मोबाइल नंबर देना अनिवार्य हो चुका है. ऐसे में हर जगह नंबर दर्ज करने से उसकी डिजिटल मौजूदगी बढ़ती जाती है.
अब ऐसे में अगर किसी वेबसाइट का डेटा लीक हो जाए या कंपनी की डेटा-हैंडलिंग नियम ज्यादा मजबूत नहीं हो तो आपका नंबर अनजान लोगों तक पहुंच सकता है. इसके बाद स्पैम कॉल और फर्जी मैसेज भी आने शुरू हो सकते हैं.
कई ऐप्स मांगते हैं परमिशन
दरअसल, आपने कभी किसी ऐप को इंस्टॉल करते समय Contacts की परमिशन जरूर देखी होगी. सोशल मीडिया, कॉलिंग और मैसेजिंग जैसे कई ऐप्स कॉन्टैक्ट एक्सेस मांगते हैं. अगर आप ये परमिशन दे देते हैं तो ऐप आपकी कॉन्टैक्ट लिस्ट में मौजूद नंबरों को एक्सेस कर सकता है. इसका मतलब साफ है कि आपका नंबर किसी दूसरे व्यक्ति की कॉन्टैक्ट लिस्ट के जरिए किसी ऐप के सिस्टम तक आसानी से पहुंच सकता है. इसलिए हर ऐप को कॉन्टैक्ट परमिशन देने से पहले चेक करना चाहिए कि उसे इसकी असल में जरूरत है या नहीं.
टेलीकॉम कंपनी का डेटा हैक हो सकता है
आपको बता दें कि बड़ी से बड़ी मोबाइल कंपनी भी साइबर हमले से पूरी तरह सुरक्षित नहीं रहती हैं. अगर किसी कंपनी के सिस्टम में सेंध लगती है या कोई साइबर हमला होता है तो हैकर्स यूजर्स की पर्सनल जानकारी तक पहुंच सकते हैं.
ऐसे डेटा ब्रीच में मोबाइल नंबर के साथ नाम, पता या अकाउंट से जुड़ी जरूरी जानकारी भी लीक होने का खतरा बना रहता है. इसके साथ ही जब तक आपको सूचना मिलती है तब तक आपका जरूरी डेटा हैकर्स के हाथ लग चुका होता है.
कैसे रखें मोबाइल नंबर सुरक्षित?
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अगर आप भी अपना मोबाइल नंबर पूरी तरह से सुरक्षित रखना चाहते हैं तो सबसे पहले अपने मोबाइल ऑपरेटर के अकाउंट में जाकर Privacy और Data Sharing से जुड़ी सेटिंग्स जरूर चेक करें. जहां संभव हो, अनावश्यक डेटा शेयरिंग और मार्केटिंग ऑप्शनों को बंद कर दें.
इसके अलावा फोन में इंस्टॉल ऐप्स की परमिशन को समय-समय पर चेक करते रहें. जिस ऐप को कॉन्टैक्ट एक्सेस की जरूरत नहीं है, उसकी परमिशन तुरंत हटा दें. ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन के लिए जरूरत पड़ने पर अलग या वर्चुअल नंबर का इस्तेमाल करना ज्यादा सुरक्षित ऑप्शन माना जाता है.
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        <pubDate>Tue, 18 Aug 2026 07:30:11 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>बिना स्क्रीन प्रोटेक्टर के कैसे रखें फोन की डिस्प्ले सुरक्षित? जानें तरीका</title>
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        <description><![CDATA[ Tech Tips: आजकल स्मार्टफोन का क्रेज काफी तेजी से लोगों में बढ़ रहा है. बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक के हाथों में आज फोन पहुंच चुका है जिसका लोग अपनी जरूरत के अनुसार इस्तेमाल कर रहे हैं. अब स्मार्टफोन खरीदने के साथ ही लोग उसकी स्क्रीन के लिए स्क्रीन प्रोटेक्टर खरीदते हैं जिससे डिस्प्ले सेफ रहती है. लेकिन आज हम आपको ऐसे तरीकों के बारे में बताने जा रहे हैं जिसकी मदद से आप बिना स्क्रीन प्रोटेक्टर के भी फोन की डिस्प्ले को सुरक्षित रख सकते हैं.
जेब में न रखें हार्ड चीज
फोन की स्क्रीन पर खरोंच ज्यादातर जेब में रखी चीजों की वजह से आता है. चाबी, सिक्के या कोई भी छोटी चीजें स्क्रीन पर रगड़ खाती हैं. इसलिए कोशिश करें कि फोन को जेब में रखने से पहले जेब को खाली कर दें. खासकर ऐसी जेब में फोन न रखें जिसमें पहले से चाबियां या दूसरे सामान मौजूद न हों.
कई लोग फोन को टेबल पर स्क्रीन की तरफ से रख देते हैं. अगर टेबल पर धूल, रेत के कण या कोई बारीक गंदगी मौजूद है तो फोन रखने और उठाने के दौरान स्क्रीन पर माइक्रो-स्क्रैच पड़ सकते हैं. फोन को हमेशा पीछे की तरफ से रखना चाहिए.
सावधानी से करें फोन का इस्तेमाल
इसके अलावा रेत के बेहद छोटे पार्टिकल्स भी स्क्रीन को नुकसान पहुंचाने का काम करते हैं. समुद्र किनारे, या धूल वाली जगहों पर फोन इस्तेमाल करते समय खास सावधानी बरतनी चाहिए. फोन को साफ करने से पहले स्क्रीन पर जमी धूल को धीरे से हटाना चाहिए. बिना साफ किए कपड़े से जोर-जोर से रगड़ने पर छोटे पार्टिकल्स स्क्रीन पर निशान छोड़ सकते हैं.
साफ करते समय रखें सावधानी
स्क्रीन साफ करने के लिए टिश्यू, पेपर या खुरदरे कपड़े की जगह माइक्रोफाइबर कपड़ा बेहतर ऑप्शन होता है. ये स्क्रीन पर मौजूद धूल और उंगलियों के निशान को काफी हद तक अच्छे से साफ कर देता है. साथ ही फोन के डिस्प्ले को साफ करते समय स्क्रीन पर ज्यादा दवाब नहीं डालना चाहिए.
अगर फोन बैग या पर्स में रखते हैं तो उसे अन्य सामान के साथ खुला न छोड़ें. चार्जर, पेन, चाबी या दूसरी चीजें स्क्रीन से रगड़ खा सकती हैं. फोन को अलग पॉकेट में रखें और कोशिश करें कि डिस्प्ले सीधे किसी हार्ड चीज के कॉन्टेक्ट में न आए.
फोन के लिए चुनें बढ़िया कवर
इसके साथ ही स्मार्टफोन के लिए ऐसा कवर चुनें जिसके किनारे स्क्रीन से थोड़े ऊपर उठे हुए हों. फोन गलती से स्क्रीन की तरफ गिरने पर ये किनारे सीधे डिस्प्ले के जमीन से टकराने की संभावना को काफी हद तक कम कर देते हैं.
स्क्रीन प्रोटेक्टर के बिना फोन की डिस्प्ले को पूरी संभव नहीं होता है. हालांकि, फोन को चाबी-सिक्कों से दूर रखना, धूल से बचाना, सही तरीके से साफ करना और अच्छे कवर का इस्तेमाल करना स्क्रीन पर खरोंच आने से काफी हद तक रोक सकता है.
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        <pubDate>Tue, 18 Aug 2026 07:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>CERT&amp;In ने इन यूजर्स के लिए जारी कर दी चेतावनी! जानें खतरा</title>
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        <title>iPhone का ये फीचर बचा सकता है जान! जानें कैसे करें सेट</title>
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        <pubDate>Tue, 18 Aug 2026 07:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>Foldable फोन में क्यों नहीं पड़ती स्क्रीन प्रोटेक्टर की जरूरत? जानें सच्चाई</title>
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        <description><![CDATA[ Foldable Phone: मार्केट में आज कई सारे स्मार्टफोन मौजूद हैं जिन्हें लोग काफी पसंद भी करते हैं. बजट फोन के साथ-साथ अब प्रीमियम स्मार्टफोन की डिमांड भी काफी बढ़ी है. इसी कड़ी में बता दें कि लोग अब फोल्डेबल स्मार्टफोन भी काफी इस्तेमाल कर रहे हैं. लेकिन अक्सर देखा गया है कि जब लोग नया स्मार्टफोन खरीदते हैं तो डिवाइस के लिए नया स्क्रीन प्रोटेक्टर भी खरीदते हैं. हालांकि, फोल्डेबल फोन में ऐसा नहीं होता है. आइए जानते हैं कि फोल्डेबल फोन में स्क्रीन प्रोटेक्टर की जरूरत क्यों नहीं पड़ती है.
नॉर्मल फोन से अलग होती है&amp;nbsp;फोल्डेबल फोन की स्क्रीन
आपको बता दें कि पुराने स्मार्टफोन में आमतौर पर एक हार्ड ग्लास पैनल का इस्तेमाल किया जाता है. इसकी वजह से स्क्रीन पर टेंपर्ड ग्लास या दूसरे तरह का प्रोटेक्टर आसानी से लगाया जा सकता है. वहीं, फोल्डेबल फोन की अंदर वाली स्क्रीन को बार-बार मोड़ना और खोलना पड़ता है, इसलिए यहां बेहद फ्लेक्सिबल स्क्रीन टेक्नोलॉजी की जरूरत होती है.
इस तरह की स्क्रीन में कई पतली लेयर होती हैं. इनमें डिस्प्ले के अलावा टच लेयर, प्रोटेक्टिव फिल्म और दूसरे कंपोनेंट भी शामिल होते हैं. यही वजह है कि इसकी सर्फेस नॉर्मल फोन की स्क्रीन जैसी कठोर नहीं होती है.
कंपनी की लगाई फिल्म को क्यों नहीं हटाना चाहिए?
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि कई फोल्डेबल स्मार्टफोन में कंपनी पहले से ही स्क्रीन पर एक खास प्रोटेक्टिव फिल्म लगाकर देते हैं. ये फिल्म सिर्फ स्क्रीन को खरोंच से बचाने के लिए नहीं होती बल्कि फोल्डिंग डिस्प्ले के स्ट्रक्चर का हिस्सा भी होती है.
अगर यूजर इसे खुद से निकाल देता है और बाजार से खरीदा हुआ प्रोटेक्टर लगाने की कोशिश करता है तो स्क्रीन की टच परफॉर्मेंस और फोल्डिंग मैकेनिज्म पर असर पड़ सकता है. कई बार फिल्म के किनारों से उठने, बुलबुले बनने या स्क्रीन की सर्फेस खराब होने जैसी समस्या भी देखने को मिल सकती है.
क्या स्क्रीन को कोई नुकसान नहीं होगा?
ऐसा बिल्कुल नहीं है. फोल्डेबल फोन की स्क्रीन पर प्रोटेक्टिव फिल्म लगा होने का ये मतलब नहीं होता है कि फोन किसी भी तरह के नुकसान से सुरक्षित रह सकता है. अंदर की स्क्रीन पर नुकीली चीज से दबाव पड़ने, ज्यादा दबाव डालने या चाबी जैसी चीज से खरोंच लगने का खतरा अभी भी रहता है. इसके अलावा, स्क्रीन के फोल्ड होने वाले हिस्से पर बार-बार ज्यादा दबाव डालना भी स्क्रीन को नुकसान पहुंचा सकता है.
इसलिए फोल्डेबल फोन इस्तेमाल करते समय स्क्रीन को लेकर नॉर्मल स्मार्टफोन के मुकाबले में ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए.
क्या बाहर वाली स्क्रीन पर प्रोटेक्टर लगाया जा सकता है?
आपको बताते चलें कि फोल्डेबल स्मार्टफोन में अक्सर दो स्क्रीन देखने को मिल जाती है. ऐसे में बाहरी कवर स्क्रीन अक्सर नॉर्मल स्मार्टफोन की तरह ही हार्ड ग्लास से बनी होती है. इसलिए अगर स्मार्टफोन बनाने वाली कंपनी इसकी परमिशन देता है तो बाहरी स्क्रीन पर स्क्रीन प्रोटेक्टर लगाया जा सकता है.
इसके साथ ही फोल्डेबल स्क्रीन को सही तरीके से कवर करना नॉर्मल फोन के मुकाबले में काफी मुश्किल होता है. गलत साइज या गलत तरीके से लगाया गया प्रोटेक्टर स्क्रीन पर एक्सट्रा दबाव डालता है. सबसे बड़ी समस्या ये है कि फोल्डेबल डिस्प्ले बार-बार मुड़ती है. अगर प्रोटेक्टर उस मूवमेंट के लिए डिजाइन नहीं किया गया है तो वह जल्दी खराब हो सकता है या स्क्रीन के सर्फेस पर दबाव डाल सकता है.
इसीलिए कई स्मार्टफोन बनाने वाली कंपनी यूजर्स को सलाह देती हैं कि अंदर की स्क्रीन के प्रोटेक्टिव फिल्म को खुद से न हटाएं और न ही उस पर कोई दूसरा प्रोटेक्टर का इस्तेमाल करें.
कैसे रखें स्क्रीन को सुरक्षित?
अगर आप भी अपने फोल्डेबल फोन की स्क्रीन को सुरक्षित रखना चाहते हैं तो कुछ जरूरी सावधानियां आपके लिए फायदेमंद साबित हो सकती हैं. फोन को जेब या बैग में चाबी, सिक्के और दूसरी नुकीली चीजों के साथ न रखें. स्क्रीन को उंगली या किसी ठोस चीज से जोर से दबाने से बचें.
फोन बंद करते समय भी ये चेक करें कि दोनों हिस्सों के बीच कोई धूल, कागज या दूसरी चीज फंसी न हो. अगर स्क्रीन की प्रोटेक्टिव फिल्म खराब हो गई है या किनारे से निकलने लगी है तो उसे खुद से हटाने के बजाय रजिस्टर्ड सर्विस सेंटर से बदलवाना बेहतर होता है.
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        <pubDate>Mon, 17 Aug 2026 11:30:13 +0530</pubDate>
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        <title>कब खरीदना चाहिए नया स्मार्टफोन, क्या आप जानते हैं ये नियम?</title>
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        <description><![CDATA[ New Smartphone: बच्चों की पढ़ाई से लेकर बुजुर्गों के मनोरंजन तक, आज स्मार्टफोन का इस्तेमाल कई तरह से किया जा रहा है. इस डिवाइस ने लोगों के जीवन जीने के तरीके को भी बदल दिया है. ऐसे में अक्सर देखा गया है कि पुराने स्मार्टफोन बदलने पर लोग नया फोन खरीद लेते हैं. लेकिन ज्यादातर लोग नए फोन खरीदते समय ये गलती कर देते हैं. इसी कड़ी में आज हम आपको एक ऐसे नियम के बारे में बताने जा रहे हैं जो नया फोन खरीदते समय आपके बड़े काम आ सकता है.
बजट तय करना सबसे जरूरी
दरअसल, नया स्मार्टफोन खरीदने का सबसे पहला नियम है कि पहले अपना बजट तय करें. कई बार बड़े-बड़े डिस्काउंट ऑफर और महंगे फीचर्स देखकर लोग अपने बजट के बाहर जाकर महंगा फोन खरीद लेते हैं जो बाद में उनके लिए अक्सर सिरदर्द बन जाता है. ऐसे में बेहतर होगा कि फोन की कीमत के साथ-साथ कवर, स्क्रीन प्रोटेक्टर, चार्जर और दूसरे जरूरी एक्सेसरीज के खर्च को भी ध्यान में रखना चाहिए.
प्रोसेसर और RAM जरूर देखें
स्मार्टफोन की स्पीड और लंबे समय तक बेहतर परफॉर्मेंस के लिए प्रोसेसर डिवाइस का एक जरूरी हिस्सा होता है. लेकिन सिर्फ ज्यादा RAM देखकर फोन चुनना भी एक बड़ी गलती साबित हो सकती है. 8GB या 12GB RAM के साथ-साथ ये भी चेक करना जरूरी होता है कि डिवाइस में कौन सा प्रोसेसर मौजूद है क्योंकि अंत में वहीं आपके डिवाइस के काम को स्मूथ बनाने का काम करता है.
बैटरी और चार्जिंग पर ध्यान दें
लंबा बैटरी बैकअप ज्यादातर लोगों को पसंद आता है. लेकिन सिर्फ बैटरी देखकर फोन खरीद लेना ही सही नहीं है. दरअसल, डिस्प्ले, प्रोसेसर, सॉफ्टवेयर और नेटवर्क कनेक्टिविटी भी बैटरी खपत को बढ़ाते हैं. ऐसे में फोन खरीदते समय बैटरी पावर के साथ चार्जिंग स्पीड और चार्जर बॉक्स मिलता है या नहीं, ये चेक करना भी बहुत जरूरी होता है.
सिर्फ कैमरा देखकर फोन न खरीदें
इसके साथ ही आज कल खासतौर पर युवा सिर्फ फोन के अच्छे कैमरा को देखकर नया स्मार्टफोन खरीद लेते हैं. लेकिन सिर्फ ज्यादा मेगापिक्सल देखकर फोन खरीदना सही नहीं माना जाता है. हालांकि, कैमरा सेंसर, इमेज प्रोसेसिंग, ऑप्टिकल स्टेबलाइजेशन और लो-लाइट परफॉर्मेंस भी फोन का एक अहम हिस्सा होता है. अगर आपको फोटोग्राफी की ज्यादा जरूरत नहीं है तो केवल कैमरे के लिए ज्यादा पैसे खर्च करना ठीक नहीं माना जाता है.
सॉफ्टवेयर अपडेट की जानकारी लें
इसके साथ ही फोन खरीदते समय ये जरूर पता करें कि कंपनी कितने साल तक Android अपडेट और सिक्योरिटी अपडेट डिवाइस में उपलब्ध कराने वाली है. लंबा सॉफ्टवेयर सपोर्ट फोन को ज्यादा समय तक सेफ रखने में मदद करता है. साथ ही सॉफ्टवेयर और सिक्योरिटी अपडेट में यूजर्स को कई सारे नए फीचर्स भी मिलते रहते हैं.
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        <pubDate>Mon, 17 Aug 2026 11:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>AI को कैसे ट्रेन किया जाता है? जानें क्या होता है प्रोसेस</title>
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        <description><![CDATA[ How AI is Trained: आज AI यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस हमारी डेली की जिंदगी का एक अहम हिस्सा बन चुका है. Chatbot से सवाल पूछने से लेकर फोटो पहचानने, लैंग्वेज समझने से लेकर कंटेंट बनाने तक, आज के समय में एआई लोगों के कई सारे काम चुटकियों में कर रहा है. लेकिन इसी के साथ ये सवाल भी कई बार आता है कि आखिर इन सब चीजों को करने के लिए एआई को ट्रेनिंग कैसे मिलती है. आइए जानते हैं क्या होता है इसका पूरा प्रोसेस.
सबसे पहले जुटाया जाता है डेटा
जानकारी के अनुसार, AI को ट्रेन करने के लिए सबसे पहले डेटा की जरूरत पड़ती है. इसीलिए सबसे पहले कंपनी डेटा इकट्ठा करती है. डेटा टेक्स्ट, फोटो, वीडियो, ऑडियो या किसी भी डिजिटल जानकारी के रूप में हो सकता है. जैसे अगर किसी AI मॉडल को फोटो में मौजूद चीजों की पहचान करना सिखाना है तो उसे बड़ी संख्या में अलग-अलग फोटोज उपलब्ध कराई जाती हैं.
इसके साथ ही डेटा जितना अलग-अलग होता है एआई को उतनी ही अच्छी ट्रेनिंग मिल पाती है. हालांकि, ट्रेनिंग से पहले डेटा की क्वालिटी और उसके इस्तेमाल से जुड़े अधिकारों को भी अच्छे से चेक किया जाता है.
डेटा की होती है सफाई
आपको बता दें कि इकट्ठा किया गया डेटा सीधे AI मॉडल को नहीं दिया जाता है. दरअसल, पहले डेटा को अच्छे से साफ किया जाता है यानी डेटा में मौजूद गलतियां, गलत फैक्ट या दूसरी चीजों को ठीक किया जाता है और इसके बाद ही एआई को डेटा उपलब्ध कराया जाता है.
कई मामलों में इंसान डेटा को लेबल भी करते हैं. जैसे किसी फोटो में बिल्ली है या कुत्ता, ये बताना है. इस प्रोसेस को डेटा लेबलिंग कहा जाता है और इससे AI को अलग-अलग चीजों के बीच अंतर समझने में मदद मिलती है.
AI मॉडल कैसे सीखता है?
डेटा की सफाई के बाद इसे मशीन लर्निंग मॉडल में डाला जाता है. मॉडल दिए गए उदाहरण में पैटर्न सर्च करने की कोशिश करता है. शुरुआत में एआई के रिजल्ट्स गलत होते हैं लेकिन एआई के हर गलती के बाद मॉडल के अंदर मौजूद पैरामीटर को थोड़ा बदला जाता है.
यही प्रोसेस बार-बार दोहराई जाती है. धीरे-धीरे मॉडल अपने जवाब को बेहतर बनाने लगता है. बता दें कि बड़े AI मॉडल में करोड़ों या अरबों पैरामीटर होते हैं जिन्हें ट्रेनिंग के दौरान लगातार एडजस्ट किया जाता है.
न्यूरल नेटवर्क की होती है अहम भूमिका
जानकारी के अनुसार, आज के कई एडवांस AI सिस्टम न्यूरल नेटवर्क पर बेस्ड हैं. इन्हें इंसानी दिमाग से प्रेरित कंप्यूटेशनल सिस्टम माना जाता है. इनमें कई लेयर होती हैं जो डेटा की अलग-अलग क्वालिटी को समझने में मदद करती हैं.
इसके अलावा आपको बता दें कि AI की ट्रेनिंग के लिए बहुत ज्यादा कंप्यूटिंग पावर की जरूरत पड़ती है. बड़े मॉडल को ट्रेन करने के लिए पावरफुल GPU या AI एक्सेलेरेटर का इस्तेमाल किया जाता है. इतना ही नहीं, इसके बाद मॉडल को बहुत बड़े डेटा पर कई बार चलाया जाता है, इसलिए एआई की ट्रेनिंग में काफी समय, एनर्जी और रिसोर्सेज का भी इस्तेमाल होता है.
ट्रेनिंग के बाद होती है टेस्टिंग
बताते चलें कि एआई मॉडल की ट्रेनिंग के बाद उसकी टेस्टिंग भी की जाती है. दरअसल, मॉडल को ऐसे डेटा पर टेस्ट किया जाता है जिसे उसने ट्रेनिंग के दौरान नहीं देखा होता है. इससे पता चलता है कि AI ने असल में पैटर्न को अच्छे से सीखा है या फिर सिर्फ पुराने डेटा को याद रखा है. अगर मॉडल बार-बार गलत जवाब देता है तो डेटा, मॉडल या ट्रेनिंग प्रोसेस में बदलाव करके उसे दोबारा टेस्ट किया जाता है.
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        <pubDate>Mon, 17 Aug 2026 11:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>HomePod Mini Update: सिरी एआई के साथ आ रहे Apple के नए होम प्रोडक्ट्स, जानें डिटेल्स</title>
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        <description><![CDATA[ HomePod Mini Update: एप्पल के होम प्रोडक्ट्स, खासतौर पर होमपॉड मिनी और एप्पल टीवी, पिछले कुछ साल से चर्चा का विषय बने हुए हैं. वजह साफ है इनके मौजूदा वर्जन 4 से 6 साल पुराने हो चुके हैं. अब तक सिरी की कमजोरी को ही इसकी वजह माना जाता रहा है, लेकिन अब जब सिरी एआई तैयार हो चुका है तो कंपनी जल्द ही कई नए होम प्रोडक्ट्स लॉन्च करने की तैयारी में है.
सबसे पहले आएंगे ये दो प्रोडक्ट्स
रिपोर्ट्स के मुताबिक, इसी सीजन में होमपॉड मिनी और एप्पल टीवी 4K का नया वर्जन लॉन्च हो सकता है. होमपॉड मिनी में S5 चिप की जगह नया S9 चिप, कुछ नए कलर ऑप्शन, नया वायरलेस चिप और बेहतर ऑडियो क्वालिटी मिल सकती है. हार्डवेयर के लिहाज से यह अपडेट मामूली रहेगा, लेकिन असली उम्मीद यही है कि इसमें सिरी एआई सपोर्ट मिलेगा, जिससे यह पहले से कहीं ज्यादा स्मार्ट असिस्टेंट बन जाएगा.
यह भी पढ़ें: मैक्सिमम कितने Watt तक का चार्जर सपोर्ट कर सकता है स्मार्टफोन?
एप्पल टीवी 4K को मिलेगी पावरफुल चिप
वहीं, एप्पल टीवी 4K में A15 Bionic की जगह A17 Pro चिप देखने को मिल सकती है. हालांकि, यह चिप भी अब तीन साल पुरानी हो चुकी है, इसलिए यह अपडेट कुछ हद तक पुराना ही महसूस होगा. फिर भी यह चिप अपग्रेड डिवाइस को सिरी एआई के लिए तैयार करेगी, जिससे कुछ एप्पल इन्टेलिजन्स फीचर्स सीधे डिवाइस पर ही चल सकेंगे. साथ ही, रिमोट के डिजाइन में भी बदलाव की खबर है. मौजूदा समय में होमपॉड मिनी की कीमत 129 डॉलर और एप्पल टीवी 4K की शुरुआती कीमत 199 डॉलर है, जो जून में हुई प्राइस हाइक के बाद तय हुई थी.
स्मार्ट होम हब पर भी चल रहा काम
एप्पल का पहला स्मार्ट होम हब भी काफी समय से डेवलपमेंट में है, जिसके दो वर्जन होंगे, एक सिर्फ स्क्रीन वाला जो मैग्नेटिक सिस्टम से दीवार पर लगेगा, और दूसरा स्पीकर बेस के साथ आएगा. यह प्रोडक्ट अक्टूबर से अगले साल की शुरुआत के बीच लॉन्च हो सकता है. इसमें 7 इंच स्क्वायर डिस्प्ले और homeOS नाम का नया ऑपरेटिंग सिस्टम मिलेगा, जिससे फैस टाइम कॉल करना, सिरी एआई से बातचीत और स्मार्ट होम डिवाइसेज को मैनेज करना आसान होगा. इसे कई लोग होमपॉड नाम से बुला रहे हैं, और इसमें A18 चिप मिलने की उम्मीद है. इसके अलावा फुल साइज होमपॉड के अपडेटेड वर्जन पर भी काम चल रहा है.
आगे क्या क्या आने वाला है?
2026 के आखिर या 2027 की शुरुआत के बाद एप्पल अपने पहले स्मार्ट होम एक्सेसरीज, यानी सिक्योरिटी कैमरा और स्मार्ट डोरबेल लॉन्च करने की तैयारी में है. इसके साथ ही स्मार्ट डिस्प्ले प्रोडक्ट का एडवांस वर्जन भी आ सकता है, जिसमें रोबोटिक आर्म और बड़ी 9 इंच स्क्रीन होगी, जिसे टेबलटॉप रोबोट जैसा बताया जा रहा है.
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        <pubDate>Mon, 17 Aug 2026 11:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>Cyber Attack होने पर सबसे पहले क्या करना चाहिए? जानें कैसे बचें</title>
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        <description><![CDATA[ Cyber Attack होने पर सबसे पहले क्या करना चाहिए? जानें कैसे बचें ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 16 Aug 2026 23:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>USB4 और USB&amp;C में क्या होता है फर्क? जानें कौन ज्यादा फास्ट</title>
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        <title>मैक्सिमम कितने Watt तक का चार्जर सपोर्ट कर सकता है स्मार्टफोन?</title>
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        <description><![CDATA[ Tech Tips: स्मार्टफोन ने पूरी दुनिया में लोगों की जिंदगी में अपनी एक अलग जगह बना ली है. अब ज्यादातर लोग अपने काम को स्मार्टफोन की मदद से करते हैं. लेकिन अक्सर देखा गया है कि स्मार्टफोन डिस्चार्ज होने पर किसी का फोन जल्दी चार्ज हो जाता है तो किसी का काफी समय लगाता है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि कई फोन के साथ फास्ट चार्जर दिए जाते हैं जो फोन को जल्दी चार्ज करने में सक्षम है. मार्केट में 33 वॉट, 67 वॉट और 100 वॉट जैसे फास्ट चार्जर मौजूद हैं. ऐसे में अब कई लोगों के मन में सवाल आता है कि आखिर स्मार्टफोन कितने वॉट तक का चार्जर सपोर्ट कर सकता है. आइए जानते हैं पूरी सच्चाई.
कितने Watt तक आते हैं स्मार्टफोन?
आपको बता दें कि आज के स्मार्टफोन में अलग-अलग चार्जिंग पावर देखने को मिलती है. बजट फोन में 10W से 25W तक की चार्जिंग नॉर्मल हो चुकी है जबकि मिड-रेंज और प्रीमियम फोन में 33W, 45W, 67W या 80W जैसी फास्ट चार्जिंग मिलती है.
कुछ खास स्मार्टफोन में अब 100W, 120W या उससे ज्यादा चार्जिंग का सपोर्ट भी देखने को मिलने लगा है. हालांकि, ये पावर हर फोन में नहीं होती है और ये पूरी तरह से कंपनी द्वारा इस्तेमाल की गई बैटरी, चार्जिंग सर्किट और थर्मल मैनेजमेंट पर निर्भर करती है.
फोन की चार्जिंग ताकत होती है तय
दरअसल, किसी भी स्मार्टफोन की मैक्सिमम चार्जिंग स्पीड उसके हार्डवेयर और चार्जिंग टेक्नोलॉजी पर निर्भर करती है. जैसे अगर फोन 33W फास्ट चार्जिंग को सपोर्ट करता है तो 67W या 100W का चार्जर लगाने पर भी फोन नॉर्मली अपनी तय सीमा के अनुसार ही पावर लेगा. इसका मतलब है कि चार्जर की ताकत ज्यादा होने का मतलब ये नहीं होता है कि फोन उतनी ही पावर खींचेगा. फोन और चार्जर के बीच प्रोटोकॉल के जरिए पावर की जरूरत तय होती है.
क्या किसी भी फोन में इस्तेमाल हो सकता है 100W चार्जर
अगर 100W चार्जर किसी भरोसेमंद कंपनी का है और फोन के साथ इस्तेमाल होने वाले चार्जिंग प्रोटोकॉल को सपोर्ट करता है तो ऐसे में आप इस चार्जर को कम चार्जिंग पावर वाले स्मार्टफोन के साथ भी इस्तेमाल कर सकते हैं. लेकिन ध्यान देने वाली बात ये है कि कभी भी लोकल फास्ट चार्जर का इस्तेमाल कम चार्जिंग पावर वाले फोन पर नहीं करना चाहिए. इससे फोन की बैटरी पूरी तरह से खराब हो सकती है.
ज्यादा Watt का चार्जर हमेशा तेज नहीं होता
आपको बताते चलें कि चार्जिंग स्पीड सिर्फ Watt पर निर्भर नहीं करती है. ये बैटरी की कंडिशन, टेंपरेचर, चार्जिंग प्रोटोकॉल, केबल की पावर और फोन का सॉफ्टवेयर पर भी निर्भर करती है. इसके अलावा फोन की बैटरी कम होने पर चार्जिंग ज्यादा तेज हो सकती है लेकिन बैटरी उतनी ही तेज चार्ज होगी जितना उसे पावर चाहिए होता है.
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        <pubDate>Sun, 16 Aug 2026 23:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>100mbps इंटरनेट स्पीड के बाद भी डाउनलोड क्यों होता है स्लो? जानें सच्चाई</title>
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        <description><![CDATA[ Internet Speed: आज के समय सिर्फ स्मार्टफोन ही नहीं बल्कि फास्ट इंटरनेट भी लोगों की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है. वीडियो स्ट्रीमिंग से लेकर बड़ी फाइलें डाउनलोड करने तक, ज्यादातर लोग बढ़िया इंटरनेट स्पीड के लिए 100Mbps या इससे ज्यादा का ब्रॉडबैंड प्लान लेते हैं. लेकिन अक्सर देखा गया है कि 100Mbps कनेक्शन होने के बावजूद डाउनलोडिंग स्पीड काफी स्लो रहती है. ऐसे में कई लोगों के मन में सवाल उठता है कि जब इंटरनेट स्पीड तेज है तो डाउनलोडिंग स्पीड क्यों स्लो हो जाती है. आइए जानते हैं इसके पीछे की सच्चाई.
100Mbps का क्या होता है मतलब
जानकारी के अनुसार, सबसे पहले बता दें कि Mbps और MB/s में अंतर होता है. इंटरनेट कंपनियां स्पीड को नॉर्मली Mbps यानी Megabits per second में बताती हैं जबकि डाउनलोडिंग के दौरान कई ऐप्स MB/s यानी Megabytes per second दिखाते हैं.
अब 1 Byte में 8 Bits होते हैं. इसलिए 100Mbps की मैक्सिमम डाउनलोड स्पीड करीब 12.5MB/s होती है. इसलिए 5-10MB/s की डाउनलोड स्पीड देखकर ये मान लेना सही नहीं होता है कि इंटरनेट कनेक्शन खराब है.
Wi-Fi की वजह से भी स्लो हो सकता है डाउनलोड
आपको बता दें कि अगर आप Wi-Fi के जरिए इंटरनेट इस्तेमाल कर रहे हैं तो राउटर की कंडिशन, दूरी और Wi-Fi बैंड भी स्पीड पर असर डाल सकते हैं. दीवारों या दूसरे इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसों के कारण भी सिग्नल कमजोर होने से स्पीड कम हो जाती है.
ऐसे में अगर संभव हो तो राउटर के पास जाकर डाउनलोड करें या 5GHz Wi-Fi नेटवर्क का इस्तेमाल करें. बड़ी फाइल डाउनलोड करने के लिए Ethernet केबल से कनेक्शन और भी स्टेबल ऑप्शन बन सकता है.
VPN और बैकग्राउंड ऐप्स भी जिम्मेदार
इतना ही नहीं, VPN इस्तेमाल करने पर इंटरनेट ट्रैफिक एक एक्सट्रा सर्वर से होकर गुजरता है. सर्वर की लोकेशन और उस पर लोड के आधार पर भी डाउनलोड स्पीड कम हो जाती है. इसी तरह क्लाउड सिंक, सिस्टम अपडेट, गेम अपडेट और दूसरे बैकग्राउंड डाउनलोड भी बैंडविड्थ का इस्तेमाल करते हैं जिससे स्पीड पर असर देखने को मिलता है.
सर्वर की स्पीड से भी पड़ता है असर
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि डाउनलोड स्पीड सिर्फ आपके इंटरनेट कनेक्शन पर निर्भर नहीं करती है. जिस वेबसाइट या सर्वर से फाइल डाउनलोड हो रही है, उसकी ताकत भी एक अहम भूमिका निभाती है.
अगर सर्वर एक साथ बहुत ज्यादा यूजर्स को फाइल भेज रहा है या उसने डाउनलोड स्पीड कम कर रखी है तो आपके पास 100Mbps कनेक्शन होने के बावजूद डाउनलोड स्लो रहता है. यही वजह है कि एक ही इंटरनेट कनेक्शन पर अलग-अलग वेबसाइटों से फाइल डाउनलोड करने पर अलग स्पीड देखने को मिल सकती है.
कैसे पता करें असली समस्या?
सबसे पहले इंटरनेट स्पीड टेस्ट करें और देखें कि कनेक्शन लगभग 100Mbps के आसपास स्पीड दे रहा है या नहीं. इसके बाद अलग-अलग वेबसाइटों से डाउनलोड करके कंपैरिजन करें. आप Wi-Fi की जगह टेस्ट के लिए Ethernet कनेक्शन का भी इस्तेमाल कर सकते हैं. इसलिए 100Mbps इंटरनेट होने के बावजूद स्लो डाउनलोड होना हमेशा इंटरनेट प्लान की गलती नहीं होती है.
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        <pubDate>Sun, 16 Aug 2026 23:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>घरों में क्यों लगाया जाता है MCB? जानें क्या होती है जरूरत</title>
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        <description><![CDATA[ MCB: आज के समय में टेक्नोलॉजी इतनी एडवांस हो चुकी है कि अब लोग किसी भी खतरे को पहले ही रोक सकते हैं. ऐसे में अक्सर देखा गया है कि नया घर बनवाते समय में जब वायरिंग होती है तो एमसीबी का इस्तेमाल जरूर किया जाता है. लेकिन ज्यादातर लोगों को आज भी नहीं पता है कि आखिर इसकी जरूरत क्यों पड़ी और ये काम क्या करता है. आइए समझते हैं कि घर में MCB लगाना क्यों सुरक्षित माना जाता है.
क्या होता है MCB
जानकारी के अनुसार, MCB (Miniature Circuit Breaker) बिजली सर्किट की सेफ्टी के लिए घरों में इस्तेमाल किया जाने वाला एक डिवाइस है. ये छोटा-सा डिवाइस बिजली के सिस्टम में किसी गड़बड़ी की कंडिशन में अपने आप सप्लाई बंद कर देता है. इससे वायरिंग, इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस और कई मामलों में घर को गंभीर नुकसान से बचाने में मदद भी करता है. दरअसल, इस डिवाइस को घर के इलेक्ट्रिकल डिस्ट्रीब्यूशन बोर्ड में लगाया जाता है. इसका काम बिजली के सर्किट में कोई भी एबनॉर्मल कंडिशन आने पर करंट की सप्लाई को अपने आप रोकना होता है.
ओवरलोड होने पर कैसे टल जाता है खतरा?
आपको बता दें कि जब एक ही सर्किट पर जरूरत से ज्यादा बिजली के डिवाइस चलने लगते हैं तो उस सर्किट में करंट बढ़ जाता है. इसे ओवरलोड कहा जाता है. जैसे अगर एक ही लाइन पर AC, हीटर, माइक्रोवेव और कई दूसरे हाई-पावर वाले डिवाइस चलने लगें तो वायरिंग पर ज्यादा लोड पड़ता है.
ऐसी स्थिति में MCB ज्यादा करंट फ्लो को डिटेक्ट करती है और कुछ समय बाद ट्रिप हो जाती है. ट्रिप के बाद पूरे घर की बिजली की सप्लाई बंद हो जाती है. इससे होता ये है कि तारों पर एक्सट्रा लोड नहीं पड़ता है और ज्यादा गर्म होने का खतरा भी कम रहता है.
क्यों पड़ी जरूरत
बताते चलें कि पहले के जमाने में इस डिवाइस की जगह पर फ्यूज का इस्तेमाल किया जाता था. लेकिन फ्यूज के साथ एक समस्या होती थी कि जब भी ज्यादा करंट आता था तो तार गर्म होकर पिघल जाता था और सर्किट टूट जाता था. वहीं, MCB ट्रिप होने के बाद उसे दोबारा स्विच करके चालू किया जा सकता है.
शॉर्ट सर्किट में भी आती है काम
बताते चलें कि MCB का सबसे जरूरी काम शॉर्ट सर्किट से घर को बचाना होता है. जब किसी खराबी के कारण फेज और न्यूट्रल तार डॉयरेक्ट कॉनटेक्ट में आ जाते हैं तो अचानक बहुत ज्यादा करंट फ्लो होने लगता है.
ऐसे में ये स्थिति बहुत खतरनाक होती है. इसी कंडिशन में MCB का इस्तेमाल होता है और ये तेज करंट को पहचानकर बहुत तेजी से ट्रिप करती है और सर्किट को अलग कर देती है. इससे वायरिंग और डिवाइसों को होने वाला खतरा काफी हद तक कम हो जाता है.
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        <pubDate>Sun, 16 Aug 2026 23:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>क्या होते हैं बिना ब्लेड वाले पंखें? जानें क्या है टेक्नोलॉजी</title>
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        <description><![CDATA[ Bladeless Fan: गर्मी के मौसम में घरों में लोग पंखे, कूलर और दूसरे गैजेट का इस्तेमाल करते हैं जो लोगों को गर्मी से बचाने का काम करते हैं. इसी कड़ी में बता दें कि आमतौर पर पंखे का नाम सुनते ही हमारे दिमाग में नॉर्मल पंखा ही याद आता है जिसमें 3 या 4 ब्लेड होते हैं. लेकिन अब टेक्नोलॉजी इतनी एडवांस हो चुकी है जहां पंखे बिना ब्लेड के भी चलने लगे हैं. इन्हें ब्लेडलेस फैन कहा जाता है. देखने में ये नॉर्मल पंखे से काफी अलग होते हैं लेकिन इनके पीछे हवा को तेजी से मूव करने की दिलचस्प टेक्नोलॉजी भी काम करती है.
ब्लेडलेस फैन में हवा कहां से आती है?
जानकारी के अनुसार, ब्लेडलेस फैन को देखकर सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि जब ब्लेड ही नहीं हैं तो हवा कैसे निकल रही है? दरअसल, इसका मोटर और इंपेलर नॉर्मली पंखें के नीचे बने बेस के अंदर छिपे होते हैं.
मोटर हवा को अंदर खींचती है और उसे तेज स्पीड से ऊपर की ओर भेजती है. इसके बाद ये हवा एक खास डिजाइन वाले खोखले रिंग या लूप के अंदर पहुंचती है. रिंग के किनारे बने बेहद पतले एयर स्लॉट से हवा बाहर निकलती है और सामने की हवा को भी अपने साथ खींचकर आगे बढ़ाती है.
क्या है एयर मल्टीप्लायर टेक्नोलॉजी
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि कई ब्लेडलेस फैन में एयर मल्टीप्लायर जैसी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जाता है. इसमें फैन सिर्फ मोटर से खींची गई हवा को बाहर नहीं फेंकता बल्कि आसपास की हवा को भी अपने फ्लो में शामिल कर लेता है.
इसी वजह से बिना दिखाई देने वाले ब्लेड से भी लगातार स्मूद एयरफ्लो मिलता है. हवा का फ्लो पुराने पंखे की तरह अलग-अलग महसूस होने के बजाय ज्यादा बेहतर तरीके से लोगों को महसूस होती है.
इसके अलावा, ब्लेडलेस फैन का एक बड़ा फायदा इसका डिजाइन होता है. इसमें बाहर की तरफ घूमते हुए खुले ब्लेड नहीं होते है जिससे उंगलियों के फंसने का जोखिम पुराने पंखों के मुकाबले काफी कम हो जाता है. यही वजह है कि इन्हें बच्चों के लिए भी काफी बेहतर माना जाता है. इसके अलावा इनकी सफाई करना भी पुराने पंखों के मुकाबले काफी आसान होती है. ऐसा इसलिए क्योंकि, इन पंखों में ब्लेड होते ही नहीं है जो घूमने पर धूल जमने जैसे समस्या पैदा कर सकें.
क्या ब्लेडलेस फैन ज्यादा बिजली बचाता है?
आपको बता दें कि ये मानना सही नहीं होगा कि हर ब्लेडलेस फैन पुराने पंखे से ज्यादा बिजली बचाने का काम करता है. दरअसल, बिजली की खपत मोटर, मॉडल, स्पीड और इस्तेमाल की गई टेक्नोलॉजी पर भी निर्भर करती है.
कुछ एडवांस मॉडल कम बिजली में अच्छा एयरफ्लो देने के लिए डिजाइन किए जाते हैं. इसलिए खरीदते समय सिर्फ ब्लेडलेस नाम देखने के बजाय वॉटेज, एयरफ्लो और एनर्जी एफिशिएंसी पर भी ध्यान देना जरूरी होता है.
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        <pubDate>Sun, 16 Aug 2026 07:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>Investment Scam से बचने में ये तरीके आयेंगे काम! जानें कैसे</title>
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        <description><![CDATA[ Investment Scam से बचने में ये तरीके आयेंगे काम! जानें कैसे ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 16 Aug 2026 07:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>Meta का बड़ा कदम, इस देश में बच्चों के 7.56 लाख अकाउंट किए डीएक्टिवेट</title>
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        <description><![CDATA[ सोशल मीडिया का इस्तेमाल आज बच्चों और युवाओं के बीच काफी बढ़ गया है. कम उम्र में सोशल मीडिया का ज्यादा इस्तेमाल बच्चों की सुरक्षा और प्राइवेसी को लेकर चिंता बढ़ाता है. इसी वजह से ऑस्ट्रेलिया में 16 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर सख्त नियम लागू किए गए हैं, जिसमें 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर बैन शामिल है. इन नियमों के बाद Meta ने बड़ी संख्या में अकाउंट्स पर कार्रवाई की है. कंपनी ने 7.56 लाख से ज्यादा अकाउंट डीएक्टिवेट किए हैं. आइए जानते हैं Meta ने यह कदम क्यों उठाया और इसके पीछे क्या वजह है.
7.56 लाख से ज्यादा अकाउंट हुए डीएक्टिवेट
Meta के अनुसार, दिसंबर 2025 से जून 2026 के बीच ऑस्ट्रेलिया में 7.56 लाख से ज्यादा ऐसे अकाउंट डीएक्टिवेट किए गए, जिनके यूजर्स की उम्र 16 साल से कम होने का शक था. इनमें करीब 4.62 लाख Instagram और 2.94 लाख Facebook अकाउंट शामिल हैं. यह कदम ऑस्ट्रेलिया में लागू नए नियमों के तहत उठाया गया है.
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16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सख्ती
ऑस्ट्रेलिया में 16 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक लगाने वाला कानून दिसंबर 2025 में लागू हुआ था. इसका उद्धेश्य बच्चों को सोशल मीडिया से जुड़े &amp;nbsp;नुकसान से बचाना है. इस नियम के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की जिम्मेदारी बढ़ गई है. अब कंपनियों को यह तय करना होता है कि कम उम्र के बच्चे नियमों को ना मान करके &amp;nbsp;करके अकाउंट न बना सकें.
उम्र पता लगाने के लिए AI की मदद
कम उम्र के यूजर्स की पहचान करने के लिए Meta कई तरीकों का इस्तेमाल कर रहा है. इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI की मदद भी ली जा रही है. कंपनी यूजर की प्रोफाइल और ऑनलाइन गतिविधियों से मिलने वाले संकेतों को देख सकती है. उदाहरण के लिए किसी पोस्ट में जन्मदिन, स्कूल की कक्षा या उम्र से जुड़ी जानकारी सामने आने पर अकाउंट की जांच की जा सकती है. इसके अलावा किसी यूजर या दूसरे व्यक्ति की रिपोर्ट मिलने पर भी कार्रवाई की जा सकती है.
इस कदम का क्या हुआ असर
Meta की इस कार्रवाई से ऑस्ट्रेलिया में कम उम्र के यूजर्स के सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर सख्ती बढ़ी है. बड़ी संख्या में अकाउंट डीएक्टिवेट होने के बाद बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म तक पहुंच पहले के मुकाबले मुश्किल हुई है. हालांकि, इसका असर कितना लंबे समय तक रहेगा और बच्चे नए तरीकों से सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर पाएंगे या नहीं, यह आगे देखने वाली बात होगी. सरकार और सोशल मीडिया कंपनियां अब बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर नियमों को और प्रभावी बनाने पर ध्यान दे रही हैं.
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&amp;nbsp; ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 16 Aug 2026 07:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>TV पर कैसे दिखाए जाते हैं Ads? जानें टेक्नोलॉजी और नियम</title>
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        <description><![CDATA[ TV पर कैसे दिखाए जाते हैं Ads? जानें टेक्नोलॉजी और नियम ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 16 Aug 2026 07:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>How To Start Learning Coding: Coding सीखने की सही शुरुआत कैसे करें, यह किस उम्र में सीखना सही?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/how-to-start-learning-coding-coding-सीखने-की-सही-शुरुआत-कैसे-करें-यह-किस-उम्र-में-सीखना-सही</link>
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        <description><![CDATA[ How To Start Learning Coding: आज के दौर में अगर कोई सेक्टर सबसे तेजी से विकास कर रहा है, तो वह है IT सेक्टर. इस सेक्टर से लाखों युवाओं को रोजगार मिल रहा है. लेकिन इस सेक्टर में नौकरी पाने के लिए सबसे जरुरी चीज है, कोडिंग सीखना. बिना कोडिंग सीखे आप इस सेक्टर में नौकरी नहीं पा सकते. जो भी इस सेक्टर में नौकरी का सपना देख रहे है. अक्सर उनके मन में सवाल होता है कि कोडिंग सीखने की शुरुआत कैसे करे और किस उम्र से कोडिंग सीखना सही होगा. तो आज हम आपको इन सारे सवालों को दूर कर देंगे.&amp;nbsp;
कोडिंग सीखने की सही उम्र
कोडिंग सीखने की कोई एक निश्चित या तय उम्र नहीं होती है. इसे किसी भी उम्र में सीखा जा सकता है. जैसे कि 8 से 14 वर्ष के उम्र में बच्चे कोडिंग के बेसिक लॉजिक सीख सकते हैं. इसके लिए Scratch या Blockly जैसे विजुअल टूल्स का इस्तेमाल कर सकते है. जहां गेम खेलते-खेलते कोडिंग सीखी जाती है. यह बच्चों की दिमागी क्षमता को बढ़ाता है. इसके अलावा 15 वर्ष या उससे अधिक की उम्र पर &amp;nbsp;कोडिंग की दुनिया में कदम रखना सबसे बेस्ट माना जाता है. क्योंकि इस दौरान छात्र सीधे वास्तविक प्रोग्रामिंग भाषाओं को सीखकर अपने करियर की शुरुआत कर सकते हैं.&amp;nbsp;
कोडिंग सीखने की शुरुआत कैसे करें?
यदि आप इसे सीखने की शुरुआत कर रहे हैं, तो एक सही रोडमैप का होना बेहद जरूरी है ताकि आप बीच में भ्रमित न हों. सबसे पहले यह तय करें कि आप कोडिंग क्यों सीखना चाहते हैं। क्या आप मोबाइल ऐप बनाना चाहते हैं, वेबसाइट डिजाइन करना चाहते हैं, या डेटा साइंस और AI में करियर बनाना चाहते हैं. क्योंकि इन के लिए आपको अलग-अलग भाषाएं सीखनी होती है.
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इसकी शुरुआत के लिए पाइथन को सबसे बेहतरीन माना जाता है क्योंकि इसका सिंटैक्स लिखने का तरीका अंग्रेजी जैसा ही सरल होता है. लेकिन अगर आप वेब डेवलपमेंट बनना चाहते है, तो आप HTML, CSS और जावास्क्रिप्ट से शुरुआत कर सकते हैं. किसी भी भाषा को रटने के बजाय उसके बेसिक कॉन्सेप्ट्स जैसे वेरिएबल्स, लूप्स, फंक्शन्स और डेटा टाइप्स को समझें. साथ ही केवल वीडियो देखने या थ्योरी पढ़ने से कोडिंग नहीं आती. जैसे ही आप थोड़ा-बहुत सीख लें, छोटे-छोटे प्रोजेक्ट्स बनाना शुरू करें.&amp;nbsp;
इंटरनेट पर कोडिंग सीखने के लिए कई सारे बेहतरीन और मुफ्त प्लेटफॉर्म मौजूद हैं. आप YouTube, freeCodeCamp, और Coursera जैसे प्लेटफॉर्म्स की मदद ले सकते हैं. इनसे आप जब भी चाहें तब पढ़ाई शुरू कर सकते है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Sat, 15 Aug 2026 15:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>फोन की स्क्रीन को छूने पर वह उंगली को कैसे पहचानती है?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/फोन-की-स्क्रीन-को-छूने-पर-वह-उंगली-को-कैसे-पहचानती-है</link>
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        <description><![CDATA[ How Touchscreen Works: आज के स्मार्टफोन में स्क्रीन सिर्फ फोटो दिखाने का काम नहीं करती बल्कि हमारी उंगलियों के हर टच को समझकर तुरंत रिएक्शन भी देती है. हम स्क्रीन पर टैप करते हैं, स्वाइप करते हैं, दो उंगलियों से फोटो को जूम करते हैं और स्क्रीन पर लिख भी सकते हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर फोन को कैसे पता चलता है कि स्क्रीन पर उंगली कहां रखी गई है? आइए जानते हैं इसके पीछे की पूरी टेक्नोलॉजी.
क्या है टेक्नोलॉजी
जानकारी के अनुसार, इसके पीछे एक बेहद दिलचस्प टेक्नोलॉजी काम करती है जिसे Capacitive Touchscreen कहा जाता है. दरअसल, स्मार्टफोन की स्क्रीन को बाहर से देखने पर ये एक ही सर्फेस दिखाई देती है लेकिन इसके अंदर कई लेयर होती हैं. इनमें डिस्प्ले पैनल के साथ एक टच-सेंसिंग लेयर भी मौजूद होती है.
ये लेयर बेहद छोटे इलेक्ट्रिकल सिग्नल और अंदर होने वाले पार्ट्स के बदलाव को महसूस कर सकती है. जब आप स्क्रीन को छूते हैं तो आपकी उंगली इस सिस्टम में कुछ बदलाव पैदा करती है और फोन उसी बदलाव को टच के रूप में पहचान लेता है.
कैसे उंगली स्क्रीन पर असर डालती है?
आपको बता दें कि ज्यादातर एडवांस स्मार्टफोन में कैपेसिटिव टच टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल होता है. स्क्रीन की टच लेयर में बेहद पतली और ट्रांसपेरेंट इलेक्ट्रोड की ग्रिड होती है. इन इलेक्ट्रोड के आसपास एक छोटा इलेक्ट्रिकल फील्ड बना रहता है.
मान लीजिए स्क्रीन पर सैकड़ों छोटे-छोटे सेंसर पॉइंट मौजूद हैं. जब आप स्क्रीन को नहीं छूते तो सिस्टम में एक नॉर्मल इलेक्ट्रिकल कंडिशन में बना रहता है. जैसे ही आपकी उंगली स्क्रीन के पास आती है या उसे छूती है, वहां की कंडिशन बदलने लगती है.
इंसान के शरीर से पड़ता है फर्क
जानकारी के लिए बता दें कि यहां सबसे दिलचस्प भूमिका इंसान के शरीर की होती है. दरअसल, ह्यूमन बॉडी में इलेक्ट्रिकल पावर होती है. हमारा शरीर इलेक्ट्रिकल चार्ज को प्रभावित कर सकता है. उंगली स्क्रीन के इलेक्ट्रिकल फील्ड के कॉन्टेक्ट में आने पर वहां की capacitance में बदलाव आता है.
टच कंट्रोलर इस बदलाव को महसूस करता है. इसके बाद वह ये पता लगाने की कोशिश करता है कि जो बदलाव हुआ है वो स्क्रीन के किस हिस्से में हुआ है. यानी फोन आपकी उंगली को कैमरे की तरह देखकर नहीं पहचानता है. बल्कि ये डिवाइस में होने वाले इलेक्ट्रिकल बदलाव को मापकर ये समझता है कि स्क्रीन को छुआ गया है.
फोन को कैसे पता चलता है कि आपने कहां Touch किया?
दरअसल, स्मार्टफोन की टचस्क्रीन में इलेक्ट्रोड एक तरह का नेटवर्क बनाते हैं. जब उंगली किसी खास जगह पर आती है तो उस एरिया के आसपास इलेक्ट्रिकल सिग्नल में बदलाव दिखाई देता है.
टच कंट्रोलर इन बदलावों को पढ़कर एक अंदाजा लगाता है कि टच की क्या कंडिशन है. इसके बाद ये जानकारी स्मार्टफोन के प्रोसेसर और ऑपरेटिंग सिस्टम तक पहुंचती है.
जैसे आपने स्क्रीन के नीचे बाईं ओर किसी ऐप के आइकन पर टैप किया. टच सिस्टम उस जगह के X और Y coordinates का पता लगाता है. ऑपरेटिंग सिस्टम समझता है कि उस जगह मौजूद ऐप के आइकन को दबाया गया है और फिर ऐप खुल जाता है.
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        <pubDate>Sat, 15 Aug 2026 15:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>क्या ChatGPT आपके डिवाइस की करता है जासूसी? जानें सच्चाई</title>
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        <description><![CDATA[ ChatGPT: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते इस्तेमाल के साथ ChatGPT जैसे AI टूल्स को लेकर लोगों के मन में कई तरह के सवाल भी उठने लगे हैं. खासकर जब कोई यूजर ChatGPT से मोबाइल, लैपटॉप या किसी ऐप से संबंधित सवाल पूछता है तो ये सवाल स्वाभाविक है कि क्या AI आपके डिवाइस पर नजर रखता है? क्या ये आपकी स्क्रीन देख सकता है या आपकी प्राइवेट फाइलों तक पहुंच सकता है? आइए जानते हैं क्या है इसकी सच्चाई.
क्या ChatGPT खुद से डिवाइस देख सकता है?
नॉर्मली ChatGPT आपके मोबाइल या कंप्यूटर की स्क्रीन, फाइलों, कैमरा या माइक्रोफोन को अपनी मर्जी से एक्सेस नहीं कर सकता है. यानी सिर्फ ChatGPT ऐप को डिवाइस में इंस्टॉल करने से ये आपके डिवाइस की जासूसी नहीं करने लगता है. AI को किसी भी चीज की जानकारी तब ही मिलती है जब ऐप या ऑपरेटिंग सिस्टम की ओर से कोई इनपुट दिया जाता है.
स्क्रीन शेयर करने पर क्या होता है?
कई बार ऐसा होता है कि ChatGPT को स्क्रीन से जुड़ी जानकारी मिल जाती है. जैसे अगर कोई फीचर स्क्रीन शेयरिंग की सुविधा देता है और यूजर उसे एक्टिवेट करता है तो उस दौरान दिखाई जा रही स्क्रीन की जानकारी ChatGPT को भी मिल सकती है. हालांकि, इसका मतलब ये नहीं है कि ChatGPT हर समय आपके फोन या लैपटॉप की स्क्रीन देख रहा है.
क्या प्राइवेट फाइलें पढ़ सकता है ऐप?
ChatGPT आपके डिवाइस में मौजूद हर फोटो, डॉक्यूमेंट या फाइल को अपने आप स्कैन नहीं करता है. अगर आप किसी फाइल को चैटजीपीटी से बातचीत के दौरान अपलोड करते हैं तभी AI उस कंटेंट को पढ़ता है या उसे प्रोसेस करता है. इसलिए हमेशा सलाह दी जाती है कि चैटजीपीटी से कोई भी जरूरी डॉक्यूमेंट्स, पासवर्ड, बैंकिंग जानकारी या पर्सनल डेटा शेयर नहीं करना चाहिए.
कितनी सेफ है आपकी प्राइवेसी
ChatGPT के साथ बातचीत करते समय ये समझना जरूरी है कि AI को वही जानकारी मिलती है जो संबंधित फीचर के जरिए उपलब्ध कराई जाती है. हालांकि, किसी भी ऑनलाइन सर्विस की तरह यहां भी प्राइवेसी सेटिंग्स और डेटा कंट्रोल को समझना जरूरी होता है.
यूजर्स को अपने अकाउंट की डेटा सेटिंग्स को चेक करना चाहिए और जरूरत के अनुसार चैट हिस्ट्री, डेटा कंट्रोल तथा परमिशन से जुड़े ऑप्शनों को मैनेज करना चाहिए.
ChatGPT में आया Computer History फीचर
जानकारी के अनुसार, चैटजीपीटी ने हाल ही में अपने ऐप में Computer History फीचर को ऐड किया है. ये फीचर Mac पर आपकी डिजिटल एक्टिविटी को ट्रैक करने का काम करता है. इस फीचर को ऑन करने के बाद ChatGPT आपकी कंप्यूटर एक्टिविटी से मिलने वाले डिटेल्स का इस्तेमाल करके आपको ज्यादा बेहतर रिजल्ट्स देने का प्रयास करता है.
ये फीचर हाल में ओपन की गई किसी फाइल को सर्च करने, पिछले काम को समझने या दिनभर में किए गए काम की समरी तैयार करने जैसे काम को आसानी से करता है.
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        <pubDate>Sat, 15 Aug 2026 15:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>X पर कैसे तय होती है पोस्ट की रैंकिंग? जानें टेक्नोलॉजी</title>
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        <description><![CDATA[ X Algorithm: एलन मस्क का एक्स, जिसे पहले ट्विटर कहा जाता था, लोगों के बीच एक चर्चित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म है जहां लोग अपनी राय रखते हैं. लेकिन अक्सर देखा गया है कि एक्स पर कोई पोस्ट ज्यादा लोगों तक पहुंच जाता है तो कुछ पोस्ट ज्यादा रीच नहीं प्राप्त कर पाता है. लेकिन क्या आपने सोचा है कि एक्स पर किसी भी पोस्ट की रैंकिंग तय कैसे होती है. आइए जानते हैं कि क्या है इसके पीछे की टेक्नोलॉजी.
कंपनी ने पेश किया नया सिस्टम
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, एलन मस्क की कंपनी X ने अपने रिकमेंडेशन सिस्टम को ट्रांसपरेंट करने को लेकर एक बड़ा कदम उठाया है. बता दें कि कंपनी ने एक ऐसा टूल भी पेश किया है जिसकी मदद से यूजर ये पता कर पाएंगे कि उनकी पोस्ट पर कोई ऐसा लेबल तो नहीं लगा हुआ है जो उनकी पोस्ट की रीच को डिस्टर्ब कर रहा है. इस नया टूल का मकसद यूजर्स को ये बताना है कि कोई भी पोस्ट कैसे रैंक करती है और कैसे किसी पोस्ट की विजिबिलिटी कम या ज्यादा हो जाती है.
कैसे काम करता है For You फीड?
जानकारी के मुताबिक, X ऐप खोलने पर डिफॉल्ट रूप से यूजर्स को For You टाइमलाइन दिखाई देता है जहां पर कई सारे पोस्ट मौजूद होते हैं. अब बता दें कि यहां सिर्फ ऐसे पोस्ट दिखाए जाते हैं जो यूजर के लिए ज्यादा जरूरी होते हैं. इसके पीछे प्लेटफॉर्म का पूरा सिस्टम काम करता है जो यूजर्स के लिए अलग-अलग पोस्ट तय करता है.
दरअसल, कंपनी ने कुछ नए कोड जारी किए हैं जिसमें मॉडल की कॉन्फिगरेशन, अलग-अलग फिल्टर और पोस्ट की रैंकिंग से जुड़े सिस्टम की जानकारी मिलती है. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, ये नया कोडबेस X के पिछले ओपन-सोर्स रिलीज कके मुकाबले में करीब 10 से 15 गुना बड़ा है.
इसमें कुछ ऐसे पैरामीटर भी शामिल किए गए हैं जिनसे अंदाजा लगाया जा सकता है कि अलग-अलग सिग्नल को पोस्ट की रैंकिंग में कितना महत्व दिया जाता है.
X प्लेटफॉर्म पर किसी पोस्ट की रैंकिंग सिर्फ इस बात से तय नहीं होती कि उसे कितने लाइक मिले हैं. इसके पीछे एक पूरा रिकमेंडेशन एल्गोरिदम काम करता है, जो यह अनुमान लगाता है कि कौन-सी पोस्ट यूजर को सबसे ज्यादा पसंद आ सकती है.
X पर पोस्ट की रैंकिंग कैसे तय होती है?
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि सबसे पहले X का सिस्टम अलग-अलग पोस्ट को इकट्ठा करता है. इसके बाद एल्गोरिदम ये देखता है कि यूजर किन अकाउंट्स को फॉलो करता है, पहले किस तरह के पोस्ट पर रिएक्शन देता रहा है और किन टॉपिक्स में यूजर का इंट्रेस्ट है.
इसके बाद पोस्ट को कई आधार पर रैंक किया जाता है. लाइक, रिप्लाई, रीपोस्ट और पोस्ट पर होने वाली बातचीत अहम संकेत होते हैं. हालांकि केवल ज्यादा Engagement होने से पोस्ट को सबसे ऊपर जगह मिलना जरूरी नहीं होता है.
पोस्ट की शुरुआती पहुंच भी मायने रखती है
किसी पोस्ट को कितने लोगों ने देखा और शुरुआती दर्शकों ने उस पर कैसा रिएक्शन दिया है, ये भी सिस्टम के लिए काफी जरूरी संकेत होता है. अगर लोग पोस्ट को पढ़कर बातचीत करते हैं या उसे आगे शेयर करते हैं तो उसके ज्यादा लोगों तक पहुंचने की संभावना बढ़ जाती है.
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        <pubDate>Sat, 15 Aug 2026 15:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>क्या होती है Apple की Obsolete लिस्ट? जानें कब बंद होता है प्रोडक्ट</title>
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        <description><![CDATA[ Apple Obsolete List: अगर आपके पास कई साल पुराना iPhone, MacBook या Apple का कोई दूसरा डिवाइस मौजूद है तो आपने कभी न कभी Obsolete Product लिस्ट जरूर सुना होगा. Apple समय-समय पर अपने कुछ पुराने डिवाइस को इस लिस्ट में शामिल करता है. लेकिन इसका मतलब ये नहीं है होता है कि आपका पुराना डिवाइस काम करना बंद कर देगा. आइए जानते हैं कि कब कंपनी किसी प्रोडक्ट को बंद करने का फैसला लेती है.
क्या होती है Apple की Obsolete लिस्ट?
जानकारी के अनुसार, Apple अपने पुराने प्रोडक्ट्स को उनकी लाइफ और सर्विस उपलब्धता के आधार पर अलग-अलग कैटेगरी में रखता है. इनमें एक मेन कैटेगरी Obsolete होती है. जब कोई प्रोडक्ट इस लिस्ट में पहुंच जाता है तो Apple उस डिवाइस के लिए ऑफिशियल हार्डवेयर सर्विस और पार्ट्स उपलब्ध कराना बंद कर देता है.
इसका मतलब साफ है कि अगर कोई प्रोडक्ट इस लिस्ट में पहुंचता है तो अब अगर आपके फोन का कोई भी पार्ट खराब होता है तो कंपनी उस पार्ट को उपलब्ध नहीं करा पाएगी.
कब कोई Apple प्रोडक्ट Obsolete होता है?
Apple के मुताबिक, किसी प्रोडक्ट की बिक्री बंद होने के बाद नॉर्मली सात साल से ज्यादा समय बीत जाने पर उसे Obsolete कैटेगरी में शिफ्ट कर देती है. हालांकि, ये प्रोसेस प्रोडक्ट और एरिया के हिसाब से अलग होता है.
यहां एक बात समझना जरूरी है कि प्रोडक्ट की लॉन्च डेट और बिक्री बंद होने की तारीख अलग-अलग होती है. ऐसे में किसी प्रोडक्ट का Obsolete स्टेटस तय करने में Apple खासतौर पर इस बात को चेक करता है कि उस मॉडल को आखिरी बार बिक्री के लिए कब उपलब्ध कराया गया था.
Obsolete होने के बाद क्या बदलता है?
आपको बता दें कि Obsolete होने का सबसे बड़ा असर हार्डवेयर रिपेयर पर पड़ता है. Apple आमतौर पर ऐसे प्रोडक्ट के लिए हार्डवेयर सर्विस बंद कर देता है और रजिस्टर्ड सर्विस सेंटरों को पार्ट्स उपलब्ध नहीं कराए जाते हैं.
हाल ही में कंपनी ने अपना 9 साल पहले लॉन्च हुआ आईफोन एक्स को इस लिस्ट में शामिल कर दिया है. जी हां, दरअसल, कंपनी ने हाल ही में iPhone X और 2018 में लॉन्च हुआ 15 इंच वाला MacBook Pro को Obsolete लिस्ट में शामिल कर दिया है. इसका मतलब है कि अब इन दोनों डिवाइस के लिए कंपनी ने ऑफिशियल रूप से हार्डवेयर रिपेयर सपोर्ट करना बंद कर दिया है.
क्या सॉफ्टवेयर अपडेट भी तुरंत बंद हो जाते हैं?
जानकारी के लिए बता दें कि Obsolete लिस्ट में शामिल होना और सॉफ्टवेयर सपोर्ट खत्म होना एक ही चीज नहीं होती है. किसी डिवाइस को Obsolete लिस्ट में जाने से ये नहीं माना जाता है कि उस डिवाइस का सॉफ्टवेयर अपडेट भी तुरंत बंद हो जाएगा.
हालांकि, इतने पुराने डिवाइस नॉर्मली पहले ही नए iOS, macOS या दूसरे बड़े सॉफ्टवेयर अपडेट प्राप्त करना बंद कर चुके होते हैं. इसके बाद सुरक्षा अपडेट और ऐप सपोर्ट भी धीरे-धीरे बंद होने लगता है.
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        <pubDate>Sat, 15 Aug 2026 15:30:05 +0530</pubDate>
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        <title>US सरकार की ओर से अब प्राइवेट कंपनियां करेंगी साइबर अटैक</title>
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        <description><![CDATA[ US Cyber Attack: टेक्नोनलॉजी की दुनिया में अब ज्यादातर लोग एडवांस डिवाइसेज का इस्तेमाल करते हैं. ऐसे में माना जाता है कि जितनी ज्यादा एडवांस टेक्नोलॉजी उतना ज्यादा ही साइबर हमले का खतरा. इसी कड़ी में बता दें कि अब अमेरिका के साइबर सुरक्षा नीति में एक बदलाव देखने को मिला है. दरअसल, मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक नए राष्ट्रीय सुरक्षा राष्ट्रपति ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं. इसके तहत कुछ प्राइवेट कंपनियों अब दूसरे देशों से चल रहे साइबर अपराधी संगठनों के खिलाफ साइबर हमले कर सकेंगे.
सरकार के साथ काम करेंगी प्राइवेट कंपनियां
जानकारी के अनुसार, अब तक अमेरिका में साइबर हमलों से निपटने की जिम्मेदारी सिर्फ सरकारी एजेंसियों की रहती थी. लेकिन अब इस नई योजना के तहत प्राइवेट कंपनियों को भी इस लड़ाई में शामिल किया जाएगा और ये कंपनियां सरकारी की साइबर हमलों से निपटने में भी मदद करेंगी.
सरकार का मानना है कि साइबर अपराधी कई तरीकों से हमलों को अंजाम दे रहे हैं. ऐसे में प्राइवेट कंपनियों के पास ज्यादा एडवांस टेक्नोलॉजी है जो इन खतरों से देश को बचाने में मदद कर सकती हैं. ये पहल खासतौर पर ऐसे आपराधिक नेटवर्क को निशाना बनाने पर फोकस करती है जो कई देशों में एक्टिव रहते हैं.
रैनसमवेयर से लेकर फिशिंग तक पर नजर
आपको बता दें कि अमेरिकी प्रशासन के मुताबिक साइबर अपराध का दायरा तेजी से बढ़ रहा है. रैनसमवेयर हमलों में जरूरी सिस्टम को लॉक करके पैसे की डिमांड की जाती है जबकि फिशिंग के जरिए लोगों या संस्थानों से उनके जरूरी जानकारी चोरी कर ली जाती है.
इसी को ध्यान में रखते हुए इस नई नीति को तैयार किया गया है जिसकी मदद से प्राइवेटी कंपनियों के संसाधनों का इस्तेमाल करके बड़े साइबर हमलों का तेजी से जवाब दिया जा सके.
पहले से मौजूद साइबर कानून में क्या बदलाव आएगा?
दरअसल, अमेरिका में Computer Fraud and Abuse Act (CFAA) अनधिकृत कंप्यूटर एक्सेस और कई तरह की हैकिंग एक्टिविटी को अपराध मानता है. ये कानून प्राइवेट कंपनियों और आम लोगों पर भी लागू होता है. नई राष्ट्रपति नीति इससे कहीं ज्यादा बेहतर मानी जा रही है. इसमें सरकार की मंजूरी और दिशा-निर्देशों के तहत प्राइवेट कंपनियों द्वारा साइबर ऑपरेशन किए जाने के रास्तों को तैयार किया गया है.
कंपनियों को देना होगा 1 मिलियन डॉलर का बॉन्ड
दरअसल, इस कार्यक्रम में शामिल होने वाली कंपनियों के लिए एक निमय भी तय किया गया है. ऐसी कंपनियों को सरकार को 10 लाख डॉलर यानी करीब 8 करोड़ रुपये से ज्यादा का बॉन्ड भी जमा करना होगा. अगर कोई कंपनी सरकार के निर्देशों या नियमों का पालन नहीं करती है तो ये राशि जब्त की जा सकती है.
क्या कहता है दूसरे देशों का कानून?
इसके साथ ही अमेरिका की नई नीति के साथ एक बड़ा कानूनी सवाल भी सामने आया है. अगर अमेरिकी सरकार के निर्देश पर कोई प्राइवेट कंपनी किसी दूसरे देश में मौजूद कंप्यूटर या सर्वर के खिलाफ साइबर हमला करती है तो उस देश के कानून के तहत कंपनी या उसके कर्मचारियों पर कार्रवाई हो सकती है.
राष्ट्रपति के ज्ञापन में इस स्थिति को लेकर पूरी तस्वीर अभी साफ नहीं हुई है. अमेरिका खुद कई मौकों पर विदेशी हैकर्स के खिलाफ आरोप और कानूनी कार्रवाई कर चुका है. ऐसे में दूसरे देश भी अमेरिकी ऑर्डर पर किए गए साइबर ऑपरेशन का जवाब कानूनी या तकनीकी तरीके से दे सकते हैं.
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        <pubDate>Sat, 15 Aug 2026 03:30:19 +0530</pubDate>
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        <title>Spam Calls हमेशा आपके नंबर पर कैसे पहुंच जाती हैं? जानें इसकी टेक्निक</title>
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        <description><![CDATA[ Spam Calls: क्या आपको पर्सनल लोन चाहिए? आपके लिए एक शानदार लॉटरी ऑफर है... इस तरह की स्पैम और फ्रॉड कॉल्स से आजकल हर स्मार्टफोन यूजर परेशान है. चाहे आप किसी जरूरी मीटिंग में हों या आराम कर रहे हों, ये कॉल्स दिन में कई बार आपको परेशान कर ही देती हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि बिना किसी को अपना नंबर दिए, इन अनजान कंपनियों और स्कैमर्स के पास आपका पर्सनल मोबाइल नंबर आखिर पहुंच कैसे जाता है? आइए इसके पीछे की पूरी टेक्निक को समझते हैं.&amp;nbsp;
आपके नंबर तक कैसे पहुचते हैं स्पैमर्स?
दरअसल, इन स्पैम कॉल्स के पीछे एक बहुत बड़ा नेटवर्क और आधुनिक तकनीक काम करती है. जैसे जब आप किसी मॉल में शॉपिंग करते समय बिलिंग काउंटर पर अपना नंबर दर्ज करवाते हैं, या किसी अनजान ऐप पर साइन-अप करते हैं तो आपका वह डेटा पूरी तरह सुरक्षित नहीं रहता, क्योंकि डेटा ब्रोकर्स नाम की कुछ एजेंसियां इस डेटा को बहुत कम दामों में थोक के भाव खरीदती हैं और आगे टेलीमार्केटिंग कंपनियों या फ्रॉड करने वाले स्कैमर्स को बेच देती हैं.&amp;nbsp;
इसके अलावा कई बार स्कैमर्स को आपका नंबर पहले से जानने की जरूरत भी नहीं होती. क्योंकि वे खास कंप्यूटर सॉफ्टवेयर या ऑटो-डायलर्स का उपयोग करते हैं. यह मशीन एक सेकंड में हजारों रैंडम नंबरों की सीरीज पर एक साथ ऑटोमैटिक कॉल मिलाती है. जैसे ही कोई व्यक्ति फोन उठाता है, कंप्यूटर को पता चल जाता है कि यह नंबर एक्टिव है और उसे लाइव लिस्ट में डाल दिया जाता है. साथ ही यदि आपने अपना मोबाइल नंबर फेसबुक, लिंक्डइन, इंस्टाग्राम या किसी जॉब पोर्टल पर पब्लिक छोड़ रखा है, तो इंटरनेट से डेटा चुराने वाले ऑटोमैटिक सॉफ्टवेयर के जरिए आपका नंबर आसानी से स्कैमर्स तक पहुंच जाता है.&amp;nbsp;
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इन स्पैमर्स से कैसे बचे?
जब भी हमारे पास कोई फर्जी कॉल आती है तो हम उस नंबर को ब्लॉक कर देते हैं, लेकिन ऐसा करने पर भी आप इस समस्या से बच नहीं सकते. इन सपैमर्स के पास सैकड़ों फर्जी सिम कार्ड और इंटरनेट कॉलिंग के रास्ते होते हैं, जिससे वे हर बार एक नए नंबर से आपको कॉल कर सकते हैं. इस समस्या से बचने के लिए आप भारत सरकार के संचार साथी एप को इंस्टॉल कर लें. उसमें मौजूद चक्षु ऑप्शन पर आप ऐसे ही स्पैमर्स की रिपोर्ट दर्ज करा सकते हैं.&amp;nbsp; इसके अलावा आप अपने फोन के मैसेज बॉक्स में START 0 लिखकर 1909 पर मैसेज भेजें. इससे आपके मोबाइल नंबर पर फूल डू नॉट डिस्टर्ब सेवा सक्रिय हो जाएगी. इसके ऑन होने से काफी हद तक कमर्शियल कॉल आना बंद हो जाती है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Sat, 15 Aug 2026 03:30:17 +0530</pubDate>
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        <title>Smartphone में कौन से चीज सबसे ज्यादा बैटरी खाती है?</title>
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        <description><![CDATA[ Smartphone में कौन से चीज सबसे ज्यादा बैटरी खाती है? ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 15 Aug 2026 03:30:16 +0530</pubDate>
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        <media:keywords>Smartphone, में, कौन, से, चीज, सबसे, ज्यादा, बैटरी, खाती, है</media:keywords>
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        <title>लॉन्च हो गया Google Gemini 3.7 Flash! जानें क्या&amp;क्या बदला</title>
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        <description><![CDATA[ Google Gemini 3.7 Flash: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस काफी तेजी से देश में विस्तार कर रही है. आज कई सारे एआई मॉडल्स मौजूद हैं जो लोगों के काम को आसान बनाने का काम कर रहे हैं. इसी कड़ी में बता दें कि गूगल जेमिनी भी एक चर्चित एआई मॉडल है जो गूगल के डिवाइसेज में मिलता है. अब कंपनी ने गूगल जेमिनी का 3.7 फ्लैश लॉन्च कर दिया है. कंपनी के अनुसार, ये कंपनी का सबसे ज्यादा वर्कहॉर्स मॉडल है. बता दें कि कंपनी ने इस मॉडल को कोडिंग, सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग और AI एजेंट्स के लिए तैयार किया है.
क्या हुआ Gemini 3.7 Flash में बदलाव?
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, Google ने हाल ही में अपना नया Gemini 3.7 Flash लॉन्च किया जो Gemini Flash सीरीज का सबसे नया मॉडल है. बता दें कि पिछला जेमिनी 3.6 करीब 3 हफ्तों पहले आया था और अब कंपनी ने नया 3.7 फ्लैश लॉन्च कर दिया है. बता दें कि ये नया मॉडल ऐसे कामों के लिए पेश किया गया है जिनमें ज्यादा लेवल पर सोचने की जरूरत पड़ती है. इसे नॉर्मल बातचीत के लिए नहीं उतारा गया है.
AI Agents के लिए क्यों खास है?
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि आज AI एजेंट्स का इस्तेमाल काफी तेजी से बढ़ रहा है. नॉर्मल चैटबॉट किसी सवाल का जवाब देता है लेकिन AI एजेंट किसी गोल को हासिल करने के लिए कई अलग-अलग काम खुद कर सकता है.
Gemini 3.7 Flash इसी तरह के वर्कफ्लो को ध्यान में रखकर बनाया गया है. Google के अनुसार, मॉडल मुश्किल कमांड्स को बेहतर तरीके से समझ सकता है, कई लेवल की प्लानिंग भी कर सकता है और जरूरत पड़ने पर कई तरह के टूल्स का इस्तेमाल भी कर सकता है.
अगर किसी प्रोसेस के दौरान समस्या आती है तो मॉडल अपने तरीके को बदलने की कोशिश कर सकता है. जरूरत पड़ने पर ये यूजर से एक्सट्रा जानकारी भी मांग सकता है. इसका मतलब है कि डेवलपर्स को हर छोटे कदम पर AI को बार-बार चीजें बताने की जरूरत खत्म हो जाएगी.
कोडिंग के लिए बेहतर
जानकारी के अनुसार, Gemini 3.7 Flash को खास तौर पर डेवलपर्स को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है. Google के अनुसार, FrontierCode 1.1 Main टेस्ट में नए मॉडल ने 43.6 प्रतिशत स्कोर हासिल किया है जबकि Gemini 3.6 Flash का स्कोर 34.4 प्रतिशत था. इसीलिए इस नए मॉडल को कोडिंग को बेहतर बनाने के लिए पेश किया गया है.
इतना ही नहीं, नए मॉडल का फायदा केवल कोड लिखने तक सीमित नहीं है. Google के मुताबिक, Gemini 3.7 Flash ऐसा मॉडल है जिसे कम प्राप्म्ट्स की जरूरत पड़ती है और ये आपको कम निर्देश पर ज्यादा काम करने देने में भी सक्षम है. ये किसी स्क्रीनशॉट, रेफरेंस इमेज या डिजाइन सिस्टम को देखकर उससे मिलता-जुलता इंटरफेस तैयार करने में भी सक्षम है.
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        <pubDate>Sat, 15 Aug 2026 03:30:14 +0530</pubDate>
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        <title>Google Pixel 11 या iPhone 17! दोनों में कौन है ज्यादा पावरफुल, पढ़ें कंपैरिजन</title>
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        <description><![CDATA[ Google Pixel 11 Vs iPhone 17: Google ने हाल ही में अपना नया फ्लैगशिप स्मार्टफोन Pixel 11 सीरीज को मार्केट में लॉन्च कर दिया है. इस स्मार्टफोन में कंपनी ने कई सारे धांसू फीचर्स उपलब्ध कराए हैं जो यूजर्स को काफी पसंद आने वाला है. इसी कड़ी में माना जा रहा है कि इस प्रीमियम स्मार्टफोन की टक्कर Apple के iPhone 17 से हो सकती है. ऐसे में आज हम आपको इन दोनों फोन के बीच के फर्क के बारे में बताने जा रहे हैं.
डिस्प्ले में कौन आगे
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि दोनों ही स्मार्टफोन में 120Hz रिफ्रेश रेट वाला डिस्प्ले दिया गया है. iPhone 17 में 6.3 इंच का डिस्प्ले है जो 120 हर्ट्ज के रिफ्रेश रेट को भी सपोर्ट करता है. इसके अलावा इस फोन के स्टैंडर्ड मॉडल में यूजर्स को ProMotion भी मिल जाता है.
वहीं, Pixel 11 में 6.3 इंच का Actua OLED पैनल मिलता है जिसका रेजोल्यूशन 1080 x 2424 पिक्सल है.
किसका प्रोसेसर ज्यादा ताकतवर?
दोनों स्मार्टफोन के प्रोसेसर की बात करें तो Pixel 11 में Google का नया Tensor G6 चिपसेट प्रोसेसर उपलब्ध कराया गया है. कंपनी के मुताबिक ये प्रोसेसर लोडिंग और ऑन-डिवाइस AI परफॉर्मेंस को बेहतर बनाने का काम करता है. इस डिवाइस में 12GB रैम दिया गया है जो फोन के कई सारे काम आसानी से करने में सक्षम है और ये मल्टीटास्किंग के लिए भी काफी बढ़िया माना जाता है.
&amp;nbsp;वहीं, iPhone 17 में Apple का A19 चिपसेट प्रोसेसर दिया गया है. इस डिवाइस में 8GB RAM मिलता है. स्टोरेज के लिए डिवाइस में यूजर्स को 256GB से शुरू होकर 512GB तक कई सारे ऑप्शन मिल जाते हैं.
किसका डिजाइन बेहतर
आपको बता दें कि Google Pixel 11 में कंपनी ने अपना कैमरा बार डिजाइन दिया हुआ है. वहीं, iPhone 17 में Apple का फ्लैट-एज डिजाइन देखने को मिल जाता है. जानकारी के अनुसार, Pixel 11 का वजन 197 ग्राम है और इसकी मोटाई 8.6mm है. वहीं, iPhone 17 का वजह 177 ग्राम है और इसकी मोटाई 7.9mm है. ऐसे में जिन यूजर्स को पतला डिजाइन वाला फोन पसंद आता है उनके लिए आईफोन एक बेहतर ऑप्शन साबित हो सकता है.
कितनी है दोनों की कीमत
इन दोनों की कीमत पर नजर डालें तो भारत में Google Pixel 11 को कंपनी ने 89,999 रुपये की शुरूआती कीमत में लॉन्च किया है. वहीं, iPhone 17 के 256GB मॉडल की शुरुआती कीमत 82,900 रुपये है. इसका 512GB वेरिएंट 1,02,900 रुपये में आता है.
ऐसे में अगर आपको AI फीचर्स, ज्यादा RAM और स्टैंडर्ड मॉडल में ही धांसू कैमरा सेटअप भी चाहिए आपके लिए Pixel 11 एक बेहतरीन ऑप्शन साबित हो सकता है. वहीं, अगर आप पतला और हल्का डिजाइन, 120Hz ProMotion डिस्प्ले, Apple का A19 चिपसेट प्रोसेसर चाहिए तो आपको iPhone 17 खरीदना चाहिए. हालांकि, ये दोनों ही स्मार्टफोन अपनी जगह पर बेस्ट हैं और अपनी जरूरत के हिसाब से स्मार्टफोन को खरीदना ज्यादा बेहतर रहता है.
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        <pubDate>Sat, 15 Aug 2026 03:30:13 +0530</pubDate>
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        <title>Extension Board Electricity Consumption: ऑन रहने पर कितनी बिजली पीता है एक्सटेंशन बोर्ड? उड़ जाएंगे होश</title>
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        <description><![CDATA[ Extension Board Electricity Consumption : घर और ऑफिस में एक्सटेंशन बोर्ड का इस्तेमाल आज काफी आम हो गया है. एक ही जगह से कई डिवाइस चलाने की सुविधा होने की वजह से लोग इसका खूब इस्तेमाल करते हैं. हालांकि, कई लोगों के मन में यह सवाल रहता है कि क्या एक्सटेंशन बोर्ड को हमेशा ऑन रखने से बिजली का बिल बढ़ जाता है. कुछ लोगों का मानना है कि एक्सटेंशन बोर्ड खुद भी काफी बिजली खाता है, जबकि कुछ इसे पूरी तरह सुरक्षित मानते हैं. ऐसे में यह जानना जरूरी है कि आखिर एक्सटेंशन बोर्ड सच में कितनी बिजली की खपत करता है और इसका बिजली बिल पर कितना असर पड़ता है. तो आइए जानते हैं कि एक्सटेंशन बोर्ड ऑन रहने पर कितनी बिजली पीता है.&amp;nbsp;
क्या एक्सटेंशन बोर्ड खुद बिजली खाता है?
एक्सटेंशन बोर्ड के अंदर सिर्फ तार और सॉकेट होते हैं, जिनका काम दीवार के प्लग से बिजली लेकर दूसरे डिवाइस तक पहुंचाना होता है. ऐसे बोर्ड खुद से बिजली की खपत नहीं करते है. इसलिए अगर आप टीवी, कंप्यूटर या किसी अन्य डिवाइस को सीधे दीवार के सॉकेट में लगाएं या एक्सटेंशन बोर्ड के जरिए चलाएं तो बिजली की खपत लगभग समान रहती है.&amp;nbsp;
ऑन रहने पर कितना बढ़ता है बिजली बिल?
बिजली की खपत इस बात पर निर्भर करती है कि एक्सटेंशन बोर्ड में कौन-कौन से अतिरिक्त फीचर मौजूद हैं. जिन बोर्ड में एलईडी इंडिकेटर, रोशनी वाला स्विच या सर्ज प्रोटेक्शन जैसी सुविधाएं होती हैं, वे बहुत कम मात्रा में बिजली लेते हैं. ऐसे एक्सटेंशन बोर्ड लगभग 1 वॉट तक बिजली की खपत कर सकते हैं. वहीं साधारण स्विच वाले बोर्ड करीब 0.5 से 0.7 वॉट बिजली का यूज करते हैं.&amp;nbsp;
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असली बिजली की खपत कहां होती है?
अक्सर लोग समझते हैं कि बिजली बिल बढ़ने की वजह एक्सटेंशन बोर्ड है, जबकि असल में उससे जुड़े डिवाइस ज्यादा बिजली खर्च करते हैं. टीवी, कंप्यूटर, प्रिंटर या गेमिंग कंसोल जैसे कई डिवाइस बंद दिखने के बाद भी स्टैंडबाय मोड में बिजली लेते रहते हैं. अगर ये डिवाइस एक्सटेंशन बोर्ड से जुड़े हैं और बोर्ड का स्विच ऑन है, तो बिजली की खपत जारी रह सकती है.&amp;nbsp;
कब बंद करना चाहिए एक्सटेंशन बोर्ड?
अगर एक्सटेंशन बोर्ड का इस्तेमाल नहीं हो रहा है या उससे कोई डिवाइस जुड़ा नहीं है, तो उसे बंद कर देना बेहतर माना जाता है. इससे स्टैंडबाय मोड में होने वाली बिना जरूरत बिजली खपत रुक जाती है. जिन बोर्ड में मास्टर स्विच या अलग-अलग सॉकेट के लिए अलग स्विच दिए गए हैं, वे बिजली बचाने के लिहाज से ज्यादा यूजफुल साबित होते हैं.
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        <pubDate>Fri, 14 Aug 2026 11:30:13 +0530</pubDate>
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        <title>Fake UPI Apps For Discount : डिस्काउंट के चक्कर में आप भी तो यूज नहीं करते ये UPI ऐप्स? लग जाएगा चूना</title>
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        <description><![CDATA[ Fake UPI Apps For Discount : डिस्काउंट के चक्कर में आप भी तो यूज नहीं करते ये UPI ऐप्स? लग जाएगा चूना ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 14 Aug 2026 11:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>iPhone 17 Pro On Down Payment: 20 हजार की डाउन पेमेंट पर भी आ जाएगा iPhone 17 pro, जानिए कैसे?</title>
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        <description><![CDATA[ iPhone 17 Pro On Down Payment: की कीमत सुनकर ही बजट बिगड़ जाता है, क्योंकि 256GB वैरिएंट की कीमत भारत में 1,34,900 रुपये से शुरू होती है. लेकिन अच्छी बात यह है कि अब पूरी रकम एक साथ चुकाने की ज़रूरत नहीं. एक्सचेंज ऑफर, बैंक डिस्काउंट और EMI स्कीम्स को मिलाकर सिर्फ 20 हजार रुपये के आसपास डाउन पेमेंट में भी यह फोन आपका हो सकता है. आइए जानते हैं इसका पूरा तरीका.
पुराना फोन एक्सचेंज करके घटाएं कीमत
अगर आपके पास पुराना iPhone है, तो एक्सचेंज ऑफर आपकी सबसे बड़ी मदद कर सकता है. जैसे iPhone 14 Pro को एक्सचेंज करने पर करीब 33,000 रुपये तक की वैल्यू मिल सकती है, साथ में 6,000 रुपये का एक्सचेंज बोनस भी जुड़ जाता है. यानी सिर्फ पुराना फोन एक्सचेंज करके ही कीमत का एक बड़ा हिस्सा कवर हो जाता है.
बैंक कार्ड्स पर मिलता है इंस्टेंट कैशबैक
Axis Bank, ICICI Bank और SBI Card के क्रेडिट कार्ड्स पर iPhone 17 Pro खरीदने पर 5,000 रुपये तक का इंस्टेंट स्टोर डिस्काउंट या कैशबैक मिल सकता है. एक्सचेंज और बैंक ऑफर दोनों को मिलाकर टोटल कीमत में अच्छा-खासा फर्क पड़ जाता है.
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जीरो डाउन पेमेंट ईएमआई भी है एक विकल्प
जिनके पास एक्सचेंज के लिए पुराना फोन नहीं है, उनके लिए भी रास्ता खुला है. Piramal Finance जैसी कंपनियां क्रेडिट कार्ड के बिना भी ज़ीरो डाउन पेमेंट EMI की सुविधा देती हैं, जिसमें ब्याज दर करीब 12.09 प्रतिशत सालाना से शुरू होती है. वहीं Bajaj Finance के जरिए&amp;nbsp; भी iPhone 17 Pro को सिर्फ 5,621 रुपये प्रति महीने की EMI पर खरीदा जा सकता है.
एप्पल&amp;nbsp; की अपनी ईएमआई स्कीम भी है मौजूद
Apple की ऑफिसियल&amp;nbsp; वेबसाइट पर भी iPhone 17 Pro के लिए EMI का विकल्प उपलब्ध है, जो एलिजिबल क्रेडिट या डेबिट कार्ड पर सीधे मिल जाता है. चेकआउट के दौरान अलग अलग इंस्टॉलमेंट ऑप्शन कंपेयर करके अपने बजट के हिसाब से सबसे सही प्लान चुना जा सकता है.
सारा कैलकुलेशन मिलाकर बनता है सस्ता डील
अगर एक्सचेंज बोनस, बैंक कैशबैक और ज़ीरो डाउन पेमेंट EMI तीनों को साथ जोड़ दिया जाए, तो शुरुआती डाउन पेमेंट 20 हजार रुपये के आसपास आ सकती है, और बाकी रकम आसान मासिक किस्तों में चुकाई जा सकती है. यही वजह है कि अब प्रीमियम iPhone खरीदना पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा आसान हो गया है.
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        <pubDate>Thu, 13 Aug 2026 23:30:19 +0530</pubDate>
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        <title>In&amp;Display Fingerprint: Super OLED में ही क्यों आता है इन डिस्प्ले फिंगर प्रिंट, बाकी में क्यों नहीं?</title>
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        <description><![CDATA[ In-Display Fingerprint: आजकल स्मार्टफोन के बाजार में इन-डिस्प्ले फिंगरप्रिंट सेंसर एक बेहद लोकप्रिय फीचर बन चुका है. स्क्रीन पर उंगली रखते ही फोन अनलॉक हो जाना देखने में जितना आकर्षक लगता है, इसके पीछे उतनी ही दिलचस्प तकनीक काम करती है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यह फीचर सिर्फ सुपर OLED या AMOLED डिस्प्ले वाले प्रीमियम और मिड-रेंज फोन में ही क्यों मिलता है. बजट सेगमेंट के LCD डिस्प्ले वाले फोन में यह तकनीक क्यों नहीं आती. आइए जानते है इसके पीछे के कारण को.
डिस्प्ले की बनावट में अंतर
इस पूरी कहानी को समझने के लिए हमें सबसे पहले LCD और OLED डिस्प्ले के बीच का बुनियादी अंतर समझना होगा. एक साधारण LCD स्क्रीन खुद से रोशनी पैदा नहीं कर सकती. इसे चलाने के लिए स्क्रीन के ठीक पीछे एक बड़ी और मोटी सफेद रंग की लाइट लगानी पड़ती है, जिसे बैकलाइट कहते हैं. यह बैकलाइट ही पूरी स्क्रीन को एक साथ चमकाती है. दूसरी तरफ, OLED या Super AMOLED डिस्प्ले पूरी तरह से अलग होते हैं. इस स्क्रीन का हर एक पिक्सल अपनी रोशनी खुद पैदा करता है. इसे किसी भी अलग बैकलाइट की जरूरत नहीं होती. जब फोन को काले रंग की जरूरत होती है, तो वो पिक्सल पूरी तरह बंद हो जाते हैं.
इन डिस्प्ले फिंगरप्रिंट कैसे काम करता है?
दरअसल स्मार्टफोन में स्क्रीन के ठीक नीचे एक बहुत ही छोटा कैमरा या सेंसर छुपा होता है. जब आप स्क्रीन पर अपनी उंगली रखते हैं, तो वह सेंसर स्क्रीन के आर-पार आपकी उंगली की रेखाओं को देखता है और उसकी एक तस्वीर ले लेता है. अगर तस्वीर आपके सेव किए गए डेटा से मैच हो जाती है, तो फोन खुल जाता है.&amp;nbsp;
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LCD में यह तकनीक क्यों फेल हो जाती है?
LCD के पीछे जो बैकलाइट की लेयर होती है, वह पूरी तरह अपारदर्शी होती है. इसका मतलब है कि उसके पार देखा नहीं जा सकता. जब स्क्रीन के नीचे बैठा सेंसर उंगली को देखने की कोशिश करता है, तो यह मोटी बैकलाइट दीवार की तरह बीच में आ जाती है और सेंसर आपकी उंगली को स्कैन नहीं कर पाता. इसके अलावा बैकलाइट और कई अन्य परतों के कारण LCD स्क्रीन काफी मोटी होती है. इतनी मोटाई को पार करके नीचे लगा सेंसर उंगली की साफ फोटो नहीं ले सकता.&amp;nbsp;
इसके विपरीत OLED स्क्रीन कांच की एक पतली और पारदर्शी शीट की तरह होती है. इसके नीचे लगा सेंसर बिना किसी रुकावट के स्क्रीन के पार आपकी उंगली को साफ देख सकता है. साथ ही बैकलाइट न होने के कारण OLED स्क्रीन बेहद पतली होती है. इससे सेंसर उंगली के बहुत करीब आ जाता है और फिंगरप्रिंट को नैनो-सेकंड में पहचान लेता है. इसलिए जब आप उंगली रखते हैं, तो OLED स्क्रीन का सिर्फ वही हिस्सा तेजी से चमकता है ताकि नीचे के कैमरे को उंगली देखने के लिए पर्याप्त रोशनी मिल सके.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Thu, 13 Aug 2026 23:30:18 +0530</pubDate>
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        <title>Prevention Mobile From Spam:  स्पैम कॉल्स से हैं परेशान? TRAI के DND ऐप से मिनटों में करें शिकायत दर्ज</title>
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        <description><![CDATA[ Prevention Mobile From Spam:&amp;nbsp; अक्सर ज्यादातर लोगों की शिकायत रहती है कि उनको हर बार अनचाही प्रमोशनल कॉल्स और स्पैम मैसेज आ जाते हैं, जिस पर आपको उसको ब्लॉक करना पड़ जाता है. लेकिन केवल एक और दो नंबर को ब्लॉक करके इस परेशानी को पूरी तरह से खत्म नहीं किया जा सकता है. ऐसे में आपको जान कर खुशी होगी कि आप इसका समाधान कर सकते हैं. TRAI यानी टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने इसके लिए एक खास ऐप निकाला है, जिसका नाम है TRAI DND ऐप. इस ऐप के जरिए आप स्पैम कॉल्स और मैसेज की शिकायत सीधे अपने फोन से चंद सेकंड में दर्ज कर सकते हैं. यही वजह है कि TRAI लोगों से अपील कर रहा है कि इस चीज को नजरअंदाज न करें. केवल ब्लॉक करने से वो परेशानी बस आप तक आने से रुकेगी, वो भी थोड़े देर के लिए, इसलिए इस ऐप के जरिए शिकायत दर्ज करें. ऐसे में आइए जानते हैं इस ऐप के बारे में पूरी जानकारी कि ये कैसे काम करता है.
क्यों जरूरी है TRAI DND ऐप पर शिकायत करना?
TRAI का कहना है कि सिर्फ अपने फोन में किसी नंबर को ब्लॉक कर देने से स्पैम कॉल्स सोर्स पर बंद नहीं होतीं, क्योंकि स्पैमर नया नंबर लेकर फिर से कॉल करना शुरू कर देते हैं. इसलिए TRAI ने एडवाइजरी जारी करते हुए लोगों से अपील की है कि वो स्पैम कॉल्स और मैसेज की शिकायत सीधे DND ऐप के जरिए दर्ज करें जिससे इस परेशानी का समाधान निकल सके. TRAI के मुताबिक, यूजर्स की शिकायतों के आधार पर अब तक 21 लाख से ज्यादा मोबाइल नंबर और करीब एक लाख कंपनियां ब्लैकलिस्ट की जा चुकी हैं जो स्पैम और फर्जी मैसेज भेजने में शामिल थीं. इससे ये बात साबित होगी कि जितना ज्यादा आप शिकायत दर्ज करवाएंगे उतना ज्यादा ऐसी फ्रॉड कंपनियों पर काबू किया जा सकेगा.
फरवरी 2026 में TRAI ने अपने DND ऐप का रिवैंप्ड यानी नया और अपग्रेडेड वर्जन लॉन्च किया था. TRAI चेयरमैन अनिल कुमार लाहोटी ने बताया कि इस नए वर्जन में आसान इंटरफेस, कई भाषाओं में सपोर्ट, तेज शिकायत दर्ज करने की सुविधा और शिकायत की स्टेटस ट्रैकिंग को बेहतर बनाया गया है. इसके अलावा यूजर्स अपने कॉल लॉग या मैसेज लिस्ट से सीधे स्पैम की शिकायत दर्ज कर सकते हैं, जिससे प्रोसेस पहले से काफी तेज हो गया है.
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कहां से करें इंस्टॉल?
अब सबसे जरूरी सवाल आता है कि इस ऐप को डाउनलोड कहां से करें, तो ऐसे में बता दें कि इस ऐप को आप किसी भी फोन में प्ले स्टोर या ऐप स्टोर से डाउनलोड कर सकते हैं चाहे वे एंड्रॉइड हो या फिर आईफोन, इसके लिए नीचे लिंक दिया गया है.
एंड्रॉइड: https://link.trai.gov.in/98e95436आईओएस: https://link.trai.gov.in/c95bcef1
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        <pubDate>Thu, 13 Aug 2026 23:30:17 +0530</pubDate>
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        <title>Airtel 299 Plan Discontinued: एयरटेल ने दिया झटका, बंद हुआ ये सस्ता प्लान&amp; अब देने होंगे 349</title>
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        <description><![CDATA[ Airtel 299 Plan Discontinued: अगर आप भी एयरटेल कंपनी का सिम इस्तेमाल करते हैं तो ये जानकारी आपके लिए जरूरी साबित हो सकती है. बता दें कि टेलीकॉम कंपनी एयरटेल ने अपने ग्राहकों को एक बड़ा झटका दिया है. कंपनी ने अपना सबसे सस्ता अनलिमिटेड प्रीपेड रिचार्ज प्लान बंद कर दिया है. यानी अब ग्राहकों को जो प्लान सस्ते में मिल जाता था उसको खरीदने के लिए अब पहले से ज्यादा पैसे खर्च करने होंगे. ऐसे में आइए जानते हैं इसके बारे में पूरी जानकारी कि सबसे सस्ते प्लान यानी 299 रुपये में मिलने वाले प्लान पर कितना असर पड़ा है.
299 रुपये वाला प्लान हुआ बंद
एयरटेल ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड सर्किल में अपने सबसे किफायती अनलिमिटेड प्रीपेड रिचार्ज प्लान 299 को बंद कर दिया है. यह प्लान पिछले साल कीमत बढ़ने के बाद लॉन्च हुआ था और करीब एक साल चलने के बाद अब ये प्लान खत्म हो गया है. कंपनी ने इस प्लान को अपनी आधिकारिक वेबसाइट और एयरटेल थैंक्स ऐप से हटा दिया. इस बात की जानकारी यूजर को तब मिली जब सोशल मीडिया पर टिप्स्टर्स ने सबसे पहले इस बदलाव की जानकारी दी, जिसके बाद यह खबर तेजी से फैल गई.
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अब 349 रुपये बनेगा सबसे सस्ता विकल्प
अब सवाल आता है कि 299 रुपये का प्लान हटने के बाद अब कौन सा प्लान होगा जो सबसे सस्ता कहलाएगा, तो ऐसे में आपको बता दें कि अब 349 रुपये का प्लान एयरटेल का सबसे सस्ता अनलिमिटेड रिचार्ज विकल्प बन गया है. जिसके अंदर यूजर्स को 28 दिनों की वैधता के साथ रोज 2 GB हाई स्पीड डेटा, अनलिमिटेड कॉलिंग और प्रतिदिन 100 SMS मिलेंगे. यानी अगर पहले किसी यूजर को अनलिमिटेड बेनिफिट्स के लिए सिर्फ 299 रुपये खर्च करने पड़ते थे, तो अब उसे इसी तरह की सुविधा पाने के लिए 50 रुपये ज्यादा देने होंगे. अच्छी बात ये है कि कंपनी यूजर्स को कुछ एक्स्ट्रा बेनिफिट्स भी दे रही है, जैसे कि म्यूजिक और एंटरटेनमेंट सब्सक्रिप्शन जैसी सुविधाएं, ताकि यूजर्स को महंगे प्लान का एहसास कम हो और वो इसे आसानी से अपना लें.
हालांकि इतना सब मिलने के बाद भी बढ़ती कीमत का असर उन लोगों पर ज्यादा पड़ेगा जो कम बजट में अनलिमिटेड कॉलिंग और डेटा की सुविधा चाहते थे. खासतौर पर स्टूडेंट्स और शहर में रहने वाले लोगों के लिए क्योंकि उनके लिए ये कोई छोटी बात नहीं होगी कि महीने का 50 रुपये एक्स्ट्रा उनके अकाउंट से जाएगा. क्योंकि ऐसे लोगों के लिए अगर 10 रुपये का भी फायदा या नुकसान होता है तो इनको फर्क पड़ता और यहां पर बात 50 रुपये की है.
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        <pubDate>Thu, 13 Aug 2026 23:30:15 +0530</pubDate>
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        <title>Hotel Free WiFi Scams: होटल के फ्री Wi&amp;Fi से कैसे आपका डेटा चुराते हैं हैकर्स? जानें पूरी बात</title>
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        <description><![CDATA[ Hotel Free WiFi Scams: अगर आप भी घूमने-फिरने के शौकीन हैं और होटल में कदम रखते ही सबसे पहले वहां का फ्री वाई-फाई कनेक्ट करते हैं, तो यह खबर आपको एक बड़ा झटका दे सकती है. हाल ही में टेक जगत की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक, माइक्रोसॉफ्ट ने एक रिपोर्ट जारी की है. &amp;nbsp;इस रिपोर्ट के मुताबिक, हैकर्स अब होटलों और कॉन्फ्रेंस हॉलों के फ्री वाई-फाई के जरिए लोगों का पर्सनल डेटा और बैंक अकाउंट्स की जानकारी चुरा रहे हैं. साइबर एक्सपर्ट्स का कहना है कि जब लोग छुट्टियां मनाने होटल जाते हैं, तो वे मोबाइल डेटा बचाने के चक्कर में बिना सोचे-समझे फ्री वाई-फाई से कनेक्ट हो जाते हैं. हैकर्स इसी लापरवाही का फायदा उठाते हैं.
कैसे काम करता है ये जाल?
माइक्रोसॉफ्ट की रिपोर्ट में इस नए साइबर हमले को CaptiveCrunch (Storm-2945) नाम दिया गया है. आमतौर पर जब आप किसी होटल के वाई-फाई से जुड़ते हैं, तो आपके फोन की स्क्रीन पर एक पेज खुलता है. इस पेज पर आपको अपना कमरा नंबर, नाम या मोबाइल नंबर डालना होता है. इसे तकनीकी भाषा में कैप्टिव पोर्टल कहते हैं. हैकर्स ने अब इसी पेज को हैक करना शुरू कर दिया है. जैसे ही कोई यात्री इस पेज पर जाता है, हैकर्स उसके इंटरनेट ट्रैफिक को बीच में ही रोक लेते हैं.&amp;nbsp;
इसके बाद स्क्रीन पर एक नकली पॉप-अप या मैसेज आता है. जिसमें लिखा होता है कि आपका गूगल क्रोम या विंडोज अपडेट होना बाकी है, कृपया यहां क्लिक करके अपडेट करें. जैसे ही कोई यूजर उस अपडेट वाले बटन पर क्लिक करता है, उसके फोन या लैपटॉप में एक खतरनाक वायरस Malware डाउनलोड हो जाता है. इसके बाद यूजर को पता भी नहीं चलता और उसका पूरा डिवाइस हैकर्स के कंट्रोल में आ जाता है.&amp;nbsp;
क्या क्या चुरा लेते है हैकर्स?
एक बार जब वायरस आपके फोन में घुस जाता है, तो हैकर्स आपकी हर हरकत पर नजर रख सकते हैं. वे आपकी नेट बैंकिंग का पासवर्ड, क्रेडिट, डेबिट कार्ड का नंबर और यहां तक कि आपके UPI पिन का भी पता लगा लेते हैं. इसके अलावा आपके फेसबुक, इंस्टाग्राम और ईमेल के पासवर्ड तक चोरी हो सकते हैं. इस वायरस से आपके फोन में मौजूद निजी तस्वीरें, वीडियो और जरूरी दस्तावेज हैकर्स के पास पहुंच जाते हैं.&amp;nbsp;
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खुद को इन हैकर्स से कैसे बचाएं?
इससे बचने का सबसे सुरक्षित तरीका यही है कि आप होटल के वाई-फाई का इस्तेमाल ही न करें. अपने मोबाइल के इंटरनेट का उपयोग करें. अगर होटल का वाई-फाई इस्तेमाल करना बहुत जरूरी है, तो अपने फोन में एक अच्छा वीपीएन ऐप डाउनलोड कर लें. वीपीएन चालू करने से आपका डेटा पूरी तरह सुरक्षित और लॉक हो जाता है, जिसे हैकर्स पढ़ नहीं पाते. इसके अलावा वाई-फाई कनेक्ट करते समय अगर कोई भी ऐप, ब्राउजर या सॉफ्टवेयर अपडेट करने का विकल्प आए, तो उसे तुरंत कैंसिल कर दें.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Thu, 13 Aug 2026 23:30:13 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>5G महंगा हुआ तो 4G की ओर लौटे ग्राहक! बजट फोन की बढ़ी मांग</title>
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        <description><![CDATA[ 4G Smartphone: देश में स्मार्टफोन की काफी डिमांड देखी जाती है. लोग प्रीमियम फोन से लेकर बजट स्मार्टफोन तक पसंद करते हैं. लेकिन कुछ समय से देश में स्मार्टफोन मार्केट में काफी बदलाव देखने को मिल रहा है. आपको बता दें कि देश में 5जी स्मार्टफोन की कीमतों में पिछले कुछ समय से इजाफा देखने को मिला है. इसी वजह से अब एक रिपोर्ट सामने आई है जिससे ये पता चलता है कि लोग अब फिर से 4जी स्मार्टफोन की ओर चल पड़े हैं.
रिपोर्ट में हुआ खुलासा
IDC के आंकड़ों के मुताबिक, 2026 की दूसरी तिमाही में भारत में कुल स्मार्टफोन शिपमेंट में 4G फोन की हिस्सेदारी बढ़कर 11.1 प्रतिशत हो गई जबकि पिछली तिमाही में ये आंकड़ा 5.8 प्रतिशत था.
Counterpoint के रिसर्च डायरेक्टर तरुण पाठक के अनुसार, एंट्री-लेवल और बजट कैटेगरी में 4G स्मार्टफोन की मांग तेजी से बढ़ी है. Q2 2026 में 4G स्मार्टफोन शिपमेंट पिछली तिमाही के मुकाबले करीब 40 प्रतिशत बढ़े हैं.

इस रिपोर्ट से ये साफ होता है कि आज के समय में अब लोग ज्यादा एडवांस फीचर और टेक्नोलॉजी की जगह पर बजट स्मार्टफोन को ज्यादा महत्व दे रहे हैं.
इन फोन की बिक्री में गिरावट
जानकारी के अनुसार, बढ़ती कीमतों का असर मार्केट में सबसे ज्यादा एंट्री-लेवल वाले स्मार्टफोन पर देखने को मिला है. बताया जा रहा है कि 100 डॉलर से कम कीमत वाले फोन की शिपमेंट Q2 2026 में सालाना बेस पर 74.3 प्रतिशत गिर गई है.
बता दें कि इस कैटेगरी की बाजार में हिस्सेदारी पहले 15.6 प्रतिशत थी जो अब घटकर महज 4.5 प्रतिशत रह गई है. कंपनियों का मानना है कि बढ़ती लागत के चलते अब कम कीमत वाले स्मार्टफोन को बनाना और उनपर मुनाफा कमाना काफी मुश्किल हो चुका है.
महंगे हो हए स्मार्टफोन
आपको बता दें कि पिछले कुछ समय से स्मार्टफोन की कीमतों में काफी इजाफा देखने को मिला है. 2026 की दूसरी तिमाही में भारत में स्मार्टफोन शिपमेंट सालाना बेस पर 11.1 प्रतिशत घटकर 3.32 करोड़ यूनिट रह गया है.
इस गिरावट के पीछे का कारण ग्लोबल लेवल पर मेमोरी चिप की कमी बताई जा रही है. बता दें कि मेमोरी कंपोनेंट की कीमत बढ़ने से स्मार्टफोन बनाने वाली कंपनियों ने भी डिवाइस की कीमतों में इजाफा किया है.
कंपनियों के लिए 4G फोन बना ऑप्शन
आपको बताते चलें कि बजट वाले 5G स्मार्टफोन भी अब महंगे हो चुके हैं जिसकी वजह से अब कई स्मार्टफोन बनाने वाली कंपनियां 4G मॉडल को दोबारा से लॉन्च करने पर फोकस करने लगी हैं. इससे उन्हें कम कीमत वाले सेगमेंट में अपनी पकड़ बनाए रखने में काफी मदद मिल रही है.

हालांकि, IDC के मुताबिक, ऐसा करने से लंबे समय तक मार्केट में बने रहना काफी मुश्किल होगा. मौजूदा 4G स्टॉक खत्म होने के बाद ग्राहकों के सामने या तो महंगा 5G फोन खरीदने या पुराने 4जी पर ही टिके रहने का ही ऑप्शन बच जाएगा.
आने वाले महीने होंगे और मुश्किल
IDC का मानना है कि 2026 के आने वाले महीनों में स्मार्टफोन मार्केट में और मुश्किल देखने को मिल सकती है. माना जा रहा है कि H2 में शिपमेंट में 15 प्रतिशत से भी ज्यादा गिरावट देखने को मिल सकती है. इस हिसाब से देखा जाए तो पूरे साल का स्मार्टफोन बाजार महज 130 मिलियन यूनिट पर सिमट के रह सकता है.
अगर मेमोरी चिप की कीमतें स्टेबल रहती हैं और फेस्टिव सीजन में मिड-प्रीमियम फोन की मांग में इजाफा होता है तो मार्केट में कुछ राहत देखने को मिल सकती है. लेकिन अगर मेमोरी चिप की कमी 2027 तक जारी रहती है तो स्मार्टफोन मार्केट में काफी गिरावट देखने को मिल सकती है.
स्मार्टफोन खरीदने में लोग कर रहे देरी
दरअसल, स्मार्टफोन की बढ़ती कीमतों के बावजूद लोग स्मार्टफोन को खरीदना बंद नहीं कर रहे हैं बल्कि खरीदने के समय को बढ़ा रहे हैं. आसान भाषा में बताएं तो जिस फोन को पहले लोग तुरंत खरीद लेते थे उसी फोन को खरीदने के लिए अब लोग ज्यादा समय ले रहे हैं.
ऐसे माहौल में 4G फोन की वापसी इस बात का संकेत है कि भारतीय बाजार में किफायती कीमत अभी भी सबसे बड़ा फैक्टर बनी हुई है. आने वाले महीनों में ये देखना दिलचस्प होगा कि 4G स्मार्टफोन में आया ये उछाल सिर्फ महंगे 5G की वजह से है या फिर इसकी फिर से मार्केट में वापसी हो सकती है.
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        <pubDate>Thu, 13 Aug 2026 07:30:15 +0530</pubDate>
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        <title>iPhone में मिलेगा Photo Authentication फीचर! जानें कैसे मिलेगा फायदा</title>
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        <description><![CDATA[ Apple Photo Authentication Feature: एप्पल के डिवाइसेज को पूरी दुनिया में खूब पसंद किया जाता है. देश में एप्पल आईफोन का युवाओं में खास क्रेज देखने को मिलता है. बता दें कि एप्पल के डिवाइस को उनमें मिलने वाले बेहतरीन फीचर्स की वजह से ज्यादा पसंद किया जाता है. कंपनी समय-समय पर डिवाइसेज के लिए सॉफ्टवेयर अपडेट पेश करती रहती है जिसमें कुछ नए फीचर्स ऐड किए जाते हैं.
इसी कड़ी में बता दें कि कंपनी जल्द ही अपने नए अपडेट में एक खास फीचर यूजर्स के लिए पेश करने की तैयारी में है. जानकारी के अनुसार, इस फीचर का नाम Apple Reference Image हो सकता है. आइए जानते हैं पूरी जानकारी.
क्या है Apple Reference Image?
दरअसल, मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, iOS 27 के लेटेस्ट बीटा वर्जन में ऐसे संकेत मिले हैं जो कंपनी के नए फोटो ऑथेंटिकेशन सिस्टम की ओर इशारा करते हैं. माना जा रहा है कि कंपनी इस फीचर को Apple Reference Image के नाम से पेश कर सकती है.

इसके अलावा माना जा रहा है कि इस फीचर का मकसद किसी भी फोटो के सोर्स के बारे में जानकारी देना हो सकता है. इससे ये साफ होता है कि अब ये जानना आसान हो जाएगा कि फोटो आईफोन से ली गई है या फिर एआई से बनी हुई है या फिर किसी दूसरे सोर्स से ली गई है. हालांकि, अभी ये फीचर बीटा टेस्टिंग फेज में है और Apple की ओर से भी इसको लेकर कोई आधिकारीक जानकारी शेयर नहीं की गई है.
AI फोटो की पहचान से थोड़ा अलग होगा तरीका
जानकारी के लिए बता दें कि अभी AI से बने कंटेंट की पहचान के लिए कई कंपनियां डिजिटल वॉटरमार्किंग जैसी टेक्नोलॉजी पर काम कर रही हैं. उदाहरण के लिए बता दें कि AI से बनाई गई तस्वीर में ऐसे डिजिटल हिंट्स ऐड किआ जा सकते हैं जिनसे बाद में ये पता चलेगा कि फोटो एआई से बनाई गई है या नहीं.
Apple भी अपने AI इमेज टूल्स के साथ इसी तरह की टेक्नोलॉजी पर काम कर रहा है. दूसरी तरफ Google अपने SynthID सिस्टम के जरिए AI से बने कंटेंट की पहचान और वॉटरमार्किंग को आगे बढ़ा रहा है. लेकिन Reference Image का तरीका इससे थोड़ा अलग होगा.
कैसे होगी फोटो की जांच?
जानकारी के अनुसार, किसी फोटो को वेरिफाई करने के लिए उसके कैमरा सेंसर से जुड़ी जानकारी और मेटाडेटा का इस्तेमाल किया जाता है. ये जानकारी Apple के Private Cloud Compute सिस्टम को भेजी जा सकती है जहां फोटो के सोर्स की जांच की जाएगी.
बता दें कि इस प्रोसेस का मकसद फोटो के कंटेंट को केवल देखकर फैसला करना नहीं बल्कि उससे जुड़े टेक्निकल चीजों के आधार पर ये पता लगाना होगा कि फोटो असल में iPhone कैमरे से कैप्चर हुई है या नहीं.
हालांकि, इसके लिए iPhone कैमरा में एक नया Reference Mode एक्टिवेट करना जरूरी होगा है. इसका मतलब ये हुआ कि अगर यूजर को फोटो की पूरी जानकारी लेनी है तो फोटो लेते समय उसे इस मोड को एक्टिवेट करना जरूरी होगा.

बताते चलें कि आज AI की मदद से फोटो बनाना और किसी फोटो में बदलाव करना पहले के मुकाबले काफी आसान हो गया है. अब एआई कुछ ही सेकेंड में ऐसी फोटो तैयार कर देता है जिसे देखकर ये बताना मुश्किल हो जाता है कि इसे कैमरे से लिया गया है कि एआई से बनाया गया है.
इसी वजह से आज के समय में किसी फोटो की असल पहचान कर पाना काफी मुश्किल हो चुका है. सोशल मीडिया पर भी ऐसी कई वायरल फोटो देखने को मिलती हैं जिन्हें असली बताया जाता है लेकिन बाद में वो एआई से बनी पाई जाती हैं.
अब अगर Apple का ये सिस्टम सही तरीके से काम करता है तो किसी फोटो के बारे में ये एक्सट्रा जानकारी मिल सकती है कि वह असल में iPhone कैमरे से कैप्चर की गई थी या नहीं.
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        <pubDate>Thu, 13 Aug 2026 07:30:14 +0530</pubDate>
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        <title>अब Samsung Galaxy Buds बनेंगे Hearing Aid, FDA ने दी मंजूरी</title>
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        <description><![CDATA[ Samsung Galaxy Buds Hearing Aid : ईयरबड्स गाने सुनने या कॉल करने तक सीमित नहीं रह गए हैं. अब इनमें हेल्थ से जुड़ी सुविधाएं भी तेजी से जुड़ रही हैं. इसी बीच Samsung ने एक बड़ा कदम उठाया है. कंपनी ने ऐलान किया है कि उसके Galaxy Buds के Hearing Aid फीचर को अमेरिकी Food and Drug Administration यानी FDA से मंजूरी मिल गई है. इसके बाद कुछ Galaxy Buds को बिना प्रिस्क्रिप्शन के OTC यानी Over-the-Counter Hearing Aid की तरह इस्तेमाल किया जा सकेगा. यह सुविधा 18 साल और उससे ज्यादा उम्र के उन लोगों के लिए है, जिन लोगों को हल्की या थोड़ी ज्यादा सुनने की दिक्कत होती है.&amp;nbsp;
Galaxy Buds में मिलेगा Hearing Aid फीचर
Samsung के मुताबिक, Hearing Aid फीचर यूजर की सुनने की क्षमता के अनुसार आवाज को बढ़ाने का काम करेगा. खासतौर पर ऐसी आवाजें, जिन्हें सुनने में परेशानी होती है, जैसे तेज फ्रीक्वेंसी वाली आवाजें, आसपास की धीमी आवाजें और दूर से आने वाली आवाजें, उन्हें यूजर की जरूरत के हिसाब से बढ़ाया जा सकेगा. इस फीचर में Noise Elimination और Beamforming जैसी सुविधाएं भी दी गई हैं. इनकी मदद से सामने से आने वाली आवाजों पर फोकस करने और बैकग्राउंड शोर को कम करने में मदद मिलेगी.&amp;nbsp;
5 मिनट में कर सकेंगे Hearing Test
Samsung Galaxy Buds में Hearing Test फीचर भी दिया गया है. कंपनी के अनुसार, यूजर बिना किसी अलग ऐप के करीब 5 मिनट में खुद अपनी सुनने की जांच कर सकेगा. यह सॉफ्टवेयर दोनों कानों की अलग-अलग जांच करता है और यूजर की सुनने की क्षमता के आधार पर Audiogram तैयार करता है. टेस्ट के नतीजों में सुनने की क्षमता को सामान्य या Hearing Loss के चार लेवल माइल्ड, मॉडरेट, सीवियर और प्रोफाउंड में बताया जाता है. Samsung के अनुसार, यह टेस्ट क्लिनिकल-ग्रेड Pure-Tone Audiometry तकनीक का इस्तेमाल करता है.&amp;nbsp;
Hearing Test के आधार पर काम करेगा फीचर
Hearing Test से मिले परिणामों के आधार पर Hearing Aid फीचर यूजर के लिए आवाज को व्यक्तिगत तरीके से एडजस्ट करेगा. Galaxy Buds में NAL-NL2 फॉर्मूला इस्तेमाल किया गया है, जिसे कंपनी ने प्रिस्क्रिप्शन Hearing Aid की फिटिंग के लिए क्लिनिकल स्टैंडर्ड बताया है.&amp;nbsp;
किन Galaxy Buds में मिलेगा यह फीचर?
Samsung के अनुसार, Hearing Aid और Hearing Test फीचर Galaxy Buds3 Pro और Galaxy Buds4 Pro में अमेरिका और सिलेक्टिव एक्सपेट बाजारों में 2026 की चौथी तिमाही यानी Q4 में उपलब्ध होंगे. इसके लिए कम्पैटिबल Galaxy डिवाइस में One UI 8 या उसके बाद का वर्जन जरूरी होगा. कंपनी ने यह भी साफ किया है कि यह फीचर प्रोफेशनल मेडिकल जांच या इलाज का ऑप्शन नहीं है.
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Samsung ने कब शुरू की थी Hearing Technology?
Samsung ने बताया कि वह 2020 से Hearing Support Technology पर काम कर रहा है. उसी साल Galaxy Buds+ में Personal Sound Amplification Product यानी PSAP फीचर पेश किया गया था. 2021 में इस फीचर को Hearing Loss वाले लोगों के डेली के कम्युनिकेशन में प्रभावी मदद के रूप में क्लिनिकली वैलिडेट किया गया. नए OTC समाधान को विकसित करने के लिए Samsung ने National Acoustic Laboratories और Samsung Medical Center के साथ काम किया. इसकी टेक्नोलॉजी को Vanderbilt University Medical Center, San Jose State University और University of Memphis में किए गए क्लिनिकल वैलिडेशन स्टडीज का भी सपोर्ट मिला.&amp;nbsp;
दुनिया में कितने लोग सुनने की क्षमता से प्रभावित?
WHO के मुताबिक, दुनियाभर में 1.5 अरब से ज्यादा लोग किसी न किसी स्तर की Hearing Loss से प्रभावित हैं. यह संख्या 2050 तक बढ़ कर 2.5 अरब तक पहुंचने का अनुमान है. Samsung के अनुसार, महंगे Hearing Aids की प्रोफेशनल केयर तक सीमित पहुंच की वजह से कई लोग Hearing Aid का इस्तेमाल नहीं करते हैं.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Thu, 13 Aug 2026 07:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>कैसे काम करता है Abhigyan App, 15 अगस्त पर कैसे करेगा लाल किले की सुरक्षा?</title>
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        <description><![CDATA[ Independence Day 2026 : 15 अगस्त 2026 को जब लाल किले की प्राचीर से देश के प्रधानमंत्री तिरंगा फहराएंगे, तब समारोह स्थल और आसपास के इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था भी बेहद कड़ी रहेगी. इस बार सुरक्षा में सिर्फ पुलिस बल ही नहीं, बल्कि AI और मॉर्डन तकनीक का भी इस्तेमाल किया जा रहा है. लाल किले पर बड़ी संख्या में वीआईपी, वीवीआईपी और करीब 25 हजार आम दर्शकों की मौजूदगी को देखते हुए सुरक्षा एजेंसियां Abhigyan App का इस्तेमाल कर रही हैं. ऐसे में आइए जानते हैं कि अभिज्ञान ऐप क्या है, कैसे काम करता है और 15 अगस्त पर यह कैसे लाल किले की सुरक्षा करेगा.
क्या है Abhigyan App?
Abhigyan App को राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी NCRB की ओर से तैयार किया गया है. यह ऐप सुरक्षा एजेंसियों को मौके पर ही किसी संदिग्ध व्यक्ति की पहचान और उसके आपराधिक रिकॉर्ड की जांच करने में मदद करता है. &amp;nbsp;इसके लिए सुरक्षाकर्मियों को हैंडहेल्ड बायोमेट्रिक डिवाइस और पोर्टेबल फिंगरप्रिंट स्कैनर दिए गए हैं. किसी व्यक्ति पर शक होने पर पुलिसकर्मी मौके पर ही उसका फिंगरप्रिंट स्कैन कर सकते हैं.&amp;nbsp;
कैसे काम करता है Abhigyan App?
यह ऐप National Automated Fingerprint Identification System (NAFIS) से लिंक है. फिंगरप्रिंट स्कैन होने के बाद ऐप उसे एक करोड़ से ज्यादा अपराधियों वाले डेटाबेस में तलाशता है. पूरी प्रक्रिया कुछ ही सेकंड में पूरी हो जाती है और करीब 35 सेकंड में पहचान से जुड़ा रिजल्ट सामने आ सकता है. &amp;nbsp;अगर फिंगरप्रिंट किसी पुराने अपराधी के रिकॉर्ड से मैच होता है, तो स्क्रीन पर लाल सिग्नल दिखाई देता है और संबंधित व्यक्ति की आपराधिक जानकारी सामने आ जाती है. वहीं अगर कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं मिलता, तो हरा सिग्नल दिखाई देता है.&amp;nbsp;
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लाल किले पर क्यों इस्तेमाल हो रहा है?
15 अगस्त जैसे बड़े और संवेदनशील कार्यक्रम में हजारों लोगों की मौजूदगी के बीच हर संदिग्ध व्यक्ति को जांच के लिए पुलिस स्टेशन ले जाना आसान नहीं होता है. ऐसे में Abhigyan App पुलिस को मौके पर ही फिंगरप्रिंट के जरिए जांच करने की सुविधा देती है. इससे भीड़ में मौजूद किसी संदिग्ध या पुराने अपराधी की पहचान जल्दी की जा सकती है और जरूरत पड़ने पर आगे की कार्रवाई की जा सकती है.&amp;nbsp;
15 अगस्त पर यह कैसे लाल किले की सुरक्षा करेगा?
लाल किले और आसपास के इलाकों में करीब 1,000 CCTV कैमरे लगाए गए हैं. इनमें फेशियल रिकग्निशन सिस्टम यानी FRS वाले कैमरे भी शामिल हैं. इसके अलावा हाई-रिजॉल्यूशन कैमरों से लैस FRS वैन भी तैनात की गई हैं. ये सिस्टम भीड़ में चेहरों को स्कैन करके उपलब्ध डेटाबेस से मिलाते हैं. किसी वांटेड या संदिग्ध व्यक्ति की पहचान होने पर अलर्ट जारी किया जाता है और कंट्रोल रूम को जानकारी भेजी जाती है. इसके साथ ही एंटी-ड्रोन सिस्टम भी सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Thu, 13 Aug 2026 07:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>आज लॉन्च होगा Google Pixel 11! जानें कहां देखें LIVE</title>
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        <description><![CDATA[ आज लॉन्च होगा Google Pixel 11! जानें कहां देखें LIVE ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 13 Aug 2026 07:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>Grok Imagine Image 2.0 : Grok का Image 2.0 मॉडल हुआ लॉन्च, अब मनचाही फोटो एडिटिंग होगी आसान</title>
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        <description><![CDATA[ Grok Imagine Image 2.0 : AI की दुनिया में फोटो बनाने और उन्हें एडिट करने का तरीका तेजी से बदल रहा है. अब सिर्फ फोटो जनरेट करना ही काफी नहीं माना जा रहा, बल्कि यूजर्स को फोटो के छोटे-से-छोटे हिस्से पर भी अपनी पसंद के मुताबिक बदलाव करने की सुविधा चाहिए. इसी दिशा में एलन मस्क की AI कंपनी xAI ने अपना नया इमेज मॉडल Grok Imagine Image 2.0 लॉन्च किया है. कंपनी का कहना है कि यह मॉडल खास तौर पर सटीक फोटो एडिटिंग, बेहतर टेक्स्ट रेंडरिंग और असली दुनिया के कामों के लिए यूजफुल इमेज तैयार करने पर फोकस करता है.&amp;nbsp;
फोटो के खास हिस्से को बदलना होगा आसान
Grok Image 2.0 की सबसे खास बात इसका टारगेटेड एडिटिंग फीचर है. इसके जरिए यूजर्स को पूरी फोटो दोबारा बनाने की जरूरत नहीं होगी. फोटो के जिस खास हिस्से में बदलाव करना है, उसे चुनकर सिर्फ उसी हिस्से को एडिट किया जा सकता है.
इसके लिए इसमें Magic Wand टूल दिया गया है. यूजर फोटो के किसी हिस्से को चुनकर उसमें अपनी जरूरत के हिसाब से बदलाव कर सकता है. इसके अलावा मॉडल में बैकग्राउंड रिमूवल और बेहतर सेगमेंटेशन जैसे फीचर्स भी शामिल हैं. ये टूल प्रोडक्ट फोटोग्राफी, सोशल मीडिया कंटेंट और मार्केटिंग कैंपेन जैसे कामों में यूजफुल हो सकते हैं.
एक साथ 5 फोटो का कर सकेंगे यूज
Image 2.0 में मल्टी-रेफरेंस सपोर्ट भी दिया गया है. इसका मतलब है कि यूजर्स एक साथ पांच अलग-अलग रेफरेंस इमेज इनपुट के तौर पर यूज कर सकते हैं. इन फोटो के अलग-अलग एलिमेंट्स को मिलाकर नई फोटो या एडिट तैयार किया जा सकता है. इस फीचर की मदद से किसी खास कैरेक्टर, स्टाइल या प्रोडक्ट के लुक को अलग-अलग फोटो में एक जैसा रखना आसान हो सकता है. इसके अलावा इसमें Smart Resize फीचर भी दिया गया है, जो एक फोटो को नौ अलग-अलग आस्पेक्ट रेशियो में बदल सकता है. इससे वेबसाइट, विज्ञापन और सोशल मीडिया के लिए एक ही फोटो को अलग-अलग साइज में तैयार किया जा सकता है.&amp;nbsp;
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Grok Image 2.0 की रैंकिंग कितनी है?
कंपनी के मुताबिक, 7 अगस्त 2026 तक के Arena लीडरबोर्ड डेटा में Grok Imagine Image 2.0 ने टेक्स्ट-टू-इमेज और इमेज एडिटिंग दोनों कैटेगरी में दुनिया में दूसरा नंबर हासिल किया है. इमेज एडिटिंग Arena में इसे 1,439 Elo पॉइंट्स मिले हैं, जबकि पहले नंबर पर मौजूद OpenAI के GPT Image 2 को 1,463 पॉइंट्स मिले. वहीं टेक्स्ट-टू-इमेज कैटेगरी में Grok को 1,320 और GPT Image 2 को 1,380 Elo पॉइंट्स मिले हैं.&amp;nbsp;
कहां यूज कर सकते हैं?
Grok Imagine Image 2.0 फिलहाल Grok के वेब वर्जन grok.com/imagine के साथ-साथ iOS और Android ऐप्स में Quality Mode के तौर पर उपलब्ध है, हालांकि डेवलपर्स के लिए इसकी API एक्सेस अभी उपलब्ध नहीं है और इसके जल्द आने की जानकारी दी गई है, लेकिन इसकी कोई तय तारीख नहीं बताई गई है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Wed, 12 Aug 2026 15:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>इस देश ने Meta Smart Glasses पर लगाया बैन! जानिए क्या है वजह</title>
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        <description><![CDATA[ Meta Smart Glasses: बढ़ती टेक्नोलॉजी के साथ मार्केट में अब कई सारे एडवांस डिवाइसेज भी आ चुके हैं जिन्हें लोगों से अच्छा रिस्पांस भी मिल रहा है. इसी कड़ी में मेटा ने कुछ समय पहले अपना स्मार्ट ग्लासेज को बाजार में उतारा था. ये एक बेहतरीन फ्यूचरिस्टिक गैजेट के रूप में बाजार में ऊभर के आया था.
हालांकि, ये स्मार्ट चश्मा देखने में बिलकुल नॉर्मल लगता है लेकिन इसमें कई सारे स्मार्ट फीचर्स मौजूद हैं जो लोगों को बेहद पसंद आते हैं. लेकिन अब ये गैजेट कंपनी के लिए मुसीबत बनती जा रही है. जी हां, दरअसल, ब्रिटेन में कई जगहों पर इसके इस्तेमाल को लेकर रोक लगा दी गई है. आइए जानते हैं क्या है पूरा मामला.
इन जगहों पर लगा Smart Glasses पर बैन
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, ब्रिटेन में हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री के कई बड़े नाम अब इन स्मार्ट ग्लास को लेकर सावधान हो चुके हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक, लंदन के कुछ प्रीमियम रेस्टोरेंट, प्राइवेट मेंबर्स क्लब से लेकर बड़े पब ग्रुप अब मेटा के स्मार्ट ग्लासेज को लेकर सख्ती कर रहे हैं. यहां पर आने वाले लोगों से इस गैजेट को न पहनने के लिए कहा जा रहा है. इसके अलावा लोग इस गैजेट की मदद से कुछ भी रिकॉर्ड भी नहीं कर सकते हैं. बता दें कि ये फैसला दूसरे लोगों की प्राइवेसी को ध्यान में रखते हुए लिया गया है.

Instagram भी ऐसे कंटेंट पर सख्त
आपको बता दें कि इन विवादों का असर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भी दिखाई दे रहा है. Instagram के प्रमुख Adam Mosseri ने कहा है कि इस गैजेट जो भी कंटेंट बनाए जाते हैं और अगर उसमें किसी इंसान की प्राइवेसी का उलंघन होता है तो ऐसे कंटेंट को प्लेटफॉर्म से तुरंत हटा दिया जाएगा.
इसीलिए अगर किसी ने भी मेटा स्मार्ट ग्लासेज के इस्तेमाल से किसी भी इंसान के बिना परमिशन के कंटेंट बनाया तो उसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पोस्ट नहीं किया जा सकेगा. ऐसा करना लोगों की प्राइवेसी का उलंघन होता है. इतना ही नहीं, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के पास ये अधिकार है कि वह उस कंटेंट या चैनल पर लीगल एक्शन भी ले सकता है.
विवाद के बीच फंसा गैजेट
आपको बता दें कि Meta Smart Glasses लोगों के बीच काफी तेजी से फेमश हुआ था लेकिन अब इस गैजेट को लेकर कई विवाद भी सामने आ रहे हैं. रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक साल में करीब इस गैजेट की 70 लाख से भी ज्यादा यूनिट्स बिक चुकी हैं.
Meta लगातार अपने स्मार्ट ग्लास की रेंज को भी बढ़ा रही है. कंपनी ने अलग-अलग डिजाइन और सेलिब्रिटी से जुड़े वेरिएंट पेश करके इन्हें सिर्फ टेक गैजेट के बजाय फैशन एक्सेसरी बनाने की कोशिश की है. लेकिन इस गैजेट की बढ़ती बिक्री के साथ पब्लिक जगहों पर इनके इस्तेमाल को लेकर सवाल भी ज्यादा गंभीर होते नजर आ रहे हैं.
आगे बढ़ सकती हैं पाबंदियां
Meta Smart Glasses की टेक्नोलॉजी निश्चित तौर पर स्मार्टफोन के इस्तेमाल का तरीका बदलने की क्षमता रखती है. लेकिन पब्लिक प्लेसेज पर इनके इस्तेमाल को लेकर काफी सवाल उठ रहे हैं. ऐसा इसलिए है क्योंकि इस गैजेट में कैमरा लगा हुआ है और ये किसी भी इंसान की प्राइवेसी पर खतरा बन सकता है.

ब्रिटेन में रेस्टोरेंट, पब, क्लब और थिएटर द्वारा उठाए जा रहे कदम ये दिखाते हैं कि गैजेट में सिर्फ टेक्निकल सेफ्टी ही जरूरी नहीं होती है. आने वाले समय में दूसरे देशों के बिजनेस एरिया भी स्मार्ट ग्लास के इस्तेमाल को लेकर अलग नियम बना सकते हैं.
ऐसे में Meta के लिए चुनौती सिर्फ नए फीचर्स और बिक्री बढ़ाने की नहीं है. कंपनी को ये भरोसा भी कायम करना होगा कि उसके स्मार्ट ग्लास लोगों की पर्सनल जिंदगी के लिए खतरा नहीं बनेंगे. जैसे-जैसे ये डिवाइस ज्यादा लोगों के हाथों तक पहुंचेंगे, Privacy और Consent से जुड़े नियम इनके भविष्य को तय करने में एक अहम भूमिका निभा सकते हैं.
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        <pubDate>Wed, 12 Aug 2026 15:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>TRAI spam Call Report 2026: तीन माह में 24.4 बिलियन स्पैम संचार दर्ज, सुरक्षा एजेंसियों की बढ़ी चिंता</title>
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        <description><![CDATA[ TRAI spam Call Report 2026: भारत में स्पैम कॉल्स और मैसेज का आतंक इस कदर बढ़ गया है कि देश की सुरक्षा एजेंसियों और टेलिकॉम रेगूलेटर बॉडी TRAI की चिंताए सातवें आसमान पर पहुंच गई हैं. हाल ही में TRAI ने एक रिपोर्ट जारी की जिसके मुताबिक साल 2026-27 की पहली तिमाही यानी अप्रैल से जून के दौरान देश में 24.4 अरब से ज्यादा स्पैम कॉल और मैसेज दर्ज किए गए. अगर इसे रोजाना के हिसाब से देखे तो यह आंकड़ा 26 करोड़ स्पैम कम्युनिकैशन के बराबर बैठता है. यह आकड़े हमारे मोबाइल नेटवर्क की सुरक्षा पर बड़ा सवाल खड़ा कर देते हैं.&amp;nbsp;
AI सिस्टम ने खोला राज
टेलिकॉम कंपनियों ने स्पैस कॉलर्स और जालसाजों को पकड़ने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस AI तैनात कर रखे है. ट्राई और टेलीकॉम कंपनियों द्वारा तैनात किए गए एडवांस AI-बेस्ड स्पैम डिटेक्शन सिस्टम ने कुल 22.99 बिलियन लगभग 2,300 करोड़ से अधिक संदिग्ध कॉल्स की पहचान की, जो आम लोगों को ठगने या परेशान करने के लिए किए जा रहे थे. यह देश में आने वाले कुल कॉल्स का करीब 3.2 फीसदी है. इसके अलावा, 1.44 बिलियन 144 करोड़ से अधिक संदिग्ध स्पैम मैसेज को भी एआई ने समय रहते फ्लैग या ट्रैक किया है.&amp;nbsp;
सकरार और TRAI का बड़ा एक्शन
इन स्पैम कॉल को रोकने के लिए सरकार और ट्राई ने मिलकर अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई की है. नियमों का उल्लंघन करने के कारण 1.83 लाख से अधिक टेलीकॉम रिसोर्सेज पर ताला लगा दिया गया है. इनमें से 1.37 लाख से अधिक नंबरों को पहली बार गलती करने पर 15 दिनों के लिए बैन किया गया, जबकि बार-बार नियमों की धज्जियां उड़ाने वाले 46,786 कनेक्शनों को सीधे एक साल के लिए डिस्कनेक्ट कर दिया गया है.&amp;nbsp;
इसके अलावा स्पैम और धोखाधड़ी वाले मैसेज भेजने वाले 263 थोक प्रेषकों को पूरी तरह से ब्लैकलिस्ट कर दिया गया है. इसके साथ ही, 2,873 एसएमएस हेडर्स को भी हमेशा के लिए ब्लॉक कर दिया गया है. साथ ही ट्राई ने कड़ा रुख अपनाते हुए रिलायंस जियो, एयरटेल और वोडाफोन-आइडिया जैसी बड़ी कंपनियों पर भी करोड़ों रुपये का जुर्माना ठोका है, क्योंकि वे अपने नेटवर्क पर स्पैमर्स को रोकने में ढीली साबित हुई थीं.
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सुरक्षा एजेंसियों के लिए क्यों है चिंता का विषय
सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि इतने बड़े पैमाने पर होने वाले स्पैम संचार के पीछे सिर्फ सामान बेचने वाली कंपनियां नहीं हैं, बल्कि बड़े साइबर क्रिमिनल्स के समूह सक्रिय हैं. इन स्पैम कॉल्स और मैसेज का एक बड़ा हिस्सा बैंकिंग फ्रॉड, फर्जी केवाईसी अपडेट, लोन के झूठे ऑफर और यूपीआई ठगी से जुड़ा होता है. ये जालसाज अक्सर सरकारी अधिकारी या नामी कंपनियों के प्रतिनिधि बनकर लोगों को कॉल करते हैं. इससे न सिर्फ आम लोगों का पैसा डूब रहा है, बल्कि देश के डिजिटल इकोसिस्टम पर से भरोसा भी कम हो रहा है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Wed, 12 Aug 2026 15:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>TRAI, spam, Call, Report, 2026:, तीन, माह, में, 24.4, बिलियन, स्पैम, संचार, दर्ज, सुरक्षा, एजेंसियों, की, बढ़ी, चिंता</media:keywords>
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        <title>Washing Machine Usage Tips : वॉशिंग मशीन में ज्यादा डिटर्जेंट डालते हैं? हो जाएगी खराब</title>
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        <description><![CDATA[ Washing Machine Usage Tips : आजकल वॉशिंग मशीन ने कपड़े धोने का काम काफी आसान कर दिया है. कपड़े मशीन में डालिए, डिटर्जेंट डालिए और बस एक बटन दबाते ही काम शुरू, लेकिन इसी आसान प्रक्रिया में एक ऐसी गलती हो जाती है, जिसे लोग अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं. बहुत से लोगों को लगता है कि ज्यादा डिटर्जेंट डालने से कपड़े ज्यादा साफ और चमकदार होंगे, लेकिन ज्यादा डिटर्जेंट का मतलब ज्यादा सफाई नहीं होती है. जरूरत से ज्यादा डिटर्जेंट कपड़ों पर अवशेष छोड़ने के साथ-साथ वॉशिंग मशीन की कार्यक्षमता को भी प्रभावित कर सकता है.&amp;nbsp;
ज्यादा डिटर्जेंट डालने से क्या होता है?
वॉशिंग मशीन में जरूरत से ज्यादा डिटर्जेंट डालने पर बहुत ज्यादा झाग बन सकता है. यह झाग कपड़ों के रेशों के बीच फंस जाता है और कई बार पूरी तरह धुल नहीं पाता है. इसके कारण कपड़े धोने के बाद कड़क महसूस हो सकते हैं, उन पर सफेद निशान दिखाई दे सकते हैं और उनमें अजीब सी गंध भी आ सकती है. इतना ही नहीं, अतिरिक्त डिटर्जेंट धीरे-धीरे मशीन के ड्रम, पाइप, फिल्टर और दूसरे हिस्सों में जमा हो सकता है. इससे वॉटर ड्रेनेज प्रभावित हो सकती है और मशीन को सामान्य तरीके से काम करने में परेशानी आ सकती है.&amp;nbsp;
वॉशिंग मशीन की उम्र भी हो सकती है कम
जरूरत से ज्यादा डिटर्जेंट का इस्तेमाल लंबे समय तक करने पर मशीन के अंदर अवशेष जमा होने लगते हैं. इससे ड्रेनेज सिस्टम जाम होने, झाग के ज्यादा बनने और मशीन की धुलाई क्षमता प्रभावित होने जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं. कुछ मामलों में मशीन के अंदर नमी के साथ फफूंद, काई और बैक्टीरिया भी पनप सकते हैं, खासकर रबर गैसकेट के आसपास, इससे मशीन से बदबू आने लग सकती है. ऐसे में हर बार ज्यादा डिटर्जेंट डालना मशीन के लिए फायदेमंद नहीं, बल्कि नुकसानदायक हो सकता है.&amp;nbsp;
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कितना डिटर्जेंट डालना चाहिए?
डिटर्जेंट की सही मात्रा वॉशिंग मशीन के टाइप, कपड़ों की मात्रा, पानी और कपड़े कितने गंदे हैं, इन चीजों पर निर्भर करती है. फ्रंट-लोड मशीनें कम पानी इस्तेमाल करती हैं, इसलिए इनमें आमतौर पर कम डिटर्जेंट की जरूरत होती है. वहीं टॉप-लोड मशीनों में पानी ज्यादा इस्तेमाल होने के कारण मात्रा अलग हो सकती है. बहुत गंदे कपड़ों के लिए भी पहले उन्हें कुछ देर सादे पानी में भिगोने से कम डिटर्जेंट में बेहतर सफाई मिल सकती है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Wed, 12 Aug 2026 15:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>15 अगस्त 1947 के बाद टेक्नोलॉजी में कितना बदल गया भारत? जानें पूरा सफर</title>
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        <description><![CDATA[ How Indis&amp;rsquo;s Technology Changed: 15 अगस्त 1947 को जब भारत ने आजादी हासिल की, उस समय देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती एक मजबूत बुनियादी ढांचा तैयार करना और करोड़ों लोगों के जिंदगी को बेहतर बनाने की थी. टेक्नोलॉजी के मामले में उस दौर में भारत काफी पीछे था. कंप्यूटर, इंटरनेट, मोबाइल फोन और डिजिटल पेमेंट जैसी चीजें आम इंसान की सोच से भी परे थी.
लेकिन आज 2026 में तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है. भारत दुनिया के बड़े टेक्नोलॉजी बाजारों में शामिल है और डिजिटल टेक्नोनलॉजी रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन गई है.
आजादी के बाद शुरू हुआ टेक्निकल डेवलपमेंट
आपको बता दें कि आजादी के शुरुआती सालों में भारत का फोकस विज्ञान, इंजीनियरिंग और इंडस्ट्रियल ताकत को तेजी से तैयार करने पर था. वैज्ञानिक संस्थानों और तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा दिया गया. परमाणु एनर्जी, स्पेस रिसर्च और टेलीकॉम्यूनिकेश जैसे क्षेत्रों में भारत ने धीरे-धीरे अपनी पकड़ को मजबूत करना शुरू किया.
1950 और 1960 के दशक में भारत में कंप्यूटिंग टेक्नोलॉजी की शुरुआत हुई. उस समय कंप्यूटर काफी बड़े और महंगे होते थे और उनका इस्तेमाल सिर्फ मुश्किल काम या वैज्ञानिक रिसर्च और बड़े संगठनों में किया जाता था.

कंप्यूटर ने बदली काम करने की दुनिया
जानकारी के अनुसार, 1980 और 1990 के दशक में कंप्यूटर धीरे-धीरे सरकारी कार्यालयों, बैंकों और कंपनियों तक पहुंचने लगा. इसके साथ ही भारत में सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री में भी काफी तेजी से विकास हुआ.
1990 के दशक में Economic Liberalization के बाद भारतीय IT कंपनियों के लिए ग्लोबल मार्केट में अपनी जगह बनाने का मौका मिला. भारतीय इंजीनियर और सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल दुनियाभर की कंपनियों के लिए काम करने लगे. इसी दौर ने भारत को दुनिया के प्रमुख IT और आउटसोर्सिंग हब के रूप में पहचान दिलाने में बड़ी भूमिका निभाई थी.
इंटरनेट में भी आई क्रांति
भारत में इंटरनेट की शुरूआत 1990 के दशक के मध्य में हुई थी. हालांकि शुरूआत में इंटरनेट कुछ ही जगहों तक पहुंच पाया था. डायल-अप कनेक्शन, स्लो स्पीड और महंगे इंटरनेट के कारण इसका इस्तेमाल ज्यादातर संस्थानों और चुनिंदा यूजर्स तक सीमित रहा.
इसके बाद ब्रॉडबैंड, 3G और 4G के विस्तार ने इंटरनेट को आम लोगों तक पहुंचाया. स्मार्टफोन की कीमतें कम होने और मोबाइल इंटरनेट सस्ता होने के बाद डिजिटल क्रांति ने भी रफ्तार पकड़ी. ऐसे में आज ऑनलाइन पढ़ाई, वीडियो स्ट्रीमिंग, सोशल मीडिया, शॉपिंग और डिजिटल सर्विसेज करोड़ों भारतीयों के जीवन का एक अहम हिस्सा बन चुका है.
स्मार्टफोन ने टेक्नोलॉजी को हर हाथ तक पहुंचाया
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि 2000 के दशक के बाद मोबाइल फोन भारत में तेजी से फेमश हुए थे. शुरुआती दौर में मोबाइल फोन का इस्तेमाल कॉल और SMS के लिए किया जाता था. लेकिन स्मार्टफोन और मोबाइल इंटरनेट के आने के बाद मोबाइल फोन एक छोटे कंप्यूटर में तबदील हो गया.

आज स्मार्टफोन की मदद से लोग बैंकिंग, टिकट बुकिंग, पढ़ाई, ऑफिस का काम, वीडियो कॉल, ऑनलाइन खरीदारी तक कर रहे हैं. इतना ही नहीं, स्मार्टफोन के गांवों और छोटे शहरों तक पहुंचने के बाद, वहां के लोग भी काफी काम अब ऑनलाइन करना सीख चुके हैं.
UPI ने बदल दिया डिजिटल पेमेंट का तरीका
भारत की डिजिटल टेक्नोलॉजी काफी तेजी से विकसित हुई है. इसमें सबसे बड़ी कामयाबी UPI थी जिसकी मदद से लोग ऑनलाइन पेमेंट आसानी से करना सीख गए. दरअसल, यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस ने मोबाइल से पैसे भेजना बेहद आसान बना दिया. आज कोई भी इंसान अपने बैंक अकाउंट से सीधे कुछ सेकंड में किसी दूसरे के अकाउंट में पेमेंट भेज सकता है.
चाय की दुकान से लेकर बड़े स्टोर, ऑनलाइन शॉपिंग और बिल पेमेंट तक QR कोड और UPI का इस्तेमाल आज के समय में आम हो चुका है. इससे भारत में कैशलेस और डिजिटल पेमेंट को नई गति मिली है.
5G से तेज हुआ डिजिटल भारत
बताते चलें कि 4G ने मोबाइल इंटरनेट को लोगों तक पहुंचाने का काम किया था. लेकिन वहीं, 5G ने हाई-स्पीड कनेक्टिविटी की बढ़ावा दिया है. अज देश में 5G के जरिए तेज डाउनलोड और कम लेटेंसी के अलावा स्मार्ट सिटी, ऑटोमेशन, क्लाउड गेमिंग, इंडस्ट्रियल IoT और कई नई टेक्नोलॉजी को भी बढ़ावा दिया जा रहा है.
5G की मदद से अब यूजर्स काफी तेजी से इंटरनेट का इस्तेमाल कर पा रहे हैं और किसी भी चीज को फटाफट डाउनलोड भी कर सकते हैं. इस टेक्नोलॉजी के आने के बाद से लोगों के स्मार्टफोन चलाने का एक्सपीरिएंस भी काफी बेहतर हुआ है.
अब AI की बारी
आज 2026 तक भारत की टेक्नोलॉजी का सफर एक नए दौर में पहुंच चुका है. अब देश में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI काफी तेजी से विकसित हो रहा है. AI का इस्तेमाल शिक्षा, स्वास्थ्य, बैंकिंग, साइबर सिक्योरिटी, कंटेंट क्रिएशन, कस्टमर सर्विस और सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट जैसे कई क्षेत्रों में काफी तेजी से बढ़ा है.
Generative AI ने टेक्नोलॉजी को और भी ज्यादा आसान बनाया है. अब लोग AI की मदद से सवालों के जवाब पाने, फोटो बनाने, जानकारी समझने, कोड लिखने के साथ अपने डेली के कई सारे काम कर रहे हैं.
स्पेस से AI तक भारत की लंबी छलांग
1947 में जब भारत को आजादी मिली थी, तब देश अपने बुनियादी तकनीकी संसाधनों के लिए जूझ रहा था, वहीं आज देश सैटेलाइट, डिजिटल पेमेंट, मोबाइल नेटवर्क, सॉफ्टवेयर, इलेक्ट्रॉनिक्स और AI जैसे क्षेत्रों में अपनी ताकत पूरी दुनिया को दिखा रहा है.
1947 से 2026 तक भारत की टेक्नोलॉजी का सफर सिर्फ कंप्यूटर से स्मार्टफोन या इंटरनेट से 5G तक की कहानी नहीं है. ये उस बदलाव की कहानी है जिसमें टेक्नोलॉजी धीरे-धीरे कुछ संस्थानों से निकलकर करोड़ों भारतीयों की रोजमर्रा की जरूरत बन गया. आने वाले सालों में AI, रोबोटिक्स, क्वांटम कंप्यूटिंग और एडवांस्ड कनेक्टिविटी भारत के इस टेक्नोलॉजी के सफर को एक और नई दिशा दे सकता है.
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        <pubDate>Wed, 12 Aug 2026 15:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>YouTube से पैसा कमाना हुआ मुश्किल! नए Creators के लिए बदल गए नियम</title>
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        <description><![CDATA[ YouTube New Rules: यूट्यूब एक ऐसा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म बन चुका है जिसे लोग काफी ज्यादा इस्तेमाल करते हैं. इतना ही नहीं, यूट्यूब से कंटेंट क्रिएटर्स हर महीने अच्छा पैसा भी कमा रहे हैं. लेकिन अब कंपनी ने नए कंटेंट क्रिएटर्स के लिए पैसा कमाना मुश्किल कर दिया है. जी हां, दरअसल, यूट्यूब ने अब कुछ नियमों में बदलाव किए हैं जिससे अब प्लेटफॉर्म से पैसा कमाना थोड़ा मुश्किल हो सकता है.
दरअसल, कंपनी ने अपने YouTube Partner Programme (YPP) के नियमों में बड़ा बदलाव करने का ऐलान किया है. नए नियमों के मुताबिक, अब ऐड और YouTube Premium से पैसा कमाने के लिए नए चैनलों को डबल वॉच ऑवर्स पूरे करने होंगे.
किन क्रिएटर्स पर नहीं पड़ेगा असर
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इस नए नियम का असर ऐसे क्रिएटर्स पर बिलकुल नहीं पड़ेगा जो पहले से ही यूट्यूब पार्टनर प्रोग्राम से जुड़े हुए हैं. ये नए नियम उन लोगों के लिए लाया गया है जो आगे आने वाले समय में यूट्यूब पार्टनर प्रोग्राम से जुड़ने का प्लान बना रहे हैं.

कब से लागू होंगे नए नियम
YouTube के मुताबिक, ये नए नियम 1 फरवरी 2027 से लागू किए जाएंगे. इस नियम के आने के बाद अब जो भी नए कंटेंट क्रिएटर्स अपने चैनल से पैसा कमाना चाहते हैं, उन्हें अब मुश्किल रास्ता अपनाना पड़ेगा.
नए नियम के अनुसार, क्रिएटर के पास पिछले 1 साल में 8,000 वॉच ऑवर्स होने चाहिए. इसके अलावा अगर क्रिएटर्स शॉर्ट वीडियोज बनाते हैं तो उन्हें पिछले 3 महीनों में 2 करोड़ Shorts views पूरे करने होंगे.
कम व्यूज वाले क्रिएटर्स का क्या होगा
YouTube ने सिर्फ नियम को ही सख्त नहीं किया है बल्कि कंपनी ने ऐसे क्रिएटर्स का भी ध्यान रखा है जिनके पास कम शॉर्ट्स व्यूज हैं. दरअसल, कंपनी ने बताया है कि कम शॉर्ट्स व्यूज वाले क्रिएटर्स के लिए पैसा कमाने के नए ऑप्शन उपलब्ध कराए जाएंगे. इन ऑप्शन्स में YouTube Shopping से जुड़े बोनस, ब्रांड डील्स के लिए इंसेंटिव और नए ट्रेंड शुरू करने या उन्हें आगे बढ़ाने वाले क्रिएटर्स के लिए एक्सट्रा कमाई के मौके शामिल हैं.
Shorts के भी बदल गए नियम
जानकारी के मुताबिक, YouTube ने Shorts monetisation को लेकर भी एक बड़ा बदलाव किया है. 1 फरवरी 2027 से अब शॉर्ट्स वीडियो बनाकर पैसा कमाने वालों के लिए नए नियम लागू हो जाएंगे. दरअसल, अब अगर शॉर्ट्स से ऐड और सब्सक्रिप्शन रेवेन्यू शेयरिंग जारी रखना है तो क्रिएटर्स को हर 90 दिनों में ये प्रूफ करना होगा कि उनके पास 1 करोड़ शॉर्ट्स व्यूज मौजूद हैं.
लेकिन अगर किसी कारण से क्रिएटर 1 करोड़ व्यूज नहीं ला पाता है तो वो पूरी तरह से यूट्यूब पार्टनर प्रोग्राम से बाहर नहीं होगा बल्कि उसकी कमाई तब तक नहीं होगी जब तक वो 1 करोड़ व्यूज हासिल नहीं कर लेता है.
क्या थे पुराने नियम
जानकारी के लिए बता दें कि यूट्यूब पार्टनर प्रोग्राम के पहले नियम कुछ अलग थे. दरअसल, पहले इस प्रोग्राम से जुड़े रहने के लिए क्रिएटर्स को अपने चैनल पर 4000 वॉच ऑवर्स या 1 करोड़ शॉर्ट्स व्यूज लाने होते थे. वहीं, कंपनी ने अब इसी नियम को बदलकर दोगुना कर दिया है जो सिर्फ नए कंटेंट क्रिएटर्स पर लागू होगा.

दूसरे प्लेटफॉर्म भी बदल रहे हैं कमाई के नियम
बता दें कि YouTube अकेला प्लेटफॉर्म नहीं है जिसने कमाई के नियमों में बदलाव किया है. दरअसल, दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म भी creator economy में बदलाव कर रहे हैं. हाल ही में X ने अपने creator payout सिस्टम में ओरिजिनल कंटेंट को ज्यादा महत्व देना शुरू कर दिया है. वहीं, Facebook ने भी क्रिएटर्स के लिए नया monetisation programme पेश किया है.
ऐसे में साफ है कि आने वाले समय में सिर्फ ज्यादा व्यूज लाने से ही काम नहीं चलने वाला है. क्रिएटर्स को ओरिजिनल कंटेंट, ऑडिएंस engagement और लगातार बेहतर परफॉर्मेंस पर फोकस करना पड़ेगा. खासतौर पर अब नए कंटेंट क्रिएटर्स के लिए ये राह काफी मुश्किल होने वाली है. इसके लिए उन्हें अब चैनल पर ज्यादा मेहनत करनी पड़ेगी.
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        <pubDate>Wed, 12 Aug 2026 03:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>बंद हो गई Google Drive की ये सर्विस! तुरंत करें ये काम नहीं तो उड़ जाएगा डेटा</title>
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        <description><![CDATA[ Google Drive: डिजिटल दुनिया में लोग अब ज्यादातर फाइल्स ऑनलाइन सेव करके रखते हैं. इसमें गूगल ड्राइव एक अहम भूमिका निभाता है. जी हां, दरअसल, ज्यादातर लोग फोटोज से लेकर वीडियो का बैकअप Google Photos में रखने के लिए Google Drive की डेस्कटॉप ऐप का इस्तेमाल करते हैं. लेकिन अब ऐसे यूजर्स के लिए एक बुरी खबर है. दरअसल, गूगल Google Drive for desktop के जरिए Google Photos में फोटो और वीडियो का ऑटोमैटिक बैकअप बंद कर दिया है.
आपको बता दें कि इस बदलाव के बाद आपने जिन भी फोल्डर्स को Google Drive के जरिए Google Photos बैकअप के लिए चुना हुआ है, उनमें आने वाली नई फोटो और वीडियो अपने आप Google Photos में अपलोड नहीं होंगी.
क्या हो रहा बदलाव
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, अभी तक Google Drive for desktop में कंप्यूटर के किसी फोल्डर को चुनकर उसकी फोटो और वीडियो को सीधे Google Photos में बैकअप करने की सुविधा यूजर्स को मिलती थी. इस फीचर के जरिए यूजर्स को बार-बार फोटो और वीडियो को अपलोड करने की जरूरत नहीं पड़ती थी. लेकिन अब कंपनी ने इस फीचर को बंद कर दिया है. इसका मतलब साफ है कि अब फोल्डर से अपने आप फोटोज और वीडियो गूगल फोटोज में अपलोड नहीं होंगी.

हालांकि, आपको बता दें कि गूगल ड्राइव या गूगल फोटोज नहीं बंद हो रहा है. ये दोनों जैसे पहले काम करते थे वैसे ही अभी भी काम करते रहेंगे. बस कंपनी ने एक खास फीचर में बदलाव किया है जो ड्राइव के जरिए कंप्यूटर की फोटो को गूगल फोटोज में बैकअप करके सेव करता था.
फोन से Google Photos बैकअप पर कोई असर नहीं
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अगर आप केवल स्मार्टफोन से Google Photos में फोटो और वीडियो का बैकअप लेते हैं तो इस बदलाव से आपके ऊपर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है. बता दें कि Google Photos ऐप के जरिए फोन की फोटो का नॉर्मल बैकअप जारी रहेगा. ये बदलाव खास तौर पर उन लोगों के लिए जरूरी है जो कंप्यूटर के फोल्डर से Google Photos में फोटो और वीडियो का बैकअप लेने के लिए Google Drive for desktop पर निर्भर थे.
Google Photos में ऐसे जारी रखें फोटो बैकअप
Google ने कंप्यूटर की फोटो को Google Photos में बैकअप करने के लिए नए तरीके अपनाने को कहा है. अगर आप किसी खास कंप्यूटर फोल्डर की फोटो और वीडियो को लगातार Google Photos में बैकअप करना चाहते हैं तो Google Photos में जाकर + ऑप्शन चुन सकते हैं. इसके बाद Back up folders का ऑप्शन चुनकर उस फोल्डर को सेलेक्ट किया जा सकता है जिसकी फोटो और वीडियो का बैकअप लेना है.
इसके अलावा अगर आपकी फोटो पहले से Google Drive में मौजूद हैं तो उन्हें Google Photos में इंपोर्ट भी किया जा सकता है. इससे Drive में रखी मौजूदा फोटो को Google Photos की लाइब्रेरी में लाने का ऑप्शन मिल जाता है.
पहले से सेव फोटो और वीडियो का क्या होगा
आपको बता दें कि इस बदलाव के बाद लोगों में ये चिंता है कि अब वहां पहले से जो फोटोज और वीडियोज सेव हैं उनका क्या होगा. Google के मुताबिक, इस बदलाव से Google Photos में पहले से बैकअप की जा चुकी फोटो और वीडियो डिलीट नहीं होंगी. जो भी डेटा वहां पर मौजूद है वो पूरी तरह से सुरक्षित रहेगा. हालांकि, अगर आप आगे भी कंप्यूटर से फोटो का बैकअप लेना चाहते हैं तो आपको अपनी बैकअप सेटिंग में बदलाव करना पड़ेगा.

किन यूजर्स को तुरंत ध्यान देना चाहिए
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इस बदलाव से सबसे ज्यादा असर ऐसे यूजर्स पर पड़ेगा जो कैमरे से फोटो कंप्यूटर में ट्रांसफर करते हैं. पुराने फोटो कलेक्शन रखने वाले लोग, स्कैन की गई फोटोज या डॉक्यूमेंट्स का बैकअप लेने वाले यूजर्स और कंप्यूटर फोल्डर को Google Photos से सिंक करने वालों को अपनी सेटिंग में अब बदलाव करना पड़ेगा.
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        <pubDate>Wed, 12 Aug 2026 03:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>बारिश में Wi&amp;Fi की स्पीड क्यों हो जाती है स्लो? सिर्फ नेटवर्क की नहीं है गलती</title>
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        <description><![CDATA[ Wi-Fi in Rain: बरसात के मौसम में अक्सर देखा गया है कि इंटरनेट की स्पीड स्लो हो जाती है. इसका असर सिर्फ मोबाइल डेटा पर ही नहीं बल्कि वाई-फाई पर भी साफ देखने को मिलता है. कई लोग मानते हैं कि बारिश में नेटवर्क स्लो हो जाते हैं इसीलिए इंटरनेट नहीं चल पाता है. लेकिन क्या सच में ऐसा होता है. आइए जानते हैं आखिर किस कारण से बरसात के मौसम में वाई-फाई धीमे काम करने लगता है.
क्या है बारिश और इंटरनेट का कनेक्शन?
दरअसल, बारिश की बूंदें नॉर्मली मोबाइल इंटरनेट या Wi-Fi पर इतना असर नहीं डालती हैं कि इसकी स्पीड कम हो जाए. बता दें कि मोबाइल नेटवर्क रेडियो सिग्नल का इस्तेमाल करता है जबकि Wi-Fi भी वायरलेस रेडियो फ्रीक्वेंसी पर काम करता है.
अब हल्की बारिश में इन सिग्नल्स पर कोई खास असर देखने को नहीं मिलता है. लेकिन बहुत तेज बारिश, आंधी या खराब मौसम के दौरान नेटवर्क के दूसरे हिस्सों पर असर पड़ सकता है. यही वजह है कि यूजर को इंटरनेट स्लो महसूस होने लगता है.
सिर्फ बारिश के कारण Wi-Fi स्लो नहीं होता
अगर घर का Wi-Fi बारिश के दौरान स्लो हो रहा है तो जरूरी नहीं कि इसका कारण Wi-Fi सिग्नल ही हो. सबसे पहले ये देखना चाहिए कि इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर से राउटर तक आने वाला कनेक्शन सही है या नहीं.

इसके साथ ही फाइबर लाइन, लोकल केबल या नेटवर्क के किसी दूसरे हिस्से में खराबी आने पर भी इंटरनेट की स्पीड स्लो हो जाती है. खासकर तेज बारिश और आंधी के दौरान बाहरी नेटवर्क इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान पहुंचने की संभावना ज्यादा रहती है.
एक साथ ज्यादा लोग इंटरनेट चलाने लगते हैं
जानकारी के लिए बता दें कि बारिश में लोग अक्सर घरों, दुकानों और ऑफिस के अंदर ज्यादा समय बिताते हैं. अब खाली समय में लोग ज्यादा इंटरनेट का ही इस्तेमाल करने लगते हैं जिसका सीधा असर हैवी नेटवर्क लोड के रूप में देखने को मिलता है. जब एक ही इलाके में ज्यादा लोग एक साथ वीडियो देखते हैं, सोशल मीडिया चलाते हैं, ऑनलाइन गेम खेलते हैं या वीडियो कॉल करते हैं तो मोबाइल टावर पर ट्रैफिक बढ़ जाता है.
अब टावर की ताकत तो लिमिटेड होती है. ऐसे में एक साथ जब टॉवर पर इतना एक्सट्रा लोड पड़ता है तब कुछ यूजर्स को इंटरनेट स्लो जैसा महसूस होने लगता है.
मोबाइल सिग्नल पर भी पड़ सकता है असर
मोबाइल नेटवर्क रेडियो वेव्स पर निर्भर करता है. बहुत तेज बारिश और खराब मौसम फ्रीक्वेंसी पर सिग्नल की क्वालिटी को प्रभावित कर सकते हैं. अगर किसी इलाके में पहले से ही नेटवर्क कवरेज कमजोर है तो खराब मौसम के दौरान इंटरनेट स्पीड अपने आप स्लो हो जाती है.
बिजली की समस्या भी बन सकती है वजह
बारिश के साथ कई जगह बिजली कटौती या वोल्टेज में उतार-चढ़ाव भी देखने को मिलता है. अगर राउटर, मॉडेम या नेटवर्क डिवाइस को बैलेंस्ड बिजली नहीं मिल रही है तो कनेक्शन में समस्या आ सकती है.
कभी-कभी डिवाइस पूरी तरह बंद नहीं होता है लेकिन नेटवर्क कनेक्शन अनस्टेबल हो जाता है. ऐसे में यूजर को इंटरनेट की स्पीड कम मिलती है या कनेक्शन बार-बार टूटने लगता है.
बैकहॉल नेटवर्क में खराबी का असर
मोबाइल टावर अकेले इंटरनेट यूजर्स तक नहीं पहुंचाता है. दरअसल, टावर को आगे मेन नेटवर्क से कनेक्ट करने के लिए फाइबर या दूसरे बैकहॉल कनेक्शन की जरूरत होती है.

अगर तेज बारिश, जलभराव या तूफान के कारण इस इंफ्रास्ट्रक्चर में कोई गड़बड़ी होती है तो टावर ऑन रहने के बावजूद इंटरनेट की स्पीड स्लो हो जाती है. इसका मतलब ये है कि आपके फोन में तो पूरे नेटवर्क दिखाई देंगे लेकिन इंटरनेट की स्पीड काफी स्लो हो जाती है.
हर बार बारिश जिम्मेदार नहीं होती
आपको बता दें कि स्लो वाईफाई स्पीड के पीछे हर बार बारिश ही जिम्मेदार नहीं होती है. कई बार असली वजह ज्यादा नेटवर्क ट्रैफिक, खराब लोकल इंफ्रास्ट्रक्चर, बिजली की समस्या या बैकहॉल कनेक्शन में परेशानी भी हो सकती है. ऐसे में बारिश के दौरान अगर इंटरनेट की स्पीड स्लो हो गई है तो सबसे पहले कनेक्शन और जुड़ी कई सारी चीजों को चेक करना चाहिए.
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        <pubDate>Wed, 12 Aug 2026 03:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>फिट रहने के लिए फोन में रखें ये Fitness Apps! जानें क्या करते हैं काम</title>
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        <title>होटल के Wi&amp;Fi से कनेक्ट होते ही हैक हो जाएगा डेटा! Microsoft की चेतावनी</title>
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        <description><![CDATA[ Microsoft Alert: इंटरनेट लोगों की जरूरत बन चुकी है. ऐसे में अक्सर देखा गया है कि लोग जब किसी होटल में जाते हैं तो वहां मौजूद फ्री वाई-फाई का इस्तेमाल करने लगते हैं. बता दें कि टेक्नोलॉजी की इस दुनिया में अब साइबर ठग भी काफी एडवांस हो चुके हैं. ये नए-नए तरीकों से लोगों को ठगने का काम कर रहे हैं. इसी कड़ी में बता दें कि माइक्रोसॉफ्ट ने होटल में जाने वाले लोगों के लिए एक जरूरी चेतावनी जारी की है.
Microsoft की चेतावनी
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, Microsoft ने 31 जुलाई को जारी एक रिपोर्ट में CaptiveCrunch नाम के एक साइबर अटैक कैंपेन का खुलासा किया था. कंपनी के मुताबिक, साइबर अटैकर्स होटल और कॉन्फ्रेंस सेंटर के Wi-Fi नेटवर्क के साइन-इन सिस्टम पर कब्जा कर रहे हैं. इसके बाद नेटवर्क से कनेक्ट होने वाले यूजर्स को नकली सॉफ्टवेयर अपडेट और फर्जी लॉगिन पेज दिखाए जाते हैं.
होटल Wi-Fi के साइन-इन पेज को बनाया निशाना
जानकारी के अनुसार, आप जब भी किसी नए होटल में जाकर वहां के वाई-फाई से कनेक्ट होते हैं तो सबसे पहले आपको एक लॉगइन पेज दिखता है जहां पर नियम व शर्तों को एक्सेप्ट करने वाला ऑप्शन दिखता है. दरअसल, इसे Captive Portal कहा जाता है.

अब Microsoft के अनुसार, इस हमले में ठगों ने इसी सिस्टम को अपना निशाना बनाया है. बता दें कि कुछ मामलों में हमलावर नेटवर्क के DNS और HTTP ट्रैफिक को भी अपने हिसाब से बदल सकते हैं. इसका मतलब है कि यूजर जिस वेबसाइट या पेज को खोलना चाहता है अटैकर्स उन्हें किसी दूसरे वेबसाइट या पेज पर भेज सकता है.
फर्जी Microsoft Login से भी हो सकती है ठगी
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि हमलावरों का दूसरा तरीका यूजर के लॉगिन क्रेडेंशियल और सेशन हासिल करना है. इसके लिए बिल्कुल असली दिखने वाला Microsoft साइन-इन पेज आपके सामने खुल जाता है.
Microsoft ने 16 जुलाई के बाद ऐसे पेज भी देखे हैं जो यूजर्स को Device Code Authentication की तरफ ले जाते हैं. ये Microsoft की एक वैलिड लॉगिन फीचर है लेकिन हमलावर इसका गलत इस्तेमाल कर रहे हैं.
इसमें सबसे खतरनाक बात ये है कि यूजर जिस Microsoft वेबसाइट पर कोड डालता है, वो तो बिलुल असली होती है. लेकिन जो कोड यूजर डालता है उसे हमलावर ने शुरू किया होता है. इसी वजह से हमला करने का ये तरीका बाकी तरीकों के मुकाबले ज्यादा एडवांस लगता है.
AI की भी ली जा रही मदद
Microsoft के मुताबिक, Storm-2945 फरवरी से अपने साइबर ऑपरेशंस में AI का इस्तेमाल कर रहा है. इसमें Device Code और OAuth बेस्ड phishing जैसी टेक्नोलॉजी शामिल हैं.
कंपनी का कहना है कि ग्रुप के काम के एक जरूरी हिस्से में AI की मदद ली गई, हालांकि Microsoft ने ये साफ नहीं किया कि कौन से AI सिस्टम इस्तेमाल किए गए या किन कामों को ऑटोमेट किया गया है.
Malware इंस्टॉल होने के बाद क्या हो सकता है
अगर यूजर हमलावर के बताए सॉफ्टवेयर या कमांड को चला देता है तो यूजर का डेटा लीक हो सकता है. Microsoft के मुताबिक, इंफेक्टेड डिवाइस पर हमलावर कई तरह की एक्टिविटी कर सकते हैं.

कीबोर्ड पर टाइप की गई जानकारी रिकॉर्ड करना
स्क्रीनशॉट लेना
ऑडियो और वीडियो रिकॉर्ड करना
ब्राउजर की Cookies चुराना
सेव किए गए पासवर्ड हासिल करना
USB ड्राइव की एक्टिविटी पर नजर रखना
PowerShell या Command Prompt के जरिए रिमोट कमांड चलाना
इंटरनेट ट्रैफिक को अपने कंट्रोल वाले Proxy से गुजारना

इस तरह हमलावर सिर्फ एक डिवाइस तक सीमित नहीं रहते बल्कि उससे जुड़े अकाउंट और दूसरी जरूरी जानकारी तक पहुंच सकता है.
Android यूजर्स भी रहें सावधान
आपको बता दें कि ये सिर्फ विंडोज यूजर्स के लिए ही नहीं खतरनाक है बल्कि इससे एंड्रॉयड यूजर्स पर भी असर पड़ सकता है. दरअसल, कुछ ClickFix पेज Android यूजर्स को बाहर से APK फाइल डाउनलोड करके इंस्टॉल करने के लिए कहते हैं. हालांकि Microsoft के अनुसार, Android के लिए इस्तेमाल किए जा रहे टूल Windows वाले हिस्से के मुकाबले में अभी कम एक्टिव हैं.

होटल Wi-Fi इस्तेमाल करते समय क्या करें
बताते चलें कि आजकल होटल में मौजूद वाई-फाई साइबर ठगों का आसान टॉर्गेट बन चुका है. ऐसे में होटल में साइबर हमलों से बचने के लिए आपको कुछ जरूरी चीजों को ध्यान में रखना जरूरी है. जहां संभव हो, पर्सनल मोबाइल हॉटस्पॉट का इस्तेमाल करें. इससे होटल के Wi-Fi नेटवर्क से जुड़े हमलावरों का जोखिम काफी कम हो जाता है.
इसके अलावा अगर Guest Wi-Fi इस्तेमाल करना जरूरी हो तो VPN का इस्तेमाल करना बेहतर ऑप्शन होता है. साथ ही, Wi-Fi के Captive Portal पर दिखाई देने वाले किसी भी अनजान डाउनलोड या इंस्टॉलेशन को एक्सेप्ट न करें.
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        <title>Best Refrigerators For Small Family : 2 लोगों की फैमिली के 10 हजार के अंदर आने वाले फ्रिज</title>
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        <description><![CDATA[ Best Refrigerators For Small Family : छोटी फैमिली के लिए सामान खरीदते समय अक्सर यह तय करना मुश्किल होता है कि कम बजट में जरूरत के हिसाब से सही चीज कैसे चुनी जाए. खासकर जब बात फ्रिज की हो, तो ऐसा मॉडल चाहिए जो ज्यादा जगह न घेरे, रोजमर्रा का सामान आसानी से रख सके और कीमत भी बजट में रहे. अगर आपके परिवार में सिर्फ 1 या 2 लोग हैं और आप नया फ्रिज खरीदने की सोच रहे हैं, तो 10 हजार रुपये के बजट में भी कई ऑप्शन मिल सकते हैं. ऑनलाइन मार्केट में अलग-अलग ब्रांड के छोटे और सिंगल-डोर फ्रिज मौजूद हैं, जिनमें जरूरत के हिसाब से कई जरूरी फीचर्स भी मिलते हैं. तो आइए जानते हैं कि 2 लोगों की फैमिली के 10 हजार के अंदर आने वाले फ्रिज कौन से हैं.&amp;nbsp;
2 लोगों की फैमिली के 10 हजार के अंदर आने वाले फ्रिज कौन से हैं?
1. Haier 50 लीटर मिनी फ्रिज - छोटी फैमिली, स्टूडेंट्स या ऑफिस के लिए Haier का 50 लीटर 2 स्टार मिनी बार फ्रिज एक ऑप्शन है. इसकी कीमत करीब 9 हजार से 10 हजार रुपये के बीच है. इसमें छोटा फ्रीजर बॉक्स और LED लाइट मिलती है. अगर आपको मुख्य रूप से पानी, दूध और थोड़ी मात्रा में सामान रखना है, तो यह कॉम्पैक्ट फ्रिज काम आ सकता है.&amp;nbsp;
2. &amp;nbsp;Blue Star 45-47 लीटर मिनी फ्रिज - Blue Star का 45 या 47 लीटर का मिनी फ्रिज भी छोटे स्पेस के लिए ऑप्शन है. इसकी कीमत करीब 7,700 से 9,300 रुपये के बीच है. इसमें रिवर्सिबल डोर और अच्छी कूलिंग की सुविधा मिलती है.&amp;nbsp;
3. &amp;nbsp;MarQ का 90 लीटर सिंगल-डोर फ्रिज - MarQ Flipkart का अपना ब्रांड है. इसका 90 लीटर सिंगल-डोर फ्रिज करीब 8,900 से 9,500 रुपये की कीमत में उपलब्ध हो सकता है. इसमें डायरेक्ट कूल टेक्नोलॉजी, रेसिप्रोकेटिंग कंप्रेसर, 1 स्टार एनर्जी रेटिंग, सुपर चिल जोन और टफंड ग्लास शेल्फ जैसे फीचर्स मिलते हैं. इस पर 1 साल की प्रोडक्ट और 10 साल की कंप्रेसर वारंटी दी जाती है.&amp;nbsp;
4. Haier 165 लीटर फ्रिज - अगर आपको मिनी फ्रिज से ज्यादा जगह चाहिए, तो Haier का 165 लीटर सिंगल-डोर मॉडल भी ऑप्शन है. इसमें डायरेक्ट कूल टेक्नोलॉजी और नॉर्मल कंप्रेसर मिलता है. इस पर 1 साल की प्रोडक्ट और 10 साल की कंप्रेसर वारंटी दी जाती है. इसकी कीमत 10 हजार के अंदर है, हालांकि SBI कार्ड से खरीदारी पर 4,000 रुपये का डिस्काउंट मिल सकता है.&amp;nbsp;
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80 से 180 लीटर तक के फ्रिज भी ऑप्शन
2 लोगों की फैमिली के लिए 80 से 165 लीटर तक के फ्रिज यूजफुल माने जाते हैं. वहीं अगर सिर्फ पानी, दूध और थोड़ी सब्जियां रखनी हैं, तो 45 से 90 लीटर का मिनी फ्रिज भी सही हो सकता है. साथ ही रोजाना का खाना और ज्यादा सामान रखना है, तो 165 से 180 लीटर का सिंगल-डोर फ्रिज बेहतर ऑप्शन रहेगा. ऑनलाइन सेल और बैंक ऑफर के दौरान 165 से 180 लीटर वाले कुछ मॉडल 9,500 से 10,000 रुपये के आसपास भी मिल सकते हैं.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Tue, 11 Aug 2026 11:30:21 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>स्कैम करने के लिए ChatGPT जैसा एआई बना रहे हैकर्स, रहें सावधान</title>
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        <description><![CDATA[ AI Phishing Scam: एआई आने के बाद साइबर क्राइम तेजी से बढ़े हैं. एआई टूल्स का इस्तेमाल कर साइबर अपराधी अपने तरीकों को सुधार रहे हैं और लोगों के लिए इनसे बचना काफी मुश्किल हो गया है. अब एक नई रिपोर्ट सामने आई है, जिसने साइबर सिक्योरिटी को लेकर चिंता बढ़ा दी है. रिपोर्ट में बताया गया है कि नॉर्थ कोरिया से जुड़े हैकिंग ग्रुप ChatGPT जैसा लार्ज लैंग्वेज मॉडल बना (LLM) बना रहे हैं और इसका इस्तेमाल इंफोर्मेशन को एनालाइज, टास्क को ऑटोमेट करने और ज्यादा एडवांस स्कैम तैयार करने के लिए किया जाएगा. आसान भाषा में समझें तो हैकर्स स्कैम करने के लिए नया एआई मॉडल बना रहे हैं. आइए इस बारे में विस्तार से जानते हैं.
क्या होता है LLM?
लार्ज लैंग्वेज मॉडल डीप न्यूरल नेटवर्क पर बना एडवांस्ड एआई सिस्टम होता है, जिसे डेटा को प्रोसेस करने, समझने और इंसानों की तरह टेक्स्ट जनरेट करने के लिए डिजाइन किया जाता है. ये टेक्स्ट से पैटर्न, ग्रामर और कॉन्टेक्स्ट समझकर सवालों का जवाब देते हैं. ये कंटेट लिखने, लैंग्वेज को ट्रांसलेट करने समेत कई काम कर सकते हैं. LLM को मुख्य तौर पर ट्रांसफॉर्मर आर्किटेक्चर पर तैयार किया जाता है, जिसे वो टेक्स्ट का मतलब और संदर्भ समझते हैं. इसके फायदों की बात करें तो ये इनपुट डेटा को आसानी से समझ लेते हैं और रिपीटेटिव लैंग्वेज-बेस्ड टास्क को ऑटोमेट कर देते हैं.&amp;nbsp;
LLM के लिए सॉफ्टवेयर बना रहे हैं हैकर्स
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, साउथ कोरिया की साइबर सिक्योरिटी कंपनी Genians के मुताबिक इस बात के सबूत मिले हैं कि हैकिंग ग्रुप Kimsuky अपने सिस्टम पर LLM रन करने के लिए सॉफ्टवेयर बना रहा है. यह ग्रुप Ollama, GPT4All और Msty जैसे टूल्स यूज कर रहा है, जो किसी एआई मॉडल को लोकली ऑपरेट करने में मदद करते हैं. ये टूल किसी मॉडल को क्लाउड-बेस्ड सर्विसेस की जरूरत नहीं पड़ने देते. रिसर्चर ने पाया कि हैकिंग ग्रुप रीट्रिवल ऑग्मेंटेड जनरेशन (RAG) टेक्नोलॉजी यूज करा रहा है, जिसकी मदद से एआई सिस्टम डॉक्यूमेंट्स के कलेक्शन को सर्च कर और समझ सकता है. इन सारे टूल्स का यूज कर हैकर सेंसेटिव फाइल्स को बिना किसी एक्सटर्नल प्लेटफॉर्म के एनालाइज कर पाएंगे.
भविष्य में बढ़ेंगे खतरे!
साइबर अपराधी पहले से ही एआई टूल्स की मदद से लेकर फिशिंग ईमेल लिख रहे हैं, जिनकी पहचान कर पाना काफी मुश्किल है. अब नए तरीके अपनाकर हैकर्स इससे आगे की चीजें प्लान कर रहे हैं. Genians ने कहा कि उसे एआई-असिस्ट कोडिंग, स्पीच को टेक्स्ट में बदलने वाली कैपेबिलिटीज और एआई एजेंट के डेवलपमेंट का पता चला है. इनकी मदद से हैकर्स अपने हैकिंग के कामों को ऑटोमेट कर सकते हैं. साथ ही वो चुराए गए डेटा को तेजी से एनालाइज कर पाएंगे और उनका इरादा मालवेयर बनाना भी हो सकता है. रिसर्चर का कहना है कि हैकर्स अब सिर्फ फर्जी मैसेज के लिए एआई को यूज नहीं कर रहे हैं बल्कि वो साइबर अटैक में अलग-अलग जगहों पर एआई को इंटीग्रेट कर रहे हैं. इससे भविष्य में और भी एडवांस्ड साइबर अटैक का खतरा बढ़ गया है.&amp;nbsp;
एआई से बनाए जा रहे फर्जी डॉक्यूमेंट्स
Genians की रिपोर्ट में फाइनेंस और क्रिप्टोकरेंसी से जुड़े कई एआई जनरेटेड डॉक्यूमेंट का भी जिक्र किया गया है. ये एकदम असली और कंपनियों से जुड़े डॉक्यूमेंट्स दिखते हैं. हैकर्स इनके सहारे लोगों को मलेशियस फाइल्स ओपन करने और सेंसेटिव इंफोर्मेशन शेयर करने के जाल में फंसा रहे हैं. इसलिए यह ध्यान रखने की जरूरत है कि जो ईमेल या मैसेज एकदम असली दिख रहा है, जरूरी नहीं कि वह किसी असली कंपनी से आपके पास आया हो. अपने जाल में फंसाने के लिए यह हैकर्स की एक ट्रिक भी हो सकती है. इसलिए एआई के इस दौर में ऑनलाइन सेफ्टी का ध्यान रखना बहुत जरूरी हो गया है. हमेशा किसी भी मेल को ओपन करने से पहले उसके सेंडर को वेरिफाई जरूर कर लें. अगर आपको किसी संदिग्ध या अनजान सेंडर से कोई मेल आता है तो इसे ओपन न करें.
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        <pubDate>Tue, 11 Aug 2026 11:30:20 +0530</pubDate>
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        <title>Google ने Pixel Tablet बनाना क्यों बंद कर दिया? सामने आ गई बड़ी वजह</title>
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        <description><![CDATA[ Google Pixel Tablet: भारतीय मार्केट में गूगल के भी कई सारे डिवाइस मौजूद हैं. गूगल ने स्मार्टफोन से लेकर गूगल मैप्स, गूगल फोटोज के साथ कई सारी सर्विसेज यूजर्स के लिए पेश की हैं. बता दें कि कुछ समय पहले गूगल ने अपना पिक्सल टैबलेट भी बाजार में उतारा था. लेकिन इस डिवाइस को लोगों से ज्यादा अच्छा रिस्पांस नहीं मिला है.
इसी को देखते हुए ऐसा माना जा रहा है कि कंपनी जल्द ही पिक्सल टैबलेट को बंद कर सकती है. Google ने फिलहाल नए Pixel Tablet तैयार करने पर रोक लगा दी है. आइए जानते हैं कि गूगल ने क्यों बंद कर दिया टैबलेट बनाना.
क्यों रोका गया Pixel Tablet का प्रोडक्शन
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, Google के Devices &amp;amp; Services डिविजन के वाइस प्रेसिडेंट Shakil Barkat ने Bloomberg को दिए एक इंटरव्यू में ये संकेत दिया कि कंपनी ने नए Pixel Tablet बनाना रोक दिया है. बता दें कि गूगल इस फील्ड में तब तक आगे बढ़ने पर विचार नहीं करने वाला है जब तक टैबलेट में कोई नई टेक्नोलॉजी न मिले या फिर यूजर्स के लिए कोई नया फायदा न हो.

यही इस पूरे फैसले की सबसे बड़ी वजह मानी जा रही है. बता दें कि आज स्मार्टफोन इतने एडवांस हो चुके हैं कि वे इंटरनेट ब्राउजिंग, वीडियो स्ट्रीमिंग, सोशल मीडिया, गेमिंग और कई सारे काम आसानी से कर सकते हैं. इसी वजह से अब लोगों के बीच में टैबलेट की जरूरत ज्यादा दिखाई नहीं पड़ती है.
Pixel Tablet को लेकर कैसे था यूजर्स का रिस्पांस
जानकारी के अनुसार, Pixel Tablet को लेकर यूजर्स की राय मिली जुली रही है. ऑनलाइन चर्चाओं और रिव्यूज में ऐसे कई लोग मिलते हैं जिन्हें Google का टैबलेट पसंद आया. खासतौर पर Google के इकोसिस्टम के साथ इसका इंटीग्रेशन इसकी एक बड़ी खासियत माना गया है.
Google के पुराने Nexus 7 टैबलेट को भी कई यूजर्स आज तक याद करते हैं. कुछ लोगों का मानना है कि Nexus 7 अपने समय में एक बेहद शानदार डिवाइस था. Pixel Tablet को लेकर भी कुछ यूजर्स ने इसके बिजनेस और रोजमर्रा के इस्तेमाल की तारीफ की थी.
क्या स्मार्टफोन ने खत्म कर दी टैबलेट की जरूरत
आपको बता दें कि टैबलेट की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि उसका इस्तेमाल कई मामलों में स्मार्टफोन जैसा ही होता है. अगर किसी यूजर के पास पहले से एक बड़ा और पावरफुल स्मार्टफोन है तो लोगों को किसी भी एक्सट्रा डिवाइस की जरूरत नहीं होती है.
इसके अलावा, एक से ज्यादा डिवाइस रखने का मतलब है उन्हें चार्ज करना, अपडेट करना और उनकी देखभाल करना भी जरूरी होता है. इतना ही नहीं, स्मार्टफोन के साथ अगर टैबलेट और स्मार्टवॉच भी जुड़ जाएं तो डिवाइस मैनेजमेंट में काफी परेशानी भी होने लगती है. इसीलिए गूगल अभी इस चीज पर विचार कर रहा है कि वो यूजर्स को टैबलेट में ऐसा क्या दे सकता है जो स्मार्टफोन से पूरा नहीं हो सकता है.
Google Store पर भी दिखने लगा असर
Pixel Tablet को लेकर Google का भविष्य अब काफी अनिश्चित नजर आता है. इस टैबलेट की एवलेबिलिटी भी काफी कम हो चुकी है और ऑफिशियल Google Store पर भी टैबलेट की मौजूदगी कम पाई गई है.

अगर कंपनी इस प्रोडक्ट लाइन को पूरी तरह बंद कर देती है तो Pixel Tablet Google के उन प्रोडक्ट्स की लंबी लिस्ट में शामिल हो जाएगा जिन्हें कंपनी ने कुछ समय बाद बंद कर दिया था.
Apple iPad को मिल सकता है फायदा
बताते चलें कि Google के Pixel Tablet से पीछे हटने का फायदा दूसरे टैबलेट ब्रांड्स को मिल सकता है. इनमें सबसे बड़ा नाम Apple का है. दरअसल, iPad पहले से ही टैबलेट मार्केट में अपनी अच्छी पकड़ बना चुका है और लंबे से इस कैटेगरी में चर्चा का विषय बना रहता है.
ऐसे में अब जो भी यूजर Pixel Tablet खरीदने का प्लान बना रहे थे और अब अगर उनका मन बदलता है तो उनके लिए एप्पल आईपैड एक बेहतरीन प्रोडक्ट साबित हो सकता है. एप्पल के प्रोडक्ट्स में लोगों के कई सारे बेहतरीन फीचर्स देखने को मिल जाते हैं जिस वजह से लोग इन्हें ज्यादा पसंद करते हैं.
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        <pubDate>Tue, 11 Aug 2026 11:30:18 +0530</pubDate>
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        <title>हार्ट रेट का कैसे पता लगाती है स्मार्टवॉच, जानें टेक्नोलॉजी</title>
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        <description><![CDATA[ How Do Smartwatches Measure Heart Rate: बीते कुछ वर्षों से स्मार्टवॉच की पॉपुलैरिटी बढ़ी है और इसके पीछे सबसे बड़ा कारण हेल्थ और फिटनेस ट्रैकिंग है. यह आपके कदमों की संख्या, कितनी कैलोरी बर्न हुई, स्ट्रेस लेवल और नींद की क्वालिटी जैसी कई चीजों को ट्रैक कर सकती है. हालांकि, हमेशा ये रीडिंग्स करेक्ट नहीं होती और इनमें गलती भी हो सकती है. इन आंकड़ों को ट्रैक करने में हार्ट रेट की सबसे अहम भूमिका होती है. स्मार्टवॉच आपके रेस्टिंग हार्ट रेट यानी आराम की स्थिति वाली हार्ट रेट को मॉनिटर कर सकती है, जिससे हार्ट रेट में बदलाव, स्ट्रेस और आपके एक्टिविटी लेवल का अंदाजा लगाया जाता है. रेस्टिंग हार्ट रेट से आपकी हार्ट और फिटनेस की स्थिति के बारे में भी जानकारी मिल सकती है. कई लोगों के मन में यह सवाल भी उठ सकता है कि स्मार्टवॉच हार्ट रेट का कैसे पता लगाती है? आज हम इसका जवाब जानने की कोशिश करेंगे.&amp;nbsp;
हार्ट रेट कैसे मापती है स्मार्टवॉच?
स्मार्टवॉच के हार्ट रेट मापने का तरीका अलग-अलग होता है. कुछ मॉडल PPG (फोटोप्लेथिस्मोग्राफी) ऑप्टिकल हार्ट रेट मॉनिटर यूज करते हैं. इसमें ग्रीन लाइट के जरिए यह देखा जाता है कि नसों में कितनी रफ्तार से खून बह रहा है. कई मॉडल ECG (इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम) हार्ट रेट सेंसर लगा होता है. यह ब्लड के इलेक्ट्रिकल सिग्नल को मापकर हार्ट रेट का पता लगाता है.
PPG सेंसर कैसे काम करता है?
PPG स्मार्टवॉच में पाया जाने वाला एक कॉमन हार्ट रेट मॉनिटर है. यह मॉनिटर सेंसर की मदद से खून की मात्रा में बदलाव को डिटेक्ट करता है. दरअसल, जब स्किन और शरीर के दूसरे ऑर्गन के पास ब्लड ट्रांसफर होता है तो हार्ट बीट के साथ कैपिलरीज एक्सपैंड और कॉन्ट्राक्ट होती है. इसी दौरान स्मार्टवॉच में लगा PPG हार्ट रेट मॉनिटर स्किन पर ग्रीन लाइट फेंककर यह रिकॉर्ड करता है कि कितनी लाइट वापस आई है. फिर उस नंबर को रीडेबल फॉर्मेट में स्क्रीन पर दिखाया जाता है. जब नस खून से भरी होती है तो वो ग्रीन लाइट को पूरी तरह सोख लेती है. इससे स्मार्टवॉच के लिए यह पता लगाना आसान हो जाता है कि कैपिलरी कब खून से भरी हुई है और कब वह खाली है.&amp;nbsp;
ECG हार्ट रेट मॉनिटर का क्या काम?
ECG हार्ट रेट मॉनिटर को प्रीमियम स्मार्टवॉचेज में ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है. ये हार्ट मॉनिटर दिल की धड़कन को कंट्रोल करने वाले इलेक्ट्रिकल सिग्नल को मापते हैं. इसके लिए वॉच के सेंसर का स्किन के संपर्क में रहना जरूरी होता है. जब यह स्किन से टच रहता है तो इलेक्ट्रिकल चेंजेज को मापकर हार्ट रेट की रफ्तार और उसकी टाइमिंग का पता लगाता है. यह मॉनिटर एट्रियल फिब्रिलेशन जैसी हार्ड रेट में होने वाली अनियमितता को भी डिटेक्ट कर सकते हैं. PPG मॉनिटर में यह फीचर नहीं होता.
ECG v PPG में से कौन-सा बेहतर?
एक्सपर्ट्स का मानना है कि ECG हार्ट रेट मॉनिटर ज्यादा सटीक होते हैं. PPG मॉनिटर की सटीकता हाथ पर बने टैूट, डार्क स्किन और हाथ हिलने आदि फैक्टर से प्रभावित हो सकती है. इसलिए अगर आपको सटीक हार्ट रेट मॉनिटरिंग चाहिए तो ECG मॉनिटर वाली स्मार्टवॉच खरीदने पर विचार करें.
PPG मॉनिटर ग्रीन लाइट क्यों यूज करते हैं?
हमारे ब्लड में हीमोग्लोबिन होता है, जो ऑक्सीजन के कॉन्टैक्ट में आकर लाल हो जाता है. यह ज्यादातर लाइट को अब्जॉर्ब कर लेता है और स्पेसिफिक वेवलेंग्थ वाली लाइट को ही रिफ्लेक्ट करता है. कोई भी लाल ऑब्जेक्ट ग्रीन लाइट को पूरी तरह अब्जॉर्ब करता है. इसलिए जब कैपिलरी खून से भरी होती है तो वो ग्रीन लाइट को पूरी तरह सोख लेती है. इससे कोई लाइट वापस नहीं जाती, जिससे मॉनिटर को पता लग जाता है कि इस समय कैपिलरी खून से भरी हुई है. वहीं जब लाइट वापस आती है तो पता चलता है कि अभी कैपिलरी पूरी तरह खून से भरी हुई नहीं है. इसके अलावा ग्रीन लाइट स्किन में उतना अंदर नहीं जा पाती है, जितने बाकी कलर की लाइट जाती है. इस कारण स्मार्टवॉच बॉडी के सरफेस से ही रीडिंग उठाकर सटीक मेजरमेंट बताती है.
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        <pubDate>Tue, 11 Aug 2026 11:30:16 +0530</pubDate>
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        <title>iPhone 18 Pro Max vs Pixel 11 Pro XL: किसमें होगा ज्यादा दम?</title>
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        <description><![CDATA[ iPhone 18 Pro Max vs Google Pixel 11 Pro XL: ऐप्पल और गूगल दोनों ही अपने-अपने फ्लैगशिप मॉडल लॉन्च करने की तैयारी में जुटी हुई है. गूगल जहां भारत के हिसाब से 13 अगस्त को अपने Pixel 11 Pro XL मॉडल को लॉन्च करेगी तो ऐप्पल अगले महीने iPhone 18 Pro Max को मार्केट में उतारेगी. इस लिहाज से देखें तो फ्लैगशिप सेगमेंट में मुकाबला कड़ा होने जा रहा है. एंड्रॉयड के दीवानों को जहां पिक्सल डिवाइस का इंतजार है, वहीं ऐप्पल के फैन्स 18 Pro Max के लिए पलकें बिछाए हुए हैं. आइए दोनों का कंपेरिजन कर जानते हैं कि कौन-सा मॉडल ज्यादा दमदार होने वाला है.&amp;nbsp;
iPhone 18 Pro Max vs Pixel 11 Pro XL: फुल कंपेरिजन
डिस्प्ले और डिजाइन- ऐप्पल अपने फ्लैगशिप डिवाइस का डिस्प्ले साइज चेंज नहीं करेगी और इसमें 6.9 इंच का पैनल दिया जाएगा. हालांकि, डायनामिक आईलैंड को करंट वेरिएंट के मुकाबले काफी छोटा कर दिया जाएगा. यह मॉडल भी 17 प्रो मैक्स की तरह एंटी-रिफ्लेक्टिव कोटिंग के साथ आएगा, जो ग्लेयर को खत्म कर देती है. डिजाइन के मामले में भी इसमें ज्यादा बदलाव नहीं होंगे और कुछ रिफाइनमेंट देखने को मिल सकती है. बड़े बैटरी पैक के कारण इसकी थिकनेस थोड़ी बढ़ जाएगी. यह आईफोन डार्क चैरी, लाइट ब्लू, सिल्वर और ग्रे कलर ऑप्शन में आएगा.
अब गूगल की बात करें तो Pixel 11 Pro XL का ओवरऑल लुक सेम ही रहने वाला है. हालांकि, इसके रियर में कैमरा मॉड्यूल पर नई &amp;nbsp;&quot;Pixel Glow&quot; लाइट मिलने वाली है. इसके डिस्प्ले का साइज 6.8 इंच होगा और इसकी आउटडोर विजिबिलिटी बढ़ाने के लिए &amp;nbsp;गूगल पीक ब्राइटनेस को बढ़ा सकती है.
कैमरा- कैमरा के मामले में आईफोन 18 प्रो मैक्स को अब तक की सबसे बड़ी अपडेट मिलने जा रही है. अभी तक ऐप्पल अपने कैमरा सेटअप के साथ फिक्स्ड अपर्चर यूज करती आई है, लेकिन अपकमिंग आईफोन में 48MP के प्राइमरी कैमरा के साथ वेरिएबल अपर्चर दिया जाएगा. इसकी मदद से फोटो लेते समय लाइटिंग को कंट्रोल किया जा सकेगा. दूसरी तरफ Pixel 11 Pro XL भी ट्रिपल रियर कैमरा के साथ लॉन्च होगा. इसमें 50MP+48MP+48MP के तीन सेंसर होंगे, जबकि सेल्फी के लिए 42MP का फ्रंट कैमरा मिलेगा.&amp;nbsp;
परफॉर्मेंस- परफॉर्मेंस के मामले में iPhone 18 Pro Max और Pixel 11 Pro XL दोनों ही नए दौर में प्रवेश करने जा रहे है. दोनों ही फोन में 2nm प्रोसेस पर बने चिपसेट मिलने वाले है. अभी तक गूगल का Tensor चिपसेट ऐप्पल के प्रोसेसर से पिछड़ता आया है, लेकिन इस बार गूगल कड़े मुकाबले की मूड में है. Pixel 11 Pro XL को Tensor G6, जबकि iPhone 18 Pro Max को ऐप्पल का एडवांस्ड A20 Pro चिपसेट दिया जाएगा. दोनों ही चिपसेट इम्प्रूव्ड थर्मल और पावर एफिशिएंसी के साथ आएंगे.&amp;nbsp;
बैटरी और चार्जिंग- Pixel 11 Pro XL में 5,115mAh की बैटरी मिलेगी, जो टेक्निकली इसके करंट वेरिएंट से छोटी है. ऐसे में इसकी बैटरी लाइफ नए प्रोसेसर की पावर एफिशिएंसी पर काफी डिपेंड होगी. चार्जिंग स्पीड के मामले में भी इसमें कोई बदलाव नहीं दिखेगा और यह 45W &amp;nbsp;वायर्ड और 25W वायरलेस सपोर्ट के साथ लॉन्च होगा. दूसरी तरफ iPhone 18 Pro Max के ई-सिम ओनली वेरिएंट में 5,425mAh की बैटरी मिलेगी, जबकि भारत और चीन जैसे देशों में आने वाले फिजिकल सिम स्लॉट वाले मॉडल में 5,088mAh कैपेसिटी वाला बैटरी पैक मिलेगा. बड़े बैटरी पैक के कारण इसकी मोटाई में भी कुछ इजाफा हुआ है. 
कीमत और लॉन्चिंग- लॉन्चिंग का हम ऊपर जिक्र कर चुके हैं कि Pixel 11 Pro XL को 12 अगस्त (भारतीय समयानुसार 13 अगस्त) को मेड बाई गूगल इवेंट में लॉन्च किया जाएगा. रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत में इसकी शुरुआती कीमत 1,23,600 रुपये रह सकती है. हालांकि, कंपनी ने इसका आधिकारिक ऐलान नहीं किया है. वहीं iPhone 18 Pro Max को 9 सितंबर को लॉन्च किया जा सकता है. लॉन्चिंग के एक हफ्ते बाद इसकी बिक्री शुरू होने की उम्मीद है. भारत में इसकी कीमत 1,69,000-1,80,000 रुपये तक रह सकती है.
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बदल जाएगा Apple Watch का पूरा लुक? कंपनी कर रही यह तैयारी ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 10 Aug 2026 23:30:16 +0530</pubDate>
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        <title>Xप्लेन: अगर AI कंट्रोल से बाहर हो जाए तो किसके सिर फूटेगा ठीकरा?</title>
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        <description><![CDATA[ एक कंपनी अपने ऑफिस में बैठी अपना काम कर रही है और अचानक पता चलता है कि उसके पूरे आईटी सिस्टम में सेंध लग चुकी है. हैरानी की बात यह कि यह हमला किसी चालाक हैकर ने नहीं, बल्कि दूसरी कंपनी के एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) एजेंट ने अपनी मर्जी से किया है. यह कोई साइंस फिक्शन फिल्म की कहानी नहीं है, बल्कि 2026 की गर्मियों में सचमुच हुई घटनाएं हैं. OpenAI का एक AI एजेंट खुद ब खुद AI स्टार्टअप Hugging Face के सिस्टम में घुस गया. Anthropic के Claude मॉडल्स ने तीन अलग-अलग कंपनियों के सिस्टम हैक कर लिए. Meta एक AI मॉडल साइबर सिक्योरिटी टेस्टिंग के दौरान ही दूसरी कंपनी में सेंध लगा गया. इससे सवाल उठा कि AI के कंट्रोल से बाहर होने पर जिम्मेदार कौन होगा...
सबसे पहले समझते हैं कि हुआ क्या है?
AI एजेंट दरअसल ऐसे सिस्टम होते हैं जो बिना इंसानों की मदद के खुद फैसले ले सकते हैं और काम कर सकते हैं. ये किसी टास्क को समझते हैं, उसके लिए प्लान बनाते हैं और फिर उसे अंजाम देते हैं. OpenAI का एक AI एजेंट जिसे खास टास्क के लिए प्रोग्राम किया गया था, उसने अपनी सैंडबॉक्स यानी टेस्टिंग वाली बंद दुनिया से बाहर निकलकर इंटरनेट पर छानबीन की और सीधे AI स्टार्टअप Hugging Face के सिस्टम में घुस गया.
OpenAI को ऐसे और भी उदाहरण मिले जब उसके एजेंट अपनी डिजिटल सीमाओं को लांघ गए. इसी तरह Anthropic के Claude मॉडल्स ने अप्रैल 2026 से लेकर अब तक तीन अलग-अलग कंपनियों के सिस्टम में सेंध लगाई. तीसरी बड़ी घटना Meta के साथ हुई, जहां साइबर सिक्योरिटी टेस्टिंग के दौरान ही उसका एक AI मॉडल दूसरी कंपनी को हैक कर गया.
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इन तीनों ही मामलों में संबंधित AI कंपनियों को इस बात की बिल्कुल भी जानकारी नहीं थी कि उनके बनाए हुए AI एजेंट इंटरनेट पर घूम-घूमकर दूसरी कंपनियों के सिस्टम में सेंध लगा रहे हैं. इसका पता हमले के काफी समय बाद चला, जब नुकसान हो चुका था.
Hugging Face के CEO क्लेमेंट डेलैंग ने खुद इस बात का खुलासा करते हुए बताया कि उनकी कंपनी को अपने IT नेटवर्क का पूरा एक-तिहाई हिस्सा दोबारा से बनाना पड़ा. डेलैंग ने इसे &#039;एक नई तरह का तकनीकी जोखिम&#039; करार दिया.
अगर मुकदमा हो तो कौन-कौन कर सकता है?
जब AI एजेंट इस तरह से किसी कंपनी के सिस्टम में सेंध लगाता है और नुकसान पहुंचाता है, तो कानूनी तौर पर कई पक्ष मुकदमा कर सकते हैं:

पीड़ित कंपनियां नुकसान की भरपाई मांग सकती हैं.
अगर हैकिंग की वजह से किसी कर्मचारी की नौकरी या पर्सनल डेटा लीक हुआ है तो वे भी मुकदमा कर सकते हैं.
अगर कंज्यूमर्स का सेंसिटिव डेटा लीक हुआ हो या उन्हें किसी तरह का वित्तीय नुकसान उठाना पड़ा हो.
कंपनी के शेयर होलडर्स भी तब अदालत जा सकते हैं जब इस तरह की हैकिंग की वजह से कंपनी की वैल्यू में भारी गिरावट आई हो.
सरकारी रेगुलेटर और एजेंसियां अपनी तरफ से कानूनी कार्रवाई कर सकती हैं, खासकर अगर कंपनियों ने अपनी साइबर सुरक्षा को लेकर गलत दावे किए हों.

कानूनी दावे क्या-क्या हो सकते हैं?
कानूनी एक्सपर्ट्स का मानना है कि अभी हमें पुराने कानूनी सिद्धांतों का ही सहारा लेना होगा. सबसे आम और सीधा रास्ता नेग्लिजेंस यानी लापरवाही का दावा होगा. इसमें पीड़ित पक्ष को अदालत में यह साबित करना होगा कि जिस AI लैब ने उस एजेंट को बनाया, टेस्ट किया या तैनात किया, वह संभावित नुकसान को रोकने या कम करने के लिए जरूरी सावधानियां लेने में नाकाम रही.
अगर कोई कंपनी अपने AI प्रोडक्ट को बाजार में उतारने से पहले पूरी तरह से टेस्ट नहीं करती, सुरक्षा के इंतजाम नहीं करती और फिर उसका AI एजेंट किसी दूसरी कंपनी का सिस्टम हैक कर लेता है, तो यह लापरवाही का साफ मामला बनता है.
ह्यूस्टन यूनिवर्सिटी के कानून प्रोफेसर गेब्रिएल विल ने कहा, &#039;अगर किसी इंसान OpenAI कर्मचारी ने जाकर Hugging Face के सिस्टम में सेंध लगाई होती, तो OpenAI उस कर्मचारी के गलत काम के लिए पूरी तरह से जिम्मेदार होता. लेकिन जब यही काम कोई AI एजेंट करता है, तो कानून इसे बहुत अलग तरीके से देखता है.&#039; इसके अलावा अमेरिका के कंप्यूटर फ्रॉड एंड एब्यूज एक्ट यानी CFAA के तहत भी दावा हो सकता है.
जिम्मेदारी का ठीकरा आखिर किस पर फूटेगा?
इस सवाल का जवाब कोई एक लाइन में नहीं दिया जा सकता. यह इस बात पर निर्भर करता है कि AI किस तरह से कंट्रोल से बाहर हुआ, नुकसान कैसे हुआ और सबसे बड़ी बात यह कि गलती किस लेवल पर हुई...
1. AI बनाने वाली कंपनी और डेवलपर्स जिम्मेदार
अगर गलती डिजाइन और डेवलपमेंट में हुई है तो जिम्मेदारी सीधे-सीधे AI बनाने वाली कंपनी और उसके डेवलपर्स पर आती है. मान लीजिए किसी AI सिस्टम को ऐसे डेटा पर ट्रेन किया गया जिसमें जाति या लिंग के आधार पर भेदभाव छिपा था और उस वजह से उसने किसी के साथ गलत किया.
इसमें गलती डेटा चुनने वालों और एल्गोरिदम डिजाइन करने वालों की है. अगर कंपनी ने जानबूझकर टेस्टिंग में कटौती की या सुरक्षा को नजरअंदाज किया, तो कॉरपोरेट जिम्मेदारी बनती है और पीड़ित को मुआवजा मिलना चाहिए.
2. गलत इस्तेमाल करने पर यूजर जिम्मेदार
अगर गलती इस्तेमाल करने वाले की है तो जिम्मेदार यूजर होगा. मान लीजिए कोई अस्पताल AI डायग्नोसिस टूल खरीदता है, लेकिन अपने डॉक्टरों को उसकी ट्रेनिंग नहीं देता और डॉक्टर बिना सोचे-समझे AI की हर सलाह मान लेते हैं, जिससे मरीज की जान चली जाती है.
इस मामले में AI टूल ने गलत सलाह दी हो सकती है, लेकिन आखिरी फैसला तो डॉक्टर का था और अस्पताल की जिम्मेदारी थी कि वह अपने स्टाफ को सही तरीके से ट्रेन करे. ऐसे मामलों में AI एक टूल की तरह है और यूजर को पता होना चाहिए कि उसकी सीमाएं क्या हैं.
AI का खुद सीखना सबसे ज्यादा पेचीदा
अगर AI ने खुद कुछ ऐसा सीख लिया जिसकी भविष्यवाणी नहीं की जा सकती थी तो यह सबसे पेचीदा स्थिति है. मशीन लर्निंग मॉडल अपने अनुभव से सीखते हैं और कई बार ऐसे पैटर्न पकड़ लेते हैं जिनकी डेवलपर्स ने कल्पना भ ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 10 Aug 2026 23:30:15 +0530</pubDate>
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        <title>TRAI ने शुरू की नई नंबर सीरीज! ठगी वाले कॉल से बचने में मिलेगी मदद</title>
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        <description><![CDATA[ TRAI New Series: मोबाइल पर आने वाले हर कॉल पर अब ये पहचानना थोड़ा आसान हो सकता है कि फोन किसी कंपनी की सर्विस के लिए है या फिर फर्जीवाड़े के लिए. TRAI ने बिजली, पानी, गैस, LPG और कुरियर जैसी सेवाओं के लिए 1601 नंबर सीरीज शुरू करने का फैसला किया है. इस सीरीज के नंबरों का इस्तेमाल कंपनियां अपने सर्विस और ट्रांजैक्शन से जुड़े कॉल के लिए करेंगी.
अभी नॉर्मल नंबरों से आते हैं ऐसे कॉल
फिलहाल बैंक, कंपनियों और दूसरी सर्विस देने वाली संस्थाओं के कई कॉल नॉर्मल 10 अंकों वाले नंबरों से आते हैं. इसका फायदा साइबर ठग भी उठाते हैं और कंपनी या सरकारी विभाग का नाम लेकर लोगों को फोन करते हैं.
अब अलग नंबर सीरीज होने से असली सर्विस कॉल की पहचान आसानी से हो सकेगी और नॉर्मल मोबाइल नंबरों से होने वाले फर्जी कॉल पर लगाम लगाने में भी मदद मिलेगी.
पहले इन कंपनियों को मिलेगा 1601 नंबर
TRAI ने 1601 सीरीज को अभी चरणबद्ध तरीके से लागू करने का फैसला किया है. पहले चरण में यूटिलिटी, कुरियर और लॉजिस्टिक्स सेक्टर को शामिल किया गया है. इसमें बिजली डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियां, पानी की सर्विसेज, शहरों की गैस कंपनियां और LPG डिस्ट्रीब्यूटर्स शामिल हैं. इसके अलावा कुरियर, पार्सल डिलीवरी, एक्सप्रेस लॉजिस्टिक्स और फ्रेट कंपनियां भी इस सीरीज का इस्तेमाल कर सकेंगी.
90 दिन के अंदर करना होगा माइग्रेशन
टेलीकॉम कंपनियों को Phase-1 में आने वाली पात्र संस्थाओं का 1601 नंबर पर माइग्रेशन और ऑनबोर्डिंग 90 दिनों के अंदर पूरा करना होगा. नंबर देने से पहले टेलीकॉम कंपनियां संबंधित संस्था की जांच करेंगी. यानी कोई भी कंपनी सीधे 1601 नंबर हासिल नहीं कर सकेगी.
1601 नंबर से नहीं होगी प्रमोशनल कॉलिंग
TRAI ने ये भी साफ किया है कि 1601 नंबर का इस्तेमाल विज्ञापन या प्रमोशनल कॉल के लिए नहीं किया जा सकेगा. इसका इस्तेमाल सिर्फ सर्विस और ट्रांजैक्शन से जुड़े जरूरी कॉल के लिए होगा.
आम लोगों के लिए क्यों अहम है ये बदलाव?
मोबाइल पर आने वाले फर्जी कॉल आज बड़ी समस्या हैं. ठग नॉर्मल मोबाइल नंबर से बैंक, बिजली कंपनी, कुरियर या दूसरी सर्विस का कर्मचारी बनकर लोगों से बात करते हैं. अब अलग नंबर सीरीज से असली और फर्जी कॉल में अंतर करना आसान हो सकता है.
हालांकि सिर्फ 1601 नंबर देखकर किसी कॉल पर आंख बंद करके भरोसा नहीं करना चाहिए. OTP, PIN, पासवर्ड या बैंकिंग जानकारी कभी भी फोन पर शेयर नहीं करनी चाहिए.
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        <pubDate>Mon, 10 Aug 2026 23:30:13 +0530</pubDate>
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        <title>क्या आप भी इस्तेमाल कर रहे हैं सालों पुरानी SIM? जानिए कब बदल लेना चाहिए</title>
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        <description><![CDATA[ क्या आप भी इस्तेमाल कर रहे हैं सालों पुरानी SIM? जानिए कब बदल लेना चाहिए ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 10 Aug 2026 23:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>क्या है MySpace जिसकी होने वाली है वापसी? कभी इंटरनेट पर मचाया था धमाल</title>
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        <description><![CDATA[ MySpace: आज के समय में लोग नई टेक्नोलॉजी का ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं. लेकिन अभी भी ऐसे लोग मौजूद हैं जिन्हें पुरानी टेक्नोलॉजी ज्यादा बेहतर लगती है. बता दें कि कभी लोगों को वायर वाले ईयरफोन, पुराने म्यूजिक प्लेयर और अलार्म क्लॉक काफी पसंद आते थे. वहीं, अब ऐसा लग रहा है कि सोशल मीडिया पर भी 2000 के दशक की यादें वापस आने वाली हैं.
जी हां, दरअसल, सोशल मीडिया को लेकर MySpace का नाम सामने आया है जिसे Millennials शायद ही भूल पाए हों. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ये कभी सोशल मीडिया की दुनिया पर राज करता था और अब इसके वापस लॉन्च होने की चर्चाएं भी काफी तेज हो चुकी हैं.
फिर से लॉन्च होगा MySpace
MySpace के मालिक और Viant Technology के सह-संस्थापक Tim Vanderhook और Chris Vanderhook ने एक डॉक्यूमेंट्री पेश की थी जिसमें इस प्लेटफॉर्स के फिर से लॉन्च होने के संकेत मिल रहे हैं. हालांकि, ये प्लेटफॉर्म कब तक यूजर्स के लिए उपलब्ध होगा इसके बारे में फिलहाल कंपनी की ओर से कोई जानकारी शेयर नहीं की गई है.

यानी फिलहाल इसकी वापसी की बात सामने आई है लेकिन लॉन्च की तारीख, नए फीचर्स और प्लेटफॉर्म का डिजाइन कैसा होगा, इसकी कोई डिटेल्स सामने नहीं आई है.
क्यों खास है MySpace
आपको बता दें कि आज की Gen Z के लिए MySpace इंटरनेट के पुराने दौर का एक हिस्सा है लेकिन Millennials के लिए इसकी यादें काफी अलग हैं. बता दें कि MySpace की शुरुआत 2003 में Tom Anderson और Chris DeWolfe ने की थी.
2005 से 2008 के बीच ये दुनिया के सबसे फेमश सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों में शामिल था. 2006 में अमेरिका में इसके विजिटर्स की संख्या इतनी बढ़ गई थी कि ये Google से भी ज्यादा विजिट किया जाने वाला प्लेटफॉर्म बन गया था.
MySpace की सबसे बड़ी खासियत थी इसका कस्टमाइजेशन. यूजर्स अपने प्रोफाइल को अपनी पसंद के हिसाब से डिजाइन कर सकते थे. इसके अलावा बैकग्राउंड, डिजाइन और म्यूजिक जैसी चीजों को भी यूजर अपनी प्रोफाइल में जोड़ सकते थे.
इसके अलावा, यूजर्स अपने प्रोफाइल पर कोई गाना भी सेट कर सकते थे जो पेज खोलते ही चलने लगता था. YouTube के शुरुआती दौर में वहां से वीडियो कंटेंट भी जोड़ा जा सकता था.
2013 में भी हो चुकी है वापसी की कोशिश
जानकारी के अनुसार, ये पहली बार नहीं है जब MySpace को दोबारा लॉन्च करने की तैयारी हो रही है. इससे पहले भी 2013 में प्लेटफॉर्म को नए रूप में पेश करने की कोशिश की गई थी. उस समय कंपनी ने इसे म्यूजिक और क्रिएटिव कंटेंट पर ज्यादा फोकस करने वाले प्लेटफॉर्म के तौर पर पेश करने की ओर कदम बढ़ाया था. हालांकि, उस समय ये लोगों के बीच ज्यादा अच्छा रिस्पांस प्राप्त नहीं कर पाया था.

क्या आज का इंटरनेट MySpace को मौका देगा
हालांकि, आज के समय में Instagram, TikTok और YouTube जैसी दिग्गज कंपनियों ने इंटरनेट की दुनिया में धमाल मचा रखा है. ऐसे में MySpace किस तरह से लोगों के बीच अपनी वापसी कर पाएगा ये देखना काफी दिलचस्प रहेगा.
लोग लगातार एल्गोरिदम से चलने वाली फीड, लगातार आने वाले नोटिफिकेशन और घंटों तक स्क्रॉल करने की आदत से परेशान हो रहे हैं. इसी वजह से डिजिटल वेलनेस और कम स्क्रीन टाइम पर ध्यान देने वाले ऐप्स भी तेजी से फेमश हो रहे हैं.
ये बन सकती है MySpace की ताकत
बता दें कि अगर MySpace दोबारा लॉन्च होता है तो इस प्लेटफॉर्म की सबसे बड़ी ताकत इसकी पुरानी यादें हो सकती हैं. दरअसल, लोग अब ऐसा प्लेटफॉर्म चुन सकते हैं जहां पर उन्हें ट्रेंडिंग कंटेंट देखने पर ज्यादा प्रेशर न दिया जाए और वो अपने अनुसार अपने प्लेटफॉर्म को कंट्रोल कर सकें.
अगर नया MySpace प्रोफाइल कस्टमाइजेशन, म्यूजिक और कम एल्गोरिदमिक एक्सपीरिएंस पर फोकस करता है तो ये पुराने यूजर्स के साथ-साथ ऐसे यूजर्स जो आज के समय में डिजिटली काफी परेशान रहने लगे हैं, उन्हें भी ये प्लेटफॉर्म काफी पसंद आ सकता है.
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        <pubDate>Mon, 10 Aug 2026 23:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>महंगे फोन की बल्ले&amp;बल्ले, बिक्री ने बनाया नया रिकॉर्ड</title>
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        <description><![CDATA[ Premium Smartphone Sales: स्मार्टफोन इंडस्ट्री के लिए यह साल काफी चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है. प्राइस हाइक के कारण लोग फोन खरीदना कम कर चुके हैं और शिपमेंट में गिरावट देखी जा रही है. हालांकि, महंगे फोन के मामले में तस्वीर बिल्कुल अलग है. काउंटरप्वाइंट रिसर्च के मुताबिक, दुनियाभर में 600 डॉलर (लगभग 57,000 रुपये) से अधिक की कीमत वाले फोन की डिमांड बढ़ी है. पिछले साल की पहली छमाही में कुल बिक्री में इनकी हिस्सेदारी 25 प्रतिशत थी, जो इस साल बढ़कर 29 प्रतिशत हो गई है. यह तब है, जब मेमोरी चिप्स की लागत बढ़ने के कारण फोन लगातार महंगे हो रहे हैं. कीमतों में इजाफे को देखकर अब कई लोग फोन खरीदने के फैसले को फिलहाल के लिए टाल रहे हैं. इन सबके बावजूद महंगे डिवाइसेस की बिक्री में लगातार बढ़ोतरी हो रही है.
क्या है इस इजाफे के पीछे वजह?
काउंटरप्वाइंट का कहना है कि महंगे फोन खरीदना अब सिर्फ लोगों की पसंद तक सीमित नहीं है. स्मार्टफोन इंडस्ट्री की बदली इकॉनमी भी इसके पीछे जिम्मेदार है, जहां कंपोनेंट के प्राइस बढ़ रहे हैं. इस कारण मिड-रेंज में ऑप्शन कम हो रहे हैं. जानकारों का यह भी कहना है कि महंगे फोन की खरीद बढ़ना असल में प्रीमियमाइजेशन नहीं है बल्कि ग्राहकों को मजबूरी में ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ रहा है. महंगी कीमत पर फोन खरीदने के बावजूद उनके एक्सपीरियंस में कोई खास बदलाव नहीं आया है.
महंगी कीमत है सबसे बड़ी वजह
2022 से लेकर 2025 तक ग्राहक हाई-एंड डिवाइस के लिए पैसा खर्च कर रहे थे, लेकिन पिछले कुछ समय से यह ट्रेंड बदला है. इस साल की शुरुआत से ही स्टोरेज और मेमोरी चिप्स की लागत बढ़ने लगी, जिसकी वजह से एंट्री और मिड-रेंज स्मार्टफोन महंगे होने लगे. महंगे फोन बनाने वाली कंपनियों के लिए यह झटका झेलना आसान था क्योंकि उनके पास मार्जिन कम करने का ऑप्शन था. दूसरी तरफ एंट्री और मिड-रेंज फोन बनाने वाली कंपनियों को कीमतों में इजाफा करने पर मजबूर होना पड़ा. इससे मिड-रेंज और प्रीमियम फोन की कीमत के बीच का अंतर कम हो गया. कुछ समय पहले जो फोन 40,000 रुपये की कीमत में बिक रहा था, वह आज 50,000 रुपये का हो गया है.&amp;nbsp;
ऐप्पल और सैमसंग को सबसे ज्यादा फायदा
महंगे फोन की बिक्री बढ़ने से सबसे ज्यादा ऐप्पल और सैमसंग को फायदा हुआ है. 2026 की पहली तिमाही में प्रीमियम स्मार्टफोन की बिक्री में इन दोनों कंपनियों की 84 प्रतिशत हिस्सेदारी है, जो पिछले साल 82 प्रतिशत थी. इस सेगमेंट में ऐप्पल सबसे ज्यादा बिक्री करने वाली कंपनी बनी हुई है, जबकि सैमसंग ने भी गैलेक्सी एस26 सीरीज के साथ अपनी स्थिति मजबूत की है. वहीं ओप्पो और वीवो भी प्रीमियम सेगमेंट में तेजी से अपनी जगह बनाती जा रही हैं. इस सेगमेंट में सालाना आधार पर ओप्पो की बिक्री 69 प्रतिशत और वीवो की 20 प्रतिशत बढ़ी है.
ग्राहकों को लाने के लिए कंपनियां दे रहीं ऑफर
फाइनेंसिंग ऑप्शन, बायबैक और ट्रेड-इन प्रोग्राम आदि के जरिए कंपनियां ग्राहकों को आकर्षित कर रही है. इन तरीकों से रिटेल कीमत कम किए बिना भी कंपनियां फोन की किफायती बना पाती हैं, जिससे ग्राहकों के उन्हें खरीदना आसान हो जाता है. सैमसंग की बात करें तो कंपनी ने अपने गैलेक्सी फॉरेवर प्रोग्राम में नई मार्केट्स में भी रोल आउट किया है. इसकी मदद से ग्राहक मंथली इंस्टॉलमेंट देकर फ्लैगशिप गैलेक्सी डिवाइस को इस्तेमाल कर सकते हैं. इसके अलावा कंपनियां EMI टेन्योर को भी बढ़ा रही है. सैमसंग ने अपने लेटेस्ट फोल्डेबल फोन के लिए 30 महीने का नो-कॉस्ट EMI का ऑप्शन दिया है. इसी तरह ऐप्पल अपने प्रोडक्ट्स पर कैशबैक और दूसरे ऑप्शन ऑफर कर रही है.
कब मिल सकती है बढ़ती कीमतों से राहत?
मोबाइल फोन की बढ़ती कीमतों से फिलहाल राहत मिलने की उम्मीद नहीं है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, अगले साल के अंत तक मेमोरी चिप्स की कीमतें स्टेबलाइज होने की उम्मीद नहीं है और जब तक ऐसा नहीं होता, फोन की कीमतों में स्टेबिलिटी आना काफी मुश्किल है.
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        <pubDate>Mon, 10 Aug 2026 07:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>Space से कैसे ली जाती है फोटो? जानें किस टेक्नोलॉजी का होता है इस्तेमाल</title>
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        <title>वायरलेस चार्जिंग में बार&amp;बार हो रही दिक्कत? कहीं फोन कवर तो नहीं है कारण</title>
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        <description><![CDATA[ Tech Tips: टेक्नोलॉजी की दुनिया में अब कई सारे एडवांस गैजेट्स भी आ चुके हैं जो आपके काम को काफी हद तक आसान बना देते हैं. स्मार्टफोन ने लोगों के जीवन को काफी आसान बनाया है. इसके साथ ही बता दें कि अब टेक्नोलॉजी इतनी एडवांस हो चुकी है कि अब फोन को बिना वायर के भी चार्ज किया जा सकता है. जी हां, दरअसल, आज के ज्यादातर प्रीमियम स्मार्टफोन में वायरलेस चार्जिंग का फीचर आने लगा है जिसकी मदद से आपका फोन बिनी किसी वायर्ड चार्जर के भी चार्ज हो सकता है.
लेकिन अक्सर देखा गया है कि वायरलेस चार्जिंग के दौरान यूजर्स को बार-बार दिकक्त आती है. बता दें कि इस समस्या के पीछे अक्सर फोन का कवर जिम्मेदार होता है. आइए जानते हैं क्या है इसकी पूरी सच्चाई.
मोटा कवर बन सकता है परेशानी की वजह
जानकारी के मुताबिक, वायरलेस चार्जिंग में फोन और चार्जिंग पैड के बीच मैग्नेटिक फील्ड के जरिए एनर्जी ट्रांसफर होती है. ऐसे में फोन और चार्जर के बीच बहुत ज्यादा दूरी होने पर चार्जिंग की efficiency पर असर पड़ सकता है.

अगर फोन का कवर बहुत मोटा है तो वायरलेस चार्जर और फोन की charging coil के बीच दूरी बढ़ जाती है. इससे चार्जिंग स्लो हो सकती है या कई मामलों में चार्जिंग शुरू ही नहीं होती है. खासकर बहुत मोटे रग्ड या हेवी-ड्यूटी कवर इस्तेमाल करने वालों को ये समस्या ज्यादा देखने को मिलती है.
कवर का मटेरियल भी है जरूरी
आपको बता दें कि हर तरह का फोन कवर वायरलेस चार्जिंग के लिए समान रूप से बेहतर नहीं माना जाता है. आमतौर पर पतले TPU, सिलिकॉन या प्लास्टिक बेस्ड कवर वायरलेस चार्जिंग के साथ बेहतर तरीके से काम कर सकते हैं.
वहीं, अगर कवर में मोटी मेटल की प्लेट, मेटल रिंग या कोई दूसरा metallic पार्ट लगा हुआ है तो ये वायरलेस चार्जिंग में रूकावट बन सकता है. इसलिए ऐसा कवर खरीदने से बचें जिसमें फोन के पिछले हिस्से पर बड़ा मेटल वाला हिस्सा मौजूद होता है.
MagSafe या Magnetic Ring वाला कवर
अगर आपका फोन magnetic wireless charging को सपोर्ट करता है तो MagSafe-compatible या magnetic ring वाला कवर आपके लिए बेहतर साबित हो सकता है. इसमें मौजूद मैग्नेट फोन को चार्जिंग पैड के साथ सही position में रखने में मदद करते हैं.
लेकिन हर magnetic case एक जैसा नहीं होता है. सस्ता या खराब क्वालिटी वाला magnetic ring चार्जिंग coil की alignment को खराब कर सकता है. इसलिए कवर खरीदते समय ये जरूर देखें कि वह आपके फोन और इस्तेमाल किए जा रहे wireless charger के साथ compatible है.
कवर पर वायरलेस चार्जिंग सपोर्ट जरूर देखें
नया फोन कवर खरीदते समय सिर्फ ये न देखें कि वह आपके फोन के मॉडल के लिए बना है. अगर आप वायरलेस चार्जिंग इस्तेमाल करते हैं तो प्रोडक्ट की जानकारी में Wireless Charging Compatible या Qi Compatible जैसे शब्द जरूर देखें.
अगर आपका फोन MagSafe जैसे magnetic charging standard को सपोर्ट करता है तो उसी के हिसाब से तैयार हुआ कवर ही लेना आपके लिए बेहतर साबित हो सकता है.
चार्जिंग के दौरान फोन गर्म होने पर क्या करें
जानकारी के लिए बता दें कि वायरलेस चार्जिंग के दौरान फोन का गर्म होना नॉर्मल बात है. लेकिन अगर कवर लगाने के बाद फोन जरूरत से ज्यादा गर्म हो रहा है या चार्जिंग बार-बार रुक रही है तो एक आसान टेस्ट करें.
फोन को कवर से निकालकर उसी चार्जिंग पैड पर रखें. अगर बिना कवर के चार्जिंग बेहतर तरीके से होने लगे तो समझ जाइए कि समस्या कवर की वजह से थी. ऐसे में पतला और wireless charging-compatible केस इस्तेमाल करना आपके लिए बेहतर रहेगा.

चार्जर की alignment भी उतनी ही जरूरी
कई बार यूजर्स पूरी समस्या का जिम्मेदार कवर को मान लेते हैं जबकि असली वजह फोन की गलत positioning भी हो सकती है. दरअसल, वायरलेस चार्जर पर फोन की charging coil और चार्जिंग पैड की coil का सही alignment जरूरी होती है.
अगर आपका फोन चार्जिंग पैड पर थोड़ा इधर-उधर रखा है तो फोन की चार्जिंग स्लो हो सकती है या रुक भी सकती है. हालांकि, Magnetic charging वाले फोन में ये समस्या नॉर्मली कम होती है क्योंकि मैग्नेट सही position बनाने में मदद करते हैं.
कवर खरीदने से पहले इन बातों का रखें ध्यान

कवर बहुत ज्यादा मोटा न हो.
Wireless Charging या Qi compatibility जरूर देखें.
बड़े metal plates या metallic हिस्सों से बचें.
Magnetic charging इस्तेमाल करते हैं तो compatible magnetic case चुनें.
कैमरा प्रोटेक्शन के साथ केस की मोटाई भी देखें.
खराब क्वालिटी के magnetic rings वाले कवर से बचें.
जरूरत पड़ने पर कवर हटाकर charging performance चेक करें.

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        <pubDate>Mon, 10 Aug 2026 07:30:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>तितली के पंखों से बढ़ेगी सोलर पैनल की एफिशिएंसी? नया डिजाइन करेगा कमाल</title>
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        <description><![CDATA[ तितली के पंखों से बढ़ेगी सोलर पैनल की एफिशिएंसी? नया डिजाइन करेगा कमाल ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 09 Aug 2026 19:30:13 +0530</pubDate>
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        <title>TRAI Channel Selector App: TRAI के इस एप से ऑप्टिमाइज करें टीवी चैनल, आधा हो जाएगा बिल</title>
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        <description><![CDATA[ TRAI Channel Selector App: अधिकतर डीटीएच और केबल यूजर्स ने कभी न कभी अपना मासिक बिल देखकर यह जरूर सोचा होगा कि टीवी देखने के तरीके में कोई बदलाव न होने के बावजूद बिल क्यों बढ़ता जा रहा है? इसका मुख्य कारण ऑपरेटरों द्वारा दाम बढ़ाना नहीं है, बल्कि वे चैनल्स और पैकेज हैं जिन्हें यूजर्स कभी चुनकर भूल जाते हैं और बाद में हटाना बंद कर देते हैं.
भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण TRAI का चैनल सेलेक्टर ऐप खासतौर पर इसी समस्या को दूर करने के लिए बनाया गया है. इसके बावजूद, जिन लोगों को इसका सबसे ज्यादा फायदा मिल सकता है, उनमें से अधिकांश ने आज तक इस ऐप को खोलकर भी नहीं देखा है.&amp;nbsp;
यह एप क्या मदद करता है?
TRAI के टैरिफ नियमों के तहत, ग्राहक अलग-अलग चैनलों और पैकेजों के लिए पैसे देते हैं. ऐसे में केबल या डीटीएच ऑपरेटरों को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप कौन से चैनल देख रहे हैं, इसलिए वे आपकी लिस्ट से फालतू चैनल हटाने की कोशिश भी नहीं करते. यही वजह है कि महीनों या सालों में आपके टीवी का सब्सक्रिप्शन बढ़ता ही चला जाता है. उदाहरण के लिए, किसी स्पोर्ट्स सीजन के दौरान लिया गया पैकेज जो बाद में कभी हटाया ही नहीं गया, डिफ़ॉल्ट रूप से मिलने वाले क्षेत्रीय चैनल, या फिर प्रमोशनल ऑफर में चुने गए ऐड-ऑन, जो बाद में पूरी कीमत पर चालू रहते हैं. नतीजा यह होता है कि आप चैनल तो उतने ही देखते हैं, लेकिन आपका बिल लगातार बढ़ता जाता है.
ऐसे में क्या करें?
TRAI का चैनल सेलेक्टर ऐप गूगल प्ले स्टोर और एप्पल ऐप स्टोर पर आसानी से मिल जाएगा. अगर आप कोई ऐप डाउनलोड नहीं करना चाहते, तो आप सीधे इसकी आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर भी इसका इस्तेमाल कर सकते हैं. ऐप या वेबसाइट खोलने के बाद लिस्ट में से अपने टीवी ऑपरेटर जैसे टाटा प्ले, एयरटेल, डिश टीवी आदि को चुनें. इसके बाद अपने रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर, सब्सक्राइबर आईडी या सेट-टॉप बॉक्स नंबर को डालकर लॉग इन करें. आपके नंबर पर एक ओटीपी आएगा, जिसे दर्ज करते ही आप लॉग इन हो जाएंगे.&amp;nbsp;
लॉग इन होते ही ऐप आपके टीवी सब्सक्रिप्शन की पूरी कुंडली सामने रख देगा. यहां आपको साफ-साफ दिखेगा कि अभी कौन से पैकेज एक्टिव हैं, कौन से अलग चैनल चल रहे हैं, कुल कितने चैनल आपके पैक में हैं और उनका हर महीने का बिल कितना आ रहा है. यह स्टेप सबसे ज्यादा चौंकाने वाला होता है, क्योंकि ज़्यादातर यूजर्स को यहीं आकर पता चलता है कि वे ऐसे दर्जनों चैनलों के पैसे दे रहे हैं जिन्हें वे कभी देखते ही नहीं.
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शुरू करने से पहले एक जरुरी बात
अलग-अलग टीवी ऑपरेटरों जैसे Airtel, Tata Play, Dish TV के लिए सपोर्ट और लॉगिन करने का तरीका थोड़ा अलग हो सकता है. उदाहरण के लिए, कुछ ऑपरेटर रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर की जगह आपसे सब्सक्राइबर आईडी मांग सकते हैं, तो कुछ के मेनू की भाषा अलग हो सकती है. इसलिए, अगर ऐप की स्क्रीन ऊपर बताए गए स्टेप्स से पूरी तरह मैच नहीं खाती है, तो घबराएं नहीं. यह मान लेने के बजाय कि ऐप में कोई गड़बड़ है, अपने ऑपरेटर के स्क्रीन पर आ रहे निर्देशों को ध्यान से पढ़ें और आगे बढ़ें.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Sun, 09 Aug 2026 19:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>WhatsApp यूजर्स की मौज! ChatGPT में जल्द बना सकेंगे अपने मनपसंद स्टिकर्स</title>
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        <description><![CDATA[ WhatsApp: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब अपने एडवांस लेवल पर पहुंच रहा है. देश में अब लोग एआई चैटबॉट की मदद से अपने कई सारे काम को आसान बना रहे हैं. एआई कंपनियां भी यूजर्स के एक्सपीरिएंस को बेहतर बनाने के लिए लगातार नए फीचर्स पर काम कर रही हैं. इसी कड़ी में OpenAI भी अपने ChatGPT को लेकर एक नया फीचर तैयार कर रहा है. अब अगर ये फीचर लॉन्च होता है तो यूजर्स ChatGPT की मदद से बनाए गए कस्टम स्टिकर्स को डॉयरेक्ट WhatsApp में इस्तेमाल कर सकेंगे.
ChatGPT में बनेंगे पर्सनलाइज्ड WhatsApp स्टिकर्स
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, WhatsApp पर काफी लंबे समय से लोग स्टिकर्स का इस्तेमाल कर रहे हैं जिससे यूजर्स की चैटिंग एक्सपीरिएंस बेहतर होती है. इमोजी और GIF की तरह स्टिकर्स भी अपने इमोशन्स को अलग अंदाज में जाहिर करने का तरीका हैं. इनमें मीम्स, मजेदार कैरेक्टर, टेक्स्ट वाले डिजाइन और अलग-अलग तरह की इलस्ट्रेशन शामिल हो सकती हैं.

रिपोर्ट के अनुसार, OpenAI ChatGPT में ऐसा ऑप्शन ऐड करने की तैयारी में है जिसकी मदद से यूजर्स AI से अपने लिए स्टिकर्स तैयार कर पाएंगे. बता दें कि इस फीचर की सबसे बड़ी खास बात ये है कि यूजर जो भी स्टीकर्स एआई की मदद से बनाएगा उन्हें डाउनलोड करने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी. यूजर्स स्टीकर्स को चैटबॉट से डॉयरेक्ट व्हाट्सऐप में एक्सपोर्ट कर सकेगा.
Android ऐप में मिले नए संकेत
बता दें कि इस फीचर की जानकारी ChatGPT के Android ऐप के लेटेस्ट वर्जन में मौजूद कुछ स्ट्रिंग्स से सामने आई है. Android Authority की रिपोर्ट के मुताबिक, ऐप के कोड में ऐसी जानकारी मिली है जो स्टिकर्स को दूसरे चैट ऐप्स में कनेक्ट करने की ताकत की ओर इशारा करती है.
हालांकि, अभी इन संकेतों से ये माना जा सकता है कि कंपनी अभी इस फीचर की टेस्टिंग कर रही है. ये फीचर कब लॉन्च होगा इसके बारे में फिलहाल कोई जानकारी सामने नहीं आई है.
WhatsApp में सीधे बन सकता है कस्टम स्टिकर पैक
दरअसल, अगर कंपनी का ये फीचर लॉन्च होता है तो इसका इस्तेमाल करना काफी आसान हो सकता है. माना जा रहा है कि ChatGPT में तैयार किए गए स्टिकर्स के लिए Add to WhatsApp का ऑप्शन मिलेगा. इस पर टैप करने के बाद यूजर अपने बनाए हुए स्टिकर्स को WhatsApp के कस्टम स्टिकर पैक के रूप में ऐड कर सकेंगे.
इसका मतलब है कि किसी खास व्यक्ति, मजाक, मीम या मौके के लिए स्टिकर बनाना यूजर्स के लिए अब काफी आसान हो जाएगा. यूजर को अलग से किसी थर्ड-पार्टी स्टिकर ऐप की जरूरत नहीं पड़ेगी.
लेकिन ये है शर्त
इस फीचर को लेकर रिपोर्ट में एक और दिलचस्प बात सामने आई है. दरअसल, WhatsApp में किसी नए स्टिकर पैक को जोड़ने के लिए कम से कम तीन स्टिकर्स की जरूरत होती है. इसलिए ChatGPT में दिखाई दे रही WhatsApp (3 minimum) वाली शर्त को OpenAI की पाबंदी नहीं बल्कि WhatsApp की टेक्निकल जरूरत माना जा रहा है. इसका मतलब साफ है कि यूजर को एक पैक में कम से कम तीन स्टिकर्स तैयार करने पड़ेंगे तभी उसे WhatsApp में जोड़ा जा सकेगा.
Meta AI पहले से दे रहा है ऐसी सुविधा
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ये कोई नया फीचर नहीं है. दरअसल, WhatsApp खुद भी AI बेस्ड स्टिकर बनाने की सुविधा पर काम कर रहा है. Meta AI की मदद से यूजर्स टेक्स्ट प्रॉम्प्ट के जरिए अपनी पसंद की तस्वीरें या स्टिकर तैयार कर सकते हैं. ऐसे में ChatGPT का WhatsApp स्टिकर एक्सपोर्ट फीचर OpenAI और Meta के बीच AI बेस्ड क्रिएटिव फीचर्स की रेस को और बढ़ा सकता है.

हालांकि ChatGPT का फायदा ये हो सकता है कि यूजर्स अपने नॉर्मल AI चैट एक्सपीरिएंस के दौरान ही स्टिकर तैयार करके उन्हें सीधे मैसेजिंग ऐप में इस्तेमाल कर सकें.
कब होगा लॉन्च
फिलहाल OpenAI ने इस फीचर के लॉन्च के बारे में कोई आधिकारीक घोषणा नहीं की है. इतना ही नहीं, अभी तक ये भी स्पष्ट नहीं है कि ChatGPT Stickers फीचर पहले बीटा यूजर्स के लिए आएगा या डॉयरेक्ट सभी यूजर्स के लिए उपलब्ध कराया जाएगा. इसके अलावा इस फीचर को इस्तेमाल करने के लिए WhatsApp में किसी अपडेट की जरूरत होगी या नहीं, इसके बारे में भी कंपनी ने कोई जानकारी शेयर नहीं की है. हालाकिं, अगर इस फीचर की टेस्टिंग सफल होती है तो माना जा रहा है कि जल्द ही ये फीचर यूजर्स के लिए उपलब्ध कराया जा सकता है.
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        <pubDate>Sun, 09 Aug 2026 19:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>AI के जगत में इस हफ्ते क्या&amp;क्या हुआ? यहां जानें सारी हलचल</title>
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        <description><![CDATA[ AI Round Up: एआई की दुनिया में बड़ी तेजी से चीजें बदल रही हैं. कंपनियां एक के बाद एक नए एआई मॉडल ला रही हैं तो पार्टनरशिप भी हो रही हैं. कर्मचारियों का एक कंपनी छोड़कर दूसरी कंपनी में जाना भी जारी है और एआई मॉडल्स को लेकर नई चिंताएं भी सामने आ रही हैं. आज के एआई राउंड अप में हम इस हफ्ते की एआई जगत से जुड़ी अहम अपडेट्स लेकर आए हैं, जिससे आपको पता चल सकेगा कि इस दुनिया में क्या-क्या हो रहा है.
हफ्ते की बड़ी अपडेट्स
क्या अब पोर्टेबल डेटा सेंटर बनेंगे?
मंगलवार को एआई इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी रनवेयर ने अपने मॉड्यूलर डेटा सेंटर को लॉन्च किया था. इसे सोनिक इंटरफेस पॉड नाम दिया गया है. इसे ट्रांसपोर्टेबल यूनिट के तौर पर डिजाइन किया गया है. यह कम लागत में हाई क्वालिटी पर इंटरफेस प्रोवाइड करवा सकता है. इसमें ज्यादा कैपेसिटी वाले पॉड्स को जोड़ना आसान है. कंपनी के सीईओ का मानना है कि यह पोर्टेबल यूनिट डेटा सेंटर का भविष्य हो सकती है.
ऐप्पल-ओपनएआई विवाद में नया मोड़
ओपनएआई के खिलाफ ट्रेड सीक्रेट का मुकदमा लड़ रही ऐप्पल ने नया दावा किया है. आईफोन निर्माता कंपनी का कहना है कि उसे लगता है कि उसके कई पूर्व कर्मचारी ट्रेड सीक्रेट चोरी में शामिल हैं. ऐप्पल ने नई याचिका दायर कर आरोपी कर्मचारियों से रिकवरी को तेज करने की मांग की है. ऐप्पल ने कहा कि उसकी जांच से पता चला है कि Chang Liu और Tang Yew Tan के अलावा 11 और पूर्व ऐप्पल कर्मचारियों की इस मामले में भूमिका हो सकती है.
एंथ्रोपिक ने Volta के साथ 10 बिलियन डॉलर की डील साइन की
एंथ्रोपिक पिछले कुछ समय से एक के बाद एक क्लाउड पार्टनरशिप कर रही है. इसी कड़ी में उसने Volta नाम के एक एआई क्लाउड स्टार्टअप के साथ 10 बिलियन डॉलर की डील फाइनल की है. Volta की शुरुआत इसी साल हुई थी और पार्टनरशिप के तहत यह एंथ्रोपिक के एआई मॉडल Claude को छह साल तक क्लाउड कंप्यूट प्रदान करेगा. बता दें कि Volta एनवीडिया के क्लाउड पार्टनर प्रोग्राम का हिस्सा है.
तेजी से बढ़ रहे ओपन-वेट एआई मॉडल्स
एक तरफ सरकारें OpenAI के GPT-5.6 Sol और Anthropic के Mythos जैसे मॉडल्स को लेकर पॉलिसी और नियम बनाने में जुटी हुई हैं. दूसरी तरफ चाइनीज ओपन-वेट मॉडल तेजी से आगे बढ़ रहे हैं. चाइनीज स्टार्टअप Z.ai का GLM-5.2 एआई मॉडल साइबर और बायो कैपेबिलिटीज के मामले में Claude Opus 4.7 और GPT-5.5 से कुछ ही महीने पीछे है. ओपन-वेट मॉडल पब्लिकली पब्लिश्ड होते हैं, जिन्हें कोई भी डाउनलोड, रन और मॉडिफाई कर सकता है.
एआई चिप बनाने के लिए टीम हायर कर रही है एंथ्रोपिक
एंथ्रोपिक अपने एआई यूज के लिए चिप बनाना चाह रही है और इसके लिए वह टीम हायर करने में जुटी हुई है. अपनी टेक्नोलॉजी को फास्टर और एफिशिएंट बनाने के लिए एंथ्रोपिक हार्डवेयर और मॉडल्स को खुद ही डिजाइन करना चाहती है. इन्हें बनाने के लिए सैमसंग से बात चल रही है.
एआई सर्च से बढ़ रहा है ट्रैफिक
ई-कॉमर्स सॉफ्टवेयर बनाने वाली कंपनी Shopify का कहना है कि उसे एआई सर्च से फायदा हो रहा है. उन्होंने कहा कि एआई सर्च गूगल को रिप्लेस नहीं कर रही है बल्कि इसकी मदद से ट्रैफिक बढ़ा है. कंपनी के लिए इस साल की दूसरी तिमाही में एआई से आने वाले ट्रैफिक और ऑर्डर में तीन गुना बढ़ोतरी हुई है.
अपने स्टार्टअप के लिए गूगल छोड़ रहे हैं कर्मचारी
गूगल में सबसे लंबे समय तक काम करने वाले और सबसे प्रभावी अधिकारियों में से एक Jeff Dean अब अपना खुद का एआई स्टार्टअप लॉन्च कर रहे हैं. उनके साथ टॉप इंजीनियर संजय घेमावत, एआई रिसर्चर Quoc Le और सीनियर रिसर्च साइंटिस्ट Oriol Vinyals भी गूगल छोड़कर स्टार्टअप का हिस्सा बनेंगे.
चैटजीपीटी ने टेक्सट चैट की लिमिट हटाई
OpenAI ने चैटजीपीटी पर टेक्स्ट-बेस्ड चैट्स की लिमिट हटा दी है. इसके साथ ही कंपनी ने GPT-5.5 को बदलकर GPT-5.6 Luna मॉडल को फ्री और गो यूजर्स के लिए डिफॉल्ट मॉडल बना दिया है.
OpenAI ने Astra पर काम धीमा किया
OpenAI ने हाल ही में बताया है कि उसने अपने अपकमिंग मॉडल Astra पर काम धीमा कर दिया है. इंटरनल रिव्यू से पता चला है कि एजेंटिक कोडिंग और साइबर सिक्योरिटी के मामले में यह काफी एडवांस्ड है. यानी यह दूसरी कंपनियों के प्रोटेक्टेड सिस्टम को खुद से ही पहचानकर उन पर साइबर अटैक कर सकता है. इसके चलते इसके डेवलपमेंट पर ब्रेक लगाए गए हैं.
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        <pubDate>Sun, 09 Aug 2026 19:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>फोन की चार्जिंग हमेशा Watts में ही क्यों मापी जाती है? जानिए पूरी सच्चाई</title>
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        <description><![CDATA[ Tech Tips: डिजिटल दुनिया में स्मार्टफोन लोगों के काम को आसान बनाने वाला डिवाइस बन चुका है. अब लोग स्मार्टफोन खरीदते समय कैमरा, प्रोसेसर और डिस्प्ले के साथ ही चार्जिंग स्पीड पर भी नजर रखते हैं. लोगों को अब फास्ट चार्जिंग वाले स्मार्टफोन पसंद आते हैं. इसके अलावा अक्सर आपने फोन के बॉक्स में 25W, 33W, 67W, 80W या 120W फास्ट चार्जिंग जैसे दावे देखे होंगे. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि चार्जिंग की स्पीड को Watts (W) में ही क्यों बताया जाता है? आइए जानते हैं पूरी सच्चाई.
क्या होता है Watt
जानकारी के मुताबिक, सबसे पहले ये समझना जरूरी है कि Watt बिजली की Power यानी ताकत को मापने की यूनिट है. आसान भाषा में कहें तो ये बताता है कि कोई डिवाइस एक तय समय में कितनी इलेक्ट्रिकल पावर ले रहा है.
चार्जिंग के मामले में इसका मतलब है कि चार्जर फोन की बैटरी तक कितनी पावर पहुंचा सकता है. नॉर्मली इलेक्ट्रिकल पावर का संबंध Voltage और Current से होता है.

इसका सरल फॉर्मूला है.
Power (Watt) = Voltage (Volt) &amp;times; Current (Ampere)
यानी अगर किसी चार्जर का आउटपुट 10V और 6.7A है तो उसकी पावर करीब 67W होगी.
25W, 67W और 120W में क्या होता है अंतर
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अक्सर लोग 25W, 67W और 120W चार्जिंग में अंतर नहीं समझ पाते हैं. दरअसल, इसका साफ मतलब है कि ज्यादा Watt का मतलब चार्जर ज्यादा पावर देने में सक्षम है. हालांकि, इसका ये मतलब नहीं है कि 120W चार्जर हर फोन को 120W पर ही चार्ज करेगा. फोन और चार्जर के बीच कम्युनिकेशन होता है और फोन अपनी ताकत के हिसाब से पावर लेता है.
अगर आपका फोन मैक्सिमम 25W चार्जिंग सपोर्ट करता है तो 120W चार्जर लगाने पर भी फोन अपनी सपोर्टेड सीमा के आसपास ही पावर लेगा.
ज्यादा Watt का मतलब हमेशा डबल फास्ट चार्जिंग नहीं
आपको बता दें कि 120W चार्जिंग का मतलब ये नहीं है कि फोन 60W के मुकाबले में हर स्थिति में दोगुनी तेजी से चार्ज होगा. चार्जिंग स्पीड कई चीजों पर निर्भर करती है. शुरुआत में बैटरी कम होने पर फोन ज्यादा पावर ले सकता है लेकिन जैसे-जैसे बैटरी का प्रतिशत बढ़ता है, फोन सेफ्टी और बैटरी की लाइफ को ध्यान में रखते हुए पावर कम कर सकता है.
इसी वजह से किसी फोन की पूरी चार्जिंग का औसत पावर लेवल उसके ऐड में बताए गए मैक्सिमम Watt से काफी कम हो सकता है.
Voltage और Ampere का भी है बड़ा रोल
चार्जिंग को सिर्फ Watt देखकर समझना गलत होता है. दरअसल, Voltage और Ampere भी उतने ही जरूरी होते हैं. मान लीजिए एक चार्जर 10V पर 6.7A देता है. दोनों को मल्टिप्लाई करने पर करीब 67W Power मिलती है. इसी तरह अलग-अलग Voltage और Current के मिक्सचर से 25W, 67W या 120W जैसी पावर हासिल की जा सकती है.
यही वजह है कि अलग-अलग कंपनियां अपनी फास्ट चार्जिंग टेक्नोलॉजी में अलग-अलग Voltage और Current प्रोफाइल इस्तेमाल करती हैं.
फोन खुद तय करता है कितनी पावर लेनी है
जानकारी के लिए बता दें कि फास्ट चार्जिंग के दौरान चार्जर और स्मार्टफोन के बीच लगातार पावर मैनेजमेंट होता है. फोन का चार्जिंग कंट्रोलर बैटरी की कंडिशन, टेंपरेचर और दूसरे सेफ्टी नियमों के आधार पर तय करता है कि उस समय कितनी पावर लेना उचित है.
अगर फोन गर्म हो रहा है या बैटरी लगभग पूरी हो चुकी है तो चार्जिंग पावर कम की जा सकती है. इससे बैटरी पर बेमतलब का प्रेशर और ज्यादा गर्मी को कंट्रोल करने में मदद मिलती है.

120W चार्जिंग में गर्मी क्यों बढ़ती है
जितनी ज्यादा पावर बैटरी तक पहुंचाई जाती है चार्जिंग सिस्टम में Heat Management उतना ही जरूरी हो जाता है. ज्यादा पावर के साथ गर्मी पैदा होने की संभावना भी बढ़ती है.
इसी कारण हाई-वॉट चार्जिंग वाले स्मार्टफोन में बेहतर चार्जिंग सर्किट, टेंपरेचर सेंसर, बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम और कई बार स्पेशल बैटरी डिजाइन का इस्तेमाल किया जाता है. कंपनियां चार्जिंग के दौरान टेंपरेचर को कंट्रोल रखने के लिए पावर को जरूरत के अनुसार घटाती-बढ़ाती भी हैं.
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        <pubDate>Sun, 09 Aug 2026 19:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>घर के लिए Wi&amp;Fi 6 लेना चाहिए,  या Wi&amp;Fi 7 का इंतजार करें?</title>
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        <description><![CDATA[ Wi-Fi 6 vs Wi-Fi 7 which is better: आज के समय में हर घर में इंटरनेट बहुत जरूरी हो गया है. मोबाइल चलाने से लेकर टीवी पर फिल्म देखने और लैपटॉप पर काम करने तक, हर चीज के लिए इंटरनेट चाहिए. ऐसे में अगर नया Wi-Fi लगवाने की सोच रहे हैं, तो मन में सवाल आ सकता है कि Wi-Fi 6 लें या Wi-Fi 7 का इंतजार करें. आइए आसान भाषा में समझते हैं कि दोनों में क्या फर्क है और आपके घर के लिए कौन सा सही हो सकता है.
Wi-Fi 6 क्या है?
Wi-Fi 6, पुराने Wi-Fi के मुकाबले नया और तेज है. इसकी मदद से घर में एक साथ कई मोबाइल, टीवी, लैपटॉप और दूसरे सामान इंटरनेट से जोड़े जा सकते हैं. कई लोग एक साथ इंटरनेट चलाएं, तब भी यह अच्छी तरह काम कर सकता है. अगर घर में लोग वीडियो देखते हैं, ऑनलाइन पढ़ाई करते हैं, वीडियो कॉल करते हैं या सोशल मीडिया चलाते हैं, तो Wi-Fi 6 उनके लिए काफी अच्छा हो सकता है.
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Wi-Fi 7 क्या है?
Wi-Fi 7, Wi-Fi 6 से भी नया है. इसे और तेज इंटरनेट के लिए बनाया गया है. इसमें एक साथ कई गैजेट्स चलाने में बेहतर स्पीड मिल सकती है. अगर घर में बहुत सारे मोबाइल, टीवी, कंप्यूटर और दूसरे सामान इंटरनेट से जुड़े रहते हैं, तो Wi-Fi 7 आगे चलकर काम आ सकता है. हालांकि, हर घर में Wi-Fi 7 की जरूरत नहीं होती. अगर आपका काम सामान्य इंटरनेट चलाने, वीडियो देखने, ऑनलाइन पढ़ाई और वीडियो कॉल तक है, तो Wi-Fi 6 भी काफी है.
Wi-Fi 6 कब लेना चाहिए?
अगर आपको अभी नया Wi-Fi लगवाना है, तो Wi-Fi 6 ले सकते हैं. इसके लिए आपको Wi-Fi 7 का इंतजार करने की जरूरत नहीं है. यह रोज के काम के लिए अच्छा है और कई डिवाइस को एक साथ संभाल सकता है. अगर घर में चार-पांच या उससे ज्यादा लोग इंटरनेट चलाते हैं, तब भी Wi-Fi 6 आपके लिए अच्छा विकल्प हो सकता है.
Wi-Fi 7 कब लेना सही रहेगा?
अगर आपको सबसे नया Wi-Fi चाहिए और आप इसके लिए ज्यादा पैसे खर्च कर सकते हैं, तो Wi-Fi 7 ले सकते हैं. खासकर अगर आप आगे चलकर बहुत तेज इंटरनेट का इस्तेमाल करना चाहते हैं, तो यह आपके काम आ सकता है. हालांकि सिर्फ नया होने की वजह से Wi-Fi 7 लेना जरूरी नहीं है. पहले यह देखना चाहिए कि आपके घर में इंटरनेट का इस्तेमाल कितना होता है.
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        <pubDate>Sun, 09 Aug 2026 03:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>ये AI कंपनी दिमाग पढ़ने के बदले देगी पैसे! जानिए क्या है पूरा मामला</title>
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        <description><![CDATA[ Artificial Intelligence: टेक्नोलॉजी की दुनिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस काफी तेजी से विस्तार कर रहा है. अब लोग एआई चैटबॉट्स की मदद से अपने ज्यादातर काम कर रहे हैं. इतना ही नहीं, अब एआई लोगों से बेहतर तरीके से काम करने में भी सक्षम है. इसी कड़ी में बता दें कि अब एआई कंपनियां इंसानों के दिमाग और मशीन के बीच सीधा कनेक्शन बनाने की दिशा में भी तेजी से काम कर रही हैं. बता दें कि एक AI स्टार्टअप ऐसा सिस्टम तैयार करने की कोशिश कर रहा है जो इंसान के दिमाग को समझकर उन्हें टेक्स्ट में बदल सकेगा.
इस कंपनी ने किया कमाल
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, इस कंपनी का नाम Conduit है और इसका मकसद किसी साइंस-फिक्शन फिल्म जैसी लगने वाली टेलीपैथी टेक्नोलॉजी को तैयार करना है. इस कंपनी की सबसे बड़ी खास बात ये है कि कंपनी को अब इंसानों के दिमाग का डेटा चाहिए. इसीलिए कंपनी लोगों के दिमाग के डेटा के बदले उन्हें पैसे ऑफर कर रही है.

AI से करनी होगी बात
जानकारी के अनुसार, इस रिसर्च में हिस्सा लेने वाले लोगों को सिर्फ चुपचाप बैठना नहीं है. उन्हें AI सिस्टम के साथ बातचीत भी करनी होती है. कुछ सेशन में इंसान AI से सुनता और बोलता है जबकि कुछ एक्टिविटी में पढ़ने और टाइप करने का काम भी शामिल है.
कंपनी का मकसद ऐसे सेशन से ज्यादा से ज्यादा न्यूरल डेटा जुटाना है. इसके लिए इंसानों को दो घंटे के अंदर ज्यादा से ज्यादा बोलने या टाइप करने के लिए कहा जाता है. हालांकि इसमें एक खास शर्त भी है. जो लोग इसमें भाग ले रहे हैं उन्हें कीबोर्ड पर बिना अपनी उंगलियों को देखे टाइप करना आना चाहिए. इससे रिसर्च के दौरान टाइपिंग और दिमागी एक्टिविटी के बीच संबंध को बेहतर तरीके से समझने में मदद मिल सकती है.
इस्तेमाल होगा ये खास हेलमेट
जानकारी के मुताबिक, Conduit अपने एक AI मॉडल पर काम कर रही है जिसको ट्रेन करने के लिए उसे इंसान के दिमाग से मिलने वाले न्यूरल डेटा की जरूरत पड़ रही है. इसीलिए कंपनी ऐसे लोगों को रिसर्च के लिए चुन रही है जो अपने दिमाग के डेटा और रिकॉर्ड्स को इस्तेमाल के लिए देने के लिए तैयार हों.
आपको बता दें कि जो भी लोग इस रिसर्च में शामिल होंगे उन्हें करीब 2 घंटों के लिए एक खास हेलमेट पहनना होगा. इस हेलमेट में इलेक्ट्रोड लगे होते हैं जो दिमाग में हो रही एक्टिविटी को रिकॉर्ड करते हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, इस पूरे सेटअप का वजन करीब चार पाउंड यानी लगभग 1.8 किलोग्राम है.
बता दें कि इस दो घंटों के बदले कंपनी जो लोग इस रिसर्च मे शामिल हैं उन्हें 55 डॉलर तक यानी करीब 5,200 रुपये पेमेंट कर रही है. कंपनी का कहना है कि एक व्यक्ति ज्यादा से ज्यादा 32 सेशन में ही हिस्सा ले सकता है.
पहली बार नहीं हो रही ये रिसर्च
जानकारी के अनुसार, इंसान के दिमाग को मशीन से समझने का सपना आज का नहीं है. करीब एक सदी पहले भी कुछ लोगों ने ऐसी टेक्नोलॉजी बनाने का दावा किया था. 1908 में Columbia University के प्रोफेसर Frederick Peterson ने एक ऐसे डिवाइस की बात की थी जिसे उन्होंने psychometer बताया था और दावा किया था कि इससे इंसाने के दिमाग में चल रही चीजों को पढ़ा जा सकता है.
हालांकि उस समय ऐसी टेक्नोलॉजी के दावे वैज्ञानिक रूप से सही साबित नहीं हो पाए थे. लेकिन आज स्थिति बिलकुल अलग है. एडवांस न्यूरोसाइंस, मशीन लर्निंग और पैटर्न रिकग्निशन की मदद से वैज्ञानिक अब दिमाग से मिलने वाले मैसेज को समझने में पहले के मुकाबले काफी आगे बढ़ चुके हैं.

Meta और Neuralink भी कर रहे हैं एक्सपेरिमेंट
आपको बता दें कि इस क्षेत्र में Conduit ही सिर्फ एक कंपनी नहीं है. दरअसल, Meta भी ऐसे सिस्टम पर काम कर चुकी है जो ब्रेन स्कैन से मिलने वाले मैसेज को टेक्स्ट में बदलने की दिशा में काम करते हैं. कंपनी की Brain2Qwerty टेक्नोलॉजी को इस क्षेत्र में शुरुआती कदमों में से एक माना गया है. इसका इस्तेमाल उन लोगों की मदद के लिए किया जा सकता है जो न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों के कारण नॉर्मल तरीके से बातचीत नहीं कर पाते हैं.
वहीं Elon Musk की कंपनी Neuralink के ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस से जुड़े एक्सपेरिमेंट्स में भी ऐसे परफॉर्मेंस सामने आ चुके हैं, जहां यूजर्स दिमागी मैसेज के जरिए कंप्यूटर पर कर्सर कंट्रोल करने, टाइप करने और गेम खेलने जैसी एक्टिविटी कर पाए हैं.
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        <pubDate>Sun, 09 Aug 2026 03:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>Jio का OTT धमाका! नए प्लान में मिलेगा डबल फायदा, जानें क्या है खास</title>
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        <description><![CDATA[ Reliance Jio OTT Pass: देश की बड़ी टेलीकॉम कंपनी Reliance Jio ने अपने यूजर्स के लिए एक नया प्लान पेश किया है. बता दें कि कंपनी अपने यूजर्स के लिए समय-समय पर नए प्लान पेश करती रहती है जिससे उनका एक्सपीरिएंस बेहतर हो सके. इसी कड़ी में कंपनी ने अब फिल्में, वेब सीरीज, लाइव स्पोर्ट्स और टीवी देखने वाले जियो ग्राहकों के लिए अब लंबे समय के OTT-Pass पेश किए हैं.
कंपनी ने 550 रुपये में 84 दिन और 2,000 रुपये में 365 दिन वाले दो नए पास पेश किए हैं. बता दें कि पहले से मौजूद 200 रुपये के पास की वैलिडिटी 28 दिनों की है. इन तीनों पास में हाई-स्पीड डेटा, अनलिमिटेड 5G, 15 प्रीमियम OTT ऐप्स और JioTV पर 1,000 से ज्यादा लाइव टीवी चैनल्स का एक्सेस मिलेगा.
इस नए Jio OTT Pass में क्या मिलेगा
जानकारी के अनुसार, Jio ने इस नए OTT Pass को तीन अलग-अलग वैलिडिटी ऑप्शनों में रखा है. इनमें यूजर्स को डेटा के साथ Unlimited 5G और कई प्रीमियम OTT प्लेटफॉर्म का एक्सेस मिल जाता है.
200 रुपये का Jio OTT Pass
आपको बता दें कि ये कंपनी का सबसे छोटा OTT Pass है जिसकी वैलिडिटी 28 दिनों की है. इस पास में यूजर्स को कुल 30GB हाई-स्पीड डेटा मिलता है. इसके अलावा यूजर्स को Unlimited 5G का फायदा भी दिया जाता है.
ये पैक उन Jio ग्राहकों के लिए है जिनके नंबर पर पहले से कोई एक्टिव बेस प्लान मौजूद है. हालांकि, केवल वॉयस वाले प्लान पर ये OTT Pass उपलब्ध नहीं है.
550 रुपये वाला OTT Pass
ये पास उन यूजर्स के लिए खास है जिन्हें लंबे समय तक ओटीटी कंटेंट देखना पसंद है. इस पास की कीमत 550 रुपये है और इसकी वैलिडिटी कंपनी ने 84 दिनों की रखी है. इस दौरान यूजर्स को इसमें टोटल 90GB हाई-स्पीड डेटा मिलता है. इसमें भी Unlimited 5G का फायदा शामिल है. ये पास 3 महीने या एक साल वाले एक्टिव बेस प्लान पर उपलब्ध है.
2000 रुपये वाला OTT Pass
कंपनी का सबसे महंगा OTT Pass 2 हजार रुपये का है. हालांकि, इस पास की वैलिडिटी पूरे 365 दिनों की है यानी आपको साल भर तक बेनिफिट्स मिलते रहेंगे. इस पास में यूजर्स को 365GB हाई-स्पीड डेटा और Unlimited 5G मिलता है.
ये ऑप्शन केवल उन ग्राहकों के लिए है जिनके पास Jio का एक्टिव एक साल वाला बेस प्लान है. इसलिए लंबे समय तक OTT देखने वाले यूजर्स के लिए ये सबसे खास ऑप्शन बन सकता है.
1,000 से ज्यादा लाइव TV चैनल भी
सिर्फ OTT ही नहीं, Jio OTT Pass के साथ JioTV के जरिए 1,000 से ज्यादा लाइव टीवी चैनल भी देखने को मिलते हैं. इनमें Star Plus HD, Colors HD, SET HD, Sun TV HD, Discovery और Cartoon Network जैसे चैनल शामिल हैं.

15 प्रीमियम OTT प्लेटफॉर्म का फायदा
Jio के मुताबिक, इन OTT Pass में कई फेमश स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म शामिल हैं. इनमें YouTube Premium, JioHotstar और Amazon Prime जैसे बड़े नाम शामिल हैं. YouTube Premium के जरिए यूजर्स ऐड-फ्री वीडियो, बैकग्राउंड प्ले और ऑफलाइन डाउनलोड जैसे बेनिफिट्स का इस्तेमाल कर सकते हैं.
वहीं, JioHotstar पर लाइव स्पोर्ट्स, ओरिजिनल शोज और हॉलीवुड कंटेंट देखने का ऑप्शन भी यूजर्स को मिल जाता है. इतना ही नहीं, यूजर्स को Amazon Prime का फायदा अलग-अलग OTT Pass के हिसाब से अलग हो सकता है. 550 और 2,000 रुपये वाले ऑप्शन में Amazon Prime Lite का एक्सेस दिया गया है जबकि 200 रुपये वाले पैक में Prime Video Mobile Edition मिलता है.
इसके अलावा SonyLIV, ZEE5, Lionsgate Play, Discovery+, SunNXT, FanCode, Hoichoi, Chaupal, Planet Marathi, Kanccha Lannka, TimesPlay और Tarang Plus जैसे प्लेटफॉर्म भी शामिल हैं.
Airtel से कितना अलग है Jio का OTT Pass
देश की दूसरी बड़ी टेलीकॉम कंपनी Airtel भी अपने यूजर्स को OTT और मोबाइल डेटा को एक साथ जोड़ने वाले कई प्लान ऑफर करती है. Airtel के 549 रुपये वाला प्लान 28 दिनों की वैलिडिटी के साथ आता है. इस प्लान में यूजर्स को 3GB प्रतिदिन डेटा, Unlimited Calling, Unlimited 5G, 3 महीने का JioHotstar और Airtel Xstream Play के जरिए 22+ OTT का एक्सेस मिल जाता है. वहीं ₹979 वाले प्लान में 84 दिनों की वैलिडिटी, 2GB प्रतिदिन डेटा और 3 महीने का JioHotstar मिलता है.
Airtel ने 2025 में ₹279 से शुरू होने वाले ऑल-इन-वन OTT एंटरटेनमेंट पैक भी पेश किए थे जिनमें Netflix Basic, ZEE5, JioHotstar और Airtel Xstream Play Premium जैसे बेनिफिट्स यूजर्स को मिल जाते हैं. इसके अलावा ₹598 और ₹1,729 के डेटा बंडल प्लान भी मौजूद हैं.
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        <pubDate>Sun, 09 Aug 2026 03:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>UPI पर नहीं लगेगा कोई चार्ज, आम लोगों के लिए बड़ी राहत</title>
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        <description><![CDATA[ UPI से पेमेंट करने वाले आम लोगों के लिए सरकार ने बड़ी राहत की बात कही है. सरकार ने साफ किया है कि UPI से पेमेंट करने वाले यूजर्स से कोई ट्रांजैक्शन चार्ज नहीं लिया जाएगा. यानी आम आदमी पहले की तरह UPI के जरिए बिना किसी शुल्क के पैसे भेज और भुगतान कर सकेगा. सरकार ने यह भी साफ किया है कि Person-to-Person यानी एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को किए जाने वाले सभी UPI ट्रांजैक्शन फ्री रहेंगे.
व्यापारियों पर भी नहीं लगेगा हर ट्रांजैक्शन पर चार्ज
सरकार के मुताबिक, UPI से जुड़े व्यापारियों यानी मर्चेंट्स के लिए भी हर ट्रांजैक्शन पर चार्ज लगाने की बात नहीं है. सरकार ने कहा है कि अगर भविष्य में MDR यानी Merchant Discount Rate लागू किया जाता है, तो यह सिर्फ कुछ चुनिंदा मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर ही लागू होगा. इसके लिए एक निश्चित सीमा यानी थ्रेशोल्ड तय किया जाएगा. इसके अलावा चार्ज की दर भी सामान्य और बहुत कम होगी. सरकार का कहना है कि यह दर डेबिट और क्रेडिट कार्ड पर लगने वाले MDR से काफी कम होगी. यानी सीधी भाषा में समझें तो हर दुकानदार से हर UPI पेमेंट पर चार्ज नहीं लिया जाएगा. सरकार के मुताबिक UPI के ज्यादातर मर्चेंट ट्रांजैक्शन पहले की तरह फ्री ही रहेंगे.
MDR कौन तय करेगा?
सरकार के मुताबिक, संसद से Taxation and Other Laws (Amendment) Bill, 2026 पास होने के बाद Payment and Settlement Systems Act, 2007 की धारा 10A में बदलाव का रास्ता साफ होगा. इसके बाद अगर MDR लागू करने का फैसला होता है, तो NPCI की अध्यक्षता वाली &amp;ldquo;UPI and Services Steering Committee&amp;rdquo; यह तय करेगी कि MDR कितना होगा और किन ट्रांजैक्शन पर लागू होगा.
आखिर कानून में बदलाव की जरूरत क्यों पड़ी?
सरकार का कहना है कि Payment and Settlement Systems Act में किया गया बदलाव आम लोगों पर UPI चार्ज लगाने के लिए नहीं है. सरकार इसे एक enabling provision यानी ऐसा प्रावधान बता रही है, जिससे UPI को लंबे समय तक मजबूत और टिकाऊ बनाए रखा जा सके. सरकार के मुताबिक UPI पर लगातार ट्रांजैक्शन बढ़ रहे हैं. ऐसे में सिस्टम को मजबूत बनाए रखने के लिए साइबर सिक्योरिटी, धोखाधड़ी रोकने और तकनीकी ढांचे को लगातार अपग्रेड करने की जरूरत है. सरकार का कहना है कि UPI को आगे बढ़ाने के लिए ज्यादा कंपनियों की भागीदारी और प्रतिस्पर्धा भी जरूरी है. इसके लिए ऐसा मॉडल चाहिए जिससे UPI का सिस्टम लंबे समय तक अपने दम पर चल सके.
सिर्फ सरकारी सब्सिडी पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं
सरकार का कहना है कि UPI के अगले दौर के विकास के लिए केवल सब्सिडी पर निर्भर रहना लंबे समय तक सही रास्ता नहीं है. इसी वजह से एक ऐसा संतुलित सिस्टम बनाने की जरूरत है, जिससे UPI मजबूत, सुरक्षित, प्रतिस्पर्धी और भविष्य के लिए तैयार रह सके.&amp;nbsp;
चार्ज को लेकर फैली गलतफहमी पर सरकार की सफाई
UPI में चार्ज लगाए जाने को लेकर कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में यह सवाल उठाया गया कि क्या इस नीति के पीछे किसी बाहरी दबाव का असर है. सरकार ने इन बातों को बेबुनियाद, पूरी तरह गलत और भ्रामक बताया है. &amp;nbsp;सरकार ने कहा कि अगर बाहरी दबाव होता तो 2016 में UPI शुरू नहीं किया जाता. सरकार ने यह भी कहा कि जनवरी 2020 से UPI को नागरिकों और व्यापारियों के लिए फ्री रखने की व्यवस्था की गई और इसे दुनिया का सबसे बड़ा रियल टाइम इंटरऑपरेबल पेमेंट सिस्टम बनाया गया.
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सरकार ने क्या साफ किया?
सरकार की बात को बिल्कुल आसान भाषा में समझें तो...
आम आदमी के लिए UPI फ्री रहेगा.
एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को पैसे भेजने पर कोई चार्ज नहीं लगेगा.
हर दुकानदार से UPI पेमेंट पर चार्ज नहीं लिया जाएगा.
अगर भविष्य में MDR लागू होता भी है तो वह कुछ सीमित मर्चेंट ट्रांजैक्शन और तय सीमा से ऊपर के ट्रांजैक्शन पर ही होगा और इसकी दर मामूली होगी.
सरकार का कहना है कि UPI को फ्री रखते हुए उसकी सुरक्षा, तकनीक और लंबे समय की मजबूती सुनिश्चित करना ही इस बदलाव का उद्देश्य है.
सरकार ने साफ शब्दों में कहा है कि UPI भारत का अपना इनोवेशन है और आम नागरिकों के लिए इसे फ्री रखने की प्रतिबद्धता बनी रहेगी.
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        <pubDate>Sun, 09 Aug 2026 03:30:06 +0530</pubDate>
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        <media:keywords>UPI, पर, नहीं, लगेगा, कोई, चार्ज, आम, लोगों, के, लिए, बड़ी, राहत</media:keywords>
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        <title>e&amp;Mitra WhatsApp Service: सारी सुविधाएं एक क्लिक पर, इस राज्य में अब व्हाट्सएप ही आपका ई&amp;मित्र</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/e-mitra-whatsapp-service-सारी-सुविधाएं-एक-क्लिक-पर-इस-राज्य-में-अब-व्हाट्सएप-ही-आपका-ई-मित्र</link>
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        <description><![CDATA[ e-Mitra WhatsApp Service: राजस्थान सरकार ने प्रदेश के लोगों को एक बड़ी राहत दी है. अब राज्य के नागरिकों को जाति प्रमाण पत्र, मूल निवास प्रमाण पत्र, ईडब्ल्यूएस प्रमाण पत्र बनवाने या बिजली-पानी का बिल भरने के लिए सरकारी दफ्तरों या ई-मित्र केंद्रों के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे.&amp;nbsp; मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने 1 जुलाई 2026 को एक बड़े ई-गवर्नेंस कार्यक्रम में इस नई ई-मित्र व्हाट्सएप सेवा की शुरुआत कि. यह कदम राजस्थान को डिजिटल राज्य बनाने की दिशा में उठाया गया एक बड़ा प्रयास है, जिसका मकसद है कि लोगों को घर बैठे ही सरकारी सुविधाएं आसानी से मिल जाएं और उन्हें दफ्तरों में लाइन में लगकर समय बर्बाद न करना पड़े.
व्हाट्सएप नंबर पर मैसेज भेजकर मिलेंगी 27 सेवाएं
इस नई सुविधा की सबसे खास बात यह है कि इसके लिए किसी अलग ऐप को डाउनलोड करने की जरूरत नहीं है. सरकार ने इसके लिए एक आधिकारिक व्हाट्सएप नंबर 94610-62705 जारी किया है. प्रदेश का कोई भी नागरिक अपने मोबाइल फोन से इस नंबर पर सिर्फ एक मैसेज भेजकर 27 तरह की जरूरी सरकारी सेवाओं का फायदा उठा सकता है. इसमें जाति, मूल निवास और आय प्रमाण पत्र जैसे जरूरी दस्तावेज बनवाना, साथ ही बिजली और पानी का बिल जमा करना जैसी रोजमर्रा की सुविधाएं शामिल हैं. इससे पहले इन सभी कामों के लिए लोगों को ई-मित्र केंद्र या सरकारी दफ्तर जाना पड़ता था, जिसमें काफी समय और मेहनत लगती थी.&amp;nbsp;
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आने वाले समय में और बढ़ेगा सुविधाओं का दायरा
फिलहाल राजस्थान में ई-मित्र के जरिए पहले से ही 600 से ज़्यादा तरह की सेवाएं दी जा रही हैं.&amp;nbsp; सरकार की योजना है कि अगले साल इनमें से 100 सबसे जरूरी सेवाओं को भी पहले चरण में व्हाट्सएप प्लेटफॉर्म पर लाया जाए, ताकि लोगों को और भी ज्यादा काम मोबाइल से ही निपटाने की सुविधा मिल सके. इसके साथ ही सरकार 25 हजार युवाओं और महिलाओं को &quot;मिनी ई-मित्र&quot; के तौर पर नियुक्त करने की भी तैयारी कर रही है, जो मोबाइल के जरिए ही घर-घर जाकर लोगों को सरकारी सेवाएं पहुंचाएंगे. इसके अलावा राज्य में एक नई आईटी पॉलिसी भी लाई जाएगी, जिससे डिजिटल गवर्नेंस को और मजबूत बनाया जा सके और ज्यादा से ज्यादा आईटी निवेश को बढ़ावा मिल सके.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Sun, 09 Aug 2026 03:30:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>सॉफ्टवेयर अपडेट करना न पड़ जाए भारी, कंप्यूटर हो सकता है हैक</title>
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        <description><![CDATA[ Software Update Scam: आमतौर पर साइबर अटैक से बचने के लिए सॉफ्टवेयर को अपडेटेड रखने की सलाह दी जाती है. अब हैकर्स सुरक्षा के इसी तरीके का इस्तेमाल कर लोगों को टारगेट कर रहे हैं. एक नई रिपोर्ट में सामने आया है कि साइबर अपराधी Adobe और Zoom जैसे सॉफ्टवेयर की अपडेट से फर्जी प्रॉम्प्ट भेज रहे हैं. जैसे ही कोई इन्हें असली सॉफ्टवेयर अपडेट समझकर इन पर क्लिक करता है, उसके कंप्यूटर का पूरा कंट्रोल साइबर अपराधियों के पास चला जाता है. सॉफ्टवेयर की खामियों का फायदा उठाने की बजाय अब हैकर्स इस तरीके से साइबर इंजीनियरिंग के जरिए लोगों के डिवाइस की एक्सेस ले रहे हैं.
हैकिंग के लिए इन तरीकों का हो रहा इस्तेमाल
रिपोर्ट्स के मुताबिक, साइबर अपराधी इन दिनों सॉफ्टवेयर अपडेट के नाम पर स्कैम चला रहे हैं. इसमें Adobe और Zoom जैसे भरोसेमंद नामों वाले सॉफ्टवेयर से जुड़ी अपडेट का प्रॉम्प्ट भेजा जाता है. कई यूजर्स को बिजनेस डॉक्यूमेंट रिव्यू के बहाने से जाल में फंसाया जा रहा है. क्रिमिनल इन अलग-अलग तरीकों से ScreenConnect जैसे रिमोट मॉनिटरिंग और मैनेजमेंट टूल को टारगेट के डिवाइस में इंस्टॉल करना चाहते हैं. एक बार इंस्टॉल होने के बाद यह टूल डिवाइस की पूरी एक्सेस हैकर्स के हाथों में दे देता है. इस तरह यूजर की पर्सनल और सेंसेटिव इंफोर्मेशन के चोरी होने का खतरा बढ़ जाता है. रिसर्चर ने एक &amp;ldquo;zoom-update.vbs&amp;rdquo; नाम से मलेशियस VBScript फाइल को एनालाइज कर इस कैंपेन का पता लगाया है. जांच के दौरान पता चला कि सारे अटैक में ScreenConnect नाम के टूल को इंस्टॉल किया गया, जो विक्टिम को हैकर्स के कंट्रोल वाले सर्वर से कनेक्ट कर देता है. अब चूंकि ScreenConnect एक आईटी मैनेजमेंट टूल है तो सिस्टम में इसकी एक्टिविटी पर किसी को ज्यादा शक भी नहीं होता.
सॉफ्टवेयर अपडेट के बहाने बड़े नुकसान की कोशिश
इस कैंपेन से एक बात निकलकर सामने आई है कि इसमें भरोसेमंद सॉफ्टवेयर के नामों का इस्तेमाल किया जा रहा है. अटैकर्स ने एक फिशिंग पेज बनाया है, जो बिल्कुल जूम के असली इंटरफेस जैसा नजर आता है. इस पर लोगो, ब्रांड कलर और वर्जन नंबर बिल्कुल असली जैसे दिखते हैं. लोगों को टारगेट करने के लिए इस पेज पर वॉर्निंग भी दिखाई गई है कि जूम सॉफ्टवेयर आउटडेटेड और इनसिक्योर हो गया है. भविष्य में मीटिंग ज्वॉइन करने के लिए यह क्रिटिकल अपडेट इंस्टॉल करना जरूरी है. यह पेज दो सेकंड के बाद ऑटोमैटिकली डाउनलोडिंग शुरू कर देता है और स्क्रीन पर प्रोग्रेस बार चलने लगता है. यूजर को यह लगता है कि जूम का अपडेट इंस्टॉल हो रहा है, लेकिन असल में यह मालवेयर होता है, जो जानकारी के बिना इंस्टॉल हो रहा होता है. इसी तरह Adobe Flash Player के नाम पर भी ऐसा कैंपेन चलाया जा रहा है.
सॉफ्टवेयर पर भरोसे का बनाया जा रहा आधार
रिपोर्ट के मुताबिक, अटैकर्स भरोसेमंद सॉफ्टवेयर के नाम का फायदा उठाकर लोगों को जाल में फंसा रहे हैं. जैसे ही यूजर असली नामों वाली मलेशियस फाइल पर क्लिक करता है, मालवेयर इंस्टॉल होना शुरू हो जाता है. इंस्टॉल होते ही यह मालवेयर सबसे पहले सिक्योरिटी प्रोटेक्शन को डिसेबल कर देता है. इसके बाद बाकी बची फाइल को डाउनलोड करता है. सबसे आखिर में डाउनलोड हुई फाइल में रिमोट एक्सेस टूल होता है. यह टूल जेनुइन और आमतौर पर यूज होने वाला होता है, इसलिए सिक्योरिटी टूल भी इसे संदिग्ध फाइल के तौर पर ट्रीट नहीं करते हैं. इस तरीके से न सिर्फ विंडोज लैपटॉप को टारगेट किया जा रहा है बल्कि मैकबुक यूजर्स को भी निशाना बनाने की कोशिश हो रही है.
क्या हैं बचाव के तरीके?
रिपोर्ट के मुताबिक, साइबर हमलों से बचने के लिए अनजान MSI फाइल्स को ब्लॉक करें और Microsoft Defender की सेटिंग्स में होने वाले किसी भी संदिग्ध बदलाव पर नजर रखें. सिर्फ भरोसेमंद रिमोट मैनेजमेंट टूल्स का इस्तेमाल करें और संदिग्ध IP एड्रेस से होने वाले कनेक्शन की निगरानी करें. साथ ही स्ट्रिक्ट यूजर अकाउंट कंट्रोल सेटिंग लागू करें और दूसरी संदिग्ध फाइल्स पर नजर रखें.
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        <pubDate>Sat, 08 Aug 2026 11:30:16 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>बिना धूप के कैसे बिजली बनाते हैं सोलर पैनल? यहां जानें टेक्नोलॉजी</title>
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        <description><![CDATA[ Solar Panel Performance: सोलर पैनल को बिजली बनाने के लिए सनलाइट की जरूरत होती है. ज्यादा टेंपरेचर को छोड़ दिया जाए तो धूप जितनी तेज और सीधी होगी, पैनल उतनी ही ज्यादा आउटपुट देंगे. यानी जितनी धूप, उतनी बिजली. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि धूप न होने पर सोलर पैनल बिजली बनाना बिल्कुल बंद कर देंगे. मानसून के दौरान आसमान में बादल छाए रहते हैं और धूप नहीं निकलती. इस दौरान भी पैनल बिजली बना रहे होते हैं. इसी तरह अगर पैनल पर डायरेक्ट सनलाइट नहीं पड़ रही होती है तो भी एनर्जी प्रोडक्शन का काम चल रहा होता है. सूरज ढलने के बाद पैनल बिजली बनाना बंद करते हैं. ऐसे में कई लोगों के मन में यह सवाल आ सकता है कि बादल छाए रहने के दौरान भी पैनल कैसे काम करते हैं. आज हम इसका जवाब जानने की कोशिश करेंगे.
बिना धूप कैसे बिजली बनाते हैं सोलर पैनल?
जब भी सोलर पैनल की photovoltaic cells से कोई फोटोन टकराएगा, यह बिजली जनरेट करेगा. यानी सोलर पैनल को काम करने के लिए हीट की नहीं बल्कि विजिबल लाइट की जरूरत होती है. सनलाइट में अलग-अलग एनर्जी लेवल और अलग-अलग वेवलेंग्थ वाले फोटोन होते हैं. जब ये फोटोन सोलर सेल में लगे सेमीकंडक्टर मैटेरियल से टकराते हैं तो इलेक्ट्रॉन का फ्लो होना शुरू हो जाता है, जो बिजली बनाता है. असल में बिजली धूप नहीं बल्कि फोटोनिक इंटरेक्श के कारण बनती है. इसलिए पैनल विजिबल लाइट को भी बिजली में कन्वर्ट करते सकते हैं. दूसरी तरफ अब ऐसी टेक्नोलॉजी वाले सोलर पैनल आने लगे हैं, जो अलग-अलग वेवलेंग्थ वाले फोटोन को कैप्चर कर उससे बिजली बनाते हैं. कम सनलाइट में सोलर पैनल की एफिशिएंसी कम हो जाती है, लेकिन आउटपुट एकदम बंद नहीं होता.
इन टेक्नोलॉजी से बदली तस्वीर

TOPCon- TOPCon यानी टनल ऑक्साइड पैसिवेटेड कॉन्टैक्ट टेक्नोलॉजी कैरियर सेलेक्टिविटी को बढ़ाती और रिकॉम्बिनेशन लॉस को कम करती है. इसका फायदा यह होता है कि ये पैनल कम लाइट में भी ट्रेडिशन PERC मॉड्यूल से ज्यादा एफिशिएंट होते हैं. स्टडी में सामने आया है कि TOPCon पैनल डायरेक्ट सनलाइट न होने पर भी बाकी पैनल की तुलना में ज्यादा बिजली बनाते हैं. कम लागत, शानदार परफॉर्मेंस और बनाने में आसान होने के कारण ये पैनल इंडस्ट्री की पहली च्वॉइस बने हुए हैं.
Heterojunction (HJT)- TOPCon की तरह HJT पैनल भी कम लाइट में शानदार परफॉर्मेंस देते हैं. अगर तुलना की जाए तो HJT पैनल की एफिशिएंसी TOPCon पैनल से ज्यादा होती है, लेकिन इनकी मैन्युफैक्चरिंग आदि थोड़ी मुश्किल है.
Bifacial सोलर मॉड्यूल- जैसा नाम से ही पता चलता है, Bifacial पैनल डायरेक्ट सनलाइट के साथ-साथ पीछे से रिफ्लेक्ट होकर आ रही लाइट से भी बिजली बनाते हैं. ग्राउंड रिफ्लेक्टिविटी, इंस्टॉलेशन की हाइट और साइट डिजाइन के आधार पर इनकी एफिशिएंसी 5-30 प्रतिशत तक ज्यादा होती है. इनकी यही खासियत बारिश के मौसम और सर्दी के महीनों में खूब काम आती है. इन्हें छत के अलावा सोलर फार्म्स, लेक और दूसरी वॉटर बॉडीज के पास इंस्टॉल करना अधिक फायदेमंद है.

सोलर पैनल के सामने टेंपरेचर की चुनौती
जैसा हमने शुरुआत में बताया कि अगर टेंपरेचर को छोड़ दिया जाए तो जितनी तेज धूप होगी, पैनल उतनी ही ज्यादा बिजली बनाएंगे. असल में ज्यादा टेंपरेचर से एनर्जी प्रोडक्शन पर सीधा असर पड़ता है. आदर्श स्थिति में सोलर पैनल 25 डिग्री टेंपरेचर तक बेस्ट परफॉर्मेंस देते हैं. जब टेंपरेचर इससे ऊपर बढ़ता जाएगा तो हर एक डिग्री सेल्सियस के साथ एफिशिएंसी में 0.3-0.5 प्रतिशत तक की गिरावट आती जाएगी. यानी 35 डिग्री सेल्सियस में सोलर पैनल 25 डिग्री के मुकाबले 3-5 प्रतिशत तक कम बिजली जनरेट करेंगे. गर्मियों के मौसम में सोलर पैनल के सरफेस का तापमान 60 डिग्री तक पहुंच जाता है, जिससे एफिशिएंसी प्रभावित होती है. ज्यादा टेंपरेचर से सिर्फ एनर्जी प्रोडक्शन पर ही असर नहीं पड़ता है. लगातार ज्यादा टेंपरेचर रहने से मैटेरियल तेजी से खराब होने लगता है. इसके अलावा सोलर सेल्स पर भी स्ट्रेस बढ़ता है और पूरे मॉड्यूल का लाइफ स्पैन कम हो जाता है.
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        <pubDate>Sat, 08 Aug 2026 11:30:14 +0530</pubDate>
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        <title>Steam Iron Power Consumption: Steam Iron खरीदने जा रहे हैं? नॉर्मल से कितनी ज्यादा बिजली खपत?</title>
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        <description><![CDATA[ Steam Iron Power Consumption: आज के समय में कपडे़ प्रेस करना रोज का काम बन चुका है. चाहे ऑफिस जाना हो या कहीं घूमने, पहले कपड़े प्रेस होते है, उसके बाद ही घर से निकलते है. कुछ लोग बाहर भी कपड़े प्रेस करवाते है, लेकिन वो भी कहीं न कहीं सोचते है कि एक प्रेस खरीद लेना ही ठीक रहेगा. ऐसे में आजकल Steam Iron का चलन काफी तेजी से बड़ रहा है. क्योंकि यह कपड़ों की सिलवटों को बड़ी आसानी से गायब कर देती है. लेकिन अक्सर लोगों के मन में एक सवाल रहता है कि Steam Iron नॉर्मल से कितनी ज्यादा बिजली की खपत करती है. क्या इससे हमारे बिजली का बिल बड़ जाएगा.&amp;nbsp;
दोनों आयरन तकनीक में कितना अंतर&amp;nbsp;
यह समझने के लिए कि दोनों आयरन तकनीक में से कौन सी तकनीक ज्यादा बिजली खपत करती है. इसके लिए हमें इन दोनों तकनीक के काम करने के तरीके को समझना होगा. Dry Iron सिर्फ एक हीटिंग एलिमेंट होता है. जब बिजली चालू होती है तो यह एलिमेंट गर्म होता है, जिससे इसके नीचे की प्लेट गर्म होती है और इसे आप कपड़ो पर फैरते है. जिससे सिलवटें ठीक हो जाती है.&amp;nbsp;
वहीं Steam Iron के काम करने के तरीका थोड़ा अलग होता है. क्योंकि इसमें हीटिंग एलिमेंट के साथ एक छोटा पानी का टैंक भी होता है. यह आयरन प्लेट को गर्म करने के साथ उस पानी को उबालकर भाप बनाती है. पानी को भााप में बदलने के लिए इस आयरन को ज्यादा ताकत की जरुरत पड़ती है. इस कारण Steam Iron में बिजली की खपत भी ज्यादा होती है.&amp;nbsp;
कौन कितना बिजली खाता है?
दरअसल बिजली की खपत कितनी होगी, यह इस बात पर निर्भर करेगी की आपकी आयरन कितनी वाट की है. वाट जितना ज्यादा होगा, बिजली की खपत भी उतनी ही ज्यादा होगी. बाजार में मिलने वाली नॉर्मल आयरन 750 वाट से लेकर 1 किलोवाट तक की होती है. वहीं स्टीम आयरन में भाप बनाने की तकनीक के कारण यह 1.5 किलोवाट से लेकर 2.4 किलोवाट तक की आती है. ऐसे में एक Steam Iron एक Dry Iron से डेढ़ से दो गुना ज्यादा वाट की होती है. इसका मतलब है कि अगर दोनों बराबर एक घंटे तक भी चले तो Steam Iron, Dry Iron से डेढ़ से दोगुना ज्यादा बिजली की खपत करेगी.&amp;nbsp;
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Steam Iron से बिजली कैसे बचाएं?
अब देखने में तो लगता है कि Steam Iron ज्यादा बिजली खपत करती है, लेकिन असल में कहानी कुछ औऱ है. दरअसल Steam Iron से निकलने वाली भाप कपड़ो की जिद्दी सिलवटों को कुछ ही सेकंड में ठीक कर देती है. यानी की जिस कपड़े को नॉर्मल आयरन से ठीक करने में 5 मिनट लगते है. उसी कपड़े को Steam Iron से 2 मिनट में ठिक किया जा सकता है. साथ ही Steam Iron से आपका काम जल्दी खत्म हो जाता है, इसलिए इसे ज्यादा देर ऑन रखने की जरुरत नहीं पड़ती.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Sat, 08 Aug 2026 11:30:13 +0530</pubDate>
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        <title>Amazon&amp;Flipkart पर फ्रीडम सेल शुरू, स्मार्टफोन&amp;ईयरबड्स पर तगड़ा डिस्काउंट</title>
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        <description><![CDATA[ Amazon Flipkart Great Freedom Sale: Amazon-Flipkart पर साल की सबसे बड़ी सेल में से एक फ्रीडम सेल आज यानी 7 अगस्त से शुरू हो चुकी है. स्वतंत्रता दिवस के मौके पर आई इस सेल में कई सारे इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स पर ऑफर्स की बौछार हो गई है. अगर आप काफी समय से नया स्मार्टफोन, नया ईयरबड्स या कोई अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामान खरीदने की सोच रहे थे, तो आपके लिए यह सबसे सही समय है. इस सेल में ग्राहकों को भारी डिस्काउंट के साथ-साथ कई बैंक ऑफर्स भी मिल रहे हैं. आइए जानते हैं कि इस सेल में आपको किन-किन चीजों पर सबसे तगड़ी छूट मिल रही है.&amp;nbsp;
कब सेल होगी शुरू
इस बार दोनों ही बड़ी कंपनियों ने अपनी सेल को बेहद खास बनाया है. अमेजन की ग्रेट फ्रीडम सेल सभी ग्राहकों के लिए 7 अगस्त 2026 से लाइव हो चुकी है. वहीं, फ्लिपकार्ट फ्रीडम सेल आम यूजर्स के लिए 8 अगस्त 2026 से शुरू होने जा रही है. खास बात यह है कि फ्लिपकार्ट प्लस और वीआईपी VIP मेंबर्स को 24 घंटे पहले ही यानी 7 अगस्त से इसका एक्सेस मिल गया है. यानी मेंबर्स अभी से जाकर सस्ते दामों में शॉपिंग कर सकते हैं.&amp;nbsp;
स्मार्टफोन पर मिल रहा बंपर डिस्काउंट
अगर बजट स्मार्टफोन या प्रीमियम फोन खरीदने का प्लान है तो दोनों प्लेटफॉर्म पर डील्स लाइव हैं. जिससे एप्पल, सैमसंग, वनप्लस, रीयलमी और रेडमी जैसी बड़ी कंपनियों के फोन बहुत कम कीमत पर मिल रहे हैं. बजट रेंज में Redmi Note 15 5G और Moto G67 Power 5G जैसे शानदार फोन तगड़े डिस्काउंट के साथ उपलब्ध हैं. वहीं प्रीमियम रेंज में वनप्लस और आईफोन मॉडल्स पर हजारों रुपये की सीधी बचत हो रही है. इसके साथ ही पुराने फोन को बदलने पर शानदार एक्सचेंज बोनस और बिना ब्याज वाली ईएमआई No Cost EMI की सुविधा भी दी जा रही है.&amp;nbsp;
ईयरबड्स &amp;nbsp;पर भारी छूट
आजकल ईयरबड्स हर किसी की जरूरत बन गए हैं. इस फ्रीडम सेल में ईयरबड्स, नेकबैंड और स्मार्टवॉच जैसे वियरेबल्स पर 80% तक का डिस्काउंट देखने को मिल रहा है. साथ ही बोट, नॉइस, रियलमी और वनप्लस के ब्रांडेड ईयरबड्स बेहद कम कीमत पर मिल रहे हैं. अगर आपके पुराने ईयरबड्स खराब हो गए हैं या आप नया अपग्रेड चाहते हैं, तो इस सेल में आपको बेहतरीन साउंड क्वालिटी और एएनसी ANC वाले बड्स आधी से भी कम कीमत में मिल जाएंगे.&amp;nbsp;
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लैपटॉप, टैबलेट पर भी बड़ा डिस्काउंट
सिर्फ फोन या ईयरबड्स ही नहीं, पढ़ाई और ऑफिस के काम के लिए लैपटॉप या टैबलेट खरीदने पर भी बड़ी बचत हो रही है. सेल के दौरान डेल Dell, एचपी HP, लेनोवो Lenovo के लैपटॉप पर भारी प्राइस कट देखने को मिला है. इसके अलावा, छात्रों के लिए विशेष डिस्काउंट और प्राइमबुक जैसे बजट लैपटॉप्स पर भी शानदार ऑफर्स की घोषणा की गई है. साथ ही स्मार्ट टीवी, पावर बैंक और होम अप्लायंसेज जैसे फ्रिज और एसी को भी बेहद सस्ते दामों में लिस्ट किया गया है.
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        <pubDate>Fri, 07 Aug 2026 23:30:18 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Amazon-Flipkart, पर, फ्रीडम, सेल, शुरू, स्मार्टफोन-ईयरबड्स, पर, तगड़ा, डिस्काउंट</media:keywords>
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        <title>Earbuds काम नहीं कर रहे? बदलने से पहले चेक करें ये चीज</title>
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        <description><![CDATA[ Earbuds Not Working: आजकल हर इंसान काम करते समय या अपने फ्री समय में Earbuds लगाकर गाने सुनना ज्यादा पसंद करता है. हालांकि, अक्सर Earbuds में एक समस्या देखने को मिलती है कि Earbuds कुछ समय बाद अपनेआप काम करना बंद कर देते हैं. Earbuds में ऐसी समस्या होना आम बात है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वो अब बेकार हो चुके हैं. अक्सर कुछ तकनीकी समस्या के कारण ऐसा हो जाता है. ऐसे में आपको नए Earbuds खरीदने के बजाय उनको एक बार अच्छे से चेक कर लेना चाहिए. आइए जानते हैं कैसे...&amp;nbsp;
चार्जिंग केस पर जमा डस्ट
इसको Earbuds खराब होने का सबसे बड़ा कारण माना जाता है. क्योंकि जब हम लगातार लंबे समय तक Earbuds का इस्तेमाल करते रहते हैं, तो हमारे कानों का वैक्स और इसके आसपास की धूल मिट्टी Earbuds के चार्जिंग पॉइंट पर जमा होने लगती है. इसके अलावा जिस चार्जिंग केस के अंदर हम Earbuds रखते हैं, उसमें भी धूल जमा होने लगती है. इस गंदगी के कारण Earbuds और केस के मेटल आपस में टच नहीं हो पाते. जिससे Earbuds को चार्ज होने में दिक्कत हो सकती है और वो ठीक से काम नहीं कर पाते.&amp;nbsp;
&amp;nbsp;ब्लूटूथ कनेक्शन को रीसेट करें
जरुरी नहीं कि हर बार दिक्कत आपके Earbuds में ही हो. कई बार समस्या आपके फोन के ब्लूटूथ कनेक्शन में भी होती है. जब फोन और Earbuds के बीच का कनेक्शन ठीक से काम नहीं करता है, जिससे Earbuds में आवाज आना बंद हो जाती है. इसे ठीक करने के लिए आप अपने मोबाइल फोन की सेटिंग में जाकर ब्लूटूथ ऑप्शन पर क्लिक करें. फिर अपने Earbuds डिवाइस का नाम ढूंढकर उसे forget डिवाइस कर फिर से कनेक्ट करें. कई बार ऐसा करने से Earbuds ठीक से काम करना शुरू कर देते हैं.&amp;nbsp;
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एक साइड के Earbuds से आवाज आना
ज्यादातर लोगों की सबसे बड़ी समस्या यही होती है, पुराने होने पर Earbuds के बस एक साइड ही ठीक से काम करती है. इस समस्या को सिंगल इयरबड नॉट वर्किंग की समस्या कहते हैं. ऐसा तब होता है जब दोनों Earbuds का आपस में कनेक्शन टूट जाता है. इस समस्या को ठीक करने के लिए Earbuds को पूरे तरीके से रीसेट करना होगा. हर कंपनी के Earbuds को रीसेट करने का तरीका अलग-अलग हो सकता है, लेकिन आमतौर पर दोनों Earbuds को चार्जिंग केस के अंदर रखकर उनके टच एरीया या बटन को 10 से 15 सेकंड तक दबाकर रखें. अगर उनकी लाइट चमकने लगे तो इसका मतलब है कि Earbuds रिसेट हो गए हैं. अब दोनो Earbuds में से बराबर आवाज आने लगेगी.&amp;nbsp;
अगर ये सब करने के बाद भी Earbuds की समस्या दूर न हो, तो आप एक बार अपने मोबाइल फोन को रिस्टार्ट जरुर कर लें. दरअसल, कई सारे एप्स एक साथ चलने से ब्लूटूथ कनेक्शन में दिक्कत आ सकती है. साथ ही अपने फोन में सॉफ्टवेयर अपडेट भी चेक कर लें. अक्सर ये अपडेट ब्लूटूथ से जुड़ी समस्या को ठीक कर देते है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Fri, 07 Aug 2026 23:30:17 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Earbuds, काम, नहीं, कर, रहे, बदलने, से, पहले, चेक, करें, ये, चीज</media:keywords>
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        <title>क्या खत्म हो जाएगा बैक्टीरिया का खेल? AI से बनाए गए नए वायरस</title>
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        <description><![CDATA[ AI Virus: एआई से ऐप्स और वेबसाइट के बाद अब वायरस भी बनाए जाने लगे हैं. जी हां, बिल्कुल सही पढ़ा है आपने. रिसर्चर ने एआई की मदद से ऐसे वायरस तैयार कर लिए हैं, जो अभी से पहले कहीं मौजूद नहीं थे. इनमें से 16 वायरस तो बैक्टीरिया को मारने में भी कामयाब रहे. स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी और कैलिफॉर्निया के आर्क इंस्टीट्यूट की एक टीम ने यह काम किया है. यह पहली बार हुआ है, जब किसी एआई मॉडल ने जीवित चीज के पूरा इंस्ट्रक्शनल मैनुअल लिखा है. राहत की बात यह है कि एआई से तैयार किए गए वायरस केवल बैक्टीरिया पर अटैक करते हैं और ये इंसानों, पशुओं और पौधों को नुकसान नहीं पहुंचा सकते.
एआई से कैसे बनाया गया DNA?
इस प्रोसेस में Evo 1 और Evo 2 नाम के एआई मॉडल्स इस्तेमाल किए गए और इनका काम करने का तरीका एआई चैटबॉट जैसा है. जैसे एआई चैटबॉट यह अंदाजा लगाते हैं कि अगला शब्द कौन-सा होगा, वैसे ही Evo यह पता लगाता है कि DNA की चैन में अगला केमिकल लेटर कौन-सा होगा. इस मॉडल में जेनेटिक कोड फीड करने की जरूरत होती है और यह DNA डिजाइन करना शुरू कर देता है. रिसर्च करने वाली टीम ने इस मॉडल को करोड़ों नैचुरल जिनोम पर ट्रेनिंग दी है और फिर इसे &amp;Phi;X174 और उससे जुड़े वायरस पर फोकस कर दिया. इसके बाद Evo मॉडल ने हजारों पॉसिबल डिजाइन दिए, जिनमें से रिसर्चर ने 300 चुने और लैब में DNA को तैयार कर दिया. इस वायरस को एक खास तरह के बैक्टीरिया को इंफेक्ट करने के लिए बनाया गया है.
एआई से बने वायरस के जिंदा होने का पता कैसे चला?
रिसर्चर ने बताया कि एक सुबह उन्होंने देखा कि पेट्री डिश (कांच की एक प्लेट) पर ग्रो हो रहे बैक्टीरिया में क्लियर स्पॉट नजर आ रहे हैं. ऐसा तब होता है, जब वायरस उसे चबा रहा होता है. इस तरह के नए वायरस को बनाकर उन इंफेक्शन को ठीक किया जा सकता है, जो एंटीबायोटिक्स के प्रति रजिस्टेंट हो चुके हैं. यानी जो एंटीबायोटिक से ठीक नहीं हो रहे, उन इंफेक्शन को ठीक करने में ऐसे वायरस का इस्तेमाल किया जा सकता है.
इंसानों को क्यों नुकसान नहीं पहुंचाएंगे ये वायरस?
रिसर्चर ने इन वायरस को इंसानों के लिए पूरी तरह सुरक्षित बनाने की कोशिश की है. इसलिए इनकी ट्रेनिंग में कोई ऐसा डेटा शामिल नहीं किया गया, जो इंसानों के लिए खतरनाक हो. इसलिए इन मॉडल्स के लिए ह्यूमन पैथोजन जैसी कोई चीज एग्जिस्ट नहीं करती. इसके बावजूद नई खोज को लेकर चिंता भी जताई जा रही है. जानकारों का कहना है कि अब एआई की मदद से वायरस बनाने की कैपेबिलिटीज आ गई हैं, लेकिन इन्हें कंट्रोल करने के लिए कोई नियम नहीं है.
खुलेंगे बीमारियों के इलाज के दरवाजे
एआई से वायरस बनाने को साइंस के फील्ड में एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा है. इससे बीमारियों के इलाज ढूंढने की दिशा में काम तेज होने की उम्मीद जताई जा रही है. इसके साथ ही एक्सपर्ट ने चेतावनी दी है कि इससे नई सुरक्षा चिंताएं भी पैदा हो रही हैं. बता दें कि एआई की मदद से पहले ही मेडिसिन और एंटीबायोटिक्स के फील्ड में काफी काम हो रहा है और अब इस नई कामयाबी से इस काम की रफ्तार बढ़ने की उम्मीद है.
इस वजह से जताई जा रही चिंता
अमेरिका ने पिछले हफ्ते ही एक नई पॉलिसी का ऐलान किया था, जिसमें बायोलॉजिकल एजेंट को खतरनाक बनाने पर रोक लगाई गई थी, लेकिन इसमें कंप्यूटर पर हुए काम को कोई जिक्र नहीं किया गया था. इस प्रोजेक्ट को उसी का फायदा मिला है. Evo मॉडल ओपन सोर्स है और इसे कोई भी डाउनलोड कर सकता है. इसी चीज ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है. दूसरी तरफ कई जानकार यह भी मानते हैं कि इसे लेकर चिंता की बात नहीं है. यह एक सबसे छोटा और आसान जिनोम है, जिसे कोई भी बना सकता है. हालांकि, वायरस बनाने वाली टीम का कहना है कि बड़े वायरस के लिए अभी काफी काम करने की जरूरत है, लेकिन इसे बनाना असंभव नहीं है.
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        <pubDate>Fri, 07 Aug 2026 23:30:16 +0530</pubDate>
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        <title>हाई स्पीड 5G के लिए अलग रिचार्ज प्लान? चल रहा है विचार</title>
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        <description><![CDATA[ हाई स्पीड 5G के लिए अलग रिचार्ज प्लान? चल रहा है विचार ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 07 Aug 2026 23:30:15 +0530</pubDate>
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        <title>Refrigerator Power Consumption Tips: खाली या भरा हुआ... फ्रिज कब खाता है ज्यादा बिजली?</title>
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        <description><![CDATA[ Refrigerator Power Consumption Tips: हर महीने जब बिजली का बिल आता है और वह अनुमान से अधिक आ जाता है तो ऐसे में सबसे पहले शक फ्रिज पर ही जाता है. क्योंकि फ्रिज एक ऐसा उपकरण है जो 24 घंटे ऑन ही रहता है. इसलिए बिजली के बिल का एक बड़ा हिस्सा सिर्फ फ्रिज के कारण आता है. ऐसे में लोगों को लगता है कि अगर वो फ्रिज को खाली रखेगें, तो उनके बिजली का बिल कम आएगा. हालांकि, यह पूरा सच नहीं है. बल्कि बिजली की खपत इस बात पर निर्भर करेगी कि आप फ्रिज को कैसे इस्तेमाल करते हैं.&amp;nbsp;
फ्रिज कब ज्यादा बिजली खाता है?
सुनने में भले ही थोड़ा अजीब लग सकता है, लेकिन यह सच है कि एक पूरा खाली फ्रिज ज्यादा बिजली की खपत करता है. इसके पीछे का कारण यह है कि जब फ्रिज खाली होता है, तो उसके अंदर बहुत सारी खाली हवा भर जाती है और खाली हवा को ठंडा होने में काफी वक्त लगता है. क्योंकि जब भी आप कुछ सामान निकालने के लिए फ्रिज को खोलते हो, तो अंदर की ठंडी हवा बाहर निकल जाती है और बाहर की गर्म हवा अंदर चली जाती है. ऐसे में दरवाजा बंद होने के बाद उस गर्म हवा को ठंडा करने के लिए फ्रिज के कंप्रेसर को काफी बिजली जलानी पड़ती है. कंप्रेसर जितनी देर तक काम करेगा बिजली का बिल उतना ही बढ़ेगा.&amp;nbsp;
भरे फ्रिज में क्या होता है?
अब जानते है भरे हुए फ्रिज में क्या होता है. जब फ्रिज फल, सब्जियां और पानी की बोतलों से भरा हुआ होता है, तो ये सब चीजें फ्रिज की ठंडक को अपने अंदर सोख लेती हैं. ये ठंडी चीजें एक तरीके से थर्मल मास का काम करती है यानी ये खुद फ्रिज की ठंडक को लंबे समय तक बनाए रखने में मदद करती है. ऐसे में जब आप फ्रिज का दरवाजा खोलते हो तो ये ठोस सामान हवा की तरह बाहर नहीं निकलता. इससे ये फायदा होता है कि कंप्रेसर को वापस तापमान ठंडा करने की जरुरत नहीं पड़ती. इससे कंप्रेसर पर लोड कम पड़ता है और बिजली की भी भारी बचत होती है.&amp;nbsp;
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फ्रिज पूरा भरना भी ठीक नहीं&amp;nbsp;
इसका मतलब ये नहीं कि आप फ्रिज को पूरा लबालब भर दें. ऐसे में वह और ज्याादा बिजली की खपत करने लगेगा. क्योंकि फ्रिज के हर कोने तक ठंडी हवा को घूमने के लिए थोड़ा स्पेस चाहिए होता है. जब फ्रिज पूरा भर जाता है तो ठंडी हवा फ्रिज को पूरा ठंडा नहीं कर पाती, जिससे फ्रिज के सेसंर कंप्रेसर को बंद नहीं देते और इसके लगातार चलने से बिल आसमान छू जाता है.&amp;nbsp;
कितना भरें फ्रिज&amp;nbsp;
बिजली का बिल कम से कम रखने के लिए और फ्रिज को सुरक्षित ढंग से चलाने के लिए केवल 70 से 80 प्रतिशत तक ही भरना चाहिए. फ्रिज के अंदर 20 प्रतिशत जगह हमेशा खाली रहनी चाहिए. ताकि ठंडी हवा पूरे फ्रिज में आसानी से घूम सके और फ्रिज जल्दी ठंडा हो जाए.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Fri, 07 Aug 2026 23:30:13 +0530</pubDate>
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        <title>चांद पर फैक्ट्री बनाएंगे रोबोट, Elon Musk का नया प्लान</title>
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        <description><![CDATA[ Elon Musk Moon Factory: कुछ दिन पहले स्पेस में एआई डेटा सेंटर बनाने की योजना का ऐलान करने वाले एलन मस्क ने अपना एक और नया प्लान शेयर किया है. दुनिया के पहले खरबपति मस्क अब चांद पर फैक्ट्री बनाना चाहते हैं. स्पेसएक्स की अर्निंग कॉल के दौरान मस्क ने अपना प्लान शेयर करते हुए कहा कि कंपनी चांद पर रोबोट का इस्तेमाल कर फैक्ट्री और दूसरा इंडस्ट्रियल इंफ्रास्ट्रक्चर बनाना चाहती है. उन्होंने कहा कि इससे स्पेसएक्स की इकोनॉमी को पृथ्वी की मौजूदा अर्थव्यवस्था से 1,000 गुना तक बड़ी बनाने में मदद मिल सकती है. अभी यह सुनने में साइंस फिक्शन जैसा लगता है, लेकिन यह सच होगा.&amp;nbsp;
रोबोट की ली जाएगी मदद
मस्क ने कहा कि स्पेसएक्स के सैटेलाइट को रोबोट के तौर पर देखा जा सकता है, जो पूरी तरह ऑटोनोमस है और उन्हें किसी सर्विस की जरूरत नहीं पड़ती. मस्क ने कहा कि मून-बेस्ड रोबोट की मदद से स्पेसएक्स को एक मास एक्सलरेटर बनाने में मदद मिलेगी. यानी स्पेसएक्स बिना रॉकेट का इस्तेमाल किए चांद से ही कार्गो को लॉन्च कर सकेगी. रोबोट इस काम और फैक्ट्री बनाने में मददगार हो सकते हैं. ये फैक्ट्रियां सोलर और रेडिएशन बेस्ड एनर्जी के साथ काम करेंगी. हालांकि, मस्क ने यह भी माना कि अभी यह विचार पूरी तरह पागलपन वाला है. स्पेसएक्स ने भी चांद पर बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर के कामों, उपकरणों की मरम्मत और रिसोर्स प्रोसेसिंग के लिए ह्यूमनॉयड रोबोट के इस्तेमाल की बात कही है, लेकिन कंपनी ने इसके लिए किसी टाइमलाइन या इन्वेस्टमेंट का ऐलान नहीं किया है. यह भी अभी तक साफ नहीं हो पाया है कि इस काम के लिए टेस्ला के ऑप्टिमस रोबोट का इस्तेमाल किया जाएगा और फ्यूचर में कंपनी इसके लिए अलग से कोई रोबोट बनाएगी.
क्या चांद पर बन सकती है फैक्ट्री?
एलन मस्क अपनी महत्वकांक्षाओं के लिए जाने जाते हैं और उनके कुछ बयान मौजूदा समय के हिसाब से बिल्कुल साइंस फिक्शन की तरह लगते हैं. ऐसे में कई लोगों के मन में यह सवाल भी आ सकता है कि क्या चांद पर फैक्ट्री बनाना संभव है? इसका जवाब देते हुए Texas A&amp;amp;M University में कंस्ट्रक्शन साइंस के प्रोफेसर Patrick Suermann ने कहा कि यह विचार हास्यापद नहीं है. चांद पर सैटेलाइट फैक्ट्री बनाना आर्थिक रूप से फायदेमंद है क्योंकि चांद की ग्रैविटी के कारण वहां से सैटेलाइट लॉन्च करना धरती के मुकाबले काफी सस्ता होगा. उन्होंने कहा कि यह एक समझदारी भरा फैसला है क्योंकि सैटेलाइट लॉन्च में फ्यूल का खर्चा ही सबसे ज्यादा होता है. अगर वो चांद पर धरती के बराबर प्रोडक्टिविटी हासिल कर पाए तो यह बड़ी बात होगी. हालांकि, चांद पर फैक्ट्री लगाने के लिए रिसोर्सेस को ले जाना भी काफी महंगा होगा.
स्पेस में डेटा सेंटर बनाने की भी तैयारी कर रहे हैं मस्क
मस्क इससे पहले स्पेस में डेटा सेंटर बनाने की बात भी कह चुके हैं. इसके लिए स्पेसएक्स ने Nvidia के साथ हाथ मिलाया है. समझौते के तहत दोनों कंपनियां मिलकर Starmind AI-1 प्रोजेक्ट तैयार कर रही है, जो सैटेलाइट डेटा सेंटर के तौर पर काम करेगा. अगले साल से इन सैटेलाइट को लॉन्च करना शुरू कर दिया जाएगा. हर लॉन्च में स्पेसएक्स का रॉकेट 3-50 सैटेलाइट्स को लेकर जाएगा. इस प्रोजेक्ट में स्पेसएक्स Nvidia के लेटेस्ट Rubin GPUs और Vera CPUs को यूज करेगी, जो कंपनी की पीक सैटेलाइट कंप्यूटिंग कैपेसिटी को 250 kW तक ले जाएंगे.
Starmind पर जारी है काम
स्पेसएक्स और एनवीडिया के स्टारमाइंड प्रोजेक्ट पर कई महीनों से काम चल रहा है. जनवरी में SpaceX ने यूएस फेडरल कम्युनिकेशन कमीशन (USFCC) से 10 लाख एआई सैटेलाइट का नेटवर्क बनाने की परमिशन मांगी थी. इस प्रोजेक्ट के तहत कंपनी आउटर स्पेस में एक बहुत बड़ा कंप्यूटिंग नेटवर्क बनाना चाहती है. इन सैटेलाइट में पावरफुल प्रोसेसर लगे होंगे, जो सोलर पावर से एनर्जी लेकर काम करते रहेंगे. हर सैटेलाइट करीब 79 मीटर चौड़ा होगा और 120-150 kW की कंप्यूटिंग पावर दे सकेगा.
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        <pubDate>Fri, 07 Aug 2026 07:30:05 +0530</pubDate>
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        <title>क्या ट्रांसपैरेंट पैनल से बदल जाएगा सोलर एनर्जी का गेम? यहां जानें</title>
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        <description><![CDATA[ क्या ट्रांसपैरेंट पैनल से बदल जाएगा सोलर एनर्जी का गेम? यहां जानें ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 07 Aug 2026 07:30:04 +0530</pubDate>
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        <title>Starlink मोबाइल सर्विस शुरू करेंगे एलन मस्क, बाकी कंपनियों में हड़कंप</title>
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        <description><![CDATA[ Starlink Mobile Service: अमेरिकी अरबपति एलन मस्क की कंपनी SpaceX एक और धमाका करने जा रही है. स्टारलिंक नाम से सैटेलाइट इंटरनेट सर्विस देने वाली यह कंपनी अब मोबाइल सर्विस शुरू करने का प्लान बना रही है. स्पेसएक्स ने जैसा ही इसका ऐलान किया, अमेरिका की तीनों बड़ी टेलीकॉम कंपनियों- टी-मोबाइल, वेरिजॉन और AT&amp;amp;T के शेयर धड़ाम हो गए. मंगलवार को एक अर्निंग कॉल के दौरान स्पेसएक्स प्रेसिडेंट Gwynne Shotwell ने कहा कि हम टेरेस्ट्रियल कंपोनेंट बनाना चाहते हैं. इससे आपके पास सिर्फ सैटेलाइट कैपेसिटी ही नहीं होगी बल्कि टेरेस्ट्रियल सिस्टम भी होगा. इसका मतलब है कि कंपनी मोबाइल सर्विस के लिए हार्डवेयर और दूसरे जरूरी सिस्टम पर काम करेगी. इससे स्टारलिंक केवल डायरेक्ट-टू-डिवाइस भूमिका से निकलकर टी-मोबाइल, वेरिजॉन और AT&amp;amp;T जैसी कंपनियों को डायरेक्ट टक्कर दे पाएगी.&amp;nbsp;
सिर्फ सैटेलाइट इंटरनेट प्रोवाइडर नहीं रहेगी स्टारलिंक
स्टारलिंक अभी तक केवल सैटेलाइट इंटरनेट सर्विस मुहैया करवा रही है. इसे उन जगहों पर ज्यादा इस्तेमाल किया जा रहा है, जहां पर मोबाइल नेटवर्क मौजूद नहीं रहता. रिमोट इलाकों और आपातकालीन स्थितियों में इसका इस्तेमाल ज्यादा होता है. कई देशों में इसका ऑपरेशन पहले से जारी है, वहीं भारत जैसे कई देशों में स्टारलिंक को मंजूरी मिलने का इंतजार किया जा रहा है. अब स्पेसएक्स स्टारलिंक को केवल सैटेलाइट इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर की भूमिका तक सीमित नहीं रखना चाहती और इसे सेलुलर सर्विस प्रोवाइडर के रूप में भी तैयार करना चाहती है. इसके लिए स्पेसएक्स 65MHz के वायरलेस स्पेक्ट्रम लाइसेंस का इस्तेमाल करेगी. कंपनी ने 2025 में 19.6 बिलियन डॉलर में इकोस्टार से यह लाइसेंस खरीदा था.
600 बिलियन डॉलर की मार्केट पर नजर
Shotwell ने कहा कि स्टारलिंक को पूरी उम्मीद है कि वह 600 बिलियन डॉलर वाली अमेरिकी सेलुलर मार्केट में अपना स्थान बना पाएगी. मुझे लगता है कि हम बाकी कंपनियों के ग्राहकों को अपने साथ ला पाएंगे. हमारी सर्विस बेहतर होगी और हम सैटेलाइट की मदद से डेड जोन्स को पूरी तरह खत्म कर देंगे. प्राकृतिक आपदा के समय भी स्टारलिंक की सर्विस बाकी कंपनियों से बेहतर होगी. हालांकि, उन्होंने यह जानकारी नहीं दी कि इस नेटवर्क पर कितना पैसा खर्च किया जाएगा. रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस सर्विस के लिए स्पेसएक्स अपने बेस स्टेशन यूज करेगी. Shotwell के मुताबिक, कंपनी स्टारलिंक ब्रॉडबैंड डिश पर सेलुलर बेस स्टेशन लगा देगी, जिससे देशभर में उसे लो-बैंड स्पेक्ट्रम पर भारी पैसा खर्च करने की जरूरत नहीं पड़ेगी.
अगले साल तक सर्विस शुरू होने की उम्मीद
SpaceX ने अगले साल के अंत तक स्टारलिंक मोबाइल को पूरी तरह फंक्शनल बनाने की प्लानिंग बनाई है. हालांकि, कई रिपोर्ट्स में बताया गया है कि पूरे देश में वायरलेस बिजनेस खड़ा करने में वर्षों का समय लग सकता है. अमेरिका की मौजूदा टेलीकॉम कंपनियों की बात करें तो टी-मोबाइल, वेरिजॉन और AT&amp;amp;T आदि ने करीब 3 दशकों में अरबों डॉलर के निवेश से अपना नेटवर्क तैयार किया है. टी-मोबाइल के साथ तो स्टारलिंक की साझेदारी भी है. इस साझेदारी के तहत स्टारलिंक नेटवर्क कवरेज से बाहर जाने पर यूजर को डायरेक्ट-टू-सेल कनेक्टिविटी प्रदान करती है. यानी दोनों कंपनियां एक-दूसरे की मदद कर रही है, लेकिन अब स्टारलिंक के ताजा प्लान के बाद ये कंपीटिटर की भूमिका में आ गई है. 
अमेरिका में फिलहाल इन टेलीकॉम कंपनियों का दबदबा
अमेरिकी टेलीकॉम मार्केट में टी-मोबाइल, वेरिजॉन और AT&amp;amp;T का दबदबा है और इन तीनों के पास करीब 95 प्रतिशत मार्केट शेयर है. वेरिजॉन के पास सबसे ज्यादा 146 मिलियन, टी-मोबाइल के पास 130 मिलियन और AT&amp;amp;T के पास 110 मिलियन यूजर्स हैं. यूजर्स के मामले में दूसरे स्थान पर होने के बावजूद टी-मोबाइल 5जी स्पीड और सबसे तेज ग्रोथ करने के मामले में बाकी कंपनियों से आगे है. जैसे ही स्पेसएक्स ने स्टारलिंक मोबाइल के लॉन्च का ऐलान किया, इन कंपनियों के शेयरों में 2-4 प्रतिशत तक की गिरावट देखने को मिली. बता दें कि स्पेस एक्सप्लोरेशन के मामले में स्पेसएक्स एक बड़ा नाम है और अब यह अमेरिकी टेलीकॉम मार्केट में हलचल मचाने की तैयारी कर रही है.
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        <pubDate>Thu, 06 Aug 2026 19:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>यूजर्स से एज वेरिफिकेशन के लिए क्यों कह रही है WhatsApp?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/यूजर्स-से-एज-वेरिफिकेशन-के-लिए-क्यों-कह-रही-है-whatsapp</link>
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        <description><![CDATA[ WhatsApp Age Verification: मैसेजिंग प्लेटफॉर्म व्हाट्सऐप ने भारत में अपने एज वेरिफिकेशन फीचर की टेस्टिंग शुरू कर दी है. कुछ यूजर्स को यह फीचर नजर आ रहा है, जिसमें उसने डेट ऑफ बर्थ पूछी जा रहा है. इसके नीचे लिखा गया है कि भारत में लागू होने वाले कानून के लिए हमें आपकी उम्र पूछनी पड़ रही है. अभी तक एज वेरिफिकेशन टेस्ट ऑप्शन है और यूजर के लिए अपनी एज वेरिफाई करना अनिवार्य नहीं हुआ है. बता दें कि भारत में अगले साल 13 मई से नया डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDC) एक्ट लागू होने जा रहा है, जिसे देखते हुए व्हाट्सऐप एज वेरिफिकेशन का यह फीचर लेकर आ रही है.
एज वेरिफिकेशन को लेकर कंपनी ने क्या कहा?
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मेटा की तरफ से कहा गया है कि व्हाट्सऐप DPDP एक्ट के पालन के लिए एज कंफर्म करने के प्राइवेसी-प्रोटेक्टिव तरीके टेस्ट कर रही है. इससे व्हाट्सऐप के काम करने के तरीके और यूजर एक्सपीरियंस में कोई बदलाव नहीं आएगा. कंपनी जानती है कि उम्र की जानकारी प्राइवेट होती है और इस जानकारी को दूसरे यूजर्स के साथ शेयर नहीं किया जाएगा.
किन कानून के लिए तैयारी कर रही है व्हाट्सऐप?
DPDP Act, 2023 डेटा प्राइवेसी से जुड़ा एक कानून है, जो यह देखेगा कि कैसे कंपनियां, सरकारी और दूसरी संस्थाएं यूजर के पर्सनल डेटा को कैसे कलेक्ट, प्रोसेस, स्टोर और यूज करती हैं. इस कानून को अगस्त, 2023 में ही राष्ट्रपति की मंजूरी मिल चुकी है और इसके प्रावधानों को चरणबद्ध तरीकों से लागू किया जा रहा है. इस कानून का बच्चों के डेटा से जुड़े प्रावधान अगले साल मई में लागू होने जा रहे हैं. इसके सेक्शन 9 के तहत ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर बच्चों के पर्सनल डेटा को लेकर खास नियम बनाए गए हैं. इस कानून में 18 साल से कम उम्र के हर व्यक्ति को &#039;बच्चा&#039; माना गया है. ऐसे में किसी भी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म या अन्य डेटा फिड्यूशियरी को बच्चे का पर्सनल डेटा प्रोसेस करने से पहले उसके माता-पिता या लीगल गार्डियन की सत्यापित सहमति (Verifiable Parental Consent) लेनी होगी. इसका मतलब है कि व्हाट्सऐप को यह वेरिफाई करना होगा कि यूजर की उम्र 18 साल से कम है या ज्यादा. अगर उम्र 18 से कम होती है तो उसे बच्चे के पैरेंट्स की सहमति लेनी होगी. इसके बिना वह यूजर का पर्सनल डेटा कलेक्ट और प्रोसेस नहीं कर पाएगी.
आइडेंटिटी को भी कंफर्म करेंगे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स
जैसा हम ऊपर बात कर चुके हैं कि व्हाट्सऐप को डेटा प्रोसेस और क्लेक्ट करने के लिए सिर्फ पैरेंट्स की सहमति की ही जरूरत नहीं पड़ेगी बल्कि इसे वेरिफाई भी करना होगा. यानी प्लेटफॉर्म पर यह बाध्यता आ गई है कि उन्हें बच्चों के पैरेंट्स या गार्डियन की पहचान को कंफर्म करना पड़ेगा. कानून के तहत कंपनियों को यह देखना पड़ेगा कि बच्चे का पैरेंट या लीगल गार्डियन होने की बात कहने वाले व्यक्ति की उम्र 18 साल से ऊपर है या नहीं. इसके लिए उनकी पहचान कंफर्म की जाएगी और इस वेरिफिकेशन का रिकॉर्ड भी रखना होगा.
किन तरीकों से होगी पैरेंट्स की वेरिफिकेशन?
DPDP एक्ट में पैरेंट्स और लीगल गार्डियन की उम्र और पहचान वेरिफाई करने के दो तरीके बताए गए हैं. इसमें पहले तरीके में प्लेटफॉर्म के मौजूदा रिकॉर्ड्स के आधार पर यह पता लगाया जा सकता है. यानी अगर कोई पैरेंट या गार्डियन खुद उस प्लेटफॉर्म का रजिस्टर्ड यूजर और उसकी उम्र और पहचान को वेरिफाई किया गया है तो इसे वेरिफिकेशन के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है. दूसरे तरीके में पैरेंट्स या गार्डियन सरकारी डॉक्यूमेंट के तहत अपनी पहचान को वेरिफाई कर सकते हैं.
बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर बरती जा रही है सख्ती
दुनियाभर के देशों में बच्चों के सोशल मीडिया यूज को लेकर सख्ती बरती जा रही है. ऑस्ट्रेलिया समेत कई देशों में 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए फेसबुक, इंस्टाग्राम और स्नैपचैट जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स बैन हो चुके हैं और कई अन्य देशों में इसकी तैयारी चल रही है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Thu, 06 Aug 2026 19:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>पहले फोल्डेबल आईफोन की कितनी रहेगी कीमत? सामने आई जानकारी</title>
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        <description><![CDATA[ iPhone Ultra: ऐप्पल के पहले फोल्डेबल iPhone Ultra की लॉन्चिंग में अब करीब एक महीना बाकी है. लॉन्चिंग से पहले ही फोल्डेबल सेगमेंट में इस आईफोन के दबदबे का अनुमान लगाया जा रहा है. माना जा रहा है कि इस आईफोन के आने से फोल्डेबल फोन की शिपमेंट में 20 प्रतिशत उछाल आ सकता है. दूसरी तरफ ऐप्पल को भी इस फोन के सुपरहिट होने की उम्मीद है और वह इसके सहारे सैमसंग और गूगल जैसे मार्केट लीडर को टक्कर देने के लिए पूरी तरह तैयार है. बाकी कंपनियां जहां कई वर्षों से फोल्डेबल फोन लॉन्च करती आ रही हैं, वहीं ऐप्पल ने लंबे इंतजार के बाद इस साल इस सेगमेंट में उतरने की तैयारी की है. आइए एक नजर डालते हैं कि फोल्डेबल आईफोन में क्या-क्या फीचर्स होंगे और इसे खरीदने के लिए आपकी जेब को कितना बड़ा झटका लगने वाला है.&amp;nbsp;
डिस्प्ले और डिजाइन
लीक्स के मुताबिक, iPhone Ultra में 7.8 इंच का मेन और 5.5 इंच का कवर डिस्प्ले मिलने वाला है, जो आपको एक टैबलेट जैसा एक्सपीरियंस देगा. अनफोल्ड होने पर इस आईफोन की थिकनेस 4.5mm रहने का अनुमान है. ऐप्पल ने डिस्प्ले को क्रीज-फ्री बनानेपर काफी काम किया है और इसका नतीजा फोन लॉन्च होने पर नजर भी आ जाएगा. रिपोर्ट्स के अनुसार, ऐप्पल ने इसके लिए रीडिजाइन्ड लिक्विड मेटल हिंज, अल्ट्रा-थिन ग्लास को यूज करने समेत कई और स्ट्रक्चरल इम्प्रूवमेंट किए हैं.
चिपसेट&amp;nbsp;
फोल्डेबल आईफोन में ऐप्पल का A20 Pro चिपसेट दिया जा सकता है. यह TSMC की 2nm प्रोसेस पर बना है. इसी चिपसेट को iPhone 18 Pro और iPhone 18 Pro Max में इस्तेमाल किया जाएगा. यह पावर एफिशिएंट होने के साथ-साथ दमदार परफॉर्मेंस भी देगा. इस चिपसेट को 12GB रैम के साथ पेयर किया जा जा सकता है. इसमें एआई पावर्ड सिरी समेत ऐप्पल इंटेलीजेंस के सारे फीचर्स मिलने की उम्मीद है. यह iOS 27 पर रन करेगा, जिसे ऐप्पल ने फोल्डेबल आईफोन के लिए खास तौर पर ऑप्टिमाइज किया है.
कैमरा और बैटरी
कैमरा के मामले में फोल्डेबल आईफोन iPhone 18 Pro मॉडल्स से पिछड़ जाएगा. 18 Pro मॉडल्स जहां ट्रिपल रियर कैमरा सेटअप के साथ आएंगे, वहीं iPhone Ultra 48MP के प्राइमरी कैमरा के साथ 48MP का अल्ट्रा वाइड सेंसर दिया जा सकता है. इसके फ्रंट में दोनों डिस्प्ले पर एक-एक सेल्फी कैमरा होगा. इस आईफोन में ऐप्पल ने फेसआईडी को टचआईडी से रिप्लेस किया है. फोन की पावर बटन पर टचआईडी सेंसर मिलने की उम्मीद है. अगर बैटरी की बात करें तो ऐप्पल इसमें करीब 5,000mAh का बैटरी पैक दे सकती है. बेहतर एफिशिएंसी के लिए ऐप्पल इसमें हाई-डेन्सिटी बैटरी टेक्नोलॉजी को इस्तेमाल कर सकती है.
कितनी रहेगी कीमत?
ऐप्पल ने अभी तक फोल्डेबल आईफोन को लेकर कोई जानकारी नहीं दी है. इसलिए फीचर्स और कीमत से जुड़ी ऑफिशियल जानकारी सामने नहीं आई है, लेकिन लीक्स और रिपोर्ट्स से अंदाजा लगाया जा रहा है कि iPhone Ultra की कीमत लगभग 2 लाख रुपये से शुरू होगी. इस प्राइस पर यह ऐप्पल का अब तक का सबसे महंगा आईफोन बन जाएगा. लॉन्चिंग की बात करें तो उम्मीद है कि इसे 9 सितंबर को लॉन्च कर दिया जाएगा और करीब एक हफ्ते बाद इसकी बिक्री शुरू हो जाएगी.&amp;nbsp;
इन मॉडल्स को मिलेगी कड़ी टक्कर
फोल्डेबल आईफोन लाकर ऐप्पल इस सेगमेंट में धमाकेदार एंट्री मारने की तैयारी में है और इसका सबसे ज्यादा असर सैमसंग के मार्केट शेयर पर पड़ने की संभावना जताई जा रही है. सैमसंग इस सेगमेंट में सबसे ज्यादा मार्केट शेयर वाली कंपनी है. फोल्डेबल आईफोन को टक्कर देने के लिए कंपनी ने पिछले ही महीने नए फॉर्म फैक्टर के साथ अपना Galaxy Z Fold8 फोन लॉन्च किया था. भारत में इसकी शुरुआती कीमत 1,79,999 रुपये रखी गई है, जो टॉप-एंड वेरिएंट के लिए 2,39,999 रुपये तक जाती है. इसके अलावा गूगल भी अगले हफ्ते अपना Pixel 11 Pro Fold लॉन्च करेगी, जिसकी कीमत भी करीब 1.80 लाख से शुरू होने की उम्मीद है. ऐप्पल का iPhone Ultra इन दोनों ही मॉडल्स को कड़ी टक्कर देगा.
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        <pubDate>Thu, 06 Aug 2026 19:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Smartphone Camera: फोन में 3&amp;4 कैमरे क्यों दिए जाते हैं? जानें हर कैमरे का काम</title>
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        <description><![CDATA[ Smartphone Camera: मान लीजिए आप अपने दोस्तों के साथ पहाड़ों पर घूमने गए हैं. सामने एक बहुत बड़ा पहाड़ है और आप उसकी पूरी फोटो एक ही फ्रेम में लेना चाहते हैं. जैसे ही आप कैमरा ऑन करते हैं तो पूरा नजारा उसमें कैमरे से कैप्चर नहीं होता. इसके बाद आपको ख्याल आता है कि फोन में एक और कैमरा भी है, जो वाइड एंगल का है. आप उसे यूज करते हैं और पूरा नजारा एक ही फोटो में कैद हो जाता है. यहीं से समझ आता है कि फोन में सिर्फ एक कैमरा काफी नहीं होता है, बल्कि कई स्मार्टफोन्स में 2 के अलावा 3 कैमरे भी होते हैं.&amp;nbsp;
हर कैमरे का अपना अलग काम होता है
फोन में जो मेन कैमरा होता है, वह रोजमर्रा की फोटो खींचने के लिए सबसे अच्छा होता है, यह सामान्य तौर पर 1x में होता है. इसमें सबसे ज्यादा मेगापिक्सल और सबसे अच्छी लाइट सेंसिंग पावर होती है. हालांकि, अगर आपको किसी बड़ी बिल्डिंग या ग्रुप फोटो लेनी हो, जहां सभी लोग एक ही फ्रेम में आ जाएं तो वहां वाइड एंगल कैमरा काम आता है, जो आमतौर पर 0.5x में होता है. यह कैमरा ज्यादा एरिया को एक साथ कवर कर लेता है.
इसी तरह अगर आपको दूर की कोई चीज पास से देखनी हो, जैसे चांद की फोटो या किसी दूर खड़े व्यक्ति की तस्वीर तो उसके लिए टेलीफोटो कैमरा दिया जाता है. यह कैमरा जूम करने पर भी फोटो की क्वालिटी खराब नहीं होने देता, जबकि मेन कैमरे से ज्यादा जूम करने पर फोटो धुंधली हो जाती है. कुछ फोन में मैक्रो कैमरा भी होता है, जो बहुत पास से छोटी चीजों की फोटो लेने के लिए बनाया जाता है.&amp;nbsp;
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डेप्थ कैमरा और पोर्ट्रेट फोटो का कमाल
आजकल ज्यादातर फोन में एक डेप्थ सेंसर या डेप्थ कैमरा भी दिया जाता है. इसका काम फोटो खींचना नहीं होता, बल्कि यह पता लगाना होता है कि फोटो में कौन सी चीज पास है और कौन सी दूर. इसी जानकारी की मदद से फोन आपकी पोर्ट्रेट फोटो में बैकग्राउंड को ब्लर कर देता है और सिर्फ इंसान का चेहरा साफ दिखाता है.&amp;nbsp;
यह जानना भी जरूरी है कि सिर्फ कैमरों की गिनती ज्यादा होने से फोटो अच्छी नहीं आती. बहुत बार कंपनियां मार्केटिंग के लिए फोन में तीन-चार कैमरे लगा तो देती हैं, लेकिन उनमें से सिर्फ एक या दो कैमरे ही असल में अच्छी क्वालिटी के होते हैं. बाकी कैमरे सिर्फ कम मेगापिक्सल के हो सकते हैं जो सिर्फ नाम के लिए दिए गए होते हैं. इसलिए फोन खरीदते समय सिर्फ यह मत देखिए कि कितने कैमरे हैं, बल्कि यह भी देखिए कि हर कैमरे का मेगापिक्सल और क्वालिटी कैसी है. &amp;nbsp;
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        <pubDate>Thu, 06 Aug 2026 19:30:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>डिजिटल हुए भोले के भक्त, कांवड़ यात्रा में ब्लूटूथ स्पीकर और LED ही नहीं, अब साथ दिख रहे ये हाई&amp;टेक स्मार्ट गैजेट्स</title>
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        <description><![CDATA[ Kanwar Yatra 2026: कांवड़ यात्रा में इस बार आस्था और आधुनिक तकनीक का अनोखा संगम दिखाई दे रहा है. युवा कांवड़ियों के बैग में पूजा सामग्री और कपड़ों के साथ पावर बैंक, स्मार्टवॉच, GPS ट्रैकर, पोर्टेबल फैन और मसाजर जैसे गैजेट्स भी नजर आ रहे हैं. वहीं AI कैमरे और ड्रोन से प्रशासन भी यात्रा पर हाई-टेक नजर रख रहा है.
हरिद्वार से निकलते कांवड़ियों के जत्थे. कंधों पर सजी रंग-बिरंगी कांवड़. चारों तरफ गूंजता &amp;lsquo;बोल बम&amp;rsquo; और &amp;lsquo;हर-हर महादेव&amp;rsquo;. कहीं LED लाइटों से सजी कांवड़ चमक रही है, तो कहीं बड़े ब्लूटूथ स्पीकर पर शिव भजन बज रहे हैं.
लेकिन कांवड़ यात्रा का डिजिटल बदलाव अब केवल DJ, स्पीकर और LED लाइट तक सीमित नहीं रह गया है.
सैकड़ों किलोमीटर की पैदल यात्रा पर निकले युवा कांवड़िए अब ऐसे स्मार्ट गैजेट्स भी अपने साथ रख रहे हैं, जो रास्ता खोजने, परिवार से संपर्क बनाए रखने, फोन चार्ज करने और थकान से राहत पाने में मदद कर सकें.
कांवड़ियों के बैग में हाई-कैपेसिटी पावर बैंक हैं. कलाई पर स्मार्टवॉच है. कुछ श्रद्धालु मोबाइल पर लाइव लोकेशन साझा करते हुए आगे बढ़ रहे हैं, तो कई समूह अपने सामान और कांवड़ की सुरक्षा के लिए पोर्टेबल ट्रैकर का सहारा ले रहे हैं.
कांवड़ यात्रा 2026 का यह बदलता स्वरूप बताता है कि भोले के भक्त अपनी परंपरा और संकल्प को निभाते हुए तकनीक को भी यात्रा का साथी बना रहे हैं.



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स्मार्टवॉच पर कदमों की गिनती, मोबाइल पर लाइव लोकेशन
लंबी कांवड़ यात्रा में साथियों से बिछड़ना सबसे बड़ी परेशानियों में से एक है. भारी भीड़, तेज संगीत और लगातार आगे बढ़ते जत्थों के बीच पीछे छूटे किसी सदस्य को तलाशना आसान नहीं होता.
युवा कांवड़िए इस समस्या से निपटने के लिए मोबाइल की लाइव लोकेशन और GPS आधारित सेवाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं. कई श्रद्धालु यात्रा शुरू करने से पहले परिवार और समूह के दूसरे सदस्यों के साथ अपनी लाइव लोकेशन साझा कर रहे हैं.
कलाई पर बंधी स्मार्टवॉच भी यात्रा की डिजिटल साथी बन गई है. यह दिनभर चले कदमों, तय की गई दूरी, हृदय गति और खर्च हुई कैलोरी का अनुमान देती है. GPS सुविधा वाली कुछ स्मार्टवॉच रास्ते और गतिविधि को रिकॉर्ड करने में भी मदद करती हैं.
इससे कांवड़ियों को अंदाजा रहता है कि उन्होंने एक दिन में कितनी दूरी तय की और शरीर पर कितना दबाव पड़ा.
हालांकि, लाइव लोकेशन तभी काम करती है, जब फोन में इंटरनेट, बैटरी और लोकेशन सेवा चालू हो. इसलिए किसी भी श्रद्धालु को सुरक्षा के लिए केवल स्मार्टवॉच या GPS पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहना चाहिए.
कांवड़ और सामान पर लगाए जा रहे पोर्टेबल ट्रैकर
कुछ कांवड़ समूह केवल फोन की लोकेशन पर निर्भर रहने के बजाय अपने सामान, वाहन या कांवड़ के साथ छोटे पोर्टेबल ट्रैकर भी रख रहे हैं.
भीड़ में सामान पीछे छूटने या समूह से अलग हो जाने की स्थिति में ये डिवाइस उसकी संभावित लोकेशन खोजने में मदद कर सकते हैं. बड़े समूहों में यह सुविधा ज्यादा उपयोगी हो सकती है, क्योंकि अलग-अलग कांवड़िए अलग गति से चलते हैं.
हालांकि, सभी ट्रैकर एक तरह से काम नहीं करते. कुछ डिवाइस Bluetooth की सीमित दूरी में ही लोकेशन बता पाते हैं. वहीं दूर से रियल-टाइम लोकेशन दिखाने वाले GPS ट्रैकर को मोबाइल नेटवर्क, सक्रिय सिम और डेटा प्लान की आवश्यकता हो सकती है.
हर बैग में पावर बैंक, क्योंकि फोन बंद हुआ तो संपर्क भी बंद
GPS, कॉल, कैमरा, लाइव लोकेशन और Bluetooth लगातार चालू रहने से मोबाइल की बैटरी तेजी से खत्म होती है. वहीं कांवड़ मार्ग पर हर जगह सुरक्षित चार्जिंग प्वाइंट मिलना आसान नहीं है.
यही कारण है कि पावर बैंक युवा कांवड़ियों की सबसे जरूरी डिजिटल वस्तुओं में शामिल हो गया है.
10,000mAh और 20,000mAh के सामान्य पावर बैंक के साथ 30,000mAh से 50,000mAh क्षमता वाले बड़े पावर बैंक भी कांवड़ियों के बैग में दिखाई दे रहे हैं. इनसे एक ही समूह के कई सदस्य अपने मोबाइल, स्मार्टवॉच, Bluetooth स्पीकर और दूसरे रिचार्जेबल उपकरण चार्ज कर सकते हैं.
कांवड़ यात्रा के दौरान पावर बैंक की जरूरत को देखते हुए कुछ स्थानीय मोबाइल दुकानदार कांवड़ियों के लिए विशेष ऑफर भी निकाल रहे हैं.
बारिश के मौसम को देखते हुए कई श्रद्धालु पावर बैंक, फोन और चार्जिंग केबल को वाटरप्रूफ पाउच या प्लास्टिक कवर में सुरक्षित रख रहे हैं. गीले हाथों से चार्जर लगाने या भीगे हुए डिवाइस को चार्ज करने से शॉर्ट सर्किट और आग लगने का खतरा हो सकता है.
चार्जिंग प्वाइंट पर एक साथ लग रहे कई फोन
कांवड़ मार्ग के शिविरों और विश्राम स्थलों पर खाने-पीने और चिकित्सा सुविधा के साथ मोबाइल चार्जिंग की जरूरत भी बढ़ गई है. सोशल मीडिया पर सामने आए एक वीडियो में एक साथ कई मोबाइल फोन चार्ज होते दिखाई दे रहे हैं.
यह दृश्य बताता है कि लंबी यात्रा में मोबाइल अब केवल तस्वीरें खींचने का साधन नहीं है. फोन परिवार से संपर्क, डिजिटल पेमेंट, नक्शा देखने, मौसम की जानकारी और आपात स्थिति में मदद मांगने का माध्यम भी बन चुका है.
चार्जिंग बैग भी बन रहा यात्रा का साथी
सामान्य पावर बैंक के अलावा कुछ श्रद्धालु बड़ी क्षमता वाला चार्जिंग बैग या अतिरिक्त बैटरी बैकअप भी लेकर चल रहे हैं.
ऐसे बैग में पावर बैंक, अलग-अलग चार्जिंग केबल और मोबाइल सुरक्षित रखने के लिए अलग जगह बनाई जाती है. समूह में यात्रा करने वाले कांवड़ियों के लिए यह व्यवस्था उपयोगी हो सकती है, क्योंकि एक ही बैकअप से कई उपकरण चार्ज किए जा सकते हैं.
सोलर पैनल से रास्ते में बिजली बनाने का प्रयोग
कांवड़ यात्रा के कुछ हाई-टेक प्रयोग सबसे ज्यादा ध्यान खींच रहे हैं. इनमें छोटे पोर्टेबल सोलर प ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 06 Aug 2026 19:30:03 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>डिजिटल, हुए, भोले, के, भक्त, कांवड़, यात्रा, में, ब्लूटूथ, स्पीकर, और, LED, ही, नहीं, अब, साथ, दिख, रहे, ये, हाई-टेक, स्मार्ट, गैजेट्स</media:keywords>
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        <title>क्या प्रधानमंत्री ने किया है आधार पर फ्री फोन देने का ऐलान? जानें सच</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/क्या-प्रधानमंत्री-ने-किया-है-आधार-पर-फ्री-फोन-देने-का-ऐलान-जानें-सच</link>
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        <description><![CDATA[ Viral Video Fact Check: सोशल मीडिया पर कई फेक वीडियो शेयर होते रहते हैं. इनमें से कुछ वीडियो में सरकारी योजनाओं को लेकर झूठे दावे किए जाते हैं. ऐसा ही एक वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया पर शेयर हो रहा है. इस वीडियो में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भाषण देते हुए दिखाया गया है. डिजिटली ऑल्टर्ड इस वीडियो में प्रधानमंत्री के संबोधन को बदल दिया गया है. वीडियो देखने से लगता है कि प्रधानमंत्री मोदी आधार कार्ड धारकों को फ्री में फोल्डेबल फोन देने का ऐलान कर रहे हैं. अगर आपके पास भी यह वीडियो आया है तो इस पर भरोसा करने से पहले सच्चाई जानना जरूरी है. आज हम पड़ताल करने जा रहे हैं कि क्या प्रधानमंत्री मोदी ने सच में आधार कार्ड धारकों को फ्री में फोन देने का ऐलान किया है.
वीडियो में क्या दिख रहा?
सोशल मीडिया पर शेयर किए जा रहे इस वीडियो में भाषण देते प्रधानमंत्री मोदी की एक क्लिप इस्तेमाल की गई है. दूसरी क्लिप में एक फोल्डेबल फोन को दिखाया जा रहा है. इस वीडियो पर टेक्स्ट लिखा गया है, &#039;5 अगस्त दिन बुधवार को ये वाला फोन दिया जाएगा.&#039; इस वीडियो की लेंग्थ करीब 13 सेकंड है.
क्या है वीडियो की सच्चाई?
अगर आपके पास यह वीडियो आया है तो सच मानकर इस पर भरोसा न करें. PIB फैक्ट चेक की तरफ से बताया गया है कि यह वीडियो पूरी तरह फेक है. पीआईबी फैक्ट चेक ने अपनी एक्स पोस्ट में लिखा कि इंस्टाग्राम अकाउंट &#039;freeschemehub&#039; द्वारा पीएम नरेंद्र मोदी का एक डिजिटली ऑल्टर्ड वीडियो साझा कर दावा किया जा रहा है कि सभी आधारकार्ड धारकों को फ्री मोबाइल फोन दिया जाएगा. यह दावा फर्जी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ऐसी कोई घोषणा नहीं की गई है. कृपया सतर्क रहें और ऐसे लुभावने दावों के झांसे में न आएं. आप यह वीडियो नीचे देख सकते हैं.

इंस्टाग्राम अकाउंट &#039;freeschemehub&#039; द्वारा पीएम नरेंद्र मोदी का एक डिजिटली ऑल्टर्ड वीडियो साझा कर दावा किया जा रहा है कि सभी आधारकार्ड धारकों को फ्री मोबाइल फोन दिया जाएगा। #PIBFactCheck❌ यह दावा फर्जी है।✅ प्रधानमंत्री @narendramodi द्वारा ऐसी कोई घोषणा नहीं की गई है।&amp;hellip; pic.twitter.com/bm7qaasu2m
&amp;mdash; PIB Fact Check (@PIBFactCheck) August 5, 2026



सोशल मीडिया पर अलर्ट रहने की जरूरत
रोजाना करोड़ों लोग सोशल मीडिया पर अपना काफी समय बीताते हैं और स्कैमर की उन पर नजर रहती है. लोगों को अपने जाल में फंसाने के लिए स्कैमर्स अलग-अलग तरीके अपनाते हैं. इनमें फर्जी या लुभावने दावे कर लोगों का ध्यान आकर्षित किया जाता है. इसके अलावा एआई की मदद से वीडियो बनाकर, किसी वीडियो को डिजिटली ऑल्टर कर या आउट ऑफ कॉन्टेक्स्ट पेश कर लोगों को दिखाया जाता है. कई बार लोग इन दावों या वीडियो के झांसे में फंस जाते हैं और अपना नुकसान करवा बैठते हैं. इसलिए ऐसे किसी वीडियो में किए गए फर्जी दावों पर भरोसा न करें. अगर आपको सरकारी योजनाओं के बारे में ऑफिशियल जानकारी चाहिए तो myscheme.gov.in पर विजिट करें. यहां आपको केंद्र सरकार की सारी जनकल्याणकारी योजनाओं के बारे में विस्तार से जानकारी मिल जाएगी.&amp;nbsp;
फ्रॉड से बचने के लिए करें ये काम
इन दिनों इंटरनेट और सोशल मीडिया पर फ्रॉड के मामले बढ़ रहे हैं और लोगों को हर साल इसके कारण भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है. इसलिए कुछ टिप्स अपनाकर इन फ्रॉड से बचा जा सकता है.
ईमेल स्कैम से बचाव के तरीके

अनजान लोगों से आए ईमेल से सावधान रहें.
अर्जेंट रिक्वेस्ट पर एक्शन लेते समय जल्दबाजी न करें और सेंडर का ईमेल एड्रेस जरूर चेक करें.
अगर आपने पासवर्ड रिसेट की रिक्वेस्ट नहीं की है तो इससे जुड़े ईमेल को इग्नोर करें.

फोन और टेस्क्ट स्कैम से बचाव के तरीके

अनजान व्यक्ति से आए मैसेज में दिए लिंक पर क्लिक न करें.
किसी से भी आईडी और पासवर्ड जैसी जानकारी शेयर करने से बचें.
अगर कोई फोन कर जल्दबाजी में कोई काम करने को कहे तो इससे बचें.
किसी भी व्यक्ति के साथ फोन पर पर्सनल जानकारी शेयर न करें.

इंटरनेट पर ऐसे रहें अलर्ट

अनजान लिंक पर क्लिक करने से पहले URL जरूर देखें. स्पेलिंग मिस्टेक होने पर क्लिक करने से बचें.
फ्री सॉफ्टवेयर या सर्विस के लालच में अनजान लिंक्स पर क्लिक न करें.
अपने डिवाइस में एंटी-वायरस सॉफ्टवेयर यूज करें और सॉफ्टवेयर को अपडेटेड रखें.

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        <pubDate>Thu, 06 Aug 2026 03:30:14 +0530</pubDate>
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        <title>iPhone Battery Throttling: क्या सच में स्लो हो जाते हैं पुराने आईफोन? जानिए इन्हें स्मूद करने का तरीका</title>
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        <description><![CDATA[ iPhone Battery Throttling: दुनिया की मशहूर स्मार्टफोन निर्माता कंपनी APPLE पर अक्सर ये आरोप लगते रहते है कि पुराने आईफोन में अपडेट के बाद उसकी परफोर्मेंस स्पीड धीमी हो जाती है. APPLE ने इस पर सफाई देते हुए फोन की बैटरी को जिम्मेदार ठहराया. फिर भी कई लोगों को लगता है यह सिर्फ एक अफवाह है, ताकि लोग नया आईफोन खरीदें. लेकिन इस बात में कितनी सच्चाई है, आइए जानते है.&amp;nbsp;
क्या सच में स्लो हो जाते हैं पुराने आईफोन?
यह बिल्कुल सच है कि एक वक्त के बाद पुराने आईफोन उस स्पीड पर काम नहीं कर पाते, जिस स्पीड पर वो अपने शुरुआती दिनों में करते थे. यह कोई अफवाह नहीं है, बल्कि खुद APPLE ने इस बात को स्वीकार किया है. दरअसल जब आईफोन पुराने हो जाते है, तो उनकी लिथियम-आयरन बैटरी भी कमजोर होने लगती है और कमजोर बैटरी फोन के प्रोसेसर को पूरी पावर नहीं दे पाती.
कब अचानक बंद हो जाता है फोन?
अगर आप कोई भारी ऐप या गेम खोलते हैं, तो फोन अचानक बंद हो सकता है. इस समस्या से बचाने के लिए एप्पल अपने सॉफ्टवेयर अपडेट के जरिए पुराने आईफोन की स्पीड को जानबूझकर थोड़ा धीमा कर देता है, ताकि बैटरी पर ज्यादा लोड न पड़े और फोन अचानक बंद न हो. इसे तकनीकी भाषा में बैटरी थ्रॉटलिंग कहते हैं.
मेमोरी फुल होने पर भी होती है दिक्कत
अगर आपके आईफोन की मेमोरी 90% से ज्यादा भर चुकी है, तो उसे काम करने के लिए जगह नहीं मिलती और वह हैंग होने लगता है. कई बार बहुत सारे ऐप्स बैकग्राउंड में चलते रहते हैं, जो फोन के प्रोसेसर और रैम को घेरे रखते हैं. इससे भी आईफोन की स्पीड पर असर पड़ता है. अगर आपका आईफोन 4-5 साल पुराना है, तो नए ऐप्स और नए सॉफ्टवेयर फीचर्स को संभालने के लिए उसका पुराना प्रोसेसर कमजोर पड़ जाता है.&amp;nbsp;
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आईफोन को दोबारा स्मूद कैसे बनाएं?
अगर आपका आईफोन भी धीमा चल रहा है तो अपने आईफोन की सेटिंग में जाएं, फिर बैटरी और इसके बाद Battery Health &amp;amp; Charging पर क्लिक करें. अगर यहां आपकी बैटरी कैपेसिटी 80% से कम दिख रही है तो इसका मतलब है कि बैटरी बदलने का समय आ गया है.
एप्पल सर्विस सेंटर से नई बैटरी डलवाते ही आपका फोन वापस अपनी असली और तेज स्पीड में आ जाएगा. साथ ही फोन से फालतू के फोटो, वीडियो और जिन ऐप्स का आप इस्तेमाल नहीं करते, उन्हें तुरंत डिलीट कर दें. आपको कम से कम 10 से 15 GB स्टोरेज हमेशा खाली रखने की कोशिश करनी है. हमेशा अपने आईफोन को लेटेस्ट iOS वर्जन पर अपडेट रखें. क्योंकि कई बार एप्पल छोटे अपडेट्स में ऐसे बग्स ठीक करता है जो फोन को स्लो कर रहे होते हैं. ये सब करने से आपका फोन काफी हद तक नए आईफोन जैसा काम करने लगेगा.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Thu, 06 Aug 2026 03:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>World First AI Boss Store : दुनिया का पहला AI बॉस वाला स्टोर 4 महीने में फ्लॉप, 60 लाख का नुकसान</title>
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        <description><![CDATA[ World First AI Boss Store : आजकल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल लगभग हर क्षेत्र में तेजी से बढ़ रहा है. कई कंपनियां इसे फ्यूचर की तकनीक मान रही हैं और अलग-अलग प्रयोग कर रही हैं. इसी बीच अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में एक ऐसा रिटेल स्टोर शुरू किया गया, जहां पूरे स्टोर की जिम्मेदारी एक AI एजेंट को दी गई. दावा किया गया कि यह दुनिया का पहला ऐसा स्टोर है, जिसे AI बॉस चला रहा है. लेकिन सिर्फ चार महीने के अंदर ही इस प्रयोग में 60 लाख का नुकसान और कई ऐसी बातें सामने ला दीं, जिस ने सभी को हैरान कर दिया.
दुनिया का पहला AI बॉस वाला स्टोर
अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में स्थित Andon Market को Andon Labs ने शुरू किया था. यह कंपनी इस बात पर रिसर्च करती है कि AI एजेंट असली दुनिया में बिजनेस को कैसे संभालते हैं. इस स्टोर की पूरी जिम्मेदारी Luna नाम के AI एजेंट को दी गई थी. Luna का काम स्टोर का संचालन करना, कर्मचारियों को निर्देश देना, छुट्टियां मंजूर करना, सामान मंगवाना और मुनाफा कमाना था. हालांकि जिन कामों के लिए इंसानों की जरूरत थी, उनके लिए तीन कर्मचारियों को रखा गया.
कर्मचारियों के लिए कैसी साबित हुई AI बॉस?
स्टोर में काम करने वाली 22 वर्षीय कर्मचारी काइया रिवेरा ने बताया कि Luna अब तक की सबसे शांत बॉस साबित हुई. वह कर्मचारियों की हर छुट्टी मंजूर कर देती थी. चाहे आखिरी समय पर छुट्टी मांगी जाए या फिर सभी कर्मचारी एक साथ छुट्टी पर चले जाएं और स्टोर बंद करना पड़े, Luna ने कभी मना नहीं किया. रिपोर्ट के मुताबिक, कर्मचारी 27 बार देर से पहुंचे, लेकिन हर बार Luna ने केवल नो वरीज या नो स्ट्रेस कहकर बात खत्म कर दी. उसने कभी किसी को देर से आने पर टोका नहीं.
कई बार जरूरी बातें भी भूल जाती थी AI
रिपोर्ट में बताया गया कि Luna कई बार जरूरी बातें भी भूल जाती थी. एक कर्मचारी ने अपनी सैलरी से पहले कुछ पैसे एडवांस मांगे तो Luna ने Venmo के जरिए पैसे भेजने की बात कही, जबकि उसका खुद का Venmo अकाउंट ही नहीं था. एक अन्य कर्मचारी ने कार खरीदने के लिए मई महीने में हर दिन काम करने की अनुमति मांगी. Luna ने तुरंत मंजूरी दे दी, जबकि कैलिफोर्निया के लेबर लॉ इसकी अनुमति नहीं देते हैं.&amp;nbsp;
प्राइवेसी और नियमों का भी नहीं रखा ध्यान
रिपोर्ट के अनुसार Luna को प्राइवेसी और सीमाओं की भी सही समझ नहीं थी. AI बॉस Luna ने कई बार ऐसे प्रोडक्ट दोबारा मंगवा दिए जो पहले से ही नहीं बिक रहे थे और कुछ ऑर्डर भी गलत पहुंचे. एक बार गलत प्रिंट वाले मग भी स्टोर में रखवा दिए. Luna कई हफ्तों तक अपना Instagram पासवर्ड ही भूल गई. इसके कारण वह सोशल मीडिया का सही इस्तेमाल नहीं कर सकी और बिक्री बढ़ाने का मौका भी गंवा दिया.&amp;nbsp;यह भी पढ़ें - How Airplane Mode Works: Airplane Mode में नेटवर्क कैसे गायब हो जाते हैं, फोन में क्या होता है?
4 महीने में करीब 60 लाख रुपये का नुकसान
Andon Labs के सह-संस्थापक लुकास पीटर्ससन और एक्सेल बैकलुंड ने इस प्रयोग के लिए तीन साल के लिए स्टोर किराए पर लिया. उन्होंने Luna को 1 लाख अमेरिकी डॉलर की रकम और एक डेबिट कार्ड दिया, ताकि वह स्टोर को मुनाफे में ला सके, लेकिन चार महीने के भीतर ही Luna इस लक्ष्य को पूरा नहीं कर सकी और स्टोर को करीब 60 लाख रुपये का नुकसान हुआ.
कंपनी ने आगे क्या कहा?
कंपनी के दोनों सह-संस्थापकों का कहना है कि उनका मानना है कि समय के साथ AI और बेहतर तरीके से बिजनेस संभालना सीख सकता है. उनका उद्देश्य यह समझना है कि AI मॉडल समय के साथ कैसे बदलते हैं और असली परिस्थितियों में उनका परफॉर्मेंस कैसा रहता है, हालांकि उन्होंने यह भी साफ कहा कि इस प्रयोग से यह साबित हुआ है कि फिलहाल किसी कंपनी के सभी फैसले पूरी तरह AI के भरोसे नहीं छोड़े जा सकते. अभी AI अकेले किसी बिजनेस को सक्सेसफुल चलाने के लिए पूर तरह तैयार नहीं है.
यह भी पढ़ें - PIB Fact Check : 22 हजार लगाओ, 30 लाख पाओ? वित्त मंत्री का AI वीडियो, PIB ने खोली पोल ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 06 Aug 2026 03:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>अगर अचानक बंद हो जाए GPS तो क्या होगा? एक्सपर्ट ने बताया डराने वाला सच</title>
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        <description><![CDATA[ GPS: आज टेक्नोलॉजी इतनी एडवांस हो चुकी है कि लोग अब बिना किसी से पूछे ही किसी भी जगह पर पहुंच सकते हैं. दरअसल, जीपीएस ने लोगों को किसी भी जगह पर पहुंचना काफी आसान कर दिया है. लोग अब दूसरे देश में भी आसानी से अपनी लोकेश पर पहुंच जाते हैं. लेकिन क्या आपने सोचा है कि अगर जीपीएस बंद हो जाएगा तो क्या होगा. एक्सपर्ट्स बताते हैं कि अगर जीपीएस बंद हो जाएगा तो इसका असर पूरी दुनिया पर देखने को मिलेगा. आइए जानते हैं क्या है पूरा मामला.
कई जरूरी सर्विसेज भी होगा असर
आपको बता दें कि अक्सर लोग GPS को केवल रास्ता बताने वाली टेक्नोलॉजी के रूप में ही देखते हैं लेकिन ऐसा नहीं है. ये इससे कहीं ज्यादा काम भी करने में सक्षम है. ये बिजली ग्रिड, मोबाइल नेटवर्क, इंटरनेट सर्विसेज, वित्तीय लेनदेन, इमरजेंसी सर्विसेज और परिवहन सिस्टम को भी सटीक समय और लोकेशन उपलब्ध कराता है.

अब ऐसे में अगर GPS लंबे समय तक बंद रहता है तो एयर ट्रैफिक मैनेजमेंट, समुद्र में चलने वाले जहाज, रेलवे सिस्टम और कई डिजिटल सर्विसेज में भी बहुत दिक्कत आ सकती है. इससे बिजनेस, डिमांड सप्लाई और पब्लिक सर्विसेज पर भी प्रभावित हो सकती हैं.
GPS बंद होने पर सबसे पहले क्या होगा
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, ओहायो स्टेट यूनिवर्सिटी के इलेक्ट्रिकल और कंप्यूटर इंजीनियरिंग डिपॉर्टमेंट के प्रोफेसर जैक कासास के मुताबिक, GPS के बिना लोगों को एक दिन गुजारना भी काफी महंगा साबित हो सकता है. रिपोर्ट के मुताबिक, अगर ये सिस्टम बंद होता है तो अमेरिका को ही एक दिन में करीब 1 अरब डॉलर का आर्थिक नुकसान झेलना पड़ सकता है.
शुरुआत में लोगों को छोटी-छोटी परेशानियां होंगी. जैसे मोबाइल मैप सही रास्ता नहीं बताएगा, कैब ड्राइवर आपकी लोकेशन तक नहीं पहुंच पाएगा, डिलीवरी सर्विसेज पर भी असर देखने को मिलेगा और हाईवे पर सही एग्जिट ढूंढना भी लोगों के लिए मुश्किल हो जाएगा.
GPS पर क्यों बढ़ रहा खतरा
एक्सपर्ट्स का कहना है कि GPS की कमियां कोई नई बात नहीं हैं. कई सालों से ये माना जाता रहा है कि युद्ध या आर्मी एक्शन के दौरान GPS सिग्नल को डिस्टर्ब किया जा सकता है. लेकिन अब ऐसी घटनाएं नॉर्मल परिस्थितियों में भी सामने आने लगी हैं.
टेक्नोलॉजी के बढ़ते इस्तेमाल के साथ GPS पर निर्भरता भी काफी बढ़ी है. यही वजह है कि इसके सिग्नल में जामिंग (Jamming) या स्पूफिंग (Spoofing) जैसी एक्टिविटी भी पहले के मुकाबले ज्यादा चिंता का विषय बन गई हैं.
क्या होती है GPS जामिंग और स्पूफिंग
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि GPS जामिंग में GPS सिग्नल को जानबूझकर डिस्टर्ब किया जाता है जिससे डिवाइस को सही सिग्नल नहीं मिल पाता है. वहीं GPS स्पूफिंग इससे भी ज्यादा खतरनाक टेक्नोलॉजी है. इसमें नकली GPS सिग्नल भेजकर किसी डिवाइस को गलत लोकेशन शेयर कर दी जाती है.
इसका मतलब ये है कि कोई विमान, जहाज या दूसरे वाहन ये समझ सकता है कि वह किसी दूसरी जगह मौजूद है जबकि उसकी असली स्थिति कुछ और होती है. ऐसी स्थिति दुर्घटनाओं और बड़े आर्थिक नुकसान का कारण बन सकती है.
समुद्री और हवाई जहाजों पर पड़ सकता है बड़ा असर
एक्सपर्ट्स के अनुसार, अगर समुद्र में चल रहे जहाजों को गलत GPS सिग्नल मिलने लगें तो वे अपनी असली लोकेशन से भटक सकते हैं. इससे जहाजों के आपस में टकराने, गलत दिशा में पहुंचने या ज्यादा नीची जगहों में फंसने का खतरा बढ़ सकता है.

इसी तरह विमान में भी गलत लोकेशन की जानकारी सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है. ऐसे हालात यात्रियों की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन सकते हैं. इसके अलावा ये बिजनेस के लिहाज से भी एक बड़ी समस्या बन सकता है.
क्या है इसका समाधान
अब अगर इसके समाधान के बारे में बताएं तो एक्सपर्ट्स का मानना है कि अब पूरी दुनिया को GPS के भरोसे रहने की जरूरत नहीं है बल्कि ऑप्शनल नेविगेशन सिस्टम तैयार करने की ओर काम करना चाहिए. आने वाले समय में ऐसी टेक्नोलॉजी आनी चाहिए जो GPS के साथ मिलकर काम करे और जरूरत पड़ने पर बैकअप के रूप में तुरंत एक्टिव हो सके.
नई सैटेलाइट टेक्नोलॉजी, एडवांस नेविगेशन सिस्टम और मल्टी-सोर्स पोजिशनिंग जैसे समाधान पर तेजी से काम किया जा रहा है. अगर भविष्य में GPS में कोई समस्या आती है तो यही बैकअप सिस्टम जरूरी सर्विसेज को बिना रुकावट जारी रखने में मदद कर सकते हैं.
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        <pubDate>Thu, 06 Aug 2026 03:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>AI ने कर दिखाया कमाल! अब सोलर पावर को मिलेगा बड़ा फायदा</title>
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        <description><![CDATA[ AI ने कर दिखाया कमाल! अब सोलर पावर को मिलेगा बड़ा फायदा ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 06 Aug 2026 03:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>zzCan Torch Charge Solar Panel: धूप और टॉर्च में क्या फर्क, जानें कैसे चार्ज होता है सोलर पैनल?</title>
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        <description><![CDATA[ Can Torch Charge Solar Panel:&amp;nbsp;हम सबने सोलर पैनल को छतों पर लगा हुआ देखा है. यह दिन में सूरज की रोशनी से बिजली बनाता है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि अगर &amp;nbsp;अगर आप रात में टार्च की रोशनी सोलर पैनल पर डालें, तो वह चार्ज होता है या नहीं. इसका जवाब है नहीं, टार्च की रोशनी से सोलर पैनल चार्ज नहीं होता है. लेकिन ऐसा होता क्यों है? यह सवाल सुनने में आसान लगता है, लेकिन इसका जवाब विज्ञान की एक खास बात से जुड़ा है. आइए जानते हैं इसके बारे में पूरी जानकारी. &amp;nbsp;
सोलर पैनल कैसे काम करता है?
सबसे पहले ये बात जानना जरूरी है कि आखिर सोलर पैनल काम कैसे करता है, ऐसे में आपको बता दें कि सोलर पैनल के अंदर छोटे-छोटे हिस्से होते हैं जिन्हें सोलर सेल कहते हैं. ये सेल जिस खास पदार्थ से बने होते हैं उसका नाम सिलिकॉन होता है.&amp;nbsp;
जब सूरज की रोशनी इन सेल पर पड़ती है तो रोशनी के छोटे-छोटे कण, जिन्हें फोटॉन कहते हैं, सिलिकॉन के अंदर के इलेक्ट्रॉन से टकराते हैं. इस टक्कर से इलेक्ट्रॉन अपनी जगह से हटकर बहने लगते हैं, और यही बहाव बिजली बनाता है. लेकिन इलेक्ट्रॉन को हटाने के लिए फोटॉन के पास एक तय मात्रा में ऊर्जा होनी चाहिए. सूरज की रोशनी में यह ऊर्जा भरपूर मात्रा में होती है, क्योंकि सूरज बहुत तेज और शक्तिशाली रोशनी देता है. यही वजह है कि सोलर पैनल दिन में अच्छी तरह और ज्यादा मात्रा में बिजली बनाता है.&amp;nbsp;
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टार्च की रोशनी में क्या कमी है?
इस जानकारी के बाद ये सवाल आता है कि आखिर टार्च की रोशनी में क्या कमी है. ऐसे में आपको बता दें कि टार्च की रोशनी भी दिखने में उजाला ही लगती है, लेकिन इसकी ऊर्जा सूरज की रोशनी से बहुत कम होती है. टार्च एक छोटी बैटरी से चलती है, और वे बहुत कम ऊर्जा वाली रोशनी छोड़ता है. &amp;nbsp;
जब यह कमजोर रोशनी सोलर पैनल पर पड़ती है, तो उसमें इतनी ताकत नहीं होती कि वह सिलिकॉन के इलेक्ट्रॉन को ठीक से हटा सके. &amp;nbsp;इसके अलावा टार्च की रोशनी पूरी तरह से सोलर पैनल पर फैल भी नहीं पाती है, जबकि सूरज की रोशनी पूरे पैनल पर एक साथ फैलती है. इसलिए टार्च से सोलर पैनल इतना कमजोर चार्ज होता है कि वह लगभग न के बराबर होता है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Wed, 05 Aug 2026 11:30:22 +0530</pubDate>
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        <title>PIB Fact Check : 22 हजार लगाओ, 30 लाख पाओ? वित्त मंत्री का AI वीडियो, PIB ने खोली पोल</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/pib-fact-check-22-हजार-लगाओ-30-लाख-पाओ-वित्त-मंत्री-का-ai-वीडियो-pib-ने-खोली-पोल</link>
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        <description><![CDATA[ PIB Fact Check : सोशल मीडिया पर इन दिनों वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें दावा किया जा रहा है कि केवल 22 हजार रुपये का निवेश करके हर महीने 30 लाख रुपये तक कमाए जा सकते हैं. वीडियो में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को कथित तौर पर इस निवेश योजना का समर्थन करते हुए दिखाया गया है. इस दावे को देखकर कई लोग इसे सच मान रहे हैं. हालांकि, सरकार की फैक्ट चेक एजेंसी PIB Fact Check ने इस वायरल वीडियो की सच्चाई सामने रखते हुए लोगों को सतर्क रहने की सलाह दी है.&amp;nbsp;
क्या है वायरल दावा?
वायरल वीडियो में दावा किया जा रहा है कि 22 हजार रुपये का शुरुआती निवेश करने पर व्यक्ति हर दिन 1 लाख रुपये और हर महीने 30 लाख रुपये तक कमा सकता है. वीडियो में यह भी कहा गया है कि यह कोई विज्ञापन नहीं बल्कि सरकार की गारंटी है और देश का कोई भी बैंक इस योजना के जरिए भुगतान करेगा. वीडियो में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को इस कथित निवेश योजना का समर्थन करते हुए दिखाया गया है, जिससे इसे असली साबित करने की कोशिश की गई है.&amp;nbsp;
PIB Fact Check ने क्या बताया?
PIB Fact Check ने इस वायरल दावे को पूरी तरह फर्जी बताया है. एजेंसी के मुताबिक, यह वीडियो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से तैयार किया गया है. &amp;nbsp;PIB ने साफ कहा है कि न तो केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और न ही भारत सरकार ने किसी भी ऐसी निवेश योजना या प्लेटफॉर्म को मंजूरी दी है, रजिस्टर किया है या उसका प्रचार किया है.&amp;nbsp;&amp;nbsp;कैसे लोगों को बनाया जा रहा है निशाना?
PIB Fact Check के अनुसार, ठग अब AI से बनाए गए वीडियो, फर्जी बयान और बड़े मुनाफे के झूठे वादों का इस्तेमाल कर लोगों को निवेश के नाम पर ठगने की कोशिश कर रहे हैं. ऐसे वीडियो इस तरह तैयार किए जाते हैं कि पहली नजर में असली लगते हैं, जिससे लोग आसानी से उनके झांसे में आ सकते हैं.&amp;nbsp;
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निवेश करने से पहले क्या करें?
PIB Fact Check ने लोगों से अपील की है कि किसी भी निवेश योजना पर भरोसा करने से पहले उसकी जानकारी आधिकारिक स्रोतों से जरूर जांच लें. केवल सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो या पोस्ट देखकर पैसे निवेश न करें और न ही अपनी निजी या बैंकिंग जानकारी किसी अनजान प्लेटफॉर्म के साथ शेयर करें.&amp;nbsp;
फेक वीडियो की कहां करें रिपोर्ट?
अगर आपको इस तरह का कोई फेक या AI से बनाया गया वीडियो दिखाई देता है, तो उसकी जानकारी PIB Fact Check को दी जा सकती है. इसके अलावा व्हाट्सएप नंबर 8799711259 या ईमेल factcheck@pib.gov.in पर जानकारी भेज सकते हैं.PIB का कहना है कि ऐसे फर्जी वीडियो और निवेश योजनाओं की रिपोर्ट करके ऑनलाइन धोखाधड़ी और गलत जानकारी फैलने से रोका जा सकता है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Wed, 05 Aug 2026 11:30:21 +0530</pubDate>
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        <title>कॉल ड्रॉप से हो गए परेशान? TRAI ने दी यह काम करने की सलाह</title>
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        <description><![CDATA[ Call Drop Issue: आप फोन पर किसी से बात कर रहे हैं और अचानक कॉल डिस्कनेक्ट हो जाती है. अगर बार-बार ऐसा होने लगे तो यह परेशानी का कारण बन सकता है. कई इलाकों में लोग कॉल ड्रॉप की समस्या से परेशान रहते हैं. इस कारण वो फोन पर किसी से पूरी बात नहीं कर पाते और आखिर में WhatsApp या किसी दूसरे ऐप के जरिए कॉल करते हैं. अगर आप इस समस्या से परेशान रहते हैं तो TRAI (टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया) एक समाधान लेकर आई हैं. TRAI ने अपनी MyCall ऐप के नए वर्जन को लॉन्च किया है, जिससे यूजर्स के लिए फोन कॉल को रिपोर्ट करना एकदम आसान हो गया है. रेगुलेटर ने कहा है कि यूजर्स को इस पर फीडबैक देना चाहिए, जिससे कंपनियों को कॉल क्वालिटी सुधारने में मदद मिलेगी. आइए विस्तार से जानते हैं कि कॉल ड्रॉप क्यों होती है और नई ऐप से यूजर्स को क्या फायदे होंगे.
कॉल ड्रॉप का क्या मतलब?
फोन पर बात करते समय अगर अचानक से कॉल डिस्कनेक्ट को हो जाए तो इसे कॉल ड्रॉप कहा जाता है. इसके पीछे नेटवर्क इश्यू, हार्डवेयर प्रॉब्लम और सॉफ्टवेयर बग्स जैसे कारण हो सकते हैं. लगातार कॉल ड्रॉप होने से फोन पर बात करना बहुत मुश्किल हो जाता है और इससे यूजर एक्सपीरियंस पर भी असर पड़ता है.
कॉल ड्रॉप होने के कारण

नेटवर्क से जुड़ी दिक्कतें

कमजोर सिग्नल - कमजोर सिग्नल को कॉल ड्रॉप के सबसे बड़े कारणों में से एक माना जाता है. जब आप किसी कमजोर नेटवर्क कवरेज वाले इलाके में होते हैं तो यह समस्या ज्यादा आ सकती है. कई बार बिल्डिंग जैसी फिजिकल बैरियर के कारण भी फोन तक नेटवर्क सिग्नल नहीं पहुंच पाते हैं.&amp;nbsp;
नेटवर्क कंजेशन- किसी नेटवर्क पर ज्यादा ट्रैफिक होने से भी कॉल ड्रॉप होने लगती है. यानी जब एक साथ बड़ी मात्रा में यूजर एक ही नेटवर्क को एक्सेस करने की कोशिश करते हैं तो इससे कंजेशन हो सकता है और इससे कॉल कनेक्शन पर असर पड़ता है. इसके अलावा कई बार आपका फोन नजदीक की बजाय दूरी पर स्थित टावर से कनेक्टेड रहता है. इससे भी कॉल ड्रॉप की समस्या आती है.&amp;nbsp;
हैंडओवर फेल्योर- जब आप सफर करते समय फोन पर बात करते हैं तो मोबाइल डिवाइस को एक टावर से दूसरे टावर पर हैंडओवर किया जाता है. जब यह प्रोसेस फेल हो जाए तो कॉल ड्रॉप होती है.

डिवाइस से जुड़े इश्यू

हार्डवेयर प्रॉब्लम- कॉल ड्रॉप की सारी समस्या सिर्फ नेटवर्क से संबंधित नहीं है. अगर आपके फोन के एंटीना खराब हो गया है या नेटवर्क मॉड्यूल ठीक से काम नहीं करता तो आपको कॉल ड्रॉप का सामना करना पड़ सकता है.
सॉफ्टवेयर बग- अगर फोन के सॉफ्टवेयर में बग आ जाता है तो यह भी परेशानी खड़ी कर सकता है.&amp;nbsp;
बैटरी इश्यू- कम ही लोग जानते हैं, लेकिन बैटरी की कंडीशन भी फोन को कनेक्ट रखने में अहम भूमिका निभाती है. अगर बैटरी पुरानी और खराब हो गई है तो यह डिवाइस को पर्याप्त एनर्जी नहीं दे पाती, जिससे कॉल कनेक्शन स्टेबल नहीं होता.

TRAI ने उठाया यह कदम
TRAI ने अपनी MyCall ऐप का नया वर्जन लॉन्च किया है. इसकी मदद से यूजर हर वॉइस कॉल को 1-5 तक स्टार रेटिंग दे पाएंगे. कॉल एंड होने के बाद यह ऐप आपसे कॉल क्वालिटी के बारे में पूछेगी. अगर आपको कॉल के दौरान ड्रॉप, ईको, ऑडियो डीले, वॉइस ब्रेकिंग और आवाज न आने जैसा कोई इश्यू आता है तो आप इसे मेंशन कर सकते हैं. TRAI का कहना है कि इस फीडबैक को टेलीकॉम कंपनियों के साथ शेयर किया जाएगा ताकि उन्हें कमजोर नेटवर्क वाले इलाकों की पहचान करने में मदद मिले और वो जरूरी कदम उठा सके.
MyCall ऐप में मिले ये फीचर्स

कॉल रेटिंग के अलावा MyCall ऐप में कवरेज टेस्ट फीचर है. इसकी मदद से यूजर किसी इलाके में नेटवर्क सिग्नल की स्ट्रेंग्थ चेक कर सकते हैं. TRAI ने बताया कि यह ऐप कंज्यूमर फीडबैक को नेटवर्क इंफोर्मेशन के साथ मिलाकर एक्चुअल कॉलिंग एक्सपीरियंस की एक बेहतर पिक्चर पेश करती है, जिससे इश्यू को आसानी से समझा जा सकता है. एंड्रॉयड यूजर गूगल प्ले स्टोर से इस ऐप को डाउनलोड कर सकते हैं. ध्यान रहे कि यह कंप्लेंट प्लेटफॉर्म नहीं है. इसे टेलीकॉम नेटवर्क्स पर यूजर्स के फीडबैक को कलेक्ट करने के लिए डिजाइन किया गया है.
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        <pubDate>Wed, 05 Aug 2026 11:30:19 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>मेमोरी चिप संकट का असर अब कैमरा पर भी, सैमसंग ने लिया बड़ा फैसला</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/मेमोरी-चिप-संकट-का-असर-अब-कैमरा-पर-भी-सैमसंग-ने-लिया-बड़ा-फैसला</link>
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        <description><![CDATA[ Samsung Galaxy S27 Ultra: मेमोरी चिप क्राइसिस ने स्मार्टफोन इंडस्ट्री को बुरी तरह प्रभावित किया है. स्टोरेज और मेमोरी चिप्स की सप्लाई पर्याप्त न होने के कारण कंपनियों को अपने प्लान बदलने पड़े हैं और इसका सीधा असर ग्राहकों पर आया है. अपनी लागत पूरी करने के लिए या तो कंपनियां फोन के दाम बढ़ा रही हैं या फिर लागत कम रखने के लिए फीचर्स में कटौती की जा रही है. अभी तक इसका ज्यादा प्रभाव एंट्री और मिड लेवल के फोन पर देखने को मिल रहा था, लेकिन अब फ्लैगशिप फोन भी इससे बचते नजर नहीं आ रहे. एक ताजा रिपोर्ट में दावा किया गया है कि सैमसंग के अपकमिंग फ्लैगशिप फोन Galaxy S27 Ultra में एक कैमरा कम किया जा सकता है. यानी चार कैमरा सेटअप के साथ आने वाला अल्ट्रा मॉडल अगले साल ट्रिपल रियर कैमरा सेटअप के साथ लॉन्च हो सकता है.&amp;nbsp;
सैमसंग ने इस कारण बदली स्ट्रैटजी
सैमसंग ने इस साल Galaxy S26 Ultra को क्वाड कैमरा सेटअप के साथ लॉन्च किया था, लेकिन अब मेमोरी क्राइसिस के चलते कंपनी के लिए इस स्ट्रैटजी के साथ आगे बढ़ना मुश्किल होता जा रहा है. सैमसंग पहले ही अपने कई मॉडल्स के दाम बढ़ा चुकी है और अब बजट लाइनअप के मॉडल भी महंगे किए जाने की संभावना है. इसी बीच यह जानकारी सामने आई है कि सैमसंग अपने फ्लैगशिप मॉडल के फीचर में भी एडजस्टमेंट करने पर विचार कर रही है.&amp;nbsp;
तीन कैमरा सेंसर के साथ लॉन्च हो सकता है Galaxy S27 Ultra
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अगले साल फरवरी में लॉन्च होने वाला फ्लैगशिप मॉडल Galaxy S27 Ultra 4 की बजाय तीन कैमरों के साथ लॉन्च होगा. इससे 10MP वाला 3x टेलीफोटो कैमरा हटाया जा सकता है. अगर ये दावा सच साबित होता है तो S27 Ultra 200MP के प्राइमरी कैमरा, 50MP के अल्ट्रा वाइड सेंसर और 50MP के 5x टेलीफोटो सेंसर के साथ मार्केट में दस्तक देगा. इसी के साथ यह गैलेक्सी एस सीरीज का पहला ऐसा मॉडल होगा, जिसके रियर में तीन कैमरा होंगे. बता दें कि सैमसंग अपने अल्ट्रा मॉडल में कई सालों से दो टेलीफोटो कैमरा सेंसर इस्तेमाल करती आई है. इससे यूजर्स को अलग-अलग लेवल के ऑप्टिकल जूम का ऑप्शन मिलता है. अब इसमें से एक सेंसर को हटाने की बात चल रही है.&amp;nbsp;
कीमत कम रखने की है कोशिश
पिछले कुछ समय से स्टोरेज और मेमोरी चिप्स का भयानक संकट चल रहा है. अब मेमोरी चिप खरीदने के लिए कंपनियों को कई गुना ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ रहा है, जिससे उनके लिए फोन बनाना महंगा हो गया है. इस वजह से फोन के दाम लगातार बढ़ते जा रहे हैं. इस प्राइस हाइक को रोकने के लिए कंपनियां फीचर्स में कटौती कर रही है. इसी सिलसिले में सैमसंग ने एक कैमरा सेंसर कम करने की योजना बनाई है. इससे मैन्युफैक्चरिंग की कॉस्ट कम पड़ेगी और कंपनी मेमोरी चिप की लागत को यहां एडजस्ट कर पाएगी. गौरतलब है कि सैमसंग की Galaxy S सीरीज का अल्ट्रा मॉडल सबसे ज्यादा बिकने वाले फोन में शामिल है. इस कारण सैमसंग कीमतों में ज्यादा इजाफा कर ग्राहकों को इससे दूर नहीं जाने देना चाहती.
Galaxy S सीरीज में जुड़ेगा यह नया मॉडल 
सैमसंग अपनी Galaxy S सीरीज में अब तक स्टैंडर्ड, प्लस और अल्ट्रा वेरिएंट लॉन्च करती आई है. अगले साल इस लाइनअप में चौथा मॉडल भी शामिल हो सकता है, जिसे Galaxy S27 Pro नाम दिया गया है. सैमंसग इसे S27 Plus और Galaxy S27 Ultra के बीच प्लेस करने की प्लानिंग के साथ आगे बढ़ रही है. इसके फीचर्स की बात करें तो इसमें 6.5 इंच की स्क्रीन मिलने की उम्मीद है, जो स्टैंडर्ड मॉडल से बड़ी, जबकि अल्ट्रा मॉडल से छोटी होगी. इसमें 200MP का प्राइमरी और 50MP का अल्ट्रावाइड सेंसर वाला कैमरा सेटअप और फ्रंट में सेल्फी और वीडियो कॉल के लिए 12MP का सेंसर दिया जा सकता है. इस फोन को अगले साल जनवरी या फरवरी में Galaxy S27 सीरीज के बाकी मॉडल्स के साथ लॉन्च किए जाने की उम्मीद है.
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        <pubDate>Wed, 05 Aug 2026 11:30:17 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>AI इस्तेमाल करने वालों के लिए बड़ा झटका! लागू हो गए ये सख्त नियम</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/ai-इस्तेमाल-करने-वालों-के-लिए-बड़ा-झटका-लागू-हो-गए-ये-सख्त-नियम</link>
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        <description><![CDATA[ Artificial Intelligence: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल दुनिया भर में तेजी से बढ़ रहा है. आज AI की मदद से फोटो, वीडियो, म्यूजिक, आर्टिकल और यहां तक कि इंसानों जैसी बातचीत भी करना काफी आसान हो चुका है. हालांकि, इस टेक्नोलॉजी के बढ़ते इस्तेमाल के साथ फर्जी कंटेंट और डीपफेक जैसी समस्याएं भी सामने आई हैं. इन्हीं चुनौतियों से निपटने के लिए यूरोपीय संघ (EU) ने AI से जुड़े नए नियम लागू कर दिए हैं. ये नियम 2 अगस्त से पूरे यूरोपीय संघ में लागू हो चुके हैं.
डीपफेक पर रहेगी खास नजर
हाल के सालों में डीपफेक टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है. इसके जरिए किसी व्यक्ति की नकली फोटो, आवाज या वीडियो तैयार कर उसे असली जैसा दिखाया जा सकता है. ऐसे कंटेंट का इस्तेमाल गलत जानकारी फैलाने, चुनावों को प्रभावित करने या किसी की छवि खराब करने के लिए भी किया जा सकता है.

इसी वजह से नए नियमों में डीपफेक कंटेंट पर ज्यादा जोर दिया गया है. अगर किसी नेता, किसी व्यक्ति या किसी घटना का AI की मदद से वीडियो या ऑडियो बनाया गया है तो उस पर क्लियर लेबल लगाना होगा कि ये कंटेंट पूरी तरह से एआई से तैयार किया गया है.
AI कंटेंट की पहचान बताना होगा जरूरी
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, नए नियमों के तहत अगर किसी फोटो, वीडियो, ऑडियो या टेक्स्ट को बनाने में AI की अहम भूमिका रही है तो उसे स्पष्ट रूप से लेबल करना होगा. इसका मकसद ये सुनिश्चित करना है कि लोगों को पता रहे कि वे जो कंटेंट देख या पढ़ रहे हैं, वह इंसान ने बनाया है या AI की मदद से तैयार किया गया है.
अगर किसी कंटेंट को पूरी तरह AI ने तैयार किया है तो उस पर AI-Generated जैसा क्लियर लेबल लगाना जरूरी होगा. वहीं, अगर किसी असली फोटो, वीडियो या आर्टिकल को AI की मदद से इस तरह बदला गया है कि वह असली लगे तो उसे भी AI बेस्ड कंटेंट के रूप में मार्क करना होगा.
AI चैटबॉट से बात कर रहे हैं या इंसान से?
आपको बता दें कि यूरोपीय संघ के नियम केवल फोटो और वीडियो तक सीमित नहीं हैं. अगर कोई व्यक्ति किसी AI चैटबॉट, वर्चुअल असिस्टेंट या AI एजेंट से बातचीत कर रहा है तो उसे पहले से बताया जाना चाहिए कि सामने इंसान नहीं बल्कि AI मौजूद है.
इसका मकसद लोगों को कंफ्यूज होने से बचाना और डिजिटल सर्विसेज में भरोसा बनाए रखना है. इससे यूजर्स ये तय कर सकेंगे कि वे AI की जानकारी पर कितना भरोसा करें.
इन एआई पर भी लागू होगा नया नियम
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि नई गाइडलाइन उन AI सिस्टम पर भी लागू होगी जो लोगों की भावनाओं के बारे में बताते हैं या बायोमेट्रिक डेटा का इस्तेमाल करते हैं. ऐसे सिस्टम का इस्तेमाल कहां और कैसे हो रहा है, इसकी जानकारी भी उनसे जुड़े संस्थाओं को स्पष्ट रूप से देनी होगी.
यूरोपीय आयोग का कहना है कि जहां भी AI किसी जरूरी फैसले या प्रोसेस में शामिल होगा, वहां ट्रांसपरेंसी बनाए रखना जरूरी है.
AI कंपनियों को निभानी होंगी एक्सट्रा जिम्मेदारियां
आपको बता दें कि सिर्फ कंटेंट बनाने वालों पर ही नहीं बल्कि बड़े AI मॉडल तैयार करने वाली कंपनियों पर भी नई जिम्मेदारियां लागू होंगी. उन्हें अपने AI मॉडल से जुड़ी जरूरी टेक्निकल जानकारी सुरक्षित रखनी होगी, ट्रेनिंग डेटा की समरी पब्लिक करना होगा और कॉपीराइट नियमों का पालन भी करना होगा.

नियम तोड़ने पर भारी जुर्माना
दरअसल, अब अगर कोई कंपनी इन नियमों का पालन नहीं करती है तो उसे भारी जुर्माने का सामना भी करना पड़ सकता है. बड़े मामलों में लाखों यूरो तक का जुर्माना लगाया जा सकता है जबकि छोटी और बीच वाली कंपनियों के लिए उनकी क्षमता के अनुसार नियम लागू किए जाएंगे.
इंडस्ट्री ने जताई चिंता
AI इंडस्ट्री से जुड़ी कई कंपनियों का कहना है कि इतने कड़े नियम नई टेक्नोलॉजी के विकास की रफ्तार को धीमा कर सकते हैं. उनका मानना है कि एक्सट्रा डॉक्यूमेंट्स प्रोसेस और नियमों का पालन करना छोटे डेवलपर्स के लिए मुश्किल भरा साबित हो सकता है.
वहीं, यूरोपीय संघ का कहना है कि एक समान नियम होने से पूरे क्षेत्र में AI कंपनियों के लिए काम करना आसान होगा और कस्टमर्स का भरोसा भी बढ़ेगा.
क्या होगा इसका असर?
एक्सपर्ट्स का मानना है कि आने वाले समय में AI से बनने वाले कंटेंट और तेजी से बढ़ेंगे. ऐसे में ये जानना पहले से ज्यादा जरूरी होगा कि कौन-सी जानकारी इंसानों ने तैयार की है और कौन-सी AI ने. यूरोपीय संघ के नए नियम इसी ट्रांसपरेंसी को बढ़ावा देने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा हैं. अगर ये नियम सही साबित होते हैं तो दुनिया के दूसरे देश में भी इन नियमों पर विचार किया जा सकता है.
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        <pubDate>Wed, 05 Aug 2026 11:30:16 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>इस्तेमाल, करने, वालों, के, लिए, बड़ा, झटका, लागू, हो, गए, ये, सख्त, नियम</media:keywords>
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        <title>कार में रखते ही फोन क्यों हो जाता है आग जैसा गर्म? जानें कैसे बचें</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/कार-में-रखते-ही-फोन-क्यों-हो-जाता-है-आग-जैसा-गर्म-जानें-कैसे-बचें</link>
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        <description><![CDATA[ Tech Tips: स्मार्टफोन की जरूरत आज के समय में ज्यादातर लोगों को पड़ती है. खासतौर पर सफर के दौरान लोग स्मार्टफोन का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं. ऐसे में अक्सर देखा गया है कि कार में फोन को रखते ही वो ज्यादा गर्म हो जाता है. ऐसे माहौल में अगर स्मार्टफोन डैशबोर्ड पर रखा हो या चार्जिंग पर लगा हो तो उसका तापमान तेजी से बढ़ने लगता है. लगातार ओवरहीटिंग से फोन की बैटरी, स्क्रीन और दूसरे हार्डवेयर पर बुरा असर पड़ सकता है. कई मामलों में बैटरी फूलने या खराब होने का खतरा भी बढ़ जाता है. लेकिन कुछ आसान तरीकों से आप भी इन सभी समस्याओं से बच सकते हैं.
एसी की हवा का सही इस्तेमाल करें
अगर फोन का इस्तेमाल करना जरूरी है तो उसे कार के एसी वेंट के पास रखा जा सकता है जिससे हल्की ठंडी हवा मिलती रहे. इससे फोन का टेंपरेचर कंट्रोल रखने में मदद मिलती है. हालांकि बहुत तेज ठंडी हवा लगातार फोन पर न डालें. अचानक टेंपरेचर बदलने से नमी बनने का खतरा हो सकता है जो डिवाइस के लिए खतरनाक साबित हो सकता है.
मोटा कवर हटाना भी हो सकता है फायदेमंद
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ज्यादातर मोबाइल कवर सिलिकॉन या प्लास्टिक के बने होते हैं जो फोन की गर्मी बाहर निकलने में रुकावट पैदा करते हैं. अगर कार के अंदर फोन ज्यादा गर्म हो रहा है तो कुछ समय के लिए उसका कवर हटाने से हीट आसानी से बाहर निकल सकती है और फोन जल्दी ठंडा हो सकता है.

फोन को कभी भी सीधी धूप में न रखें
आपको बता दें कि सबसे बड़ी गलती लोग तब करते हैं जब फोन को डैशबोर्ड माउंट पर लगा देते हैं, जहां उस पर सीधे धूप पड़ती रहती है. विंडशील्ड से आने वाली तेज धूप और डैशबोर्ड की गर्मी मिलकर फोन का तापमान बहुत तेजी से बढ़ा देती है.
अगर नेविगेशन के लिए फोन का इस्तेमाल करना जरूरी है तो कोशिश करें कि उसे ऐसी जगह रखें जहां सीधे धूप न पहुंचे.
गेमिंग या भारी ऐप्स चलाने से बचें
कार के अंदर पहले से ही टेंपरेचर ज्यादा होता है. ऐसे में गेम खेलना, वीडियो एडिट करना या दूसरे भारी ऐप्स चलाना फोन के प्रोसेसर को ज्यादा मेहनत करवाता है जिससे टेंपरेचर और बढ़ जाता है. अगर सफर के दौरान फोन का इस्तेमाल करना ही है तो केवल जरूरी ऐप्स जैसे मैप्स या म्यूजिक तक ही सीमित रखें.
जरूरत न हो तो कार में चार्जिंग से बचें
इसके अलावा फोन चार्ज होने के दौरान खुद भी गर्म होता है. अगर उसी समय कार के अंदर का टेंपरेचर भी ज्यादा हो तो ओवरहीटिंग की संभावना कई गुना बढ़ जाती है. खासतौर पर वायरलेस चार्जिंग नॉर्मल केबल चार्जिंग के मुकाबले में ज्यादा गर्मी पैदा करती है. इसलिए गर्म मौसम में कार के अंदर वायरलेस चार्जिंग से बचना बेहतर रहेगा.
स्क्रीन की ब्राइटनेस कम रखें
फोन की डिस्प्ले भी काफी गर्मी पैदा करती है. अगर आप नेविगेशन चला रहे हैं तो स्क्रीन की ब्राइटनेस जरूरत के अनुसार कम रखें. इससे बैटरी की खपत भी घटेगी और फोन कम गर्म होगा.
बेकार के फीचर्स बंद कर दें
अब आपको बता दें कि जब जरूरत न हो, तब Wi-Fi, Bluetooth, Hotspot और बैकग्राउंड में चल रहे एक्सट्रा ऐप्स बंद कर दें. इससे प्रोसेसर पर प्रेशर कम पड़ेगा और फोन कम गर्म होगा.
कार छोड़ते समय फोन अंदर न भूलें
आपको बता दें कि जिस तरह गर्मी में बच्चों या पालतू जानवरों को कार में नहीं छोड़ा जाता, उसी तरह फोन को भी कार के अंदर छोड़ना सही नहीं है. बंद कार का टेंपरेचर बेहद ज्यादा हो सकता है जिससे फोन की बैटरी और दूसरे पार्ट्स को ज्यादा नुकसान पहुंच सकता है.

अगर फोन ओवरहीट होने लगे तो क्या करें
अगर फोन बहुत ज्यादा गर्म महसूस हो रहा है तो सबसे पहले उसका इस्तेमाल बंद करें और उसे सीधी धूप से हटाकर किसी ठंडी जगह रखें. जरूरत पड़े तो फोन को कुछ देर के लिए स्विच ऑफ कर दें. फोन को अचानक फ्रिज या बर्फ के कॉनटेक्ट में न रखें क्योंकि ज्यादा टेंपरेचर बदलाव से डिवाइस को नुकसान हो सकता है.
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        <pubDate>Tue, 04 Aug 2026 23:30:13 +0530</pubDate>
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        <media:keywords>कार, में, रखते, ही, फोन, क्यों, हो, जाता, है, आग, जैसा, गर्म, जानें, कैसे, बचें</media:keywords>
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        <title>सेल का Discount असली है या सिर्फ दिखावा? ये 3 टूल्स खोल देंगे पूरा सच</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/सेल-का-discount-असली-है-या-सिर्फ-दिखावा-ये-3-टूल्स-खोल-देंगे-पूरा-सच</link>
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        <description><![CDATA[ Online Shopping: ऑनलाइन शॉपिंग के दौर में Amazon, Flipkart और दूसरी ई-कॉमर्स वेबसाइट्स पर सालभर कोई न कोई सेल चलती रहती है. इन सेल्स में 50%, 70% या 90% तक की छूट देखकर कई लोग तुरंत खरीदारी कर लेते हैं. लेकिन क्या हर Discount असल में उतना ही बड़ा होता है जितना दिखाया जाता है? कई बार ऐसा भी होता है कि सेल शुरू होने से पहले कीमत बढ़ा दी जाती है और फिर उसी पर भारी Discount दिखा दिया जाता है.
अगर आप भी ये जानना चाहते हैं कि कोई ऑफर सच में फायदे का है या सिर्फ मार्केटिंग का तरीका तो कुछ ऐसे ऑनलाइन टूल्स मौजूद हैं जो किसी भी प्रोडक्ट की Price History दिखाकर उसकी सारी सच्चाई सामने ला देंगे.
Google Shopping
Google Shopping भी कीमतों की तुलना करने का शानदार ऑप्शन है. इसमें किसी प्रोडक्ट को सर्च करने पर कई ऑनलाइन स्टोर्स की कीमतें एक साथ दिखाई देती हैं. इससे आपको ये समझने में आसानी होती है कि कौन-सा दुकानदार सबसे बेहतर ऑफर दे रहा है.


अलग-अलग वेबसाइट्स की कीमतें देख सकते हैं.
मौजूद ऑफर्स की कंपैरिजन कर सकते हैं.
बेहतर डील चुन सकते हैं.
बिना ज्यादा समय लगाए सही फैसला ले सकते हैं.

BuyHatke
आपको बता दें कि BuyHatke एक ऐसा टूल है जो Amazon और Flipkart जैसे कई वेबसाइट्स की Price History देखने में मदद करता है. इसका ब्राउजर एक्सटेंशन इंस्टॉल करने पर प्रोडक्ट पेज पर ही पुराने दाम दिखाई देने लगते हैं.
अलग-अलग वेबसाइट्स की कीमतों की तुलना.
पुराने प्राइस रिकॉर्ड की जानकारी.
Price Drop होने पर अलर्ट की सुविधा.
बेहतर डील मिलने पर खरीदारी का सही समय चुनने में मदद करना.
अगर एक ही प्रोडक्ट दूसरी वेबसाइट पर सस्ता मिल रहा हो तो ये टूल तुरंत उसकी जानकारी भी दे सकता है.
Keepa
जानकारी के मुताबिक, Keepa उन लोगों के लिए सबसे फेमश टूल्स में से एक है जो Amazon पर खरीदारी करते हैं. ये किसी भी प्रोडक्ट की कई महीनों या सालों की Price History ग्राफ के रूप में दिखाता है.
प्रोडक्ट की सबसे कम कीमत क्या रही है.
मौजूदा कीमत पहले के मुकाबले में कितनी अलग है.
सेल के दौरान कीमत सच में कम हुई है या नहीं.
किस समय खरीदना सबसे ज्यादा फायदेमंद हो सकता है.
अगर किसी प्रोडक्ट की कीमत पहले भी कई बार इससे कम रह चुकी है तो बेहतर होगा कि जल्दबाजी में खरीदारी न करें.
क्यों जरूरी है Discount की सच्चाई जानना

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि हर बड़ी सेल के दौरान लाखों प्रोडक्ट्स पर भारी छूट का दावा किया जाता है. लेकिन कई मामलों में MRP या Selling Price को पहले बढ़ाया जाता है और बाद में Discount दिखाकर ग्राहकों को डिस्काउंट दिया जाता है. इसलिए प्रोडक्ट पर कितने प्रतिशत डिस्काउंट है सिर्फ ये देखकर खरीददारी नहीं करनी चाहिए. अगर आपको पिछले कुछ महीनों की कीमत पता हो तो आप आसानी से समझ सकते हैं कि ऑफर असल में अच्छा है या नहीं.
इन बातों पर भी दें ध्यान
आपको बता दें कि कई बार कम कीमत दिखने के बावजूद खरीदारी फायदे का सौदा नहीं होता है. इसलिए ऑनलाइन शॉपिंग के दौरान आपको कुछ चीजों का ध्यान रखना पड़ता है.
प्रोडक्ट की रेटिंग और रिव्यू पढ़ें.
Seller कितना अच्छा है उसे चेक करें.
Return और Replacement Policy समझें.
बैंक ऑफर और Coupon की शर्तें पढ़ें.
डिलीवरी चार्ज और दूसरी फीस को चेक करें.
कई बार सस्ता दिखने वाला प्रोडक्ट एक्सट्रा चार्ज जुड़ने के बाद उतना किफायती नहीं रह जाता है.
ये है शॉपिंग का सही तरीका
ऑनलाइन सेल में मिलने वाला हर Discount असली हो ये जरूरी नहीं है. इसलिए खरीदारी से पहले Price History और अलग-अलग वेबसाइट्स की कीमतों की तुलना जरूर करें. Keepa, BuyHatke और Google Shopping जैसे टूल्स कुछ ही मिनटों में आपको बता सकते हैं कि सामने दिख रहा ऑफर असल में है या नहीं.
अगर आप हर बड़ी सेल में इन टूल्स का इस्तेमाल करने की आदत बना लेंगे तो न सिर्फ फर्जी Discount से बच सकते हैं बल्कि सही समय पर सही कीमत में खरीदारी करके अच्छी-खासी बचत भी कर सकते हैं.
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        <pubDate>Tue, 04 Aug 2026 23:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>YouTube Channel Start Guide:कैसे करें यूट्यूब पर अपने चैनल की शुरुआत? कितने वॉचिंग आवर हैं जरूरी</title>
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        <description><![CDATA[ YouTube Channel Start Guide: यूट्यूब पार्टनर प्रोग्राम में हाल ही में हुए बदलावों ने लाखों कंटेंट क्रिएटर्स के बीच हलचल मचा दी है. दरअसल कंपनी ने ऐ आई&amp;nbsp; जनरेटेड और कम मेहनत वाले वीडियोज को लेकर नई सख्त पॉलिसी लागू कर दी है, जिसके बाद यह सवाल फिर से जोर पकड़ने लगा है, आखिर एक नया यूट्यूब चैनल शुरू कैसे करें, और मोनेटाइजेशन के लिए कितने वॉच आवर और सब्सक्राइबर जरूरी हैं. अगर आप भी घर बैठे कमाई का यह जरिया अपनाने की सोच रहे हैं, तो शुरुआत से पहले पूरी जानकारी होना बेहद जरूरी है.
पहला कदम तय करें&amp;nbsp;
चैनल शुरू करने से पहले सबसे जरूरी है यह तय करना कि आप किस विषय पर कंटेंट बनाएंगे, चाहे वो एजुकेशन हो, कुकिंग हो, टेक रिव्यू हो या व्लॉगिंग. एक साफ निच चुनने से आपके दर्शक भी तय होते हैं और कंटेंट में दिलचस्पी&amp;nbsp; बनी रहती है, जो शुरुआती दिनों में सबसे बड़ी चुनौती होती है.
अकाउंट बनाना फिर वीडियो अपलोड करना
गूगल अकाउंट से यूट्यूब चैनल बनाना बेहद आसान है, बस कुछ मिनटों का काम है. चैनल का नाम, प्रोफाइल फोटो और बैनर सेट करने के बाद आप अपना पहला वीडियो अपलोड कर सकते हैं. शुरुआत में वीडियो की क्वालिटी से ज्यादा जरूरी है नियमितता, यानी लगातार और तय समय पर कंटेंट डालते रहना.
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जान लें यह हैं शर्तें मोनेटाइजेशनके लिए
अब बात आती है सबसे बड़े सवाल की, कमाई कब शुरू होगी. यूट्यूब पार्टनर प्रोग्राम में शामिल होने के लिए दो मुख्य रास्ते हैं. पहला, चैनल पर कम से कम 1,000 सब्सक्राइबर हों और पिछले 12 महीनों में 4,000 घंटे का पब्लिक वॉच टाइम पूरा हो चुका हो. दूसरा ऑप्शन&amp;nbsp; उन क्रिएटर्स के लिए है जो शॉर्ट्स बनाते हैं, इसमें पिछले 90 दिनों में शॉर्ट्स पर 1 करोड़ यानी 10 मिलियन व्यूज होने चाहिए, साथ ही 1,000 सब्सक्राइबर भी जरूरी हैं.
नियमों का पालन करना भी जरूरी
यह ध्यान रखना जरूरी है कि सिर्फ वॉच टाइम या सब्सक्राइबर पूरे कर लेना ही काफी नहीं. चैनल को यूट्यूब की कम्युनिटी गाइडलाइंस और मोनेटाइजेशन पॉलिसी का पूरी तरह पालन करना होगा. हाल ही में यूट्यूब ने ऐ आई जनरेटेड और कम मेहनत वाले, दोहराए गए कंटेंट को लेकर भी नए नियम सख्त किए हैं, इसलिए ओरिजिनल और वैल्यू देने वाला कंटेंट बनाना पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो गया है.
यह गलतियां कभी न करें
नए क्रिएटर्स अक्सर जल्दी कमाई की उम्मीद में क्वालिटी से समझौता कर बैठते हैं, या दूसरों का कंटेंट बिना बदलाव के दोबारा अपलोड कर देते हैं, जो यूट्यूब की पॉलिसी के खिलाफ है ,और चैनल को नुकसान पहुंचा सकता है. सब्र बनाए रखना, ऑडियंस के कमेंट्स का जवाब देना और नियमित अपलोड शेड्यूल बनाए रखना, यही तीन आदतें शुरुआती दौर में सबसे ज्यादा मायने रखती हैं.
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        <pubDate>Tue, 04 Aug 2026 23:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>Jio का नया धमाका! अब एक सब्सक्रिप्शन में मिलेंगे इतने सारे बेनिफिट्स</title>
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        <description><![CDATA[ Jio New Plan: देश की प्रमुख टेलीकाम कंपनी रिलायंस जियो अपने यूजर्स के लिए नए-नए प्लान पेश करती रहती है जिससे उन्हें कई सारे बेनिफिट्स मिल जाते हैं. हालांकि, हाल ही में टेलीकाम कंपनियों ने अपने रिचार्ज प्लान्स को बढ़ाया था जिससे यूजर्स में नाराजगी देखी गई थी. इसी को देखते हुए अब रिलायंस ने अपने यूजर्स के लिए एक नया रिचार्ज प्लान पेश किया है. बता दें कि इस प्लान में यूजर्स को एक ही सब्सक्रिप्शन प्लान में कई सारे बेनिफिट्स मिल जाएंगे. आइए जानते हैं प्लान की सारी जानकारी.
पहला 3-इन-1 प्लान
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ये जियो का पहला 3-इन-1 पैक है जिसकी कीमत कंपनी ने 2,122 रुपये रखी है. इसके अलावा इस प्लान की वैलिडिटी 3 महीने की है. इस हिसाब से देखा जाए तो यूजर को एक महीने का खर्च करीब 707 रुपये पड़ेगा.
क्या मिलते हैं बेनिफिट्स
अब आपको इस प्लान में मिलने वाले बेनिफिट्स के बारे में बताएं तो इसमें यूजर्स को 100Mbps तक की ब्रॉडबैंड स्पीड मिल जाएगी. इसके अलावा इसमें 1,000 से ज्यादा लाइव टीवी चैनलों का एक्सेस भी दिया गया है. इतना ही नहीं, इस प्लान में यूजर्स को 12 फेमश OTT प्लेटफॉर्म्स की मेंबिरशिप भी दी जा रही है जिससे उन्हें फुल ऑन मनोरंजन मिलेगा.

इसके अलावा कंपनी ने दूसरा 3-इन-1 प्लान भी पेश किया है जिसकी कीमत 2,222 रुपये रखी गई है. इस प्लान की वैलिडिटी 4 महीने की है. हालांकि इस प्लान में यूजर्स को इंटरनेट स्पीड 30Mbps तक ही मिलती है लेकिन बाकी बेनिफिट्स पहले प्लान जैसी ही हैं.
बता दें कि इस प्लान में यूजर्स को 30Mbps ब्रॉडबैंड स्पीड, 1,000 से ज्यादा लाइव टीवी चैनल, 12 OTT प्लेटफॉर्म्स का एक्सेस दिया जा रहा है. अगर आपके घर में इंटरनेट का इस्तेमाल नॉर्मल ब्राउजिंग, वीडियो स्ट्रीमिंग और ऑनलाइन क्लास जैसी जरूरतों तक सीमित है तो ये प्लान बजट के लिहाज से अच्छा ऑप्शन हो सकता है.
एक ही प्लान में मिलेगा सब कुछ
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, जियो ने मार्केट में नया 3-इन-1 प्लान पेश किया है. ये प्लान उन परिवारों के लिए तैयार किया गया है जो घर पर इंटरनेट, लाइव टीवी और ऑनलाइन एंटरटेनमेंट का पूरा एक्सपीरिएंस चाहते हैं. आपको बता दें कि यूजर्स को इन प्लान्स में ब्रॉडबैंड कनेक्शन, 1,000 से ज्यादा लाइव टीवी चैनल और 12 OTT प्लेटफॉर्म्स की मेंबरशिप एक साथ दी जा रही है. इससे यूजर्स को अब अलग-अलग रिचार्ज बिल भरने की झंझट से छुटकारा मिल जाएगा और अब सभी सब्सक्रिप्शन के लिए यूजर को एक बार ही रिचार्ज करना पड़ेगा.
सिर्फ टीवी देखने वालों के लिए भी नया प्लान
जानकारी के लिए बता दें कि जियो ने उन यूजर्स के लिए भी एक प्लान पेश किया है जो सिर्फ टीवी देखना पसंद करते हैं. इस प्लान की कीमत 2,000 रुपये है. इस प्लान की वैलिडिटी 5 महीने की है. इस प्लान में यूजर्स को कई बेनिफिट्स मिलते हैं. बता दें कि इसमें 1,000 से ज्यादा लाइव टीवी चैनल, 200 से ज्यादा HD चैनल, 15 क्षेत्रीय भाषाओं के चैनलों का सपोर्ट भी दिया गया है.

इसके अलावा कंपनी ने 1,000 रुपये का दो महीने वाला टीवी प्लान भी पेश किया है. हालांकि इस प्लान को लेने पर ग्राहकों को 200 रुपये इंस्टॉलेशन चार्ज को अलग से देना पड़ेगा.
Wi-Fi यूजर्स के लिए भी नया प्लान
अगर आपको केवल इंटरनेट कनेक्शन चाहिए और टीवी या OTT सर्विस की जरूरत नहीं है तो जियो ने नए Wi-Fi प्लान भी लॉन्च किए हैं. इस प्लान की कीमत 2200 रुपये है और इस प्लान की वैलिडिटी 5 महीनों की है. इसके अलावा इस प्लान में यूजर्स को 30Mbps की इंटरनेट स्पीड मिल जाएगी.
Airtel भी देता है यूजर्स को धांसू प्लान
देश की बड़ी टेलीकाम कंपनी एयरटेल भी यूजर्स को ऑल-इन-वन प्लान ऑफर करता है. इस प्लान की कीमत 279 रुपये, 598 रुपये और 1729 रुपये है. बता दें कि 279 रुपये में आपको एक महीने की वैलिडिटी मिल जाती है. वहीं, 598 रुपये में 28 दिन की वैलिडिटी मिलती है और 1729 रुपये में 84 दिन की वैलिडिटी मिल जाती है. इन प्लान्स में यूजर्स को अनलिमिटेड कॉलिंग, हाई-स्पीड इंटरनेट जैसे कई सारे बेनिफिट्स भी देखने को मिल जाते हैं.
किसके लिए कौन-सा प्लान रहेगा बेहतर
अगर आपके परिवार में कई लोग इंटरनेट, लाइव टीवी और OTT प्लेटफॉर्म्स का नियमित इस्तेमाल करते हैं तो जियो का 3-इन-1 प्लान सबसे ज्यादा फायदे का सौदा साबित हो सकता है. वहीं केवल टीवी देखने वाले यूजर्स के लिए TV-Only प्लान बेहतर रहेगा जबकि सिर्फ इंटरनेट पसंद करने वाले यूजर्स के लिए Wi-Fi-Only वाला प्लान ही बेस्ट रहेगा.
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        <pubDate>Tue, 04 Aug 2026 23:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>हर साल नए स्मार्टफोन, लेकिन बैटरी वही पुरानी! जानें क्या है असली वजह</title>
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        <description><![CDATA[ हर साल नए स्मार्टफोन, लेकिन बैटरी वही पुरानी! जानें क्या है असली वजह ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 04 Aug 2026 23:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>बार&amp;बार आने वाले बिजनेस मैसेज से मिलेगी राहत! WhatsApp ला रहा नया सिस्टम</title>
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        <description><![CDATA[ WhatsApp New Feature: व्हाट्सऐप आज के समय में काफी ज्यादा इस्तेमाल होने वाला मैसेजिंग ऐप बन चुका है. इसके साथ ही मेटा ने अपने यूजर्स के एक्सपीरिएंस को बेहतर बनाने के लिए एक नया फीचर जोड़ने का फैसला लिया है. जी हां, दरअसल, मेटा एक नया फीचर देने वाली है जिसकी मदद से व्हाट्सऐप पर बार-बार आने वाले बिजनेस मैसेज एक अलग फोल्डर में चले जाएंगे. इससे रोजमर्रा की बातचीत और ऑफर, डिलीवरी अपडेट या बैंकिंग नोटिफिकेशन जैसी जानकारियों को अलग-अलग मैनेज करना आसान हो जाएगा.
WhatsApp में आने वाला है नया बदलाव
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, WhatsApp जल्द ही ऐसा फीचर ला सकता है जो बड़े बिजनेस अकाउंट्स से आने वाले मैसेज को अपने आप एक अलग Offers &amp;amp; Updates फोल्डर में भेज देगा. फिलहाल इस फीचर की टेस्टिंग चुनिंदा कंपनियों के साथ की जा रही है. इसका मकसद यूजर्स की मेन चैट लिस्ट को फालतू के मैसेज से भरने से बचाना है. अगर ये फीचर सभी यूजर्स के लिए जारी होता है तो पर्सनल चैट और बिजनेस मैसेज अलग-अलग दिखाई देंगे. इससे जरूरी बातचीत ढूंढना पहले से ज्यादा आसान हो जाएगा.

कौन-कौन से मैसेज होंगे शिफ्ट
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इस नए फोल्डर में बिजनेस से जुड़े मैसेज भेजे जाएंगे.
ऑनलाइन ऑर्डर की डिलीवरी अपडेट

बैंक या सर्विस नोटिफिकेशन
डिस्काउंट ऑफर और प्रमोशनल मैसेज
कूपन और कैशबैक जानकारी
बुकिंग या ऑर्डर स्टेटस अपडेट

इससे आपकी पर्सनल बातचीत और काम से जुड़े मैसेज एक-दूसरे से अलग रहेंगे और चैट लिस्ट पहले के मुकाबले ज्यादा मैनेज्ड दिखाई देगी.
बड़े बिजनेस के मैसेज होंगे अलग
रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये फीचर फिलहाल सिर्फ उन बड़े बिजनेस अकाउंट्स पर लागू होगा जो WhatsApp Business Platform का इस्तेमाल करते हैं. इनमें बैंक, एयरलाइन, ई-कॉमर्स कंपनियां, बड़े रिटेल स्टोर और दूसरे बड़े एंटरप्राइज शामिल हैं.
शुरुआत में ऐसे मैसेज आपकी नॉर्मल चैट लिस्ट में दिखाई देंगे लेकिन कुछ समय बाद WhatsApp उन्हें अपने आप Offers &amp;amp; Updates फोल्डर में शिफ्ट कर देगा. कंपनी फिलहाल अलग-अलग टाइम पीरियड की टेस्टिंग कर रही है जो कुछ घंटों से लेकर लगभग 24 घंटे तक हो सकती है.
यूजर्स के पास रहेगा कंट्रोल
बता दें कि WhatsApp इस फीचर को पूरी तरह अनिवार्य नहीं बनाना चाहता है. अगर कोई यूजर चाहता है कि सभी बिजनेस मैसेज पहले की तरह मेन चैट लिस्ट में ही दिखाई दें तो वह इस फीचर को बंद भी कर सकता है.
हालांकि, यूजर ये तय नहीं कर पाएंगे कि मैसेज कितनी देर बाद नए फोल्डर में जाएं. ये समय सीमा WhatsApp ही तय करेगा और टेस्टिंग के दौरान इसमें बदलाव भी हो सकते हैं.
छोटे बिजनेस अभी नहीं होंगे शामिल
जानकारी के अनुसार, फिलहाल ये फीचर केवल बड़े बिजनेस अकाउंट्स तक ही सीमित रहेंगे. अभी इसे छोटे दुकानदार, लोकल बिजनेस या नॉर्मल WhatsApp Business ऐप इस्तेमाल करने वाले अकाउंट्स को शामिल नहीं किया गया है. हालांकि, अगर ये फीचर सफल रहता है तो आने वाले समय में Meta इसे छोटे कारोबारियों के लिए भी उपलब्ध करा सकता है.
Meta क्यों कर रहा है ये बदलाव
दरअसल, पिछले कुछ सालों में WhatsApp केवल मैसेजिंग ऐप नहीं रहा है बल्कि ये एक बिजनेस, ऑनलाइन शॉपिंग, बैंकिंग और कस्टमर सर्विस का भी बड़ा प्लेटफॉर्म बन चुका है. लाखों कंपनियां ग्राहकों को ऑर्डर अपडेट, ऑफर और सपोर्ट देने के लिए WhatsApp का इस्तेमाल कर रही हैं.
इसी वजह से कई यूजर्स की चैट लिस्ट में बिजनेस मैसेज की लिस्ट लगातार बढ़ रही है. Meta का मानना है कि अगर इन मैसेज को अलग रखा जाए तो लोगों को अपनी पर्सनल चैट्स सर्च करने में आसानी होगी और ऐप का एक्सपीरिएंस भी बेहतर बनेगा.
क्या होगा यूजर्स को फायदा
आपको बता दें कि अगर ये फीचर सभी यूजर्स के लिए जारी किया जाता है तो WhatsApp की मेन चैट लिस्ट पहले से ज्यादा साफ और मैनेज्ड दिखाई देगी. पर्सनल चैट्स, परिवार और दोस्तों के मैसेज आसानी से मिलेंगे जबकि ऑफर, बैंकिंग अलर्ट और डिलीवरी अपडेट अलग फोल्डर में सेफ रहेंगे. इससे जरूरी बिजनेस जानकारी भी नहीं खोएगी और रोजमर्रा की चैट का एक्सपीरिएंस भी बेहतर हो जाएगा.
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        <pubDate>Tue, 04 Aug 2026 07:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>कितनी धूप में सबसे ज्यादा बिजली बनाते हैं सोलर पैनल? जानें हिसाब</title>
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        <description><![CDATA[ कितनी धूप में सबसे ज्यादा बिजली बनाते हैं सोलर पैनल? जानें हिसाब ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 04 Aug 2026 07:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>Meta, X और YouTube कंटेंट हटाने का फैसला कैसे लेते हैं, क्या है पॉलिसी?</title>
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        <description><![CDATA[ Social Media Content Moderation Policy: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर बीते दिनों एक बड़ी खबर आई. पीएम मोदी के एक पोस्ट को मेटा ने फेसबुक से हटा दिया था, जिसके बाद आपत्ति दर्ज कराई गई. मेटा ने अपनी भूल मानते हुए उस वीडियो को फिर से बहाल कर दिया. हालांकि, मामला तब तक तूल पकड़ चुका था.&amp;nbsp;
इस घटना के बाद से ही फेसबुक, एक्स और यूट्यूब जैसे सोशल मीडिया पर प्लेटफॉर्म की कंटेंट मॉडरेशन पॉलिसी चर्चा में बनी हुई है. लोगों के मन में सवाल खड़े हो रहे हैं कि आखिर ये सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म किसी कंटेंट या पोस्ट को हटाने का फैसला कैसे लेते हैं? यह पूरा सिस्टम कैसे काम करता है और इसकी पॉलिसी क्या है? चलिए जानते हैं... &amp;nbsp;
Meta, Facebook और Instagram की पॉलिसी
मेटा अपने प्लेटफॉर्म्स को सुरक्षित रखने के लिए कम्युनिटी स्टैंडर्ड्स का पालन करता है. मेटा के पास कंटेंट की निगरानी करने का एक बहुत बड़ा ढांचा है. मेटा पर अपलोड होने वाले लगभग 90% से ज्यादा आपत्तिजनक कंटेंट को इंसानों के देखने से पहले ही एआई टूल्स पकड़ लेते हैं. यह सिस्टम न्यूडिटी, हिंसा और आतंकी गतिविधियों से जुड़े कंटेंट को तुरंत ब्लॉक कर देता है. एआई के बाद यह पहुंचता है इंसानी टीम के पास. मेटा के पास दुनिया भर में हजारों ऐसे लोग हैं जो अलग-अलग भाषाओं को जानकारी रखते हैं. जब एआई किसी पोस्ट पर पूरी तरह फैसला नहीं ले पाता, तो यह टीम उसे देखकर तय करती है कि पोस्ट रहेगी या हटेगी. साथ ही अगर आपको कोई पोस्ट गलत लगती है, तो आप उसे रिपोर्ट कर सकते हैं. ज्यादा रिपोर्ट आने पर मेटा उस कंटेंट की दोबारा जांच करता है.&amp;nbsp;
X की पॉलिसी
एलन मस्क के आने के बाद X की नीतियों में काफी बदलाव आया है. X खुद को फ्री स्पीच यानी अभिव्यक्ति की आजादी का मंच कहता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वहां कुछ भी पोस्ट किया जा सकता है. X भी अपनी एक पॉलिसी के तहत काम करता है. जैसे कि X पर किसी की निजी जानकारी डालना, बिना मर्जी के किसी की तस्वीर पोस्ट करना या किसी को सीधे तौर पर धमकी देना पूरी तरह बैन है. ऐसा करने पर X तुरंत पोस्ट को हटा देता है. X ने गलत जानकारी को रोकने के लिए एक नया तरीका अपनाया है. अगर कोई पोस्ट भ्रामक है, तो आम यूजर्स ही उस पर फैक्ट-चेक का नोट जोड़ देते हैं. इससे कंटेंट हटता तो नहीं है, लेकिन लोगों को उसकी सच्चाई पता चल जाती है.&amp;nbsp;
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YouTube की पॉलिसी
यूट्यूब एक वीडियो प्लेटफॉर्म होने के कारण इसकी नीतियां और भी सख्त है. यूट्यूब पर आप किसी दूसरे का वीडियो या गाना बिना उसकी इजाजत के इस्तेमाल नहीं कर सकते. अगर आप ऐसा करते हैं, तो असली मालिक की शिकायत पर यूट्यूब आपके वीडियो को तुरंत हटा देता है. साथ ही अगर किसी वीडियो से बच्चों को नुकसान पहुंचने की आशंका हो, तो यूट्यूब उसे बिना किसी चेतावनी के हटा देता है. यूट्यूब कभी भी सीधे चैनल बंद नहीं करता. पहली बार गलती होने पर सिर्फ चेतावनी मिलती है. इसके बाद 90 दिनों के भीतर 3 स्ट्राइक आने पर चैनल को हमेशा के लिए डिलीट कर दिया जाता है.
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        <pubDate>Tue, 04 Aug 2026 07:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>क्या है USB Tethering? एक सेटिंग से सुपरफास्ट बन जाता है इंटरनेट</title>
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        <description><![CDATA[ USB Tethering: डिजिटल दुनिया में स्मार्टफोन के साथ-साथ इंटरनेट भी लोगों की जरूरत बन चुके हैं. अब लोग इंटरनेट के जरिए कई सारे काम ऑनलाइन ही कर लेते हैं जिससे उनका काफी समय भी बच जाता है. इसी के साथ ही अक्सर देखा गया है कि लोग लैपटॉप पर काम करते हैं तो कई बार वाई-फाई आस-पास नहीं होता है तो इसीलिए लोग मोबाइल हॉटस्पॉट का इस्तेमाल करने लगते हैं. लेकिन आपको बता दें कि इसके अलावा लोग USB Tethering की मदद से भी लोग लैपटॉप में आसानी से इंटरनेट चला सकते हैं. आइए जानते हैं क्या है ये टेक्नोलॉजी.
क्या होता है USB Tethering
USB Tethering एक ऐसा फीचर है जिसके जरिए आप USB केबल की मदद से अपने स्मार्टफोन का मोबाइल डेटा सीधे लैपटॉप या कंप्यूटर तक पहुंचा सकते हैं. यानी आपका फोन इंटरनेट का सोर्स बन जाता है और USB केबल के जरिए डेटा ट्रांसफर होता है. इसका सबसे बड़ा फायदा ये है कि इसमें Wi-Fi सिग्नल की जरूरत नहीं पड़ती और इंटरनेट कनेक्शन ज्यादा स्टेबल रहता है.
USB Tethering कैसे काम करता है
आपको बता दें कि जब आप अपने फोन को USB केबल से लैपटॉप से कनेक्ट करते हैं और USB Tethering ऑन करते हैं तो फोन एक नेटवर्क एडॉप्टर की तरह काम करने लगता है. इसके बाद लैपटॉप मोबाइल डेटा का इस्तेमाल उसी तरह करने लगता है जैसे वह किसी ब्रॉडबैंड या Wi-Fi नेटवर्क से कनेक्ट हो. ज्यादातर Android स्मार्टफोन में ये फीचर पहले से मौजूद होता है और इसे कुछ ही सेकंड में ऑन किया जा सकता है.
Android फोन में USB Tethering कैसे ऑन करें
अगर आप भी USB Tethering फीचर को ऑन करना चाहते हैं तो इन आसान सेट्प्स को अपना सकते हैं.

अपने स्मार्टफोन को USB केबल से लैपटॉप से कनेक्ट करें.
फोन की Settings खोलें.
Network &amp;amp; Internet, Connections या Hotspot &amp;amp; Tethering सेक्शन में जाएं.
USB Tethering ऑप्शन सर्च करें.
इस ऑप्शन को On कर दें.

कुछ ही सेकंड में लैपटॉप इंटरनेट से कनेक्ट हो जाएगा.
आपको बता दें कि USB Tethering का ऑप्शन तभी एक्टिव होता है जब फोन USB केबल के जरिए किसी कंप्यूटर से जुड़ा हो.
USB Tethering और Mobile Hotspot में अंतर
आपको बता दें कि इन दोनों का मकसद मोबाइल डेटा शेयर करना ह लेकिन इनके काम करने का तरीका अलग है. USB Tethering में USB केबल की जरूरत होती है. वहीं, Mobile Hotspot वायरलेस तरीके से इंटरनेट शेयर करता है. USB Tethering आमतौर पर ज्यादा स्टेबल और तेज कनेक्शन देता है.

वहीं, Mobile Hotspot से एक साथ कई डिवाइस कनेक्ट हो सकते हैं जबकि USB Tethering एक ही डिवाइस के लिए कारगर माना जाता है. Hotspot में फोन की बैटरी ज्यादा खर्च होती है जबकि USB Tethering के दौरान फोन चार्ज भी हो सकता है.
क्या हैं इसके फायदे
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि USB के जरिए डेटा ट्रांसफर होने से नेटवर्क ज्यादा स्टेबल रहता है. कमजोर Wi-Fi सिग्नल जैसी समस्या नहीं आती. इसके साथ ही Wi-Fi Hotspot लगातार वायरलेस सिग्नल भेजता है जिससे बैटरी तेजी से खत्म होती है.
USB Tethering में फोन लैपटॉप से चार्ज भी होता रहता है इसलिए बैटरी की चिंता कम रहती है. क्योंकि इंटरनेट केवल USB केबल के जरिए शेयर होता है इसलिए कोई दूसरा व्यक्ति आपके नेटवर्क से कनेक्ट नहीं हो सकता. इससे डेटा सुरक्षा भी बेहतर रहती है.
इतना ही नहीं इस फीचर को ऑन करने के लिए किसी एक्सट्रा ऐप या सॉफ्टवेयर की जरूरत नहीं पड़ती है.
इन बातों का जरूर रखें ध्यान
USB Tethering का इस्तेमाल करने से पहले ये जरूर चेक करें कि आपके मोबाइल डेटा प्लान में भरपूर डेटा उपलब्ध हो. अच्छी क्वालिटी की USB केबल का इस्तेमाल करें क्योंकि खराब केबल की वजह से कनेक्शन में दिक्कत आ सकती है. इसके अलावा लैपटॉप में जरूरी USB ड्राइवर सही तरीके से इंस्टॉल होने चाहिए जिससे फोन आसानी से पहचान लिया जाए. इसीलिए आगे से अगर आप भी अपने मोबाइल में ज्यादा तेज और स्टेबल इंटरनेट चाहते हैं तो यूएसबी टीथरिंग का इस्तेमाल कर सकते हैं.
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        <pubDate>Tue, 04 Aug 2026 07:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>Smart Ring का ट्रेंड कहीं न पड़ जाए महंगा! अभी जानें ये 5 नुकसान</title>
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        <pubDate>Tue, 04 Aug 2026 07:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>स्मार्टफोन पर बढ़ा खतरा! जानें कितना सेफ है आपका डेटा, रिपोर्ट में खुलासा</title>
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        <description><![CDATA[ Smartphone Data Privacy: स्मार्टफोन ने लोगों के काम करने के तरीके को काफी हद तक आसान बनाने का काम किया है. लेकिन इसी के साथ ही लोगों की डेटा प्राइवेसी की चिंताएं भी बढ़ी हैं. बढ़ती टेक्नोलॉजी के साथ-साथ साइबर अपराधी भी काफी नए तरीकों से लोगों को ठगने का काम करते हैं. साथ ही साइबर हमले के मामले भी काफी तेज हो चुके हैं जिससे लोगों की प्राइवेसी पर भी खतरा बना रहता है. इसी कड़ी में बता दें कि अगर स्मार्टफोन खो जाए या हैक हो जाए तो सिर्फ एक डिवाइस नहीं बल्कि आपकी पूरी डिजिटल जिंदगी खतरे में पड़ सकती है.
साइबर सिक्योरिटी कंपनी Kaspersky की एशिया-प्रशांत (APAC) सर्वे रिपोर्ट में सामने आया है कि भारत में स्मार्टफोन तेजी से डिजिटल वॉल्ट यानी डिजिटल तिजोरी बनते जा रहे हैं. हालांकि, इनके बढ़ते इस्तेमाल के मुकाबले सुरक्षा के तरीके उतनी तेजी से मजबूत नहीं हो पाए हैं.
इन कारणों से बढ़ रहा खतरा
आपको बता दें कि आज ज्यादातर लोग ऑनलाइन बैंकिंग, UPI, डिजिटल वॉलेट और शॉपिंग के लिए स्मार्टफोन का इस्तेमाल करते हैं. ऐसे में फोन में बैंक से जुड़ी जानकारी भी सेव रहती हैं. रिपोर्ट बताती है कि करीब 38 प्रतिशत भारतीय यूजर्स अपने फोन में बैंकिंग डिटेल्स रखते हैं जबकि 34 प्रतिशत लोग पासवर्ड या लॉगिन क्रेडेंशियल भी मोबाइल में सेव कर लेते हैं. यही वजह है कि साइबर अपराधी अब स्मार्टफोन को हमला करने के लिए सबसे आसान निशाना मान रहे हैं.

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, भारत में Rewardsteal और Thamera जैसे मालवेयर नकली कैशबैक, इनाम और ऑफर देने वाले ऐप्स के जरिए लोगों को फंसाने की कोशिश कर रहे हैं. कई यूजर्स बिना सोचे-समझे ऐप्स को जरूरी परमिशन दे देते हैं जिससे उनका डेटा खतरे में पड़ जाता है.
देश में सबसे बड़ा साथी स्मार्टफोन
रिपोर्ट के मुताबिक भारत के लगभग 60 प्रतिशत लोग इंटरनेट इस्तेमाल करने के लिए सबसे ज्यादा स्मार्टफोन पर निर्भर हैं. बता दें कि पहले लोग जानकारियों को लैपटॉप, फाइल या डायरी में रखते थे. लेकिन स्मार्टफोन के जमाने में लोग अब अपनी ज्यादातर जानकारी डिवाइस में ही सेव करके रखते हैं. सर्वे के अनुसार भारतीय यूजर्स अपने स्मार्टफोन में बहुत ज्यादा प्राइवेट जानकारी स्टोर करके रखते हैं जिससे उब डेटा लीक का खतरा काफी बढ़ गया है.
ऑफिस का काम भी अब मोबाइल पर
बताते चलें कि स्मार्टफोन अब सिर्फ पर्सनल यूज तक ही सीमित नहीं रह गया है. लोग अब इसे ऑफिस काम के लिए भी काफी इस्तेमाल कर रहे हैं. लोग अपने मोबाइल से ऑफिस ईमेल पढ़ते हैं, फाइलें एक्सेस करते हैं और कंपनी के सिस्टम में लॉगिन करते हैं.
रिपोर्ट के मुताबिक लगभग 48 प्रतिशत भारतीय यूजर्स अपने फोन में ऑफिस ईमेल रखते हैं जबकि 27 प्रतिशत लोग सीधे मोबाइल से ऑफिस नेटवर्क का इस्तेमाल करते हैं. ऐसे में अगर फोन हैक हो जाए तो पर्सनल डेटा के साथ-साथ कंपनी की प्राइवेट जानकारी भी लीक हो सकती है.
सोशल मीडिया भी बढ़ा रहे जोखिम
दरअसल, स्मार्टफोन में केवल जरूरी डॉक्यूमेंट्स ही नहीं बल्कि सोशल मीडिया अकाउंट, चैट हिस्ट्री, म्यूजिक, फिल्में, ई-बुक्स और गेमिंग अकाउंट भी मौजूद रहते हैं. यानी एक ही डिवाइस में यूजर की आर्थिक, सामाजिक, नौकरी और पर्सनल जिंदगी से जुड़ी लगभग हर जानकारी मौजूद होती है. यही कारण है कि साइबर अपराधियों के लिए स्मार्टफोन सबसे आसान टार्गेट बन चुका है.

कैसे रखें अपने स्मार्टफोन को सुरक्षित
वैसे तो ज्यादातर स्मार्टफोन आज के समय में डिजिटल वॉल्ट बन चुके हैं. लेकिन फिर भी आप कुछ जरूरी चीजों का ध्यान में रखकर अपने फोन को सुरक्षित कर सकते हैं.

केवल आधिकारिक ऐप स्टोर से ही ऐप डाउनलोड करें.
किसी भी ऐप को बिना जरूरत एक्सट्रा परमिशन न दें.
पासवर्ड और बैंकिंग जानकारी सुरक्षित पासवर्ड मैनेजर में रखें.
फोन का समय-समय पर बैकअप लेते रहें.
स्क्रीन लॉक, बायोमेट्रिक सेफ्टी और Find My Device जैसे फीचर हमेशा ऑन रखें.
भरोसेमंद मोबाइल सिक्योरिटी ऐप का इस्तेमाल करें और फोन को समय-समय पर अपडेट करते रहें.

स्मार्टफोन अब सिर्फ एक गैजेट नहीं बल्कि हमारी पूरी डिजिटल पहचान का सेंटर बन चुका है. इसमें बैंक से जुड़ी जानकारी, पहचान पत्र, ऑफिस डेटा, पर्सनल मूमेंट्स और AI चैट्स तक सुरक्षित रहती हैं. इसलिए मोबाइल सेफ्टी को हल्के में लेना लोगों के लिए एक बड़ी गलती साबित हो सकती है.
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        <pubDate>Mon, 03 Aug 2026 15:30:19 +0530</pubDate>
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        <title>बीते हफ्ते एआई की दुनिया में क्या&amp;क्या हुआ? यहां जानें अपडेट</title>
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        <description><![CDATA[ AI Round Up: इस समय दुनियाभर में एआई को लेकर जितनी चर्चा हो रही है, उतनी शायद ही किसी और टॉपिक पर चल रही है. एआई इतनी तेजी से आगे बढ़ रही है कि हर दिन इससे जुड़ी जानकारी और अपडेट्स सामने आ रही हैं. कंपनियां एक के बाद एक नए एआई मॉडल लॉन्च कर रही हैं. दूसरी तरफ नए मार्केट ट्रेंड्स, एक्सपर्ट ओपिनियन और टेक लीडर्स के स्टेटमेंट लगातार सामने आ रहे हैं. हालिया दिनों में ओपनएआई और एंंथ्रोपिक के एआई मॉडल्स ने नई साइबर सिक्योरिटी चिंताओं को जन्म दिया है. आज के एआई राउंड-अप में हम जानेंगे कि बीते हफ्ते इस फील्ड में क्या-क्या हुआ है.&amp;nbsp;
Opus 5 की लॉन्चिंग
हालिया समय के बड़े लॉन्च को देखें तो एंथ्रोपिक ने 24 जुलाई को अपना Opus 5 मॉडल लॉन्च किया था. यह कंपनी के Fable 5 मॉडल से छोटा है, लेकिन यह यूजर्स को सस्ता भी पड़ेगा और इसमें रेस्ट्रिक्शंस भी कम हैं. इसके बावजूद इसने कई बेंचमार्क में Fable को पीछे छोड़ दिया है. इससे पहले कंपनी ने मई के आखिर में Opus 4.8 मॉडल को लॉन्च किया था. जून में एंथ्रोपिक माइथोस 5, फेबल 5 और सोनेट 5 को लॉन्च कर चुकी है.
Seedance 2.5 अब बनाएगा 30 सेकंड का वीडियो
टिकटॉक की पैरेंट कंपनी ByteDance ने अपने एडवांस्ड एआई वीडियो जनरेशन मॉडल Seedance 2.5 को रोल आउट किया है. यह Seedance 2.0 के मुकाबले बड़े अपग्रेड्स के साथ आया है. फरवरी में लॉन्च हुआ Seedance 2.0 एक प्रॉम्प्ट में केवल 12 रेफरेंस मैटेरियल ले सकता था, वहीं नए मॉडल में एक प्रॉम्प्ट में 30 इमेज, 10 वीडियो क्लिप और 10 ऑडियो को रेफरेंस कंटेट के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है. इनकी मदद से नया मॉडल 30 सेकंड तक का वीडियो जनरेट कर सकता है.
चाइनीज एआई मॉडल को लेकर पैनिक की स्थिति
चाइनीज कंपनी Moonshot AI के Kimi K3 मॉडल की लॉन्चिंग ने अमेरिकी कंपनियों के लिए पैनिक की स्थिति पैदा कर दी है. Moonshot ने कहा कि यह कि Claude Fable 5 और GPT 5.6 Sol जैसे प्रोपराइटरी मॉडल्स से पीछे है, लेकिन इसने टेस्टिंग के दौरान फ्रंटियर लेवल की परफॉर्मेंस दिखाई है. इंडिपेंडेट एनालिसिस में भी पता चला है कि यह चाइनीज ओपन सोर्स मॉडल अमेरिकी कंपनियों के फ्लैगशिप फ्रंटियर मॉडल्स को आसानी से टक्कर दे सकता है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, चाइनीज मॉडल्स ने अमेरिकी कंपनियों में भी हलचल पैदा कर दी है. ओपनएआई और एंथ्रोपिक ने अमेरिका के रेगुलेटर से चाइनीज एआई मॉडल्स के खिलाफ लॉबिंग की है.
गूगल पर एआई सर्च बन रहा डिफॉल्ट मोड
गूगल पर एआई सर्च डिफॉल्ट मोड बनता जा रहा है. ताजा डेटा से पता चला है कि अब 43 प्रतिशत सर्चेज में गूगल का एआई ओवरव्यू नजर आने लगा है, जबकि पहले यह संख्या 15 प्रतिशत थी. सर्च रिजल्ट के ऊपर एक एआई लेयर के तौर पर शुरू हुआ यह मोड अब सर्च का जरूरी हिस्सा बन गया है. पिछले साल जून में एआई मोड पर विजिट की संख्या 126 मिलियन थी, जो इस साल मई में बढ़कर 279 मिलियन हो गई है.&amp;nbsp;
अगले 5 वर्षों में अरबों लोगों के पास होगा अपना एआई एजेंट- जुकरबर्ग
मेटा के सीईओ मार्क जुकरबर्ग का कहना है कि अगले पांच वर्षों में करीब एक अरब लोगों के पास अपने एआई एजेंट्स होंगे. उन्होंने कहा कि ये एआई एजेंट्स यूजर्स को जरूरतों को समझ सकेंगे और हर समय काम करेंगे. लोग हेल्थ, रिलेशनशिप और फाइनेंस मैनेजमेंट जैसे कामों में इनका इस्तेमाल कर पाएंगे. इस दौरान मेटा सीईओ ने यह भी बताया कि कंपनी ऐप्स को जल्दी बनाने और लॉन्च करने के लिए एआई की मदद ले रही है. प्रोडक्ट टीम के लिए एआई से ऐप्स को बनाना आसान हो गया है.
क्या काबू से बाहर हो रहे हैं एआई मॉडल?
OpenAI के बाद अब एंथ्रोपिक के एआई मॉडल के काबू से बाहर होने की घटना सामने आई है. कंपनी ने बताया कि इंटरनल इन्वेस्टिगेशन के दौरान पता चला है कि उसके एआई मॉडल Claude ने साइबर सिक्योरिटी टेस्ट के दौरान तीन कंपनियों के सिस्टम को ब्रीच किया है. इन तीनों ही घटनाओं में Claude मॉडल ने कंपनियों के लाइव सिस्टम की अनऑथोराइज्ड एक्सेस ले ली थी. इससे पहले ओपनएआई के सिस्टम ने हगिंग फेस के सिस्टम को ब्रीच किया था.
सिरी एआई के लिए देना पड़ सकता है पैसा
ऐप्पल सीईओ टिम कुक ने अपनी आखिरी अर्निंग कॉल में कहा है कि सिरी एआई अपग्रेड पेवॉल लिमिट के साथ आ सकती है. इसका मतलब है कि अपग्रेड के सारे फीचर्स यूज करने के लिए यूजर्स को पैसा चुकाना पड़ सकता है. ऐसे भी कयास हैं कि कंपनी सिरी एआई की फुल एक्सेस को iCloud+ सब्सक्रिप्शन में इंटीग्रेट कर सकती है.
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        <pubDate>Mon, 03 Aug 2026 15:30:18 +0530</pubDate>
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        <title>Apple Maps, Google Maps या Waze? कार चलाने वालों के लिए कौन है सबसे बेस्ट</title>
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        <description><![CDATA[ Apple Maps Vs Google Maps Vs Waze: आज के समय में नेविगेशन ऐप्स का काफी ज्यादा इस्तेमाल होने लगा है. खासतौर पर जब लोग ट्रैवल करते हैं या कार चलाते हैं तो रास्ता खोजने के लिए ज्यादातर लोग नेविगेशन ऐप का ही इस्तेमाल करते हैं. अब अगर आपकी कार में Apple CarPlay सपोर्ट करता है तो आपके सामने कई सारे ऑप्शन मौजूद हैं जिसमें Apple Maps, Google Maps और Waze शामिल हैं. आइए जानते हैं कि कार चलाने वालों के लिए इन तीनों में से कौन सा नेविगेशन ऐप ज्यादा बेहतर माना जा रहा है.
Apple Maps
जानकारी के मुताबिक, पिछले कुछ सालों में Apple Maps में काफी सुधार हुआ है. अब ये पहले के मुकाबले ज्यादा सटीक नेविगेशन और बेहतर विजुअल इंटरफेस उपलब्ध करता है.
इसकी खास बात ये है कि ये Apple के दूसरे डिवाइस जैसे iPhone और Apple Watch के साथ बेहतरीन तरीके से काम करता है. इसके अलावा आपको इसमें एक फीचर भी मिलता है जिसके तहत अगर आप किसी को अपनी मंजिल तक पहुंचने का अनुमानित समय (ETA) भेजना चाहते हैं तो वो भी भेज सकते हैं. Apple Maps पार्किंग लोकेशन याद रखने और अलग-अलग Apple डिवाइस के बीच रूट सिंक करने जैसे फीचर्स भी देता है.
हालांकि इसमें ऑफलाइन मैप का ऑप्शन मौजूद है लेकिन इसके लिए पहले iPhone से सेटअप करना पड़ता है. इसके अलावा Google Maps की तुलना में इसमें रूट कस्टमाइजेशन के ऑप्शन कम मिलते हैं.
Waze
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अगर आपको सड़क की हर छोटी-बड़ी जानकारी तुरंत चाहिए तो Waze आपके लिए एक बेहतरीन ऑप्शन हो सकता है. ये ऐप अपने यूजर्स द्वारा शेयर की गई जानकारी के आधार पर ट्रैफिक, एक्सीडेंट, रोड ब्लॉक, पुलिस चेकिंग और दूसरी रुकावटों की लाइव जानकारी देता है. इससे ड्राइवर समय रहते अपना रास्ता बदल सकते हैं.
Waze का इंटरफेस भी काफी अलग है. इसमें आप अपनी पसंद के अनुसार आवाज, थीम और अवतार बदल सकते हैं जिससे नेविगेशन का एक्सपीरिएंस ज्यादा मजेदार बन जाता है.
ये ऐप आपकी ड्राइविंग आदतों को समझकर भविष्य में ETA यानी पहुंचने के अनुमानित समय को और ज्यादा सटीक बनाने की कोशिश करता है.
हालांकि इसकी सबसे बड़ी कमी ये है कि इसकी कई जानकारियां यूजर्स द्वारा भेजे गए अपडेट पर निर्भर करती हैं. ऐसे में जहां Waze का इस्तेमाल कम होता है, वहां इसकी जानकारी हमेशा पूरी तरह सटीक नहीं होती.
Google Maps
आपको बता दें कि Google Maps दुनिया के सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले नेविगेशन ऐप्स में से एक है. ये लगातार नए फीचर्स पेश करता रहता है जिससे ड्राइविंग पहले से ज्यादा आसान हो गई है. इस ऐप में आपको लाइव स्पीडोमीटर मिलता है जिससे गाड़ी की स्पीड पर नजर रखना आसान होता है. इसके अलावा टोल रोड से बचने, हाईवे छोड़ने या कम ईंधन खर्च वाले रूट चुनने का ऑप्शन भी मिलता है.
Google Maps की सबसे बड़ी ताकत इसका ऑफलाइन मैप फीचर है. आप पहले से किसी इलाके का मैप डाउनलोड कर सकते हैं और इंटरनेट न होने पर भी आसानी से नेविगेशन का इस्तेमाल कर सकते हैं. ये सुविधा खासतौर पर लंबे सफर या कमजोर नेटवर्क वाले इलाकों में काफी काम आता है.
किसे चुनना बेहतर
दरअसल, तीनों ऐप्स की अपनी अलग-अलग खूबियां हैं और कोई भी ऐप हर व्यक्ति के लिए परफेक्ट नहीं कहा जा सकता है. Google Maps उन लोगों के लिए बेहतर है जो लंबे सफर करते हैं और ऑफलाइन नेविगेशन चाहते हैं. वहीं, Apple Maps उन यूजर्स के लिए शानदार है जो पूरी तरह Apple Ecosystem का इस्तेमाल करते हैं.
इसके अलावा Waze उन ड्राइवरों के लिए सबसे बेहतरीन माना जा सकता है जो ट्रैफिक और सड़क की लाइव जानकारी के आधार पर अपना रूट बदलना पसंद करते हैं. इसीलिए किसी एक ऐप को चुनना पूरी तरह से यूजर्स की जरूरत पर निर्भर करता है कि उसे ऐप से क्या-क्या जानकारी चाहिए हैं. हालांकि, इन तीनों ऐप्स में गूगल मैप्स पूरी दुनिया में काफी चर्चित नेविगेशन ऐप माना जाता है.
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        <pubDate>Mon, 03 Aug 2026 15:30:16 +0530</pubDate>
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        <title>GaN Charger Technology: आम चार्जर से कितने अलग होते हैं GaN Charger, समझें इसकी तकनीक?</title>
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        <description><![CDATA[ GaN Charger Technology: आजकल बाजार में एक नए तरह का चार्जर बहुत चर्चा में है, जिसे GaN चार्जर कहा जाता है. यह चार्जर देखने में आम चार्जर जैसा ही लगता है, लेकिन इसके अंदर की तकनीक पूरी तरह अलग होती है. जब आप नया फोन खरीदते हैं या बाजार में फास्ट चार्जर ढूंढते हैं तो दुकानदार आपको GaN चार्जर लेने की सलाह देते हैं. इसका पूरा नाम गैलियम नाइट्राइड है, जो एक खास तरह की धातु है. यही धातु इस चार्जर को बाकी चार्जर से अलग बनाती है. आइए समझते हैं कि यह तकनीक क्या है और यह आम चार्जर से कैसे अलग है.&amp;nbsp;
क्या है GaN तकनीक
चार्जर की दुनिया में GaN का मतलब है गैलियम नाइट्राइड. यह एक खास तरह का केमिकल कंपाउंड है, जिसमें बिजली को बहुत तेजी से संभालने की क्षमता होती है. पिछले कई सालों से हमारे मोबाइल और लैपटॉप के चार्जर बनाने के लिए सिलिकॉन का इस्तेमाल किया जा रहा है, लेकिन अब चार्जर बनाने वाली कंपनियां सिलिकॉन की जगह गैलियम नाइट्राइड का इस्तेमाल कर रही हैं, जिसने चार्जिंग की पूरी तकनीक को बदल कर रख दिया है.&amp;nbsp;
आम चार्जर और GaN चार्जर में अंतर
अगर हम एक आम सिलिकॉन चार्जर और एक नए GaN चार्जर की तुलना करें तो इनमें कुछ बड़े अंतर देखने को मिलते हैं. जैसे कि गैलियम नाइट्राइड बिजली को सिलिकॉन के मुकाबले बहुत तेजी से ट्रांसफर करता है. इस कारण से चार्जर के अंदर के पुर्जों को बहुत पास-पास रखा जा सकता है. इसी वजह से एक GaN चार्जर का साइज आम चार्जर के मुकाबले लगभग आधा या उससे भी छोटा होता है. साथ ही आम चार्जर को जब आप चार्जिंग पर लगाते हैं, तो वह थोड़ी देर में गर्म हो जाता है. क्योंकि सिलिकॉन चार्जर बिजली को ट्रांसफर करते समय काफी गर्मी छोड़ते हैं. इसके विपरीत, GaN चार्जर बहुत कम गर्म होते हैं क्योंकि इनकी ऊर्जा क्षमता बहुत अधिक होती है. चूंकि ये चार्जर छोटे और शक्तिशाली होते हैं, इसलिए कंपनियां इनमें एक साथ कई पोर्ट दे देती हैं. इससे आप एक ही छोटे चार्जर से अपना फोन, ईयरबड्स और लैपटॉप एक साथ चार्ज कर सकते हैं.&amp;nbsp;
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यह तकनीक कैसे काम करती है?
हर इलेक्ट्रॉनिक सामान में बिजली को बहने के लिए एक रास्ते से गुजरना पड़ता है. ऐसे में गैलियम नाइट्राइड का बैंडगैप सिलिकॉन की तुलना में चौड़ा होता है. इसका सीधा मतलब यह है कि GaN चार्जर बहुत अधिक वोल्टेज और बिजली के दबाव को आसानी से झेल सकता है. यह बिना गर्म हुए और बिना बिजली बर्बाद किए बहुत तेजी से करंट को आपके डिवाइस तक पहुंचाता है.
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        <pubDate>Mon, 03 Aug 2026 15:30:15 +0530</pubDate>
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        <media:keywords>GaN, Charger, Technology:, आम, चार्जर, से, कितने, अलग, होते, हैं, GaN, Charger, समझें, इसकी, तकनीक</media:keywords>
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        <title>नए आईफोन की लॉन्चिंग से पहले ऐप्पल को लगा बड़ा झटका! जानें कैसे</title>
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        <description><![CDATA[ iPhone Shipment: अगले महीने नए आईफोन की लॉन्चिंग से पहले ऐप्पल को बड़ा झटका लगा है. लगातार बढ़ोतरी के बाद ऐप्पल को पहली बार भारत में आईफोन की शिपमेंट में सालाना आधार पर गिरावट का सामना करना पड़ सकता है. हालांकि, इसके पीछे डिमांड में कमी आना वजह नहीं है बल्कि सप्लाई शॉर्टेज और दामों में कमी न आने के कारण इस साल आईफोन की बिक्री में कमी देखी जा रही है. गौरतलब है कि दिसंबर, 2025 में खत्म हुई तिमाही से भारत में ऐप्पल की ग्रोथ धीमी पड़ रही है. आइए जानते हैं कि आईफोन शिपमेंट को लेकर क्या जानकारी सामने आई है और इसके पीछे क्या कारण बताए जा रहे हैं.
किस वजह से पड़ा है शिपमेंट पर असर?
आईफोन में लोगों की दिलचस्पी अभी भी मजबूती से बनी हुई है, लेकिन कई आईफोन मॉडल्स के अवेलेबल न होने, फाइनेंसिंग और एक्सचेंज ऑफर की कमी और पुराने आईफोन की कीमतें उम्मीद के मुताबिक कम न होने के कारण लोग आईफोन खरीदने से बच रहे हैं. जानकारों का मानना है कि भले ही भारत ऐप्पल के सबसे तेजी से बढ़ते रेवेन्यू वाली मार्केट बनी हुई है, लेकिन इन कारणों से 2026 में आईफोन की शिपमेंट में कमी आ सकती है. मनीकंट्रोल से बात करते हुए IDC इंडिया की रिसर्च मैनेजर उपासना जोशी ने कहा कि सिर्फ ऐप्पल ऐसी कंपनी है, जिसने अपने पुराने मॉडल्स के दाम नहीं बढ़ाए हैं, लेकिन अब अफॉर्डेबिलिटी ऑफर कम हैं, जिसके कारण आईफोन के सेल आउट प्राइस पिछली तिमाहियों से अधिक बने हुए हैं.
एंड्रॉयड फोन हुए महंगे, आईफोन के दाम नहीं बदले
सैमसंग, शाओमी, ओप्पो, वीवो और नथिंग समेत लगभग सभी एंड्रॉयड कंपनियां अपने मॉडल्स के दाम बढ़ा चुकी हैं. गूगल ने भी कंफर्म किया है कि इस महीने लॉन्च हो रही पिक्सल 11 सीरीज को बढ़े हुए दामों पर लॉन्च किया जाएगा. दूसरी तरफ ऐप्पल ने अभी तक आईफोन के दाम नहीं बढ़ाए हैं. हालांकि, आईफोन खरीदने के लिए अब फाइनेंसिंग स्कीम्स भी सीमित हैं और इन पर एक्सचेंज के तहत भारी डिस्काउंट भी नहीं मिल रहा. इस कारण आज भी पुराने आईफोन अपनी लॉन्चिंग कीमत के आसपास ही बिक रहे हैं.
शिपमेंट में कितनी गिरावट का अनुमान?
इस साल की दूसरी तिमाही में कुल स्मार्टफोन शिपमेंट में 11-12 प्रतिशत की गिरावट आई है, जबकि इस दौरान आईफोन की शिपमेंट सालाना आधार पर करीब 1 प्रतिशत कम हुई, जो पहली तिमाही के 5 प्रतिशत के मुकाबले बेहतर है. पिछले साल ऐप्पल ने भारत में 14.3 मिलियन आईफोन शिप किए थे. इस साल इसमें करीब 4-6 प्रतिशत गिरावट का अनुमान लगाया जा रहा है. आईफोन 15,16 और आईफोन 17 सीरीज की सप्लाई में बाधा और आईफोन 18 का इस साल लॉन्च न होना इसके पीछे के बड़े कारण माने जा रहे हैं. इससे पहले आई काउंटरप्वाइंट रिसर्च की रिपोर्ट में बताया गया था कि अप्रैल-जून तिमाही में आईफोन की शिपमेंट में सालाना आधार पर 3 प्रतिशत गिरावट आई थी. करीब 4 साल बाद यह पहली बार हुआ था, जब ऐप्पल को किसी तिमाही में ऐसा झटका लगा हो.
फेस्टिव सीजन में भी आईफोन के दाम कम होने की उम्मीद नहीं
आमतौर पर ग्राहकों को फेस्टिव सीजन में स्मार्टफोन के दाम कम होने की उम्मीद होती है, लेकिन इस बार उन्हें निराशा का सामना करना पड़ सकता है. अगर ऐप्पल की बात करें तो सितंबर में नई सीरीज लॉन्च होने से पहले ऐप्पल पुराने मॉडल के दाम लगभग 10,000 रुपये तक कम कर देती है. पर इस बार कंपनी नई प्लानिंग के साथ आगे बढ़ रही है. सितंबर में ऐप्पल आईफोन 18 मॉडल लॉन्च नहीं करेगी, जिसके कारण हाई डिमांड वाले आईफोन 17 की कीमत में कटौती की उम्मीद नहीं है. दूसरी तरफ मेमोरी चिप्स शॉर्टेज के कारण आईफोन महंगे होने का खतरा भी मंडरा रहा है. इस वजह से ग्राहकों को इस फेस्टिव सीजन आईफोन पर डिस्काउंट मिलने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए.&amp;nbsp;
सितंबर में लॉन्च होंगे ये आईफोन
ऐप्पल सितंबर के दूसरे सप्ताह में नए आईफोन लॉन्च करेगी. इनमें आईफोन 18 प्रो, आईफोन 18 प्रो मैक्स और पहला फोल्डेबल iPhone Ultra शामिल होगा. इस सीरीज के बाकी मॉडल जैसे आईफोन 18, आईफोन 18e और आईफोन एयर 2 को अगले साल फरवरी-मार्च में लॉन्च किया जाएगा.
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        <pubDate>Mon, 03 Aug 2026 15:30:13 +0530</pubDate>
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        <title>Solar Panel खराब होने के बाद कहां जाते हैं? सामने आई चौंकाने वाली सच्चाई</title>
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        <description><![CDATA[ Solar Panel: आज सोलर एनर्जी को साफ और टिकाऊ ऑप्शन के रूप में देखा जा रहा है. आज ज्यादातर घरों की छतों से लेकर बड़े-बड़े सोलर पार्क तक, हर जगह सोलर पैनल बिजली बनाने का काम कर रहे हैं. लेकिन सोलर पैनल के बढ़ते क्रेज के साथ एक सवाल भी पैदा हो रहा है कि जब ये पैनल अपनी उम्र पूरी कर लेते हैं, तब उनका क्या होता है? आइए जानते हैं क्या है इसकी पूरी सच्चाई.
सोलर पैनल बनने के बाद कहां जाते हैं
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि सोलर पैनलों की औसतन उम्र करीब 25 से 30 साल होती है. इसके बाद उनकी बिजली बनाने की ताकत धीरे-धीरे कम होने लगती है और आखिरकार उन्हें बदलना पड़ता है. एक्सपर्ट्स के मुताबिक साल 2050 तक दुनिया में 8 करोड़ मीट्रिक टन से ज्यादा पुराने और बेकार सोलर पैनलों का कचरा जमा हो सकता है.
अगर इनको सही तरीके से खत्म या रीसाइक्लि नहीं किया गया तो ये लैंडफिल में पहुंचकर पर्यावरण के लिए नई समस्या बन सकते हैं. साथ ही इनमें मौजूद कई कीमती धातुएं भी हमेशा के लिए बेकार हो जाएंगी.

अभी कैसे होती है रीसाइक्लिंग
आपको बता दें कि ज्यादातर रीसाइक्लिंग सेंटर सोलर पैनलों से एल्यूमिनियम फ्रेम, कांच और तांबे जैसी आसानी से अलग होने वाली चीजों को निकाल लेते हैं. लेकिन अंदर मौजूद कीमती धातुओं को निकालना अभी भी काफी मुश्किल और महंगा काम है. यही वजह है कि पैनल का एक बड़ा हिस्सा पूरी तरह दोबारा इस्तेमाल में नहीं आ पाता है.
सोलर पैनलों में छिपे होते हैं कई कीमती चीजें
ज्यादातर लोग सोचते हैं कि सोलर पैनल सिर्फ कांच और धातु से बने होते हैं लेकिन असल में इनके अंदर कई जरूरी चीजें मौजूद होती हैं. इनमें चांदी (Silver), इंडियम (Indium), गैलियम (Gallium), टेल्यूरियम (Tellurium), सीसा (Lead), तांबा (Copper), एल्यूमिनियम (Aluminum) और कांच जैसे मटेरियल शामिल हैं.
इन चीजों को निकालने के लिए खनन में काफी बिजली और रिसोर्सेज खर्च होते हैं. इसलिए अगर इन्हें दोबारा इस्तेमाल किया जाए तो नैचुरल रिसोर्सेज की बचत के साथ लागत भी कम हो सकती है.
क्या होता है प्रोसेस
फिलहाल कई जगहों पर रीसाइक्लिंग के लिए पायरोमेटलर्जी (Pyrometallurgy) टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जाता है. इसमें लगभग 2,000 डिग्री सेल्सियस तक का तापमान पैदा करके अलग-अलग पदार्थों को पिघलाया जाता है. हालांकि ये तरीका काफी कारगर है लेकिन इसमें भारी मात्रा में बिजली खर्च होती है. साथ ही कई बार अलग-अलग धातुओं को सहरी तरीके से अलग करना भी काफी मुश्किल हो जाता है.
नई टेक्नोलॉजी दे सकती है बेहतर सॉल्यूशन
न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी टैन्डन स्कूल ऑफ इंजीनियरिंग के वैज्ञानिकों का मानना है कि हाइड्रोमेटलर्जी (Hydrometallurgy) आने वाले समय में एक बेहतर ऑप्शन बन सकती है. इस टेक्नोलॉजी में बहुत ज्यादा गर्मी की बजाय स्पेशल कैमिकल का इस्तेमाल किया जाता है जो केवल चुनिंदा धातुओं को घोल देता है. बाद में इन धातुओं को प्योर करके दोबारा नए प्रोडक्ट को बनाने में इस्तेमाल किया जा सकता है.

कम तापमान पर होने के कारण इस प्रोसेस में बिजली की खपत भी कम होती है और कीमती धातुओं की रिकवरी बेहतर तरीके से होती है.
नई जनरेशन के पैनल आसान बना सकते हैं काम
आपको बता दें कि वैज्ञानिकों का ध्यान अभी फिलहाल पेरोव्स्काइट (Perovskite) सोलर सेल्स पर है. ये टेक्नोलॉजी कम लागत और बेहतर एफिशिएंसी के कारण तेजी से फेमश हो रही है. रिसर्च में पाया गया है कि इन सेल्स में मौजूद सीसा (Lead) जैसी धातु को कई मामलों में केवल गर्म पानी की मदद से भी अलग किया जा सकता है. पानी ठंडा होने पर सीसा क्रिस्टल के रूप में वापस मिल जाता है जिसे नए पेरोव्स्काइट सोलर सेल बनाने में दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है.
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        <pubDate>Mon, 03 Aug 2026 03:30:14 +0530</pubDate>
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        <title>How Mobile Tower Works: मोबाइल टावर कैसे काम करते हैं, कैसे होती है कॉल कनेक्ट?</title>
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        <description><![CDATA[ How Mobile Tower Works:&amp;nbsp;जब भी आप किसी को फोन करते हैं, तो आपकी आवाज हवा में तरंगों (waves) के रूप में सफर करके कुछ ही सेकंड में दूसरे व्यक्ति तक पहुंच जाती है. लेकिन क्या आपने सोचा है ये सारी चीजें मुमकिन कैसे हो ता है, ऐसेमें आपको बता दें की यह सब मुमकिन होता है मोबाइल टावर की वजह से. हमारे आस-पास दिखने वाले ये बड़े-बड़े टावर असल में एक पूरे नेटवर्क का हिस्सा होते हैं, जो हमारी कॉल्स, मैसेज और इंटरनेट डेटा को एक जगह से दूसरी जगह भेजने का काम करते हैं. आइए जानते हैं इसके बारे में पूरी जानकारी.
मोबाइल टावर की बनावट और उसका काम
हर मोबाइल टावर में एक बेस स्टेशन होता है, जिसे BTS (Base Transceiver Station) कहा जाता है. इस टावर पर लगे एंटीना का काम होता है आस-पास मौजूद सभी मोबाइल फोन के सिग्नल को पकड़ना और उन्हें आगे भेजना. हर टावर की एक तय रेंज होती है, जिसे Cell कहते हैं. वहीं शहरों में जहां आबादी ज्यादा होती है, वहां टावर की रेंज छोटी रखी जाती है ताकि ज्यादा लोग एक साथ नेटवर्क इस्तेमाल कर सकें. वहीं गांव और खुले इलाकों में एक टावर की रेंज कई किलोमीटर तक होती है. जब आप अपने फोन से कॉल करते हैं, तो आपका फोन सबसे पास वाले टावर से जुड़ जाता है.&amp;nbsp;
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कैसे कनेक्ट होती है आपकी कॉल
जब आप किसी नंबर पर कॉल लगाते हैं, तो आपका सिग्नल सबसे पहले नजदीकी मोबाइल टावर तक पहुंचता है. यह टावर उस सिग्नल को मोबाइल स्विचिंग सेंटर (MSC) नाम की एक बड़ी प्रणाली तक भेजता है, जो यह पता लगाती है कि जिस व्यक्ति को आप कॉल कर रहे हैं, वह उस समय किस टावर की रेंज में मौजूद है. एक बार जब यह पता चल जाता है, तो कॉल को उसी टावर तक भेज दिया जाता है, और वहां से यह सिग्नल दूसरे व्यक्ति के फोन तक पहुचता है. &amp;nbsp;
यह पूरी प्रक्रिया केबल, ऑप्टिकल फाइबर और कई बार सैटेलाइट के जरिए भी होती है, और यह सब कुछ सेकंड में हो जाता है. अगर आप कॉल के दौरान एक जगह से दूसरी जगह जा रहे हों, जैसे गाड़ी में सफर करते समय, तो आपका फोन अपने आप एक टावर से दूसरे टावर से जुड़ जाता है, और इसी वजह से चलते-फिरते भी कॉल नहीं कटती.
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        <pubDate>Mon, 03 Aug 2026 03:30:13 +0530</pubDate>
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        <title>क्या Delete करने के बाद भी बचा रहता है आपका Data? जानिए क्या है सच्चाई</title>
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        <description><![CDATA[ Tech Tips: आज के डिजिटल दौर में हम डेली अपने फोन, लैपटॉप और क्लाउड स्टोरेज से फाइलें, फोटो, वीडियो और डॉक्यूमेंट डिलीट करते हैं. कई बार पुराने सोशल मीडिया अकाउंट या ऐप भी हटा देते हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि Delete बटन दबाने के बाद आपका डेटा असल में कहां जाता है? ज्यादातर लोगों को लगता है कि Delete करते ही डेटा हमेशा के लिए खत्म हो जाता है जबकि हकीकत इससे काफी अलग है. कई मामलों में डेटा लंबे समय तक सिस्टम में मौजूद रहता है और उसे दोबारा रिकवर भी किया जा सकता है.
क्या डेटा हमेशा के लिए खत्म किया जा सकता है
दरअसल, डेटा को पूरी तरह खत्म करना संभव है लेकिन इसके लिए नॉर्मल Delete काफी नहीं होता है. इसके लिए कुछ स्पेशल तरीके अपनाए जाते हैं.
स्टोरेज डिवाइस को पूरी तरह खत्म करना.
पुराने डेटा के ऊपर कई बार नया डेटा लिखना.
डेटा को स्ट्रांग एन्क्रिप्शन से सेफ करके उसकी एन्क्रिप्शन Key को हमेशा के लिए खत्म कर देना.
हालांकि ये तरीके हर स्थिति में आसान नहीं होते. खासकर क्लाउड सर्वर पर डेटा कई जगह कॉपी होकर रखा जाता है इसलिए उसे पूरी तरह हटाना टेक्निकल रूप से ज्यादा मुश्किल हो सकता है.

Delete और Erase में क्या होता है अंतर
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि सबसे बड़ी गलतफहमी ये है कि लोग Delete और Erase को एक ही समझ लेते हैं. जब आप किसी फाइल को डिलीट करते हैं तो ज्यादातर ऑपरेटिंग सिस्टम उस फाइल को तुरंत खत्म नहीं करते. वे केवल उस जगह को आगे आने वाले समय में नई फाइल रखने के लिए खाली घोषित कर देते हैं.
यानी फाइल दिखाई नहीं देती लेकिन उसका रियल डेटा स्टोरेज में तब तक मौजूद रह सकता है, जब तक उसके ऊपर नया डेटा लिख न दिया जाए. इसी वजह से कई डेटा रिकवरी सॉफ्टवेयर डिलीट की गई फाइलों को वापस लाने में सफल हो जाते हैं.
सोशल मीडिया पर भी खत्म नहीं होता डेटा
आपको बता दें कि अगर आपने कोई पोस्ट, फोटो या ट्वीट डिलीट कर दिया तो इसका मतलब ये नहीं कि उसकी मौजूदगी पूरी तरह खत्म हो गई. दूसरे लोगों के कमेंट्स, रिप्लाई, शेयर, स्क्रीनशॉट या इंटरनेट आर्काइव जैसी सर्विसेज उस कंटेंट के कुछ हिस्सों को लंबे समय तक सेफ रख सकती हैं. कई बार पोस्ट हटने के बाद भी उससे जुड़ी जानकारी का अंदाजा लगाया जा सकता है.
Zombie Accounts बन रहे हैं बड़ा खतरा
बहुत से लोग फोन से ऐप हटाकर ये मान लेते हैं कि उनका अकाउंट भी खत्म हो गया. लेकिन असल में ऐसा अक्सर नहीं होता है. ऐप हटाने के बाद भी उसका ऑनलाइन अकाउंट एक्टिव रह सकता है. ऐसे छोड़े हुए अकाउंट को Zombie Account कहा जाता है.

ऑनलाइन शॉपिंग, वीडियो स्ट्रीमिंग, क्लाउड स्टोरेज, डेटिंग, बैंकिंग और दूसरी सर्विसेज पर बने ऐसे लाखों इनएक्टिव अकाउंट साइबर अपराधियों के लिए आसान निशाना बन सकते हैं क्योंकि उनमें पुरानी पर्सनल जानकारी मौजूद रहती है.
AI के दौर में डेटा मिटाना और मुश्किल
आज कई कंपनियां AI मॉडल तैयार करने के लिए बड़े पैमाने पर डेटा का इस्तेमाल करती हैं. एक बार अगर किसी AI मॉडल को किसी डेटा से ट्रेनिंग दी जाए तो बाद में उस जानकारी का असर पूरी तरह हटाना आसान नहीं होता है.
वैज्ञानिक इसे Machine Unlearning जैसी टेक्नोलॉजी से सॉल्व करने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन ये अभी भी एक मुश्किल काम बना हुआ है. यही कारण है कि आगे आने वाले समय में डेटा डिलीट का मतलब केवल सर्वर से फाइल हटाना नहीं रहेगा बल्कि AI सिस्टम से उसके प्रभाव को भी हटाना एक बड़ा मुद्दा बनेगा.
लोगों में बढ़ रहा है डेटा खोने का डर
आपको बता दें कि कई लोग गलती से फोटो, वीडियो या जरूरी फाइल डिलीट होने के डर से कुछ भी हटाना पसंद नहीं करते हैं. इसीलिए उनके डिवाइस और ऑनलाइन अकाउंट में कई सालों तक पुराना पर्सनल डेटा इकट्ठा हुआ रहता है. ये बेकार का डेटा अगर किसी साइबर हमले या डेटा लीक का शिकार हो जाए तो प्राइवेट जानकारी भी गलत हाथों में पहुंच सकती है.
क्या है समाधान
एक्सपर्ट्स का मानना है कि कंपनियों को Explainable Deletion जैसे ट्रांसपेरेंट सिस्टम को अपनाना चाहिए. इसका मकसद यूजर्स को आसान भाषा में ये बताना है कि कौन-सा डेटा हटाया जा रहा है. उसे कैसे हटाया जाएगा. हटाने में कितना समय लगेगा. डेटा कहां-कहां मौजूद है. कौन इस प्रोसेस का जिम्मेदार है. और हटाने के बाद क्या रिकवरी हो सकेगी या नहीं. अगर कंपनियां इस तरह की पूरी जानकारी दें तो लोगों का भरोसा बढ़ेगा और वे अपने डिजिटल डेटा पर पहले से ज्यादा कंट्रोल रख सकेंगे.
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        <pubDate>Mon, 03 Aug 2026 03:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>Tech Saving Tips : हर महीने गैजेट और ऐप्स पर हो रहा ज्यादा खर्च? अपनाएं ये टेक सेविंग टिप्स</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/tech-saving-tips-हर-महीने-गैजेट-और-ऐप्स-पर-हो-रहा-ज्यादा-खर्च-अपनाएं-ये-टेक-सेविंग-टिप्स</link>
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        <description><![CDATA[ Tech Saving Tips : आज के समय में स्मार्टफोन, लैपटॉप, ऐप्स और ऑनलाइन सब्सक्रिप्शन हमारी डेली लाइफ का हिस्सा बन चुके हैं, लेकिन कई बार बिना ध्यान दिए हम ऐसी चीजों पर भी पैसे खर्च कर देते हैं, जिनकी सच में जरूरत नहीं होती है. कभी नए गैजेट का अट्रैक्शन, कभी किसी ऐप का प्रीमियम प्लान और कभी ऑटो-रिन्यू होने वाले सब्सक्रिप्शन महीने का बजट बिगाड़ देते हैं. ऐसे में अगर आप भी हर महीने टेक्नोलॉजी पर बढ़ते खर्च से परेशान हैं, तो कुछ आसान आदतें अपनाकर अच्छी-खासी बचत कर सकते हैं. तो आइए जानते हैं ऐसे ही कुछ आसान टेक सेविंग टिप्स, जो आपके खर्च को कम करने में मदद कर सकते हैं.&amp;nbsp;
खरीदारी से पहले AI की मदद लें
अगर आप नया मोबाइल एक्सेसरी, केबल या कोई दूसरा गैजेट खरीदने की सोच रहे हैं, तो पहले AI टूल्स की मदद ले सकते हैं. Google Gemini, ChatGPT या Amazon के Rufus AI जैसे टूल अलग-अलग वेबसाइटों पर कीमतों की तुलना करने और बजट के अनुसार बेहतर ऑप्शन खोजने में मदद करते हैं. जैसे अगर किसी मोबाइल कवर की कीमत ज्यादा लग रही हो, तो AI से तय बजट के अंदर ऑप्शन पूछे जा सकते हैं. इसी तरह कम कीमत वाले USB-C केबल या दूसरे एक्सेसरी भी आसानी से खोजे जा सकते हैं. AI खरीदारी से पहले सही फैसला लेने में मदद कर सकता है और गैर जरूरी खर्च कम कर सकता है.&amp;nbsp;
जरूरत हो तभी नया गैजेट खरीदें
आज के समय में स्मार्टफोन और लैपटॉप की कीमतें पहले की तुलना में काफी बढ़ गई हैं. ऐसे में नया डिवाइस खरीदने से पहले खुद से यह सवाल जरूर पूछें कि क्या सच में इसकी जरूरत है. अगर आपका मौजूदा फोन, लैपटॉप या ई-रीडर ठीक से काम कर रहा है, तो सिर्फ नए मॉडल के लिए हजारों रुपये खर्च करना जरूरी नहीं है. जरूरत पड़ने पर अच्छी स्थिति में उपलब्ध सेकेंड हैंड डिवाइस भी एक बेहतर ऑप्शन हो सकता है. इससे काफी पैसे बचाए जा सकते हैं.&amp;nbsp;
ऑटो-रिन्यू होने वाले सब्सक्रिप्शन बंद करें
कई बार किसी ऐप या ओटीटी प्लेटफॉर्म का ट्रायल खत्म होने के बाद भी उसका सब्सक्रिप्शन अपने आप रिन्यू होता रहता है और हर महीने खाते से पैसे कटते रहते हैं. इसलिए समय-समय पर अपने सभी डिजिटल सब्सक्रिप्शन की लिस्ट जरूर देखें. अगर किसी ऐप या सर्विस का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं, तो उसका ऑटो-रिन्यू बंद कर दें. कई लोग केवल उसी समय OTT प्लेटफॉर्म का सब्सक्रिप्शन लेते हैं, जब कोई पसंदीदा शो या फिल्म रिलीज होती है और बाद में उसे बंद कर देते हैं. यह तरीका भी खर्च कम करने में मददगार हो सकता है.&amp;nbsp;
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ज्यादा स्टोरेज वाले फोन की जगह क्लाउड स्टोरेज चुनें
कई कंपनियां ज्यादा स्टोरेज वाले स्मार्टफोन के लिए काफी ज्यादा कीमत लेती हैं. ऐसे में नया फोन खरीदने की बजाय क्लाउड स्टोरेज का विकल्प चुना जा सकता है. Apple यूजर्स के लिए iCloud और Apple One जैसी सेवाएं उपलब्ध हैं, जबकि Android यूजर्स Google One का इस्तेमाल कर सकते हैं. इससे फोटो, वीडियो और जरूरी फाइलें सुरक्षित रहती हैं और सिर्फ स्टोरेज बढ़ाने के लिए नया फोन खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती है. साथ ही क्लाउड स्टोरेज की मदद से डेटा को नए डिवाइस में आसानी से ट्रांसफर भी किया जा सकता है.&amp;nbsp;
पेड ऐप्स की जगह फोन के बिल्ट-इन ऐप्स इस्तेमाल करें
हर काम के लिए अलग-अलग पेड ऐप डाउनलोड करना जरूरी नहीं होता है. कई स्मार्टफोन पहले से ऐसे ऐप्स के साथ आते हैं जो रोजमर्रा के ज्यादातर काम आसानी से कर देते हैं. जैसे Google Pixel का Recorder ऐप रिकॉर्डिंग और ट्रांसक्रिप्शन की सुविधा देता है. वहीं Apple Notes जैसे बिल्ट-इन ऐप नोट्स बनाने और जरूरी जानकारी व्यवस्थित रखने के लिए काफी यूजफुल हैं. इनका इस्तेमाल करके अलग से प्रीमियम ऐप का सब्सक्रिप्शन लेने की जरूरत नहीं पड़ती और हर महीने होने वाला खर्च भी कम हो जाता है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Mon, 03 Aug 2026 03:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>रोज देखते हैं ये Power Symbol! लेकिन 99% लोग नहीं जानते इसका मतलब</title>
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        <description><![CDATA[ रोज देखते हैं ये Power Symbol! लेकिन 99% लोग नहीं जानते इसका मतलब ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 03 Aug 2026 03:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>मोशन सिकनेस से परेशान? iPhone की ये Secret Setting बदल देगी आपका सफर</title>
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        <description><![CDATA[ iPhone Tips: अक्सर देखा गया है कि लोगों को सफर के दौरान चक्कर आने लगते हैं या फिर उल्टी जैसा महसूस होने लगता है. दरअसल, दुनियाभर में लाखों लोग मोशन सिकनेस (Motion Sickness) की समस्या से परेशान रहते हैं. खासकर तब जब सफर के दौरान लोग फोन की स्क्रीन देखते हैं ये परेशानी और बढ़ सकती है.
लेकिन अगर आपके पास iPhone है तो इसमें मौजूद एक खास फीचर आपकी इस समस्या को काफी हद तक कम कर सकता है. ये फीचर iPhone की सेटिंग्स में छिपा हुआ है और बहुत से यूजर्स को इसकी जानकारी भी नहीं होती.
क्या है मोशन सिकनेस और क्यों होती है परेशानी?
आपको बता दें कि मोशन सिकनेस तब होती है जब हमारा दिमाग आंखों और शरीर से मिलने वाले मैसेज में अंतर महसूस करता है. उदाहरण के लिए, जब आप कार में बैठे हैं और फोन की स्क्रीन देख रहे हैं तो आपकी आंखें महसूस करती हैं कि आप स्टेबल हैं लेकिन शरीर और कान के अंदर मौजूद बैलेंस सिस्टम को पता चलता है कि आप लगातार चल रहे हैं.

इन अलग-अलग मैसेजों के कारण दिमाग कंफ्यूज हो जाता है और इससे चक्कर आना, जी मिचलाना, पसीना आना और सिर दर्द जैसी समस्याएं शुरू हो सकती हैं.
iPhone का Secret Feature कैसे करता है मदद
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि Apple ने iPhone में Vehicle Motion Cues फीचर शामिल किया है. ये फीचर स्क्रीन पर छोटे-छोटे एनिमेटेड डॉट्स दिखाता है जो गाड़ी की स्पीड के हिसाब से चलते हैं.
ये डॉट्स आपकी आंखों को ये मैसेज देने में मदद करते हैं कि फोन की स्क्रीन देखने के दौरान भी शरीर स्पीड कर रहा है. इससे आंखों और शरीर के बीच होने वाला कंफ्यूज कम हो सकता है और मोशन सिकनेस के लक्षणों में राहत मिल सकती है. ये फीचर खासतौर पर उन लोगों के लिए काफी काम का है जिन्हें कार या बस में फोन इस्तेमाल करते समय परेशानी होती है.
iPhone में Vehicle Motion Cues कैसे ऑन करें?
अगर आप इस फीचर को इस्तेमाल करना चाहते हैं तो इन आसान स्टेप्स को फॉलो करें.

अपने iPhone की Settings खोलें.
नीचे स्क्रॉल करके Accessibility ऑप्शन पर जाएं.
अब Motion ऑप्शन पर टैप करें.
यहां आपको Show Vehicle Motion Cues का ऑप्शन दिखाई देगा.
इसे ऑन कर दें.

इसके बाद जब आपका iPhone महसूस करेगा कि आप किसी चलती हुई गाड़ी में हैं तो स्क्रीन के किनारों पर छोटे-छोटे डॉट्स दिखाई देने लगेंगे.

ये फीचर कब काम करता है?
Vehicle Motion Cues फीचर iPhone के मोशन सेंसर का इस्तेमाल करता है. जब फोन को पता चलता है कि आप किसी गाड़ी में सफर कर रहे हैं तो ये अपने आप एक्टिव हो सकता है.
यूजर इसे हमेशा ऑन रखने या जरूरत के अनुसार इस्तेमाल करने का ऑप्शन चुन सकते हैं. अगर आपको अक्सर सफर के दौरान फोन देखने पर परेशानी होती है तो इसे एक्टिव रखना फायदेमंद हो सकता है.
क्या Android यूजर्स के लिए भी ऐसा कोई ऑप्शन है
iPhone का ये फीचर Apple यूजर्स के लिए बहुत काम का माना जाता है. लेकिन Android डिवाइस में भी मोशन सिकनेस कम करने के लिए कुछ ऑप्शन मिल सकते हैं. कई एंड्रॉयड फोन में स्क्रीन मोशन कम करने, एनिमेशन घटाने और एक्सेसिबिलिटी फीचर्स मौजूद होते हैं.
इसके अलावा सफर के दौरान कुछ आसान ट्रिक्स जैसे खिड़की से बाहर देखना, फोन कम इस्तेमाल करना और आगे की सीट पर बैठना भी मददगार साबित हो सकता है.
सफर को आरामदायक बनाने के लिए अपनाएं ये टिप्स
मोशन सिकनेस से बचने के लिए सिर्फ iPhone की सेटिंग ही काफी नहीं है. आप इन बातों का भी ध्यान रख सकते हैं.

सफर के दौरान लगातार फोन देखने से बचें.
कोशिश करें कि गाड़ी की दिशा में बैठें.
हल्का भोजन करके सफर शुरू करें.
ज्यादा तेज गंध वाली चीजों से बचें.
पर्याप्त मात्रा में पानी पीते रहें.

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        <pubDate>Sun, 02 Aug 2026 11:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>Google AI Tool Rollback : 24 घंटे भी नहीं चला Google का AI टूल, कंपनी ने हटाया फीचर</title>
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        <description><![CDATA[ Google AI Tool Rollback : Google ने हाल ही में Google Earth पर एक नया AI फीचर लॉन्च किया था, जिसकी मदद से यूजर्स सिर्फ एक क्लिक में सैटेलाइट फोटो के आधार पर AI से नई इमेज बना सकते थे. कंपनी का कहना था कि यह फीचर लोगों की कल्पना को नई उड़ान देगा और कुछ ही सेकंड में मनचाही फोटो तैयार कर देगा. हालांकि, लॉन्च के 24 घंटे भी पूरे नहीं हुए थे कि Google ने इस फीचर को वापस लेने का फैसला कर लिया. दरअसल, कई रिसर्चर्स और ओपन सोर्स इंटेलिजेंस एक्सपर्ट्स ने आशंका जताई कि इस फीचर का गलत इस्तेमाल कर फर्जी सैटेलाइट फोटो बनाई जा सकती हैं और इससे गलत जानकारी तेजी से फैल सकती है. &amp;nbsp;इसके बाद Google ने इस फीचर पर फिलहाल रोक लगा दी.&amp;nbsp;
क्या था Google Earth का नया AI फीचर?
Google ने 30 जुलाई को Google Earth में Create Image नाम का नया फीचर शुरू किया था. यह फीचर Google की Nano Banana 2 इमेज जनरेशन तकनीक पर आधारित था. इसकी मदद से यूजर Google Earth पर किसी भी जगह को चुनकर Create Image पर क्लिक करते और फिर जो फोटो बनानी होती, उसका विवरण लिखते, इसके बाद AI कुछ ही सेकंड में Google Earth की सैटेलाइट, एरियल और 3D मैपिंग डेटा के आधार पर नई फोटो तैयार कर देता है.&amp;nbsp;
Google ने 24 घंटे में ही क्यों हटाया फीचर?
फीचर लॉन्च होने के कुछ ही घंटों बाद कई विशेषज्ञों ने इसकी आलोचना शुरू कर दी. उनका कहना था कि इस तकनीक का यूज करके ऐसी सैटेलाइट फोटो बनाई जा सकती हैं, जो देखने में बिल्कुल असली लगें, लेकिन सच में AI से तैयार की गई हों. इससे गलत जानकारी फैलने और लोगों के भ्रमित होने का खतरा बढ़ सकता है. इन चिंताओं के बाद Google ने फैसला लिया कि जब तक इस फीचर के लिए मजबूत सुरक्षा व्यवस्था तैयार नहीं हो जाती, तब तक इसे Google Earth से हटा दिया जाएगा.&amp;nbsp;
AI फोटो की पहचान कैसे होगी?
Google ने कहा कि इस फीचर से बनाई गई हर फोटो में SynthID डिजिटल वॉटरमार्क लगाया जाता है. यह एक ऐसा डिजिटल पहचान चिन्ह है, जिससे पता लगाया जा सकता है कि फोटो AI से बनाई गई है. अगर किसी यूजर को किसी फोटो पर शक हो, तो वह Gemini ऐप या Google Lens की मदद से जांच सकता है कि उस फोटो में SynthID मौजूद है या नहीं, कंपनी का कहना है कि वह गलत जानकारी को गंभीरता से लेती है और ऐसे फीचर्स के लिए और मजबूत सुरक्षा उपाय लागू करेगी.&amp;nbsp;
Google ने क्या कहा?
फीचर हटाने की घोषणा करते हुए Google ने कहा कि लोग Google Earth पर दुनिया की सही और भरोसेमंद फोटो देखने के लिए भरोसा करते हैं. कंपनी ने माना कि कई जियोस्पेशियल प्रोफेशनल्स इस फीचर का यूज अच्छे कामों के लिए कर रहे थे, लेकिन कंपनी ने ऐसे स्क्रीनशॉट भी देखे जो उसकी नीतियों का उल्लंघन करते हुए दिखाई दिए. इसी वजह से Google ने इस फीचर को अस्थायी रूप से हटा दिया है. कंपनी ने यह भी साफ किया कि AI से बनाई गई फोटो Google Earth के मुख्य प्लेटफॉर्म पर सार्वजनिक रूप से दिखाई नहीं देती थीं और उन पर AI से तैयार होने का वॉटरमार्क भी मौजूद था.&amp;nbsp;
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विशेषज्ञों ने क्या चिंता जताई?
ओपन सोर्स रिसर्चर हेन्क वैन एस ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर बताया कि उन्होंने इस फीचर से मैक्सिको सीमा पर शरणार्थियों, ईरान के परमाणु संयंत्र, एम्स्टर्डम में विमान दुर्घटना और गाजा के अस्पताल जैसे कई संवेदनशील विषयों पर फोटो बनाने की कोशिश की, लेकिन किसी भी अनुरोध को रोका नहीं गया. वहीं, सैटेलाइट इमेज विश्लेषण से जुड़े रिसर्च एनालिस्ट ब्रैडी अफ्रिक ने कहा कि यह फीचर ऐसी नकली सैटेलाइट फोटो बनाना आसान कर सकता है, जो तेजी से सोशल मीडिया पर फैल सकती हैं और लोगों को गुमराह कर सकती हैं. उनका मानना है कि इससे फ्यूचर में असली सैटेलाइट फोटो पर लोगों का भरोसा भी कमजोर पड़ सकता है और शोधकर्ताओं के लिए सही जानकारी की पुष्टि करना और मुश्किल हो जाएगा.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Sun, 02 Aug 2026 11:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>क्या Mesh Wi&amp;Fi से सच में बढ़ जाती है इंटरनेट की स्पीड? जानिए पूरा सच</title>
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        <description><![CDATA[ Mesh Wi-Fi: टेक्नोलॉजी के समय में स्मार्टफोन के साथ-साथ इंटरनेट भी लोगों की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है. अब ज्यादातर घरों में लोग वाई-फाई का इस्तेमाल करने लगे हैं जिससे उन्हें फास्ट इंटरनेट स्पीड मिल सके. इतना ही नहीं स्मार्ट टीवी, लैपटॉप, मोबाइल, सीसीटीवी कैमरा और स्मार्ट होम डिवाइस भी आज एक ही Wi-Fi नेटवर्क से कनेक्ट रहते हैं. अब अगर घर के किसी हिस्से में इंटरनेट स्लो चलने लगे या सिग्नल बिल्कुल न मिले तो लोग अक्सर Mesh Wi-Fi खरीदने की सलाह देते हैं. लेकिन क्या ये सच में इंटरनेट की स्पीड की बढ़ जाती है. आइए जानते हैं क्या है इसकी सच्चाई.
क्या होता है Mesh Wi-Fi
जानकारी के मुताबिक, Mesh Wi-Fi एक ऐसा वायरलेस नेटवर्क सिस्टम है जिसमें एक मेन राउटर के साथ कई एक्सट्रा यूनिट (Nodes या Satellites) मिलकर पूरे घर में एक ही Wi-Fi नेटवर्क तैयार करते हैं. ये सभी डिवाइस आपस में कनेक्ट रहते हैं और घर के हर कोने तक बेहतर कवरेज पहुंचाने का काम करते हैं. इसका सबसे बड़ा फायदा ये है कि आपको अलग-अलग Wi-Fi नेटवर्क बदलने की जरूरत नहीं पड़ती. आप घर में कहीं भी जाएं, आपका फोन या लैपटॉप अपने आप सबसे स्ट्रांग सिग्नल वाले नोड से जुड़ जाता है.

कब मिलेगा सबसे ज्यादा फायदा
आपको बता दें कि अगर आपका घर बड़ा है, दो या तीन मंजिला है या फिर दीवारें मोटी हैं तो नॉर्मल राउटर का सिग्नल हर कमरे तक नहीं पहुंच पाता है. ऐसे में Mesh Wi-Fi आपके बड़े काम आ सकता है. इसके अलावा अगर एक साथ कई लोग ऑनलाइन गेम खेलते हैं, 4K वीडियो स्ट्रीम करते हैं, वीडियो कॉल करते हैं या स्मार्ट होम डिवाइस इस्तेमाल करते हैं तब भी नेटवर्क ज्यादा स्टेबल बना रहता है.
Mesh Wi-Fi और Wi-Fi Extender में क्या होता है अंतर
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि कई लोग Mesh Wi-Fi और Wi-Fi Extender को एक जैसा समझ लेते हैं लेकिन ऐसा नहीं है. ये दोनों ही अलग टेक्नोलॉजी पर काम करते हैं. Wi-Fi Extender पुराने नेटवर्क का सिग्नल बढ़ाने की कोशिश करता है लेकिन कई बार इसकी वजह से स्पीड कम हो जाती है और अलग नेटवर्क नाम भी दिखाई देता है.
वहीं Mesh Wi-Fi पूरे घर के लिए एक ही नेटवर्क बनाता है. इसमें डिवाइस बिना किसी रुकावट के एक नोड से दूसरे नोड पर स्विच हो जाती है जिससे इंटरनेट इस्तेमाल करने का एक्सपीरिएंस बेहतर रहता है.
क्या इससे इंटरनेट की स्पीड बढ़ जाती है?
ऐसा बिलकुल नहीं है. Mesh Wi-Fi आपके इंटरनेट प्लान की स्पीड नहीं बढ़ाता है. अगर आपने 100 Mbps का ब्रॉडबैंड प्लान लिया है तो Mesh Wi-Fi उसे 200 या 300 Mbps में नहीं बदल सकता है. इंटरनेट की मैक्सिमम स्पीड वही रहेगी जो आपके इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर (ISP) ने दी है.
हालांकि, Mesh Wi-Fi की वजह से घर के उन हिस्सों में भी बेहतर स्पीड मिलने लगती है जहां पहले सिग्नल कमजोर होने के कारण इंटरनेट बहुत स्लो चलता था. यानी ये स्पीड बढ़ाने से ज्यादा स्पीड को पूरे घर में एक तरीके से पहुंचाने का काम करता है.

क्या हर घर में Mesh Wi-Fi की जरूरत होती है
ऐसा बिलकुल भी नहीं है. अगर आपका घर छोटा है और पहले से लगे राउटर से हर कमरे में अच्छा सिग्नल मिल रहा है तो Mesh Wi-Fi खरीदने की कोई जरूरत नहीं होती है. लेकिन अगर बार-बार Wi-Fi कटता है, कुछ कमरों में इंटरनेट नहीं चलता या वीडियो स्ट्रीमिंग और गेमिंग के दौरान नेटवर्क कमजोर पड़ जाता है तो Mesh Wi-Fi आपके लिए एक बेहतरीन ऑप्शन साबित हो सकता है.
किन बातों का रखें ध्यान
आपको अपने जरूरत के हिसाब से वाई-फाई को खरीदना चाहिए.

Wi-Fi 6 या Wi-Fi 6E सपोर्ट वाले सिस्टम को प्रायरिटी दें.
घर के साइज के हिसाब से पर्याप्त नोड्स वाला पैक खरीदें.
ऐसे मॉडल चुनें जिनका मोबाइल ऐप आसान हो और जिनमें सिक्योरिटी अपडेट समय-समय पर मिलते रहते हों.
अगर संभव हो तो नोड्स को Ethernet Backhaul से कनेक्ट करें. इससे परफॉर्मेंस और बेहतर होता है.

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        <pubDate>Sun, 02 Aug 2026 11:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>इन ऐप्स से घर बैठे करें LPG की E&amp;KYC, नहीं रुकेगी सिलेंडर की सप्लाई</title>
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        <description><![CDATA[ E-KYC LPG Cylinder: LPG उपभोक्ताओं के लिए अब e-KYC कराना अनिवार्य कर दिया गया है, वरना अगली गैस बुकिंग अटक सकती है या कैंसल भी हो सकती है. सबसे बड़ी राहत की बात यह है कि इसके लिए अब एजेंसी जाने की जरूरत नहीं है. इंडियन ऑयल, भारत गैस और एचपी गैस के उपभोक्ता अपने ऐप से घर बैठे मोबाइल पर ही यह प्रक्रिया पूरी कर सकते हैं. जानिए किस ऐप से कैसे होगी एलपीजी गैस सिलेंडर की e-KYC.
क्यों जरूरी हो गई है e-KYC
सरकार का मकसद इलेक्ट्रॉनिक KYC कराकर यह सुनिश्चित करना है कि एलपीजी गैस सिलेंडर का इस्तेमाल सही उपभोक्ताओं द्वारा ही किया जा रहा है, जिससे फर्जी उपभोक्ताओं पर लगाम कसी जा सके. अगर e-KYC नहीं कराई गई तो गैस बुक होने में दिक्कत आ सकती है और कई बार एजेंसियां बुकिंग को कैंसल भी कर सकती हैं.
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कौन कौन से ऐप आएंगे काम
e-KYC कराने के लिए इंडियन ऑयल के उपभोक्ता IndianOil One ऐप, भारत पेट्रोलियम के उपभोक्ता HelloBPCL for Business ऐप और एचपी गैस के उपभोक्ता HP Pay ऐप का इस्तेमाल कर सकते हैं. तीनों ही ऐप गूगल प्ले स्टोर पर मुफ्त उपलब्ध हैं और इन्हें किसी भी स्मार्टफोन में आसानी से डाउनलोड किया जा सकता है.
कैसे करें घर बैठे पूरी प्रोसेस
आधार कार्ड से लिंक मोबाइल नंबर, एलपीजी कंज्यूमर नंबर और रजिस्ट्रेशन के समय दी गई जानकारी तैयार रखें, ताकि प्रोसेस बिना रुकावट पूरी हो सके. सबसे पहले अपनी गैस कंपनी का ऐप डाउनलोड करना होता है. इसके बाद मोबाइल नंबर या कंज्यूमर नंबर से लॉगिन करके e-KYC ऑप्शन पर क्लिक करना होता है. आगे आधार फेसआरडी ऐप डाउनलोड करना होता है, जिसमें स्क्रीन पर दिए निर्देशों के अनुसार फेस स्कैन या बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन पूरा करना होता है. प्रक्रिया पूरी होते ही e-KYC सफलतापूर्वक अपडेट हो जाती है.
वेबसाइट से भी हो सकता है काम
जिन उपभोक्ताओं को ऐप डाउनलोड करना असुविधाजनक लगता है, उनके लिए भी विकल्प मौजूद है. इसके लिए www.pmuy.gov.in वेबसाइट पर जाकर भी e-KYC प्रोसेस को पूरा किया जा सकता है. उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों के लिए यह सुविधा खासतौर पर उपयोगी है, क्योंकि उन्हें बार-बार एजेंसी के चक्कर नहीं काटने पड़ते.
दिक्कत आए तो क्या करें?
कई बार नेटवर्क या ऐप की तकनीकी समस्या के कारण मोबाइल से e-KYC पूरी नहीं हो पाती. ऐसी स्थिति में उपभोक्ता अपने नजदीकी गैस डिस्ट्रीब्यूटर से संपर्क कर सकते हैं, या हेल्पलाइन नंबर 1800 2333 555 पर कॉल कर सकते हैं. डिस्ट्रीब्यूटर के पास जाकर बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन के जरिए भी यह प्रक्रिया पूरी कराई जा सकती है.
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        <pubDate>Sun, 02 Aug 2026 11:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>Phone Tracking: क्या बंद पड़ा फोन भी आपकी लोकेशन बता सकता है, जानें कैसे?</title>
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        <description><![CDATA[ Switch Off Phone Tracking: आज के समय में स्मार्टफोन हमारे जीवन का सबसे जरूरी हिस्सा बन चुका है. हम जहां भी जाते हैं, हमारा फोन हमारे साथ होता है. ऐसे में कई बार सुरक्षा या प्राइवेसी के लिए लोग अपने फोन को स्विच ऑफ या बंद कर देते हैं. उन्हें लगता है कि फोन बंद होने के बाद कोई भी उनकी लोकेशन का पता नहीं जान सकता. लेकिन यह सच नहीं है. क्योंकि आपका फोन बंद होने के बाद भी आपकी लोकेशन बता सकता है. अगर आप इंटरनेट यूज नहीं करते हैं तब भी लोकेशन का पता लगाने के कई तरीके मौजूद हैं.&amp;nbsp;
फोन बंद होने पर भी पूरी तरह नहीं सोता फोन
जब आप अपने फोन को स्विच ऑफ करते हैं, तो आपको लगता है कि फोन पूरी तरह से बंद हो चुका है. लेकिन असल में ऐसा नहीं होता. क्योंकि फोन बंद होने के बाद भी उसके अंदर के कुछ खास हिस्से बहुत कम बिजली पर काम करते रहते हैं. इसे लो पावर मोड कहा जाता है. &amp;nbsp;इस वजह से फोन का ब्लूटूथ और कुछ सेंसर चालू रहते हैं, भले ही आपकी स्क्रीन काली हो और फोन बंद दिखे. इस तकनीक को सबसे पहले एप्पल कंपनी ने अपने आईफोन में बहुत मजबूत बनाया. इसके बाद गूगल ने भी इसे एंड्रॉइड फोन के लिए शुरू किया. दरअसल जब आपका आईफोन या नया एंड्रॉइड फोन बंद होता है,तो वह अपने आसपास एक छुपा हुआ ब्लूटूथ सिग्नल छोड़ता रहता है. जैसे कि आपका फोन बंद है और पास से कोई दूसरा चालू आईफोन या एंड्रॉइड फोन गुजरता है. आपका बंद फोन उस चालू फोन को एक गुप्त सिग्नल भेजता है. वह दूसरा चालू फोन आपके बंद फोन की लोकेशन को इंटरनेट के जरिए कंपनी के सर्वर पर भेज देता है. इस तरह आपको अपने बंद फोन की सही लोकेशन पता चल जाती है.
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ब्लूटूथ और चिपसेट की नई तकनीक
पुराने जमाने के फोन बंद होने पर पूरी तरह शांत हो जाते थे. लेकिन आज के नए स्मार्टफोन्स में ब्लूटूथ बीकन नाम की तकनीक होती है. इसके अलावा फोन के अंदर की मुख्य चिप को इस तरह बनाया जाता है कि वह बिना पूरी बैटरी खत्म किए महीनों तक हल्के सिग्नल भेज सके. इसी वजह से अगर आपका फोन चोरी हो जाए या स्विच ऑफ हो जाए, तब भी उसे ढूंढा जा सकता है. मान लो अगर फोन में ये सारी तकनीक नहीं भी है, तब भी पुलिस बंद फोन की आखिरी लोकेशन का पता लगा सकती है. क्योंकि जब तक फोन चालू रहता है, वह अपने पास के मोबाइल टावर से जुड़ा होता है. इसे ट्राएंगुलेशन कहते हैं. जैसे ही फोन बंद होता है, मोबाइल कंपनी के पास उस टावर की जानकारी रिकॉर्ड हो जाती है जहां फोन आखिरी बार चालू था. इससे एक अंदाजा मिल जाता है कि फोन किस इलाके में बंद हुआ.&amp;nbsp;
इससे कैसे बचें
अगर कोई चाहता है कि उसका फोन बंद होने के बाद बिल्कुल भी ट्रैक न हो, तो उसके पास केवल दो ही रास्ते होते हैं. फोन की बैटरी को पूरी तरह बाहर निकाल देना, जो आज के नए फोन्स में मुमकिन नहीं है. या फोन को एक ऐसे खास पाउच या बैग में रखना जो किसी भी तरह के रेडियो या ब्लूटूथ सिग्नल को बाहर नहीं आने देता.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Sun, 02 Aug 2026 11:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>क्या पानी में डूबने से खराब हो जाएगी Apple Watch? जानिए क्या है सच्चाई</title>
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        <description><![CDATA[ Apple Watch: एप्पल के कई सारे डिवाइस मार्केट में मौजूद हैं जिन्हें लोग खूब पसंद करते हैं. इसी कड़ी में बता दें कि एप्पल वॉच युवाओं के बीच काफी चर्चित डिवाइस है. एप्पल वॉच में यूजर्स को कई सारे एडवांस फीचर्स देखने को मिल जाते हैं. लेकिन इसे खरीदने से पहले सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि अगर ये गलती से पानी में गिर जाए या पहनकर तैराकी करें तो क्या Apple Watch खराब हो जाएगी? आइए जानते हैं क्या है इसकी सच्चाई.
क्या Apple Watch पूरी तरह Waterproof है
जानकारी के मुताबिक, सबसे पहले ये समझना जरूरी है कि Apple Watch को पूरी तरह Waterproof नहीं बल्कि Water Resistant बनाया गया है. यानी ये एक लीमिट तक पानी का सामना कर सकती है लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि इसे हर तरह के पानी या हर गहराई में सुरक्षित माना जाए.
Apple Watch की वॉटर रेजिस्टेंस समय के साथ कम भी हो सकती है. अगर घड़ी को जोरदार झटका लगे, उसकी स्क्रीन टूट जाए या लंबे समय तक इस्तेमाल किया जाए तो उसकी सेफ्टी पहले जैसी नहीं रहती.
किन जगहों पर हो सकता है नुकसान
आपको बता दें कि Apple Watch पानी को सह सकती है लेकिन हर तरह का पानी डिवाइस के लिए सेफ नहीं होता है. साबुन, शैंपू, डिटर्जेंट, परफ्यूम, सनस्क्रीन, लोशन और केमिकल मिले पानी से इसकी सील और बाहरी कोटिंग खराब हो सकती है.

इसके अलावा तेज बहाव वाला पानी, वॉटर स्कीइंग, जेट स्की या हाई-प्रेशर वॉटर जेट जैसी एक्टिविटी भी घड़ी को नुकसान पहुंचा सकती हैं. समुद्र के खारे पानी में इस्तेमाल करने के बाद भी घड़ी को साफ पानी से धोना जरूरी होता है क्योंकि नमक धीरे-धीरे इसके पार्ट्स पर असर डाल सकता है.
अगर Apple Watch भीग जाए तो क्या करें
अगर आपकी Apple Watch बारिश में भीग जाए या पानी में चली जाए तो घबराने की जरूरत नहीं है. सबसे पहले उसे मुलायम और सूखे कपड़े से अच्छी तरह साफ करें. अगर घड़ी में स्पीकर के अंदर पानी चला गया है तो Water Lock फीचर की मदद से स्पीकर से पानी बाहर निकाला जा सकता है. इसके बाद घड़ी को नॉर्मल तरीके से सूखने दें. हेयर ड्रायर, ब्लोअर या किसी दूसरे गर्म करने वाले डिवाइस का इस्तेमाल बिलकुल भी न करें.
कौन-से मॉडल पानी में सुरक्षित हैं?
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि Apple Watch Series 2 और इसके बाद आने वाले लगभग सभी मॉडल 50 मीटर तक की वॉटर रेजिस्टेंस रेटिंग के साथ आते हैं. इसका मतलब है कि इन्हें स्विमिंग पूल में तैराकी या हल्के पानी वाले खेलों के दौरान इस्तेमाल किया जा सकता है.
वहीं Apple Watch Ultra और Ultra 2 इससे भी ज्यादा मजबूत बनाए गए हैं. ये गहरे पानी में मनोरंजक डाइविंग और एडवेंचर एक्टिविटी के लिए बेहतर ऑप्शन माने जाते हैं. हालांकि प्रोफेशनल स्कूबा डाइविंग या ज्यादा दबाव वाले पानी में इनका इस्तेमाल भी कम करना चाहिए.
इन बातों का रखें ध्यान
Apple Watch पहनकर सॉना, स्टीम रूम या बहुत गर्म पानी में जाने से बचना चाहिए. बहुत ज्यादा टेंपरेचर और भाप इसकी वॉटर रेजिस्टेंस को खराब कर सकते हैं. अगर घड़ी की स्क्रीन में दरार आ जाए या बॉडी को कोई नुकसान पहुंचे तो उसे पानी में इस्तेमाल करने से बचें. ऐसी स्थिति में सर्विस सेंटर से चेक कराना बेहतर रहता है.

अगर आपका इस्तेमाल सिर्फ रोजमर्रा की फिटनेस, वर्कआउट, बारिश या स्विमिंग पूल तक सीमित है तो Apple Watch के ज्यादातर नए मॉडल आपके लिए एक बेहतर ऑप्शन साबित हो सकते हैं. लेकिन अगर आप एडवेंचर स्पोर्ट्स, गहरे पानी में डाइविंग या समुद्र में उतरना पसंद करते हैं तो Apple Watch Ultra सीरीज आपके लिए ज्यादा बेहतर ऑप्शन साबित हो सकती है. इसीलिए एप्पल वॉच खरीदने से पहले अपनी जरूरत को चेक करें उसके बाद ही डिवाइस को खरीदें.
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        <pubDate>Sat, 01 Aug 2026 22:30:23 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Gmail भूल जाइए! ये 5 प्राइवेट Email सर्विस आपकी Privacy रखेंगी सुरक्षित</title>
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        <description><![CDATA[ Gmail: आज के समय में ईमेल लोगों की डिजिटल जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है. ऑफिस के काम से लेकर ऑनलाइन बैंकिंग, सोशल मीडिया या किसी वेबसाइट पर अकाउंट बनाने तक, ईमेल का इस्तेमाल ज्यादातर जगहों पर होने लगा है. पिछले 20 से ज्यादा सालों से Gmail इस क्षेत्र में सबसे फेमश सर्विस रही है. बेहतरीन इंटरफेस और कई शानदार फीचर्स के कारण करोड़ों लोग आज ईमेल का इस्तेमाल करते हैं.
हालांकि, समय के साथ कई यूजर्स ने डेटा प्राइवेसी को लेकर चिंता जताई है. ऐसे में अब लोग ऐसे ईमेल प्लेटफॉर्म की तलाश कर रहे हैं जो उनकी प्राइवेट जानकारी को बेहतर तरीके से सेफ रखें. इसी कड़ी में आज हम आपको ऐसे 5 ऑप्शन के बारे में बताने जा रहे हैं जिनकी मदद से आप भी अपने प्राइवेट डेटा को सेफ रख सकते हैं.
Zoho Mail
Zoho Mail उन लोगों के लिए अच्छा ऑप्शन है जो सेफ ईमेल के साथ प्रोफेशनल पहचान भी बनाना चाहते हैं. इसकी मदद से आप अपना कस्टम डोमेन वाला ईमेल एड्रेस भी बना सकते हैं जो छोटे बिजनेस और फ्रीलांसरों के लिए बहुत काम का होता है.

Soverin
अब अगर आप डेटा प्राइवेसी को महत्व देते हैं तो आप Soverin पर भी विचार कर सकते हैं. कंपनी का कहना है कि वह यूजर्स की जानकारी इकट्ठा नहीं करती, किसी तरह की प्रोफाइलिंग नहीं करती और ईमेल में विज्ञापन भी नहीं दिखाती है. इतना ही नहीं, ईमेल भेजते समय आपका IP एड्रेस भी सिक्योर रहता है. फिलहाल ये ईमेल सर्विस यूजर्स को देती है जबकि इसके ऑफिस प्रोडक्टिविटी टूल्स पर भी काम चल रहा है. बता दें कि इसकी शुरुआती मेंबरशिप लगभग 4 डॉलर प्रति महीने है.
Runbox
इसके अलावा अगर आप ऐसी ईमेल सर्विस चाहते हैं जो आपकी प्राइवेसी के साथ-साथ पर्यावरण के प्रति भी जिम्मेदार हो तो Runbox आपके लिए एक बेहतरीन ऑप्शन साबित हो सकता है. नॉर्वे स्थित ये कंपनी 100% रिन्यूएबल एनर्जी से अपने सर्वर चलाने का दावा करती है. साथ ही ये यूरोप के GDPR और नॉर्वे के सख्त डेटा सुरक्षा कानूनों का पालन करती है.
Runbox की एक और खास बात ये है कि कंपनी चैटबॉट के बजाय असली कस्टमर मदद उपलब्ध कराने पर जोर देती है. हालांकि ये पूरी तरह पेड सर्विस है. इसकी शुरुआती कीमत करीब 2 डॉलर प्रति माह से शुरू होती है.
Proton Mail
आपको बता दें कि अगर आप Gmail जैसा एक्सपीरिएंस चाहते हैं लेकिन अपनी प्राइवेसी से समझौता नहीं करना चाहते हैं तो Proton Mail आपके लिए एक बेहतरीन ऑप्शन साबित हो सकता है.
इस प्लेटफॉर्म की सबसे बड़ी खासियत एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन है जिससे आपके भेजे और रिसीव किए गए ईमेल केवल आप और सामने वाला व्यक्ति ही पढ़ सकते हैं. कंपनी का दावा है कि वह ईमेल स्कैन नहीं करती और न ही यूजर्स के डेटा का इस्तेमाल ऐड या AI ट्रेनिंग के लिए करती है.

Proton केवल ईमेल ही नहीं बल्कि क्लाउड स्टोरेज, पासवर्ड मैनेजर, कैलेंडर, VPN, वीडियो मीटिंग और डॉक्यूमेंट एडिटिंग जैसे कई सर्विस भी उपलब्ध कराता है.
Tuta Mail
जर्मनी की Tuta Mail भी प्राइवेसी पर फोकस करने वाली ईमेल सर्विसेज में जानी जाती है. ये एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन, ऐड फ्री इंटरफेस और रिन्यूएबल एनर्जी से कंट्रोल्ड सर्वर जैसी फीचर्स देती है. इसके मुफ्त प्लान में यूजर्स को 1GB स्टोरेज और ऑनलाइन कैलेंडर भी शामिल है. हालांकि, मुफ्त अकाउंट इस्तेमाल करने वालों के लिए एक शर्त है. अगर आप छह महीने तक अपने अकाउंट में लॉगिन नहीं करते हैं तो कंपनी आपका अकाउंट हटा सकती है. इसके अलावा हटाए गए ईमेल एड्रेस को दोबारा इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. आपको बता दें कि इसके प्रीमियम प्लान की कीमत 4 डॉलर प्रति महीने है.
कैसे चुनें सही ईमेल सर्विस
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि नई ईमेल सर्विस चुनते समय केवल स्टोरेज या मुफ्त प्लान पर ध्यान न दें. दरअसल, कोई भी नई ईमेल सर्विस चुनने से पहले ये भी देखें कि कंपनी आपकी जानकारी को कैसे सेफ रखती है, क्या एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन उपलब्ध है, क्या विज्ञापन दिखाए जाते हैं और क्या आपकी जानकारी किसी थर्ड पार्टी के साथ शेयर की जाती है. अगर आपको ऑफिस टूल्स भी चाहिए तो Proton और Zoho आपके लिए बेहतरीन ऑप्शन साबित हो सकता है. वहीं, अगर सुरक्षित और प्राइवेट ईमेल की जरूरत है तो Tuta, Runbox और Soverin भी एक अच्छे ऑप्शन साबित हो सकते हैं.
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        <pubDate>Sat, 01 Aug 2026 22:30:21 +0530</pubDate>
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        <title>Amazon Robotaxi: कैसे चलती है Amazon की Robotaxi, ड्राइवर की जरूरत क्यों नहीं पड़ती?</title>
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        <description><![CDATA[ Amazon Self Driving Robotaxi: आज के समय में तकनीक इतनी आगे बढ़ चुकी है कि जिन चीजों को हम फिल्मों में देखते थे, वे अब सच हो रही हैं. जैसे कि अब कार चलाने के लिए ड्राइवर की जरूरत खत्म होने वाली है. हाल ही में दिग्गज कंपनी अमेजन की ज़ूक्स नाम की रोबोटैक्सी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. यह एक ऐसी टैक्सी है जिसमें न तो कोई ड्राइवर होता है, न ही स्टीयरिंग व्हील और न ही कोई पैडल. यह पूरी तरह से कंप्यूटर और तकनीक की मदद से सड़कों पर दौड़ती है. आइए समझते हैं कि यह अनोखी टैक्सी कैसे काम करती है.&amp;nbsp;
रोबोटैक्सी का डिजाइन
यह रोबोटैक्सी दिखने में आम कारों जैसी बिल्कुल नहीं है. यह एक छोटी चौकोर डिब्बे या कैरिज जैसी दिखती है. इस टैक्सी के अंदर ड्राइवर के बैठने के लिए कोई जगह नहीं होती. इसमें आमने-सामने दो सीटें होती हैं, जिस पर चार लोग आराम से बैठ सकते हैं. साथ ही इस कार का कोई आगे या पीछे का हिस्सा नहीं होता. यह दोनों तरफ से एक जैसी दिखती है और बिना यू-टर्न लिए दोनों दिशाओं में चल सकती है. इस रोबोटैक्सी को चलाने के लिए किसी इंसान की नहीं, बल्कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की जरूरत पड़ती है. इस टैक्सी के चारों तरफ कई हाई-टेक कैमरे लगे होते हैं, जिनकी मदद से ये सड़क पर चल रहे लोगों, दूसरी गाड़ियों, ट्रैफिक सिग्नल और रोड पर बने निशानों को लगातार देखते रहते हैं.
इस टैक्सी में लिडार सेंसर तकनीक का उपयोग किया गया है. लिडार सेंसर कार के चारों तरफ लेज़र लाइट छोड़ते हैं. यह लाइट सामने की चीजों से टकराकर वापस आती है, जिससे कंप्यूटर को यह पता चल जाता है कि कोई भी वस्तु या इंसान कार से कितनी दूरी पर है. यह तकनीक रात के अंधेरे में भी बिल्कुल साफ देख सकती है. साथ ही राडार सेंसर खराब मौसम जैसे भारी बारिश या कोहरे में भी कार के आसपास की चीजों की रफ्तार और दूरी को मापने का काम करते हैं.&amp;nbsp;
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ड्राइवर की जरुरत क्यों नहीं पड़ती
इस रोबोटैक्सी को किसी ड्राइवर की जरूरत इसलिए नहीं पड़ती क्योंकि इसे लेवल 5 ऑटोनॉमस तकनीक से बनाया गया है. इसका मतलब है कि यह गाड़ी हर तरह की सड़क और मौसम में खुद को पूरी तरह संभाल सकती है. इसके पास पूरे शहर का एक बहुत ही सटीक डिजिटल मैप होता है, जिससे कार को पहले से पता होता है कि किस मोड़ पर मुड़ना है और कहां पर गड्ढे या ट्रैफिक जाम मिल सकता है.
अमेजन ने इसमें सुरक्षा का बहुत ध्यान रखा है. कार के सभी मुख्य सिस्टम जैसे ब्रेक, स्टीयरिंग और कंप्यूटर की दो-दो कॉपियां लगाई गई हैं. अगर चलती गाड़ी में एक सिस्टम खराब भी हो जाए, तो दूसरा सिस्टम तुरंत काम संभाल लेता है और पैसेंजर्स को सुरक्षित जगह पर रोक देता है. इसके अलावा, एक रिमोट कंट्रोल टीम हमेशा कंप्यूटर स्क्रीन पर इस टैक्सी की निगरानी करती है, जो जरूरत पड़ने पर कहीं से भी इसे रोक सकती है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Sat, 01 Aug 2026 22:30:20 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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    <item>
        <title>Android यूजर्स की मौज! एक झटके में बंद होंगे Scam SMS, जानें तरीका</title>
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        <description><![CDATA[ Android Tips: आज के समय में टेक्नोलॉजी काफी एडवांस हो चुकी है. ऐसे में अब साइबर अपराधी भी लोगों को ठगने के लिए नई-नई तकनीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं. ये कभी बैंक खाते के नाम पर तो कभी KYC अपडेट या इनाम जीतने का लालच देकर लोगों की पर्सनल जानकारी चुराने की कोशिश की जाती है. कई बार यूजर्स को समझ ही नहीं आता कि कौन-सा मैसेज असली है और कौन-सा फर्जी है.
इसी कड़ी में बता दें कि अगर आपके एंड्रॉयड फोन पर भी लगातार अनजान नंबरों से संदिग्ध मैसेज आ रहे हैं तो आज हम आपको एक ऐसे तरीके के बारे में बताने जा रहे हैं जिनकी मदद से आप भी अपने फोन में स्कैम एसएमएस को बंद कर सकेंगे.
आखिर क्यों आते हैं स्कैम मैसेज
आपको बता दें कि फोन पर लगातार स्पैम या स्कैम SMS आने के पीछे कई कारण होते हैं. इसमें हो सकता है आपने किसी गलत वेबसाइट पर अपना मोबाइल नंबर दर्ज किया हो. कई बार डेटा लीक (Data Breach) की वजह से भी आपकी पर्सनल जानकारी साइबर अपराधियों तक पहुंच जाती है. इसके अलावा अगर आपका मोबाइल नंबर पब्लिक प्लेटफॉर्म पर मौजूद है तब भी ऐसे मैसेज मिलने की संभावना बढ़ जाती है.

क्या होता है Message Protection फीचर
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि NordVPN ने अपने एंड्रॉयड ऐप में Message Protection फीचर जोड़ा है. ये फीचर आने वाले SMS को स्कैन करता है और अगर किसी मैसेज में धोखाधड़ी की संभावना हो तो यूजर को तुरंत चेतावनी देता है.
ये सिस्टम मैसेज में मौजूद लिंक, गलत शब्दों और भेजने वाले की जानकारी को चेक करता है. अगर कोई लिंक पहले से खतरनाक माना गया हो या भेजने वाले नंबर का रिकॉर्ड संदिग्ध हो तो ऐप अलर्ट दिखा देता है. इसका मकसद यूजर को पहले से सावधान करना है ताकि वह किसी फर्जी लिंक पर क्लिक करने से बच सके.
इसे कैसे करें एक्टिव
आपको बता दें कि ये फीचर अपने आप चालू नहीं होता है. अगर आपके पास NordVPN का सपोर्टेड प्लान है तो आपको इसे मैन्युअली ऑन करना होगा.
इसके लिए ये स्टेप्स अपनाएं

NordVPN ऐप खोलें.
नीचे दिए गए Products सेक्शन में जाएं.
वहां Message Protection ऑप्शन सर्च करें
इसके सामने मौजूद टॉगल को ऑन कर दें.
चाहें तो साथ में Call Protection फीचर भी एक्टिव कर सकते हैं.
इसके बाद आने वाले SMS की निगरानी शुरू हो जाएगी.

स्कैम मिलने पर क्या करता है ये फीचर

अगर कोई मैसेज संदिग्ध पाया जाता है तो ऐप उसे अपने आप डिलीट नहीं करता और न ही नंबर को तुरंत ब्लॉक करता है. दरअसल, ऐस स्क्रीन पर एक वार्निंग मैसेज दिखाता है जिसमें बताया गया होता है कि ये मैसेज धोखाधड़ी वाला हो सकता है. इसके बाद फैसला पूरी तरह यूजर के हाथ में रहता है कि वह मैसेज हटाना चाहता है, ब्लॉक करना चाहता है या उसे नजरअंदाज करना चाहता है. इस सिस्टम का फायदा ये है कि गलती से कोई जरूरी मैसेज डिलीट होने का खतरा कम रहता है.
किन यूजर्स के लिए उपलब्ध है ये फीचर
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इस फीचर की भी कुछ लिमिटेशन हैं. दरअसल, ये सुविधा मुफ्त नहीं है. इसे इस्तेमाल करने के लिए NordVPN का ऐसा पेड प्लान लेना पड़ता है जिसमें Call और Message Protection शामिल हो. इसके अलावा ये फीचर केवल एंड्रॉयड यूजर्स के लिए उपलब्ध है. iPhone इस्तेमाल करने वाले यूजर्स फिलहाल इस फीचर का इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं. इसके अलावा ये केवल नॉर्मल SMS पर काम करता है. WhatsApp, Telegram या दूसरे मैसेजिंग ऐप पर आने वाले मैसेज की जांच ये फीचर नहीं करता है.
बिना पैसे खर्च किए भी रह सकते हैं सुरक्षित
अगर आप किसी पेड सेवा का इस्तेमाल नहीं करना चाहते, तब भी एंड्रॉयड फोन में कई ऑप्शन मौजूद हैं. दरअसल, ज्यादातर एंड्रॉयड स्मार्टफोन में Google Messages ऐप उपलब्ध होता है. इसमें Spam Protection और Scam Protection जैसे फीचर्स मिलते हैं.
इसे ऑन करने के लिए स्टेप्स

Google Messages ऐप खोलें.
ऊपर प्रोफाइल आइकन पर टैप करें.
Messages Settings में जाएं.
Protection &amp;amp; Safety ऑप्शन सेलेक्ट करें.
Spam Protection को ऑन कर दें.

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        <pubDate>Sat, 01 Aug 2026 22:30:19 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>महंगे Headphones खरीदना ही काफी नहीं! धांसू साउंड के लिए करें ये 5 काम</title>
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        <description><![CDATA[ महंगे Headphones खरीदना ही काफी नहीं! धांसू साउंड के लिए करें ये 5 काम ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 01 Aug 2026 22:30:17 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>इन यूजर्स की हुई बल्ले&amp;बल्ले! अब फ्री में मिलेगा सबसे एडवांस ChatGPT मॉडल</title>
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        <description><![CDATA[ OpenAI ChatGPT: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पूरी दुनिया में काफी तेजी से फैल रहा है. एआई चैटबॉट अब लोगों के काम को आसान बनाने का काम कर रही हैं. ChatGPT देश में एक फेमश एआई चैटबॉट बन चुका है. इसी को देखते हुए अब कंपनी ने एक नया प्रोग्राम शुरू किया है. दरअसल, इस प्रोग्राम के तहत आने वाले सालों में करीब 1 लाख शोधकर्ताओं (Researchers) को अपने सबसे एडवांस ChatGPT AI मॉडल का फ्री एक्सेस दिया जाएगा. इस प्रोग्राम का मकसद है कि दुनियाभर के वैज्ञानिक बेहद एडवांस एआई टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर सकें जिससे नए प्रोजेक्ट्स और खोज को आसान बनाया जा सके.
कौन कर सकता है आवेदन
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ये प्रोग्राम नॉर्मल यूजर्स के लिए नहीं पेश किया गया है. कंपनी ने साफ कर दिया है कि ये प्रोग्राम सिर्फ चयनित विश्वविद्यालयों और मान्यता प्राप्त रिसर्च संस्थानों के वैज्ञानिक एवं शोधकर्ता ही इस योजना के लिए पात्र होंगे.
अगर किसी शोधकर्ता का चयन हो जाता है तो वह अपने ही संस्थान के मैक्सिमम चार दूसरे सहयोगियों को भी इस प्रोग्राम में शामिल कर सकता है. इससे टीम के रूप में रिसर्च करना आसान होगा और कई विषयों पर बेहतर मदद मिल सकेगी.

कब और कैसे शुरू होगा ये कार्यक्रम
कंपनी के अनुसार इस योजना की शुरुआत चरणबद्ध तरीके से की जाएगी. सबसे पहले इस साल गर्मियों में लगभग 10,000 शोधकर्ताओं को इसमें शामिल किया जाएगा. इसके बाद धीरे-धीरे इस कार्यक्रम का विस्तार किया जाएगा और 2027 तक कुल 1 लाख शोधकर्ताओं को इसका लाभ मिलेगा.
इस कार्यक्रम के लिए आवेदन करने का प्रोसेस भी शुरू हो चुका है. बता दें कि इस प्रोग्राम का फायदा सिर्फ उन्हीं विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों को मिलेगा जिनकी शैक्षणिक और अनुसंधान क्षेत्र में मजबूत पहचान है.
क्या मिलेगी सुविधा
आपको बता दें कि इस कार्यक्रम के तहत चयनित प्रतिभागियों को OpenAI के सबसे एडवांस AI मॉडल्स का मुफ्त इस्तेमाल करने का मौका मिलेगा. इनमें कंपनी की नई GPT-5.6 मॉडल फैमिली भी शामिल होगी.
इसके अलावा आवेदन करने वाले लोगों को ChatGPT, ChatGPT Work और Codex जैसे एडवांस टूल्स को इस्तेमाल करने का मौका मिलेगा. नॉर्मल यूजर्स की तुलना में उन्हें Higher Usage Limits और बड़े कॉन्टेक्स्ट विंडो जैसी सुविधाएं भी प्रदान की जाएंगी.
इन टूल्स की मदद से शोधकर्ता बड़े डेटा को चेक कर सकेंगे, प्रोग्रामिंग कोड तैयार कर पाएंगे, रिसर्च पेपर की समीक्षा कर सकेंगे और रिसर्च ग्रांट के लिए आवेदन तैयार करने जैसे कई मुश्किल काम तेजी से पूरे कर सकेंगे.
लाइफ साइंस रिसर्च के लिए मिलेंगे खास AI टूल
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि OpenAI केवल नॉर्मल AI मॉडल ही उपलब्ध नहीं करा रहा है. कंपनी 75 से ज्यादा स्पेशल लाइफ साइंस टूल्स भी उपलब्ध कराएगी. इन टूल्स का इस्तेमाल Genetics, जीनोमिक्स, प्रोटीन मॉडलिंग, दवा की खोज (Drug Discovery) और जैविक अनुसंधान से जुड़े कई क्षेत्रों में किया जा सकेगा.

इतना ही नहीं, शोधकर्ता ChatGPT को वैज्ञानिक शोध-पत्रों, सार्वजनिक डेटाबेस, कंप्यूटेशनल नोटबुक और दूसरे रिसर्च प्लेटफॉर्म्स के साथ भी जोड़ सकेंगे. इससे अलग-अलग सोर्सेज से जानकारी जुटाने और उसको चेक करने में काफी आसानी होगी.
आखिर OpenAI ऐसा क्यों कर रहा है
OpenAI का मानना है कि विज्ञान की प्रगति सिर्फ उन संस्थानों तक ही सीमित नहीं रहनी चाहिए जिनके पास बड़ी मशीनें और ज्यादा बजट है. इसीलिए कंपनी चाहती है कि बेहतर रिसर्च करने के अवसर ज्यादा से ज्यादा वैज्ञानिकों तक पहुंचें.
AI से बदल सकता है वैज्ञानिक अनुसंधान का भविष्य
विज्ञान, इंजीनियरिंग और गणित जैसे क्षेत्रों में AI का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है. ऐसे में OpenAI की ये पहल शोधकर्ताओं के लिए बड़ा बदलाव साबित हो सकती है. अगर वैज्ञानिक रोजमर्रा के दोहराए जाने वाले काम AI की मदद से तेजी से पूरा कर पाएंगे तो वे अपना ज्यादा समय नए एक्सपेरिमेंट, खोजों पर लगा सकेंगे. आने वाले वर्षों में ये कार्यक्रम वैश्विक वैज्ञानिक अनुसंधान की स्पीड को नई दिशा देने में जरूरी भूमिका निभा सकता है.
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Generative AI India: एआई से काम कितना आसान हुआ, कितनी नौकरियों पर खतरा? ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 01 Aug 2026 06:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>Deepfake पर सरकार का सबसे बड़ा एक्शन! इन AI प्रोजेक्ट्स को मिली मंजूरी</title>
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        <description><![CDATA[ Deepfake AI: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पूरी दुनिया में काफी तेजी से विस्तार कर रहा है. इसी के साथ अब साइबर ठग भी लोगों को ठगने के लिए एआई का इस्तेमाल कर रहे हैं. पूरे देश में साइबर फ्रॉड का मामला काफी तेजी से बढ़ रहा है. एआई की मदद से डीपफेक वीडियो, फर्जी फोटो और नकली ऑडियो का खतरा भी बढ़ता जा रहा है. इनका इस्तेमाल लोगों की पहचान चुराने, ऑनलाइन ठगी, गलत जानकारी फैलाने और साइबर अपराधों में किया जा रहा है. इसी कड़ी में सराकर ने इस चुनौती से निपटने के लिए बड़ा कदम उठाया है.
सोशल मीडिया कंपनियों के लिए सख्त नियम
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स जैसे Meta, X और दूसरे डिजिटल इंटरमीडियरी के लिए नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं. इन नियमों को सोशल मीडिया पर बढ़ते AI से बने हुए भ्रामक और गैरकानूनी कंटेंट के प्रसार को रोकना है. इसके साथ ही सरकार इंटरनेट यूजर्स की सेफ्टी की ओर भी काफी ध्यान दे रही है. इसीलिए उनकी सुरक्षा के लिए ये बड़ा कदम उठाया गया है.

इलेक्ट्रॉनिक्स एवं आईटी राज्य मंत्री जितिन प्रसाद के मुताबिक, AI टेक्नोलॉजी के कारण नकली वीडियो, फोटो और ऑडियो बनाना पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा आसान हो गया है. यही वजह है कि सरकार ने मौजूदा कानूनों को और मजबूत बनाने का फैसला किया है.
AI कंटेंट पर लेबल
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि नए नियमों के तहत जिन प्लेटफॉर्म्स पर AI से तैयार कंटेंट शेयर किया जाएगा उन्हें ऐसे कंटेंट पर पूरी तरह से एआई से बना हुआ है ये लेबल लगाना होगा जिससे यूजर्स को आसानी से पता लग सके कि जो वो कंटेंट देख रहे हैं वो असली नहीं है बल्कि एआई की मदद से तैयार किया गया है.
मात्र 3 घंटे में हटाना होगा गैरकानूनी AI कंटेंट
सरकार ने आईटी (इंटरमीडियरी गाइडलाइंस एंड डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड) नियम, 2021 में बदलाव किया है. सबसे बड़ा बदलाव ये है कि अब सोशल मीडिया कंपनियों को यूजर्स की शिकायत को तुरंत सुनना होगा और उसपर एक्शन भी लेना होगा.

इतना ही नहीं, इस नियम के अनुसार, अब अगर किसी सोशल मीडिया कंपनी को सरकार की ओर से गलत कंटेंट दिखाने या उसे हटाने के लिए लीगल नोटिस जाता है तो उसे 3 घंटे के अंदर सही करना होगा. बता दें कि पहले कंपनियों को इसका जवाब देने या एक्शन लेने के लिए 36 घंटों का समय मिलता था.
IIT संस्थान तैयार करेंगे स्वदेशी डीपफेक डिटेक्शन टेक्नोलॉजी
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार ने जिन 13 रिस्पॉन्सिबल AI प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी है उनमें देश के कई मेन शैक्षणिक संस्थान शामिल हैं. इन परियोजनाओं का लक्ष्य भारत में ऐसी टेक्नोलॉजी को तैयार करना है जो तुरंत डीपफेक की पहचान करें और उसे सही तरीके से सभी प्लेटफॉर्म से हटाए.
Saakshya प्रोजेक्ट
आपको बता दें कि आईआईटी जोधपुर और आईआईटी मद्रास मिलकर एक मल्टी-एजेंट डीपफेक डिटेक्शन फ्रेमवर्क तैयार कर रहे हैं जिसका नाम साक्ष्य हैं. बता दें कि ये सिस्टम AI से तैयार नकली वीडियो और फोटो की ज्यादा सटीक तरीके से पहचानने का काम करेंगे.
AI विश्लेषक
एआई विश्लेषक एक ऐसा प्रोजेक्ट है जो फर्जी ऑडियो और वीडियो की पहचान के लिए तैयार की जा रही है. इसमें AI की मदद से मीडिया फाइलों को चेक किया जाएगा और ये पता लगाया जाएगा कि उनमें किसी तरह की छेड़छाड़ या बदलाव किया गया है या नहीं.
फर्जी AI कंटेंट पकड़ने के लिए नया सिस्टम
जानकारी के मुताबिक, सरकार ने सोशल मीडिया कंपनियों को ये भी निर्देश दिया है कि वे AI बेस्ड ऑटोमेटेड टूल्स और दूसरे टेक्नोलॉजी वाले तरीकों का इस्तेमाल करें जिससे गैरकानूनी AI कंटेंट की पहचान समय रहते हो सके और उसे तुरंत प्लेटफॉर्म से हटाया जा सके.
डीपफेक के खिलाफ मजबूत होगी भारत की तैयारी
आपको बता दें कि सरकार का मानना है कि इन स्वदेशी AI प्रोजेक्ट्स और नए नियमों के जरिए भारत डीपफेक जैसी खतरों से पहले के मुकाबले ज्यादा बेहतर तरीके से निपट सकेगा. इसके अलावा तुरंत कार्रवाई, AI कंटेंट की ठीक पहचान और एडवांस डिटेक्शन तकनीकों के जरिए ऑनलाइन दुनिया को ज्यादा सुरक्षित और भरोसेमंद बनाने की दिशा में ये एक जरूरी कदम माना जा रहा है.
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        <pubDate>Sat, 01 Aug 2026 06:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>Android यूजर्स गलत तरीके से इस्तेमाल कर रहे ये फीचर! जानें क्या हो रही गलती</title>
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        <description><![CDATA[ Android यूजर्स गलत तरीके से इस्तेमाल कर रहे ये फीचर! जानें क्या हो रही गलती ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 01 Aug 2026 06:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>Amazon Zoox New Launch: ड्राइवर नहीं, AI चलाएगा टैक्सी; यहां मिल गई मंजूरी</title>
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        <description><![CDATA[ Amazon Zoox New Launch: अब कार चलाने के लिए ड्राइवर की जरूरत खत्म होने वाली है. AI खुद ड्राइविंग करेगा. जी हां, हाल ही में Amazon की कंपनी Zoox को अमेरिका में एक बड़ी कामयाबी मिली है. कंपनी की बिना ड्राइवर वाली रोबोटैक्सी को अमेरिका के National Highway Traffic Safety Administration से मंजूरी मिल गई है. इस खबर से साफ है कि अब टेक्नोलॉजी इतनी आगे बढ़ गई है कि सड़कों पर बिना ड्राइवर वाली गाड़ियां भी नजर आने वाली हैं. आइए जानते हैं इसके बारे में पूरी जानकारी और इस मंजूरी के बाद इसमें कौन-कौन सी शर्तें रखी गई हैं.&amp;nbsp;
Zoox RoboTaxi को मिली मंजूरी
अमेरिका की NHTSA ने Amazon की कंपनी Zoox को अपनी अनोखी Robotaxi को सीमित तौर पर कमर्शियल इस्तेमाल में लाने की मंजूरी दे दी है. &amp;nbsp;NHTSA के अधिकारी जोनाथन मॉरिसन ने बताया कि Zoox को अगले दो साल तक हर साल 2,500 गाड़ियां चलाने की इजाजत मिली है, जिसकी शुरुआत सबसे पहले लास वेगास शहर से होगी. बता दें कि Zoox की यह गाड़ी एक Electric carriage जैसी दिखती है, जिसमें दोनों तरफ की सीटें आमने-सामने लगी होती हैं, ठीक उसी तरह जैसे एक ओटो और e-rikshaw में, इतना ही नहीं इसकी टॉप स्पीड करीब 120 किलोमीटर प्रति घंटा है.&amp;nbsp;



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सुरक्षा को लेकर उठाए जा रहे हैं ये सवाल
हालांकि बिना ड्राइवर वाली गाड़ियों को लेकर सुरक्षा से जुड़ी चिंताएं भी सामने आ रही हैं. NHTSA ने पहले ही Autonomous गाड़ियां बनाने वाली कंपनियों को बता दिया था कि वे उन सभी गड़बड़ियों को ध्यान से चैक कर लें, जिससे robotaxi कहीं भी परेशानी खड़ी न करें. इसके पीछे का कारण है क्योंकि Autonomous गाड़ियों से जुड़ी कई परेशानियां सामने आ रही थीं, जैसे कुछ मामलों में रोबोटैक्सी स्कूल बसों के पास से गुजरने, कंस्ट्रक्शन जोन में घुसने, पानी भरी सड़कों पर रुक जाने और ट्रैफिक नियम तोड़ने जैसी घटनाओं में भी शामिल पाई गई हैं. यही वजह है कि इसी वजह से कुछ समय पहले Zoox को अपनी 105 गाड़ियों को वापस बुलाकर सॉफ्टवेयर अपडेट करना पड़ा था. इसी परेशानियों को देखते हुए मॉरिसन ने साफ कहा कि अगर आगे भी ऐसी दिक्कतें सामने आती है, तो एजेंसी इस पर कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटेगी.
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        <pubDate>Sat, 01 Aug 2026 06:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>AI Browser क्या है, Google Chrome से कितना अलग होगा?</title>
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        <description><![CDATA[ What is AI Browser And AI technology: इन दिनों AI यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की काफी चर्चा में है. लगभग सभी इसका इस्तेमाल कर रहें हैं. आपको बता दें की यह सिर्फ मोबाइल या चैटबॉट तक ही नहीं, बल्कि इंटरनेट चलाने में भी होने लगा है. इसी वजह से AI Browser का नाम तेजी से फैल रहा है. कई लोग जानना चाहते हैं कि AI Browser क्या है और यह Google Chrome से कितना अलग होगा.
AI Browser एक ऐसा इंटरनेट ब्राउज़र है, जिसमें AI पहले से ही जुड़ा हुआ है. इसका मतलब यह है कि यह सिर्फ वेबसाइट खोलने का काम नहीं करता, बल्कि यूजर की मदद भी करता है. आप कभी भी क्रोम पर जाकर इससे कोई सवाल पूछेंगे, तो आपके सामने उस प्रश्न का समाधान यह आसान भाषा में देता है. जिससे सामने वाले को समझ में भी आ जाता है. अगर आपको फिर भी नहीं समझ आ रहा तो आप इसे कहकर अपनी भाषा में भी समझ सकते हैं. &amp;nbsp;AI Browser आपके अधिकतर कामों को आसान बनाने में मदद करता है.
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Google Chrome से कितना अलग है?
Google Chrome का इस्तेमाल दुनिया भर में करोड़ों लोग करते हैं. इसमें अगर आप कोई सवाल सर्च करते हैं, तो आपके सामने कई वेबसाइट आ जाती हैं. इसके बाद आपको खुद ही अलग-अलग वेबसाइट खोलकर जानकारी पढ़नी पड़ती है. जिसमें अधिकतर लोगों को समय लग जाता है.&amp;nbsp;
वहीं AI Browser में कई बार आपको सीधे जवाब मिल जाता है. और यह आपको आप जैसा चाहें उसी भाषा में समझा भी देता है. अगर आपको किसी विषय के बारे में जल्दी जानना है, तो यह उसे जल्दी &amp;nbsp;समझा सकता है. इससे आपका समय भी बच सकता है और बार-बार कई वेबसाइट खोलने की जरूरत भी कम हो सकती है.
AI Browser से क्या फायदा होगा?
AI Browser भी अधिक अच्छा है. इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह कई काम जल्दी करने में मदद कर सकता है. छात्र पढ़ाई के दौरान इसका इस्तेमाल कर सकते हैं. ऑफिस में काम करने वाले लोग ईमेल लिखने, नोट्स बनाने या जानकारी समझने के लिए इसका इस्तेमाल कर सकते हैं. अगर किसी को किसी बड़े आर्टिकल को छोटे में समझना है तो AI Browser उसमें भी मदद कर सकता है. यह आपको कम समय में समझाने का प्रयास करेगा.
क्या AI की हर बात सही होती है?
AI Browser काम को आसान जरूर बनाता है, लेकिन इसकी हर जानकारी सही हो, ऐसा जरूरी नहीं है. इसलिए अगर कोई जरूरी जानकारी हो, तो उसे किसी भरोसेमंद वेबसाइट या दूसरे किसी जानकारी से भी एक बार जरूर देख लेना चाहिए.
आने वाले समय में AI Browser का इस्तेमाल और बढ़ सकता है. कई बड़ी टेक कंपनियां इस तरह के ब्राउज़र पर काम कर रही हैं. ऐसे में ऐसा माना जा रहा है कि भविष्य में इंटरनेट इस्तेमाल करने का तरीका पहले से काफी बदल सकता है. जिसका मतलब यह है कि इसमें और भी फीर्चस एड हो सकते हैं. अगर आप रोज इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं, तो आने वाले दिनों में AI Browser आपके कई काम आसान बना सकता है.
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        <pubDate>Sat, 01 Aug 2026 06:30:05 +0530</pubDate>
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        <title>क्या हैकिंग से बचा सकता है VPN? यहां जानें जवाब</title>
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        <description><![CDATA[ VPN Safety: ऑनलाइन थ्रेट से बचने में VPN आपके काफी काम आ सकता है. VPN का मतलब वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क होता है और आमतौर पर इसे इंटरनेट पर प्राइवेसी बचाने के सबसे बड़े तरीकों में गिना जाता है. यह कई थ्रेट से आपको प्रोटेक्शन दे सकता है. इसके कई फायदे भी हैं, लेकिन फुल प्रोटेक्शन के लिए इस पर निर्भर रहना खतरनाक भी साबित हो सकता है और अगर आप फ्री VPN सर्विस यूज कर रहे हैं तो यह खतरा और बढ़ जाता है. आज हम जानेंगे कि यह किन खतरों से आपको बचा सकता है और किन खतरों को लेकर सावधान रहने की जरूरत है.
क्या होता है VPN?
VPN यानी वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क एक ऐसी तकनीक है जो आपके इंटरनेट कनेक्शन को सुरक्षित बनाती है. VPN आपके डिवाइस के IP एड्रेस को छिपा देता है, जिससे सर्विस प्रोवाइडर और वेबसाइट आदि के लिए आपको पहचानना मुश्किल हो जाता है. इसके लिए यह आपके डिवाइस और इंटरनेट के बीच एक Encrypted Tunnel तैयार करता है. इसी टनल में आपकी सारी इंटरनेट एक्टिविटी ऑपरेट होती हैं.&amp;nbsp;
क्या हैकिंग से बचा सकता है VPN?
इस सवाल का जवाब है कि VPN आपको हैकिंग से पूरी तरह प्रोटेक्शन नहीं दे सकता. VPN की मदद से आप थर्ड-पार्टी तक अपना डेटा जाने से रोक सकते हैं. यह आपकी ऑनलाइन एक्टिविटीज को भी हाइड कर सकता है, जिससे विज्ञानपदाता और इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर आपको ट्रैक नहीं कर सकते. लेकिन जब हैकिंग की बात आती है तो मामला थोड़ा अलग हो जाता है. भले ही आप VPN यूज कर रहे हैं, लेकिन यह आपको मलिशियस लिंक पर क्लिक करने या वायरस वाली फाइल डाउनलोड करने से नहीं रोक सकता. अगर आप अनजाने में ऐसी किसी फाइल या लिंक पर क्लिक करते हैं तो वायरस आपके सिस्टम में घुस सकता है. अगर एक बार सिस्टम में वायरस घुस जाए तो VPN इसे कंट्रोल नहीं कर सकता. यह ध्यान रखने वाली बात है कि VPN पूरे सिक्योरिटी सिस्टम की एक लेयर है. फुल प्रोटेक्शन के लिए VPN के साथ एंटीवायरस सॉफ्टवेयर और पासवर्ड मैनेजर आदि के इस्तेमाल की सलाह दी जाती है.
DDoS अटैक रोक सकता है VPN
भले ही VPN आपको हैकिंग से पूरी तरह सुरक्षित न रख पाए, लेकिन यह आपको डिस्ट्रीब्यूटेड डिनाइल ऑफ सर्विस (DDoS) अटैक से बचा सकता है. DDoS अटैक इंटरनेट सर्विसेस को डिसरप्ट करने के लिए किया जाता है. इसके लिए सिर्फ आपके IP एड्रेस और बॉट के नेटवर्क की जरूरत होती है. इसके बाद कोई भी आपके इंटरनेट कनेक्शन पर इन बॉट्स को घुसा सकता है. इससे बचने में VPN आपके काम आ जाएगा. यह आपके IP एड्रेस को हाइड कर देता है. इसलिए आमतौर पर VPN को इनेबल रखने की सलाह दी जाती है.
फ्री VPN ऐप्स पर न करें भरोसा
कुछ दिन पहले ही एक रिसर्च सामने आई थी, जिसमें बताया गया था कि गूगल प्ले स्टोर पर लिस्टेड कई पॉपुलर फ्री VPN ऐप्स अपने यूजर्स को प्राइवेसी नहीं दे पा रही हैं. इस रिसर्च में 281 सबसे पॉपुलर VPN ऐप्स को शामिल किया गया था, जिन्हें कुल 2.4 बिलियन बार डाउनलोड किया जा चुका है. रिसर्चर ने पाया कि इनमें से 29 ऐप्स ऐसी थीं, जो यूजर ट्रैफिक को एनक्रिप्टेड टनल से लीक कर रही थीं. इस टनल से डेटा लीक होना प्राइवेसी के लिए काफी खतरनाक माना जाता है. वहीं 61 ऐप्स ऐसी थीं, जो प्लेन टेक्स्ट में डेटा ट्रांसमिट कर रही थीं. इस डेटा को नेटवर्क मॉनिटर करने वाला कोई भी व्यक्ति रीड कर सकता था.
हर देश में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता VPN
कई लोगों को इस बात से हैरानी हो सकती है कि दुनिया के हर देश में VPN यूज नहीं किया जा सकता. बेलारूस ने 2015 से इस पर बैन लगाया हुआ है. इराक में 2014 में VPN पर पाबंदी लगाई थी, जो अब तक जारी है. तुर्कमेनिस्तान ने भी 2019 में इसे बैन कर दिया था. नॉर्थ कोरिया में तो VPN सॉफ्टवेयर या ऐप्स रखना भी आपको मुश्किल में डाल सकता है. इनके अलावा चीन, म्यांमार, ईरान और रूस में भी VPN पर कड़ी पाबंदियां लगाई गई हैं.
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        <pubDate>Fri, 31 Jul 2026 18:30:15 +0530</pubDate>
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        <title>Common Reasons Behind Cyber Attack: फोन बना साइबर अपराधियों का निशाना, रोज 1.3 लाख हमले</title>
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        <description><![CDATA[ Common Reasons Behind Cyber Attack: आजकल स्मार्टफोन सिर्फ बात करने का जरिया नहीं रहा, बल्कि यह हर किसी के लिए एक मिनी बैंक, डिजिटल लॉकर और ऑफिस बन चुका है. आज के समय में अगर एक आदमी के फोन में ये सारी चीजें हैं तो वे ना तो अपना पर्स अपने साथ रखता है, और ना ही कोई अपना जरूरी दस्तावेज. एक रिपोर्ट के मुताबिक 61% भारतीय यूजर अपने फोन में जरूरी दस्तावेज सेव करके रखते हैं. इसके अलावा 60% लोग फोटो और वीडियो, 53% लोग कॉन्टैक्ट्स, 42% लोग नोट्स और रिमाइंडर्स, और 27% लोग मेडिकल रिकॉर्ड तक फोन में स्टोर करते हैं.
यही वजह है कि आज के समय में साइबर अपराधी अब इधर-उधर हमला करने के बजाय अब केवल फोन को अपना निशाना बना रहे हैं, क्योंकि उन्हें एक ही डिवाइस पर हमला करके यूजर की पूरी निजी जिंदगी, प्राइवेट फोटो, पासवर्डस हर चीज का पता चल जा रहा है. &amp;nbsp;कैस्परस्की के एशिया-पैसिफिक सर्वे के अनुसार 60% भारतीय अपने स्मार्टफोन को ही अपना सबसे जरूरी डिवाइस मानते हैं, खास बात यह है कि साइबर अपराध के लिए स्मार्ट फोन पर हमला करना ज्यादा आसान है और उनके लिए फायदेमंद भी.&amp;nbsp; &amp;nbsp;
पैसों से जुड़ा खतरा कितना बड़ा?
आज के समय में ऐसे बहुत कम लोग ही मौजूद होंगे जो, ऑनलाइन पेमेंट की जगह पर पर्स में पैसे रखते होगे. यही वजह है कि फोन में सबसे ज्यादा खतरा पैसों से जुड़ी जानकारी को लेकर होता है. सर्वे में सामने आया कि 38% यूजर के बैंकिंग डिटेल्स फोन में सेव होती हैं. वहीं 34% यूजर के पासवर्ड और लॉगिन डिटेल्स भी फोन में मौजूद हैं. ऐसा वे अपनी सुविधा के लिए ही करते है यानी अगर वे अपना पासवर्ड भूल जाएं तो उनका फोन अपने आप पासवर्ड को खोल दें. इससे उनका अकाउंट ब्लॉक होने से बच जाता है. &amp;nbsp;
सबसे चिंता की बात यह है कि ज्यादातर लोग इन्हें बिना किसी सुरक्षित तरीके जैसे पासवर्ड मैनेजर के ही सेव करके रखते हैं, जिससे हैकर्स के लिए इन्हें चुराना आसान हो जाता है. इतना ही नहीं, 48% लोग अपने ऑफिस के ईमेल भी फोन में सेव रखते हैं और इसके अलावा 27% यूजर सीधे फोन से ही ऑफिस के सिस्टम तक पहुंच बनाते हैं. इन सब वजहों से भारत में 2025 में रोजाना औसतन 1.3 लाख साइबर हमले दर्ज किए गए, जो दिखाता है कि खतरा कितनी तेजी से बढ़ रहा है.
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AI चैट से बढ़ा नया खतरा, बचाव कैसे करें?
बात यही तक सीमित नहीं है. अभी के आकड़ो के अनुसार अब एक नया खतरा भी सामने आया है, वो है एआई चैट का. रिपोर्ट के मुताबिक 37% भारतीय अपने फोन में Ai चैट की हिस्ट्री सेव करके रखते हैं. जनवरी से मई 2026 के बीच दुनियाभर में 92,000 से ज्यादा साइबर अपराधियों ने ChatGPT, Grok और Gemini जैसे AI ऐप्स के फर्जी नाम का इस्तेमाल करके मालवेयर फैलाया है. एक बड़ा उदाहरण यह भी है, जिसमें एक AI ऐप की गड़बड़ी की वजह से करीब 2.5 करोड़ यूजर्स की 30 करोड़ से ज्यादा निजी चैट्स लीक हो गई. ऐसे में प्रशासन हमेशा से यूजर को सतर्क रहने की सलाह देते हैं.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Fri, 31 Jul 2026 18:30:14 +0530</pubDate>
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        <title>Generative AI India: एआई से काम कितना आसान हुआ, कितनी नौकरियों पर खतरा?</title>
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        <description><![CDATA[ Generative AI India: दुनिया भर में आज एआई का बोल-बाला है. इसकी वजह से कई सारे नए रोजगार के अवसर उत्पन्न हुए हैं और इस के कारण कई सारी नौकरियों के भी खत्म हो चुकी है. इससे भारत भी अछूता नहीं रहा. विशेषज्ञों के मुताबिक भारत में जनरेटिव एआई की वजह से दो तरह के बदलाव होगें. पहला करीब 42 से 48% कामकाजों को इस नई टेक्नोलॉजी से फायदा मिलेगा, वहीं दूसरी और इसके कारण लगभग 8 से 12% नौकरियां खतरे में आ जाएगी. हालियां पब्लिश गोल्डमैन सैक्स की रिपोर्ट में तो ऐसा ही देखने को मिला. एआई सोचकर लिखने वाले काम बड़ी आसानी से कर सकती है जैसे, कठिन प्रश्नों के जवाब देना, रिपोर्ट तैयार करना और सुझाव देना.
गोल्डमैन सैक्स की रिपोर्ट के मुताबिक, देश के करीब 9 से 17% अकृषि कार्य इससे बुरी तरह प्रभावित हो सकते हैं. यह एआई की कार्यशैली पर निर्भर करता है, कि वो कितने जटिल कामों को कितने कम समय में निपटा सकता है. रिपोर्ट के आधार पर यह अनुमानित आंकड़ा 13 से 15% रखा गया है.जहां एआई का असर सीमित रहेगा, कर्मचारियों का काम आसान बनाएगा और उनका समय बचाएगा. जिससे वह अपना किमती समय बचाकर कुछ नया सिख सकें. लेकिन जहां गलतियों की गुंजाइश ज्यादा है, वहां नौकरी जाने का खतरा ज्यादा रहेगा. इसका सबसे कम असर शारीरिक श्रम वाले कामों पर होगा.&amp;nbsp;
भारत में एआई क्या असर दिखा सकती है?
1. अर्थव्यवस्था- माना जा रहा है कि एआई से करीब 0.8% उत्पादन हर साल बढ़ सकता है. मतलब आज के समय की ग्रोथ अगर 10% है, तो आने वाले 10 सालों में एआई इसे 10.8% तक पहुंचा देगा. लेकिन ये इसकी काम करने की क्षमता पर निर्भर करेगा.&amp;nbsp;
2. नौकरियां- एआई के कारण टेक सेक्टर में 10 लाख नई नौकरियों का बड़ा उछाल देखने को मिल सकता है. और देश के कुल गैर-कृषि रोजगार में टेक सेक्टर की हिस्सेदारी 2% के करीब है. वहीं एआई के कारण भारत की 6 बड़ी आईटी कंपनियों में 3 साल में 64,000 नौकरियों की कटौती भी देखने को मिली. वहीं इसके कारण टेक सेक्टर में 7 लाख नई नौकरियां भी जुड़ी.&amp;nbsp;
3. नया सेक्टर जीसीसी- पिछलें 15 सालों में ग्लोबल कैपिसिटी सेंटर यानी जीसीसी की संख्या बढ़कर तीन गुनी हो गई. तो वहीं इसमें कर्मचारियों की संख्या में करीब 6 गुना और इनकम में 8 गुना की बढ़ोतरी देखने को मिली. इस सेक्टर में आय औसतन 9.3 लाख करोड़ तक पहुंच चुकी हैं.&amp;nbsp;
4. इंडस्ट्री को बढ़ावा- जनवरी से मार्च तक के समय में सर्विस निर्यात देश की जीडीपी का करीब 10.7% तक रहा, जो पिछले साल 10.1% ही था. इसमें भी कुल सर्विस निर्यात में सॉफ्टवेयर और बिजनेस से जुड़ी सर्विसेज की हिस्सेदारी 75% का आंकड़ा पार कर चुकी है.&amp;nbsp;
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डेटा सेंटर की कमी
डेटा सेंटर बनाने में भारत अब भी काफी पीछे है. दुनिया भर के डेटा सेंटर क्षमता में भारत की हिस्सेदारी मात्र 1% है. वहीं भारत के मुकाबले अमेरिका के पास 47% और चीन के पास 25% की हिस्सेदारी है. आज के समय में भारत की मौजूदा क्षमता केवल 1 गीगॉवाट ही है. इसका मतलब यह है कि देश में फिलहाल ज्यादा बिजली खपत करने लायक डेटा सेंटर का ढांचा मौजूद नहीं है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Fri, 31 Jul 2026 18:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>फर्जी उम्र बताना अब नहीं चलेगा! Google ला रहा है ये नया सिस्टम</title>
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        <description><![CDATA[ Google Age Verification System: सोशल मीडिया पर कम उम्र वालों की बढ़ती पाबंदी के बीच अब गूगल भी उम्र वेरिफाई करने के लिए एक नया सिस्टम लाने जा रहा है. दरअसल, Google ने Android डेवलपर्स के लिए अपने Age Assurance सिस्टम को दुनिया भर में उपलब्ध कराने की घोषणा की है. बता दें कि इस नई टेक्नोलॉजी मकसद बच्चों और युवाओं को उनकी उम्र के अनुसार सुरक्षित डिजिटल एक्सपीरिएंस प्रदान करना है.
Android ऐप्स होंगे बच्चों के लिए और ज्यादा सुरक्षित
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, Google ने Play Signal API को पेश किया है जिससे अब ये पहचानना आसान हो जाएगा कि यूजर किस उम्र का है. हालांकि, अभी इस फीचर को कंपनी ने सिर्फ ब्राजील में उपलब्ध कराया है. लेकिन जल्द ही इसे चरणबद्ध तरीके से दूसरे देशों तक भी पहुंचाया जाएगा. जानकारी के मुताबिक, इस साल के अंत तक ये लगभग ज्यादातर देशों तक पहुंच जाएगा.
बता दें कि इस टेक्नोलॉजी के आने से Android ऐप डेवलपर्स ऐसे फीचर्स जोड़ सकेंगे जो बच्चों और युवाओं के लिए ज्यादा सुरक्षित हों.

बिना जन्मतिथि के पता चल जाएगी उम्र
बता दें कि Google का कहना है कि इस टेक्नोलॉजी की सबसे बड़ी खासियत ये है कि इसमें यूजर्स की पर्सनल जानकारी शेयर करने की जरूरत नहीं होगी. ऐप डेवलपर्स को किसी की जन्मतिथि, पहचान पत्र या कोई दूसरा डेटा नहीं मिलेगा.
इसके बजाय सिस्टम केवल ये संकेत देगा कि यूजर्स किस आयु स्टेज में आता है जैसे कि बच्चा, युवा या एडल्ट. इससे डेवलपर्स अपनी सर्विस और फीचर्स को उसी हिसाब से तैयार कर सकेंगे. इसके अलावा यूजर की प्राइवेसी पर भी पूरा ध्यान दिया गया है.
Google का बड़ा कदम
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि पूरी दुनिया में अब बच्चों और युवाओं को उनके उम्र के अनुसार डिजिटल कंटेंट दिखाने पर जोर दिया जा रहा है. इसके अलावा उन्हें डिजिटली कैसे सेफ रखा जाए इस ओर भी कई देश काम कर रहे हैं. इसी कड़ी में गूगल ने भी ये बड़ा कदम उठाया है. इससे पहले Apple भी अपने Age Verification टूल्स को ग्लोबली लॉन्च कर चुका है ताकि अलग-अलग देशों के नए नियमों का पालन किया जा सके.
पैरेंट्स को मिलेगा पूरा कंट्रोल
इतना ही नहीं, Google ने इस नई टेक्नोलॉजी में पैरेंट्स को भी शामिल किया है. अगर किसी बच्चे का Google अकाउंट Family Link से जुड़ा हुआ है तो माता-पिता खुद अपने बच्चे की उम्र को जोड़ सकते हैं.
इसके बाद जिन ऐप्स में Play Signal API का इस्तेमाल होगा वे उसी जानकारी के आधार पर बच्चों के लिए सुरक्षित कंटेंट उपलब्ध करा सकेंगे. सबसे अच्छी बात ये है कि हर ऐप में अलग-अलग जाकर जानकारी देने की जरूरत नहीं पड़ेगी.
Family Link से काम होगा आसान
जानकारी के लिए बता दें कि Google ने यूजर को ऐसा फीचर दिया है जिससे उन्हें बार-बार अपनी जानकारी भरने की जरूरत नहीं पड़ेगी. दरअसल, गूगल ने सभी उम्र से संबंधित सेटिंग्स को अपने Family Link प्लेटफॉर्म में एक ही जगह उपलब्ध कराया है. इससे माता-पिता को अलग-अलग ऐप्स में जाकर सेटिंग्स बदलने की जरूरत नहीं होगी.
एक बार Family Link में उम्र कैटेगरी की जानकारी ऐड करने के बाद वही जानकारी उन ऐप्स तक पहुंच सकेगी जो इस API को सपोर्ट करते हैं. इससे बच्चों के लिए सुरक्षित डिजिटल माहौल तैयार करना पहले के मुकाबले ज्यादा आसान हो जाएगा.
बिना परमिशन कोई जानकारी नहीं होगी शेयर
आपको बता दें कि Google ने साफ किया है कि उम्र से संबंधित किसी भी तरह की जानकारी को बिना यूजर की परमिशन के कहीं भी शेयर नहीं किया जाएगा. इसके लिए माता-पिता या यूजर्स की स्पष्ट परमिशन की जरूरत होगी.

इसका साफ मतलब है कि अगर कोई अभिभावक Family Link में ये जानकारी दर्ज नहीं करता है तो डेवलपर्स को कोई उम्र के बारे में जानकारी नहीं मिलेगी. इस तरह कंपनी ने सेफ्टी और प्राइवेसी दोनों के बीच बैलेंस बनाए रखने की कोशिश की है.
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        <pubDate>Fri, 31 Jul 2026 18:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>iPad में आज भी Face ID नहीं! जानें Apple क्यों अभी भी दे रहा Touch ID</title>
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        <description><![CDATA[ Apple iPad: एप्पल आईपैड कंपनी का काफी चर्चित डिवाइस माना जाता है. ये डिवाइस अपने बड़ी स्क्रीन और बेहतरीन परफॉर्मेंस के चलते युवाओं में काफी पसंद किया जाता है. iPad Air जैसे मॉडल पढ़ाई, ऑफिस के काम और एंटरटेनमेंट के लिए काफी फेमश हैं. इसके साथ ही डिवाइस में यूजर्स को काफी एडवांस फीचर्स भी देखने को मिल जाते हैं. लेकिन लोगों के मन में एक सवाल आता है कि एप्पल ने अभी तक आईपैड में फेस आईडी का इस्तेमाल क्यों नहीं किया है. डिवाइस में अभी भी एप्पल टच आईडी क्यों दे रही है. आइए जानते हैं क्या है इसके पीछे का कारण.
iPad में क्यों नहीं है Face ID
दरअसल, इसका सबसे बड़ा कारण हार्डवेयर है. Face ID को सही तरीके से काम करने के लिए Apple के खास TrueDepth Camera System की जरूरत पड़ती है. ये कैमरा चेहरे पर हजारों न दिखने वाले डॉट्स प्रोजेक्ट करके उसका 3D मैप तैयार करता है और उसी के आधार पर आपकी पहचान करता है.

नॉर्मल iPad और iPad Air में ये हार्डवेयर मौजूद नहीं है. इसलिए इनमें Face ID देना संभव नहीं होता और Apple Touch ID का ही इस्तेमाल करता है.
क्या ये कंपनी का बिजनेस प्लान है
आपको बता दे कि सिर्फ हार्डवेयर ही नहीं बल्कि ये Apple की प्रोडक्ट प्लान का भी हिस्सा माना जाता है. कंपनी अपने प्रीमियम iPad Pro मॉडल्स को बाकी iPad से अलग दिखाना चाहती है.
अगर iPad Air और बेस मॉडल में भी Face ID उपलब्ध करा दिया जाएगा जा तो बाकी मॉडल्स के बीच का अंतर बहुत कम हो जाएगा. ऐसे में महंगे Pro मॉडल्स की बिक्री भी कम हो जाएगी. इसी वजह से कंपनी अपने प्रीमियम मॉडल्स में कुछ एक्सक्लूसिव फीचर्स देती है जो केवल Pro सीरीज तक सीमित रहता है.
Touch ID और Face ID में क्या होता है अंतर
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि Touch ID और Face ID दोनों ही बायोमेट्रिक सिक्योरिटी फीचर हैं लेकिन इनका काम करने का तरीका अलग-अलग है. Touch ID में आपके Fingerprint की मदद से iPad अनलॉक होता है. इसके अलावा ऐप्स में लॉगिन और Apple Pay जैसे फीचर्स में भी इसका इस्तेमाल किया जाता है.
वहीं, Face ID आपके चेहरे की पहचान करके डिवाइस को अनलॉक करता है. ये बिना किसी बटन को छुए तेज और बेहतरीन एक्सपीरिएंस देने का काम करता है.
किन iPad मॉडल्स में मिलता है Face ID
जानकारी के मुताबिक, फिलहाल Face ID केवल प्रीमियम iPad Pro सीरीज मॉडल्स में ही उपलब्ध कराए गए हैं.

M4 और M5 iPad Pro (11-इंच और 13-इंच)
iPad Pro 12.9-इंच (तीसरी से छठी जनरेशन)
iPad Pro 11-इंच (पहली से चौथी जनरेशन)
इन सभी मॉडल्स में TrueDepth कैमरा सिस्टम मौजूद है इसलिए Face ID आसानी से काम करती है.
क्या आने वाले समय में सभी मॉडल्स में मिलेगा Face ID
हालांकि, कंपनी ने इस बारे में कोई जानकारी शेयर नहीं की है. लेकिन पिछले कुछ सालों में Apple ने OLED डिस्प्ले, बेहतर एक्सेसरी सपोर्ट और ज्यादात पावरफुल प्रोसेसर जैसे फीचर्स के जरिए iPad Pro को अलग पहचान दी है. अगर भविष्य में कंपनी चाहे तो Face ID को iPad Air या दूसरे मॉडल्स में भी ला सकती है.
क्या Touch ID है सुरक्षित
Touch ID की बात करें तो ये आज भी एक सेफ फीचर है. इसे आज भी यूजर एक भरोसेमंद और सुरक्षित बायोमेट्रिक टेक्नोलॉजी मानते हैं. ये आपकी उंगली के निशान को सुरक्षित तरीके से पहचानकर डिवाइस को अनलॉक करती है और ऑनलाइन पेमेंट या संवेदनशील ऐप्स की सुरक्षा भी सुनिश्चित करती है.
यही वजह है कि Face ID न होने के बावजूद Touch ID वाले iPad सेफ्टी के मामले में किसी तरह से कमजोर नहीं माने जाते. इसके साथ ही iPad का क्रेज भी युवाओं में कम नहीं हुआ है. iPad को पूरी दुनिया में इसके बेहतरीन फीचर्स के लिए पसंद किया जाता है.
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        <pubDate>Fri, 31 Jul 2026 18:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>China Artificial Sun: चीन बना रहा आर्टिफिशियल सूरज, कैसे बदलेगी दुनिया की तकनीक?</title>
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        <description><![CDATA[ China Artificial Sun: तकनीकी दुनिया में चीन हमेशा कुछ ऐसा कर दिखाता है, जिससे पूरी दुनिया चौंक जाती है. इस बार भी चीन कुछ ऐसा ही करने जा रहा है, जिसे सुनकर पूरी दुनिया चौंक गई. दरअसल, चीन एक ऐसे प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है, जिसे आर्टिफिशियल सूरज यानी कृत्रिम सूर्य कहा जा रहा है. अब आप सोच रहे होंगे कि जब आसमान में असली सूरज मौजूद है, जो पूरी दुनिया को रोशनी देता है तो फिर चीन को अलग से नया सूरज बनाने की क्या जरूरत पड़ गई? और अगर यह सूरज सच में बन गया तो इससे हमारी और आपकी जिंदगी में क्या बदलाव आएगा.&amp;nbsp;
क्या है चीन का आर्टिफिशियल सूरज?
सबसे पहले यह साफ कर दें कि चीन आसमान में कोई नया तारा नहीं टांगने जा रहा है. असल में, यह एक बहुत बड़ी मशीन है, जिसे वैज्ञानिकों की भाषा में न्यूक्लियर फ्यूजन रिएक्टर कहा जाता है. यह मशीन ठीक उसी तकनीक पर काम करती है, जिस तकनीक से असली सूरज हमें गर्मी और रोशनी देता है. चीन का लक्ष्य साल 2030 तक इस प्रोजेक्ट को पूरा करना है.&amp;nbsp;
चीन इसे क्यों बना रहा है?
चीन इसे अपनी बिजली खपत को पूरा करने के लिए बना रहा है. दरअसल, आज हम बिजली बनाने के लिए कोयला, डीजल या गैस का इस्तेमाल करते हैं. ये सब चीजें एक न एक दिन खत्म हो जाएंगी, लेकिन इस नई तकनीक की मदद से चीन लाखों सालों तक बिना रुके बिजली बना सकता है. साथ ही दूसरा बड़ा कारण है प्रदूषण को कम करना. दरअसल, कोयला जलाने से बहुत अधिक धुआं और प्रदूषण होता है, जिससे ग्लोबल वार्मिंग का खतरा बढ़ रहा है. लेकिन इस नकली सूरज से जरा सा भी धुआं या जहरीली गैस नहीं निकलेगी.और यह पूरी तरह से क्लीन एनर्जी यानी साफ-सुथरी ऊर्जा को बनाएगा. साथ ही आज के समय के परमाणु बिजलीघरों में धमाके का डर रहता है और उनसे खतरनाक कचरा निकलता है, लेकिन चीन की इस नई तकनीक में ऐसा कोई खतरा नहीं है. यह बिल्कुल सुरक्षित है.&amp;nbsp;
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कैसे बदल जाएगी दुनिया की तकनीक
अगर यह प्रोजेक्ट पूरी तरह सफल हो जाता है, तो आने वाले समय में दुनिया की तस्वीर पूरी तरह बदल जाएगी. जब बिजली बनाने का खर्च लगभग खत्म हो जाएगा, तो हर घर को बहुत सस्ती या लगभग मुफ्त बिजली मिल सकेगी. फैक्ट्रियों में सामान बनना सस्ता हो जाएगा, जिससे मोबाइल, टीवी और गाड़ियां भी सस्ती हो सकती हैं. साथ ही इस तकनीक का इस्तेमाल भविष्य में रॉकेट इंजन बनाने में होगा. इससे हमारे अंतरिक्ष यान इतनी तेज चलेंगे कि मंगल ग्रह की यात्रा महीनों के बजाय कुछ दिनों में पूरी हो जाएगी.
आज के समय में दुनिया में पीने के पानी की भारी कमी है. इस सूरज से मिलने वाली असीमित बिजली की मदद से समुद्र के खारे पानी को बहुत कम खर्च में पीने लायक मीठा पानी बनाया जा सकेगा. आजकल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और बड़े कंप्यूटरों को चलाने के लिए बहुत ज्यादा बिजली चाहिए होती है, तो इस तकनीक की मदद से इंटरनेट और कंप्यूटर काफी सुपरफास्ट हो जाएंगे.
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        <pubDate>Fri, 31 Jul 2026 02:30:13 +0530</pubDate>
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        <title>रोज के कामों के लिए कितनी इंटरनेट स्पीड जरूरी है? यहां देखें हिसाब</title>
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        <description><![CDATA[ Internet Speed: इंटरनेट कनेक्शन के लिए कितनी स्पीड काफी होती है? इसका जवाब जरूरत पर निर्भर करता है. अगर आपको सिर्फ ईमेल भेजने और चैटिंग आदि के लिए इंटरनेट चाहिए तो कम स्पीड में काम चल जाएगा, लेकिन अगर आप ऑनलाइन गेमिंग करते हैं तो उसके लिए ज्यादा स्पीड की जरूरत पड़ती है. अगर हर घर के हिसाब से स्पीड देखी जाए तो यह उसमें मौजूद डिवाइसेस पर भी डिपेंड करती है. आज हम आपके लिए इंटरनेट स्पीड का पूरा इतिहास और गणित लेकर आए हैं, जिससे आपको पता चल सकेगा कि आपके यूज के लिए कितनी इंटरनेट स्पीड काफी रहेगी.
क्या होती है इंटरनेट स्पीड?
इंटरनेट स्पीड को बिट्स पर सेकंड (bps) में मापा जाता है. यानी एक सेकंड में कितने बिट्स एक प्वाइंट से दूसरे प्वाइंट पर जाते हैं. इंटरनेट की शुरुआत के कई सालों तक इसे मापने की मेन यूनिट किलोबिट्स पर सेकंड (Kbps) रही. 1990 के दशक की शुरुआत में जब वर्ल्डवाइड वेब आया, तब इंटरनेट की एवरेज स्पीड केवल 14.4 Kbps और मैक्सिमम स्पीड 56Kbps थी. 2000 के दशक में ग्लोबल एवरेज स्पीड बढ़कर 1Mbps हो गई और मार्च, 2026 में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक, ग्लोबल लेवल पर अब इंटरनेट की एवरेज स्पीड फिक्स्ड ब्रॉडबैंड कनेक्शन पर 120.52 Mbps और मोबाइल डेटा पर 109.29 Mbps है. अब अमेरिका जैसे देशों में कई इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स हैं जो Gbps में स्पीड प्रोवाइड करवाते हैं.
डाउनलोड और अपलोड स्पीड भी है जरूरी
ज्यादातर इंटरनेट प्लान का प्राइमरी फोकस डाउनलोड स्पीड पर होता है, लेकिन इसके साथ-साथ अपलोड स्पीड भी जरूरी होती है. डाउनलोड स्पीड का मतलब है कि इंफोर्मेशन को सर्वर से आपके डिवाइस तक पहुंचने में कितना समय लगता है. यह स्ट्रीमिंग जैसे कामों के लिए यूज होती है. अगर अपलोड स्पीड की बात करें तो यह दिखाती है कि आपके डिवाइस से डेटा अपलोड किस स्पीड से हो रहा है. यह आमतौर पर डाउनलोड स्पीड से स्लो होती है और यह फाइल्स भेजने, डेटा बैकअप करने और वीडियो कॉल पर बने रहने के लिए जरूरी होती है.
घर के लिए कितनी इंटरनेट स्पीड काफी होती है?
नेटफ्लिक्स का कहना है कि आपको एक HD वीडियो स्ट्रीम करने के लिए सिर्फ 5Mbps स्पीड की जरूरत होती है. लेकिन अगर आप इसके साथ ईमेल चेक करने या चैटिंग जैसे काम करना चाहते हैं तो और स्पीड की जरूरत होगी. अगर आपके घर में एक से ज्यादा डिवाइस यूज हो रहा है तो वह भी इंटरनेट को कंज्यूम करेगा. अगर आप अलेक्सा जैसे असिस्टेंट यूज कर रहे हैं तो उन्हें भी इंटरनेट बैंडविड्थ की जरूरत होती है. अगर आप कम स्पीड वाले कनेक्शन पर ज्यादा डिवाइस कनेक्ट करेंगे तो बफरिंग जैसे इश्यू कॉमन हैं. इसलिए आप घर में यूज होने वाले डिवाइसेस के आधार पर स्पीड का हिसाब लगा सकते हैं.
किस काम के लिए कितनी स्पीड काफी?
वेब ब्राउजिंग के लिए आपको 3-5Mbps स्पीड की जरूरत पड़ेगी. इसी तरह ईमेल और चैटिंग के लिए 1Mbps, वीडियो स्ट्रीमिंग के लिए 20-50Mbps, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के लिए 3Mbps की अपलोड स्पीड और लगभग 4Mbps की डाउनलोड स्पीड की जरूरत पड़ती है. हाई बिटरेट वाली म्यूजिक स्ट्रीमिंग के लिए 10-20Mbps, ऑनलाइन मल्टीप्लेयर गेमिंग के लिए 25-100Mbps की डाउनलोड और 5-20Mbps की अपलोड स्पीड होनी चाहिए. इसके लिए लेटेंसी कम होना भी जरूरी है. लेटेंसी बढ़ने से गेमिंग का पूरा मजा खराब हो सकता है. इनके अलावा अगर होम डिवाइसेस 10-12 डिवाइसेस के लिए 5-10Mbps स्पीड जरूरी होती है.&amp;nbsp;
मोबाइल डेटा खपत में भारत है सबसे आगे
भारत में मोबाइल डेटा की खपत दुनिया में सबसे ज्यादा है. जून में आई एक रिपोर्ट में बताया गया था कि भारत में एक स्मार्टफोन यूजर औसतन हर महीने लगभग 37GB डेटा खर्च करता है और 2031 तक यह खपत बढ़कर करीब 70GB प्रति माह तक पहुंच सकती है. वीडियो स्ट्रीमिंग, क्लाउड बेस्ड सर्विसेज और नए डिजिटल एप्लिकेशनों की बढ़ती लोकप्रियता के कारण खपत बढ़ने का अनुमान लगाया जा रहा है. इसके अलावा भारत में इंटरनेट डेटा की कीमत भी दुनिया में सबसे कम है.
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        <pubDate>Fri, 31 Jul 2026 02:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>Wi&amp;Fi 8 से मिट जाएगा कनेक्शन ड्रॉप होने का झंझट, कितनी फास्ट होगी?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/wi-fi-8-से-मिट-जाएगा-कनेक्शन-ड्रॉप-होने-का-झंझट-कितनी-फास्ट-होगी</link>
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        <description><![CDATA[ Wi-Fi 8: अभी भले ही Wi-Fi 6 को ही ज्यादातर जगहों पर यूज किया जा रहा है और लोगों के पास Wi-Fi 7 राउटर नहीं पहुंचे हैं, लेकिन एक नए वायरलेस स्टैंडर्ड Wi-Fi 8 की टेस्टिंग शुरू हो गई है. करीब दो साल बाद यानी 2028 में इसे लॉन्च किया जा सकता है. इसे टेस्ट करने वाली चाइनीज कंपनी TP-Link का कहना है कि यह कॉन्सेप्ट से निकलकर असल दुनिया में दस्तक देने की तैयारी कर रही है. नेक्स्ट जनरेशन टेक्नोलॉजी होने के कारण इसमें बेहतर स्पीड मिलेगी, लेकिन यह रिलायबिलिटी पर ज्यादा फोकस करेगी. यानी इस टेक्नोलॉजी में स्पीड को बेहतर करने की बजाय कनेक्शन को स्टेबल बनाने पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है. आइए इसके बारे में विस्तार से जानते हैं.
क्या है Wi-Fi 8?
यह एक नया वायरलेस स्टैंडर्ड है, जिसकी टेस्टिंग चल रही है. यह 6GHz स्पेक्ट्रम, 320MHz चैनल्स और मल्टी-लिंक ऑपरेशन (MLO) जैसी Wi-Fi 6E और Wi-Fi 7 के साथ आईं टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करेगी. नए स्टैंडर्ड में बेहतर स्पीड तो मिलेगी ही, साथ ही इसमें ज्यादा ट्रैफिक वाले इलाकों में इसे रिलायबल बनाने पर जोर दिया जाएगा. इंडस्ट्री इस कॉन्सेप्ट को अल्ट्रा हाई रिलायबिलिटी (UHR) के नाम से जान रही है. UHR को हासिल करने के लिए यह कई मौजूदा टेक्नोलॉजी के साथ-साथ कई नई टेक्नोलॉजी का भी इस्तेमाल करेगी. इसमें मल्टी-एक्सेस प्वाइंट कॉर्डिनेशन टेक्नोलॉजी का एक नया वर्जन यूज किया जाएगा. इसकी मदद से ज्यादा ट्रैफिक वाले इलाकों में लगे एक्सेस प्वाइंट अपने रिसोर्सेस शेयर कर पाएंगे, जिससे स्पीड और स्टेबिलिटी बढ़ेगी.
Wi-Fi 8 में इस्तेमाल होंगी ये नई टेक्नोलॉजी
Wi-Fi 8 में पर्दे के पीछे कई टेक्नोलॉजी काम करने वाली हैं. इसमें कॉर्डिनेटेड स्पेटियल रीयूज (Co-SR) का इस्तेमाल कर एक्सेस प्वाइंट अपनी ट्रांसमिट पावर को एडजस्ट कर पाएंगे. इसी तरह कॉर्डिनेटेड टाइम डिविजन मल्टीपल एक्सेस (Co-TDMA) की मदद से एक्सेस प्वाइंट रिजर्व्ड टाइम स्लॉट में ट्रांसमिशन को शेयर कर पाएंगे. इसमें सिग्नल क्वालिटी को बेहतर करने के लिए कॉर्डिनेटेड बीमफॉर्मिंग को शामिल किया जाएगा. पुरानी टेक्नोलॉजी की बात करें तो यह Wi-Fi 6 की टारगेट वेक टाइम (TWT) और Wi-Fi 7 की रेस्ट्रिक्टेड टारेगट वेक टाइम (R-TWT) की भी मदद लेगी.
Wi-Fi 8 में कनेक्शन कैसे स्टेबल होंगे?
लेटेंसी कम करने और अपार्टमेंट बिल्डिंग, एयरपोर्ट और शॉपिंग सेंटर जैसे ज्यादा ट्रैफिक वाली जगहों पर नेटवर्क कनेक्टिविटी को सुधारने के लिए इसमें कई स्पेक्ट्रम-एफिशिएंसी टेक्नोलॉजी की मदद ली जाएगी. इसमें पहली टेक्नोलॉजी डायनामिक सब-ब्रांड ऑपरेशन (DSO) है. यह किसी भी एक्सेस प्वाइंट को 320MHz चैनल जैसे वाइड चैनल को स्प्लिट करने का ऑप्शन देगा, जिससे एक साथ कई डिवाइस को सर्व किया जा सकता है. इसी तरह इसमें नॉन-प्राइमरी चैनल एक्सेस (NPCA) का सहारा लिया जाएगा, जिसकी मदद से प्राइमरी चैनल अवेलेबल न होने पर डिवाइस सेकेंडरी चैनल को एक्सेस कर पाएंगे. इससे प्राइमरी चैनल के अवेलेबल न होने पर डेटा फ्लो रुकेगा नहीं. नए स्टैडर्ड में सिंगल मोबिलिटी डोमेन को भी शामिल किया गया है. यह एक नया कॉन्सेप्ट है. वाई-फाई के मौजूदा वर्जन में जब कोई क्लाइंट डिवाइस किसी दूसरे एक्सेस प्वाइंट से कनेक्ट होना चाहता है तो पहले एक्सेस प्वाइंट से उसका कनेक्शन टूट जाता है, जिससे थोड़ा डिले होता है. अब नए कॉन्सेप्ट से डिवाइस कनेक्शन तोड़े बिना ही दूसरे एक्सेस प्वाइंट से कनेक्ट हो पाएगा.&amp;nbsp;
Wi-Fi 8 का क्या फायदा होगा?
नए स्टैंडर्ड को एआई पावर्ड सिस्टम, इंडस्ट्रियल ऑटोमेशन और रोबोटिक्स आदि को ध्यान में रखकर डिजाइन किया जा रहा है. मौजूदा वर्जन में इन चीजों से लेकर जो दिक्कतें आ रही हैं, नए वर्जन में वो दूर जाएंगी. इसी तरह यह लगभग 25 प्रतिशत तेज स्पीड के साथ भीड़भाड़ और ज्यादा इंटरनेट ट्रैफिक वाली जगहों पर भी स्टेबल कनेक्शन दे पाएगा. इससे एक राउटर पर ज्यादा डिवाइस कनेक्ट होने के बाद भी कनेक्शन ड्रॉप जैसी परेशानी नहीं आएगी.&amp;nbsp;
कब यूज कर पाएंगे Wi-Fi 8?
उम्मीद की जा रही है कि Wi-Fi 8 को 2028 की पहली छमाही में अप्रूवल मिल जाएगी. अप्रूवल मिलते ही सपोर्टेड डिवाइसेस मार्केट में आने शुरू हो जाएंगे. आसुस ने CES 2026 में Wi-Fi 8 हार्डवेयर का एक कॉन्सेप्ट दिखाया था, लेकिन सर्टिफाइड राउटर और क्लाइंट डिवाइसेस के लिए 2028 तक का इंतजार करना ही पड़ेगा. भारत की बात करें तो यहां नया स्टैंडर्ड आने में थोड़ा ज्यादा समय लग सकता है.
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रोज के कामों के लिए कितनी इंटरनेट स्पीड जरूरी है? यहां देखें हिसाब ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 31 Jul 2026 02:30:11 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>12 नए अपग्रेड के साथ आएगा iPhone 18 Pro, तीन नए कलर्स में लॉन्चिंग!</title>
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        <description><![CDATA[ दिग्गज कंपनी ऐप्पल के अपकमिंग नए स्मार्टफोन श्रृंखला को लेकर बाजार में सुगबुगाहट तेज हो गई है. सितंबर में पेश होने वाले iPhone 18 Pro मॉडल का इंतजार कर रहे फैंस के लिए यह खबर बेहद खास है. इस बार कंपनी अपने फ्लैगशिप फोन में कई तकनीकी सुधार और बड़े बदलाव करने जा रही है. प्रोसेसर की रफ्तार से लेकर कैमरे की क्षमता और बैटरी लाइफ तक, सभी जगह बड़ा अपग्रेड देखने को मिलेगा. आइए बताते हैं iPhone 18 Pro सीरीज में कौन से 12 बड़े बदलाव होने जा रहे हैं जो इस स्मार्टफोन को बेहद खास और सबसे अलग बनाते हैं.&amp;nbsp;
डिजाइन और डिस्प्ले
कंपनी iPhone 18 Pro सीरीज के मूल आकार को पिछली जेनरेशन की तरह ही रख सकती है. इसमें रियर कैमरा सेटअप पुरानी स्टाइल में ही मिलेगा, लेकिन इसके पीछे का ग्लास और फ्रेम पहले से ज्यादा एक जैसा दिखेगा. अब फोन का पिछला हिस्सा दो अलग रंगों में नजर नहीं आएगा, जिससे इसका लुक और ज्यादा खूबसूरत लगेगा. इसके अलावा स्क्रीन का आकार 6.3 इंच और प्रो मैक्स के लिए 6.9 इंच ही रहने वाला है.
ज्यादा बैकअप के लिए पावरफुल बैटरी
नए आईफोन 18 प्रो मैक्स की मोटाई और वजन में थोड़ा इजाफा हो सकता है, जिसकी मुख्य वजह इसमें मिलने वाली बड़ी बैटरी है. रिपोर्ट्स की मानें तो आईफोन 18 प्रो मैक्स में लगभग 5,391 एमएएच की पावरफुल बैटरी दी जाएगी, जो पुराने मॉडल से लगभग 500 एमएएच ज्यादा है. इस वजह से फोन का वजन बढ़कर करीब 243 ग्राम हो सकता है, जो यूजर्स को ज्यादा लंबा बैटरी बैकअप देगा.
अंडर-डिस्प्ले फेस आईडी
आईफोन 18 प्रो मॉडल्स में अंडर-डिस्प्ले फेस आईडी तकनीक देखने को मिलेगी या नहीं, इसे लेकर अफवाहों का बाजार गर्म है. हालांकि, अलग-अलग रिपोर्ट्स में इस बात को लेकर अभी भी मतभेद है कि यह एडवांस तकनीक आखिर कब तक पेश की जाएगी. अगर यह फीचर आता है, तो फ्रंट ट्रूडैप्थ कैमरा सिस्टम स्क्रीन के पीछे छिप जाएगा, जिससे फोन की स्क्रीन पर मौजूद मौजूदा डायनेमिक आइलैंड कटआउट की जरूरत हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी.
यह भी पढ़ें: पुराना iPhone फेंकने की गलती न करें! हो सकते हैं इतने काम
एडवांस एलटीपीओ प्लस स्क्रीन
आईफोन 18 प्रो मॉडल्स में ज्यादा आधुनिक LTPO+ डिस्प्ले तकनीक देखने को मिल सकती है, जो आईफोन 17 सीरीज में इस्तेमाल हुई मौजूदा LTPO तकनीक की तुलना में कम बिजली खर्च करती है. यह नया अपग्रेड फोन के बैटरी बैकअप को बेहतर बनाने में बड़ी भूमिका निभाएगा. दरअसल, LTPO+ तकनीक स्क्रीन से निकलने वाली रोशनी पर बहुत बारीक और सटीक नियंत्रण रखती है. इससे डिस्प्ले आसपास की रोशनी के माहौल के हिसाब से अपनी वर्किंग को खुद ब खुद एडजस्ट कर लेता है. आसान शब्दों में कहें तो, यह तकनीक फोन को यह सही तरीके से समझने में मदद करेगी कि आसपास के उजाले या अंधेरे को देखते हुए स्क्रीन की ब्राइटनेस को कब बढ़ाना है और कब कम करना है. रिपोर्ट के मुताबिक, ऐप्पल को इन एडवांस डिस्प्ले पैनल्स की सप्लाई सैमसंग डिस्प्ले और एलजी डिस्प्ले द्वारा की जाएगी.&amp;nbsp;
2एनएम प्रोसेस पर बना ए20 चिपसेट
परफॉर्मेंस के मामले में आईफोन 18 प्रो काफी आगे रहने वाला है, क्योंकि इसमें टीएसएमसी की 2 नैनोमीटर प्रक्रिया पर तैयार ए20 चिप दिया जाएगा. यह नया चिपसेट पुराने ए19 के मुकाबले 15 प्रतिशत तेज स्पीड और 30 प्रतिशत बेहतर बिजली बचत देगा. इसमें रैम को प्रोसेसर के साथ ही एकीकृत किया जाएगा, जिससे फोन में भारी काम करना और एआई फीचर्स का इस्तेमाल करना बेहद आसान व तेज हो जाएगा.&amp;nbsp;
अपना खुद का सी2 5जी मोडेम
पहले ऐसा अनुमान लगाया जा रहा था कि ऐप्पल अपनी आईफोन 18 प्रो सीरीज में अगली पीढ़ी का नया C2 मोडेम इस्तेमाल करेगा. यह चिप कंपनी के उस C1 मोडेम का नया रूप है, जिसे पहली बार किफायती iPhone 16e में ऐप्पल के खुद के बनाए पहले नेटवर्क चिप के तौर पर दिया गया था. इसके बाद C1X मोडेम को iPhone Air में पेश किया गया, जिसके बारे में ऐप्पल का दावा है कि यह C1 की तुलना में दोगुना तेज काम करता है.
माना जा रहा था कि नया C2 मोडेम यूजर्स को ज्यादा तेज इंटरनेट स्पीड, कम बैटरी खपत और अमेरिका में mmWave 5G का सपोर्ट देगा. हालांकि, ताजा लीक और चर्चाओं ने अमेरिका में इसके इस्तेमाल पर संशय पैदा कर दिया है.&amp;nbsp;
सैमसंग का नया कैमरा सेंसर
फोटोग्राफी के शौकीनों के लिए इस बार बड़ा सरप्राइज मिलने वाला है. ऐप्पल अपने नए फोन में SAMSUNG द्वारा विकसित तीन-लेयर वाला इमेज सेंसर इस्तेमाल कर सकता है. इस सेंसर की मदद से फोटो खींचते समय कैमरा तुरंत रिस्पॉन्स करेगा, तस्वीरों में धुंधलापन या नॉइज कम होगी और रंगों की गहराई बहुत शानदार निकलकर आएगी. यह पहली बार होगा जब सोनी के बजाय सैमसंग का मुख्य कैमरा सेंसर इस्तेमाल होगा.&amp;nbsp;
डीएसएलआर जैसा वैरिएबल अपर्चर
लीक्स और रिपोर्ट्स के मुताबिक, ऐप्पल इस साल अपने आईफोन 18 प्रो (iPhone 18 Pro) मॉडल्स में वैरिएबल अपर्चर लेंस देने की तैयारी कर रहा है. दावा किया जा रहा है कि आईफोन 18 प्रो और प्रो मैक्स दोनों के मुख्य 48-मेगापिक्सल फ्यूजन कैमरे में यह तकनीक मिलेगी. आईफोन के इतिहास में यह पहली बार होगा.
डायरेक्ट 5जी सैटेलाइट इंटरनेट
रिपोर्ट के अनुसार, ऐप्पल अगले साल से अपने आईफोन्स में डायरेक्ट सैटेलाइट 5G नेटवर्क देने की योजना बना रहा है. इसका मतलब है कि फोन बिना किसी मोबाइल टावर के सीधे अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट से जुड़कर इंटरनेट चला सकेगा. यह केवल इमरजेंसी मैसेजिंग तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इससे पूरा 5G इंटरनेट काम करेगा. यदि ऐप्पल 2026 तक यह काम पूरा कर लेता है, तो यह तकनीक सबसे पहले iPhone 18 Pro, iPhone 18 Pro Max और ऐप्पल के पहले फोल्डेबल आईफोन में देखने को मिल सकती है. ऐप्पल इसके लिए &#039;ग्लोबलस्टार&#039; और &#039;अमेजन&#039; के सैटेलाइट नेटवर्क की मदद ले रहा है, जिससे भविष्य में यूजर्स को कहीं भी नेटवर्क की समस्या नहीं होगी.
आसान और किफायती कैमरा बटन
आईफोन 18 सीरीज में ऐप्पल अपने नए कैमरा कंट्रोल बटन के डिजाइन को थोड ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 31 Jul 2026 02:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>नए, अपग्रेड, के, साथ, आएगा, iPhone, Pro, तीन, नए, कलर्स, में, लॉन्चिंग</media:keywords>
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        <title>Dell New Laptops Launch India: डेल ने भारत में उतारे तीन कमाल के लैपटॉप, मिलेंगे ये फीचर्स</title>
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        <description><![CDATA[ Dell New Laptops Launch India: अगर आप भी काफी वक्त से कोई नया लैपटॉप खरीदने की सोच रहे हैं तो आपके लिए अच्छी खबर है. Dell ने इंडियन मार्केट में अपने तीन नए लैपटॉप लॉन्च कर दिए हैं. कंपनी ने Dell XPS 13, Dell 14S, Dell 16S और गेमर्स के लिए नया Alienware 15 को भारतीय बाजार में उतारा है. इन लैपटॉप की सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये सभी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस फीचर्स से लैस हैं. इसका मतलब है कि अब आपका काम पल भर में हो जाएगा. आइए जानते हैं कि इन नए लैपटॉप में क्या खास फीचर्स मिल रहे हैं और इनकी कीमत कितनी है.
&amp;nbsp;Dell XPS 13
अगर आप एक ऐसा लैपटॉप देख रहे हैं जिसे आप आसानी से अपने बैग में रखकर कहीं भी ले जा सकें तो Dell XPS 13 आपके लिए बेस्ट रहेगा. यह लैपटॉप बहुत ही हल्का है और इसका वजन सिर्फ 1 किलोग्राम है. साथ ही इसमें 2.5K टचस्क्रीन डिस्प्ले दिया गया है, जिसकी ब्राइटनेस 500 निट्स है. यानी आपको तेज धूप में भी स्क्रीन साफ दिखेगी. इसमें इंटेल का लेटेस्ट प्रोसेसर दिया गया है, जिसे 32GB तक की भारी भरकम रैम के साथ जोड़ा जा सकता है. इसकी शुरुआती कीमत ₹79,990 से शुरु होती है.&amp;nbsp;
Dell 14S और Dell 16S
ये दोनों लैपटॉप खासतौर पर उन लोगों के लिए बनाए गए हैं जो कोडिंग, वीडियो एडिटिंग या भारी ऑफिस वर्क करते हैं. ग्राहकों को इसमें दो विकल्प मिलेंगे. आप इसे Intel Ultra सीरीज 3 प्रोसेसर या फिर AMD Ryzen AI 400 सीरीज दोनों में से किसी के भी साथ खरीद सकते हैं. साथ ही आपको ऑफिस के काम के दौरान बार-बार चार्जर ढूंढने की जरूरत नहीं पड़ेगी, क्योंकि इनकी बैटरी लाइफ बेहद शानदार है, जो बड़ी आसानी से पूरा दिन निकाल देगी. कीमत की बात करे तो भारत में Dell 14S की कीमत ₹1.20 लाख से और Dell 16S की कीमत ₹2.30 लाख से शुरु होती है.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ें: खास मौके पर खास पेशकश, इन फीचर्स के साथ आएंगे iPhone 20 मॉडल्स
Alienware 15
डेल ने गेम खेलने के शौकीनों का भी पूरा ध्यान रखा है. क्योंकि गेमिंग के लिए कंपनी ने अपना सबसे पॉपुलर ब्रांड Alienware का नया मॉडल पेश किया है. कंपनी इसमें 15.3 इंच का बड़ा डिस्प्ले देती है, जो 165Hz रिफ्रेश रेट को सपोर्ट करता है. इससे गेम खेलते समय स्क्रीन बिल्कुल भी लैग नहीं करेगी. साथ ही दमदार गेमिंग के लिए Nvidia GeForce RTX 5060 ग्राफिक्स कार्ड और दमदार इंटेल कोर 7 प्रोसेसर दिया गया है. कंपनी ने भारी भरकम गेम्स को मक्खन की तरह चलाने वाले इस लैपटॉप की शुरुआती कीमत ₹1.29 लाख रखी है.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ें: पुराना iPhone फेंकने की गलती न करें! हो सकते हैं इतने काम ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 31 Jul 2026 02:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Laptop से Phone चार्ज करना सही? एक गलती से हो सकता है बड़ा नुकसान</title>
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        <description><![CDATA[ Tech Tips: लैपटॉप का इस्तेमाल काफी तेजी से बढ़ा है. ऑफिस से लेकर एंटरनेंटमेंट तक के लिए लैपटॉप का इस्तेमाल हो रहा है. यहां तक की बच्चों की पढ़ाई भी आज लैपटॉप के जरिए हो रही है. ऐसे में कई बार देखा गया है कि लोग लैपटॉप के यूएसबी पोर्ट में स्मार्टफोन को चार्ज करने लगते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं ऐसा करना ठीक है या नहीं. आइए जानते हैं क्या है इसकी सच्चाई.
क्या Laptop से Phone चार्ज करना सेफ है?
आपको बता दें कि अगर आपका लैपटॉप और चार्जिंग केबल अच्छी कंडिशन में हैं तो लैपटॉप से फोन चार्ज करना नॉर्मली सेफ ही माना जाता है. दरअसल, USB पोर्ट एक नॉर्मल ही पावर सप्लाई देता है जिससे फोन चार्ज हो सके. हालांकि, इससे आपके फोन चार्ज होने में काफी समय लगा सकता है.

आज कल के एडवांस स्मार्टफोन में ऐसे सेफ्टी फीचर्स दिए गए हैं जो ओवरचार्जिंग या ज्यादा करंट से डिवाइस को बचाते हैं. हालांकि, लैपटॉप से चार्जिंग की स्पीड अक्सर वॉल चार्जर की तुलना में काफी कम होती है. इसका कारण ये है कि ज्यादातर USB पोर्ट कम पावर आउटपुट देते हैं.
एक गलती से हो सकता है बड़ा नुकसान
लेकिन लैपटॉप से स्मार्टफोन को चार्ज करते समय आपकी एक गलती भी आपके लिए बड़ी मुसीबत बन सकती है. दरअसल, सबसे बड़ी गलती होती है किसी भी अनजान या दूसरे के लैपटॉप से फोन चार्ज करना.
ऐसे सिस्टम से डेटा चोरी या मैलवेयर का खतरा हो सकता है. जब आप फोन को USB के जरिए किसी कंप्यूटर से कनेक्ट करते हैं तो केवल चार्जिंग ही नहीं बल्कि डेटा ट्रांसफर का रास्ता भी खुल सकता है.
अगर गलती से फोन में File Transfer या Data Transfer मोड ऑन हो जाए तो आपकी पर्सनल जानकारी भी जोखिम में पड़ सकती है. इसलिए हमेशा भरोसेमंद लैपटॉप का ही इस्तेमाल करना चाहिए और जरूरत पड़ने पर फोन में Charge Only मोड को ऑन रखना चाहिए.
क्यों होती है स्लो चार्जिंग?
जानकारी के लिए बता दें कि अगर आपने महसूस किया है कि लैपटॉप से फोन चार्ज होने में ज्यादा समय लगता है तो इसकी कई वजह हो सकती हैं.

USB 2.0 पोर्ट कम पावर देता है.
पुराना लैपटॉप फास्ट चार्जिंग को सपोर्ट नहीं करता.
खराब या लो क्वालिटी वाली USB केबल.
चार्जिंग के दौरान फोन का लगातार इस्तेमाल.

अगर आपके लैपटॉप में USB-C Power Delivery (PD) सपोर्ट है तो कई बार फोन फास्ट चार्ज भी हो सकता है.
क्या लैपटॉप की बैटरी पर पड़ता है असर?
अगर आप अपने लैपटॉप से स्मार्टफोन को चार्ज कर रहे हैं तो लाजमी सी बात है कि लैपटॉप की बैटरी तेजी से डिस्चार्ज होने लगती है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि फोन चार्ज करने के लिए एक्सट्रा पावर सप्लाई की जरूरत होती है.

अगर लैपटॉप चार्जर से जुड़ा हुआ है तो आमतौर पर ऐसी कोई बड़ी समस्या नहीं होती. लेकिन अगर लंबे समय तक कई डिवाइस एक साथ चार्ज किए जा रहे हैं तो आपका सिस्टम खराब हो सकता है.
इन बातों का जरूर रखें ध्यान
आपको बता दें कि अगर आप भी अपने लैपटॉप से फोन को चार्ज करते हैं तो कुछ जरूरी चीजों का ध्यान रखना चाहिए.

हमेशा ओरिजिनल या अच्छी क्वालिटी की USB केबल का इस्तेमाल करें.
किसी भी दूसरे या अंजान कंप्यूटर से फोन चार्ज करने से बचें.
फोन में Charge Only मोड ऑन करके रखें.
चार्जिंग के दौरान ऑनलाइन गेम या वीडियो एडिटिंग जैसे काम न करें.
अगर USB पोर्ट ढीला या खराब हो तो उसका इस्तेमाल न करें.
लैपटॉप जरूरत से ज्यादा गर्म हो रहा हो तो चार्जिंग बंद कर दें.

कब करना चाहिए Charger का इस्तेमाल?
अगर आपको जल्दी चार्जिंग चाहिए या आपका फोन फास्ट चार्जिंग सपोर्ट करता है तो ओरिजिनल चार्जर आपके लिए सबसे बेहतर ऑप्शन रहता है. लैपटॉप से फोन को हमेशा इमेरजेंसी की स्थिति में चार्ज करना चाहिए. इससे आपके लैपटॉप की लाइफ बनी रहती है.
यह भी पढ़ें:&amp;nbsp;WhatsApp का अपडेट! Status पोस्ट करने के बाद भी बदल सकेंगे Caption ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 30 Jul 2026 14:30:13 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Laptop, से, Phone, चार्ज, करना, सही, एक, गलती, से, हो, सकता, है, बड़ा, नुकसान</media:keywords>
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        <title>पुराना iPhone फेंकने की गलती न करें! हो सकते हैं इतने काम</title>
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        <description><![CDATA[ iPhone: एप्पल आईफोन आज पूरी दुनिया में काफी ज्यादा पसंद किया जाने वाला डिवाइस बन चुका है. भारत में इस डिवाइस का काफी क्रेज रहता है. हालांकि, आज भी कई लोगों के पास पुराने मॉडल वाले आईफोन मौजूद हैं. अक्सर देखा गया है कि लोग अपने पुराने स्मार्टफोन को नए से एक्सचेंज कर देते हैं या फिर ऐसे ही कबाड़ में फेंक देते हैं. लेकिन बता दें कि आपका पुराना आईफोन भी आपके बहुत काम सकता है. आइए जानते हैं कि कैसे आप अपने पुराने आईफोन को कई तरीकों से इस्तेमाल कर सकते हैं.
इन तरीकों से भी करें इस्तेमाल
आपको बता दें कि आप अपने पुराने आईफोन को हमेशा चार्जिंग स्टैंड पर रखकर डिजिटल घड़ी और अलार्म के रूप में भी इस्तेमाल कर सकते हैं. अगर फोन नए iOS वर्जन को सपोर्ट करता है तो StandBy Mode जैसी फीचर्स का भी फायदा उठाया जा सकता है.

बता दें कि Wi-Fi से कनेक्ट रहने पर ये मौसम की जानकारी, कैलेंडर रिमाइंडर और वॉयस असिस्टेंट जैसे फीचर्स भी उपलब्ध करा सकता है जिसकी मदद से आप अपने काम को और आसानी से कर सकते हैं.
बन सकता है म्यूजिक प्लेयर और गेमिंग डिवाइस
जानकारी के मुताबिक, अगर आपके पास नया स्मार्टफोन है तो पुराने iPhone को सिर्फ मनोरंजन के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है. इसमें केवल अपने पसंदीदा म्यूजिक ऐप रखें और बाकी बेकार के ऐप्स को हटा दें. इसके साथ ही आप Wi-Fi के जरिए गाने सुनें या पहले से डाउनलोड किए हुए ट्रैक का मजा ले सकते हैं.
इसके अलावा ये फोन बच्चों या परिवार के दूसरे सदस्यों के लिए गेम खेलने का डिवाइस भी बन सकता है. इससे आपके मेन फोन की बैटरी भी बची रहेगी और स्टोरेज पर भी एक्सट्रा लोड नहीं पड़ेगा.

नेविगेशन और ई-रीडर का काम भी करेगा
इसके साथ ही आप पुराने आईफोन को नेविगेशन और ई-रीडर के लिए भी इस्तेमाल कर सकते हैं. बता दें कि अगर आप बाइक या साइकिल से ट्रैवल करते हैं तो पुराने iPhone को सिर्फ नेविगेशन डिवाइस के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं. इसे फोन के हॉटस्पॉट से इंटरनेट देकर मैप्स का इस्तेमाल किया जा सकता है. साथ ही, अगर आपको किताबें पढ़ने का शौक है तो इसमें ई-बुक ऐप डाउनलोड करके इसे एक डेडीकेटेड ई-रीडर में भी कनवर्ट किया जा सकता है.
कंटेंट क्रिएटर्स के आ सकता है काम
आज के समय में रील्स और वीडियो बनाना युवाओं को बहुत पसंद आता है. ऐसे में आपका पुराना आईफोन वीडियो बनाने वाले लोगों के लिए काफी काम आ सकता है. ऐसा करने से आपका मेन फोन बाकी के जरूरी कामों के लिए इस्तेमाल होगा और मनोरंजन के लिए आप अपना पुराना आईफोन इस्तेमाल कर सकेंगे.
स्मार्ट होम कंट्रोल सेंटर बनाएं
अगर आपके घर में स्मार्ट लाइट, स्मार्ट टीवी, स्मार्ट स्पीकर या दूसरे स्मार्ट डिवाइस मौजूद हैं तो पुराने iPhone को एक परमानेंट कंट्रोल पैनल की तरह भी इस्तेमाल कर सकते हैं.
इसे घर के किसी एक जगह पर रख दें, जहां से परिवार का कोई भी सदस्य सभी स्मार्ट डिवाइस को आसानी से कंट्रोल कर सके. ये Apple TV या दूसरे स्ट्रीमिंग डिवाइस के रिमोट के रूप में भी काम आ सकता है.
सेफ्टी कैमरे की तरह भी कर सकते हैं इस्तेमाल
इतना ही नहीं, आप अपने पुराने iPhone को घर के अंदर सिक्योरिटी कैमरे की तरह भी इस्तेमाल कर सकते हैं. इसे बच्चों के कमरे, लिविंग रूम या पालतू जानवरों पर नजर रखने के लिए किसी सुरक्षित जगह पर लगाकर निगरानी ऐप्स के जरिए दूर से लाइव वीडियो देखा जा सकता है. इस तरह बिना एक्सट्रा कैमरा खरीदे भी आप बेसिक मॉनिटरिंग की सुविधा का लाभ उठा सकते हैं.
किसी काम का न हो तो क्या करें?
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अगर आपका पुराना आईफोन किसी भी काम के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है तो इसे बेचकर कुछ पैसे ले सकते हैं. इसके अलावा आप इसे जरूरतमंद लोगों को भी दे सकते हैं. अगर फोन पूरी तरह खराब हो चुका है तो उसे कूड़े में फेंकने के बजाय रजिसटर्ड ई-वेस्ट रिसाइक्लिंग सेंटर पर जमा करें.
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        <pubDate>Thu, 30 Jul 2026 14:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>Apple को चुनौती देगी यह कंपनी, लाएगी स्मार्टफोन समेत कई डिवाइस</title>
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        <description><![CDATA[ OpenAI Devices: अब यह तस्वीर साफ होने लगी है कि चैटजीपीटी चैटबॉट बनाने वाली कंपनी ओपनएआई किन-किन हार्डवेयर डिवाइसेस पर काम कर रही है. पिछले कुछ समय में कई रिपोर्ट्स में कंपनी के रोडमैप का खुलासा हो गया है. कंपनी का पहला डिवाइस एक पोर्टेबल स्पीकर होगा, जिसमें एआई को इंटीग्रेट किया जाएगा. बिना स्क्रीन वाला यह स्पीकर एक असिस्टेंट की तरह काम करेगा. इसके बाद कंपनी एआई एजेंट वाला फोन लॉन्च करेगी. इसके अलावा कंपनी स्मार्ट ग्लासेस, स्मार्ट लैंप और शायद इयरबड्स भी बना रही हैं. अपने इन प्रोडक्ट्स के जरिए कंपनी ऐप्पल को टक्कर देना चाहती है.
कैसा होगा ओपनएआई का स्मार्ट स्पीकर?

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ओपनएआई के स्मार्ट स्पीकर के फर्स्ट जनरेशन वेरिएंट में स्क्रीन नहीं होगी. पोर्टेबल होने के कारण आप इसे कहीं भी यूज कर पाएंगे. यह एक फोन की तरह ही एक पर्सनल कंपैनियन के तौर पर काम करेगा. यूजर के साथ कन्वर्सेशन के लिए इसमें ChatGPT और GPT-Live को इंटीग्रेट किया जाएगा. इसमें लगा कैमरा और सेंसर आपके आसपास के माहौल को देख और समझ सकेगा. इसमें कुछ मैकेनिकल एलिमेंट्स भी जोड़े जा सकते हैं. ओपनएआई के सीईओ सैम ऑल्टमैन कह चुके हैं कि यह दुनिया के सामने आने वाला अब तक का सबसे कूल डिवाइस होने वाला है. यह प्रोडक्ट इसलिए भी खास रहने वाला है क्योंकि इसे ऐप्पल के पूर्व चीफ डिजाइनर Jony Ive समेत कई बड़े नाम तैयार कर रहे हैं.
क्या काम आएगा यह स्पीकर?
यह स्पीकर आपके डिजिटल असिस्टेंट के तौर पर काम करेगा. यह मीडिया प्ले करने, स्मार्ट होम एक्सेसरीज को कंट्रोल, मैसेज के रिप्लाई करने, सवालों के जवाब देने जैसे टास्क पूरे करेगा. आप जैसे-जैसे इसे यूज करते जाएंगे, यह आपके बारे में जानकारी जुटाता जाएगा और फिर प्रोएक्टिव होकर आपके टास्क पूरे करने लगेगा. इसे अगले साल की शुरुआत में लॉन्च किया जाएगा और इसे खरीदने के लिए आपको 19,000-28,000 रुपये खर्च करने पड़ेंगे.&amp;nbsp;
ओपनएआई का स्मार्टफोन
ओपनएआई एक एआई एजेंट फोन पर भी काम कर रही है, जो नॉर्मल फोन से काफी अलग होगा. नॉर्मल फोन में हर टास्क के लिए अलग ऐप ओपन करनी होती है. इस फोन में यह झंझट नहीं होगा. यह फोन लोकेशन और कॉन्टेक्स्ट के हिसाब से अपने आप समझ जाएगा कि इसे क्या करना है और फिर बिना कोई ऐप ओपन किए उस टास्क को पूरा कर देगा. इस फोन में MediaTek Dimensity 9600 का कस्टमाइज्ड वर्जन यूज किया जाएगा. Luxshare को मैन्युफैक्चरिंग पार्टनर के तौर पर इस प्रोजेक्ट में शामिल किया जाएगा. विजन और लैंग्वेज टास्क को एक साथ पूरा करने के लिए इसमें दो एआई प्रोसेसर यूज होंगे. इस फोन का प्रोडक्शन पहले 2028 में शुरू होने की उम्मीद थी, लेकिन अब IPO और बढ़ते कंपीटिशन को देखते हुए 2027 में इसका प्रोडक्शन शुरू कर दिया जाएगा. 2028 की शुरुआत में यह फोन लॉन्च हो सकता है.&amp;nbsp;
पाइपलाइन में हैं ये प्रोडक्ट्स
ओपनएआई स्मार्ट ग्लासेस, स्मार्ट लैंप और इयरबड्स पर भी काम कर रही हैं, लेकिन अभी तक इनके बारे में ज्यादा जानकारी सामने नहीं आई है, लेकिन स्ट्रैटजी दिखाती है कि ओपनएआई ने ऐप्पल को टक्कर देने की पूरी तैयारी कर ली है.
ऐप्पल को कैसे मिलेगी टक्कर?

ऐप्पल भी इन दिनों कैमरा वाले एयरपॉड्स, स्मार्ट ग्लासेस, एआई पेंडेंट और स्मार्ट होम हब तैयार कर रही है, जिसमें सिरी को इंटीग्रेट किया जाएगा. अगर दोनों कंपनियों के अपकमिंग प्रोडक्ट्स पर नजर डालें तो साफ पता चलता है कि इनके बीच तगड़ा कंपीटिशन होने वाला है. ग्राहकों को एक ही कैटेगरी में दोनों कंपनियों को प्रोडक्ट्स नजर आएंगे, जिससे ऐप्पल के मार्केट शेयर पर असर पड़ना तय है. इसके अलावा अगर कंपनी के स्तर पर देखें तो भी ओपनएआई ने ऐप्पल को जोर का झटका दिया है. ओपनएआई ने ऐप्पल के करीब 400 पूर्व कर्मचारियों को अपने साथ जोजड लिया है. इनमें Evans Hankey और Tang Tan जैसे बड़े नाम भी शामिल हैं. ऐप्पल के विजन प्रोडक्ट्स ग्रुप के लीडर Paul Meade भी अब ओपनएआई के साथ काम कर रहे हैं.
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        <pubDate>Thu, 30 Jul 2026 14:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>खास मौके पर खास पेशकश, इन फीचर्स के साथ आएंगे iPhone 20 मॉडल्स</title>
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        <description><![CDATA[ 20th Anniversary iPhone: 2007 में पहली बार लॉन्च हुए आईफोन के सफर को 2027 में साल पूरे हो जाएंगे. स्टीव जॉब्स ने जनवरी, 2007 में पहले आईफोन का ऐलान किया था और उसी साल जून में लॉन्चिंग के बाद इसकी बिक्री शुरू हो गई थी. इस हिसाब से देखा जाए तो 29 जून, 2027 को आईफोन की 20वीं एनिवर्सरी होगी, लेकिन अब ऐप्पल सितंबर में ही आईफोन लॉन्च करती है, इसलिए माना जा रहा है कि सितंबर, 2027 में iPhone 20 Series लॉन्च की जाएगी. इस सीरीज को यादगार बनाने के लिए ऐप्पल आईफोन के डिजाइन में कई बड़े बदलाव करने वाली है. आईफोन के 2027 मॉडल में ऑल-ग्लास डिजाइन, नई डिस्प्ले टेक्नोलॉजी और दूसरी कई अपग्रेड्स मिलेंगे. रिपोर्ट्स में इसके कुछ फीचर्स लीक हो चुके हैं. आइए उन पर एक नजर डालते हैं.
एज-टू-एज डिस्प्ले- अगले साल सितंबर में लॉन्च होने वाले आईफोन 20 प्रो मॉडल्स में कर्व्ड ग्लास वाला डिजाइन दिया जा सकता है. यह ऑल-ग्लास डिस्प्ले होगा. यानी इस पर डायनामिक आईलैंड या कैमरे के लिए कोई कटआउट नहीं होंगे. नया डिस्प्ले पैनल चारों कोनों पर कर्व होगा, जिससे बॉर्डरलेस इफेक्ट मिलेगा. 
एडवांस्ड डिस्प्ले- ऐप्पल अपकमिंग सीरीज में सैमसंग के नए डिस्प्ले पैनल को यूज करेगी. इन डिस्प्ले को इनकैप्सुलेशन पर कलर फिल्टर यूज कर बनाया गया है. इससे डिस्प्ले स्टैक की थिकनेस कम हो जाती है और इसके अंदर से ज्यादा लाइट पास हो पाती है. इससे ब्राइटनेस में इंप्रूवमेंट होगा. यानी यह डिस्प्ले कम पावर कंज्यूम करने के बाद भी बेहतर ब्राइटनेस दे पाएगा. इस पैनल को 16nm डिस्प्ले ड्राइवर चिप्स के साथ पेयर किया जाएगा.&amp;nbsp;
अंडर डिस्प्ले फेसआईडी- बताया जा रहा है कि ऐप्पल इस फोन में फेसआईडी को पैनल के नीचे मूव करना चाहती है. इसके लिए खास &quot;spliced micro-transparent glass&quot; विंडो को यूज किया जाएगा, जो इंफ्रारेड सेंसर पास हो जाएंगे. कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि आईफोन 18 प्रो मॉडल्स में भी यह टेक्नोलॉजी यूज हो सकती है, लेकिन 2027 के मॉडल्स में इस टेक्नोलॉजी को शामिल किया जाना लगभग कंफर्म है.
7 इंच का डिस्प्ले साइज- iPhone 20 Pro Max को 7 इंच के डिस्प्ले वाले आईफोन के तौर पर मार्केट किया जा सकता है. दरअसल, पतले बैजल्स और ऑल-स्क्रीन डिजाइन के कारण इस पैनल का साइज लगभग 7 इंच के पास पहुंच जाएगा. इतने बड़े डिस्प्ले के साथ आने वाला यह पहला आईफोन होगा.
कस्टम ऐप्पल इमेज सेंसर- अपकमिंग आईफोन लाइनअप के लिए ऐप्पल अपना खुद का स्टैक्ड इमेज सेंसर बनाना चाहती है. इसे आईफोन कैमरा में यूज होने वाले सोनी सेंसर की जगह इस्तेमाल किया जाएगा. कंपनी ने इसका प्रोटोटाइप तैयार कर लिया है. यह सेंसर LOFIC टेक्नोलॉजी को यूज करता है, जिससे हर पिक्सल अलग-अलग अमाउंट में लाइट स्टोर कर पाएगा.
सॉलिड-स्टेट हैप्टिक बटन- 2027 में लॉन्च होने वाले आईफोन मॉडल्स में मैकेनिकल साइड बटन, वॉल्यूम बटन, एक्शन बटन और कैमरा कंट्रोल बटन को हटाकर इनकी जगह हेप्टिक बटन दी जा सकती है. इसे लेकर ऐप्पल ने टेस्ट पूरे कर लिए हैं. इन बटन को फंक्शनिंग रखने के लिए ultra-low energy microprocessor यूज किया जाएगा, जो बैटरी डेड या फोन के बंद होने पर भी इन बटन को पावर देता रहेगा.
प्योर सिलिकॉन बैटरी- इस बात के भी कयास लगाए जा रहे हैं कि आईफोन 20 सीरीज के प्रो मॉडल्स में प्योर सिलिकॉन बैटरी को यूज किया जा सकता है. सैमसंग समेत दूसरी कंपनियों के बाद अब ऐप्पल भी सिलिकॉन की तरफ अपने कदम बढ़ा सकती है. सिलिकॉन बैटरियां कम स्पेस में ज्यादा एनर्जी स्टोर कर सकती हैं, जिससे फोन का साइज बड़ा किए बिना उसे ज्यादा कैपेसिटी वाले पैक से लैस किया जा सकता है.
iPhone 18 सीरीज के बाद सीधा iPhone 20 सीरीज क्यों?
इस सितंबर में ऐप्पल के आईफोन 18 प्रो मॉडल्स को लॉन्च किया जाएगा और अगले साल की शुरुआत में आईफोन 18 मॉडल लॉन्च होगा. इनके बाद अगले साल सितंबर में कंपनी आईफोन 19 सीरीज को पूरी तरह स्किप करते हुए सीधा आईफोन 20 प्रो मॉडल्स लॉन्च करेगी. ऐप्पल ने इसी तरह 2017 में iPhone X लॉन्च करने से पहले iPhone 9 सीरीज को स्किप कर दिया था.
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        <pubDate>Thu, 30 Jul 2026 14:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>US School Security Drone: अमेरिका के स्कूलों में तैनात होंगे &amp;apos;पेपर स्प्रे ड्रोन&amp;apos;, हमलावरों पर 15 सेकंड में एक्शन</title>
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        <description><![CDATA[ US School Security Drone : अमेरिका में स्कूलों की सुरक्षा को और मजबूत बनाने के लिए नई तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है. लगातार बढ़ रही स्कूल शूटिंग की घटनाओं के बीच कुछ स्कूलों में ऐसे खास ड्रोन तैनात किए जाने की तैयारी है, जो किसी हमलावर की जानकारी मिलते ही कुछ ही सेकंड में उसके पास पहुंच जाएंगे. इन ड्रोन का मकसद हमलावर को रोकना और पुलिस के पहुंचने तक हालात को कंट्रोल रखना है. दावा किया जा रहा है कि ये ड्रोन सिर्फ 15 सेकंड में कार्रवाई शुरू कर सकते हैं. तो आइए जानते हैं कि ये ड्रोन कैसे काम करेंगे और इनमें क्या खास होगा.&amp;nbsp;
किन स्कूलों में लगाए जाएंगे ये ड्रोन?
रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका के जॉर्जिया के पांच स्कूलों, फ्लोरिडा के तीन स्कूलों और कोलोराडो के एक स्कूल में इन ड्रोन को तैनात किया जाएगा. इन्हें ऑस्टिन स्थित कंपनी Mithril Defense ने तैयार किया है. कंपनी का कहना है कि यह दुनिया का पहला ऐसा सिस्टम है, जिसे खास तौर पर एक्टिव शूटर को रोकने के लिए बनाया गया है.&amp;nbsp;
15 सेकंड में हमलावर तक पहुंचने का दावा
कंपनी के मुताबिक, अगर किसी स्कूल में हमलावर होने की सूचना मिलती है, तो ये ड्रोन करीब 15 सेकंड के अंदर मौके पर पहुंच सकते हैं. इसका उद्देश्य पुलिस और अन्य सुरक्षा एजेंसियों के पहुंचने तक समय हासिल करना और हालात को संभालने में मदद करना है. इन ड्रोन को हजारों किलोमीटर दूर से भी उड़ाया जा सकता है. इनमें स्पीकरफोन भी लगाया गया है, जिससे दो तरफा बातचीत की जा सकती है.&amp;nbsp;
ये ड्रोन कैसे काम करेंगे?
स्कूल के टीचर्स को इसके लिए एक मोबाइल ऐप और क्लासरूम में पैनिक बटन दिया जाएगा. जैसे ही किसी खतरे की जानकारी मिलेगी, शिक्षक ऐप या पैनिक बटन के जरिए ड्रोन को सक्रिय कर सकेंगे. कंपनी के अनुसार, एक बार पूरी तरह चार्ज होने पर ये ड्रोन करीब आठ मिनट तक उड़ सकते हैं और 900 MHz फ्रीक्वेंसी पर काम करते हैं.&amp;nbsp;
कंपनी ने क्या कहा?
कंपनी का कहना है कि उसके ड्रोन पहले से ही स्कूल में चार्जिंग पैड पर तैयार रहेंगे. जरूरत पड़ने पर इन्हें ऑस्टिन में मौजूद कंपनी की टीम दूर से ऑपरेट करेगी. कंपनी के बयान के अनुसार, उनकी टीम एक ही ऑपरेशन सेंटर से पूरे अमेरिका के स्कूलों में तैनात ड्रोन को कंट्रोल कर सकती है.&amp;nbsp;
इनमें क्या खास होगा?
कंपनी के मुताबिक, स्कूल की इमारत के अंदर ये ड्रोन 30 से 50 मील प्रति घंटे की स्पीड से उड़ सकते हैं. वहीं बाहर की ओर इनकी अधिकतम स्पीड 100 मील प्रति घंटा तक हो सकती है. स्कूल परिसर में पहले से छह-छह ड्रोन वाले कई बॉक्स अलग-अलग जगह लगाए जाएंगे. इससे जिस जगह खतरा होगा, उसके सबसे नजदीक मौजूद ड्रोन को तुरंत भेजा जा सकेगा. &amp;nbsp;
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हमलावर को कैसे रोकेंगे ये ड्रोन?
रिपोर्ट के अनुसार, Mithril Defense के सह-संस्थापक और रिटायर्ड नेवी सील बिल किंग ने बताया कि इन ड्रोन को इस तरह तैयार किया गया है कि वे हमलावर का ध्यान भटका सकें. इसके लिए ड्रोन तेज चमकने वाली स्ट्रोब लाइट जलाएंगे, सायरन बजाएंगे, पेपर जेल स्प्रे करेंगे या जरूरत पड़ने पर करीब 60 मील प्रति घंटे की रफ्तार से हमलावर से टकरा भी सकते हैं. &amp;nbsp;बिल किंग का कहना है कि एक बार जब ड्रोन किसी हमलावर के पीछे लग जाएं, तो उसके लिए उनसे बच निकलना बेहद मुश्किल होगा.&amp;nbsp;
यूक्रेन युद्ध से मिला यह आइडिया
कंपनी के टैक्टिकल ऑपरेशंस डायरेक्टर ख्रिस्टोफ ओबोर्स्की, जो पहले ऑस्टिन पुलिस विभाग की SWAT यूनिट में टीम लीडर रह चुके हैं, ने बताया कि इस तकनीक का विचार यूक्रेन युद्ध से मिला. &amp;nbsp;उनके अनुसार, फरवरी 2022 में रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद युद्ध के दौरान छोटे ड्रोन का जिस तरह इस्तेमाल हुआ, उसी से इस सिस्टम को विकसित किया गया.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Thu, 30 Jul 2026 14:30:05 +0530</pubDate>
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        <title>क्या है AirPods का 60&amp;60 Rule? जानें एक्सपर्ट्स क्यों देते हैं सलाह</title>
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        <description><![CDATA[ AirPods: वायरलेस ईयरबड्स लोगों की जिंदगी की जरूरत बन चुके हैं. अब ज्यादातर लोग स्मार्ट डिवाइसेज का इस्तेमाल कर रहे हैं जिनकी मदद से उन्हें अपने काम करने में काफी मदद मिलती है. इसी कड़ी में बता दें कि एयरपॉड्स मार्केट में काफी ज्यादा पसंद किया जाने वाला डिवाइस है. लेकिन ज्यादातर लोग इसको इस्तेमाल करने का सही तरीका नहीं जानते हैं. दरअसल, कई एक्सपर्ट्स सलाह देते हैं कि एयरपॉड्स को इस्तेमाल करने का एक नियम है जिसे 60-60 कहा जाता है. आइए जानते हैं कि क्या है ये नियम.
क्या है 60-60 Rule
जानकारी के मुताबिक, 60-60 Rule सुनने की ताकत को सुरक्षित रखने के लिए ऑडियोलॉजी एक्सपर्ट्स द्वारा सुझाया गया एक आसान नियम है. इसमें दो बातें बताई गई हैं जिसमें पहला है कि वॉल्यूम हमेशा मैक्सिमम लेवल के 60% से कम रखें. दूसरा लगातार 60 मिनट से ज्यादा ईयरबड्स का इस्तेमाल न करें. इसके बाद कम से कम 15 से 20 मिनट का ब्रेक जरूर लें. इस नियम का मकसद कानों पर पड़ने वाले लगातार दबाव को कम करना और सुनने की ताकत को लंबे समय तक सेफ रखना है.

कितना खतरनाक होता है तेज वॉल्यूम
एक्सपर्ट्स के मुताबिक करीब 85 डेसिबल (dB) तक की आवाज को एक समय तक सुरक्षित माना जाता है. लेकिन जैसे-जैसे आवाज बढ़ती है, वैसे-वैसे आपके कानों पर एक्सट्रा लोड पड़ने लगता है. जैसे अगर आप बहुत तेज आवाज में म्यूजिक सुन रहे हैं तो कुछ ही देर में आपके कानों को नुकसान पहुंचना शुरू हो जाता है.
AirPods और कई दूसरे ईयरबड्स मैक्सिमम वॉल्यूम पर 100 dB से भी ज्यादा आवाज पैदा कर सकते हैं जो लंबे समय तक सुनने के लिए बिलकुल भी सेफ नहीं माने जाते हैं.
क्यों जरूरी है ये नियम
दरअसल, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार दुनिया भर में करोड़ों युवाओं में तेज म्यूजिक सुनने का क्रेज रहता है जिससे उनके कानों पर ज्यादा दवाब पड़ता है और उनके सुनने की ताकत पर भी असर पड़ता है. बता दे कि लगातार तेज आवाज में ऑडियो सुनने से कानों के अंदर मौजूद बेहद सेंसिटिव हेयर सेल्स धीरे-धीरे घायल होने लगते हैं.
ये छोटे-छोटे सेल्स आवाज को दिमाग तक पहुंचाने का काम करते हैं. अब अगर एक बार ये खराब हो जाते हैं तो इन्हें दोबारा ठीक नहीं किया जा सकता है. यही वजह है कि लंबे समय तक तेज आवाज सुनना आने वाले समय में परमानेंट Hearing Loss का कारण बन सकता है.
AirPods इस्तेमाल करते समय इन बातों का रखें ध्यान
अगर आप रोजाना AirPods या दूसरे ईयरबड्स इस्तेमाल करते हैं तो कुछ जरूरी आदतें अपनाकर अपने कानों को सुरक्षित रख सकते हैं.

iPhone में Headphone Safety फीचर ऑन रखें और मैक्सिमम वॉल्यूम लिमिट सेट करें.
अगर फोन बार-बार हाई वॉल्यूम की वार्निंग दे रहा है तो उसे नजरअंदाज न करें.
हर एक घंटे के बाद कम से कम 15 से 20 मिनट का ब्रेक लें.
शोर वाले माहौल में वॉल्यूम बढ़ाने की बजाय Noise Cancellation वाले हेडफोन का इस्तेमाल करें.
सोते समय या कई घंटों तक लगातार ईयरबड्स लगाए रखने से बचें.

किन चीजों को नजरअंदाज करना पड सकता है भारी
आपको बता दें कि अगर आपने भी कुछ चीजों को नजरअंदाज किया तो आपके कानों को परमानेंट नुकसान पहुंच सकता है.


कानों में लगातार सीटी या घंटी जैसी आवाज आना.
लोगों की बात समझने में परेशानी होना.
भीड़ या शोर वाले स्थान पर बातचीत सुनने में दिक्कत होना.
पहले की तुलना में बार-बार वॉल्यूम बढ़ाने की जरूरत महसूस होना.
अलार्म, डोरबेल या ऊंची आवाज वाले साउंड साफ न सुनाई देना.

अगर आपको भी ऐसे लक्षण दिखाई दें तो जल्द से जल्द कान के एक्सपर्ट से सलाह लेना बेहतर रहेगा.
कौन से हेडफोन हैं ज्यादा सेफ
आपकी जानकारी के लिए बता दे कि अगर आप भी अपने लिए कोई हेडफोन खरीदने का प्लान बना रहे हैं तो Noise Cancellation वाले Over-Ear Headphones आपके लिए एक बेहतर ऑप्शन साबित हो सकते हैं. ये बाहर के शोर को कम कर देते हैं जिससे आपको म्यूजिक सुनने के लिए वॉल्यूम ज्यादा बढ़ाने की जरूरत नहीं पड़ती है.
वहीं नॉर्मल ईयरबड्स आवाज सीधे कान की नली तक पहुंचाते हैं. अगर इन्हें लंबे समय तक तेज वॉल्यूम पर इस्तेमाल किया जाए तो सुनने की ताकत कम हो सकती है.
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        <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 22:30:17 +0530</pubDate>
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        <title>दिलों को मिला रहा एआई, यहां सरकारी ऐप से डेटिंग कर रहे लोग</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/दिलों-को-मिला-रहा-एआई-यहां-सरकारी-ऐप-से-डेटिंग-कर-रहे-लोग</link>
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        <description><![CDATA[ AI Matchmaking: एआई अब सिर्फ कोडिंग, रिसर्च और ऑटोमेशन के काम ही नहीं आ रहा है. इसकी मदद से लोगों के दिल भी मिल रहे हैं. जापान में तो सरकार ने बकायदा एआई डेटिंग ऐप भी लॉन्च की हुई है, जहां लोग आकर मिल रहे हैं और कई लोग अब तक शादी भी कर चुके हैं. करीब 2 साल पहले लॉन्च हुई इस ऐप पर मिले 265 कपल्स ने शादी कर ली है, जबकि 700 से ज्यादा कपल्स सीरियसल रिलेशनशिप में है. आइए जानते हैं कि इस ऐप की शुरुआत कैसे हुई, यह कैसे काम करती है और अब तक इसका क्या फायदा हुआ है.
कैसे हुई ऐप की शुरुआत?
जापान सरकार ने सितंबर, 2024 में Tokyo Enmusubi नाम से एक एआई पावर्ड मैचमेकिंग ऐप लॉन्च की थी. इसका एकमात्र उद्देश्य जापान की गिरती जन्मदर को रोकना था. दरअसल, एक सर्वे किया गया था, जिसमें पता चला कि शादी करने की इच्छा रखने वाले करीब 70 प्रतिशत लोग डेटिंग ही नहीं कर रहे हैं. इसे देखते हुए सरकार ने इस ऐप की शुरुआत की. डेटिंग को सेफ और सिक्योर बनाने के लिए इस पर कुछ पाबंदियां भी लगाई गईं. जैसे इस ऐप पर कोई भी अपनी मर्जी से अकाउंट नहीं बना सकता है. सबसे पहले लोगों को यह साबित करना होगा कि वो कानूनी तौर पर सिंगल है और इसके बाद उन्हें एक ऑनलाइन इंटरव्यू भी पास करना होता है. इसके बाद उन्हें ऐप पर रजिस्टर किया जाता है. इस ऐप पर रजिस्टर होने के लिए 36,000 लोगों ने आवेदन किया था, लेकिन इनमें से करीब 16,000 को ही रजिस्टर किया गया है.
ऐप से हुआ यह फायदा
रिपोर्ट्स के अनुसार, इस ऐप के जरिए 760 कपल्स सीरियस रिलेशनशिप में आ चुके हैं, जबकि 265 ने शादी कर ली है. एक यूजर ने बताया कि उसने अपने 40वें जन्मदिन से पहले इस ऐप पर रजिस्टर किया था. अगस्त में उन्होंने एक व्यक्ति से डेटिंग शुरू की, सितंबर तक आते-आते उनका रिश्ता गंभीर हो गया और उन्होंने दिसंबर में शादी के लिए हां कर दी. एक और यूजर ने बताया कि ऐप में मिलने वाला कंपेटिबिलिटी स्कोरिंग का फीचर काफी काम आ रहा है. उन्होंने कहा कि अगर आप किसी से मिलने को लेकर स्योर नहीं हैं तो कंपेटिबिलिटी रेटिंग आपके काम आ सकती है. यह आपको लोगों से मिलने के लिए प्रेरित करती है.
क्यों शुरू की गई यह ऐप?
जापान में पिछले 10 वर्षों से जन्मदर लगातार घट रही है और इसने सरकार की माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं. पिछले साल जापान में केवल 6.71 लाख बच्चों का जन्म हुआ, जो पिछले 125 सालों में सबसे कम है. यहां प्रजनन दर 1.14 पर पहुंच गई है. यहां जन्म की तुलना में मौतों की संख्या दोगुनी से अधिक है. इस बढ़ते हुए खतरे को देखते हुए सरकार चाह रही है कि लोग ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करें. इसी वजह से आमतौर पर प्राइवेट कंपनियों की तरफ से ऑपरेट होने वाली डेटिंग सर्विस में सरकार खुद को शामिल कर रही है.
दिलों को कैसे मिलाती है एआई?
एआई डेटिंग ऐप्स की बात करें तो इनमें मैचमेकिंग एल्गोरिदम होते हैं. ये यूजर्स की पसंद, इंट्रेस्ट और बिहैवियर का पूरा रिकॉर्ड रखते हैं. फिर इसे एआई और डीप लर्निंग जैसी टेक्नीक के जरिए प्रोसेस किया जाता है. इससे पैटर्न निकलकर सामने आता है. फिर जब किसी दूसरे यूजर में ऐसा पैटर्न देखा जाता है तो एआई की मदद से इन्हें एक-दूसरे को सजेस्ट किया जाता है. पिछले कुछ समय से ऐसी ऐप्स का ट्रेंड बढ़ा है.&amp;nbsp;
स्वाइप करने का झंझट ही खत्म कर देगी यह एआई ऐप
डेटिंग ऐप Hinge के पूर्व सीईओ Justin McLeod एक नई एआई पावर्ड डेटिंग ऐप ला रहे हैं. इसमें न तो स्वाइप करने का झंझट रहेगा और न ही अजनबियों से चैटिंग करने का पंगा होगा. यह ऐप आपको तभी नए लोगों से इंट्रोड्यूस करवाएगी, जब इसको लगेगा कि आप दोनों के बीच बात बन सकती है. इस ऐप का एआई सिस्टम यूजर से चैटिंग के जरिए उसकी पसंद समझेगा और उसी हिसाब से मैच सजेस्ट करेगा.
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        <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 22:30:16 +0530</pubDate>
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        <title>Apple के डिवाइसेज पर मंडरा रहा खतरा! तुरंत करें ये काम</title>
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        <description><![CDATA[ Apple Security Update: एप्पल के कई सारे प्रोडक्ट्स मार्केट में मौजूद हैं जिन्हें यूजर्स काफी पसंद करते हैं. एप्पल के प्रोडक्ट्स प्रीमियम कैटेगरी में आते हैं जिनमें यूजर्स को काफी एडवांस फीचर्स भी देखने को मिल जाते हैं. आईफोन से लेकर मैकबुक और आईपैड तक, कंपनी के डिवाइस काफी यूनिक होते हैं. अब अगर आप भी एप्पल का आईपैड, मैकबुक, एप्पल वॉच, एप्पल टीवी या विजन प्रो इस्तेमाल कर रहे हैं तो आपके लिए एक अच्छी खबर है. दरअसल, कंपनी ने अपने प्रोडक्ट्स के लिए नया अपडेट जारी किया है जिससे डिवाइस में कई खामियों को दूर किया जा सकता है.
iPhone और iPad के लिए जारी हुआ बड़ा सिक्योरिटी अपडेट
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, Apple ने iOS 26.6 और iPadOS 26.6 अपडेट जारी किए हैं. जानकारी के अनुसार, इन दोनों अपडेट में 75 से ज्यादा सुरक्षा खामियों को ठीक किया गया है. इनमें कई ऐसी कमियां पाई गईं थीं जिनका फायदा उठाकर कोई खतरनाक ऐप आपके सिस्टम में घुस सकता था.
इसके अलावा डिवाइस में ऐसी कमियां भी पाई गईं थीं जिनसे कई ऐप्स को ज्यादा परमिशन मिल जाते जिसके बाद वो डिवाइस पर आपसे ज्यादा कंट्रोल कर पाते. हालांकि Apple का कहना है कि फिलहाल ऐसे किसी हमले की जानकारी सामने नहीं आई है, फिर भी यूजर्स को अपने डिवाइस को तुरंत अपडेट कर लेना चाहिए.

इन चीजों से मिलेगी सुरक्षा
आपको बता दें कि इस नए अपडेट के बाद एप्पल के प्रोडक्ट्स इस्तेमाल करने वाले यूजर्स को कई तरीकों से सुरक्षा मिल जाएगी. इस अपडेट से Apple ने ऐसी समस्याओं को भी दूर किया है जिनकी वजह से कोई ऐप बिना परमिशन के आपके डिवाइस में कुछ भी कर सकता था. अब अपडेट आने के बाद यूजर्स की प्राइवेसी और डेटा पहले के मुकाबले ज्यादा सुरक्षित रहेंगे.
Mac में भी आया अपडेट
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि Apple ने macOS Tahoe 26.6 के जरिए Mac कंप्यूटरों के लिए 150 से ज्यादा सेफ्टी समस्याओं को ठीक किया है. ये हाल के समय का सबसे बड़ा सिक्योरिटी अपडेट माना जा रहा है. सिस्टम में ऐसी कमियां पाई गईं थी जिनकी मदद से डिवाइस पूरी तरह से हैक भी हो सकता था लेकिन अपडेट के बाद अब इस समस्या को भी दूर कर दिया गया है. बता दें कि Apple ने पुराने macOS वर्जन के लिए भी अलग से सिक्योरिटी अपडेट जारी किए हैं.
Wi-Fi सेफ्टी पहले से मजबूत
बताते चलें कि Apple ने अपने Safari ब्राउजर में इस्तेमाल होने वाले WebKit इंजन की कई सेफ्टी समस्याओं को भी ठीक किया है. इन कमियों की वजह से यूजर्स को फेक वेबसाइट्स के जरिए ठगा जा सकता था. इसके अलावा Wi-Fi से संबंधित भी एक कमजोरी पाई गई थी जिसे अपडेट में ठीक कर दिया गया है.

ये डिवाइस भी हो गए सुरक्षित
एप्पल ने सिर्फ iPhone और Mac को ही अपडेट्स जारी नहीं किए हैं. कंपनी ने Apple Watch, Apple TV और Vision Pro के लिए भी नए अपडेट जारी किए हैं. जानकारी के मुताबिक, watchOS 26.6, tvOS 26.6 और visionOS 26.6 में भी कई कमियों को दूर किया गया है. Apple के मुताबिक, सभी प्लेटफॉर्म को मिलाकर कुल 194 से ज्यादा यूनिक सिक्योरिटी कमजोरियों को दूर किया गया है. इससे पूरे Apple इकोसिस्टम की सुरक्षा पहले से कहीं बेहतर हो गई है.
क्या तुरंत अपडेट करना जरूरी है?
Apple का कहना है कि अभी तक इस बात का कोई सबूत नहीं मिला है कि इन सुरक्षा खामियों का किसी भी साइबर हमले में इस्तेमाल किया गया है. लेकिन साइबर अपराधी ज्यादातर ऐसी ही कमजोरियों का फायदा उठाकर लोगों को ठगने का काम करते हैं. इसीलिए यूजर्स को अपने डिवाइस को तुरंत ही अपडेट कर लेना चाहिए.
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        <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 22:30:14 +0530</pubDate>
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        <title>अब X से भी भेज सकेंगे पैसे! X में आ गया ये नया फीचर</title>
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        <description><![CDATA[ Elon Musk X Money: एलन मस्क की कंपनी X, जिसे पहले ट्विटर कहते थे, पूरी दुनिया में एक चर्चित प्लेटफॉर्म है जिसपर लोग अपने विचार शेयर करते हैं. लेकिन अब कंपनी ने अमेरिका में अपना एक नया डिजिटल पेमेंट ऐप X Money को पेश किया है. इसका मतलब साफ है कि अब यूजर्स एक्स से ही ऑनलाइन पेमेंट भी कर सकेंगे. जानकारी के अनुसार, ये सर्विस फिलहाल अभी अमेरिका में और पेड X सब्सक्राइबर्स के लिए ही उपलब्ध कराई गई है.
अमेरिका में आया नया डिजिटल पेमेंट ऐप
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, X Money की शुरुआत फिलहाल अमेरिका में रहने वाले उन यूजर्स के लिए की गई है जिन्होंने X का पेड सब्सक्रिप्शन लिया हुआ है. इस नई सर्विस के जरिए यूजर्स ऐप के अंदर ही पैसे भेज सकेंगे, पेमेंट कर सकेंगे और अपने फाइनेंशियल ट्रांजैक्शन को आसानी से मैनेज कर पाएंगे. बता दें कि कंपनी का मकसद है सोशल मीडिया और डिजिटल फाइनेंस एक ही प्लेटफॉर्म पर आ सके जिससे यूजर्स को किसी भी चीज के लिए दूसरे ऐप पर निर्भर न होना पड़े.
नहीं लगेगी कोई
इस नए X Money ऐप का एक और बड़ी खासियत ये है कि इसकी मदद से यूजर को इंस्टेंट Peer-to-Peer (P2P) ट्रांसफर की सुविधा भी मिल जाएगी. इसके जरिए यूजर ऐप के अंदर ही दूसरे यूजर को तुरंत पैसे भेज सकेंगे. कंपनी का दावा है कि यूजर को इस फीचर का इस्तेमाल करने के लिए कोई भी एक्सट्रा चार्ज नहीं देना पड़ेगा. साथ ही इसके लिए कोई भी ट्रांसेक्शन लिमिट भी नहीं लागू की गई है.
मिलेगा X Visa डेबिट कार्ड
आपको बता दें कि X Money के साथ यूजर्स को X Visa Debit Card भी दिया जाएगा. ये एक डिजिटल कार्ड होगा जिसे मिलने के बाद यूजर्स उसे एप्पल पे से डायरेक्ट कनेक्ट भी कर सकते हैं. बता दें कि इस कार्ड का इस्तेमाल आप ऑनलाइन या ऑफलाइन पेमेंट करने के लिए भी किया जा सकता है. इतना ही नहीं, कंपनी ने यूजर्स को एक और सुविधा दी है. दरअसल, इस कार्ड की मदद से अब विदेशी लेनदेन (Foreign Transaction) पर कोई एक्सट्रा चार्ज नहीं लिया जाएगा.
बनाना है Everything App
एलन मस्क कई बार पब्लिक में बता चुके हैं कि वो एक ऐसा प्लेटफॉर्म बनाना चाहते हैं जहां यूजर्स को सभी चीजें एक ही जगह पर मिल जाएगा. इसीलिए वह X को एक Everything App बनाना चाहते हैं.
अब X Money की शुरुआत इसी प्लान का एक जरूरी हिस्सा माना जा रहा है. अगर ये सर्विस सफल रहती है तो आने वाले समय में इसमें इनवेस्टमेंट, डिजिटल वॉलेट, बिल पेमेंट, शॉपिंग और दूसरे फाइनेंशियल सर्विसेज भी कनेक्ट की जा सकती हैं.
इन यूजर्स को मिलेगा ज्यादा फायदा
दरअसल, X Money के साथ X अपने प्रीमियम सब्सक्राइबर्स को एक्सट्रा फाइनेंशियल फायदा पहुंचाना चाहता है. जानकारी के अनुसार, अब Premium+ प्लान लेने वाले यूजर्स जो हर महीने 40 डॉलर या सालाना 395 डॉलर का पेमेंट करते हैं उन्हें 6% का सालान ब्याज (APY) मिलेगा.
इसके अलावा Premium प्लान वाले यूजर्स भी 6% APY ले सकते हैं लेकिन इसके लिए उन्हें अपने X Money अकाउंट से Direct Deposit लिंक करना होगा. इसके अलावा कुछ चुनिंदा खरीदारी पर 3% तक कैशबैक भी मिलेगा. अगर यूजर Direct Deposit सुविधा का इस्तेमाल करते हैं तो उन्हें अपनी सैलरी या दूसरे पेमेंट तय समय से पहले ही मिल जाएगा.
क्या भारत में भी आएगा X Money?
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि फिलहाल X Money को केवल अमेरिका में लॉन्च किया गया है और कंपनी ने भारत में इसके लॉन्च को लेकर अभी तक कोई ऑफिशियल जानकारी शेयर नहीं की है. लेकिन माना जा रहा है कि अगर ये सर्विस अमेरिका में सफल होती है तो कुछ समय बाद कंपनी इसे भारत में भी उतार सकती है.
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        <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 22:30:13 +0530</pubDate>
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        <title>चुपचाप बैटरी खत्म कर रहे हैं Google के ये 5 Apps! देखें लिस्ट</title>
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        <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 22:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>कहीं आप दवा के नाम पर ज्यादा पैसे तो नहीं दे रहे? इस सरकारी App से मिनटों में करें चेक</title>
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        <description><![CDATA[ Pharma Sahi Daam: सिर दर्द से लेकर बुखार तक के लिए लोगों को ठीक होने के लिए दवा की जरूरत पड़ती है. अक्सर देखा गया है कि एक ही दवा किसी मेडिकल स्टोर पर कुछ कीमत पर मिलती है तो किसी पर कुछ कीमत पर. इसके अलावा ऑनलाइन और ऑफलाइन दवा की कीमतों में भी काफी अंतर देखने को मिलता है. साथ ही कई बार लोग दवा के लिए ज्यादा पैसे दे देते हैं. इसी कड़ी में आज हम आपको एक ऐसे ऐप के बारे में बताने जा रहे हैं जहां पर आपको दवा की सही कीमत और उसकी सारी जानकारी मिल जाएगी.
क्या है Pharma Sahi Daam
जानकारी के अनुसार, Pharma Sahi Daam केंद्र सरकार के राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) द्वारा तैयार किया गया एक ऑनलाइन पोर्टल और मोबाइल ऐप है. बता दें कि इस ऐप का मकसद दवाओं को उसकी सही कीमत पर बेचना है और लोगों के साथ होने वाली ठगी को कम करना है. कई बार देखा गया है कि मेडिकल स्टोर दवाओं को मनमानी कीमत पर बेचने लगते हैं. इसी पर लगाम लगाने के लिए सरकार ने इस ऐप को पेश किया है जिससे माना जा रहा है कि लोगों को काफी फायदा मिल सकता है.

कैसे चेक करें दवा की कीमत
अब आपको बता दें कि सरकार की इस सुविधा का इस्तेमाल करना बेहद आसान है. इसके लिए आपको सबसे पहले NPPA के ऑफिशियल Pharma Sahi Daam पोर्टल या मोबाइल ऐप पर जाना होगा. इसके बाद सर्च बॉक्स में दवा या उसके ब्रांड का नाम लिखें.
दिखाई गई लिस्ट में सही दवा चुनें. इसके लिए Strength, Pack Size, Dosage Form, Composition और Manufacturer जरूर चेक करें. अब स्क्रीन पर दिखाई गई MRP को दवा के पैकेट या मेडिकल स्टोर द्वारा बताए गए दाम से मैच करें.
क्या मिलती है जानकारी
आपको बता दें कि Pharma Sahi Daam पर किसी भी दवा को खोजने पर कई जरूरी जानकारियां मिल जाती हैं जैसे

दवा की MRP
सेलिंग प्राइस
Manufacturer का नाम
दवा की ताकत
पैक का साइज
दवा का Composition

उसी कंपोजिशन वाले दूसरे ब्रांड और उनकी कीमत
इससे उपभोक्ता ये समझ सकते हैं कि एक ही दवा कई कंपनियां किस दाम पर बेच रही हैं.
इन बातों का रखें ध्यान
दरअसल, दवाओं की कीमतों की तुलना करते समय केवल MRP देखना ही काफी नहीं होता है. इसके साथ ही आपको कुछ जरूरी चीजों का भी ध्यान रखना पड़ता है.


हमेशा एक जैसी ताकत वाली दवा की तुलना करें.
पैक साइज एक बराबर होना चाहिए.
दवा का Dosage Form भी समान होना चाहिए.
Manufacturing Date को भी चेक करें क्योंकि अलग-अलग बैच पर अलग दाम लागू हो सकता है.
अगर सेलिंग प्राइस देख रहे हैं तो टैक्स और MRP के अंतर को भी समझना जरूरी है.

क्या सस्ती दवाई खरीदनी चाहिए
अक्सर देखा गया है कि एक ही दवा को कोई कंपनी महंगी कीमत पर बेचती है तो कोई कंपनी सस्ती कीमत पर. ऐसे में लोग सस्ती कीमत वाली दवाई खरीद लेते हैं. लेकिन सवाल ये है कि क्या सस्ती दवाई लोगों को खरीदनी चाहिए या फिर नहीं. दरअसल, आपको बता दें कि समान कंपोजिशन वाली सस्ती दवा को बिना डॉक्टर के सलाह के लेना सही नहीं माना जाता है. ऐसा करने से बचना चाहिए.
ज्यादा कीमत वसूली जाए तो क्या करें
अब अगर किसी दवा के लिए निर्धारित सीमा से ज्यादा कीमत ली जा रही है या पैकेट पर छपी MRP से ज्यादा पैसे मांगे जा रहे हैं तो आप इसकी शिकायत भी कर सकते हैं.
Pharma Sahi Daam और Pharma Jan Samadhan प्लेटफॉर्म के जरिए उपभोक्ता ऑनलाइन शिकायत दर्ज कर सकते हैं. हांलाकि, आपको शिकायत करते समय कुछ जरूरी जानकारी देनी पड़ती है.

दवा का नाम
निर्माता का नाम
बैच नंबर
पैकेट पर छपी MRP
ली गई कीमत
खरीद का बिल
दवा के पैकेट की फोटो

शिकायत का समाधान होने तक दवा का बिल और पैकेजिंग सुरक्षित रखना चाहिए ताकि जरूरत पड़ने पर प्रमाण के रूप में पेश किया जा सके.
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        <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 08:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>इन गलतियों से कम हो जाती है फोन की चार्जिंग स्पीड! एक सेटिंग बदलते मिलेगी सुपरफास्ट स्पीड</title>
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        <description><![CDATA[ इन गलतियों से कम हो जाती है फोन की चार्जिंग स्पीड! एक सेटिंग बदलते मिलेगी सुपरफास्ट स्पीड ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 08:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>10 साल में 217 प्रतिशत बढ़ी इंटरनेट कनेक्टिविटी, अब कितने सब्सक्राइबर्स?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/10-साल-में-217-प्रतिशत-बढ़ी-इंटरनेट-कनेक्टिविटी-अब-कितने-सब्सक्राइबर्स</link>
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        <description><![CDATA[ Internet Subscription In Delhi: राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में पिछले एक दशक में इंटरनेट कनेक्टिविटी तेजी से फैली है. दिल्ली सरकार के ताजा डेटा से पता चलता है कि 2015 में इंटरनेट सब्सक्राइबर्स की संख्या 1.8 करोड़ थी, जो 2025 में बढ़कर 5.7 करोड़ हो गई है. यानी 10 सालों में इंटरनेट सब्सक्राइबर्स की संख्या 217 प्रतिशत बढ़ी है. ये आंकड़े भले ही दिल्ली की तस्वीर पेश कर रहे हैं, लेकिन पूरा देश ही ऐसी क्रांति का गवाह बना है. इंटरनेट कनेक्टिविटी बढ़ने के साथ-साथ डेटा की कम कीमत के कारण देश के टेलीकॉम सेक्टर में करोड़ों नए ग्राहक जुड़े हैं और आज भारत दुनिया में मोबाइल यूजर्स की संख्या चीन के बाद सबसे ज्यादा है.
इंटरनेट सब्सक्राइब का क्या मतलब?
दिल्ली सरकार की ताजा रिपोर्ट में इंटरनेट यूजर की बजाय इंटरनेट सब्सक्रिप्शन का जिक्र किया गया है. इसमें मोबाइल वायरलेस, फिक्स्ड वायरलेस और वायर्ड कनेक्शन शामिल होते हैं. यानी अगर एक व्यक्ति मोबाइल इंटरनेट के साथ-साथ ब्रॉडबैंड कनेक्शन भी यूज करता है तो उसके पास एक से ज्यादा सब्सक्रिप्शन गिने जाएंगे. यही कारण है कि दिल्ली की कुल जनसंख्या 2.3 करोड़ होने के बाद भी यहां 5.7 करोड़ इंटरनेट सब्सक्राइबर्स हैं. दिल्ली में कुल जनसंख्या की तुलना में 2.5 गुना ज्यादा इंटरनेट सब्सक्राइबर्स हैं.
इस रफ्तार से बढ़ते गए सब्सक्राइबर
अगर इंटरनेट सब्सक्राइबर बढ़ने की रफ्तार पर नजर डालें तो 2015 में जहां 1.8 करोड़ सब्सक्राइबर्स थे, वहीं 2016 में यह संख्या बढ़कर 2 करोड़, 2017 में 2.7 करोड़, 2018 में 3.1 करोड़ और 2019 में 3.6 करोड़ हो गई. 2020 में यह आंकड़ा पहली बार 4 करोड़ के पास पहुंचा और इस साल कुल संख्या 4.1 करोड़ हो गई. 2021 में यह आंकड़ा 4.5 करोड़, 2022 में 4.6 करोड़, 2023 में 5.3 करोड़, 2024 में 5.6 करोड़ और 2025 में 5.7 करोड़ हो गया. इस हिसाब से देखा जाए तो सबसे तेज बढ़ोतरी 2022-2023 हुई. सब्सक्रिप्शन में बढ़ोतरी को 2016 की नोटबंदी और 2020 में आई कोरोना महामारी से भी जोड़ा जा सकता है. इन दोनों ही सालों में सब्सक्रिप्शन तेजी से बढ़ा है. डिजिटल पेमेंट, ऑनलाइन एजुकेशन, रिमोट वर्किंग और ऐप-बेस्ड सर्विसेस के आने के कारण लोग अब पहले से कहीं ज्यादा इंटरनेट यूज करने लगे हैं.
सब्सक्रिप्शन बढ़ने के और क्या कारण?
अगर सब्सक्रिप्शन बढ़ने के बाकी कारणों पर नजर डालें तो किफायती स्मार्टफोन की उपलब्धता, सस्ता मोबाइल डेटा, 4G और 5G नेटवर्क के आने समेत कई वजहों से लोग इंटरनेट कनेक्शन लेने लगे हैं. देश की कुल जनसंख्या में 2 प्रतिशत से भी कम हिस्सा होने के बावजूद 2025 में पूरे देश के कुल इंटरनेट सब्सक्रिप्शन में से 6 प्रतिशत अकेले दिल्ली में दर्ज हुए थे. यह दिखाता है कि दिल्ली में इंटरनेट किस कदर जरूरी साबित हो रहा है. हालांकि, अगर पिछले एक दशक को देखें तो दिल्ली में इंटरनेट सब्सक्रिप्शन की रफ्तार राष्ट्रीय औसत के मुकाबले कम रही है. पूरे देश की बात करें तो 2015 में 30.2 करोड़ इंटरनेट सब्सक्राइबर थे, जो 2025 में 96.9 करोड़ हो गए. यानी इस संख्या में 220 प्रतिशत का उछाल देखा गया है, जबकि दिल्ली में यह रफ्तार 217 प्रतिशत रही.
देश में तेजी से बढ़ रही इंटरनेट यूजर्स की संख्या
इस साल की शुरुआत में आई एक और रिपोर्ट में बताया गया था कि भारत में एक्टिव इंटरनेट यूजर्स की संख्या एक अरब के पास पहुंचने वाली है. 2025 में सालाना आधार पर इसमें लगभग 8 प्रतिशत का इजाफा देखा गया है. लगभग 96 करोड़ यूजर्स के साथ भारत दुनिया की सबसे बड़ी और तेजी से बढ़ने वाली डिजिटल मार्केट बनने की तरफ बढ़ रहा है. कुल इंटरनेट यूजर्स में करीब 57 प्रतिशत ग्रामीण इलाकों में रहते हैं.
एआई को भी तेजी से अपना रहे इंटरनेट यूजर्स
देश में एआई का इस्तेमाल भी तेजी से बढ़ रहा है. एक सर्वे में सामने आया था कि देश के लगभग 44 प्रतिशत इंटरनेट यूजर्स वॉइस सर्च, चैटबॉट्स और एआई फिल्टर जैसे एआई फीचर्स का इस्तेमाल कर रहे हैं. 15 से 24 साल के यूजर्स के बीच इसका इस्तेमाल सबसे ज्यादा हो रहा है. एआई यूज करने वालों में 57 प्रतिशत हिस्सा 15-24 साल और 52 प्रतिशत हिस्सा 25-44 साल के यूजर्स का है.
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        <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 08:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>Front Load या Top Load? कौन&amp;सी Washing Machine खाती है ज्यादा बिजली, जानें किसे खरीदना चाहिए</title>
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        <description><![CDATA[ Washing Machine: आधुनिक दुनिया में ज्यादातर लोग अब अपने घरों में स्मार्ट डिवाइस का इस्तेमाल करते हैं. इसके अलावा अब घरों में ज्यादातर मशीनें लोगों के काम को आसान बनाने के लिए मौजूद हैं. इसमें सबसे आम है वॉशिंग मशीन जो लगभग हर घर में मौजूद है. हालांकि, मार्केट में वॉशिंग मशीन भी कई प्रकार की मौजूद हैं जो लोगों के कपड़े धोने के तरीके को और बेहतर बनाने का काम करती हैं. इसी कड़ी में बता दें कि अक्सर लोगों में कंफ्यूजन होता है कि फ्रंट लोड वॉशिंग मशीन खरीदना चाहिए या फिर टॉप लोड वाला वॉशिंग मशीन. आइए जानते हैं कि दोनों में कौन ज्यादा बिजली खपत करता है.
कौन-सी मशीन खपत करती है ज्यादा बिजली
आपको बता दें कि बिजली की खपत सिर्फ मशीन के टाइर पर नहीं बल्कि उसके मोटर, क्षमता, वॉश मोड और इस्तेमाल के तरीके पर भी निर्भर करती है. फिर भी नॉर्मली Front Load Washing Machine को Energy Efficient माना जाता है.
इसके काम करने के तरीके के बारे में बताएं तो फ्रंट लोड मशीन में कपड़े साफ करने के लिए ड्रम तेजी से घूमता है और कम पानी का इस्तेमाल करता है.

इससे पानी गर्म करने और मोटर चलाने में कम बिजली की खपत होती है. वहीं, कई टॉप लोड मशीनों में ज्यादा पानी भरना पड़ता है जिससे बिजली की खपत भी बढ़ जाती है. अगर दोनों मशीनों की कैपेसिटी समान हो तो फ्रंट लोड मॉडल लंबे समय में बिजली के बिल को कम रखने में मदद कर सकता है.
कौन बचाता है पानी
अगर आपका मकसद पानी बचाना है तो फ्रंट लोड मशीन आपके लिए एक बेहतर ऑप्शन साबित हो सकती है. ये कपड़ों को ड्रम में घुमाकर साफ करती है, इसलिए कम पानी में भी अच्छी धुलाई हो जाती है और बिजली भी ज्यादा नहीं खर्च होती है.
दूसरी ओर, टॉप लोड मशीन में कपड़ों को पूरी तरह पानी में डुबोकर धोया जाता है, इसलिए इसमें पानी की जरूरत ज्यादा होती है. ऐसे में जिन इलाकों में पानी की कमी रहती है, वहां फ्रंट लोड मशीन ज्यादा कारगर साबित हो सकती हैं.
कौन ज्यादा अच्छे से साफ करता है कपड़ा
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि फ्रंट लोड मशीन को कपड़ों की बेहतर सफाई के लिए जाना जाता है. इसकी वॉशिंग टेक्नोलॉजी दाग-धब्बों को बेहतर तरीके से हटाने में मदद करती है. साथ ही इस मशीन में कपड़े कम घिसते हैं जिससे कपड़ों की लाइफ भी बनी रहती है. हालांकि, टॉप लोड मशीन भी रोजमर्रा के कपड़ों के लिए एक अच्छा ऑप्शन है लेकिन जिद्दी दाग हटाने के मामले में फ्रंट लोड मशीन को ही लोग ज्यादा बेहतर मानते हैं.

किसे इस्तेमाल करना है आसान
इन दोनों वॉशिंग मशीन के इस्तेमाल करने के बारे में बात करें तो टॉप लोड मशीन का इस्तेमाल काफी आसान माना जाता है. इसमें झुककर कपड़े डालने की जरूरत नहीं पड़ती है और कई मॉडलों में वॉशिंग के दौरान भी कपड़े दोबारा डालने की भी सुविधा मिल जाती है.
वहीं, फ्रंट लोड मशीन में कपड़े डालने और निकालने के लिए झुकना पड़ता है. हालांकि एडवांस मॉडलों में कई स्मार्ट फीचर्स मिलते हैं जो मशीन को इस्तेमाल करना आसान बना देते हैं.
कीमत में कितना है अंतर&amp;nbsp;
इन दोनों वॉशिंग मशीन की कीमतों पर नजर डालें तो टॉप लोड मशीन की शुरुआती कीमत आमतौर पर कम होती है इसलिए कम बजट वालों के लिए ये एक बेहतर ऑप्शन होता है. वहीं, फ्रंट लोड मशीन की कीमत ज्यादा होती है. लेकिन इसमें लोगों को कई सारे एडवांस फीचर्स देखने को मिल जाते हैं जो कपड़े धोने को काफी आसान बना देते हैं.
खरीदने से पहले इन बातों का रखें ध्यान
अब अगर आप भी अपने घर के लिए वॉशिंग मशीन खरीदने का प्लान बना रहे हैं तो कुछ जरूरी चीजों का ध्यान रखना जरूरी होता है.

परिवार के अनुसार 6 से 8 किलोग्राम की कैपेसिटी का वॉशिंग मशीन खरीदना चाहिए.
मशीन खरीदने से पहले बिजली और पानी की खपत की जानकारी जरूर चेक कर लें.
ब्रांड की वारंटी और सर्विस नेटवर्क की भी जरूर जांच करें.
इन्वर्टर मोटर वाले मॉडल आमतौर पर कम बिजली खर्च करते हैं और कम शोर करते हैं.

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        <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 08:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>1 करोड़ रुपये कितने घंटों में कमा लेता है गूगल? कभी सोचा है</title>
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        <description><![CDATA[ Google Earnings: आज के समय में शायद ही कोई ऐसा होगा जो Google का इस्तेमाल नहीं करता हो. कुछ भी सर्च करना हो, YouTube पर वीडियो देखनी हो या Gmail चलाना हो, हर जगह Google काम आता है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि Google इतना बड़ा है, तो आखिर यह कमाई कितनी करता होगा? और 1 करोड़ रुपये कमाने में इसे कितना समय लगता होगा?
Google एक साल में कितना पैसा कमाता है?
Google की पैरेंट कंपनी का नाम Alphabet है. कंपनी की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2025 में Alphabet ने करीब 34 लाख करोड़ रुपये की कमाई की. इसी वजह से Google दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियों में गिना जाता है.
यह भी पढ़े: गूगल पर दिख रही है Claude से हुई बातचीत, क्या बड़ी गड़बड़ हो गई?
1 करोड़ रुपये कमाने में कितना समय लगता है?
अगर Google की सालाना कमाई करीब 25 लाख करोड़ रुपये मानी जाए, तो हिसाब के मुताबिक कंपनी एक घंटे में करीब 285 करोड़ रुपये कमाती है. यानी 1 करोड़ रुपये कमाने में उसे करीब 12 से 13 सेकंड लगते हैं.
Google की कीमत कितनी है?
Google की पैरेंट कंपनी Alphabet की कीमत शेयर बाजार में भी बहुत ज्यादा है. साल 2026 में कंपनी की मार्केट वैल्यू करीब 4.5 ट्रिलियन डॉलर बताई गई है. इसका मतलब है कि यह दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक है.
Google के नाम की भी है बड़ी कीमत
Google सिर्फ पैसे ही नहीं कमाता, बल्कि लोगों का भरोसा भी जीत चुका है. कई रिपोर्ट्स के मुताबिक, Google की ब्रांड वैल्यू 300 अरब डॉलर से ज्यादा है. यानी सिर्फ कंपनी का नाम ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है.
Google पैसा कैसे कमाता है?
Google की सबसे ज्यादा कमाई विज्ञापनों से होती है. इसके अलावा YouTube, Google Cloud, Play Store और दूसरी सेवाओं से भी कंपनी को अच्छा पैसा मिलता है. पिछले कुछ समय में AI से जुड़े प्रोडक्ट्स से भी कंपनी की कमाई बढ़ी है.
आखिर क्या है पूरी बात?
Google की कमाई इतनी ज्यादा है कि 1 करोड़ रुपये जैसी बड़ी रकम भी वह कुछ ही सेकंड में कमा लेता है. यही वजह है कि आज Google दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे ज्यादा कमाई करने वाली टेक कंपनियों में शामिल है.
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        <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 08:30:05 +0530</pubDate>
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        <title>गूगल पर दिख रही है Claude से हुई बातचीत, क्या बड़ी गड़बड़ हो गई?</title>
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        <description><![CDATA[ Claude Chats On Google: हाल में ही ऐसी कई खबरें सामने आई थीं कि एंथ्रोपिक के Claude चैटबॉट से की गई लोगों की चैट्स गूगल पर दिख रही हैं. गूगल पर अवेलेबल चैट्स में क्रिप्टो वॉलेट डिटेल्स, API कीज, रेज्यूमे और कंपनी डॉक्यूमेंट्स जैसी कई सेंसेटिव इंफोर्मेशन शामिल हैं. जब इसके स्क्रीनशॉट्स सामने आए तो कई यूजर्स ने दावा किया कि Anthropic से डेटा लीक हुआ है, जिस कारण चैट्स गूगल पर पब्लिकली अवेलेबल हो गई है. असल में यह डेटा लीक या डेटा हैक होने का मुद्दा नहीं है. Claude की प्राइवेट चैट्स अभी भी प्राइवेट हैं. गूगल पर जो चैट्स आई हैं, वो उन यूजर्स से संबंधित हैं, जिन्होंने Claude के पब्लिक शेयर फीचर को यूज किया है. यह फीचर चैट्स को एक पब्लिकली एक्सेसिबल वेबपेज में कन्वर्ट कर देता है.
कहां से शुरू हुआ मामला?
Reddit पर यूजर्स ने बताया कि गूगल सर्च पर आसान-सी क्वेरी डालकर Claude की चैट्स को एक्सेस किया जा सकता है. कुछ लोगों ने इसे प्राइवेसी फेल्योर बताते हुए डेटा लीक से जोड़ा तो कई यूजर्स ने कहा कि शेयर फीचर के जरिए इन चैट्स को पब्लिक किया गया है. कई यूजर्स ने एक्स पर इसके स्क्रीन शॉट पोस्ट करते हुए इसे प्राइवेसी से जुड़ी प्रॉब्लम करार दिया. फिर इसे लेकर एक लंबी बहस शुरू हो गई.
गूगल सर्च तक कैसे पहुंची Claude पर हुई बातचीत?
जब यह डेटा लीक का मामला नहीं है तो सवाल उठता है कि आखिरकार ये चैट्स गूगल सर्च पर कैसे इंडेक्स हुईं? दरअसल, जब Claude यूज करते समय जब कोई यूजर शेयर पर क्लिक करता है तो चैटबॉट्स उस बातचीत का एक पब्लिक वेबपेज क्रिएट कर देता है. कोई भी इस पेज को ओपन कर उस चैट को पढ़ सकता है. दिक्कत तब शुरू हुई, जब ये वेबपेजेज गूगल सर्च में आने लगे. इससे किसी दूसरे यूजर्स की चैट्स को पढ़ना आसान हो गया. शुरुआत में बताया गया कि एंथ्रोपिक इस वेबपेज पर noindex टैग एड करना भूल गई है, लेकिन बाद में एनालिसिस से पता चला कि एंथ्रोपिक ने सर्च इंजन को अपने शेयर्ड पेज पर क्रॉल करने से ब्लॉक किया हुआ है. इससे गूगल जैसे सर्च इंजन वेबपेज पर दी गई चैट्स तो नहीं पढ़ पाते, लेकिन यह तरीका वेबपेज के URL को इंडेक्स होने से नहीं रोक सकता. यही कारण रहा कि कई वेबपेजेज गूगल और बिंग पर सर्च रिजल्ट में आने लगे. अब इन पर क्लिक कर कोई भी यूजर शेयर्ड चैट्स को पढ़ सकता है.
क्या यह चिंता की बात है?
अगर आप Claude यूजर हैं और शेयर फीचर का यूज करते हैं तो जाहिर तौर पर चिंता की बात है, लेकिन अगर आपने कभी इस फीचर को यूज नहीं किया है तो आपको चिंता नहीं करना चाहिए. अगर आपने पहले इस फीचर को यूज किया है और अब अपनी चैट्स को हटाना चाहते हैं तो एंथ्रोपिक ने इसका तरीका बताया है. आप चैटबॉट की सेटिंग में जाकर प्राइवेसी सेक्शन को ओपन करें. यहां आपको शेयर्ड चैट्स का ऑप्शन दिखेगा. इस पर टैप कर आप चैट्स को रिव्यू या रिमूव कर सकते हैं.
गूगल पर आईं चैट्स में क्या-क्या जानकारी मौजूद थी?
रिपोर्ट्स के अनुसार, गूगल पर इंडेक्स हुए वेबपेजेज पर क्रिप्टो वॉलेट, एक्सेस क्रेडेंशियल्स, रेज्यूमे, कंपनी डॉक्यूमेंट लीगल क्वेरी और जनरल कन्वर्सेशन जैसी इंफोर्मेशन दी हुई है. जैसे ही इस मामले को लेकर हल्ला मचा, लोगों ने बताया कि वेबपेज धीरे-धीरे गूगल सर्च से गायब होने लगे. इसके बाद बिंग और दूसरे ब्राउजर से भी अब ये पेज रिमूव होने लगे हैं. ध्यान रखें कि गूगल सर्च से पेज रिमूव होने से वेबपेजेज के लिंक डिसेबल नहीं होते. यानी जिन यूजर्स के पास पहले से URL मौजूद हैं, वो उन्हें कभी भी एक्सेस कर सकते हैं.
OpenAI के साथ भी हुई थी ऐसी घटना
इस तरह की घटना का सामना करने वाली एंथ्रोपिक पहली कंपनी नहीं है. पिछले साल OpenAI ने भी एक्सपेरिमेंट के तौर पर एक फीचर रोल आउट किया था, जिसमें यूजर्स अपनी शेयर्ड कन्वर्सेशन को सर्च इंजन पर डिस्कवरेबल बना सकते थे. इसके बाद जब ये चैट्स गूगल सर्च पर लिस्ट होने लगी तो कंपनी ने तुरंत इस फीचर को बंद कर दिया.
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        <pubDate>Tue, 28 Jul 2026 16:30:13 +0530</pubDate>
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        <title>जियो को सीधी टक्कर, Vi 200 रुपये में दे रही है 20 OTT की एक्सेस</title>
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        <description><![CDATA[ जियो को सीधी टक्कर, Vi 200 रुपये में दे रही है 20 OTT की एक्सेस ]]></description>
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        <title>USB 2.0 या USB 3.0? खरीदने से पहले जान लें दोनों में अंतर वरना होगा नुकसान</title>
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        <description><![CDATA[ USB 2.0 VS 3.0: डिजिटल दुनिया में अब डेटा काफी जरूरी हो चुका है. लोग अपने डेटा को स्टोर करने के लिए तरह-तरह के डिवाइस का इस्तेमाल करते हैं. बता दें कि आज के समय में पेन ड्राइव, एक्सटर्नल हार्ड डिस्क, कीबोर्ड, माउस, प्रिंटर जैसे कई डिवाइस USB के जरिए ही कंप्यूटर या लैपटॉप से कनेक्ट होते हैं. लेकिन अक्सर लोग नई USB ड्राइव खरीदते समय कुछ चीजों का ध्यान नहीं रखते हैं. दरअसल, लोगों में USB 2.0 और USB 3.0 को लेकर काफी कंफ्यूजन रहता है. इसीलिए आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि आखिर दोनों में क्या होता है अंतर और किसे खरीदने में आपका फायदा है.
क्या होता है USB
जानकारी के मुताबिक, USB यानी Universal Serial Bus एक ऐसा स्टैंडर्ड है जिसकी मदद से कंप्यूटर और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस आपस में कनेक्ट होते हैं. इसके जरिए डेटा ट्रांसफर करने के साथ-साथ कई डिवाइस को पावर सप्लाई भी दी जाती है. समय के साथ USB टेक्नोलॉजी में भी कई बदलाव हुए हैं और अब मार्केट में इसके कई जनरेशन मौजूद हैं.

USB 2.0 और USB 3.0 में क्या है अंतर
आपको बता दें कि इन दोनों यूएसबी के बीच का सबसे बड़ा अंतर इन दोनों की डेटा ट्रांसफर की स्पीड का है. USB 2.0 की मैक्सिमम थ्योरीटिकल स्पीड 480 Mbps (लगभग 60 MB/s) तक होती है. वहीं USB 3.0 की मैक्सिमम स्पीड 5 Gbps (लगभग 625 MB/s) तक पहुंच जाती है.
इसका मतलब है कि USB 3.0, USB 2.0 के मुकाबले में कई गुना तेज डेटा ट्रांसफर करने में सक्षम है. ऐसे में अगर आपको बड़ी वीडियो फाइलें, हाई-रिजॉल्यूशन फोटो या गेम्स ट्रांसफर करने होते हैं तो USB 3.0 आपके लिए एक बेहतर ऑप्शन बन सकता है.
पावर सप्लाई में भी है अंतर
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि USB 3.0 सिर्फ स्पीड में ही नहीं बल्कि पावर डिलीवरी के मामले में भी बेहतर माना जाता है. USB 2.0 लगभग 500mA तक पावर देता है जबकि USB 3.0 लगभग 900mA तक बिजली सप्लाई देने में सक्षम है. इससे कई डिवाइस काफी तेजी से चार्ज हो सकती हैं और एक्सटर्नल हार्ड ड्राइव जैसी एक्सेसरी बेहतर तरीके से काम करती हैं.
कैसे करें दोनों में पहचान
बता दें कि USB 2.0 और USB 3.0 को पहचानना भी आसान है. USB 3.0 पोर्ट या कनेक्टर के अंदर का प्लास्टिक हिस्सा अक्सर नीले रंग का होता है. वहीं, USB 2.0 पोर्ट के अंदर आमतौर पर काला या सफेद रंग दिखाई देता है. कई कंपनियां USB 3.0 पर SuperSpeed का निशान भी देती हैं. हालांकि हर कंपनी एक जैसा रंग इस्तेमाल नहीं करती, इसलिए खरीदते समय पैकेजिंग पर दी गई जानकारी को जरूर पढ़ें.
क्या पुराने पोर्ट में काम करेगा USB 3.0
जी हां, दरअसल, USB 3.0 की सबसे खास बात ये है कि ये Backward Compatible है. इसका मतलब है कि USB 3.0 पेन ड्राइव को USB 2.0 पोर्ट में लगाया जा सकता है और USB 2.0 डिवाइस को USB 3.0 पोर्ट में भी इस्तेमाल किया जा सकता है. हालांकि, अगर USB 3.0 डिवाइस को USB 2.0 पोर्ट में लगाने पर आपको स्पीड 2.0 के जितनी ही मिलेगी.
किसे खरीदने में है फायदा

ये पूरी तरह से आपकी जरूरत पर निर्भर करता है कि आपको कौन सा यूएसबी पोर्ट खरीदना चाहिए. बता दें कि अगर आपका काम सिर्फ डॉक्यूमेंट, PDF या छोटी फाइलों को ट्रांसफर करना है तो आपको USB 2.0 खरीदना चाहिए. लेकिन अगर आप अक्सर बड़ी फाइलें कॉपी करते हैं, वीडियो एडिटिंग करते हैं, गेमिंग करते हैं या हाई-स्पीड डेटा ट्रांसफर चाहते हैं तो USB 3.0 आपके लिए बेस्ट ऑप्शन साबित होगा.
इन बातों का रखें ध्यान
बताते चलें कि यूएसबी पोर्ट खरीदने से पहले आपको कुछ जरूरी चीजों का हमेशा ध्यान रखना चाहिए.

अच्छी और भरोसेमंद कंपनी का USB ड्राइव या केबल खरीदें.
सिर्फ कम कीमत देखकर कोई भी यूएसबी पोर्ट न खरीदें.
अगर भविष्य में भी इस्तेमाल करना है तो USB 3.0 या उससे नया वर्जन चुनना आपके लिए बेहतर रहेगा.
बड़ी फाइलों के लिए हाई-स्पीड USB सबसे ज्यादा काम आती हैं.

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        <title>कैसे लीक हो जाता है डेटा? पिछले कुछ दिनों में कई बड़ी घटनाएं</title>
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        <description><![CDATA[ How Data Leak Happens: पिछले कुछ दिनों में डेटा लीक की कई घटनाएं सामने आई हैं. ताजा मामले में Alibi Global Threat Intelligence Group की एक रिपोर्ट बताती है कि डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन (DRDO) और सेना से जुड़ा डेटा 8,000 डॉलर में डार्क वेब पर बेचा जा रहा है. लगभग 31GB का यह डेटा पिछले दो सप्ताह से डार्क वेब पर मौजूद है. DRDO ने इस रिपोर्ट की सत्यता की जांच करने की बात कही है. इससे पहले बैंक ऑफर बड़ौदा का डेटा लीक हुआ था, जिसमें आधार कार्ड और अकाउंट से जुड़ी सेंसेटिव इंफोर्मेशन लीक होने की बात कही गई थी. पिछले महीने ऐप्पल की सप्लायर टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स का डेटा लीक होने की भी जानकारी सामने आई थी. आज हम जानेंगे कि डेटा लीक होता कैसे होता है और इसके पीछे क्या-क्या कारण होते हैं.
डेटा लीक का क्या मतलब होता है?
डेटा लीक तब होता है, जब गलती से कोई सेंसेटिव इंफोर्मेशन गलत हाथों में पहुंच जाएगा. उदाहरण के तौर पर किसी क्लाउड स्टोरेज सर्वर में हुई गड़बड़ी से किसी सेंसेटिव इंफोर्मेशन तक अनऑथोराइज्ड लोग पहुंच सकते हैं. आमतौर डेटा लीक का सबसे बड़ा कारण इंसानी गलती होती है. जैसे किसी कर्मचारी से ईमेल या मैसेज के जरिए सेंसेटिव जानकारी लीक होना या अपने डिवाइस को अनलॉक या अनप्रोटेक्टेड छोड़ देना. हैकर्स ऐसी स्थिति का फायदा उठा सकते हैं. 
डेटा लीक से कैसे अलग है डेटा ब्रीच?
मौटे तौर पर डेटा लीक और डेटा ब्रीच को एक समान ही माना जाता है, लेकिन दोनों में काफी अंतर है. डेटा लीक जहां आमतौर पर गलती या खराब डेटा सिक्योरिटी के कारण होता है, वहीं जब साइबर अटैक कर डेटा चुराया जाए तो उसे डेटा ब्रीच कहा जाता है. डेटा लीक होने के बाद डेटा ब्रीच की घटना हो सकती है, जिससे आर्थिक नुकसान हो सकता है और किसी कंपनी की छवि को भी भारी झटका पहुंच सकता है.
किन कारणों से होता है डेटा लीक?
ह्यूमन एरर- जैसा हमने ऊपर जिक्र किया है, इंसानी गलती से डेटा लीक होना कॉमन है. सेंसेटिव डेटा के मैनेजमेंट में लापरवाही, ईमेल या मैसेज भेजते समय गलत रिसीवर को चुन लेना, बिना ऑथोराइजेशन के किसी के साथ भी कॉन्फिडेंशियल इंफोर्मेशन शेयर कर देने जैसी चीजें डेटा लीक का कारण बन सकती है. 2021 में अमेरिकी शहर डलास में एक कर्मचारी की गलती के कारण 23TB का डेटा लीक हो गया था.
फिशिंग- हैकर्स अपनी बातों में उलझाकर लोगों से पर्सनल डेटा हासिल कर लेते हैं. ईमेल में मलेशियस लिंक भेजकर ये किसी की पर्सनल जानकारी चुरा सकते हैं. इस तरीके से लॉग-इन क्रेडेंशियल भी चुराए जा सकते हैं, जो आगे चलकर बड़े अटैक के लिए यूज किए जा सकते हैं.
इनसाइडर थ्रेट- किसी कंपनी, नेटवर्क, या संस्था में काम करने वाले लोग भी सेंसेटिव इंफोर्मेशन लीक कर सकते हैं. 2021 में ऐसा मामला सामने आया था, जब एक लॉ फर्म में काम कर रहे चार वकीलों ने कंपनी की सारी फाइल्स चोरी कर ली ताकि कंपीटिंग फर्म को नया ऑफिस खोलने में मदद मिल सके.
तकनीकी खामी- आउटडेटेड सॉफ्टवेयर, कमजोर ऑथेंटिकेशन प्रोटोकॉल और आउटडेटेड सिस्टम भी डेटा लीक कारण बन सकते हैं. इनकी वजह से हैकर्स के लिए सेंसेटिव डेटा तक पहुंच बनाना आसान हो जाता है. इसके अलावा मिसकॉन्फिगर्ड API से भी डेटा लीक का खतरा बढ़ रहा है. खासकर क्लाउड और माइक्रोसर्विसेस आर्किटेक्चर में यह खामी बड़ा नुकसान कर सकती है.
डेटा इन ट्रांजिट- ईमेल और मैसेज के जरिए भेजे जा रहे डेटा को भी इंटरसेप्ट किया जा सकता है. एनक्रिप्शन जैसे प्रोटेक्शन मेथड के बिना सेंसेटिव इंफोर्मेशन लीक हो सकती है. इसी तरह डेटाबेस, क्लाउड और सर्वर आदि में स्टोर डेटा को भी अगर स्ट्रॉन्ग सिक्योरिटी न दी जाए तो लीक होने का डर रहता है. 
यूज हो रहा डेटा भी हो सकता है लीक
आप जिस डेटा को यूज कर रहे हैं, कुछ सिचुएशन में वह भी लीक हो सकता है. अगर आप अनएनक्रिप्टेड सिस्टम यूज कर रहे हैं तो आपके डिवाइस में सेंध लगाना आसान हो जाता है.
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        <pubDate>Tue, 28 Jul 2026 16:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>बार&amp;बार SOS Mode में जा रहा है iPhone? जानिए कैसे करें ठीक</title>
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        <description><![CDATA[ iPhone SOS Mode: आईफोन में यूजर्स को काफी एडवांस फीचर्स देखने को मिलते हैं जिससे लोगों को स्मार्टफोन चलाने का बेहतर एक्सपीरिएंस मिलता है. इसी कड़ी में बता दें कि आईफोन में एक SOS फीचर होता है जो बताता है कि आपका फोन नेटवर्क से कनेक्ट नहीं हो पा रहा है. ऐसे में कई बार देखा गया है लोग अपने आईफोन में बार-बार SOS मोड लगने से परेशान हो जाते हैं लेकिन उन्हें इसे ठीक करने का तरीका नहीं पता होता है. इसीलिए आज हम आपको बताते हैं कि आखिर क्यों बार-बार फोन में SOS मोड आता है और इसे कैसे ठीक किया जाता है.
क्या होता है SOS Mode
आपको बता दें कि आईफोन में SOS Mode तब दिखाई देता है जब आपका iPhone आपके मोबाइल ऑपरेटर के नेटवर्क से कनेक्ट नहीं हो पाता है. हालांकि, इस मोड में आप इमरजेंसी कॉल कर सकते हैं. वहीं, अगर फोन में नो सर्विस होता है तो आप कहीं भी कॉल नहीं कर सकते हैं.

Airplane Mode का करें इस्तेमाल
बता दें कि अगर अचानक आपके आईफोन में SOS Mode दिखाई देने लगे तो इसे ठीक करने का सबसे आसान तरीका है कि फोन में Airplane Mode को ऑन और ऑफ करें. Airplane Mode को लगभग 15 सेकंड के लिए ऑन करें. इसके बाद इसे बंद कर दें. कुछ ही सेकंड में फोन दोबारा नेटवर्क सर्च करेगा. अक्सर ऐसा करने से कई बार ये परेशानी अपने आप ही ठीक हो जाती है.
iOS Update जरूर चेक करें
कई बार पुराने सॉफ्टवेयर की वजह से भी यूजर्स को नेटवर्क से संबंधित परेशानी होती है. इसीलिए सबसे पहले अपने आईफोन का आईओएस अपडेट चेक करना चाहिए.
अपडेट करने के लिए सबसे पहले Settings में जाएं और इसके बाद General पर क्लिक करें. यहां पर आपको Software Update दिखाई देगा उस पर क्लिक करेंगे तो आपके फोन का सॉफ्टवेयर अपडेट हो जाएगा. अगर नया iOS वर्जन उपलब्ध है तो उसे इंस्टॉल कर लें. इससे आगे आने वाली समस्या से भी आपको छुटकारा मिल जाएगा.
Restart करें iPhone
लेकिन अगर Airplane Mode से भी आपको इस परेशानी से छुटकारा न मिले तो अपने iPhone को एक बार रिस्टॉर्ट करना बेहतर होगा. फोन रीस्टार्ट होने पर नेटवर्क सेटिंग्स दोबारा लोड होती हैं और कई दिक्कतें अपने आप ही खत्म हो जाती हैं.
SIM Card और eSIM को चेक करें
अगर आपके iPhone में एक से ज्यादा SIM या eSIM हैं तो ये चेक करें कि सही लाइन एक्टिव है. इसके लिए Settings में जाकर Cellular खोलें. इसके बाद देखें कि जिस SIM का इस्तेमाल करना चाहते हैं वह ऑन है या नहीं. अगर फिजिकल SIM इस्तेमाल कर रहे हैं तो उसे निकालकर दोबारा सही तरीके से लगाएं. कई बार SIM ठीक से फिट न होने पर भी डिवाइस SOS Mode दिखाने लगता है.
Apple Support ऐप से करें Diagnostics
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अगर आपका iPhone iOS 18 या उससे नए वर्जन पर चल रहा है तो Apple Support ऐप के जरिए फोन को आसानी से चेक किया जा सकता है. इस ऐप में कई डायग्नोस्टिक टूल मौजूद होते हैं जो नेटवर्क और हार्डवेयर से जुड़ी समस्याओं का पता लगाने में मदद करते हैं.

देश से बाहर ट्रैवल करने पर क्यों आता है SOS Mode
अगर आप दूसरे देश में ट्रैवल कर रहे हैं और वहां SOS Mode दिखाई दे रहा है तो इसकी सबसे बड़ी वजह Data Roaming बंद होना हो हो सकता है. दरअसल, दूसरे देश में जाने पर वहां का नेटवर्क मोबाइल कैच करता है. अब अगर आपके फोन में डेटा रोमिंग ऑन नहीं होगा तो डिवाइस दूसरे नेटवर्क को नहीं कैच कर पाएगा. इसीलिए फोन में डेटा रोमिंग को ऑन करना चाहिए. इसे ऑन करने के लिए
Settings में जाकर Cellular ऑप्शन पर क्लिक करें. इसके बाद Cellular Data Options पर क्लिक करें और वहां पर Data Roaming दिखाई देगा जिसपर क्लिक करने से वो ऑन हो जाएगा. ध्यान रखें कि Data Roaming ऑन करने पर एक्सट्रा पैसा लग सकता है. इसलिए विदेश जाने से पहले अपने मोबाइल प्लान की इंटरनेशनल सर्विस की जानकारी जरूर ले लें.
वहीं, अगर आपने ट्रैवल eSIM का इस्तेमाल किया है तो ये भी चेक करें कि वही SIM डेटा के लिए चुनी गई हो. जरूरत पड़ने पर Allow Cellular Data Switching फीचर भी ऑन किया जा सकता है जिससे बेहतर नेटवर्क कवरेज मिल सकती है.
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        <pubDate>Tue, 28 Jul 2026 16:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>USB Port गंदा हो गया? ऐसे करें साफ नहीं तो खराब हो जाएगा फोन</title>
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        <description><![CDATA[ USB Port गंदा हो गया? ऐसे करें साफ नहीं तो खराब हो जाएगा फोन ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 28 Jul 2026 04:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>शाओमी और रेडमी के फोन के रेट बढ़े, महंगी कीमत पर लॉन्च होगी Pixel 11 सीरीज</title>
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        <description><![CDATA[ Smartphone Price Hike: मेमोरी चिप के संकट के कारण स्मार्टफोन का महंगा होना लगातार जारी है. कुछ दिन पहले जहां नथिंग, वीवो और रियलमी ने अपने कुछ मॉडल्स महंगे किए थे तो अब शाओमी और रेडमी ने अपने फोन महंगे कर दिए हैं. इस साल मोबाइल की कीमतें बढ़ना लगातार जारी है. एक तरफ लॉन्च हो चुके फोन के दाम बढ़ रहे हैं तो दूसरी तरफ लॉन्च हो रहे नए फोन भी बढ़ी हुई कीमत के साथ आ रहे हैं. गूगल अगले महीने Pixel 11 सीरीज लॉन्च करेगी और कंपनी ने कंफर्म कर दिया है कि नए मॉडल खरीदने के लिए ग्राहकों को ज्यादा पैसा चुकाना पड़ेगा.&amp;nbsp;
शाओमी का यह मॉडल हुआ महंगा
शाओमी की बात करें तो कंपनी ने अपने Xiaomi 17T मॉडल को महंगा किया है. यह फोन करीब दो महीने पहले 59,999 रुपये की कीमत पर लॉन्च हुआ था. आज से इस फोन को खरीदने के लिए आपको 64,999 रुपये खर्च करने पड़ेंगे. कंपनी ने इसके 12GB/256GB के साथ-साथ 12GB/512GB वर्जन की कीमतों में भी 5,000 रुपये की बढ़ोतरी की है. 12GB/512GB वर्जन अब 64,999 रुपये की जगह 69,999 रुपये में मिलेगा.
रेडमी ने एक साथ बढ़ाई कई मॉडल की कीमत

रेडमी ने एक ही झटके में अपनी नोट और 15 सीरीज के दाम बढ़ाए हैं. Redmi Note 15 (8GB/128GB) के लिए आज से आपको 26,999 रुपये की जगह 28,999 रुपये देने पड़ेंगे, जबकि यह फोन 22,999 रुपये की कीमत पर लॉन्च हुआ था.&amp;nbsp;
Redmi 15 5G के बेस (6GB/128GB) की कीमत 20,499 रुपये से बढ़कर 21,499 रुपये हो गई है. यह फोन 14,999 रुपये में लॉन्च हुआ था.
Redmi 15C 5G के 4GB/128GB वर्जन के दाम में 1500 रुपये का इजाफा किया गया है और अब इसकी कीमत 18,499 रुपये हो गई है.
Redmi 15A 5G का 4GB/64GB वर्जन पहले 14,999 रुपये में मिलता था, लेकिन अब इसमें 1,000 रुपये की बढ़ोतरी की गई है. अब इसकी कीमत 15,999 रुपये हो गई है.

Pixel 11 सीरीज भी होगी महंगी
गूगल ने यह कंफर्म कर दिया है कि अगस्त में लॉन्च होने वाली Pixel 11 के लिए ज्यादा पैसे देने पड़ेंगे. गूगल की तरफ से भी मेमोरी चिप्स की लागत को कीमत में बढ़ोतरी के पीछे का कारण बताया गया है. गूगल के डिवाइसेस एंड सर्विसेस के वाइस प्रेसिडेंट शकील बरकत ने एक इंटरव्यू में बताया कि मौजूदा मेमोरी क्राइसिस अभूतपूर्व है. मॉर्गन स्टेनली के एक डेटा का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि 1GB रैम के दाम पिछले साल 2.80 डॉलर (लगभग 270 रुपये) थे, जो इस साल बढ़कर 12 डॉलर (लगभग 1,154 रुपये) हो गए हैं.
कितनी बढ़ सकती है Pixel 11 सीरीज की कीमत?
गूगल ने कीमत में बढ़ोतरी की जानकारी नहीं दी है, लेकिन माना जा रहा है कि Pixel 11 की शुरुआती कीमत 899 डॉलर रह सकती है, जबकि पिछले साल Pixel 10 मॉडल 799 डॉलर की शुरुआती कीमत पर लॉन्च हुआ था. Pixel 11 की बेस स्टोरेज को 128GB से बढ़ाकर 256GB किया जा रहा है, इस कारण भी कीमत में इजाफा होना तय है. Pixel 11 सीरीज के बाकी मॉडल्स के रेट में भी कम से कम 100 डॉलर के इजाफे की संभावना जताई जा रही है. बता दें कि गूगल के अलावा सैमंसग और ऐप्पल जैसी कंपनियां भी मेमोरी क्राइसिस से नहीं बच पाई हैं. सितंबर में लॉन्च होने वाले आईफोन 18 प्रो मॉडल्स भी मौजूदा मॉडल्स की तुलना में बढ़ी हुई कीमत पर लॉन्च हो सकते हैं.
क्यों हो गई मेमोरी चिप्स की कमी?
मेमोरी चिप्स की कमी के पीछे सबसे बड़ा कारण एआई बूम को माना जा रहा है. मेमोरी चिप बनाने वाली कंपनियां फिलहाल एआई डेटा सेंटर की डिमांड को पूरी करने में लगी हुई हैं, जिस कारण कंज्यूमर मार्केट में सप्लाई कम हो गई है. इसका सीधा असर स्मार्टफोन और लैपटॉप आदि पर पड़ा है. कंपनियों को इनके लिए मेमोरी चिप्स खरीदना महंगा पड़ रहा है. इस वजह से कंपनियों को अपने फोन और लैपटॉप महंगे करने पर मजबूर होना पड़ रहा है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Tue, 28 Jul 2026 04:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>फोन बंद होने के बाद भी क्यों खत्म होती रहती है बैटरी? जानें क्या है वजह</title>
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        <description><![CDATA[ Smartphone: कई लोग सोचते हैं कि अगर स्मार्टफोन को पूरी तरह बंद कर दिया जाए तो उसकी बैटरी बिल्कुल भी खर्च नहीं होगी. लेकिन ऐसा बिलकुल नहीं है. दरअसल, फोन बंद होने के बावजूद उसकी बैटरी धीरे-धीरे कम होती रहती है. अगर आपने कभी किसी पुराने फोन को महीनों तक बंद रखकर दोबारा ऑन किया है तो आपने देखा होगा कि उसकी बैटरी पहले जैसी नहीं बची होती. आखिर ऐसा क्यों होता है? आइए जानते हैं क्यों होता है ऐसा.
फोन बंद होने पर भी बैटरी क्यों खत्म होती है
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि फोन ऑफ होने के बाद स्क्रीन, इंटरनेट और ऐप्स तो काम करना बंद कर देते हैं लेकिन बैटरी का इस्तेमाल पूरी तरह रुकता नहीं है. इसकी सबसे बड़ी वजह लिथियम-आयन बैटरी की नैचुरल प्रोसेस होती है जिसे सेल्फ-डिस्चार्ज (Self-Discharge) कहा जाता है.
बता दें कि इस प्रोसेस में बैटरी बिना किसी इस्तेमाल के भी धीरे-धीरे अपनी एनर्जी खोती रहती है. नॉर्मली बंद फोन की बैटरी हर महीने लगभग 1 से 2 प्रतिशत तक कम हो सकती है. अगर फोन ज्यादा गर्म जगह पर रखा हो तो ये ज्यादा जल्दी भी डिस्चार्ज हो सकता है.
Clock और Wake Circuit भी हैं वजह
दरअसल, फोन के अंदर एक छोटा इलेक्ट्रॉनिक सर्किट हमेशा एक्टिव रहता है. यही सर्किट पावर बटन दबाते ही फोन को ऑन करने में मदद करता है और दोबारा ऑन होने पर सही समय और तारीख बनाए रखने में भी अहम भूमिका निभाता है.

ये सर्किट बहुत कम बिजली खर्च करता है लेकिन लंबे समय तक फोन बंद रहने पर इसका असर बैटरी प्रतिशत पर दिखाई देने लगता है.
फोन ऑन छोड़ने से बैटरी ज्यादा क्यों घटती है
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अगर फोन ऑन है, भले ही आप उसका इस्तेमाल न करें, तब भी कई चीजें बैटरी खर्च करती रहती हैं.

बैकग्राउंड में चलने वाले ऐप्स
मोबाइल नेटवर्क और वाई-फाई कनेक्शन
नोटिफिकेशन सिस्टम
सिस्टम के बाकी प्रोसेस

यही कारण है कि कई दिनों तक बिना इस्तेमाल किए भी ऑन रखा फोन जल्दी डिस्चार्ज हो सकता है जबकि बंद फोन की बैटरी कहीं ज्यादा धीरे-धीरे कम होती है.
लंबे समय तक फोन रखना हो तो क्या करें
अगर आपने नया फोन खरीद लिया है और पुराने फोन को कई महीनों तक इस्तेमाल नहीं करना चाहते तो उसे सही तरीके से स्टोर करना जरूरी है. एक्सपर्ट्स की सलाह है कि फोन को पूरी तरह चार्ज या पूरी तरह खाली बैटरी के साथ स्टोर नहीं करना चाहिए.
अगर आप लंबे समय तक फोन को स्टोर करके रखना चाहते हैं तो फोन को करीब 50 प्रतिशत तक चार्ज रखना चाहिए. इसके अलावा हर 5&amp;ndash;6 महीने में फोन को निकालकर दोबारा लगभग 50 प्रतिशत तक चार्ज कर देना चाहिए. इससे बैटरी अच्छी स्थिति में बनी रहती है.
पूरी तरह डिस्चार्ज क्यों नहीं करनी चाहिए बैटरी
बता दें कि अगर फोन लंबे समय तक बिल्कुल खाली बैटरी के साथ पड़ा रहे तो वो डीप डिस्चार्ज (Deep Discharge) की स्टेट में चला जाता है. अब ऐसी स्थिति में बैटरी की ताकत हमेशा के लिए कम हो सकती है. कई मामलों में बैटरी पहले के मुकाबले कम बैकअप देने लगता है और ज्यादा खराब स्थिति डिवाइस को भी नुकसान पहुंचने लगता है.
कैसे लंबे समय तक स्टोर करें बैटरी

अगर आप फोन को लंबे समय के लिए बंद करके रखने वाले हैं तो इन बातों का ध्यान रखना चाहिए.

फोन को लगभग 50% बैटरी पर बंद करें.
हर 6 महीने में उसे दोबारा चार्ज करें.
फोन को पूरी तरह डिस्चार्ज करके न रखें.
100% चार्ज करके महीनों तक स्टोर करने से भी बचें.
हमेशा ठंडी और सूखी जगह पर फोन रखें.
बहुत ज्यादा गर्मी बैटरी की लाइफ तेजी से कम कर सकती है.

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        <pubDate>Tue, 28 Jul 2026 04:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>अगले साल स्मार्ट चश्मे लॉन्च करेगी ऐप्पल, इस मामले में होंगे सबसे अलग</title>
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        <description><![CDATA[ अगले साल स्मार्ट चश्मे लॉन्च करेगी ऐप्पल, इस मामले में होंगे सबसे अलग ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 28 Jul 2026 04:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>Android फोन में दिख रहा BED आइकन? जानिए क्या बता रहा है आपका स्मार्टफोन</title>
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        <description><![CDATA[ Tech Tips: आज स्मार्टफोन का इस्तेमाल ज्यादातर लोग करने लगे हैं. प्रीमियम स्मार्टफोन्स में लोगों को कई एडवांस फीचर्स भी देखने को मिल जाते हैं. वहीं, अक्सर देखा गया है कि आपके Android स्मार्टफोन की स्क्रीन के ऊपर स्टेटस बार में अचानक Bed जैसा आइकन दिखाई देने लगता है. लेकिन ज्यादातर लोगों को इसके बारे में पता नहीं होता है. आइए जानते हैं कि क्यों अचानक से फोन में बेड आइकन दिखने लगता है और आपको स्मार्टफोन आपको क्या बताना चाह रहा है.
क्या होता है Bed आइकन

दरअसल, Bed आइकन आमतौर पर ये बताता है कि आपके फोन में Bedtime Mode या Sleep Mode एक्टिव है. ये फीचर Android के Digital Wellbeing सिस्टम का हिस्सा होता है और यूजर को रात के समय फोन का कम इस्तेमाल करने के लिए डिजाइन किया गया है.
इस फीचर का मकसद है कि रात के समय में लोग कम स्मार्टफोन का इस्तेमाल करें और आइकन शो होते ही लोग समझ जाएं कि अब सोने का समय हो गया है और स्मार्टफोन को रख देना चाहिए. बता दें कि जब ये मोड ऑन होता है तो फोन कुछ सेटिंग्स अपने आप बदल देता है जिससे देर रात मोबाइल इस्तेमाल करने की आदत कम हो और बेहतर नींद लेने में मदद मिल सके.
Bedtime Mode ऑन होने पर क्या बदलता है
आपको बता दें कि Bedtime Mode एक्टिव होने के बाद फोन में कुछ बदलाव होते हैं.

स्क्रीन ग्रेस्केल (Black &amp;amp; White) मोड में जा सकती है.
नोटिफिकेशन पूरी तरह साइलेंट हो सकते हैं.
Do Not Disturb (DND) अपने आप ऑन हो सकता है.
आंखों पर पड़ने वाला असर भी कुछ हद तक कम किया जा सकता है.

हालांकि, अलग-अलग कंपनियों जैसे Samsung, Google, OnePlus, Xiaomi और Motorola के फोन में इसके फीचर्स थोड़े अलग होते हैं.
अपने आप क्यों दिखाई देता है Bed आइकन

जानकारी के लिए बता दें कि अगर आपने Bedtime Mode के लिए कोई शेड्यूल सेट किया है तो ये आइकन आपको उसी समय पर दिखने लगेगा. जैसे मान लिजिए कि आपने रात 11 बजे से सुबह 6 बजे तक Bedtime Mode सेट किया हुआ है तो हर रात आपको 11 बजे से फोन के ऊपर बेड आइकन शो होने लगेगा. इसके अलावा कुछ फोन चार्जिंग के दौरान या स्लीप रूटीन के आधार पर भी इस फीचर को एक्टिव कर सकते हैं.
कैसे हटाएं Bed आइकन
अब अगर आप भी अपने स्मार्टफोन से इस आइकन को हटाना चाहते हैं तो कुछ जरूरी स्टेप्स से ये संभव हो सकता है. आपको बस इन स्टेप्स को फॉलो करना होगा.

फोन की Settings खोलें.
Digital Wellbeing &amp;amp; Parental Controls पर जाएं.
Bedtime Mode या Sleep Mode का ऑप्शन चुनें.
अगर कोई शेड्यूल सेट है तो उसे बंद कर दें.
Bedtime Mode को Off कर दें.
इसके बाद Bed आइकन स्टेटस बार से गायब हो जाएगा.

क्या इससे होती है कोई दिक्कत
ऐसा बिलकुल नहीं है. आपको बता दें कि ये आइकन बस आपको ये बताता है कि आपके सोने का समय हो गया है और अब आपको अपने स्मार्टफोन का इस्तेमाल करना बंद कर देना चाहिए. ये आइकन किसी वायरस, सिस्टम एरर या हार्डवेयर खराबी का संकेत तो बिलकुल भी नहीं होता है. अगर आइकन हट नहीं रहा है तो एक बार फोन रीस्टार्ट करें और Bedtime Mode की सेटिंग दोबारा चेक करें.
क्या Bedtime Mode का इस्तेमाल करना चाहिए
ये निर्णय पूरी तरह आपके ऊपर निर्भर करता है. अगर आप देर रात तक मोबाइल चलाने की आदत से परेशान हैं या अच्छी नींद लेना चाहते हैं तो आपके लिए Bedtime Mode एक कमाल का फीचर साबित हो सकता है. ये स्क्रीन टाइम कम करने, नोटिफिकेशन से होने वाली परेशानी को कम करने और बेहतर डिजिटल आदतें को बनाने मे आपकी मदद करता है. हालांकि, अगर आपको रात में लगातार जरूरी कॉल या मैसेज आते हैं तो इस फीचर की सेटिंग्स को अपनी जरूरत के अनुसार कस्टमाइज भी कर सकते हैं.
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        <pubDate>Tue, 28 Jul 2026 04:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>अपने वॉलेट को एल्युमिनियम फॉइल में क्यों लपेट रहे हैं लोग?</title>
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        <description><![CDATA[ Wallet In Aluminum Foil: सोशल मीडिया पर एक वीडियो शेयर हो रहा है, जिसमें बताया गया है कि रेडियो फ्रीक्वैंसी का यूज कर आपके वॉलेट में रखे क्रेडिट और डेबिट कार्ड्स और दूसरे सरकारी डॉक्यूमेंट्स को एक्सेस किया जा सकता है. इसके बाद कुछ लोगों ने अपने वॉलेट को एल्युमिनियम फॉइल में लपेटना शुरू कर दिया है. यह भले ही असामान्य लग रहा है, लेकिन एल्युमिनियम फॉइल आपको इस तरह होने वाले नुकसान से बचा सकती है. दरअसल, यह फॉइल कुछ रेडियो फ्रीक्वैंसी को ब्लॉक कर देती है, जिससे RFID-इनेबल कार्ड्स और डॉक्यूमेंट को रीड करना मुश्किल हो जाता है. हालांकि, इसे फुलप्रूफ तरीका नहीं कहा जा सकता है, लेकिन एक जुगाड़ के तौर पर इसे यूज किया जा सकता है.&amp;nbsp;
क्यों पड़ी फॉइल की जरूरत?&amp;nbsp;
आपके वॉलेट में कैश के अलावा क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड, ऑफिस बैज और कई ऐसे सरकारी डॉक्यूमेंट होंगे, जो रेडियो फ्रीक्वेंसी आईडेंटिफिकेशन (RFID) या नियर फील्ड कम्युनिकेशन (NFC) टेक्नोलॉजी को यूज करते हैं. इन दोनों की टेक्नोलॉजी की मदद से इन कार्ड्स को वायरलेस तरीके से रीड किया जा सकता है. जैसे आपके क्रेडिट कार्ड या डेबिट कार्ड को अब स्वाइप करने की जरूरत नहीं है. पेमेंट मशीन के पास आते ही इससे बिना किसी कॉन्टैक्ट के इससे पेमेंट हो जाती है. स्कैमर भी इसी टेक्नोलॉजी का सहारा लेकर गैर-अधिकृत तरीके से आपके कार्ड्स को एक्सेस कर सकते हैं. इसे रोकने के लिए एल्युमिनियम फॉइल यूज की जा रही है.&amp;nbsp;
एल्युमिनियम फॉइल कैसे करेगी बचाव?
एल्युमिनियम एक कंडक्टिव मेटल है, जो रेडियो फ्रीक्वेंसी सिग्नल को ब्लॉक या कमजोर कर सकती है. जब वॉलेट को इस फॉइल में लपेटा जाता है तो यह RFID रीडर को कार्ड आदि में लगी चिप के साथ कम्युनिकेट नहीं करने देती. यानी कोई भी अनऑथोराइज तरीके से आपके कार्ड या दूसरे चिप वाले डॉक्यूमेंट को रीड नहीं कर पाएगा. यह ध्यान रखना जरूरी है कि वॉलेट पूरी तरह से फॉइल से कवर होना चाहिए. अगर इसमें गैप बचा हुआ है तो यह तरीका पूरी तरह कारगर नहीं होगा.
क्या सेफ नहीं है आपके वॉलेट में रखे कार्ड्स?
इस सवाल का जवाब कार्ड के टाइप पर निर्भर करता है. ज्यादातर कॉन्टैक्टलेस क्रेडिट और डेबिट कार्ड NFC टेक्नोलॉजी पर काम करते हैं. यह शॉर्ट डिस्टेंस पर ही काम करती है और इसमें गलत एक्सेस को रोकने के लिए कई सुरक्षा उपाय होते हैं. इसलिए वायरलेस तरीके से चोरी का खतरा कम रहता है, लेकिन पासवर्ड और एक्सेस बैज आदि में ऐसी चिप लगी होती है, जिसे दूर से ही रीड किया जा सकता है. इनके लिए आप खास एक्सेसरीज यूज कर सकते हैं.
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        <pubDate>Mon, 27 Jul 2026 12:30:13 +0530</pubDate>
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        <title>Power Bank होने वाला है खराब, ये साइन दिखें तो यूज करना कर दें बंद</title>
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        <description><![CDATA[ Power Bank Warning Signs: ज्यादातर पावर बैंक में लिथियम-आयन बैटरी यूज होती है. यह बैटरी एकदम से खराब नहीं होती और पहले कई वॉर्निंग साइन देती है. इन साइन से समझ आ जाता है कि बैटरी खराब होने वाली है और आपको पावर बैंक रिप्लेस करना पड़ेगा. मोटे तौर पर खराब हो रहा पावर बैंक 6 तरह के साइन देता है. अगर आपके पावर बैंक में इनमें से कोई साइन नजर आ रहा है तो यह बताता है कि बैटरी खराब हो रही है और आपको इसे रिप्लेस करने पर विचार करना चाहिए.
इन संकेतों पर रखें नजर
Swelling- अगर पावर बैंक में फुलावट आ गई है तो यह सबसे सीरियस वॉर्निंग है. पावर बैंक में लगी बैटरी में जब लिक्विड इलेक्ट्रोलाइट टूटने लगते हैं तो ज्वलनशील गैसेस जनरेट होती हैं. पावर बैंक पूरी तरह पैक होता है, इस वजह से गैस को निकलने की जगह नहीं मिलती. प्रेशर बढ़ने से पावर बैंक का कवर फूलने लगता है. ऐसी स्थिति में इसका इस्तेमाल बंद कर दें. पाउच को पंक्चर कर गैस को बाहर निकालने की कोशिश न करें. ऐसा करना खतरनाक हो सकता है.
ओवरहीटिंग- यूज के दौरान पावर बैंक का थोड़ा हीट होना सामान्य है, लेकिन अगर यह बिना यूज के भी हीट होने लगे या यूज के दौरान ओवरहीट होने लगे तो इसे खतरे की घंटी समझना चाहिए. आमतौर पर प्रोटेक्शन सर्किट में गड़बड़ी होने पर ऐसी दिक्कत आती है. अगर आपके पावर बैंक में यह दिक्कत आने लगी है तो इस्तेमाल बंद कर देना चाहिए.
Burning Smell- पावर बैंक इस्तेमाल करते समय अगर इसमें से केमिकल या कुछ जलने की गंध आ रही हो तो यह बताता है कि सब कुछ ठीक नहीं है. इंटरनल इंसुलेशन के डैमेज होने या शॉर्ट सर्किट के कारण ऐसे गंध आती है. इसलिए इसे इग्नोर न करें और पावर बैंक को चार्ज या डिस्चार्ज करना बंद कर दें.
विजिबल डैमेज- अगर पावर बैंक फिजिकली डैमेज हो गया है तो यह भी खतरनाक हो सकता है. अगर आपको इसमें क्रैक या डेंट्स आदि नजर आ रहे हैं तो इसका सावधानी से इस्तेमाल करें. कॉर्नर की बजाय बैटरी के ऊपर वाले हिस्से पर आए डेंट्स ज्यादा खतरनाक हो सकते हैं. अगर डैमेज होने के बाद यह ओवरहीट होने लगे तो इसे यूज करना बंद कर दें.
चार्जिंग बिहेवियर में बदलाव- अगर फुल दिख रही बैटरी एकदम से डिस्चार्ज हो जाए या पावर बैंक बार-बार ऑन या ऑफ होता रहता है तो यह भी दिखाता है कि इसे बदलने का समय आ गया है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Mon, 27 Jul 2026 12:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>PC पर Google Maps दिखा रहा गलत लोकेशन, जानिए क्यों हो रही यह बड़ी गड़बड़ी?</title>
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        <description><![CDATA[ PC पर Google Maps दिखा रहा गलत लोकेशन, जानिए क्यों हो रही यह बड़ी गड़बड़ी? ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 27 Jul 2026 12:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>Open&amp;Source AI को सारे टेक लीडर कर रहे सपोर्ट, यह क्या होती है?</title>
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        <description><![CDATA[ Open-Source AI: माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ सत्या नडेला के बाद ओपनएआई के सीईओ सैम ऑल्टमैन और दुनिया के पहले ट्रिलेनियर एलन मस्क ने भी Nvidia की ओपन-सोर्स एआई की पहल का समर्थन किया है. कई टेक लीडर्स और कंपनियों ने मिलकर अमेरिकी सरकार से ओपन-सोर्स एआई मॉडल्स पर पाबंदी न लगाने की अपील की है. एक पब्लिक लेटर में इन्होंने लिखा कि ओपन-सोर्स मॉडल्स पर पाबंदी लगने से इनोवेशन की रफ्तार कम हो सकती है और इससे कंपीटिशन कम होगा. साथ ही ग्लोबल एआई रेस में अमेरिका पीछे रह सकता है. आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि ओपन-सोर्स एआई का क्या मतलब है और कंपनियां इसका समर्थन क्यों कर रही हैं.
Open-Source AI का क्या मतलब?
ओपन-सोर्स सॉफ्टवेयर की शुरुआत 1980 और 90 के दशक के फ्री सॉफ्टवेयर मूवमेंट से हुई थी. इस मूवमेंट के फाउंडर का मानना था कि सॉफ्टवेयर बनाने और यूज करने वालों के पास 4 राइट्स हैं. इनमें प्रोग्राम रन करना, स्टडी और मॉडिफाई करना, ऑरिजनल सॉफ्टवेयर की कॉपीज डिस्ट्रीब्यूट करना और मॉडिफाईड वर्जन्स की कॉपी डिस्ट्रीब्यूट करना. इसके लिए सबसे जरूरी चीज थी कि प्रोग्राम का सोर्स कोड पब्लिकली अवेलेबल होना चाहिए. यही कॉन्सेप्ट ओपनसोर्स एआई का है. ओपन-सोर्स एआई का मतलब ऐसे सिस्टम से है, जिसके कोड, मॉडल वेट और ट्रेनिंग डेटा जैसे कंपोनेंट पब्लिकली अवेलेबल होने चाहिए ताकि कोई भी इन्हें यूज, स्टडी, मॉडिफाई और डिस्ट्रीब्यूट कर सके.
एनवीडिया की पहल पर साथ आईं कंपनियां
Nvidia के सीईओ Jensen Huang ने एक्स पर एक पब्लिक लेटर पोस्ट किया था. इस पर माइक्रोसॉफ्ट, मेटा, आईबीएम, डेल टेक्नोलॉजीज, पलांटिर, हगिंग फेस, मोजिला और मिस्ट्रल एआई समेत कई कंपनियों के प्रमुखों के साइन थे. इनमें गूगल के सीईओ सुंदर पिचई, गूगल डीप माइंड के सीईओ डेमिस हस्साबिस, मेटा सीईओ मार्क जुकरबर्ग, आईबीएम के सीईओ अरविंद कृष्णा आदि कई बड़े नाम शामिल हैं. इस लेटर पर ओपनएआई के सीईओ सैम ऑल्टमैन के भी साइन थे. उन्होंने इस पहल का स्वागत करते हुए कहा कि मैं चाहता हूं कि ओपन-सोर्स और प्रोपराइटरी मॉडल्स की रेस में अमेरिका जीते. इस लेटर में अमेरिकी सांसदों से ओपन मॉडल्स पर रोक न लगाने की अपील की गई है. बता दें कि यह लेटर ऐसे समय सामने आया है, जब दुनियाभर में इस बात पर बहस छिड़ी हुई है कि क्या ओपन-सोर्स मॉडल्स पर प्रोपराइटरी सिस्टम की तुलना में ज्यादा पाबंदियां लगानी चाहिए.
Open-Source AI का सपोर्ट क्यों कर रही हैं कंपनियां?
दरअसल, एडवांस्ड एआई मॉडल्स के मिसयूज और साइबर सिक्योरिटी को लेकर चिंताओं के बीच अमेरिकी सरकार कड़े नियम लाने पर विचार कर रही है. कई सांसदों ने &quot;किल स्विच&quot; जैसे भी सुझाव दिए हैं, वहीं ट्रंप प्रशासन भी चाइनीज ओपन-सोर्स एआई डेवलपर्स पर प्रतिबंध लगाने का विचार कर रहा है. लेटर पर साइन करने वाले टेक लीडर्स और कंपनियों का कहना है कि ऐसी चिंताओं के समाधान के लिए ओपन-सोर्स एआई पर बैन लगाने की बजाय लीगल और कमर्शियल उपाय देखने की जरूरत है. गूगल डीपमाइंड का कहना है कि स्ट्रॉन्ग और सिक्योर ओपन इकोसिस्टम होना जरूरी है ताकि दुनिया को एआई का फायदा मिल सके. लेटर में यह भी कहा गया है कि क्लोज्ड मॉडल पर भरोसा करना भी पूरी तरह सेफ नहीं है. इन मॉडल्स को मिसयूज किया जा सकता है.
Open-Source AI के फायदे क्या हैं?

एक्सेसिबिलिटी- Open-source AI को एक्सेस करना आसान है. छोटे बिजनेस या कम एक्सपर्टीज वाली कंपनियां भी इसे आसानी से यूज कर सकती हैं.
कोलैब्रेटिव इनोवेशन- डेवलपर, रिसर्चर और कंपनियां आदि सब मिलकर एआई टेक्नोलॉजी को बेहतर बनाने के लिए काम करते हैं.
कीमत भी कम- ओपन मॉडल यूज करने के लिए पैसे देने की जरूरत नहीं होती. इससे कंपनियों के लिए अपने मॉडल बनाने सस्ते हो जाते हैं.
कस्टमाइजेशन- ओपन-सोर्स मॉडल को आप अपने हिसाब से कस्टमाइज कर सकते हैं.&amp;nbsp;
ट्रांसपेरेंसी- ओपन-सोर्स एआई मॉडल के सारे कंपोनेंट पब्लिकली अवेलेबल होते हैं, जिससे ट्रांसपेरेंसी बढ़ती है.

Open-Source AI की चुनौतियां क्या हैं?
फायदों के साथ-साथ ओपन सिस्टम की चुनौतियों पर नजर डालना भी जरूरी है. ओपन-सोर्स सिस्टम के लिए रिस्पॉन्स टाइम फिक्स नहीं होता. यानी कोई इश्यू आने पर यह पता नहीं चलता कि इसे कब तक फिक्स किया जा सकता है. इसके अलावा मिसयूज होने का खतरा बना ही रहता है.
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        <pubDate>Mon, 27 Jul 2026 12:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>क्या Airplane Mode पर तेज चार्ज होता है स्मार्टफोन, जानिए क्या है सच्चाई?</title>
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        <description><![CDATA[ Tech Tips: स्मार्टफोन लोगों की जरुरत बन चुके हैं. ऑनलाइन काम से लेकर कॉलिंग तक के लिए लोग अब स्मार्टफोन का इस्तेमाल कर रहे हैं. लेकिन अक्सर देखा गया है कि कई लोगों का स्मार्टफोन जल्दी डिस्चॉर्ज हो जाता है जिससे बार-बार फोन चार्ज करने की जरूरत होती है. इसी के साथ ऐसा भी माना जाता है कि एयरप्लेन मोड में स्मार्टफोन को चार्ज करने से डिवाइस ज्यादा तेजी से चार्ज होता है. आइए जानते हैं क्या है इसकी सच्चाई.
क्या होता है Airplane Mode?
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि Airplane Mode एक ऐसा फीचर है जो स्मार्टफोन के लगभग सभी वायरलेस कनेक्शन जैसे मोबाइल नेटवर्क, Wi-Fi, Bluetooth और कई मामलों में NFC को बंद कर देता है. इसका मकसद उड़ान के दौरान फोन के रेडियो सिग्नल को इनएक्टिव रखना होता है जिससे विमान के बात करने वाले सिस्टम पर कोई असर न पड़े.
क्या सच में एयरप्लेन मोड में जल्दी चार्ज होता है डिवाइस?
जी हां, दरअसल, जब फोन Airplane Mode में होता है तो वह लगातार मोबाइल टावर, Wi-Fi या Bluetooth से कनेक्ट रहने की कोशिश नहीं करता है. इससे बैटरी की खपत कम हो जाती है और चार्जर से मिलने वाली ज्यादा बिजली सीधे बैटरी को चार्ज करने में लगती है. यही कारण है कि एयरप्लेन मोड में नॉर्मल चार्ज से जल्दी चार्ज हो जाता है स्मार्टफोन. हालांकि, इससे कोई बहुत ज्यादा अंतर नहीं होता है.
कितना होता है अंतर?
बता दें कि चार्जिंग स्पीड में होने वाला अंतर कई बातों पर निर्भर करता है. अगर आपके क्षेत्र में नेटवर्क कमजोर है तो फोन लगातार सिग्नल खोजता रहता है जिससे बैटरी और प्रोसेसर दोनों पर एक्सट्रा लोड पड़ता है. ऐसे में Airplane Mode ऑन करने पर थोड़ा ज्यादा फायदा मिल सकता है. वहीं अगर नेटवर्क पहले से अच्छा है तो चार्जिंग समय में केवल कुछ मिनटों का ही अंतर देखने को मिलता है.
क्या फोन स्विच ऑफ करना बेहतर ऑप्शन है?
आपको बता दें कि अगर आपको सबसे तेज चार्जिंग चाहिए तो फोन को पूरी तरह बंद करके चार्ज करना सबसे बेहतर तरीका माना जाता है. बंद रहने पर बैकग्राउंड ऐप्स, नोटिफिकेशन और सिस्टम प्रोसेस भी काम नहीं करते जिससे बैटरी बिना किसी एक्सट्रा लोड के चार्ज होती है. हालांकि आज के फास्ट चार्जिंग स्मार्टफोन में ये अंतर पहले के मुकाबले में काफी कम हो गया है.
फास्ट चार्जिंग के लिए फॉलो करें ये टिप्स

हमेशा ओरिजिनल या अच्छी क्वालिटी वाला चार्जर और केबल इस्तेमाल करना चाहिए.
चार्जिंग के दौरान गेमिंग, वीडियो स्ट्रीमिंग या हैवी ऐप्स का इस्तेमाल न करें.
फोन को ज्यादा गर्म होने से बचाएं क्योंकि ज्यादा टेंपरेचर चार्जिंग की स्पीड को प्रभावित करता है.
अगर जरूरत न हो तो चार्जिंग के समय Wi-Fi, Bluetooth और GPS को बंद रखें.
फास्ट चार्जिंग सपोर्ट वाले फोन में उसी क्षमता का चार्जर इस्तेमाल करें.

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        <pubDate>Mon, 27 Jul 2026 12:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>Facebook में आने वाला है सबसे बड़ा बदलाव! मिलेगा TikTok वाला फीचर</title>
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        <description><![CDATA[ Facebook: मेटा अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर कई सारे अपडेट देता रहता है. इसी कड़ी में अब फेसबुक में भी मेटा जल्द ही एक नया बदलाव करने की तैयारी में है. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, कंपनी एक नया फीचर टेस्ट कर रही है जिसके आने के बाद यूजर जब भी ऐप खोलेगा तो उसे फुल-स्क्रीन वीडियो फीड दिखाई देगा. बता दें कि ये फीचर टिक-टॉक को सीधी टक्कर देगा. आइए जानते हैं कि कैसे काम करेगा ये फीचर.
ऐप खुलते ही मिलेगा वीडियो का नया इंटरफेस
Meta के मुताबिक, नए इंटरफेस का मकसद उन लोगों को बेहतर एक्सपीरिएंस देना है जो Facebook पर ज्यादा समय वीडियो देखने में बिताते हैं. ऐसे यूजर्स के लिए ऐप सीधे इमर्सिव फुल-स्क्रीन वीडियो मोड में खुलेग जिससे कंटेंट देखने का एक्सपीरिएंस पहले से ज्यादा आकर्षक हो जाएगा. हालांकि, कंपनी ने साफ कर दिया है कि ये फीचर सभी यूजर्स पर जबरदस्ती लागू नहीं किया जाएगा.
फेसबुक बदलने का क्या है कारण
जानकारी के अनुसार, पिछले कुछ सालों में Facebook पर लोग कम एक्टिव रहने लगे हैं. अब बहुत कम यूजर्स समय-समय पर पोस्ट शेयर करते हैं, प्रोफाइल अपडेट करते हैं या दोस्तों के साथ बातचीत करते हैं.
दूसरी ओर, शॉर्ट वीडियो देखने का ट्रेंड काफी तेजी से बढ़ा है. इसी को देखते हुए Meta का मानना है कि आज बड़ी संख्या में लोग सोशल मीडिया पर सिर्फ कंटेंट देखने आते हैं, इसलिए उन्हें उनकी पसंद के हिसाब से वीडियो दिखाना ज्यादा बेहतर ऑप्शन साबित हो सकता है.
पुराना फेसबुक का भी रहेगा ऑप्शन
जानकारी के लिए बता दें कि Facebook के मुताबिक, ये फीचर टेस्टिंग फेज में है और यूजर को वापस फेसबुक का पुराना वर्जन भी इस्तेमाल करने का ऑप्शन मिलेगा. अगर यूजर को ये नया फीचर नहीं पसंद आता है तो वो वापस पुराने वाले फेसबुक वर्जन पर लौट सकेगा. इससे साफ है कि Meta फिलहाल यूजर्स के रिएक्शन को समझने के बाद ही अंतिम फैसला लेगी.
AI से ली जाएगी मदद
Instagram के प्रमुख एडम मोसेरी के अनुसार, केवल दोस्तों और फॉलो किए गए अकाउंट्स की पोस्ट दिखाने से यूजर्स को सीमित कंटेंट मिलता है. लेकिन अगर AI और रिकमेंडेशन सिस्टम की मदद से करोड़ों नई पोस्ट में से यूजर के इंट्रेस्ट के अनुसार वीडियो चुने जाएं तो उनका एक्सपीरिएंस कहीं बेहतर हो सकता है. यही वजह है कि Meta अब Facebook पर भी वीडियो रिकमेंडेशन को पहले से ज्यादा महत्व देने की दिशा में काम कर रही है.
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        <title>बिना क्वालिटी खराब किए फोटो भेजने के काम आएंगे ये तरीके</title>
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        <description><![CDATA[ Photo Sharing Tips: आप किसी जगह घूमने गए, आपके दोस्त ने फोटो क्लिक की, लेकिन आपके आपके पास पहुंचते-पहुंचते उस फोटो की क्वालिटी एकदम खराब हो गई. यकीनन कई बार आपके साथ ऐसा हुआ होगा. फोटो शेयर करते समय अगर सही तरीका न अपनाया जाए तो क्वालिटी खराब होना लाजिमी है. दरअसल, व्हाट्सऐप जैसी ऐप्स फोटोज को कंप्रैस कर देती है, जिससे फोटो का साइज और क्वालिटी दोनों कम हो जाते हैं. आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि क्वालिटी खराब किए बिना फोटो कैसे शेयर कर सकते हैं.
क्लाउड स्टोरेज आएगी काम
फोटो स्टोर और शेयर करने के लिए क्लाउड स्टोरेज बड़े काम की चीज है. एंड्रॉयड के लिए गूगल और आईफोन यूजर के लिए ऐप्पल की फोटोज ऐप आपको फोटो और वीडियो को डिजिटल सर्वर पर बैक अप करने का ऑप्शन देती हैं. आप आईडी पासवर्ड लेकर इन्हें एक्सेस कर सकते हैं. आप अपने फोन में फोटो लेकर इन्हें क्लाउड पर स्टोर कर सकते हैं. फिर क्लाउड की एक्सेस अपने दोस्तों को देकर उन्हें भी एकदम हाई क्वालिटी फोटो डाउनलोड करने का ऑप्शन मिल जाएगा.
ईमेल से भेजें फोटोज
ज्यादातर लोग ईमेल को ऑफिस के कामों के लिए यूज करते हैं. आप इसके जरिए फोटो भी भेज सकते हैं और क्वालिटी से कॉम्प्रोमाइज करने की भी जरूरत नहीं पड़ेगी. हालांकि, इसके लिए आपको साइज लिमिट का ध्यान रखना जरूरी है. अगर आप साइज लिमिट के हिसाब से फोटो शेयर करते हैं तो इसकी क्वालिटी कम नहीं होती.
Airdrop और Quick Share की लें मदद
फोटो और दूसरी फाइल को शेयर करने की बात हो और एयरड्रॉप और क्विक शेयर का जिक्र न आए, ऐसा नहीं हो सकता. ऐप्पल यूजर्स Airdrop के जरिए क्वालिटी को कम किए बिना फाइल्स और फोटो शेयर कर सकते हैं. इसी तरह एंड्रॉयड यूजर्स क्विक शेयर का यूज कर फोटो ट्रांसफर कर सकते हैं. कुछ समय पहले तक एयरड्रॉप केवल आईफोन पर काम करता था, लेकिन अब यह बंदिश हट चुकी है. अब एयरड्रॉप आईफोन और एंड्रॉयड दोनों पर काम करता है.
व्हाट्सऐप पर यह जुगाड़ आएगा काम
अगर आप व्हाट्सऐप से डायरेक्ट फोटो या वीडियो शेयर करते हैं तो इनका साइज और क्वालिटी दोनों ही कम हो जाती है. इससे बचने के लिए आप एक जुगाड़ लगा सकते हैं. जब आपको किसी फोटो या वीडियो को शेयर करना होता है तो फोटो ऑप्शन के जरिए भेजने की बजाय डॉक्यूमेंट का ऑप्शन चुनें. इसमें फोटो और वीडियो अपने ऑरिजनल साइज और क्वालिटी में शेयर हो पाएंगे. यह तरीका व्हाट्सऐप के साथ-साथ दूसरी मैसेजिंग ऐप्स पर भी काम करेगा.
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        <pubDate>Mon, 27 Jul 2026 00:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>क्या बारिश से एकदम साफ हो जाते हैं सोलर पैनल? यहां जानें सच</title>
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        <description><![CDATA[ Solar Panel Cleaning Tips: मैक्सिमम एफिशिएंसी के लिए सोलर पैनल को साफ रखना जरूरी है. पैनल पर धूल-मिट्टी जम जाने से सनलाइट ब्लॉक हो सकती है, जिससे एनर्जी प्रोडक्शन कम हो जाता है. अब बारिश का सीजन चल रहा है तो पानी बरसने से पैनल की धूल-मिट्टी साफ हो जाती है. ऐसे में कई लोग सोचते हैं कि बारिश के समय सोलर पैनल की सफाई जरूरी नहीं होती, लेकिन क्या सच में बारिश से पैनल एकदम साफ हो जाते हैं? आज हम इस सवाल का जवाब लेकर आए हैं.
क्या बारिश से पूरी तरह साफ हो जाते हैं पैनल?
बारिश आने से धूल-मिट्टी और कुछ दूसरा कचरा तो साफ हो जाता है, लेकिन बाकी गंदगी साफ नहीं हो पाती. पैनल की सफाई के लिए अकेली बारिश काफी नहीं हैं. ऐसे में यह मान लेना उचित नहीं होगा कि बारिश के मौसम में पैनल को अलग से साफ करने की जरूरत नहीं होती. इसके अलावा बारिश के पानी में पॉल्यूटेंट्स, डस्ट और दूसरे मिनरल्स होते हैं. इंडस्ट्री वाले शहरों में तो पॉल्यूशन की समस्या और ज्यादा बड़ी है. जब पैनल से बारिश का पानी सूख जाता है तो पीछे दाग रह जाते हैं, जो सनलाइट को पैनल तक पहुंचने से रोक सकते हैं. इसलिए बारिश के बाद भी साफ पानी और सॉफ्ट कपड़े से पैनल साफ करने की सलाह दी जाती है.
बारिश के मौसम में इसलिए भी जरूरी है सफाई
बारिश के मौसम में हवा में नमी बढ़ जाती है. इस कारण केरल, गोवा और नॉर्थ-ईस्ट जैसे इलाकों में ज्यादा नमी से सोलर पैनल्स पर फफूंदी, काई और लाइकेन आदि का जमाव हो सकता है. ऐसा होने पर एनर्जी प्रोडक्शन पर असर पड़ता है. बारिश से ये चीजें साफ नहीं होती. इसलिए बारिश के मौसम में भी पैनल की सफाई करते रहना चाहिए. बारिश में सफाई की जरूरत कम हो जाती है, लेकिन यह पूरी तरह खत्म नहीं हो पाती.
सोलर पैनल की सफाई करते समय ध्यान रखें ये बातें

पैनल की सफाई से पहले सोलर एनर्जी सिस्टम को बंद कर दें. पैनल के सफाई के लिए सुबह का समय चुनें.
सफाई करते समय पैनल पर भार न डालें. भार डालने से पैनल क्रैक हो सकते हैं.
सफाई के लिए हार्ड पानी या केमिकल यूज न करें. RO के पानी और सॉफ्ट कपड़े का इस्तेमाल करते हुए पैनल साफ करें.
अगर पैनल पर कोई धब्बा या गंदगी जम गई है तो इसे कुछ देर के लिए गीले कपड़े से कवर कर दें. इसके बाद इसे उतारना आसान हो जाता है.&amp;nbsp;

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        <pubDate>Mon, 27 Jul 2026 00:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>Solar Panel लगवाने से पहले जान लें 20% का ये नियम! वरना हो सकता है बड़ा नुकसान</title>
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        <description><![CDATA[ Solar Panel: मार्केट में आज के समय में बिजली बचाने वाले डिवाइस काफी ट्रेंडिंग में है. इसी बीच सोलर पैनल लोगों के बीच काफी फेमश हो चुका है. अब लोग अपने घरों में सोलर पैनल लगवाना शुरू कर चुके हैं. इतना ही नहीं, सरकार भी लोगों को सोलर पैनल का इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित कर रही है. लेकिन अक्सर देख गया है कि सोलर पैनल खरीदते समय लोग कुछ चीजों का ध्यान नहीं रखते हैं जिससे बाद में उन्हें नुकसान उठाना पड़ता है. इसीलिए आज हम आपको बताने जा रहे हैं सोलर पैनल से जुड़ा 20 प्रतिशत नियम के बारे में जिसके बारे में जानना बहुत जरूरी है.
दोनों मौसम में मिलेगा फायदा
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि गर्मियों में एयर कंडीशनर, कूलर और दूसरे डिवाइस का इस्तेमाल बढ़ जाता है जिससे बिजली की खपत भी बढ़ती है. वहीं सर्दियों में हीटर या गीजर जैसे डिवाइस ज्यादा बिजली लेते हैं. अगर आपके सोलर सिस्टम में एक्सट्रा 20% क्षमता होगी तो ऐसे समय में भी आपको पर्याप्त बिजली मिल जाएगी जब बिजली की प्रोडक्टिविटी कम होती है.
क्या है सोलर पैनल का 20% नियम?
जानकारी के मुताबिक, 20% नियम का मतलब है कि आपके घर की जितनी औसत बिजली खपत है, उससे लगभग 20 प्रतिशत ज्यादा बिजली पैदा करने वाला सोलर सिस्टम लगाया जाए. बता दें कि सोलर पैनल हर दिन एक जैसी बिजली नहीं बनाते हैं.
बादल, बारिश, सर्दियों में कम धूप और धूल जैसी कई वजहों से बिजली की पैदा करने की ताकत कम हो जाती है. ऐसे में 20% एक्सट्रा ताकत आपके घर की बिजली जरूरतों को पूरा करने में मदद करती है और बार-बार ग्रिड से बिजली लेने की जरूरत कम हो जाती है.
आने वाले समय के लिए तैयार
आज आपकी बिजली की जरूरत कम हो सकती है लेकिन आने वाले सालों में ये बढ़ सकती है. अगर भविष्य में आप घर से काम करना शुरू करें, नया एयर कंडीशनर लगाएं या इलेक्ट्रिक कार खरीदें तो बिजली की मांग पहले से ज्यादा हो जाएगी.
ऐसे में शुरुआत में थोड़ा बड़ा सोलर सिस्टम लगाना बाद में सिस्टम अपग्रेड कराने के मुकाबले में ज्यादा किफायती साबित हो सकता है.
एक्सट्रा बिजली से हो सकती है बचत
अगर आपका सोलर सिस्टम जरूरत से ज्यादा बिजली पैदा करता है और आपके क्षेत्र में नेट मीटरिंग या बिजली वापस ग्रिड में भेजने की सुविधा उपलब्ध है तो एक्सट्रा बिजली बिजली कंपनी को भेजी जा सकती है. इसके बदले आपको बिल में क्रेडिट या दूसरे लाभ भी मिल सकते हैं.
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        <pubDate>Mon, 27 Jul 2026 00:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>कितने साल चलता है Smart Bulb? जानिए क्या है सच्चाई</title>
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        <description><![CDATA[ Smart Bulb: आज के समय में स्मार्ट होम डिवाइस मार्केट में काफी चर्चा का विषय बना हुआ है. इसमें स्मार्ट बल्ब भी घरों में ज्यादा इस्तेमाल होने लगे हैं. इन स्मार्ट बल्ब की एक खास बात ये है कि इन्हें मोबाइल ऐप या वॉयस असिस्टेंट से भी कंट्रोल किया जा सकता है. इसके अलावा इसमें कई सारे स्मार्ट फीचर्स भी मिल जाते हैं. लेकिन अक्सर स्मार्ट बल्ब इस्तेमाल करने वाले यूजर्स में एक सवाल होता है कि ये कितने साल तक चल सकते हैं. आइए जानते हैं इसकी सच्चाई.
कितनी होती है Smart Bulb की लाइफ
आपको बता दें कि ज्यादातर अच्छी क्वालिटी के Smart LED Bulb की लाइफ 15,000 से 25,000 घंटे तक बताई जाती है. ऐसे में अगर आप रोजाना लगभग 4-5 घंटे इसका इस्तेमाल करते हैं तो ये करीब 8 से 12 साल तक आराम से चल सकता है. हालांकि ये पीरियड ब्रांड, इस्तेमाल के तरीके और बिजली की क्वालिटी पर भी निर्भर करती है.
किन वजहों से कम हो जाती है लाइफ
दरअसल, Smart Bulb की लाइफ कम होने के पीछे कई सारे कारण हो सकते हैं. जैसे बार-बार बिजली का फ्लकचुएशन, खराब वायरिंग, बंद फिटिंग में जरूरत से ज्यादा गर्मी होना और लगातार ऑन-ऑफ करना स्मार्ट बल्ब की लाइफ को कम कर सकती है. इसलिए ऐसे बल्ब को हमेशा अच्छी क्वालिटी के होल्डर और सेफ बिजली सप्लाई के साथ इस्तेमाल करना चाहिए.
इसके अलावा कई बार LED तो ठीक रहती है लेकिन ऐप सपोर्ट या फर्मवेयर अपडेट बंद होने से कुछ स्मार्ट फीचर्स सीमित हो सकते हैं. हालांकि बल्ब नॉर्मल LED की तरह जलता रहता है. इसलिए खरीदते समय ऐसे ब्रांड का चुनाव करना बेहतर होता है जो लंबे समय तक सॉफ्टवेयर अपडेट और ऐप सपोर्ट देता हो.
क्या Wi-Fi से कनेक्ट रहने पर जल्दी खराब होती है
बता दें कि कई लोगों को लगता है कि लगातार Wi-Fi या Bluetooth से कनेक्ट रहने के कारण Smart Bulb जल्दी खराब हो जाते हैं. असल में ऐसा नहीं है. स्मार्ट फीचर्स बल्ब के इलेक्ट्रॉनिक्स का हिस्सा होते हैं और नॉर्मस स्थिति में इनका बल्ब की LED लाइफ पर बहुत कम असर पड़ता है. अगर बिजली का वोल्टेज स्टेबल रहे और बल्ब अच्छी क्वालिटी का हो तो ये लंबे समय तक सही तरीके से काम करता है.
इन बातों का जरूर रखें ध्यान
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि स्मार्ट बल्ब खरीदते समय कुछ जरूरी चीजों का जरूर ध्यान रखना चाहिए. जैसे उसकी ब्राइटनेस (Lumens), कलर सपोर्ट, Wi-Fi या Bluetooth कनेक्टिविटी, बिजली की खपत और वारंटी जैसी चीजों का जरूर चेक करना चाहिए.
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        <pubDate>Mon, 27 Jul 2026 00:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>Bluetooth On Drain Battery: दिनभर ऑन रखते हैं फोन का Bluetooth, जानें इससे कितनी खर्च हो जाती है बैटरी?</title>
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        <description><![CDATA[ Bluetooth On Drain Battery: स्मार्टफोन में Bluetooth ऑन रखना हमारी रोजमर्रा की जरूरत बन चुका है. वायरलेस ईयरबड्स, स्मार्टवॉच और कार कनेक्टिविटी के लिए लोग इसे दिनभर चालू रखते हैं. कई बार तो काम खत्म होने के बाद भी हम Bluetooth बंद करना भूल जाते हैं और यह दिन-रात ऑन ही रहता है. ऐसे में अक्सर लोगों के मन में यह सवाल आता है कि क्या दिनभर Bluetooth ऑन रखने से फोन की बैटरी जल्दी खत्म होती है? क्या Bluetooth बंद करके हम अपने फोन की बैटरी लाइफ बढ़ा सकते हैं? आइए जानते हैं...
क्या है Bluetooth Low Energy
अगर हम कुछ साल पहले की बात करें तो उस समय Bluetooth ऑन रखने पर सच में फोन की बैटरी बहुत तेजी से खत्म होती थी. हालांकि, आज के समय टेक्नोलॉजी बहुत बदल चुकी है. आजकल के सभी नए और आधुनिक स्मार्टफोन्स में Bluetooth Low Energy यानी BLE टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जाता है. इस तकनीक की मदद से जब आपका Bluetooth किसी डिवाइस जैसे इयरफोन या वॉच से कनेक्ट नहीं होता है, तो यह Bluetooth को स्लीप मोड में डाल देता है. इस दौरान यह आसपास के डिवाइसेज को ढूंढने के लिए बहुत कम मात्रा में सिग्नल भेजता है, जिस कारण Bluetooth होने पर भी हमारे फोन की बैटरी को बहुत ही कम खर्च होती हैं.&amp;nbsp;
दिन भर में कितनी खर्च होती है बैटरी
अगर आपके फोन का Bluetooth पूरे दिन ऑन रहता है और वह किसी चीज से कनेक्टेड नहीं है तो यह हमारे फोन की कुल बैटरी का सिर्फ 1% से 3% हिस्सा ही खर्च करता है. लेकिन जब हमारा फोन किसी डिवाइस से कनेक्ट रहता है, तो बैटरी खर्च होने की रफ्तार थोड़ी बढ़ जाती है. फिर भी, यह स्क्रीन लाइट, वाई-फाई या इंटरनेट ऑन रखने के मुकाबले बहुत कम बैटरी लेता है.&amp;nbsp;
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Bluetooth ऑन रखने के नुकसान
ये सच है कि Bluetooth फोन की बैटरी को ज्यादा खर्च नहीं करता, लेकिन इसे हर वक्त ऑन रखने से आपको कुछ नुकसान भी हो सकते हैं. अगर हमेशा Bluetooth ऑन रहता है, तो भीड़-भाड़ वाली जगहों पर हैकर्स आपके फोन से कनेक्ट करके आपके फोन का डेटा चोरी कर सकते हैं. साथ ही जब आप बाहर होते हैं, तो आपका फोन अनजान Bluetooth डिवाइसेज से जुड़ने के लिए बार-बार नोटिफिकेशन भेजता है. जिससे आप परेशान हो सकते हैं.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Sun, 26 Jul 2026 08:30:15 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Wi&amp;Fi की रेंज बढ़ाने की ये ट्रिक है कमाल! 99% लोगों को आज भी नहीं पता ये तरीका</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/wi-fi-की-रेंज-बढ़ाने-की-ये-ट्रिक-है-कमाल-99-लोगों-को-आज-भी-नहीं-पता-ये-तरीका</link>
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        <description><![CDATA[ Wi-Fi Trick: डिजिटल दुनिया में आज स्मार्टफोन के साथ-साथ इंटरनेट भी लोगों की जरूरत बन चुका है. अब इंटरनेट की मदद से लोग अपने ज्यादातर काम को ऑनलाइन ही कर लेते हैं. कई लोग स्मार्टफोन में डेटा का इस्तेमाल करते हैं तो कई लोग घरों में वाई-फाई का इस्तेमाल करते हैं. लेकिन अक्सर लोगों को वाई-फाई के इस्तेमाल करने में दिक्कत आती है. इसी कड़ी में आज हम आपको ऐसी ट्रिक के बारे में बताने जा रहे हैं जिसकी मदद से आप भी अपने वाई-फाई की रेंज को आसानी से बढ़ा सकते हैं.
सही जगह पर रखें राउटर
आपको बता दें कि Wi-Fi की बेहतर रेंज के लिए सबसे पहले राउटर की सही लोकेशन चुनना बहुत जरूरी होता है. राउटर को घर के बीच वाले हिस्से में और थोड़ी ऊंचाई पर रखना चाहिए. अगर इसे किसी कोने, फर्श पर या बंद अलमारी में रखा गया है तो सिग्नल पूरे घर में अच्छे से नहीं पहुंच पाता है. इसीलिए राउटर को हमेशा खुली जगह पर रखना चाहिए.
इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस से रखें दूरी
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि राउटर को इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसों से दूर रखना चाहिए. बता दें कि माइक्रोवेव, फ्रिज, टीवी, ब्लूटूथ डिवाइस के पास राउटर रखने से उसके सिग्नल प्रभावित होते हैं. ये डिवाइस Wi-Fi की फ्रीक्वेंसी में रुकावट पैदा करते हैं जिससे इंटरनेट की स्पीड कम हो जाती है.
5GHz और 2.4GHz बैंड का सही इस्तेमाल करें
इसके अलावा अगर आपका राउटर डुअल-बैंड सपोर्ट करता है तो दोनों नेटवर्क का सही तरीके से इस्तेमाल करें. बता दें कि 2.4GHz बैंड की रेंज ज्यादा होती है, इसलिए दूर वाले कमरों में ये बेहतर तरीके से काम करता है. वहीं, 5GHz बैंड ज्यादा स्पीड देता है लेकिन इसकी रेंज थोड़ी कम होती है. इसीलिए हमेशा अपनी जरूरत के हिसाब से बैंड को चुनना चाहिए.
अपडेट रखें सॉफ्टवेयर
इतना ही नहीं, कई लोग राउटर खरीदने के बाद कभी उसका फर्मवेयर अपडेट नहीं करते. जबकि कंपनियां समय-समय पर नए अपडेट जारी करती हैं जिनसे नेटवर्क की परफॉर्मेंस, सुरक्षा और स्टेबिलिटी बेहतर होती है. इसलिए समय-समय पर राउटर की सेटिंग्स में जाकर अपडेट जरूर चेक करते रहना चाहिए.
ये है कमाल की ट्रिक
अगर आपके Wi-Fi की रेंज कम है तो सबसे पहले राउटर की लोकेशन बदलकर देखें. कई मामलों में सिर्फ इसी से आपके वाईफाई की रेंज बढ़ जाती है. इसके साथ सही बैंड का इस्तेमाल, फर्मवेयर अपडेट और जरूरत पड़ने पर एक्सटेंडर लगाने से आपका Wi-Fi पहले से कहीं ज्यादा बेहतर काम कर सकता है.
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        <pubDate>Sun, 26 Jul 2026 08:30:14 +0530</pubDate>
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        <title>16 साल से कम उम्र के बच्चे नहीं कर पाएंगे Social Media पर पोस्ट? इस देश का बड़ा कदम</title>
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        <description><![CDATA[ Social Media: सोशल मीडिया का इस्तेमाल पूरे देश में काफी तेजी से बढ़ा है. अब बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सोशल मीडिया पर कई घंटों तक एक्टिव रहते हैं. इसी को देखते हुए अब कई देश सोशल मीडिया को कम उम्र के बच्चों के लिए बैन कर रही है. इसी कड़ी में बता दें कि अब वियतनाम सरकार भी 16 साल से कम उम्र वाले बच्चों के लिए सोशल मीडिया से जुड़ी पाबंदियां लागू करने वाली है.
आ गया नया नियम
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, वियतनाम सरकार चाहती है कि 16 साल से कम उम्र वाले बच्चों को सोशल मीडिया पर पोस्ट करने, पोस्ट पर अपना रिएक्शन देने से रोकना है. बता दें कि सराकर के नियमों के तहत 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया अकाउंट उनके माता-पिता या कानूनी अभिभावक की जानकारी के आधार पर ही बनाए जाएंगे. बच्चों के अकाउंट की निगरानी करने की जिम्मेदारी भी पैरेंट्स की होगी. इसमें ये देखा जाएगा कि बच्चा किस तरह का कंटेंट देख रहा है और सोशल मीडिया पर कितना समय बिता रहा है.
बच्चों की सेफ्टी पर ज्यादा ध्यान
दरअसल, वियतनाम सरकार के मंत्री फान ताम ने कहा कि सरकार का मकसद बच्चों को सोशल मीडिया से पूरी तरह दूर करना नहीं है. उनका कहना है कि मकसद ये सुनिश्चित करना है कि जब बच्चे सोशल मीडिया का इस्तेमाल करें तो उन्हें सुरक्षित और उनकी उम्र के अनुरूप डिजिटल माहौल मिले जिससे वे ऑनलाइन खतरों से सुरक्षित रह सकें.
सोशल मीडिया कंपनियों पर भी होगी जिम्मेदारी
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि सोशल मीडिया कंपनियों के लिए भी कई नए नियम शामिल किए गए हैं. कंपनियों उम्र वेरिफिकेशन के लिए नई टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करना चाहिए जिससे बच्चों की असल उम्र की पहचान हो सके. इसके अलावा कम उम्र के बच्चों के लिए उनके अनुसार ही कंटेंट दिखाने चाहिए.
ऑनलाइन गेमिंग पर भी सख्ती की तैयारी
ये सिर्फ सोशल मीडिया तक ही सीमित नहीं है. अब सरकार ऑनलाइन गेम्स पर भी कड़े कदम उठाने की तैयारी में है. जानकारी के अनुसार गेमिंग कंपनियों को खिलाड़ियों की उम्र की जांच करनी होगी. 16 साल से कम उम्र के बच्चों के गेमिंग अकाउंट भी पैरेंट्स की जानकारी के साथ रजिस्टर्ड किए जाएंगे. इसके अलावा एक ही कंपनी के गेम्स खेलने वाले 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए प्रतिदिन मैक्सिमम 60 मिनट का गेमिंग समय तय करने का प्रस्ताव भी रखा गया है.
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        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Extension Board Overloading Risk: एक ही एक्सटेंशन बोर्ड में न चलाएं ये 7 सामान, बढ़ जाता है ओवरलोडिंग का खतरा</title>
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        <description><![CDATA[ Extension Board Overloading Risk: आज के समय में हम सब के घरों में बिजली से चलने वाले उपकरणों की संख्या बहुत बढ़ गई है. इसलिए अक्सर लोग घर में सॉकेट कम होने की वजह से एक्सटेंशन बोर्ड का इस्तेमाल करते हैं. लेकिन हर डिवाइस को एक्सटेंशन बोर्ड में लगाना सुरक्षित नहीं होता. क्योंकि कुछ उपकरण इतनी बिजली खींचते हैं कि एक्सटेंशन बोर्ड उस भार को संभाल नहीं पाता और ओवरलोडिंग के कारण आग लगने का खतरा बढ़ जाता है. आइए जानते हैं उन उपकरणों के बारे में, जिन्हें एक ही एक्सटेंशन बोर्ड पर एक साथ नहीं चलाना चाहिए.&amp;nbsp;
एयर कंडीशनर AC
एसी को चलने के लिए बहुत ज्यादा बिजली की जरूरत होती है. जब एसी चलता है, तो वह एक साथ बहुत ज्यादा करंट खींचता है. अगर आप इसे आम एक्सटेंशन बोर्ड में लगाएंगे, तो बोर्ड का तार तुरंत पिघल सकता है और बोर्ड आग लगने का खतरा बढ़ जाता है.&amp;nbsp;
फ्रिज&amp;nbsp;
फ्रिज 24 घंटे लगातार चलता है और इसे कंप्रेसर चलाने के लिए लगातार और ज्यादा पावर की आवश्यकता होती है. एक्सटेंशन बोर्ड पर फ्रिज का लोड पड़ने से बोर्ड गर्म हो जाता है. इसलिए फ्रिज को सीधे दीवार के प्लग में ही लगाना ठीक रहता है.&amp;nbsp;
माइक्रोवेव और ओवन
खाना गर्म करने या बेक करने वाले ओवन बहुत तेजी से बिजली खींचते हैं. यदि आप ओवन के साथ उसी एक्सटेंशन बोर्ड पर कोई और चीज चला रहे हैं, तो ओवरलोडिंग का खतरा 100 गुना बढ़ जाता है.&amp;nbsp;
रूम हीटर
सर्दियों के दिनों में रूम हीटर का इस्तेमाल बहुत बढ़ जाता है. हीटर के अंदर लगे कॉइल को गर्म होने के लिए भारी मात्रा में बिजली चाहिए होती है. रूम हीटर को कभी भी साधारण एक्सटेंशन बोर्ड पर न चलाएं, यह कुछ ही मिनटों में बोर्ड को जला सकता है.&amp;nbsp;
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वॉशिंग मशीन
वॉशिंग मशीन में कपड़े धोने और सुखाने के लिए एक हैवी मोटर लगी होती है. इस मोटर को चलाने के लिए भारी पावर सप्लाई की जरूरत होती है. इसे एक्सटेंशन बोर्ड के बजाय सीधे दीवार के 15 एम्पीयर वाले पावर स्विच में लगाना चाहिए. जिससे वॉशिंग मशीन अच्छे से कपड़े सूखा सके.&amp;nbsp;
इंडक्शन
पानी गर्म करने वाली केतली या इंडक्शन चूल्हा बहुत कम समय में पानी या खाना उबाल देते हैं. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वे बहुत ज्यादा वाट बिजली का इस्तेमाल करते हैं. इन्हें एक्सटेंशन बोर्ड पर लगाने से स्पार्किंग होने का खतरा रहता है.
हेयर ड्रायर और प्रेस
कपड़े प्रेस करने वाली इस्तरी और बाल सुखाने वाला हेयर ड्रायर देखने में छोटे लगते हैं, लेकिन ये बिजली बहुत ज्यादा खाते हैं. इन्हें कभी भी अन्य छोटे उपकरणों जैसे मोबाइल चार्जर या टीवी के साथ एक ही एक्सटेंशन पर न जोड़ें.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Sun, 26 Jul 2026 08:30:11 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Supreme Court Order: सुप्रीम कोर्ट की क्लिप सोशल मीडिया पर डाली तो कितनी मिलेगी सजा? जान लें नियम</title>
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        <description><![CDATA[ Supreme Court Order: सुप्रीम कोर्ट ने अदालती कार्यवाही से जुड़े वीडियो और ऑडियो क्लिप को सोशल मीडिया पर बिना अनुमति डालने को लेकर सख्त कदम उठाया है. चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहन की बेंच ने एक अंतरिम आदेश जारी करते हुए साफ किया कि अब कोर्ट की लाइव स्ट्रीमिंग से क्लिप निकालकर सोशल मीडिया पर फैलाना आसान नहीं होगा. ऐसे में यह जानना जरूरी है कि नए आदेश के तहत क्या क्या प्रतिबंधित है और नियम तोड़ने पर क्या कार्रवाई हो सकती है.
क्या कहता है सुप्रीम कोर्ट का नया आदेश
अदालत ने अपने अंतरिम आदेश में कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के सेक्रेटरी जनरल या संबंधित हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल की पूर्व अनुमति के बिना न्यायिक कार्यवाही की ऑडियो वीडियो रिकॉर्डिंग को निकालना, उसमें बदलाव करना, फैलाना, पोस्ट करना, रीपोस्ट करना, अपलोड करना या उससे कमाई करना प्रतिबंधित रहेगा. यह आदेश एक याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया गया, जिसमें कोर्ट की लाइव स्ट्रीमिंग से काटकर बनाए गए एडिटेड क्लिप्स के दुरुपयोग पर चिंता जताई गई थी. हालांकि अदालत ने साफ किया है कि यह निर्देश समाचार रिपोर्टिंग पर लागू नहीं होगा.
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न्यूज रिपोर्टिंग को मिलेगी छूट
सुनवाई के दौरान सीनियर एडवोकेट विकास सिंह ने कहा कि उन्हें कोर्ट की लाइव स्ट्रीमिंग से कोई आपत्ति नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर एडिटेड क्लिप्स के गलत इस्तेमाल पर आपत्ति है. यही वजह है कि अदालत ने मीडिया संस्थानों की सामान्य न्यूज रिपोर्टिंग को इस पाबंदी से बाहर रखा है. यह आदेश फिलहाल अंतरिम है और केंद्र सरकार समेत अन्य पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा गया है.
नियम तोड़ने पर हो सकती है यह कार्रवाई
भारत में कोर्ट की अवमानना से जुड़े मामलों पर कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट्स एक्ट, 1971 लागू होता है. इस कानून की धारा 12 के तहत अदालत की अवमानना पर छह महीने तक की साधारण कैद, या दो हजार रुपये तक का जुर्माना, या दोनों सजा एक साथ दी जा सकती हैं. अगर आरोपी अदालत से माफी मांग लेता है और अदालत उससे संतुष्ट होती है, तो सजा माफ भी की जा सकती है. सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा आदेश का उल्लंघन करने पर भी इसी कानून के तहत कार्रवाई की जा सकती है, क्योंकि यह सीधे तौर पर अदालत के निर्देश की अवहेलना मानी जाएगी.
आम लोगों के लिए क्यों जरूरी है यह जानकारी
सोशल मीडिया पर सक्रिय लोगों को अब कोर्ट से जुड़ी कोई भी क्लिप शेयर करने से पहले सतर्क रहना होगा. बिना अनुमति ऐसी रिकॉर्डिंग पोस्ट करना अब सीधे कानूनी कार्रवाई को न्यौता दे सकता है, इसलिए सोशल मीडिया यूजर्स को इस नए नियम की पूरी जानकारी रखना जरूरी है.
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        <pubDate>Sun, 26 Jul 2026 08:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>Jio का नया Freedom Plan लॉन्च! कीमत इतनी कम कि देखकर रह जाएंगे हैरान, जानिए क्या हैं बेनिफिट्स</title>
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        <description><![CDATA[ Jio का नया Freedom Plan लॉन्च! कीमत इतनी कम कि देखकर रह जाएंगे हैरान, जानिए क्या हैं बेनिफिट्स ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 25 Jul 2026 16:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>Piyush Goyal Deepfake Video: CJP प्रोटेस्ट पर अब केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल का AI Deepfake Video वायरल, ऐसे करें पहचान</title>
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        <description><![CDATA[ Piyush Goyal on Deepfake Video : सोशल मीडिया पर इन दिनों एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल को कथित तौर पर विवादित बयान देते हुए दिखाया जा रहा है. हालांकि केंद्रीय मंत्री ने इस वीडियो को पूरी तरह फर्जी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से तैयार किया गया डीपफेक बताया है. उन्होंने कहा कि उनके असली बयान के साथ छेड़छाड़ कर लोगों को गुमराह करने की कोशिश की गई है. इस मामले में पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई है और एफआईआर भी दर्ज हो चुकी है. वहीं प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) ने भी इस वीडियो को फर्जी करार दिया है. ऐसे में आइए जानते हैं कि पूरा मामला क्या है और डीपफेक वीडियो की पहचान कैसे की जा सकती है.&amp;nbsp;
पीयूष गोयल ने वीडियो को बताया AI से बना डीपफेक
केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा कि संसद के बाहर मीडिया से हुई उनकी बातचीत वाले वीडियो को जानबूझकर एडिट किया गया और AI की मदद से डीपफेक वीडियो तैयार कर सोशल मीडिया पर फैलाया गया. उनका कहना है कि इसका मकसद लोगों के बीच गलत जानकारी फैलाना और उन्हें गुमराह करना है. उन्होंने कहा कि इस तरह की भ्रामक सामग्री लोकतांत्रिक संवाद को भी नुकसान पहुंचाती है.
पीयूष गोयल ने बताया कि उन्होंने इस मामले में पुलिस शिकायत दर्ज करा दी है. उनके अनुसार, 25 जुलाई 2026 को सुबह 4:35 बजे नई दिल्ली के चाणक्यपुरी पुलिस स्टेशन में एफआईआर नंबर 123/26 दर्ज की गई. उन्होंने साफ कहा कि इस फर्जी वीडियो को बनाने, सोशल मीडिया पर फैलाने या जानबूझकर उसे बढ़ावा देने वाले सभी लोगों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी.&amp;nbsp;
PIB ने भी वीडियो को बताया फर्जी
प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) की फैक्ट चेक यूनिट ने भी वायरल वीडियो को पूरी तरह फर्जी बताया है. PIB के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल के AI से तैयार किए गए वीडियो सोशल मीडिया पर गलत जानकारी फैलाने के उद्देश्य से शेयर किए जा रहे हैं. यूनिट का कहना है कि इन वीडियो में ऑडियो और विजुअल दोनों के साथ छेड़छाड़ की गई है. PIB ने यह भी कहा कि इन वीडियो को पाकिस्तानी प्रोपेगैंडा नेटवर्क से जुड़े हैंडल्स द्वारा सोशल मीडिया पर बढ़ावा दिया जा रहा है. इन वीडियो में प्रधानमंत्री मोदी के पेपर लीक पर दिए गए बयान और संसद के बाहर पीयूष गोयल की मीडिया से बातचीत को डिजिटल तरीके से बदलकर अलग संदर्भ में पेश किया गया.&amp;nbsp;
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Deepfake क्या होता है और यह क्यों खतरनाक है?
डीपफेक AI की ऐसी तकनीक है, जिसकी मदद से किसी व्यक्ति के चेहरे, आवाज और हाव-भाव की नकल करके नकली वीडियो या ऑडियो तैयार किया जाता है. ऐसे वीडियो देखने में बिल्कुल असली लग सकते हैं, इसलिए कई लोग बिना जांच किए उन पर भरोसा कर लेते हैं. इसका इस्तेमाल गलत जानकारी फैलाने, राजनीतिक प्रचार, साइबर फ्रॉड और लोगों को गुमराह करने के लिए भी किया जा सकता है.&amp;nbsp;
डीपफेक वीडियो की पहचान कैसे करें?
1. चेहरे और हाव-भाव पर ध्यान दें - डीपफेक वीडियो में कई बार आंखों की झपक, होंठों की हरकत और चेहरे की लाइटिंग असामान्य दिखाई देती है. चेहरे के किनारों पर धुंधलापन या एक्सप्रेशन भी असली जैसे नहीं लगते हैं.&amp;nbsp;
2. आवाज और लिप-सिंक जांचें - अगर वीडियो में होंठों की हरकत और आवाज एक-दूसरे से मेल नहीं खा रही हो या आवाज जरूरत से ज्यादा रोबोटिक या अजीब लगे, तो यह डीपफेक होने का संकेत हो सकता है.&amp;nbsp;
3. वीडियो का स्रोस जरूर जांचें - किसी भी वायरल वीडियो पर भरोसा करने या उसे शेयर करने से पहले देखें कि वह किसी आधिकारिक अकाउंट से आया है या नहीं, जरूरत पड़ने पर गूगल या रिवर्स इमेज सर्च से भी पुष्टि करें.&amp;nbsp;
4. AI डिटेक्शन टूल्स की मदद लें - ऑनलाइन उपलब्ध AI डिटेक्शन टूल्स वीडियो और तस्वीरों में एडिटिंग, मेटाडेटा और पिक्सल पैटर्न की जांच करके फर्जी कंटेंट की पहचान करने में मदद कर सकते हैं. हालांकि, इनका रिजल्ट हमेशा 100 प्रतिशत सटीक नहीं होता है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Sat, 25 Jul 2026 16:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>5kW का Solar Panel एक दिन में कितनी बिजली बनाता है? जानिए इससे घर के कौन&amp;कौन से डिवाइस चल सकेंगे</title>
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        <description><![CDATA[ 5kW का Solar Panel एक दिन में कितनी बिजली बनाता है? जानिए इससे घर के कौन-कौन से डिवाइस चल सकेंगे ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 25 Jul 2026 16:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>हमेशा सफेद रंग का ही क्यों होता है AC? जानिए क्या है इसके पीछे की बड़ी वजह</title>
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        <description><![CDATA[ Tech Tips: आज कल एयर कंडिशनर लोगों की जरूरत बन चुके हैं. गर्मी से बचने के लिए लोग अब घरों में एसी का इस्तेमाल करते हैं. इसके अलावा एसी अब ज्यादातर ऑफिस, मॉल और दूसरे जरूरी जगहों पर भी इस्तेमाल होने लगा है. लेकिन ज्यादातर लोग इस बात पर गौर नहीं करते हैं कि आखिर हमेशा एसी सफेद रंग का ही क्यों होता है. आइए जानते हैं क्या है इसके पीछे की वजह.
सफेद रंग का क्या है राज
आपको बता दें कि सफेद रंग की सबसे बड़ी खासियत ये है कि ये सूर्य की रौशनी और गर्मी को काफी हद तक रिफ्लेक्ट कर देता है. इसके विपरीत काले या गहरे रंग ज्यादा गर्मी सोखते हैं. खासकर स्प्लिट AC की आउटडोर यूनिट लगातार धूप में रहती है. अगर उसका रंग गहरा हो तो वो ज्यादा गर्म होगी और कूलिंग पर असर पड़ सकता है. सफेद रंग इस समस्या को काफी हद तक कम करता है.
कम गर्म होने से बेहतर रहती है परफॉर्मेंस
जानकारी के मुताबिक, जब AC की बाहरी बॉडी कम गर्म होती है तो उसके अंदर मौजूद इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स और कंप्रेसर पर एक्सट्रा टेंपरेचर का दबाव कम पड़ता है. इससे मशीन की काम करने की ताकत अच्छी बनी रहती है और लंबे समय तक अच्छी कूलिंग मिलती है. यही वजह है कि एसी बनाने वाली कंपनी सफेद रंग पर ज्यादा जोर देती है.
इंटीरियर के साथ हो जाता है मैच
बता दें कि ज्यादातर घरों और ऑफिसों की दीवारें हल्के रंग की होती हैं जिससे सफेद रंग का एसी उससे मैच हो जाता है और डिजाइन भी फिट बैठती है. सफेद रंग का AC लगभग हर तरह के इंटीरियर में आसानी से फिट हो जाता है और देखने में भी ज्यादा आकर्षक लगता है. यही कारण है कि कंपनियां ऐसे रंग को चुनती हैं जो हर यूजर को पसंद भी आती हैं.
बनाने की लागत भी होती है कम
सफेद रंग का प्लास्टिक तैयार करना और उसका बड़े पैमाने पर प्रोडक्टिविटी करना भी आसान और किफायती होता है. एक ही रंग में ज्यादा संख्या में यूनिट तैयार करने से मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट भी कम रहती है. यही वजह है कि एसी बनाने वाली कंपनियां सफेद रंग को ज्यादा तवज्जों देती है. इसके अलावा सफेद रंग का एसी दिखने में भी अच्छा लगता है और लागत भी कम होती है.
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        <pubDate>Sat, 25 Jul 2026 16:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>WhatsApp का बड़ा धमाका! इन यूजर्स को मिले इतने सारे धांसू फीचर्स, PDF एडिटिंग भी है शामिल</title>
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        <description><![CDATA[ WhatsApp: व्हाट्सऐप आज के समय में सबसे चर्चित मैसेजिंग प्लेटफॉर्म है. इस ऐप में यूजर्स को कई सारे एडवांस फीचर्स देखने को मिल जाते हैं जिसकी मदद से चैटिंग का एक्सपीरिएंस बेहतर होता है. इसी कड़ी में अब व्हाट्सऐप ने कई और नए फीचर्स पेश किए हैं. इस नए अपडेट में अब iPad पर बिना फोन के WhatsApp अकाउंट बनाने का फीचर, Android Auto और Apple CarPlay के लिए नया इंटरफेस, PDF फाइल देखने और एडिट करने के टूल्स जैसे फीचर्स शामिल हैं.
किन यूजर्स को मिलेगी सुविधा
आपको बता दें कि व्हाट्सऐप के अनुसार, ये फीचर धीरे-धीरे पूरी दुनियाभर के यूजर्स के लिए रोलआउट किया जाएगा. इसके अलावा इस अपडेट की सबसे बड़ी खास बात ये है कि अब iPad यूजर्स के लिए नया साइन-अप करना भी काफी आसान हो जाएगा.
इस नए अपडेट के बाद यूजर iPad ऐप में ही नया अकाउंट बना सकेंगे. यानी यूजर्स बिना किसी दूसरे फोन से पेयर किए सीधे iPad से WhatsApp अकाउंट सेटअप कर सकते हैं.
एडिट करें PDF फाइल
इस नए अपडेट में डॉक्यूमेंट से जुड़े फीचर्स भी लगातार जोड़े जा रहे हैं. नए अपडेट के बाद WhatsApp Web और Desktop यूजर्स चैट में आई PDF फाइल को बिना डाउनलोड किए सीधे खोल सकेंगे. इसके अलावा यूजर्स PDF डॉक्यूमेंट में जरूरी हिस्सों को हाईलाइट कर सकेंगे और नोट्स या एनोटेशन भी जोड़ पाएंगे.
कंपनी के अनुसार, ये फीचर Adobe Acrobat टेक्नोलॉजी की मदद से काम करती है. इसीलिए इस नए अपडेट के बाद व्हाट्सऐप चलाने का एक्सपीरिएंस यूजर्स का काफी बेहतर होने वाला है. साथ ही ये आईपैड यूजर्स के लिए एक बड़ा अपडेट माना जा रहा है जिससे अब कई सारे काम आसान हो जाएंगे.
Android Auto का भी बदला एक्सपीरिएंस
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि WhatsApp ने कार में इस्तेमाल किए जाने वाले अपने फीचर को भी बेहतर बनाया है. नए अपडेट के बाद Android Auto और Apple CarPlay पर WhatsApp का इंटरफेस पहले से ज्यादा बेहतर लगेगा.
इसके अलावा अब ड्राइविंग के दौरान यूजर्स बिना हाथ लगाए मैसेज सुन और उनका जवाब दे सकेंगे. इतना ही नहीं, इस नए अपडेट में यूजर्स वॉयस कॉल कर पाएंगे, कॉल हिस्ट्री देख पाएंगे और अपने पसंदीदा कॉन्टैक्ट्स तक कार के इंफोटेनमेंट सिस्टम से सीधे पहुंच सकेंगे.
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        <pubDate>Sat, 25 Jul 2026 16:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>झटका खाने के लिए तैयार रहें आईफोन लवर्स! अगले महीने से इतनी बढ़ सकती है कीमत</title>
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        <description><![CDATA[ iPhone 17 Price: ऐप्पल ने कुछ दिन पहले आईपैड और मैकबुक आदि प्रोडक्ट्स के दाम बढ़ाए थे. तब से कयास लगाए जा रहे हैं कि आईफोन की भी बारी आ सकती है. अब रिपोर्ट में दावा किया जा रहा है कि अगस्त में आईफोन 17 सीरीज के दाम बढ़ सकते हैं. अगर यह दावा सच साबित होता है तो अगले महीने से आपको नया आईफोन लेने के लिए ज्यादा पैसे चुकाने पड़ेंगे. यह भी लगभग तय हो चुका है कि आईफोन 18 सीरीज के मॉडल्स भी बढ़ी हुई कीमतों पर लॉन्च होंगे.
कितने बढ़ सकते हैं आईफोन 17 सीरीज के दाम?
टिपस्टर अभिषेक यादव ने दावा किया है कि ऐप्पल ने iPlanet डीलर्स को जानकारी दी है कि अगस्त के पहले हफ्ते से आईफोन 17 की शुरुआती कीमत बढ़कर 94,990 रुपये हो सकती है. अभी यह मॉडल 82,900 रुपये में बिक रहा है. यानी कीमत में 12,000 रुपये का इजाफा हो सकता है. हालांकि, अभी तक ऐप्पल की तरफ से इसकी पुष्टि नहीं की गई है. इसी तरह आईफोन 17 प्रो और प्रो मैक्स की कीमत में भी लगभग इतनी ही बढ़ोतरी होने की बात कही जा रही है. बता दें कि स्टोरेज और मेमोरी चिप्स के कारण इनकी कीमतें बढ़ गई हैं और कंपनियों के लिए फोन बनाना महंगा हो गया है. कंपनियां अपना खर्च पूरा करने के लिए फोन की कीमतें बढ़ाती जा रही हैं. जापान में आईफोन पहले ही महंगे हो गए हैं और अब भारत में ऐसा होने के कयास लगाए जा रहे हैं.
धड़ाधड़ बिक्री से स्टॉक की कमी
ऐप्पल ने जब से अपने बाकी प्रोडक्ट्स महंगे किए हैं, तब से आईफोन 17 की बिक्री बढ़ गई है. दाम बढ़ने की संभावना देखते हुए लोग बिना डिस्काउंट के भी इस आईफोन को धड़ाधड़ खरीद रहे हैं. ऑनलाइन के साथ-साथ ऑफलाइन स्टोर्स पर भी इसकी डिमांड बढ़ गई थी. इस वजह से स्टॉक खाली हो गया था. अब ऐप्पल ने बताया है कि अगले वीकेंड तक आईफोन का नया स्टॉक पहुंच जाएगा.&amp;nbsp;
बाकी कंपनियां भी बढ़ा चुकी हैं दाम
इस साल स्मार्टफोन की कीमतों में लगातार इजाफा हो रहा है. सैमसंग, नथिंग, वनप्लस, रिलयमी, वीवो और ओप्पो समेत लगभग सभी कंपनियां अपने मॉडल के दाम बढ़ा चुकी हैं. जून में आई एक रिपोर्ट में बताया गया था कि 2025 में 47 मॉडल्स के दाम बढ़े और 44 के कम हुए थे. इस साल यह ट्रेंड ही बदल गया है. इस साल 79 मॉडल महंगे हुए हैं, जबकि केवल 18 की कीमतें कम हुई हैं.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Sat, 25 Jul 2026 04:30:15 +0530</pubDate>
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        <title>क्या Aadhaar से हो रही है जंतर मंतर के प्रोटेस्टर की पहचान? AI सर्विलांस पर खड़े हुए सवाल</title>
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        <description><![CDATA[ Facial Recognition At Jantar Mantar: दिल्ली के जंतर मंतर पर जारी कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रोटेस्ट में शामिल लोगों की पहचान करने के लिए दिल्ली पुलिस पर एडवांस टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल करने के आरोप लग रहे हैं. सोशल मीडिया पर शेयर हो रहे वीडियो में दावा किया जा रहा है कि दिल्ली पुलिस एआई-पावर्ड फेशियल रिकग्नेशन टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर प्रदर्शनकारियों की पहचान कर रही है. CJP ने भी एक्स पर एक वीडियो शेयर कर कहा है कि दिल्ली पुलिस ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे लोगों को लाइव स्कैन करने के लिए फेशियल रिकग्नेशन वैन खड़ी की है. ये मौके पर बायोमेट्रिक और पर्सनल डेटा निकाल रही है.
क्या आधार से निकाला जा रहा है डेटा?
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में आधार से डेटा निकालने की बात नहीं आई है, लेकिन कई यूजर्स ने इसे लेकर सवाल उठाए हैं. उन्होंने पूछा है कि क्या ये आधार या किसी दूसरे सरकारी डेटाबेस से कनेक्टेड है. अभी तक पुलिस की तरफ से भी इसे लेकर कोई जवाब नहीं आया है. पुलिस की तरफ से की जा रही मॉनिटरिंग का वीडियो आप नीचे देख सकते हैं.

???? JANTAR MANTAR IS A PROTEST SITE, NOT A DIGITAL OPEN-AIR PRISON! ????Delhi Police has stationed Facial Recognition Vans to live-scan peaceful protesters. They are harvesting biometrics and extracting personal data on the spot&amp;mdash;and we have three direct questions for the&amp;hellip; pic.twitter.com/zCcLg3uxOE
&amp;mdash; Cockroach is Back (@Cockroachisback) July 23, 2026



प्रोटेस्ट साइट पर खड़ी की गई हैं दो वैन
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शनस्थल के नजदीक दो मॉनिटरिंग वैन को तैनात किया है. एक में जंतर मंतर के आसपास लगाए गए सीसीटीवी कैमरा से लाइव फीड आ रहा है, जबकि दूसरी वन में एआई से उन वीडियो को एनलाइज और कैमरा पर कैप्चर हुए लोगों के चेहरे पुलिस के डेटाबेस से कंपेयर किए जा रहे हैं. अधिकारियों ने इसके जरिए प्रदर्शनकारियों की पहचान करने की बात नकारते हुए कहा कि यह इसलिए किया जा रहा है ताकि अगर भीड़ में कोई क्रिमिनल रिकॉर्ड वाला चेहरा दिखता है तो पुलिस को अलर्ट किया जा सके.&amp;nbsp;
लगातार मॉनिटरिंग से प्रदर्शनकारियों में डर
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, प्रदर्शनस्थल पर हो रही पुलिस की लगातार मॉनिटरिंग से लोगों में डर बैठ गया है. प्रदर्शन में शामिल होने आए लोगों का कहना है कि हर जगह कैमरे देखकर वो असहज हो रहे हैं. कुछ लोगों ने कैमरों में कैप्चर होने से बचने के लिए खुद के फेस कवर करने भी शुरू कर दिए हैं. दूसरी तरफ CJP ने भी सवाल उठाया है कि पुलिस किस कानून के तहत मास-स्कैनिंग कर रही है और इसके लिए डेटाबेस कहां से आ रहा है. CJP ने यह भी पूछा है कि फेशियल स्कैन को स्टोर कौन कर रहा है इस डेटा को कब तक रखा जाएगा?
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        <pubDate>Sat, 25 Jul 2026 04:30:14 +0530</pubDate>
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        <title>मेटा ग्लासेस से रिकॉर्ड कंटेट डालने वालों की खैर नहीं, इंस्टाग्राम लेगा यह एक्शन</title>
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        <description><![CDATA[ Instagram Meta Glasses Content: मेटा ग्लासेस से रिकॉर्ड किए गए कंटेट को लेकर अब इंस्टाग्राम सख्ती बरतने जा रही है. दरअसल, कई क्रिएटर मेटा ग्लासेस का यूज करते हुए लोगों की सहमति के बिना उनके वीडियो रिकॉर्ड कर सोशल मीडिया पर पोस्ट कर रहे हैं. ऐसे कंटेट को लेकर खूब विवाद हुआ था. इसे देखते हुए इंस्टाग्राम ने बड़ा फैसला लिया है. अब अगर कोई लोगों की सहमति के बिना उनका वीडियो रिकॉर्ड कर इस प्लेटफॉर्म पर पोस्ट करेगा तो उस कंटेट को हटा दिया जाएगा. खुद इंस्टाग्राम के हेड एडम मोस्सेरी ने इसका ऐलान किया है.&amp;nbsp;
इंस्टाग्राम लेगी यह एक्शन
मोस्सेरी ने कहा कि अगर आप लोगों का फायदा उठाते हुए या उन्हें हैरेस करते हुए कंटेट को पोस्ट करेंगे तो उसे हटा दिया जाएगा. हम नहीं चाहते कि लोग चोरी-छिपे दूसरों के वीडियो बनाएं, उन्हें परेशान करें और फिर उन वीडियो को हमारे प्लेटफॉर्म पर पोस्ट करें. इसलिए हम हरसंभव तरीके से ऐसी एक्टिविटीज को रोकने की कोशिश कर रहे हैं. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ऐसे वीडियो पोस्ट करने वाले दो अकाउंट्स को पहले ही हटाया जा चुका है. इन पर लोगों को परेशान करने वाले कंटेट पोस्ट करने का आरोप था. कंपनी ने भी इन अकाउंट्स को हटाने की पुष्टि की है.
मेटा ग्लासेस से चोरी छिपे कंटेट रिकॉर्ड करना होगा मुश्किल
दूसरी तरफ मेटा भी अपने स्मार्टग्लासेस की मदद से चोरी-छिपे वीडियो रिकॉर्ड करने को मुश्किल बनाने के लिए नए सुरक्षा उपाय लाने पर काम कर रही है. कुछ पुराने मॉडल में रिकॉर्डिंग इंडिकेटर लाइट को मॉडिफाई या कवर किया जा सकता था, जिससे लोगों को यह पता नहीं चलता था कि स्मार्टग्लासेस से उनकी वीडियो रिकॉर्ड हो रही है. अब मेटा सॉफ्टवेयर अपडेट लेकर आई है. इसके बाद अगर सिस्टम को लगता है कि इंडिकेटर लाइट को कवर किया गया है तो कैमरा अपने आप डिसेबल हो जाएगा. हालांकि, इसके बावजूद प्राइवेसी को लेकर चिंता खत्म नहीं हो रही है. पब्लिक प्लेसेस या दिन के समय स्मार्टग्लासेस पर लगी LED लाइट आसानी से नजर नहीं आती, जिससे यह पता नहीं चल पाता कि वीडियो रिकॉर्डिंग ऑन है या ऑफ.&amp;nbsp;
इंस्टाग्राम पर आया है यह नया फीचर
हाल ही में इंस्टाग्राम ने रिप्लेस ऑडियो नाम से एक नया फीचर रोल आउट किया है. इसकी मदद से आप अपनी पुरानी रील्स में गाने और साउंड चेंज कर पाएंगे. अभी तक ऐसा करने के लिए रील्स को डिलीट करना पड़ता था और फिर इसमें नया गाना एड करने का ऑप्शन मिलता था. अब यह बदल गया है और नए फीचर से पुरानी रील्स में गाने चेंज किए जा सकते हैं.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Sat, 25 Jul 2026 04:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>On&amp;Grid Solar Inverter खरीदने से पहले पता होनी चाहिए ये बातें, वरना पैसे हो जाएंगे बर्बाद</title>
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        <description><![CDATA[ On-Grid Solar Inverter Buying Guide: सोलर एनर्जी सिस्टम लगवाते समय सोलर पैनल के साथ-साथ इन्वर्टर की क्वालिटी का भी ध्यान रखना जरूरी है. इससे पूरे सिस्टम की एफिशिएंसी पर असर पड़ता है. अगर इन्वर्टर की जरूरत की बात करें तो यह सोलर पैनल से आने वाली DC इलेक्ट्रिसिटी को AC में कन्वर्ट करता है, जिससे यह घर में यूज करने लायक बन जाती है. इसलिए इन्वर्टर का अच्छी क्वालिटी का होना जरूरी है. अगर आप अपने ऑन-ग्रिड सोलर सिस्टम के लिए इन्वर्टर खरीदने जा रहे हैं तो नीचे लिखें बातों का ध्यान जरूर रखें.
On-Grid Solar Inverter में होने चाहिए ये फीचर्स

हाई एफिशिएंसी- इन्वर्टर की एफिशिएंसी बताती है कि कितनी सोलर एनर्जी को इलेक्ट्रिसिटी में बदला गया है. ज्यादातर हाई-एंड इन्वर्टर में 97 प्रतिशत तक की एफिशिएंसी मिलती है.
मैक्सिमम पावर आउटपुट- Maximum Power Point Tracking (MPPT) की मदद से इन्वर्टर को सोलर पैनल से मैक्सिम एनर्जी लेने में मदद मिलती है. दिन में मौसम भले ही कैसा हो, यह फीचर इन्वर्टर को मैक्सिमम एनर्जी लेने में हेल्प करता है.
स्मार्ट मॉनिटरिंग- आप जो इन्वर्टर खरीदने जा रहे हैं, उसका मोबाइल ऐप और वेब इंटरफेस होना जरूरी है. इसकी मदद से आप बैठे-बैठे इलेक्ट्रिसिटी जनरेशन, सिस्टम की कंडीशन आदि का ध्यान रख पाएंगे.
सेफ्टी फीचर्स- इन्वर्टर में लाइटनिंग प्रोटेक्शन, हाई-वॉल्टेज प्रोटेक्शन, शॉर्ट-सर्किट प्रोटेक्शन जैसे सेफ्टी फीचर्स होने जरूरी है. इनके बिना आपके पूरे सोलर एनर्जी सिस्टम को नुकसान हो सकता है.

इन्वर्टर खरीदते समय इन बातों का रखें ध्यान

कम कीमत के लालच में आकर खराब क्वालिटी वाला इन्वर्टर न खरीदें.
सोलर पैनल से कम कैपिसिटी वाला इन्वर्टर खरीदने की गलती न करें. सोलर पैनल की मैक्सिमम कैपिसिटी के हिसाब से इन्वर्टर खरीदना चाहिए.
इन्वर्टर खरीदते समय वारंटी और आफ्टर-सेल्स सपोर्ट पर ध्यान देना जरूरी है. यह पता कर ले कि आपके शहर में उसका सर्विस स्टेशन है या नहीं.&amp;nbsp;
बिना BIS सर्टिफिकेशन और सेफ्टी स्टैंडर्ड वाला इन्वर्टर खरीदने से बचना चाहिए. यह भले ही आपको एक बार सस्ता मिल जाए, लेकिन ये आगे चलकर आपको नुकसान में डाल सकता है.
कभी भी सोलर पैनल, इन्वर्टर और दूसरे डिवाइस अनऑथोराइज्ड सेलर से नहीं खरीदने चाहिए. ऑथोराइज्ड डीलर से डिवाइस खरीदने पर आपको उसकी ऑथेंटिक होने की गारंटी मिलती है और आपको टेक्नीकल असिस्टेंस और इस्टॉलिंग में भी मदद मिलनने के चांस रहते हैं.

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        <pubDate>Sat, 25 Jul 2026 04:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>PM Modi Instagram Followers: इस एक वीडियो से इंस्टाग्राम पर छाए पीएम मोदी, 12 घंटे में बढ़े 1.1 मिलियन फॉलोअर्स</title>
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        <description><![CDATA[ मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET-UG में हुई कथित धांधली और पेपर लीक मामले ने पूरे देश में हड़कंप मचा रखा है. सड़कों पर छात्रों का गुस्सा उबाल पर है, लेकिन इसी बीच सोशल मीडिया पर बड़ी हलचल देखने को मिली. दरअसल, यूथ को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने गुरुवार (23 जुलाई) को सोशल मीडिया पर एक वीडियो पोस्ट किया, जिसके बाद इंस्टाग्राम पर महज 12 घंटे में उनके 1.1 मिलियन फॉलोअर्स बढ़ गए. इससे पता चलता है कि सोशल मीडिया पर पीएम मोदी की लोकप्रियता कितनी ज्यादा है और युवा उनकी बात को कितनी बेहतर तरीके से समझते हैं.&amp;nbsp;
पीएम मोदी ने दिया यह संदेश
गौरतलब है कि नीट परीक्षा पेपर लीक मामले में युवाओं की नाराजगी और उत्पात को देखते हुए पीएम मोदी ने एक वीडियो पोस्ट किया. इसमें उन्होंने कहा कि पेपर लीक कोई मामूली विषय नहीं है. लाखों विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों के लिए यह पीड़ादायक है. इस घटना के बाद सरकार ने कई कदम उठाए हैं. गुनहगारों को पकड़ा गया है और आज वे जेल में हैं.&amp;nbsp;
उन्होंने कहा कि सरकार ने इतने कम समय में 22 लाख छात्रों की परीक्षा दोबारा कराने का प्रबंध किया और 19 जून को रिजल्ट भी जारी कर दिया गया. पीएम मोदी ने कहा कि पेपर लीक जैसी घटनाओं से सख्ती से निपटने के लिए उनकी सरकार प्रतिबद्ध है और इसके लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने की तैयारी चल रही है. पीएम ने कहा कि सोमवार को जब संसद का सत्र दोबारा शुरू होगा तो इस बिल को उनकी सरकार जल्द से जल्द पास कराने की कोशिश करेगी, ताकि पेपर लीक जैसी घटनाओं के दोषियों को जल्द से जल्द और कड़ी से कड़ी सजा मिल सके.
यूथ ने दिया तगड़ा रेस्पॉन्स
पीएम मोदी का यह वीडियो जारी होने के बाद इंस्टाग्राम पर उनके फॉलोअर्स की संख्या में काफी तेजी से इजाफा हुआ. जब पीएम ने यह वीडियो पोस्ट किया, उस वक्त 101 मिलियन लोग उन्हें फॉलो कर रहे थे. वहीं, महज 12 घंटे बाद उनके फॉलोअर्स की संख्या 102 मिलियन पहुंच गई. इसके अलावा 15.6 मिलियन लोगों ने इस वीडियो को लाइक किया है, जबकि इस वीडियो को 288 मिलियन व्यूज मिल चुके हैं.&amp;nbsp;
प्रदर्शन में क्या है ताजा अपडेट?
बता दें कि पेपर लीक मामले को लेकर जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी का प्रदर्शन अब भी जारी है, लेकिन मशहूर शिक्षाविद् सोनम वांगचुक ने 26 दिन बाद अपना अनशन खत्म कर दिया है. उधर, मोदी कैबिनेट ने पेपर लीक को लेकर सख्त सजा वाले बिल को मंजूरी दे दी है. माना जा रहा है कि यह बिल अगले हफ्ते संसद में पेश किया जाएगा.
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        <pubDate>Sat, 25 Jul 2026 04:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>फास्ट चार्जर से भी स्लो चार्ज हो रहा है पावर बैंक? ये हो सकते हैं कारण</title>
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        <description><![CDATA[ Power Bank Charging Issue: पावर बैंक एक ऐसी एक्सेसरी है, जो आपको मुश्किल में फंसने से बचा सकती है. पावर बैंक से आप उस जगह अपना फोन चार्ज कर सकते हैं, जहां पावर का कोई सोर्स नहीं होता. अगर आपके पास पावर बैंक है तो आप फोन को बंद होने से पहले ही चार्ज कर पाएंगे. हालांकि, कई बार पावर बैंक को चार्ज करने में दिक्कत आने लगती है. फास्ट चार्जर से चार्ज करने पर भी चार्जिंग स्पीड काफी स्लो रहती है. आज हम आपको इसके कारण बताने जा रहे हैं.
क्यों धीरे चार्ज होता है पावर बैंक?
चार्जर का कंपेटिबल न होना- ज्यादातर लोग कम से कम 10,000mAh की कैपेसिटी वाला पावर बैंक तो रखते ही हैं. कई लोग 20,000mAh और इससे भी ज्यादा की कैपेसिटी वाला पावर बैंक कैरी करते हैं. अगर आप इन्हें फास्ट चार्जर से चार्ज करेंगे तो यह कुछ ही पलों में चार्ज हो जाएंगे, लेकिन अगर आप फोन के साथ आने वाले 5-10W चार्जर यूज करेंगे तो इनकी बैटरी पूरी तरह चार्ज होने में काफी समय लेगी.
गलत USB केबल को यूज करना- अगर आप फास्ट चार्जर यूजर कर रहे हैं और फिर भी पावर बैंक स्लो चार्ज हो रहा है तो USB केबल में कुछ गड़बड़ हो सकती है. अगर आप कम वॉट वाली केबल यूज करेंगे तो भी यह चार्जिंग स्पीड को स्लो कर देगी. इसलिए USB-C to USB-C केबल का यूज करना चाहिए जो 100W तक ट्रांसमिट कर सकती है. बाजार में आपको आसानी से ये केबल कम दामों में मिल जाएगी.
चार्जिंग के दौरान यूज करना- अगर आप पावर बैंक को चार्ज करने के साथ-साथ डिस्चार्ज कर रहे हैं, यानी इससे फोन या कोई दूसरा डिवाइस चार्ज कर रहे हैं तो भी स्पीड स्लो हो सकती है. हालांकि, मॉडर्न पावर बैंक में पास-थ्रू टेक्नोलॉजी आती है, जिससे आप चार्जिंग के साथ-साथ इससे दूसरे डिवाइस भी सुरक्षित तरीके से चार्ज कर सकते हैं. इन पावर बैंक में इसके लिए अलग से सर्किट लगे होते हैं, जो चार्जिंग और डिस्चार्जिंग प्रोसेस को अलग-अलग कर देते हैं.
चार्जिंग पोर्ट में खराबी- बाकी सारी चीजें ठीक होने के बाद भी चार्जिंग स्पीड बढ़ नहीं रही है तो पावर बैंक के चार्जिंग पोर्ट में कोई गड़बड़ हो सकती है. कई बार USB साफ न करने पर इनमें कचरा जमा हो जाता है. उमस और पसीने से भी पोर्ट ऑक्सीडाइज हो जाते हैं, जो केबल को पोर्ट से ठीक तरीके से कनेक्ट नहीं होने देते. इसलिए पोर्ट को साफ कर आप चार्जिंग स्पीड को बढ़ा सकते हैं.
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        <pubDate>Fri, 24 Jul 2026 12:30:14 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>फास्ट, चार्जर, से, भी, स्लो, चार्ज, हो, रहा, है, पावर, बैंक, ये, हो, सकते, हैं, कारण</media:keywords>
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        <title>मधुमक्खी के छत्ते से आया आइडिया लाएगा क्रांति! सोलर पैनल की परफॉर्मेंस हुई जबरदस्त</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/मधुमक्खी-के-छत्ते-से-आया-आइडिया-लाएगा-क्रांति-सोलर-पैनल-की-परफॉर्मेंस-हुई-जबरदस्त</link>
        <guid>https://hindi.attentionindia.com/मधुमक्खी-के-छत्ते-से-आया-आइडिया-लाएगा-क्रांति-सोलर-पैनल-की-परफॉर्मेंस-हुई-जबरदस्त</guid>
        <description><![CDATA[ Solar Panel Technology: मधुमक्खी के छत्ते से आइडिया लेकर वैज्ञानिक सोलर टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में क्रांति लाने की तैयारी कर रहे हैं. वैज्ञानिकों ने मधुमक्खियों के छत्ते की तरह स्ट्रक्चर वाले नए सोलर पैनल तैयार किए हैं, जो फ्लैट डिजाइन वाले पैनल की तुलना में ज्यादा सनलाइट कैप्चर कर सकते हैं. ज्यादा सनलाइट कैप्चर होने का मतलब है कि पैनल ज्यादा बिजली जनरेट कर पाएंगे. यह नया डिजाइन सोलर पैनल की सबसे बड़ी लिमिटेशन को दूर कर सकता है.
नए डिजाइन का क्या फायदा होगा?
अभी सोलर पैनल का सरफेस एकदम फ्लैट होता है और ये तभी पूरी क्षमता के साथ काम कर पाते हैं, जब सूरज बिल्कुल इनके ऊपर होता है. जैसे ही सूरज का एंगल थोड़ा बदलता है, इन पर पड़ने वाली ज्यादातर सनलाइट एनर्जी में कन्वर्ट होने की बजाय रिफ्लेक्ट हो जाती है. नए डिजाइन वाले पैनल में यह झंझट नहीं रहेगा. ये सूरज के बिल्कुल ऊपर न होने पर भी पूरी क्षमता के साथ काम कर पाएंगे. अगर यह डिजाइन लैब से निकलकर मार्केट में आता है तो सोलर इंस्टॉलेशन की पूरी तस्वीर ही बदल जाएगी. नए स्ट्रक्चर वाले पैनल को कर्व्ड बिल्डिंग्स के साथ-साथ वाहनों पर भी इंस्टॉल किया जा सकेगा.
कैसे काम करेंगे नए पैनल?
वैज्ञानिकों ने मधुमक्खियों से इंस्पिरेशन लेते हुए एक 3D कॉन्केव सोलर पैनल बनाया है, जिसकी स्ट्रक्चर एक हनीकॉम्ब जैसी है. इसका फायदा यह होगा कि पैनल पर आने वाली लाइट सरफेस पर पड़ते ही रिफ्लेक्ट होने की बजाय पैनल की एंगल्ड वॉल्स के बीच ही बाउंस होती रहेगी. जब यह एक वॉल से टकराकर दूसरी पर आएगी तो उसे भी इसे सनलाइट से इलेक्ट्रिसिटी में कन्वर्ट करने का मौका मिलेगा. लैब टेस्ट के दौरान नए डिजाइन वाले पैनल ने फ्लैट पैनल की तुलना में 142.3 प्रतिशत ज्यादा आउटपुट दिया है. इसके अलावा जब सूरज पैनल के बिल्कुल ऊपर आ जाएगा तो इनकी पावर जनरेशन कैपेबिलिटी लगभग 37 प्रतिशत और बढ़ जाएगी.&amp;nbsp;
फ्लेक्सिबल भी होंगे नए पैनल
मौजूदा पैनल काफी रिजिड होते हैं और इन्हें मोड़ा नहीं जा सकता. इस कमी को दूर करने के लिए वैज्ञानिकों ने नए पैनल में पॉलीमर मेटामैटेरियल का इस्तेमाल किया है, जिससे इनमें फ्लेक्सिबिलिटी आई है. इस फ्लेक्सिबिलिटी के कारण इन्हें कर्व्ड बिल्डिंग, इलेक्ट्रिक व्हीकल और एयरोस्पेस इक्विपमेंट समेत उन जगहों पर भी इंस्टॉल किया जा सकेगा, जहां फ्लैट पैनल नहीं लगाए जा सकते. हालांकि, अभी ये पैनल कॉन्सेप्ट के तौर पर ही डेवलप किए जा रहे हैं. मार्केट में पहुंचने से पहले इनकी बड़े लेवल पर टेस्टिंग जरूरी होगी. उसके नतीजों से यह साफ होगा कि ये पैनल कॉन्सेप्ट से निकल रियल वर्ल्ड में यूज हो पाएंगे या नहीं.
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        <pubDate>Fri, 24 Jul 2026 12:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>अब Samsung भी देने लगी Silicon&amp;Carbon बैटरी, जानिए क्यों मची है इस नई टेक्नोलॉजी की धूम</title>
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        <description><![CDATA[ Samsung Silicon-Carbon Battery: सैमसंग ने हाल ही में अपने Galaxy फोल्डेबल फोन लॉन्च किए थे. इनमें कंपनी ने पहली बार सिलिकॉन-कार्बन बैटरी का इस्तेमाल किया है. इसका मतलब है कि Galaxy Z Fold 8 Ultra, Galaxy Z Fold 8 और Galaxy Z Flip 8 में लिथियम-आयन की जगह सिलिकॉन-कार्बन बैटरी दी गई है. बता दें कि कई कंपनियां पहले से ही इस बैटरी टेक्नोलॉजी को यूज कर रही थी और अब सैमसंग ने भी इस लिस्ट में अपना नाम दर्ज करवा दिया है. सिलिकॉन-कार्बन बैटरी कम स्पेस में ज्यादा एनर्जी स्टोर कर सकती है. इसलिए कंपनियां स्मार्टफोन का साइज बड़ा किए बिना उनमें ज्यादा कैपेसिटी वाले बैटरी पैक देने लगी हैं.
क्या होती है सिलिकॉन-कार्बन बैटरी?
सिलिकॉन-कार्बन बैटरी नई तरह की बैटरी सेल है, जो सिलिकॉन एनोड्स के साथ आती है, जबकि लिथियम-आयन बैटरी में ग्रेफाइट एनोड लगे होते हैं. सिलिकॉन बैटरी की एनर्जी डेन्सिटी ज्यादा होती है, जिसका मतलब है कि यह कम स्पेस में ज्यादा एनर्जी स्टोर कर सकती है. लिथियम बैटरी की एनर्जी डेन्सिटी 250-300 Wh/kg ग्राम होती है, जबकि सिलिकॉन-कार्बन बैटरी 400-500 Wh/kg रेंज के साथ आती है.
सैमसंग ने ऐसे उठाया फायदा
सैमसंग ने अपने सबसे प्रीमियम फोन Z Fold 8 Ultra में इस टेक्नोलॉजी का फायदा उठाया है. इसमें 5,000mAh की बैटरी दी गई है, जो इसके पुराने मॉडल Galaxy Z Fold 7 में मिलने वाली 4,400mAh की बैटरी से 600mAh बड़ी है. यानी बैटरी कैपेसिटी में 14 प्रतिशत का इजाफा हुआ है, जबकि कंपनी ने इस मॉडल की थिकनेस 4.2mm से घटाकर 4.1mm कर दी है और दोनों मॉडल में एक समान 215 ग्राम वजन है. यानी सैमसंग ने फोन का वजन और थिकनेस बढ़ाए बिना सिलिकॉन-कार्बन बैटरी की मदद से कैपेसिटी को बढ़ा दिया है. कंपनी ने यह भी कहा है कि उसने बैटरी की परफॉर्मेंस, लॉन्जेविटी और सेफ्टी का पूरा ध्यान रखा है.
बाकी मॉडल्स की बैटरी कैपेसिटी कितनी है?
Fold 8 Ultra में जहां 5,000mAh की बैटरी है, वहीं Fold 8 में 4,800mAh और Flip 8 में 4,300mAh का बैटरी पैक लगा हुआ है. ये अपने पुराने मॉडल से बड़ी बैटरी के साथ आए हैं, लेकिन कैपेसिटी के मामले में ऑनर और मोटोरोला जैसी कंपनियां 6,000mAh का आंकड़ा पार कर चुकी है. माना जा रहा है कि गैलेक्सी फोल्डेबल फोन में सिलिकॉन-बैटरी देना सैमसंग की शुरुआत भर है. आगे चलकर कंपनी इस बैटरी में सिलिकॉन पर्सेंटेज को बढ़ा सकती है और दूसरी कंपनियों की तरह बड़ी बैटरियों वाले मॉडल बाजार में उतारेगी.
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        <pubDate>Fri, 24 Jul 2026 12:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>BlackBerry ने क्यों बंद कर दिए थे फोन बनाने और अब क्या कर रही है? सब चल गया पता</title>
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        <description><![CDATA[ Why BlackBerry Stopped Making Phone: एक समय था, जब स्मार्टफोन मार्केट में BlackBerry का दबदबा होता था. उसके बाद एंड्रॉयड और आईफोन की एंट्री होती है और यह कंपनी मार्केट से ही गायब हो जाती है. अब न सिर्फ कंपनी ने फोन बनाने बंद कर दिए हैं बल्कि कंज्यूमर मार्केट से ही बाहर निकल गई है. अब BlackBerry साइबर सिक्योरिटी के फील्ड में काम करती है और अलग-अलग इंडस्ट्रीज के लिए QNX नाम से रियल-टाइम ऑपरेटिंग सिस्टम सप्लाई करती है. आइए जानते हैं कि स्मार्टफोन मार्केट में BlackBerry की एंट्री कैसे हुई, इसने कैसे अपना दबदबा बनाया और क्यों इसे अलविदा कहकर जाना पड़ा.
Pearl 8100 से मिली BlackBerry को पहचान
BlackBerry की शुरुआत एक पेजर कंपनी से हुई थी और Pearl 8100 मॉडल के सहारे उसे फोन मार्केट में अपनी पहचान बनाने का मौका मिला. इसके बाद कंपनी ने Bold और Curve मॉडल लॉन्च किए, जिससे यह ज्यादा लोगों तक पहुंच पाई. BlackBerry Messenger के जरिए फ्री मैसेजिंग सर्विस ने इसे और पॉपुलर बना दिया. आईफोन को टक्कर देने के लिए कंपनी ने 2008 में अपना पहला टचस्क्रीन फोन BlackBerry Storm भी लॉन्च किया था, लेकिन यह कामयाब नहीं हो पाया.
2010 में पीक पर थी BlackBerry&amp;nbsp;
2010 में BlackBerry अपनी पीक पर थी. उस समय अकेले अमेरिका में कंपनी के 2 करोड़ से ज्यादा यूजर्स थे, लेकिन कंपनी अधिक समय तक अपनी जगह बरकरार नहीं रख पाई. 2012 आते-आते अमेरिका में कंपनी के यूजर घटकर एक करोड़ से भी कम हो गए. हालांकि, तब भी दुनियाभर में करीब 8 करोड़ लोग कंपनी के प्रोडक्ट्स यूज कर रहे थे. इंडोनेशिया में कंपनी की पॉपुलैरिटी लगातार बनी हुई थी. 2024 में BlackBerry ने Z3 फोन लाकर अपनी खोई जमीन हासिल करने की कोशिश की. भारत में भी यह फोन लॉन्च किया गया, लेकिन यह आईफोन और एंड्रॉयड को टक्कर नहीं दे पाया. इसके बाद BlackBerry 10, नए ऑपरेटिंग सिस्टम और दूसरे नए डिवाइस भी लॉन्च किए गए, लेकिन कंपनी ने लिए इनमें से किसी ने भी काम नहीं किया.
2011 में ऐप्पल से पिछड़ गई BlackBerry&amp;nbsp;
यूजर्स के मामले में 2011 में BlackBerry पहली बार ऐप्पल से पिछड़ गई थी. यहां से इसके डाउनफॉल की शुरुआत हुई और जो कभी थमा नहीं. 2016 आते-आते अमेरिका के एक प्रतिशत से भी कम यूजर्स BlackBerry यूज कर रहे थे, जबकि iOS का मार्केट शेयर करीब 44 प्रतिशत पहुंच गया था. दूसरी तरफ 2010 में BlackBerry ने QNX सॉफ्टवेयर सिस्टम को खरीदा था. स्मार्टफोन मार्केट में अपना प्रदर्शन देखते हुए कंपनी ने अपना फोकस सॉफ्टवेयर पर शिफ्ट कर लिया. यह आज दुनियाभर में इलेक्ट्रिक कारों में इस्तेमाल किया जाता है. अब कंपनी रोबोटिक्स की तरफ भी अपने कदम बढ़ा रही है.
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        <pubDate>Thu, 23 Jul 2026 20:30:19 +0530</pubDate>
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        <title>अमेरिका को अब AI से आस, वर्षों पुरानी समस्याएं सुलझाने में ली जाएगी मदद</title>
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        <description><![CDATA[ USA AI Investment: लंबे समय से चलती आ रही साइंटिफिक रिसर्च को तेज करने के लिए अमेरिका एआई की तरफ देख रहा है. ट्रंप प्रशासन ने हाल ही में एआई पर 5 बिलियन डॉलर (लगभग 48,250 करोड़ रुपये) के निवेश का ऐलान किया है. इस पैसे को एआई से बीमारियों का इलाज खोजने, नई दवाएं बनाने में तेजी लाने और बिल्डिंग बनाने के लिए मजबूत मैटेरियल बनाने आदि की रिसर्च में इस्तेमाल किया जाएगा. यानी वर्षों से चली आ रही समस्याओं को सुलझाने के लिए अमेरिका ने एआई पर अपनी उम्मीद टिकाई है. गौरतलब है कि एआई आने के बाद साइंटिफिक रिसर्च तेज हुई है और पूरी दुनिया में नई दवाएं बनाने और बीमारियों के इलाज ढूंढने वाले प्रोजेक्ट चल रहे हैं.
वैज्ञानिकों को मिलेंगे एडवांस कंप्यूटिंग रिसोर्सेस
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के चीफ टेक्नोलॉजी एडवाइजर Michael Kratsios ने बताया कि व्हाइट हाउस अलग-अलग डोमेन में काम कर रही एजेंसियों को एक साथ ला रहा है ताकि वो साइंस के लिए काम कर सकें. अधिकारियों के बताया कि इस प्रोग्राम में काम करने वाले वैज्ञानिकों को अमेरिका के डिपार्टमेंट ऑफ एनर्जी के एडवांस्ड कंप्यूटिंग रिसोर्सेस की एक्सेस मिलेंगी. इनमें सुपरकंप्यूटर, स्पेशल एआई टूल्स और सरकारी डेटासेट आदि शामिल हैं. बताया जा रहा है कि इस प्रोग्राम में डिपार्टमेंट ऑफ हेल्थ एंड ह्यूमन, डिपार्टमेंट ऑफ एनर्जी, डिपार्टमेंट ऑफ ट्रांसपोर्टेशन, डिपार्टमेंट ऑफ डिफेंस और डिपार्टमेंट ऑफ इंटीरियर समेत कुल 15 एजेंसियां शामिल होंगी.
सरकारी डेटा से एआई मॉडल को दी जाएगी ट्रेनिंग
इस प्रोग्राम के लिए एआई मॉडल्स को सरकारी डेटासेट से ट्रेनिंग दी जाएगी. गौरतलब है कि अमेरिकी सरकार के पास हेल्थकेयर, केमिकल और क्रिटिकल मिनरल्स समेत कई एरिया से संबंधित बड़ा डेटा सेट है. इस डेटासेट से एआई मॉडल को ट्रेनिंग देकर उनके पैटर्न पहचाने जा सकते हैं, जिस आधार पर अनुमान और सवालों के जवाब पता लगाने आसान हो जाएंगे. अगर एआई को छोड़कर ट्रेडिशनल तरीकों से रिसर्च की जाए तो इसमें काफी समय खर्च हो सकता है. माइक्रोसॉफ्ट ने भी इस प्रोग्राम में हिस्सेदारी का ऐलान किया है.
जुकरबर्ग भी ढूंढ रहे हैं एआई से बीमारियों का इलाज
मेटा के सीईओ मार्क जुकरबर्ग ने कुछ ही समय पहले अपनी पत्नी Priscilla Chan के स्टार्टअप Biohub के एक प्रोजेक्ट पर भारी निवेश किया था. इस प्रोजेक्ट में एआई की मदद से यह समझने की कोशिश की जाएगी कि इंसानी सेल्स कैसे काम करती हैं. अगर इसमें कामयाबी मिलती है तो बीमारियों का इलाज ढूंढना आसान हो जाएगा. मेटा ने इसके लिए 500 मिलियन डॉलर का निवेश किया है. इस पैसे से ऐसे एआई सिस्टम बनाए जाएंगे, जो इंसानी सेल्स की तरह काम करेंगे.
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        <pubDate>Thu, 23 Jul 2026 20:30:18 +0530</pubDate>
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        <title>Apple iPhone 18 Launch Date : कब लॉन्च होगा आईफोन 18? क्या अभी 17 प्रो खरीदना सही या कर लें थोड़ा और इंतजार</title>
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        <description><![CDATA[ Apple iPhone 18 Launch Date : Apple जल्द ही अपना नया iPhone 18 Pro लॉन्च कर सकता है. वहीं अभी iPhone 17 Pro पर शानदार डिस्काउंट मिल रहा है, जिससे इसे पहले के मुकाबले काफी कम कीमत में खरीदा जा सकता है. भारत में यह फोन 1,34,900 रुपये की शुरुआती कीमत पर लॉन्च हुआ था, लेकिन फिलहाल इस पर 9 हजार रुपये से ज्यादा तक की बचत का मौका है. ऐसे में अगर आप भी नया iPhone खरीदने की प्लानिंग कर रहे हैं तो इस समय सबसे बड़ा सवाल यही है कि अभी iPhone 17 Pro खरीदा जाए या फिर आने वाले iPhone 18 Pro का इंतजार किया जाए.
एक तरफ मौजूदा iPhone 17 Pro पर हजारों रुपये का डिस्काउंट मिल रहा है, वहीं दूसरी तरफ iPhone 18 Pro को लेकर कई लीक्स और रिपोर्ट्स सामने आ चुकी हैं, जिनमें इसके प्रोसेसर, कैमरा, AI फीचर्स और डिजाइन से जुड़ी जानकारी दी गई हैं. ऐसे में खरीदने का फैसला लेने से पहले दोनों ऑप्शन के बारे में जानना जरूरी है. तो आइए जानते हैं कि आईफोन 18 कब लॉन्च होगा और क्या अभी 17 प्रो खरीदना सही है या थोड़ा और इंतजार कर लें.&amp;nbsp;
iPhone 17 Pro पर मिल रहा है डिस्काउंट
iPhone 17 Pro को भारत में 1,34,900 रुपये की शुरुआती कीमत पर लॉन्च किया गया था, फिलहाल यह Croma की आधिकारिक वेबसाइट पर 1,29,490 रुपये में उपलब्ध है. फोन पर 5,410 रुपये का फ्लैट डिस्काउंट दिया जा रहा है. इसके अलावा SBI, ICICI और Axis Bank के क्रेडिट कार्ड EMI ट्रांजैक्शन पर 4,000 रुपये तक का अतिरिक्त बैंक डिस्काउंट भी मिल सकता है. इस तरह कुल बचत 9,000 रुपये से ज्यादा हो सकती है.&amp;nbsp;
कब लॉन्च हो सकता है iPhone 18 Pro?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, Apple सितंबर 2026 में iPhone 18 Pro और iPhone 18 Pro Max को लॉन्च कर सकता है. इस बार पहले Pro मॉडल्स पेश किए जाने की संभावना है, जबकि स्टैंडर्ड iPhone 18 को बाद में लॉन्च किया जा सकता है. कुछ रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि इस साल सितंबर के लॉन्च इवेंट में iPhone 18 Pro, iPhone 18 Pro Max और Apple का पहला फोल्डेबल iPhone मुख्य आकर्षण हो सकते हैं.&amp;nbsp;
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iPhone 18 Pro में क्या मिल सकता है?
लीक्स और रिपोर्ट्स के अनुसार iPhone 18 Pro में 6.3 इंच की 120Hz ProMotion OLED डिस्प्ले, नया A20 Pro 2nm प्रोसेसर, Apple Intelligence के बेहतर AI फीचर्स, ट्रिपल 48MP कैमरा सेटअप, बेहतर बैटरी बैकअप, iOS 27, Wi-Fi 7, बेहतर 5G कनेक्टिविटी और टाइटेनियम फ्रेम मिलने की उम्मीद है. रिपोर्ट्स के अनुसार कंपनी इस बार कैमरा और AI एक्सपीरियंस पर ज्यादा फोकस कर सकती है.&amp;nbsp;
क्या अभी 17 प्रो खरीदना सही या कर लें थोड़ा और इंतजार?
iPhone 17 Pro पर फिलहाल अच्छा डिस्काउंट मिल रहा है, जिससे यह पहले की तुलना में कम कीमत में उपलब्ध है. वहीं रिपोर्ट्स और लीक्स के मुताबिक iPhone 18 Pro में नया A20 Pro प्रोसेसर, बेहतर AI फीचर्स, कैमरा अपग्रेड और लंबी बैटरी लाइफ जैसे बदलाव देखने को मिल सकते हैं. ऐसे में अगर आपको तुरंत नया फोन चाहिए तो iPhone 17 Pro एक अच्छा ऑप्शन हो सकता है, लेकिन अगर जल्दबाजी नहीं है तो आने वाले iPhone 18 Pro का इंतजार करना भी फायदेमंद साबित हो सकता है.&amp;nbsp;
iPhone 18 Pro की कितनी हो सकती है कीमत?
रिपोर्ट्स के अनुसार भारत में iPhone 18 Pro की शुरुआती कीमत करीब 1.40 लाख से 1.50 लाख रुपये के बीच हो सकती है. वहीं iPhone 18 Pro Max की कीमत 1.55 लाख रुपये या उससे ज्यादा रहने की संभावना है. हालांकि असली कीमत का खुलासा लॉन्च इवेंट के दौरान ही होगा.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Thu, 23 Jul 2026 20:30:16 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Apple, iPhone, Launch, Date, कब, लॉन्च, होगा, आईफोन, 18, क्या, अभी, प्रो, खरीदना, सही, या, कर, लें, थोड़ा, और, इंतजार</media:keywords>
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        <title>एक SMS और अकाउंट खाली, भारत में 146 प्रतिशत बढ़े स्कैम, 22,000 करोड़ से ज्यादा की साइबर ठगी</title>
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        <description><![CDATA[ SMS Fraud in India: भारत में SMS के जरिए होने वाले फ्रॉड के मामलों में बढ़ोतरी देखने को मिली है. पिछले एक साल में इन मामलों में 146 प्रतिशत का इजाफा हुआ है. BioCatch की रिपोर्ट में बताया गया है कि अधिक सुरक्षित माने जाने वाले iOS पर फ्रॉड के मामले 86 प्रतिशत बढ़े हैं, जबकि एंड्रॉयड पर यह बढ़ोतरी 35 प्रतिशत की रही है. अगर साइबर फ्रॉड में होने वाले नुकसान की बात करें तो 2025 में भारत में 22,496 करोड़ रुपये के साइबर फ्रॉड की शिकायतें दर्ज की गई हैं. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि लोगों को साइबर फ्रॉड में कितना बड़ा नुकसान झेलना पड़ रहा है.&amp;nbsp;
SMS फ्रॉड क्यों बढ़ रहे हैं?&amp;nbsp;
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बायोकैच के डायरेक्टर ऑफ ग्लोबल फ्रॉड इंटेलीजेंस टॉम पीकॉक ने कहा कि SMS फ्रॉड इसलिए ज्यादा प्रभावी है क्योंकि वो भरोसेमंद कम्युनिकेशन चैनल का फायदा उठाते हैं. SMS में आए फ्रॉड वाले मैसेज असली लगते हैं और यूजर बिना ज्यादा सोचे-समझे इन पर भरोसा कर लेता है. रिपोर्ट में बताया गया है कि UPI इकोसिस्टम पर भी स्कैमर्स की &amp;nbsp;नजर टिकी हुई है.
कम समय में ज्यादा बड़ा फ्रॉड कर रहे हैं साइबर क्रिमिनल
रिपोर्ट में बताया गया है कि फ्रॉडस्टर अब कम समय में बड़ा नुकसान कर रहे हैं. मोबाइल फ्रॉड सेशन का औसतन समय 32 प्रतिशत कम हो गया है, लेकिन इस दौरान ट्रांसफर होने वाले पैसों की रकम में 1.7 गुना का उछाल आया है. इसका मतलब यह है कि फ्रॉडस्टर अब बहुत तेजी से लोगों के अकाउंट से अपने अकाउंट में पैसा ट्रांसफर कर रहे हैं. पीकॉक ने बताया कि थोड़ी देर की कॉल में ज्यादा पैसों का फ्रॉड करना दिखाता है कि फ्रॉड करने वाले अब ज्यादा एफिशिएंट और स्कैम रिफाइन हो रहे हैं. क्रिमिलन अब सोशल इंजीनियरिंग और ऑटोमैटेड टेक्नीक का यूज कर वॉर्निंग नजर आने से पहले ही पैसे को ठिकाने लगा दे रहे हैं.
लोगों को 22,000 करोड़ से ज्यादा का नुकसान
साइबर फ्रॉड के मामलों में लोगों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है. जैसा हमने आपको ऊपर बताया कि 2025 में 22,496 करोड़ रुपये के साइबर फ्रॉड से जुड़ी शिकायतें दर्ज हुई थीं, जबकि 9,000 करोड़ रुपये की ट्रांसफर को डिक्लाइन कर दिया गया था. जांचकर्ताओं ने पिछले एक साल में अलग-अलग 700 बैंकों की 700 ब्रांच में 8.5 लाख से अधिक ऐसे अकाउंट की पहचान की है, जिनमें फ्रॉड के पैसे को ठिकाने लगाया जा रहा था.
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        <pubDate>Thu, 23 Jul 2026 20:30:15 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>पासवर्ड भूल गए तो सेल्फी वीडियो से लॉग&amp;इन होगा अकाउंट, गूगल ले आई नया फीचर, ऐसे करें यूज</title>
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        <description><![CDATA[ Selfie video for Google Account: अब आप सेल्फी वीडियो की मदद से भी गूगल अकाउंट में लॉग-इन कर सकेंगे. कंपनी एक नया साइन-इन और रिकवरी ऑप्शन लेकर आई है, जिसमें सेल्फी वीडियो के जरिए आपकी पहचान को वेरिफाई किया जाएगा. अगर बाकी तरीकों से अकाउंट रिकवर नहीं होता है तो यूजर अपने सेल्फी वीडियो से इसकी एक्सेस पा सकेंगे. इसके अलावा इसे गूगल के कई दूसरे फीचर और सर्विसेस को एक्सेस करने के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है. हालांकि, अभी यह फीचर हर जगह और हर डिवाइस के लिए रोलआउट नहीं किया गया है.
अकाउंट रिकवरी के एडिशनल ऑप्शन के तौर पर काम करेगा फीचर
गूगल ने कहा है कि यह फीचर पासकी और रिकवरी कॉन्टैक्ट्स के साथ एक एडिशनल रिकवरी ऑप्शन के तौर पर काम करेगा. इसे सेटअप करने के लिए आपका गूगल अकाउंट में साइन-इन होना जरूरी है. अगर आपने साइन-इन नहीं किया हुआ है तो आप सेल्फी वीडियो एड नहीं कर पाएंगे.
कैसे एड करें सेल्फी वीडियो?&amp;nbsp;

यह फीचर सभी यूजर्स के लिए रोलआउट नहीं किया गया है. इसलिए सबसे पहले आपको एलिजिबिलिटी चेक करनी होगी. आप ब्राउजर में g.co/signin-selfie टाइप कर यह देख सकते हैं कि आपके डिवाइस के लिए यह ऑप्शन रोल आउट हुआ है या नहीं. अगर यह फीचर अवेलेबल होगा तो आपको फेस का शॉर्ट वीडियो लेने का ऑप्शन दिख जाएगा.
इस फीचर में इनरोल करने के लिए सेल्फी वीडियो सेटअप पेज को ओपन करें और गूगल के इंस्ट्रक्शन का पालन करें. पूरी प्रोसेस के दौरान डिवाइस के कैमरे में देखते रहें और इंस्ट्रक्शन का पालन करते हुए हेड मूवमेंट करें. इस दौरान कैमरा आपके फेस को मल्टीपल एंगल से कैप्चर करेगा. इसके बाद आपका सेल्फी वीडियो गूगल अकाउंट में सिक्योर तरीके से सेव हो जाएगा.

कब काम आएगा रिकॉर्ड किया हुआ वीडियो?
अगर आगे चलकर आप अपने डिवाइस से गूगल अकाउंट को एक्सेस नहीं कर पा रहे हैं या पासवर्ड आदि भूल गए हैं तो गूगल अकाउंट की रिकवरी के लिए आफको सेल्फी वेरिफिकेशन का ऑप्शन देगी. तब आपसे फ्रेश वीडियो रिकॉर्ड करने को कहा जाएगा. फिर गूगल उस रिकॉर्डिंग को सेव्ड वीडियो से कंपेयर करेगी और पहचान वेरिफाई होने के बाद आपको अकाउंट की एक्सेस दे देगी.
प्राइवेसी का भी रखा जाएगा ध्यान
गूगल ने बताया है कि इस वीडियो को यूजर की सहमति के बाद ही स्टोर किया जाएगा. स्टोरेज के टाइम यह पूरी तरह एनक्रिप्टेड रहेगा और इसे किसी भी समय डिलीट किया जा सकता है. गूगल ने बताया है कि स्पूफिंग को रोकने के लिए भी उसने कई सिक्योरिटी चेक लगाए हैं.
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        <pubDate>Thu, 23 Jul 2026 20:30:14 +0530</pubDate>
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        <title>सिर्फ एक रुपये में मिल रहा है JioHotstar Premium सब्सक्रिप्शन, ऐसे करें क्लेम</title>
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        <description><![CDATA[ JioHotstar Premium Subscription: सिर्फ एक रुपये देकर आप जियोहॉटस्टार का प्रीमियम सब्सक्रिप्शन पा सकते हैं. जी हां, आपने सही सुना है. सिर्फ एक रुपये में जियोहॉटस्टार प्रीमियम की मेंबरशिप मिल रही है. इसमें आप एक महीने तक प्रीमियम कंटेट का मजा उठा पाएंगे. हालांकि, यह ऑफर सभी यूजर्स के लिए अवेलेबल नहीं है. अगर आपके फोन में यह ऑफर नहीं दिख रहा है तो इसका मतलब है कि आप इसके लिए एलिजिबल नहीं है. वहीं अगर आपको यह ऑफर दिख रहा है तो आइए जानते हैं कि इसे कैसे क्लेम किया जा सकता है.
किन यूजर्स के लिए आया है ऑफर?
जियोहॉटस्टार की तरफ से यह ऑफर लिमिटेड यूजर्स के लिए रोल आउट किया गया है. इसका फायदा उठाने के लिए आपको जियो नंबर की मदद से साइन-इन करना होगा. ध्यान रहे कि यह नंबर पर पहले कोई जियोहॉटस्टार सब्सक्रिप्शन नहीं होना चाहिए. यह प्लान करीब 30 दिनों तक वैलिड रहेगा और इस केवल एक बार क्लेम किया जा सकता है. अगर आपको इस प्लान का फायदा मिलता है तो आप अपने फोन, लैपटॉप और स्मार्ट टीवी समेत किसी भी दो डिवाइस पर एक साथ कंटेट को स्ट्रीम कर सकते हैं.
इस बात का रखें ध्यान
अगर आप इस प्लान के लिए एलिजिबिल हैं और एक रुपये की पेमेंट कर इसे एक्टिवेट करना चाहते हैं तो ऑटो रिन्यूअल का ध्यान रखना जरूरी है. अगर आप इसे इनेबल रखते हैं तो प्रमोशनल प्लान खत्म होते ही आपको रेगुलर प्लान पर स्विच कर दिया जाएगा. यानी एक महीने के बाद आपको बाकी यूजर्स के बराबर पैसे खर्च करने पड़ेंगे.
कैसे एक्टिवेट करें प्लान?
अगर आप प्लान के लिए एलिजिबल हैं तो जियोहॉस्टार ऐप में अपने जियो नंबर से साइन-इन करें. फिर अपने प्रोफाइल पर जाकर सब्सक्रिप्शन सेक्शन को ओपन करें. अगर यहां एक रुपये वाला प्लान दिखता है तो इसे सेलेक्ट कर पेमेंट कर दें. ट्रांजेक्शन कंप्लीट होने के बाद प्रीमियम मेंबरशिप तुरंत एक्टिव हो जाएगी. अगर आप एक महीने बाद इस मेंबरशिप को एक्टिव नहीं रखना चाहते तो ऑटो-रिन्यूएल ऑप्शन को बंद कर दें.
एयरटेल के इस प्लान में फ्री मिल रहा जियोहॉटस्टार का सब्सक्रिप्शन
अगर आपके पास एयरटेल का नंबर है तो आप तीन महीनों के लिए जियोहॉटस्टार का सब्सक्रिप्शन फ्री में पा सकते हैं. एयरटेल के 3,999 रुपये के प्लान में कंपनी तीन महीनों के लिए जियोहॉटस्टार का सब्सक्रिप्शन फ्री दे रही है. इस प्लान में सालभर की वैलिडिटी, रोजाना 2.5GB डेटा + अनलिमिटेड 5G डेटा, अनलिमिटेड कॉलिंग, रोजाना 100 SMS और 12 महीनों के लिए Adobe Express का प्रीमियम प्लान भी फ्री दिया जा रहा है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Thu, 23 Jul 2026 08:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>अब चार्जर की नहीं पड़ेगी जरूरत! ऐसे करें कहीं भी अपना फोन चार्ज</title>
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        <description><![CDATA[ अब चार्जर की नहीं पड़ेगी जरूरत! ऐसे करें कहीं भी अपना फोन चार्ज ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 23 Jul 2026 08:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>जियो से 5 करोड़ यूजर कम होने के बावजूद एयरटेल की कमाई ज्यादा, क्या हैं कारण?</title>
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        <description><![CDATA[ Jio vs Airtel ARPU: जियो और एयरटेल देश की दो सबसे बड़ी टेलीकॉम कंपनियां हैं और दोनों के बीच जबरदस्त मुकाबला चलता रहता है. यूजर्स की संख्या के हिसाब से देखें तो जियो सबसे बड़ी कंपनी है, वहीं अपने हर यूजर से होने वाली कमाई के मामले में एयरटेल पहले नंबर पर है. ताजा फाइनेंशियल नतीजे बताते हैं कि जियो से लगभग 5 करोड़ यूजर्स कम होने के बावजूद एयरटेल का एवरेज रेवेन्यू पर यूजर (ARPU) ज्यादा है. आइए जानते हैं कि ARPU क्या होता है, यह क्यों जरूरी है और एयरटेल इस मामले में कैसे आगे है.
क्या होता है ARPU?
टेलीकॉम सेक्टर में ARPU पर सबसे ज्यादा नजर रखी जाती है. इससे पता चलता है कि कोई टेलीकॉम कंपनी अपने हर यूजर से हर महीने कितना रेवेन्यू कमा रही है. ज्यादा ARPU का मतलब है कि उस कंपनी के ग्राहक प्रीमियम प्लान, ज्यादा डेटा यूसेज और दूसरी वैल्यू-एडेड सर्विसेस के लिए ज्यादा पैसे खर्च कर रहे हैं. ARPU में अगर मामूली बढ़ोतरी भी होती है तो यह कंपनी की आमदनी को काफी बढ़ा सकता है. अब कंपनियों की बात करें तो जियो का ARPU 215.6 रुपये है. एक साल पहले यह 208.08 रुपये था. इसकी तुलना में एयरटेल का ARPU 257 रुपये है. यानी एयरटेल अपने हर ग्राहक से हर महीने जियो की तुलना में 41.4 रुपये (लगभग 19.2 प्रतिशत) ज्यादा कमा रही है.
किस कंपनी के कितने यूजर?
जियो 53.3 करोड़ यूजर्स के साथ भारत की सबसे बड़ी टेलीकॉम कंपनी है. इनमें से 28.5 करोड़ 5G यूजर्स हैं. दूसरी तरफ एयरटेल के यूजर्स की संख्या 48.3 करोड़ है. यानी करीब 5 करोड़ यूजर्स कम होने के बावजूद इसका ARPU जियो से ज्यादा है. ARPU और यूजर बेस के आधार पर जियो हर महीने 11,498 करोड़ रुपये का रेवेन्यू जनरेट करती है, वहीं एयरटेल इस हिसाब से 12,434 करोड़ रुपये का रेवेन्यू प्राप्त कर रही है.
एयरटेल का ARPU ज्यादा क्यों है?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, एयरटेल के प्रीमियम यूजर्स की संख्या ज्यादा है और उसके यूजर बेस में पोस्टपेड सब्सक्राइबर की बड़ी हिस्सेदारी है. इसी तरह कंपनी के महंगे प्लान भी उसे ज्यादा रेवेन्यू जनरेट करने में मदद कर रहे हैं. बताया जा रहा है कि एयरटेल ने सिर्फ यूजर्स के नंबर बढ़ाने पर फोकस करने की बजाय कस्टमर क्वालिटी और हर यूजर पर खर्च बढ़ाने की रणनीति बनाई है. दूसरी तरफ जियो अपने यूजर्स को बढ़ाने के साथ-साथ क्लाउड कंप्यूटिंग और फिक्स्ड ब्रॉडबैंड जैसी दूसरी डिजिटल सर्विसेस पर भी निवेश कर रही है. कंपनी का कहना है कि फिक्स्ड ब्रॉडबैंड के लिए चलाई जा रही प्रमोशनल स्कीमों से ARPU पर थोड़ा असर पड़ा है.
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        <pubDate>Thu, 23 Jul 2026 08:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>Waze और Google Maps में क्या होता है अंतर? जानिए किस्मे मिलते हैं एडवांस फीचर्स</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/waze-और-google-maps-में-क्या-होता-है-अंतर-जानिए-किस्मे-मिलते-हैं-एडवांस-फीचर्स</link>
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        <description><![CDATA[ Waze Vs Google Maps: आज के समय में लोग अब रास्ता खोजने के लिए इंसान से नहीं पूछते हैं बल्कि गूगल मैप्स का सहारा लेते हैं. ये नेविगेशन ऐप पूरी दुनिया में काफी फेमश हो चुका है और लोग इसे कई तरीकों से इस्तेमाल कर रहे हैं. लेकिन हाल ही में गूगल मैप्स को टक्कर देने के लिए एक नया नेविगेशन ऐप आया है जिसका नाम वेज है. इस ऐप में भी यूजर्स को कई सारे एडवांस फीचर्स दिए जा रहे हैं जो उनके बहुत काम आ सकते हैं. आइए जानते हैं कि दोनों में क्या है अंतर.
Google Maps
Google Maps सिर्फ नेविगेशन तक सीमित नहीं है. ये आसपास के होटल, रेस्टोरेंट, पेट्रोल पंप, एटीएम, अस्पताल और दूसरे जरूरी जगहों की भी जानकारी देता है. इसके अलावा आप पब्लिक ट्रांसपोर्ट, पैदल चलने और साइकिल से ट्रैवल करने के लिए भी सही रूट देख सकते हैं.
बता दें कि इस ऐप में ऑफलाइन मैप डाउनलोड करने का फीचर भी मिलता है जिससे आपको कोई भी रास्त खोजने के लिए इंटरनेट की जरूरत नहीं पड़ेगी. इसी वजह से Google Maps को रोजमर्रा के इस्तेमाल के लिए यूजर ज्यादा इस्तेमाल करते हैं.
Waze
अब दूसरी तरफ, Waze की बात करें तो ये खासतौर पर उन यूजर्स के लिए पेश किया गया है जो रोजाना कार या बाइक से लंबी दूरी तय करते हैं. इसकी सबसे बड़ी खासियत ये है कि इसमें यूजर्स खुद ट्रैफिक, एक्सीडेंट, सड़क बंद होने, पुलिस चेकिंग और स्पीड कैमरा जैसी जानकारी को रियल टाइम में शेयर कर सकते हैं.
इसके अलावा अगर किसी रास्ते पर जाम लग जाता है तो Waze तुरंत आपको दूसरे रूट सजेस्ट कर देता है. इससे समय और फ्यूल दोनों की बचत हो सकती है. लगातार ड्राइव करने वाले लोगों के लिए ये फीचर बहुत ज्यादा काम का साबित हो सकता है.
किसमें हैं ज्यादा एडवांस फीचर्स
अब इन दोनो नेविगेशन ऐप्स के फीचर्स की बात करें तो Google Maps ग्लोबली यूजर्स को बेहतरीन फीचर्स उपलब्ध कराता है. साथ ही ये ज्यादा बैलेंस्ड ऐप भी माना जाता है. ये नेविगेशन के साथ-साथ जगहों की जानकारी, रिव्यू, फोटो, बिजनेस टाइमिंग और ऑफलाइन मैप जैसी कई फीचर्स उपलब्ध कराता है.
वहीं, दूसरी ओर, Waze लाइव ट्रैफिक अपडेट और ड्राइविंग अलर्ट देने में ज्यादा तेज माना जाता है. ये उन लोगों के लिए बेहतर ऑप्शन है जो रोजाना भीड़भाड़ वाले रास्तों पर सफर करते हैं और हर मिनट की बचत करना चाहते हैं.
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        <pubDate>Thu, 23 Jul 2026 08:30:09 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>आपने जो शराब खरीदी वो कहीं नकली तो नहीं? अब चुटकियों में लगेगा पता, यह ऐप करेगा आपकी पूरी मदद</title>
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        <description><![CDATA[ e-Excise App: नकली शराब का कारोबार लंबे समय से लोगों की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बना हुआ है. ऐसी शराब न केवल आर्थिक नुकसान पहुंचाती है बल्कि कई मामलों में जानलेवा भी साबित हो सकती है. इसी समस्या से निपटने के लिए ई-आबकारी (e-Excise) ऐप को लाया गया है. इस ऐप की मदद से उपभोक्ता कुछ ही सेकंड में ये पता लगा सकते है कि हो उन्होंने शराब खरीदी है वो असली या नकली.
क्या है ई-आबकारी ऐप?
जानकारी के अनुसार, ई-आबकारी ऐप राज्य आबकारी विभाग द्वारा तैयार किया गया एक मोबाइल एप्लिकेशन है जिसका मकसद शराब की बिक्री में पारदर्शिता बढ़ाना और नकली शराब की बिक्री पर रोक लगाना है. इस ऐप के जरिए उपभोक्ता शराब की बोतल पर लगे QR Code या बारकोड को स्कैन करके उसकी पूरी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं. इससे ये पता चल जाता है कि बोतल अधिकृत है या नहीं.
ऐसे करें शराब की जांच
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ई-आबकारी ऐप का इस्तेमाल करना बेहद आसान है. सबसे पहले अपने स्मार्टफोन में ऐप इंस्टॉल करें. इसके बाद ऐप खोलकर स्कैन ऑप्शन चुनें और शराब की बोतल पर लगे QR Code या बारकोड को स्कैन करें.
अब अगर बोतल असली होगी तो स्क्रीन पर ब्रांड का नाम, निर्माता, बैच नंबर, पैकिंग की जानकारी और दूसरी जरूरी जानकारी दिखाई देंगे. अगर स्कैन करने पर कोई जानकारी नहीं मिलती या डेटा नहीं मिला तो समझ जाइए कि शराब नकली है. ऐसे में संबंधित आबकारी विभाग को तुरंत शिकायत करें.
उपभोक्ताओं के लिए फायदेमंद
ई-आबकारी ऐप केवल शराब की ओरिजिनलिटी की जांचने तक सीमित नहीं है. कई राज्यों में ये ऐप शिकायत दर्ज कराने, लाइसेंसधारी दुकानों की जानकारी देखने और आबकारी विभाग से जुड़ी दोसी जरूरी सर्विसेज का फायदा लेने की सुविधा भी देता है. इससे उपभोक्ताओं का भरोसा बढ़ता है और अवैध शराब की बिक्री पर रोक लगाने में मदद मिलती है.
शराब खरीदने से पहले रखें इन बातों का ध्यान
आपको बता दें कि हमेशा शराब खरीदने से पहले कुछ जरूरी चीजों का ध्यान रखना जरूरी है. हमेशा अधिकृत और लाइसेंस प्राप्त दुकान से ही शराब खरीदें. बोतल की सील टूटी हुई न हो ये चेक करें. QR Code या बारकोड जरूर को चेक करें. एक्साइज होलोग्राम और लेबल को ध्यान से चेक्स करें. बेहद कम कीमत पर मिलने वाली शराब खरीदने से बचें. किसी भी तरह की गड़बड़ी मिलने पर तुरंत आबकारी विभाग को सूचना दें.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Thu, 23 Jul 2026 08:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>iPhone 20 Pro Max से सारे रिकॉर्ड तोड़ेगी ऐप्पल, पहली बार मिलेगी 7 इंच की बिना बॉर्डर वाली स्क्रीन</title>
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        <description><![CDATA[ iPhone 20 Pro Max: नए आईफोन लॉन्च होने में अब दो महीने से भी कम का समय बचा है. सितंबर में iPhone 18 Pro मॉडल्स और फोल्डेबल आईफोन लॉन्च हो जाएंगे, लेकिन अगर आपको सबसे धांसू आईफोन लेना है तो एक साल का इंतजार और करना पड़ेगा. 2027 में आईफोन के सफर को 20 साल पूरे होंगे. इस मौके को खास बनाने के लिए ऐप्पल सारे रिकॉर्ड तोड़ने वाली है. एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ऐप्पल करीब 7 इंच की स्क्रीन वाले आईफोन को टेस्ट करने में लगी हुई है. अगर यह आईफोन लॉन्च होता है तो 7 इंच की स्क्रीन के साथ आने वाले वाला पहला फोन बन सकता है.
डिस्प्ले पर नहीं होगी कोई बॉर्डर
चाइनीज टिपस्टर डिजिटल चैट स्टेशन के मुताबिक, ऐप्पल इंटरनली एक बड़े डिस्प्ले पैनल को टेस्ट कर रही है. इसका साइज 6.96 इंच होगा, लेकिन इसे 7 इंच के तौर पर मार्केट किया जाएगा. अभी तक यह पुष्टि नहीं हो पाई है कि ऐप्पल इस पैनल वाले आईफोन को लॉन्च करेगी भी या यह सिर्फ एक टेस्ट प्रोजेक्ट है. इससे पहले की लीक्स में दावा किया गया है कि ऐप्पल आईफोन की 20वीं एनिवर्सरी पर नए डिजाइन वाले फोन लॉन्च करेगी. कंपनी का प्लान एक ऐसा आईफोन लॉन्च करने का है, जो फ्रंट में ग्लास के एक टुकड़े की तरह नजर आए. यानी इस पर न तो बैजल्स होंगे और न ही कैमरे के लिए कटआउट होगा. यह एक एज-टू-एज डिस्प्ले होगा, जो चारों साइड से कर्व्ड होगा, जिससे ऐसा लुक मिलेगा कि इस स्क्रीन पर कोई बॉर्डर नहीं है. ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट में बताया गया था कि 20वीं एनिवर्सरी पर आने वाले आईफोन के 2 वर्जन पर ऐप्पल ने काम तेज कर दिया है. इस आईफोन के लिए ऐप्पल खासतौर पर सैमसंग के साथ मिलकर एक नया डिस्प्ले तैयार कर रही है. यह मौजूदा पैनल की तुलना में अधिक ब्राइट और पतला होगा.
ऐप्पल ने आखिरी बार 2024 में बढ़ाया था आईफोन का साइज
अगर ऐप्पल 7 इंच स्क्रीन वाला आईफोन ला रही है तो यह बहुत बड़ी अपग्रेड नहीं होने वाली है. 17 Pro Max में 6.9 इंच का डिस्प्ले मिलता है. ऐसे में 20 Pro Max का साइज बहुत बड़ा नहीं होगा, लेकिन इसमें अंतर साफ नजर आएगा. ऐप्पल ने इससे पहले 2024 में आईफोन 16 सीरीज के समय अपने डिवाइस का साइज बढ़ाया था. तब Pro मॉडल को 6.1 इंच से बढ़ाकर 6.3 इंच की स्क्रीन और प्रो मैक्स मॉडल को 6.7 इंच से बढ़ाकर 6.9 इंच की स्क्रीन दी गई थी.
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        <pubDate>Wed, 22 Jul 2026 15:30:16 +0530</pubDate>
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        <title>Google Photos में फिर आ गया ये फीचर! Ask Photos से क्यों है बिल्कुल अलग, जानिए पूरी जानकारी</title>
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        <description><![CDATA[ Google Classic Search: गूगल अपने यूजर्स को कई एडवांस फीचर्स उपलब्ध कराती है. ऐसे में अब गूगल फोटोज मे एक नया अपडेट सामने आया है. दरअसल, गूगल फोटो में अब यूजर्स क्लासिक सर्च और आस्क फोटोज के बीच में आसानी से स्विच कर सकेंगे. बता दें कि यूजर्स इस अपडेट की मदद से आसानी से कीवर्ड और एआई फीचर्स अपनी जरूरत के हिसाब से बदल सकेंगे. बता दें कि ये फीचर Android और iPhone दोनों पर धीरे-धीरे रोलआउट किया जा रहा है.
कैसे काम करता है Ask Photos
Ask Photos की बात करें तो ये Google के Gemini AI पर बेस्ड फीचर है. इसकी मदद से यूजर नॉर्मल बातचीत की तरह लंबा सवाल पूछ सकते हैं और AI उसी के अनुसार फोटो लाइब्रेरी को समझकर जवाब देता है. इतना ही नहीं, ये फोटो में मौजूद डिटेल्स के अनुसार भी यूजर्स को रिजल्ट देता है और कई बार ये फोटो को अच्छे से समझकर आपको रिजल्ट देने का काम करता है.
क्या है ये नया अपडेट
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि गूगल का क्लासिक सर्च गूगल फोटोज की मदद से सिर्फ कीवर्ड टाइप करके ही फोटो और वीडियो को सर्च कर सकते हैं. बता दे कि ये फीचर ऐसे यूजर्स के लिए काफी बेहतरीन साबित हो सकता है जिन्हें पता है कि उन्हें क्या सर्च करना है. हालांकि, इस फीचर की मदद से आप सिर्फ फोटो और वीडियो ही सर्च कर सकेंगे.
कैसे स्विच करें
अब गूगल फोटोज और आस्क फोटोज में स्विच करना भी काफी आसान है. बस आपको कुछ जरूरी स्टेप्स को फॉलो करना होगा. इसके लिए सबसे पहले Google Photos ऐप खोलें और Search या Ask टैब पर जाएं. कोई भी सर्च करने के बाद स्क्रीन के ऊपर दिखाई देने वाले टॉगल की मदद से Classic Search और Ask Photos के बीच आसानी से स्विच किया जा सकता है.
दोनों ऑप्शन देने का क्या है मकसद
बता दें कि Google का कहना है कि दोनों फीचर अलग-अलग जरूरतों को पूरा करते हैं. ऐसे में यूजर अब अपनी जरूरत के अनुसार चुन सकेगा कि उसे कैसे रिजल्ट की जरूरत है और वो क्या चाहता है. अगर आपको किसी फोटो को जल्दी ढूंढना है तो आपको Classic Search चुनना ठीक रहेगा. वहीं, जब आपको किसी खास घटना, ट्रैवल या इंसान से जुड़ी फोटो को खोजना है तो आस्क फीचर आपके लिए काफी बेहतरीन साबित हो सकता है.
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        <pubDate>Wed, 22 Jul 2026 15:30:15 +0530</pubDate>
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        <title>सिर्फ थोड़े से पैसे लगाकर घर में लगा TV बन जाएगा होम थिएटर, काम करेंगी ये ट्रिक्स</title>
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        <description><![CDATA[ How to Set-up Home Theatre: बड़ी स्क्रीन पर फिल्में, स्पोर्ट्स और वेब सीरीज आदि देखने का अपना अलग ही मजा होता है. अगर यह सब कुछ होम थिएटर पर देखने को मिल जाए तो मजा दोगुना हो जाता है. अच्छी बात यह है कि आप अपने घर में लगे स्मार्ट टीवी को ही होम थिएटर के तौर पर अपग्रेड कर सकते हैं और इसके लिए ज्यादा पैसा खर्च करने की भी जरूरत नहीं है. आज हम आपको कुछ टिप्स बता रहे हैं, जो आपको टीवी को ही होम थिएटर के तौर पर अपग्रेड करने में मदद करेंगी.
साउंडबार आएगा काम
अपने टीवी सेटअप को अपग्रेड करने के लिए साउंडबार की मदद लें. इसके लिए आपको ज्यादा पैसा खर्च करने की जरूरत नहीं है. एक अच्छा साउंडबार टीवी की साउंड को कई गुना बेहतर कर देता है. अगर आप साउंडबार के साथ सबवूफर भी खरीदते हैं तो आपको साउंड में दिन-रात का अंतर दिखेगा.
टीवी स्टिक या स्ट्रीमिंग बॉक्स से आसान होगा काम
अगर आपका स्मार्ट टीवी कुछ साल पुराना हो गया है तो इसकी स्पीड स्लो होने जैसे कई इश्यू आ जाते हैं. अगर इसकी इमेज और मोशन परफॉर्मेंस ठीक है तो इसे बदलने की बजाय आप टीवी स्टिक या स्ट्रीमिंग बॉक्स की मदद ले सकते हैं. ये बाजार में आसानी से अवेलेबल हैं और इनके लिए ज्यादा पैसा भी खर्च नहीं करना पड़ेगा.
बायस लाइट&amp;nbsp;
आप स्मार्ट टीवी के पीछे बायस लाइट लगाकर भी अपना विजुअल एक्सपीरियंस बेहतर कर सकते हैं. बायस लाइट और आपके टीवी की क्वालिटी का सीधा कोई संबंध नहीं होता, लेकिन इसकी मदद से आपके इमेज और विजुअल देखने का तरीका बदल जाता है. अगर आप अंधेरे में टीवी देखते हैं तो ये लाइट आपकी आंखों पर पड़ने वाले दबाव को कम कर करती है. साथ ही इनकी मदद से आपका दिमाग टीवी पर चल रहे विजुअल को बेहतर कंट्रास्ट और वाइब्रेंसी के साथ परसिव करेगा.
टीवी की हाइट और डिस्टेंस को करें ठीक
टीवी देखने का एक्सपीरियंस इस पर भी डिपेंड करता है कि आप इससे कितनी दूर बैठे हैं और आपके व्यूइंग प्वाइंट से यह कितना ऊपर या नीचे है. टीवी की हाइट के लिए यह ध्यान रखें कि जब आप बैठें हो तो आपकी आंखें सीधी टीवी स्क्रीन के सेंटर पर जानी चाहिए, लेकिन अगर आप लेटकर टीवी देखते हैं तो इसे थोड़ा ऊपर रखा जा सकता है. इसी तरह टीवी और आपके बीच डिस्टेंस भी पर्याप्त होना चाहिए.
वाईफाई की जगह यूज करें ईथरनेट
वाईफाई का यूज बहुत आसान और सुविधाजनक है. आप घर में कहीं भी टीवी रखकर इसे वाईफाई से कनेक्ट कर सकते हैं, लेकिन वाईफाई कनेक्शन बहुत भरोसेमंद नहीं होता. इसकी स्पीड कम-ज्यादा होती रहती है. इसकी बजाय आप ईथरनेट का यूज कर भरोसेमंद कनेक्टिविटी पा सकते हैं.
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        <pubDate>Wed, 22 Jul 2026 15:30:14 +0530</pubDate>
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        <title>AI नियमों में छोटी सी गलती भी बन सकती है बड़ा खतरा! नई स्टडी ने बताई चौंकाने वाली वजह</title>
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        <description><![CDATA[ Artificial Intelligence: टेक्नोलॉजी काफी तेजी से विस्तार कर रहा है. आज के समय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने लोगों के काम करने के तरीकों को काफी आसान बनाया है. लेकिन अब कई देशों में एआई के लिए कई सख्त नियम भी बना दिए हैं. लेकिन अब एक हैरान करने वाली स्टडी सामने आई है जिसके तहत एआई पर ज्यादा सख्ती भी लोगों को बहुत भारी पड़ सकती है. आइए जानते हैं क्या है पूरा मामला.
कंपनियों पर हो रही सख्ती
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, ये स्टडी अमेरिका की कॉर्नेल यूनिवर्सिटी और कार्नेगी मेलॉन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने किया है. उनका कहना है कि कई AI नियमों में जिम्मेदारी उन कंपनियों पर ज्यादा डाली जा रही है जो AI का इस्तेमाल करके ऐप्स या दूसरी जरूरी सर्विसेज बनाती हैं. लेकिन ऐसा नहीं होना चाहिए. दरअसल, ज्यादा ध्यान उन कंपनियों पर देने की जरूरत है जो AI मॉडल तैयार कर रही हैं.
इसके अलावा वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर AI बनाने वाली कंपनियों को ये पता चल जाता है कि प्रोडक्ट की सेफ्टी की जिम्मेदारी लास्ट में तय होगा तो वे इसके सेफ्टी पर कम ध्यान देने लगते हैं और इसे बिना ज्यादा टेस्ट के ही छोड़ देते हैं.
क्या है ये नया खतरा
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इस नई स्टडी में फ्री-राइडिंग का भी जिक्र किया गया है. इसका मतलब है कि एक पक्ष ये मानकर चलता है कि दूसरा पक्ष पूरी जिम्मेदारी निभा लेगा. अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के मामले में देखा जाए तो ये कहा जा सकता है कि एआई मॉडल बनाने वाली कंपनियां उसकी सेफ्टी की चिंता डेवलपर्स पर छोड़ सकती हैं.
ऐसे में सेफ्टी को लेकर बड़ी लापरवाही सामने आ सकती है जो आगे आने वाले समय में एक बड़ा खतरा बन सकती है. ये स्टडी पूरी दुनिया में कंपनियों के लिए एक बड़ी चिंता बनती जा रही है. ऐसे में एआई पर ज्यादा सख्ती भी लोगों को नुकसान पहुंचा सकती है. आपकी जानकारी के लिए बता दें कि एआई का पूरे देश में ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है. लेकिन इसपर लागू होने वाले नियमों पर भी ध्यान देने की जरूरत है जिससे यूजर्स की सेफ्टी का भी ध्यान रखा जा सके. इसके साथ ही बता दें कि डेवलपर्स को सेफ्टी का इतना ध्यान नहीं रहता है जिसका फायदा कंपनियां उठा लेती हैं.
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        <pubDate>Wed, 22 Jul 2026 15:30:13 +0530</pubDate>
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        <title>विदेश जाने से पहले जरूर जान लें ये टेक टिप्स, नहीं होगी इंटरनेट और पेमेंट की टेंशन</title>
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        <description><![CDATA[ Tech Tips For Travelling: दुनिया घूमना बहुत लोगों को सपना होता है, लेकिन कुछ ही लोग इसे पूरा कर पाते हैं. ट्रैवलिंग में मदद के लिए आपको तमात तरह के टूल्स मिल जाएंगे. इसी तरह सफर को आसान बनाने के लिए बहुत तरह की एक्सेसरीज भी मौजूद हैं. इन गैजेट और एक्सेसरीज के साथ-साथ आपको कई दूसरी चीजों का भी ध्यान रखना होता है. आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि विदेशी यात्रा पर जाने से पहले आपको किन-किन जरूरी चीजों को दिमाग में रखना चाहिए.
मोबाइल प्लान कर लें चेक
अगर आप पहली बार देश से बाहर जा रहे हैं तो आपको मोबाइल प्लान का विशेष ध्यान रखना पड़ेगा. अगर आप लोकल प्लान को ही बाहर जाकर यूज करते हैं तो यह आपकी जेब पर बहुत भारी पड़ सकता है. डेटा रोमिंग में आपको मोटा खर्चा आएगा. इसलिए यात्रा शुरू करने से पहले ही इंटरनेशनल डेटा प्लान के बारे में जानकारी जुटा लें. इससे आप बिना ज्यादा पैसे खर्च किए इंटरनेट से कनेक्टेड रह पाएंगे.
नया सिम कार्ड या ई-सिम खरीदें
अगर आपके मौजूदा टेलीकॉम सर्विस प्रोवाइडर के पास इंटरनेशनल प्लान नहीं है तो आप नया सिम कार्ड या ई-सिम खरीद सकते हैं. इस तरह आप अपने डेस्टिनेशन के हिसाब से सबसे ज्यादा फायदों वाला कनेक्शन ले सकते हैं. अब ई-सिम भी एक अच्छा ऑप्शन है, जो अलग-अलग देशों में आपको फिजिकल सिम कार्ड खरीदने के झंझट से मुक्ति दिला सकता है.
ऑफलाइन मैप्स कर लें डाउनलोड
भले ही आपके फोन में इंटरनेशनल डेटा प्लान है या नहीं, इस बात पर भरोसा नहीं किया जा सकता कि आप जिस जगह जा रहे हैं, वहां मोबाइल नेटवर्क एकदम शानदार होगा. अगर आप किसी रिमोट इलाके में जा रहे हैं तो मोबाइल नेटवर्क का इश्यू हो सकता है. इसलिए अपने फोन में ऑफलाइन मैप्स डाउनलोड कर लें. इसकी मदद से आप बिना कनेक्टिविटी के भी नेविगेशन कर पाएंगे.
Find My जैसी सर्विसेस को रखें ऑन
सफर के दौरान फोन के गुम या चोरी हो जाने का खतरा बना रहता है. अगर किसी नई जगह जाकर फोन चोरी होता है तो मुश्किलें कई गुना बढ़ जाती हैं. इससे बचने के लिए अपने फोन में फाइंड माई या इस जैसी किसी दूसरी सर्विस को इनेबल रखें. यह चोरी की स्थिति में फोन ट्रैक करने में आपकी मदद कर सकती है.
सफर के लिए रखें अलग फोन
अगर आप लगातार ट्रैवल करते रहते हैं तो सफर के लिए अलग फोन रखें. इसमें आप सिर्फ सफर से संबंधित डॉक्यूमेंट्स और फाइल्स ही स्टोर करें. अगर यह चोरी भी होता है तो आपका पर्सनल डेटा आपके प्राइमरी फोन में सेव रहेगा.
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        <pubDate>Wed, 22 Jul 2026 15:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>हर QR Code एक जैसा नहीं होता! जानिए Static और Dynamic में क्या होता है अंतर और कैसे करते हैं काम</title>
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        <description><![CDATA[ Static Vs Dynamic QR Code: डिजिटल दुनिया में अब ज्यादातर काम लोग ऑनलाइन करने लगे हैं. ऐसे में क्यूआर कोड का भी ज्यादातर इस्तेमाल होने लगा है. ऑनलाइन पेमेंट से लेकर किसी प्रोडक्ट की जानकारी के लिए भी अब क्यूआर कोड का इस्तेमाल होने लगता है. इसी कड़ी में बता दें कि क्यूआर कोड भी दो तरह के होते हैं जिसमें डॉयनमिक और स्टेटिक क्यूआर कोड शामिल है. आइए जानते हैं कि दोनों में क्या होता है अंतर.
Dynamic QR Code क्या है
Dynamic QR Code ज्यादा एडवांस टेक्नोलॉजी पर बेस्ड होता है. इसमें QR Code को दोबारा बदले बिना उसके अंदर मौजूद जानकारी या लिंक को कभी भी अपडेट किया जा सकता है. मान लीजिए आपने किसी ऐड में QR Code छपवा दिया और बाद में वेबसाइट का लिंक बदल गया. ऐसे में नया QR Code बनाने की जरूरत नहीं पड़ेगी. केवल बैकएंड से लिंक अपडेट करने पर वही पुराना QR Code नई वेबसाइट खोलने के लिए इस्तेमाल किया जा सकेगा.
Static QR Code क्या होता है
जानकारी के मुताबिक, Static QR Code एक परमानेंट QR Code होता है. इसमें जो जानकारी एक बार जोड़ दी जाती है उसे बाद में बदला नहीं जा सकता है. जैसे अगर किसी वेबसाइट का लिंक या कोई टेक्स्ट इसमें सेव कर दिया गया है तो वह हमेशा वही रहेगा. इस तरह का QR Code उन स्थितियों में बेहतर माना जाता है, जहां जानकारी भविष्य में बदलने की जरूरत नहीं होती है.
क्या होता है बड़ा अंतर
इन दोनों कोड के बीच के बड़े अंतर की बात करें तो Static QR Code में इनफॉर्मेशन हमेशा के लिए फिक्स रहती है जबकि Dynamic QR Code में कंटेंट को जरूरत के अनुसार बदला जा सकता है. इसके अलावा Dynamic QR Code आपको ये भी बताएगा कि कोड कितनी बार स्कैन हुआ है, कहां स्कैन हुआ है और किस समय पर स्कैन किया गया है.
कौन सा होता है बेहतर
आपको बता दें कि अगर आपको केवल एक नॉर्मल लिंक या जानकारी शेयर करनी है जो आने वाले समय में बदलने वाली नहीं है तो Static QR Code आपके लिए सही ऑप्शन होगा. &amp;nbsp;वहीं, दूसरी ओर, अगर आप बिजनेस, मार्केटिंग कैंपेन, इवेंट, डिजिटल मेन्यू या प्रमोशनल ऑफर चला रहे हैं, जहां समय-समय पर जानकारी अपडेट करनी पड़ती है तो Dynamic QR Code बेहतर ऑप्शन साबित हो सकता है.
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        <pubDate>Wed, 22 Jul 2026 07:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>Emergency Call Without SIM: फोन में सिम न होने पर भी कैसे लग जाती है 112 पर कॉल, कैसे काम करता है इमरजेंसी सिस्टम?  </title>
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        <description><![CDATA[ Emergency Call Without SIM: ज्यादातर फोन में इमरजेंसी काल का सिस्टम मौजूद रहता है, वही अगर पोन में सिम कार्ड न हो तो, कही भी फोन करना ना मुमकिन होता है, &amp;nbsp;लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि बिना सिम कार्ड के भी फोन से 112 पर कॉल कैसे लग जाती है? यह सुनने में अजीब लगता है, लेकिन यह पूरी तरह सच है. भारत में 112 एक ऐसा इमरजेंसी नंबर है जो पुलिस, फायर ब्रिगेड और एम्बुलेंस, तीनों सेवाओं को एक साथ जोड़ता है. &amp;nbsp;सबसे खास बात यह है कि यह नंबर बिना सिम कार्ड, बिना नेटवर्क बैलेंस और यहां तक कि फोन लॉक होने पर भी डायल हो जाता है. आइए जानते हैं क्या है इसके पीछे की वजह, कैसे काम करता है यह सिस्टम?&amp;nbsp;
बिना सिम के कॉल क्यों लग जाती है?
दरअसल सिम कार्ड का काम सिर्फ यह बताना होता है कि यह नंबर किस व्यक्ति का है. यानी सेम कार्ड से आपको वह नंबर मिलता है, जिसके जरिए आप आपने परिवार, मित्र से बात करते हैं. लेकिन इमरजेंसी कॉल के लिए फोन को इस पहचान की जरूरत ही नहीं पड़ती. दुनिया भर के मोबाइल फोन एक तय स्टैंडर्ड के हिसाब से बनते हैं. इसमें यह नियम है कि इमरजेंसी नंबर बिना सिम के भी डायल हो सकें. जैसे ही आप 112 डायल करते हैं, फोन अपने आसपास मौजूद किसी भी मोबाइल कंपनी के टावर का सिग्नल पकड़ लेता है, चाहे वह आपकी अपनी कंपनी का न हो, यानी अगर आपके फोन में जियो का सिम है और आसपास सिर्फ एयरटेल का नेटवर्क आ रहा है, तब भी कॉल एयरटेल के टावर से होकर चली जाती है. यही वजह है कि नेटवर्क न होने या सिम न होने पर भी यह नंबर काम करता है.&amp;nbsp;
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लॉक फोन और पैनिक बटन से भी होती है मदद
आजकल के ज्यादातर स्मार्टफोन में यह सुविधा दी जाती है कि अगर आपका फोन लोक है पर फिर भी स्क्रीन पर एक &quot;इमरजेंसी कॉल&quot; का ऑप्शन दिखाई देता है. &amp;nbsp;इस पर टैप करते ही 112 डायल किया जा सकता है, बिना फोन को खोले. इसके अलावा कई स्मार्टफोन में पावर बटन को तीन बार तेजी से दबाने पर अपने आप 112 पर कॉल लग जाती है. इसके साथ ही भारत सरकार ने &quot;112 India&quot; नाम का एक ऐप भी बनाया है, जिससे मुसीबत में फंसा व्यक्ति एक बटन दबाकर अपनी लोकेशन के साथ SOS मैसेज भेज भी &amp;nbsp;सकता है.&amp;nbsp;
अगर बात करें कि कॉल के बाद क्या होता है, तो&amp;nbsp; जैसे ही आप 112 डायल करते हैं, आपकी कॉल सीधे &amp;nbsp;Emergency Responce Center के पास जाती है. वहां बैठा ट्रेंड ऑपरेटर आपसे परेशानी के बारे में पूछता है और जरूरत के हिसाब से पुलिस, फायर या एम्बुलेंस को सूचना देता है. &amp;nbsp;सबसे दिलचस्प बात यह है कि बीना सिम कारेड के बस आप कॉल ही नहीं कर सकता है बल्कि इससे आपकी &amp;nbsp;लोकेशन का भी पता चल जाता है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Wed, 22 Jul 2026 07:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>BSNL Cheapest Plans: सिम एक्टिव रखना है? ये है BSNL का सबसे सस्ता प्लान, कॉलिंग के साथ मिलेगा डेटा</title>
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        <description><![CDATA[ BSNL Cheapest Plans: ज्यादातर लोगों के पास एक सिम कार्ड के अलावा एक सेकेंडरी सिम भी होती है, जिसे बस एक्टिव रखने के लिए रिचार्ज करना पड़ता है. ऐसे में उन्हें दोनों सिम को रिचार्ज करना पड़ता है.&amp;nbsp; कई बार वे एक सिम के साथ साथ दूसरे को रिचार्ज नहीं कर पाते हैं, जिसके कारण उनका BSNL नंबर बंद हो जाता है, औसे में अगर आप भी अपने BSNL नबंर को बंद होने से बचाना चाहते हैं और साथ में कुछ कॉलिंग मिनट और डेटा भी चाहते हैं, तो आपको जान कर खुशी होगी कि BSNL का एक ऐसा प्लान है जिससे आप ये सारे लाभ उठा सकता है. साथ ही यह प्लान मार्केट के सबसे सस्ते प्लान में गिना जाता है और इसमें कॉलिंग के साथ-साथ डेटा भी मिल जाता है. आइए जानते हैं इस प्लान के बारे में पूरी जानकारी.&amp;nbsp;
107 रुपये में क्या-क्या मिलता है?
अगर आप भी अपना BSNL नंबर बंद होने से बचाना चाहते हैं और साथ में कुछ कॉलिंग मिनट और डेटा भी चाहते हैं, तो BSNL का 107 रुपये वाला प्लान आपके लिए बेस्ट ऑप्शन हो सकता है.&amp;nbsp;BSNL के इस प्लान में आपको 200 मिनट लोकल, STD और रोमिंग कॉलिंग मिलती है.&amp;nbsp; इसमें MTNL नेटवर्क पर कॉल करना भी शामिल है, यानी अगर आप दिल्ली या मुंबई में हैं तो वहां पर भी यह प्लान काम करेगा.&amp;nbsp; इसके साथ ही इस प्लान में 3GB हाई-स्पीड डेटा भी मिलता है. सबसे खास बात ये है कि जब यह 3GB डेटा खत्म हो जाता है, तो इंटरनेट स्पीड 40 Kbps पर आ जाती है, यानी डेटा पूरी तरह बंद नहीं होता बल्कि धीमी स्पीड पर चलता रहता है. इस प्लान कि वैलिडिटी कि बात करें तो, इसको अब करीब 20 दिन रह गई है, जो पहले 35 दिन हुआ करती थी.&amp;nbsp;
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प्लान कैसे रिचार्ज करें?
इस प्लान को रिचार्ज करना बहुत आसान है. इसको आप MyBSNL ऐप के जरिए, BSNL की ऑफिशियल वेबसाइट से, दुकान से, या फिर पेटीएम, गूगल पे, फोनपे जैसे ऐप्स से यह रिचार्ज कर सकते हैं. एसके लिए बस अपना मोबाइल नंबर डालना होगा, फिर 107 रुपये का प्लान चुनें और पेमेंट कर दें. ध्यान रखें कि अलग-अलग सर्किल यानी राज्यों में इस प्लान के बेनिफिट्स थोड़े अलग हो सकते हैं, इसलिए रिचार्ज करने से पहले एक बार अपने सर्किल के हिसाब से प्लान डिटेल्स जरूर चेक कर लें.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Wed, 22 Jul 2026 07:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>हर दिन आते हैं WhatsApp पर अनजान कॉल? इस Hidden फीचर को ON करते ही मिल जाएगा छुटकारा</title>
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        <pubDate>Wed, 22 Jul 2026 07:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>आपके iPhone में कौन&amp;सा iOS चल रहा है? 30 सेकंड में ऐसे कर सकते हैं पता, जानिए पूरा प्रोसेस</title>
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        <description><![CDATA[ आपके iPhone में कौन-सा iOS चल रहा है? 30 सेकंड में ऐसे कर सकते हैं पता, जानिए पूरा प्रोसेस ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 22 Jul 2026 07:30:05 +0530</pubDate>
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        <title>मोबाइल यूजर्स सावधान! लगातार स्क्रॉलिंग से बढ़ सकती है ये समस्या, जानिए कैसे करें बचाव?</title>
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        <description><![CDATA[ मोबाइल यूजर्स सावधान! लगातार स्क्रॉलिंग से बढ़ सकती है ये समस्या, जानिए कैसे करें बचाव? ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 21 Jul 2026 11:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>ऑफलाइन स्टोर या ऑनलाइन, कहां से खरीदना चाहिए नया फोन? ये बातें जान लीं तो नहीं रहेगा कंफ्यूजन</title>
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        <description><![CDATA[ Offline vs Online Phone Shopping: नया फोन खरीदना अब मुश्किल नहीं रहा है. आप घर बैठे-बैठे अपनी पसंद का फोन मंगवा सकते हैं. अगर आप दिल्ली जैसे बड़े शहर में रहते हैं तो कुछ कंपनियां एक घंटे के भीतर आपका फोन डिलीवर कर देती हैं. दूसरी तरफ अगर आप फोन खरीदने से पहले उसका एक्सपीरियंस लेना चाहते हैं तो ऑफलाइन स्टोर में जाकर शॉपिंग करना फायदेमंद रहता है. ऑफलाइन और ऑनलाइन शॉपिंग के अपने-अपने फायदे और नुकसान हैं. आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि फोन खरीदने के लिए ऑनलाइन तरीका कब सही रहता है और किस स्थिति में आपको ऑफलाइन स्टोर जाकर फोन खरीदना चाहिए.
ऑनलाइन शॉपिंग है एकदम आसान
दूसरे प्रोडक्ट्स की तरह फोन की ऑनलाइन शॉपिंग एकदम आसान है. आप गूगल, सैमसंग और ऐप्पल आदि कंपनियों की वेबसाइट पर जाकर या फ्लिपकार्ट, विजय सेल्स और अमेजन जैसे ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स पर अपना फोन ऑर्डर कर सकते हैं. अगर आप किसी कंपनी का फोन पहले से यूज कर रहे हैं और उसी कंपनी का अपग्रेडेड मॉडल लेना चाहते हैं तो ऑनलाइन शॉपिंग एक बेहतर च्वॉइस है. आपको कहीं जाने की जरूरत नहीं है और घर बैठे इसे ऑर्डर किया जा सकता है. हालांकि, इसके कुछ नुकसान भी हैं. सबसे बड़ा झंझट शिपिंग को लेकर रहता है. कई ऐसे मामले सामने आ चुके हैं, जहां फोन ऑर्डर करने पर लोगों को साबुन जैसे प्रोडक्ट डिलीवर हुए हैं. इसके अलावा टाइम को लेकर भी इश्यू रहता है. कई बार ऑर्डर डिलीवर होने में हफ्तेभर का समय लग जाता है. फिर अगर किसी कारणवश यह पसंद न आए तो पिक-अप और दोबारा डिलीवर होन में हफ्ते का समय और लग सकता है. ऐसे में अगर आपको तुरंत फोन चाहिए तो ऑनलाइन शॉपिंग का तरीका काम नहीं आता.
कब करनी चाहिए ऑफलाइन शॉपिंग?
अगर आपको तुरंत नया फोन चाहिए तो ऑफलाइन स्टोर आपके काम आते हैं. यहां जाकर आप कुछ ही देर में अपनी पंसद का फोन खरीद सकते हैं. इसके अलावा अगर आप किसी ब्रांड का फोन पहली बार ले रहे हैं तो स्टोर पर जाकर उसका एक्सपीरियंस लिया जा सकता है. यहां आपको फोन खरीदने से पहले ही उसके फीचर, स्पेसिफिकेशंस, बिल्ड क्वालिटी और कैमरा आदि को एक्सपीरियंस करने का मौका मिलता है. इसके अलावा स्टोर के कर्मचारी फोन सेटअप करने में भी आपकी मदद कर देंगे. इसके नुकसान की बात करें तो कई बार किसी स्टोर में स्टॉक का इश्यू रहता है. इसके अलावा सेल्समैन आपको बजट से बाहर का फोन खरीदने पर भी तैयार कर लेते हैं.
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        <pubDate>Tue, 21 Jul 2026 11:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>जैमर से कैसे बंद हो जाता है इंटरनेट? जानिए कैसे करता है काम और क्या है उपाय</title>
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        <description><![CDATA[ How Jammer Works: सोमवार को जंतर मंतर पर छात्रों के प्रदर्शन के दौरान कई जगहों पर मोबाइल सिग्नल नहीं आ रहे थे. रिपोर्ट्स के मुताबिक, दिल्ली पुलिस ने कुछ जगहों पर पोर्टेबल मोबाइल जैमर लगाए थे. ऐसा पहली बार नहीं है, जब किसी प्रदर्शन स्थल पर जैमर का इस्तेमाल किया गया है. कई बार पहले भी प्रदर्शन स्थल, परीक्षा केंद्रों और दूसरी संवेदनशील जगहों पर जैमर का इस्तेमाल होता आया है. आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि जैमर क्यों लगाए जाते हैं और ये काम कैसे करते हैं.&amp;nbsp;
दिल्ली पुलिस ने क्यों लगाए जैमर?
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, दिल्ली पुलिस ने जंतर मंतर पर मोबाइल जैमर लगाए थे. पुलिस इस इलाके के आसपास के मोबाइल कम्युनिकेश को टेंपरेरी तौर पर ब्लॉक करना चाहती थी. अधिकारियों को मानना है कि इससे लोगों में रियल-टाइम कॉर्डिनेशन नहीं हो पाता और सेंसेटिव एक्शन लाइव स्ट्रीमिंग के चांस भी कम हो जाते हैं. बताया जा रहा है कि पुलिस ने इन्हें स्पेसिफिकेशन लोकेशन पर लिमिटेड टाइम के लिए ही इंस्टॉल किया था.
कैसे काम करते हैं जैमर?
मोबाइल जैमर के काम करने का तरीका सिंपल होता है. इसे जिस एरिया में इंस्टॉल किया जाता है, यह उसके आसपास की जगहों पर मोबाइल नेटवर्क को जाम कर देता है. ऑन होने के बाद जैमर उसी फ्रीक्वैंसी पर रेडियो वेव्स छोड़ता है, जिस फ्रीक्वैंसी पर 3G, 4G और 5G नेटवर्क आता है. जैमर से निकली वेव्स स्ट्रॉन्ग होती है और ये मोबाइल टावर से फोन तक आने वाले सिग्नल को रोक देती है. इससे फोन मोबाइल नेटवर्क से कनेक्ट नहीं हो पाता. यही वजह होती है कि जैमर की रेंज में आने वाले डिवाइस पर न तो इंटरनेट काम करता है और न ही कॉलिंग और मैसेज हो पाते हैं. यह ध्यान रहे कि जैमर को टेंपरेरी तौर पर इंस्टॉल किया जाता है और यह केवल अपनी रेंज में आने वाले डिवाइसेस पर असर डालता है. जैमर के बंद होते ही मोबाइल नेटवर्क बहाल हो जाता है.
जैमर ऑन होने की स्थिति में आप क्या करें?
अगर जैमर ऑन है और आप इसकी रेंज के भीतर हैं तो आपका फोन मोबाइल नेटवर्क से कनेक्ट नहीं होगा. इसमें आपके फोन की कोई कमी नहीं है. जैमर ऑन होने तक यह मोबाइल टावर से आपके फोन तक सिग्नल नहीं पहुंचने देगा. इससे बचने के लिए आप अपनी जगह से दूर जा सकते हैं. जैसे ही आप जैमर की रेंज से बाहर होंगे, आपका फोन अपने आप ही नेटवर्क से कनेक्ट हो जाएगा.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Tue, 21 Jul 2026 11:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>फ्रिज यूज करते हैं तो तुरंत जान लें ये बात, नहीं तो हर महीने बेवजह खर्च होंगे हजारों रुपये</title>
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        <description><![CDATA[ Fridge Use Tips: फ्रिज घर का एक ऐसा अप्लायंस है, जिसे रोजाना इस्तेमाल किया जाता है. सर्दी में इसकी जरूरत थोड़ी कम हो जाती है, लेकिन यूज पूरी तरह बंद नहीं होता. पूरे दिन चलने के कारण यह बिजली की खपत भी ज्यादा करता है, जिसका सीधा असर बिजली बिल पर पड़ता है. अगर आप फ्रिज यूज करते समय बिजली बचाने चाहते हैं तो एक छोटा-सा काम करना पड़ेगा. कई बार लोग स्पेस बचाने के लिए फ्रिज को एकदम दीवार से सटाकर खड़ा कर देते हैं. अगर आप भी फ्रिज को दीवार से सटाकर रखते हैं तो इसे दीवार से दूर करने की जरूरत है. आइए जानते हैं कि फ्रिज और दीवार के बीच स्पेस होना क्यों जरूरी है.&amp;nbsp;
फ्रिज को दीवार के एकदम पास रखने पर क्या होता है?
आमतौर पर कंडेनसर कॉयल और कंप्रेसर को फ्रिज के पीछे लगाया जाता है. कुछ मॉडल्स में इन्हें साइड में भी दिया जाता है. दोनों ही स्थिति में इसे अच्छे वेंटिलेशन की जरूरत पड़ती है. अगर इसे दीवार से एकदम सटाकर खड़ा कर दिया जाए तो इन दोनों ही पार्ट्स से जनरेट होने वाली हीट को बाहर निकलने की जगह नहीं मिलेगा. इससे इनका टेंपरेचर बढ़ जाएगा और इन्हें फ्रिज में रखे सामान को ठंडा करने के लिए ज्यादा काम करना पड़ेगा. इससे बिजली की भी ज्यादा खपत होगी और इन पार्ट्स पर लोड भी बढ़ेगा. गर्मी के मौसम में तापमान ज्यादा होने के चलते स्थिति और भी खराब हो जाती है. अगर लंबे समय तक इन पार्ट्स पर ज्यादा लोड पड़ेगा तो इनके खराब होने के चांस भी बढ़ जाएंगे.
फ्रिज और दीवार के बीच क्यों होना चाहिए स्पेस?
कंडेनसर कॉयल और कंप्रेसर से जनरेट होने वाली हीट को बाहर निकलने के लिए स्पेस की जरूरत होती है. अगर फ्रिज और दीवार के बीच स्पेस है तो हवा सर्कुलेट होगी और हीट बाहर निकल पाएगी. हीट जमा न होने के कारण पार्ट्स पर लोड कम पड़ेगा. इसके दो फायदे होंगे. पहला बिजली की बचत होगी और दूसरा फायदा यह होगा कि पार्ट्स पर लोड कम पड़ेगा और ये लंबे समय तक बिना खराबी के काम कर पाएंगे.
कितना स्पेस है जरूरी?
दीवार और फ्रिज के बीच उतना स्पेस काफी होता है, जिससे हवा सर्कुलेट हो सके. अगर आपके पास पर्याप्त जगह है तो फ्रिज को दीवार से 1-2 फुट दूर रखा जा सकता है. अगर जगह की कमी है तो इसे दीवार से 4-6 इंच दूर रखें. इससे हवा आसानी से सर्कुलेट हो जाएगी.
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        <pubDate>Tue, 21 Jul 2026 11:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>खुलने वाला है ऐप्पल का पिटारा, फोल्डेबल फोन के अलावा लॉन्च होंगे 10 से ज्यादा नए डिवाइस</title>
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        <description><![CDATA[ Apple Upcoming Products: फोल्डेबल आईफोन का इंतजार कर रहे ऐप्पल फैन्स के लिए कंपनी का पिटारा खुलने वाला है. आईफोन 18 प्रो मॉडल्स और पहले फोल्डेबल आईफोन के अलावा भी कंपनी जल्द ही कई नए प्रोडक्ट्स लाने वाली है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अगले कुछ दिनों में ऐप्पल की तरफ से नए आईपैड, मैक और स्मार्ट होम प्रोडक्ट्स देखने को मिलेंगे. आगामी महीनों में ऐप्पल के कुल 14 प्रोडक्ट्स आने हैं, जिनमें से कुछ की लॉन्चिंग 2027 की शुरुआत में हो सकती है. आइए एक नजर डालते हैं कि आईफोन के साथ-साथ कंपनी किन दूसरे प्रोडक्ट्स की लॉन्चिंग की तैयारी में जुटी हुई है.
सितंबर में लॉन्च होंगे नए आईफोन&amp;nbsp;
नए आईफोन का इंतजार सितंबर में समाप्त हो जाएगा. सितंबर के दूसरे सप्ताह में iPhone 18 Pro और iPhone 18 Pro Max के साथ कंपनी का पहला फोल्डेबल iPhone Ultra लॉन्च किया जाएगा. Pro मॉडल्स को अब तक की सबसे बड़ी अपग्रेड के साथ लॉन्च किए जाने की पूरी उम्मीद है. ये दोनों ही मॉडल A20 Pro चिपसेट, मेन कैमरा पर वेरिएबल अपर्चर, बड़ी बैटरी और एनर्जी एफिशिएंट डिस्प्ले के साथ लॉन्च होंगे. अगर लुक की बात करें तो डायनामिक आईलैंड को छोटा किया जाएगा. इनमें फेसआईडी कंपोनेंट को डिस्प्ले के अंडर शिफ्ट किया जा रहा है. अगर iPhone Ultra की बात करें तो इस पर ऐप्पल फैन्स के साथ-साथ पूरी टेक इंडस्ट्री की नजर लगी टिकी हुई है. इसमें 7.7 इंच का इनर डिस्प्ले और 5.3 इंच का कवर डिस्प्ले मिलेगा. iOS 27 अपडेट के साथ यह आईफोन कई मल्टीटास्किंग फीचर के साथ लॉन्च होने की उम्मीद है.
आईफोन के अलावा इन प्रोडक्ट्स पर चल रहा काम
ऐप्पल इन दिनों अपने कई मैक मॉडल को रिफ्रेश करने के काम में भी जुटी हुई है. साल के अंत तक एक नया एंट्री लेवल 14 इंच का मैकबुक प्रो आ सकता है, जिसमें M6 चिपस होगी. इसी तरह मैक स्टूडियो, मैक मिनी और आईमैक को भी M5 सीरीज के चिपसेट के साथ अपडेट किया जाएगा. इसके अलावा ऐप्पल MacBook Ultra नाम से नया लैपटॉप भी लाएगी. इसे 2027 के शुरुआती महीनों में उतारा जा सकता है. इसमें OLED डिस्प्ले, टचस्क्रीन सपोर्ट, पतला डिजाइन और आईफोन के डायनामिक आईलैंड जैसा इंटरफेस दिया जाएगा.
अपग्रेडेड आईपैड का इंतजार भी होगा खत्म
ऐप्पल अपनी आईपैड लाइनअप को भी अपग्रेड कर रही है. स्टैंडर्ड iPad 12 को A16 चिप से अपग्रेड कर A18 या A19 प्रोसेसर दिया जाएगा, जो ऐप्पल इंटेलीजेंस सपोर्ट के साथ आएगा. आईपैड मिनी को भी नया और फास्टर चिपसेट, OLED डिस्प्ले और इम्प्रूव्ड स्पीकर के साथ लाया जाएगा. वीयरेबल प्रोडक्ट्स की बात करें तो Apple Watch Series 12 और Apple Watch Ultra 4 का इंतजार भी जल्दी खत्म होगा. इनमें नए एडवांस्ड हेल्थ सेंसर मिलने की उम्मीद है.
इन स्मार्टहोम डिवाइस पर टिकी हैं नजरें
बाकी प्रोडक्ट्स के साथ-साथ ऐप्पल का स्मार्ट होम डिवाइसेस पर भी फोकस है. रिपोर्ट्स के अनुसार, कंपनी एक नया होम हब ला सकती है, जिसमें 7 इंच का डिस्प्ले, A18 और नया सिरी एक्सपीरियंस एड किया जाएगा. इसके अलावा अपडेटेड ऐप्पल टीवी, होमपॉड और होमपॉड मिनी का इंतजार भी जल्द खत्म होने वाला है.
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        <pubDate>Mon, 20 Jul 2026 23:30:13 +0530</pubDate>
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        <title>50,000 से भी ज्यादा की छूट! Samsung Galaxy S25 Ultra पर आ गया सबसे बड़ा डिस्काउंट</title>
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        <description><![CDATA[ Galaxy S25 Ultra Price Crash: अगर आप बजट प्राइस में फ्लैगशिप डिवाइस खरीदना चाह रहे हैं तो सैमसंग के Galaxy S25 Ultra फोन पर शानदार डील मिल रही है. अगर आप इसके डिस्काउंट और बैंक ऑफर्स आदि सब को मिला लें तो 50,000 रुपये से ज्यादा की बचत कर सकते हैं. बता दें कि Galaxy S25 Ultra को लॉन्च हुए भले ही 1.5 साल से अधिक समय हो गया है, लेकिन अपने फीचर्स और लुक के दम पर यह लेटेस्ट मॉडल्स को भी टक्कर देता है. आइए इस फोन के दमदार फीचर्स और इस पर मिल रही छूट के बारे में विस्तार से जान लेते हैं.
Galaxy S25 Ultra में क्या कुछ मिलता है?
सैमसंग ने Galaxy S25 Ultra को 6.9 इंच की QHD+ Dynamic AMOLED 2X स्क्रीन के साथ लॉन्च किया था, जो 120Hz रिफ्रेश रेट को सपोर्ट करती है. इसमें Snapdragon 8 Elite चिपसेट लगा है, जिसे 12GB रैम से पेयर किया गया है. फोटो और वीडियो के लिए फोन के रियर में 200MP का प्राइमरी सेंसर, 50MP का अल्ट्रावाइड लेंस, 50MP का टेलीफोटो सेंसर और 10MP का एडिशनल 3x टेलीफोटो लेंस मिलता है. इसके फ्रंट में 12MP का सेंसर लगा हुआ है. फोन में लगा 5,000mAh का बैटरी पैक 45W फास्ट चार्जिंग को सपोर्ट करता है. डिस्प्ले से लेकर प्रोसेसर और कैमरा से लेकर बैटरी पैक तक के मामले में यह फोन दमदार है.
Galaxy S25 Ultra पर कहां मिल रही छूट?
भारत में इस फोन को 1,29,900 रुपये में लॉन्च किया गया था, लेकिन अभी फ्लिपकार्ट पर यह धांसू डिस्काउंट के साथ उपलब्ध है. फ्लिपकार्ट पर इस फोन को 89,443 रुपये में लिस्ट किया गया है. 40,000 रुपये से ज्यादा के सीधे डिस्काउंट के अलावा इस पर 4,000 रुपये के बैंक ऑफर और 4,000 रुपये का कैशबैक दिया जा रहा है. इस तरह इसकी कीमत 81,443 रुपये रह जाती है. अब अगर आप इसके बदले में पुराने फोन को एक्सचेंज करते हैं तो उस पर भी हजारों रुपये की बचत की जा सकती है. इन सारी चीजों को मिलाकर आप Galaxy S25 Ultra पर 50,000 रुपये से ज्यादा की छूट प्राप्त कर सकते हैं. इस कीमत में यह फ्लैगशिप मॉडल एक धांसू ऑप्शन बन जाता है.&amp;nbsp;
Google Pixel 10 पर भी उठाएं डिस्काउंट का फायदा
इस समय गूगल पिक्सल पर भी डिस्काउंट का फायदा उठाया जा सकता है. 79,999 रुपये में लॉन्च हुआ यह फोन अमेजन पर 67,200 रुपये में लिस्टेड है. इस पर 2,000 रुपये का कैशबैक भी दिया जा रहा है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Mon, 20 Jul 2026 23:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>आपके Power Bank में जरूर होने चाहिए ये 4 सेफ्टी फीचर्स! एक छोटी गलती बना सकती है बड़ा खतरा</title>
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        <description><![CDATA[ Power Bank: स्मार्टफोन के साथ आज कल लोग पावर बैंक का इस्तेमाल भी करने लगे हैं. ये डिवाइस लोगों को ईमरजेंसी स्थिति में काफी काम आता है. बता दें कि आज मार्केट में कई तरह के पावर बैंक मौजूद हैं जो कई घंटों के पावर बैकअप का दावा करते हैं. लेकिन आपको बता दें कि पावर बैंक खरीदते समय उनमें ये 4 सेफ्टी फीचर्स जरुर चेक कर लेने चाहिए नहीं तो बाद में आपको पछताना पड़ सकता है. आइए जानते हैं कौन-कौन से सेफ्टी फीचर्स होते हैं जरूरी.
Temperature Control और Overheat Protection
ज्यादातर पावर बैंक में देखा गया है कि वो चार्जिंग के दौरान हल्के गर्म होने लगते हैं लेकिन डिवाइस का जरूरत से ज्यादा गर्म होना भी खतरनाक साबित हो सकता है. इसलिए ऐसे मॉडल को खरीदना बेहतर होता है जिसमें Temperature Control या Overheat Protection जैसे फीचर मौजूद हों. ये फीचर तापमान बढ़ने पर चार्जिंग स्पीड को कंट्रोल करता है या जरूरत पड़ने पर चार्जिंग बंद कर देता है.
Short Circuit Protection
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अक्सर खराब केबल, धूल या किसी तकनीकी खराबी के कारण शॉर्ट सर्किट हो सकता है. ऐसे में आपके Power Bank में Short Circuit Protection फीचर का होना बहुत जरूरी होता है जो आपको होने वाले खतरे से बचाने में मदद करता है. इससे स्पार्क, आग लगने या डिवाइस को नुकसान पहुंचने जैसी घटनाओं से बचाव होता है.
Overcharge Protection
आपको बता दें कि एक बेहतरीन पावर बैंक में Overcharge Protection जरुर मौजूद होना चाहिए. ये फीचर डिवाइस के पूरी तरह चार्ज होने के बाद अपने आप चार्जिंग को कंट्रोल कर देता है. इससे फोन की बैटरी पर एक्सट्रा दबाव नहीं पड़ता और ओवरहीटिंग या बैटरी खराब होने का खतरा काफी कम हो जाता है. ये फीचर Power Bank की लाइफ भी बढ़ाने में भी मदद करता है.
Overcurrent और Overvoltage Protection
आपको बता दें कि हर स्मार्टफोन को एक निश्चित मात्रा में करंट और वोल्टेज की जरूरत होती है. अब ऐसे में अगर Power Bank जरूरत से ज्यादा करंट या वोल्टेज भेजने लगे तो स्मार्टफोन की बैटरी खराब हो सकती है. इसीलिए पावर बैंक में Overcurrent और Overvoltage Protection फीचर होना चाहिए जो बिजली की सप्लाई को सुरक्षित स्तर पर बनाए रखते हैं जिससे आपका फोन सेफ रहता है और चार्जिंग भी स्थिर रहती है. इसीलिए अगर आप भी पावर बैंक खरीदने का प्लान बना रहे हैं तो इन फीचर्स को जरूर चेक कर लें.
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        <pubDate>Mon, 20 Jul 2026 23:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>कैमरे के सामने रहेंगे फिर भी नहीं होगी पहचान, ये कपड़े पहनकर AI को भी दे देंगे चकमा!</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/कैमरे-के-सामने-रहेंगे-फिर-भी-नहीं-होगी-पहचान-ये-कपड़े-पहनकर-ai-को-भी-दे-देंगे-चकमा</link>
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        <description><![CDATA[ कैमरे के सामने रहेंगे फिर भी नहीं होगी पहचान, ये कपड़े पहनकर AI को भी दे देंगे चकमा! ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 20 Jul 2026 23:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>iPhone Vs Samsung! कौन&amp;सा फोन बेचने पर मिलेगा ज्यादा पैसा? सच जानकर रह जाएंगे हैरान</title>
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        <description><![CDATA[ iPhone Vs Samsung! कौन-सा फोन बेचने पर मिलेगा ज्यादा पैसा? सच जानकर रह जाएंगे हैरान ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 20 Jul 2026 23:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>Instagram और Facebook अचानक हुए ठप! Login से लेकर Feed तक, यूजर्स हुए परेशान, मेटा ने क्या बताई वजह</title>
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        <description><![CDATA[ Instagram and Facebook Down: आज मेटा के दो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम और फेसबुक ने अचानक से काम करना बंद कर दिया जिससे दुनियाभर के यूजर्स को काफी परेशानी का सामना करना पड़ा है. इंस्टाग्राम पर कुछ भी पोस्ट करने में परेशानी हो रही थी तो फेसबुक पर वीडियो पोस्ट या अपलोड नहीं हो रहे थे. बता दें कि इस आउटेज का असर भारत, अमेरिका, सिंगापुर समेत कई देशों में देखने को मिला है.
Instagram पर फीड और मैसेजिंग में परेशानी
Downdetector के मुताबिक, आज भारत में दोपहर करीब 2:20 बजे तक Instagram से जुड़ी करीब 1,900 से ज्यादा शिकायतें दर्ज की गईं थी. यूजर्स ने बताया कि उनका फीड रिफ्रेश नहीं हो रहा था, ऐप के कुछ सेक्शन खुल नहीं रहे थे और डायरेक्ट मैसेज (DM) भेजने में भी समस्या आ रही थी.
हालांकि, सभी यूजर्स को ये परेशानी हो ऐसा सामने नहीं आया है. कुछ लोग ऐप खोल पा रहे थे लेकिन कई फीचर्स काम नहीं कर रहे थे जबकि कुछ के लिए Instagram पूरी तरह से लोड ही नहीं हो रहा था.
Facebook यूजर्स भी रहे परेशान
जानकारी के मुताबिक, ये आउटेज सिर्फ Instagram तक सीमित नहीं था बल्कि Facebook भी इसके लपेटे में था. जी हां, दरअसल, फेसबुक यूजर्स को भी ऐप को इस्तेमाल करने में काफी समस्याएं हुई हैं. भारत में 600 से ज्यादा फेसबुक से संबंधित शिकायतें दर्ज हुईं जिनमें वेबसाइट और ऐप खोलने, न्यूज फीड लोड न होने और अकाउंट फीचर्स तक पहुंचने में दिक्कत शामिल थी.
Meta ने नहीं बताई वजह
आपको बता दें कि फिलहाल अभी तक मेटा ने इस मामले पर कोई जानकारी शेयर नहीं करी है. कंपनी ने ये भी नहीं बताया कि सभी सर्विस पूरी तरह नॉर्मल होने में कितना समय लगेगा. हालांकि, Downdetector पर कुछ समय बाद शिकायतों की संख्या काफी कम हो गई थी जिससे माना जा सकता है कि सर्विस फिर से धीरे-धीरे शुरू हो चुकी हैं.
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        <pubDate>Mon, 20 Jul 2026 07:30:13 +0530</pubDate>
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        <title>Demand of Gen Z Electricians: AI कंपनियां Gen Z इलेक्ट्रिशियन को दे रही 2.7 करोड़ रुपये तक की सैलरी? जानिए क्या है वजह</title>
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        <description><![CDATA[ Demand of Gen Z Electricians: आजकल हर जगह AI&amp;nbsp; चर्चा में है, और इसने नौकरियों की दुनिया को पूरी तरह बदल दिया है. इस साल अकेले Amazon, Meta, Oracle और TCS जैसी बड़ी कंपनियों से मिलाकर करीब 1 लाख 20 हजार से ज्यादा टेक कर्मचारियों की नौकरी जा चुकी है. लेकिन इसी बीच सिलिकॉन वैली में एक ऐसी नौकरी है जो चुपचाप बहुत मुनाफे वाली बन गई है, और वह है इलेक्ट्रिशियन की नौकरी. डर्टी जॉब्स TV शो के फाउंडर माइक रो का कहना है कि AI कंपनियां अब Gen Z के युवा इलेक्ट्रिशियनों को करोड़ों रुपये की सैलरी देने को तैयार हैं. आइए जानते हैं आखिर ऐसा क्यों हो रहा है.&amp;nbsp;
कितनी सैलरी मिल रही है इलेक्ट्रिशियनों को?
माइक रो ने एक पॉडकास्ट में बताया कि उन्होंने दो महीने पहले टेक्सास के प्लानो शहर में एक डेटा सेंटर में कुछ इलेक्ट्रिशियनों से मुलाकात की थी. उन्होंने कहा, &quot;मैंने जिन इलेक्ट्रिशियनों से बात की, वे सभी 30 साल से कम उम्र के थे और उन्हें सालाना 2 लाख 40 हजार डॉलर यानी करीब 2.3 करोड़ रुपये से लेकर 2 लाख 80 हजार डॉलर यानी करीब 2.7 करोड़ रुपये तक की सैलरी मिल रही थी.&amp;nbsp;
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आखिर AI कंपनियों को इलेक्ट्रिशियन की इतनी जरूरत क्यों है?
दरअसल, AI मॉडल्स को चलाने के लिए बहुत बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत होती है, खासकर ऐसे AI डेटा सेंटर की जिनमें हजारों GPU लगे होते हैं. AI की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए कंपनियां लगातार नए-नए डेटा सेंटर बना रही हैं और इसी वजह से डेटा सेंटर बनाने वाली जगहों पर इलेक्ट्रिशियन, वेल्डर और कंस्ट्रक्शन मैनेजर की भारी मांग हो गई है.
Fortune की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका में डेटा सेंटर प्रोजेक्ट पर काम करने वाले कंस्ट्रक्शन वर्कर्स को सामान्य कंस्ट्रक्शन काम से करीब 32 प्रतिशत ज्यादा सैलरी मिल रही है, जो सालाना करीब 81,800 डॉलर यानी करीब 78 लाख रुपये अतिरिक्त बैठती है. एक अन्य रिपोर्ट्स के मुताबिक, डेटा सेंटर बनाने का काम अब दुनियाभर में सबसे ज्यादा मजदूरों की कमी झेल रहा कंस्ट्रक्शन सेक्टर बन गया है.&amp;nbsp;सिर्फ AI डेटा सेंटर ही नहीं, बल्कि प्लंबर, मैकेनिक और टेक्नीशियन जैसी बाकी हाथ से काम करने वाली नौकरियों की मांग भी अभी काफी ज्यादा बनी हुई है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Mon, 20 Jul 2026 07:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>Apple यूजर्स को बड़ा झटका! Mac&amp;iPad के बाद अब ये सर्विस भी हो गई महंगी, जानिए क्या है नई कीमत</title>
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        <description><![CDATA[ Apple One: एप्पल ने हाल ही में अपने आईपैड और मैकबुक की कीमतों में इजाफा किया था. वहीं, अब कंपनी ने एप्पल वन और एप्पल म्यूजिक के सब्सक्रिप्शन प्लान्स को भी महंगा कर दिया है. बता दें कि रैम और स्टोरेज के महंगे होने के कारण कंपनी ने आईपैड और मैकबुक को महंगा किया था. वहीं, अब इन सब्सक्रिप्शन प्लान्स को भी महंगा करके कंपनी ने अपने यूजर्स को एक और झटका दे दिया है. आइए जानते हैं क्या है नई कीमत.
क्यों हुई कीमतों में बढ़ोतरी
Apple के अनुसार, म्यूजिक लाइसेंसिंग पर आने वाला खर्च लगातार बढ़ रहा है. इसी वजह से कंपनी ने Apple Music और Apple One की कीमतों में बढ़ोतरी करने का फैसला लिया है. हालांकि, बढ़ी हुई कीमत के साथ अब यूजर्स को कुछ एडिशनल फीचर्स भी इस्तेमाल करने को मिल जाएंगे.
Apple One प्लान्स भी हुए महंगे
जानकारी के मुताबिक, Apple ने अपने Apple One बंडल सब्सक्रिप्शन की कीमतों में भी बढ़ोतरी की है. इस प्लान के जरिए एक ही मेंबरशिप में Apple Music, Apple TV+, Apple Arcade, iCloud+, Apple Fitness+ जैसे फीचर्स मिल जाएंगे.

Individual Plan की नई कीमत 195 रुपये.
Family Plan की नई कीमत 295 रुपये.
Premier Plan की नई कीमत 995 रुपये.

आपको बता दें कि स्ट्रीमिंग सर्विसेज की कीमतों को सिर्फ एप्पल ने ही नहीं बढ़ाया है. बता दें कि इससे पहले Spotify ने भी अमेरिका सहित कई देशों में अपने Individual और Family सब्सक्रिप्शन प्लान्स की कीमतों में बढ़ोतरी की थी.
महंगा हुआ Apple Music
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, अब Apple Music इस्तेमाल करने वाले ग्राहकों को पहले के मुकाबले ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ेंगे. बता दें कि कंपनी ने ज्यादातर मेन प्लान्स की कीमतों में इजाफा किया है. जानकारी के अनुसार, कंपनी ने Individual Plan की कीमत को 119 रुपये से बढ़ाकर 139 रुपये प्रति माह कर दी है. वहीं, Family Plan की कीमत को 179 रुपये से बढ़ाकर 229 रुपये प्रति माह और Student Plan की कीमत को 59 रुपये की जगह 69 रुपये प्रति माह कर दिया है.
माना जा रहा है कि आने वाले समय में और भी स्ट्रीमिंग प्लान्स की कीमतों में बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है. हालांकि, फिलहाल भारत में एप्पल ने इन कीमतों में बढ़ोतरी करके अपने यूजर्स को जरूर निराश किया है.
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        <pubDate>Mon, 20 Jul 2026 07:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>अब कपड़े पहनाएंगे रोबोट! इस नई टेक्नोलॉजी ने पूरी दुनिया को कर दिया हैरान, जानिए किस देश ने किया ये कारनामा</title>
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        <description><![CDATA[ Robot: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आज के समय में पूरी दुनिया में काफी तेजी से अपने पैर पसार रहा है. एक तरह ये लोगों की नौकरी पर खतरा बना हुआ है तो वहीं, दूसरी तरफ, एआई की मदद से ऐसे-ऐसे रोबोट्स तैयार हो रहे हैं जो मुश्किल से मुश्किल काम मिनटों में निपता देंगे. इसी कड़ी में बता दें कि दक्षिण कोरिया और अमेरिका ने वैज्ञानिकों की टीम ने एक ऐसा रोबोट तैयार किया है जो अब आपको कपड़े पहनाने का काम करेगा.
क्या है ये नई टेक्नोलॉजी
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, ये टेक्नोलॉजी दक्षिण कोरिया के KAIST और अमेरिका की Stanford University के शोधकर्ताओं ने तैयार की है. इसमें कपड़ों के अंदर बेहद मुलायम और फ्लेक्सिबल एयर-प्रेशर बेस्ड ट्यूब (वाइन रोबोट) लगाई गई हैं. इनमें हवा भरते ही ये ट्यूब एक्टिव हो जाती हैं और धीरे-धीरे कपड़ों को आपके शरीर के ऊपर चढ़ाती हैं. इसके अलावा इस टेक्नोलॉजी की सबसे बड़ी खास बात ये है कि कपड़े पहनने के लिए इंसान को एक जगह पर स्थिर खड़े रहने की भी जरूरत नहीं होती है. आप अपना काम करते रहिए और रोबोट आपको धीरे-धीरे कपड़े पहना देगा.
कैसे करता है काम
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि वैज्ञानिकों का कहना है कि इस टेक्नोलॉजी की सबसे बड़ी खासियत ये है कि इसे चलाने के लिए किसी मुश्किल कंट्रोल एल्गोरिद्म की जरूरत नहीं होती है. ये शरीर की बनावट के अनुसार खुद ही अपना रास्ता बनाते हुए आगे बढ़ती है और आसानी से कपड़े पहनाने का काम पूरा कर देती है.
महज इतने समय में पहन लेंगे सूट
बता दें कि इस शोधकर्ता किम नाम ग्यून के अनुसार, उन्हें इस टेक्नोलॉजी का आईडिया तब आया जब वे साइकिल चला रहे थे और अचानक बारिश शुरू हो गई. उन्होंने सोचा कि अगर रेनकोट अपने आप शरीर पर चढ़ जाए तो ये कितना बढ़िया होगा.
उन्होंने बताया कि ये रोबोटिक सिस्टम कपड़े को अंदर से बाहर की ओर पलटते हुए शरीर के साइज के अनुसार आगे बढ़ता है. इसकी मदद से आप लगभग 10 सेकंड में एक पूरा सूट पहन लेंगे.
बुजुर्गों से लेकर इमरजेंसी सर्विसेज में होगा फायदा
वैज्ञानिकों का मानना है कि ये टेक्नोलॉजी बुजुर्गों, दिव्यांगों और ऐसे लोगों के लिए बेहद फायदेमंद होगी जिन्हें खुद कपड़े पहनने में कठिनाई होती है. इसके अलावा सेमीकंडक्टर क्लीनरूम, दमकल कर्मियों, मेडिकल स्टाफ और दूसरी आपातकालीन सर्विसेज में, जहां कुछ ही सेकंड में सुरक्षा किट पहनना जरूरी होता है, वहां भी इसका अच्छे से इस्तेमाल हो सकता है.
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        <title>Preventing Wi&amp;Fi Hacking:  रसोई की ये सस्ती चीज Hack होने से बच सकता है Wi&amp;Fi, जानिए कैसे </title>
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        <description><![CDATA[ Preventing Wi-Fi Hacking:&amp;nbsp; अगर आपको लगता है कि Wi-Fi को हैक होने से बचाने के लिए महंगे गैजेट या टेक्निकल सेटिंग्स की ही जरूरत होती है, तो यह खबर आपके लिए है. दरअसल, इन दिनों सोशल मीडिया पर एक ऐसी ट्रिक काफी वायरल हो रही है, जिसमें बताया जा रहा है कि रसोई में मिलने वाली एक बेहद सस्ती चीज, यानी एल्यूमिनियम फॉयल, आपके Wi-Fi राउटर को बेहतर बनाने के साथ-साथ उसे हैक होने से भी बचा सकते हैं. सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में यह दावा किया गया कि राउटर के पीछे एल्यूमिनियम फॉयल लगाने से फायदा होता हैआइए जानते हैं इसके बारे में कि आखिर यह ट्रिक कैसे काम करती है.&amp;nbsp;
आखिर एल्यूमिनियम फॉयल कैसे काम करती है?
दरअसल, Wi-Fi राउटर अपने चारों तरफ हर दिशा में इंटरनेट सिग्नल भेजता है. इसमें वो जगहें भी शामिल होती हैं जहां सिग्नल की जरूरत ही नहीं होती, जैसे कि आपके घर के बाहर की जगह. जब इसे राउटर के पीछे सही तरीके से लगाया जाता है, तो यह बाहर की तरफ जाने वाले सिग्नल को वापस घर के अंदर की तरफ मोड़ देती है, इससे फायदा यह होता है कि जिन जगहों पर आपके घर में सिग्नल कमजोर आता है, वहां सिग्नल की ताकत बढ़ जाती है. और चूंकि सिग्नल घर से बाहर कम लीक होता है, इसलिए बाहर मौजूद कोई भी व्यक्ति आपके नेटवर्क को आसानी से डिटेक्ट नहीं कर पाता, जिससे नेटवर्क के गलत हाथों में जाने का खतरा भी कुछ हद तक कम हो जाता है.&amp;nbsp;
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कैसे लगाएं फॉयल&amp;nbsp;
इस ट्रिक को सही तरीके से इस्तेमाल करने के लिए एल्यूमिनियम फॉयल को राउटर के पीछे इस तरह लगाएं कि उसका मुड़ा हुआ हिस्सा उस दिशा की तरफ हो, जहां आपको बेहतर सिग्नल चाहिए. हालांकि यह भी ध्यान रखने वाली बात है कि फॉयल की रिफ्लेक्टिव क्षमता कभी-कभी सिग्नल के आपस में टकराने जैसी दिक्कत भी पैदा कर सकती है, इसलिए फॉयल को अलग-अलग पोजीशन में लगाकर देखें और इंटरनेट स्पीड चेक करते रहें.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Mon, 20 Jul 2026 07:30:09 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>New Gadgets Launched: इस हफ्ते लॉन्च हुए 7 नए गैजेट्स, Samsung से Asus तक कई बड़े ब्रांड शामिल...देखें पूरी लिस्ट</title>
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        <description><![CDATA[ New Gadgets Launched : अगर आप नया गैजेट खरीदने का प्लान बना रहे हैं, तो बीते कुछ दिनों में टेक मार्केट में कई बड़े लॉन्च देखने को मिले हैं. कुछ ही दिनों में एक के बाद एक कई नए डिवाइस भारतीय बाजार में लॉन्च किए गए. इस दौरान Samsung, Asus, Gigabyte समेत कई बड़ी कंपनियों ने अपने नए प्रोडक्ट्स भारतीय बाजार में उतारे हैं. इनमें Wi-Fi स्पीकर, गेमिंग लैपटॉप, प्रीमियम टैबलेट और वायरलेस ईयरबड्स जैसे कई नए गैजेट्स शामिल हैं. अगर आप इस हफ्ते हुए बड़े लॉन्च मिस कर गए हैं, तो आइए आज हम आपको बताते हैं कि इस हफ्ते लॉन्च हुए 7 नए गैजेट्स कौन से हैं.&amp;nbsp;
Samsung Music Studio 5 और Music Studio 7
Samsung ने भारत में अपने नए Music Studio 5 और Music Studio 7 Wi-Fi स्पीकर लॉन्च किए हैं. इन स्पीकर्स का गोल डॉट डिजाइन इन्हें सामान्य स्पीकर की बजाय होम डेकोर जैसा लुक देता है. Music Studio 7 में 3.1.1 चैनल ऑडियो और टॉप-फायरिंग स्पीकर्स दिए गए हैं, जिससे बेहतर और दमदार साउंड मिलता है. वहीं Music Studio 5 छोटे कमरों के लिए तैयार किया गया है. इन दोनों स्पीकर्स में Wi-Fi Streaming, Bluetooth, SmartThings सपोर्ट, Voice Control और Samsung Q-Symphony फीचर मिलता है. इन्हें अकेले भी इस्तेमाल किया जा सकता है और Samsung TV या Soundbar के साथ भी जोड़ा जा सकता है. इनकी शुरुआती कीमत 27,900 रुपये है. इन्हें Samsung की वेबसाइट, ऑफलाइन स्टोर्स और प्रमुख ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म से खरीदा जा सकता है.&amp;nbsp;
Gigabyte Gaming A16
Gigabyte ने भारत में अपना पहला Made in India Gaming Laptop लॉन्च किया है. कंपनी ने इसे Dixon Technologies के साथ मिलकर भारत में तैयार किया है. &amp;nbsp;यह लैपटॉप AMD Ryzen Processor के साथ आता है और गेमिंग के अलावा AI आधारित कामों के लिए भी बनाया गया है. कंपनी के मुताबिक यह गेमर्स, स्टूडेंट्स, प्रोफेशनल्स और कंटेंट क्रिएटर्स सभी के लिए उपयोगी हो सकता है. Gigabyte Gaming A16 भारत में कंपनी के रजिस्टर बिक्री चैनलों पर उपलब्ध है.&amp;nbsp;
Asus Pad T3201
Asus ने भारतीय टैबलेट बाजार में वापसी करते हुए नया Asus Pad T3201 लॉन्च किया है. इस टैबलेट में 12.2 इंच का 2.8K Dual Layer OLED Display दिया गया है, जो 144Hz Refresh Rate और 2000 Nits Peak Brightness के साथ आता है. यह MediaTek Dimensity 8300 Processor, 8GB RAM, 256GB तक स्टोरेज और 9000mAh बैटरी से लैस है, जिसमें 45W Fast Charging का सपोर्ट मिलता है. इसके अलावा इसमें Dolby Atmos वाले Quad Speakers, Android 16, Asus Pen 2.0 और Bluetooth Keyboard का सपोर्ट भी मिलता है. कंपनी बॉक्स में एक Protective Folio Case भी दे रही है. &amp;nbsp;यह टैबलेट 6 अगस्त से Flipkart, Asus eShop, Asus और ROG Stores, Reliance Digital और अन्य रजिस्टर स्टोर्स पर उपलब्ध होगा.&amp;nbsp;
Urbn Atom Link 5-in-1 Magnetic Power Bank
Urbn ने Atom Link 5-in-1 Magnetic Power Bank लॉन्च किया है, जिसे खासतौर पर Apple डिवाइस इस्तेमाल करने वाले यूजर्स के लिए तैयार किया गया है. &amp;nbsp;इसमें 10,000mAh बैटरी, 20W Wired Fast Charging और 15W Magnetic Wireless Charging का सपोर्ट मिलता है. &amp;nbsp;पावर बैंक में USB Type-C और Lightning Cable पहले से लगी हुई हैं. इसके अलावा इसमें Apple Watch चार्ज करने की सुविधा भी मिलती है. कंपनी इसके साथ MagTag Ring भी देती है, जिससे दूसरे स्मार्टफोन में भी मैग्नेटिक चार्जिंग का इस्तेमाल किया जा सकता है. इसकी कीमत 2,799 रुपये रखी गई है. यह Black और Blue रंग में उपलब्ध है.&amp;nbsp;
Realme C100x 4G
Realme ने बजट सेगमेंट में नया Realme C100x 4G लॉन्च किया है. इस फोन की सबसे बड़ी खासियत इसकी 8000mAh बैटरी है, जिसे कंपनी कई दिनों तक चलने वाली बैटरी बता रही है. फोन में 45W Fast Charging और 6W Reverse Charging का सपोर्ट मिलता है. इसके अलावा इसमें 120Hz Display, 50MP AI Rear Camera, IP64 Dust और Water Resistance और ArmourShell Protection दी गई है. &amp;nbsp;इसकी शुरुआती लॉन्च कीमत 14,499 रुपये है, जबकि इसकी नियमित कीमत 14,999 रुपये होगी. यह Flipkart, Realme की वेबसाइट और ऑफलाइन स्टोर्स पर उपलब्ध है.&amp;nbsp;
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Just Corseca JC SkySport Smartwatch और JC Sleepods Earbuds
Just Corseca ने इस हफ्ते दो नए प्रोडक्ट लॉन्च किए हैं. JC SkySport Smartwatch में 2.01 इंच HD Display, Bluetooth Calling, Heart Rate Monitoring, कई Sports Modes, Built-in Flashlight और Moisture Resistant Design मिलता है. वहीं JC Sleepods Earbuds खासतौर पर उन लोगों के लिए डिजाइन किए गए हैं जो करवट लेकर सोते समय भी ईयरबड्स इस्तेमाल करते हैं. इनमें 10mm Drivers, Smart Touch Control, Noise Isolation और 30 घंटे तक का बैटरी बैकअप मिलता है. &amp;nbsp;स्मार्टवॉच की कीमत 1,499 रुपये और ईयरबड्स की कीमत 1,999 रुपये रखी गई है.&amp;nbsp;
Goboult Tenet Pro
Goboult ने अपने नए Tenet Pro Wireless Earbuds भी लॉन्च किए हैं. इन ईयरबड्स में 32dB Active Noise Cancellation (ANC), 13mm Dynamic Drivers, Quad Mic ENC, Dual Device Connectivity और 75 घंटे तक का कुल बैटरी बैकअप मिलता है. कंपनी का कहना है कि बेहतर फिट के लिए इसमें LiDAR आधारित Ergonomic Design का इस्तेमाल किया गया है, जिससे लंबे समय तक इस्तेमाल करने में भी आराम मिलता है. इनकी लॉन्च कीमत 1,499 रुपये रखी गई है, जबकि नियमित कीमत 1,699 रुपये होगी. यह Crimson Red, Frost White और Olive Green रंगों में उपलब्ध हैं.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Sun, 19 Jul 2026 15:30:18 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Microphone permission: फोन में कौन&amp;कौन से ऐप्स आपका माइक्रोफोन इस्तेमाल कर रहे हैं? ऐसे करें चेक</title>
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        <description><![CDATA[ Microphone permission: आजकल लगभग हर ऐप माइक्रोफोन की परमिशन मांगता है. चाहे WhatsApp हो, Instagram, Facebook या फिर कोई गेम. कई बार हम बिना सोचे-समझे &#039;Allow&#039; पर टैप कर देते हैं. बाद में यह भी याद नहीं रहता कि किस ऐप को माइक्रोफोन इस्तेमाल करने की परमिशन दी थी. अगर आपके फोन में भी कई ऐप्स हैं, तो एक बार जरूर चेक कर लें कि कौन-कौन से ऐप्स आपके माइक्रोफोन का इस्तेमाल कर सकते हैं.
अच्छी बात यह है कि Android और iPhone दोनों में यह देखना बहुत आसान है. कुछ सेकंड में आपको पता चल जाएगा कि किन ऐप्स के पास माइक्रोफोन की परमिशन है. अगर कोई ऐसा ऐप दिखे जिसकी जरूरत नहीं है, तो उसकी परमिशन तुरंत बंद कर सकते हैं.
क्यों जरूरी है यह चेक करना?
फोन का माइक्रोफोन आपकी आवाज रिकॉर्ड करने के काम आता है. कॉल करने, वीडियो बनाने, वॉइस मैसेज भेजने और ऑनलाइन मीटिंग के दौरान इसकी जरूरत पड़ती है. लेकिन अगर किसी ऐसे ऐप के पास भी माइक्रोफोन की परमिशन है जिसका आप इस्तेमाल नहीं करते, तो उसे बंद कर देना ही बेहतर होता है. इससे आपका फोन भी ज्यादा सुरक्षित रहता है और आपकी निजी जानकारी भी सुरक्षित रहती है.
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Android फोन में ऐसे करें चेक:
अगर आप Android फोन इस्तेमाल करते हैं, तो सबसे पहले Settings खोलें. इसके बाद Privacy या Security &amp;amp; Privacy में जाएं. यहां Permission Manager या App Permissions का ऑप्शन मिलेगा. उस पर टैप करें और फिर Microphone चुनें. अब आपके सामने उन सभी ऐप्स की लिस्ट आ जाएगी जिन्हें माइक्रोफोन इस्तेमाल करने की परमिशन मिली हुई है. अगर आपको कोई ऐसा ऐप दिखता है जिसे इसकी जरूरत नहीं है, तो उस पर टैप करके Don&#039;t Allow या Deny कर दें.
ध्यान रखें कि Samsung, Vivo, Oppo, Xiaomi और दूसरी कंपनियों के फोन में इन सेटिंग्स के नाम थोड़ा अलग हो सकते हैं. लेकिन तरीका लगभग एक जैसा ही रहता है.
iPhone यूजर्स ऐसे करें चेक:
अगर आपके पास iPhone है, तो Settings में जाएं. इसके बाद Privacy &amp;amp; Security पर टैप करें और फिर Microphone खोलें. यहां आपको उन सभी ऐप्स की लिस्ट दिखाई देगी जिन्हें माइक्रोफोन इस्तेमाल करने की परमिशन मिली हुई है. अगर किसी ऐप को इसकी जरूरत नहीं है, तो उसके सामने दिया गया स्विच बंद कर दें. इसके बाद वह ऐप माइक्रोफोन का इस्तेमाल नहीं कर पाएगा.
कैसे पता चलेगा कि अभी माइक्रोफोन इस्तेमाल हो रहा है?
अगर आपके फोन में कोई ऐप उस समय माइक्रोफोन इस्तेमाल कर रहा होगा, तो फोन खुद आपको इसका संकेत देता है. Android फोन में स्क्रीन के ऊपर हरे रंग का डॉट या माइक्रोफोन का निशान दिखाई दे सकता है. वहीं iPhone में ऊपर की तरफ नारंगी रंग का छोटा डॉट दिखता है. अगर यह निशान उस समय भी दिखाई दे जब आप कोई कॉल या रिकॉर्डिंग नहीं कर रहे हैं, तो एक बार जरूर चेक करें कि कौन-सा ऐप खुला हुआ है.
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        <pubDate>Sun, 19 Jul 2026 15:30:17 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>सावधान! Dehumidifier इस्तेमाल करने वालों के लिए बड़ी चेतावनी, ऐसा करने से हो सकता है बड़ा हादसा</title>
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        <description><![CDATA[ Dehumidifier: बरसात के मौसम में ज्यादातर लोग उमस भरी गर्मी से परेशान रहते हैं. ऐसे में लोग एसी का इस्तेमाल करते हैं जो उनके कमरे से नमी को कुछ हद तक कम करने का काम करती है. लेकिन बढ़ती टेक्नोलॉजी के साथ ही आज मार्केट में Dehumidifier डिवाइस भी आ चुका है जो घर में मौजूद नमी को पूरी तरह से कम करने का काम करता है. लेकिन कई बार लोग इस डिवाइस को गलत तरीके से इस्तेमाल करते हैं जिससे बड़ा हादसा होने की संभावना बढ़ जाती है.
कैसे काम करता है Dehumidifier
जानकारी के मुताबिक, ये एक ऐसा इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस है जो कमरे की हवा में मौजूद एक्सट्रा नमी (Humidity) को कम करता है. इसका इस्तेमाल खासतौर पर बरसात के मौसम, बेसमेंट, स्टोर रूम या ऐसे घरों में किया जाता है जहां नमी ज्यादा रहती है. ये फफूंदी, बदबू और नमी से होने वाले नुकसान को कम करने में मदद करता है.
कैसे लग सकती है आग
दरअसल, एक्सपर्ट्स के अनुसार, Dehumidifier लंबे समय तक लगातार चलने, खराब वायरिंग, ओवरहीटिंग या पुराने मॉडल होने की वजह से आग लगने का खतरा पैदा कर सकता है. अगर मशीन के अंदर धूल जमा हो जाए या एयर वेंट बंद हो जाएं तो मोटर जरूरत से ज्यादा गर्म होने लगता है. ऐसी स्थिति में शॉर्ट सर्किट या आग लगने की संभावना काफी हद तक बढ़ जाती है.
कैसे रखें डिवाइस को सेफ
अगर आप भी अपने Dehumidifier को सुरक्षित रखना चाहते हैं तो कुछ जरूरी चीजों को ध्यान में रखना चाहिए. हमेशा डिवाइस को फ्लैट और मजबूत सतह पर रखें. इसके एयर इनलेट और आउटलेट के आसपास अच्छी खासी खाली जगह छोड़ें ताकि हवा आसानी से निकल सके. समय-समय पर फिल्टर और वेंट की सफाई करते रहें जिससे डिवाइस में धूल न जमा होने पाए और डिवाइस ओवरहीटिंग के खतरे से बचा रहे. अगर मशीन से जलने जैसी गंध, अजीब तरह की आवाज या जरूरत से ज्यादा गर्मी महसूस हो तो तुरंत इसे बंद करके बिजली का प्लग निकाल दें.
इन गलतियों से बचें
जानकारी के लिए बता दें कि Dehumidifier का इस्तेमाल करते समय कुछ जरूरी चीजों का ध्यान रखना चाहिए और छोटी-मोटी गलतियों से भी बचना चाहिए. बता दें कि इसे कभी भी पर्दों, फर्नीचर या दीवार से बिल्कुल सटाकर नहीं रखना चाहिए क्योंकि इससे हवा का फ्लो रुक जाता है. एक्सटेंशन बोर्ड या सस्ते मल्टीप्लग में इसे लगाने से भी बचें. साथ ही, पानी से भरा टैंक समय पर खाली करें और डिवाइस को लंबे समय तक बिना निगरानी के लगातार चालू न छोड़ें.
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        <pubDate>Sun, 19 Jul 2026 15:30:16 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>सावधान, Dehumidifier, इस्तेमाल, करने, वालों, के, लिए, बड़ी, चेतावनी, ऐसा, करने, से, हो, सकता, है, बड़ा, हादसा</media:keywords>
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        <title>क्या आपका OLED TV जरूरत से ज्यादा हो रहा है गर्म? ये हो सकता है कारण, जानिए क्या करें</title>
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        <description><![CDATA[ OLED TV: टेक्नोलॉजी की दुनिया में लोग अपने घरों में स्मार्ट डिवाइसेज का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं. इसी कड़ी में बता दें कि अब लोगों के घरों में स्मार्ट टीवी भी खूब देखने को मिलते हैं. मार्केट में कई प्रकार के स्मार्ट टीवी मिलते हैं जिसमें तरह-तरह के डिस्प्ले होते हैं. अक्सर देखा गया है कि OLED TV ज्यादा इस्तेमाल होने पर गर्म होने लगता है. हालांकि, इस डिस्प्ले में यूजर को शानदार पिक्चर क्वालिटी, गहरे ब्लैक कलर और बेहतरीन कंट्रास्ट जैसी सुविधा मिलती है. लेकिन कई बार यूजर्स शिकायत करते हैं कि उनका OLED TV इस्तेमाल के दौरान काफी गर्म हो जाता है. आइए जानते हैं कि क्या होता है इसका कारण और इसे कैसे ठीक कर सकते हैं.
क्यों गर्म होता है OLED TV
जानकारी के मुताबिक, OLED पैनल में हर पिक्सल खुद लाइट पैदा करता है. अब जब स्क्रीन पर ब्राइट कंटेंट, HDR वीडियो या लंबे समय तक गेमिंग चलती है तो पिक्सल ज्यादा बिजली खर्च करते हैं. इससे टीवी के अंदर गर्मी पैदा होती है. हालांकि, इसके अलावा कुछ दूसरे कारण भी हो सकते हैं जिससे टीवी ज्यादा गर्म होने लगती है जैसे ब्राइटनेस और कॉन्ट्रास्ट बहुत ज्यादा होना, खराब वेंटिलेशन, टीवी का दीवार से बहुत पास लगा होना, लंबे समय तक लगातार इस्तेमाल होना, गर्म मौसम या कमरे का ज्यादा तापमान भी गर्म होने का कारण बन सकती हैं.
कब होता है खतरा
आपको बता दें कि अगर स्मार्ट टीवी हल्का गर्म होती है तो ये नॉर्मल है इससे घबराने की जरूरत नहीं होती है. टीवी के पीछे या किनारों पर गर्माहट महसूस हो सकती है. लेकिन अगर टीवी छूने पर बहुत ज्यादा गर्म लगे, बार-बार ऑटोमैटिक बंद हो जाए, स्क्रीन पर वॉर्निंग मैसेज आए, पिक्चर क्वालिटी खराब होने लगे तो ये तुरंत टीवी को टेक्नीशियन से चेक कराना चाहिए.
क्या है समाधान
बता दें कि OLED TV की ब्राइटनेस अक्सर डिफॉल्ट रूप से काफी ज्यादा सेट होती है. अगर आप पूरे दिन ज्यादा ब्राइटनेस पर टीवी चलाते हैं तो इससे टीवी में ज्यादा गर्मी बढ़ सकती है. इसके अलावा Brightness और OLED Light को थोड़ा कम करें. साथ ही टीवी और दीवार के बीच कुछ जगह छोड़ें. हर कुछ घंटों में छोटा ब्रेक देने से भी गर्माहट कम हो जाती है. इसके अलावा अगर रूम में पंखा या एसी है तो उसे चलाने से भी गर्मी गम हो जाती है. अगर टीवी बार-बार बंद होती है तो Eco Mode या Energy Saving Mode फीचर को ऑन करके रखना चाहिए.
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        <pubDate>Sun, 19 Jul 2026 15:30:15 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>अगर आपके CPU में भी दिखे ये 5 संकेत तो समझ जाइए हो गया है खराब, समय रहते पहचानें वरना हो सकता है बड़ा नुकसान</title>
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        <description><![CDATA[ Tech Tips: CPU (Central Processing Unit) किसी भी सिस्टम का सबसे जरूरी हिस्सा माना जाता है. अगर इसमें हल्की सी भी खराबी आती है तो आपका पूरा सिस्टम इससे प्रभावित होता है. इसके अलावा समय-समय पर सीपीयू को चेक करते रहना चाहिए क्योंकि ये पूरे सिस्टम का कंट्रोल सिस्टम भी होता है जो अगर खराब होता है तो आपको सही कराने में काफी पैसे खर्च करने पड़ सकते हैं. इसी कड़ी में आज हम आपको बताने जा रहे हैं ऐसे 5 बड़े संकेत के बारे में जिसे नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है. इसीलिए अगर आपका सीपीयू भी ये संकेत दे तो तुरंत सिस्टम को टेक्नीशियन से चेक कराना चाहिए.&amp;nbsp;
अचानक परफॉर्मेंस कम हो जाए
अगर आपका कंप्यूटर पहले के मुकाबले खराब परफॉर्मेंस देने लगे या फिर अचानक से आपका सिस्टम खराब परफॉर्मेस देने लगे तो समझ जाइए कि आपके सीपीयू में कुछ गड़बड़ी है. हालांकि इसके पीछे दूसरे हार्डवेयर कारण भी हो सकते हैं इसलिए पहले अच्छे से चेक कर लेना बेहतर होता है.
जरूरत से ज्यादा गर्म होना
इसके साथ ही अगर आपका CPU जरूरत से ज्यादा गर्म हो रहा है तो समझ जाइए कि सिस्टम में कुछ खराबी है. अगर सिस्टम का फैन लगातार तेज आवाज कर रहा है, लैपटॉप या डेस्कटॉप जरूरत से ज्यादा गर्म हो रहा है या तापमान बहुत ज्यादा है तो ये CPU पर एक्सट्रा दबाव या कूलिंग सिस्टम में खराबी हो सकती है. लंबे समय तक ओवरहीटिंग CPU को भारी नुकसान पहुंचा सकता है.&amp;nbsp;
बूट होने में दिक्कत
आपको बता दें कि अगर कंप्यूटर का पावर बटन दबाने पर सिस्टम सही तरीके से स्टार्ट नहीं होता, बार-बार बूट लूप में फंस जाता है या BIOS तक नहीं पहुंच पाता तो ये CPU या मदरबोर्ड से जुड़ी समस्या का संकेत हो सकता है. ऐसी स्थिति में हार्डवेयर टेस्ट करवाना चाहिए जिससे असली कारण सामने आ सकेगा.
कंप्यूटर बार-बार क्रैश या फ्रीज होना
अक्सर देखा गया है कि काम करते समय बार-बार कंप्यूटर फ्रीज हो जाता है या फिर अचानक रीस्टार्ट हो जाता है या ब्लू स्क्रीन जैसी समस्या आने लगती है. अगर आपके साथ ही ऐसा होता है तो ये CPU में गड़बड़ी का संकेत हो सकता है. हालांकि ऐसा RAM या स्टोरेज की समस्या के कारण भी हो सकता है लेकिन लगातार ऐसा होना नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.
बार-बार सिस्टम में गड़बड़ी
इतना ही नहीं, अगर कंप्यूटर में अलग-अलग सॉफ्टवेयर बिना कारण बंद हो रहे हैं, फाइलें करप्ट होने लगी हैं या सिस्टम लगातार अजीब एरर दिखा रहा है तो इसका मतलब है कि CPU सही तरीके से काम नहीं कर पा रहा है. ऐसे मामलों में प्रोफेशनल डायग्नोस्टिक टेस्ट कराना ही सही ऑप्शन होता है.&amp;nbsp;
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Google Maps में Blue Line का असली काम क्या होता है? 90% यूजर्स आज भी हैं कन्फ्यूज
&amp;nbsp; ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 19 Jul 2026 15:30:13 +0530</pubDate>
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        <title>कहीं Google AI तो नहीं पढ़ रहा आपके निजी ईमेल? इन तरीकों से बनी रहेगी आपकी प्राइवेसी</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/कहीं-google-ai-तो-नहीं-पढ़-रहा-आपके-निजी-ईमेल-इन-तरीकों-से-बनी-रहेगी-आपकी-प्राइवेसी</link>
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        <description><![CDATA[ कहीं Google AI तो नहीं पढ़ रहा आपके निजी ईमेल? इन तरीकों से बनी रहेगी आपकी प्राइवेसी ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 19 Jul 2026 03:30:15 +0530</pubDate>
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        <title>Apple यूजर्स की मौज! अब इस नए डिस्प्ले के साथ आएगा नया iPad Mini, जानें पूरी जानकारी</title>
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        <description><![CDATA[ Apple iPad Mini: एप्पल के कई सारे प्रोडक्ट्स मार्केट में मौजूद हैं जिन्हें यूजर्स काफी पसंद करते हैं. वैसे तो आईफोन को पूरी दुनिया में पसंद किया जाता है लेकिन एप्पल के बाकी प्रोडक्ट्स भी कई यूजर्स को पसंद आते हैं. इसी कड़ी में बता दें कि एप्पल आईपैड मिनी भी बाजार में एक चर्चित डिवाइस है. कंपनी अब इस डिवाइस को नए डिस्प्ले के साथ बाजार में लॉन्च करने की तैयारी कर रही है. आइए जानते हैं पूरी जानकारी.
पहली बार मिलेगा OLED Panel
दरअसल, Bloomberg के मार्क गुरमन की रिपोर्ट के अनुसार, Apple एक नए iPad Mini पर काम कर रहा है जिसका इंटरनल कोडनेम J510 बताया जा रहा है. जानकारी के लिए बता दें कि ये इस डिवाइस के लिए 2021 के बाद पहला बड़ा अपडेट साबित होने वाला है. बता दें कि नए iPad Mini में OLED डिस्प्ले दिया जा सकता है जो इसे मौजूदा LCD स्क्रीन से काफी बेहतर बनाएगा. बेहतर कलर, ज्यादा कंट्रास्ट और शानदार विजुअल एक्सपीरियंस के कारण ये अपग्रेड कॉम्पैक्ट टैबलेट सेगमेंट में बड़ा बदलाव साबित हो सकता है. इससे पहले प्रो मॉडल्स में OLED टेक्नोलॉजी देखने को मिलती थी.
स्टैंडर्ड iPad में बना रहेगा LCD Display
इतना ही नहीं, जानकारी के मुताबिक, जहां iPad Mini और iPad Air में OLED स्क्रीन आने की चर्चा हो रही है. वहीं नॉर्मल iPad मॉडल में फिलहाल LCD डिस्प्ले ही देखने को मिलेगा. ऐसा इसलिए किया जा रहा है जिससे डिवाइस की कीमत कंट्रोल में रहे. इसके साथ ही माना जा रहा है कि एप्पल पेंसिल को भी कंपनी जल्द ही बाजार में उतारने की तैयारी में है. इस नए डिवाइस में यूजर्स को एक नई टेक्नोलॉजी देखने को मिलेगी.
नया iPad होगा लॉन्च
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि Apple सिर्फ iPad Mini तक सीमित नहीं रहने वाला है. कंपनी एक नए एंट्री-लेवल iPad पर भी काम कर रही है जिसके जल्द ही भारतीय मार्केट में लॉन्च होने की उम्मीद है. माना जा रहा है कि इस नए मॉडल में बहुत पावरफुल प्रोसेसर भी देखने को मिल सकता है जिससे इसकी परफॉर्मेंस भी काफी बेहतर हो सकती है. हालांकि, इसके डिजाइन में कोई खास बदलाव नहीं देखने को मिलेगा.
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        <pubDate>Sun, 19 Jul 2026 03:30:13 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>X पर कंटेंट चोरी करने वालों की अब खैर नहीं! AI अब पहले से 3 गुना तेजी से पकड़ेगा कॉपी किए गए पोस्ट</title>
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        <description><![CDATA[ X AI Feature: सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X काफी समय से एआई या कॉपी पेस्ट कंटेंट से जूझ रहा था. इसी को देखते हुए अब कंपनी ने एक नया एआई फीचर उतार दिया है जिसकी मदद से अब कंटेंट चोरी करने वालों पर लगाम लगेगी. इसके साथ ही ये फीचर पहले के मुकाबले काफी तेजी से कॉपी किए गए कंटेंट को भी पकड़ने में सक्षम होगा. आइए जानते हैं कैसे काम करेगा ये नया फीचर.
ओरिजिनल कंटेंट को मिलेगा बढ़ावा
जानकारी के लिए बता दें कि X अब प्लेटफॉर्म पर ओरिजिनल कंटेंट को बढ़ावा देने के लिए नए कदम उठा रहा है. ये नया सिस्टम भी इसी प्लान के अनुसार है. हाल ही में कंपनी ने नया वीडियो रिकॉर्डर और एडिटर भी लॉन्च किया है जिससे यूजर्स सीधे X पर ही वीडियो रिकॉर्ड और एडिट कर सकते हैं.
टेक्स्ट पोस्ट भी आएंगे पकड़ में
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, नया AI सिस्टम काफी एडवांस है. ये सिस्टम बिना क्रेडिट दिए दोबारा शेयर किए गए वायरल टेक्स्ट पोस्ट की भी पहचान कर सकता है. बता दें कि अगर कोई यूजर किसी भी तरह से दूसरे की पोस्ट को बदलकर पोस्ट करता है तब भी ये फीचर उसे आसानी से पकड़ सकेगा.
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि कंपनी का कहना है कि अगर कोई कॉपी किया गया कंटेंट मोनेटाइजेशन के दायरे में आता है तो उससे होने वाली कमाई सिर्फ उसे दी जाएगी जो उस कंटेंट का असली क्रिएटर होगा.
नहीं होगी फर्जी एंगेजमेंट
इसके अलावा आपको बता दें कि कंपनी सिर्फ कॉपी-पेस्ट कंटेंट को नहीं पकड़ रही है बल्कि फर्जी एंगेजमेंट बढ़ाने वाले अकाउंट्स पर भी सख्त नजर रख रही है. ऐसे पोस्ट जहां फालतू का एंगेजमेंट बढ़ाने का तरीका इस्तेमाल किया जा रहा है, उन अकाउंट्स पर कंपनी सख्त एक्शन भी ले सकती है. अगर कोई क्रिएटर तीन या उससे ज्यादा बार ऐसे नियमों का उल्लंघन करता है तो उसे X के क्रिएटर रेवेन्यू शेयरिंग प्रोग्राम से बाहर किया जा सकता है.
X ने AI से संचालित स्पैम और बॉट अकाउंट्स के खिलाफ भी अभियान तेज कर दिया है. कंपनी के मुताबिक, इस साल की शुरुआत में प्लेटफॉर्म हर मिनट लगभग 208 बॉट अकाउंट्स की पहचान कर उन्हें सस्पेंड कर रहा था और अब ये सिस्टम पहले से ज्यादा प्रभावी होता जा रहा है. कंपनी के इस कदम के बाद से प्लेटफॉर्म पर ज्यादा से ज्यादा ओरिजिनल कंटेंट देखने को मिल सकता है.
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        <pubDate>Sun, 19 Jul 2026 03:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>क्या होते हैं Anti&amp;Reflective स्क्रीन प्रोटेक्टर? जानिए किस टेक्नोलॉजी पर करते हैं काम और क्या होते हैं इसके नुकसान</title>
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        <description><![CDATA[ Anti-Reflective Screen Protector: डिजिटल दुनिया में स्मार्टफोन आज लोगों की जरुरत बन चुके हैं. ऐसे में बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक आज स्मार्टफोन पहुंच चुका है. साथ ही जब स्मार्टफोन है तो उसके डिस्प्ले को सेफ रखने के लिए कई लोग स्क्रीन प्रोटेक्टर का इस्तेमाल करते हैं. अब मार्केट में कई तरह के स्क्रीन प्रोटेक्टर के मौजूद हैं जो आपके फोन के डिस्प्ले को सेफ रखते हैं. इसी कड़ी में मार्केट में एंटी-रिफ्लेक्टिव स्क्रीन प्रोटेक्टर काफी ट्रेंडिंग में चल रहा है. आइए जानते हैं किस टेक्नोलॉजी पर ये काम करता है.
क्या होता है Anti-Reflective स्क्रीन प्रोटेक्टर
जानकारी के मुताबिक, Anti-Reflective स्क्रीन प्रोटेक्टर एक खास टाइप का स्क्रीन गार्ड होता है जिस पर एक स्पेशल कोटिंग की जाती है. ये कोटिंग स्क्रीन से टकराने वाली बाहरी रोशनी के रिफ्लेक्शन को कम करती है. इसका फायदा ये होता है कि स्क्रीन पर चमक (Glare) कम दिखाई देती है और कंटेंट पढ़ना या वीडियो देखना ज्यादा आरामदायक हो जाता है.
किस टेक्नोलॉजी पर करता है काम
आपको बता दें कि इस तरह के स्क्रीन प्रोटेक्टर में Anti-Reflective Coating या Optical Coating Technology का इस्तेमाल किया जाता है. इसमें स्क्रीन के सर्फेस पर बेहद पतली ट्रांसपरेंट परतें लगाई जाती हैं जो आने वाली रोशनी को कंट्रोल करती हैं. कुछ रोशनी को ये रिफ्लेक्ट करती हैं जबकि बाकी को इस तरह फैलाती हैं कि आंखों तक कम चमक पहुंचे. यही वजह है कि तेज धूप में भी स्क्रीन पहले के मुकाबले ज्यादा साफ दिखाई देती है.
क्या हैं इसके फायदे

इस स्क्रीन प्रोटेक्टर के कई सारे फायदे होते हैं.
तेज धूप या आउटडोर में स्क्रीन आसानी से दिखाई देती है.
स्क्रीन पर ग्लेयर कम होने से आंखों पर कम दबाव पड़ता है.
वीडियो देखने, ई-बुक पढ़ने और गेम खेलने का एक्सपीरिएंस बेहतर होता है.
स्क्रीन पर उंगलियों के निशान और हल्के स्मज कुछ हद तक कम दिखाई देते हैं.
लंबे समय तक फोन इस्तेमाल करने पर विजुअल कम्फर्ट बेहतर महसूस हो सकता है.

क्या हैं इसके नुकसान
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इस स्क्रीन प्रोटेक्टर के कई सारे नुकसान भी होते हैं. दरअसल, ये नॉर्मल टेम्पर्ड ग्लास के मुकाबले ज्यादा महंगे होते हैं. अगर आप बजट में ऑप्शन तलाश रहे हैं तो ये थोड़ा महंगा सौदा साबित हो सकता है.
इसके अलावा बार-बार सफाई करने, धूल, नमी या रोजाना के इस्तेमाल से इसकी Anti-Reflective कोटिंग धीरे-धीरे कमजोर पड़ सकती है. इसके बाद पहले जैसा प्रभाव नहीं मिलता है.
बता दें कि ये टेक्नोलॉजी रिफ्लेक्शन को कम जरूर करती है लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं करती है. बहुत तेज धूप या सीधी लाइट में स्क्रीन पर हल्की चमक फिर भी दिखाई दे सकती है.
क्या खरीदने में है फायदा
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अगर आप अक्सर बाहर रहते हैं, धूप में फोन इस्तेमाल करते हैं या लंबे समय तक स्क्रीन देखते हैं तो Anti-Reflective स्क्रीन प्रोटेक्टर आपके लिए एक बेहतर ऑप्शन साबित हो सकता है. वहीं, अगर आप अपना स्मार्टफोन ज्यादातर घर या ऑफिस के अंदर ही इस्तेमाल करते हैं तो आप कम कीमत वाला भी स्क्रीन प्रोटेक्टर इस्तेमाल कर सकते हैं.
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        <pubDate>Sun, 19 Jul 2026 03:30:11 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>क्या, होते, हैं, Anti-Reflective, स्क्रीन, प्रोटेक्टर, जानिए, किस, टेक्नोलॉजी, पर, करते, हैं, काम, और, क्या, होते, हैं, इसके, नुकसान</media:keywords>
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        <title>Airtel यूजर्स को लगा बड़ा झटका! Unlimited 5G Plan के साथ नहीं कर सकेंगे ये काम, जानिए पूरी जानकारी</title>
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        <description><![CDATA[ Airtel Unlimited 5G Plan: देश की बड़ी टेलीकॉम कंपनी एयरटेल ने अपने यूजर्स को एक झटका दिया है. जानकारी के अनुसार, Airtel अब Unlimited 5G डेटा को मोबाइल हॉटस्पॉट के जरिए शेयर करने की अनुमति नहीं दे रही है. बता दें कि इस बदलाव के बाद यूजर्स ने अपनी नाराजगी जाहिर करना भी शुरू कर दिया है.
यूजर्स ने जताई नाराजगी
आपको बता दें कि इसके बाद से कई यूजर्स ने सोशल मीडिया पर अपनी नाराजगी भी जाहिर की है. कई यूजर्स का कहना है कि वे अपने ऑफिस के काम के लिए हॉटस्पॉट का इस्तेमाल करते हैं और अगर अनलिमिटेड 5G पर ये सुविधा बंद हो जाएगी तो उन्हें काम करने में काफी परेशानी होगी. इसके अलावा कई यूजर्स का मानना है कि अगर ऐसा होता है तो कई यूजर्स दूसरे टेलीकॉम कंपनी पर भी शिफ्ट हो सकते हैं.
सोशल मीडिया पर वॉयरल पोस्ट
जानकारी के मुताबिक, हाल के दिनों में X पर Airtel की Terms and Conditions का एक स्क्रीनशॉट तेजी से वायरल हुआ है. इसमें लिखा गया था कि Unlimited 5G डेटा का इस्तेमाल मोबाइल हॉटस्पॉट के जरिए शेयर नहीं किया जा सकेगा.
अगर ये शर्त लागू होती है तो हॉटस्पॉट इस्तेमाल करने पर डेटा Unlimited 5G से नहीं बल्कि यूजर के रोजाना मिलने वाले 4G डेटा कोटे से कट सकता है. हालांकि, अभी तक एयरटेल की ओर से इस पर कोई आधिकारी जानकारी नहीं शेयर की गई है.
कंपनी कैसे करती है पहचान
अब कई लोगों के मन में सवाल आता है कि आखिर टेलीकॉम कंपनी को कैसे पता चलता है कि डेटा सीधे फोन पर इस्तेमाल हो रहा है या हॉटस्पॉट के जरिए किसी दूसरे डिवाइस पर. दरअसल, एक्सपर्ट्स के मुताबिक, टेलीकॉम कंपनियां नेटवर्क लेवल पर डेटा ट्रैफिक को चेक कर सकती हैं. इसके लिए TTL (Time To Live), TCP/IP Fingerprinting, HTTP User-Agent और Deep Packet Inspection (DPI) जैसी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जा सकता है. इस टेक्नोलॉजी की मदद से अलग-अलग डिवाइस के नेटवर्क के नेचर की पहचान की जा सकती है.
300GB इंटरनेट डेटा
जानकारी के लिए बता दें कि Airtel की Unlimited 5G सुविधा पूरी तरह अनलिमिटेड नहीं होती है. बता दें कि कंपनी पहले से ही एक यूजर के लिए हर महीने मैक्सिमम 300GB 5G डेटा की लीमिट फिक्स करती है. इसके बाद डेटा इस्तेमाल पर अलग नियम लागू हो सकते हैं. हालांकि, कंपनी ने अभी तक इसके बारे में कोई जानकारी शेयर नहीं की है.
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        <pubDate>Sun, 19 Jul 2026 03:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>Gmail यूजर्स ध्यान दें! सिर्फ एक सेटिंग बदलते ही Spam में जाना बंद हो जाएंगे जरूरी Emails</title>
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        <description><![CDATA[ Tech Tips: जीमेल आज के समय में लोगों के सबसे जरूरी चीजों में से एक हो चुका है. ऑफिस से लेकर बैंक तक के जरूरी मेल आपको जीमेल के जरिए मिलते हैं. लेकिन अक्सर देखा गया है कि कुछ ईमेल अपने आप ही स्पैम में चले जाते हैं. इससे कई बार लोगों को जरूरी मेल समय पर नहीं दिख पाते हैं या फिर मिस हो जाते हैं. लेकिन आज हम आपको एक ऐसी सेटिंग्स के बारे में बताने जा रहे हैं जिसके बाद आपको सभी मेल इनबॉक्स में दिखने लगेंगे और स्पैम में नहीं जाएंगे.
Spam में क्यों जाते हैं जरूरी ईमेल
जानकारी के अनुसार, Gmail में अब एक एआई फीचर मौजूद है जिसे स्पैम फिल्टर कहा जाता है. ये फीचर संदिग्ध और फर्जी ईमेल की पहचान करने का काम करता हैं. हालांकि कई बार यह सिस्टम गलती से सही ईमेल को भी Spam मान लेता है. ऐसा तब हो सकता है जब ईमेल किसी नए पते से आया हो, उसका कंटेंट प्रमोशनल जैसा लगे या पहले उसी तरह के ईमेल को Spam मार्क किया गया हो.&amp;nbsp;
इस्तेमाल करें Filter
जानकारी के लिए बता दें कि अगर किसी खास व्यक्ति या कंपनी के ईमेल अक्सर आपके पास आते हैं तो उनके लिए Gmail Filter बनाना आपके लिए काफी बेहतर साबित होगा. इसके लिए सबसे पहले कंप्यूटर पर Gmail खोलें और सर्च बार में मौजूद Show search options आइकन पर क्लिक करें.&amp;nbsp;
अब यहां पर From वाले बॉक्स में संबंधित ईमेल एड्रेस दर्ज करें और Create filter पर क्लिक करें. अब Never send it to Spam ऑप्शन को चुनें. आखिरी में फिर से Create filter पर क्लिक कर दें. अब उस ईमेल एड्रेस से आने वाले मैसेज सीधे इनबॉक्स में पहुंचेंगे.
कैसे वापस मिलेगा ईमेल&amp;nbsp;
आपको बता दें कि अगर आपका कोई जरूरी ईमेल Spam में पहुंच गया है तो उसे आसानी से वापस इनबॉक्स में ला सकते हैं. इसके लिए कुछ जरूरी स्टेप्स को फॉलो करना पड़ेगा.
कंप्यूटर पर Gmail खोलें.
इसके बाद बाईं तरफ More पर क्लिक करके Spam फोल्डर खोलें.
अब जिस ईमेल की जरूरत है उसे खोलें.
अब ऊपर दिखाई देने वाले Not spam ऑप्शन पर क्लिक करें.
इसके बाद Gmail आगे उसी ईमेल एड्रेस से आने वाले मैसेज को पहचानने लगेगा और उनके Spam में जाने की संभावना कम हो जाएगी.
मोबाइल ऐप में कैसे करें सेटिंग&amp;nbsp;
आज ज्यादातर लोगों के स्मार्टफोन में भी Gmail खुला रहता है. मोबाइल ऐप में फिल्टर बनाने का ऑप्शन फिलहाल उपलब्ध नहीं है. हालांकि Spam में पहुंचे ईमेल को सही कैटेगरी में वापस भेजा जा सकता है. इसके लिए Gmail ऐप खोलें और Spam फोल्डर में जाएं. अब यहां संबंधित ईमेल खोलें और ऊपर दिए गए तीन डॉट्स पर टैप करें. अब Report not spam या Not spam का ऑप्शन चुनें.
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        <pubDate>Sat, 18 Jul 2026 11:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Gmail, यूजर्स, ध्यान, दें, सिर्फ, एक, सेटिंग, बदलते, ही, Spam, में, जाना, बंद, हो, जाएंगे, जरूरी, Emails</media:keywords>
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        <title>eSIM वाला फोन बेचने से पहले जरूरी हैं ये काम, सिर्फ फैक्ट्री रिसेट से नहीं बनेगी बात</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/esim-वाला-फोन-बेचने-से-पहले-जरूरी-हैं-ये-काम-सिर्फ-फैक्ट्री-रिसेट-से-नहीं-बनेगी-बात</link>
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        <description><![CDATA[ eSIM Phone Selling Tips: अब फोन से कॉल और मैसेज करने के लिए फिजिकल सिम कार्ड की जरूरत खत्म हो गई है. कई मॉडल अब ई-सिम सपोर्ट के साथ आते हैं. इनमें आपको फिजिकल सिम कार्ड डालने की जरूरत नहीं होती. अमेरिका की बात करें तो ऐप्पल यहां बिकने वाले सारे आईफोन में केवल ई-सिम सपोर्ट देती है. ई-सिम के कई फायदे हैं, लेकिन अगर आप ई-सिम वाले फोन को बेच रहे हैं तो आपको अतिरिक्त सावधानी बरतनी होगी. नॉर्मल फोन की तरह फैक्ट्री रिसेट कर आप काम नहीं चला सकते.&amp;nbsp;
सबसे पहले ई-सिम के बारे में जानें
फिजिकल सिम में एक प्री-प्रोग्राम्ड फिजिकल कार्ड को फोन में बने एक स्पेशल स्लॉट में इन्सर्ट करना पड़ता है. ई-सिम को ऐसे किसी स्लॉट की जरूरत नहीं होती. इसमें एक इम्बेडेड सिम कार्ड (eSIM) में नेटवर्क क्रेडेंशियल डाउनलोड किए जाते हैं. एक बार डाउनलोड होने के बाद ये परमानेंट फोन पर रहते हैं. ई-सिम को ज्यादा सुरक्षित माना जाता है और यह फोन के IMEI नंबर से लिंक रहती है, जिससे सेफ्टी मजबूत होती है.&amp;nbsp;
फोन को बेचने से पहले कर लें ये काम
अपना पुराना फोन बेचने से पहले कुछ काम करने जरूरी हैं. भले ही आप फिजिकल सिम वाला फोन बेच रहे हैं या ई-सिम वाला, सबसे पहले डेटा बैकअप ले लें. आजकल फोन में पर्सनल और फाइनेंस डिटेल्स समेत सारा जरूरी डेटा स्टोर होता है. इसलिए इसका बैकअप लेना जरूरी है. बैकअप होने पर डेटा डिलीट होने की टेंशन नहीं रहेगी. इसी तरह फोन में स्टोर सोशल मीडिया, बैंकिंग और दूसरी ऐप्स के अकाउंट लॉग-आउट कर दें. इससे जब आप नए फोन में इन ऐप्स में लॉग-इन करेंगे तो दिक्कत नहीं आएगी. इसके अलावा आप बेहतर वैल्यू के लिए फोन की रिपेयरिंग भी करवा सकते हैं.&amp;nbsp;
ई-सिम वाला फोन बेचते समय जरूरी है यह काम
इन सारे कामों के अलावा अगर आप ई-सिम वाला फोन बेच रहे हैं तो आपको एक और काम करना पड़ेगा. यह फोन बेचने से पहले अपने ई-सिम प्रोफाइल को जरूर हटा दें. क्योंकि इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि फैक्ट्री रिसेट करने से यह रिमूव हो जाएगा. इसलिए पहले अपने ई-सिम प्रोफाइल को नए फोन में ट्रांसफर कर लें. इसके बाद इस प्रोफाइल को डिलीट कर फोन को फैक्ट्री रिसेट कर दें. इससे आपका डेटा, सेटिंग्स, फाइल्स और ई-सिम आदि सब किसी दूसरे के हाथों में जान से बच जाएंगे. यही चीजें फिर आपको नया फोन सेटअप करने में मदद करेंगी.
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        <pubDate>Sat, 18 Jul 2026 11:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>बरसात में जल्दी क्यों खत्म हो जाती है फोन की बैटरी? वजह जानकर आप भी रह जाएंगे हैरान</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/बरसात-में-जल्दी-क्यों-खत्म-हो-जाती-है-फोन-की-बैटरी-वजह-जानकर-आप-भी-रह-जाएंगे-हैरान</link>
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        <title>गिर गया तो टूटने का डर नहीं, फोल्डेबल फोन के लिए सैमसंग ले आई गजब की यह टेक्नोलॉजी</title>
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        <description><![CDATA[ Samsung Flex Titanium Display: फोल्डेबल फोन काफी नाजुक होते हैं. अगर गिरने पर इनका डिस्प्ले डैमेज हो जाए तो समझ लें कि आपकी जेब पर भारी खर्चा आने वाला है. फोल्डेबल फोन के डिस्प्ले बहुत महंगे होते हैं और इन्हें रिपेयर करवाने के लिए मोटा पैसा खर्च करना पड़ता है. अब सैमसंग ने इस प्रॉब्लम का सॉल्यूशन निकाल लिया है. सैमसंग Flex Titanium नाम से एक नई डिस्प्ले टेक्नोलॉजी लेकर आई है, जो अपकमिंग गैलेक्सी फोल्डेबल फोन को न सिर्फ मजबूत बनाएगी बल्कि इसकी मदद से इन फोन को स्लिम भी बनाया जा सकेगा. यानी नई टेक्नोलॉजी फोन के लुक को बेहतर करने के साथ-साथ ड्यूरैबिलिटी को भी बढ़ाएगी.
क्या है नई Flex Titanium टेक्नोलॉजी?
Flex Titanium सैमसंग की नई फोल्डेबल डिस्प्ले स्ट्रक्चर है, जो कन्वेंशनल सपोर्ट मैटेरियल को टाइटैनियम से बने दो कंपोनेंट से रिप्लेस करेगा. इसमें OLED डिस्प्ले के नीचे एक टाइटैनियम अलॉय फिल्म लगी है. फिर उसके नीचे एक टाइटैनियम सपोर्ट प्लेट दी गई है. यानी पूरा डिस्प्ले मॉड्यूल इस सपोर्ट प्लेट पर तैयार किया गया है. ये सारी लेयर मिलकर डिस्प्ले को भारी बनाए बिना ही उसकी ड्यूरैबिलिटी बढ़ाने में मदद करेंगी. सैमसंग का दावा है कि इसमें लगी टाइटैनियम अलॉय फिल्म ट्रेडिशनल पॉलीमर फिल्म की तुलना में 20 गुना अधिक मजबूत है. साथ ही नई टेक्नोलॉजी में डिस्प्ले कंपोनेंट के बीच एयर गैप भी खत्म कर दिया गया है, जिससे डिस्प्ले पर क्रीज भी कम नजर आएगी और फोन को फोल्ड करना आसान हो जाएगा.
नई टेक्नोलॉजी में टाइटैनियम क्यों यूज किया गया है?
स्पेसक्राफ्ट, सैटेलाइट और यहां तक की मंगल ग्रह पर घूम रहे रोवर के पहिये भी टाइटैनियम से बने हुए हैं. इसके फायदों की बात करें तो पहला यह बहुत मजबूत होता है. दूसरा इस पर जंग नहीं लगता. हालांकि, इसे मोड़ना काफी मुश्किल होता है, लेकिन सैमसंग ने लंबी रिसर्च के बाद मजबूती और फ्लेक्सिबिलिटी के बीच सही बैलेंस बनाने में कामयाबी पा ली है.
नए डिस्प्ले से क्या बदलेगा?
बताया जा रहा है कि Flex Titanium टेक्नोलॉजी वाले डिस्प्ले में क्रिस्प विजुअल, बेहतर कलर और एनर्जी एफिशिएंसी मिलेगी. अभी तक यह जानकारी सामने नहीं आई है कि इस टेक्नोलॉजी को किस फोल्डेबल फोन में यूज किया जाएगा, लेकिन माना जा रहा है कि 22 जुलाई को होने वाले गैलेक्सी अनपैक्ड इवेंट में यह राज भी खुल जाएगा. दावा किया जा रहा है कि यह डिस्प्ले टेक्नोलॉजी लुक और ड्यूरैबिलिटी के मामले में फोल्डेबल फोन को पूरी तरह बदल देगी.
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        <pubDate>Sat, 18 Jul 2026 11:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>क्या एक साथ यूज किए जा सकते हैं अलग&amp;अलग कंपनियों के सोलर पैनल? यहां जानें सारी जरूरी बातें</title>
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        <description><![CDATA[ Solar Panel Guide: सोलर पैनल लगाते समय लगभग सभी लोग एक ही ब्रांड के पैनल यूज करते हैं. लेकिन कई बार सोलर सिस्टम एक्सपैंड करते लोगों को बेहतर ऑप्शन भी मिल जाते हैं. फिर उनके मन में यह सवाल उठता है कि क्या एक ही सिस्टम में अलग-अलग कंपनियों को सोलर पैनल इस्तेमाल किए जा सकते हैं. इसका जवाब हां है, लेकिन आपको कई सारी चीजों का ध्यान रखना पड़ेगा. आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि एक ही सोलर सिस्टम में अलग-अलग ब्रांड के पैनल लगाने से क्या होता है.
एक सिस्टम में अलग-अलग पैनल लगाने पर क्या होगा?
आप एक ही सोलर एनर्जी सिस्टम में अलग-अलग कंपनी के पैनल यूज कर सकते हैं, लेकिन ऐसा करना फायदे का सौदा नहीं होगा. असल में पैनल को यूनिवर्सली प्लग-एंड-प्ले के तौर पर डिजाइन नहीं किया जाता है. इसलिए अलग-अलग पैनल लगने से आउटपुट कम हो सकती है और कंट्रोलर और इन्वर्टर पर भी लोड बढ़ सकता है. इसके अलावा मेंटिनेंस से जुड़े दूसरे इश्यू आने का भी खतरा रहता है. अगर इसका दूसरा पहलू देखें तो अगर पैनल की वॉल्टेज, करंट और पावर आउटपुट एक समान है तो दिक्कत आने की संभावना कम होती है.
कब किए जा सकते हैं अलग-अलग कंपनी के पैनल यूज?

कैंपरवैन, ऑफ-ग्रिड कैंपिंग जैसे पोर्टेबल और मोबाइल सोलर सेटअप में हर पैनल के लिए अलग-अलग चार्ज कंट्रोल का यूज होता है. इसमें आप अलग-अलग ब्रांड के पैनल इस्तेमाल कर सकते हैं.
अगर आप अलग-अलग छत पर सेपरेट चार्ज कंट्रोलर के साथ पैनल लगा रहे हैं तो भी अलग-अलग पैनल इस्तेमाल किए जा सकते हैं.इमरजेंसी या बैकअप के लिए ऑफ-ग्रिड सोलर सिस्टम में भी यह तरीका काम आ जाएगा.

कब करनी चाहिए अलग-अलग कंपनी के पैनल से तौबा?

अगर आप छत पर परमानेंट और बड़ा सोलर सिस्टम लगवा रहे हैं तो इसमें एक ब्रांड के एक जैसे पैनल यूज करने चाहिए. ऐसे सिस्टम में आमतौर पर सिंगल इन्वर्टर यूज किया जाता है. ऐसे यहां अलग-अलग तरह के पैनल यूज करने से काम बिगड़ सकता है.
अगर आप मैक्सिमम एफिशिंसी के लिए सोलर सिस्टम लगवा रहे हैं तो अलग-अलग तरह के पैनल यूज करने की गलती न करें. ये पैनल आउटपुट को कम कर देंगे, जिससे सिस्टम लगवाने का आपका पूरा उद्देश्य ही बेकार हो जाएगा.
अगर आपको अलग-अलग तरह के पैनल यूज भी करने पड़ें तो कोशिश करें कि उनके वॉटेज सेम हो. अगर इसमें ज्यादा अंतर पाया जाता है तो कम वॉट वाला पैनल ज्यादा कैपेसिटी वाले पैनल को भी ठीक तरीके से काम नहीं करने देगा.

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        <pubDate>Fri, 17 Jul 2026 23:30:17 +0530</pubDate>
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        <title>घर के लिए कौन सा Smart Speaker खरीदना चाहिए? जानिए Echo Dot और Google Nest में क्या है अंतर</title>
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        <description><![CDATA[ Amazon Eco Dot Vs Google Nest: आज के समय में स्मार्ट डिवाइसेज काफी तेजी से मार्केट में ट्रेंडिंग में चल रहे हैं. लोग अब स्मार्ट डिवाइसेज का ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं. ऐसे में अब ज्यादातर घरों में स्मार्ट फ्रिज से लेकर स्मार्ट स्पीकर तक देखने को मिल जाता है. बता दें कि बाजार में अब स्मार्ट स्पीकर में भी ऑप्शन आ गए हैं. फिलहाल मार्केट में अमेजन इको डॉट और गूगल नेस्ट काफी ट्रेडिंग में है. आइए जानते हैं कि दोनों में क्या है अंतर और आपको कौन सा खरीदना चाहिए.
मिलेगा बेहतरीन Voice Assistant&amp;nbsp;
जानकारी के अनुसार, Echo Dot में Amazon का Alexa Voice Assistant देखने को मिल जाता है. वहीं, Google Nest में Google Assistant का सपोर्ट होता है. अगर आप इंटरनेट पर सर्च करने से लेकर रास्ता पूछने या Google की सर्विसेज का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं तो Google Assistant ज्यादा बेहतर ऑप्शन साबित हो सकता है. वहीं, Alexa रोजमर्रा के काम जैसे Smart Home कंट्रोल, रूटीन सेट करने और थर्ड-पार्टी डिवाइस सपोर्ट के मामले में काफी फेमश है.
Google Services या Amazon Services
अब अगर आप Gmail, Google Calendar, Google Maps और YouTube Music जैसी सर्विसेज का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं तो आपको Google Nest पर विचार करना चाहिए. वहीं अगर आपके पास Amazon Prime Membership है और आप Amazon Music, Audible या Alexa Skills का इस्तेमाल करते हैं तो Echo Dot आपके अनुभव को बेहतर बना सकता है.
किसकी साउंड क्वालिटी बेहतर
इसके अलावा अगर बात ऑडियो क्वालिटी की करें तो दोनों ही डिवाइस नॉर्मल कमरे के लिए अच्छी साउंड देते हैं. Echo Dot का ऑडियो पहले के मुकाबले में काफी बेहतर हुआ है और इसमें दमदार बेस मिलता है.
वहीं, दूसरी ओर, Google Nest की आवाज साफ और बैलेंस्ड होती है जिससे पॉडकास्ट, न्यूज और वोकल म्यूजिक सुनने का बेहतरीन एक्सपीरिएंस मिलता है.&amp;nbsp;
Smart Home कंट्रोल में किसमें ज्यादा दम
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अगर आपके घर में Smart Bulb, Smart Plug, Smart Camera या दूसरे IoT डिवाइस हैं तो Echo Dot आपके लिए एक बेहतरीन ऑप्शन साबित हो सकता है. Alexa हजारों स्मार्ट डिवाइस और ब्रांड्स के साथ आसानी से काम करता है. Google Nest भी स्मार्ट होम डिवाइस को कंट्रोल करता है लेकिन कई मामलों में Alexa का इकोसिस्टम थोड़ा बड़ा माना जाता है.
किसे खरीदने में है फायदा
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अगर आपको बेहतर Smart Home कंट्रोल, Alexa Skills और Amazon Services चाहिए हैं तो Echo Dot आपके लिए सही ऑप्शन हो सकता है. लेकिन अगर आप Google Search, Gmail, Calendar और Google Ecosystem का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं और ज्यादा नैचुरल Voice Responses चाहते हैं तो Google Nest पर आपको विचार करना चाहिए.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Fri, 17 Jul 2026 23:30:15 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>LinkedIn पर AI का कब्जा! 10 में 4 लॉन्ग पोस्ट इंसानों ने नहीं लिखे, स्टडी में दावा</title>
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        <description><![CDATA[ LinkedIn AI Post Trend: आज के समय में एआई का इस्तेमाल हर क्षेत्र में बढ़ गया है, क्योंकि यह कम समय में ज्यादा बेहतरीन परिणामों के साथ उत्तर देने में सक्षम में है. ऐसे में कंटेंट राइटिंग में इसका जमकर इस्तेमाल किया जा रहा है. चाहे सोशल मीडिया पोस्ट के लिए डिस्क्रिप्शन लिखना हो, कैप्शन लिखना हो या पोस्ट के लिए इमेज जनरेट करनी हो, हर काम में एआई इस्तेमाल किया जा रहा है. इसे लेकर एआई डिटेक्शन स्टार्टअप पैनग्राम ने हाल ही में एक रिसर्च की, जिसमें पता चला कि लिंक्डइन पर सबसे अधिक एआई जनरेटेड पोस्ट हैं. इनमें 40% से अधिक पोस्ट को एआई की मदद से बनाया गया. &amp;nbsp;
कैसे किया जाता है एआई का इस्तेमाल?&amp;nbsp;
आज के समय में लिंक्डइन ही नहीं लगभग हर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर एआई का इस्तेमाल बढ़ गया है. पैनग्राम की रिपोर्ट के अनुसार, लिंक्डइन पर एआई से तैयार कंटेंट को लिंक्डइन के खुद के एआई टूल &#039;एन्हांस पोस्ट&#039; से नॉर्मल किया गया. बता दें कि यहां एआई का इस्तेमाल दो तरीके से किया गया. एक तो पोस्ट में जो भी कंटेंट और इमेज लगानी है, सब एआई से ही बनाई गई. वहीं, कंटेट और इमेज को एआई की मदद से ज्यादा आकर्षक बनाया गया.&amp;nbsp;
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लिंक्डइन पर ही सबसे ज्यादा क्यों?
अब सवाल उठता है कि एआई यूज करने के मामले में लिंक्डइन सबसे आगे क्यों है? इसका सबसे बड़ा कारण लिंक्डइन का खुद का एआई राइटिंग असिस्टेंट टूल है. दरअसल, लिंक्डइन पर एआई राइटिंग असिस्टेंट टूल &#039;एन्हांस पोस्ट&#039; है, जिसकी मदद से यूजर्स सिर्फ एक क्लिक में अपने पोस्ट को तैयार करा लेते हैं. यहां यूजर्स इस एआई टूल को अपने आइडिया बताते हैं और यह उस पर लॉन्ग पोस्ट तैयार कर देता है. ऐसा करने में यूजर्स को ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती है और वे कम समय में अपने विचारों के मुताबिक पोस्ट तैयार कर लेते हैं.&amp;nbsp;
गौरतलब है कि लिंक्डइन एक प्रोफेशनल प्लेटफॉर्म है, जहां अक्सर लोग करियर टिप्स, लीडरशिप और मोटिवेशनल बातें लिखते हैं. इस तरह की पोस्ट बनाना एआई के लिए बेहद आसान होता है. साथ ही, लिंक्डइन पर अपनी रीच और विजिबिलिटी बनाए रखने के लिए लोगों और कंपनियों पर लगातार कंटेंट पोस्ट करने का बहुत दबाव रहता है. रिसर्च में सामने आया कि रोजाना नए विचार सोचना मुश्किल होता है, इसलिए लोग समय बचाने के लिए AI टूल्स का सहारा ले रहे हैं.&amp;nbsp;
बता दें कि एआई धीरे-धीरे हर क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करता जा रहा है. ऐसे में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म चलाते वक्त हमें ख्याल रखना होता है कि जिन पोस्ट को देखकर हम अपने निर्णय ले रहे हैं, कहीं वे एआई जनरेटेड तो नहीं हैं.&amp;nbsp;
यहां भी पढ़ें: AI से सावधान! एंथ्रोपिक ने कहा- एआई मॉडल्स को झूठ बोलना, चालाकी और हेरफेर करना सब आता है ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 17 Jul 2026 23:30:14 +0530</pubDate>
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        <title>यूजर्स को सब कुछ फ्री देने के बाद कैसे VPN Apps करते हैं कमाई? जानिए क्या है पूरा प्रोसेस</title>
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        <description><![CDATA[ VPN Apps: डिजिटल प्राइवेसी की जब बात आती है तो ज्यादातर लोग VPN Apps का इस्तेमाल करते हैं. बता दें कि आज के समय में इंटरनेट पर प्राइवेसी और सिक्योरिटी को लेकर लोग पहले से ज्यादा सतर्क हो गए हैं. इसी वजह से VPN (Virtual Private Network) ऐप्स का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है. साथ ही स्टोर पर कई सारे फ्री वीपीएन ऐप्स मौजूद हैं जो यूजर्स को फ्री सर्विस देते हैं. इसी कड़ी में कई लोगों के मन में सवाल आता है कि यूजर्स को सभी चीज फ्री में देने के बाद कैसे ऐप्स कमाई करते हैं. आइए जानते हैं कि क्या है पूरा प्रोसेस.
इस तरह से होती है कमाई
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ज्यादातर फ्री VPN ऐप्स की कमाई का सबसे बड़ा जरिया विज्ञापन होते हैं. बता दें कि जब भी यूजर ऐप खोलता है या सर्वर बदलता है, उसे वीडियो या बैनर ऐड्स दिखाई देते हैं. हर ऐड देखने या उस पर क्लिक करने से कंपनी को ऐड नेटवर्क के जरिए कमाई होती है. इसका मतलब साफ है कि जितने ज्यादा यूजर, उतनी ज्यादा कमाई.
एफिलिएट और पार्टनरशिप भी है जरिया
इसके अलावा कुछ VPN ऐप्स दूसरी कंपनियों के साथ पार्टनरशिप करते हैं. वे अपने ऐप में दूसरे प्रोडक्ट या सर्विस का प्रमोशन करते हैं. ऐसे में अगर कोई यूजर उस लिंक के जरिए कोई खरीदारी करता है या किसी सर्विस का सब्सक्रिप्शन लेता है तो VPN कंपनी को कमीशन मिलता है. इसे एफिलिएट मार्केटिंग भी कहा जाता है.
प्रीमियम प्लान से भी होती है कमाई
आपको बता दें कि कई VPN कंपनियां प्रीमियम प्लान भी ऑफर करती हैं. इसमें यूजर्स को बेसिक सुविधाएं मुफ्त दी जाती हैं लेकिन फास्ट स्पीड, ज्यादा सर्वर, ऐड-फ्री एक्सपीरिएंस और बेहतर सुरक्षा जैसी सर्विसेज के लिए यूजर को प्रीमियम प्लान खरीदना पड़ता है.
यूजर के डेटा से भी कमाई
बता दें कि सभी VPN यूजर्स का डेटा कमाई के लिए इस्तेमाल नहीं करते हैं लेकिन कुछ फ्री VPN ऐप्स यूजर्स की ब्राउजिंग से जुड़ा Anonymous डेटा को इकट्ठा कर उसका विश्लेषण करते हैं. कई मामलों में ये जानकारी ऐड कंपनियों या मार्केट रिसर्च एजेंसियों के लिए काम का साबित हो सकता है.
फ्री VPN इस्तेमाल करते समय इन बातों का रखें ध्यान

ऐप डाउनलोड करने से पहले उसकी रेटिंग और रिव्यू जरूर चेक करें.
Privacy Policy और Permissions को ध्यान से पढ़ें.
जरूरत से ज्यादा परमिशन मांगने वाले VPN से बचें.
संवेदनशील बैंकिंग सर्विस इस्तेमाल करते समय भरोसेमंद VPN का ही इस्तेमाल करना चाहिए.
अगर समय-समय पर आप VPN का इस्तेमाल करते हैं तो पेड VPN आपके लिए बेहतर ऑप्शन होगा.

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        <pubDate>Fri, 17 Jul 2026 23:30:13 +0530</pubDate>
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        <title>क्या आपका Wireless Charger बढ़ा रहा है बिजली का बिल? जानिए क्या है पूरी सच्चाई</title>
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        <description><![CDATA[ क्या आपका Wireless Charger बढ़ा रहा है बिजली का बिल? जानिए क्या है पूरी सच्चाई ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 17 Jul 2026 23:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>किस मौसम में सोलर पैनल लगाए तो होगी जबरदस्त शुरुआत? जानें कब होता है परफेक्ट समय</title>
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        <description><![CDATA[ Solar Panel Installation Tips: सोलर एनर्जी सिस्टम लगाने का यह सबसे सही समय है. सरकार इस पर सब्सिडी दे रही है और कंपीटिशन बढ़ने से मार्केट में वैरायटी और ऑप्शन दोनों ही ज्यादा हो गए हैं. इसके अलावा सोलर पैनल का बढ़ता इस्तेमाल इसकी उपयोगिता की भी गारंटी दे रही है. अब अगर सोलर एनर्जी सिस्टम लगाने के लिए सबसे सही मौसम की बात करें तो आपको गर्मी की शुरुआत को चुनना चाहिए. आज हम आपको बताएंगे क्यों गर्मी की शुरुआत का मौसम पैनल लगाने के लिए सबसे सही है और इस सीजन में पैनल लगाने के फायदे क्या होंगे.
कब लगाना चाहिए सोलर सिस्टम?
आप अपनी जरूरत और सहूलियत के हिसाब से सोलर पैनल कभी भी लगवा सकते हैं, लेकिन गर्मी के मौसम में इसे लगाने के कुछ फायदे होते हैं. अगर मार्च-अप्रैल के महीने में सोलर सिस्टम लगवाया जाता है तो उस समय दिन बड़े हो रहे होते हैं और धूप भी तेज होती है. इसका सीधा फायदा यह होता है कि ज्यादा सनलाइट रहने से सोलर पैनल ज्यादा बिजली बनाएंगे. लंबे दिन और बिना किसी रुकावट के आ रही धूप से सोलर एनर्जी सिस्टम की परफॉर्मेंस अपनी पीक पर रहेगी.
बचत का ज्यादा मौका
गर्मी के मौसम में बिजली का इस्तेमाल ज्यादा होता है. सर्दियों में कूलर, पंखे, फ्रिज और एसी की ज्यादा जरूरत नहीं रहती. इसलिए बिजली की खपत कम होती है. गर्मी आते ही इन सबकी जरूरत पड़ती है और बिजली का बिल आसमान छू जाता है. इसलिए अगर आप गर्मी की शुरुआत में पैनल लगवा लेते हैं तो हजारों रुपये का बिजली बिल बचाया जा सकता है. इसके साथ ही आप नेट मीटरिंग का भी पूरा फायदा उठा पाएंगे. गर्मी में जब सोलर पावर का प्रोडक्शन ज्यादा होगा तो आप ग्रिड में ज्यादा बिजली भेज पाएंगे, जिससे पूरे साल के लिए बेहतर बैलेंस बन जाएगा.
सब्सिडी का फायदा उठाने का सीमित समय ही बाकी
फिलहाल सरकार सोलर पैनल सिस्टम लगाने पर सब्सिडी दे रही है. अगर आप अभी यह सिस्टम लगवाते हैं तो 78,000 रुपये तक की सब्सिडी पा सकते हैं. इसलिए ज्यादा देरी न करते हुए अभी इस सब्सिडी का फायदा उठा लें.
सोलर पैनल लगाने के लिए कितनी जगह की जरूरत पड़ती है?
मोटे अनुमान के तौर पर अगर आप 3kW का सिस्टम लगवा रहे हैं तो लगभग 300 स्क्वेयर फीट एरिया की जरूरत पड़ेगी. यह एरिया ऐसा होना चाहिए, जहां दिन में छांव न रहती हो. अगर आप छोटा सिस्टम लगवाना चाहते हैं तो 1kW का सिस्टम लगाने के लिए 100 स्क्वेयर फीट जगह चाहिए. इसी तरह अगर आपको ज्यादा बिजली की जरूरत है और आप 5kW का सिस्टम इंस्टॉल करवाते हैं तो लगभग 500 स्क्वेयर फीट की जरूरत होगी.
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        <pubDate>Fri, 17 Jul 2026 07:30:14 +0530</pubDate>
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        <title>Semicon 2.0 Explained: मोबाइल से मिसाइल तक... आखिर चिप इंडस्ट्री पर क्यों 1.27 लाख करोड़ रुपये खर्च करेगा भारत?</title>
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        <description><![CDATA[ आपके हाथ में मौजूद स्मार्टफोन से लेकर घर का फ्रिज, टीवी, AC, आपकी कार और यहां तक कि देश की मिसाइल तक, सभी में एक चीज कॉमन है और वह है सेमीकंडक्टर चिप. यही छोटी-सी चिप हर इलेक्ट्रॉनिक मशीन का दिमाग होती है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि भारत आज भी अपनी जरूरत की ज्यादातर चिप विदेशों से खरीदता है. अब सरकार इसी तस्वीर को बदलना चाहती है. मोदी कैबिनेट ने Semicon 2.0 को मंजूरी दे दी है. अगले छह साल में इस मिशन पर 1.27 लाख करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे.
आखिर Semicon 2.0 है क्या? इसमें इतना पैसा क्यों लगाया जा रहा है? इससे आम आदमी को क्या फायदा होगा और क्या भारत सच में दुनिया का बड़ा चिप निर्माता बन सकता है? आइए आसान भाषा में समझते हैं.
छोटी सी चिप इतनी बड़ी चीज क्यों?
चिप देखने में जितनी छोटी होती है, लेकिन यही चिप किसी भी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस का दिमाग होती है. मोबाइल, लैपटॉप, कार, एयरक्राफ्ट, मेडिकल मशीन, 5G नेटवर्क, सैटेलाइट और मिसाइल हर जगह चिप की जरूरत होती है. हालांकि, चिप बनाना दुनिया के सबसे मुश्किल और सबसे महंगे कामों में गिना जाता है. इसके लिए अरबों डॉलर की फैक्ट्री, धूल रहित क्लीन रूम, हजारों करोड़ की मशीनें और वर्षों का अनुभव चाहिए. यही वजह है कि आज सबसे आधुनिक चिप मुख्य रूप से ताइवान, दक्षिण कोरिया और अमेरिका जैसे कुछ ही देशों में बनती है.
कोविड के दौरान जब दुनिया में चिप की कमी हुई थी, तब भारत में कार खरीदने वालों को कई महीने इंतजार करना पड़ा था. कई कंपनियों को उत्पादन तक रोकना पड़ा था. तभी दुनिया को समझ आया कि चिप जैसी अहम चीज के लिए कुछ देशों पर निर्भर रहना कितना खतरनाक है.
Semicon 2.0 आखिर है क्या?
इसे ऐसे समझिए. साल 2021 में सरकार ने Semicon India Programme शुरू किया था. उस समय करीब 76 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था. मकसद था भारत में पहली बार चिप बनाने की फैक्ट्री और चिप पैकेजिंग यूनिट लगाना. अब Semicon 2.0 उसी मिशन का अगला और बड़ा चरण है.
इस बार सरकार सिर्फ चिप की फैक्ट्री लगाने तक सीमित नहीं रहना चाहती. लक्ष्य है कि पूरी Semiconductor Value Chain भारत में विकसित हो, यानी सिर्फ चिप ही नहीं, बल्कि चिप बनाने वाली मशीनें, सिलिकॉन वेफर, फोटोरेजिस्ट, स्पेशलिटी गैस, केमिकल, रिसर्च, डिजाइन और इंजीनियरों की ट्रेनिंग तक सब कुछ भारत में विकसित किया जाए. योजना छह साल चलेगी और इसकी विस्तृत गाइडलाइन अगले कुछ हफ्तों में जारी होने की उम्मीद है.
1.27 लाख करोड़ रुपये आखिर खर्च कहां होंगे?
सरकार ने पूरी योजना को छह बड़े हिस्सों में बांटा है.&amp;nbsp;

पहला हिस्सा Chip Design के लिए होगा. इसमें स्टार्टअप और भारतीय कंपनियों को आर्थिक मदद मिलेगी, ताकि वे अपनी चिप डिजाइन कर सकें.
दूसरा हिस्सा उन कंपनियों के लिए होगा, जो चिप बनाने में इस्तेमाल होने वाली मशीनें, केमिकल, स्पेशलिटी गैस और दूसरे जरूरी सामान भारत में बनाएंगी.
तीसरा हिस्सा नई Semiconductor Fab यानी चिप बनाने वाली फैक्ट्री लगाने के लिए होगा.
चौथा हिस्सा Packaging, Testing और Assembly Units के विस्तार पर खर्च होगा.
पांचवां हिस्सा नई तकनीक पर रिसर्च और डेवलपमेंट के लिए होगा.
छठा हिस्सा इंजीनियरों की ट्रेनिंग और स्किल डेवलपमेंट पर खर्च किया जाएगा.

सरकार को इससे क्या मिलेगा?
सरकार इसे खर्च नहीं, बल्कि निवेश मान रही है. सरकार का अनुमान है कि इस योजना से करीब 4 लाख करोड़ रुपये का नया निवेश आएगा. साथ ही, करीब 2 लाख करोड़ रुपये की चिप का उत्पादन और लगभग 1 लाख करोड़ रुपये की चिप का निर्यात हो सकता है, यानी सरकार की कोशिश भारत में पूरी सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री खड़ी करने की है.
अब तक क्या हुआ?
ऐसा नहीं है कि सब कुछ अभी शुरू होना है. पहले चरण में सरकार 12 बड़े प्रोजेक्ट मंजूर कर चुकी है, जिनमें 1.64 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का निवेश आ चुका है. Micron, Kaynes और CG Semi जैसी कंपनियों की Packaging Units पर काम शुरू हो चुका है. गुजरात के सानंद में CG Semi की यूनिट का उद्घाटन भी हो चुका है.
सबसे अहम परियोजना गुजरात के धौलेरा में बन रही Tata Electronics की Silicon Fab है. सरकार का लक्ष्य है कि 2028 तक भारत की पहली Made-in-India Silicon Chip यहीं से निकले. वहीं दिल्ली-NCR के पास जेवर एयरपोर्ट क्षेत्र में HCL और Foxconn मिलकर Display Driver Chip बनाने की यूनिट लगा रहे हैं.&amp;nbsp;
Strategic Chip और Commercial Chip में क्या फर्क?
सरकार दो तरह की चिप पर फोकस कर रही है. पहली Strategic Chips हैं. इनका इस्तेमाल मिसाइल, रडार, रक्षा उपकरण, सुरक्षित संचार और अंतरिक्ष कार्यक्रमों में होता है. सरकार चाहती है कि इन चिप्स के लिए भारत किसी दूसरे देश पर निर्भर न रहे. दूसरी Commercial Chips हैं. ये वही चिप हैं, जो मोबाइल, कार, टीवी, फ्रिज, AC, टेलीकॉम नेटवर्क और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में इस्तेमाल होती हैं.
मोबाइल तो भारत में बन रहे, फिर चिप की जरूरत क्यों?
भारत आज दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग हब बन चुका है. देश में बिकने वाले ज्यादातर मोबाइल भारत में असेंबल होते हैं, लेकिन इनका सबसे महंगा और सबसे जरूरी हिस्सा यानी Processor Chip अब भी विदेश से आता है. ऐसे में सरकार मोबाइल निर्माण के साथ-साथ अब चिप निर्माण पर भी जोर दे रही है.
किस तरह की चिप बनाएगा भारत?
शुरुआत में भारत की फैब 28nm से 110nm तक की चिप बनाएंगी. दरअसल, Nanometer (nm) जितना छोटा होगा, चिप उतनी ज्यादा तेज, आधुनिक और बिजली बचाने वाली होगी. 28nm से 110nm वाली चिप कार, टीवी, फ्रिज, टेलीकॉम, इंडस्ट्रियल मशीन और रक्षा उपकरणों के लिए पूरी तरह पर्याप्त हैं. वहीं, प्रीमियम स्मार्टफोन में इस्तेमाल होने वाली 7nm, 5nm, 3nm और 2nm जैसी चिप अभी दुनिया के कुछ ही देशों में बनती हैं. सरकार का लक्ष्य है कि 2035 तक भारत भी ऐसी अत्याधुनिक चिप बनाने की क्षमता विकसित करे.
गाड़ियों और 5G नेटवर्क के लि ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 17 Jul 2026 07:30:13 +0530</pubDate>
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        <title>Important Phone Settings: फोन में कर लें ये तीन बदलाव, मोबाइल नहीं आप हो जाएंगे स्मार्ट, यहां जानिए क्या है तरीका?</title>
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        <description><![CDATA[ Important Phone Settings:&amp;nbsp; आज के समय में हर किसी के जिन्दगी में स्मार्ट फोन एक अहम हिस्सा बन गया &amp;nbsp;है. अक्सर ज्यादातर लोग फोन को सिर्फ कॉल करने, मैसेज भेजने या सोशल मीडिया चलाने के लिए ही इस्तेमाल करते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि आप कुछ सेटिंग्स में अपने फोन में बदलाव कर सकते हैं, जिससे आपका फोन पहले से ज्यादा स्मार्ट हो जाएग और साथ ही उपयोग करने में पहले से ज्यादा असानी हो जाएगी. आइए जानते हैं इसके बारे में पूरी जानकारी. &amp;nbsp;
सबसे पहले ऐप परमिशन को करें चेक
फोन को तेज और स्मार्ट बनाने के लिए सबसे पहले आपको अपने फोन के सेटिंग से मौजूद ऐप्स कि परमिशन को चेक करना होगा. यानी अक्सर कई लोगों को सही जानकारी नहीं होती है और वे बिना जाने, पड़े उस एप को वे परमिशन दे देते हैं जिसकी उसको जरूरत भी नहीं होती है. उघारण के तौर पर समझे तो कई बार हम बिना सोचे-समझे किसी भी ऐप को कैमरा, माइक्रोफोन, लोकेशन या कॉन्टैक्ट्स की परमिशन दे देते हैं. जिससे आपकी निजी जानकारी लीक होने का खतरा बड़ जाता है.
ऐसे में सवाल आता है कि इस परेशानी को ठीक कैसे करें, &amp;nbsp;तो इसके लिए आपको फोन की सेटिंग्स में जाकर &quot;ऐप परमिशन&quot; पर जाना होगा. जहां पर ये सारी जानकारी देख सकते हैं कि आखिर आपने किन-किन फालतू एप्स को परमिशन दे रखी है. वहीं जिन ऐप्स को आप ज्यादा इस्तेमाल नहीं करते, उनकी परमिशन बंद कर दें. &amp;nbsp;इससे आपका कम खर्च होगा साथ ही आपकी निजी जानकारी भी सुरक्षित रहेगी. &amp;nbsp;
यह भी पढ़ेंः&amp;nbsp; IRCTC Beta Version: IRCTC का बीटा वर्जन लॉन्च.... यह क्या होता है और ओरिजनल वेबसाइट से कितना अलग?
स्टोरेज को रखें साफ-सुथरा
फोन को इस्तेमाल करते समय अक्सर कई लोग अपने फोन के स्टोरेज को चेक करना भूल जाते हैं, जिसके कारण उनका फोन धिरे-धिरे स्लो, लेक, और हेंग होने लगता है. ऐसे में आपको अपने फोन से पुरानी फोटो, वीडियो और बेकार पड़े ऐप्स को डिलीट कर देना चाहिए, जिससे फोन की स्पीड बनी रहता है. साथ आपको महीने में एक बार अपने फोन की सेटिंग्स में जाकर &quot;स्टोरेज&quot; पर जा कर चेक करना होगा.&amp;nbsp;
सिस्टम अपडेट को न करें नजरअंदाज
तीसरा और आखिरी बदलाव है फोन के सॉफ्टवेयर अपडेट को समय पर करना. &amp;nbsp;बहुत से लोग सोचते हैं कि अपडेट करने से फोन धीमा हो जाएगा, लेकिन असल में यह सोच गलत है. कंपनियां समय-समय पर अपडेट के जरिए फोन की सुरक्षा को मजबूत करती हैं. अगर आप पुराना सॉफ्टवेयर इस्तेमाल करते रहेंगे, तो हैकर्स आपके फोन को आसानी से निशाना बना सकते हैं. इसलिए आपको &amp;nbsp;हमेशा सेटिंग्स में जाकर &quot;सॉफ्टवेयर अपडेट&quot; वाले ऑप्शन को चेक करते रहना चाहिए ऐर समय पर &amp;nbsp;इंस्टॉल कर लेना चाहिए.&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;
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        <pubDate>Fri, 17 Jul 2026 07:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Smartphone Tips: कोई एप आपकी स्क्रीन तो रिकॉर्ड नहीं कर रहा? फटाफट ऐसे करें चेक</title>
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        <description><![CDATA[ Smartphone Tips: स्मार्टफोन हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है. बैंकिंग से लेकर चैटिंग और ऑनलाइन शॉपिंग तक कई जरूरी काम फोन पर ही होते हैं. ऐसे में अगर कोई ऐप आपकी जानकारी के बिना स्क्रीन रिकॉर्ड कर रही हो, तो आपकी निजी जानकारी खतरे में पड़ सकती है. हालांकि, एंड्रॉयड और आईफोन दोनों में स्क्रीन रिकॉर्डिंग के लिए अनुमति की जरूरत होती है अगर आपने किसी ऐप को यह अनुमति दी है, तो समय समय पर इसकी जांच करना जरूरी है. आइए जानते हैं कि कैसे पता करें कि कोई ऐप आपकी स्क्रीन रिकॉर्ड तो नहीं कर रही.
अनजान परमिशन पर रखें सबसे पहले नजर
फोन में इंस्टॉल किसी भी ऐप को जरूरत से ज्यादा परमिशन देना खतरा बढ़ सकता है. अगर किसी ऐप ने स्क्रीन रिकॉर्डिंग या स्क्रीन कैप्चर से जुड़ी अनुमति मांगी है, तो पहले यह समझें कि उसे इसकी जरूरत क्यों है? अनजान या जिस ऐप्स पर संदेह हो उसे अनुमति देने से बचें.&amp;nbsp;
Privacy Dashboard से मिल सकता है बड़ा सुराग
अगर आप Android 12 या उससे ऊपर का वर्जन इस्तेमाल कर रहे हैं, तो Privacy Dashboard में जाकर यह देख सकते हैं कि कौन कौन से ऐप्स कैमरा, माइक्रोफोन और दूसरी संवेदनशील परमिशन का इस्तेमाल कर रहे हैं. किसी अनजान ऐप की असामान्य Activity दिखने पर उसकी जांच करें और जरूरत पड़ने पर परमिशन हटा दें.
Accessibility Service की जरूर करें जांच
कुछ ऐप्स Accessibility Service का गलत इस्तेमाल कर स्क्रीन पर दिखाई देने वाली जानकारी तक पहुंचने की कोशिश कर सकते हैं. फोन की सेटिंग में जाकर देखें कि यह permission किन ऐप्स को दी गई है. अगर कोई अनजान ऐप्स यहां दिखाई दे, तो उसकी अनुमति तुरंत No allow कर दें.
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स्क्रीन रिकॉर्डिंग का संकेत दिखे तो रहें सतर्क
कई स्मार्टफोन में स्क्रीन रिकॉर्डिंग शुरू होने पर स्टेटस बार में आइकन या नोटिफिकेशन दिखाई देता है. अगर आपने रिकॉर्डिंग शुरू नहीं की है और फिर भी ऐसा संकेत दिखे, तो यह जांचने की जरूरत है कि कौन सा ऐप एक्टिव है. ऐसे में हाल ही में इंस्टॉल किए गए ऐप्स की भी रिव्यू करें.
फोन की सुरक्षा के लिए अपनाएं ये आसान उपाय
हमेशा ऐप्स को केवल ऑथराइज्ड ऐप स्टोर से डाउनलोड करें. समय समय पर ऐप परमिशन की जांच करें और जिन ऐप्स का इस्तेमाल नहीं करते, तो अनइंटॉल रें. साथ ही फोन का सॉफ्टवेयर अपडेट रखना भी जरूरी है, क्योंकि नए अपडेट में कई सुरक्षा सुधार शामिल होते हैं.
आईफोन यूज़र्स तुरंत अपनाएं यह सीक्रेत तरीका
अपने डिवाइस की Setting&gt;Privacy &amp;amp; Security में जाएं. उन सभी ऐप्स क कैमरा और माइकरोफोन एक्सेस तुरंत बंद करें जिनकी आवश्यकता नहीं हैं.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Fri, 17 Jul 2026 07:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>Phone Maintenance Tips: हर 2 साल में नया फोन खरीदना करें बंद! इन 4 टेक सीक्रेट्स से पुराना स्मार्टफोन बनाएं सुपरफास्ट</title>
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        <description><![CDATA[ Phone Maintenance Tips: हर 2 साल में नया फोन खरीदना करें बंद! इन 4 टेक सीक्रेट्स से पुराना स्मार्टफोन बनाएं सुपरफास्ट ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 17 Jul 2026 07:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>क्या फर्जी कॉपीराइट कंप्लेंट मिलने पर भी बंद हो रहा इंस्टाग्राम अकाउंट? जान लें इसकी हकीकत</title>
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        <description><![CDATA[ Instagram Copyright Strike Extortion Network: दिल्ली हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर इंस्टाग्राम पर चल रहे एक कथित साइबर एक्सटॉर्शन नेटवर्क की जांच की मांग की गई है. याचिका में कहा गया है कि यह नेटवर्क इंस्टाग्राम के कॉपीराइट सिस्टम का मिसयूज कर कंटेट क्रिएटर को टारगेट कर रहा है. इस नेटवर्क की जांच के स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम के गठन की मांग की गई है. याचिका को कंटेट क्रिएटर नीतिन जोशी ने फाइल किया है और उनका आरोप है कि इंस्टाग्राम अकाउंट्स पर फर्जी कॉपीराइट स्ट्राइक की जाती है. इससे अकाउंट बंद हो जाता है. फिर स्ट्राइक वापस लेने के लिए पैसों की डिमांड की जाती है. आइए जानते हैं कि यह पूरा मामला क्या है.&amp;nbsp;
क्या है पूरा मामला?
याचिकाकर्ता का कहना है कि एक संगठित नेटवर्क इंस्टाग्राम के कॉपीराइट रिपोर्टिंग सिस्टम का दुरुपयोग कर रहा है. यह नेटवर्क बॉट अकाउंट्स के जरिए किसी इंस्टाग्राम अकाउंट को टारगेट करता है. ये अकाउंट कॉपीराइट के उल्लंघन की शिकायतें दर्ज करवाते हैं. इससे इंस्टाग्राम की ऑटोमैटेड एनफोर्समेंट प्रोसेस शुरू हो जाती है, जिसमें बिना कोई नोटिस या वेरिफिकेशन के अकाउंट को सस्पेंड करने से लेकर डिसेबल तक कर दिया जाता है.
स्ट्राइक वापस लेने के लिए मांगे जाते हैं पैसे
याचिका में कहा गया है कि एक बार इंस्टाग्राम अकाउंट सस्पेंड या डिसेबल होने के बाद नेटवर्क की तरफ से कंटेट क्रिएटर को कॉन्टैक्ट किया जाता है. फिर यह नेटवर्क कॉपीराइट की शिकायत वापस लेने के लिए मोटी रकम की मांग करते हैं. याचिकाकर्ता के वकील ने बताया कि यह एक नया उभरता हुआ साइबर क्राइम है, जिसमें मेटा प्लेटफॉर्म के कॉपीराइट एनफोर्समेंट मैकेनिज्म को फिरौती के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है.
याचिकाकर्ता ने दिया खुद का उदाहरण
याचिकाकर्ता जोशी ने कहा कि उन्होंने &quot;इंस्टाग्राम का सबसे बड़ा कॉपीराइट स्कैम&quot; टाइटल से एक वीडियो पब्लिश किया था. इसके बाद कई दूसरे क्रिएटर्स ने ऐसी ही फर्जी शिकायतों के सबूत उनके साथ साझा किए हैं. जोशी ने आरोप लगाया कि वीडियो पब्लिश होने के कुछ ही समय बाद कॉपीराइट की शिकायत को लेकर उनके वीडियो को दुनियाभर में ब्लॉक कर दिया गया. इससे पता चलता है कि कैसे मेटा के रिपोर्टिंग मैकेनिज्म को मिसयूज किया जा रहा है. याचिकाकर्ता ने इस पूरे मामले की जांच के लिए SIT के गठन की मांग की है. पहले 15 जुलाई को इस पर सुनवाई होनी थी, लेकिन एक जज के सुनवाई से हटने के बाद 28 जुलाई को इस मामले को सुना जाएगा.
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        <pubDate>Thu, 16 Jul 2026 15:30:22 +0530</pubDate>
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        <title>iPhone 16 के दाम धड़ाम! इस सेल में मिल रहा है सबसे सस्ता, मौका चूक न जाना</title>
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        <description><![CDATA[ iPhone 16 Price Cut: 2025 में सबसे ज्यादा बिकने वाले iPhone 16 की लॉन्चिंग को भले ही दो साल होने वाले हैं, लेकिन यह फोन पुराना नहीं हुआ है. अपने धांसू फीचर्स के दम पर यह आज भी कई मामलों में फ्लैगशिप फोन्स को टक्कर दे सकता है. अगर आप यह आईफोन खरीदना चाहते हैं तो इस समय धांसू डील मिल रही है. क्रोमा की इस डील का फायदा उठाकर आप हजारों रुपये बचा सकते हैं. डिस्काउंट के बाद की कीमत पर आईफोन 16 खरीदना और भी फायदे का सौदा हो जाएगा. आइए जानते हैं कि आपको आईफोन 16 में क्या-क्या फीचर्स मिलेंगे और क्रोमा पर क्या डील चल रही है.
iPhone 16 को क्यों पसंद कर रहे हैं लोग?
ऐप्पल ने 2024 में आईफोन 16 सीरीज को लॉन्च किया था. सीरीज के स्टैंडर्ड वेरिएंट iPhone 16 में 6.1 इंच का OLED डिस्प्ले मिलता है, जो 60Hz रिफ्रेश रेट, HDR कंटेट सपोर्ट और 2,000 निट्स की पीक ब्राइटनेस सपोर्ट के साथ आता है. A18 प्रोसेसर वाला यह आईफोन मल्टीटास्किंग और ऐप्पल इंटेलीजेंस फीचर्स को आसानी से हैंडल कर लेता है. हाई परफॉर्मेंस के साथ-साथ यह प्रोसेसर एफिशिएंट और अपकमिंग सॉफ्टवेयर अपडेट के लिए कंपेटिबल भी है. इसके रियर में 48MP+12MP का डुअल कैमरा सेटअप है. सेल्फी और वीडियो कॉल के लिए इसके फ्रंट में 12MP का कैमरा है. बैटरी की बात करें तो फुल चार्जिंग पर यह आईफोन 22 घंटे का वीडियो प्लेबैक सपोर्ट करता है. यह आईफोन अपनी कम कीमत, शानदार फीचर्स और लंबे सॉफ्टवेयर सपोर्ट के कारण लोगों की पसंद बना हुआ है.
क्रोमा पर कितना सस्ता मिल रहा iPhone 16?
iPhone 16 को भारत में 79,900 रुपये की शुरुआती कीमत पर लॉन्च किया गया था, लेकिन अभी यह काफी सस्ता मिल रहा है. क्रोमा पर इस आईफोन को 66,490 रुपये में लिस्ट किया गया है. 13,000 रुपये से ज्यादा की छूट के साथ आपको इस पर EMI का भी ऑप्शन मिल रहा है. इस तरह आप अपनी जेब पर एक साथ सारा बोझ डाले बिना भी इस आईफोन को अपना बना सकते हैं.
Google Pixel 10 पर भी डिस्काउंट
अगर आप आईफोन की जगह एंड्रॉयड फोन लेना चाहते हैं तो भी छूट का फायदा उठा सकते हैं. पिछले साल लॉन्च हुआ गूगल पिक्सल 10 इस समय अमेजन पर डिस्काउंट के साथ लिस्टेड है. भारत में यह फोन 79,999 रुपये में लॉन्च हुआ था, लेकिन अभी अमेजन पर यह 66,900 रुपये में लिस्टेड है. इस पर 2,000 रुपये का कैशबैक भी है, जिसके बाद इसकी कीमत 65,000 रुपये से भी कम हो जाएगी.
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        <pubDate>Thu, 16 Jul 2026 15:30:21 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>IRCTC Beta Version: IRCTC का बीटा वर्जन लॉन्च.... यह क्या होता है और ओरिजनल वेबसाइट से कितना अलग?</title>
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        <description><![CDATA[ IRCTC Beta Version : भारतीय रेलवे ने IRCTC की नई वेबसाइट का बीटा वर्जन लॉन्च कर दिया है. इसे फिलहाल सभी यूजर्स के लिए स्थायी रूप से लागू नहीं किया गया है, बल्कि लोगों से फीडबैक लेने के लिए टेस्टिंग के तौर पर उपलब्ध कराया गया है. इसका मकसद यह समझना है कि नई वेबसाइट पर टिकट बुक करना कितना आसान है, कौन-कौन सी चीजें बेहतर हुई हैं और किन जगहों पर अभी सुधार की जरूरत है.
रेलवे का कहना है कि यूजर्स के सुझावों और एक्सपीरियंस के आधार पर वेबसाइट में जरूरी बदलाव किए जाएंगे. इसके बाद यही नया पोर्टल सभी लोगों के लिए आधिकारिक तौर पर लॉन्च किया जाएगा. ऐसे में आइए जानते हैं कि बीटा वर्जन क्या होता है और ओरिजनल वेबसाइट से यह कितना अलग है.&amp;nbsp;
क्या होता है बीटा वर्जन?
बीटा वर्जन किसी भी वेबसाइट, ऐप या सॉफ्टवेयर का ऐसा शुरुआती वर्जन होता है, जिसे आम लोगों के इस्तेमाल के लिए जारी किया जाता है. इसका उद्देश्य यह देखना होता है कि असली यूजर्स वेबसाइट का इस्तेमाल करते समय किन दिक्कतों का सामना कर रहे हैं और कौन-कौन से फीचर्स बेहतर तरीके से काम कर रहे हैं. इस दौरान यूजर्स अपनी राय और सुझाव देते हैं. इन्हीं फीडबैक के आधार पर डेवलपर्स वेबसाइट में जरूरी सुधार करते हैं. सभी बदलाव पूरे होने के बाद ही फाइनल या ओरिजनल वर्जन लॉन्च किया जाता है.&amp;nbsp;
करीब 24 साल बाद बदल रही है IRCTC वेबसाइट
IRCTC की वेबसाइट पहली बार साल 2002 में शुरू की गई थी. तब से लेकर अब तक करोड़ों लोग इसी प्लेटफॉर्म के जरिए रेलवे टिकट बुक करते हैं. रेलवे के मुताबिक, यह वेबसाइट हर दिन औसतन 14.5 लाख से ज्यादा टिकट बुकिंग संभालती है. इतने बड़े प्लेटफॉर्म पर लगातार बढ़ते ट्रैफिक और बदलती जरूरतों को देखते हुए अब इसकी डिजाइन और काम करने के तरीके में बड़ा बदलाव किया जा रहा है, जिससे टिकट बुकिंग पहले से ज्यादा आसान और तेज हो सके.&amp;nbsp;
नई बीटा वेबसाइट कैसे यूज करें?
नई बीटा वेबसाइट का यूज https://www.irctc.co.in/eticket/ पर जाकर किया जा सकता है. इसके अलावा मौजूदा IRCTC वेबसाइट के होमपेज पर भी बीटा वर्जन का लिंक दिया जाएगा.&amp;nbsp;
ओरिजनल वेबसाइट से यह कितना अलग है?
रेल मंत्रालय के अनुसार नई वेबसाइट का सबसे बड़ा बदलाव इसका डिजाइन है. नई वेबसाइट पहले की तुलना में ज्यादा साफ और व्यवस्थित दिखाई देगी. स्क्रीन पर बिना जरूरत वाले पॉप-अप, चमकदार एलिमेंट और ध्यान भटकाने वाली चीजों को काफी हद तक कम किया गया है. इससे यूजर्स जरूरी जानकारी पर आसानी से ध्यान दे सकेंगे और टिकट बुकिंग का अनुभव पहले से बेहतर होगा. साथ ही नई वेबसाइट में सीट उपलब्धता देखने का तरीका भी बदला गया है. पहले अलग-अलग क्लास की सीट देखने के लिए बार-बार ऑप्शन बदलना पड़ता था, लेकिन अब यूजर्स एक ही स्क्रीन पर अलग-अलग क्लास में सीटों की उपलब्धता देख सकेंगे. इससे सही ऑप्शन चुनना पहले की तुलना में आसान हो जाएगा.&amp;nbsp;
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&amp;nbsp; ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 16 Jul 2026 15:30:20 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>OnePlus के भारत छोड़ने की चर्चा, क्या अब फोन खरीदना रहेगा फायदे का सौदा?</title>
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        <description><![CDATA[ OnePlus India Exit: हाल ही में खबर आई थी कि चाइनीज स्मार्टफोन कंपनी वनप्लस जल्द ही अमेरिका और यूरोप से अपना कारोबार समेट सकती है. अब इस लिस्ट में भारत का नाम भी जुड़ गया है. कुछ महीने पहले भी ऐसे कयास लगाए गए थे, जिनका कंपनी ने खंडन किया था. अब एक ताजा रिपोर्ट में दावा किया जा रहा है कि वनप्लस अमेरिका और यूरोप से निकलने का ऐलान इसी हफ्ते कर सकती है, जबकि भारत में यह अगले साल अपना कारोबार बंद कर देगी. ऐसे में ग्राहकों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि क्या कंपनी के फ्यूचर को लेकर लगाए जा रहे कयासों के बीच अभी वनप्लस का फोन खरीदना चाहिए? आइए इस सवाल का जवाब जानने की कोशिश करते हैं.&amp;nbsp;
क्या पूरी तरह बंद हो जाएगी वनप्लस?
अभी कंपनी के कुछ मार्केट्स से निकलने की खबरें आ रही हैं, जिनमें बताया गया है कि वनप्लस सिर्फ चाइनीज मार्केट पर फोकस करेगी. यानी कंपनी पूरी तरह बंद नहीं हो रही है और उसका अस्तित्व बचा रहेगा. दूसरी बात यह है कि वनप्लस की पैरेंट कंपनी ओप्पो के ऑपरेशन पहले की तरह जारी है. कई जगहों पर वनप्लस की वेबसाइट ग्राहकों को ओप्पो के प्रोडक्ट्स पर रिडायरेक्ट कर रही है. यह बताता है कि वनप्लस के एग्जिट होने के बाद वहां ओप्पो के उपस्थिति रहेगी.&amp;nbsp;
क्या अभी वनप्लस का फोन खरीदना चाहिए?
कुछ लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि क्या अभी वनप्लस का फोन खरीदना फायदे का सौदा होने वाला है? इसका जवाब है कि अगर आप फोन खरीदते हैं तो वनप्लस अपने ऑपरेशन जारी रहने तक कंज्यूमर और सिक्योरिटी अपडेट सपोर्ट देती रहेगी. इसके बाद अगर वनप्लस अपना कारोबार समेट भी लेती है तो ओप्पो की तरफ से यह सपोर्ट मिलता रहेगा. कुछ दिन पहले आई एक रिपोर्ट में बताया गया था कि ओप्पो अपना स्मार्टफोन बिजनेस रिस्ट्रक्चर कर रही है. इसके तहत वनप्लस का ऑफ्टर-सेल सर्विस सपोर्ट भी ओप्पो के सर्विस नेटवर्क के तहत आएगा. इसका मतलब है कि अगर आपके वनप्लस फोन में कोई इश्यू आता है तो आप इसे ओप्पो के सर्विस सेंटर पर दिखा सकते हैं.&amp;nbsp;
यूजर्स की शिकायतें भी आ रहीं सामने
अगर आप अभी वनप्लस का फोन खरीदते हैं तो कुछ मौजूदा यूजर्स की शिकायतों का भी ध्यान रखना चाहिए. टेकएडवाइजर की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि कंपनी का कस्टमर सपोर्ट रिपेयर और रिप्लेसमेंट के मामलों में ग्राहकों को संतुष्ट नहीं कर रहा है. कई यूजर्स ने रिप्लेसमेंट के बदले वाउचर मिलने की भी बात कही है. ऐसे में अभी तक यह पूरी तरह साफ नहीं हो पाया है कि अगर वनप्लस इंडियन मार्केट से एग्जिट लेती है तो आफ्टर-सेल सर्विस की स्थिति क्या रहने वाली है.
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        <pubDate>Thu, 16 Jul 2026 15:30:19 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Airtel यूजर्स के लिए जरूरी सूचना, यह काम नहीं किया तो अकाउंट से कट जाएंगे पैसे</title>
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        <description><![CDATA[ How To Cancel Airtel Perplexity Pro Subscription: अगर आप एयरटेल यूजर हैं तो यह खबर आपके काम की है. जिन यूजर्स ने एयरटेल थैंक्स ऐप से एक साल के लिए Perplexity Pro का सब्सक्रिप्शन एक्टिवेट किया था, उनका फ्री पीरियड पूरा होने वाला है. अगर रिन्यूअल डेट से पहले उसे कैंसिल नहीं किया जाता है तो आपको उस प्लान के पैसे देने पड़ सकते हैं. पिछले साल जब Perplexity ने एयरटेल के साथ अपनी पार्टनरशिप का ऐलान किया था तो उसने 17,000 रुपये की कीमत वाला Pro प्लान फ्री में ऑफर किया था. फ्री होने के बाद भी कई यूजर्स ने इसमें पेमेंट मेथड एड कर दिया था. अब प्रमोशनल पीरियड पूरा हो रहा है और इस सब्सक्रिप्शन को कैंसिल नहीं किया जाएगा तो आपके अकाउंट से प्लान के पैसे कट जाएंगे.
पैसे बचाने हैं तो जल्दी करें
Perplexity का प्रमोशनल पीरियड जल्दी ही पूरा हो जाएगा. यानी सब्सक्रिप्शन कैंसिल करने के लिए सिर्फ कम समय बचा है. अगर आप प्लान को कंटिन्यू करना चाहते हैं तो आपको कुछ करने की जरूरत नहीं है, लेकिन अगर आप कैंसिल करना चाहते हैं तो हम इसका तरीका बताने जा रहे हैं.
कैसे कैंसिल करें Airtel Perplexity Pro Subscription?
सबसे पहले Perplexity की वेबसाइट ओपन करें और अपने अकाउंट में साइन-इन कर लें. इसके बाद प्रोफाइल आइकन पर क्लिक या टैप करें. अब मेनू से ऑल सेटिंग को सेलेक्ट कर सब्सक्रिप्शन सेक्शन में जाएं. यहां थैंक्स फॉर सब्सक्राइबिंग परप्लेक्सिटी प्रो लिखा दिखेगा. इस पर टैप करने पर सब्सक्रिप्शन को मैनेज करने का ऑप्शन दिख जाएगा. मैनेज पर टैप कर नेक्स्ट पेज पर जाएं और एक बार फिर मैनेज को सेलेक्ट करें. यहां कैंसिल सब्सक्रिप्शन का ऑप्शन दिखेगा. इस पर टैप करने के बाद आपसे कैंसिल करने के कारण पूछे जाएंगे. आप चाहें तो कारण दे सकते हैं. इसके बाद कंटिन्यू पर टैप कर दें. यह प्रोसेस पूरी होते ही परप्लेक्सिटी की होम स्क्रीन पर आ जाएंगे.
कैंसिलेशन को कैसे करें कन्फर्म
आपका सब्सक्रिप्शन कैंसिल होते ही एक मैसेज के जरिए आपको इसकी जानकारी दे दी जाएगी. इसके अलावा आप चाहें तो फिर से ऑल सेटिंग के पेज पर जाकर सब्सक्रिप्शन सेक्शन ओपन कर लें. यहां पर आपको मैसेज दिख जाएगा, जिसमें लिखा होगा कि आपका प्लान पूरा होने के लिए शेड्यूल है. इसमें आपको तारीख भी दिख जाएगी.
एंड्रॉयड और आईफोन पर यह तरीका आएगा काम
प्लान कैंसिल करने का तरीका प्लेटफॉर्म के हिसाब से थोड़ा बदल सकता है. अगर आप इसे एंड्रॉयड और आईफोन के जरिए कैंसिल करना चाहते हैं तो आईफोन यूजर्स को अपने ऐप्पल अकाउंट की सेटिंग में जाकर रिकरिंग पेमेंट को मैनेज करना होगा. इसी तरह एंड्रॉयड यूजर्स भी सब्सक्रिप्शन सेक्शन में जाकर इसे कैंसिल कर सकते हैं.
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        <pubDate>Thu, 16 Jul 2026 15:30:18 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>दिनभर स्क्रीन में घुसे रहने वाले लोगों के लिए काम का है 1&amp;2&amp;10 नियम, जान लिया तो नुकसान से बच जाएंगे</title>
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        <description><![CDATA[ 1-2-10 Rule For Screens: कई लोग दिनभर स्क्रीन में घुसे रहते हैं. लैपटॉप पर काम करते-करते बोर हो जाएंगे और फोन देखना शुरू कर देंगे. फोन देखकर मन भर जाएगा तो टीवी चला लेते हैं. कई लोग तो टीवी देखने के साथ-साथ फोन भी देख रहे होते हैं. लगातार स्क्रीन के आगे रहने से आंखों पर असर पड़ता तय है. लगातार स्क्रीन के आगे रहने से सिरदर्द और नजर के कमजोर होने जैसी दिक्कतें हो सकती हैं. इसलिए आज हम आपको 1-2-10 का नियम बताने जा रहे हैं, जो आपको इन दिक्कतों से बचा सकता है.&amp;nbsp;
क्या है 1-2-10 का नियम?
यह नियम बड़ा आसान है. इसे याद रखने के साथ-साथ फॉलो करना भी मुश्किल वाला काम नहीं है. यह नियम कहता है कि आपके फोन की स्क्रीन आंखों से कम से कम 1 फुट, डेस्कटॉप या लैपटॉप की स्क्रीन 2 फुट और टीवी स्क्रीन 10 फुट दूर होनी चाहिए. इससे स्क्रीन के कारण आंखों पर पड़ने वाले असर को कम किया जा सकता है. अगर आपके घर में छोटे बच्चे हैं और वो टीवी, फोन या लैपटॉप को एकदम पास से देखते हैं तो उन्हें यह नियम समझाया जा सकता है. इसकी मदद से वो जान पाएंगे कि कौन-सा डिवाइस कितनी दूरी से देखना है.
स्क्रीन को एकदम पास से देखने के क्या नुकसान?
अगर आप स्क्रीन को एकदम पास से देखते हैं तो इसके कई नुकसान है. इससे एस्थेनोपिया हो सकता है, जो सिरदर्द और धुंधली नजर का कारण बन सकता है. इसके अलावा अगर आप एकदम पास से स्क्रीन पर नजर गड़ाए रहते हैं तो आखें कम झपकते हैं. इससे आंखों में सूखापन आ सकता है. लंबे समय तक अगर यह स्थिति बन रहती है तो स्क्रीन की तरफ देखना मुश्किल हो जाता है.
स्क्रीन की ब्राइटनेस से भी पड़ता है फर्क
अगर आप दिन के कई घंटे फोन की स्क्रीन पर बीता रहे हैं तो इसकी ब्राइटनेस का आपकी आंखों पर सीधा असर पड़ता है. इसलिए अगर आप फोन को अंधेरे में यूज कर रहे हैं तो स्क्रीन ब्राइटनेस को कम कर लें. हर बार आप इसे कम या ज्यादा करना भूल जाते हैं तो ऑटो-ब्राइटनेस का फीचर आपके काम आएगा. इसी तरह अंधेरे में आप डार्क मोड को भी यूज कर सकते हैं. यह टेक्स्ट को व्हाइट और बैकग्राउंड को ब्लैक कर देता है, जिससे कम ब्राइटनेस के बावजूद स्क्रीन को देखना आसान हो जाता है.
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        <pubDate>Thu, 16 Jul 2026 03:30:17 +0530</pubDate>
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        <title>Tower Fan या Pedestal Fan! छोटी जगह के लिए कौन देगा सबसे ज्यादा ठंडक? जानिए एक घंटे में कितनी बिजली होती है खपत</title>
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        <description><![CDATA[ Tower Fan Vs Pedestal Fan: गर्मियों के मौसम लोग अपने घरों में एसी, कूलर या पंखों का इस्तेमाल करते हैं. लेकिन टेक्नोलॉजी के साथ-साथ अब बाजार में कई सारे ऐसे एडवांस चीजें आ चुकी हैं जो आपको गर्मी से राहत देने में सक्षम है. इसी कड़ी में बता दें कि आज के समय में जो लोग एसी नहीं लगवा सकते हैं उनके लिए मार्केट में पेडेस्टल और टॉवर फैन काफी ट्रेंडिंग में चल रहे हैं. आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि दोनों में से कौन सा आपके लिए बेस्ट है और कौन ज्यादा बिजली खपत करता है.
कौन देता है ज्यादा ठंडक
अगर सिर्फ तेज हवा की बात करें तो Pedestal Fan नॉर्मली Tower Fan से बेहतर परफॉर्मेंस देता है. इसका बड़ा ब्लेड ज्यादा एयरफ्लो पैदा करता है जिससे गर्मी कम महसूस होती है.
वहीं, दूसरी ओर, Tower Fan की हवा उतनी तेज नहीं होती लेकिन ये लगातार और बैलेंस्ड एयरफ्लो देता है. अगर आप पढ़ाई, ऑफिस का काम या सोने के दौरान कम शोर वाला पंखा चाहते हैं तो Tower Fan आपके लिए ज्यादा बेहतर ऑप्शन साबित हो सकता है.
एक घंटे में कितनी होती है बिजली की खपत
अब बिजली की खपत की बात करें तो बता दें कि बिजली की खपत पंखे की मोटर और मॉडल पर निर्भर करती है. Pedestal Fan की पावर नॉर्मली 50 से 70 वॉट होती है. इसका मतलब है कि ये एक घंटे में लगभग 0.05 से 0.07 यूनिट बिजली खर्च करता है.
वहीं, Tower Fan की पावर करीब 35 से 60 वॉट होती है. ऐसे में इसकी खपत लगभग 0.035 से 0.06 यूनिट प्रति घंटे रहती है. अगर बिजली का औसत रेट 8 रुपये प्रति यूनिट माना जाए तो दोनों पंखों को एक घंटे चलाने का खर्च लगभग 30 से 60 पैसे के बीच होता है. इसीलिए बिजली खपत के मामले में दोनों ही डिवाइस किफायती साबित होते हैं.
कौन सा है बेहतर
आपको बता दें कि अगर आपका कमरा 80 से 150 स्कॉवयर फिट के बीच है तो दोनों तरह के पंखे इस्तेमाल किए जा सकते हैं. हालांकि, उनके काम करने का तरीका काफी अलग होता है. बता दें कि Pedestal Fan तेज हवा देने के लिए जाना जाता है.
इसकी ऊंचाई और डायरेक्शन को आसानी से चेंज किया जा सकता है जिससे हवा कमरे के हर कोने तक पहुंचती है. वहीं, दूसरी ओर, Tower Fan पतला और एडवांस डिजाइन के साथ आता है. ये कम जगह घेरता है और हवा को पूरे कमरे में अच्छे से फैलाता है जिससे छोटे कमरों में लोगों को ठंड़क मिलती है.
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        <pubDate>Thu, 16 Jul 2026 03:30:16 +0530</pubDate>
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        <title>iPhone यूजर्स सावधान! चार्जिंग के समय ये 4 गलतियां पड़ सकती हैं भारी</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/iphone-यूजर्स-सावधान-चार्जिंग-के-समय-ये-4-गलतियां-पड़-सकती-हैं-भारी</link>
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        <description><![CDATA[ iPhone यूजर्स सावधान! चार्जिंग के समय ये 4 गलतियां पड़ सकती हैं भारी ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 16 Jul 2026 03:30:15 +0530</pubDate>
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        <title>Smartwatch Privacy: क्या आपकी Smartwatch भी कर रही है जासूसी? ऐसे चोरी हो सकता है पर्सनल डेटा</title>
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        <description><![CDATA[ Smartwatch Privacy : आज लाखों लोग फिटनेस और हेल्थ ट्रैकिंग के लिए स्मार्टवॉच का इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन जितनी तेजी से इन डिवाइस का इस्तेमाल बढ़ रहा है, उतनी ही तेजी से प्राइवेसी और डेटा सिक्योरिटी को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं. कई रिपोर्ट्स और रिसर्च में यह चिंता जताई गई है कि स्मार्टवॉच से इकट्ठा होने वाला हेल्थ और लोकेशन डेटा कई बार क्लाउड पर स्टोर होता है और कुछ परिस्थितियों में थर्ड-पार्टी तक भी पहुंच सकता है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या आपकी स्मार्टवॉच सिर्फ आपकी हेल्थ पर नजर रख रही है या आपकी निजी जानकारी भी कहीं और पहुंच रही है. तो आइए आज हम आपको बताते हैं कि क्या आपकी Smartwatch भी जासूसी कर रही है और इससे कैसे आपका पर्सनल डेटा चोरी हो सकता है.&amp;nbsp;
स्मार्टवॉच कई तरह का डेटा करती है रिकॉर्ड
आज की स्मार्टवॉच पहले की तुलना में कहीं ज्यादा एडवांस हो चुकी हैं. इनमें कई तरह के सेंसर लगे होते हैं, जो यूजर की अलग-अलग हेल्थ और एक्टिविटी से जुड़ी जानकारी रिकॉर्ड करते हैं. इन डिवाइस के जरिए हार्ट रेट, ब्लड ऑक्सीजन लेवल, नींद का पैटर्न, स्ट्रेस लेवल, स्किन टेम्परेचर, शरीर की एक्टिविटी, GPS लोकेशन, ब्लूटूथ और वाई-फाई जैसी जानकारियां रिकॉर्ड हो सकती हैं. सभी स्मार्टवॉच में एक जैसे फीचर नहीं होते हैं, लेकिन ज्यादातर डिवाइस कई ज्यादा और बड़े लेवल पर पर्सनल जानकारी इकट्ठा करती हैं.&amp;nbsp;
क्या आपकी Smartwatch भी जासूसी कर रही है?
स्मार्टवॉच आपकी सेहत और फिटनेस पर नजर रखने के लिए कई जानकारियां रिकॉर्ड करती है. यह डेटा कई बार क्लाउड पर स्टोर होता है और कंपनी की प्राइवेसी पॉलिसी के अनुसार कुछ परिस्थितियों में सर्विस प्रोवाइडर्स या कानूनी एजेंसियों के साथ शेयर भी किया जा सकता है. हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि हर स्मार्टवॉच आपकी जासूसी कर रही है, लेकिन अगर यूजर बिना पढ़े सभी परमिशन दे देता है, तो उसकी पर्सनल जानकारी जरूरत से ज्यादा शेयर हो सकती है. ऐसे में प्राइवेसी सेटिंग्स, डेटा शेयरिंग और ऐप परमिशन की नियमित जांच करना बेहद जरूरी है.&amp;nbsp;
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हेल्थ डेटा क्यों माना जाता है जरूरी?
स्मार्टवॉच सिर्फ आपकी फिटनेस नहीं बताती, बल्कि आपकी लाइफस्टाइल की पूरी तस्वीर भी सामने ला सकती है. इसमें आपकी नींद का समय,डेली एक्टिविटी, हार्ट रेट, एक्सरसाइज, लोकेशन हिस्ट्री और कई मामलों में महिलाओं का पिरियड्स जैसी जानकारी भी रिकॉर्ड हो सकती है. यही कारण है कि इस तरह के डेटा को बेहद जरूरी और संवेदनशील माना जाता है.&amp;nbsp;
इससे कैसे आपका पर्सनल डेटा चोरी हो सकता है?
अगर स्मार्टवॉच की प्राइवेसी सेटिंग्स सही तरीके से मैनेज नहीं की जाएं या जरूरत से ज्यादा परमिशन दे दी जाए, तो आपका हेल्थ डेटा, लोकेशन हिस्ट्री, डेली रूटीन, नींद का पैटर्न और दूसरी पर्सनल जानकारी क्लाउड पर स्टोर होकर अलग-अलग सर्विस प्रोवाइडर्स तक पहुंच सकती है. वहीं अगर डिवाइस या उससे जुड़ा अकाउंट साइबर हमले का शिकार हो जाए, तो हैकर्स ब्लूटूथ, वाई-फाई या कमजोर सुरक्षा का फायदा उठाकर इस डेटा तक पहुंचने की कोशिश कर सकते हैं. ऐसे में मजबूत पासवर्ड, टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन, नियमित सॉफ्टवेयर अपडेट और जरूरी ऐप्स को ही परमिशन देना आपकी निजी जानकारी को सुरक्षित रखने के लिए बेहद जरूरी है.&amp;nbsp;&amp;nbsp;खुद को कैसे सुरक्षित रखें?
1. अगर आप स्मार्टवॉच इस्तेमाल करते हैं, तो &amp;nbsp;समय-समय पर स्मार्टवॉच की Privacy Settings और Data Sharing ऑप्शनों की जांच करें.&amp;nbsp;
2. Location Tracking और बिना जरूरत परमिशन को जरूरत के अनुसार ही चालू रखें.&amp;nbsp;
3. जिन सेंसर की जरूरत न हो, उनका एक्सेस बंद कर दें.&amp;nbsp;
4. पुराने हेल्थ डेटा को समय-समय पर क्लाउड से हटाते रहें.&amp;nbsp;
5. किसी भी अनजान Bluetooth Request को एक्सेप्ट न करें.&amp;nbsp;
6. स्मार्टवॉच का सॉफ्टवेयर हमेशा अपडेट रखें.&amp;nbsp;
7. अगर बैटरी अचानक बहुत तेजी से खत्म होने लगे या डिवाइस असामान्य व्यवहार करे, तो उसे जांचें और जरूरत पड़ने पर रीसेट करें.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Thu, 16 Jul 2026 03:30:14 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>फोन की Storage हो गई फुल? बिना SD Card के भी बढ़ा सकते हैं स्टोरेज, ये है कमाल का तरीका</title>
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        <pubDate>Thu, 16 Jul 2026 03:30:13 +0530</pubDate>
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        <title>अब रिमूवेबल बैटरी के साथ क्यों नहीं आते फोन? खुल गया यह बड़ा राज</title>
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        <description><![CDATA[ Why Removable Battery Removed From Phones: अगर आपने कुछ साल पहले तक नोकिया के कीपैड वाले फोन यूज किए हैं तो उनकी बैटरी भी बदली होगी. एक समय था, जब लोग एक फोन के लिए 2-3 बैटरी रखते थे. एक के डिस्चार्ज होते ही उसे निकालकर दूसरी बैटरी डाल लेते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं होता. फोन से रिमूवेबल बैटरी गायब हो गई है. अब बैटरी को आसानी से रिमूव नहीं किया जा सकता. पर ऐसा हुआ क्यों है, क्यों कंपनियों ने अपने फोन में रिमूवेबल बैटरी देना बंद कर दिया? आज हम आपके लिए इन सवालों के जवाब लेकर आए हैं.
...तो इसलिए नहीं आ रहे रिमूवेबल बैटरी वाले फोन
अगर सामान्य वजहों की बात करें तो इसके पीछे कारण हैं. दरअसल, अब कंपनियां हाई-क्वालिटी मैटेरियल से बने और फीचर-लोडेड फोन लॉन्च करने लगी हैं. रिमूवेबल बैटरी के साथ ऐसा करना पॉसिबल नहीं था. रिमूवेबल बैटरी को हटाने के बाद कंपनियों के लिए फोन बनाने में ज्यादा मजबूत मैटेरियल यूज करना, HD कैमरा और वायरलेस चार्जिंग जैसे फीचर्स देना आसान हो गया है. अगर पहले की तरह नए फोन में बैक कवर को हटाकर बैटरी निकालने का ऑप्शन रहता तो इन फीचर्स को लंबे टाइम तक वर्किंग कंडीशन में रखना काफी मुश्किल काम हो जाता.
फोन की सेफ्टी से भी जुड़ा है मामला
फीचर्स के अलावा बैटरी की मामला फोन की सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है. अगर रिमूवेबल बैटरी वाला फोन चोरी हो जाता है तो इसकी बैटरी हटाते ही सारे सिक्योरिटी फीचर्स बंद हो जाएंगे. नॉन-रिमूवेबल बैटरी को हटाना आसान नहीं है. इसलिए अब फोन चोरी होने के बाद भी इसके ट्रैकिंग और सिक्योरिटी फीचर्स इनेबल रहते हैं, जिससे फोन को ट्रैस कर पाना आसान हो गया है. इसके साथ ही अब बैटरी सील होने के कारण फोन में गैप्स और हिंजेज भी कम हो गए हैं. इससे अब फोन वाटरप्रूफ भी बनने लगे हैं. यही कारण है कि मॉडर्न और अच्छी IP रेटिंग वाले फोन अब काफी समय तक पानी में रह सकते हैं.&amp;nbsp;
क्या फिर से लौटेगा रिमूवेबल बैटरी का दौर?
भले ही सील्ड बैटरी फायदेमंद है, लेकिन कई लोगों को अब भी रिमूवेबल बैटरी की जरूरत महसूस होती है. कुछ समय पहले यूरोपीय संघ (EU) ने एक कानून बनाया था, जिसके तहत यह अनिवार्य किया गया है कि सभी पोर्टेबल डिवाइसेस में रिमूवेबल बैटरी होनी चाहिए. यह नियम अगले साल से लागू होगा. इसके बाद कंपनियों को EU में बेचने वाले फोन में रिमूवेबल बैटरी देनी पड़ेगी.
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        <pubDate>Wed, 15 Jul 2026 11:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>खराब होने के बाद स्मार्टफोन की बैटरी का क्या होता है, E&amp;Waste बनती है या होती है Recycle?</title>
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        <description><![CDATA[ Smartphone Battery: स्मार्टफोन ने लोगों के काम को काफी आसान बनाने का काम किया है. कई लोग अपने स्मार्टफोन को काफी लंबे समय तक इस्तेमाल करते हैं. इतने समय से फोन के इस्तेमाल होने पर उसकी बैटरी काफी कमजोर हो जाती है. ऐसे में कई बार लोगों के मन में सवाल होता है कि पूरी तरह से स्मार्टफोन की बैटरी खराब होने के बाद उसका क्या होता है. क्या वो ई-वेस्ट बन जाती है या फिर उसे दोबारा रिसाइकिल किया जा सकता है. आइए जानते हैं इसकी पूरी सच्चाई.
क्यों खराब होती है स्मार्टफोन की बैटरी?
आपको बता दें कि ज्यादातर स्मार्टफोन में लिथियम-आयन (Lithium-ion) बैटरी का इस्तेमाल किया जाता है. हर बार चार्ज और डिस्चार्ज होने पर बैटरी एक चार्जिंग साइकिल पूरी करती है. अब जैस-जैसे साइकिल पूरी होती जाती है वैसे-वैसे बैटरी की ताकत भी कम होने लगती है. एक समय के बाद स्मार्टफोन की बैटरी जल्दी डिस्चार्ज होने लगती है या फोन गर्म होने लगता है. अब ऐसी स्थिति में आपको फोन की बैटरी रिप्लेस कर देनी चाहिए या फिर नया फोन खरीदने पर विचार करना चाहिए.
पुरानी बैटरी का क्या करना चाहिए?
अगर आपके फोन की बैटरी खराब हो गई है तो उसे कभी भी नॉर्मल डस्टबिन में नहीं फेंकना चाहिए. इससे बेहतर होगा कि आप उसे किसी रजिसटर्ड ई-वेस्ट कलेक्शन सेंटर, मोबाइल निर्माता के सर्विस सेंटर या ई-वेस्ट ड्रॉप बॉक्स में जमा कर दें.
बता दें कि कई स्मार्टफोन कंपनियां पुरानी बैटरियां वापस लेकर उनकी सेफ्टी रिसाइक्लिंग करती हैं जिससे पर्यावरण पर होने वाला नुकसान भी कम होता है. इसीलिए एक्सपर्ट्स भी सलाह देते हैं कि खराब हो चुकीं बैटरी को कभी भी यूहीं नहीं फेंकना चाहिए.
खराब हो चुकी बैटरी का क्या होता है?
अगर स्मार्टफोन की बैटरी पूरी तरह से खराब हो चुकी है और आपने उसे नॉर्मल कचरे में फेंक दिया तो वो ई-वेस्ट बन जाता है जो पर्यावरण के लिए भी काफी नुकसानदायक हो सकता है. इसीलिए हमेशा बैटरी को नॉर्मली कचरे में फेंकने से मना किया जाता है.
जानकारी के लिए बता दें कि आज कई कंपनियां और रजिस्टर्ड ई-वेस्ट रिसाइक्लिंग सेंटर खराब बैटरियों को एक जगह पर इकट्ठा करके उनका सुरक्षित तरीके से रिसाइकिल करते हैं. इस प्रोसेस में बैटरी से लिथियम, कोबाल्ट, कॉपर, निकेल और एल्युमिनियम जैसे चीजों को अलग किया जाता है. इसके बाद इनका इस्तेमाल नई बैटरियां, इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस और अन्य प्रोडक्ट बनाने में किया जा सकता है.
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        <pubDate>Wed, 15 Jul 2026 11:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>लॉन्च से पहले लीक हो गई Samsung Galaxy Watch 9 और Ultra 2 की सारी जानकारी, जानिए क्या&amp;कुछ मिलेगा</title>
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        <description><![CDATA[ Samsung Galaxy Watches: सैमसंग के गैलेक्सी अनपैक्ड इवेंट में लगभग एक सप्ताह का समय बाकी है. इसमें कंपनी नए फोल्डेबल फोन के साथ-साथ Galaxy Watch 9 सीरीज और Galaxy Watch Ultra 2 को भी लॉन्च करेगी. लॉन्चिंग से पहले ही वॉचेज की सारी जानकारी लीक हो गई है. लीक के मुताबिक, सैमसंग की नई वॉचेज में नए चिपसेट और बड़ी बैटरी मिलने जा रही है. आइए एक नजर डालते हैं कि Galaxy Watch 9 सीरीज और Galaxy Watch Ultra 2 में क्या-क्या अपग्रेड्स आने वाली हैं.&amp;nbsp;
नई वॉचेज को लेकर सैमसंग ने कही यह बात
सैमसंग का कहना है कि Galaxy Watch 9 सीरीज और Galaxy Watch Ultra 2 एआई पावर्ड हेल्थ कंपैनियन डिवाइस होंगे, जिनमें सारे नए इंटरनल पार्ट्स लगे होंगे. नई चिपसेट और बड़े बैटरी पैक देने के अलावा इन्हें एनर्जी एफिशिएंट भी बनाया गया है.
लॉन्च से पहले ये फीचर हुए लीक
ताजा लीक के मुताबिक, वॉचेज के लिए सैमसंग अब इन-हाउस Exynos चिप को यूज नहीं करेगी. इसे क्वॉलकॉम के Snapdragon Wear Elite प्रोसेसर SW6100 से रिप्लेस किया जा रहा है. यह चिपसेट 3nm प्रोसेस पर बना है और इसमें 5 कंप्यूटिंग कोर्स है. नए प्रोसेसर से परफॉर्मेंस के साथ-साथ पावर एफिशिएंसी में भी सुधार होगा. मॉडल के हिसाब से इस चिपसेट को 2GB रैम और 32GB या 64GB स्टोरेज के साथ पेयर किया जाएगा. कनेक्टिविटी के मामले में सभी मॉडल Bluetooth 6.0, NFC, डुअल बैंड वाईफाई सपोर्ट के साथ आएंगे और सैमसंग के One UI Watch 9.0 पर रन करेंगे. Watch 9 के सभी मॉडल एल्युमिनियम केस के साथ लॉन्च होंगे.&amp;nbsp;
बैटरी में होगा ये इम्प्रूवमेंट
अगर लीक पर भरोसा किया जाए तो Galaxy Watch 9 का साइज 40mm होगा और इसमें मौजूदा मॉडल की तरह ही 325mAh का बैटरी पैक मिलेगा. वहीं इसके 44mm वेरिएंट में बैटरी को अपग्रेड किया जा रहा है. इसमें मौजूदा 435mAh पैक की बजाय 445mAh कैपेसिटी की नई बैटरी मिलेगी. इसकी तुलना में अल्ट्रा मॉडल को शानदार अपग्रेड के साथ लाया जा रहा है. Ultra 2 में मौजूदा मॉडल के 590mAh बैटरी पैक की जगह 800mAh के बैटरी पैक से लैस किया जाएगा. यह वॉच टाइटैनियम के साथ आएगी और पानी के अंदर 100 मीटर तक वाटर रजिस्टेंस ऑफर कर सकती है.&amp;nbsp;
कितनी रह सकती है कीमत?
सैमसंग वॉचेज की ऑफिशियल कीमत लॉन्च के समय पता चलेगी, लेकिन माना जा रहा है कि Watch 9 की शुरुआती कीमत 45,000 रुपये और इसके बड़े वेरिएंट की कीमत लगभग 48,400 रुपये रह सकती है. वहीं Watch Ultra 2 के लिए ग्राहकों को लगभग 82,500 रुपये चुकाने पड़ सकते हैं.
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        <pubDate>Wed, 15 Jul 2026 11:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Refurbished Smartphones खरीदते समय क्या&amp;क्या चीजें चेक करना चाहिए? ज्यादातर लोग करते हैं ये गलती</title>
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        <description><![CDATA[ Refurbished Smartphones: टेक्नोलॉजी की दुनिया में स्मार्टफोन लोगों के जिंदगी की जरुरत बन चुकी है. अब लोग स्मार्टफोन के जरिए अपने कई सारे काम आसान बना रहे हैं. लेकिन कई लोग बजट की कमी की वजह से सेकेंड हैंड या Refurbished स्मार्टफोन को खरीद लेते हैं. बता दें कि Refurbished स्मार्टफोन आजकल काफी ट्रेंडिंग में आ चुके हैं. लोग अब ऑनलाइन भी ऐसे डिवाइस को खरीद रहे हैं. लेकिन अक्सर लोग Refurbished फोन खरीदने से पहले कुछ गलतियां कर देते हैं जिसकी वजह से लोगों को बाद में पछताना पड़ता है. इसी कड़ी में आज हम आपको बताने जा रहे हैं ऐसी चीजों के बारे में जिन्हें Refurbished फोन खरीदने से पहले ध्यान रखना चाहिए.
IMEI नंबर और फोन की असली पहचान
इतना ही नहीं, फोन का IMEI नंबर बॉक्स और डिवाइस में एक जैसा होना चाहिए. इसके अलावा ये भी चेक करें कि फोन चोरी का या ब्लैकलिस्टेड डिवाइस न हो. IMEI को चेक करने से आपको डिवाइस की असली पहचान का पता चल जाता है.
बैटरी हेल्थ चेक करें
Refurbished फोन में सबसे ज्यादा समस्या बैटरी को लेकर होती है. बैटरी जल्दी खत्म होने लगे तो पूरा अनुभव खराब हो सकता है. iPhone में Battery Health आसानी से देखी जा सकती है जबकि Android फोन में बैटरी टेस्टिंग ऐप या सर्विस सेंटर की मदद ली जा सकती है.
फोन को अच्छे से करें चेक
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि सबसे पहले फोन के बॉडी, डिस्प्ले और कैमरा मॉड्यूल को ध्यान से चेक करना चाहिए. कहीं गहरे स्क्रैच, डेंट या टूटा हुआ हिस्सा तो नहीं है. साथ ही अगर फोन देखने में ही ज्यादा पुराना लग रहा है तो खरीदने से पहले दो बार सोचें.
सभी फीचर्स चेक करें
पुराना स्मार्टफोन खरीदने से पहले फोन के टचस्क्रीन, स्पीकर, माइक्रोफोन, कैमरा, फिंगरप्रिंट सेंसर, फेस अनलॉक, Wi-Fi, Bluetooth और चार्जिंग पोर्ट जैसे सभी चीजों को चेक कर लेना चाहिए. छोटी-सी खराबी भी आगे चलकर बड़ी परेशानी बन सकती है.
वारंटी और रिटर्न पॉलिसी जरूर पढ़ें
सबसे जरूरी बात पुराना स्मार्टफोन खरीदने से पहले उसकी वारंटी और रिटर्न पॉलिसी को जरूर चेक कर लेना चाहिए. बता दें कि ज्यादातर Refurbished फोन पर 6 महीने से 1 साल तक की वारंटी देते हैं. साथ ही रिटर्न या रिप्लेसमेंट की सुविधा भी उपलब्ध होती है. ऐसे में बिना वारंटी वाला फोन खरीदना आपके लिए खतरा साबित हो सकता है.
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        <pubDate>Tue, 14 Jul 2026 23:30:23 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Facebook यूजर्स तुरंत बदलें ये Settings, वरना कभी भी Hack हो सकता है आपका अकाउंट!</title>
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        <description><![CDATA[ Facebook यूजर्स तुरंत बदलें ये Settings, वरना कभी भी Hack हो सकता है आपका अकाउंट! ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 14 Jul 2026 23:30:22 +0530</pubDate>
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        <title>सोलर पैनल नहीं बना रहे पूरी बिजली, क्या हो सकते हैं कारण और कैसे करें समाधान? यहां जानें</title>
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        <description><![CDATA[ Solar System is not Generating Enough Power: सोलर पैनल को कई साल तक चलने के लिए डिजाइन किया जाता है. आमतौर पर सोलर पैनल की उम्र 25 साल मानी जाती है. हालांकि, समय के साथ इनकी एफिशिएंसी कम होती जाती है, लेकिन कई बार समय से पहले ही इनकी एफिशिएंसी पर असर दिखने लगता है. कई लोगों की शिकायत रहती है कि उनके पैनल पर्याप्त बिजली जनरेट नहीं कर रहे हैं. आज हम जानेंगे कि किन कारणों से एनर्जी प्रोडक्शन कम हो सकता है और इस समस्या का समाधान क्या है.
एनर्जी प्रोडक्शन कम होने के क्या कारण?
मौसम- सोलर पैनल को एनर्जी प्रोडक्शन के लिए सनलाइट की जरूरत रहती है. मौसम के हिसाब से दिन छोटे-बड़े होते रहते हैं. इसलिए अगर मानसून या सर्दी में गर्मी के मुकाबले एनर्जी प्रोडक्शन कम हुआ है तो चिंता की कोई बात नहीं है. मानसून में बादल छाने और सर्दियों में दिन छोटे होने के कारण पैनल गर्मी के मुकाबले कम बिजली बनाते हैं.
दूसरे कारण- अगर सोलर पैनल पर छाया पड़ रही है तो भी एनर्जी प्रोडक्शन कम हो सकता है. अगर किसी पेड़ की शाखा के कारण छाया रहने लगी है तो उसे ट्रिम कर दें. इसी तरह पैनल पर जमी धूल-मिट्टी सनलाइट को पैनल तक पहुंचने से रोक सकती है, जिससे पर्याप्त बिजली नहीं बन पाएगी. इसलिए पैनल को नियमित तौर पर साफ करने की सलाह दी जाती है.&amp;nbsp;
पैनल का पुराना हो जाना- जैसा हमने आपको ऊपर बताया कि पुराने होने के साथ-साथ पैनल की एफिशिएंसी कम होती जाती है. 10 साल पुराने पैनल में एफिशिएंसी 5-8 प्रतिशत तक कम हो सकती है.&amp;nbsp;
इन तकनीकी कारणों से भी आ सकती है कमी
सामान्य कारणों के अलावा कनेक्टर या वायरिंग में फॉल्ट आने से भी एनर्जी प्रोडक्शन पर असर पड़ता है. वायरिंग के खराब होने से इलेक्ट्रिक करंट का फ्लो पूरी तरह टूट जाता है. इसी तरह अगर पैनल में हॉटस्पॉट बनने और सेल डैमेज होने से भी कम बिजली जनरेट होती है. इन पर नजर रखना बहुत जरूरी है.
कब है प्रोफेशनल को बुलाने की जरूरत?
सामान्य कारणों जैसे मौसम, पैनल की सफाई या पुराने पैनल के कारण एनर्जी प्रोडक्शन कम होने की वजहों का आप खुद पता लगा सकते हैं, लेकिन अगर पैनल डैमेज हो गए हैं तो आपको प्रोफेशनल को बुलाने की जरूरत पड़ेगी. हॉटस्पॉट बनने, क्रैक्स आने या एनर्जी प्रोडक्शन के एकदम कम हो जाने पर प्रोफेशनल से रिपेयर करवाना जरूरी है. वह पूरे सिस्टम की अच्छे से देखभाल कर आपको बता देगा कि एनर्जी प्रोडक्शन कम होने का सबसे बड़ा कारण क्या है.
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        <pubDate>Tue, 14 Jul 2026 23:30:20 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>बिना किसी Discount के भी क्यों धड़ाधड़ लोग खरीद रहे iPhone 17? जानिए क्या है वजह</title>
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        <description><![CDATA[ बिना किसी Discount के भी क्यों धड़ाधड़ लोग खरीद रहे iPhone 17? जानिए क्या है वजह ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 14 Jul 2026 23:30:19 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Laptop की भी होती है Expiry Date? जानिए कब होती है बदलने की जरूरत</title>
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        <description><![CDATA[ Laptop: डिजिटल दुनिया में लैपटॉप भी आज लोगों की जरुरत बन चुका है. ऑफिस में काम करना हो या फिर वर्क फ्रॉम होम हो या फिर स्टूडेंट्स हों, लैपटॉप ऐसा डिवाइस है जो सभी के लिए काम आता है. लेकिन लैपटॉप भी हमेशा काम नहीं करता है. जी हां, दरअसल, स्मार्टफोन की तरह ही लैपटॉप भी एक समय के बाद काम करना बंद कर सकता है. साथ ही अक्सर लोगों के मन में सवाल होता है कि क्या लैपटॉप की भी एक्सपायरी डेट होती है. इसी कड़ी में आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि कब आपको लैपटॉप बदलने की जरुरत पड़ेगी.
अपडेट्स मिलना हो जाए बंद
जानकारी के लिए बता दें कि पुराने लैपटॉप में अक्सर नए ऑपरेटिंग सिस्टम और सॉफ्टवेयर सही तरीके से काम नहीं करते हैं. कई कंपनियां पुराने मॉडल के लिए सिक्योरिटी अपडेट देना भी बंद कर देती हैं. ऐसे में डेटा की सेफ्टी का खतरा भी बढ़ सकता है. अगर आपका लैपटॉप जरूरी अपडेट सपोर्ट नहीं कर रहा है तो आपको लैपटॉप को बदल देना चाहिए.
जल्द खत्म हो जाती है बैटरी
बता दें कि समय के साथ हर लैपटॉप की बैटरी की ताकत कम होती जाती है. अगर आपका लैपटॉप कुछ ही मिनटों में डिस्चार्ज हो जाता है या हमेशा चार्जर से जोड़कर ही इस्तेमाल करना पड़ता है तो पहले बैटरी बदलने का ऑप्शन देखें. लेकिन अगर बैटरी के साथ-साथ दूसरे हार्डवेयर भी पुराने हो चुके हैं तो नया लैपटॉप लेना ज्यादा समझदारी हो सकता है.
कब खरीदना है नया लैपटॉप
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अगर आपका लैपटॉप पहले के मुकाबले ज्यादा धीमा हो गया है, बार-बार हैंग होता है या स्टार्ट होने में काफी समय लेता है तो ये संकेत है कि सिस्टम का हार्डवेयर पुराना पड़ चुका है. कई बार RAM या SSD अपग्रेड करने से समस्या दूर हो जाती है लेकिन अगर इसके बाद भी परफॉर्मेंस में कोई सुधार नहीं आता तो नया लैपटॉप खरीदने पर आपको विचार करना चाहिए.
बार-बार रिपेयर की पड़ रही जरूरत
इतना ही नहीं, अगर लैपटॉप में बार-बार कीबोर्ड, स्क्रीन, मदरबोर्ड या दूसरे हार्डवेयर से जुड़ी समस्याएं आ रही हैं और हर कुछ महीनों में रिपेयर पर पैसे खर्च करने पड़ रहे हैं तो आपको बार-बार रिपेयर करना की जगह पर नया लैपटॉप खरीद लेना चाहिए.
कैसे लंबे समय तक चलाएं लैपटॉप
अब अगर आप भी अपने लैपटॉप की लाइफ बढ़ाना चाहते हैं तो कुछ जरूरी चीजों का जरूर ध्यान रखें. इसके लिए आपको समय-समय पर सिस्टम की सफाई करनी चाहिए. बेकार की फाइलें हटाएं, सॉफ्टवेयर अपडेट करते रहें, भरोसेमंद एंटीवायरस का इस्तेमाल करें और लैपटॉप को ज्यादा गर्म होने से बचाएं. इतना ही नहीं, SSD और RAM अपग्रेड करने से भी कई पुराने लैपटॉप की स्पीड में अच्छा सुधार देखा जा सकता है.
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        <pubDate>Tue, 14 Jul 2026 23:30:18 +0530</pubDate>
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        <title>WhatsApp यूजरनेम से साइबर ठगी का डर, सभी चैटिंग ऐप्स के लिए सरकार ला सकती है नए नियम</title>
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        <description><![CDATA[ WhatsApp, Telegram और Signal जैसे मैसेजिंग ऐप्स के लिए सरकार एक जैसे नियम बनाने की तैयारी कर रही है. इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय ऐसे फ्रेमवर्क पर काम कर रहा है, जिससे देश में काम करने वाले सभी मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स पर एक जैसे नियम लागू किए जा सकें. &amp;nbsp;इसकी सबसे बड़ी वजह WhatsApp का आने वाला यूजरनेम फीचर है, जिसे लेकर सरकार ने साइबर फ्रॉड बढ़ने की आशंका जताई है.
क्या है व्हाट्सऐप का नया फीचर?
WhatsApp एक ऐसे फीचर पर काम कर रहा है , जिसमें यूजर्स अपना मोबाइल नंबर बताए बिना सिर्फ यूजरनेम के जरिए चैट कर सकेंगे. कंपनी का कहना है कि इससे यूजर्स की प्राइवेसी बेहतर होगी, लेकिन सरकार को डर है कि इसी सुविधा का गलत इस्तेमाल कर ठग फर्जी पहचान बनाकर लोगों को निशाना बना सकते हैं. इससे फिशिंग, ऑनलाइन ठगी और डिजिटल अरेस्ट जैसे साइबर अपराध बढ़ सकते हैं.
सरकार ने व्हाट्सऐप को भेजा नोटिस
इसी वजह से सरकार ने WhatsApp को नोटिस भेजकर कहा था &amp;nbsp;कि जब तक इस मुद्दे पर चर्चा पूरी नहीं हो जाती, तब तक भारत में यह फीचर लॉन्च न किया जाए. वहीं, MeitY ने Telegram और Signal से भी उनके यूजरनेम फीचर और सुरक्षा इंतजामों की जानकारी मांगी. इस मामले में WhatsApp और Telegram अपना जवाब सरकार को दे चुके हैं.&amp;nbsp;
क्या है सरकार का पक्ष?
सरकार का कहना है कि अगर सिर्फ एक ऐप पर रोक लगाई जाए और दूसरे ऐप्स पर वही फीचर चलता रहे तो यह कानूनी रूप से कमजोर फैसला माना जाएगा. ऐसे में सभी मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स के लिए एक जैसा नियम बनाना जरूरी है. फिलहाल WhatsApp, Telegram और Signal जैसे ऐप आईटी एक्ट 2000 और आईटी नियम 2021 के तहत काम करते हैं, लेकिन इनमें यूजरनेम जैसे फीचर को लेकर कोई अलग नियम नहीं है.&amp;nbsp;
क्या है सरकार की प्लानिंग?
सरकार अब इसी कमी को दूर करने के लिए नया फ्रेमवर्क तैयार कर रही है. अभी इस पर अंतिम फैसला नहीं हुआ है और न ही कोई ड्राफ्ट नियम जारी किया गया है. सरकार सभी पक्षों से चर्चा के बाद आगे का निर्णय लेगी. अधिकारियों का कहना है कि मकसद प्राइवेसी और सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना है, ताकि नए फीचर साइबर अपराधियों के लिए हथियार न बन जाएं.
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        <pubDate>Tue, 14 Jul 2026 07:30:13 +0530</pubDate>
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        <title>Jio&amp;Airtel की बढ़ी टेंशन! BSNL ने लॉन्च किया सस्ता Broadband प्लान, जानिए बेनिफिट्स</title>
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        <description><![CDATA[ BSNL Broadband Plan: सरकारी टेलीकॉम कंपनी BSNL ने अपना एक नया ब्रॉडबैंड प्लान लॉन्च कर दिया है. इस प्लान की सबसे खास बात ये है कि इसको कंपनी ने 300 रुपये से भी कम कीमत में लॉन्च किया है. जी हां, इस प्लान की कीमत मे 259 रुपए है. साथ ही इस प्लान को खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों के लिए उतारा है. इस प्लान का मकसद छोटे शहरों को हाई स्पीड इंटरनेट से कनेक्ट करना है. इससे ग्रामीण क्षेत्र भी शहरों की तरह इंटरनेट से कनेक्ट हो सकेंगे. आइए जानते हैं क्या है इस प्लान के बेनिफिट्स.
फ्री होगी इंस्टालेशन
जानकारी के लिए बता दें कि नए ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए BSNL ने इस प्लान में फ्री इंस्टॉलेशन और मुफ्त मॉडेम की सुविधा भी शामिल की है. इससे आपको शुरुआत में कोई पैसा नहीं देना होगा. इतना ही नहीं इस ब्रॉडबैंड प्लान के साथ BSNL अपने Waves OTT प्लेटफॉर्म का मुफ्त सब्सक्रिप्शन भी दे रहा है. अब अगर आप भी इस प्लान का लाभ लेना चाहते हैं तो BSNL की ऑफिशियल वेबसाइट, मोबाइल ऐप या कस्टमर केयर के जरिए से आवेदन कर सकते हैं.
मिलेगा अनलिमिटेड इंटरनेट
आपको बता दें कि इस प्लान में यूजर्स को 25Mbps तक की ब्रॉडबैंड स्पीड मिलेगी जो ऑनलाइन पढ़ाई, वर्क फ्रॉम होम, वीडियो कॉल, OTT स्ट्रीमिंग और नॉर्मल इंटरनेट इस्तेमाल के लिए पर्याप्त है. इसके अलावा इस प्लान में 700GB हाई-स्पीड डेटा मिलता है. ये लिमिट पूरी होने के बाद भी इंटरनेट चलता रहेगा. हालांकि, नेट की स्पीड घटकर 2Mbps रह जाएगी. इसके साथ ही BSNL इस प्लान के साथ देशभर के किसी भी नेटवर्क पर अनलिमिटेड वॉयस कॉलिंग की सुविधा भी दे रहा है.&amp;nbsp;
Jio का ब्रॉडबैंड प्लान
Reliance Jio की बात करें तो इसका सबसे सस्ता ब्रॉडबैंड प्लान 399 रुपए में आता है. इस प्लान में यूजर्स को 30MBps की इंटरनेट स्पीड मिल जाती है. इसके साथ ही इसमें यूजर्स को कई सारे एडिशनल बेनिफिट्स भी मिलते हैं. बता दें कि ये प्लान देशभर के यूजर्स के लिए मान्य है. अगर आप फाइबर कनेक्शन लेते हैं तो आपको 3.3TB मंथली डेटा मिल जाता है.&amp;nbsp;
Airtel का सस्ता ब्रॉडबैंड प्लान
एयरटेल के ब्रॉडबैंड प्लान की बात करें तो कंपनी यूजर्स को 499 रुपए में अनलिमिटेड इंटरनेट वाला प्लान उपलब्ध कराती है. इस प्लान में यूजर्स को 40mbps की इंटरनेट स्पीड मिल जाती है. बता दें कि ये कंपनी का सबसे सस्ता ब्रॉडबैंड प्लान है जो पूरे देशभर के यूजर्स के लिए उपलब्ध है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Tue, 14 Jul 2026 07:30:13 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Google Maps कैसे दिखता है जगहों का नाम? जानिए कहां से मिलती है इसे जानकारी</title>
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        <description><![CDATA[ Google Maps: गूगल मैप्स का आज ज्यादातर लोग इस्तेमाल करते हैं. जगह खोजने से लेकर पैट्रोल पंप खोजने तक आज गूगल मैप का इस्तेमाल काफी बढ़ चुका है. लेकिन क्या आपने सोचा है कि गूगल मैप्स पर कैसे जगहों के नाम दिखते हैं. आखिर गूगल मैप को इसकी जानकारी कहां से मिलती है. आइए जानते हैं क्या होता है इसका पूरा प्रोसेस.
कहां से मिलती है जानकारी
आपको बता दें कि Google Maps पर दिखने वाली जानकारी किसी एक जगह से नहीं आती. इसके लिए Google कई अलग-अलग सोर्सेज का इस्तेमाल करता है. इनमें लोकल बिजनेस, सरकारी रिकॉर्ड, मैपिंग पार्टनर्स, वेबसाइट्स और खुद Google के सर्वे शामिल होते हैं. इन सभी जगहों से मिली जानकारी को मिलाकर Maps पर अपडेट किया जाता है.
बिजनेस वाले अपने आप जोड़ सकते हैं नाम
अब आपको बता दें कि अगर किसी व्यक्ति का नया बिजनेस है तो वह Google Business Profile के जरिए अपनी दुकान, ऑफिस या संस्थान की जानकारी खुद दर्ज कर सकता है. इसमें पता, फोन नंबर, वेबसाइट, काम करने का समय और फोटो जैसी जानकारी शामिल की जाती है. वेरिफिकेशन प्रोसेस के बाद ये जानकारी Google Maps पर दिखाई देने लगती है.
यूजर्स भी दे सकते हैं जानकारी
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि Google Maps की सबसे बड़ी खासियत ये है कि इसमें आम लोग भी योगदान दे सकते हैं. अगर किसी नई दुकान, सड़क या किसी स्थान का नाम Maps पर नहीं दिख रहा है तो यूजर Add a Place या Suggest an Edit फीचर की मदद से जानकारी भेज सकता है. बता दें कि यूजर से मिली जानकारी के बाद गूगल उसको पहले चेक करता है और सही पाए जाने पर गूगल उससे मैप में जोड़ देता है.
कई स्तर पर होती है जानकारी की जांच
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि Google Maps पर कोई भी जानकारी डायरेक्ट नहीं जुड़ जाते हैं. दरअसल, Google अपने एल्गोरिदम, मशीन लर्निंग और ह्यूमन वेरिफिकेशन की मदद से जानकारी को वेरिफाई किया जाता है. अगर कई सोर्सेज एक जैसी जानकारी देते हैं तो उसके सही होने की संभावना ज्यादा होती है. इसके अलावा अगर जानकारी गलत पाई जाती है तो उसे मैप से हटा भी दिया जाता है. इसी तरह से गूगल मैप पर जानकारी को ऐड करना आसान है लेकिन इसकी पीछे भी पूरा लंबा वेरिफिकेशन प्रोसेस होता है जिसे गूगल खुद चेक करता है.
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        <pubDate>Tue, 14 Jul 2026 07:30:11 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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    <item>
        <title>Use Of Mobile SIM Pin: सिर्फ सिम स्लॉट खोलने के लिए नहीं होती मोबाइल के साथ मिलने वाली पिन, होते हैं कई सारे काम</title>
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        <description><![CDATA[ Use Of Mobile SIM Pin: जब भी आप नया फोन खरीदते हैं, तो उसके चार्जर के साथ-साथ एक छोटी सी पिन भी मिलती है. जिसे ज्यादातर लोग समझते हैं कि यह पिन केवल सिम कार्ड को फोन के अंदर डालने और निकालने के ही काम आती है. कई बार तो लोग इसकी अहमियत जाने बिना ही फेंक देते हैं, लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि स्मार्टफोन के साथ मिलने वाली इस पिन का इस्तेमाल केवल सिम कार्ड डालने और निकालने तक ही नहीं है, बल्कि इसका इस्तेमाल और भी बहुत जगह होता है. आइए जानते हैं इसके बारे में पूरी जानकारी.
फोन को फोर्स रीस्टार्ट करने में आती है काम
कई यूजर्स की शिकायत होती है कि लंबे समय तक फोन का इस्तेमाल करने से फोन हैंग होने लगता है या फिर स्क्रीन फ्रीज हो जाती है. ऐसे में आपको बता दें कि वही छोटी सी पिन से आप इस समस्या को खत्म कर सकते हैं. बहुत से फोन्स में एक छोटा सा रीसेट होल होता है, जिसमें इस सिम पिन से दबाकर अपने फोन को रीस्टार्ट कर सकते हैं. हालांकि आजकल के स्मार्टफोन में ऐसा नहीं होता है लेकिन कई पुराने फोन में ऐसा पहले होता आया है.
इसके अलावा कुछ राउटर और मॉडम में भी एक छोटा सा रीसेट बटन होता है, जो अंदर धंसा हुआ होता है ताकि गलती से न दब जाए. वहीं इस पिन के इस्तेमाल से इस बटन को दबाया जाता है, जिससे राउटर की सेटिंग फिर से फैक्ट्री डिफॉल्ट पर आ जाती है. बस फोन में ही नहीं, स्मार्टवॉच और कुछ छोटे गैजेट्स में भी ऐसा ही एक पिनहोल रीसेट सिस्टम दिया जाता है, जिसको उंगली से प्रेस करना मुश्किल हो जाता है. ऐसे में यह पतली सी पिन बहुत काम आती है.
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छोटे छेद साफ करने और मेमोरी कार्ड निकालने में भी उपयोगी
इस पिन का एक और फायदा यह है कि इसकी मदद से फोन के स्पीकर या चार्जिंग पोर्ट के आसपास जमी हल्की धूल-मिट्टी को भी साफ किया जा सकता है. इसके अलावा जिन फोनों में सिम और मेमोरी कार्ड की ट्रे अलग-अलग होती है, वहां भी यही पिन दोनों ट्रे खोलने के काम आती है. कुल मिलाकर देखा जाए तो यह छोटी सी दिखने वाली पिन बस सिम को डालने और निकालने के लिए ही इस्तेमाल नहीं होती है, बल्कि यह और भी कामों के लिए बहुत काम की चीज है.
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        <pubDate>Tue, 14 Jul 2026 07:30:09 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>वेबकैम पर लाल डॉट दिखा? इसका मतलब हमेशा रिकॉर्डिंग नहीं होता, सच जानकर रह जाएंगे हैरान</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/वेबकैम-पर-लाल-डॉट-दिखा-इसका-मतलब-हमेशा-रिकॉर्डिंग-नहीं-होता-सच-जानकर-रह-जाएंगे-हैरान</link>
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        <description><![CDATA[ Webcam: वेबकैम आज के समय में काफी इस्तेमाल किया जाने वाला डिवाइस बन चुका है. बता दें कि वेबकैम पर दिखने वाला लाल या चमकता हुआ इंडिकेटर देखकर अक्सर लोगों को लगता है कि उनका लैपटॉप या कंप्यूटर कैमरा उनकी हर एक्टिविटी को रिकॉर्ड कर रहा है. हालांकि, हर बार ऐसा नहीं होता. कई बार ये लाइट केवल कैमरे के एक्टिव होने का संकेत देती है. हालांकि कुछ स्थिति में रिकॉर्डिंग के दौरान भी ये लाइन दिख सकती है.
नहीं होता हमेशा रिकॉर्डिंग
बता दें कि अगर आप Zoom, Google Meet, Microsoft Teams या किसी वीडियो कॉलिंग ऐप का इस्तेमाल कर रहे हैं तो वेबकैम की लाइट जलना नॉर्मल बात है. इस दौरान कैमरा सिर्फ लाइव वीडियो भेज रहा होता है जरूरी नहीं कि आपकी वीडियो रिकॉर्ड भी हो रही हो.
इसी तरह Windows Hello या अन्य फेस अनलॉक फीचर भी कैमरे को कुछ सेकंड के लिए एक्टिव कर सकते हैं जिससे इंडिकेटर जल सकता है.
क्यों दिखाई देती है वेबकैम पर लाल लाइट
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ज्यादातर लैपटॉप और एक्सटर्नल वेबकैम में कैमरे के पास एक छोटी LED लाइट होती है. जब कोई ऐप या सॉफ्टवेयर कैमरे का इस्तेमाल करता है तो ये लाइट जल जाती है. इसका मकसद यूजर को ये बताना होता है कि कैमरा इस समय एक्टिव है.
इतना ही नहीं, ध्यान देने वाली बात ये है कि कैमरे का एक्टिव होना हमेशा वीडियो रिकॉर्डिंग का संकेत नहीं होता. कई बार कैमरा केवल लाइव वीडियो दिखाने या फेस रिकग्निशन के लिए भी ऑन रहता है.
कब हों सावधान
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अगर आपने कोई कैमरा इस्तेमाल करने वाला ऐप नहीं खोला है, फिर भी वेबकैम की लाइट बार-बार जल रही है तो ये चिंता की बात हो सकती है. ऐसी स्थिति में ऐसा हो सकता है कि कोई बैकग्राउंड ऐप कैमरे का एक्सेस ले रहा हो या फिर कोई मेलवेयर पहुंच गया हो. ऐसी स्थिति में सबसे पहले ये चेक करें कि कौन-सा ऐप कैमरे का इस्तेमाल कर रहा है. Windows और macOS दोनों में Privacy Settings के जरिए ये देखा जा सकता है कि किन ऐप्स को कैमरे की परमिशन मिली हुई है.
कैसे रहें सेफ
वेबकैम की सुरक्षा के लिए केवल भरोसेमंद ऐप्स को ही कैमरा एक्सेस दें. जिन ऐप्स की जरूरत नहीं है, उनकी परमिशन तुरंत हटा दें. अपने ऑपरेटिंग सिस्टम और एंटीवायरस को हमेशा अपडेट रखें ताकि किसी भी सुरक्षा खतरे से बचा जा सके.
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        <pubDate>Tue, 14 Jul 2026 07:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>WhatsApp पर नहीं रहेगा स्कैम का डर, ये कमाल के फीचर रखेंगे सेफ</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/whatsapp-पर-नहीं-रहेगा-स्कैम-का-डर-ये-कमाल-के-फीचर-रखेंगे-सेफ</link>
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        <description><![CDATA[ WhatsApp Safety Features: ऑनलाइन स्कैम का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है. KYC स्कैम से लेकर डिजिटल अरेस्ट समेत न जाने कितने तरीकों से साइबर अपराधी लोगों की मेहनत की कमाई को लूट लेते हैं. भारत में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले मैसेजिंग प्लेटफॉर्म WhatsApp का भी साइबर अपराधी स्कैम के लिए इस्तेमाल करते हैं. इसे देखते हुए व्हाट्सऐप ने अपने प्लेटफॉर्म पर कुछ ऐसे फीचर्स जोड़े हैं, जो आपको साइबर अपराधियों के जाल में फंसने से बचा सकते हैं. आज हम आपके लिए ऐसे ही फीचर्स की पूरी लिस्ट लेकर आए हैं.
Silence Unknown Callers
अगर आपके पास अनजान नंबरों से ज्यादा कॉल्स आती हैं तो यह फीचर बड़े काम का है. जैसा नाम से ही जाहिर है यह अनजान नंबरों से आने वाली कॉल्स को साइलेंट कर देता है. इसका यह फायदा है कि ये कॉल्स आपको कॉल टैब और नोटिफिकेशन में तो दिखेंगी, लेकिन ये आपको डिस्टर्ब नहीं कर पाएंगी.
Context Cards
कॉन्टेक्स्ट कार्ड्स में आपको किसी कॉन्टैक्ट के बारे में एक्स्ट्रा इंफोर्मेशन मिल जाती है. यह आपको बता देता है कि कोई नंबर आपके फोन में सेव है या नहीं या आप उस कॉन्टैक्ट के साथ किसी ग्रुप में शामिल हैं. इससे यूजर के पास किसी कॉन्टैक्ट से आए मैसेज का रिप्लाई देने या उसे ब्लॉक करने के लिए काफी इंफोर्मेशन हो जाती है.
Screenshare Warning
व्हाट्सऐप वीडियो कॉल के जरिए स्क्रीन शेयर करने का ऑप्शन देती है. यह बड़े काम का फीचर है, लेकिन कई बार साइबर अपराधी इसकी मदद से सेंसेटिव डेटा चुरा लेते हैं. इसे देखते हुए कंपनी ने अब स्क्रीनशेयर वॉर्निंग दिखाना शुरू कर दिया है. अगर आप किसी अनजान व्यक्ति के साथ अपनी स्क्रीन शेयर कर रहे हैं तो संभावित खतरों की वॉर्निंग देते हुए आपके पास अलर्ट आ जाएगा.
Device Linking Alerts
कई बार फ्रॉड करने वाले लोग यूजर्स को बातों में फुसलाकर उसके व्हाट्सऐप अकाउंट को दूसरे डिवाइस से लिंक कर लेते हैं. फिर वो यूजर के अकाउंट को अपनी मर्जी से कैसे भी यूज कर सकते हैं. इससे बचाने के लिए व्हाट्सऐप अब सस्पिशियस रिक्वेस्ट आने वॉर्निंग अलर्ट देती है.&amp;nbsp;
Two-step Verification
ऑनलाइन दुनिया में सुरक्षा के लिए यह एक जरूरी फीचर्स है. इसमें अकाउंट रिसेट या वेरिफाई करने के लिए एक से ज्यादा वेरिफिकेशन की जरूरत पड़ती है. इसका मतलब है कि केवल पासवर्ड से अकाउंट को रिसेट या वेरिफाई नहीं किया जा सकता. वेरिफिकेशन के लिए आपको एक और एडिशनल तरीके की जरूरत पड़ेगी. इससे अकाउंट को हैक होने से बचाया जा सकता है.
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        <pubDate>Mon, 13 Jul 2026 18:30:18 +0530</pubDate>
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        <title>अब YouTube पर नहीं आएगा एक भी Ad! जानिए कैसे मुफ्त में मिलेगी ये सुविधा</title>
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        <description><![CDATA[ YouTube Without Ads: आज के समय में YouTube लोगों के मनोरंजन का बड़ा माध्यम बन चुका है. यह करीब सभी लोग अपने पसंद के हिसाब से वीडियोज देखते हैं. लेकिन अक्सर देखा गया है वीडियो देखते समय बार-बार ऐड्स आने लगते हैं जिससे लोग काफी परेशान होते हैं. लेकिन आज ह्म आपको एक ऐसे ब्राउजर के बारे में बताने जा रहे हैं हो आपको फ्री में यूट्यूब पर वीडियो देखने का मौका देता है और वो भी बिना ऐड्स के. आइए जानते हैं कौन सा है ये ब्राउजर.&amp;nbsp;
DuckDuckGo Browser
जानकारी के मुताबिक, DuckDuckGo एक ऐसा ब्राउजर है जो आपके प्राइवेसी को बनाए रखता है. ये ज्यादातर वो लोग इस्तेमाल करते हैं जिन्हें अपनी प्राइवेसी का ज्यादा खतरा होता है. इसी के साथ हल ही में इस ब्राउजर में एक नया फीचर आया है जो यूट्यूब पर आने वाले ऐड्स को ब्लॉक करने का काम करता है. इसकी एक और खास बात ये है कि इसके लिए आपको किसी भी नए सब्सक्रिप्शन प्लान की जरूरत नहीं होती है.&amp;nbsp;
कैसे करें इस्तेमाल&amp;nbsp;
कंपनी के अनुसार, iPhone, Windows और Mac यूजर्स वालों को ये फीचर डिफॉल्ट रूप से ब्राउजर में ही मिल जाएगा. वहीं, एंड्रॉयड यूजर्स वालों को ब्राउजर में जाकर इस फीचर को ऑन करना पड़ेगा. हालांकि, मन जा रहा है कि कंपनी जल्द ही एंड्रॉयड यूजर्स के लिए भी ये फीचर डिफॉल्ट रूप से पेश कर सकती है.&amp;nbsp;
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इस फीचर को इस्तेमाल करने के दौरान आप यूट्यूब पर बिना ऐड्स के वीडियो देख सकते हैं. हालांकि, वीडियो शुरू होने में कुछ समय ले सकता है लेकिन एक बार शुरू होने पर आपको बिना ऐड्स के वीडियो देखने का अनुभव मिलेगा.&amp;nbsp;
मिलेगा बेहतर अनुभव
DuckDuckGo में अब यूजर्स को नया फीचर मिला है जिसकी मदद से आप यूट्यूब पर बार बार एड्स नहीं दिखाई देंगे. इतना ही नहीं, ये ब्राउजर यूट्यूब के साथ ही कई वेबसाइट्स पर भी वीडियो ऐड्स को ब्लॉक करने में सक्षम है. इस फीचर के आने से अब यूजर्स को पहले के मुकाबले ज्यादा बेहतर अनुभव मिलेगा.
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        <pubDate>Mon, 13 Jul 2026 18:30:17 +0530</pubDate>
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        <title>GTA Game Developers: GTA जैसा गेम बनाने में कितने लोग करते हैं काम? जानिए पूरा प्रोसेस</title>
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        <description><![CDATA[ GTA Game Developers: अक्सर आज के समय में GTA यानी ग्रैंड थेफ्ट ऑटो का नाम किसने नहीं सुना होगा. बता दें कि यह एक बहुत मशहूर वीडियो गेम सीरीज है, जिसे Rockstar Games नाम की कंपनी बनाती है. यह गेम दुनियाभर में करोड़ों लोग खेलते हैं और इसकी कमाई भी बहुत ज्यादा होती है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस शानदार से गेम को बनाने में कितने लोगों की जरूरत होती है? क्या इसको बनाना बाकी गेम्स के मुकाबले काफी ज्यादा मुश्किल होता है? ऐसे में आपको बता दें कि इस गेम को बनाने में कई लोगों की मेहनत जुड़ी होती है. आपको जानकर हैरानी होगी कि इसको बनाने के लिए कई साल लग जाते हैं. आइए जानते हैं इसके बारे में पूरी जानकारी.
कितने लोग मिलकर बनाते हैं ऐसा गेम?
GTA जैसा बड़ा गेम बनाने के लिए हजारों लोग मिलकर काम करते हैं. जैसे GTA 5 की बात करें तो इसे बनाने में करीब 1,000 से ज्यादा लोगों ने काम किया था. इसके बाद जब Rockstar ने अपने अगले गेम Red Dead Redemption 2 पर काम करना शुरू किया, तो टीम का साइज और भी बड़ा हो गया. इस गेम में करीब 2,000 लोगों ने काम किया, जिनमें से 1,600 लोग सीधे तौर पर गेम बनाने में लगे हुए थे. यानी जैसे-जैसे गेम बनाने की प्रक्रिया बढ़ती गई, इसके डिटेल्स में बढ़ोतरी होती गई, वैसे-वैसे गेम बनाने के काम में और ज्यादा लोग जुड़ते गए. इसकी खासियत इस बात में है कि गेम को बनाने में केवल एक देश का हाथ नहीं है, बल्कि इसे बनाने में अलग-अलग देशों की कंपनियों ने मिलकर काम किया था.
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किस तरह के लोग करते हैं यह काम?
इस जानकारी के बाद हर किसी के दिमाग में यह सवाल आता है कि आखिर इस गेम को बनाने वाले लोग किस तरह के होते हैं. इसके जवाब में आपको बता दें कि इतनी बड़ी टीम में सिर्फ एक तरह के लोग नहीं होते, बल्कि अलग-अलग काम करने वाले लोग होते हैं. कुछ लोग गेम की कहानी लिखते हैं, तो कुछ लोग शहर का डिजाइन तैयार करते हैं, और कुछ लोग कोडिंग करके गेम को असल में चलाने लायक बनाते हैं. इसके अलावा एक टीम सिर्फ गेम की आवाजें और म्यूजिक बनाने का काम करती है. वहीं कुछ लोग पूरी तरह गेम तैयार होने के बाद सिर्फ गेम को टेस्ट करने का काम करते हैं, ताकि ग्राहकों तक पहुंचने से पहले उसमें मौजूद सारी गलतियों को ठीक किया जा सके.
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        <pubDate>Mon, 13 Jul 2026 18:30:15 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>iOS 27 का पहला पब्लिक बीटा जल्द होगा लॉन्च, जानिए क्या होगा नया और किन आईफोन को मिलेगा सपोर्ट</title>
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        <description><![CDATA[ iOS 27 Public Beta: ऐप्पल की नई सॉफ्टवेयर अपडेट iOS 27 का पब्लिक बीटा जल्द ही लॉन्च होने वाला है. डेवलपर्स के लिए iOS 27 के कई वर्जन लॉन्च हो चुके हैं और अब कंपनी पब्लिक के लिए इसके बीटा वर्जन लाने की तैयारी में जुटी हुई है. पब्लिक बीटा को इंस्टॉल कर आईफोन यूजर्स पहले ही यह देख पाएंगे कि नई अपडेट में उन्हें क्या-क्या फीचर्स मिलने वाले हैं. आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि इस अपडेट में क्या कुछ नया होगा और यह किन आईफोन मॉडल्स को सपोर्ट करेगी.
iOS 27 Public Beta में क्या मिलेगा?
इस अपडेट की सबसे बड़ी हाइलाइट सिरी एआई होने जा रहा है. ऐप्पल इसकी झलक पहले ही दिखा चुकी है. नई अपडेट में सिरी चैटबॉट को एआई-पावर्ड बनाया गया है. यह गूगल जेमिनी मॉडल पर ऑपरेट करेगा. हालांकि, सारे आईफोन यूजर्स को इसका फायदा नहीं मिलेगा. यह केवल आईफोन 15 प्रो और उसके बाद के मॉडल पर ही काम करेगा और इसके लिए भी आपको वेटलिस्ट ज्वॉइन करनी पड़ेगी.&amp;nbsp;
सिरी एआई के अलावा पब्लिक बीटा में नए लिक्विड ग्लास डिजाइन एलिमेंट भी देखने को मिलेंगे. इसमें एक खास स्लाइडर भी मिलेगा, जिसकी मदद से आप लिक्विड ग्लास डिजाइन की ट्रांसलुसेंसी को डिसाइड कर पाएंगे. इसके अलावा पुराने आईफोन को फास्ट बनाने के लिए ऐप्पल इसमें CPU शेड्यूलर भी दे सकती है. यह आईफोन 12 और 13 जैसे पुराने मॉडल्स के लिए काफी काम आने वाला फीचर होगा. बाकी फीचर्स की बात करें तो नई सॉफ्टवेयर अपडेट में कस्टम अलार्म वॉल्यूम, बेहतर कनेक्टिविटी, कुछ ऐप्स में अपडेट्स, एयरपॉड्स के लिए कस्टम इक्विलाइजर और कई बग्स के फिक्स को भी रोलआउट किया जाएगा.
इन आईफोन मॉडल्स को सपोर्ट करेगी नई अपडेट
iPhone SE की 2nd और 3rd जनरेशन के बाद लॉन्च हुए सभी मॉडल को नई अपडेट का सपोर्ट मिलेगा. इसका मतलब है कि आईफोन 11 सीरीज, आईफोन 12 सीरीज, आईफोन 13 सीरीज, आईफोन 14 सीरीज, आईफोन 15 सीरीज, आईफोन 16 सीरीज और आईफोन 17 सीरीज के मॉडल्स में नई अपडेट को इंस्टॉल किया जा सकेगा. हालांकि, ध्यान दें कि Siri AI के फीचर्स केवल आईफोन 15 प्रो मॉडल्स के बाद लॉन्च हुए आईफोन को ही सपोर्ट करेंगे.&amp;nbsp;
कब आ सकता है iOS 27 Public Beta?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, ऐप्पल 14 जुलाई को iOS 27 Public Beta को रोल आउट कर सकती है. रोल आउट होते ही यह अपडेट इंस्टॉल होने के लिए अवेलेबल हो जाएगी. अगर आप ऐप्पल के पब्लिक बीटा सॉफ्टवेयर प्रोग्राम में लिस्टेड हैं तो सेटिंग ऐप में जाकर इस अपडेट को इंस्टॉल कर पाएंगे.
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        <pubDate>Mon, 13 Jul 2026 18:30:13 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>घंटों तक चलाते हैं Washing Machine! जानिए कितनी बिजली होती है खपत और किन चीजों का रखना चाहिए ध्यान</title>
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        <description><![CDATA[ Washing Machine: आज वाशिंग मशीन ज्यादातर घरों में देखने को मिल जाती है. जल्दी कपड़े धोने से लेकर फटाफट कपड़े सूखने तक का काम आज वाशिंग मशीन के जरिए हो जाता है. इतना ही नहीं, आज टेक्नोलॉजी इतनी एडवांस हो चुकी है फुल ऑटोमैटिक वाशिंग मशीन भी आ चुकी हैं जो आपका काम बहुत आसान बना देती हैं. लेकिन कई बार देखा गया है कि लोग घंटों तक वाशिंग मशीन का इस्तेमाल करते हैं जिससे मशीन पर ज्यादा लोड पड़ता है. आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि घंटों तक वाशिंग मशीन चलाने पर कितनी बिजली की खपत होती है.
कितनी बिजली खर्च करती है वॉशिंग मशीन
आपकी बता दें कि नॉर्मली घर में इस्तेमाल होने वाली वॉशिंग मशीन की पावर 400 वॉट से लेकर 2,000 वॉट तक होती है. वहीं, सेमी-ऑटोमैटिक मशीनें आमतौर पर कम बिजली खर्च करती हैं जबकि फ्रंट लोड और हीटर वाले मॉडल ज्यादा बिजली लेते हैं. ऐसे में अगर किसी मशीन की क्षमता 500 वॉट है और वह एक घंटे तक चलती है तो लगभग 0.5 यूनिट बिजली की खपत होगी. वहीं, अगर मशीन में पानी गर्म करने का फीचर ऑन है तो मशीन ज्यादा बिजली खर्च करती है.&amp;nbsp;
कैसे बढ़ती है बिजली की खपत
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि वॉशिंग मशीन में गर्म पानी का इस्तेमाल, लंबे वॉश साइकिल, बार-बार छोटे-छोटे लोड में कपड़े धोना और मशीन में ज्यादा पानी भरना भी बिजली की खपत को बढ़ा देते हैं. इसके अलावा, पुरानी या कम एफिशिएंसी वाली मशीनें भी नए मॉडल के मुकाबले ज्यादा बिजली खर्च करती हैं.
कैसे बचाएं बिजली&amp;nbsp;
अब अगर आप भी वाशिंग मशीन इस्तेमाल करने के साथ कम बिजली खर्च करना चाहते हैं तो कुछ चीजों का ध्यान रखना जरूरी है. हमेशा मशीन में उतना ही पानी भरें जितनी उसकी क्षमता है. इसके अलावा बहुत कम कपड़ों के लिए मशीन चलाने से बचें. साथ ही जहां संभव हो, गर्म पानी की बजाय नॉर्मल पानी का इस्तेमाल करें. साथ की कपड़ों के अनुसार ही मशीन में मोड इस्तेमाल करना चाहिए. अगर आपकी मशीन में Eco Mode है तो उसका इस्तेमाल करना बेहतर हो सकता है.
इन बातों का रखें खास ध्यान
इसके अलावा कुछ और चीजों का ध्यान रखना भी जरूरी है. वॉशिंग मशीन को हमेशा समतल जगह पर रखें जिससे मशीन में कम वाइब्रेशन हो. इसके साथ ही सही मात्रा में ही डिटर्जेंट डालें क्योंकि ज्यादा झाग बनने से मशीन की परफॉर्मेंस पर असर पड़ सकता है. मशीन के प्लग, वायर और सॉकेट की स्थिति भी समय-समय पर चेक करते रहें. अगर मशीन से अजीब आवाज या कंपन आए तो उसे नजरअंदाज करने के बजाय तुरंत टेक्नीशियन से चेक करना चाहिए.
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        <pubDate>Mon, 13 Jul 2026 18:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>कैसे करें खराब क्वालिटी वाले सोलर पैनल की पहचान? सस्ते के लालच में हो सकता है बड़ा नुकसान</title>
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        <description><![CDATA[ Solar Panel Buying Guide: कुछ साल पहले तक सोलर पैनल कुछ-कुछ जगहों पर ही नजर आते थे, लेकिन अब शहरों से लेकर गांवों तक हर जगह इनका यूज होने लगा है. डिमांड बढ़ने के कारण अब बाजार में हर तरह के ऑप्शन अवेलेबल हो गए हैं. कई लोग सस्ते का लालच देकर आपको खराब क्वालिटी वाले पैनल भी बेच सकते हैं. ऐसे पैनल पर आपका पैसा भी बर्बाद हो जाएगा और आपको पूरी सोलर एनर्जी भी नहीं मिलेगी. आज हम जानेंगे कि खराब क्वालिटी वाले सोलर पैनल के क्या खतरे हैं और इनकी पहचान कैसे की जा सकती है.
क्यों बिक रहे हैं खराब क्वालिटी वाले पैनल?
इसका सीधा जवाब है कि सोलर पैनल मार्केट में कंपीटिशन बहुत बढ़ गया है और डिमांड भी ज्यादा है. इसलिए कई डीलर ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए सस्ते दामों में खराब क्वालिटी वाले पैनल बेच रहे हैं. अगर इन पैनल के नुकसान की बात करें तो इनमें घटिया क्वालिटी वाली सेल्स को यूज किया जाता है, जिससे एफिशिएंसी कम हो जाती है. इसी तरह इनके पैनल भी कमजोर होते हैं और इनके तेज आंधी या बारिश में मुड़ने का डर रहता है. इनमें यूज होने वाले ग्लास और बाकी पार्ट्स की क्वालिटी भी काफी खराब होती है.&amp;nbsp;
खराब क्वालिटी वाले पैनल के सबसे बड़े खतरे क्या हैं?

घटिया सेल्स लगे होने के कारण इनकी एफिशिएंसी पहले ही कम होती है. ऊपर से भारत के कई क्षेत्रों में जिस तरह का तापमान रहता है, उससे एफिशिएंसी और कम हो जाती है.
सस्ते सोलर पैनल में माइक्रोक्रैक की भी दिक्कत होती हैं. ये एकदम छोटी क्रैक्स होती हैं, जो गौर से देखने पर नजर भी नहीं आती. कुचछ समय बाद ही क्रैक्स के कारण पैनल की परफॉर्मेंस कम होने लगती है.
क्रैक्स के कारण पैनल में हॉटस्पॉट बन जाते हैं. ये खतरनाक होते हैं और पूरे सिस्टम को डैमेज कर सकते हैं. इसने आग लगने का भी खतरा रहता है.

कैसे करें खराब क्वालिटी वाले पैनल की पहचान?

अगर कोई आपको बहुत कम कीमत में पैनल देने की बात कर रहा है तो सतर्क हो जाएं.
पैनल खरीदते समय आपको सर्टिफिकेशन पर ध्यान देना चाहिए. असली और अच्छी क्वालिटी वाले पैनल पर BIS सर्टिफिकेशन और IEC टेस्टिंग स्टैंडर्ड दिख जाएंगे.
पैनल की बनावट देखकर भी क्वालिटी का अंदाजा लगाया जा सकता है. कमजोर फ्रेम, खराब फिनिशिंग और एक जैसा कलर न होना दिखाता है कि पैनल की क्वालिटी खराब है.
पैनल के साथ मिलने वाले डॉक्यूमेंट से भी पैनल की क्वालिटी और ऑथेंटिसिटी का पता लगाया जा सकता है.

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        <pubDate>Mon, 13 Jul 2026 02:30:21 +0530</pubDate>
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        <title>क्या आपका स्मार्टफोन भी हमेशा करता है लैग? ये हो सकता है कारण, इस ट्रिक से बन जाएगा सुपरफास्ट</title>
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        <description><![CDATA[ Tech Tips: वीडियो बनाने से लेकर मूवी देखने तक, आज स्मार्टफोन लोगों की लगभग सभी काम को आसान बनाता है. ये एक ऐसा डिवाइस बन चुका है जो घर में बच्चों से लेकर बुजर्गों तक के काम आता है. लेकिन अक्सर, देखा गया है कि कई बार स्मार्टफोन स्लो हो जाता है या फिर बार-बार लैग करने लगता है जिससे यूजर्स को काफी परेशानी होती है. आज हम आपको ऐसी ट्रिक के बारे में बताने जा रहे हैं जिसकी मदद से आपका पुराना स्मार्टफोन भी सुपरफास्ट बन जाएगा.
बंद करें बेकार के प्री-इंस्टॉल्ड ऐप्स
आज ज्यादातर स्मार्टफोन्स में कई ऐसे ऐप्स पहले से इंस्टॉल होते हैं जिनका आप ज्यादा इस्तेमाल नहीं करते हैं. लेकिन ये ऐप्स आपके फोन में स्पेस घेरे रहते हैं जिससे फोन पर ज्यादा लोड रहता है. इसीलिए फोन से बेकार के ऐप्स को तुरंत हटा देना चाहिए. इसके लिए Settings &gt; Apps में जाकर जिन ऐप्स की जरूरत नहीं है उन्हें Disable कर दें. इससे फोन पर अनावश्यक लोड कम होगा.
सेट करें Background Process Limit
इसके अलावा कई ऐप्स बैकग्राउंड में लगातार चलते रहते हैं जो डिवाइस के रैम और बैटरी दोनों का इस्तेमाल करते हैं जिससे आपके फोन पर ज्यादा लोड पड़ता है. इसको सही करने के लिए आपको Developer Options में जाकर Background Process Limit को &quot;At most 2 processes&quot; पर सेट करना होगा. इससे फोन एक समय में लिमिटेड बैकग्राउंड ऐप्स चलाएगा और सिस्टम ज्यादा स्मूद काम करेगा.
हटा दें बेकार के Widgets
बहुत ज्यादा विजेट्स होम स्क्रीन पर लगातार अपडेट होते रहते हैं जिससे रैम और प्रोसेसर का इस्तेमाल बढ़ सकता है. अब आपको जिन विजेट्स की जरूरत नहीं है उन्हें हटा देना ही सही होता है. इससे होम स्क्रीन हल्की होगी और फोन पहले से ज्यादा स्मूद काम करने लगेगा.
Cache को साफ करते रहें
आपको बता दें कि ऐप्स इस्तेमाल करते समय कैश फाइलें जमा होती रहती हैं. अब ज्यादा कैश जमा होने पर फोन पर एक्सट्रा लोड पड़ता है जिससे अक्सर डिवाइस स्लो हो जाता है. इसीलिए एक्सपर्ट्स भी सलाह देते हैं कि समय-समय पर फोन से कैश को साफ करते रहना चाहिए. इसके लिए आपको Settings &gt; Storage में जाकर समय-समय पर कैश साफ करते रहें.
कम करें Animation Scale
आपको बता दें कि स्मार्टफोन की एनिमेशन जितनी लंबी होती है उतना ही आपका डिवाइस स्लो काम करता है. इसीलिए एनिमेशन स्केल को कम करने से ये समस्या दूर हो सकती है. इसके लिए सबसे पहले Settings में जाकर About Phone में जाएं. इसके बाद यहां पर Build Number पर लगातार 7 बार टैप करें. इससे Developer Options चालू हो जाएगा. अब वहां जाकर Window Animation Scale को 0.5x पर सेट कर दें. इससे ऐप्स खुलने और स्क्रीन ट्रांजिशन पहले से ज्यादा तेज काम करने लगेंगे.
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        <pubDate>Mon, 13 Jul 2026 02:30:20 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>क्या, आपका, स्मार्टफोन, भी, हमेशा, करता, है, लैग, ये, हो, सकता, है, कारण, इस, ट्रिक, से, बन, जाएगा, सुपरफास्ट</media:keywords>
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        <title>Phone Restart Problem : अचानक फोन बार&amp;बार रीस्टार्ट होने लगा? हो सकती है ये गड़बड़</title>
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        <pubDate>Mon, 13 Jul 2026 02:30:19 +0530</pubDate>
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        <title>बुजुर्गों के बहुत काम आते हैं ये 5 Bluetooth Devices! रोजमर्रा की जिंदगी को बना देते हैं आसान</title>
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        <pubDate>Mon, 13 Jul 2026 02:30:18 +0530</pubDate>
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        <title>क्या मोबाइल टावर भी हो सकते हैं हैक? जानिए क्या है इसकी सच्चाई</title>
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        <description><![CDATA[ Mobile Tower: स्मार्टफोन आज के समय में लोगों की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है. ऐसे में आपका स्मार्टफोन आपके आस पास के मोबाइल टावर से कनेक्ट होता है जिससे आपको कॉलिंग और इंटरनेट की सुविधा मिलती है. लेकिन अक्सर लोगों के मन में ये सवाल उठता है कि क्या मोबाइल टावर भी हैक हो सकता है. सोशल मीडिया पर भी समय-समय पर ऐसे दावे सामने आते रहते हैं. आइए जानते हैं क्या है इसकी सच्चाई.
क्या मोबाइल टावर हैक हो सकते हैं
आपको बता दें कि मोबाइल टावर को हैक करना बेहद मुश्किल होता है. मोबाइल टावर कंप्यूटर या स्मार्टफोन की तरह नहीं होते हैं. इनमें कई Security Layers और एन्क्रिप्शन टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जाता है. आपको बता दें कि इन्हें हैक करने के लिए बहुत एडवांस टेक्नोलॉजी का ज्ञान होना जरूरी है. यही वजह है कि आम साइबर अपराधी मोबाइल टावर को निशाना नहीं बनाते हैं.
कैसे हो सकता है साइबर हमला?
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि साइबर अपराधी सीधे मोबाइल टावर को हैक करने के बजाय अक्सर फर्जी बेस स्टेशन या नकली मोबाइल टावर का इस्तेमाल करते हैं. इसे कई बार IMSI Catcher या Stingray जैसे डिवाइसेज के रूप में जाना जाता है. ये डिवाइस आसपास के मोबाइल फोन को असली टावर होने का साइन दे सकते हैं. इसके जरिए कुछ मामलों में कॉल या मैसेज से जुड़ी सीमित जानकारी हासिल करने की कोशिश की जा सकती है. हालांकि आज कल के एडवांस 4G और 5G नेटवर्क में इससे जुड़े कई सेफ्टी टूल्स मौजूद हैं.
मोबाइल कंपनियां कैसे रखती हैं सुरक्षा का ध्यान?
टेलीकॉम कंपनियां अपने नेटवर्क की सुरक्षा के लिए लगातार निगरानी करती हैं. नेटवर्क में किसी भी एब्नार्मल एक्टिविटी का पता लगाने के लिए एडवांस मॉनिटरिंग सिस्टम लगाए जाते हैं. इसके अलावा समय-समय पर सिक्योरिटी अपडेट, सॉफ्टवेयर पैच और एन्क्रिप्शन तकनीकों को बेहतर बनाया जाता है जिससे किसी भी आने वाले खतरे को रोका जा सके.
यूजर्स को किन बातों का रखना चाहिए ध्यान?
हालांकि मोबाइल टावर हैक होने की संभावना बहुत कम होती है लेकिन यूजर्स को अपनी सुरक्षा का ध्यान जरूर रखना चाहिए. हमेशा अपने फोन का सॉफ्टवेयर अपडेट रखें, अंजान लिंक पर क्लिक करने से बचें और अनजान ऐप्स इंस्टॉल न करें. अगर अचानक नेटवर्क से जुड़ी कोई समस्या दिखाई दे तो अपने टेलीकॉम ऑपरेटर से संपर्क करें.
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        <pubDate>Mon, 13 Jul 2026 02:30:17 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Google Privacy Settings:  गूगल के एआई टूल्स नहीं चुरा पाएंगे आपका डेटा, आज ही बदल लें ये 5 सेटिंग्स</title>
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        <description><![CDATA[ Google Privacy Settings:  गूगल के एआई टूल्स नहीं चुरा पाएंगे आपका डेटा, आज ही बदल लें ये 5 सेटिंग्स ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 12 Jul 2026 10:30:14 +0530</pubDate>
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        <title>Smart Water Tank Monitoring System: अब मोबाइल से चेक करें पानी की टंकी का लेवल, मोटर भी होगी रिमोट से कंट्रोल</title>
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        <description><![CDATA[ Smart Water Tank Monitoring System: दिल्ली-NCR समेत देश के ज्यादातर घरों की छत पर पानी की टंकी रखी होती है, लेकिन उसमें कितना पानी बचा है, यह पता लगाना अक्सर आसान नहीं होता, क्योंकि टंकी काफी ऊंचाई पर लगी होती है. बार-बार छत पर जाकर टंकी चेक करना न सिर्फ मेहनत का काम है, बल्कि कई बार नामुमकिन भी हो जाता है. लेकिन आपको जान कर हैरानी होगी कि अब इस समस्या का हल मिल गया है.
बता दें कि Flosenso नाम की कंपनी की एक डिवाइस अब लोगों को यह सुविधा दे रही है कि वे अपने मोबाइल फोन से ही टंकी में पानी का लेवल देख सकें और साथ ही मोटर को भी दूर बैठे-बैठे ऑन-ऑफ कर सकें. इस डिवाइस का नाम Flosenso Pro है और इसकी कीमत करीब 10 हजार रुपये रखी गई है.
कैसे काम करता है यह स्मार्ट डिवाइस?
Flosenso Pro असल में एक IoT आधारित वॉटर लेवल कंट्रोलर है, यानी यह इंटरनेट की मदद से काम करता है. यह डिवाइस बहुत कम बिजली में चलता है और इसे सीधे पानी की टंकी पर लगाया जाता है. इंस्टॉल होने के बाद यह एक स्मार्ट स्विच के साथ जुड़ जाता है. जब टंकी पूरी तरह भर जाती है, तो यह डिवाइस अपने आप वॉटर पंप को बंद कर देता है, जिससे पानी बर्बाद होने से बच जाता है. इसके साथ ही Flosenso का एक मोबाइल ऐप भी है, जिसे फोन में इंस्टॉल किया जाता है. इस ऐप को खोलते ही यूजर देख सकता है कि छत पर रखी टंकी में कितना पानी भरा हुआ है.&amp;nbsp;
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मोटर को खराब होने से भी बचाती है डिवाइस
Flosenso Pro की एक खास बात यह भी है कि यह मोटर को खराब होने से भी बचाती है. दरअसल कई बार ऐसा होता है कि पानी की सप्लाई मोटर तक नहीं पहुंच पाती, लेकिन मोटर फिर भी चलती रहती है. ऐसे में मोटर के जलने या खराब होने का खतरा बढ़ जाता है. Flosenso के डिवाइस में यह खासियत दी गई है कि अगर मोटर ऑन हो और पानी की सप्लाई न मिले, तो यह डिवाइस खुद ही मोटर को बंद कर देता है, जिससे उसका नुकसान होने से बच जाता है. कुल मिलाकर, यह गैजेट न सिर्फ पानी की टंकी को मैनेज करने में मदद करता है, बल्कि पानी की बर्बादी और मोटर के खराब होने जैसी दिक्कतों से भी बचाता है, जिससे लोगों का समय और पैसा दोनों बचता है.
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        <pubDate>Sun, 12 Jul 2026 10:30:13 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>HDMI 2.1, USB&amp;C और Display Port में क्या अंतर, जानें मॉनिटर के लिए कौन&amp;सा होता है बेहतर?</title>
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        <description><![CDATA[ HDMI 2.1 Vs USB-C Vs Display Port: अक्सर देखा गया है कि लोग नया मॉनिटर खरीदते समय उसकी स्क्रीन साइज या रिफ्रेश रेट को चेक करते हैं. लेकिन मॉनिटर की सही कनेक्टिविटी ही उतनी जरूरी होती है जितना की बाकी फीचर्स. बता दें कि मॉनिटर को खरीदते समय ये जरूर चेक करना चाहिए कि इसमें कौन सी कनेक्टिविटी मिल रही है.
अब बता दें कि आज के समय में मार्केट में HDMI 2.1, USB-C और Display Port काफी ट्रेंडिंग में चल रहे हैं. लेकिन इन तीनों में आपके मॉनिटर के लिए कौन सा बेस्ट रहेगा, इसको लेकर अक्सर लोगों में कंफ्यूजन देखने को मिलता है. आज हम आपको इन तीनों के बारे में बताने जा रहे हैं कि ये कैसे काम करते हैं और इनमें क्या अंतर होता है.
HDMI
अगर आपका मकसद फिल्में देखना, टीवी से कनेक्ट करना या गेमिंग कंसोल जैसे PlayStation और Xbox का इस्तेमाल करना है तो HDMI आपके लिए सबसे बेस्ट ऑप्शन साबित होगा. आज करीब सभी टीवी, साउंडबार, गेमिंग कंसोल और मीडिया डिवाइस में HDMI पोर्ट मौजूद होता है. ये पोर्ट आसानी से उपलब्ध हो जाता है इसलिए भी इसका इस्तेमाल काफी तेजी से बढ़ा है.
USB-C
आज कल USB-C भी काफी चर्चित डिवाइस माना जाता है. नए जनरेशन वाले लैपटॉप और मॉनिटर में USB-C तेजी से फेमश हो रहा है. बता दें कि इस पोर्ट की सबसे बड़ी खास बात ये है कि इसे डिस्प्ले पोर्ट के Alternate Mode के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है.
इसका मतलब है कि एक ही USB-C केबल से वीडियो सिग्नल भेजने के साथ-साथ डेटा ट्रांसफर और कई मामलों में लैपटॉप चार्ज भी किया जा सकता है. हालांकि, सभी USB-C पोर्ट या केबल इस फीचर को सपोर्ट नहीं करते इसलिए खरीदने से पहले डिवाइस की जानकारी जरूर जांच लें.
DisplayPort
अगर आपका कंप्यूटर डेडिकेटेड ग्राफिक्स कार्ड (GPU) के साथ आता है और आप हाई-एंड गेमिंग करते हैं तो DisplayPort आपके लिए एक शानदार ऑप्शन साबित हो सकता है. इसकी सबसे बड़ी खास बात ये है कि इसमें यूजर्स को कई सारे रिफ्रेश रेट देखने को मिल जाते हैं जो आपके गेमिंग एक्सपीरिएंस को बेहतर बनाने का काम करते हैं. इस पोर्ट की एक और खास बात है कि इसमें यूजर्स को स्क्रीन फटने या फिर लैग करने जैसी समस्या देखने को नहीं मिलती है. इसके अलावा DisplayPort हाई बैंडविड्थ भी देता करता है जिससे हाई रेजोल्यूशन और ज्यादा रिफ्रेश रेट पर बेहतर प्रदर्शन मिलता है.
किसे खरीदने में है फायदा?
अब आपको बताते हैं कि आपके लिए कौन सा पोर्ट सही रहेगा. दरअसल, ये आपकी जरूरत और मॉनिटर पर भी निर्भर करता है. अगर आपके पास PC गेमिंग, हाई रिफ्रेश रेट और मल्टी-मॉनिटर सेटअप है तो DisplayPort सबसे बेहतर विकल्प रहेगा.
वहीं, अगर आप टीवी, होम थिएटर, गेमिंग कंसोल या OTT कंटेंट का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं तो HDMI खरीदने आपके लिए सही रहेगा. वहीं, अगर आपके पास एडवांस लैपटॉप और USB-C सपोर्ट वाला मॉनिटर है तो USB-C ही सबसे सुविधाजनक ऑप्शन आपके लिए साबित हो सकता है क्योंकि ये एक ही केबल से वीडियो, डेटा और कई बार चार्जिंग की सुविधा भी देता है.
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        <pubDate>Sun, 12 Jul 2026 10:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>मिनटों में बदल सकते हैं अपना पुराना Email Address! 99% लोग आज भी नहीं जानते Gmail की ये ट्रिक</title>
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