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    <title>Attention India Hindi &amp; : हेल्थ&amp;फिटनेस</title>
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    <description>Attention India Hindi &amp; : हेल्थ&amp;फिटनेस</description>
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    <dc:rights>Copyright 2024 Attention India&amp; All Rights Reserved.</dc:rights>
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        <title>आपकी मुस्कान बता सकती है ओरल हेल्थ का हाल, इसे कैसे ठीक करें?</title>
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        <description><![CDATA[ सुबह उठकर ब्रश करना हमारी रोज की आदत है, लेकिन क्या हम अपने दांतों और मसूड़ों की सेहत पर उतना ही ध्यान देते हैं? अक्सर दांतों की सफाई को सिर्फ अच्छी स्माइल से जोड़कर देखा जाता है. जबकि ओरल हेल्थ का असर हमारे पूरे जीवन पर पड़ता है. दांतों में दर्द, बदबू या मसूड़ों की परेशानी की वजह से कई लोग लोगों के सामने खुलकर हंसने और बात करने से भी कतराते हैं. इसलिए दांतों की देखभाल सिर्फ दिखावे के लिए नहीं, बल्कि अच्छी सेहत और आत्मविश्वास के लिए भी जरूरी है.
दांतों को लेकर झिझक बदल सकती है आपकी सोशल लाइफ
कई लोगों को अपने दांतों का रंग, आकार या उनकी बनावट पसंद नहीं आती. इसका असर उनकी रोजमर्रा की बातचीत पर भी दिखाई देता है. कुछ लोग फोटो में कम मुस्कुराते हैं तो कुछ हंसते समय अपने मुंह पर हाथ रख लेते हैं. ऐसी छोटी-छोटी झिझक धीरे-धीरे कॉन्फिडेंस को प्रभावित करती है. दांतों से जुड़ी परेशानी होने पर डेंटिस्ट से सलाह लेकर उसकी वजह और सही इलाज का पता लगाया जाता है. जरूरत के अनुसार, दांतों की सफाई, अलाइनमेंट या दूसरे ट्रीटमेंट किए जाते हैं. लेकिन अच्छी स्माइल का मतलब बिल्कुल सफेद या फिल्मी सितारों जैसी स्माइल होना नहीं है. दांत साफ, मसूड़े स्वस्थ और मुस्कान नेचुरल हो, यही ज्यादा जरूरी है.
यह भी पढ़ें : शराब पीने के बाद उपद्रव क्यों करने लगते हैं लोग? जान लें वजह
मसूड़ों की परेशानी को हल्के में न लें
अगर ब्रश करते समय कभी-कभार मसूड़ों से खून आ जाए तो कई लोग इसे सामान्य समझकर छोड़ देते हैं. लेकिन अगर ऐसा बार-बार होता है, तो डेंटिस्ट से जांच करवाना जरूरी है. इसी तरह लंबे समय तक मुंह से बदबू आना, मसूड़ों में सूजन, दांतों में दर्द या ठंडा-गरम लगना भी ओरल हेल्थ से जुड़ी परेशानी का संकेत हो सकता है. मुंह की सेहत का संबंध शरीर की बाकी सेहत से भी देखा गया है. इसलिए दांतों की समस्या को केवल कॉस्मेटिक परेशानी समझना सही नहीं है. समय पर जांच और इलाज से कई समस्याओं को आगे बढ़ने से रोका जाता है.
रोज की आदतों से भी सुधरती है स्माइल
हेल्दी दांतों के लिए सबसे जरूरी चीज महंगा ट्रीटमेंट नहीं, बल्कि रोज की सही आदतें हैं. दिन में दो बार फ्लोराइड वाले टूथपेस्ट से ब्रश करें और दांतों के बीच जमा गंदगी की सफाई भी करें. बहुत ज्यादा मीठा खाने और दिनभर मीठे ड्रिंक्स पीने की आदत दांतों को नुकसान पहुंचाती है. खाने के बाद पानी पीना और समय-समय पर डेंटल चेकअप करवाना भी फायदेमंद रहता है. आज डेंटिस्ट दांतों की जांच और ट्रीटमेंट की प्लानिंग के लिए डिजिटल स्कैन जैसी नई तकनीकों का इस्तेमाल करते हैं. इससे इलाज को ज्यादा सही तरीके से प्लान किया जाता है. लेकिन आखिर में सबसे जरूरी बात यही है कि आपकी स्माइल सिर्फ देखने में अच्छी नहीं, बल्कि अंदर से भी हेल्दी हो. जब दांत और मसूड़े स्वस्थ होते हैं, तो मुस्कुराने में झिझक भी कम होती है.
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        <pubDate>Sun, 13 Sep 2026 13:30:04 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>मिर्गी के लंबे दौरे में क्लोबाजाम भी असरदार, AIIMS की स्टडी में खुलासा</title>
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        <description><![CDATA[ मिर्गी के मरीजों के लिए नई स्टडी उम्मीद जगाने वाली है. AIIMS नई दिल्ली और जीबी पंत इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं ने पाया है कि मुंह में घुलने वाली क्लोबाजाम (Clobazam) लंबे समय तक चलने वाले मिर्गी के दौरे को रोकने में नाक से दी जाने वाली मिडाजोलम (Midazolam) जितनी असरदार हो सकती है.
स्टडी में दोनों दवाओं ने लंबे focal seizures को करीब एक मिनट में रोकने में असर दिखाया. शोधकर्ताओं ने इसके लिए मरीजों के दौरे के लक्षणों के साथ EEG में दिमाग की इलेक्ट्रिकल एक्टिविटी को भी देखा.
क्यों जरूरी है यह रिसर्च?
मिर्गी का दौरा अक्सर कुछ समय बाद अपने आप रुक सकता है, लेकिन अगर दौरा लगातार जारी रहे और लंबा हो जाए तो स्थिति गंभीर हो सकती है. ऐसे मामलों में डॉक्टर रेस्क्यू मेडिसिन का इस्तेमाल कर सकते हैं. इस रिसर्च में दो मिनट से ज्यादा चलने वाले focal seizures पर ध्यान दिया गया. रिसर्चर्स का मकसद यह पता लगाना था कि ऐसे लंबे दौरे को रोकने में मुंह में घुलने वाली क्लोबाजाम और नाक से दी जाने वाली मिडाजोलम में कितना अंतर है.
95 मरीजों पर हुई स्टडी
यह रिसर्च AIIMS दिल्ली की Epilepsy Monitoring Unit में की गई. इसमें ऐसे मरीजों को शामिल किया गया, जिन्हें ड्रग रेसिस्टेंट मिर्गी थी. इस दौरान कुल 165 मरीजों की जांच की गई, जिनमें 95 मरीज स्टडी में शामिल किए गए.
दो समूह में बांटे गए मरीज

47 मरीजों को नाक से मिडाजोलम दी गई.
48 मरीजों को मुंह में घुलने वाली क्लोबाजाम दी गई.

स्टडी के दौरान कुल 570 दौरे रिकॉर्ड किए गए. इनमें 52 ऐसे दौरे थे, जो दो मिनट से ज्यादा चले और जिनमें रेस्क्यू मेडिसिन की जरूरत पड़ी.
करीब एक मिनट में रुका लंबा दौरा
स्टडी का सबसे अहम नतीजा यह रहा कि दोनों दवाओं ने लंबे focal seizures को करीब एक मिनट में रोकने में असर दिखाया. रिसर्चर्स ने सिर्फ मरीज के शरीर में दिखाई देने वाले दौरे के लक्षणों को ही नहीं देखा, बल्कि EEG के जरिए दिमाग की इलेक्ट्रिकल एक्टिविटी की भी निगरानी की. आसान भाषा में कहें तो इस स्टडी के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि मिडाजोलम या क्लोबाजाम में से कोई एक दवा दूसरी से स्पष्ट रूप से बेहतर है.
नाक में मिडाजोलम देने में क्या दिक्कत?
स्टडी में इस्तेमाल की गई मिडाजोलम नाक के जरिए दी गई. डॉ. मंजरी त्रिपाठी के मुताबिक, बच्चों में इसे कई पफ में देना पड़ सकता है, जबकि बड़ों में भी कई पफ की जरूरत पड़ती है. इस दौरान दवा के लीक होने की आशंका रहती है. उन्होंने बताया कि नाक से दी जाने वाली दवा हर जगह आसानी से उपलब्ध नहीं होती और इसकी कीमत भी एक चुनौती हो सकती है.
मुंह में घुलने वाली क्लोबाजाम अलग कैसे?
क्लोबाजाम के जिस फॉर्म को इस रिसर्च में देखा गया, उसे सामान्य गोली की तरह निगलने की जरूरत नहीं पड़ती. यह मुंह में घुल जाती है, जिससे ऐसे मरीजों में इसे देना आसान हो सकता है, जिन्हें दौरे के दौरान निगलने में परेशानी हो. डॉ. मंजरी त्रिपाठी के मुताबिक, अगर मरीज को दौरा आने से पहले चेतावनी के लक्षण महसूस हो जाएं तो डॉक्टर की सलाह के अनुसार ऐसी रेस्क्यू दवा का इस्तेमाल दौरे को लंबा होने से रोकने के लिए किया जा सकता है. हालांकि, रेस्क्यू मेडिसिन का इस्तेमाल डॉक्टर की सलाह और निर्धारित डोज के अनुसार ही किया जाना चाहिए.
दोनों दवाएं असरदार, लेकिन किसे चुनें?
इस रिसर्च का संदेश यह नहीं है कि अब मिडाजोलम की जगह हर मरीज को क्लोबाजाम दी जाएगी. स्टडी में दोनों दवाओं की तुलना की गई और दोनों ने लंबे दौरे रोकने में समान प्रभाव दिखाया. रिसर्चर्स के मुताबिक, क्लोबाजाम को मिडाजोलम के एक संभावित विकल्प के तौर पर देखने की दिशा में यह अध्ययन महत्वपूर्ण है. खासकर ऐसे मामलों में जहां नाक से दी जाने वाली दवा उपलब्ध न हो या उसके इस्तेमाल में व्यावहारिक दिक्कत हो.
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        <pubDate>Sun, 13 Sep 2026 01:30:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>शराब पीने के बाद उपद्रव क्यों करने लगते हैं लोग? जान लें वजह</title>
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        <description><![CDATA[ महाराष्ट्र के पुणे जिले में प्रशासन ने गणेशोत्सव के पावन त्योहार के मौके पर पूरे 12 दिनों के लिए शराब की बिक्री पर रोक लगाने का आदेश जारी किया था. हालांकि, बॉम्बे हाई कोर्ट ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए बहुत ही दिलचस्प टिप्पणी की. चीफ जस्टिस महेश चंद्र त्रिपाठी की पीठ ने साफ कहा कि अगर त्योहार के दौरान कोई शराब पीकर उत्साह दिखाता है, तो आप यह नहीं कह सकते कि वह सड़कों पर उपद्रव या कानून-व्यवस्था की स्थिति पैदा करेगा.&amp;nbsp;
इसके साथ ही कोर्ट ने कहा कि इतने लंबे समय तक शराब पूरी तरह बंद करने से नियमित पीने वालों की तबीयत बिगड़ सकती है और अस्पताल भर जाएंगे. कोर्ट की फटकार के बाद प्रशासन को झुकना पड़ा और यह प्रतिबंध सिर्फ दो मुख्य दिनों तक सीमित कर दिया गया. हाई कोर्ट की इस टिप्पणी ने एक पुरानी बहस को दोबारा जिंदा कर दिया है. आखिर ऐसा क्यों होता है कि कुछ लोग शराब पीने के बाद बिल्कुल शांत रहते हैं, जबकि कुछ लोग भारी हंगामा और उपद्रव करने लगते हैं? इसके पीछे का वैज्ञानिक कारण और हमारे शरीर में निकलने वाले हार्मोन बहुत मायने रखते हैं.
दिमाग का कंट्रोल रूम कमजोर पड़ जाता है
हमारे दिमाग का एक हिस्सा होता है, जिसे प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स कहा जाता है. यही हिस्सा हमें सही-गलत का फैसला लेने, गुस्से को काबू करने और सोच-समझकर बोलने में मदद करता है. शराब सीधे इसी हिस्से पर असर डालती है और इसे सुस्त कर देती है. नतीजा यह होता है कि इंसान का आत्म-नियंत्रण कमजोर पड़ जाता है. जो बात नशे में न होने पर वह मन में ही दबा लेता, शराब पीने के बाद वही बात वह खुलकर बोलने या करने लगता है. यही वजह है कि शराब पीने के बाद लोग बिना सोचे-समझे झगड़ा, बहस या मारपीट तक कर बैठते हैं.
कौन से हार्मोन बढ़ा देते हैं गुस्सा?
शराब पीने के बाद शरीर में टेस्टोस्टेरोन नाम के हार्मोन का स्तर बढ़ जाता है, जो आक्रामकता और गुस्से से जुड़ा माना जाता है. इसके साथ ही तनाव बढ़ाने वाला हार्मोन कॉर्टिसोल भी सक्रिय हो जाता है, जिससे इंसान चिड़चिड़ा और बेचैन महसूस करने लगता है. वहीं दिमाग को शांत रखने वाला हार्मोन सेरोटोनिन शराब के असर से कम हो जाता है.&amp;nbsp;
सेरोटोनिन की कमी की वजह से मूड बिगड़ने लगता है और छोटी-छोटी बातों पर भी गुस्सा आने लगता है. यानी एक तरफ शरीर में आक्रामकता बढ़ाने वाले हार्मोन ज्यादा सक्रिय हो जाते हैं, तो दूसरी तरफ शांत रखने वाला हार्मोन कमजोर पड़ जाता है, और यही मेल इंसान को उपद्रवी बना देता है.
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हर किसी पर असर एक जैसा क्यों नहीं होता?
यह जरूरी नहीं कि शराब पीने वाला हर इंसान हिंसक या उपद्रवी हो जाए. इसका असर व्यक्ति के स्वभाव, शराब की मात्रा, माहौल और पहले से मन में मौजूद तनाव पर भी निर्भर करता है. जो इंसान वैसे भी गुस्सैल स्वभाव का होता है या पहले से किसी बात को लेकर परेशान होता है, उसमें शराब का असर ज्यादा आक्रामक रूप में सामने आता है.&amp;nbsp;
वहीं भीड़ और शोर-शराबे वाले माहौल में भी लोग एक-दूसरे को देखकर जल्दी उत्तेजित हो जाते हैं, जिससे छोटी बहस भी बड़ी झड़प में बदल सकती है. यही वजह है कि त्योहारों और बड़े आयोजनों के दौरान प्रशासन भीड़भाड़ वाले इलाकों में शराब बिक्री पर खास नजर रखता है, ताकि जश्न किसी हंगामे में न बदल जाए.
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        <pubDate>Sun, 13 Sep 2026 01:30:03 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>खाली होने पर गुड़गुड़ाता क्यों है पेट, क्या है इसकी वजह?</title>
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        <description><![CDATA[ पेट में गुड़गुड़ होना आम बात है. खासकर भूख लगने पर पेट में गुड़गुड़ होना एक आम समस्या है. हालांकि, पेट में गुड़गुड़ होने की अन्य वजह भी होती हैं, जैसे हमारे शरीर की पाचन क्रिया और आंतों का सिकुड़ना. कई बार यह आवाज इतनी तेज होती है कि आसपास बैठे लोगों को भी सुनाई देने लगती है. इसके पीछे पाचन तंत्र की सामान्य गतिविधियां जिम्मेदार होती हैं. ऐसे में आइए जानते हैं पेट में गुड़गुड़ होने की वजह और इसके समाधान.
पेट में गुड़गुड़ होने की वजह?
हमारे पाचन तंत्र में पेट और आंतें लगातार काम करती रहती हैं. जब भोजन पेट में मौजूद होता है, तब पाचन प्रक्रिया के दौरान मांसपेशियां भोजन और तरल पदार्थ को आगे बढ़ाती हैं. इस प्रक्रिया को पेरिस्टालसिस कहा जाता है. पेट खाली रहने पर भी पाचन तंत्र पूरी तरह शांत नहीं होता. पेट और छोटी आंत की मांसपेशियां समय-समय पर सिकुड़ती रहती हैं. इस दौरान गैस और तरल पदार्थ आंतों के भीतर आगे बढ़ते हैं. इन्हीं की हलचल से गुड़गुड़ जैसी आवाज पैदा होती है.
खाली पेट में आती है ज्यादा आवाज
खाली पेट होने पर आवाज ज्यादा साफ सुनाई देती है, क्योंकि पेट में भोजन की मात्रा कम होने के कारण आवाज को दबाने वाला पदार्थ मौजूद नहीं होता. इसलिए कई बार पेट की सामान्य गतिविधियां भी ज्यादा तेज महसूस या सुनाई देती हैं. भूख लगने पर शरीर में कुछ हार्मोनल बदलाव होते हैं, जो पाचन तंत्र की गतिविधि को प्रभावित करते हैं. इस वजह से कुछ लोगों को खाली पेट में अधिक हलचल महसूस होती है.
गैस भी हो सकती है वजह
पेट की गुड़गुड़ाहट का एक कारण गैस भी होती है. खाते या पीते समय हवा निगलना या जल्दी-जल्दी खाने से पेट में गैस बनती है. वहीं कुछ खाद्य पदार्थ भी पेट और आंतों में हवा की मात्रा बढ़ा देते हैं. जब यह गैस आंतों में घूमती है तो आवाज सुनाई देती है. इसके अलावा कब्ज, अपच या अचानक खान-पान में बदलाव के दौरान भी आंतों की गतिविधि बदल जाती है, जिसकी वजह से पेट में गुड़गुड़ होने लगती है.
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कब है चिंता की बात
सिर्फ पेट से आवाज आना आमतौर पर चिंता की बात नहीं होती लेकिन अगर गुड़गुड़ लगातार बनी रहती है और इसके साथ तेज पेट दर्द, लगातार उल्टी-दस्त जैसे लक्षण दिखाई दें, तो यह किसी बीमारी के संकेत हो सकते हैं. खासकर अगर पेट की आवाज के साथ दर्द बहुत ज्यादा हो या मल त्याग में परेशानी हो रही हो, तो इसे केवल भूख समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. ऐसा स्थिती में डॉक्टर की सलाह लेना चाहिए.
किन बातों का रखें ध्यान
खाने को हमेशा धीरे-धीरे और अच्छी तरह चबाकर खाना सही होता है. वहीं शरीर में पर्याप्त पानी होना भी जरूरी है. ऐसे में नियमित रूप से पानी पीते रहें. लंबे समय तक भूखे न रहे और संतुलित आहार खाएं. एक्टिव लाइफस्टाइल अपनाएं यह आपके शरीर को रोग मुक्त रखता है. किसी भी गंभीर समस्या या लक्षण के दिखने पर खुद से दवाई लेने के बजाय डॉक्टर की सलाह लेना बेहतर होता है.
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        <pubDate>Fri, 11 Sep 2026 19:30:04 +0530</pubDate>
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        <title>क्या होती है पैसिव स्मोकिंग? सिगरेट न पीने वालों को भी जान का खतरा</title>
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        <description><![CDATA[ The Lancet के हालिया पब्लिश हुए एक अध्ययन में पता चला है कि सेंकडहैंड स्मोकिंग की वजह से हर साल लाखों लोगों की मौत होती है. यह बच्चों, महिलाओं और दिल के मरिजों के लिए सबसे बड़ा खतरा है. रिपोर्ट के मुताबिक भारत में पैसिव स्मोकिंग एक गंभीर समस्या बनकर उभर रहा है. वहीं भारत में साल 2023 में 3 लाख से अधिक लोगों की मौत की वजह सेंकडहैंड स्मोकिंग थी. यदि साल 1990 की तुलना में देखा जाए, तो इस आकड़े में 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है. चीन के बाद भारत इस समस्या में दूसरे नंबर पर आता है. ऐसे में पैसिव स्मोकिंग के बढ़ते खतरे के बीच आइए जानते है कि यह क्या होती है और कैसे यह लोगों के स्वास्थ पर असर डालता है.
क्या होती है पैसिव स्मोकिंग?
धूम्रपान सेहत के लिए हानिकारक होता है, लेकिन धूम्रपान न करने वालों की सेहत पर भी इसका असर पड़ता है. धूम्रपान करने वाले खुद की जान को तो खतरे में डालते ही हैं साथ ही आस-पास वालों को इसके धुएं से प्रभावित करते हैं. पैसिव स्मोकिंग का मतलब होता है कि कोई व्यक्ति खुद धूम्रपान नहीं करता लेकिन आस-पास धूम्रपान करने वाले के छोड़े हुए धुंए को सांस के साथ अंदर लेता है, इसे सेंकडहैंड स्मोकिंग भी कहा जात है. जब कोई व्यक्ति स्मोकिंग करता है, तो वह हवा में दो प्रकार के धुएं को छोड़ता है. पहला सिगरेट से निकलने वाला धुआं और दूसरा स्मोकिंग के वक्त मुंह से छोड़ा जाने वाला धुआं.
किसे है खतरा?
रिपोर्ट बताती है कि साल 2023 में दुनियाभर में 80 लाख से ज्यादा लोगों की मौत केवल धूम्रपान और तंबाकू से जुड़ी समस्याओं की वजह से हुई. इनमें कई लोग तो ऐसे थे जिन्होनें कभी सिगरेट को हाथ भी नहीं लगाया. यानि कि लाखों मासूम लोग केवल पैसिव स्मोकिंग के शिकार हो जाने की वजह से अपनी जान खो बैठें. अध्ययन के मुताबिक इसका सबसे बड़ा खतरा बच्चों, महिलाओं और दिल के मरिजों को हैं. यह जहरीला धुआं सांस के साथ आपके शरीर में पहुंचता है और आपके शरीर को नुकसान पहुंचाता है.
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पैसिव स्मोकिंग से होने वाली बीमारियां
अगर आपके आस-पास कोई स्मोकिंग कर रहा है, तो कुछ समय के लिए आपको सांस लेने में परेशानी हो सकती है. वहीं कुछ लोगों को आंखों में जलन होने जैसी समस्या भी होती है. अगर प किसी स्मोकिंग करने वाले व्यक्ति के संपर्क में लगातार रहते हैं, तो इससे आपको सांस की गंभीर बीमारियां और संक्रमण होने का खतरा रहता है. पैसिव स्मोकिंग से होने वाली मौतों में सबसे ज्यादा हार्ट स्ट्रोक और फेफड़े के कैंसर वाले मामले सामने आए हैं.
घर को बनाएं स्मोक-फ्री जोन
पैसिव स्मोकिंग से बचने के लिए आप अपने घर को स्मोक-फ्री जोन बनाएं. वहीं पब्लिक प्लेसेस जैसे मॉल, ऑफिस और अन्य स्थान पर स्मोक करने वाले व्यक्ति से दूर रहें. अपने करीबियों को स्मोकिंग से जुड़ी स्वास्थ समस्याओं के प्रति जागरूक करें. अपने बच्चों का विशेष कर ध्यान रखें. एक्टिव लाइफस्टाइल अपनाएं और संतूलित भोजन के साथ शारीरिक गतिविधियों पर ध्यान दें.
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        <pubDate>Wed, 09 Sep 2026 23:30:04 +0530</pubDate>
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        <title>रात को बीच में अचानक खुल रही नींद? इस बीमारी का है संकेत</title>
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        <description><![CDATA[ रात में नींद खुलना एक सामान्य समस्या है. रात में अक्सर कई लोगों की नींद खुलती है. हालांकि रात में बार-बार नींद खुलना, उठने के बाद नींद न आना और चिड़चिड़ापन होना किसी गंभीर बीमारी के लक्षण हो सकते हैं. ऐसे में इन्हें नजरअंदाज करने से अनिद्रा और स्लीप एपनिया जैसी बीमारी हो सकती है. सही समय पर पहचान करने से आप घर पर ही अपनी दैनिक जीवन की आदतों में बदलाव कर के इसका उपचार कर सकते हैं. ऐसे में आइए जानते हैं रात में नींद खुलने की वजह और समाधान.
रात में नींद खुलने की वजह
रात में अक्सर नींद खुलने की सबसे प्रमुख वजह तनाव और चिंता होती है. व्यक्ति तनाव की वजह से रात में सो नहीं पाता और नींद आने पर बार-बार टेंशन की वजह से उठ जाता है. वहीं कभी-कभी व्यक्ति गलत तकिया व जगह की वजह से भी सोने में असहज महसूस करता है. वहीं कुछ परिस्थितियों में रात में नींद अनिद्रा और स्लीप एपनिया की वजह से भी खुलती है.
क्या है अनिद्रा?
रात में बार-बार नींद खुलना, नींद खुलने के बाद नींद न आना, सुबह होने से पहले ही नींद खुल जाना या रात भर नींद ही न आना अनिद्रा की वजह से होता है. जिसकी वजह से व्यक्ति दिनभर थकान और चिड़चिड़ापन महसूस करता है.
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स्लीप एपनिया क्या है?
स्लीप एपनिया में व्यक्ति की सोते हुए सांस रूक जाना, खर्राटें लेना और घुटन होने जैसी समस्याएं होती है. कभी-कभी तो व्यक्ति को इस बारे में पता नहीं चलता. परिवार के लोग इस समस्या को पहचानते है. स्लीप एपनिया की वजह से व्यक्ति रात में अचानक उठ जाता है, या सांस रूकने की वजह से घबराहट के कारण नींद में परेशान होता है.
कैसे पाएं अच्छी नींद?
रात में अच्छी नींद लेने के लिए सबसे जरूरी है एक्टिव लाइफस्टाइल. दिनभर की दिनचर्या सही होने से व्यक्ति को रात में आसानी से नींद आ जाती है. सोने से पहले किसी भी गैजेट जैसे मोबाइल या लेपटॉप का उपयोग न करें, यह आपकी नींद को प्रभावित कर देता है. आप सोने से पहले किताब पढ़ सकते हैं, स्लो गाने सुन सकते हैं और अपने पसंद का कोई भी काम कर सकते हैं. वहीं सोने के लिए आपकी जगह भी सही होना जरूरी है. गलत तकिये व गद्दे की वजह से आपके शरीर को सोने में परेशानी हो सकती है. ऐसे में आरामदायक गद्दा और तकिये का चुनाव करना नींद के लिए बेहतर होता है.
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        <pubDate>Wed, 09 Sep 2026 23:30:03 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>गट हेल्थ ठीक करनी है? नाश्ते में खाएं ये 5 चीजें</title>
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        <description><![CDATA[ आजकल लोग ज्यादातर जंक फूड ही खाते हैं और रोजाना हम जो खाना खाते है उसका असर हमारे पाचन पर पड़ता है. जिसे गट हेल्थ भी कहते है. हमारी आतों में कई तरह के बैक्टीरिया मौजूद होते है, जो पाचन को सही रखने में मदद करते हैं .जब गट हेल्थ ठीक रहती है तो खाना पचाने में आसानी होती है. और पेट से जुडी कुछ समस्याएं जैसे गैस और पेट फूलना भी गट हेल्थ &amp;nbsp;अच्छी के होने के कारण ठीक हो सकती है. इसलिए रोज डाइट में ऐसी चीजें शामिल करना जरूरी है. जो आंतो यानी गट हेल्थ के लिए अच्छी हो. सुबह के नाश्ते में पोष्टिक खाना खाने से पेट को अच्छा सपोर्ट मिल सकता है. आइए जानते हैं ऐसी 5 चीजों के बारे में जो आप नाश्ते में शामिल कर सकते हैं.
दही को नाश्ते में करें शामिल
दही गट हेल्थ के लिए एक अच्छा विकल्प है. इसमें प्रोबायोटिक्स पाए जाते हैं, जो आंतों में मौजूद अच्छे बैक्टीरिया को सपोर्ट करने में मदद करते हैं. सुबह के नाश्ते में एक कटोरी दही किसी भी लिया जा सकता है आप इसे पोहा, पराठे या दूसरे नाश्ते के साथ भी खा सकते हैं. अगर दही आपको आसानी से पचता है तो इसे &amp;nbsp;आप इसे अपनी रोज की डाइट में भी शामिल कर सकते हैं.
ओट्स से करें दिन की शुरुआत
ओट्स में फाइबर &amp;nbsp;बहुत ही अच्छी मात्रा में पाया जाता है, जो पाचन तंत्र के लिए जरूरी है. सुबह नाश्ते में ओट्स खाने से गट हेल्थ पर भी अच्छा असर पड़ता है और डाइट में फाइबर बढ़ाने का आसान तरीका भी &amp;nbsp;मिल जाता है. इसे दूध या दही के साथ बनाकर इसमें केला, सेब या कुछ ड्राईफ्रूट्स भी मिला सकते हैं. इससे &amp;nbsp;आपका नाश्ता स्वादिष्ट होने के साथ ज्यादा पोष्टिक भी हो जाता है.
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दलिया है हेल्दी नाश्ते का विकल्प
दलिया भी गट हेल्थ के लिए अच्छा नाश्ता होता है. इसमें फाइबर पाया जाता है, जो पाचन को बेहतर रखने में मदद करता है. आप सुबह दूध वाला दलिया या फिर सब्जियों के साथ नमकीन दलिया बना सकते हैं. तो नाश्ते के लिए एक अच्छा आप्शन होगा. इसमें गाजर, मटर, बीन्स जैसी सब्जियां डालने से इसका पोषण और बढ़ जाता है. रोज की डाइट में फाइबर वाली चीजें शामिल करना पेट के लिए अच्छा होता है.
अंकुरित मूंग है अच्छा विकल्प
अंकुरित मूंग में फाइबर और प्रोटीन दोनों पाए जाते हैं, इसलिए यह एक पौष्टिक नाश्ता होता है. इसे सुबह सलाद की तरह खाया जा सकता है. इसमें खीरा, टमाटर, नींबू और थोड़े मसाले डालकर आप इसका स्वाद बढ़ा सकते हैं. फाइबर वाली चीजों को डाइट में शामिल करने से पाचन तंत्र को सही तरीके से काम करने में मदद मिलती है और गट हेल्थ भी अच्छी रहती है.
&amp;nbsp;केला भी डाइट में करें शामिल
केला आसानी से मिलने वाला फल है और इसमें फाइबर भी पाया जाता है. सुबह नाश्ते में केला खाने से कुछ समय तक पेट भरा हुआ महसूस होता है. इसे आप सीधे खा सकते हैं या फिर ओट्स और दही के साथ मिलाकर खा सकते हैं. अगर आप सुबह जल्दी में रहते हैं और कुछ आसान खाना चाहते हैं तो केला एक अच्छा आप्शन हो सकता है.
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        <pubDate>Tue, 08 Sep 2026 19:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>घर बैठे ऐसे करें अपने फेफड़ों को डिटॉक्स, रोज पिएं ये ड्रिंक</title>
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        <description><![CDATA[ आज के जीवन में धूल, धुआं, प्रदूषण और सिगरेट का धुआं काफी आम बात है. और इनके कारण शरीर के और अंगो के साथ फेफड़ों की सेहत पर भी असर पड़ता है. ऐसे में कई लोग फेफड़ों को डिटॉक्स करने के लिए अलग-अलग तरह की ड्रिंक पीने लगते हैं. हालांकि, शरीर में फेफड़ों को साफ करने का काम किसी एक ड्रिंक से नहीं होता.
यह मददगार तो होता है पर हमारे फेफड़े खुद एक प्राकृतिक सफाई प्रक्रिया के जरिए धूल और दूसरी चीजों को बाहर निकालते हैं. लेकिन पर्याप्त पानी पीना और पौष्टिक चीजों को डाइट में शामिल करना शरीर और सांस की सेहत के लिए अच्छा हो सकता है. अगर आप घर पर फेफड़ों को देतोक्स करने के लिए कोई आसान ड्रिंक लेना चाहते हैं तो कुछ ड्रिंक्स के विकल्प रोज की डाइट का हिस्सा बन सकते हैं.
गुनगुना पानी फेफड़ों को हाइड्रेट रखने में सहायक
गुनगुना पानी पीना शरीर को हाइड्रेट रखने के साथ फेफड़ों और सांस की नली में मौजूद चिपचिपे पदार्थ को पतला रखने में मदद करता है. इससे बलगम को बाहर निकालना आसान हो सकता है और सांस की नली साफ रखने में मदद मिलती है. रोज पर्याप्त मात्रा में पानी पीना फेफड़ों की प्राकृतिक सफाई प्रक्रिया को सपोर्ट करने वाली आसान आदत है.
अदरक की ड्रिंक
अदरक में मौजूद प्राकृतिक तत्व शरीर में सूजन कम करने में मदद करते हैं. अदरक को गुनगुने पानी में डालकर पीने से गले को आराम मिलता है और सांस से जुड़ी हल्की परेशानी में भी राहत मिल सकती है. और यह &amp;nbsp;अदरक वाली ड्रिंक फेफड़ों की सेहत को सपोर्ट करने वाली&amp;nbsp; आसान डाइट का हिस्सा बन&amp;nbsp; क्र फेफड़ो को डिटॉक्स करने में भी मदद क्र सकती है.
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नींबू पानी
नींबू में विटामिन C पाया जाता है, जो शरीर के इम्यून सिस्टम को सपोर्ट करता है. नींबू पानी शरीर में पानी की कमी पूरी करने का भी आसान तरीका है. अच्छी हाइड्रेशन शरीर की प्राकृतिक सफाई प्रक्रिया में मदद करती है, इसलिए नींबू पानी को फेफड़ों की सेहत के लिए फायदेमंद ड्रिंक में भी गिना जाता है.
भाप फेफड़ों से बलगम निकालने में सहायक
गर्म पानी की भाप सांस की नली में जमा बलगम को कमजोर करने में मदद करती है. &amp;nbsp;इससे बलगम बाहर निकालना आसान होता है और बंद नाक या गले की परेशानी में राहत मिलती है. फेफड़ों को स्वस्थ रखने के लिए भाप को एक आसान घरेलू उपाय मान कर अपनाया जा सकता है.
फेफड़ों के डिटॉक्स के लिए धुएं से रहें दूर
फेफड़ों की प्राकृतिक सफाई को बेहतर रखने के लिए सबसे जरूरी है कि उन्हें नुकसान पहुंचाने वाली चीजों से बचाया जाए. सिगरेट और तंबाकू के धुएं से दूरी रखें और ज्यादा प्रदूषण वाली जगहों पर मास्क का इस्तेमाल करें. इसके साथ रोज थोड़ी शारीरिक गतिविधि करें पर्याप्त पानी और पौष्टिक खाना फेफड़ों को लंबे समय तक स्वस्थ रखने में मदद करता है.
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        <pubDate>Mon, 07 Sep 2026 13:30:06 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>इंसान के शरीर में सूअर की किडनी, इससे कितने दिन बच सकती है जान?</title>
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        <description><![CDATA[ चिकित्सा विज्ञान के इतिहास में एक ऐसा अनोखा कारनामा हुआ है, जिसने दुनिया भर के डॉक्टरों और किडनी के मरीजों को एक नई उम्मीद दी है. अमेरिका में डॉक्टरों ने एक 66 वर्षीय मरीज टिम एंड्रयूज के शरीर में सूअर की किडनी का सफल ट्रांसप्लांट किया था. इस सूअर की किडनी ने मरीज के शरीर में रिकॉर्ड 271 दिनों तक सफलता के साथ काम किया.
चिकित्सा इतिहास में किसी जानवर के अंग का इंसान के शरीर में इतने लंबे समय तक काम करने का यह अब तक का सबसे बड़ा रिकॉर्ड है. इस पूरी प्रक्रिया और इसके नतीजों से जुड़ी रिपोर्ट मशहूर मेडिकल जर्नल द लैंसेट में प्रकाशित हुई है.
टिम एंड्रयूज को डायलिसिस से मिली 9 महीने की आजादी
मरीज टिम एंड्रयूज टाइप-2 डायबिटीज से पीड़ित थे, जिसके कारण उनकी दोनों किडनियां पूरी तरह खराब हो चुकी थीं. डॉक्टरों ने उन्हें बताया था कि उन्हें एक इंसानी किडनी मिलने में कम से कम 7 साल तक का लंबा इंतजार करना पड़ सकता है. आमतौर पर डायलिसिस पर रहने वाले मरीज इतना लंबा इंतजार नहीं कर पाते हैं.&amp;nbsp;
ऐसे मुश्किल समय में मैसाचुसेट्स जनरल हॉस्पिटल के डॉक्टरों ने उन्हें जेनोट्रांसप्लांटेशन यानी जानवर के अंग को इंसान में लगाने की सलाह दी. 25 जनवरी 2025 को डॉक्टरों ने टिम के शरीर में सूअर की किडनी ट्रांसप्लांट की. इस ट्रांसप्लांट के बाद टिम को कई महीनों तक अस्पताल जाकर डायलिसिस मशीन से खून साफ कराने की जरूरत नहीं पड़ी और उन्होंने एक सामान्य जीवन जिया.
क्या है जेनोट्रांसप्लांटेशन
जब किसी जानवर के अंग, कोशिका या टिश्यू को इंसान के शरीर में ट्रांसप्लांट किया जाता है, तो इस पूरी चिकित्सा प्रक्रिया को विज्ञान की भाषा में जेनोट्रांसप्लांटेशन कहा जाता है. डॉक्टरों का कहना है कि इंसानी अंगों की बनावट से मेल खाने के कारण सूअर को इस प्रक्रिया के लिए सबसे सही जानवर माना जाता है.
सूअर की किडनी ही क्यों ट्रांसप्लांट की जा सकती है?
जेनोट्रांसप्लांटेशन के लिए सूअर को सबसे बेहतर जानवर माना जाता है. क्योंकि उसके अंगों का आकार काफी हद तक सही है और उन्हें पालने का इंसानों के पास कई सालों का अनुभव भी है. लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि आप सीधे किसी फार्म पर जाएं, सूअर की किडनी निकालकर उसे किसी इंसान के शरीर में लगा दें. ऐसा करने पर इंसान का इम्यून सिस्टम तुरंत उस बाहरी अंग पर हमला कर उसे कुछ ही मिनटों में नष्ट कर देता है.
&amp;nbsp;
इसी समस्या से बचने के लिए वैज्ञानिकों ने विशेष रूप से युकाटन मिनिएचर पिग विकसित किए. डॉक्टरों ने इस सूअर की किडनी के जीन में 69 खास तरह के जेनेटिक बदलाव किए. इन बदलावों के जरिए सूअर की कोशिकाओं से उन चीजों को हटाया गया जिन पर इंसान का इम्यून सिस्टम हमला करता है.&amp;nbsp;
&amp;nbsp;
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किडनी को 271 दिनों के बाद क्यों निकालना पड़ा?
ट्रांसप्लांट के बाद शुरुआती महीनों में टिम का शरीर बिल्कुल स्वस्थ था. शुरुआत में जब इम्यून सिस्टम ने अंग को अस्वीकार करने की कोशिश की, तो डॉक्टरों ने दवाइयों में बदलाव करके स्थिति को संभाल लिया. लेकिन लगभग 6 महीने बीत जाने के बाद, सूअर की किडनी की रक्त वाहिकाएं धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त होने लगीं, जिससे अंग में सूजन आ गई. अक्टूबर 2025 में इस किडनी ने काम करना बंद कर दिया, जिसके बाद डॉक्टरों को सर्जरी करके इस किडनी को बाहर निकालना पड़ा.
सूअर के अंग ने किया &#039;ब्रिज&#039; का काम
मास जनरल ब्रिघम के सेंटर फॉर ट्रांसप्लांटेशन साइंसेज के डॉक्टर लियोनार्डो रिएला ने बताया कि सूअर की इस किडनी ने मरीज के लिए एक ब्रिज के रूप में काम किया. सूअर की किडनी निकालने के बाद टिम को सिर्फ 82 दिनों तक दोबारा डायलिसिस पर रहना पड़ा. इसके ठीक बाद जनवरी 2026 में उन्हें एक मृत डोनर से इंसानी किडनी मिल गई. डॉक्टरों के मुताबिक, टिम एंड्रयूज के शरीर में अब वह इंसानी किडनी अच्छी तरह काम कर रही है.
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        <pubDate>Sun, 06 Sep 2026 21:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>बाजार में मिली नकली रेबीज वैक्सीन की खेप! लोगों में मचा हड़कंप&amp; ऐसे हुआ खुलासा</title>
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        <description><![CDATA[ भारत में इस्तेमाल होने वाली रेबीज वैक्सीन Abhayrab के एक बैच को लेकर ड्रग रेगुलेटर ने राज्यों को सतर्क किया है. जांच में इस बैच का एक सैंपल जरूरी potency test में फेल पाया गया. इसके बाद इसे Not of Standard Quality यानी तय गुणवत्ता मानकों पर खरा नहीं उतरने वाला बताया गया है. साथ ही, इसके नकली होने की भी जांच की जा रही है.&amp;nbsp;
मामला Abhayrab के बैच नंबर KE25012 से जुड़ा है. अधिकारियों के मुताबिक, इस बैच के कुछ वाइल्स&amp;nbsp;दिल्ली के मुखर्जी नगर स्थित एक बिना लाइसेंस वाले परिसर से बरामद किए गए थे. इसके बाद इन सैंपल को जांच के लिए सरकारी प्रयोगशाला भेजा गया. केंद्रीय औषधि प्रयोगशाला, कसौली में किए गए परीक्षण में सैंपल potency की जरूरी शर्तों को पूरा नहीं कर पाया.
कंपनी ने कहा- ये वैक्सीन हमने नहीं बनाई
Abhayrab बनाने वाली कंपनी Indian Immunologicals Limited ने साफ किया है कि जांच में मिले वाइल्स&amp;nbsp;उसकी ओर से तैयार नहीं किए गए थे. कंपनी के मुताबिक, बरामद वायल पर Abhayrab का नाम और KE25012 बैच नंबर लिखा था, लेकिन जब इन्हें कंपनी के रिकॉर्ड और सुरक्षित रखे गए असली सैंपल से मिलाया गया तो कई अंतर सामने आए.
कंपनी ने बताया कि लेबल, पैकेजिंग, QR कोड, कैप के रंग, लाइसेंस से जुड़ी जानकारी और पैकेज पर लिखे विवरण में अंतर मिला हैं. कंपनी के अनुसार, जांच में कुल 17 अंतर सामने आए हैं. इसी वजह से इस बात की जांच की जा रही है कि बरामद वैक्सीन नकली तरीके से तैयार कर बाजार में तो नहीं पहुंचाई गई.
DCGI ने राज्यों को निगरानी के निर्देश दिए
मामले को देखते हुए Drugs Controller General of India ने राज्यों के ड्रग कंट्रोलर्स को Abhayrab के बैच KE25012 की बिक्री और वितरण पर कड़ी नजर रखने को कहा है. अधिकारियों को जरूरत के अनुसार कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं.
CDSCO के मुताबिक, इस मामले में दिल्ली पुलिस ने कार्रवाई करते हुए चार लोगों को गिरफ्तार किया है. जांच एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि ये वाइल्स&amp;nbsp;कहां से आए और इन्हें कहां-कहां पहुंचाया गया.
कंपनी के मुताबिक अधिकृत सप्लाई प्रभावित नहीं
Indian Immunologicals ने कहा है कि उसके अधिकृत चैनल से सप्लाई की गई Abhayrab वैक्सीन इस मामले से प्रभावित नहीं है. कंपनी के अनुसार हर बैच को बाजार में भेजे जाने से पहले सरकारी स्तर पर भी जांच से गुजरना होता है.
कंपनी ने यह भी कहा कि KE25012 के मूल बैच में 83,370 वायल थे, जिन्हें अधिकृत चैनलों के जरिए वितरित किया गया था. हालांकि, सरकार की ओर से अभी यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि जांच के दायरे में आए वाइल्स&amp;nbsp;की कुल संख्या कितनी थी और इनमें से कितने बाजार तक पहुंचे.
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दो साल में दूसरी बार सामने आया ऐसा मामला
Abhayrab को लेकर यह पहली बार नहीं है जब नकली वैक्सीन की चिंता सामने आई है. जनवरी 2025 में भी कंपनी ने ड्रग रेगुलेटर को एक दूसरे बैच KA24014 के नाम से नकली Abhayrab बाजार में आने की जानकारी दी थी. इसके बाद अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया समेत कुछ देशों के स्वास्थ्य अधिकारियों ने भारत से लौटने वाले यात्रियों को लेकर अलर्ट जारी किया था.
भारत में रेबीज के कारण हर साल हजारों लोगों की मौत होती है. 2024 के एक रिसर्च के मुताबिक देश में हर साल करीब 5,726 लोगों की मौत रेबीज से होती है. ऐसे में संक्रमित जानवर के काटने के बाद प्रभावी वैक्सीन की उपलब्धता बेहद जरूरी मानी जाती है. Abhayrab का इस्तेमाल रेबीज से बचाव के लिए एक्सपोजर से पहले और एक्सपोजर के बाद दोनों स्थितियों में किया जाता है.
यह भी पढ़ें: इंसान के शरीर में सूअर की किडनी, इससे कितने दिन बच सकती है जान? ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 06 Sep 2026 21:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>बाजार, में, मिली, नकली, रेबीज, वैक्सीन, की, खेप, लोगों, में, मचा, हड़कंप-, ऐसे, हुआ, खुलासा</media:keywords>
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        <title>Bathing After Eating: खाने के तुरंत बाद नहाना सही या गलत, जानें शरीर पर क्या असर पड़ता है?</title>
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        <description><![CDATA[ Bathing After Meal Effect On Digestion: खाना खाने के बाद आराम करने का मन करता है. कई लोगों के लिए दिनभर की थकान मिटाने के लिए खाना खाने के बाद गर्म पानी से नहाना भी एक अच्छा तरीका लगता है. लेकिन आपने अक्सर यह जरूर सुना होगा कि खाना खाने के तुरंत बाद नहाना नहीं चाहिए. कहा जाता है कि इससे पाचन पर असर पड़ सकता है, पेट में ऐंठन हो सकती है या अपच की परेशानी हो सकती है.
लेकिन क्या वाकई खाने के तुरंत बाद नहाना इतना नुकसानदायक है? इसका जवाब इतना सीधा नहीं है. अभी तक ऐसी कोई पक्की वैज्ञानिक रिसर्च नहीं है जो यह साबित करती हो कि खाना खाने के तुरंत बाद गर्म पानी से नहाना हर व्यक्ति के लिए नुकसानदायक होता है. फिर भी शरीर में खाने के बाद होने वाले बदलावों को समझना जरूरी है.
खाना खाने के बाद शरीर में क्या होता है?
हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली वेबसाइट Healthline के अनुसार,&amp;nbsp; जब आप खाना खाते हैं, तो शरीर उसे पचाने की प्रक्रिया शुरू कर देता है. इस दौरान पाचन तंत्र के अंगों तक ब्लड फ्लो बढ़ता है. इसी वजह से भरपेट खाना खाने के बाद शरीर में हल्की गर्माहट महसूस हो सकती है.

अब अगर इसी समय आप गर्म पानी से नहाते हैं, तो शरीर का तापमान भी थोड़ा बढ़ सकता है. गर्म पानी शरीर में एक प्रक्रिया को सक्रिय करता है, जिसे हाइपरथर्मिक एक्शन कहा जाता है. इससे शरीर का अंदरूनी तापमान कुछ बढ़ सकता है. यही वजह है कि खाना खाने के तुरंत बाद गर्म पानी से नहाने को लेकर यह संभावना जताई जाती है कि शरीर में ब्लड फ्लो और तापमान से जुड़े बदलाव पाचन के दौरान असहजता पैदा कर सकते हैं. हालांकि, इस बात के पक्ष या विपक्ष में निर्णायक वैज्ञानिक सबूत उपलब्ध नहीं हैं.
गर्म पानी से नहाने पर क्या परेशानी हो सकती है?
गर्म पानी से नहाने पर शरीर को आराम जरूर मिलता है, लेकिन इससे हार्ट रेट बढ़ सकता है. अगर आपने अभी-अभी काफी भारी खाना खाया है, तो भरे हुए पेट के साथ यह बदलाव कुछ लोगों को असहज लग सकता है. खासतौर पर बहुत ज्यादा फैट, प्रोटीन या फाइबर वाला खाना खाने के बाद पेट फूलना या भारीपन महसूस हो सकता है. अगर ऐसे समय में शरीर पर गर्म पानी का असर भी पड़ रहा हो, तो कुछ लोगों को पेट में ऐंठन, सीने में असहजता या हार्टबर्न जैसा महसूस हो सकता है. हालांकि, यह हर व्यक्ति के साथ होगा, ऐसा नहीं है. शरीर की प्रतिक्रिया इस बात पर भी निर्भर करती है कि आपने क्या और कितनी मात्रा में खाया है.

अगर नहाना ही हो तो कैसा पानी बेहतर?
अगर खाना खाने के तुरंत बाद नहाने की जरूरत है और आप किसी तरह की परेशानी से बचना चाहते हैं, तो बहुत गर्म पानी के बजाय गुनगुने या ठंडे पानी से नहाना एक विकल्प हो सकता है. ठंडा पानी शरीर का अंदरूनी तापमान बढ़ाने के बजाय उसे कम करने की दिशा में काम करता है. इसलिए गर्म पानी की तुलना में इससे शरीर पर गर्मी से जुड़ा अतिरिक्त प्रभाव कम हो सकता है. फिर भी इसका मतलब यह नहीं है कि खाना खाने के तुरंत बाद ठंडे पानी से नहाना जरूरी या सभी के लिए बेहतर है. मुख्य बात यह है कि अगर आपको खाने के बाद नहाने से असहजता महसूस होती है, तो थोड़ी देर इंतजार करना बेहतर विकल्प हो सकता है.
कितनी देर बाद नहाना चाहिए?
खाने के बाद नहाने के लिए कोई ऐसी तय समय सीमा वैज्ञानिक रूप से साबित नहीं हुई है जिसे हर व्यक्ति को मानना ही चाहिए. आम तौर पर 20 मिनट से एक घंटे तक इंतजार करने की सलाह दी जाती है, खासकर अगर खाना भारी रहा हो. अगर आपने हल्का खाना खाया है, तो परेशानी की संभावना अलग हो सकती है. वहीं बहुत ज्यादा या भारी भोजन के बाद थोड़ा ज्यादा इंतजार करना ज्यादा आरामदायक लग सकता है. यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि खाना खाने के कितनी देर बाद नहाना चाहिए. यह भी देखना जरूरी है कि आपने कितना और कैसा खाना खाया है और नहाते समय पानी कितना गर्म है.
खाने के तुरंत बाद और किन चीजों से बचें?
खाने के बाद सिर्फ नहाने को लेकर ही लोगों के मन में सवाल नहीं होते. कुछ दूसरी आदतों का भी पाचन से संबंध माना जाता है. मिसाल के तौर पर खाना खाने के तुरंत बाद दांतों को ब्रश करने से बचना बेहतर माना जाता है, खासकर अगर आपने बहुत एसिडिक खाना खाया है. ऐसे भोजन के बाद तुरंत ब्रश करने से दांतों के इनेमल पर असर पड़ सकता है. इसके लिए करीब 30 मिनट इंतजार करना बेहतर माना जाता है.
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वहीं खाना खाने के बाद तैरने को लेकर यह आम धारणा है कि तुरंत स्विमिंग नहीं करनी चाहिए, लेकिन इसके समर्थन में पर्याप्त सबूत नहीं हैं. इसी तरह खाना खाने के तुरंत बाद भारी एक्सरसाइज करने से भी पेट में असहजता हो सकती है. भारी भोजन के बाद वर्कआउट शुरू करने से पहले कुछ समय इंतजार करना बेहतर हो सकता है. खाने के तुरंत बाद बिस्तर पर लेटना भी कुछ लोगों में एसिड रिफ्लक्स की समस्या बढ़ा सकता है. इसलिए खाना खाने और सोने के बीच थोड़ा अंतर रखना फायदेमंद हो सकता है.
तो क्या खाना खाने के तुरंत बाद नहाना गलत है?
सीधे तौर पर इसे गलत कहना सही नहीं होगा. अभी तक उपलब्ध जानकारी यह साबित नहीं करती कि खाना खाने के तुरंत बाद गर्म पानी से नहाना निश्चित रूप से पाचन को रोक देता है या नुकसान पहुंचाता है. लेकिन अगर आपको खाना खाने के बाद पेट भारी रहने, ऐंठन, अपच या हार्टबर्न जैसी परेशानी होती है, तो तुरंत गर्म पानी से नहाने के बजाय थोड़ा इंतजार करना बेहतर हो सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 05 Sep 2026 04:30:06 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>मरीजों की बड़ी टेंशन खत्म, पर्चा बनवाने से इलाज तक मदद करेगा पेशेंट नेवीगेटर</title>
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        <description><![CDATA[ दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में मरीजों की सुविधा के लिए जल्द ही पेशेंट नेवीगेटर व्यवस्था शुरू होने जा रही है. इसका ट्रायल सबसे पहले दिल्ली के चुनिंदा सरकारी अस्पतालों में किया जाएगा. दरअसल, सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने आने वाले मरीजों को अक्सर पर्ची बनवाने से लेकर डॉक्टर तक पहुंचने, जांच कराने और फिर दवा लेने तक कई काउंटरों पर भटकना पड़ता है.&amp;nbsp;
इस दौरान मरीज और उनके परिजन थक जाते हैं और कई बार सही जानकारी न मिलने से परेशानी और बढ़ जाती है. अब इसी समस्या को दूर करने के लिए पेशेंट नेवीगेटर सिस्टम लाया जा रहा है, जिसका मकसद यही है कि मरीज को अस्पताल में कदम-कदम पर सही रास्ता और मदद मिल सके.
क्या है पेशेंट नेवीगेटर व्यवस्था
पेशेंट नेवीगेटर एक तरह की गाइड व्यवस्था है, जिसके तहत अस्पताल में मरीजों की मदद के लिए प्रशिक्षित स्टाफ या वॉलंटियर तैनात किए जाएंगे. ये नेवीगेटर मरीजों की मदद करेगें. पर्ची बनवाने से लेकर सही डॉक्टर तक पहुंचाने, जांच के लिए सही विभाग दिखाने और फिर दवा काउंटर तक ले जाने तक, हर स्टेप में मरीज को अकेले भटकना नहीं पड़ेगा. खासतौर पर बुजुर्ग, अकेले आए मरीज और गंभीर बीमारी से जूझ रहे लोगों के लिए यह व्यवस्था बड़ी राहत साबित हो सकती है.
दिल्ली में सबसे पहले होगा ट्रायल
इस नई व्यवस्था को शुरू करने से पहले इसका ट्रायल सबसे पहले दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में किया जाएगा. ट्रायल के दौरान चुनिंदा अस्पतालों जैसे एलएनजेपी, जीबी पंत, या जीटीबी अस्पताल में पेशेंट नेवीगेटर तैनात किए जाएंगे और यह देखा जाएगा कि यह व्यवस्था मरीजों के लिए कितनी कारगर साबित होती है. इस दौरान मिलने वाले फीडबैक के आधार पर आगे इसे बाकी सरकारी अस्पतालों में भी लागू किया जा सकता है.
कैसे काम करेगा यह सिस्टम
इस व्यवस्था के तहत जैसे ही कोई मरीज अस्पताल पहुंचेगा, उसे एक नेवीगेटर सौंपा जाएगा या फिर हेल्प डेस्क के जरिए उसकी शुरुआती जानकारी ली जाएगी. इसके बाद मरीज की जरूरत के मुताबिक उसे सही रजिस्ट्रेशन काउंटर, संबंधित डॉक्टर के कमरे और जांच केंद्र तक पहुंचाया जाएगा. डॉक्टर से सलाह मिलने के बाद अगर मरीज को किसी और विभाग में भेजा जाता है या दवा लेनी होती है, तो उसमें भी नेवीगेटर मदद करेंगे. इससे मरीजों का समय बचेगा और उन्हें बार-बार पूछताछ करने की जरूरत नहीं पड़ेगी.
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डिजिटल तकनीक की भी होगी मदद
इस व्यवस्था को और बेहतर बनाने के लिए डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल भी किया जा सकता है. अस्पतालों में लगे डिस्प्ले बोर्ड, टोकन सिस्टम और मोबाइल एप्स के जरिए मरीजों को उनकी बारी और लोकेशन से जुड़ी जानकारी दी जा सकती है. इससे भीड़भाड़ कम होगी और अस्पताल प्रशासन भी मरीजों की संख्या और उनकी जरूरतों को बेहतर तरीके से मैनेज कर सकेगा.
मरीजों को मिलेगी बड़ी राहत
सरकारी अस्पतालों में हर दिन बड़ी संख्या में मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं, जिसकी वजह से अक्सर वहां भीड़ और अव्यवस्था की शिकायतें सामने आती रहती हैं. ऐसे में पेशेंट नेवीगेटर व्यवस्था लागू होने से न सिर्फ मरीजों का समय बचेगा, बल्कि उन्हें मानसिक तनाव से भी राहत मिलेगी. खासतौर पर वे मरीज, जो पहली बार अस्पताल आते हैं और वहां की प्रक्रिया से अनजान होते हैं, उनके लिए यह व्यवस्था काफी मददगार साबित हो सकती है.
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        <pubDate>Sat, 05 Sep 2026 04:30:04 +0530</pubDate>
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        <title>Dehydration: पानी पीने के बाद भी लगती है प्यास? शरीर के इन इशारों को समझें</title>
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        <description><![CDATA[ Why Do I Feel Thirsty After Drinking Water: प्यास लगना शरीर का एक सामान्य संकेत है. गर्मी, ज्यादा पसीना आने या एक्सरसाइज करने के बाद पानी पीने से आमतौर पर राहत मिल जाती है. लेकिन अगर पानी पीने के कुछ देर बाद भी गला सूखा महसूस हो या बार-बार पानी पीने का मन करे, तो इसे सिर्फ ज्यादा गर्मी का असर मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. कई बार इसके पीछे शरीर में पानी और जरूरी मिनरल्स के संतुलन से जुड़ी वजह हो सकती है. दिलचस्प बात यह है कि कुछ परिस्थितियों में बहुत ज्यादा पानी पीने के बाद भी प्यास का एहसास बना रह सकता है. आखिर ऐसा क्यों होता है और शरीर इस तरह का संकेत क्यों देता है? इसके पीछे कई संभावित कारण हो सकते हैं.
ज्यादा पानी पीने से भी बिगड़ सकता है संतुलन
शरीर को सिर्फ पानी की जरूरत नहीं होती. सोडियम, पोटैशियम और क्लोराइड जैसे इलेक्ट्रोलाइट्स भी शरीर में पानी के स्तर को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाते हैं. जब कोई व्यक्ति कम समय में बहुत ज्यादा पानी पी लेता है, तो शरीर में मौजूद इलेक्ट्रोलाइट्स, खासकर सोडियम, जरूरत से ज्यादा डील्यूट हो सकते हैं. ऐसे में शरीर के अंदर पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन प्रभावित हो सकता है. शरीर इस बदलाव को महसूस करके प्यास का संकेत दे सकता है, ताकि संतुलन दोबारा सामान्य हो सके. यानी हर बार ज्यादा पानी पीना ही प्यास बुझाने का सही तरीका हो, यह जरूरी नहीं है.

बहुत ज्यादा पानी पीना भी हो सकता है समस्या
बहुत अधिक मात्रा में पानी पीने की एक दुर्लभ स्थिति को हाइपोनेट्रेमिया या वॉटर इंटॉक्सिकेशन कहा जाता है. इसमें जरूरत से ज्यादा पानी पीने के कारण खून में सोडियम की मात्रा काफी कम हो सकती है. सोडियम शरीर के फ्लूइड बैलेंस के लिए जरूरी है. इसकी मात्रा बहुत कम होने पर सेल्स में सूजन जैसी समस्या हो सकती है और शरीर का सामान्य फ्लूइड बैलेंस प्रभावित हो सकता है. ऐसे मामलों में प्यास समेत दूसरे लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं. हालांकि, यह स्थिति आम नहीं है. इसलिए सिर्फ कभी-कभार पानी पीने के बाद प्यास लगने को वॉटर इंटॉक्सिकेशन से जोड़ना सही नहीं होगा. समस्या तब ज्यादा गंभीर मानी जाती है जब बहुत ज्यादा पानी पीने की आदत के साथ लगातार असामान्य प्यास या दूसरे परेशान करने वाले संकेत भी मौजूद हों.
हर पानी से एक जैसा हाइड्रेशन?
पानी का मुख्य काम शरीर में तरल की कमी को पूरा करना है, लेकिन पानी में मौजूद मिनरल्स भी शरीर के इलेक्ट्रोलाइट बैलेंस में भूमिका निभाते हैं. कुछ पानी में प्राकृतिक रूप से कैल्शियम, मैग्नीशियम और दूसरे मिनरल्स मौजूद होते हैं, जबकि कुछ तरह के पानी में इनकी मात्रा कम हो सकती है. हालांकि, सिर्फ पानी में मिनरल्स की मात्रा को लगातार प्यास का एकमात्र कारण मानना ठीक नहीं है. शरीर की हाइड्रेशन जरूरत कई चीजों पर निर्भर करती है और हर व्यक्ति की स्थिति अलग हो सकती है.

गर्मी और एक्सरसाइज के बाद क्यों बढ़ सकती है प्यास?
अगर आपने तेज गर्मी में काफी समय बिताया है या एक्सरसाइज के दौरान बहुत पसीना आया है, तो शरीर से सिर्फ पानी ही नहीं बल्कि कुछ इलेक्ट्रोलाइट्स भी बाहर निकलते हैं. ऐसे में पानी पीने के बाद भी प्यास कुछ समय तक बनी रह सकती है. इसी वजह से प्यास को शरीर का एक संकेत माना जाता है. खासकर गर्म मौसम में पसीना ज्यादा आने पर शरीर के फ्लूइड बैलेंस में बदलाव हो सकता है और आपको सामान्य दिनों की तुलना में ज्यादा पानी की जरूरत महसूस हो सकती है.
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कुछ दवाइयां भी बढ़ा सकती हैं प्यास
बार-बार प्यास लगने की वजह हमेशा पानी की कमी नहीं होती. कुछ दवाइयां, खासकर ऐसी दवाएं जो शरीर से ज्यादा तरल बाहर निकालती हैं, शरीर के फ्लूइड बैलेंस को प्रभावित कर सकती हैं. इसके चलते पानी पीने के बावजूद प्यास का एहसास बना रह सकता है. अगर किसी दवा को शुरू करने के बाद लगातार प्यास बढ़ी है, तो अपनी तरफ से दवा बंद करने के बजाय डॉक्टर से इस बारे में बात करना बेहतर है.
कब इसे सामान्य मानकर नजरअंदाज न करें?
गर्मी में, पसीना आने के बाद या लंबे समय तक शारीरिक मेहनत करने के बाद प्यास लगना सामान्य हो सकता है. लेकिन अगर आपको बिना किसी स्पष्ट वजह के लगातार बहुत ज्यादा प्यास लगती रहती है और पानी पीने के बाद भी राहत नहीं मिलती, तो इसके पीछे कोई स्वास्थ्य संबंधी कारण भी हो सकता है. ऐसी स्थिति में सिर्फ बार-बार पानी पीते रहना समाधान नहीं है. खासकर अगर यह समस्या लगातार बनी हुई है या इसके साथ दूसरे असामान्य बदलाव भी महसूस हो रहे हैं, तो डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर रहेगा.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 05 Sep 2026 04:30:03 +0530</pubDate>
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        <title>11 साल से अपने बाल खा रही थी छात्रा, पेट से निकला 1.16 किलो का गुच्छा</title>
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        <description><![CDATA[ दिल्ली के द्वारका स्थित मणिपाल अस्पताल में डॉक्टरों ने 20 साल की एक छात्रा के पेट से करीब 1.16 किलो वजन का बालों का गुच्छा निकाला. छात्रा करीब 11 साल से अपने बाल खा रही थी. लंबे समय तक बाल खाने की वजह से उसके पेट में धीरे-धीरे बाल जमा होते गए और बड़ा गुच्छा बन गया.
छात्रा को कुछ दिनों से पेट में तेज दर्द की शिकायत थी. वहीं, उल्टी और जी मिचलाने की समस्या भी हो रही थी. वह काफी समय से ठीक से खाना नहीं खा पा रही थी. ऐसे में उसका वजन कम हो रहा था और उसे लगातार कमजोरी भी महसूस हो रही थी.
पेट में मिली बड़ी और सख्त गांठ
छात्रा की हालत को देखते हुए डॉक्टरों ने उसकी जांच शुरू की. जांच के दौरान उसके पेट में सख्त गांठ महसूस हुई. इसके बाद डॉक्टरों ने एंडोस्कोपी कराई, जिसमें पेट के अंदर बड़ी मात्रा में बाल जमा होने की जानकारी मिली. जब डॉक्टरों ने बात की तो छात्रा ने बताया कि वह करीब 11 साल से अपने बाल खा रही है. यह आदत बचपन से ही थी. धीरे-धीरे बाल पेट में जमा होते गए और गुच्छा बन गया.
डॉक्टरों के मुताबिक, बाल सामान्य भोजन की तरह पच नहीं पाते. अगर कोई व्यक्ति लगातार बाल निगलता रहे तो ये पेट में जमा होते रहते हैं. समय के साथ बाल आपस में उलझकर सख्त और बड़ी गांठ का रूप ले सकते हैं.
एंडोस्कोपी से नहीं निकला बालों का गुच्छा
मणिपाल अस्पताल के सर्जरी विभाग के प्रमुख डॉ. संदीप अग्रवाल के मुताबिक, बालों का गुच्छा इतना बड़ा और सख्त हो चुका था कि उसे सामान्य एंडोस्कोपी के जरिए निकालना मुश्किल था. इसके बाद डॉक्टरों ने सर्जरी करने का फैसला किया. पेट में छोटा सा चीरा लगाकर बालों के पूरे गुच्छे को सावधानी से बाहर निकाला गया. डॉक्टरों के मुताबिक, यह गुच्छा करीब 1.16 किलो वजन का था और पेट के बड़े हिस्से में फैला हुआ था.&amp;nbsp;
खाने की नली से छोटी आंत तक पहुंच गए थे बाल
डॉक्टरों के अनुसार, बालों का यह गुच्छा इतना बड़ा हो गया था कि इसका असर पेट के साथ-साथ आगे के पाचन तंत्र पर भी पड़ रहा था. यह खाने की नली और पेट के जोड़ से लेकर छोटी आंत की ओर जाने वाले रास्ते तक पहुंच गया था. सर्जरी के दौरान इस बात का खास ध्यान रखा गया कि बालों का गुच्छा निकालते समय पेट की अंदरूनी परत को किसी तरह की चोट न पहुंचे.
क्या है बाल खाने की आदत?
लगातार अपने बाल खाने की आदत को मेडिकल भाषा में ट्राइकोफेजिया कहा जाता है. लंबे समय तक ऐसा होने पर पेट में बालों का गुच्छा बन सकता है, जिसे ट्राइकोबेजोअर कहा जाता है.
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        <pubDate>Fri, 04 Sep 2026 15:30:04 +0530</pubDate>
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        <title>सीढ़ियां चढ़ते ही फूल रही सांस, फिटनेस की कमी या और कुछ?</title>
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        <description><![CDATA[ सीढ़ियां चढ़ते समय सांस फूलना आम समस्या है. खासकर अगर कोई व्यक्ति लंबे समय से एक्सरसाइज न कर रहा हो. वजन ज्यादा होने पर या अचानक तेज गति से सीढ़ियां चढ़ने पर भी यह समस्या होती है. ऐसे में शरीर की ऑक्सीजन की मांग बढ़ती है और सांस तेज चलने लगती है. कुछ देर आराम करने के बाद सांस सामान्य हो जाए तो अक्सर यह कम फिटनेस या शरीर की सामान्य प्रतिक्रिया हो सकती है. लेकिन अगर थोड़ी-सी सीढ़ियां चढ़ने पर ही बहुत ज्यादा सांस फूलने लगे, बार-बार ऐसा हो या इसके साथ दूसरे लक्षण भी दिखाई दें, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.
फिटनेस की कमी भी हो सकती है वजह
जो लोग नियमित रूप से पैदल चलने, दौड़ने या किसी तरह की शारीरिक गतिविधि में शामिल नहीं होते, उनकी कार्डियोवैस्कुलर फिटनेस कम होने की वजह से ऐसा होता है. ऐसे में सीढ़ियां चढ़ने जैसी गतिविधि अचानक शरीर पर ज्यादा दबाव डालती है और हृदय को तेजी से रक्त पंप करना पड़ता है. वहीं मांसपेशियों को भी अधिक ऑक्सीजन चाहिए होती है.
वजन बढ़ने से भी बढ़ सकती है परेशानी
शरीर का वजन अधिक होने पर चलने या सीढ़ियां चढ़ने जैसी गतिविधियों में शरीर को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है. इससे ऑक्सीजन की जरूरत बढ़ती है और सांस फूलने की समस्या जल्दी महसूस होती है. ऐसे में आप नियमित शारीरिक गतिविधि और संतुलित खान-पान से धीरे-धीरे अपनी फिटनेस सुधार सके हैं.
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एनीमिया में भी फूलती है सांस
अगर किसी व्यक्ति के शरीर में हीमोग्लोबिन कम है, तो ऐसे में खून की ऑक्सीजन पहुंचाने की क्षमता प्रभावित हो सकती है. इसका असर सीढ़ियां चढ़ने जैसी गतिविधियों के दौरान ज्यादा महसूस होता है. यदि सांस फूलने के साथ थकान, कमजोरी, चक्कर आना और सिरदर्द जैसे लक्षण दिख रहे हैं, तो ऐसे लक्षणों में डॉक्टर की सलाह लेना बेहतर होगा.
अपनी फिटनेस में करें सुधार
यदि सीढ़ियां चढ़ते समय आपकी सांस भी फूलती हैं तो यह सामान्य है. ऐसे में आप रोज वॉक या कुछ शारीरिक गतिविधि कर के अपनी शारीरिक क्षमता बढ़ा सकते हैं. आप रोज अपनी क्षमता अनुसार केवल सीढ़ियां चढ़कर भी अपनी फिटनेस में सुधार ला सकते हैं. ध्यान रहे हैं कि बार-बार सांस फूलना किसी गंभीर समस्या का संकेत भी हो सकता है. ऐसे में डॉक्टर से सलाह लेना या जांच करवाना बेहतर होता है.
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        <pubDate>Thu, 03 Sep 2026 23:30:04 +0530</pubDate>
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        <title>बिना चोट अचानक दर्द करने लगा पैर? हो सकती है इन चीजों की कमी</title>
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        <description><![CDATA[ पैरों में दर्द होना एक साधारण समस्या है. लंबे समय तक खड़े रहने या बैठने पर पैरों में दर्द, ऐंठन और झनझनाहट जैसी समस्या देखने को मिलती है. अक्सर यह समस्याएं थोड़ी देर में बिनी किसी दवा के ठीक हो जाती है. लेकिन अगर यह समस्या लंबे समय तक बनी रहती है और बिना मेहनत और चोट के तकलीफ देती हैं, तो यह आपके शरीर में कुछ जरूरी पोषक तत्वों की कमी के संकेत हो सकते हैं. ऐसे में आइए जानते हैं कि ऐसी समस्या किन जरूरी तत्वों की कमी से होती है और इन्हें किसी ठीक किया जा सकता है.
विटामिन डी की कमी
हमारे शरीर में मांसपेशियों, हड्डियों और नसों को कार्य करने के लिए विटामिन डी की आवश्यक्ता होती है. इसकी कमी से शरीर में दर्द और कमजोरी महसूस होती है. कई लोगों को विटामिन डी की कमी की वजह से पीठ, कमर और पैरों में दर्द होने जैसी समस्या हो सकती है. आमतौर पर विटामिन डी हमें सूर्य से मिलता है लेकिन इसकी कमी को पूरा करने के लिए आप डॉक्टर से सलाह ले सकते हैं.
कैल्शियम की कमी से भी होता है दर्द
कई लोगों को लगता है कि कैल्शियम केवल हड्डियों के लिए ही आवश्यक होता है, लेकिन असल में कैल्शियम की कमी का असर हड्डियों के साथ-साथ शरीर की मांसपेशियों पर पड़ता है. इसकी कमी होने से शरीर के कुछ अंगों में खिंचाव और ऐंठन जैसी समस्या होती है. कैल्शियम की कमी को पूरा करने के लिए आप अपने आहार में दूध, दही, पनीर और तिल शमिल करें.
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विटामिन बी12 की कमी से होता है पैर सुन्न
विटामिन बी12 की कमी से शरीर में नसों और मांसपेशियों में सुन्नपन, खिंचाव और ऐंठन महसूस होती है. कई लोगों को रात में पैरों में ऐंठन की शिकासत होती है. इसकी सबसे बड़ी वजह विटामिन बी12 की कमी ही होती है. विटामिन बी12 की कमी आपके शरीर की नसों को सीधे प्रभावित करती है जिससे पैरों में अचानक दर्द जैसी समस्या सामने आती है.
संतुलित आहार से करें कमी पूरी
शरीर में पौषक तत्वों की कमी करने के लिए आपको केवल आपके खाने में कुछ चीजें शामिल करना होगी. संतूलित और सवस्थ आहार आपके शरीर को वो सारे पौषक तत्व देता है जिसकी आपके शरीर को कार्य करने के लिए आवश्यकता होती है. अपने खाने में सबसे पहले हरी सब्जियां शामिल करें. वहीं दूध, अंडा और मौसमी फल को भी अपनी डाइट में शामिल करें, ये आपके शरीर को जरूरी मिनरल्स और विटामिन देते हैं. वहीं एक्टिव लाइफस्टाइल और थोड़ी सी एक्सरसाइज आपके शरीर को फिट रखने में मदद करती है. अगर ये समस्या बार-बार हो रही है, तो ऐसे में डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर होगा.
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        <pubDate>Thu, 03 Sep 2026 23:30:03 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>जन्माष्टमी व्रत में क्या खाएं कि कमजोरी न हो? जानें हेल्थ टिप्स</title>
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        <description><![CDATA[ जन्माष्टमी का पर्व देशभर में बड़ी श्रध्दा के साथ मनाया जाता है और इस दिन बड़ी संख्या में श्रध्दालु व्रत रखते हैं. कई लोग निर्जला व्रत रखते हैं तो कई फलआहार के सहारे दिनभर का उपवास पूरा करते हैं. लंबे समय तक भूखे रहने से शरीर में कमजोरी, चक्कर आना और थकान जैसी दिक्कतें हो सकती हैं. ऐसे में अगर व्रत के दौरान सही खान-पान का ध्यान रखा जाए, तो पूजा-पाठ के साथ-साथ सेहत भी बनी रह सकती है. आइए जानते हैं जन्माष्टमी व्रत में किन चीजों का सेवन फायदेमंद रहता है.&amp;nbsp;
व्रत शुरू करने से पहले लें हल्का आहार
जन्माष्टमी का व्रत आमतौर पर लंबा होता है, इसलिए व्रत शुरू करने से पहले हल्का और पौष्टिक आहार लेना बेहतर माना जाता है. इसलिए शरीर को दिनभर के लिए जरूरी ऊर्जा मिल जाती है. भारी और तला-भुना खाने से बचना चाहिए, क्योंकि इससे पेट में भारीपन महसूस हो सकता है.&amp;nbsp;
फलों के सेवन करें
व्रत के दौरान फलों का सेवन सबसे अच्छा माना जाता है. केला, सेब, अनार और पपीता जैसे फल शरीर को जरूरी विटामिन और मिनरल्स देते हैं. इनमें प्राकृतिक शुगर भी होती है, जिससे शरीर में ऊर्जा बनी रहती है और कमजोरी महसूस नहीं होती. फलों को थोड़ी-थोड़ी देर में खाने से भूख भी नियंत्रित रहती है.&amp;nbsp;
साबूदाना और कुट्टू के आटे से बनी चीजें
व्रत के दौरान साबूदाना खिचड़ी, साबूदाना वड़ा और कुट्टू के आटे से बनी पूड़ी या पराठा जैसी चीजें भी खाई जाती हैं. साबूदाना शरीर को तुरंत ऊर्जा देता है, जबकी कुट्टू का आटा प्रोटीन और फाइबर का अच्छा स्त्रोत माना जाता है. हालांकि इन्हें बहुत ज्यादा तेल या घी में तलकर खाने से बचना चाहिए, ताकि पेट पर असर न पड़े.&amp;nbsp;
दही और मखाना भी हैं अच्छे विकल्प
व्रत के दौरान दही खाना पेट के लिए फायदेमंद माना जाता है, क्योंकि यह पाचन को बेहतर रखने में मदद करता है. इसके अलावा मखाना भी हल्का और पौष्टिक नाश्ता माना जाता है, जिसे घी में हल्का भूनकर खाया जा सकता है. मखाने में कैल्शियम और प्रोटीन की अच्छी मात्रा पाई जाती है, जो शरीर को दिनभर ऊर्जावान बनाए रखने में सहायक होती है.&amp;nbsp;
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पानी की न करें कमी
जो लोग निर्जला व्रत नहीं रखते, उन्हें दिनभर पर्याप्त मात्रा में पानी पीते रहना चाहिए. इसके अलावा नारियल पानी, नीबूं पानी और छाछ जैसे तरल पदार्थ भी शरीर को हाइड्रेट रखने में मदद करते हैं. शरीर में पानी की कमी होने से ही ज्यादातर कमजोरी और चक्कर आने की समस्या होती है, इसलिए तरल पदार्थ का सेवन बीच-बीच में करते रहना चाहिए.&amp;nbsp;
व्रत खोलते समय बरतें सावधानी
लंबे व्रत के बाद अचानक भारी और तला हुआ खाना खाने से बचना चाहिए. व्रत खोलते समय सबसे पहले हल्का फलाहार या तरल पदार्थ लेना चाहिए, इसके बाद ही धीरे-धीरे सामान्य भोजन शुरू करना चाहिए. इससे पाचन तंत्र पर अचानक दबाव नहीं पड़ता और शरीर आसानी से सामान्य दिनचर्या में लौट पाता है. जन्माष्टमी व्रत में क्या खाएं.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Wed, 02 Sep 2026 19:30:06 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>एक डोनर के कॉर्निया से कई मरीजों को मिलेगी रोशनी, AIIMS की नई पहल</title>
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        <description><![CDATA[ आंखों की रोशनी खो चुके लोगों के लिए दिल्ली AIIMS ने नई पहल शुरू की है. एम्स के डॉ. राजेंद्र प्रसाद सेंटर फॉर ऑप्थैल्मिक साइंसेज स्थित राष्ट्रीय नेत्र बैंक (NEB) में नई मेम्ब्रेन पीलिंग तकनीक को अपनाया जा रहा है. इसके जरिए एक डोनर कॉर्निया के अलग-अलग हिस्सों का उपयोग कई लैमेलर प्रत्यारोपण और एलोजेनिक स्टेम सेल प्रक्रियाओं में किया जा सकता है. इसकी मदद से एक आई डोनर कई मरीजों तक रोशनी पहुंचा रहा है.&amp;nbsp;
यह जानकारी, राष्ट्रीय नेत्र बैंक के एक कार्यक्रम में नेत्रदान और कॉर्निया प्रत्यारोपण से जुड़ी गतिविधियों और पिछले वर्षों के आंकड़ों की जानकारी साझा की. कार्यक्रम में नेत्रदान करने वाले परिवारों के साथ ही इस प्रक्रिया में सहयोग करने वाले संस्थानों और स्वास्थ्यकर्मियों को भी सम्मानित किया गया.
61 सालों में इकट्ठा किए 38 हजार कॉर्निया
एम्स की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक, राष्ट्रीय नेत्र बैंक ने पिछले 61 वर्षों के दौरान 38 हजार से अधिक कॉर्निया एकत्र किए हैं. इन कॉर्निया का उपयोग कर 28 हजार से अधिक कॉर्नियल ब्लाइंडनेस से प्रभावित मरीजों का कॉर्निया प्रत्यारोपण किया गया. इस दौरान 500 से अधिक नेत्र विशेषज्ञों को कॉर्निया प्रत्यारोपण की विभिन्न आधुनिक तकनीकों का प्रशिक्षण भी दिया गया.
आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में राष्ट्रीय नेत्र बैंक ने कुल 2,167 कॉर्निया एकत्र किए. इनमें से 1,775 कॉर्निया, यानी करीब 81.9 प्रतिशत, हॉस्पिटल कॉर्नियल रिट्रीवल प्रोग्राम (HCRP) के माध्यम से प्राप्त हुए. एम्स-दिल्ली-HCRP मॉडल के तहत अस्पतालों से कॉर्नियल टिश्यू प्राप्त कर प्रत्यारोपण के लिए उपलब्ध कराया जाता है. एम्स के अनुसार, राष्ट्रीय नेत्र बैंक ने लगातार चौथे वर्ष 1,300 से अधिक कॉर्निया प्रत्यारोपण किए. वर्ष 2025 में 1,775 मरीजों का कॉर्निया प्रत्यारोपण किया गया और कॉर्निया उपयोग की दर करीब 82 प्रतिशत दर्ज की गई.
&#039;एक डोनर-कई मरीज&#039;
कॉर्नियल टिश्यू की उपलब्धता बढ़ाने के लिए इस वर्ष राष्ट्रीय नेत्र बैंक ने अटल बिहारी वाजपेयी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज एवं डॉ. आरएमएल अस्पताल, इंदिरा गांधी अस्पताल, द्वारका और नॉर्दर्न रेलवे सेंट्रल अस्पताल के साथ समझौते किए हैं. इसके अलावा, RayMed Ltd. द्वारा प्रायोजित एक परियोजना के तहत बच्चों के कॉर्निया प्रत्यारोपण के लिए अन्य आई बैंकों से कॉर्नियल टिश्यू की व्यवस्था की जा रही है. आरपी सेंटर में &amp;ldquo;एक डोनर, कई मरीज&amp;rdquo; मॉडल पर भी काम किया जा रहा है.&amp;nbsp; कॉर्निया को सुरक्षित रखने के लिए इस्तेमाल होने वाले प्रिजर्वेशन मीडिया के क्षेत्र में भी केंद्र काम कर रहा है. राष्ट्रीय अंधत्व नियंत्रण कार्यक्रम के सहयोग से आरपी सेंटर का ऑक्यूलर फार्माकोलॉजी विभाग ExStorSol नामक कॉर्नियल प्रिजर्वेशन मीडिया तैयार करता है. वर्ष 2025-26 के दौरान इसके 4,652 से अधिक वायल देश के 24 राज्यों में स्थित 130 आई बैंकों को उपलब्ध कराए गए.
एक साल में 100 लोगों ने की नेत्रदान की प्रतिज्ञा
एम्स में मृत्यु की सूचना देने के लिए 100 प्रतिशत ऑनलाइन प्रणाली भी शुरू की गई है, ताकि नेत्रदान से जुड़े काउंसलर और तकनीशियन समय पर संबंधित परिवारों तक पहुंच सकें. राष्ट्रीय नेत्र बैंक और ORBO ने नेत्रदान की प्रतिज्ञा के लिए ऑनलाइन व्यवस्था भी शुरू की है. एम्स के अनुसार, पिछले वर्ष 100 लोगों ने राष्ट्रीय नेत्र बैंक के माध्यम से नेत्रदान की प्रतिज्ञा की. इसके अलावा, नेत्रदान के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए स्कूलों, कॉलेजों और आवासीय क्षेत्रों में कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं. इसी क्रम में 25 अगस्त 2026 को एम्स परिसर में &amp;lsquo;वॉक फॉर आई डोनेशन&amp;rsquo; आयोजित की गई.
आरपी सेंटर में स्यूचरलेस डेसमेट मेम्ब्रेन एंडोथीलियल केराटोप्लास्टी (DMEK) तकनीक का भी इस्तेमाल किया जा रहा है. इस तकनीक में कॉर्निया की केवल प्रभावित कार्यात्मक परत का प्रत्यारोपण किया जाता है. केंद्र में केराटोकोनस और फुच्स एंडोथीलियल कॉर्नियल डिस्ट्रॉफी जैसी बीमारियों पर आनुवंशिक और सूजन संबंधी कारकों को लेकर शोध भी चल रहा है. वर्ष 2026 में एम्स ने Vision-Aid के साथ पांच वर्ष की साझेदारी की है. इसके तहत दिल्ली-एनसीआर में 10 इंटीग्रेटेड विजन सेंटर स्थापित करने और बच्चों के लिए सेरेब्रल विजुअल इम्पेयरमेंट (CVI) रिसोर्स सेंटर विकसित करने की योजना है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Wed, 02 Sep 2026 19:30:04 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>बदल गई फ्लू वैक्सीन, जानिए किन लोगों के लिए जरूरी है यह टीका?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/बदल-गई-फ्लू-वैक्सीन-जानिए-किन-लोगों-के-लिए-जरूरी-है-यह-टीका</link>
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        <description><![CDATA[ पिछले साल सर्दियों में ब्रिटेन समेत कई देशों में फ्लू यानी इन्फ्लूएंजा के मामले सामान्य से काफी पहले और ज्यादा संख्या में सामने आए थे. इसी को देखते हुए इस साल सर्दी शुरू होने से पहले ही फ्लू वैक्सीन में बड़ा बदलाव किया गया है. दरअसल इन्फ्लूएंजा वायरस हर साल अपना रूप बदलता रहता है, इसलिए विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी WHO वायरस पर लगातार निगरानी रखने के बाद वैक्सीन को अपडेट करने की सिफारिश करता है. इस बार WHO ने आने वाले फ्लू सीजन के लिए वैक्सीन में सुपर-K नाम के स्ट्रेन को शामिल करने की सलाह दी थी, जिसे अब तैयार भी कर लिया गया है.&amp;nbsp;
क्या है सुपर-K स्ट्रेन
सुपर-K कोई नई बीमारी या नया वायरस नहीं है, बल्कि यह H3N2 फ्लू वायरस का ही एक बदला हुआ रूप है. इसका वैज्ञानिक नाम इन्फ्लूएंजा A(H3N2) सब क्लेड K है. चूंकि यह वायरस हर साल थोड़ा बदलता रहता है, इसलिए इसके हिसाब से वैक्सीन को भी समय-समय पर अपडेट किया जाता है, ताकि लोगों में संक्रमण के मामले कम हों और अस्पताल में भर्ती होने की नौबत न आए. पिछले साल यह वायरस दुनिया के कई हिस्सों में तेजी से फैला था, जिसके चलते इस बार मामलों में और बढ़ोतरी की आशंका जताई जा रही है.&amp;nbsp;
किसने तैयार की अपडेटेड वैक्सीन
बता दें कि फ्लू की कोई बिल्कुल नई वैक्सीन नहीं बनाई गई है, बल्कि मौजूदा वैक्सीन को ही नए स्ट्रेन के हिसाब से अपडेट किया गया है. ब्रिटेन में 2026-27 सीजन के लिए एस्ट्राजेनेका कंपनी ने फ्लूएंज वैक्सीन तैयार की है. यह बच्चों और युवाओं को नाक के जरिए दी जाने वाली लाइव एटेन्यूएटेड इन्फ्लूएंजा वैक्सीन है. यह ऐसी वैक्सीन होती है, जो एक ही खुराक में तीन अलग-अलग वायरस या बैक्टीरिया के स्ट्रेन से सुरक्षा देती है, इसीलिए इसे ट्राइवैलेंट वैक्सीन भी कहा जाता है.
बच्चों के लिए क्या है व्यवस्था
बच्चों के टीकाकरण के लिए खास इंतजाम किया गया है. दो साल की उम्र से लेकर स्कूल जाने वाले बच्चों को आमतौर पर फ्लूएंज नेजल स्प्रे के रूप में यह वैक्सीन दी जा रही है, जिसमें सुई का इस्तेमाल नहीं होता. हालांकि जिन बच्चों को किसी कारण से नेजल स्प्रे नहीं दिया जा सकता, उनके लिए इंजेक्शन वाली वैक्सीन का विकल्प भी मौजूद है.&amp;nbsp;
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क्या भारत में भी यही वैक्सीन लगेगी
WHO की वायरस-स्ट्रेन को लेकर दी गई सिफारिशें दुनियाभर के वैक्सीन निर्माताओं के लिए एक अहम आधार जरूर मानी जाती हैं. ऐसे में भारत में उपलब्ध फ्लू वैक्सीन के पैकेज पर दी गई जानकारी देखकर ही यह पता लगाया जा सकता है कि उसमें 2026 के लिए H3N2 का नया कंपोनेंट शामिल है या नहीं.सिर्फ यह सुनकर कि वैक्सीन अपडेट हो गई है, भारत में कोई भी फ्लू वैक्सीन लगवाने का फैसला सही नहीं माना जाएगा.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Wed, 02 Sep 2026 03:30:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>बदल, गई, फ्लू, वैक्सीन, जानिए, किन, लोगों, के, लिए, जरूरी, है, यह, टीका</media:keywords>
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        <title>Antibiotic Resistance: एंटीबायोटिक्स का बेअसर होना जानलेवा! ICMR रिसर्च में बड़ा खुलासा</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/antibiotic-resistance-एंटीबायोटिक्स-का-बेअसर-होना-जानलेवा-icmr-रिसर्च-में-बड़ा-खुलासा</link>
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        <description><![CDATA[ Carbapenem Resistant Bacterial Infections India: भारत के अलग-अलग अस्पतालों में भर्ती मरीजों पर हुए एक बड़े रिसर्च में सामने आया है कि एंटीबायोटिक दवाओं का असर खत्म होने के बाद होने वाले बैक्टीरियल इंफेक्शन ज्यादा जानलेवा हो सकते हैं. ऐसे इंफेक्शनि के इलाज में मरीजों को ज्यादा समय तक इलाज की जरूरत पड़ सकती है और दवाओं पर खर्च भी बढ़ सकता है.
ग्राम-नेगेटिव बैक्टीरिया ऐसे बैक्टीरिया होते हैं, जो शरीर के कई हिस्सों में इंफेक्शन फैला सकते हैं. ये फेफड़ों, पेशाब की नली, घाव और खून में इंफेक्शन का कारण बन सकते हैं. इनमें ई. कोलाई, क्लेबसिएला न्यूमोनिया, एसिनेटोबैक्टर बाउमानी और स्यूडोमोनास एरुजिनोसा जैसे बैक्टीरिया शामिल हैं. अस्पतालों में इनसे होने वाले इंफेक्शन आम हैं. जब इन बैक्टीरिया पर एंटीबायोटिक दवाओं का असर कम या खत्म हो जाता है, तो मरीज का इलाज मुश्किल हो जाता है.
गंभीर बैक्टीरियल इंफेक्शन के इलाज में कार्बापेनेम एंटीबायोटिक्स का इस्तेमाल किया जाता है. लेकिन जब बैक्टीरिया इन दवाओं के खिलाफ भी एंटीसेप्टिक हो जाते हैं, तो डॉक्टरों के पास मरीज के इलाज के लिए दवाओं के विकल्प कम बचते हैं. यही वजह है कि ऐसे इंफेक्शन चिंता का बड़ा कारण बन रहे हैं.
20 अस्पतालों में 1.59 लाख मरीजों पर हुआ रिसर्च
यह रिसर्च इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च यानी आईसीएमआर के एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस सर्विलांस नेटवर्क से जुड़े रिसर्चर ने किया है. इसमें चार प्रमुख बैक्टीरिया ई. कोलाई, क्लेबसिएला न्यूमोनिया, एसिनेटोबैक्टर बाउमानी और स्यूडोमोनास एरुजिनोसा को शामिल किया गया. रिसर्चर ने अप्रैल 2022 से अप्रैल 2025 के बीच देश के 20 बड़े अस्पतालों में भर्ती 1,59,336 मरीजों के आंकड़ों का अध्ययन किया. इनमें 26,213 मरीजों में ग्राम-नेगेटिव बैक्टीरिया से इंफेक्शन की पुष्टि हुई. इनमें से 16,025 यानी 61.1 फीसदी मरीजों में इंफेक्शन कार्बापेनेम एंटीबायोटिक्स के खिलाफ एंटीसेप्टिक पाया गया.

दवा का असर नहीं होने पर मौत का खतरा ज्यादा
चारों तरह के बैक्टीरिया से संक्रमित मरीजों में दवा-एंटीसेप्टिक इंफेक्शन के मामले में मौत का आंकड़ा ज्यादा रहा. ई. कोलाई इंफेक्शन वाले मरीजों में कार्बापेनेम-रेजिस्टेंट इंफेक्शन के मामले में 24.4 फीसदी मरीजों की मौत हुई. वहीं, जिन मरीजों में इसी बैक्टीरिया पर दवा का असर हो रहा था, उनमें मृत्यु दर 17.3 फीसदी रही.
क्लेबसिएला न्यूमोनिया के मामले में दवा-एंटीसेप्टिक इंफेक्शन वाले मरीजों में मृत्यु दर 31.2 फीसदी थी, जबकि दवा का असर होने वाले मरीजों में यह 23.5 फीसदी रही. एसिनेटोबैक्टर बाउमानी के मामले में यह आंकड़ा क्रमशः 37.9 फीसदी और 32.8 फीसदी रहा. वहीं, स्यूडोमोनास एरुजिनोसा इंफेक्शन में दवा-एंटीसेप्टिक समूह में मृत्यु दर 28.9 फीसदी और दूसरे समूह में 20.2 फीसदी रही.

आंकड़ों के मुताबिक, कार्बापेनेम-रेजिस्टेंट ई. कोलाई इंफेक्शन वाले मरीजों में मौत का खतरा दवा के असर वाले मरीजों की तुलना में 41 फीसदी ज्यादा था. क्लेबसिएला न्यूमोनिया में यह खतरा 33 फीसदी, एसिनेटोबैक्टर बाउमानी में 16 फीसदी और स्यूडोमोनास एरुजिनोसा में 43 फीसदी ज्यादा पाया गया. हालांकि, रिसर्चर ने साफ किया है कि इन आंकड़ों का यह मतलब नहीं है कि एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस खत्म करने से इतनी ही मौतों को रोका जा सकता है. मरीज की हालत कितनी गंभीर थी, सही दवा कितनी जल्दी शुरू हुई और दूसरे स्वास्थ्य संबंधी कारणों का भी इलाज के नतीजे पर असर पड़ सकता है.
खून में इंफेक्श पहुंचने पर खतरा और बढ़ा
अगर बैक्टीरिया का इंफेक्शन खून तक पहुंच जाए, तो मरीज के लिए खतरा और बढ़ जाता है. ऐसे मामलों में कार्बापेनेम-रेजिस्टेंट इंफेक्शन वाले मरीजों में मृत्यु दर ई. कोलाई के लिए 39.3 फीसदी से लेकर एसिनेटोबैक्टर बाउमानी के लिए 50.8 फीसदी तक रही. क्लेबसिएला न्यूमोनिया में यह 44.8 फीसदी और स्यूडोमोनास एरुजिनोसा में 46.4 फीसदी थी. इसके मुकाबले जिन मरीजों में बैक्टीरिया पर एंटीबायोटिक का असर हो रहा था, उनमें खून के इंफेक्शन से मृत्यु दर ई. कोलाई के लिए 23.8 फीसदी, क्लेबसिएला न्यूमोनिया के लिए 36 फीसदी, एसिनेटोबैक्टर बाउमानी के लिए 42.6 फीसदी और स्यूडोमोनास एरुजिनोसा के लिए 32.8 फीसदी रही.
इन चारों बैक्टीरिया से होने वाले खून के इंफेक्शनों में 85 फीसदी से ज्यादा मामले अस्पताल से जुड़े इंफेक्शन पाए गए. इससे साफ होता है कि अस्पतालों में इंफेक्शन रोकने के लिए साफ-सफाई और जरूरी सावधानियों पर ज्यादा ध्यान देना कितना जरूरी है.
&amp;nbsp;इलाज भी महंगा
शोध में यह भी सामने आया कि कार्बापेनेम-रेजिस्टेंट इंफेक्शन के इलाज में एंटीबायोटिक दवाओं पर ज्यादा खर्च हुआ. ई. कोलाई के दवा-एंटीसेप्टिक इंफेक्शन में एक मरीज पर औसतन करीब 39,846 रुपये खर्च हुए, जबकि दवा के असर वाले इंफेक्शन में यह खर्च करीब 20,034 रुपये था. क्लेबसिएला न्यूमोनिया के लिए यह खर्च क्रमशः 55,688 रुपये और 47,918 रुपये रहा. एसिनेटोबैक्टर बाउमानी के इलाज में दवा-एंटीसेप्टिक इंफेक्शन के लिए करीब 62,150 रुपये और संवेदनशील इंफेक्शन के लिए 41,372 रुपये खर्च हुए. वहीं, स्यूडोमोनास एरुजिनोसा के इलाज में यह खर्च करीब 66,599 रुपये और 48,392 रुपये रहा.
कुल मिलाकर, दवा-एंटीसेप्टिक इंफेक्शन में एंटीबायोटिक का खर्च सामान्य इंफेक्शन की तुलना में करीब 1.1 से दो गुना तक ज्यादा पाया गया. हालांकि, इसमें अस्पताल के कमरे, जांच, डॉक्टर की फीस और मरीज की दूसरी देखभाल का खर्च शामिल नहीं था. खर्च की गणना जनऔषधि योजना के तहत मिलने वाली एंटीबायोटिक दवाओं की दरों के आधार पर की गई थी, जो आम बाजार कीमतों से कम होती हैं. इसलिए मरीज पर पड़ने वाला असली खर्च इससे ज्यादा हो सकता है.
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इसको रोकना क्यों जरूरी?
रिसर्च में सामने आया कि इन चारों बैक्टीरिया से होने वाले ज्यादातर इंफेक्सन अस्पतालों से जुड़े थे. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 02 Sep 2026 03:30:03 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Antibiotic, Resistance:, एंटीबायोटिक्स, का, बेअसर, होना, जानलेवा, ICMR, रिसर्च, में, बड़ा, खुलासा</media:keywords>
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        <title>फरीदाबाद के प्राइवेट अस्पतालों में आज नहीं चलेगा आयुष्मान कार्ड, जान लें वजह</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/फरीदाबाद-के-प्राइवेट-अस्पतालों-में-आज-नहीं-चलेगा-आयुष्मान-कार्ड-जान-लें-वजह</link>
        <guid>https://hindi.attentionindia.com/फरीदाबाद-के-प्राइवेट-अस्पतालों-में-आज-नहीं-चलेगा-आयुष्मान-कार्ड-जान-लें-वजह</guid>
        <description><![CDATA[ Ayushman Card: &amp;nbsp;फरीदाबाद समेत हरियाणा के आयुष्मान योजना से जुड़े निजी अस्पतालों में 1 सितंबर को आयुष्मान कार्ड पर इलाज की सुविधा प्रभावित रहने वाली है. इंडियन मेडिकल असोसिएशन यानी आईएमए हरियाणा ने सरकार से लंबे समय से अटके क्लेम का भुगतान करने की मांग को लेकर सांकेतिक हड़ताल का फैसला लिया है. इस दौरान आयुष्मान कार्ड से जुड़े इलाज और अन्य सेवाएं बंद रखी जाएंगी. हालांकि, यह फैसला सामान्य इलाज पर लागू नहीं है और मरीजों को अस्पताल जाने से पहले संबंधित अस्पताल से जानकारी लेनी चाहिए
भुगतान में देरी बनी सबसे बड़ी वजह
आयुष्मान योजना के तहत निजी अस्पताल पहले मरीजों का इलाज करते हैं और बाद में सरकार की ओर से क्लेम का भुगतान किया जाता है. आईएमए हरियाणा का कहना है कि कई अस्पतालों के क्लेम लंबे समय से अटके हुए हैं. असोसिएशन के अनुसार, कई मामलों में भुगतान छह महीने से ज्यादा समय से लंबित है.
अस्पतालों का कहना है कि लगातार भुगतान नहीं मिलने से उनकी आर्थिक स्थिति पर असर पड़ रहा है और योजना के तहत मरीजों को सेवाएं देना मुश्किल होता जा रहा है. आईएमए का कहना है कि अस्पतालों और सरकार के बीच भुगतान को लेकर पहले से तय व्यवस्था के बावजूद समय पर राशि नहीं मिल रही है. इसी समस्या को लेकर अस्पताल संचालक लगातार सरकार से समाधान की मांग कर रहे हैं. अब निजी अस्पतालों ने सरकार का ध्यान इस मुद्दे की ओर खींचने के लिए सांकेतिक हड़ताल का फैसला किया है.
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1 सितंबर को 24&amp;nbsp; घंटे प्रभावित रहेंगी सेवाएं
आईएमए हरियाणा के अनुसार, 1 सितंबर की रात 12 बजे से 2 सितंबर की रात 12 बजे तक आयुष्मान से जुड़ी सेवाएं बंद रखी जाएंगी. इसका मतलब है कि इस अवधि में आयुष्मान कार्ड के जरिए निजी अस्पतालों में इलाज कराने वाले मरीजों को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है. यह विरोध 24 घंटे के लिए रखा गया है. फरीदाबाद में आयुष्मान योजना के तहत सूचीबद्ध अस्पतालों की आधिकारिक सूची हरियाणा सरकार की वेबसाइट पर उपलब्ध है. अगस्त 2026 में जारी सूची में जिले के आयुष्मान अस्पतालों की जानकारी दी गई है. इसलिए इलाज के लिए जाने वाले लाभार्थियों को अस्पताल की मौजूदा स्थिति पहले से पता कर लेना चाहिए.
मांग पूरी नहीं हुई तो आगे बढ़ सकता है विरोध
आईएमए हरियाणा ने यह भी चेतावनी दी है कि अगर सरकार की ओर से लंबित भुगतान को लेकर ठोस कदम नहीं उठाया जाता है, तो 16 सितंबर की रात 12 बजे से आयुष्मान सेवाएं पूरी तरह बंद करने की स्थिति बन सकती है. असोसिएशन का कहना है कि अस्पताल मरीजों को परेशानी नहीं देना चाहते, लेकिन लंबे समय से भुगतान अटका रहने के कारण उनके सामने आर्थिक दबाव बढ़ रहा है.
ऐसे में आयुष्मान कार्डधारकों के लिए जरूरी है कि 1 सितंबर को निजी अस्पताल जाने से पहले वहां आयुष्मान सेवा की उपलब्धता की जानकारी लें. किसी जरूरी या गंभीर स्थिति में मरीज सरकारी अस्पताल में उपलब्ध आयुष्मान सुविधा के बारे में भी जानकारी ले सकते हैं. हरियाणा सरकार की वेबसाइट पर आयुष्मान योजना के तहत सूचीबद्ध और निष्क्रिय अस्पतालों की अलग-अलग जानकारी उपलब्ध कराई गई है
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        <pubDate>Tue, 01 Sep 2026 11:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>बच्चा देर से बोल रहा, Eye Contact भी कम? न करें नजरअंदाज</title>
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        <description><![CDATA[ हर बच्चे के बढ़ने और सीखने की रफ्तार अलग होती है, इसलिए कई बार माता पिता यह सोचकर बात टाल देते हैं कि बच्चा थोड़ा देर से बोलना शुरू करेगा. लेकिन एक्सपर्ट्स के मुताबिक अगर बोलने में देरी के साथ साथ आई कॉन्टैक्ट कम होना या बुलाने पर प्रतिक्रिया न देना जैसे लक्षण भी दिखें, तो इसे नजरअंदाज करना सही नहीं है. आइए जानते हैं बच्चों में बोलने में देरी की क्या वजहें हो सकती हैं, किन बातों पर ध्यान देना चाहिए, और कब डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी हो जाता है.
हर बच्चे का डिवेलपमेंट एक जैसा नहीं होता
विशेषज्ञों के मुताबिक, बच्चों में बोलने की ताकत एक तय समय के आसपास डेवलप होती है, लेकिन हर बच्चे में यह प्रोसेस थोड़ी अलग तरह से हो सकती है. हालांकि अगर उम्र के हिसाब से देरी हो रही हो, तो यह परेशानी बन सकता है.
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देरी से बोलने के पीछे क्या वजह हो सकती हैं?
कई बार बच्चे में देरी से बोलने की वजह सुनने की ताकत में कमी होती है, जिससे बच्चा आवाजें ठीक से सुन नहीं पाता है और नतीजतन बोल भी नहीं पाता है. कुछ मामलों में वोकल कॉर्ड, इंटरनल इयर, नर्वस सिस्टम या दिमाग के भाषा से जुड़े हिस्से में किसी तरह की कमजोरी इसकी वजह बन सकती है. कम शक्ति की वजह से भी बच्चों को लंबे बात सुनकर उन्हें दोहराने में दिक्कत हो सकती है.
यह नहीं करना चाहिए नजरअंदाज
सिर्फ देर से बोलना ही अकेला इशारा नहीं है. एक्सपर्ट्स के मुताबिक अगर बच्चे में बार बार हाथ फड़फड़ाना, गोल गोल घूमना या खिलौनों के सिर्फ एक हिस्से जैसे पहिए से ही बार बार खेलते रहना जैसी आदतें दिखें, तो इन्हें भी ध्यान में रखना चाहिए. इसके अलावा तेज रोशनी, तेज आवाज या किसी खास कपड़े को छूने पर बहुत ज्या चिड़चिड़ा हो जाना भी एक अहम इशारा माना जाता है.
आई कॉन्टैक्ट कम होना क्यों है अहम इशारा?
बोलने में देरी के साथ साथ अगर बच्चा आंखों में आंखें डालकर बात करने से बचता है, नाम पुकारने पर जवीब नहीं देता है, या दूसरों के साथ जुड़ने में दिलचस्पी कम दिखाता है, तो यह सिर्फ शर्मीलेपन का मामला नहीं हो सकता. ऐसे लक्षण एक साथ दिखने पर विशेषज्ञ की सलाह लेना ज्यादा बेहतर रहता है.
कब करना चाहिए डॉक्टर से संपर्क?
अगर समय देने और बात करने के तमाम कोशिशों के बावजूद बच्चे की स्पीच में सुधार नहीं दिख रहा है,या बताए गए किसी भी लक्षण के साथ बोलने में देरी जुड़ी हुई है, तो बिना देर किए डॉक्टर से संपर्क करें. शुरुआती पहचान और सही समय पर मिली मदद बच्चे के आगे के डेवलप में काफी फर्क ला सकती है.
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें
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        <pubDate>Mon, 31 Aug 2026 23:30:04 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>अंडे फ्रीज कराने का सोच रही हैं? जानें यहां सही उम्र और जरूरी बातें</title>
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        <description><![CDATA[ आजकल कई महिलाएं एग फ्रीजिंग की बात कर रही हैं, खासकर उन महिलाओं के लिए जो किसी वजह से भविष्य में मां बनने की प्लानिंग बना रही हैं. इस प्रोसेस में ओवरी से अंडे लेकर उन्हें सुरक्षित तरीके से जमा दिए जाते हैं, ताकि बाद में जरूरत पड़ने पर उनका इस्तेमाल किया जा सके. हालांकि इसे भविष्य में मां बनने की पक्की गारंटी नहीं माना जा सकता है.
किस उम्र में अंडे फ्रीज बेहतर हो सकता है
अंडों की संख्या और क्वालिटी उम्र के साथ बदलती है. आमतौर पर कम उम्र में लिए गए अंडों में क्वालिटी बेहतर हो सकती है. 30 साल की उम्र के आसपास अंडे फ्रीज कराने पर क्वालिटी के तुलना में &amp;nbsp;बेहतर हो सकती है, जबकि 35 के बाद फैसला व्यक्ति की हालत पर ज्यादा निर्भर करता है. 40 की उम्र में भी प्रोसेस मुमकिन हो सकती है, लेकिन जरूरत के मुताबिक अच्छे अंडे मिलने की चांस कम हो सकती है. अंडे फ्रीज कराना भविष्य में बच्चे की पक्की गारंटी नहीं देता. अंडे फ्रीज कराने की उम्र का असर उनकी क्वालिटी पर पड़ सकता है. कितने परिपक्व अंडे जमा किए गए हैं, यह भी अहम होता है. फैसला करने से पहले आईवीएफ और एग फ्रीजिंग एक्सपर्ट से सलाह लेना जरूरी है.
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क्या बरतनी पड़ती है सावधानी?
अंडे फ्रीज करने की प्रोसेस के दौरान दवाओं के जरिए ओवरी में कई अंडों को डिवेलप किया जाता है. इस दौरान ओवरी कुछ समय के लिए बड़े और नाजुक हो सकते हैं. इसलिए बहुत तेज दौड़ना, कूदना, भारी वजन उठाना या शरीर को अचानक मोड़ने वाले एक्सर्साइज से कुछ समय के लिए दूर रहने की सलाह दी जाती है. हल्की सैर और आसान शारीरिक एक्सर्साइज कई मामलों में की जा &amp;nbsp;सकती हैं, लेकिन यह हर महिला की हालत पर निर्भर करता है. अंडों को निकालने की प्रोसेस के आसपास शरीर को आराम और संभलकर रखने की जरूरत होती &amp;nbsp;है. इसके बाद एक्सकएरसीजे कब शुरू करना है, इसका फैसला डॉक्टर की सलाह से करना बेहतर होता है.
पहले इन बातों को समझना जरूरी है
अंडे जमा कर देने का मतलब यह नहीं है कि भविष्य में प्रेग्नन्सी होना जरूरी है. जमा किए गए हर अंडे का बाद में कामयाबी से इस्तेमाल होना, यह जरूरी नहीं. अंडे की उम्र, संख्या और बाद की प्रोसेस के साथ कई बातें नतीजे पर असर दिखा सकती हैं. इसलिए अंडे फ्रीज कराना उम्र के खिलाफ नहीं, बल्कि भविष्य की प्लैनिंग से जुड़ा फैसला है. अगर कोई महिला इस विकल्प पर सोच रही है तो अपनी उम्र, भविष्य की प्लानिंग और रीप्रोडक्शन से जुड़ी कन्डिशन को समझकर आईवीएफ और एग फ्रीजिंग एक्सपर्ट से सलाह लेना सबसे बेहतर हो सकता है.
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें
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        <pubDate>Mon, 31 Aug 2026 07:30:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>कितनी होती है ब्लड की एक्सपायरी डेट? जान लें सच्चाई</title>
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        <description><![CDATA[ &amp;nbsp;blood expiry date: अक्सर लोगों को यह जानकारी नहीं होती कि डोनेट किया गया ब्लड हमेशा के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, बल्कि इसकी भी एक तय एक्सपायरी डेट होती है. ब्लड बैंकों में खून को खास तापमान पर सुरक्षित रखा जाता है, ताकि उसकी गुणवत्ता बनी रहे. लेकिन एक तय समय के बाद उसमें मौजूद जरूरी तत्व कमजोर पड़ने लगते हैं, इसलिए एक्सपायरी डेट का ध्यान रखना जरूरी होता है, ताकि मरीज को सुरक्षित और असरदार खून मिल सके.
ब्लड के अलग-अलग हिस्सों की अलग होती है एक्सपायरी
पूरा खून यानी होल ब्लड आमतौर पर 21 से 35 दिनों तक इस्तेमाल के लायक माना जाता है, यह समय-सीमा उसमें मिलाए गए प्रिजर्वेटिव पर निर्भर करती है. रेड ब्लड सेल्स को अलग करके सही तापमान पर रखा जाए, तो इसे लगभग 42 दिनों तक इस्तेमाल किया जा सकता है. वहीं प्लेटलेट्स सबसे जल्दी खराब होने वाला हिस्सा माने जाते हैं, इन्हें सिर्फ 5 से 7 दिनों के भीतर ही इस्तेमाल करना होता है, इसलिए इनकी मांग भी अक्सर ज्यादा रहती है. प्लाज्मा को अगर फ्रीज करके रखा जाए, तो इसकी एक्सपायरी लगभग एक साल तक बढ़ जाती है, यही वजह है कि इसे लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है.
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एक्सपायरी के बाद क्यों नहीं होता ब्लड इस्तेमाल
एक्सपायरी डेट के बाद खून में मौजूद ऑक्सीजन ले जाने वाली क्षमता कमजोर पड़ने लगती है, जिससे मरीज को उतना फायदा नहीं मिल पाता. इसके अलावा एक्सपायर हो चुके ब्लड में बैक्टीरिया बढ़ने का खतरा भी बढ़ जाता है, जो मरीज की सेहत के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है. कई बार पुराने खून में मौजूद पोटैशियम की मात्रा भी बढ़ जाती है, जो शरीर पर उल्टा असर डाल सकती है. यही वजह है कि ब्लड बैंक हर यूनिट पर उसकी तारीख और एक्सपायरी डेट साफ तौर पर दर्ज करते हैं. मरीज को चढ़ाने से पहले डॉक्टर और स्टाफ इस जानकारी की बारीकी से जांच करते हैं, ताकि किसी भी तरह की लापरवाही से बचा जा सके.
सही तापमान पर स्टोरेज है सबसे जरूरी बात
ब्लड की गुणवत्ता बनाए रखने में तापमान की भूमिका सबसे अहम होती है, इसलिए इसे हमेशा तय रेफ्रिजरेशन में ही रखा जाता है. होल ब्लड और रेड ब्लड सेल्स को 2 से 6 डिग्री सेल्सियस के बीच रखा जाता है, जबकि प्लाज्मा को माइनस तापमान पर फ्रीज करके सुरक्षित रखा जाता है. प्लेटलेट्स को हल्के हिलते हुए तापमान नियंत्रित मशीन में रखा जाता है, ताकि उनकी गुणवत्ता ज्यादा दिनों तक बनी रहे. तापमान में जरा सी भी गड़बड़ी होने पर ब्लड की क्वालिटी पर असर पड़ने लगता है, इसलिए ब्लड बैंकों में इसकी नियमित निगरानी की जाती है. आम लोगों को भी यह समझना जरूरी होता है कि ब्लड डोनेशन एक जिम्मेदारी भरा काम है, इसलिए इससे जुड़ी सही जानकारी रखना हर किसी के लिए फायदेमंद साबित होता है.
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        <pubDate>Mon, 31 Aug 2026 07:30:03 +0530</pubDate>
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        <title>How To Prevent Chafing: जांघे छिलने से हैं परेशान? इन तरीकों से जिंदगी भर के लिए मिल जाएगा आराम</title>
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        <description><![CDATA[ How To Prevent Thigh Chafing In Summer: गर्मियों या उमस भरे मौसम में कई लोगों को जांघों के बीच त्वचा छिलने की परेशानी होने लगती है. चलने, दौड़ने या ज्यादा देर तक एक्टिव रहने पर यह समस्या और बढ़ सकती है. कई बार कपड़ों की रगड़, पसीना और त्वचा के आपस में घर्षण की वजह से जांघों के बीच लालिमा, जलन और खुजली होने लगती है. अगर समय रहते इसका ध्यान न रखा जाए तो त्वचा पर छोटे-छोटे दाने, छाले या घाव भी हो सकते हैं.
इस समस्या को मेडिकल भाषा में चफिंग कहा जाता है. यह सिर्फ जांघों तक सीमित नहीं है. बगल, कमर, नितंब, छाती और पैरों में भी त्वचा के रगड़ खाने से चफिंग हो सकती है. हालांकि, सही देखभाल और कुछ आसान सावधानियों की मदद से इससे बचा जा सकता है और बार-बार होने वाली परेशानी को काफी हद तक रोका जा सकता है.
आखिर जांघों की त्वचा क्यों छिलती है?
हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली संस्था clevelandclinic के अनुसार, जांघों के छिलने की सबसे बड़ी वजह त्वचा का लगातार आपस में रगड़ना है. जब चलने या किसी दूसरी एक्टिविटी के दौरान दोनों जांघों की त्वचा बार-बार एक-दूसरे से टकराती है तो वहां घर्षण बढ़ जाता है. कपड़ों की रगड़ भी इस समस्या को बढ़ा सकती है. पसीना और नमी इस परेशानी को और गंभीर बना देते हैं. नम त्वचा ज्यादा आसानी से क्षतिग्रस्त होती है और लगातार रगड़ लगने पर जलन और लालिमा बढ़ सकती है. यही वजह है कि गर्म और उमस वाले मौसम में जांघों के छिलने की शिकायत ज्यादा देखने को मिलती है.
जो लोग ज्यादा एक्सरसाइज करते हैं, लंबे समय तक चलते हैं या ऐसी गतिविधियां करते हैं जिनमें लगातार शरीर की मूवमेंट होती है, उनमें भी चफिंग का खतरा बढ़ सकता है. बहुत टाइट कपड़े या ऐसे कपड़े जिनमें नमी ज्यादा देर तक बनी रहती है, वे भी परेशानी की वजह बन सकते हैं.

जांघें छिलने पर कैसे पहचानें समस्या?
शुरुआत में प्रभावित जगह पर लालिमा और हल्की जलन महसूस हो सकती है. इसके साथ त्वचा में खुजली, रूखापन या छूने पर गर्माहट महसूस हो सकती है. कई लोगों को चलने या कपड़ा लगने पर चुभन और दर्द भी होता है. अगर रगड़ ज्यादा बढ़ जाए तो त्वचा पर छोटे-छोटे उभरे हुए दाने, छाले या घाव हो सकते हैं. गंभीर स्थिति में त्वचा फट सकती है और खून भी आ सकता है. इसलिए लगातार होने वाली जलन को सिर्फ सामान्य परेशानी समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.
सबसे पहले रगड़ को रोकना जरूरी
अगर जांघों की त्वचा छिल गई है तो सबसे पहले उस गतिविधि से कुछ समय के लिए ब्रेक लें, जिसकी वजह से रगड़ हो रही है. त्वचा को ठीक होने का समय देना जरूरी है. इस दौरान साफ और आरामदायक कपड़े पहनें, जो त्वचा से ज्यादा न रगड़ें. बहुत टाइट कपड़ों से बचना भी फायदेमंद हो सकता है. ऐसे कपड़े चुनें जो शरीर के लिए आरामदायक हों और पसीने को त्वचा पर लंबे समय तक जमा न रहने दें.

नमी को कंट्रोल करें
जांघों के बीच पसीना और नमी चफिंग को बढ़ा सकते हैं. इसलिए इस हिस्से को साफ और सूखा रखना जरूरी है. नमी सोखने वाले फैब्रिक के कपड़े पहने जा सकते हैं. जरूरत पड़ने पर कॉर्नस्टार्च का इस्तेमाल अतिरिक्त नमी सोखने के लिए किया जा सकता है. हालांकि, अगर त्वचा पहले से फट गई है या घाव बन गया है तो किसी भी घरेलू चीज को लगाने से पहले डॉक्टर की सलाह लेना बेहतर है.
त्वचा को दें राहत
प्रभावित हिस्से को हल्के साबुन और पानी से साफ करें और धीरे से सुखाएं. इसके बाद एलोवेरा जेल या पेट्रोलियम जेली की बहुत पतली परत लगाई जा सकती है. ये त्वचा को शांत करने और आगे होने वाली रगड़ को कम करने में मदद कर सकते हैं. पेट्रोलियम जेली जैसी चीजें त्वचा और कपड़े के बीच घर्षण कम करने में भी मदद कर सकती हैं. लेकिन अगर दर्द, सूजन या घाव बढ़ रहा हो तो खुद से इलाज करते रहने के बजाय डॉक्टर से संपर्क करें.
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दोबारा जांघें न छिलें, इसके लिए क्या करें?
बार-बार चफिंग से बचने के लिए सबसे जरूरी है कि कपड़े सही फिटिंग के हों. बहुत टाइट कपड़े जांघों में रगड़ बढ़ा सकते हैं. कपड़े के फैब्रिक का चुनाव भी महत्वपूर्ण है. नमी सोखने वाले फैब्रिक बेहतर हो सकते हैं, जबकि कॉटन पसीना सोखने के बाद देर तक गीला रह सकता है. अगर आप रनिंग, साइकिलिंग या कोई दूसरी एक्सरसाइज करते हैं तो एक्टिविटी शुरू करने से पहले एंटी-चफिंग प्रोडक्ट का इस्तेमाल किया जा सकता है. जरूरत के मुताबिक पैडिंग या टेप भी रगड़ वाली जगह पर सुरक्षा दे सकता है.
कब डॉक्टर को दिखाना चाहिए?
हल्की चफिंग आमतौर पर कुछ दिनों में ठीक हो जाती है. लेकिन अगर समस्या लगातार बनी रहे, लक्षण बढ़ते जाएं या त्वचा पर छाले, घाव, ज्यादा सूजन या खून आने लगे तो डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए. लगातार नमी और त्वचा के खराब होने से बैक्टीरियल या फंगल इंफेक्शन का खतरा भी बढ़ सकता है. जांघों के बीच होने वाली हर जलन चफिंग ही हो, यह जरूरी नहीं है. उदाहरण के लिए जॉक इच एक फंगल इंफेक्शन है, जबकि चफिंग मुख्य रूप से रगड़ की वजह से होती है.
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        <pubDate>Sun, 30 Aug 2026 18:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>हमेशा अकेले खाना खाते हैं? जानें कैसे मेंटल हेल्थ बिगाड़ती है ये आदत</title>
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        <description><![CDATA[ आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में बहुत से लोग अकेले खाना खाते हैं. ऑफिस में लंच ब्रेक हो या घर पर डिनर टाइम, कई लोग फोन या लैपटॉप के सामने अकेले बैठकर खाना खा लेते हैं. शुरुआत में यह आदत बहुत मामूली लगती है, लेकिन एक्सपर्ट्स का कहना है कि लगातार अकेले खाना खाने की आदत मेंटल हेल्थ पर गहरा असर डाल सकती है.
क्यों बढ़ रही है अकेले खाना खाने की आदत
वर्क फ्रॉम होम, बिजी शेड्यूल और सोशल मीडिया पर बढ़ता समय आजकल लोगों को परिवार और दोस्तों के साथ बैठकर खाना खाने से दूर कर रहा है. कई लोग जल्दी में खाना निपटा लेते हैं, तो कुछ लोग अकेले रहने की वजह से भी अकेले खाना खाते हैं. यह आदत धीरे-धीरे इतनी सामान्य हो गई है कि लोग इसके असर को नोटिस भी नहीं कर पाते.
अकेले खाना खाने से मेंटल हेल्थ पर क्या असर पड़ता है?
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, साथ बैठकर खाना खाना सिर्फ पेट भरने का काम नहीं करता, बल्कि यह इमोशनल कनेक्शन भी बनाता है. जब हम परिवार या दोस्तों के साथ खाना खाते हैं तो बातचीत होती है, हंसी-मजाक होता है और दिन भर का स्ट्रेस हल्का हो जाता है. हालांकि, अकेले खाना खाने पर यह मौका नहीं मिलता, जिससे धीरे-धीरे अकेलापन महसूस होने लगता है.
लगातार अकेले खाना खाने से इंसान खुद को दूसरों से कटा हुआ महसूस कर सकता है. इससे स्ट्रेस और एंग्जायटी बढ़ने का खतरा रहता है. कुछ स्टडीज में यह भी सामने आया है कि जो लोग अक्सर अकेले खाना खाते हैं, उनमें उदासी और लो मूड की शिकायत ज्यादा देखी जाती है. साथ ही, अकेले खाना खाते समय फोन या टीवी देखने की आदत से माइंडफुल ईटिंग यानी ध्यान से खाना खाने की आदत भी छूट जाती है, जिससे ओवरईटिंग या गलत खानपान की समस्या भी हो सकती है.
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इस आदत को कैसे बदलें?
एक्सपर्ट्स सलाह देते हैं कि हफ्ते में कम से कम कुछ दिन परिवार या दोस्तों के साथ बैठकर खाना खाने की कोशिश करनी चाहिए. ऑफिस में साथ काम करने वाले साथियों के साथ लंच करना भी एक अच्छा विकल्प है. खाना खाते समय फोन या लैपटॉप से दूरी बनाना भी जरूरी है, ताकि खाने पर पूरा ध्यान दिया जा सके. अगर अकेले खाना खाना मजबूरी है, तो भी परिवार या दोस्तों से वीडियो कॉल पर बात करते हुए खाना खाया जा सकता है, ताकि जुड़ाव महसूस हो. छोटी-छोटी आदतों में बदलाव लाकर अकेले खाना खाने की वजह से होने वाले मेंटल हेल्थ के नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है.
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        <pubDate>Sun, 30 Aug 2026 18:30:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>स्क्रीनशॉट लेने की आदत से घट रही है आपकी याददाश्त, नई रिसर्च में खुलासा</title>
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        <description><![CDATA[ आजकल हम कोई भी जरूरी जानकारी, तस्वीर या मैसेज देखते ही तुरंत उसका स्क्रीनशॉट ले लेते हैं. हमें लगता है कि स्क्रीनशॉट लेने से वह जानकारी हमेशा के लिए हमारे पास सुरक्षित रहेगी और हमें याद भी रहेगी. लेकिन एक नई रिसर्च में इसके बिल्कुल उलट बात सामने आई है. शोध के मुताबिक, बार-बार स्क्रीनशॉट लेने की आदत असल में हमारी याददाश्त को कमजोर बना रही है.
अमेरिका की यूनिवर्सिटी में हुआ शोध
यह रिसर्च अमेरिका की बिंघैमटन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने की है. रिसर्चर्स ने पाया कि फोटो या स्क्रीनशॉट लेने की आदत याददाश्त को बेहतर बनाने के बजाय उसे कमजोर करती है. रिसर्चर्स ने इस स्थिति को एक खास नाम दिया है, जिसे फोटो-टेकिंग इम्पेयरमेंट इफेक्ट कहा गया है. आसान भाषा में समझें तो जो व्यक्ति किसी चीज की फोटो खींचता है, उसे उस चीज के बारे में उतना याद नहीं रहता, जितना उस व्यक्ति को याद रहता है जो सिर्फ ध्यान से उसे देखता है और आगे बढ़ जाता है.
कैसे किया गया यह प्रयोग?
इस शोध के लिए छात्रों को कुछ तस्वीरें दिखाई गईं, जिनमें पेंटिंग और स्केच शामिल थीं. कुछ कलाकृतियों का छात्रों को स्क्रीनशॉट लेने के लिए कहा गया, जबकि बाकी को सिर्फ ध्यान से देखने के लिए कहा गया. इसके बाद सभी छात्रों से उन कलाकृतियों से जुड़े बारीक सवाल पूछे गए. नतीजों में सामने आया कि जिन तस्वीरों का छात्रों ने स्क्रीनशॉट लिया था, उनके बारे में उन्हें कम याद रहा. वहीं जिन तस्वीरों को उन्होंने बिना फोटो लिए सिर्फ देखा था, उनका विवरण उन्हें ज्यादा सटीक तरीके से याद रहा.
चौकानें वाली बात आई सामने
इस शोध की सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि कई छात्र यह तक भूल गए कि उन्होंने किस तस्वीर का स्क्रीनशॉट लिया था. जबकि उन्हें यह अच्छी तरह याद था कि उन्होंने किस तस्वीर की फोटो नहीं ली थी. इससे साफ पता चलता है कि स्क्रीनशॉट लेने के बाद दिमाग उस जानकारी को याद रखने की कोशिश ही बंद कर देता है.
क्यों खतरनाक है यह आदत?
शोधकर्ताओं के मुताबिक इसके पीछे कुछ खास वजहें हैं. सबसे पहली वजह है ध्यान का बंट जाना. जब हम फोटो या स्क्रीनशॉट लेते हैं, तो हमारा ध्यान बटन दबाने और स्क्रीन सेट करने में चला जाता है, जबकि यही एनर्जी याददाश्त बनाने में लगनी चाहिए थी. दूसरी वजह है कॉग्निटिव ऑफलोडिंग, यानी जब दिमाग को यह भरोसा हो जाता है कि जानकारी फोन में सुरक्षित है, तो वह उसे याद रखने की कोशिश करना बंद कर देता है. यही कारण है कि लोग फोन नंबर याद नहीं रखते, क्योंकि वे फोन में सेव रहते हैं.
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स्क्रीनशॉट की जगह डायरी में लिखने की सलाह
वैज्ञानिकों का सुझाव है कि अगर किसी जरूरी बात को लंबे समय तक याद रखना है, तो मोबाइल में स्क्रीनशॉट लेने के बजाय उसे डायरी या कागज पर लिख लेना चाहिए. लिखते समय दिमाग उस जानकारी को ध्यान से समझता और प्रोसेस करता है, जबकि स्क्रीनशॉट लेते वक्त दिमाग का यह काम पूरी तरह छूट जाता है, जिससे हम आसानी से वह बात भूल जाते हैं. रिसर्च में यह भी सामने आया कि करीब 90 फीसदी अमेरिकी लोग अपने फोन का इस्तेमाल करते हैं और एक व्यक्ति रोजाना करीब 20 तस्वीरें लेता है, जबकि उसके फोन में करीब दो हजार फोटो पहले से स्टोर रहती हैं.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Sat, 29 Aug 2026 14:30:03 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>बुखार में गिर सकता है बच्चों का BP, जानें फौरन बचाव के जरूरी तरीके</title>
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        <description><![CDATA[ बदलते मौसम में बच्चों को बुखार आना एक आम बात है, लेकिन कई बार तेज बुखार के साथ बच्चों का ब्लड प्रेशर यानी BP भी गिरने लगता है, जो माता-पिता के लिए चिंता की बात बन जाती है. असल में तेज बुखार आने पर शरीर से पसीने के जरिए काफी पानी निकल जाता है, जिससे शरीर में पानी की कमी यानी डिहाइड्रेशन हो जाती है. यही डिहाइड्रेशन बच्चों में BP गिरने की सबसे बड़ी वजह मानी जाती है. इसके अलावा अगर बुखार किसी गंभीर इंफेक्शन की वजह से आया हो, तो भी शरीर में BP कम होने की समस्या देखने को मिल सकती है. ऐसे में कई लोगों को समझ नहीं आता है कि क्या करें. आइए जानते हैं इसके बारे में पूरी जानकारी.
किन लक्षणों से पहचानें कि BP गिर रहा?
बच्चों में BP गिरने के कुछ खास लक्षण होते हैं, जिन्हें पहचानना माता-पिता के लिए जरूरी है. अगर बच्चा सुस्त पड़ने लगे, बार-बार नींद में जाने लगे या ठीक से जवाब न दे पाए, तो यह BP गिरने का संकेत हो सकता है. इसके अलावा बच्चे के हाथ-पैर ठंडे पड़ जाना, त्वचा का रंग पीला पड़ जाना, सांस तेज या अनियमित होना और चक्कर आने जैसी शिकायत भी इसके लक्षणों में शामिल हैं.
कुछ मामलों में बच्चे को उल्टी या दस्त भी हो सकते हैं, जिससे शरीर में पानी की कमी और बढ़ जाती है और पेशाब भी कम आने लगता है. अगर बच्चा बहुत ज्यादा कमजोरी महसूस कर रहा हो या रोते-रोते अचानक शांत होकर सुस्त पड़ जाए, तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए, क्योंकि यह गंभीर स्थिति का संकेत हो सकता है.
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बचाव के लिए तुरंत करें ये जरूरी काम
अगर बुखार के साथ बच्चे का BP गिरने लगे, तो सबसे पहले घबराने की बजाय शांत रहकर सही कदम उठाना जरूरी है. बच्चे को लिटा दें और उसके पैरों को थोड़ा ऊपर उठाकर रखें, इससे दिमाग तक खून का बहाव बेहतर होता है. इसके साथ ही बच्चे को थोड़ी-थोड़ी देर में ORS का घोल, पानी, नारियल पानी या नमक-चीनी का घोल पिलाते रहें, ताकि शरीर में पानी की कमी पूरी हो सके.
बुखार कम करने के लिए बच्चे के माथे और शरीर पर हल्के गुनगुने या सामान्य पानी से भीगा कपड़ा रखें, लेकिन बहुत ठंडे पानी का इस्तेमाल न करें. बच्चे को तंग कपड़ों से आजादी दें और उसे खुली व हवादार जगह पर रखें. इन सबके साथ ही सबसे जरूरी बात यह है कि अगर बच्चा सुस्त पड़ रहा हो, बेहोशी जैसी हालत में जा रहा हो, हाथ-पैर ठंडे पड़ रहे हों या सांस तेज हो रही हो, तो देर न करते हुए तुरंत डॉक्टर के पास ले जाएं.
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        <pubDate>Fri, 28 Aug 2026 22:30:06 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>PCSK9 कोलेस्ट्रॉल की आम दवाओं से कैसे अलग, जानें किस तरह करती है काम?</title>
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        <description><![CDATA[ शरीर में बढ़ते खराब कोलेस्ट्रॉल (LDL) को नियंत्रित करना दिल की सेहत के लिए सबसे जरूरी माना जाता है. लंबे समय से इसके लिए स्टैटिन दवाओं का इस्तेमाल किया जा रहा है, लेकिन कई मरीजों में ये दवाएं पूरी तरह कारगर नहीं होतीं. इसी बीच मेडिकल साइंस के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक सफलता मिली है. अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) ने जुलाई 2026 में Merck कंपनी की बनाई दुनिया की पहली ओरल PCSK9 इनहिबिटर दवा लिपफेंड्रा जेनेरिक नाम- Enlicitide को मंजूरी दे दी है. यह दवा रोजाना एक गोली के रूप में ली जाती है और कोलेस्ट्रॉल घटाने के पारंपरिक तरीकों से बिल्कुल अलग है. चलिए जानें.
पारंपरिक स्टैटिन दवाओं से कितनी अलग है यह तकनीक?
कोलेस्ट्रॉल को कम करने के लिए अब तक दी जाने वाली पारंपरिक दवाएं या स्टैटिन मुख्य रूप से लिवर में कोलेस्ट्रॉल बनने की प्रक्रिया को ही धीमा कर देती हैं. इनसे खराब कोलेस्ट्रॉल में करीब 20 से 50 प्रतिशत तक की कमी आती है. हालांकि, कई मरीजों में इससे मांसपेशियों में गंभीर दर्द या लिवर एंजाइम बढ़ने जैसी समस्याएं होने लगती हैं. दूसरी ओर, नई ओरल PCSK9 इनहिबिटर दवा लिवर में कोलेस्ट्रॉल का निर्माण रोकने के बजाय, खून में मौजूद पहले से बह रहे खराब कोलेस्ट्रॉल को बाहर निकालने की क्षमता बढ़ा देती है. इससे एलडीएल स्तर में 50 से 60 प्रतिशत तक की भारी गिरावट आती है.
इंजेक्शन के झंझट से मिली मुक्ति
PCSK9 इनहिबिटर तकनीक पहले से मौजूद थी, लेकिन मरीज केवल सुई या इंजेक्शन पर ही निर्भर थे. पुराने PCSK9 इनहिबिटर को हर दो से चार हफ्ते में चमड़ी के नीचे इंजेक्शन के जरिए शरीर में पहुंचाना पड़ता था. इससे कई बार मरीज को इंजेक्शन लगने वाली जगह पर सूजन, लालिमा या दर्द की शिकायत होती थी. मर्क की लिपफेंड्रा टैबलेट के आने से अब मरीजों को बार-बार अस्पताल जाने या सुई चुभाने के डर से आजादी मिल गई है. यह रोजाना खाई जाने वाली एक साधारण गोली है, जिसके साइड इफेक्ट्स भी बहुत कम हैं, जैसे हल्का चक्कर आना या पेट खराब होना.
शरीर में कैसे काम करती है यह दवा?
मानव शरीर में लिवर की सतह पर छोटे-छोटे रिसेप्टर्स यानी जालीदार सेंसर्स होते हैं. इनका मुख्य काम खून में बह रहे हानिकारक एलडीएल कोलेस्ट्रॉल को पकड़कर लिवर के अंदर ले जाना और उसे नष्ट करना है. लेकिन हमारे शरीर में PCSK9 नाम का एक प्राकृतिक प्रोटीन मौजूद होता है, जो इन मददगार सेंसर्स को समय से पहले ही खत्म कर देता है. जब ये सेंसर्स कम हो जाते हैं, तो खून में बैड कोलेस्ट्रॉल की मात्रा बढ़ने लगती है. जब मरीज लिपफेंड्रा गोली खाता है, तो यह आंतों के जरिए अवशोषित होकर सीधे PCSK9 प्रोटीन को निष्क्रिय कर देती है.
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कोलेस्ट्रॉल की तेजी से सफाई और बेहतर नतीजे
जैसे ही PCSK9 प्रोटीन ब्लॉक होता है, लिवर की सतह पर मौजूद रिसेप्टर्स पूरी तरह सुरक्षित हो जाते हैं और उनकी संख्या तेजी से बढ़ने लगती है. ये मजबूत रिसेप्टर्स खून में फैले खराब कोलेस्ट्रॉल को स्पंज की तरह तेजी से सोख लेते हैं. इसके बाद सारा खराब कोलेस्ट्रॉल लिवर में जाकर पच जाता है, जिससे रक्त वाहिकाओं में ब्लॉकेज बनने का खतरा काफी हद तक टल जाता है. यह पूरा सिस्टम शरीर की प्राकृतिक सफाई प्रक्रिया को कई गुना मजबूत बना देता है, जिससे कोलेस्ट्रॉल का स्तर बहुत तेजी से गिरता है.
किन मरीजों के लिए वरदान है दवा?
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यह नई ओरल दवा दो विशेष प्रकार के मरीजों के लिए गेम-चेंजर साबित होगी. पहले वे मरीज जो स्टैटिन इनटोलरेंट हैं, यानी जिन्हें पारंपरिक गोलियां खाने से मांसपेशियों में असहनीय दर्द होता है. दूसरे वे हाई-रिस्क मरीज, जिन्हें पहले कभी दिल का दौरा पड़ चुका है या जो अनुवांशिक बीमारी (HeFH) के कारण जन्मजात हाई कोलेस्ट्रॉल से जूझ रहे हैं. ऐसे मरीज जब स्टैटिन की सबसे तेज खुराक लेते हैं, तब भी उनका कोलेस्ट्रॉल सुरक्षित स्तर पर नहीं आता है. उनके लिए लिपफेंड्रा एक बेहद सुरक्षित और असरदार विकल्प बनकर उभरी है.
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        <pubDate>Fri, 28 Aug 2026 22:30:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Shingles Vaccine से हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा भी कम, स्टडी में बड़ा दावा</title>
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        <description><![CDATA[ Shingles Vaccine Lowers Heart Disease Risk: दाद से बचाने वाली वैक्सीन को लेकर एक नई स्टडी में चौंकाने वाली बात सामने आई है. रिसर्चर के मुताबिक, शिंगल्स की दो अलग-अलग वैक्सीन की तुलना करने पर नई वैक्सीन लेने वाले लोगों में दिल से जुड़ी बीमारियों का खतरा कम पाया गया. इस ग्रुप में दिल की बीमारी, हार्ट फेल्योर और दिल की धड़कन के अनियमित होने जैसी समस्याएं कम देखी गईं. पुरुषों में इस वैक्सीन के बाद इस्केमिक स्ट्रोक का खतरा भी करीब 12 प्रतिशत कम पाया गया.
यह स्टडी मशहूर मेडिकल जर्नल नेचर मेडिसिन में प्रकाशित हुई है. शोधकर्ताओं ने अमेरिका के लोगों के बड़े स्वास्थ्य रिकॉर्ड का डेटा खंगाला. इसमें 60 साल या उससे ज्यादा उम्र के लोगों को शामिल किया गया था. रिसर्चर ने उन लोगों की तुलना की, जिन्हें पहले वाली शिंगल्स वैक्सीन लगी थी और उन लोगों की, जिन्हें बाद में इस्तेमाल में आई नई वैक्सीन दी गई थी.
सात साल तक लोगों पर रखी गई नजर
इस स्टडी के लिए अमेरिका के करीब 60 हेल्थ सेंटर से डेटा लिया गया. इस नेटवर्क में 10 करोड़ से ज्यादा लोगों के हेल्थ रिकॉर्ड मौजूद थे. मुख्य स्टडी में 36,460-36,460 लोगों के दो ग्रुप बनाए गए. दोनों ग्रुप के लोगों की उम्र, बीमारियों, दवाओं और हेल्थ से जुड़ी दूसरी चीजों को ध्यान में रखकर उनकी तुलना की गई. इसके बाद करीब सात साल तक देखा गया कि उनमें दिल से जुड़ी बीमारियां कितनी सामने आईं. स्टडी के लिए वह समय चुना गया, जब अमेरिका में पुरानी शिंगल्स वैक्सीन की जगह नई वैक्सीन का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा था. पहले दौर में करीब 98.6 प्रतिशत लोगों को पुरानी वैक्सीन लगी थी. वहीं, एक साल बाद वाले दौर में करीब 93.5 प्रतिशत लोगों को नई वैक्सीन दी गई.
रिसर्चर ने पाया कि नई वैक्सीन वाले ग्रुप में सात साल के दौरान दिल और नसों से जुड़ी बीमारियों का कुल खतरा करीब 9 प्रतिशत कम था. हालांकि, समय के साथ यह अंतर धीरे-धीरे कम होता गया.

हार्ट फेल्योर और दिल की बीमारी में भी कमी
स्टडी में दिल की नसों से जुड़ी बीमारी के मामलों में करीब 10 प्रतिशत की कमी देखी गई. वहीं, हार्ट फेल्योर का खतरा करीब 12 प्रतिशत कम पाया गया. पुरुषों और महिलाओं दोनों में इसके नतीजे लगभग एक जैसे रहे. इसके अलावा, दिल की धड़कन के अनियमित होने की बीमारी यानी एट्रियल फिब्रिलेशन का खतरा भी नई वैक्सीन वाले ग्रुप में करीब 7 प्रतिशत कम पाया गया. हालांकि, हर तरह की दिल और नसों से जुड़ी बीमारी में कमी नहीं मिली. दिल की मांसपेशियों में सूजन, पैरों की नसों की बीमारी, दिमाग में खून बहने और कुछ समय के लिए स्ट्रोक जैसे मामलों में कोई खास अंतर नहीं मिला.

स्ट्रोक को लेकर क्या सामने आया?
इस्केमिक स्ट्रोक के मामलों में दोनों ग्रुप के बीच कुल मिलाकर कोई बड़ा अंतर नहीं मिला. लेकिन जब पुरुषों और महिलाओं के आंकड़ों को अलग-अलग देखा गया, तो पुरुषों में इस्केमिक स्ट्रोक का खतरा करीब 12 प्रतिशत कम पाया गया. इसका मतलब यह नहीं है कि शिंगल्स वैक्सीन सभी लोगों में स्ट्रोक का खतरा 12 प्रतिशत कम कर देती है. स्टडी में सिर्फ एक संभावित संबंध सामने आया है. इसे पक्का साबित करने के लिए अभी और रिसर्च की जरूरत है.
शोधकर्ताओं ने यह भी देखा कि कहीं दूसरे कारणों की वजह से तो नतीजे प्रभावित नहीं हुए. इसके लिए उन्होंने कोरोना महामारी के दौर को हटाकर भी डेटा की जांच की. इसके अलावा मौत के आंकड़ों को शामिल करके भी दोबारा एनालिसिस किया गया. इन सभी जांचों के बाद भी मुख्य नतीजों में ज्यादा बदलाव नहीं आया.
वैक्सीन का असर कैसे हो सकता है?
शोधकर्ताओं का मानना है कि इसके पीछे शरीर की इम्यूनिटी और नसों की अंदरूनी परत में होने वाले बदलाव की भूमिका हो सकती है. नई शिंगल्स वैक्सीन में इस्तेमाल होने वाला एक खास घटक शरीर की इम्यूनिटी को लंबे समय तक सक्रिय रख सकता है. इससे शरीर में सूजन पैदा करने वाली कुछ प्रक्रियाएं कम हो सकती हैं. शरीर में ज्यादा सूजन को दिल की बीमारियों के खतरे से जोड़ा जाता है. इसलिए माना जा रहा है कि वैक्सीन और दिल की बेहतर सेहत के बीच कोई संबंध हो सकता है.
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हालांकि, शरीर में होने वाले ये बदलाव हमेशा बने रहें, यह जरूरी नहीं है. यही वजह हो सकती है कि स्टडी के शुरुआती सालों में दिल की बीमारियों में कमी ज्यादा दिखाई दी, लेकिन बाद के सालों में इसका असर कम होता गया.
अभी शिंगल्स वैक्सीन को हार्ट अटैक की दवा न समझें
स्टडी के नतीजे दिल की सेहत को लेकर उम्मीद जरूर जगाते हैं, लेकिन शोधकर्ताओं ने साफ किया है कि इससे यह साबित नहीं होता कि शिंगल्स वैक्सीन सीधे तौर पर हार्ट अटैक या स्ट्रोक को रोकती है. यह एक ऐसी स्टडी है जिसमें पहले से मौजूद हेल्थ रिकॉर्ड के आधार पर लोगों की तुलना की गई है. इसमें कुछ ऐसे फैक्टर की पूरी जानकारी नहीं थी, जो दिल की बीमारी के खतरे को प्रभावित कर सकते हैं. इनमें धूम्रपान, खान-पान, शराब, पढ़ाई, नौकरी और कमाई जैसी चीजें शामिल हैं. इसलिए यह पूरी तरह नहीं कहा जा सकता कि नतीजे सिर्फ वैक्सीन की वजह से ही आए.
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        <pubDate>Fri, 28 Aug 2026 22:30:03 +0530</pubDate>
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        <title>3 गुनी ज्यादा शुगर वाली फेंटा कितनी खतरनाक, जानें हेल्थ को कितने गुना नुकसान?</title>
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        <description><![CDATA[ Fanta Drink: भारत में मिलने वाली Fanta और ब्रिटेन में बिकने वाली Fanta के पोषण लेबल को लेकर सोशल मीडिया पर चर्चा होती रहती है. दोनों देशों में एक ही ब्रांड का ड्रिंक होने के बावजूद इसकी रेसिपी और शुगर की मात्रा अलग हो सकती है. भारत की Fanta में प्रति 100 ml करीब 13.7 ग्राम शुगर है, जबकि UK की Fanta Orange में करीब 4.5 ग्राम शुगर है. यानी भारतीय वेरिएंट में शुगर करीब तीन गुना है.
भारत और यूके की Fanta में इतना बड़ा अंतर क्यों
भारत और यूके में बिकने वाली Fanta को सिर्फ एक ही फॉर्मूले का ड्रिंक मानना सही नहीं होगा. अलग-अलग देशों में कंपनियां स्थानीय बाजार, उपभोक्ताओ की पसंद, स्वाद, टैक्स, नियम और उपलब्ध सामग्री के हिसाब से उत्पाद की रेसिपी तय करती हैं. भारत की Fanta में 100 ml पर 13.7 ग्राम शुगर दर्ज है, जबकि UK Fanta Orange में 4.5 ग्राम शुगर और स्वीटनर्स का इस्तेमाल किया गया है. इसका मतलब यह नहीं है कि UK की Fanta पूरी तरह हेल्दी है. वहां भी यह एक मीठा कार्बोनेटेड ड्रिंक है. फर्क मुख्य रूप से इसमें मौजूद शुगर की मात्रा का है. उदाहरण के लिए, 500 ml भारतीय Fanta में लेबल के हिसाब से करीब 68.5 ग्राम शुगर हो सकती है, जबकि उतनी ही मात्रा की UK Fanta Orange में करीब 22.5 ग्राम शुगर होगी. इसलिए मात्रा के साथ लेबल पढना जरूरी है.
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बाजार की जरूरत और लोगों की पसंद से जुड़ा है फॉर्मूला
किसी भी पैकेज्ड ड्रिंक का फॉर्मूला केवल स्वाद के आधार पर तय नही होता. कंपनियों को अलग-अलग बाजारों में उपभोक्ताओं की पसंद, कीमत, रेगुलेशन और प्रतिस्पर्धा को ध्यान में रखना पड़ता है. भारत में मीठे और तेज स्वाद वाले सॉफ्ट ड्रिंक्स का बड़ा बाजार है, इसलिए स्वाद और उपभोक्ता मांग भी प्रोडक्ट की संरचना को प्रभावित कर सकती है.
हालांकि अब बाजार में कम और जीरो-शुगर विकल्पों की मांग भी बढ़ रही है. UK में Fanta Orange Zero जैसे विकल्प उपलब्ध हैं, जिनमें सामान्य Fanta की तुलना में शुगर काफी कम है. भारत में भी उपभोक्ताओ के बीच हेल्थ और न्यूट्रिशन को लेकर जागरूकता बढ़ने के साथ कम शुगर वाले विकल्पों की मांग महत्वपूर्ण होती जा रही है. यही वजह है कि किसी एक देश के प्रोडक्ट को दूसरे देश के प्रोडक्ट से तुलना करते समय सिर्फ कीमत या स्वाद नहीं, बल्कि न्यूट्रिशन लेबल और सर्विंग साइज को भी देखना चाहिए.
ज्यादा शुगर शरीर के लिए कितनी नुकसानदायक?
ज्यादा शुगर वाली ड्रिंक का नियमित और अधिक सेवन शरीर में अतिरिक्त कैलोरी पहुंचा सकता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक फ्री शुगर का सेवन कुल दैनिक ऊर्जा का 10% से कम रखना चाहिए और इसे 5% से नीचे लाने पर अतिरिक्त स्वास्थ्य लाभ मिल सकते हैं.
WHO के अनुसार ज्यादा फ्री शुगर का सेवन वजन बढ़ने, मोटापे और दांतों में कैविटी के बढ़ते जोखिम से जुड़ा है. ज्यादा मीठे पेय पदार्थों का लगातार सेवन इसलिए चिंता का विषय बन सकता है, खासकर तब जब व्यक्ति दिनभर में चाय, मिठाई, बिस्किट और दूसरे मीठे खाद्य पदार्थों से भी शुगर ले रहा हो.
यह कहना सही नहीं होगा कि भारतीय Fanta पीने से किसी व्यक्ति को &amp;ldquo;तीन गुना ज्यादा बीमारी&amp;rdquo; होगी. तीन गुना का अंतर यहां शुगर की मात्रा में है, बीमारी के जोखिम में नहीं. असली खतरा इस बात पर निर्भर करता है कि कितनी मात्रा में और कितनी बार ऐसी ड्रिंक पी जाती है. कभी-कभार सीमित मात्रा लेने की तुलना में रोजाना ज्यादा मात्रा में सेवन ज्यादा चिंता की बात है.
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        <pubDate>Thu, 27 Aug 2026 18:30:04 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>पैनक्रिएटिक कैंसर के मरीजों को राहत, इलाज के लिए नई दवा को मंजूरी</title>
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        <description><![CDATA[ पैनक्रिएटिक कैंसर यानी अग्राशय के कैंसर को दुनिया के सबसे जानलेवा कैंसर माना जाता है, क्योंकि यह शुरुआती स्टेज में पकड़ में ही नहीं आता है. हालांकि, अब मरीजों के लिए एक बड़ी राहत की खबर सामने आई है. अमेरिका की फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने एडवांस्ड पैनक्रिएटिक कैंसर के लिए एक क्रांतिकारी नई दवा का मंजूरी दे दी है, जिसे दशकों से डॉक्टर और वैज्ञानिक तलाश कर रहे थे. आइए जानते हैं यह दवा क्या है, कैसे काम करती है, और मरीजों के लिए यह कितनी असरदार साबित हुई है.
कौन सी दवा को मिली मंजूरी?
फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने &#039;डाराक्सोनरासिब&#039; वैक्सीन को मंजूरी दी है, जिसे रेवोल्यूशन मेडिसिन्स कंपनी रासोंक ब्रांड नाम से बेचेगी. यह अपनी तरह की पहली गोली है, जो एक म्यूटेटेड प्रोटीन को ब्लॉक करती है. यह 90 प्रतिशत से ज्यादा पैनक्रिएटिक कैंसर मामलों में ट्यूमर की ग्रोथ को बढ़ा देता है. फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने इसे तय वक्त से छह महीने पहले ही एक्सपेडाइटेड अप्रूवल दे दिया, जो इस दवा की अहमियत को दिखाता है.
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क्या टारगेट करती है यह दवा?
यह नई दवा आरएएसजीन फैमिली में होने वाले म्यूटेशन को निशाना बनाती है, जो सेल ग्रोथ को नियंत्रित करता है. इसमें केआरएएस म्यूटेशन को पैनक्रिएटिक कैंसर बढ़ाने का सबसे बड़ी वजह माना जाता है. लेकिन इस प्रोटीन की बनावट ऐसी है कि इससे जुड़ने वाली कोई दवा बनाना कई दशक तक नामुमकिन माना जाता था, यही वजह है कि इसे अनड्रगेबल कहा जाता था. रेवोल्यूशन मेडिसिन्स की यह दवा एक तरह के मॉलिक्यूलर ग्लू के जरिए कई केआरएएस&amp;nbsp;सबटाइप्स से जुड़ने में कामयाब रहती है.
मरीजें को क्यों है फायदेमंद?
इस स्टडी में 500 मरीज शामिल हुए थे, जिनका मेटास्टैटिक यानी फैल चुका कैंसर पहले के इलाज पर रिस्पॉन्स करना बंद कर चुका था. मरीजों को रैंडमली इस नई दवा या पुराने कीमोथेरेपी ट्रीटमेंट पर रखा गया है. नतीजों में पाया गया कि नई दवा लेने वाले मरीजों की जिंदा रहने का मौका लगभग दोगुनी हो सकती है. साथ ही उनमें खतरनाक साइड इफेक्ट भी कम देखे जा सकते हैं.
कितनी है दवा की कीमत
कंपनी के मुताबिक, इस दवा के एक महीने के कोर्स की कीमत करीब 39,800 डॉलर है, यानी भारतीय रुपयों में करीब 33 लाख रुपये के आसपास आता है. यह रोजाना ली जाने वाली गोली के रूप में आएगी. पैनक्रिएटिक कैंसर का इलाज करने वाले डॉक्टरों को उम्मीद है कि इस दवा की मंजूरी दूसरे कैंसर के लिए भी नए रास्ते खोल सकती है, क्योंकि इसी बुनियाद पर दर्जनों एक्सपेरिमेंटल दवाएं भी डेवलपमेंट स्टेज में हैं. कंपनी अब इसी टेक्नोलॉजी को फेफड़ों के कैंसर के साथ कई और तरह के कैंसर पर भी टेस्ट कर रही है.
अमेरिकन कैंसर सोसाइटी के मुताबिक अकेले अमेरिका में इस साल करीब 67,000 नए पैनक्रिएटिक कैंसर मामले सामने आए हैं, जबकि 52,000 से ज्यादा लोगों की इससे मौत होने का खतरा होता है. इस बीमारी की पांच साल की जिंदा रहने की दर सिर्फ 13 प्रतिशत है, जो इसे सबसे जानलेवा कैंसर में से एक बनाती है.
उम्मीद बढ़ा रहा है यह अप्रूवल
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        <pubDate>Thu, 27 Aug 2026 18:30:03 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>स्किन कैंसर से लड़ने वाली वैक्सीन तैयार, जानें कैसे करेगी काम?</title>
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        <description><![CDATA[ मेलानोमा स्किन कैंसर का एक खतरनाक किस्म है. अब इसके इलाज को लेकर मॉडर्न और मर्कक की एक पर्सनलाइज्ड एमआरएनए थेरेपी चर्चा में है. इसे कैंसर के इलाज में एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है. यह वैक्सीन मर्क और मॉडर्ना नाम की दो दवा कंपनियों ने तैयार की है. इसका नाम इंतिसमेरण औटोगेनए&amp;nbsp; (4157/V940) है. खास बात यह है कि इसे हर मरीज के लिए उसके ट्यूमर की जानकारी के मुताबिक पर तैयार किया जाता है. इसका मकसद शरीर की इम्यून सिस्टम को कैंसर की उन खास पहचान वाली चीजों को पहचानने में मदद करना है, जो उस मरीज के ट्यूमर में मौजूद हैं.&amp;nbsp;
&amp;nbsp;ट्यूमर के हिसाब से होगी थेरेपी
इसका तरीका सामान्य वैक्सीन से काफी अलग है. मरीज के ट्यूमर का सैंपल लेकर उसमें मौजूद बदलावों का पता लगाना है. इसके बाद ऐसे नेओंटीगेन्स चुने जाते हैं, जिन्हें इम्यून सिस्टम कैंसर सेल्स की पहचान के लिए इस्तेमाल कर सकता है. इसी जानकारी के मुताबिक पर्सनलाइज्ड एमआरएनए थेरेपी तैयार की जाती है. इसका मकसद शरीर की अपनी इम्यून सिस्टम को ट्रेन करना है, ताकि वह कैंसर से जुड़ी इन खास पहचान को समझ सके और ऐसी कोशिकाओं पर हमला करने में मदद कर सके. यह कोई ऐसी वैक्सीन नहीं है जिसे स्वस्थ लोगों को कैंसर से बचाने के लिए सामान्य टीके की तरह लगाया जाए.&amp;nbsp;
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मिला है बेहतर रिजल्ट
इस थेरेपी को मर्कककी&amp;nbsp; केतरुदा&amp;nbsp; पेम्बरोलीजुमब के साथ हाई रिस्क स्टेज III और IV मेलानोमा के मरीजों में जांचा हाय है, जिनका ट्यूमर सर्जरी से पूरी तरह निकाल दिया गया था. 2026 में जारी करीब 5 साल के फॉलो अप डेटा में V940 और केतरुदा&amp;nbsp; के कॉम्बिनेशन ने अकेले केतरुदा&amp;nbsp; की तुलना में कैंसर के दोबारा लौटने या मरीज की मौत के जोखिम को 49 फीसदी कम किया है . दूर तक कैंसर फैलने या मौत के जोखिम में 59 फीसदी कमी दर्ज हुई है.&amp;nbsp;
आम मरीजों के लिए मंजूरी नहीं मिली
यहां एक जरूरी बात समझना जरूरी है. V940 अभी इंवेस्टिगटीगेशनल थेरपी है. यानी इस पर क्लिनिकल ट्रायल चल रहा है और इसे हर मेलानोमा मरीज के लिए आम इलाज के तौर पर मंजूरी नहीं मिली है. फेज 3 का INTerpath 001 ट्रायल हाई रिस्क मेलानोमा में इसकी सुरक्षा और असर की जांच हो रहा है. इस स्टडी में करीब 1,089 मरीजों को शामिल करने का लक्ष्य है.&amp;nbsp;
कैंसर को कैसे पहचानेगा शरीर?
इस थेरेपी को लेकर सबसे खास बात इसका पर्सनलाइज्ड तरीका है. एक ही दवा हर मरीज के लिए बिल्कुल एक जैसी तैयार करने की जगह ट्यूमर में मिले खास बदलावों को देखकर इसका डिजाइन किया जाता है. यही वजह है कि इसे कैंसर के इलाज में एक नई दिशा के तौर पर देखा जा रहा है. हालांकि अभी इसे&amp;nbsp; मेलानोमा की पक्की वैक्सीन&amp;nbsp; कहना जल्दबाजी होगी. आगे के ट्रायल से ही पता चलेगा कि यह अलग अलग मरीजों में कितना असर और कितनी बेहतर साबित हा सकती है.
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        <pubDate>Thu, 27 Aug 2026 02:30:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>एक महीना न खाई जाए शक्कर तो शरीर में क्या होंगे बदलाव? जानें सबकुछ</title>
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        <description><![CDATA[ आजकल खाने-पीने की चीजों में शक्कर का इस्तेमाल काफी ज्यादा हो गया है. चाय, कॉफी, मिठाई, बिस्किट, केक और कई पैकेज्ड फूड में भी शक्कर होती है. ऐसे में अगर कोई व्यक्ति एक महीने तक शक्कर न खाने का फैसला करता है तो शरीर में क्या बदलाव हो सकते हैं, यह जानना भी जरूरी है. शुरुआत में मीठा खाने की इच्छा ज्यादा हो सकती है और कुछ लोगों को थोड़ी परेशानी महसूस हो सकती है. लेकिन समय के साथ मीठा खाने की आदत कम हो सकती है. आइए जानते हैं एक महीने तक शक्कर कम करने पर शरीर में क्या बदलाव देखने को मिल सकते हैं.
धीरे-धीरे कम हो सकती है मीठा खाने की इच्छा
अगर आप रोज चाय, मिठाई, चॉकलेट, बिस्किट या दूसरी चीजों के जरिए काफी शक्कर लेते हैं, तो अचानक इसे बंद करना थोड़ा मुश्किल लग सकता है. शुरुआत में बार-बार मीठा खाने का मन कर सकता है. लेकिन कुछ समय बाद शरीर को कम मीठे की आदत पड़ने लगती है. इसके बाद फल जैसी प्राकृतिक रूप से मीठी चीजें भी पहले से ज्यादा मीठी लग सकती हैं.
&amp;nbsp;वजन कम करने में मिल सकती है मदद
ज्यादा शक्कर वाली चीजों में कैलोरी काफी होती है. खासकर कोल्ड ड्रिंक, मिठाई, केक और मीठे पैकेज्ड फूड को कम करने से रोजाना ली जाने वाली कैलोरी कम हो सकती है. अगर आप एक महीने तक इन चीजों से दूरी रखते हैं और बाकी खाना भी संतुलित रखते हैं, तो वजन कम होने में मदद मिल सकती है. हालांकि सिर्फ शक्कर छोड़ने से हर व्यक्ति का वजन कम हो, यह जरूरी नहीं है.
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&amp;nbsp;दिनभर की एनर्जी में बदलाव महसूस हो सकता है
बहुत ज्यादा मीठा खाने के बाद कुछ समय के लिए शरीर में एनर्जी महसूस हो सकती है, लेकिन बाद में थकान भी लग सकती है. अगर आप ज्यादा शक्कर वाली चीजें कम कर देते हैं तो खाने का तरीका थोड़ा बेहतर हो सकता है. इससे दिनभर एनर्जी में होने वाले उतार-चढ़ाव कम महसूस हो सकते हैं. इसके लिए सही मात्रा में खाना और पर्याप्त पानी पीना भी जरूरी है.
दांतों के लिए फायदेमंद हो सकता है
ज्यादा शक्कर खाने से दांतों में कैविटी होने का खतरा बढ़ सकता है. मुंह में मौजूद बैक्टीरिया शक्कर का इस्तेमाल करते हैं, जिससे ऐसा एसिड बन सकता है जो दांतों को नुकसान पहुंचाता है. इसलिए एक महीने तक मिठाई, मीठे ड्रिंक और दूसरी ज्यादा शक्कर वाली चीजें कम करने से दांतों की सेहत को फायदा मिल सकता है. साथ ही रोज ब्रश करना और मुंह की सफाई रखना भी जरूरी है.
खाने की आदत में हो सकता है सुधार
एक महीने तक शक्कर कम करने से आपको यह समझने में मदद मिल सकती है कि आप दिनभर में कितनी मीठी चीजें खाते हैं. शुरुआत में मुश्किल लगने के बाद धीरे-धीरे मीठी चीजों की जरूरत कम हो सकती है. इसके बाद आप खाने के लेबल देखकर उसमें मौजूद added sugar पर भी ध्यान देने लगेंगे. इससे लंबे समय में खाने की आदत को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है.
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        <pubDate>Thu, 27 Aug 2026 02:30:05 +0530</pubDate>
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        <title>क्या सफेद चीनी से होती है डायबिटीज, क्या कहती है मेडिकल रिसर्च?</title>
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        <description><![CDATA[ आजकल बहुत से लोग मानते हैं कि सफेद चीनी खाने से डायबिटीज हो जाती है. इसी वजह से कई लोग चाय, मिठाई और दूसरी मीठी चीजों से दूरी बनाने लगते हैं. लेकिन क्या सिर्फ चीनी खाने से किसी व्यक्ति को डायबिटीज हो सकती है? मेडिकल रिसर्च के मुताबिक इसका जवाब इतना सीधा नहीं है. सिर्फ सफेद चीनी खाने से सीधे डायबिटीज नहीं होती, लेकिन लंबे समय तक बहुत ज्यादा मीठा खाना, खासकर मीठे ड्रिंक पीना, डायबिटीज के खतरे को बढ़ा सकता है. इसके साथ वजन बढ़ना, कम एक्सरसाइज करना और परिवार में डायबिटीज होना भी बीमारी के खतरे को बढ़ा सकता है.
क्या चीनी खाने से सीधे डायबिटीज होती है?
सिर्फ सफेद चीनी खाने से किसी व्यक्ति को सीधे डायबिटीज हो जाए, ऐसा नहीं है. डायबिटीज तब होती है, जब शरीर ब्लड शुगर को ठीक से कंट्रोल नहीं कर पाता है. इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं जैसे- ज्यादा वजन, कम शारीरिक मेहनत, गलत खान-पान और परिवार में किसी को डायबिटीज होना इसके खतरे को बढ़ा सकता है. इसलिए सिर्फ चीनी को ही डायबिटीज का कारण मानना सही नहीं होगा.
फिर ज्यादा चीनी से खतरा क्यों बढ़ सकता है?
अगर कोई व्यक्ति रोज बहुत ज्यादा मीठा खाता है तो शरीर में जरूरत से ज्यादा कैलोरी जा सकती है. लंबे समय तक ऐसा होने पर वजन बढ़ सकता है. ज्यादा वजन होने से टाइप-2 डायबिटीज का खतरा बढ़ सकता है. यानी चीनी का असर सिर्फ ब्लड शुगर बढ़ने तक सीमित नहीं है. ज्यादा मीठा खाने से वजन और पूरी डाइट खराब होने पर भी इसका असर पड़ सकता है.
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मीठे ड्रिंक ज्यादा नुकसान कर सकते हैं
कोल्ड ड्रिंक, पैकेज्ड जूस, एनर्जी ड्रिंक और दूसरे मीठे पेय में काफी मात्रा में शक्कर हो सकती है. इन्हें पीने पर शरीर को कम समय में ज्यादा शक्कर मिल जाती है. कई बार लोग इन ड्रिंक को पानी की तरह पी लेते हैं और उन्हें पता भी नहीं चलता कि वे कितनी अतिरिक्त चीनी ले रहे हैं. इनमें कैलोरी भी ज्यादा हो सकती है, जिससे लंबे समय तक ज्यादा सेवन करने पर वजन बढ़ने का खतरा रहता है. बढ़ा हुआ वजन टाइप-2 डायबिटीज के खतरे को बढ़ा सकता है. रिसर्च में भी शुगर वाली ड्रिंक और टाइप-2 डायबिटीज के बीच संबंध पाया गया है.
चीनी कम करने से क्या फायदा होगा?
डाइट में ज्यादा चीनी कम करने से शरीर को मिलने वाली अतिरिक्त कैलोरी कम हो सकती है. इससे वजन को कंट्रोल करने में मदद मिल सकती है. चीनी कम करने का मतलब सिर्फ चाय में कम चीनी डालना नहीं है, बल्कि मिठाई, चॉकलेट, मीठे बिस्किट, केक और शुगर वाली ड्रिंक जैसी चीजों का सेवन भी कम करना है. इससे रोजाना ली जाने वाली कुल शक्कर कम हो सकती है. अगर इसके साथ घर का संतुलित खाना और रोज थोड़ी शारीरिक एक्टिविटी रखी जाए तो शरीर को लंबे समय में फायदा मिल सकता है.&amp;nbsp;
क्या चीनी पूरी तरह छोड़ना जरूरी है?
हर व्यक्ति के लिए चीनी को पूरी तरह बंद करना जरूरी नहीं है. ज्यादा जरूरी है कि रोजाना जरूरत से ज्यादा शक्कर न ली जाए. मिठाई, चॉकलेट, मीठे बिस्किट और शुगर वाली ड्रिंक को कम मात्रा में लेना बेहतर है. अगर किसी व्यक्ति को पहले से डायबिटीज है या ब्लड शुगर बढ़ा हुआ है तो उसे अपनी डाइट डॉक्टर की सलाह के अनुसार रखनी चाहिए.
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        <pubDate>Thu, 27 Aug 2026 02:30:03 +0530</pubDate>
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        <title>घर में किसी को H1N1 है तो बाकी लोग कैसे बचें? इन बातों का रखें ध्यान</title>
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        <description><![CDATA[ दिल्ली एनसीआर &amp;nbsp;में H1N1 यानी स्वाइन फ्लू के मामले लगातार बढ़ रहे हैं. इस साल अब तक दिल्ली में इन्फ्लूएंजा A के 2,392 मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें से 1,777 मामले अकेले H1N1 के हैं. ऐसे में अगर घर में किसी एक शख्स को H1N1 हो जाए, तो बाकी लोगों तक इसका फैलना रोकना सबसे बड़ी चुनौती बन जाती है. डॉक्टरों के मुताबिक स्वाइन फ्लू कोई नया या अनजान वायरस नहीं है, यह पहले भी फैलता रहा है, बस कुछ बुनियादी सावधानियां अपना कर इसे आसानी से रोका जा सकता है.
मरीज को अलग कमरे में रखें
घर में जिसे भी H1N1 के लक्षण दिखें, उसे तुरंत बाकी परिवार से अलग कर देना चाहिए. मरीज को अलग कमरे में रखें और जितना हो सके नजदीक न जाएं, क्योंकि यह वायरस मुख्य रूप से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलता है.
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हाथों की सफाई सबसे जरूरी
डॉक्टरों के मुताबिक हाथों की सफाई वायरस को फैलने से रोकने का सबसे आसान और असरदार तरीका है. बार बार साबुन पानी से हाथ धोना या सैनिटाइजर इस्तेमाल करना घर के हर शख्स के लिए जरूरी है, खासकर मरीज की देखभाल करने के बाद.
मास्क लगाना नहीं भूलें
मरीज और उसकी देखभाल करने वाले, दोनों को मास्क पहनना चाहिए. डॉक्टरों की सलाह है कि कोरोना के दौरान अपनाए गए तरीके यहां भी दोहराने चाहिए, भीड़भाड़ वाली जगहों से बचना, मास्क लगाना और नियमित रूप से हाथ धोते और सैनिटाइज करते रहें.
इन बातों का ध्यान रखें
मरीज़ को खांसते या छींकते वक्त हमेशा रुमाल या टिशू से नाक और मुंह ढककर रखना चाहिए. इस्तेमाल किए गए टिशू को तुरंत बंद डस्टबिन में फेंक दें, ताकि वायरस के फैलने का खतरा कम हो जाए .
निजी सामान अलग रखें
मरीज के तौलिये, बर्तन, कपड़े और दूसरी निजी चीज़ें बाकी परिवार से अलग रखे. इन चीजों को शेयर करने से वायरस आसानी से दूसरे सदस्यों तक पहुंच सकता है.
घर को हवादार और साफ रखें
घर के कमरों में हवा का &amp;nbsp;वेंटिलेशन, और जिस जगह मरीज़ रह रहा हो वहां नियमित सफाई जरूरी है. दरवाज़ों के हैंडल, स्विच बोर्ड जैसी बार बार छुई जाने वाली जगहों को भी साफ करते रहें.
कमजोर इम्यूनिटी वालों का रखें खास ध्यान
बुज़ुर्ग, छोटे बच्चे, गर्भवती महिलाएं और पहले से किसी बीमारी से जूझ रहे लोग फ्लू की गंभीर चपेट में जल्दी आ सकते हैं. ऐसे लोगों को मरीज़ से जितना हो सके दूर रखें, और उनकी सेहत पर खास &amp;nbsp;नजर रखें.
लक्षण दिखते ही डॉक्टर से मिलें&amp;nbsp;
अगर &amp;nbsp;परिवार के किसी और शख्स को भी बुखार, खांसी, गले में खराश या बदन दर्द जैसे लक्षण महसूस हों, तो बिना देर किए डॉक्टर से मिलें. सीने में दर्द या सांस लेने में तकलीफ जैसे लक्षणों को हल्के में नहीं लें .
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        <pubDate>Tue, 25 Aug 2026 21:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>घर, में, किसी, को, H1N1, है, तो, बाकी, लोग, कैसे, बचें, इन, बातों, का, रखें, ध्यान</media:keywords>
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        <title>H1N1 के शिकार हैं तो भूलकर भी न करें ये गलतियां, वरना बढ़ जाएगी दिक्कत</title>
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        <description><![CDATA[ दिल्ली में इन दिनों H1N1 यानी स्वाइन फ्लू के मामलों में बढ़ोतरी देखने को मिल रही है. स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, 20 अगस्त तक राजधानी में इस साल H1N1 के 1,777 मामले सामने आ चुके है. अकेले 20 अगस्त को 114 नए H1N1 संक्रमण दर्ज किए गए. बढ़ते मामलों को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग ने लोगों को सावधानी बरतने की सलाह दी है. हालांकि, इस बढ़ोतरी के बीच भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद यानी ICMR ने कहा है कि देश में H1N1 का कोई नया स्ट्रेन सामने नहीं आया है. विशेषज्ञों के मुताबिक मौजूदा स्थिति मौसमी फ्लू से जुड़ी है, इसलिए घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन लापरवाही से बचना बेहद जरूरी है. ऐसे में अगर आप H1N1 की चपेट में आ चुके है, तो सिर्फ दवा लेना ही काफी नहीं है. बीमारी के दौरान आपकी कुछ आदतें रिकवरी को प्रभावित कर सकती हैं और संक्रमण के गंभीर होने का जोखिम बढ़ा सकती हैं
पुराना अनुभव समझकर लापरवाही न करें
अगर आपको पहले H1N1 हो चुका है तो यह सोचकर बेफिक्र न हो जाएं कि शरीर इसे आसानी से संभाल लेगा. फ्लू वायरस में बदलाव होते रहते हैं और हर संक्रमण का असर हमेशा एक जैसा नहीं होता. इसलिए डॉक्टर की सलाह और शरीर के संकेतों को गंभीरता से लेना जरूरी है. खासकर जिन लोगों को पहले से सांस, फेफड़े या दूसरी स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हैं, उन्हें ज्यादा सतक रहना चाहिए.
खुद से न लें दवा
H1N1 होने पर अपने पुराने प्रिस्क्रिप्शन की दवाएं दोबारा शुरू कर लेना या किसी दूसरे व्यक्ति की दवा लेना सही नहीं है. हर मरीज की स्थिति अलग होती है. एंटीबायोटिक भी खुद से शुरू नहीं करनी चाहिए, क्योंकि H1N1 वायरल संक्रमण है. डॉक्टर जरूरत के अनुसार एंटीवायरल दवा या दूसरी दवाओं की सलाह देते हैं. इसलिए दवा की मात्रा और अवधि खुद तय करने के बजाय चिकित्सकीय सलाह लेना बहतर है.
यह भी पढ़ें: घर में किसी को H1N1 है तो बाकी लोग कैसे बचें? इन बातों का रखें ध्यान
बीमारी में काम या एक्सरसाइज जारी न रखें
कई लोग बुखार या कमजोरी के बावजूद ऑफिस, बाहर के काम या जिम जाना जारी रखते हैं. यह गलती शरीर को रिकवर होने का पर्याप्त समय नहीं देती. H1N1 के दौरान पर्याप्त आराम करें. खासकर बुखार, शरीर में दर्द या कमजोरी रहने तक भारी व्यायाम और ज्यादा शारीरिक मेहनत से बचना चाहिए.
घर में रहते हुए भी इंफेक्शन फैलाने से बचें
अगर आपको H1N1 है तो सिर्फ अपने आराम के बारे में सोचना पर्याप्त नहीं है. वायरस परिवार के दूसरे सदस्यों तक भी पहुंच सकता है. खांसते या छींकते समय मुंह और नाक ढकें, हाथों को नियमित रूप से साफ करें और जहां संभव हो, घर में अच्छी वेंटिलेशन रखें. बीमारी के दौरान भीड़भाड़ वाली जगहों पर जाने से बचना विशेष रूप से जरूरी है. दिल्ली में बढ़ते मामलों के बीच विशेषज्ञों ने भी भीड़ और खराब वेंटिलेशन वाली जगहों को लेकर सावधानी बरतने की सलाह दी है.
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        <pubDate>Tue, 25 Aug 2026 21:30:06 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>H1N1 के ILI और SARI लक्षणों में क्या अंतर? समझेंगे तो नहीं होगी दिक्कत</title>
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        <description><![CDATA[ मौसम बदलने के साथ सर्दी, खांसी और बुखार जैसी परेशानियां आम हो जाती हैं. H1N1 फ्लू में भी ऐसे ही कई लक्षण दिखाई दे सकते हैं. लेकिन हर मरीज में बीमारी की गंभीरता एक जैसी नहीं होती. डॉक्टर H1N1 और दूसरी सांस की बीमारियों में लक्षणों को समझने के लिए ILI और SARI जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं. ILI का मतलब Influenza Like Illness और SARI का मतलब Severe Acute Respiratory Infection है. दोनों में कुछ लक्षण एक जैसे हो सकते हैं, लेकिन SARI में सांस से जुड़ी परेशानी ज्यादा गंभीर हो सकती है. इसलिए इनके बीच का फर्क समझना जरूरी है.
ILI क्या होता है
ILI यानी Influenza Like Illness में मरीज को फ्लू जैसे लक्षण दिखाई देते हैं. इसमें अचानक बुखार आना, खांसी, गले में दर्द, सिरदर्द, शरीर में दर्द और थकान जैसी परेशानी हो सकती है. कुछ लोगों को नाक बहने या बंद होने की समस्या भी हो सकती है. ILI के लक्षण होने का मतलब यह जरूरी नहीं है कि व्यक्ति को H1N1 ही है, कई दूसरी वायरल बीमारियों में भी ऐसे लक्षण दिखाई देते हैं.
SARI में क्या होता है
SARI यानी Severe Acute Respiratory Infection में सांस से जुड़ी परेशानी ज्यादा गंभीर हो सकती है. इसमें खांसी और बुखार के साथ सांस लेने में तकलीफ, सांस फूलना या ऑक्सीजन का स्तर कम होना जैसी समस्या हो सकती है. ऐसे लक्षणों को हल्के में नहीं लेना चाहिए..खासकर अगर मरीज की हालत तेजी से बिगड़ रही हो तो उसे जल्द डॉक्टर को दिखाना जरूरी है.
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दोनों में सबसे बड़ा अंतर क्या है
ILI में आमतौर पर फ्लू जैसे लक्षण होते हैं और हर मरीज की हालत गंभीर हो, यह जरूरी नहीं है. वहीं SARI में सांस से जुड़ी गंभीर समस्या सामने आ सकती है. आसान भाषा में कहें तो ILI में फ्लू जैसे लक्षण ज्यादा प्रमुख होते हैं, जबकि SARI में सांस की परेशानी ज्यादा गंभीर हो सकती है. इसी वजह से SARI को ज्यादा गंभीर स्थिति माना जाता है और इसमें मेडिकल जांच की जरूरत पड़ सकती है.
H1N1 में कब सावधान होना चाहिए
अगर बुखार और खांसी के साथ सांस लेने में परेशानी होने लगे, सीने में दर्द हो, बहुत ज्यादा कमजोरी महसूस हो या मरीज की हालत तेजी से खराब हो रही हो तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए. बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और पहले से किसी बीमारी से जूझ रहे लोगों में फ्लू गंभीर होने का खतरा ज्यादा हो सकता है. ऐसे लोगों में लक्षण दिखाई देने पर डॉक्टर की सलाह लेना बेहतर है.
लक्षण देखकर खुद इलाज न करें
ILI और SARI के लक्षणों में कुछ समानता होने की वजह से सिर्फ लक्षण देखकर यह तय नहीं किया जा सकता कि किसी व्यक्ति को H1N1 है या कोई दूसरी बीमारी. जरूरत पड़ने पर डॉक्टर जांच और टेस्ट की सलाह दे सकते हैं. इसलिए तेज बुखार, खांसी या सांस की परेशानी को नजरअंदाज करने के बजाय सही समय पर मेडिकल सलाह लेना जरूरी है.
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        <pubDate>Tue, 25 Aug 2026 21:30:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>भोपाल में खुला पहला सरकारी IVF सेंटर, सिर्फ 75 हजार में होगा इलाज</title>
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        <description><![CDATA[ आज कल निसंतानता की समस्या बढ़ रही है ऐसे में बच्चा चाहने वाले कई पति-पत्नी IVF का सहारा लेते हैं. इसमें काफी खर्च होता है और ये IVF का खर्च भी कई परिवारों के लिए बड़ी समस्या होती है।.IVF यानी इन विट्रो फर्टिलाइजेशन की मदद से उन दंपतियों को माता-पिता बनने का मौका मिल सकता है, जिन्हें गर्भधारण करने में परेशानी होती है&amp;rsquo;. लेकिन प्राइवेट अस्पतालों में इसका खर्च काफी ज्यादा होता है ऐसे में भोपाल में शुरू हुआ सरकारी IVF सेंटर जरूरतमंद परिवारों के लिए राहत की खबर है. यहां निजी सेंटरों की तुलना में कम खर्च में IVF इलाज मिलने की उम्मीद है. आइए जानते हैं इस सेंटर से जुड़ी खास बातें
भोपाल में शुरू हुआ सरकारी IVF सेंटर
भोपाल के AIIMS में सरकारी IVF सेंटर की सुविधा शुरू की गई है. इसे मध्य प्रदेश का पहला सरकारी IVF सेंटर बताया जा रहा है. यहां IVF से जुड़ी जरूरी जांच और इलाज की सुविधा एक ही जगह पर देने की कोशिश की गई है. सरकारी सेंटर शुरू होने से उन परिवारों को फायदा मिल सकता है, जो ज्यादा खर्च की वजह से निजी अस्पतालों में IVF नहीं करा पाते.
निजी क्लीनिक में 4 लाख तक खर्च
IVF का खर्च हर अस्पताल और हर मरीज के लिए एक जैसा नहीं होता. इलाज की जरूरत, दवाइयों और दूसरी प्रक्रियाओं के हिसाब से खर्च बढ़ या घट सकता है. निजी क्लीनिक में IVF के लिए कई मामलों में करीब 4 लाख रुपये तक खर्च हो सकता है. ऐसे में कम आय वाले परिवारों के लिए यह रकम काफी बड़ी होती है. सरकारी सेंटर में कम कीमत पर इलाज मिलने से ऐसे परिवारों को काफी राहत मिल सकती है.
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यहां करीब 75 हजार में इलाज की बात
सरकारी IVF सेंटर में इलाज की लागत निजी अस्पतालों की तुलना में काफी कम रखे जाने की जानकारी सामने आई है. यहां IVF ट्रीटमेंट का खर्च करीब 75 हजार रुपये बताया जा रहा है, हालांकि मरीज की जरूरत और इलाज के दौरान होने वाले अतिरिक्त टेस्ट या दवाइयों के कारण अंतिम खर्च अलग हो सकता है. इसलिए इलाज शुरू करने से पहले सेंटर से पूरी फीस और इसमें शामिल सुविधाओं की जानकारी लेना जरूरी है.
IVF के लिए आधुनिक सुविधाएं
IVF इलाज के लिए सिर्फ डॉक्टर की सलाह ही नहीं, बल्कि कई तरह की लैब सुविधाओं की भी जरूरत होती है. सरकारी सेंटर में IVF से जुड़ी आधुनिक लैब और जरूरी उपकरण उपलब्ध कराए गए हैं. यहां अंडाणु और शुक्राणु से जुड़ी प्रक्रिया के साथ भ्रूण को सुरक्षित रखने जैसी सुविधाएं भी जरूरी होती हैं. इससे मरीजों को इलाज के लिए अलग-अलग जगह जाने की परेशानी कम हो सकती है.
किन लोगों के लिए मददगार होगा सेंटर?
यह सेंटर उन दंपतियों के लिए मददगार हो सकता है, जिन्हें लंबे समय से गर्भधारण करने में परेशानी हो रही है और डॉक्टर ने IVF की सलाह दी है. खासकर ऐसे परिवार जो निजी अस्पतालों का ज्यादा खर्च नहीं उठा सकते, उनके लिए सरकारी सेंटर एक बेहतर विकल्प बन सकता है. हालांकि हर मरीज के लिए IVF जरूरी नहीं होता. डॉक्टर जांच के बाद ही तय करते हैं कि मरीज को किस तरह के इलाज की जरूरत है.
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        <pubDate>Tue, 25 Aug 2026 21:30:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Xप्लेन: स्वाइन फ्लू का टीका कब लगवाएं? डॉक्टर्स ने बता दिए 10 जरूरी जवाब</title>
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        <description><![CDATA[ दिल्ली-NCR में इन दिनों H1N1 यानी स्वाइन फ्लू के मामले तेजी से बढ़े हैं. इस साल अगस्त तक 1,777 से ज्यादा मामले सामने आ चुके हैं. यह पिछले साल की तुलना में करीब आठ गुना ज्यादा हैं. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि स्वाइन फ्लू का टीका कब लगवाना चाहिए. क्या अक्टूबर सही समय है या अभी लगवा लें. आइए, डॉक्टरों और सरकारी सलाह के आधार पर पूरी बात समझते हैं...
क्या &#039;स्वाइन फ्लू का टीका&#039; अलग से मिलता है?
यह समझना सबसे जरूरी है कि H1N1 यानी स्वाइन फ्लू का कोई अलग टीका नहीं है. यह वायरस अब सीजनल फ्लू का ही एक हिस्सा बन गया है. इस वजह से जो सीजनल इन्फ्लूएंजा (मौसमी फ्लू) का टीका लगता है, उसमें H1N1 के खिलाफ सुरक्षा भी शामिल होती है.
दिल्ली में मैक्स हेल्थकेयर हॉस्पिटल के इंटरनल मेडिसिन और सीनियर डॉक्टर रोम्मिल टिक्कू कहते हैं, &#039;आमतौर पर H1N1 या स्वाइन फ्लू लिखे टीके की तलाश करने की जरूरत नहीं है. जो टीका लोगों को लगता है, वह सीजनल इन्फ्लूएंजा वैक्सीन है, जो उस सीजन में फैलने वाले वायरस से बचाने के लिए बनाई जाती है. H1N1 उन इन्फ्लूएंजा A स्ट्रेन में से एक है, जिसे वैक्सीन में शामिल किया जाता है.&#039;
तो स्वाइन फ्लू का टीका लगवाएं कब?
इसका जवाब इस बात पर निर्भर करता है कि आप भारत के किस हिस्से में रहते हैं...
1. उत्तरी भारतवासियों के लिए अक्टूबर
उत्तरी भारत के ठंडे इलाकों के लिए अक्टूबर का महीना सबसे सही माना जाता है. यहां सर्दियों में इन्फ्लूएंजा का प्रकोप बढ़ता है. केंद्र सरकार की एक एक्सपर्ट पैनल है, जिसमें ICMR, NCDC और डायरेक्टरेट जनरल ऑफ हेल्थ सर्विसेज के एक्सपर्ट्स शामिल हैं. इस पैनल ने पहली बार भारत में अलग-अलग क्षेत्रों के लिए अलग-अलग समय सुझाए हैं. इसके मुताबिक:

जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे सबसे ठंडे राज्यों के लिए अक्टूबर में टीका लगवाने की सलाह है.
बाकी मुख्य भूमि भारत (ज्यादातर राज्य) के लिए मई-जून में टीका लगवाने का सुझाव है.
तमिलनाडु जैसे राज्यों के लिए जुलाई का समय बताया गया है.

2. अक्टूबर में टीका मिस करने पर घबराएं नहीं
अगर आपने अक्टूबर में टीका नहीं लगवाया, तो घबराएं नहीं. देर से लगवाना भी फायदेमंद हो सकता है. जब तक इन्फ्लूएंजा एक्टिव है, तब तक टीका लगवाना ठीक रहता है.
3. अगर अभी (अगस्त-सितंबर) टीका लगवाएं तो?
दिल्ली-NCR में H1N1 के मामले बढ़ रहे हैं. डॉक्टरों का कहना है कि अगर आपने अभी तक सीजनल फ्लू का टीका नहीं लगवाया है, तो अभी लगवा लेना चाहिए.
मशहूर साइंटिस्ट डॉ. सौम्या स्वामीनाथन ने सलाह दी है कि अभी फ्लू का टीका लगवा लेना चाहिए, क्योंकि टीका लगने के बाद इम्युनिटी बनने में करीब दो हफ्ते लगते हैं.
मैक्स हेल्थकेयर हॉस्पिटल में प्रिंसिपल डायरेक्टर और इंटरनल मेडिसिन के डॉ. आरएस मिश्रा कहते हैं, &#039;टीका लगवाना सबसे अच्छा है, मामले बढ़ने की उम्मीद से कम से कम दो हफ्ते पहले, क्योंकि शरीर को सुरक्षात्मक इम्युनिटी बनाने में लगभग दो हफ्ते लगते हैं.&#039;

क्या टीका 100% सुरक्षा देता है?
नहीं. कोई भी इन्फ्लूएंजा का टीका 100% सुरक्षा नहीं देता. दरअसल वैक्सीन का असर करना इस बात पर निर्भर करता है कि वैक्सीन में मौजूद वायरस और मौसम में फैलने वाले वायरस में कितना मेल खाते हैं. व्यक्ति की उम्र और इम्यून रिस्पांस भी अहम रोल निभाती है.
टीका लगवाने से गंभीर बीमारी, अस्पताल में भर्ती होने और जटिलताओं का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है. यहां तक कि तब भी जब टीका पूरी तरह से संक्रमण को रोक न पाए.
NIH में छपी एक स्टडी के मुताबिक, टीके सबसे ज्यादा तब असर करता है, जब टीका लगवाने का समय फ्लू के चरम के साथ मेल खाता है. जिन स्टडीज में टीकाकरण का समय फ्लू के चरम से कई महीने पहले था, वहां कम असर पाया गया है. यही वजह है कि भारत जैसे बड़े देश में अलग-अलग क्षेत्रों के लिए अलग-अलग समय सुझाए जा रहे हैं.
टीका हर साल क्यों लगवाना चाहिए?
एक्सपर्स्ट दो बड़ी वजहें बताते हैं:

वायरस में बदलाव: इन्फ्लूएंजा वायरस लगातार आनुवंशिक बदलावों से गुजरता है. इस वजह से WHO हर साल वैक्सीन की संरचना को अपडेट करने की सिफारिश करता है.
कम होती इम्युनिटी: पिछले साल का टीका या पिछली बीमारी से मिली सुरक्षा समय के साथ घटती जाती है. सालाना टीकाकरण से आपकी सुरक्षा ताजा और मौसम में फैलने वाले वायरस के खिलाफ कारगर साबित होती है.


क्या पहले H1N1 हो चुका है तो टीका नहीं लगवाना चाहिए?
नहीं, पहले H1N1 होने का मतलब यह नहीं कि आप भविष्य के सभी फ्लू वायरस से सुरक्षित हैं. आपको अभी भी सालाना टीका लगवाना चाहिए.
अगर आपको हल्की सर्दी है, तो क्या टीका लगवा सकते हैं?
हां, हल्की बीमारी टीका लगवाने में रोड़ा नहीं बनती. लेकिन अगर आप मध्यम या गंभीर रूप से बीमार हैं, तेज बुखार है या बहुत अस्वस्थ हैं , तो अपने डॉक्टर से टीके का समय तय करना बेहतर होता है. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 25 Aug 2026 21:30:04 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>अगर हाथ पैर न हो तो कैसे चेक किया जाता है मरीज का बीपी?</title>
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        <description><![CDATA[ अक्सर ज्यादातर कोई भी बीमारी होती है तो डॉक्टर सबसे पहले मरीज का BP चेक करता है BP यानी ब्लड प्रेशर, जब हम सबसे पहले BP चेक करने के बारे में सोचते हैं तो सबसे पहले जो दिमाग में आता है वह है तस्वीर बनती है वह होती है हाथ से BP को चेक करना. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि अगर किसी मरीज के हाथ पर ही नहीं है, तो डॉक्टर उनका BP कैसे चेक करते होंगे. ये सवाल सुनने में तो अजीब लगता है, लेकिन इसका जवाब मेडिकल साइंस से जुड़ा हुआ होता है. ऐसे में आइए जानते हैं इसके बारे में पूरी जानकारी कि ऐसे मामलों में डॉक्टर कौन सा तरीका अपनाते हैं.
शरीर के दूसरे हिस्सों से भी हो सकता है बीपी चेक
आमतौर पर बीपी सबसे ज्यादा ऊपरी बाजू यानी ब्रेकियल हिस्से से नापा जाता है, लेकिन अगर यह मुमकिन न हो तो कलाई, जांघ के पीछे वाले हिस्से और पैर के निचले हिस्से से भी बीपी चेक किया जा सकता है. जिन मरीजों के हाथ नहीं होते, उनका बीपी अक्सर जांघ या पिंडली पर कफ बांधकर नापा जाता है. डॉक्टरों का मानना है कि जिन मामलों में बाजू पर बीपी नापना संभव नहीं होता, जैसे कि हाथ कटा होना, जलना या कई तरह की चोट लगी हो, वहां कफ को बीपी नापने के लिए वैकल्पिक जगह की तरह इस्तेमाल किया जाता है. इसी तरह अगर पैर भी न हों, तो डॉक्टर शरीर के किसी और हिस्से जैसे कंधे के पास मौजूद नस को चुनते हैं, जहां से खून का बहाव आसानी से नापा जा सकता है.
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बहुत गंभीर मामलों में लगाई जाती है खास नली
जब किसी मरीज के हाथ और पैर दोनों न हों, या फिर मरीज बहुत गंभीर हालत में हो, तो डॉक्टर एक अलग और ज्यादा सटीक तरीका अपनाते हैं. ऐसे गंभीर मामलों में डॉक्टर मरीज के शरीर के अंदरूनी हिस्से में मौजूद किसी बड़ी नस में एक पतली नली डालते हैं, जिसे आर्टीरियल लाइन कहा जाता है. यह नली शरीर के बीच वाले हिस्से की किसी नस में लगाई जाती है, न कि हाथ-पैर जैसी बाहरी जगह पर. यह तरीका खासतौर पर आईसीयू में भर्ती मरीजों या बड़े ऑपरेशन के दौरान इस्तेमाल किया जाता है, ताकि हर पल मरीज की सेहत पर नजर रखी जा सके.
यह जानना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि दुनिया भर में हादसों, बीमारी या जन्म से ही हाथ-पैर न होने के मामले सामने आते रहते हैं, और ऐसे मरीजों का सही इलाज करने के लिए डॉक्टरों को सही तरीका पता होना चाहिए. मेडिकल साइंस में हर मरीज की स्थिति अलग होती है, इसलिए डॉक्टर हमेशा मरीज के शरीर के हिसाब से सही तरीका चुनते हैं.
यह भी पढ़ेंः H1N1 Cases In Delhi: H1N1 का कोई नया स्ट्रेन नहीं...ICMR बोला- घबराने की जरूरत नहीं ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 25 Aug 2026 09:30:04 +0530</pubDate>
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        <title>किन सब्जियों को साथ खाने से हो जाती है पथरी? दूर कर लीजिए सारे शक</title>
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        <description><![CDATA[ सब्जियों को लेकर अक्सर ऐसी बातें सुनने को मिलती हैं कि दो खास सब्जियों को साथ खाने से किडनी में पथरी बन जाती है. लेकिन हर ऐसी बात सच नहीं होती, पथरी बनने का मामला सिर्फ दो सब्जियों को एक साथ खाने से तय नहीं होता है. इसमें पानी की कमी, खाने की आदतें, शरीर में कैल्शियम और ऑक्सलेट का संतुलन, ज्यादा नमक और कुछ दूसरी चीजें भी अहम रोल अदा करते हैं.
क्या सब्जियां खाने से पथरी बनती है?
आम तौर पर किसी खास सब्जियों को साथ खाने से पथरी बनने का सीधा वैज्ञानिक सबूत नहीं है. किडनी स्टोन कई वजहों से बन सकती है, और इसका सबसे आम किस्म का कैल्शियम ऑक्सलेट स्टोन है. ऑक्सलेट कुछ खान पान में प्राकृतिक रूप से पाया जाता है.इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि जैसे ही दो खास सब्जियां एक साथ खाई जाई, पथरी बन जाएगी. किसी व्यक्ति के लिए जोखिम उसकी पूरी डाइट और शरीर की स्थिति पर निर्भर कर सकता है.
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इस सब्जियों में होता है ऑक्सलेट
पालक में ऑक्सलेट की मात्रा ज्यादा होती है. जिन लोगों को कैल्शियम ऑक्सलेट स्टोन बनने की समस्या रहती है, उन्हें बहुत ज्यादा ऑक्सलेट वाली चीजों का खान पान कम करने की सलाह दी जाती है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हर कोई पालक खाना बंद ही कर दे. कुछ दूसरी सब्जियों और खानों में भी ऑक्सलेट पाया जाता है. यहां मात्रा और एक शख्स की हालत ज्यादा अहम होता है. अगर पहले पथरी हो चुकी है, तो डॉक्टर या डाइटिशियन से अपनी डाइट के बारे में सलाह लेना बेहतर रहता है.
पथरी से बचने के लिए क्या है जरूरी?
किडनी स्टोन से बचने के लिए सिर्फ यह देखना काफी नहीं है कि कौन सी सब्जी किसके साथ खाई जा रही है. डॉक्टर के मुताबिक पीना सबसे जरूरी बातों में शामिल है. पानी कम पीने से पेशाब ज्यादा गाढ़ा हो सकता है, और उसमें मौजूद कुछ पदार्थ क्रिस्टल बनाकर पथरी हो सकता है. इसके अलावा ज्यादा नमक खाना भी किडनी स्टोन का खतरा को बढ़ा सकता है. इसलिए खाने में नमक की मात्रा पर ध्यान देना और पानी पीना&amp;nbsp; बेहद जरूरी है.
हर व्यक्ति के लिए हर चीज नहीं होती
अगर किसी व्यक्ति को पहले किडनी स्टोन हो चुका है तो उसकी डाइट इस बात पर भी निर्भर कर सकती है कि पथरी किस तरह की पथरी थी. इसलिए इंटरनेट पर मिलने वाली ये सब्जियां कभी साथ न खाएं जैसी बातों पर आंख बंद करके भरोसा करना समझदारी नहीं है. वैसे सब्जियां आम तौर पर हेल्थी डाइइट का हिस्सा हैं. बिना वजह कई सब्जियां बंद करने के बजाय अपनी परेशानी और पुराने टेस्ट के हिसाब से डॉक्टर से सही सलाह लेना ज्यादा बेहतर है.&amp;nbsp;
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें
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        <pubDate>Mon, 24 Aug 2026 17:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>पेन किलर को कैसे पता चलता है कि शरीर में कहां हो रहा दर्द? जानें सच</title>
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        <description><![CDATA[ How Painkillers Work : जब शरीर के किसी हिस्से में चोट लगती है, सूजन होती है या कोई और परेशानी होती है, तो वहां मौजूद नसें दर्द से जुड़े सिग्नल दिमाग तक भेजती हैं. दिमाग इन सिग्नल को समझता है और तभी हमें दर्द महसूस होता है. ऐसे में अक्सर मन में सवाल आता है कि जब हम पेन किलर की गोली खाते हैं, तो उसे कैसे पता चलता है कि दर्द सिर में है, पेट में है या पैर में. सच यह है कि पेन किलर को यह बिल्कुल पता नही होता कि दर्द ठीक किस जगह हो रहा है, फिर भी वह राहत पहुंचा देती है?
दवा कैसे काम करती है?
चोट या सूजन होने पर शरीर में कुछ केमिकल निकलते हैं, जिनमें प्रोस्टाग्लैंडिन मुख्य मानना जाता है&amp;nbsp; है. ये पदार्थ नसों को ज्यादा संवेदनशील बना देते हैं, जिससे दर्द का सिग्नल तेजी से दिमाग तक पहुंचता है और हमें दर्द महसूस होता है. दरअसल यह पूरी प्रोसेस&amp;nbsp; शरीर की एक तरह की सुरक्षा प्रणाली है जिससे दर्द के जरिए शरीर हमें बताता है&amp;nbsp; कि कहीं कुछ गड़बड़ है, ताकि हम उस हिस्से का ध्यान रखें या उसे और नुकसान से बचाएं.
दरअसल, दवा खाने के बाद उसका सक्रिय तत्व पेट और आंतों से अवशोषित होकर खून में मिल जाता है और खून इसे शरीर के हर हिस्से तक पहुंचाता है. यही वजह है कि दवा को दर्द की सही जगह ढूंढने की कोई जरूरत नहीं होती, वह अपने आप ही पूरे शरीर में फैल जाती है. ज्यादातर आम पेन किलर प्रोस्टाग्लैंडिन बनने की प्रक्रिया को कम या धीमा कर देती हैं, जिससे दर्द और सूजन दोनों घटने लगते हैं. आमतौर पर दवा असर दिखाना 20 से 30 मिनट के भीतर शुरू कर देती है, क्योंकि इतने समय में सक्रिय तत्व खून में अच्छी मात्रा में पहुंच जाता है और अपना काम शुरू कर देता है.
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सिर्फ दर्द वाली जगह पर क्यों करती है काम दवाइयां?
जगह पर दवाओं के काम करने की वजह यह है कि चोट या सूजन वाले हिस्से में केमिकल एक्टिविटी बाकी शरीर से ज्यादा होती है और पेन किलर वहीं की गतिविधि को सबसे ज्यादा प्रभावित करती है. इसी वजह से राहत उसी हिस्से में महसूस होती है, भले ही दवा पूरे शरीर में घूम रही हो. कुछ दवाएं प्रोस्टाग्लैंडिन को कम करती हैं तो कुछ सीधे नसों और दिमाग पर असर डालती हैं. इसलिए अलग-अलग तरह के दर्द के लिए अलग दवा दी जाती है. हर दर्द के लिए एक ही पेन किलर सही नही मानी जाती.
क्या पेन किलर लेना हमेशा सुरक्षित?
किसी भी पेन किलर को बार-बार या जरूरत से ज्यादा मात्रा में लेना सही नहीं माना जाता, क्योंकि कुछ दवाएं पेट, किडनी और लिवर जैसे अंगों पर बुरा असर डाल सकती हैं. यह खून के जरिए पूरे शरीर में पहुंचती है और दर्द पैदा करने वाले केमिकल सिग्नल या नसों-दिमाग के दर्द संकेत को प्रभावित करती है. इसी वजह से हमें दर्द वाली जगह पर राहत महसूस होती है. दवा की सही मात्रा और इस्तेमाल हमेशा डॉक्टर या फार्मासिस्ट की सलाह के अनुसार ही करना चाहिए.
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        <pubDate>Mon, 24 Aug 2026 17:30:06 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>H1N1 Cases In Delhi: H1N1 का कोई नया स्ट्रेन नहीं...ICMR बोला&amp; घबराने की जरूरत नहीं</title>
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        <description><![CDATA[ ICMR Statement On H1N1 Swine Flu Strain: दिल्ली में मौसमी फ्लू के मामलों में बढ़ोतरी के बीच H1N1 को लेकर लोगों की चिंता बढ़ रही है. इसी बीच इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के सीनियर साइंटिस्ट ने साफ किया है कि देश में H1N1 वायरस का कोई नया स्ट्रेन सामने नहीं आया है. वैज्ञानिकों के मुताबिक, फिलहाल घबराने की जरूरत नहीं है. भारत में जो वायरस फैल रहे हैं, वे मौसमी स्ट्रेन हैं और 2025 से ही सर्कुलेशन में हैं. ये उत्तरी गोलार्ध के लिए सुझाई गई वैक्सीन में शामिल स्ट्रेन से भी अच्छी तरह मेल खाते हैं.
ICMR के वैज्ञानिकों के अनुसार, भारत में इस समय फैल रहे Influenza A (H1N1)pdm09 वायरस A/Missouri/11/2025 (H1N1)pdm09-like वायरस स्ट्रेन से संबंधित हैं. ये वायरस clade 6B.1A.5a2a और subclade D.3.1.1 के अंतर्गत आते हैं. वैज्ञानिकों ने बताया कि स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है और नियमित सर्विलांस के जरिए वायरस के प्रसार की निगरानी की जा रही है.
दिल्ली में H1N1 के मामले बढ़े
ICMR की यह जानकारी ऐसे समय में सामने आई है जब दिल्ली में मौसमी इन्फ्लुएंजा के मामलों में बढ़ोतरी देखी जा रही है. 20 अगस्त तक दिल्ली में H1N1 के 1,777 मामले सामने आए थे. वहीं, Influenza A के कुल 2,392 मामले दर्ज किए गए थे. इस तरह इस साल रिपोर्ट किए गए Influenza A के मामलों में H1N1 प्रमुख सब-टाइप बना हुआ है.
मेडांटा अस्पताल में इंटरनल मेडिसिन और रेस्पिरेटरी एंड स्लीप मेडिसिन के चेयरमैन डॉ. रणदीप गुलेरिया ने भी मामलों में बढ़ोतरी की बात कही. उन्होंने बताया कि हर साल मानसून के दौरान H1N1 के मामलों में बढ़ोतरी देखने को मिलती है, लेकिन इस बार मामलों की संख्या तुलनात्मक रूप से ज्यादा दिखाई दे रही है.
क्या हैं H1N1 के सामान्य लक्षण?
डॉ. गुलेरिया के मुताबिक, ज्यादातर मरीजों में बुखार, खांसी, गले में खराश और शरीर में दर्द जैसे लक्षण देखने को मिल रहे हैं. कई मरीजों में सूखी खांसी भी हो रही है. ये लक्षण मौसमी इन्फ्लुएंजा के दौरान आम तौर पर देखे जा सकते हैं. हालांकि, हर मरीज में बीमारी का असर एक जैसा नहीं होता. खासकर बुजुर्गों, छोटे बच्चों और पहले से किसी दूसरी बीमारी से जूझ रहे लोगों में इंफेक्शन गंभीर रूप ले सकता है. ऐसे लोगों में सीने में जकड़न, सांस लेने में परेशानी और वायरल निमोनिया जैसे लक्षण भी सामने आ सकते हैं.

किन लक्षणों को नजरअंदाज न करें?
AIIMS के मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डॉ. नीरज निश्चल ने बताया कि कुछ लक्षण ऐसे हैं जिनके दिखाई देने पर मरीज को तुरंत मेडिकल मदद लेनी चाहिए. सांस लेने में परेशानी, सीने में दर्द, ऑक्सीजन का स्तर कम होना, लगातार या बढ़ता हुआ बुखार, भ्रम की स्थिति, बहुत ज्यादा कमजोरी या शरीर में पानी की कमी इसके संकेत हो सकते हैं. उन्होंने एक खास स्थिति को भी महत्वपूर्ण बताया है. अगर मरीज की तबीयत कुछ समय तक ठीक होने लगे और इसके बाद अचानक फिर से बिगड़ जाए, तो इसे सामान्य समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. &amp;nbsp;ठीक होने के बाद अचानक हालत खराब होना किसी दूसरी दिक्कत का संकेत हो सकता है.
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नया स्ट्रेन सामने नहीं आया
H1N1 के बढ़ते मामलों के बीच सबसे बड़ी चिंता यही थी कि कहीं देश में वायरस का कोई नया स्ट्रेन तो नहीं फैल रहा. ICMR वैज्ञानिकों ने इस चिंता को दूर करते हुए कहा है कि फिलहाल किसी नए स्ट्रेन का पता नहीं चला है. मौजूदा वायरस मौसमी स्ट्रेन हैं, जो 2025 से ही सर्कुलेशन में हैं. इसका मतलब यह है कि मामलों में बढ़ोतरी को सीधे किसी नए या ज्यादा खतरनाक वायरस के सामने आने से जोड़ना सही नहीं होगा. वैज्ञानिक नियमित सर्विलांस के जरिए स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं, ताकि वायरस में किसी तरह के बदलाव का समय रहते पता लगाया जा सके.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 24 Aug 2026 17:30:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Swine Flu Cases: दिल्ली&amp;कर्नाटक में स्वाइन फ्लू का कहर! जानें क्या करें और क्या नहीं?</title>
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        <description><![CDATA[ Swine Flu H1N1 Cases Surge In Delhi And Karnataka: देशभर के कई राज्यों में स्वाइन फ्लू के मामले निकल कर सामने आ रहे हैं. राजधानी दिल्ली में H1N1 इन्फ्लुएंजा के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी देखने को मिल रही है. नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल के आंकड़ों के मुताबिक, 20 अगस्त 2026 तक दिल्ली में H1N1 के 1,777 मामले सामने आ चुके हैं. पिछले साल इसी समय में यह संख्या 229 थी. रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में इस साल 2 हजार केस का आंकड़ा पार हो चुका है. मामलों में बढ़ोतरी को देखते हुए राजधानी के अस्पतालों ने इन्फ्लुएंजा और उससे जुड़ी संभावित दिक्कतों वाले मरीजों के लिए अपनी तैयारियां मजबूत कर दी हैं. वहीं, कोलकाता और बेंगलुरु जैसे शहरों में भी हाल के दिनों में मामलों में बढ़ोतरी देखने को मिली है.
इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च ने साफ किया है कि H1N1 के मामलों में यह बढ़ोतरी किसी नए स्ट्रेन की वजह से नहीं है. ऐसे में लोगों को घबराने के बजाय जरूरी सावधानियां बरतने की सलाह दी गई है. इसी बीच देशभर में स्वाइन फ्लू के बढ़ते मामलों को देखते हुए कर्नाटक सरकार के स्वास्थ्य विभाग ने भी हेल्थ एडवाइजरी जारी की है. एडवाइजरी में मौसमी इन्फ्लुएंजा के प्रसार को कम करने के लिए लोगों से कुछ जरूरी सावधानियां बरतने की अपील की गई है.
क्या करें?
कर्नाटक स्वास्थ्य विभाग ने लोगों को सलाह दी है कि छींकते और खांसते समय नाक और मुंह को अच्छी तरह ढकें. इसके अलावा साबुन और पानी से नियमित रूप से हाथ धोते रहें. शरीर में पानी की कमी न हो, इसके लिए भरपूर मात्रा में तरल पदार्थ पीने की सलाह दी गई है. जिन लोगों में स्वाइन फ्लू के लक्षण दिखाई दे रहे हैं, उन्हें अलग यानी आइसोलेट रखने की सलाह दी गई है, ताकि इंफेक्शन के फैलाव को कम किया जा सके.

क्या न करें?
एडवाइजरी में लोगों से अपनी आंखों, नाक और मुंह को बार-बार छूने से बचने को कहा गया है. बिना डॉक्टर की सलाह के कोई दवा न लेने की सलाह भी दी गई है. अगर किसी व्यक्ति में फ्लू के लक्षण हैं, तो उसे हाथ मिलाने से बचना चाहिए. ऐसे लोगों को भीड़भाड़ वाली जगहों पर जाने से भी बचने की सलाह दी गई है. इसके अलावा इस्तेमाल किए गए रुमाल या नेपकिन का दोबारा इस्तेमाल न करने को कहा गया है. कर्नाटक सरकार ने लोगों से अपील की है कि वे घबराएं नहीं और इन्फ्लुएंजा से बचाव के लिए बताए गए एहतियाती उपायों का सख्ती से पालन करें.
कर्नाटक में कितने मामले आए?
राज्य में मौजूदा इन्फ्लुएंजा की स्थिति के बारे में स्वास्थ्य विभाग ने बताया कि इंटीग्रेटेड हेल्थ इंफॉर्मेशन प्लेटफॉर्म (IHIP) के जरिए रिपोर्ट किए गए निगरानी आंकड़ों के अनुसार, 22 अगस्त 2026 तक कर्नाटक के 32 जिलों में लैब से पुष्टि किए गए 4,212 इन्फ्लुएंजा-पॉजिटिव मामले दर्ज किए गए हैं. आंकड़ों के मुताबिक, 2025 में कर्नाटक में ऐसे मामलों की संख्या 4,583 थी, जबकि 2024 में 3,903 मामले दर्ज किए गए थे. स्वास्थ्य विभाग मौजूदा स्थिति पर निगरानी बनाए हुए है. वहीं, अगर पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता की बात करें, तो 22 जुलाई तक 20 मामले दर्ज किए गए थे.

अस्पतालों को जरूरी सामान तैयार रखने की सलाह
स्वाइन फ्लू से प्रभावी तरीके से निपटने के लिए कर्नाटक सरकार ने राज्यभर की स्वास्थ्य सुविधाओं को जरूरी सामान की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने की सलाह दी है. इनमें PPE, N95 मास्क और ओसेल्टामिविर &amp;nbsp;जैसी आवश्यक चीजें शामिल हैं. स्वास्थ्य विभाग ने स्वास्थ्यकर्मियों को ILI यानी इन्फ्लुएंजा जैसी बीमारी और SARI यानी गंभीर सांस संबंधी इंफेक्शन की शुरुआती पहचान, जोखिम का आकलन और मरीजों के प्रबंधन के बारे में जागरूक किया है.
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निजी अस्पतालों को भी दिए गए निर्देश
राज्य के निजी स्वास्थ्य संस्थानों को H1N1 के मामलों की जांच, टेस्टिंग और इलाज को लेकर राज्य सरकार की ओर से जारी मानक प्रोटोकॉल का पालन करने की सलाह दी गई है. इसके साथ ही IHIP प्लेटफॉर्म के जरिए निगरानी अधिकारियों को सभी मामलों की अनिवार्य रूप से रिपोर्ट करने को कहा गया है. फिलहाल दिल्ली समेत कुछ शहरों में H1N1 और मौसमी इन्फ्लुएंजा के मामलों में बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है. हालांकि, ICMR के मुताबिक, यह बढ़ोतरी किसी नए H1N1 स्ट्रेन की वजह से नहीं है. ऐसे में स्वास्थ्य विभाग लोगों से घबराने के बजाय साफ-सफाई, इंफेक्शन से बचाव और जरूरी सावधानियों का पालन करने की अपील कर रहे हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 24 Aug 2026 17:30:04 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>शुगर पेशेंट घर के लिए एक महीने में कितनी चाहिए चीनी? नोट कर लें हिसाब किताब</title>
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        <description><![CDATA[ चीनी के बढ़ते दामों ने इन दिनों लोगों की चिंता बढ़ा दी है. देशभर में चीनी की कीमतें लगातार ऊपर जा रही हैं और इसका असर आम लोगों की जेब पर भी पड़ रहा है. इन दिनों कई शहरों में चीनी के दाम 65 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गए हैं. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक साल में चीनी की कीमतों में 20 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ोतरी हुई है. चीनी की कीमतें बढ़ने के साथ-साथ घर के महीने भर के राशन में इसकी मात्रा को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं. खासकर डायबिटीज से जूझ रहे लोगों के लिए यह समझना जरूरी है कि रोजाना कितनी अतिरिक्त चीनी ली जा रही है. आमतौर पर डायबिटीज को चीनी से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक शरीर में कार्बोहाइड्रेट भी टूटकर ग्लूकोज में बदलते हैं और ब्लड शुगर को प्रभावित कर सकते हैं. ऐसे में आइए जानते हैं कि शुगर पेशेंट घर के लिए एक महीने में चीनी कितनी चाहिए.&amp;nbsp;
शुगर पेशेंट घर के लिए एक महीने में चीनी कितनी चाहिए?
डायबिटीज वाले व्यक्ति के लिए घर में एक महीने के लिए चीनी की कोई एक तय मात्रा नहीं होती है. हर व्यक्ति की जरूरत अलग होती है. यह उसकी सेहत, वजन, एक्टिविटी लेवल, डायबिटीज के प्रकार, दवाओं और पूरी डाइट पर निर्भर करती है. आमतौर पर डायबिटीज वाले लोगों को अतिरिक्त चीनी सीमित रखने की सलाह दी जाती है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, रोजाना मिलने वाली कुल कैलोरी में अतिरिक्त चीनी की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत से कम होनी चाहिए. वहीं, अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन (AHA) महिलाओं के लिए करीब 25 ग्राम और पुरुषों के लिए करीब 36 ग्राम अतिरिक्त चीनी रोजाना लेने की सीमा बताता है.&amp;nbsp;&amp;nbsp;डायबिटीज में चीनी पूरी तरह बंद करनी जरूरी है?
डायबिटीज में व्यक्ति को चीनी पूरी तरह बंद करनी जरूरी नहीं है. डायबिटीज वाले लोग चीनी युक्त चीजें खा सकते हैं, लेकिन मात्रा पर कंट्रोल रखना जरूरी है. चीनी के साथ-साथ कार्बोहाइड्रेट पर भी ध्यान देना जरूरी है. शरीर कार्बोहाइड्रेट को ग्लूकोज में बदलता है और इससे ब्लड शुगर प्रभावित हो सकता है.&amp;nbsp;
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डायबिटीज में ज्यादा चीनी खाने के नुकसान
डायबिटीज में ज्यादा चीनी का सेवन करने से ब्लड शुगर बढ़ सकता है, जिससे इसे कंट्रोल करना मुश्किल हो सकता है. लगातार ज्यादा ब्लड शुगर रहने पर समय के साथ हार्ट, ब्लड वेसेल्स, आंखों, नसों और किडनी से जुड़ी समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है. हालांकि चीनी खाना सीधे तौर पर डायबिटीज का कारण नहीं बनता है. डायबिटीज में चीनी की मात्रा के साथ-साथ कुल कार्बोहाइड्रेट और पूरी डाइट पर ध्यान देना जरूरी है.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 24 Aug 2026 01:30:03 +0530</pubDate>
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        <title>Drivers Heart Risk: 45 से कम उम्र के ड्राइवरों पर मंडरा रहा हार्ट अटैक का खतरा! जानें सच</title>
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        <description><![CDATA[ Auto And Cab Drivers Heart Attack Risk: ऑटो और कैब चलाने वाले लोगों की दिनचर्या अक्सर लंबे समय तक सड़क पर रहने, घंटों एक ही जगह बैठे रहने और ट्रैफिक के तनाव से भरी होती है. अब स्वास्थ्य एक्सपर्ट ने इस तरह की लाइफस्टाइलसे जुड़े हार्ट संबंधी जोखिमों पर चिंता जताई है. हेल्थ एजुकेटर प्रशांत देसाई ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट के जरिए एक कर्नाटक जिले के अचानक हुई कार्डियक मौत के मामलों का जिक्र करते हुए बताया कि पिछले 20 मामलों में से 6 लोग ऑटो या कैब ड्राइवर थे. उन्होंने यह भी कहा कि जिन 24 अचानक मौत के मामलों की जांच की गई, उनमें 14 लोग 45 साल से कम उम्र के थे.
देसाई ने अपने पोस्ट में ड्राइवरों की कामकाजी परिस्थितियों को लेकर चिंता जताई. उन्होंने बताया कि ऑटो और कैब ड्राइवरों को अक्सर रोजाना लंबे समय तक गाड़ी चलानी पड़ती है. घंटों बैठे रहना, ट्रैफिक और प्रदूषण का सामना करना, अनियमित नींद और लगातार तनाव उनके स्वास्थ्य पर असर डाल सकते हैं. उनका कहना है कि कई दूसरे पेशों में काम करने वाले लोगों के पास अपने काम और आराम का समय तय करने का विकल्प होता है, लेकिन ड्राइवरों की कमाई अक्सर सड़क पर बिताए गए समय से जुड़ी होती है. ऐसे में पर्याप्त आराम लेना उनके लिए मुश्किल हो सकता है.

उन्होंने ड्राइवरों के लिए नियमित हेल्थ चेकअप, काम के दौरान जरूरी ब्रेक और पर्याप्त नींद को प्राथमिकता देने की जरूरत बताई. हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि केवल लंबे समय तक ड्राइविंग को अचानक कार्डियक अरेस्ट की सीधी वजह नहीं माना जा सकता. लेकिन इससे जुड़े कई कारक हृदय रोग के खतरे को बढ़ा सकते हैं.
लंबे समय तक बैठने का दिल पर क्या असर पड़ता है?
KIMS Hospitals, ठाणे के कार्डियक साइंसेज विभाग के निदेशक और एचओडी डॉ. बी. सी. कलमठ के अनुसार, लंबे समय तक ड्राइविंग करने से हृदय रोग से जुड़े कई स्थापित जोखिम कारकों पर असर पड़ सकता है. रोजाना 10 से 12 घंटे तक गाड़ी की सीट पर बैठे रहने का मतलब है कि काम के दौरान शारीरिक गतिविधि बेहद कम हो जाती है.



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डॉ. कलमठ के मुताबिक, लंबे समय तक बैठने और पर्याप्त शारीरिक गतिविधि न होने से ब्लड सर्कुलेशन, ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल के स्तर पर निगेटिव असर पड़ सकता है. ऑटो और कैब ड्राइवर अक्सर कई घंटों तक एक ही स्थिति में बैठे रहते हैं, जिससे शरीर की सक्रियता कम हो जाती है. लंबे समय तक बनी रहने वाली ऐसी दिनचर्या हार्ट और&amp;nbsp;ब्लड वेसल्स से जुड़े जोखिमों को बढ़ा सकती है.
इसके अलावा, ड्राइवरों को लगातार मानसिक तनाव का भी सामना करना पड़ता है. ट्रैफिक जाम, समय पर पहुंचने का दबाव, यात्रियों की अपेक्षाएं और कमाई को लेकर चिंता कई लोगों को लंबे समय तक तनाव की स्थिति में रख सकती है. एक्सपर्ट के अनुसार, लगातार तनाव कोरोनरी आर्टरी डिजीज समेत अन्य हृदय संबंधी समस्याओं के जोखिम कारकों में योगदान कर सकता है.

प्रदूषण से बढ़ सकती है परेशानी
सड़क पर लंबे समय तक काम करने वाले ड्राइवरों को वाहनों से निकलने वाले धुएं और हवा में मौजूद प्रदूषकों का भी सामना करना पड़ता है. खासकर भारी ट्रैफिक वाले इलाकों में लंबे समय तक रहने से शरीर पर प्रदूषण का असर बढ़ सकता है.
डॉ. कलमठ के अनुसार, लंबे समय तक वायु प्रदूषण के संपर्क में रहने से शरीर में सूजन बढ़ सकती है और रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंच सकता है. यह हृदय पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है. धूम्रपान करने वालों में यह जोखिम और बढ़ सकता है. वहीं, अधिक शराब का सेवन हाई ब्लड प्रेशर और दिल की धड़कन की अनियमितता से भी जुड़ा हो सकता है. एक्सपर्ट का कहना है कि जब लंबे समय तक बैठने, तनाव, प्रदूषण, खराब नींद, धूम्रपान और अन्य अस्वस्थ आदतों जैसे कई कारक एक साथ मौजूद हों, तो हार्ट और ब्लड वेसल्स पर दबाव काफी बढ़ सकता है.
इसे भी पढ़ेंः&amp;nbsp;Delhi NCR Health Study: दिल्ली-NCR में हर 20 में से 1 को 2 गंभीर बीमारियां! स्टडी में बड़ा खुलासा
खराब नींद भी बन सकती है खतरा
कमाई बढ़ाने के लिए कई कैब और ऑटो ड्राइवर देर रात तक काम करते हैं या सुबह जल्दी एयरपोर्ट और दूसरी लंबी राइड के लिए निकल जाते हैं. इससे उनकी नींद का समय अनियमित हो सकता है. लगातार पर्याप्त नींद न मिलने पर ब्लड प्रेशर और तनाव से जुड़े हार्मोन बढ़ सकते हैं, जिसका असर शरीर के मेटाबॉलिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है. अनियमित या खराब नींद की वजह से शरीर को पर्याप्त आराम नहीं मिल पाता. विशेषज्ञ नींद को काम के लिए कुर्बान करने के बजाय स्वास्थ्य की प्राथमिकता मानने की सलाह देते हैं. थकान दूर करने के लिए जरूरत से ज्यादा कैफीन, सिगरेट या शराब का सहारा लेना भी स्थिति को बेहतर नहीं बनाता.
45 साल से कम उम्र होना पूरी सुरक्षा की गारंटी नहीं
डॉ. कलमठ का कहना है कि कम उम्र को देखकर हार्ट रोग के खतरे को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. 45 साल से कम उम्र के लोगों को भी हार्ट हेल्थ को लेकर सतर्क रहने की जरूरत है, खासकर अगर उनकी दिनचर्या में लंबे समय तक बैठना, तनाव, खराब नींद या अन्य जोखिम कारक शामिल हैं. ड्राइवरों को सीने में दबाव या बेचैनी, सांस फूलना, असामान्य पसीना आना, चक्कर आना या बेहोशी, दिल की तेज या अनियमित धड़कन, बिना वजह ज्यादा थकान और दर्द का हाथ, कंधे, पीठ या जबड़े तक फैलना जैसे संकेतों को गंभीरता से लेना चाहिए. अगर ये लक्षण नए हों, गंभीर हों या लगातार बने रहें, तो तुरंत मेडिकल जांच करानी चाहिए. यदि सीने में तकलीफ के साथ सांस फूलना, ज्यादा पसीना आना या बेहोशी जैसे लक्षण हों, तो खुद गाड़ी चलाकर अस्पताल जाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए.
लंबे घंटे काम करना जरूरी हो तो क्या करें?
एक्सपर्ट लंबे समय तक लगा ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 23 Aug 2026 13:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>देर तक रोककर रखते हैं टॉयलेट, शरीर में ये हो सकती हैं दिक्कतें</title>
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        <description><![CDATA[ कई लोग काम की व्यस्तता, सफर, स्कूल-कॉलेज या आसपास साफ टॉयलेट न होने की वजह से पशाब को लंबे समय तक रोककर रखते हैं. कभी-कभार ऐसा होना आम बात है, लेकिन अगर बार-बार लंबे समय तक पेशाब रोकने की आदत बन जाए तो यह यूरिनरी सिस्टम पर गहरा असर डाल सकती है. पेशाब की इच्छा को लगातार नजरअंदाज करने के बजाय शरीर के संकेतों को समझना बेहद जरूरी होता है.
हमारे शरीर में किडनी खून को फिल्टर करके न काम आने वाले पदार्थ और अतिरिक्त पानी को पेशाब के रूप में बाहर निकालती है. यह पेशाब मूत्राशय में जमा होता है और पर्याप्त मात्रा होने पर पेशाब करने की इच्छा महसूस होती है. सामान्य परिस्थितियों में इस संकेत को लंबे समय तक टालते रहना अच्छी आदत नहीं माना जाता.
यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन का हो सकता है खतरा
पेशाब को बार-बार रोकने से मूत्राशय में लंबे समय तक पेशाब जमा रह सकता है, जिसकी वजह से कुछ परिस्थितियों में इससे बैक्टीरिया को बढ़ने का मौका मिल सकता है और यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन (UTI) का जोखिम बढ़ जाता है. UTI होने पर पेशाब करते समय जलन, बार-बार पेशाब लगना, पेशाब में दर्द या निचले पेट में असहजता जैसे लक्षण दिखाई देते हैं.
ब्लैडर की कार्यप्रणाली हो सकती है प्रभावित
लंबे समय तक पेशाब रोकने की आदत मूत्राशय को जरूरत से ज्यादा खिंचाव की स्थिति में ला सकती है. अगर कोई व्यक्ति नियमित रूप से पेशाब की इच्छा को दबाता रहता है तो समय के साथ ब्लैडर के सामान्य तरीके से खाली होने में परेशानी हो जाती है. हालांकि, इसका असर व्यक्ति की आदत, स्वास्थ्य और अन्य परिस्थितियों पर निर्भर करता है. ऐसे में पेशाब आने पर हमेशा टॉयलेट जान चाहिए.
यह भी पढ़ें: Personal Hygiene Tips: प्राइवेट पार्ट और पर्सनल हाइजीन का रखें खास ख्याल, इन बातों को न करें नजरअंदाज
पेशाब पूरी तरह खाली न होने की समस्या
कुछ लोगों में लंबे समय तक पेशाब रोकने की आदत के साथ ब्लैडर को पूरी तरह खाली करने में परेशानी हो सकती है. पेशाब करने के बाद भी ऐसा महसूस हो सकता है कि ब्लैडर पूरी तरह खाली नहीं हुआ और दोबारा टॉयलेट जाने पर पेशाब न आने जैसी समस्या हो सकती है. अगर यह समस्या बार-बार हो रही है, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, क्योंकि इसके पीछे अन्य स्वास्थ्य कारण भी हो सकते हैं.
सामान्य तौर पर जब पेशाब की इच्छा हो तो सुविधानुसार जल्द टॉयलेट जाना बेहतर होता है. पानी भी जरूरत के अनुसार पीते रहें. कम पानी पीकर पेशाब की जरूरत को कम करने की कोशिश करना सही तरीका नहीं है. अगर पेशाब करते समय तेज जलन या दर्द हो, पेशाब में खून दिखाई दे, पेशाब करने में परेशानी हो या बार-बार UTI हो रहा हो, तो ऐसे में डॉक्टर स सलाह जरूर लेनी चाहिए.
यह भी पढ़ें: UTI in Women: महिलाओं में बार-बार क्यों होता है UTI, जानें किन बातों का रखें ख्याल?
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        <pubDate>Sun, 23 Aug 2026 13:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>डायबिटीज&amp;मोटापा बढ़ा रहे भारत की चिंता, चीन की तुलना में कैसी है हमारी स्थिति?</title>
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        <description><![CDATA[ भारत में स्वास्थ्य सेवाओं का दायरा बढ़ा है. प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों तक लोगों की पहुंच बेहतर हुई है और स्वास्थ्य बीमा का कवरेज भी बढ़ा है. इसके बावजूद मधुमेह, मोटापा और उच्च रक्तचाप जैसी जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां हमारे देश में लगातार चिंता का विषय बनी हुई हैं. सामने आए आंकड़े बताते हैं कि बीमारी का समय रहते पता लगाना और रोकथाम पर जोर देना अब पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गया है.
मधुमेह बना चिंता का विषय
आंकड़ों के मुताबिक, भारत में मधुमेह का प्रसार पुरुषों और महिलाओं दोनों में बढ़ा है. 2015-16 के मुकाबले 2019-21 से 2022-24 के बीच पुरुषों में यह आंकड़ा करीब 15.6 प्रतिशत से बढ़कर 20.9 प्रतिशत हो गया. वहीं महिलाओं में भी मधुमेह का प्रसार 13.5 प्रतिशत से बढ़कर 17.8 प्रतिशत तक पहुंचा है. यह बढ़ोतरी केवल एक स्वास्थ्य आंकड़ा नहीं है, बल्कि बदलती जीवनशैली की ओर भी संकेत करती है. कम शारीरिक गतिविधि, खानपान में बदलाव, बढ़ता वजन और शहरी जीवनशैली मधुमेह के जोखिम को बढ़ाने वाले प्रमुख कारणों में शामिल हैं.
मधुमेह के साथ मोटापा भी बढ़ रहा
मधुमेह के साथ बढ़ता वजन और मोटापा भी भारत के लिए गंभीर चुनौती बन रहा है. उपलब्ध आंकड़ों में महिलाओं में अधिक वजन और मोटापे का स्तर 24 प्रतिशत से बढ़कर 30.7 प्रतिशत और पुरुषों में 22.9 प्रतिशत से बढ़कर 27.3 प्रतिशत बताया गया है. एक सर्वे के अनुसार, वयस्क मोटापे का स्तर चीन में भारत से अधिक है. चीन में यह करीब 8.3 प्रतिशत, जबकि भारत में 7.3 प्रतिशत बताया गया है. यानी मोटापे के मामले में चीन की स्थिति कुछ हालातों में भारत से खराब दिखाई देती है, लेकिन भारत में बढ़ता मोटापा भी चिंता का विषय है. डब्ल्यूएचओ के अनुसार अधिक वजन और मोटापा गैर-संचारी रोगों के महत्वपूर्ण जोखिम कारणों में शामिल हैं.
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उच्च रक्तचाप में भी चीन आगे
भारत में पुरुषों में इसका स्तर करीब 21.3 प्रतिशत से बढ़कर 22.1 प्रतिशत हुआ, जबकि महिलाओं में यह 24 प्रतिशत से घटकर 19.4 प्रतिशत रहा. वहीं तुलना में चीन में उच्च रक्तचाप और मोटापे का बोझ कई हालातों पर अधिक दिखाई दता है.
भारत के लिए चुनौती
भारत की सबसे बड़ी चुनौती बीमारी के इलाज से पहले उसकी रोकथाम को मजबूत करना है. नियमित स्वास्थ्य जांच, रक्तचाप और रक्त शर्करा की समय पर जांच, वजन पर नियंत्रण, संतुलित आहार और रोजाना शारीरिक गतिविधि को प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं का हिस्सा बनाना बहद जरूरी है. डब्ल्यूएचओ के अनुसार 2024 के अंत तक भारत में 1.7 करोड़ से अधिक उच्च रक्तचाप और मधुमेह के मरीज उपचार प्राप्त कर रहे थे, हालांकि देखभाल की निरंतरता और मधुमेह की प्रभावी निगरानी अब भी चुनौती बनी हुई है.
बीमारी को रोकने पर देना होगा ध्यान
भारत और चीन दोनों ही गैर-संचारी रोगों के बढ़ते बोझ का सामना कर रहे हैं. फर्क यह है कि भारत में मधुमेह और अधिक वजन जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रह हैं, जबकि चीन कई हालातों में पहले से अधिक ऊंचे स्तर पर है. ऐसे में भारत के लिए यह समय चेतावनी को समझने और बीमारी बढ़ने से पहले कदम उठाने का है. स्वास्थ्य व्यवस्था पर महंगा इलाज का बोझ बढ़ने से बेहतर है कि नियमित जांच, बेहतर खानपान और सक्रिय जीवनशैली के जरिए बीमारी को शुरुआती स्तर पर ही रोका जाए.
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        <pubDate>Sun, 23 Aug 2026 13:30:05 +0530</pubDate>
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        <title>दवाओं पर 80% डिस्काउंट का दावा फर्जी तो नहीं? मेडिकल स्टोर्स पर सरकार सख्त</title>
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        <description><![CDATA[ दिल्ली में मेडिकल स्टोर्स पर दवाओं के डिस्काउंट को लेकर Drugs Control Department ने सख्ती दिखाई है. विभाग ने मेडिकल स्टोर्स पर लगाए जाने वाले &amp;lsquo;UP TO 60%, 70% और 80% DISCOUNT&amp;rsquo; जैसे दावों को लेकर Advisory जारी की है. हालांकि, विभाग ने साफ किया है कि MRP से कम कीमत पर दवा बेचना प्रतिबंधित नहीं है. आपत्ति ऐसे डिस्काउंट दावों पर है जो गलत, बढ़ा-चढ़ाकर किए गए, भ्रामक या अस्पष्ट हों और जिनसे ग्राहक को भ्रम हो सकता है.
क्या है पूरा मामला?
Drugs Control Department ने देखा कि दिल्ली की कुछ रिटेल फार्मेसियों पर दवाओं पर भारी डिस्काउंट के दावे करने वाले बोर्ड, बैनर और विज्ञापन लगाए जा रहे हैं. विभाग ने कहा है कि अगर किसी मेडिकल स्टोर पर डिस्काउंट का दावा किया जा रहा है तो वह वास्तविक होना चाहिए और ग्राहक को वास्तव में मिलना चाहिए. यानी बोर्ड पर जितना डिस्काउंट लिखा है, ग्राहक को वही फायदा मिलना चाहिए.
डिस्काउंट का रिकॉर्ड भी जरूरी
विभाग ने मेडिकल स्टोर्स को कहा है कि ग्राहक को दिया गया डिस्काउंट Sale Bill और दुकान के Purchase Records से जांचा जा सके. साथ ही दवाओं की खरीद Genuine Drug Licence वाले Distributors या Wholesalers से करने की सलाह दी गई है.
बहुत ज्यादा डिस्काउंट पर क्यों सवाल?
विभाग ने कहा है कि अगर किसी दवा पर इतना ज्यादा डिस्काउंट दिखाया जा रहा है कि उसकी बिक्री कीमत उस कीमत से भी कम नजर आती है जिस कीमत पर दुकानदार ने दवा खरीदी थी, तो दवा की खरीद के स्रोत की विश्वसनीयता पर सवाल उठ सकते हैं. इसीलिए मेडिकल स्टोर्स को अपनी खरीद और बिक्री का रिकॉर्ड ठीक रखने की सलाह दी गई है.
मेडिकल स्टोर्स को अपने बोर्ड चेक करने होंगे
Drugs Control Department की Advisory के बाद Retail Distribution Chemist Alliance (RDCA) One Delhi ने भी अपने सदस्यों के लिए Circular जारी किया है. Association ने मेडिकल स्टोर्स से अपनी दुकानों पर लगे सभी डिस्काउंट से जुड़े प्रचार की समीक्षा करने को कहा है. इसमें Discount Boards, Banners, Posters, Printed Advertisements और Digital Displays शामिल हैं. Association ने खास तौर पर &amp;lsquo;UP TO __% DISCOUNT&amp;rsquo; जैसे दावों की भी जांच करने को कहा है. अगर कोई दावा गलत, बढ़ा-चढ़ाकर किया गया, भ्रामक या अस्पष्ट है तो उसे हटाने या सही करने की सलाह दी गई है.
यह भी पढ़ें: पीरियड की हर परेशानी हार्मोनल नहीं! ये संकेत हो सकते हैं गंभीर बीमारी का इशारा
RDCA ने क्या कहा?
RDCA One Delhi ने अपने सदस्यों से पारदर्शिता बनाए रखने, ग्राहकों के हितों का ध्यान रखने और भ्रामक कारोबारी प्रचार से बचने की अपील की है. Association ने कहा है कि मेडिकल स्टोर्स को अपने प्रचार में यह सुनिश्चित करना चाहिए कि डिस्काउंट और दवाओं की कीमत से जुड़ी जानकारी वास्तविक, पारदर्शी और जिम्मेदारी के साथ दी जाए.
17 अगस्त को Advisory, 21 अगस्त को Circular
Drugs Control Department की Advisory 17 अगस्त 2026 को जारी हुई थी. इसके बाद RDCA One Delhi ने 21 अगस्त 2026 को अपने सदस्यों के लिए Circular जारी किया. सीधी बात यह है कि दवा MRP से कम कीमत पर बेचना जारी रह सकता है, लेकिन डिस्काउंट के नाम पर ग्राहक को भ्रमित करने वाले दावे नहीं किए जा सकते. 60%, 70% या 80% तक डिस्काउंट का दावा करने वाले मेडिकल स्टोर्स को अब यह सुनिश्चित करना होगा कि उनका दावा वास्तविक हो, ग्राहक को वही डिस्काउंट मिले और जरूरत पड़ने पर उसका रिकॉर्ड बिल और खरीद दस्तावेजों से दिखाया जा सके.
यह भी पढ़ें: दिल्ली में बढ़ रहे H1N1के केस, मरीजों में गिर रहा ऑक्सीजन लेवल ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 22 Aug 2026 21:30:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>दवाओं, पर, 80, डिस्काउंट, का, दावा, फर्जी, तो, नहीं, मेडिकल, स्टोर्स, पर, सरकार, सख्त</media:keywords>
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        <title>मेडिकल स्टोर से नकली दवा तो नहीं खरीद रहे? ऐसे करें पहचान</title>
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        <description><![CDATA[ अहमदाबाद से एक बड़ी ही झकझोर देने वाली खबर सामने आई है. यहां&amp;nbsp; दिल की बीमारी में इस्तेमाल होने वाली दवा की भारी मात्रा में नकली टैबलेट पकड़ी गई हैं. जांच एजेंसियों ने Nicardia Retard 10 MG नाम की दवा की करीब 7.20 लाख नकली टैबलेट बरामद की हैं. यह दवा हाई ब्लड प्रेशर और दिल से जुड़ी बीमारियों के मरीजों को दी जाती है, इसलिए इसकी नकली सप्लाई सामने आने से मरीजों की सेहत को लेकर गंभीर चिंता खड़ी हो गई है. इतनी बड़ी तादाद में नकली दवा बाजार में पहुंचना यह दिखाता है कि नकली दवाओं का यह रैकेट कितने बड़े स्तर पर काम कर रहा था.&amp;nbsp;
फिलहाल इस मामले में आगे की जांच चल रही है और यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि ये नकली टैबलेट कहां-कहां तक सप्लाई हो चुकी थीं. ऐसे में यह जानना बेहद जरूरी हो जाता है कि नकली दवा की पहचान कैसे की जाए, इसके क्या नुकसान हो सकते हैं और अगर किसी को नकली दवा मिले तो उसे कहां शिकायत करनी चाहिए.
नकली दवा की पहचान कैसे करें?
नकली दवा को पहचानना आसान नहीं होता, लेकिन कुछ बातों का ध्यान रखकर इसका अंदाजा लगाया जा सकता है. सबसे पहले दवा की पैकिंग को ध्यान से देखना चाहिए. असली दवा की पैकिंग पर छपाई एकदम साफ और सही होती है, जबकि नकली दवा में अक्षर धुंधले, स्पेलिंग गलत या रंग हल्का अलग नजर आ सकता है. साथ ही दवा पर बैच नंबर, मैन्युफैक्चरिंग डेट और एक्सपायरी डेट जरूर चेक करनी चाहिए. अगर यह जानकारी मिटी हुई है, गायब है या ठीक से प्रिंट नहीं हुई है, तो यह नकली दवा है सकती है.&amp;nbsp;
इसके अलावा, कई दवा कंपनियां अब पैकेट पर QR कोड या होलोग्राम भी देती हैं, जिन्हें स्कैन करके दवा असली है या नहीं, यह पता किया जा सकता है. साथ ही अगर दवा हमेशा से जानी-पहचानी दुकान के बजाय किसी अनजान या बहुत सस्ते दाम पर बेचने वाली जगह से मिल रही है, तो वहां से दवा खरीदने से पहले सतर्क रहना चाहिए. दवा खाने के बाद अगर असर सामान्य से अलग महसूस हो या कोई नई दिक्कत हो, तो भी यह नकली दवा का संकेत हो सकता है.&amp;nbsp;
नकली दवा के नुकसान
नकली दवा के नुकसान बेहद गंभीर हो सकते हैं, खासतौर पर तब जब बात दिल की बीमारी जैसी गंभीर स्थिति की हो. हार्ट पेशेंट्स को दी जाने वाली दवाएं ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने और दिल की धड़कन को सामान्य बनाए रखने का काम करती हैं. अगर मरीज को नकली दवा मिल जाए, तो उससे बीमारी कंट्रोल में नहीं आती और स्थिति और बिगड़ सकती है. साथ ही कई बार नकली दवाओं में गलत या हानिकारक केमिकल भी मिला दिए जाते हैं, जो शरीर के दूसरे अंगों को भी नुकसान पहुंचा सकते हैं. हार्ट पेशेंट्स के लिए यह खतरा और बढ़ जाता है, क्योंकि सही समय पर सही दवा न मिलने से हार्ट अटैक जैसी जानलेवा स्थिति भी बन सकती है.
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नकली दवा मिल जाए तो कहां शिकायत करें
अगर किसी को शक हो कि उसे नकली दवा मिली है, तो सबसे पहले उस दवा को इस्तेमाल करना तुरंत बंद कर देना चाहिए और डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए. इसके बाद इसकी शिकायत राज्य के फूड एंड ड्रग कंट्रोल एडमिनिस्ट्रेशन यानी FDCA में की जा सकती है. हर राज्य में यह विभाग मौजूद होता है और नकली, मिलावटी या अवैध दवाओं से जुड़ी शिकायतें यहीं दर्ज कराई जाती हैं. इसके अलावा, Central Drugs Standard Control Organisation यानी CDSCO के पास भी शिकायत की जा सकती है, जिसकी आधिकारिक वेबसाइट पर ऑनलाइन शिकायत दर्ज करने की सुविधा दी गई है.&amp;nbsp;
जिस दुकान या मेडिकल स्टोर से दवा खरीदी गई है, उसका बिल संभालकर रखना भी जरूरी है, क्योंकि शिकायत के समय यह सबूत के तौर पर काम आता है. साथ ही, नजदीकी पुलिस थाने में भी इसकी शिकायत दर्ज कराई जा सकती है, क्योंकि नकली दवा बेचना और बनाना कानूनी तौर पर गंभीर अपराध माना जाता है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Sat, 22 Aug 2026 21:30:04 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Flight Attendants Cancer Risk: पायलट और एयर होस्टेस में कैंसर का जोखिम ज्यादा? नई स्टडी ने बढ़ाई चिंता</title>
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        <description><![CDATA[ Pilot And Flight Attendant Cancer Risk Study: आसमान में हजारों घंटे बिताने वाले पायलट और फ्लाइट अटेंडेंट्स को लंबे समय तक एक ऐसे जोखिम का सामना करना पड़ सकता है, जिस पर अब नई रिसर्च ने चिंता बढ़ा दी है. एक स्टडी में पाया गया है कि 500 से अधिक अलग-अलग पेशों की तुलना में फ्लाइट अटेंडेंट्स और पायलट्स में रेडिएशन से जुड़े कैंसर के कारण होने वाली मौतों का अनुपात सबसे ज्यादा था. रिसर्चर ने इसके पीछे उड़ान के दौरान लंबे समय तक कॉस्मिक रेडिएशन के संपर्क को एक संभावित वजह के रूप में देखा है. यह स्टडी हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के रिसर्चर ने किया है और इसके निष्कर्ष JAMA Internal Medicine में प्रकाशित हुए हैं.
1.27 करोड़ से ज्यादा लोगों के आंकड़ों का किया गया एनालिसिस
रिसर्चर ने अमेरिका में 2020 से 2024 के बीच हुई करीब 1.27 करोड़ मौतों के डेथ सर्टिफिकेट से जुड़े आंकड़ों का एनालिसिस किया. इस दौरान 503 अलग-अलग पेशों को शामिल किया गया और उन कैंसर से होने वाली मौतों की तुलना की गई, जिन्हें रेडिएशन के संपर्क से जोड़ा जा सकता है. रिसर्च में फ्लाइट अटेंडेंट्स पहले स्थान पर रहे, जबकि पायलट दूसरे स्थान पर थे. दोनों पेशों में रेडिएशन से जुड़े कैंसर के कारण मौतों का अनुपात अध्ययन में शामिल कई दूसरे पेशों की तुलना में अधिक पाया गया. इसमें न्यूक्लियर मेडिसिन से जुड़े कुछ पेशे भी शामिल थे.

रिसर्चर के अनुसार, दूसरे पेशों की तुलना में फ्लाइट अटेंडेंट्स में रेडिएशन से जुड़े कैंसर से मृत्यु का जोखिम करीब 50 प्रतिशत अधिक था. वहीं, पायलट्स में यह आंकड़ा लगभग 36 प्रतिशत ज्यादा पाया गया. हालांकि, अध्ययन में एक अहम बात यह भी सामने आई कि एयरक्रू में कुल मिलाकर हर तरह के कैंसर का स्तर असामान्य रूप से ज्यादा नहीं था. जिन कैंसर को रेडिएशन से संबंधित नहीं माना गया, उनमें पायलट और फ्लाइट अटेंडेंट्स के नतीजे अध्ययन में शामिल अन्य पेशों के बीच के स्तर के करीब थे.
उड़ान के दौरान कॉस्मिक रेडिएशन क्यों चिंता का विषय है?
इस अध्ययन में सबसे बड़ी चिंता कॉस्मिक रेडिएशन को लेकर जताई गई है. अंतरिक्ष से आने वाले उच्च ऊर्जा वाले कणों से पृथ्वी का वायुमंडल हमें काफी हद तक सुरक्षा देता है. लेकिन जैसे-जैसे ऊंचाई बढ़ती है, यह सुरक्षा कम होती जाती है. कमर्शियल फ्लाइट जिस ऊंचाई पर उड़ती हैं, वहां कॉस्मिक रेडिएशन का संपर्क जमीन की तुलना में अधिक हो सकता है. पायलट और फ्लाइट अटेंडेंट्स अपने करियर में हजारों घंटे इसी ऊंचाई पर बिताते हैं, इसलिए उनके कुल एक्सपोजर पर वैज्ञानिकों की नजर है.

यह एक्सपोजर हर व्यक्ति में एक जैसा नहीं होता. फ्लाइट कितने समय की है, विमान किस रूट से जा रहा है और उड़ान किस अक्षांश से गुजरती है, जैसे कई कारक रेडिएशन की मात्रा को प्रभावित कर सकते हैं. अनुमान के मुताबिक, एयरक्रू के सदस्य हर साल लगभग 3 से 6 मिलीसिवर्ट कॉस्मिक रेडिएशन के संपर्क में आ सकते हैं. इसकी तुलना में साल में 10 क्रॉस-कंट्री रिटर्न फ्लाइट करने वाले एक आम यात्री को करीब 0.4 मिलीसिवर्ट रेडिएशन मिलने का अनुमान लगाया गया है.
क्या सिर्फ रेडिएशन ही कैंसर के लिए जिम्मेदार है?
रिसर्चर ने कहा है कि इस स्टडी के आधार पर कॉस्मिक रेडिएशन को कैंसर की मौतों का सीधा कारण नहीं कहा जा सकता. पायलट और फ्लाइट अटेंडेंट्स की लाइफस्टाइल और कामकाज से जुड़े दूसरे कारक भी कैंसर के जोखिम को प्रभावित कर सकते हैं.एक्सपर्ट ने विमान की खिड़कियों से आने वाली अल्ट्रावॉयलेट रेडिएशन, रात की फ्लाइट, शिफ्ट ड्यूटी और शरीर की प्राकृतिक बायोलॉजिकल क्लॉक में होने वाले बदलाव को भी संभावित कारकों के रूप में देखा है. लगातार अलग-अलग टाइम जोन में यात्रा करने और अनियमित काम के घंटों से नींद और शरीर की सर्कैडियन रिदम प्रभावित हो सकती है.
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इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि हर पायलट या फ्लाइट अटेंडेंट को केवल कॉस्मिक रेडिएशन की वजह से कैंसर का खतरा बढ़ जाता है. अध्ययन मुख्य रूप से एक ऐसे पैटर्न की ओर इशारा करता है, जिस पर आगे और गहराई से जांच की जरूरत है.
क्या एयरक्रू के लिए ज्यादा सुरक्षा की जरूरत है?
शोधकर्ताओं का कहना है कि ये निष्कर्ष एयरक्रू के लिए कार्यस्थल पर रेडिएशन से सुरक्षा से जुड़े नियमों पर दोबारा विचार करने की जरूरत दिखाते हैं. अमेरिका में Federal Aviation Administration एयरक्रू को आयनाइजिंग रेडिएशन के संपर्क में आने वाला पेशेवर समूह मानता है. हालांकि, अध्ययन में शोधकर्ताओं ने यह भी कहा कि अमेरिका में एयरक्रू पर दूसरे रेडिएशन के संपर्क में काम करने वाले कर्मचारियों की तरह फेडरल स्तर पर डोज लिमिट या नियमित मॉनिटरिंग की अनिवार्य व्यवस्था नहीं है. इसी वजह से वैज्ञानिकों ने एयरक्रू के एक्सपोजर के स्तर के अनुरूप बेहतर सुरक्षा उपायों पर विचार करने की बात कही है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 22 Aug 2026 21:30:04 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>भारत में बढ़े डायबिटीज और मोटापे के मामले, बीपी में मामूली राहत</title>
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        <description><![CDATA[ भारत ने पिछले कुछ सालों में स्वास्थ्य सेवाओं और बीमा की सुविधाओं में काफी सुधार किया है, जिससे सेहत को लेकर एक नई तस्वीर सामने आई है. नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS) की ताजा रिपोर्ट बताती है कि देश में डायबिटीज और हाई ब्लड शुगर की समस्या तेजी से बढ़ रही है. यह बदलाव सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारी बदलती जीवनशैली, खानपान की आदतों और घटती शारीरिक गतिविधि की तरफ भी इशारा करता है.
हालांकि, रिपोर्ट में एक राहत भरी बात यह है कि हाई ब्लड प्रेशर यानी बीपी के मामलों में मामूली गिरावट देखी गई है. यह आंकड़े बताते हैं कि जहां एक तरफ हमें डायबिटीज को लेकर ज्यादा सतर्क होने की जरूरत है, वहीं दूसरी तरफ बीपी को कंट्रोल करने की दिशा में हम सही रास्ते पर हैं.
डायबिटीज और शुगर में हुई बढ़ोतरी
रिपोर्ट के अनुसार, भारत में डायबिटीज और हाई ब्लड शुगर की समस्या दोनों में साफ बढ़त देखी गई है. पुरुषों में यह आंकड़ा पहले 17.8% था, जो अब बढ़कर 20.9% हो गया है. वहीं महिलाओं में भी यह समस्या 13.5% से बढ़कर 15.6% तक पहुंच गई है. यानी हर पांच में से एक पुरुष और हर सात में से एक महिला अब हाई ब्लड शुगर की चपेट में है. इसके साथ ही मोटापे और ओवरवेट की समस्या भी बढ़ी है, खासकर महिलाओं में यह बदलाव सबसे ज्यादा नजर आया है, जहां यह आंकड़ा 24% से बढ़कर 30.7% हो गया है.
पुरुषों में भी मोटापे की दर 21.3% से बढ़कर 22.9% हुई है. यह आंकड़े साफतौर पर बताते हैं कि हमें अपने खानपान और रोजमर्रा की जीवनशैली पर गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है, क्योंकि डायबिटीज और मोटापा आगे चलकर दिल की बीमारियों और किडनी से जुड़ी दिक्कतों का कारण भी बन सकते हैं.
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बीपी के मामलों में मिली थोड़ी राहत
जहां डायबिटीज और शुगर को लेकर चिंता बढ़ी है वहीं हाई ब्लड प्रेशर यानी बीपी के मामलों में हल्की गिरावट देखने को मिली है. रिपोर्ट के मुताबिक, बीपी का आंकड़ा 24.3% से घटकर 23.4% के आसपास आ गया है. यह गिरावट भले ही बड़ी न लगे, लेकिन यह इस बात का संकेत है कि लोगों में बीपी को लेकर जागरूकता थोड़ी बढ़ी है और समय पर इलाज व दवाइयां लेने की आदत में सुधार हुआ है. हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ बीपी में राहत मिलना काफी नहीं है, क्योंकि डायबिटीज और मोटापा जैसी बीमारियां लगातार बढ़ रही हैं और अगर समय रहते इन पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले सालों में यह देश के लिए एक बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बन सकती हैं. इसलिए जरूरी है कि लोग नियमित रूप से अपनी शुगर और वजन की जांच कराएं, संतुलित खानपान अपनाएं और रोजाना कुछ समय शारीरिक गतिविधि के लिए जरूर निकालें.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Sat, 22 Aug 2026 21:30:02 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Global Warming Risk: 3°C ग्लोबल वार्मिंग बढ़ने से 80 पर्सेंट बुजुर्गों पर मौत का खतरा, जानें वजह</title>
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        <description><![CDATA[ Global Warming&amp;nbsp;Risk : बढ़ता तापमान बुजुर्गों के लिए गंभीर स्वास्थ्य खतरा बनता जा रहा है. द लैंसेट प्लैनेटरी हेल्थ में प्रकाशित एक नई स्टडी ने ग्लोबल वार्मिंग को लेकर चिंता बढ़ाने वाली तस्वीर पेश की है. अध्ययन के मुताबिक, अगर दुनिया का औसत तापमान औद्योगिक दौर से पहले के स्तर की तुलना में 3&amp;deg;C या उससे ज्यादा बढ़ता है, तो भारत समेत दक्षिण एशिया के करोड़ों बुजुर्गों को दिन और रात दोनों समय खतरनाक गर्मी का सामना करना पड़ सकता है. भारत इस खतरे में दुनिया के सबसे संवेदनशील देशों में शामिल है.
3&amp;deg;C तापमान बढ़ा तो 80 पर्सेंट बुजुर्गों पर खतरा
स्टडी के अनुसार, भारत, चीन, पाकिस्तान और बांग्लादेश में रहने वाले बुजुर्गों को 3&amp;deg;C ग्लोबल वार्मिंग की स्थिति में साल के करीब तीन महीने तक दिन-रात खतरनाक गर्मी का सामना करना पड़ सकता है. इन चार देशों में दुनिया की करीब 73 फीसदी बुजुर्ग आबादी रहती है. &amp;nbsp;भारत में स्थिति और भी चिंताजनक बताई गई है. 3&amp;deg;C तापमान बढ़ने की स्थिति में भारत की आधी से ज्यादा आबादी और 80 फीसदी से ज्यादा बुजुर्गों को हर साल औसतन कम से कम 180 घंटे ऐसी गर्मी झेलनी पड़ सकती है, जिसे शरीर के लिए सहन करना बेहद मुश्किल माना गया है.&amp;nbsp;
दिल्ली और इंडो-गंगेटिक प्लेन में ज्यादा असर
स्टडी में दिल्ली और बड़े इंडो-गंगेटिक प्लेन को खास तौर पर संवेदनशील क्षेत्र बताया गया है. यहां बुजुर्गों को 1.5&amp;deg;C ग्लोबल वार्मिंग की स्थिति में ही सालाना करीब 1,000 या उससे ज्यादा घंटे असहनीय गर्मी का सामना करना पड़ सकता है. यह तापमान स्तर करीब 2030 के आसपास पहुंचने की उम्मीद जताई गई है. &amp;nbsp;वहीं अगर ग्लोबल वार्मिंग 3&amp;deg;C तक पहुंचती है तो यह अवधि 2,000 घंटे से ज्यादा हो सकती है. खास बात यह है कि यह गर्मी पूरे साल समान रूप से नहीं फैलेगी, बल्कि इसका बड़ा हिस्सा मई से सितंबर के बीच केंद्रित रहेगा.&amp;nbsp;
कई महीनों तक दिन-रात झेलनी पड़ सकती है गर्मी
स्टडी की प्रमुख लेखिका प्रोफेसर किंगकिंग कोंग के मुताबिक, 3&amp;deg;C से ज्यादा तापमान बढ़ने पर बुजुर्गों को लगातार कई महीनों तक दिन और रात दोनों समय असहनीय गर्मी का सामना करना पड़ सकता है. ऐसी स्थिति में कूलिंग की सुविधा, बिजली, स्वास्थ्य सेवाओं और हीट-रिस्पॉन्स प्रोग्राम पर काफी दबाव पड़ सकता है.&amp;nbsp;
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बुजुर्गों के लिए कम तापमान पर भी ज्यादा खतरा
रिसर्च के मुताबिक, बुजुर्गों का शरीर गर्मी को कंट्रोल करने में युवाओं की तुलना में कम सक्षम होता है. वे कम पसीना बहाते हैं, उनकी ब्लड वेसल्स की प्रतिक्रिया धीमी होती है और गर्मी में उनके दिल को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है. इसी वजह से पहले किए गए कुछ अध्ययनों में बुजुर्गों पर पड़ने वाले खतरे का अनुमान कम लगाया गया हो सकता है. अध्ययन में 15-39 साल, 40-59 साल और 60 साल से ज्यादा उम्र के लोगों की गर्मी सहने की क्षमता को अलग-अलग देखा गया. इसके आधार पर अलग-अलग तापमान स्तरों पर खतरे और प्रभावित होने वाली आबादी का अनुमान लगाया गया.&amp;nbsp;
दक्षिण एशिया को बताया गया सबसे संवेदनशील क्षेत्र
अध्ययन के मुताबिक भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार और नाइजर जैसे देश ज्यादा जोखिम में हैं. इसकी एक वजह बड़ी आबादी का गर्मी के संपर्क में आना और गरीबी का ज्यादा होना है, जिससे गर्मी से बचने की क्षमता प्रभावित होती है. विशेषज्ञों के मुताबिक, उम्र बढ़ने के साथ शरीर की गर्मी कंट्रोल करने की क्षमता कम होती जाती है. उनके मुताबिक दक्षिण एशिया में बुजुर्गों के लिए बढ़ता हीट स्ट्रेस एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चेतावनी है. विशेषज्ञों के मुताबिक, हीट-हेल्थ सिस्टम में उम्र, तापमान, नमी, गर्मी के संपर्क की अवधि और रात के तापमान जैसे कारकों को भी ध्यान में रखना जरूरी है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 21 Aug 2026 01:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Heart Valves Disease: सांस फूलना पड़ा भारी, दिल में छिपी थी बड़ी बीमारी</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/heart-valves-disease-सांस-फूलना-पड़ा-भारी-दिल-में-छिपी-थी-बड़ी-बीमारी</link>
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        <description><![CDATA[ Heart Valves Disease : कई बार शरीर में दिखने वाली मामूली परेशानी के पीछे कोई गंभीर वजह छिपी हो सकती है. ऐसा ही कुछ एक शख्स के साथ हुआ. करीब एक महीने से उन्हें लगातार खांसी परेशान कर रही थी. आमतौर पर ऐसी खांसी को लोग संक्रमण, एलर्जी या सांस की नली में जलन से जोड़कर देखते हैं. उन्होंने ने भी दवाएं लीं और उम्मीद की कि कुछ समय में समस्या ठीक हो जाएगी, लेकिन राहत ज्यादा देर नहीं मिली. धीरे-धीरे खांसी बढ़ने लगी और इसके साथ सांस फूलना और ऑक्सीजन लेवल कम होना जैसे लक्षण भी सामने आने लगे. जब वह अस्पताल पहुंचे तो उन्हें लगा था कि सिर्फ खांसी की जांच होगी, लेकिन जांच में दिल से जुड़ी गंभीर समस्या सामने आई.&amp;nbsp;
खांसी के पीछे छिपे थे कई संकेत
अस्पताल पहुंचने तक शख्स कई महीनों से अलग-अलग परेशानियों से जूझ रहे थे. उन्हें सांस फूलने, थकान और लगातार तेज धड़कन की समस्या हो रही थी. अस्पताल के डायरेक्टर के मुताबिक, मरीज जल्दी थक जाता था और उसके कई लक्षण एक साथ दिखाई दे रहे थे. &amp;nbsp;इनमें से हर लक्षण को अलग-अलग देखने पर वजह सामान्य लग सकती थी. थकान को बिजी रूटी, तेज धड़कन को तनाव और सांस फूलने को कमजोरी या खांसी से जोड़ना आसान था, लेकिन जब इन सभी लक्षणों को एक साथ देखा गया तो मामला दिल की ओर इशारा कर रहा था. जांच और हार्ट इमेजिंग के बाद पता चला कि शख्स के एओर्टिक और माइट्रल दोनों वाल्व गंभीर रूप से संकरे हो चुके थे.&amp;nbsp;
जब म हो जाएं तो क्या होता है?
हमारे दिल में चार वाल्व होते हैं, जो एक तरफा दरवाजे की तरह काम करते हैं. ये खून को सही दिशा में आगे बढ़ने देते हैं और वापस जाने से रोकते हैं. माइट्रल वाल्व बाएं एट्रियम से बाएं वेंट्रिकल तक खून पहुंचाने में मदद करता है, जबकि एओर्टिक वाल्व बाएं वेंट्रिकल से एओर्टा तक खून जाने का रास्ता देता है. &amp;nbsp;जब किसी वाल्व का रास्ता संकरा हो जाता है तो इसे स्टेनोसिस कहा जाता है. ऐसी स्थिति में खून आसानी से आगे नहीं बढ़ पाता और दिल को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है. &amp;nbsp;इस मामले में एक साथ दो वाल्व प्रभावित होने के कारण दिल पर दबाव और बढ़ गया था.&amp;nbsp;
रूमेटिक हार्ट डिजीज होने का कारण&amp;nbsp;
भारत में हार्ट वाल्व के संकरे होने का एक आम कारण रूमेटिक हार्ट डिजीज है. यह बचपन में गले के संक्रमण का सही इलाज न होने के लंबे समय बाद होने वाली समस्या से जुड़ी हो सकती है. उम्र बढ़ने और दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं के कारण भी वाल्व प्रभावित हो सकते हैं.&amp;nbsp;
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दिल की बीमारी में क्यों आती है खांसी?
जब दिल संकरे वाल्व के रास्ते खून को आगे भेजने के लिए ज्यादा मेहनत करता है तो उसके पीछे दबाव बढ़ सकता है. इससे फेफड़ों की ओर तरल पदार्थ जमा होने लगता है. इसी वजह से सांस फूलना, जल्दी थकना, ऑक्सीजन कम होना और लगातार खांसी जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं. शरीर संकेत तो दे रहा था, लेकिन समस्या उस जगह नहीं थी जहां शुरुआत में उसे समझा जा रहा था.&amp;nbsp;
दोनों वाल्व की हुई सर्जरी
शख्स के दोनों वाल्व गंभीर रूप से संकरे थे, इसलिए डॉक्टरों ने डबल-वाल्व रिप्लेसमेंट सर्जरी की सलाह दी. इस सर्जरी में दोनों खराब वाल्व बदले गए. डॉक्टरों के सामने मैकेनिकल और बायोलॉजिकल वाल्व में से चुनाव का ऑप्शन था. शख्स की उम्र और स्वास्थ्य को देखते हुए बायोलॉजिकल वाल्व लगाने का फैसला किया गया. डॉक्टर के अनुसार, ऐसे वाल्व में ब्लड थिनर दवा सीमित अवधि के लिए लेनी पड़ती है, जबकि मेटल वाल्व के मामले में लंबे समय तक ब्लड थिनिंग दवा और नियमित ब्लड टेस्ट की जरूरत होती है.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 21 Aug 2026 01:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>Detergent in MDM: बिहार में नमक की जगह बच्चों को खिला दिया डिटर्जेंट, यह कितना खतरनाक?</title>
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        <description><![CDATA[ Used Detergent Instead of Salt in Children&#039;s MDM:&amp;nbsp;हर मां-बाप के लिए अपने बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के अलावा उनकी अच्छी सेहत भी बहुत मायने रखती है इसलिए हर मां-बाप को इस बात की हमेशा चिंता लगी रहती है कि उनके बच्चे जो खा रहे हैं या पी रहे हैं वे सुरक्षित है या नहीं, लेकिन जब उन्हें पता चलता है कि उनके बच्चे को जो खाना मिल रहा है वह मिलावटी का है, तो ये खबर हर मां-बाप के लिए कोई मामूली खबर नहीं होगी.
ऐसी ही कुछ खबर इन दिनों बिहार के नालंदा से आ रही है जिसने पूरे राज्य को हिला कर रख दिया है. बता दें कि इस खबर में आई बात सामने में किसी एक या दो बच्चों के खाने में मिलावटी नहीं की गई है बल्कि कुल 34 से 40 मासूम बच्चों के खाने के साथ मिलावटी की गई है, और ये मिलावटी किसी सब्जी या मसाले के साथ नहीं बल्कि नमक के साथ की गई है, जिसके निष्कर्ष में करिब 34 से 40 मासूम बच्चों को अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा है.
इस पूरे मामले में आरोप है कि बच्चों के खाने में नमक की जगह पर डिटर्जेंट मिला दिया गया. इस खबर को सुनने वाले हर आदमी के मन में एक ही सवाल है कि आखिर बच्चों के खाने के साथ इतना बड़ा खिलवाड़ कोई कैसे कर सकता है, और जो सबसे जरूरी बात है कि डिटर्जेंट खा लेना बच्चों की सेहत के लिए कितना खतरनाक साबित हो सकता है. हर किसी के मन में बच्चों की सेहत को लेकर तरह-तरह के सवाल आ रहे हैं. ऐसे में आइए आपको बताते हैं कि अगर कोई बच्चा गलती से डिटर्जेंट खा लेता है तो उसके सेहत को कितना नुकसान पहुंचाता है.
आखिर स्कूल में उस दिन क्या हुआ था?
यह घटना नालंदा के नूरसराय प्रखंड स्थित परासी मिडिल स्कूल की है, जहां मंगलवार को बच्चों को हमेशा की तरह मिड डे मील में चावल और सोयाबीन-आलू की सब्जी खाने पहुंचे थे. खाना खाते ही कुछ बच्चों को सब्जी में नमक कम लगा, जिसके बाद रसोइया से नमक मांगा गया. आरोप है कि जल्दबाजी में रसोइया ने गलती से नमक की जगह डिटर्जेंट पाउडर दे दिया, जिसे बच्चों ने बिना कुछ समझे खा लिया. खाना खाते ही कुछ ही देर में बच्चों की तबीयत बिगड़नी शुरू हो गई और स्कूल में हड़कंप मच गया.&amp;nbsp;
&amp;nbsp;

Why Bihar always ??In Bihar&#039;s Nalanda, when extra salt was demanded for the mid-day meal, allegedly detergent (Surf) was given instead. More than 20 children fell ill and were admitted to the hospital. pic.twitter.com/08gSUJET8b
&amp;mdash; Oxomiya Jiyori ???????? (@SouleFacts) August 18, 2026



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डिटर्जेंट खाने से बच्चों की सेहत को कितना खतरा
अब बात करते हैं उस सवाल के जवाब की जो हर किसी के दिमाग में चल रहा है वे हैं बच्चों की सेहत पर लापरवाही का क्या असर पड़ा होगा. तो बता दें कि जो चीज कपड़े और बर्तन धोने के लिए बनी है, अगर वही गलती से किसी मासूम बच्चे के पेट में चली जाए तो नतीजे बेहद डरावने हो सकते हैं. डॉक्टरों के मुताबिक डिटर्जेंट में मौजूद तेज रसायन गले और मुंह में जलन पैदा करते हैं, जिससे बच्चों को उल्टी, मतली और पेट में तेज दर्द जैसी शिकायत होने लगती है.
कई बार यह इतना असर डाल सकता है कि सांस लेने में तकलीफ होने लगती है और गले में सूजन आ जाती है, जो बच्चों के लिए बेहद खतरनाक स्थिति बन सकती है. ज्यादा मात्रा में डिटर्जेंट पेट में चले जाने पर बच्चे को घबराहट, बेचैनी और सुस्ती भी महसूस हो सकती है, और कुछ गंभीर मामलों में गले व खाने की नली को नुकसान पहुंचने का भी खतरा रहता है. बच्चों का शरीर बड़ों के मुकाबले बेहद नाजुक होता है, इसलिए उनके लिए यह खतरा और भी ज्यादा गंभीर हो जाता है, ऐसे में समय पर अस्पताल पहुंचाना और सही इलाज मिलना बहुत जरूरी हो जाता है.
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        <pubDate>Fri, 21 Aug 2026 01:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>टॉयलेट में आप भी लगाते हैं ज्यादा जोर? ये हो सकती है दिक्कतें</title>
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        <description><![CDATA[ रोज सुबह टॉयलेट जाना हर किसी की दिनचर्या का हिस्सा है, लेकिन कई लोगों की शिकायत रहती है कि इस दौरान उनका ठीक तरीके से पेट साफ नहीं होता है और काफी दम लगाना पड़ता है, ऐसा उनके साथ एक बार नहीं रोजाना होता है. कभी कब्ज की वजह से तो कभी जल्दी में यह आदत बन जाती है, और ज्यादातर लोग इस बात को सामान्य समझ कर नजरअंदाज कर देते हैं. लेकिन उनको जानकारी होनी चाहिए कि इस विषय पर डॉक्टरों की क्या राय है?
बता दें कि इस बात में डॉक्टरों का कहना है कि बार-बार टॉयलेट में जरूरत से ज्यादा जोर लगाना शरीर के लिए कई तरह से नुकसानदायक हो सकता है. आइए जानते हैं इसके बारे पूरी जानकारी कि इससे शरीर को किन किन परेशानियों का सामना करना पड़ता है.
बढ़ जाता है&amp;nbsp;बवासीर और फिशर होने का खतरा
हर किसी को समझना चाहिए कि इस परेशानी को नजरअंदाज बिल्कुल नहीं करना चाहिए वरना आप बड़ी बीमारी के शिकार हो सकते हैं. बता दें कि हमारे मल निकलने वाली जगह के आस पास मौजूद नसों पर बहुत ज्यादा दबाव पड़ता है, जिससे वे सूज जाते हैं और फिर यही कारण बनते हैं बवासीर जैसी बीमारी की.
इसके अलावा इस परेशानी के लगातार रहने से गुदा के अंदर की मुलायम परत में छोटे-छोटे कट या दरारें भी आ सकती हैं, जिन्हें एनल फिशर कहा जाता है और इनकी वजह से टॉयलेट में फ्रेश होने जाते हैं तो जोर लगाने के साथ साथ दर्द होता है और खून निकलने की समस्या होने लगती है. वहीं एक बार यह दरारें बनने के बाद बार-बार जोर लगाने से घाव सही तरीके से भर नहीं पाता, जिससे दर्द, खून आना और गुदा की मांसपेशियों में ऐंठन जैसी दिक्कतें बनी रह जाती हैं जो लगातार रहने से एक बड़ी बीमारी बन जाती है.
कई बार लोग इन्हीं दर्द और परेशानी से बचने के लिए टॉयलेट जाने से बचते हैं, और अच्छी तरह खाना नहीं खाते हैं जिसके कारण उनकी हालत और खराब हो जाती है. लगातार जोर लगाने का असर सिर्फ गुदा तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इससे शरीर के निचले हिस्से की सहारा देने वाली मांसपेशियां भी कमजोर पड़ने लगती हैं. यह दबाव इतना बढ़ सकता है कि गुदा के आसपास की मांसपेशियां और टिशू कमजोर पड़ जाते हैं, जिससे रेक्टम का कुछ हिस्सा गुदा के रास्ते बाहर की तरफ निकलने लगता है, जिसे रेक्टल प्रोलैप्स कहा जाता है.
यह समस्या शुरुआत में हल्की लग सकती है, लेकिन समय के साथ गंभीर हो जाती है और कई बार इसकी वजह से पेशाब पर नियंत्रण खोने जैसी दिक्कत भी हो सकती है. ज्यादातर मामलों में इस स्थिति को ठीक करने के लिए ऑपरेशन तक की जरूरत पड़ सकती है, इसलिए इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए. डॉक्टर बताते हैं कि शरीर से हमारा जितना मल निकलेगा उतना हमारे शरीर के लिए फायदेमंद रहेगा, वहीं इस परेशानी को लोग शर्म की वजह से किसी को बताते नहीं है और जब परेशानी बड़ी हो जाती है तो उसके इलाज के बारे में सोच कर और डर जाते हैं. इसलिए जरूरी है कि आप परेशानी को बड़ी होने से पहले ही रोक दें और डॉक्टर को बेझिझक अपनी परेशानी बताएं.
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दिल पर भी पड़ सकता है असर
यहां तक तो ठीक था, लेकिन आपको जानकर और हैरानी होगी कि इसका जितना असर पेट और गुदा पर पड़ता है उतना ही इसका असर दिल तक भी पहुंच जाता है. जोर लगाते समय सीने के अंदर का दबाव अचानक बढ़ जाता है, जिससे थोड़ी देर के लिए खून का बहाव प्रभावित हो सकता है. इसलिए डॉक्टर सलाह देते हैं कि टॉयलेट में जोर लगाने की आदत से बचना चाहिए. इसके लिए सबसे आसान तरीका है कि रोज पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं.
अगर साधारण पानी से असर नहीं होता है तो पानी को थोड़ा गुनगुना करके पिएं, खाने में फाइबर यानी रेशेदार चीजों की मात्रा बढ़ाएं, और शरीर को एक्टिव रखें, खाने में मसालों का सेवन कम करें जैसे लाल मिर्च और गरम मसाले जैसे मसालों का, इसके अलावा सबसे जरूरी घर के साधारण खाने पर ज्यादा ध्यान दें कई बार लोग कामकाज में व्यस्त होकर खाना खाना भूल जाते हैं और बस पिज्जा या बर्गर खा कर काम चला लेते हैं. साथ ही जरूरत से ज्यादा देर तक टॉयलेट में बैठे रहने से भी बचना चाहिए और जब भी शरीर मल त्याग का संकेत दे, उसे टालना नहीं चाहिए. इसके अलावा सबसे जरूरी अगर ये परेशानी लंबे समय तक है तो डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए.
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        <pubDate>Fri, 21 Aug 2026 01:30:05 +0530</pubDate>
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        <title>Xप्लेन: क्या हर बुखार में स्वाइन फ्लू टेस्ट करवाएं? महिला की मौत के बाद देशभर में हलचल</title>
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        <description><![CDATA[ मध्य प्रदेश के इंदौर में 19 अगस्त यानी बुधवार शाम एक 60 वर्षीय महिला की स्वाइन फ्लू से मौत हो गई. यह खबर महज एक मौत की खबर नहीं, बल्कि उस खतरे की घंटी है जो पूरे देश में बज रही है. दिल्ली में इस साल स्वाइन फ्लू के मामले पिछले साल की तुलना में लगभग 6 गुना बढ़ गए हैं. बेंगलुरु के एक स्कूल में 500 से ज्यादा छात्र और 21 स्टाफ सदस्य बीमार पड़ गए. मेरठ में मामले बढ़कर 7 हो गए. हरियाणा, चंडीगढ़ और उत्तर प्रदेश समेत हर तरफ स्वास्थ्य विभागों ने एडवाइजरी जारी कर दी है. तो क्या यह कोरोना जैसी महामारी की दस्तक है और हर बुखार में अब स्वाइन फ्लू का टेस्ट करवाना जरूरी है या नहीं...
स्वाइन फ्लू के क्यों बढ़ रहे हैं मामले?
मेयो क्लीनिक की रिपोर्ट के मुताबिक, मौसम में बदलाव, बारिश और उमस इस वायरस के पनपने के लिए बेहतरीन माहौल बनाते हैं. नमी और तापमान में उतार-चढ़ाव वायरस को एक्टिव कर देते हैं. यही वजह है कि हर साल अगस्त-सितंबर के आसपास स्वाइन फ्लू के मामले बढ़ जाते हैं. लेकिन इस बार आंकड़े चौंकाने वाले हैं:

ये आंकड़े बताते हैं कि यह सिर्फ किसी एक शहर या राज्य की समस्या नहीं है, बल्कि देशव्यापी संकट है.
तो आखिर स्वाइन फ्लू के लक्षण को कैसे पहचानें?
स्वाइन फ्लू के लक्षण आम फ्लू से काफी मिलते-जुलते हैं:

स्वाइन फ्लू फैलता कैसे है?
यूएस सेंटर्स फॉर डिसीज कंट्रोल एंड प्रीवेंशन की रिपोर्ट के मुताबिक, यह वायरस संक्रमित व्यक्ति के खांसने, छींकने, बोलने या सांस लेने से निकली बूंदों (ड्रॉपलेट्स) के जरिए हवा में फैलता है. अगर आप इन बूंदों को सांस के जरिए अंदर लेते हैं या किसी दूषित सतह (जैसे दरवाजे का हैंडल, सिंक) को छूकर अपनी आंखों, नाक या मुंह को छूते हैं, तो आप संक्रमित हो सकते हैं.
संक्रमित व्यक्ति लक्षण दिखने से एक दिन पहले से ही वायरस फैलाना शुरू कर देता है. यानी आपको पता भी नहीं चलता कि आपके आसपास कोई बीमार है और वह वायरस फैला रहा है. संक्रमित व्यक्ति 7 दिनों तक (बच्चों में 10 दिनों तक) दूसरों को संक्रमित कर सकता है.
हर किसी को यह बीमारी हो सकती है, लेकिन कुछ लोगों को गंभीर नुकसान का खतरा ज्यादा होता है:

2 साल से कम उम्र के बच्चे
65 साल से ज्यादा उम्र के बुजुर्ग
गर्भवती महिलाएं
अस्थमा, डायबिटीज और हृदय रोग जैसी पुरानी बीमारियों वाले लोग
कमजोर इम्यून सिस्टम वाले लोग (कैंसर, HIV/एड्स, ऑर्गन ट्रांसप्लांट)
नर्सिंग होम या बैरक जैसी भीड़भाड़ वाली जगहों पर रहने वाले लोग

तो क्या हर बुखार में टेस्ट करवाना चाहिए?
दिल्ली एम्स के मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डॉ. नीरज निश्चल का कहना है कि हर बुखार में टेस्ट करवाना जरूरी नहीं है. टेस्ट की जरूरत मरीज के लक्षणों, बीमारी की अवधि, आसपास संक्रमण की स्थिति और रिस्क फैक्टर &amp;nbsp; पर निर्भर करती है. यानी,

अगर आपको हल्का बुखार, खांसी या गले में खराश है, तो आपको तुरंत टेस्ट की जरूरत नहीं है. आराम करें, लिक्विड फूड लें और लक्षणों पर नजर रखें.
अगर बुखार 102-103 डिग्री से ऊपर जा रहा है, सांस लेने में तकलीफ हो रही है या लक्षण लगातार बने हुए हैं और बिगड़ रहे हैं, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें और टेस्ट करवाएं.

स्वाइन फ्लू की जांच के लिए RT-PCR (Real-Time PCR) टेस्ट सबसे बेहतर है. इसके लिए मरीज के नाक या गले का स्वैब लिया जाता है.
देशभर में मामले बढ़ने के बाद केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने देशव्यापी एडवाइजरी जारी की है. कई राज्यों ने भी अपनी-अपनी एडवाइजरी जारी की हैं:

हरियाणा: स्वास्थ्य विभाग ने मौसम बदलने के कारण स्वाइन फ्लू से बचाव की सलाह दी है. लोगों को हाथ मिलाने से बचने, सार्वजनिक स्थानों पर न थूकने और बिना डॉक्टर की सलाह के दवा न लेने की हिदायत दी गई है.
चंडीगढ़: स्वास्थ्य विभाग ने सार्वजनिक एडवाइजरी जारी की. बुखार, खांसी या छींक होने पर लोगों को सार्वजनिक स्थानों से दूरी बनाने की सलाह दी गई.
उत्तर प्रदेश: स्वास्थ्य विभाग ने मलिन बस्तियों और भीड़भाड़ वाले इलाकों में विशेष शिविर लगाने का फैसला किया है.

क्या यह कोरोना जैसी महामारी है?
नहीं. यह समझना बहुत जरूरी है. 2009 में H1N1 महामारी बनकर उभरा, लेकिन अब यह सीजनल फ्लू का हिस्सा है. हर साल मौसम बदलने पर इसके मामले बढ़ते हैं और फिर कम हो जाते हैं.
हां, इस बार मामले असामान्य रूप से अधिक हैं. दिल्ली में 6 गुना, बेंगलुरु में स्कूल बंद, लेकिन यह कोरोना जैसी नई महामारी नहीं है. फिर भी, लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए क्योंकि यह बुजुर्गों, बच्चों और पुरानी बीमारियों वाले लोगों के लिए जानलेवा हो सकता है. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 21 Aug 2026 01:30:04 +0530</pubDate>
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        <title>AIIMS Delhi Takes Long Time For Surgery: बेटी के दिल के ऑपरेशन के लिए 14 साल से इंतजार कर रहा पिता, जानें पूरा मामला</title>
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        <description><![CDATA[ AIIMS Delhi Takes Long Time For Surgery: दिल्ली के एम्स अस्पताल से जुड़ा एक ऐसा मामला सामने आया है, जो सरकारी अस्पतालों में इलाज को लेकर होने वाली परेशानियों की पोल खोलता है. कोटा को गुमानपुर इलाके में रहने वाले मुकेश कुमार पिछले 14 साल से अपनी बेटी तनवी की दिल की सर्जरी के लिए दिल्ली एम्स के चक्कर लगा रहे हैं. लेकिन अब तक उनकी बेटी का ऑपरेशन नहीं हो पाया है.&amp;nbsp;
जन्म से ही है दिल में छेद&amp;nbsp;
सेल्समैन की नौकरी करने वाले मुकेश कुमार का कहना है कि उनकी बेटी तनवी को जन्म से ही दिल की एक बीमारी है, जिसे वेंट्रिकुलर सेप्टल डिफेक्ट कहा जाता है. इस बीमारी का पता चलते ही परिवार ने इलाज के लिए भागदौड़ शुरू कर दी थी. साल 2012 में जब तनवी करीब पौने दो साल की थी, तब पहली बार 10 अक्तूबर को दिल्ली एम्स में उसे दिखाया गया था. डॉक्टरों ने ऑपरेशन के लिए बुलाया, लेकिन तारीख मिली सितंबर 2015 की, यानी करीब तीन साल बाद. &amp;nbsp;
फिर भी नहीं हुई सर्जरी
मुकेश का आरोप है कि 4 अप्रैल 2014 को एम्स के डॉक्टर ने ऑपरेशन के लिए उनसे 1.25 लाख रुपये जमा कराए और साथ ही चार यूनिट खून भी लिया गया. इसके बावजूद सर्जरी के लिए तय की गई तारीख टाल दी गई. अस्पताल पहुंचने पर परिवार को बताया गया कि बेड खाली नहीं है, इसलिए बेटी को भर्ती नहीं किया जा सकता. मुकेश का कहना है कि इसके बाद भी मामला लगातार टलता चला गया.&amp;nbsp;
प्राइवेट डॉक्टर की सलाह
आरोप है कि इसके बाद डॉक्टर ने दवा कंपनी के प्रतिनिधि संजीव का नंबर देकर उससे संपर्क करने को कहा, जिसने तनवी के पिता से 30 हजार रुपये लेकर अस्पताल पहुंचने की बात कही. इसके बाद दिसंबर में तनवी को दोबारा बुलाया गया और भर्ती भी कर लिया गया, लेकिन आरोप है कि सर्जरी से पहले दांतो में किड़े होने की बात कहकर ऑपरेशन फिर टाल दिया गया. इसके बाद 4 जनवरी 2016 की नई तारीख दी गई, लेकिन इसके बाद भी बार-बार तारीख बदलती रही और सर्जरी नहीं हो सकी.&amp;nbsp;
सांसद से मांगी मदद तो और बढ़ी परेशानी
मुकेश का आरोप है कि ऑपरेशन की तारीख बार-बार बदलने से परेशान होकर उन्होंने अपने क्षेत्र के सांसद से मदद मांगी. सांसद और पीए के जरिए एम्स के संबंधित डॉक्टर को फोन किया, जिसके दौरान दोनों के बीच बहस हो गई. मुकेश का आरोप है कि इसके बाद डॉक्टर नाराज हो गए और उन्होंने ऑपरेशन करने से मना कर दिया. तब से लेकर अब तक तनवी की सर्जरी नहीं हो पाई है.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ें: क्या बड़ी जांघों से बढ़ती है उम्र? इस स्टडी में हुआ चौंकाने वाला खुलासा
अब हैदराबाद जाने की सोच रहा परिवार
अब तनवी 16 साल की हो चुकी है और बीमारी के साथ जीवन को मजबूर है. कपड़े की दुकान पर काम करने वाले मुकेश के मुताबिक, उन्हें हैदराबाद के एक अस्पताल में इलाज की सलाह दी गई है, जहां सर्जरी का खर्च करीब 6 लाख रुपये बताया गया है. मुकेश का कहना है कि इतनी बड़ा रकम जुटा पाना उनके लिए आसान काम नहीं है.&amp;nbsp;
इस पूरे मामले पर एम्स दिल्ली की मीडिया प्रभारी डॉ. रीमा दादा ने कहा है कि यह चिंता का विषय है और मामले की जांच कराकर इस समस्या का समाधान निकाला जाएगा.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ें: कोविड के बाद सुप्त वायरस सक्रिय, भविष्य का फ्लू फेफड़ों के लिए घातक ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 20 Aug 2026 12:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>Viruses Reactivated After Covid: कोविड के बाद सुप्त वायरस सक्रिय, भविष्य का फ्लू फेफड़ों के लिए घातक</title>
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        <description><![CDATA[ Viruses Reactivated After Covid: मेडिकल साइंस की दुनिया से एक बेहद डराने वाली और चौंकाने वाली खबर सामने आई है. हाल ही में प्रसिद्ध वैज्ञानिक पत्रिका नेचर में प्रकाशित एक रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार, जिन लोगों को गंभीर कोरोना COVID-19 संक्रमण हुआ था, उनके शरीर में सालों से सुप्त यानी सोए हुए वायरस अचानक फिर से सक्रिय हो रहे हैं. वैज्ञानिकों का दावा है कि इन सुप्त वायरसों के जागने के कारण मरीजों के फेफड़े अंदर से बेहद संवेदनशील और कमजोर हो रहे हैं. इसका सबसे बड़ा नुकसान यह होगा कि भविष्य में आने वाला सामान्य इन्फ्लूएंजा या श्वसन संबंधी कोई भी मामूली संक्रमण इन लोगों के फेफड़ों को बहुत बुरी तरह और घातक रूप से प्रभावित कर सकता है.&amp;nbsp;
क्या होता है सुप्त वायरस?
हमारे शरीर में कई ऐसे वायरस जैसे एपस्टीन-बार वायरस, साइटोमेगालोवायरस और एनेलोविरिडे परिवार के वायरस होते हैं. जो एक बार ठीक होने के बाद भी हमेशा के लिए पूरी तरह खत्म नहीं होते. ये हमारे शरीर के सेल्स में बिल्कुल शांत या सुप्त अवस्था में छिपकर बैठ जाते हैं. आम तौर पर हमारा इम्यून सिस्टम इन्हें दबाकर रखता है.लेकिन वैज्ञानिकों ने पाया कि गंभीर कोविड संक्रमण के कारण शरीर के भीतर बहुत तेज और लंबे समय तक चलने वाली सूजन पैदा हो गई. इसी आंतरिक सूजन ने इन सोए हुए वायरसों को दोबारा जगाने के लिए एक अलार्म का काम किया है.&amp;nbsp;
फेफड़ों के लिए कैसे बढ़ गया खतरा?
इस नए शोध के मुताबिक, कोविड के बाद इन सुप्त वायरसों के सक्रिय होने से फेफड़ों के टिश्यूज में लगातार हल्की सूजन और तनाव बना रहता है. इस वजह से संक्रमण के बाद फेफड़ों को खुद से ठीक करने वाली कोशिकाएं काफी कमजोर पड़ने लगी है. अगर ऐसे किसी व्यक्ति को भविष्य में सामान्य फ्लू या कफ-कोल्ड होता है, तो उनका फेफड़ा उस मामूली वायरस को भी झेल नहीं पाएगा और गंभीर रूप से डैमेज हो सकता है. वैज्ञानिकों का मानना है कि कोरोना ठीक होने के महीनों बाद भी जो लोगों को अत्यधिक थकान, सांस फूलना और कमजोरी महसूस हो रही है, उसके पीछे यही सुप्त वायरसों का दोबारा सक्रिय होना है.&amp;nbsp;
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इसे कैसे बचें?
यदि आपको पहले गंभीर कोविड हो चुका है और आपको अक्सर सांस लेने में दिक्कत या फेफड़ों में कमजोरी महसूस होती है. बदलते मौसम में डॉक्टरों की सलाह पर इन्फ्लूएंजा और रेस्पिरेटरी वैक्सीन जरूर लगवाएं ताकि फेफड़े सुरक्षित रहें. खाने में ऐसी चीजें शामिल करें जो शरीर के अंदरूनी सूजन को कम करती हैं, जैसे हरी सब्जियां, हल्दी, एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर फल और ड्राई फ्रूट्स.
फेफड़ों की कार्यक्षमता को मजबूत बनाए रखने के लिए रोजाना हल्के ब्रीदिंग एक्सरसाइज या प्राणायाम करें. सर्दी, खांसी या कफ होने पर इसे सामान्य फ्लू मानकर खुद से दवा लेने के बजाय तुरंत चेस्ट स्पेशलिस्ट से संपर्क करें.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 19 Aug 2026 19:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>Xप्लेन: खराब कोलेस्ट्रॉल का इलाज अब सिर्फ एक इंजेक्शन? Verve 102 का कमाल</title>
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        <description><![CDATA[ 


लंदन के मेडिकल रिसर्चर्स के अनुसार एक बार के इलाज से हाई कोलेस्ट्रॉल का पूरी तरह से इलाज संभव हो सकता है. शुरुआती दौर के क्लिनिकल ट्रायल में एक नई एक्सपेरिमेंटल थेरेपी की एक ही डोज़ ने LDL यानी &#039;बैड&#039; कोलेस्ट्रॉल के लेवल को 62% तक कम कर दिया और उसे एक साल तक कम बनाए रखा. इससे यह उम्मीद जगी है कि मरीज़ों को भविष्य में ज़िंदगी भर रोज़ाना दवा लेने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी.
VERVE-102 नाम के इस इलाज को IV ड्रिप के ज़रिए दिया जाता है और यह कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल करने वाले जीन में स्थायी रूप से बदलाव करके काम करता है. रिसर्चर्स को ट्रायल में सुरक्षा से जुड़ी कोई गंभीर समस्या नहीं मिली. इसके नतीजे &#039;द न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ़ मेडिसिन&#039; में पब्लिश हुए हैं.
बता दें कि LDL कोलेस्ट्रॉल कम करने से धमनियों में फैटी प्लाक का जमाव कम होता है जिससे हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा कम करने में मदद मिलती है. हालांकि स्टेटिन (एक दवा) से भी जीन थेरेपी जैसी ही कमी लाई जा सकती है, लेकिन आमतौर पर उन्हें रोज़ लेना पड़ता है. अगर बड़े अध्ययनों से यह पुष्टि हो जाती है कि VERVE-102 सुरक्षित और असरदार है, तो एक ही बार के इलाज से दिल की बीमारियों से लंबे समय तक सुरक्षा मिल सकती है.
यह एक बहुत ही रोमांचक उपलब्धि 
यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन (UCL) में क्लिनिकल एकेडमिक और बार्ट्स हेल्थ और UCL हॉस्पिटल्स (UCLH) में कंसल्टेंट कार्डियोलॉजिस्ट होने के साथ इस ट्रायल के लोकल लीड्स में से एक प्रोफ़ेसर रियाज़ पटेल ने कहा, &quot;अभी शुरुआती दौर है, लेकिन यह एक बहुत ही रोमांचक उपलब्धि है.ये नतीजे दिखाते हैं कि यह टेक्नोलॉजी काम करती है, सुरक्षित है और कोलेस्ट्रॉल कम करने में मदद करती है.&quot;
यह क्यों ज़रूरी है
बढ़ा हुआ LDL कोलेस्ट्रॉल हार्ट अटैक और स्ट्रोक के सबसे बड़े जोखिम कारकों में से एक है, जिससे UK और US में हर साल लाखों लोगों की मौत होती है. डॉक्टर के मुताबिक, स्टैटिन से इस जोखिम को कम कर सकते हैं. अभी UK में 70 लाख से ज़्यादा और US में 4 करोड़ से ज़्यादा लोग ये दवाएं ले रहे हैं लेकिन ये दवाएं तभी असर करती हैं जब लोग इन्हें लगातार लेते रहें.
भारत में भी यह एक बड़ी समस्या है. हर साल लगभग 28 से 30 लाख लोगों की मौत हृदय रोगों (जिसमें मुख्य रूप से हार्ट अटैक शामिल है) के कारण होती है. वहीं स्ट्रोक से भारत में हर साल लगभग 7 से 8 लाख लोगों की मौत होती है. कुल वार्षिक मौतें यदि हार्ट अटैक और स्ट्रोक (दोनों कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों) को मिला दिया जाए, तो भारत में हर साल लगभग 35 से 40 लाख मौतें केवल इन दो कारणों से होती हैं. यह देश में होने वाली कुल मौतों का लगभग 28% से 30% है.
इस रिसर्च से पता चलता है कि लगभग आधे मरीज़ कोलेस्ट्रॉल की दवा शुरू करने के एक साल के अंदर ही उसे लेना बंद कर देते हैं. इसकी वजह या तो रोज़ गोली लेने में होने वाली परेशानी है या फिर दवा के साइड इफ़ेक्ट्स. मांसपेशियों में दर्द की समस्या सबसे ज़्यादा देखने को मिलती है, जबकि कुछ मरीज़ों को ज़्यादा गंभीर परेशानियां भी होती हैं.

इसीलिए रिसर्चर VERVE-102 जैसे इलाज को लेकर बहुत उत्साहित हैं. अगर एक ही डोज़ से कोलेस्ट्रॉल लंबे समय तक कम रह सकता है, तो इससे ज़िंदगी भर दवा लेने की ज़रूरत पूरी तरह खत्म हो सकती है.
यह कैसे काम करता है
UCL और UCLH के रिसर्चर्स की इस स्टडी में 35 ऐसे वयस्क शामिल थे जिन्हें या तो बहुत ज़्यादा कोलेस्ट्रॉल की वंशानुगत समस्या थी. जिसे &#039;हेटरोज़ायगस फैमिलियल हाइपरकोलेस्ट्रोलेमिया&#039; कहा जाता है&amp;nbsp; या फिर कम उम्र में कोरोनरी आर्टरी डिज़ीज़ (दिल की बीमारी) थी. हर मरीज़ को छह में से कोई एक डोज़ दी गई, जिसमें शरीर के वज़न के प्रति किलोग्राम के हिसाब से 0.3mg से 1.0mg तक कुल RNA शामिल था. RNA शरीर में जेनेटिक मैसेंजर का काम करता है.
सबसे ज़्यादा डोज़ देने पर, इस थेरेपी ने LDL कोलेस्ट्रॉल को 62 प्रतिशत तक कम कर दिया. सबसे कम कमी, यानी 9 प्रतिशत, सबसे कम डोज़ (0.3 mg प्रति किलोग्राम) पर देखी गई. जिन लोगों पर सबसे लंबे समय तक नज़र रखी गई, उनमें कोलेस्ट्रॉल का स्तर कम बना रहा.

VERVE-102 को एक बार इन्फ़्यूज़न के ज़रिए (ड्रिप से नस में) दिया जाता है और यह अप्रत्यक्ष रूप से LDL को कम करता है. यह उस जीन को बंद कर देता है जो लिवर को PCSK9 नाम का प्रोटीन बनाने के लिए प्रेरित करता है; यह प्रोटीन आम तौर पर शरीर को खून में घूम रहे LDL कोलेस्ट्रॉल को साफ़ करने से रोकता है. जीन के बंद होने पर, शरीर ज़्यादा LDL को हटा पाता है.
यह तरीका बायोलॉजी की एक प्राकृतिक विशेषता की नकल करने के लिए बनाया गया है. कुछ लोग ऐसे जीन के साथ पैदा होते हैं जो असल में बंद होता है, जिससे उनका कोलेस्ट्रॉल जीवन भर बहुत कम रहता है और उन्हें दिल की बीमारी का ख़तरा भी बहुत कम होता है. इस थेरेपी का मकसद उन लोगों में सुरक्षा का वही असर पैदा करना है जिन्हें हार्ट अटैक और स्ट्रोक का ज़्यादा ख़तरा है.
कितना सेफ
इसे &#039;जीन थेरेपी&#039; कहा जाता है, लेकिन यह इलाज किसी व्यक्ति के पूरे DNA को नहीं बदलता है. यह लिवर की कोशिकाओं के अंदर मौजूद एक जीन में खास बदलाव करता है, और यह बदलाव मरीज़ के शरीर की उन्हीं कोशिकाओं तक ही सीमित रहता है.
सबसे अहम बात यह है कि यह स्पर्म या एग में मौजूद जीन्स को प्रभावित नहीं करता, इसलिए यह किसी व्यक्ति के बच्चों में नहीं जा सकता. हालांकि इसकी लंबे समय की सुरक्षा पर अभी भी स्टडी की जा रही है.


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        <pubDate>Wed, 19 Aug 2026 19:30:06 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Global Anxiety Statistics: एंग्जायटी लेवल 3 क्या है, भारत&amp;पाकिस्तान समेत दुनिया में कितने लोग परेशान?</title>
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        <description><![CDATA[ 



Global Anxiety Statistics:&amp;nbsp;आज के समय में एंग्जायटी एक सामान्य परेशानी हो गई है, किसी को काम के प्रेशर से एंग्जायटी हो जाती है तो किसी को रिश्तों में परेशानी से. लेकिन क्या आप जानते हैं एंग्जायटी हर आदमी को एक जैसी नहीं होती है, हर किसी का स्तर दूसरा होता है जिसको समझने के लिए डॉक्टर GAD-7 टेस्ट का इस्तेमाल करते हैं. इसमें 7 सवाल पूछे जाते हैं और जवाब के आधार पर 0 से 21 तक अंक मिलते हैं. इन अंकों के हिसाब से एंग्जायटी को 4 स्तरों में बांटा जाता है. आइए जानते हैं इसके बारे में पूरी जानकारी.





0-4 अंक: बहुत कम या सामान्य चिंता
5-9 अंक: हल्की चिंता
10-14 अंक: मध्यम स्तर की चिंता
15-21 अंक: गंभीर चिंता

अगर किसी व्यक्ति के 10-14 अंक आते हैं, तो इसे मध्यम स्तर की एंग्जायटी माना जाता है. इस स्थिति में रोज के कामों पर भी असर पड़ सकता है और यह एंग्जायटी डिसऑर्डर का संकेत हो सकता है. हालांकि, केवल GAD-7 के स्कोर से खुद बीमारी तय नहीं करनी चाहिए.&amp;nbsp;
एंग्जायटी लेवल 3 क्या होता है?




आंकड़ों की बात करें तो ज्यादातर लोगों का सवाल रहता है कि अगर उनका एंग्जायटी लेवल 3 है तो इसका मतलब क्या है, तो ऐसे में बता दें कि अगर GAD-7 टेस्ट में किसी व्यक्ति के 10 से 14 के बीच अंक आते हैं, तो उसे लेवल 3 यानी मध्यम स्तर की एंग्जायटी माना जाता है. इस स्तर पर चिंता के लक्षण अक्सर आते हैं और काफी तेज महसूस होते हैं, जिससे रोजमर्रा के काम जैसे पढ़ाई, नौकरी या घर के काम करने में दिक्कत आने लगती है. इस स्तर पर पहुंचे ज्यादातर लोगों में जनरलाइज्ड एंग्जायटी डिसऑर्डर यानी GAD नाम की बीमारी होने की संभावना ज्यादा होती है.




दुनिया में कितने लोग एंग्जायटी से पीड़ित?
ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज नाम की एक बड़ी रिसर्च के मुताबिक, दुनिया की करीब 4.05% आबादी यानी लगभग 30 करोड़ 10 लाख लोग एंग्जायटी डिसऑर्डर से पीड़ित हैं. जिन देशों में सबसे ज्यादा लोग इस बीमारी से पीड़ित हैं उनमें चीन सबसे ऊपर है जहां करीब 4 करोड़ 78 लाख लोग एंग्जायटी से परेशान हैं, उसके बाद भारत का नंबर आता है जहां करीब 4 करोड़ 18 लाख लोग इससे जूझ रहे हैं, फिर अमेरिका, ब्राजील और इंडोनेशिया का नंबर आता है.&amp;nbsp; WHO की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक साल 2021 में दुनिया भर में करीब 35 करोड़ 90 लाख लोगों को एंग्जायटी की समस्या थी, जो कुल आबादी का लगभग 4.4% हिस्सा है.&amp;nbsp;
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भारत और पाकिस्तान में एंग्जायटी की स्थिति
भारत की बात करें तो 2017 में हुई एक बड़ी स्टडी के मुताबिक भारत में करीब 4 करोड़ 49 लाख लोग एंग्जायटी डिसऑर्डर से पीड़ित पाए गए थे, यानी देश की आबादी का लगभग 3.3% हिस्सा. WHO की एक अलग रिपोर्ट में यह आंकड़ा करीब 3 करोड़ 80 लाख बताया गया था. इसके अलावा भारत की नेशनल मेंटल हेल्थ सर्वे के मुताबिक देश की करीब 3.5% आबादी किसी न किसी तरह के तनाव या एंग्जायटी से जूझती है, और यह समस्या सबसे ज्यादा 18 से 29 साल की उम्र के युवाओं में देखी जाती है, साथ ही पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में यह ज्यादा पाई जाती है.&amp;nbsp;
पाकिस्तान में एंग्जायटी को लेकर पूरे देश के स्तर पर कोई बड़ा सरकारी सर्वे अभी तक नहीं हुआ है, इसलिए वहां का सटीक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है. लेकिन कराची के एक अस्पताल में हुई एक स्टडी में पाया गया कि वहां आने वाले मरीजों और उनके साथ आए लोगों में से करीब 28.3% लोगों में एंग्जायटी के लक्षण मिले, और यह समस्या पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में ज्यादा पाई गई है.&amp;nbsp;&amp;nbsp;
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        <pubDate>Wed, 19 Aug 2026 19:30:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>UTI in Women: महिलाओं में बार&amp;बार क्यों होता है UTI, जानें किन बातों का रखें ख्याल?</title>
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        <description><![CDATA[ UTI in Women: UTI महिलाओं और पुरुषों दोनों को ही होने वाला इंफेक्शन है, लेकिन यह पुरुषों की तुलना में महिलाओं को ज्यादा होता है. शुरुआती स्टेज में UTI कोई बहुत बड़ी या जानलेवा समस्या नहीं है, लेकिन अगर इसे लंबे समय तक बिना इलाज के छोड़ दिया जाए या यह बार-बार होने लगे तो यह चिंता का विषय बन सकता है. UTI से बचाव के लिए कुछ बातों का ख्याल रखना बहुत जरूरी होता है. आप कुछ आम सावधानियां बरत कर इस इंफेक्शन से बच सकते हैं.
महिलाओं में क्यों होता है UTI?
महिलाओं में पुरुषों की तुलना में UTI यानी यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन काफी ज्यादा होता है. इसका सबसे बड़ा कारण उनकी शारीरिक रचना है. महिलाओं का मूत्रमार्ग पुरुषों की तुलना में काफी अलग होता है, इसलिए बैक्टीरिया के लिए मूत्राशय तक पहुंचना काफी आसान हो जाता है. इसके अलावा हार्मोन में बदलाव भी UTI होने का बहुत बड़ा कारण है, खासकर मेनोपॉज के दौरान एस्ट्रोजन का स्तर कम होने से मूत्र मार्ग की प्राकृतिक सुरक्षा कमजोर हो जाती है. वहीं, गर्भावस्था के दौरान बढ़ते गर्भाशय का मूत्राशय पर दबाव पड़ने से पेशाब पूरी तरह बाहर न निकल पाने की समस्या होती है, जिससे बैक्टीरिया पनपने का खतरा बढ़ जाता है. कुछ गर्भनिरोधक तरीकों जैसे डायाफ्राम और स्पर्मिसाइड के इस्तेमाल से भी कुछ महिलाओं में UTI का खतरा बढ़ जाता है. कई बार यह इंफेक्शन शारीरिक संबंध बनाने पर भी हो जाता है.
क्या हैं लक्षण?
महिलाओं में UTI होने पर उन्हें पेशाब करते हुए तेज जलन या दर्द होने जैसी परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है, साथ ही उनमें UTI होने पर बार-बार पेशाब आने के लक्षण भी देखने को मिलते हैं. पेशाब का बार-बार कम मात्रा में आना, साथ ही पेशाब रोकने में बहुत दिक्कत होने लगती है. इसके अलावा उन्हें पेट के निचले हिस्से यानी पेल्विक वाले हिस्से में दर्द व भारी ऐंठन का सामना करना पड़ता है. UTI इंफेक्शन के दौरान पेशाब का रंग धुंधला पड़ जाता है और बहुत तेज व अजीब बदबू भी आने लगती है. कुछ मामलों में संक्रमण बढ़ने पर पेशाब के साथ खून आने के कारण यूरिन का रंग हल्का गुलाबी भी होने लगता है. यह शरीर को भी कमजोर व थका हुआ महसूस करवाने लगता है. इंफेक्शन के अधिक बढ़ जाने पर यह मूत्राशय से बढ़कर किडनी तक पहुंच जाता है, तो तेज बुखार और कंपकंपी, पीठ के ऊपरी हिस्से में तेज दर्द, उल्टी होना या लगातार जी मिचलाना जैसी गंभीर परिस्थितियां बन आती हैं.
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कैसे रखें ख्याल?
UTI से बचने के लिए और बार-बार होने वाले संक्रमण को रोकने के लिए रोजमर्रा की कुछ आदतों में कुछ छोटे से बदलाव करने से मदद मिलेगी. दिनभर में पर्याप्त पानी पिएं, इससे पेशाब के जरिए बैक्टीरिया बाहर निकलने में मदद मिलती है. प्राइवेट पार्ट पर खुशबूदार साबुन, स्प्रे या डियोड्रेंट का इस्तेमाल न करें. पेशाब को ज्यादा देर तक न रोकें. ध्यान रखें कि शारीरिक संबंध बनाने के बाद पेशाब जरूर करें, जिससे इंफेक्शन होने का खतरा काफी कम हो जाता है. साथ ही सूती अंडरवियर पहनें और बहुत टाइट कपड़ों से बचें व आरामदायक कपड़े पहनें. अपनी डाइट में दही, छाछ और प्रोबायोटिक चीजें शामिल करें और अगर डॉक्टर ने एंटीबायोटिक दी है तो उसका पूरा कोर्स जरूर पूरा करें.
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        <pubDate>Wed, 19 Aug 2026 19:30:04 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>UTI, Women:, महिलाओं, में, बार-बार, क्यों, होता, है, UTI, जानें, किन, बातों, का, रखें, ख्याल</media:keywords>
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        <title>Dengue Fever: डेंगू का बुखार उतर गया तो न हों खुश! अगले 24&amp;48 घंटे हैं अहम</title>
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        <description><![CDATA[ Why Dengue Gets Worse After Fever Drops:&amp;nbsp;डेंगू का बुखार उतरते ही कई लोग यह मान लेते हैं कि अब खतरा टल गया है और मरीज ठीक होने लगा है. लेकिन डेंगू में ऐसा हमेशा नहीं होता. दरअसल, बुखार कम होने के बाद के अगले 24 से 48 घंटे काफी अहम हो सकते हैं. इसी दौरान कुछ मरीजों की हालत अचानक बिगड़ सकती है और बीमारी गंभीर डेंगू का रूप ले सकती है. खासतौर पर बच्चों की देखभाल कर रहे माता-पिता को इस समय ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत होती है. डेंगू का इंफेक्शन आमतौर पर तीन चरणों से गुजरता है. हर चरण में शरीर में अलग तरह के बदलाव हो सकते हैं. इसलिए केवल बुखार उतरने को पूरी तरह ठीक होने का संकेत मानना सही नहीं है.
पहला चरण: जब तेज बुखार रहता है
medanta की रिपोर्ट के अनुसार, &amp;nbsp;डेंगू का शुरुआती चरण बुखार वाला होता है. यह आमतौर पर इंफेक्शन मच्छर के काटने के 4 से 10 दिन बाद शुरू हो सकता है और 2 से 7 दिनों तक रह सकता है. इस दौरान अचानक तेज बुखार, सिर में तेज दर्द, आंखों के पीछे दर्द, मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द जैसी समस्याएं हो सकती हैं. इसके अलावा चेहरे पर लालिमा, त्वचा लाल होना, मतली, उल्टी और भूख कम लगने जैसे लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं. कुछ मरीजों में रैश या नाक और मसूड़ों से हल्का खून आने की शिकायत भी हो सकती है. इस चरण में मरीज को पर्याप्त तरल पदार्थ देने और उसकी हालत पर नजर रखना जरूरी होता है.

बुखार उतरने के बाद शुरू हो सकता है सबसे अहम दौर
डेंगू का दूसरा चरण यानी क्रिटिकल फेज अक्सर बीमारी के तीसरे से सातवें दिन के बीच आता है. यही वह समय है, जब बुखार कम या पूरी तरह उतर सकता है. लेकिन कई लोग यहीं गलती कर बैठते हैं और इसे पूरी तरह ठीक होने का संकेत मान लेते हैं. असल में बुखार उतरने के बाद के अगले 24 से 48 घंटे गंभीर हो सकते हैं. इस दौरान कुछ मरीजों में रक्त वाहिकाओं से प्लाज्मा का रिसाव शुरू हो सकता है. प्लेटलेट्स तेजी से कम हो सकते हैं और शॉक का खतरा बढ़ सकता है. इसलिए तापमान सामान्य होने के बावजूद मरीज की निगरानी बंद नहीं करनी चाहिए. डेंगू की यही बात इसे कई बार धोखा देने वाली बीमारी बना देती है. मरीज को लग सकता है कि अब तबीयत सुधर रही है, लेकिन इसी समय गंभीर लक्षण उभर सकते हैं. कुछ मामलों में स्थिति घंटों के भीतर तेजी से बिगड़ सकती है.

बुखार उतरने के बाद इन संकेतों को बिल्कुल नजरअंदाज न करें
अगर डेंगू के मरीज में बुखार कम होने के बाद पेट में तेज दर्द या पेट छूने पर ज्यादा दर्द महसूस हो, तो इसे गंभीर संकेत माना जा सकता है. लगातार उल्टी होना भी चिंता की बात है. 24 घंटे में तीन या उससे ज्यादा बार उल्टी होने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए. नाक या मसूड़ों से खून आना भी गंभीर लक्षणों में शामिल हो सकता है. उल्टी में खून आना या मल का काला और तारकोल जैसा दिखना अंदरूनी ब्लीडिंग की ओर इशारा कर सकता है. ऐसी स्थिति में देरी नहीं करनी चाहिए.
इसे भी पढ़ेंः&amp;nbsp;Smoking Side Effects: क्या पहली ही सिगरेट से खराब होने लगते हैं फेफड़े? जानें सच
इसके अलावा मरीज का जरूरत से ज्यादा थका हुआ दिखना, बहुत सुस्त हो जाना, बेचैनी या असामान्य व्यवहार भी चेतावनी का संकेत हो सकता है. तेजी से सांस लेना या सांस लेने में परेशानी, त्वचा का पीला, ठंडा या चिपचिपा महसूस होना भी गंभीर स्थिति की तरफ इशारा कर सकता है. ज्यादा प्यास लगना, शरीर में अत्यधिक कमजोरी और होश बनाए रखने में परेशानी जैसे लक्षणों पर भी तुरंत ध्यान देना चाहिए. ये संकेत इस बात से जुड़े हो सकते हैं कि शरीर में तरल पदार्थ का संतुलन बिगड़ रहा है.
किन लोगों को ज्यादा सावधान रहने की जरूरत?
गंभीर डेंगू का खतरा कुछ लोगों में ज्यादा हो सकता है. इसमें 10 साल से कम उम्र के बच्चे, 65 साल से अधिक उम्र के लोग और डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर या लंबे समय से किडनी और लिवर की बीमारी से जूझ रहे लोग शामिल हो सकते हैं. जिन लोगों को दूसरी बार डेंगू का संक्रमण होता है, उनमें भी गंभीर डेंगू का खतरा बढ़ सकता है. इसलिए अगर मरीज पहले भी डेंगू से इंफेक्शन हो चुका है, तो उसके लक्षणों पर और अधिक ध्यान देना जरूरी है.
तीसरा चरण: कब शुरू होती है रिकवरी?
क्रिटिकल फेज बिना किसी गंभीर मुस्किलों के गुजरने के बाद रिकवरी शुरू हो सकती है. आमतौर पर बीमारी के छठे या सातवें दिन के आसपास मरीज की हालत में सुधार दिखने लगता है. भूख वापस आने लगती है, थकान कम हो सकती है और प्लेटलेट्स बढ़ने लगते हैं. शरीर में जमा अतिरिक्त तरल वापस ब्लड फ्लो में आने लगता है और मरीज को पहले की तुलना में बार-बार पेशाब भी आ सकता है. कुछ लोगों में इस दौरान लाल और खुजली वाला रैश दोबारा दिखाई दे सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 18 Aug 2026 15:30:04 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Dengue, Fever:, डेंगू, का, बुखार, उतर, गया, तो, न, हों, खुश, अगले, 24-48, घंटे, हैं, अहम</media:keywords>
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        <title>IIT Indore Oral Cancer: अब बिना बायोप्सी पता चलेगा ओरल कैंसर, IIT इंदौर के वैज्ञानिकों ने खोजा तरीका</title>
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        <description><![CDATA[ IIT Indore Oral Cancer Saliva Test Breakthrough: ओरल कैंसर की जांच को लेकर भविष्य में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है. इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी इंदौर के साइंटिस्ट ने एक ऐसा तरीका विकसित किया है, जिसकी मदद से लार और मुंह के अंदर से लिए गए साधारण स्वैब सैंपल के जरिए ओरल कैंसर से जुड़े मॉलिक्यूलर बदलावों का पता लगाया जा सकता है. यह तकनीक खासतौर पर उन लोगों की बार-बार स्क्रीनिंग और निगरानी में मददगार हो सकती है, जिन्हें ओरल कैंसर का खतरा ज्यादा है.
हालांकि,&amp;nbsp; इस तकनीक को पूरी तरह से बायोप्सी का विकल्प नहीं कहा जा सकता. रिसर्चर को इसे बड़े और अलग-अलग समूहों पर और जांचना होगा. हालांकि, शुरुआती नतीजे बताते हैं कि भविष्य में यह तरीका जोखिम वाले लोगों में शुरुआती बदलावों की पहचान और लगातार निगरानी के लिए उपयोगी साबित हो सकता है.
IIT इंदौर के वैज्ञानिकों ने किया शोध
यह स्टजी IIT इंदौर के मेहता फैमिली स्कूल ऑफ बायोसाइंसेज एंड बायोमेडिकल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर हेम चंद्र झा और डॉ. तरुण प्रकाश वर्मा के नेतृत्व में किया गया. इस शोध में गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ डेंटिस्ट्री, इंदौर के डॉ. दीपक अग्रवाल ने भी सहयोग किया. रिसर्चर ने ओरल स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा पर अध्ययन किया, जो मुंह के कैंसर का एक आम प्रकार है. इसके साथ ही ओरल सबम्यूकस फाइब्रोसिस यानी OSMF से पीड़ित लोगों के सैंपल भी जांचे गए. OSMF एक ऐसी स्थिति है, जिसका संबंध सुपारी, गुटखा और तंबाकू के सेवन से हो सकता है और कुछ मामलों में यह आगे चलकर कैंसर में बदलने का खतरा पैदा कर सकती है.
लार और स्वैब से कैसे मिली जानकारी?
रिसर्च के दौरान साइंटिस्ट ने तीन अलग-अलग समूहों से सैंपल लिए. इनमें स्वस्थ लोग, OSMF के मरीज और ओरल कैंसर से पीड़ित मरीज शामिल थे. लार के साथ मुंह के अंदर की परत से स्वैब के जरिए सैंपल लिया गया. इसके बाद सैंपल का लिक्विड क्रोमैटोग्राफी-मास स्पेक्ट्रोमेट्री यानी LC-MS तकनीक से एनालिसिस किया गया. इस जांच के जरिए वैज्ञानिकों ने शरीर में मौजूद कुछ मॉलिक्यूलर और केमिकल बदलावों का अध्ययन किया.
लार से वैज्ञानिकों को मुंह में होने वाले रासायनिक बदलावों के संकेत मिले. वहीं, स्वैब से मुंह की अंदरूनी सतह से कोशिकाओं और प्रोटीन से जुड़ी जानकारी जुटाई गई. दोनों तरह के सैंपल से मिली जानकारी को एक साथ देखने पर स्वस्थ ऊतकों से लेकर कैंसर से पहले की स्थिति और फिर कैंसर तक होने वाले आणविक बदलावों की तस्वीर समझने में मदद मिली.

इन बदलावों पर वैज्ञानिकों की नजर
स्टडी में फैट मेटाबॉलिज्म यानी वसा के चयापचय से जुड़े बदलाव देखे गए. इसके अलावा शरीर में ऊर्जा बनने की प्रक्रिया, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस, टिश्यू की मरम्मत और इम्यून सिस्टम की गतिविधियों से जुड़े अलग-अलग मॉलिक्यूलर संकेत भी सामने आए. वैज्ञानिकों के अनुसार, इस तरह के बदलाव बीमारी की प्रक्रिया के दौरान दिखाई दे सकते हैं. भविष्य में इन मॉलिक्यूलर संकेतों को आसान जांच के रूप में विकसित करने की संभावना पर काम किया जा सकता है.
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बिना सुई और बायोप्सी के सैंपल लेने की संभावना
इस तरीके की सबसे बड़ी खासियत यह है कि सैंपल लेने के लिए शुरुआत में किसी सुई या दर्दनाक प्रक्रिया की जरूरत नहीं पड़ती. लार का सैंपल लेना आसान है, जबकि स्वैब के जरिए मुंह के अंदर की सतह से नमूना लिया जा सकता है. अगर आगे के अध्ययनों में इस तकनीक के नतीजे सफलतापूर्वक साबित होते हैं, तो इसका इस्तेमाल उन लोगों की नियमित निगरानी में किया जा सकता है, जिन्हें ओरल कैंसर होने का जोखिम अधिक है. उदाहरण के तौर पर, मुंह में पहले से संदिग्ध या प्रीकैंसरस बदलाव वाले लोगों की समय-समय पर जांच करने में यह मददगार हो सकता है.

रिसर्चर का मानना है कि यह तकनीक भविष्य में दिखने वाले लक्षणों से पहले होने वाले कुछ आणविक बदलावों की पहचान करने में भी मदद कर सकती है. हालांकि, इसे क्लिनिकल इस्तेमाल के लिए पूरी तरह तैयार होने से पहले बड़े स्तर पर जांच और पुष्टि की जरूरत होगी.
IIT इंदौर के निदेशक प्रोफेसर सुहास जोशी ने कहा कि यह अध्ययन एडवांस्ड मॉलिक्यूलर रिसर्च को एक आसान और दर्दरहित स्क्रीनिंग तरीके की दिशा में ले जाने की संभावना दिखाता है. वहीं, प्रोफेसर हेम चंद्र झा के अनुसार, टीम का लक्ष्य इन आणविक संकेतों को ऐसे व्यावहारिक टूल में बदलना है, जिनका इस्तेमाल जोखिम वाले ओरल लीजन्स की शुरुआती पहचान और निगरानी में किया जा सके.
ब्रिटिश जर्नल ऑफ कैंसर में प्रकाशित हुआ रिसर्च
इस रिसर्च के निष्कर्ष ब्रिटिश जर्नल ऑफ कैंसर में प्रकाशित हुए हैं. IIT इंदौर ने इस तकनीक के लिए पेटेंट आवेदन भी दाखिल किया है, जो फिलहाल प्रक्रिया में है. अब वैज्ञानिकों की टीम इस शोध को बड़े और अधिक विविध मरीज समूहों पर जांचने की तैयारी कर रही है. इसके बाद कैंसर से जुड़े इन आणविक संकेतों के आधार पर आसान और इस्तेमाल में सुविधाजनक टेस्ट विकसित करने की दिशा में काम किया जाएगा.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 17 Aug 2026 23:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>पानी पीने के बाद भी प्यास लग रही, ये दिक्कत तो नहीं?</title>
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        <description><![CDATA[ &amp;nbsp;Frequent Thirst Causes: पानी पीने के तुरंत बाद भी अगर गला सूखता महसूस हो और बार-बार प्यास लगती रहे तो इसे मामूली चीज समझकर नजरअंदाज करना सही नहीं है. डॉक्टरों के मुताबिक, यह लक्षण भले ही खुद कोई बीमारी न हो, लेकिन यह शरीर में किसी गड़बड़ी की तरफ इशारा जरूर कर सकता है.
ज्यादातर मामलों में बार-बार प्यास लगने की वजह डिहाइड्रेशन ही होती है. मेहनत करने, ज्यादा पसीना निकलने, तेज धूप में रहने या नमक वाली चीजों का ज्यादा सेवन करने से शरीर में पानी की कमी हो जाती है, जिससे प्यास बार-बार लगती रहती है. कैफीन और शराब का ज्यादा सेवन भी शरीर से पानी निकालने का काम करता है, जो इस दिक्कत को और बढ़ा सकता है.
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डायबिटीज का भी हो सकता है संकेत
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, बार-बार और असामान्य रूप से प्यास लगना डायबिटीज का शुरुआती लक्षण हो सकता है. जब ब्लड शुगर लेवल बढ़ जाता है तो शरीर पेशाब के जरिए एक्स्ट्रा ग्लूकोज बाहर निकालने की कोशिश करता है, इसी प्रोसेस में शरीर से पानी भी बाहर निकल जाता है, जिससे बार-बार प्यास लगने लगती है.
बीमारी में भी बिगड़ता है पानी का संतुलन
किडनी शरीर में पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन बनाए रखने का काम करती है. अगर किडनी सही तरीके से काम न करे, तो यह संतुलन बिगड़ जाता है, जिससे बार बार प्यास लगने की समस्या हो सकती है. ऐसे में यह लक्षण किडनी से जुड़ी दिक्कत की तरफ भी इशारा कर सकता है.
डायबिटीज इन्सिपिडस भी है एक वजह
डायबिटीज इन्सिपिडस एक ऐसी स्थिति है, जिसमें शरीर में एक खास हार्मोन की कमी हो जाती है, जिससे अत्यधिक प्यास लगने के साथ साथ बार बार पेशाब भी आता है. यह डायबिटीज मेलिटस से बिल्कुल अलग स्थिति है, लेकिन इसके लक्षण काफी हद तक मिलते जुलते होते हैं.
मुंह सूखना भी हो सकता है वजह
कई बार मुंह में पर्याप्त लार न बनने की वजह से भी बार-बार प्यास महसूस होती है, इसे ड्राई माउथ कहा जाता है. इसमें मुंह, गला और जीभ रूखी हो सकती है, कई बार होंठ भी फटने लगते हैं. कुछ दवाइयों के साइड इफेक्ट के तौर पर भी यह समस्या हो सकती है.
कब लेनी चाहिए डॉक्टर की सलाह?
अगर यह लक्षण लगातार बना रहे, खासकर उन लोगों में जिन्हें पहले से डायबिटीज, किडनी या हार्मोन से जुड़ी कोई बीमारी है, तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए. बच्चों और बुजुर्गों में यह लक्षण ज्यादा गंभीर हो सकता है, इसलिए समय पर जांच और सही इलाज जरूरी है.
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें
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        <pubDate>Mon, 17 Aug 2026 23:30:04 +0530</pubDate>
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        <title>Room Freshener कितने सेफ, कहीं सेहत से खिलवाड़ तो नहीं कर रहे?</title>
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        <description><![CDATA[ Are Room Fresheners Safe For Health: कमरे में अच्छी खुशबू के लिए लोग स्प्रे, प्लग-इन, ऑटोमैटिक स्प्रे, रीड डिफ्यूजर, जेल और फ्रेगरेंस बीड्स जैसे रूम फ्रेशनर का इस्तेमाल करते हैं. घर में बदबू हटाने और माहौल को खुशबूदार बनाने वाले ये प्रोडक्ट आम हैं, लेकिन क्या इन्हें बिना किसी चिंता के लगातार इस्तेमाल करना पूरी तरह सुरक्षित है? इसका जवाब इतना सीधा नहीं है. रूम फ्रेशनर की सुरक्षा उसके प्रकार, उसमें मौजूद केमिकल और इस्तेमाल के तरीके पर निर्भर करती है.
पॉइजन कंट्रोल संस्था की रिपोर्ट के अनुसार, ज्यादातर रूम फ्रेशनर की थोड़ी मात्रा को सामान्य रूप से सांस के जरिए अंदर लेने से गंभीर नुकसान होने की संभावना कम होती है. लेकिन लगातार और ज्यादा मात्रा में इनके संपर्क में रहने को लेकर कुछ चिंताएं जरूर हैं. खासतौर पर कुछ लोगों में खुशबू वाले केमिकल और दूसरे घटक सांस, त्वचा या एलर्जी से जुड़ी परेशानी पैदा कर सकते हैं.
रूम फ्रेशनर में क्या होता है?
रूम फ्रेशनर अलग-अलग फॉर्म में मिलते हैं और इनमें मौजूद सामग्री भी अलग हो सकती है. इनमें आमतौर पर फ्रेगरेंस यानी खुशबू देने वाले केमिकल, एसेंशियल ऑयल और दूसरे सॉल्वेंट शामिल हो सकते हैं. कई लिक्विड प्रोडक्ट्स में खुशबू वाले तेल को आइसोप्रोपाइल अल्कोहल जैसे सॉल्वेंट में मिलाया जाता है, जिससे खुशबू हवा में फैल सके.

एयरोसोल स्प्रे में प्रोपेलेंट गैस का इस्तेमाल हो सकता है, जबकि जेल और बीड्स वाले फ्रेशनर धीरे-धीरे खुशबू छोड़ने के लिए बनाए जाते हैं. कुछ प्लग-इन फ्रेशनर गर्म होकर खुशबू फैलाते हैं. बाजार में ऐसे प्रोडक्ट भी मिलते हैं, जिनमें केवल खुशबू ही नहीं बल्कि बदबू पैदा करने वाले सूक्ष्मजीवों को कम करने के लिए अन्य रसायन भी शामिल हो सकते हैं.
क्या रूम फ्रेशनर सांस के जरिए नुकसान पहुंचा सकते हैं?
रूम फ्रेशनर से खुशबू के साथ हवा में वोलेटाइल कार्बनिक यौगिक यानी VOCs भी निकल सकते हैं. ये ऐसे केमिकल होते हैं, जो सामान्य तापमान पर आसानी से गैस या वाष्प बनकर हवा में फैल सकते हैं. कुछ वैज्ञानिक अध्ययनों में इनडोर एयर पॉल्यूशन और लंबे समय तक फ्रेगरेंस प्रोडक्ट्स के संपर्क को लेकर स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं सामने आई हैं.
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि रूम फ्रेशनर की हल्की खुशबू लेते ही हर व्यक्ति बीमार हो जाएगा. जोखिम इस बात पर निर्भर कर सकता है कि प्रोडक्ट कौन सा है, कितनी मात्रा में इस्तेमाल किया जा रहा है, कमरे में वेंटिलेशन कैसा है और व्यक्ति को किसी तरह की संवेदनशीलता या एलर्जी है या नहीं. अगर स्प्रे करने के तुरंत बाद खांसी, गले में जलन, सांस लेने में परेशानी या घुटन महसूस हो, तो तुरंत उस जगह से हटकर ताजी हवा वाली जगह पर जाना चाहिए. छोटे और बंद कमरे में जरूरत से ज्यादा स्प्रे करने से बचना बेहतर है.

बच्चों के लिए ज्यादा सावधानी जरूरी
रूम फ्रेशनर को बच्चों की पहुंच से दूर रखना चाहिए. खासतौर पर लिक्विड रिफिल, रीड डिफ्यूजर और खुशबू वाले जेल या बीड्स निगलने पर ज्यादा जोखिम पैदा कर सकते हैं. कुछ बीड्स बच्चों को देखने में आकर्षक लग सकते हैं और वे इन्हें गलती से निगल सकते हैं. ऐसे उत्पादों के धीरे-धीरे घुलने की वजह से उनमें मौजूद केमिकल का असर लंबे समय तक रह सकता है. वहीं, खुले रीड डिफ्यूजर में मौजूद लिक्विड भी बच्चों के लिए जोखिम भरा हो सकता है.
लिक्विड रूम फ्रेशनर निगलने पर मुंह और पेट में जलन, मतली या उल्टी जैसी समस्या हो सकती है. ज्यादा मात्रा में निगलने पर गंभीर असर भी हो सकते हैं. इसलिए अगर किसी बच्चे ने गलती से रूम फ्रेशनर निगल लिया है, तो इसे सामान्य घटना मानकर नजरअंदाज न करें और तुरंत डॉक्टर या स्थानीय आपातकालीन विष नियंत्रण सेवा से सलाह लें.
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प्लग-इन और ऑटोमैटिक स्प्रे इस्तेमाल करते समय रखें ध्यान
प्लग-इन रूम फ्रेशनर को ऐसी जगह लगाना चाहिए, जहां बच्चे और पालतू जानवर आसानी से न पहुंच सकें. इस्तेमाल से पहले प्रोडक्ट पर दिए गए निर्देश जरूर पढ़ें. ऑटोमैटिक स्प्रे या एयरोसोल फ्रेशनर में ज्वलनशील केमिकल हो सकते हैं. इसलिए इनके पास माचिस, मोमबत्ती, सिगरेट या किसी भी तरह की खुली आग नहीं होनी चाहिए. कुछ मामलों में स्प्रे में मौजूद ज्वलनशील पदार्थ आग पकड़ने और जलने की वजह बने हैं.
त्वचा और आंखों में चला जाए तो क्या करें?
रूम फ्रेशनर त्वचा पर गिरने से कुछ लोगों को जलन, लालिमा या एलर्जी जैसी प्रतिक्रिया हो सकती है. ऐसी स्थिति में प्रभावित जगह को साबुन और पानी से अच्छी तरह धोना चाहिए. अगर रूम फ्रेशनर आंख में चला जाए, तो साफ पानी से अच्छी तरह धोएं. आमतौर पर थोड़ी मात्रा से लालिमा और जलन हो सकती है, लेकिन अगर अच्छी तरह धोने के बाद भी परेशानी बनी रहे या नजर पर असर महसूस हो, तो डॉक्टर से जांच कराएं.
रूम फ्रेशनर इस्तेमाल करने का सही तरीका
रूम फ्रेशनर का इस्तेमाल कम मात्रा में और अच्छी हवा वाले कमरे में करें. प्रोडक्ट को जरूरत से ज्यादा स्प्रे करने से बचें. कमरे की बदबू दूर करने के लिए केवल फ्रेशनर पर निर्भर रहने के बजाय खिड़कियां खोलकर हवा आने दें और बदबू के असली कारण को साफ करें. लिक्विड, जेल और बीड्स वाले प्रोडक्ट को हमेशा बच्चों और पालतू जानवरों की पहुंच से दूर रखें. इस्तेमाल के बाद ढक्कन या पैकेजिंग को सही तरीके से बंद करें. अगर किसी व्यक्ति को खुशबू से सिरदर्द, खांसी, एलर्जी या सांस से जुड़ी परेशानी महसूस होती है, तो ऐसे प्रोडक्ट का इस्तेमाल कम करना या बंद करना बेहतर हो सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 17 Aug 2026 23:30:03 +0530</pubDate>
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        <title>Smoking Side Effects: क्या पहली ही सिगरेट से खराब होने लगते हैं फेफड़े? जानें सच</title>
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        <description><![CDATA[ Does First Cigarette Cause Damage To Body: कई लोगों को लगता है कि सिगरेट पीने से होने वाली गंभीर बीमारियां कई साल तक धूम्रपान करने के बाद ही सामने आती हैं. इसी सोच के चलते कुछ लोग खुद को यह कहकर समझाते हैं कि उन्होंने अभी कुछ ही साल से सिगरेट पीना शुरू किया है या वे सिर्फ कभी-कभार और दोस्तों के साथ ही स्मोक करते हैं. लेकिन एक्सपर्ट के मुताबिक, यह सोच सही नहीं है. सिगरेट का धुआं शरीर को नुकसान पहुंचाना पहली बार इसके संपर्क में आने के बाद ही शुरू कर सकता है, भले ही उस समय इसका कोई साफ लक्षण नजर न आए.
ग्लेनीगल्स अस्पताल, परेल के पल्मोनोलॉजी और लंग ट्रांसप्लांट विभाग के निदेशक डॉ. समीर गार्डे के मुताबिक, सिगरेट का असर फेफड़ों के साथ-साथ दिल और ब्लड वेसल्स पर भी पड़ना शुरू हो जाता है. उनका कहना है कि यह मान लेना गलत है कि कई सालों तक धूम्रपान न करने तक शरीर को कोई नुकसान नहीं होता. डॉक्टर के मुताबिक, शरीर सिगरेट के धुएं के संपर्क में आते ही उस पर प्रतिक्रिया देना शुरू कर देता है. हालांकि, शुरुआत में होने वाला नुकसान इतना हल्का हो सकता है कि व्यक्ति उसे महसूस नहीं कर पाता. यही वजह है कि कई लोग खुद को पूरी तरह स्वस्थ समझते रहते हैं और धूम्रपान जारी रखते हैं.
पहली सिगरेट से ही शरीर में शुरू हो सकते हैं बदलाव
डॉ. गार्डे के अनुसार, सिगरेट के धुएं की थोड़ी सी मात्रा भी शरीर पर तुरंत असर डाल सकती है. इसके शुरुआती प्रभावों में हार्ट रेट और ब्लड प्रेशर का बढ़ना शामिल है. इसके साथ ही फेफड़ों में जलन और सूजन जैसी स्थिति भी शुरू हो सकती है. उन्होंने बताया कि धूम्रपान का असर फेफड़ों, रक्त वाहिकाओं और दिल पर पड़ता है. लगातार सिगरेट पीते रहने से यह नुकसान धीरे-धीरे बढ़ता जाता है और समय के साथ कई बीमारियों का खतरा भी बढ़ सकता है.
सिर्फ इसलिए सुरक्षित नहीं हैं क्योंकि कोई लक्षण नहीं है
धूम्रपान करने वाले व्यक्ति को अगर खांसी, सांस फूलना या सीने में परेशानी जैसी कोई समस्या महसूस नहीं हो रही है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि शरीर पर कोई असर नहीं पड़ रहा. डॉक्टर के मुताबिक, सिगरेट का धुआं शरीर के अंदर ऐसे बदलाव शुरू कर सकता है, जिनका शुरुआती दौर में पता नहीं चलता. यानी खुद को स्वस्थ महसूस करना धूम्रपान से होने वाले नुकसान से सुरक्षित होने की गारंटी नहीं है. नुकसान धीरे-धीरे बढ़ सकता है और लंबे समय तक धूम्रपान करने पर इसके प्रभाव ज्यादा गंभीर हो सकते हैं.

शुरुआती दौर में दिख सकते हैं ये संकेत
धूम्रपान का असर केवल कई दशक बाद दिखाई दे, ऐसा जरूरी नहीं है. कुछ लोगों में कम उम्र में या कुछ सालों तक धूम्रपान करने के बाद भी बदलाव नजर आ सकते हैं. इसके कुछ संकेतों में लगातार खांसी, सीढ़ियां चढ़ते समय सांस फूलना, पहले की तुलना में जल्दी थक जाना और स्टैमिना कम होना शामिल हैं. इसके अलावा बार-बार सीने में इंफेक्शन होना, सामान्य फिटनेस वापस पाने में पहले से ज्यादा समय लगना और गले में जलन जैसी समस्याएं भी नजर आ सकती हैं. अगर किसी व्यक्ति को धूम्रपान के बाद आराम की स्थिति में सीने में दर्द या सांस लेने में परेशानी जैसी समस्या हो रही है, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.
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दिन में सिर्फ एक सिगरेट भी सुरक्षित नहीं
कई लोग मानते हैं कि दिन में सिर्फ एक सिगरेट पीने या कभी-कभार दोस्तों के साथ स्मोक करने से कोई बड़ा नुकसान नहीं होता. लेकिन डॉक्टर के मुताबिक, धूम्रपान की कोई ऐसी मात्रा तय नहीं है जिसे पूरी तरह सुरक्षित कहा जा सके. जितनी ज्यादा सिगरेट पी जाती हैं, जोखिम उतना बढ़ता जाता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि कम मात्रा में धूम्रपान पूरी तरह सुरक्षित है. दिन में सिर्फ एक सिगरेट पीने से भी व्यक्ति सिगरेट में मौजूद हानिकारक रसायनों के संपर्क में आता है, जो दिल, फेफड़ों और ब्लड वेसल्स को प्रभावित कर सकते हैं.

सोशल स्मोकिंग को भी हल्के में न लें
सिर्फ पार्टियों या दोस्तों के साथ कभी-कभार सिगरेट पीने को भी सुरक्षित विकल्प नहीं माना जा सकता. डॉ. गार्डे के मुताबिक, धूम्रपान का कोई भी रूप पूरी तरह सुरक्षित नहीं है. शरीर में जाने वाले धुएं की थोड़ी मात्रा भी बीमारी का खतरा बढ़ा सकती है.
सिगरेट छोड़ते ही शरीर शुरू करता है सुधार
हालांकि, अच्छी बात यह है कि धूम्रपान छोड़ने के बाद शरीर रिकवरी की प्रक्रिया शुरू कर देता है. डॉक्टर के मुताबिक, सिगरेट छोड़ते ही शरीर खुद को ठीक करने की दिशा में काम करना शुरू कर देता है. धीरे-धीरे फेफड़ों की क्षमता में सुधार हो सकता है और दिल से जुड़ी समस्याओं, स्ट्रोक और फेफड़ों से संबंधित बीमारियों का जोखिम भी कम हो सकता है. धूम्रपान जितनी जल्दी छोड़ा जाए, शरीर को उतना ही ज्यादा फायदा मिल सकता है. डॉक्टर का कहना है कि कम उम्र में सिगरेट छोड़ना भविष्य के लिए ज्यादा फायदेमंद होता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि बड़ी उम्र में छोड़ने का कोई फायदा नहीं है. आप जिस उम्र में भी धूम्रपान छोड़ते हैं, वह भविष्य के स्वास्थ्य के लिए बेहतर कदम है.
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        <pubDate>Sun, 16 Aug 2026 19:30:03 +0530</pubDate>
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        <title>Pankaj Bhadouria Chemotherapy Hair Loss: कीमो में बाल झड़ना महिलाओं को इतना क्यों तोड़ देता है? जानें वजह</title>
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        <description><![CDATA[ Pankaj Bhadouria Chemotherapy Hair Loss:&amp;nbsp; मास्टरशेफ इंडिया की विनर शेफ पंकज भदौरिया ने हाल ही में कीमोथेरेपी के दौरान अपने बाल झड़ने का दर्द सबके सामने रखा, और कंघी में बालों का गुच्छा दिखाती एक तस्वीर पोस्ट की. उन्होंने बताया कि यह पल उनकी सांस रोक देने वाला था, भले ही उन्हें पहले से पता था कि कीमोथेरेपी से बाल झड़ सकते हैं. दरअसल यह सिर्फ एक साइड इफेक्ट नहीं, बल्कि खुद को आईने में पहचान न पाने का झटका होता है. दिल्ली के इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल में ब्रेस्ट ऑन्कोलॉजी की क्लिनिकल एडवाइजर डॉक्टर ने इस पूरे मनोवैज्ञानिक असर को विस्तार से समझाया. उन्होंने अपना दर्द इंस्टाग्राम पोस्ट में शेयर किया.
कीमोथेरेपी से बाल क्यों झड़ते हैं?
कीमोथेरेपी उन सभी सेल्स को टारगेट करती है जो तेजी से बढ़ती हैं, जिसमें कैंसर सेल्स के साथ साथ बालों के फॉलिकल सेल्स भी शामिल हैं. इसी वजह से कई कीमो दवाएं बालों के नैचुरल ग्रोथ साइकल को रोक देती हैं, जिससे बाल पतले होने लगते हैं या फिर पूरी तरह झड़ जाते हैं. यह असर दवा, डोज और मरीज पर निर्भर करता है, और सिर के अलावा आइब्रो, आईलैशेज और शरीर के दूसरे बालों पर भी कर सकता है.



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A post shared by MasterChef Pankaj Bhadouria (@masterchefpankajbhadouria)





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बॉडी इमेज पर पड़ता है गहरा असर
मरीजों को पहले ही बता दिया जाता है, कि बाल झड़ेंगे, सर्जरी से निशान बन सकते हैं, वजन बदल सकता है या स्किन नाखूनों का रंग रूप अलग दिख सकता है. वैसे डॉक्टर कहते हैं कि कंसल्टेशन रूम में यह सब सुनने में मैनेज करने लायक लगता है, लेकिन जब यही बदलाव आईने में दिखने लगते हैं, तो एहसास पूरी तरह अलग हो जाता है.
बाल इतने अहम क्यों लगते हैं?
बाल चेहरे को फ्रेम करते हैं और खूबसूरती, स्त्रीत्व और पहचान से जुड़े होते हैं. कई महिलाओं के लिए दशकों से बाल ही उनकी खुद की पहचान का हिस्सा रहे हैं. इसीलिए बाल झड़ना एक तरह की बॉडी इमेज गड़बड़ी पैदा करता है. अमेरिकन कैंसर सोसाइटी भी बाल झड़ने को कैंसर ट्रीटमेंट के सबसे नजर आने वाले असर में गिनती है, जो बॉडी इमेज, इमोशनल हेल्थ और लाइफ क्वालिटी तीनों को प्रभावित करता है.
कंट्रोल खोने का एहसास भी है वजह
कैंसर खुद ही जिंदगी पर से कंट्रोल छीन लेने जैसा एहसास कराता है. डायग्नोसिस, सर्जरी, कीमो, स्कैन और ट्रीटमेंट शेड्यूल, यह सब ऐसी चीजें हैं जिन्हें मरीज खुद तय नहीं कर पाते. बाल झड़ना इस एहसास को और गहरा कर देता है, क्योंकि यह साफ नजर आता है, और इसे छुपाना मुश्किल होता है.
आईने के सामने का मनोविज्ञान
कई बार महिला आईने में खुद को पहचान ही नहीं पाती. नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट के मुताबिक बाल झड़ने के साथ शर्मिंदगी, गुस्सा और डिप्रेशन जैसी भावनाएं भी जुड़ी हो सकती हैं.
रिश्तों और आत्मविश्वास पर भी पड़ता है असर
बॉडी इमेज का असर पर्सनल रिश्तों पर भी पड़ता है. सर्जरी के निशान, ब्रेस्ट में बदलाव और बाल झड़ना सेक्शुअल कॉन्फिडेंस को भी असर कर सकते हैं.
बाल वापस आने के बाद भी बाकी रहता है असर
कीमो से जुड़ा हेयर लॉस आमतौर पर अस्थायी होता है. ट्रीटमेंट खत्म होने के बाद बाल दोबारा उगने लगते हैं, लेकिन मानसिक रिकवरी शरीर की रिकवरी जितनी तेज नहीं होती. डॉक्टर के मुताबिक कैंसर ट्रीटमेंट में मरीज के पूरे व्यक्तित्व का ध्यान रखा जाना चाहिए, सिर्फ मेडिकल असर नहीं, अपीयरेंस में होने वाले बदलावों के इमोशनल असर के लिए भी तैयार करना उतना ही जरूरी है.
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        <pubDate>Sat, 15 Aug 2026 15:30:04 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Can Bigger Thighs Help You Live Longer: क्या बड़ी जांघों से बढ़ती है उम्र? इस स्टडी में हुआ चौंकाने वाला खुलासा</title>
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        <description><![CDATA[ Large Thighs Linked To Longer Life Study: अक्सर बड़ी जांघों को सिर्फ शरीर की बनावट या ज्यादा फैट से जोड़कर देखा जाता है. कई लोग इन्हें कम करने के लिए एक्सरसाइज और डाइट पर खास ध्यान देते हैं. लेकिन एक अंतरराष्ट्रीय मेटा-एनालिसिस ने इस सोच को अलग नजरिए से देखने का संकेत दिया है. करीब 25 हजार लोगों से जुड़े आंकड़ों के विश्लेषण में जांघों की परिधि और लंबे जीवन के बीच एक दिलचस्प संबंध देखने को मिला.
रिपोर्ट के अनुसार, जांघ की परिधि में हर 5 सेंटीमीटर की बढ़ोतरी का संबंध किसी भी कारण से मौत के जोखिम में 18 प्रतिशत की कमी के साथ पाया गया. हालांकि इसका यह मतलब नहीं है कि सिर्फ जांघों का आकार बढ़ा लेने से उम्र अपने आप बढ़ जाएगी. विशेषज्ञों के मुताबिक इसके पीछे जांघों की बनावट और खासतौर पर उनमें मौजूद मांसपेशियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है.
25 हजार लोगों के आंकड़ों में क्या मिला?
इंटरनेशनल लेवल पर किए गए इस मेटा-एनालिसिस में करीब 25 हजार प्रतिभागियों के आंकड़ों को शामिल किया गया. इसमें पाया गया कि जांघ की परिधि में हर 5 सेंटीमीटर की बढ़ोतरी, सभी कारणों से होने वाली मृत्यु के कम जोखिम से जुड़ी हुई थी. यानी जिन लोगों की जांघों की परिधि अधिक थी, उनमें लंबे समय तक जीवित रहने का संबंध देखने को मिला. यह एक संबंध है, इसलिए इसे सीधे कारण और परिणाम के रूप में नहीं देखा जा सकता. जांघों का आकार बड़ा होने के पीछे मांसपेशियां, फैट और हड्डियों समेत कई चीजें शामिल हो सकती हैं. यही वजह है कि केवल जांघ की चौड़ाई या आकार देखकर किसी व्यक्ति की सेहत या उम्र के बारे में निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता.

बड़ी जांघों में मांसपेशियों की क्या भूमिका हो सकती है?
ब्रिटेन के किंग्स कॉलेज लंदन में एजिंग और हेल्थ की प्रोफेसर क्लेयर स्टीव्स के अनुसार, जांघ में मौजूद तीन प्रमुख तरह के ऊतकों में से मांसपेशियों का स्वास्थ्य और लंबी उम्र से मजबूत संबंध देखा गया है. जांघ का आकार केवल फैट से तय नहीं होता. इसमें मांसपेशियों की मात्रा भी अहम होती है. विशेषज्ञों का मानना है कि मेटा-एनालिसिस में लंबे समय तक जीवित रहने से जुड़ाव देखने वाले लोगों की जांघों में संभवतः मांसपेशियों की मात्रा अधिक रही होगी, जिससे उनकी जांघों की परिधि भी बड़ी हो सकती है.

मजबूत पैरों की मांसपेशियां रोजमर्रा की एक्टिविटी, चलने, दौड़ने और शरीर को सक्रिय बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती हैं. इसलिए जांघ की मांसपेशियों को शरीर की कुल फिटनेस के एक संकेतक के तौर पर भी देखा जा सकता है.
सिर्फ फैट और मांसपेशियों को एक जैसा नहीं मान सकते
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है कि बड़ी जांघें हर व्यक्ति में एक जैसी नहीं होतीं. किसी की जांघ का आकार मांसपेशियों की वजह से बड़ा हो सकता है, जबकि किसी में फैट की मात्रा अधिक हो सकती है. इसलिए केवल टेप से जांघ की परिधि मापकर यह तय नहीं किया जा सकता कि व्यक्ति की सेहत बेहतर है या नहीं. इस स्टडी से जुड़ी सबसे दिलचस्प बात यह है कि जांघ के आकार के बजाय उसके भीतर मौजूद मांसपेशियों की भूमिका पर ध्यान दिया जा रहा है. यही वजह है कि विशेषज्ञ जांघों को सिर्फ बड़ी या पतली कहने के बजाय उनकी ताकत और काम करने की क्षमता को भी महत्वपूर्ण मानते हैं.
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शरीर की बनावट को लेकर बदल सकती है सोच
बड़ी जांघों को लेकर नकारात्मक सोच भी लंबे समय से मौजूद रही है. कई लोग शरीर के इस हिस्से को लेकर असहज महसूस करते हैं और इसे कम करने को ही फिटनेस का लक्ष्य मानते हैं. ब्रिटेन की रनर ताशा थॉम्पसन ने भी बताया कि वह पहले अपनी जांघों के आकार को लेकर अलग तरह से सोचती थीं. लेकिन समय के साथ उन्होंने इस बात पर ध्यान देना शुरू किया कि उनके पैर और जांघें क्या कर सकती हैं.&amp;nbsp;
क्या बड़ी जांघें उम्र बढ़ाने की गारंटी हैं?
सिर्फ जांघों को बड़ा करने के लिए किसी खास तरीके को अपनाने के बजाय शरीर को सक्रिय रखना और मांसपेशियों की ताकत पर ध्यान देना अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है. किंग्स कॉलेज लंदन से जुड़ी प्रोफेसर क्लेयर स्टीव्स की बात भी इसी ओर इशारा करती है कि जांघों में मौजूद मांसपेशियों का स्वास्थ्य और लंबी उम्र से मजबूत संबंध है. करीब 25 हजार लोगों के आंकड़ों पर आधारित इस मेटा-एनालिसिस ने जांघों के आकार को लेकर एक दिलचस्प संबंध जरूर सामने रखा है. हर 5 सेंटीमीटर अधिक जांघ परिधि का संबंध सभी कारणों से मौत के 18 प्रतिशत कम जोखिम के साथ देखा गया.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Fri, 14 Aug 2026 23:30:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Gallbladder Stones: पित्त की थैली में कैसे बनती है पथरी? जानें लक्षण और इलाज</title>
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        <description><![CDATA[ Gallbladder Stones: पित्त की थैली यानी गॉलब्लैडर लीवर के नीचे मौजूद एक छोटी सी थैली होती है. इसमें पित्त रस जमा रहता है. यह रस खाना पचाने में मदद करता है. कई बार इसी पित्त रस में छोटे-छोटे पत्थर जैसे टुकड़े बनने लगते हैं, जिन्हें पित्त की पथरी या गॉलस्टोन कहा जाता है. पित्त की पथरी आजकल काफी आम समस्या है और यह किसी को भी हो सकती है. हालांकि, ज्यादा वजन वाले लोगों, महिलाओं और गलत खान-पान करने वालों में इसका खतरा ज्यादा हो सकता है.
पित्त की पथरी क्यों बनती है?
पित्त रस में कोलेस्ट्रॉल और कुछ दूसरे पदार्थ होते हैं. जब इनका संतुलन बिगड़ जाता है तो पथरी बन सकती है. इसके कई कारण हो सकते हैं. पित्त रस में कोलेस्ट्रॉल ज्यादा होने पर वह धीरे-धीरे जमा होकर पथरी का रूप ले सकता है. ज्यादातर पथरियां इसी वजह से बनती हैं.
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लीवर की परेशानी
कुछ लीवर की बीमारियों में शरीर में बिलिरुबिन बढ़ सकता है. इससे भी पित्त की पथरी बनने का खतरा बढ़ जाता है. इसके साथ ही अगर पित्त की थैली पूरी तरह खाली नहीं होती, तो उसमें जमा रस गाढ़ा हो सकता है. इससे पथरी बन सकती है. आपको बता दें कि मोटापा और गलत खानपान से भी पथरी का खतरा बढ़ सकता है.&amp;nbsp;
पित्त की पथरी के लक्षण क्या हैं?
कई लोगों में छोटी पथरी होने पर कोई लक्षण नहीं दिखता. उन्हें पता भी नहीं चलता कि उनके अंदर पथरी है, लेकिन अगर पथरी किसी नली में फंस जाए, तो कुछ लक्षण दिखाई दे सकते हैं.

पेट के ऊपर दाईं तरफ तेज दर्द होना.
दर्द का पीठ या कंधे तक जाना.
जी मिचलाना या उल्टी होना.
खाना खाने के बाद पेट में दर्द या भारीपन होना.
पेट फूलना.
खाना ठीक से न पचना.
बुखार या ठंड लगना.
आंखों और त्वचा का रंग पीला पड़ना.
पेशाब का रंग गहरा होना.
मल का रंग हल्का होना.

पथरी की जांच कैसे होती है?
अगर तेज पेट दर्द के साथ बुखार या आंखों और त्वचा का रंग पीला पड़ रहा है, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. ऐसे में जल्दी डॉक्टर से मिलना जरूरी है. पित्त की पथरी का पता लगाने के लिए डॉक्टर अक्सर पेट का अल्ट्रासाउंड करवाते हैं. इससे पथरी कहां है और कितनी बड़ी है, इसका पता चल सकता है. जरूरत पड़ने पर डॉक्टर कुछ और जांच भी करवा सकते हैं.
पित्त की पथरी से कैसे बचें?
कुछ आसान बातों का ध्यान रखकर पथरी का खतरा कम किया जा सकता है.

तला-भुना और ज्यादा तेल वाला खाना कम खाएं.
फल और सब्जियां ज्यादा खाएं.
खाने में फाइबर वाली चीजें शामिल करें.
रोज थोड़ा व्यायाम करें.
अपना वजन सही रखने की कोशिश करें.
अचानक बहुत तेजी से वजन कम न करें.
लंबे समय तक भूखे न रहें.
समय पर खाना खाने की कोशिश करें.

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें
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        <pubDate>Fri, 14 Aug 2026 23:30:03 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Gallbladder, Stones:, पित्त, की, थैली, में, कैसे, बनती, है, पथरी, जानें, लक्षण, और, इलाज</media:keywords>
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        <title>Independence Day 2026: फिट इंडिया का सपना, क्या आपकी 10 आदतें बन रहीं दुश्मन?</title>
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        <description><![CDATA[ Independence Day 2026: इस बार हमारा देश आजादी का 80वां स्वतंत्रता दिवस मनाने जा रहा है. ऐसे में जहां हमारा देश विकास और प्रगति की ओर बढ़ रहा है. लोगों का स्वस्थ रहना भी उतना ही जरूरी हो गया है क्योंकि यह दिन हमें याद दिलाता है कि अभी भारत को भविष्य में और भी बहुत कुछ हासिल करना है. देश को मजबूत बनाने के लिए देश के नागरिक का स्वस्थ और फिट रहना जरूरी है. आज फिट इंडिया की बात तो होती है लेकिन कई लोग इसके उदेश्य को भूल गए हैं. फिट रहने का मतलब यह नहीं है कि सिर्फ आपको रोज जिम और व्यायाम करने की जरूरत है. इसके अलावा आप अपने दैनिक जीवन की कुछ छोटी आदतों में सुधार कर के भी आप अपनी सेहत बना सकते हैं. 15 अगस्त के मौके पर आइए जानते हैं स्वास्थ से जुड़ी इन 10 आदतों के बारे में.
देर रात जागना
देर रात जागना, मोबाईल चलाना या टीवी देखना स्वास्थ के लिए बुरा होता है. देर रात जागने से आपकी नींद प्रभावित होती है जिससे दिमाग पर बुरा असर पड़ सकता है. पर्याप्त और नियमित नींद शरीर को आराम देने के साथ-साथ मानसिक एकाग्रता और ऊर्जा बनाए रखने में मदद करती है.
जंक फूड का सेवन
आजकल लोग जंक फूड का सेवन भी अधिक मात्रा में करने लगे हैं. जंक फूड में ऐसे कई तरह के तत्व होते हैं जो आपके स्वास्थ को नुकसान पहुंचाते हैं. इन्हें कभी-कभी खाना ठीक हो सकता है लेकिन इनका नियमित सेवन मोटापे और गंभीर बीमारियों की वजह बनता है.
जरूरत से ज्यादा स्क्रीन टाइम
मोबाइल फोन हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं लेकिन अधिक स्क्रीन टाइम से शारीरिक गतिविधि कम होती है जिससे हमारी नींद और मेंटल हेल्थ के साथ-साथ शरीर भी प्रभावित होता है. मोबाइल, टीवी और कंप्यूटर पर लंबे समय तक बैठे रहना शारीरिक गतिविधि को कम कर सकता है. लगातार स्क्रीन देखने से आंखों और नींद पर भी असर पड़ता ह इसलिए बीच-बीच में स्क्रीन से ब्रेक लेना जरूरी है.
कम चलना
आज की सुविधाजनक जीवनशैली ने हमारी शारीरिक गतिविधि काफी कम कर दी है. छोटी दूरी के लिए पैदल चलना, सीढ़ियों का इस्तेमाल करना और रोज कुछ समय सक्रिय रहना फिटनेस के लिए उपयोगी आदतें हैं.
धूम्रपान से बनाएं दूरी
धूम्रपान शरीर के लगभग हर अंग को नुकसान पहुंचाता है और गंभीर बीमारियों का जोखिम बढ़ाता है. स्वस्थ जीवन की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदमों में से एक है धूम्रपान से दूरी बनाना.
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शराब का सेवन
शराब स्वास्थ के लिए बेहद हानिकारक मानी जाते हैं. अत्यधिक शराब का सेवन स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है. बेहतर स्वास्थ्य के लिए शराब से दूरी रखना सबसे अच्छा विकल्प है.
लगातार तनाव में रहना
आजकल की भागदौड़ भरी जिदंगी में तनाव लेना आम बात हो गया है. तनाव कम करने की कोशिश करें. तनाव कम करने के लिए गाने सुने, अपनी पसंद की गतिविधि करें.
गलत पॉश्चर को करें ठीक
हम काम करते-करते गलत पॉश्चर अपना लेते हैं जैसे, गर्दन झुकाना, कमर सीधे कर के न बैठना. लंबे समय तक यह आदतें ठीक न करने से यह हमारे शरीर को बुरी तरह प्रभावित करती है. ऐसे में लंबे समय तक एक ही स्थिती में न बैठें और नियमित रूप से एक्सरसाइज करें.
पानी कम पीना
शरीर के अन्य कामकाज के लिए नियमित रूप से पानी पीना बेहद जरूरी है. प्यास लगने का इंतजार करने के बजाय पूरे दिन नियमित रूप से पानी पीने की आदत बनानी चाहिए.
व्यायाम को टालते रहना
&amp;nbsp;रोजाना थोड़ी-सी शारीरिक गतिविधि से शुरुआत करना और धीरे-धीरे इसे नियमित दिनचर्या का हिस्सा बनाना अधिक व्यावहारिक होता है.
इन छोटी-छोटी आदतों को ठीक करने से आप अपने आप को फिट रख सकते हैं. भूलें नहीं एक विकासशील देश की निंव उस देश का स्वस्थ नागरिक ही रखता है.
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&amp;nbsp; ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 14 Aug 2026 11:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Independence, Day, 2026:, फिट, इंडिया, का, सपना, क्या, आपकी, आदतें, बन, रहीं, दुश्मन</media:keywords>
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        <title>Patient&amp;apos;s Complaints on Private Hospital: इलाज महंगा या बिल में खेल? 68% लोगों ने प्राइवेट अस्पतालों पर उठाए सवाल</title>
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        <description><![CDATA[ भारत जहां लगातार दिन-प्रतिदिन हर क्षेत्र में तरक्की करता ही रहता है, चाहे वो शिक्षा क्षेत्र हो या स्वास्थ्य से जुड़ी हो. देश में लगातार हेल्थ सुविधाएं तो बढ़ती हैं, लेकिन इसका इलाज का खर्चा भी आसमान छूने लगता है. यानी जितना अच्छा इलाज उतना महंगा उसका बिल. हालांकि सरकारी अस्पतालों में ये परेशानी बहुत कम देखने को मिलती है, साथ ही सरकार भी कई सारी बीमारियों के लिए सरकारी अस्पतालों में मुफ्त में इलाज भी करती है, लेकिन ज्यादातर लोग सरकारी अस्पतालों को छोड़कर प्राइवेट अस्पतालों में अपना इलाज करवाना पसंद करते हैं.
वे मानते हैं कि जितनी बड़ी बिल्डिंग होगी या फिर जितनी ज्यादा सुविधा मिलेगी उतना ही ज्यादा इलाज भी बेहतर होगा. हालांकि ये सोचना गलत भी नहीं है, क्योंकि हर आदमी बीमार में यही चाहता है कि उसका इलाज अच्छी जगह और अच्छी तरह से हो. लेकिन हाल ही में हुए एक सर्वे में सामने आया कि बड़ी संख्या में लोग प्राइवेट अस्पताल के बिल को लेकर और इलाज करने के तरीकों पर सवाल उठा रहे हैं. लोगों का कहना है कि कई बार प्राइवेट अस्पतालों में ज्यादा पैसे लेने के लिए जरूरत से ज्यादा टेस्ट कराए जाते हैं और बिल में भी उसकी साफ जानकारी नहीं दी जाती है कि आखिर उनका टेस्ट किस चीज का हो रहा है. आइए जानते हैं कि क्या है ये पूरा मामला.
सरकारी और प्राइवेट अस्पताल के खर्च में बड़ा अंतर
सरकारी सर्वे के आंकड़े भी यह साफ बताते हैं कि प्राइवेट अस्पतालों का खर्च सरकारी अस्पतालों के मुकाबले कई गुना ज्यादा होता है. नेशनल सैंपल सर्वे के मुताबिक एक ही बीमारी के इलाज पर सरकारी अस्पताल में औसतन 6,631 रुपए खर्च होते हैं, जबकि प्राइवेट अस्पताल में यह खर्च बढ़कर 50,508 रुपए तक पहुंच जाता है. यानी सामान्य इलाज भी सरकारी अस्पताल के मुकाबले प्राइवेट में 5 से 10 गुना महंगा पड़ता है. इसकी वजह है कि वे मरीज को डरा कर जरूरत से ज्यादा टेस्ट करवाते हैं ताकि मरीजों से ज्यादा पैसे लिए जा सके. लेकिन वहीं अगर बीमारी बड़ी हो तो मरीज पर और दबाव पड़ जाता है, जैसे कैंसर, दिल की बीमारी और किडनी जैसी गंभीर बीमारियों में तो प्राइवेट अस्पतालों का बिल लाखों रुपए तक पहुंच जाता है, जिससे आम आदमी और मिडिल क्लास आदमी के लिए इलाज करवाना मुश्किल हो जाता है.
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क्यों नाराज हैं लोग, बिल में क्या है दिक्कत?
बात बस यहीं तक सीमित नहीं है, लोगों की सबसे बड़ी शिकायत ये भी है कि उन्हें इलाज करवाने के बाद मिलने वाली दवाइयों में भी कई सारी दवाइयां ऐसी होती हैं जिनकी असल में जरूरत भी नहीं होती है. साथ ही बिल में भी पूरी तरह से साफ-साफ जानकारी नहीं दी जाती है, केवल वही बातें लिखी जाती हैं जो अस्पताल मरीज को देना चाहता है, जिससे मरीज के परिवार समझ ही नहीं पाते कि इतने पैसे किस चीज पर मांगे जा रहे हैं. भारत में कम से कम 68% लोगों ने प्राइवेट अस्पतालों पर सवाल उठाते हुए यही कहा है कि कई बार तो बीमा होने के बावजूद अस्पताल पूरा क्लेम पास नहीं होने देते और मरीज को अपनी जेब से भी काफी पैसा भरना पड़ता है.
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        <pubDate>Thu, 13 Aug 2026 19:30:04 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Swine Flu:तेजी से बढ़ रहे स्वाइन फ्लू के मामले, जानें किन लोगों को ज्यादा खतरा?</title>
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        <description><![CDATA[ Swine Flu: दिल्ली में इस साल H1N1 यानी इन्फ्लूएंजा A वायरस के मामलों में बढ़ोतरी देखने को मिल रही है.रिपोर्ट के मुताबिक, 6 अगस्त 2026 तक दिल्ली में इस साल स्वाइन फ्लू के 1,349 पुष्ट मामले सामने आए हैं. दिल्ली सरकार ने यह आंकड़ा बताया है. रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली के कुछ अस्पतालों में H1N1 के मरीजों की संख्या बढ़ी है. वहीं बारिश और बदलते मौसम के बीच देश के कुछ इलाकों में स्वाइन फ्लू के मामले बढ़ रहे हैं. स्वाइन फ्लू को इन्फ्लूएंजा A H1N1 भी कहा जाता है. डॉक्टरों के मुताबिक मानसून का लंबा मौसम, तापमान में उतार चढ़ाव और वायरस की सक्रियता रहने से से इस समय इन्फेक्शन के ज्यादा मामले देखे जा रहे हैं. हालांकि ज्यादातर मरीजों में बीमारी हल्की रहती है और सही देखभाल से वे ठीक हो जाते हैं.
लोगों को ज्यादा सावधानी की जरूरत
विशेषज्ञ डॉक्टर के मुताबिक छोटे बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों में स्वाइन फ्लू गंभीर हो सकता है. पहले से फेफड़ों की बीमारी, दिल की बीमारी, डायबिटीज या किडनी की बीमारी से जूझ रहे लोगों को भी खास सावधानी बरतने की जरूरत है.2 ऐसे लोगों में सांस लेने में परेशानी जैसी दिक्कतें ज्यादा हो सकती हैं.
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बुखार और खांसी को न करें नजरअंदाज
डॉक्टर के अनुसार स्वाइन फ्लू होने पर अचानक बुखार, खांसी, गले में खराश, सिरदर्द, शरीर में दर्द, नाक से जुड़ी परेशानी और थकान जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं. ज्यादातर मामलों में आराम और लक्षणों के अनुसार इलाज किया जाता है. डॉक्टर जरूरत पड़ने पर शुरुआती समय में ओसेल्टामिविर जैसी एंटीवायरल दवा दे सकते हैं.
दिक्कत हो तो तुरंत अस्पताल जाएं
अगर बुखार लगातार बना हुआ है या बढ़ रहा है, सांस लेने में परेशानी हो रही है, ऑक्सीजन का स्तर कम हो रहा है, सीने में बेचैनी है या मरीज की हालत तेजी से बिगड़ रही है, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए. बहुत ज्यादा नींद आना या असामान्य कमजोरी भी गंभीर स्थिति का संकेत हो सकती है.
इन बातों का रखें ध्यान
स्वाइन फ्लू से बचने के लिए हाथों को नियमित रूप से साबुन से धोना, इन्फेक्टिड लोगों से दूरी रखना और भीड़भाड़ वाली जगहों पर सावधानी बरतना जरूरी है. डॉक्टर की सलाह से फ्लू का टीका भी लगवाया जा सकता है. इन्फेक्टिड होने पर दूसरों के संपर्क में आने से बचना और डॉक्टर की सलाह के अनुसार इलाज लेना जरूरी है. &amp;nbsp;स्वाइन फ्लू के लक्षण सामान्य फ्लू जैसे हो सकते हैं, इसलिए केवल लक्षण देखकर खुद दवा लेना सही नहीं है. खासकर बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और पहले से बीमार लोगों को लक्षण होने पर डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए
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        <pubDate>Wed, 12 Aug 2026 15:30:04 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>ब्रेस्ट पंप या डायरेक्ट फीडिंग? जानिए आपके बच्चे के लिए क्या है बेहतर</title>
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        <description><![CDATA[ Breast Pumping vs Breastfeeding: नवजात शिशु के जन्म के बाद हर मां के मन में सबसे बड़ा सवाल उसके पोषण को लेकर होता है. डॉक्टरों का मानना है कि बच्चे के शुरुआती 6 महीनों के लिए मां का दूध अमृत समान है. हालांकि, बदलते समय और बदलती लाइफस्टाइल के साथ अब दूध पिलाने के तरीकों में भी बदलाव आया है.
आजकल कामकाजी और व्यस्त माताएं सीधे स्तनपान कराने के बजाय ब्रेस्ट पंप की मदद से दूध निकालकर बोतल या चम्मच से बच्चे को पिला रही हैं, लेकिन क्या इन दोनों तरीकों में कोई अंतर है? आइए जानते हैं कि आपके बच्चे के लिए इन दोनों में से कौन सा तरीका सबसे बेस्ट है.&amp;nbsp;
ब्रेस्ट पंपिंग को लेकर चिंता क्या?
विशेषज्ञों का मानना है कि आज स्तनपान को केवल मां का दूध पिलाना मान लिया गया है और ब्रेस्ट पंपिंग को स्तनपान के बराबर समझा जा रहा है. हालांकि, ऐसा करने से मां और बच्चे के बीच का अनोखा और प्राकृतिक रिश्ता कमजोर पड़ सकता है. पंपिंग एक जरूरी जरिया तो है, पर यह सीधे स्तनपान की जगह कभी नहीं ले सकता. विशेषज्ञों का कहना है कि माताओं को मशीनों या तकनीक के बजाय सही मदद और सहयोग की ज्यादा जरूरत है. अगर ऑफिसों में रूल्स हों, मैटरनिटी लीव मिले और स्तनपान के लिए सही गाइडेंस मिले तो महिलाओं को बार-बार पंप से दूध निकालने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी.&amp;nbsp;
ब्रेस्ट फीडिंग के कई फायदे
डॉक्टरों के अनुसार, स्तनपान सिर्फ बच्चे का पेट भरने के लिए नहीं है. यह बच्चे को बीमारियों से लड़ने की ताकत देता है और उसके पेट को स्वस्थ रखता है. शुरुआती दो सालों में यह बच्चे के पूरे पाचन तंत्र को मजबूत करने का काम करता है. साथ ही कई रिसर्च में पता चला है कि सीधा स्तनपान कराने से बच्चे का दिमाग तेज होता है, उसका मेटाबॉलिज्म सुधरता है और बचपन में मोटापे का खतरा भी काफी कम हो जाता है.&amp;nbsp;
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ब्रेस्ट पंप इस्तेमाल करने का सही तरीका
डॉक्टरों के मुताबिक, अगर ब्रेस्ट पंप का इस्तेमाल करना जरूरी हो तो ऐसे मे साफ-सफाई का पूरा ध्यान रखना चाहिए. महिलाओं को पंप के उपकरणों को ठीक से साफ करना, उन्हें सैनेटाइज करना और निकाले गए दूध को सुरक्षित रखना जरूर सीखना चाहिए. साथ ही डॉक्टर दूध पिलाने के तरीके को लेकर भी सावधानी बरतने की सलाह दी है. जहां तक हो सके, बच्चे को बोतल के बजाय चम्मच या कप से दूध पिलाना बेहतर होता है. बोतल से दूध पीने पर कुछ बच्चे निप्पल कन्फ्यूजन का शिकार हो सकते हैं, जिससे बाद में उनके लिए मां का दूध सीधे पीना मुश्किल हो जाता है.&amp;nbsp;
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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        <pubDate>Tue, 11 Aug 2026 23:30:14 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Diabetes: डायबिटीज में अचार, पापड़ और चटनी कितनी सही? जानें एक्सपर्ट की राय</title>
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        <description><![CDATA[ Diabetes: जब भी डायबिटीज या ब्लड शुगर की बात होती है, तो लोग सबसे ज्यादा ध्यान चावल, रोटी, ब्रेड और मीठी चीजों पर देते हैं. लेकिन थाली में साथ में रखे अचार, पापड़ और चटनी की तरफ शायद ही किसी का ध्यान जाता है. ये चीजें खाने का स्वाद तो बढ़ा देती हैं, लेकिन क्या इनका असर हमारे ब्लड शुगर पर भी पड़ता है? यह सवाल बहुत लोगों के मन में आता है. इसका जवाब इतना आसान नहीं है कि इन्हें सीधे &#039;अच्छा&#039; या &#039;बुरा&#039; कह दिया जाए. इनका असर इस बात पर निर्भर करता है कि ये किस चीज से बने हैं, कैसे बनाए गए हैं और कितनी मात्रा में खाए जा रहे हैं.
अचार, पापड़ और चटनी का ब्लड शुगर पर असर
डाइटिशियन और डायबिटीज एक्सपर्ट कनिका मल्होत्रा बताती हैं कि इनका असर पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि कौन सा अचार या चटनी है और वह कैसे बनाई गई है. जैसे सरसों के तेल और सिरके में बना नींबू या आम का अचार खाने के बाद ब्लड शुगर को धीरे-धीरे बढ़ने में मदद कर सकता है. वहीं दही के साथ बनी धनिया या पुदीने की चटनी में बहुत कम कार्ब्स होते हैं और इसमें फाइबर तथा प्रोटीन भी मिलता है, जो अच्छा माना जाता है.
लेकिन तला हुआ पापड़ या ज्यादा चीनी वाली टमाटर की चटनी इसके उलट काम करती है. ये चीजें शरीर में ज्यादा कार्ब्स और तेल पहुंचाती हैं, जिससे ब्लड शुगर तेजी से बढ़ सकता है. एक्सपर्ट का कहना है कि ये चीजें थाली में सिर्फ स्वाद के लिए नहीं होतीं, बल्कि इनका असर सेहत पर भी पड़ता है. अकेले खाने पर इनका असर भले ही कम लगे, लेकिन जब कई चीजें एक साथ खाई जाएं, तो इनका असर बढ़ जाता है.
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कौन सी चीजें बेहतर होती हैं और क्यों
एक्सपर्ट के मुताबिक, सिरके और फर्मेंटेशन से बनी चीजें खाना पचने की रफ्तार को धीमा कर देती हैं, जिससे शुगर धीरे-धीरे बढ़ता है. नारियल, तिल या हरी सब्जियों से बनी चटनी भी शरीर में कार्ब्स के अवशोषण को धीमा करती है. सरसों, मेथी और अजवाइन जैसे मसाले भी शरीर में इंसुलिन को बेहतर तरीके से काम करने में मदद करते हैं. वहीं दही जैसी चीजें, जिनमें फैट और प्रोटीन होता है, वे भी खाना पचने की रफ्तार धीमी करती हैं.
लेकिन तले हुए पापड़ के साथ ऐसा नहीं होता. तलने की प्रक्रिया में तेल की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे उड़द या मूंग से बने पापड़ का असर भी बदल जाता है और यह ब्लड शुगर को तेजी से बढ़ा सकता है. एक्सपर्ट यह भी बताती हैं कि बाजार में मिलने वाले पैकेट के अचार और चटनी में अक्सर ज्यादा नमक, प्रिज़र्वेटिव और छिपी हुई चीनी होती है, जो सेहत के लिए अच्छी नहीं मानी जाती. यानी असली फर्क इस बात से पड़ता है कि चीज कैसे बनाई गई है, न कि सिर्फ इस बात से कि वह अचार है, पापड़ है या चटनी.
इन्हें खाने का सही तरीका क्या है
एक्सपर्ट के मुताबिक सबसे सही तरीका यह है कि अचार, पापड़ और चटनी को बहुत कम मात्रा में खाया जाए. जहां तक हो सके, ताजी बनी चटनी को चुनें, तले हुए पापड़ की जगह भुना हुआ पापड़ खाएं, और नमक तथा चीनी की मात्रा का हमेशा ध्यान रखें. इन्हें पूरी तरह छोड़ने की जरूरत नहीं है, बस समझदारी से और सही मात्रा में खाना ही सबसे अच्छा तरीका है.
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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        <pubDate>Tue, 11 Aug 2026 23:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Sleeping With Cooler in Rainy Season:  इस मौसम में भी कूलर चलाकर सोते हैं? कितनी खतरनाक हो सकती है यह आदत</title>
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        <description><![CDATA[ Sleeping With Cooler in Rainy Season:&amp;nbsp; बदलते मौसम और उमस के कारण बरसात के मौसम में भी ज्यादातर लोग कूलर चालू करके ही सोते हैं. बारिश का मौसम भले ही ठंडा हो लेकिन घर के अंदर अक्सर चिपचिपाहट और उमस जैसा महसूस होने लगता है जिसपर लोग ठंडी हवा के लिए कूलर चला कर सोते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं ये आदत आपके लिए कितनी ज्यादा नुकसानदायक हो सकती है. डॉक्टर बताते हैं कि लगातार कई घंटों तक कूलर की सीधी हवा में सोना सेहत के लिए अच्छा नहीं है. खासकर इस मौसम में जब काफी ज्यादा नमी हो. ऐसे में अगर आप भी बरसात के मौसम में कूलर चालू करके रात भर सोते हैं तो ये जानकारी आपके लिए जरूरतमंद साबित होगी, आइए जानते हैं इसके बारे में पूरी जानकारी.
सेहत पर क्या असर पड़ता है
गर्मी के मौसम में कूलर के सामने सोने के अलावा अगर इस मौसम में कूलर के आगे सोते हैं तो कूलर की ठंडी हवा से शरीर का तापमान अचानक से गिर जाता है, जिससे सर्दी जुकाम, गले में खराश, और सिर दर्द जैसी परेशानी होने लगती है. साथ ही कूलर की हवा सीधे छाती या चेहरे पर पड़े तो सांस से जुड़ी परेशानी भी बढ़ सकती है. जिन लोगों को पहले से जोड़ों में दर्द या मांसपेशियों में अकड़न की शिकायत है, उनके लिए यह आदत और भी नुकसानदायक साबित हो सकती है, क्योंकि ठंडी हवा से जोड़ों का दर्द बढ़ जाता है. इसके अलावा कूलर की हवा से त्वचा भी रूखी होने लगती है, जिससे खुजली और जलन जैसी समस्याएं हो सकती हैं.&amp;nbsp;
इसके अलावा बारिश के मौसम में मच्छरों का प्रकोप भी काफी तेजी से फैल जाता है, इसके कारण अगर कूलर की अच्छी तरह सफाई न हो और पानी डाल कर इस्तेमाल किया जाए तो आपके कमरे में मच्छरों का आना कभी कम नहीं हो पाता है, जिससे मलेरिया, बच्चों में डायरिया जैसी परेशानी सामान्य हो जाती हैं. साथ ही उमस भरे मौसम में अगर पानी डाल कर कूलर चलाते हैं तो शरीर में चिपचिपाहट और स्किन एलर्जी जैसी परेशानियां भी सामान्य हो जाती हैं.&amp;nbsp;
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बचाव के आसान तरीके
ऐसे में हर किसी के दिमाग में सवाल आता है कि उमस भरे मौसम में कूलर का सही उपयोग कैसे करें, ऐसे में बता दें कि सबसे पहले आपको, पूरी रात कूलर चलाने की बजाय टाइमर लगा देना चाहिए ताकि एक बार कमरा ठंडा हो जाए तो फिर वे अपने आप बंद हो जाए, इसके अलावा कूलर की हवा सीधे एकदम चेहरे पर, सिर पर या छाती पर आने से बचाएं, और कोशिश करें कि कूलर चलते समय थोड़ी सी खिड़की या दरवाजा खुला छोड़ दें, इससे पूरे कमरे में बराबर हवा फैलती है. और ज्यादातर मामलों में ध्यान देने वाली बात रहती है कि आप नियमित रूप से कूलर की सफाई करते रहें, ध्यान रखें कि उसमें लंबे समय तक पानी न जमा रहे इससे मच्छरों का प्रकोप बढ़ जाता है. इसके अलावा बच्चों को कूलर में सुलाने से पहले उन्हें हल्की चादर ओढ़ा दें जिससे उनके शरीर को सीधी हवा नहीं लगेगी, जिससे वे फैलने वाली बीमारी से बचेंगे.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Tue, 11 Aug 2026 23:30:06 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Ebola Outbreak in Congo : कांगो में इबोला से 2000 मौतें, तेजी से फैल रहा वायरस</title>
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        <description><![CDATA[ Ebola Outbreak in Congo : दुनिया में इबोला के प्रकोप को लेकर चिंता एक बार फिर बढ़ गई है. अफ्रीकी देश डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो में वायरस का संक्रमण तेजी से बढ़ रहा है और अब इससे होने वाली मौतों का आंकड़ा 2 हजार के पार पहुंच गया है. सबसे चिंता की बात यह है कि इस बार इबोला का प्रकोप रिकॉर्ड तेजी से बढ़ रहा है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, अब तक 4,381 मामलों की पुष्टि हो चुकी है, जबकि 2,011 लोगों की मौत हो गई है. वहीं, 704 मरीज अभी अस्पतालों में भर्ती हैं और उन्हें आइसोलेशन में रखा गया है.
तीन हफ्तों में 1000 से 2000 हुई मौतें
रिपोर्ट के मुताबिक, संक्रमण से मौतों का आंकड़ा 1,000 तक पहुंचने में करीब 9 हफ्ते लगे थे. लेकिन इसके बाद अगले 1,000 मौतों का आंकड़ा सिर्फ करीब 3 हफ्तों में पार हो गया. इसी तेजी की वजह से इसे अब तक का सबसे तेजी से बढ़ने वाला इबोला प्रकोप बताया जा रहा है.
Bundibugyo स्ट्रेन क्यों बढ़ा रहा चिंता?
इस प्रकोप में Bundibugyo प्रजाति का इबोला वायरस सामने आया है. WHO के मुताबिक, इस वायरस के लिए अभी कोई वैक्सीन या विशेष उपचार उपलब्ध नहीं है. हालांकि कुछ वैक्सीन और इलाज के ऑप्शनों को लेकर रिसर्च जारी है. वहीं स्वास्थ्य अधिकारी वायरस की निगरानी, मरीजों को आइसोलेट करने, संपर्क में आए लोगों की पहचान, क्लीनिकल केयर और स्थानीय लोगों के सहयोग के जरिए संक्रमण को कंट्रोल करने की कोशिश कर रहे हैं.
मई में हुई थी आधिकारिक घोषणा
कांगो में इस इबोला प्रकोप की आधिकारिक घोषणा 15 मई को की गई थी. हालांकि, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक, वायरस का संक्रमण इससे काफी पहले ही शुरू हो चुका था. WHO ने बताया कि कांगो में यह प्रकोप सही में फरवरी में शुरू हुआ था और कई महीनों बाद इसकी पहचान हो सकी. वहीं, WHO के अनुसार कांगो और युगांडा में इबोला के प्रकोप की पुष्टि मई में हुई थी. संक्रमण को रोकने के लिए स्वास्थ्य एजेंसियां निगरानी बढ़ाने, संक्रमित लोगों के संपर्क में आए लोगों की पहचान करने, मरीजों को इलाज और आइसोलेशन की सुविधा देने के साथ जरूरी मेडिकल सामान की उपलब्धता पर काम कर रही हैं.
यह भी पढ़ें - Diabetes: डायबिटीज में अचार, पापड़ और चटनी कितनी सही? जानें एक्सपर्ट की राय&amp;nbsp;
किस कारण बनी बड़ी चिंता
इबोला के इस प्रकोप को लेकर सबसे बड़ी चिंताओं में से एक यह है कि वायरस आधिकारिक तौर पर सामने आने से पहले कितने समय तक फैलता रहा. WHO के मुताबिक, फरवरी में संक्रमण शुरू होने और मई में इसकी आधिकारिक घोषणा के बीच का अंतर काफी जरूरी है. किसी भी इबोला संक्रमण को रोकने में शुरुआती पहचान बेहद जरूरी होती है. इससे संक्रमित मरीजों को समय पर अलग किया जा सकता है, उनके संपर्क में आए लोगों का पता लगाया जा सकता है और वायरस के आगे फैलने की संभावना को कम किया जा सकता है.
कांगो में 17वीं बार फैला इबोला
यह कांगो में इबोला का 17वां प्रकोप है. इबोला वायरस की पहली पहचान 1976 में इबोला नदी के पास हुई थी. मौजूदा प्रकोप को कांगो का अब तक का सबसे बड़ा इबोला आउटब्रेक बताया जा रहा है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 11 Aug 2026 23:30:04 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Vegetarian VS Non Vegetarian:नॉनवेज या वेज? किसे खाने वाले जीते हैं लंबा जीवन?</title>
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        <description><![CDATA[ Vegetarian VS Non Vegetarian:वेज खाना बेहतर है या नॉनवेज, ये बहस हर घर की डाइनिंग टेबल पर कभी न कभी छिड़ ही जाती है. कुछ लोग शाकाहार को लंबी उम्र का राज मानते हैं, तो कुछ का कहना है कि मांसाहार में मिलने वाला प्रोटीन और पोषण शरीर के लिए ज्यादा फायदेमंद है. लेकिन असल में सेहत और लंबी जिंदगी के लिए कौन सी डाइट बेहतर मानी जाती है? आइए एक्सपर्ट्स और रिसर्च के हवाले से इस सवाल का जवाब ढूंढते हैं.
शाकाहार के फायदे क्या कहते हैं
कई रिसर्च में यह बात सामने आई है कि शाकाहारी लोगों में दिल की बीमारी, हाई ब्लड प्रेशर, टाइप 2 डायबिटीज और कैंसर जैसी पुरानी बीमारियों का खतरा कम पाया जाता है. शाकाहारियों का वजन और बॉडी मास इंडेक्स भी आमतौर पर कम रहता है, क्योंकि उनकी डाइट फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर होती है. सब्जियों और फलों से मिलने वाला विटामिन ई, सी और कैरोटीन शरीर को अंदर से मजबूत बनाने में मदद करता है, और सैचुरेटेड फैट कम मात्रा में मिलने की वजह से दिल पर दबाव भी कम पड़ता है.
नॉनवेज को लेकर भी सामने आ रहे नए दावे
लंबे समय तक यही माना जाता रहा कि शाकाहारी लोग ज्यादा लंबा जीते हैं, लेकिन हाल ही में चीन में बुज़ुर्गों पर हुई एक स्टडी ने इस सोच को चुनौती दी है. इस रिसर्च के मुताबिक पूरी तरह वीगन डाइट फॉलो करने वालों के 100 साल की उम्र तक पहुंचने के चांस, नॉनवेज खाने वालों के मुकाबले कम पाए गए. यानी बुढ़ापे में शरीर को जिस तरह के पोषण की जरूरत होती है, वो सिर्फ प्लांट बेस्ड डाइट से पूरी नहीं हो पाती है.&amp;nbsp;
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बीच का रास्ता भी है एक ऑप्शन&amp;nbsp;&amp;nbsp;
इसी स्टडी में एक दिलचस्प बात यह भी सामने आई कि जो लोग मछली या डेयरी प्रोडक्ट्स लेते हैं यानी पेस्को वेजिटेरियन डाइट फॉलो करते हैं, उनकी उम्र और नॉनवेज खाने वालों की उम्र में बहुत बड़ा फर्क नहीं देखा गया. इससे यह साफ होता है कि पूरी तरह वेज या पूरी तरह नॉनवेज होने की बजाय, बैलेंस्ड डाइट लंबी और सेहतमंद जिंदगी के लिए जयादा अहम भूमिका निभा सकती है.
और भी फैक्टर हैं जिम्मेदार
रिसर्चर्स का यह भी कहना है कि लंबी उम्र सिर्फ खाने की आदतों पर निर्भर नहीं करती. जेनेटिक्स, लाइफस्टाइल, फिजिकल एक्टिविटी और ओवरऑल हेल्थ जैसे कई फैक्टर भी इसमें बराबर की भूमिका निभाते हैं. यही वजह है कि सिर्फ वेज या नॉनवेज होने से ही किसी की उम्र लंबी या छोटी होने की गारंटी नहीं दी जा सकती.
एक्सपर्ट्स की सलाह क्या है
हेल्थ एक्सपर्ट्स की मानें तो नॉनवेज खाने वालों को कम फैट वाले मीट चुनने चाहिए, साथ ही डाइट में प्लांट बेस्ड प्रोटीन को भी शामिल करना चाहिए. वहीं हर व्यक्ति की पोषण संबंधी जरूरतें उम्र, जेंडर, एक्टिविटी लेवल और ओवरऑल हेल्थ के हिसाब से अलग अलग हो सकती है, इसलिए डाइट प्लान बनाने से पहले न्यूट्रिशनिस्ट या डॉक्टर से सलाह लेना सबसे बेहतर तरीका माना जाता है.
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        <pubDate>Tue, 11 Aug 2026 23:30:03 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Marathon Runner Death : मैराथन रनर की दौड़ते&amp;दौड़ते मौत, क्या फिट दिखने वाले भी खतरे में?</title>
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        <description><![CDATA[ Marathon Runner Death : कर्नाटक के नंदी हिल्स में आयोजित मानसून मैराथन के दौरान 31 वर्षीय अमनदीप सिंह जगदे की अचानक तबीयत बिगड़ गई और उनकी मौत हो गई. उन्हें पहले मेडिकल कैंप ले जाया गया और हालत गंभीर होने पर एंबुलेंस से अस्पताल पहुंचाया गया, जहां CPR देकर उन्हें बचाने की कोशिश की गई, लेकिन उनकी जान नहीं बच सकी. डॉक्टरों को शुरुआती तौर पर अचानक कार्डियक अरेस्ट की आशंका है, हालांकि मौत की सही वजह पोस्टमार्टम के बाद ही साफ होगी.
उनके साथ दौड़ रहे लोगों के मुताबिक अमनदीप पूरी तरह फिट और उत्साहित दिखाई दे रहे थे. वह पहले भी कई मैराथन में हिस्सा ले चुके थे और हाल ही में एक Hyrox प्रतियोगिता भी जीती थी. &amp;nbsp;ऐसे में आइए सवाल उठ रहा है कि &amp;nbsp;जो व्यक्ति बाहर से पूरी तरह फिट और स्वस्थ नजर आता है, उसे अचानक इतनी गंभीर परेशानी कैसे हो सकती है. तो आइए जानते हैं कि क्या फिट दिखने वाले भी खतरे में है.&amp;nbsp;
कार्डियक अरेस्ट में क्या होता है?
कार्डियक अरेस्ट ऐसी मेडिकल इमरजेंसी है, जिसमें हार्ट अचानक ब्लड पंप करना बंद कर देता है. इसके कारण दिमाग और शरीर के दूसरे अंगों तक ब्लड और ऑक्सीजन की आपूर्ति रुक सकती है. कुछ मामलों में यह बिना किसी स्पष्ट चेतावनी के भी हो सकता है. इसके प्रमुख कारणों में हार्ट की धड़कन की गड़बड़ी यानी एरिथमिया, वेंट्रिकुलर फिब्रिलेशन, कार्डियोमायोपैथी और कोरोनरी आर्टरी डिजीज शामिल हैं. ज्यादा ब्लीडिंग, हार्ट के वाल्व से जुड़ी बीमारी, ऑक्सीजन की कमी और मैग्नीशियम साथ ही पोटेशियम जैसे इलेक्ट्रोलाइट्स के असंतुलन से भी इसका खतरा हो सकता है.&amp;nbsp;
क्या फिट दिखने वाले भी खतरे में है?
बाहर से फिट और स्वस्थ दिखने वाला व्यक्ति भी कभी-कभी अंदरूनी स्वास्थ्य समस्या का शिकार हो सकता है. सिर्फ अच्छी फिटनेस या नियमित एक्सरसाइज करने से यह तय नहीं होता कि दिल और शरीर के सभी अंग पूरी तरह स्वस्थ हैं. कुछ बीमारियां या हार्ट से जुड़ी परेशानियां लंबे समय तक बिना किसी बड़े लक्षण के रह सकती हैं और अचानक गंभीर हो सकती हैं. इसलिए खुद को फिट रखने के साथ-साथ समय-समय पर स्वास्थ्य जांच करवाना और शरीर में होने वाले किसी भी असामान्य बदलाव को नजरअंदाज न करना भी जरूरी है.&amp;nbsp;
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शरीर के इन संकेतों को नजरअंदाज न करें
लगातार और बिना वजह थकान, बार-बार चक्कर आना या सिरदर्द, बिना कारण वजन कम या ज्यादा होना, भूख या नींद में बदलाव, लगातार पाचन संबंधी परेशानी, सांस फूलना या सीने में बेचैनी जैसे लक्षणों पर ध्यान देना जरूरी है. इसी तरह बार-बार संक्रमण होना, घावों का देर से भरना और लगातार या असामान्य शरीर दर्द भी किसी अंदरूनी समस्या का संकेत हो सकता है. अगर कोई लक्षण बिना स्पष्ट कारण के दो-तीन हफ्ते से ज्यादा बना रहे, बार-बार हो या उसकी प्रकृति बदल रही हो, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है.&amp;nbsp;&amp;nbsp;कौन से टेस्ट करवाते रहना चाहिए?
नियमित स्वास्थ्य जांच से कई बीमारियों का शुरुआती चरण में पता लगाया जा सकता है, 30 साल की उम्र से सालाना स्क्रीनिंग में ब्लड शुगर, ब्लड प्रेशर, लिपिड प्रोफाइल और थायराइड जैसी जांचों पर ध्यान दिया जा सकता है. नियमित जांच की मदद से बीमारी मिलने पर इलाज करने के साथ शुरुआती चरण में पहचानना भी है. प्रीडायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, डिसलिपिडेमिया और थायराइड जैसी समस्याओं का समय रहते पता लगने से उन्हें कंट्रोल करने में मदद मिल सकती है.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें&amp;nbsp; ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 11 Aug 2026 11:30:15 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Side effects of Eating Samosa : सुबह उठकर आप भी करते हैं समोसे का नाश्ता? संभल जाइए</title>
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        <description><![CDATA[ Side effects of Eating Samosa : सुबह की चाय के साथ गरमा-गरम समोसा मिल जाए तो दिन की शुरुआत ही टेस्टी हो जाती है. बारिश का मौसम हो, ऑफिस जाने से पहले जल्दी-जल्दी नाश्ता करना हो या फिर दोस्तों के साथ चाय पर बैठना हो, समोसा हर मौके पर आसानी से फिट हो जाता है. भारत में यह सबसे पसंद किए जाने वाले स्नैक्स में शामिल है. बच्चे हों या बड़े, ज्यादातर लोगों को इसका कुरकुरा टेस्ट और मसालेदार आलू की फिलिंग पसंद आती है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि टेस्ट में लाजवाब लगने वाला यही समोसा आपकी सेहत के लिए परेशानी की वजह भी बन सकता है.
समोसा आमतौर पर मैदे और आलू से तैयार किया जाता है और इसे तेल में डीप फ्राई किया जाता है. इसमें फैट और कार्बोहाइड्रेट की मात्रा ज्यादा होती है. ऐसे में अगर आप सुबह उठकर आप भी समोसे का नाश्ता करते हैं, समोसे बार-बार या ज्यादा मात्रा में खाते हैं, तो यह शरीर के लिए नुकसानदायक हो सकता है.&amp;nbsp;
समोसे का नाश्ता करने से होने वाले नुकसान
1. अनहेल्दी फैट बढ़ सकता है - समोसा डीप फ्राई किया जाता है और कई जगह इसे बार-बार गर्म किए गए तेल में भी तला जाता है. ऐसे तेल में ट्रांस फैट और सैचुरेटेड फैट बढ़ सकते हैं, जिससे खराब कोलेस्ट्रॉल बढ़ने और दिल की बीमारियों, स्ट्रोक व हाई ब्लड प्रेशर का खतरा बढ़ सकता है.&amp;nbsp;
2. पाचन से जुड़ी परेशानी हो सकती है - समोसे की बाहरी परत मैदा से बनती है. मैदा में फाइबर कम होता है, इसलिए इसे खाने से पेट में भारीपन, कब्ज और दूसरी पाचन संबंधी समस्याएं हो सकती हैं.&amp;nbsp;
3. ब्लड शुगर तेजी से बढ़ सकता है - मैदा का ग्लाइसेमिक इंडेक्स ज्यादा होता है. इससे ब्लड शुगर तेजी से बढ़कर बाद में गिर सकता है. इसके कारण जल्दी भूख लग सकती है और एनर्जी लेवल में उतार-चढ़ाव हो सकता है. डायबिटीज के मरीजों के लिए यह ज्यादा नुकसानदायक हो सकता है.&amp;nbsp;
4. वजन बढ़ने का खतरा - समोसे में मैदा, आलू और तेल का इस्तेमाल होता है, जिससे इसमें कार्बोहाइड्रेट और फैट की मात्रा ज्यादा होती है. वहीं, प्रोटीन, विटामिन और जरूरी मिनरल्स कम होते हैं. इसका नियमित सेवन वजन बढ़ने का कारण बन सकता है.&amp;nbsp;
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5. दिल और डायबिटीज का खतरा बढ़ सकता है - ज्यादा कैलोरी और फैट वाला खाना लगातार खाने से मोटापे का खतरा बढ़ सकता है. मोटापे से जुड़ी डायबिटीज और दिल की बीमारियों का जोखिम भी बढ़ सकता है.&amp;nbsp;
6. &amp;nbsp;फूड पॉइजनिंग का खतरा - सड़क किनारे या छोटी दुकानों पर साफ-सफाई का ध्यान न रखा जाए तो समोसे में बैक्टीरिया और कीटाणु पहुंच सकते हैं. गंदे हाथ, गंदे पानी, गंदे बर्तन या खुले में रखा खाना पेट के संक्रमण, डायरिया और फूड पॉइजनिंग का कारण बन सकता है.&amp;nbsp;
कितना समोसा खाना ठीक है?
विशेषज्ञों के अनुसार, हफ्ते में एक समोसा खाना कम नुकसानदायक ऑप्शन हो सकता है. साथ ही रोज सुबह नाश्ते में समोसा खाने की आदत से बचना चाहिए. अगर समोसा खाने का मन हो, तो इसे रोज की डाइट का हिस्सा बनाने के जगह कभी-कभी ही खाएं. साथ ही घर पर इसे कम तेल में और थोड़े हेल्दी तरीके से बनाना भी बेहतर ऑप्शन हो सकता है.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें&amp;nbsp; ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 11 Aug 2026 11:30:13 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Iron Deficiency Causes : आयरन की कमी से हो सकती है ये गंभीर बीमारी</title>
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        <description><![CDATA[ Iron Deficiency Causes : अक्सर थकान, कमजोरी, चक्कर या सांस फूलने जैसी परेशानियों को लोग सामान्य समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन कई बार शरीर में दिखने वाले ये छोटे-छोटे बदलाव किसी जरूरी पोषक तत्व की कमी का संकेत हो सकते हैं. आयरन भी शरीर के लिए ऐसा ही जरूरी मिनरल है, जिसकी कमी होने पर सिर्फ कमजोरी ही नहीं, बल्कि गंभीर बीमारी भी हो सकती है. शरीर में आयरन की कमी किसी भी उम्र में हो सकती है और अगर लंबे समय तक इसका इलाज न किया जाए, तो इसका असर शरीर की कार्यक्षमता पर भी पड़ सकता है. &amp;nbsp;ऐसे में आइए जानते हैं कि आयरन की कमी से कौन सी गंभीर बीमारी हो सकती है.&amp;nbsp;
आयरन की कमी से कौन सी गंभीर बीमारी हो सकती है?
आयरन की कमी लंबे समय तक बनी रहे तो इससे आयरन डेफिशियेंसी एनीमिया हो सकता है. शरीर में आयरन की कमी होने पर हीमोग्लोबिन का निर्माण प्रभावित होता है. आयरन शरीर में हीमोग्लोबिन बनाने के लिए जरूरी होता है. हीमोग्लोबिन रेड ब्लड सेल्स में पाया जाने वाला प्रोटीन है, जो फेफड़ों से शरीर के अलग-अलग हिस्सों तक ऑक्सीजन पहुंचाने का काम करता है. जब शरीर में पर्याप्त आयरन नहीं होता, तो हेल्दी रेड ब्लड सेल्स का निर्माण प्रभावित हो सकता है और शरीर में ऑक्सीजन पहुंचाने की क्षमता कम हो जाती है. इससे आयरन की कमी से होने वाले एनीमिया का खतरा बढ़ जाता है.&amp;nbsp;
आयरन की कमी के कारण
शरीर में आयरन की कमी कई कारणों से हो सकती है. इसका सबसे आम कारण आयरन से भरपूर डाइट पर्याप्त मात्रा में न लेना है. इसके अलावा बच्चों, पीरियड्स वाली महिलाओं, प्रेग्नेंट और ब्रेस्ट फीडिंग कराने वाली महिलाओं में शरीर को ज्यादा आयरन की जरूरत होती है, जिससे कमी का खतरा बढ़ सकता है. कुछ लोगों में सीलिएक रोग, सूजन आंत्र रोग या पेट की सर्जरी के कारण आयरन का अवशोषण कम हो जाता है. वहीं ज्यादा पीरियड्स, पेट या आंत में ब्लीडिंग, बार-बार रक्तदान या सर्जरी के दौरान खून की कमी भी शरीर में आयरन कम होने की वजह बन सकती है.&amp;nbsp;
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आयरन की कमी के ये लक्षण दिख सकते हैं
शरीर में आयरन कम होने पर शुरुआत में हमेशा साफ लक्षण दिखाई नहीं देते हैं. व्यक्ति को लगातार थकान, कमजोरी और सुस्ती महसूस हो सकती है. इसके अलावा सांस फूलना, चक्कर आना, सिरदर्द, ध्यान लगाने में परेशानी और काम करने की क्षमता कम होना भी इसके संकेत हो सकते हैं. कुछ लोगों में स्किन पीली पड़ना, बालों का झड़ना, नाखूनों का कमजोर होकर टूटना, हाथ-पैरों में ठंडक या सुन्नपन और मुंह या जीभ से जुड़ी परेशानियां भी दिखाई दे सकती हैं.&amp;nbsp;
कैसे होती है आयरन की कमी की जांच?
आयरन की कमी का पता लगाने के लिए डॉक्टर स्वास्थ्य और खान-पान से जुड़ी जानकारी लेने के साथ ब्लड टेस्ट की सलाह दे सकते हैं. इसमें सीबीसी, सीरम आयरन, टीआईबीसी और फेरिटिन जैसे टेस्ट शामिल हो सकते हैं. जरूरत पड़ने पर आयरन की कमी के कारण का पता लगाने के लिए पाचन तंत्र से जुड़े दूसरे टेस्ट भी किए जा सकते हैं.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.&amp;nbsp; ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 11 Aug 2026 11:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>Tips For Blood Sugar Control: खाना खाने के बाद बस 10 मिनट टहलें, ब्लड शुगर रहेगा कंट्रोल</title>
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        <description><![CDATA[ Tips For Blood Sugar Control: अक्सर ज्यादातर लोग खाना खाने के तुरंत बाद आराम से बैठ जाते हैं या तुरंत सो जाते हैं. लेकिन यही छोटी सी आदत आपकी सेहत के लिए बहुत ज्यादा नुकसानदायक साबित हो सकती है. हैदराबाद के अपोलो हॉस्पिटल में न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. सुधीर कुमार ने हाल ही में इस बारे में एक अहम सलाह दी है. उन्होंने बताया कि खाना खाने के बाद कुछ देर टहलना ब्लड शुगर को कंट्रोल रखने में बहुत मदद करता है. उनकी यह सलाह ऐसे समय में आई है, जब दुनिया भर में टाइप 4 डायबिटीज के मामले लगातार बढ़ रहे हैं और ज्यादातर लोगों की लाइफस्टाइल बैठकर काम करने वाली रहने वाली हो गई है.
खाने के बाद टहलने से फायदा
खाना खाने के बाद शरीर में मौजूद कार्बोहाइड्रेट टूटकर ग्लूकोज में बदल जाते हैं, जो खून में मिल जाते हैं. अगर खाने के बाद इंसान बैठा या लेटा रहे तो शुगर तेजी से बढ़ जाती है. हालांकि, अगर खाना खाने के बाद कम से कम 10 से 15 मिनट तक टहला जाए तो शरीर की मांसपेशियां खून में मौजूद शुगर का इस्तेमाल करने लगती हैं, जिससे शरीर में ब्लड शुगर का अचानक से बढ़ना कम हो जाता है. इससे शरीर में इंसुलिन का काम भी बेहतर होता है. यह बात केवल डायबिटीज वाले मरीज के लिए नहीं, बल्कि हर इंसान को ध्यान रखनी चाहिए, क्योंकि इससे शरीर की नसों की सेहत, एनर्जी लेवल और मेटाबॉलिज्म भी बेहतर बन जाता है.

Are you diabetic? Don&#039;t sit after your meal. Walk for 10 minutes.✅If you have diabetes, just 10-15 minutes of light-to-moderate walking after a meal can significantly reduce the post-meal blood glucose rise.????Over time, regularly reducing these glucose spikes may improve&amp;hellip;
&amp;mdash; Dr Sudhir Kumar MD DM (@hyderabaddoctor) August 8, 2026



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दिन में तीन बार टहलना काफी है
अक्सर लोगों को लगता है कि अपने आप को तंदुरुस्त रखने के लिए अलग से घंटों समय निकालने की जरूरत होती है. लेकिन इसके लिए आपको घंटों की समय निकालने की जरूरत नहीं है. सलाह दी जाती है कि नाश्ते के बाद कम से कम केवल 10 मिनट ही निकाल लेना काफी होता है. यही अगर आप नाश्ते, दिन के खाने के बाद और रात के खाने के बाद अगर आप केवल 10 मिनट भी चलते हैं, यानी 1 दिन भर में 30 मिनट भी चलते हैं, तो वो भी आपके शरीर के लिए काफी है.
इस तरह हफ्ते में करीब 210 मिनट टहलना हो जाता है, जो सेहत के लिए तय किए गए न्यूनतम व्यायाम के लक्ष्य को भी पूरा कर देता है. अगर टहलना मुमकिन न हो तो ऑफिस में थोड़ी देर खड़े होकर या इधर-उधर घूमकर भी फायदा लिया जा सकता है. हालांकि जो लोग पहले से डायबिटीज की दवा ले रहे हैं, उन्हें डॉक्टर की सलाह के बिना दवा बंद नहीं करनी चाहिए, क्योंकि ये आदत दवा की जगह नहीं बल्कि उसके साथ मिलकर काम करती है.
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        <pubDate>Mon, 10 Aug 2026 19:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>AC से निकलकर सीधे बारिश में तो नहीं जा रहे? पड़ सकते हैं बीमार</title>
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        <description><![CDATA[ AC से निकलकर सीधे बारिश में तो नहीं जा रहे? पड़ सकते हैं बीमार ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 10 Aug 2026 19:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>Xप्लेन: क्या &amp;apos;बेस्ट बिफोर&amp;apos; या &amp;apos;एक्सपायरी डेट&amp;apos; के बाद खाना फेंक देना चाहिए? जानें हर तारीख के मायने</title>
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        <description><![CDATA[ अगर आप भी फ्रिज से दूध का पैकेट निकाल कर देखतें हैं और उस पर लिखी तारीख निकल चुकी होने पर कूड़ेदान में डाल देते हैं, तो आप अकेले नहीं हैं. दुनिया भर में करोड़ों लोग रोजाना भोजन सिर्फ इसलिए फेंक देते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि पैकेट पर लिखी तारीख बीत गई तो खाना जहर बन गया. यूनाइटेड नेशंस (UN) के मुताबिक, दुनिया भर में एक-तिहाई भोजन की बर्बादी की बड़ी वजह कन्फ्यूजन है, यानी क्या &#039;बेस्ट बिफोर&#039;, &#039;यूज बाय&#039;, &#039;सेल बाय&#039; और &#039;एक्सपायरी डेट&#039; सबका एक ही मतलब होता है. तो इस कन्फ्यूजन को दूर करते हैं और समझते हैं कि किस तारीख के बाद खाना फेंकना जरूरी है और किसके बाद नहीं...
भोजन पर लिखे &#039;बेस्ट बिफोर&#039; का मतलब क्या है?
Foodbank.org के मुताबिक, &#039;बेस्ट बिफोर&#039; डेट का सीधा और आसान मतलब यह है कि इस तारीख तक खाना अपनी सबसे अच्छी क्वालिटी में रहेगा. इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि इस तारीख के बाद वह खराब हो जाएगा या उसे खाना सेहत के लिए खतरनाक होगा.
यह सिर्फ निर्माता कंपनी की तरफ से एक वादा है कि तय तारीख तक प्रोडक्ट का स्वाद, बनावट, खुशबू और पोषण अपने चरम पर रहेगा. इस तारीख के बाद खाना सेफ्टी के लिहाज से खराब नहीं होता, बल्कि उसकी क्वालिटी में धीरे-धीरे गिरावट आनी शुरू हो सकती है. जैसे बिस्कुट थोड़े नरम हो सकते हैं, चिप्स का क्रंच कम हो सकता है या जूस का रंग हल्का पड़ सकता है, लेकिन अगर उसे सही तरीके से स्टोर किया गया हो तो वह बचा रहेगा.
&#039;यूज बाय&#039; या &#039;एक्सपायरी डेट&#039; का मतलब क्या?
यह पूरी तरह से सेफ्टी से जुड़ा होता है. यह वह तारीख है जिसके बाद खाना खाना सेहत के लिए खतरनाक हो सकता है. यह लेबल आमतौर पर उन चीजों पर लगाया जाता है जो जल्दी खराब होती हैं, जैसे दूध, दही, मीट, मछली और ताजा पनीर. इन चीजों को एक्सपायरी डेट के बाद बिल्कुल नहीं खाना चाहिए, भले ही देखने या सूंघने में वे ठीक लग रही हों, क्योंकि इनमें हानिकारक बैक्टीरिया पनप सकते हैं जो दिखाई नहीं देते.
अमेरिका के क्लीवलैंड में यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल्स के एक्सपर्ट्स के मुताबिक, बहुत से लोग &#039;बेस्ट बिफोर&#039; और &#039;यूज बाय&#039; के बीच के फर्क को न समझ पाने की वजह से पूरी तरह से ठीक खाना फेंक देते हैं. यह न सिर्फ उनके पैसों की बर्बादी है बल्कि पर्यावरण के लिए भी बहुत बड़ी समस्या है.
&#039;बेस्ट बिफोर&#039; और &#039;यूज बाय&#039; या &#039;एक्सपायरी डेट&#039; दोनों बिल्कुल अलग चीजें हैं और इनका मतलब भी पूरी तरह से अलग है. ज्यादातर लोग इन दोनों को एक ही समझने की गलती करते हैं और यहीं से सारी परेशानी शुरू होती है.
खाने की चीजों पर लिखी तारीखों का असली मतलब क्या?
माय जरनल कुरियर की रिपोर्ट के मुताबिक, खाने-पीने की चीजों पर आपको कई तरह की तारीखें देखने को मिलती हैं और हर एक का मतलब अलग होता है:

बेस्ट बिफोर: यह सिर्फ क्वालिटी का संकेत है, सेफ्टी का नहीं. इस तारीख तक खाना अपनी सबसे बेहतरीन स्थिति में रहेगा. इसके बाद उसका स्वाद, रंग या बनावट बदल सकती है लेकिन वह खाने के लिए सुरक्षित रहता है. यह लेबल आमतौर पर ड्राई फूड्स, डिब्बाबंद चीजें, बिस्किट, चिप्स, चॉकलेट और सॉफ्ट ड्रिंक्स पर लगाया जाता है.
यूज बाय या एक्सपायरी डेट: यह सेफ्टी से जुड़ा लेबल है और इस तारीख के बाद खाना नहीं खाना चाहिए. यह उन चीजों पर होता है जो जल्दी खराब हो जाती हैं और जिनमें बैक्टीरिया तेजी से पनप सकते हैं, जैसे दूध, दही, पनीर, मीट और मछली. इस तारीख के बाद इन चीजों को बिल्कुल न खाएं, फिर चाहे वे दिखने में कितनी भी ताजी क्यों न लगें.
सेल बाय: यह तारीख दुकानदारों के लिए होती है, ग्राहकों के लिए नहीं. इसका मतलब है कि दुकानदार को इस तारीख तक प्रोडक्ट बेच देना चाहिए. इसका मतलब यह नहीं कि इस तारीख के बाद वह प्रोडक्ट खराब हो गया. अगर आपने &#039;सेल बाय&#039; डेट के बाद कोई चीज खरीदी है और उसे सही तरीके से स्टोर किया है, तो वह खाने के लिए पूरी तरह सुरक्षित हो सकती है.
फ्रीज बाय: प्रोडक्ट की सबसे अच्छी क्वालिटी बनाए रखने के लिए किसी एक तारीख तक फ्रीज कर लेना चाहिए. यह भी सिर्फ क्वालिटी से जुड़ा सुझाव है, सेफ्टी वॉर्निंग नहीं.
मैन्युफैक्चरिंग डेट: यह वह तारीख है जब प्रोडक्ट बनाया गया था. इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि प्रोडक्ट कितना पुराना है.

फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) ने साफ नियम बनाए हैं कि किस प्रोडक्ट पर कौन सी डेट लिखी जाएगी. भारत में जो चीजें जल्दी खराब नहीं होतीं, उन पर &#039;बेस्ट बिफोर&#039; लिखा जाता है और जो जल्दी खराब होती हैं उन पर &#039;यूज बाय&#039; या &#039;एक्सपायरी डेट&#039; लिखना अनिवार्य है.
क्या &#039;बेस्ट बिफोर&#039; निकल जाने के बाद भी खाना खाया जा सकता है?
रटगर्स यूनिवर्सिटी में डिपार्टमेंट ऑफ फूड साइंस के डोनाल्ड शैफ्नर इसका जवाब &#039;हां&#039; में देते हैं. यानी &#039;बेस्ट बिफोर&#039; खाना बिल्कुल खाया जा सकता है, बशर्ते आपने उसे सही तरीके से स्टोर किया हो और पैकेट खराब न हुआ हो. &#039;बेस्ट बिफोर&#039; का मतलब यह नहीं है कि उस तारीख की रात 12 बजते ही खाना जादुई तरीके से खराब हो जाएगा. यह सिर्फ एक अनुमानित तारीख है जो निर्माता ने यह बताने के लिए तय की है कि इस समय तक प्रोडक्ट अपनी पीक क्वालिटी पर रहेगा.
कौवेरी हॉस्पिटल के एक्सपर्ट्स का कहना है कि &#039;बेस्ट बिफोर&#039; डेट के बाद खाना अपने आप खराब नहीं हो जाता, बल्कि उसमें बदलाव धीरे-धीरे आते हैं. बिस्किट में से कुरकुरापन कम होना, चॉकलेट का रंग हल्का सफेद पड़ना या जूस में विटामिन थोड़ा कम होना, लेकिन इसे खाने से आप बीमार नहीं पड़ेंगे.
ऑस्ट्रेलिया की फूड बैंक ऑर्गनाइजेशन की गाइडलाइंस के मुताबिक, बहुत सी चीजें अपनी &#039;बेस्ट बिफोर&#039; डेट के हफ्तों या महीनों बाद तक भी खाने के लिए पूरी तरह सुरक्षित रहती हैं.
&#039;बेस्ट बिफोर&#039; के बाद खाना खाने से पहले अपनी आंख, नाक और जुबान का इस्तेमाल जरूर करें. अगर खाने का रंग बदल गया हो, उसमें अजीब सी बदबू आ रही हो, फफूंद या फंगस लग गई हो, पैकेट फूल गया हो या खाने का स्वाद अजीब लगे, तो उसे बिना सोचे फ ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 10 Aug 2026 19:30:06 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>आयुर्वेदिक दवा और अंग्रेजी दवा साथ में ले रहे हैं? हो सकता है खतरा</title>
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        <description><![CDATA[ Mixing herbal and prescription medicines: आजकल बहुत से लोग एक साथ कई तरह का इलाज लेते हैं. जैसे कोई व्यक्ति शुगर या बीपी की अंग्रेजी दवा ले रहा हो, और साथ ही आयुर्वेदिक चूर्ण या घरेलू नुस्खा भी इस्तेमाल कर रहा हो. ज्यादातर लोगों को लगता है कि आयुर्वेदिक या घरेलू चीजें नेचुरल होती हैं, इसलिए इनसे कोई नुकसान नहीं होता. लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि यह सोच सही नहीं है, क्योंकि दो अलग-अलग तरह की दवाएं साथ लेने से शरीर में बड़ी दिक्कत हो सकती है.
क्या है यह समस्या?
जब कोई व्यक्ति डॉक्टर की दवा के साथ-साथ आयुर्वेदिक, होम्योपैथिक या घरेलू नुस्खे भी लेता है, लेकिन इसकी जानकारी किसी भी डॉक्टर को नहीं देता, तो यह एक बड़ी समस्या बन सकती है. कई बार व्यक्ति एक डॉक्टर से दवा लेता है और दूसरी तरफ किसी और वैद्य या होम्योपैथ से भी इलाज कराता है, लेकिन दोनों को एक-दूसरे के बारे में कुछ नहीं बताता. इससे डॉक्टर को यह समझना मुश्किल हो जाता है कि तबीयत में जो बदलाव हो रहा है, वो बीमारी की वजह से है, दवा की वजह से है, या दोनों दवाओं के मिलने से हो रहा है.
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नेचुरल चीजें भी कर सकती हैं नुकसान
बहुत से लोग सोचते हैं कि आयुर्वेदिक या हर्बल चीजें नेचुरल हैं, इसलिए सुरक्षित हैं. लेकिन इनमें भी ऐसे तत्व होते हैं जो शरीर पर असर डालते हैं. कुछ हर्बल चीजें खून पतला करने वाली दवाओं के साथ मिलकर खून बहने का खतरा बढ़ा सकती हैं. कुछ चीजें शुगर, बीपी या दिल की बीमारी की दवाओं का असर कम कर सकती हैं, जिससे बीमारी कंट्रोल में नहीं रहती. कई बार इसका उल्टा भी हो सकता है, यानी दवा का असर बहुत ज्यादा बढ़ जाए, जिससे शरीर को नुकसान हो सकता है.
लिवर पर भी पड़ता है असर
हमारे शरीर की दवाओं को प्रोसेस करने का काम लिवर करता है. कुछ हर्बल चीजें इस काम में रुकावट डाल सकती हैं. अगर दवा शरीर में ज्यादा देर तक रह जाए, तो नुकसान हो सकता है. और अगर दवा बहुत जल्दी शरीर से निकल जाए, तो उसका फायदा ही नहीं मिल पाता. यही वजह है कि कई बार मरीज सही से दवा ले रहा होता है, फिर भी उसकी बीमारी कंट्रोल में नहीं आती.
लोग डॉक्टर को क्यों नहीं बताते
बहुत से लोग हर्बल चीजों या घरेलू नुस्खों को &quot;दवा&quot; ही नहीं मानते, इसलिए डॉक्टर को इनके बारे में बताते ही नहीं. इसके अलावा एक और दिक्कत यह है कि बाजार में मिलने वाली हर्बल चीजों की क्वालिटी और मात्रा एक जैसी नहीं होती. एक ही नाम की चीज अलग-अलग कंपनी से अलग तरह की मिल सकती है, जिससे यह अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है कि वह शरीर में दवा के साथ कैसा असर डालेगी.
किन लोगों को रखना चाहिए ज्यादा ध्यान
जो लोग खून पतला करने वाली दवा ले रहे हैं, उन्हें खासतौर पर सावधान रहना चाहिए. इसके अलावा जिन लोगों को शुगर, बीपी, दिल की बीमारी या मिर्गी जैसी बीमारी है और वो सालों से दवा ले रहे हैं, उन्हें भी बहुत ध्यान रखना चाहिए. कई बार लोग किसी और वजह से हर्बल चीज लेना शुरू करते हैं और महीनों तक लेते रहते हैं, बिना यह जाने कि इससे उनकी असली दवा पर असर पड़ रहा है.
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        <pubDate>Sun, 09 Aug 2026 15:30:04 +0530</pubDate>
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        <title>शरीर में अचानक आने लगी है हल्की सूजन? हो सकते हैं लिम्फेडेमा के संकेत</title>
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        <description><![CDATA[ हाथ या पैर में सूजन आना एक आम बात लग सकती है, खासकर तब जब इसमें कोई दर्द न हो. लोग अक्सर इसे गर्मी, देर तक बैठने, पुरानी चोट या दिनभर की थकान का नतीजा मान लेते हैं. हालांकि, अगर यह सूजन ठीक नहीं हो रही है, बार-बार आ जाती है या धीरे-धीरे बढ़ती जा रही है तो इसे बिल्कुल भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. इसका एक बड़ा कारण &#039;लिम्फेडेमा&#039; हो सकता है. यह एक ऐसी बीमारी है, जिसमें लसीका प्रणाली ठीक से काम नहीं करती.&amp;nbsp;
इस वजह से शरीर के ऊतकों में लिम्फ फ्लूइड यानी एक तरह का तरल पदार्थ जमा होने लगता है. आमतौर पर लोग इसे सिर्फ एक सामान्य सूजन समझकर छोड़ देते हैं, लेकिन यह समस्या इससे कहीं अधिक गंभीर है. डॉक्टरों के मुताबिक, वक्त के साथ लिम्फेडेमा न सिर्फ त्वचा को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि मरीज के उठने-बैठने, चलने-फिरने और रोजमर्रा के कामकाज को भी बुरी तरह प्रभावित कर सकता है.&amp;nbsp;
लिम्फेडेमा क्या है और यह सूजन क्यों होती है?
शरीर के भीतर लसीका वाहिकाओं और ग्रंथियों का एक पूरा नेटवर्क यानी जाल होता है. इसका मुख्य काम शरीर के अंगों और ऊतकों से अतिरिक्त तरल पदार्थ को इकट्ठा करना और उसे वापस खून के बहाव में पहुंचाना है. इसके साथ ही, यह लसीका तंत्र हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाए रखने में भी बेहद अहम भूमिका निभाता है. जब शरीर की यह ड्रेनेज प्रणाली क्षतिग्रस्त हो जाती है, उसमें कोई रुकावट आ जाती है या फिर इसका पूरी तरह विकास नहीं हो पाता, तो अंगों में यह तरल पदार्थ जमा होने लगता है. इसके कारण प्रभावित हिस्से में भारी सूजन आ जाती है. आमतौर पर यह समस्या हाथ या पैर में देखने को मिलती है, लेकिन कई मामलों में चेहरा, गर्दन, पेट या जननांग जैसे अंग भी इसकी चपेट में आ सकते हैं.&amp;nbsp;
शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज न करे
लिम्फेडेमा के शुरुआती दौर में हमेशा बहुत ज़्यादा सूजन दिखाई नहीं देती, बल्कि इसके लक्षण काफी मामूली हो सकते हैं. मरीज को एक हाथ दूसरे के मुकाबले थोड़ा भारी महसूस हो सकता है, या फिर सालों से आराम से आ रही अंगूठी अचानक उंगली में तंग होने लगती है. हाथ की घड़ी कलाई पर गहरा निशान छोड़ने लगती है और शरीर के एक हिस्से में कपड़े या जूते असामान्य रूप से कसे हुए महसूस होने लगते हैं.&amp;nbsp;
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इसका इलाज कैसे होता है?
लिम्फेडेमा का कोई एक ऐसा इलाज नहीं है जो हर मरीज पर बराबर असर करे. इसका उपचार पूरी तरह से बीमारी के कारण, जगह और उसकी गंभीरता पर निर्भर करता है. राहत की बात यह है कि ज्यादातर मरीजों का इलाज बिना किसी सर्जरी के ही शुरू हो जाता है. इसमें कंप्रेशन गारमेंट्स(खास तरह के चुस्त कपड़े या पट्टियां बांधकर फ्लूइड को जमा होने से रोका जाता है. साथ ही नियमित व्यायाम और शारीरिक एक्टिविटी से बंद नसों के आसपास की मांसपेशियां सक्रिय हो जाती हैं, जिससे लिक्विड का बहाव बेहतर होता है. इसके अलावा एक्सपर्ट्स द्वारा दी जाने वाली खास थेरेपी भी काफी मददगार साबित होती है. इस दौरान त्वचा की देखभाल करना सबसे जरूरी है ताकि प्रभावित हिस्से में किसी भी तरह के इन्फेक्शन को रोका जा सके.&amp;nbsp;
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Sun, 09 Aug 2026 15:30:03 +0530</pubDate>
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        <title>दूध जलेबी खाने से फायदा या नुकसान, क्या कहते हैं एक्सपर्ट?</title>
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        <description><![CDATA[ Doodh-Jalebi Combo: दुनिया में अगर कहीं भी मिठाईयों की बात होगी तो भारत का नाम सबसे पहले आएगा. यहां हर राज्य की चार से पांच स्पेशल मिठाईयां होती हैं, जिनका स्वाद एकदम निराला होता है. ऐसे में अगर आप उत्तर प्रदेश के हैं जलेबी का नाम तो सुना ही होगा. कुछ लोग तो इसे &#039;राष्ट्रीय मिठाई&#039; तक घोषित कर चुके हैं.
जलेबी खाने का तरीका हर जगह अलग-अलग हो सकता है, लेकिन दूध-जलेबी का कॉम्बो और इसका स्वाद एकदम तृत्प कर देने वाला होता है.&amp;nbsp;खासकर उत्तर भारत में लोग सुबह के नाश्ते में गर्मागर्म जलेबी को दूध के साथ खाना बेहद पसंद करते हैं. यह स्वाद में जितना लाजवाब होता है, उतना ही इसके स्वास्थ्य पर असर को लेकर लोगों के मन में सवाल भी उठते हैं. तो ऐसे में आइए जानते हैं कि दूध-जलेबी खाने के फायदे होते है या नुकसान, और जानते इस बारे में एक्सपर्ट की क्या राय है.
दूध जलेबी के फायदे
दूध को एक संपूर्ण फूड कहा जाता है. दूध में कैल्शियम, प्रोटीन और कई जरूरी विटामिन्स पाए जाते हैं, जो शरीर की हड्डियों को मजबूत बनाते हैं और मसल्स के विकास में मदद करते हैं. वहीं जलेबी शुगर और कार्बोहाइड्रेट का अच्छा स्रोत होती है, जो शरीर को तुरंत ऊर्जा देने का काम करती है. कुछ न्यूट्रिशन एक्सपर्ट मानते हैं कि अगर आप बहुत थके हुए हैं या तुरंत एनर्जी की जरूरत है, तो दूध-जलेबी एक अच्छा विकल्प हो सकता है. खासकर सर्दियों में यह कॉम्बिनेशन शरीर को गर्म रखने में मदद करता है.
फायदे के साथ नुकसान भी
जलेबी शरीर को शरीर को तुरंत ऊर्जा देने का काम तो करती है लेकिन जलेबी में काफी मात्रा में शुगर और तेल होता है, जिससे यह हाई कैलोरी फूड बन जाती है. ज्यादा मात्रा में इसका सेवन करने से वजन और ब्लड शुगर लेवल बढ़ सकता है. वहीं कुछ लोगों को दूध और तली-भुनी चीजों का कॉम्बिनेशन सूट नहीं करता, जिससे पेट खराब होने की संभावना रहती है. एक्सपर्ट्स के अनुसार, डायबिटीज के मरीजों को जलेबी से खासतौर पर बचना चाहिए. वहीं दूध के साथ ज्यादा मीठा खाने से पाचन से जुड़ी समस्याएं जैसे गैस, एसिडिटी और अपच भी हो सकती है.
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सिमित मात्रा में करें सेवन&amp;nbsp;
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी खाने का संतुलित मात्रा में सेवन करने से नुकसान नहीं होता. अगर आप दूध-जलेबी खाना चाहते हैं, तो इसे कभी-कभी और सीमित मात्रा में खाने से नुकसान नहीं करती. सप्ताह में एक बार या विशेष अवसर पर इसका सेवन करना ठीक माना जाता है. डाइटिशियन भी यहीं मानते हैं कि दूध-जलेबी का कॉम्बिनेशन पूरी तरह गलत नहीं है, लेकिन इसे रोजाना खाने की आदत स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकती है. यह एक &amp;ldquo;ट्रीट फूड&amp;rdquo; की तरह है, जिसे कभी-कभी ही खाना बेहतर होता है.
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        <pubDate>Sat, 08 Aug 2026 23:30:05 +0530</pubDate>
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        <title>Reason Behind Frequent Yawning: बार&amp;बार आती है जम्हाई? सिर्फ नींद नहीं ये भी हो सकती हैं वजहें</title>
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        <description><![CDATA[ Reason Behind Frequent Yawning: बार-बार आती है जम्हाई? सिर्फ नींद नहीं ये भी हो सकती हैं वजहें ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 08 Aug 2026 23:30:04 +0530</pubDate>
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        <title>Questions Should Ask Before Delivery:  Delivery के लिए Hospital चुनने से पहले ये 7 सवाल पूछना मत भूलिए</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/questions-should-ask-before-delivery-delivery-के-लिए-hospital-चुनने-से-पहले-ये-7-सवाल-पूछना-मत-भूलिए</link>
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        <pubDate>Sat, 08 Aug 2026 23:30:03 +0530</pubDate>
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        <title>Sleeping With Lights On:लाइट जलाकर सोते हैं? गायनेकोलॉजिस्ट ने बताया कैसे बिगड़ सकता है हार्मोनल बैलेंस</title>
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        <description><![CDATA[ Sleeping With Lights On: नींद सिर्फ शरीर को आराम ही नहीं देती, बल्कि हार्मोनल संतुलन बनाए रखने में भी अहम भूमिका निभाती है. लेकिन कई लोगों की आदत होती है, कमरे की लाइट या बेडसाइड लैंप जलाकर सोना. गायनेकोलॉजिस्ट डॉ. मिताली राठौड़, जिन्हें इंस्टाग्राम पर &#039;डॉ यूट्रस&#039; नाम से जाना जाता है, ने बताया है कि यह आदत रिप्रोडक्टिव हेल्थ पर कैसे असर डाल सकती है.
नींद और हार्मोन का डायरेक्ट&amp;nbsp; कनेक्शन
डॉक्टर के मुताबिक, नींद हार्मोनल बैलेंस बनाए रखने में बेहद अहम भूमिका निभाती है. अगर लाइट की वजह से नींद की क्वालिटी बिगड़ती है, तो इसका सीधा असर हार्मोन पर भी पड़ सकता है. उन्होंने यह भी बताया कि पीरियड साइकिल के अलग अलग चरण, जैसे मेंस्ट्रुअल, फॉलिक्युलर, ओव्युलेटरी और ल्यूटियल फेज, नींद में गड़बड़ी और शरीर की सर्केडियन रिदम यानी बॉडी क्लॉक के बिगड़ने के काफी चांसेज होते हैं.
हार्मोन पर पड़ता है सीधा असर
डॉक्टर के मुताबिक, रात में लाइट के संपर्क में आना, चाहे वह कमरे की लाइट हो या फोन गैजेट्स से निकलने वाली ब्लू लाइट, मेलाटोनिन हार्मोन के प्रोडक्शन को दबा सकता है. यही वह हार्मोन है जो शरीर को नींद का संकेत देता है, और रिप्रोडक्टिव हेल्थ व हार्मोनल रेगुलेशन में अहम भूमिका निभाता है. जब मेलाटोनिन प्रोडक्शन बिगड़ता है, तो नींद इफैक्ट&amp;nbsp; होती है, जिससे स्ट्रेस हार्मोन कॉर्टिसोल का लेवल बढ़ सकता है.
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कॉर्टिसोल बढ़ने से शुरू होती है&amp;nbsp;
डॉक्टर ने आगे बताया कि जब कॉर्टिसोल लेवल हाई हो जाता है, तो इंसुलिन रेगुलेशन पर भी नकारात्मक असर पड़ता है, जिससे शरीर में सूजन यानी इंफ्लेमेशन बढ़ जाती है. यह इंफ्लेमेशन आगे चलकर हार्मोनल बैलेंस और रिप्रोडक्टिव हेल्थ को भी असर कर सकता है.
सोने के लिए कैसा माहौल है सबसे बेहतर?
डॉक्टर की सलाह है कि सोते वक्त कमरा जितना हो सके उतना अंधेरा रखा जाए, क्योंकि रोशनी वाले कमरे में सोना शरीर की नेचुरल स्लीप] वेक साइकिल में बाधा डाल सकता है. अगर रात में चलने फिरने के लिए हल्की रोशनी की जरूरत हो, तो कमरे के किसी कोने में बेहद मद्धिम लाइट जलाई जा सकती है, जिसे जरूरत पड़ने पर ही इस्तेमाल किया जाए.
कमरे का तापमान भी है जरूरी
बेहतर नींद के लिए स्पेशिलिस्ट ने ढीले, हल्के और आरामदायक कपड़े पहनने की सलाह भी दी, ताकि शरीर का तापमान सही बना रहे. साथ ही कमरे में मुनासिब हवादारी और आरामदायक तापमान होना भी जरूरी है, ताकि कमरा न ज्यादा गर्म लगे न घुटन भरा हो . उनके मुताबिक मकसद यही है कि कमरा ठंडा, आरामदायक, शांत और अंधेरा हो, ताकि शरीर बिना किसी रुकावट के गहरी और रिस्टोरेटिव नींद ले सके, जो सेहतमंद हार्मोनल रेगुलेशन के लिए बेहद जरूरी है.
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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        <pubDate>Fri, 07 Aug 2026 23:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>Maharashtra Analog Paneer Ban: एनालॉग पनीर से शरीर को कितना नुकसान, महाराष्ट्र में क्यों हुआ बैन?</title>
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        <description><![CDATA[ Maharashtra Analog Paneer Ban: बढ़ती मिलावट को देखते हुए लोगों का अब धीरे-धीरे बाहर की चीजों से विश्वास उठता जा रहा है. ऐसी ही एक मिलावट की खबर महाराष्ट्र से आ रही है, जहां पर पनीर में मिलावट के मामले सामने आए हैं. इसलिए महाराष्ट्र सरकार ने आम जनता के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए राज्य में एनालॉग यानी कृत्रिम पनीर के निर्माण, बिक्री, भंडारण, परिवहन और वितरण पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया है. इस फैसले के साथ महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ के बाद ऐसा कदम उठाने वाला देश का दूसरा राज्य बन गया है. आइए जानते हैं आखिर एनालॉग पनीर होता क्या है, यह सेहत के लिए कितना खतरनाक है और सरकार ने इस पर बैन क्यों लगाया.
क्या होता है एनालॉग पनीर?
एनालॉग पनीर ऐसा पनीर विकल्प है, जिसे ताजे दूध की बजाय वनस्पति तेल, मिल्क पाउडर या मिल्क सॉलिड, स्टार्च और दूसरे खाद्य पदार्थों से बनाया जाता है. इसे पाम ऑयल, स्किम्ड मिल्क पाउडर, स्टार्च और कुछ सस्ते केमिकल से तैयार किया जाता है. खास बात यह है कि यह देखने में, छूने में और यहां तक कि स्वाद में भी बिल्कुल असली दूध के पनीर जैसा लगता है, इसलिए होटल में खाना खाते वक्त या बाजारों में खरीदते वक्त आम लोग इसे पहचान नहीं पाते हैं और इसका इस्तेमाल कर लेते हैं. बता दें कि इन पनीरों में दूध का असली फैट और प्रोटीन न के बराबर होता है. यही वजह है कि यह असली पनीर के मुकाबले काफी सस्ता पड़ता है और इसी वजह से कई होटल, ढाबे और कैटरर्स ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए इसका इस्तेमाल करते हैं.
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शरीर को कितना नुकसान और क्यों लगा बैन?
अब आता है सबसे बड़ा सवाल कि आखिर शरीर को इस पनीर से कितना नुकसान होता है और सरकार ने इस पर बैन क्यों लगाया. तो ऐसे में बता दें कि सेहत के लिहाज से एनालॉग पनीर काफी नुकसानदायक माना जाता है, क्योंकि इसमें दूध जैसा पोषण नहीं मिलता, बल्कि इसमें केमिकल की मिलावट होती है. हाल ही में आई एक लैब रिपोर्ट में सामने आया था कि राज्य में लिए गए पनीर के 35 प्रतिशत से ज्यादा सैंपल फेल हो गए थे, क्योंकि उनमें वेजिटेबल फैट की मिलावट पाई गई थी. इसी गंभीर चिंता को देखते हुए सरकार ने यह सख्त कदम उठाया है. खाद्य सुरक्षा आयुक्त तुकाराम मुंढे ने 30 जुलाई को आदेश जारी करते हुए राज्य में एनालॉग यानी नॉन-डेयरी पनीर पर तुरंत रोक लगा दी है. अब इस पनीर का बनाना, प्रोसेस करना, पैक करना, स्टोर करना, एक जगह से दूसरी जगह ले जाना और बिक्री करना पूरी तरह बंद कर दिया गया है. यह नियम पूरे राज्य में लागू कर दिया गया है. जो लोग ऐसा करते पाए जाएंगे, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी.
नियम तोड़ने पर क्या होगी सजा?
अगर कोई भी आदमी ऐसा करता हुआ पकड़ा जाता है, तो उसे कम से कम 6 महीने की जेल से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा हो सकती है. साथ ही, दोषी पाए जाने पर भारी जुर्माना भी वसूला जाएगा. इस बैन का मकसद यही है कि आम जनता को असली और शुद्ध पनीर मिले और उनकी सेहत के साथ किसी तरह का खिलवाड़ न हो.
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        <pubDate>Fri, 07 Aug 2026 23:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Monsoon Eye Infection: बरसात में तेजी से बढ़ता है आंखों का इन्फेक्शन, ऐसे करें ठीक</title>
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        <description><![CDATA[ Monsoon Eye Infection Care And Prevention: बरसात का मौसम गर्मी से राहत तो दिलाता है, लेकिन अपने साथ कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएं भी लेकर आता है. इन्हीं में से एक है आंखों का इंफेक्शन. इस मौसम में नमी बढ़ने, गंदे पानी के संपर्क में आने और साफ-सफाई में लापरवाही के कारण आंखों में इन्फेक्शन का खतरा काफी बढ़ जाता है. अगर समय रहते इसका ध्यान न दिया जाए, तो परेशानी बढ़ सकती है. आंखों में लालपन, पानी आना, खुजली, चिपचिपा डिस्चार्ज या जलन जैसी समस्याओं को हल्के में नहीं लेना चाहिए.&amp;nbsp;
बरसात में आंखों का इन्फेक्शन क्यों बढ़ता है?
asgeyehospital की रिपोर्ट के अनुसार, बारिश का पानी सीधे आंखों में इंफेक्शन नहीं फैलाता, लेकिन इस मौसम में बैक्टीरिया और वायरस तेजी से फैलते हैं. भीड़भाड़ वाली जगहों पर जाना, गंदे हाथों से आंखें छूना, इंफेक्टेड व्यक्ति के तौलिया या रूमाल का इस्तेमाल करना और कॉन्टैक्ट लेंस की सही सफाई न रखना इंफेक्शन का खतरा बढ़ा देता है. अगर कोई व्यक्ति इंफेक्टेड आंख को छूने के बाद दरवाजे का हैंडल, मोबाइल, मेज या दूसरी चीजों को छूता है, तो वहां मौजूद वायरस या बैक्टीरिया दूसरे लोगों तक भी पहुंच सकते हैं.

आंखों के इन्फेक्शन के सामान्य लक्षण
आंखों का लाल होना.लगातार पानी आना.खुजली या जलन महसूस होना.आंखों से चिपचिपा या पीला-सफेद डिस्चार्ज निकलना.पलकों का सूज जाना.आंखों में रेत जैसी चुभन महसूस होना.सुबह उठने पर पलकों का चिपक जाना.
हर लाल आंख इन्फेक्शन नहीं होती
बरसात में कई बार एलर्जी, धूल, प्रदूषण या लंबे समय तक स्क्रीन देखने की वजह से भी आंखें लाल हो सकती हैं. इसलिए हर लाल आंख को इन्फेक्शन मानकर खुद से एंटीबायोटिक आई ड्रॉप डालना सही नहीं है. अगर दर्द ज्यादा हो, नजर धुंधली होने लगे या रोशनी चुभने लगे, तो तुरंत आई एक्सपर्ट से जांच करानी चाहिए.

किन लोगों को ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए
कॉन्टैक्ट लेंस इस्तेमाल करने वाले.छोटे बच्चे.बुजुर्ग.डायबिटीज के मरीज.कमजोर इम्यूनिटी वाले लोग.हाल ही में आंख का ऑपरेशन कराने वाले मरीज.
घर और स्कूल में कैसे फैलता है इंफेक्शन?
अगर घर के किसी सदस्य को कंजंक्टिवाइटिस या आंखों का वायरल इन्फेक्शन है, तो यह आसानी से दूसरे लोगों में फैल सकता है. एक ही तौलिया, तकिया, रूमाल, आई ड्रॉप, मेकअप या चश्मा साझा करने से इंफेक्शन फैलने का खतरा बढ़ जाता है. इसलिए इंफेक्टेड व्यक्ति की व्यक्तिगत चीजें अलग रखें और उन्हें दूसरों के साथ साझा न करें.
बरसात में आंखों की देखभाल कैसे करें?
बार-बार साबुन और पानी से हाथ धोएं.गंदे हाथों से आंखों को छूने से बचें.बाहर से आने के बाद चेहरे और हाथों को अच्छी तरह साफ करें.आंखों में धूल या गंदा पानी चला जाए तो साफ पानी से धो लें.अपना तौलिया, रूमाल और तकिया किसी के साथ साझा न करें.आंखों का मेकअप दूसरों के साथ शेयर न करें.संक्रमित होने पर पुराने आई मेकअप का इस्तेमाल बंद कर दें.
कॉन्टैक्ट लेंस पहनने वाले रखें खास ध्यान
बरसात के मौसम में कॉन्टैक्ट लेंस पहनने वालों को अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए. लेंस लगाने से पहले हाथ अच्छी तरह धोएं. लेंस या उसके केस को कभी भी नल के पानी से साफ न करें. आंखों में लालपन, दर्द या डिस्चार्ज होने पर तुरंत लेंस निकाल दें और डॉक्टर से सलाह लें. इंफेक्शन के दौरान लेंस पहनना स्थिति को और गंभीर बना सकता है.
आंखों में इंफेक्शन होने पर क्या करें?
अगर आंखें लाल हो जाएं या पानी आने लगे, तो सबसे पहले आंखों को बार-बार रगड़ना बंद करें. साफ कॉटन या मुलायम कपड़े से आंखों की सफाई करें. हल्की जलन या सूजन होने पर ठंडी सिकाई से आराम मिल सकता है. डॉक्टर की सलाह पर आर्टिफिशियल टीयर्स का इस्तेमाल किया जा सकता है. सबसे जरूरी बात यह है कि बिना डॉक्टर की सलाह के एंटीबायोटिक या स्टेरॉयड आई ड्रॉप का इस्तेमाल न करें. हर तरह के इंफेक्शन का इलाज एक जैसा नहीं होता.
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कब तुरंत डॉक्टर के पास जाएं?
आंख में तेज दर्द.धुंधला दिखाई देना.तेज रोशनी से परेशानी.पलकों की ज्यादा सूजन.आंख में चोट लगना.कॉन्टैक्ट लेंस पहनने के दौरान इंफेक्शन होना.2&amp;ndash;3 दिन बाद भी लक्षणों में सुधार न होना.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 07 Aug 2026 23:30:09 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Salman Khan 16 Kg Weight Loss: 16 किलो वजन घटाकर चमके सलमान, 60 प्लस लोग जरूर जानें यह हेल्थ सीक्रेट!</title>
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        <description><![CDATA[ &amp;nbsp;Salman Khan Weight Loss: बॉलीवुड एक्टर सलमान खान की सेहत और उनके बदले हुए लुक को लेकर पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर काफी चर्चा हो रही थी. हाल ही में एक कार्यक्रम से सामने आए वीडियो में सलमान पहले की तुलना में काफी दुबले दिखाई दिए थे. उनका वजन कम देखकर कई फैंस ने उनकी सेहत को लेकर चिंता जताई. अब सलमान खान ने खुद इस बदलाव की वजह बताई है. अभिनेता के मुताबिक उन्होंने जानबूझकर 16 किलो वजन कम किया है और यह बदलाव उनकी फिटनेस जर्नी का हिस्सा है.
सलमान खान ने अपने भाई सोहेल खान के साथ बातचीत के दौरान अपने वजन घटाने के बारे में खुलकर बात की. इस दौरान दोनों भाइयों के बीच फिटनेस और वजन को लेकर चर्चा हुई. सोहेल ने बताया कि उन्होंने 12 किलो वजन कम किया है. इसी बातचीत में सलमान ने अपनी फिटनेस का अपडेट देते हुए कहा कि वह 16 किलो वजन कम कर चुके हैं.
सलमान खान ने घटाया 16 किलो वजन
सलमान ने बातचीत के दौरान कहा, &quot;I am down 16 kg.&quot; यानी वह अब तक अपना 16 किलो वजन कम कर चुके हैं. सलमान के इस खुलासे के बाद उन फैंस को भी जवाब मिल गया है, जो पिछले कुछ दिनों से उनके अचानक दुबले दिखने को लेकर परेशान थे.

सलमान ने यह भी बताया कि उनकी फिटनेस जर्नी अभी पूरी नहीं हुई है. वह अपने टारगेट वेट तक पहुंचने के लिए लगातार काम कर रहे हैं. आने वाले प्रोफेशनल कमिटमेंट्स को देखते हुए भी वह अपनी फिटनेस पर ध्यान दे रहे हैं.
वजन &amp;nbsp;कम करते समय क्या रखें ध्यान
साकेत, नई दिल्ली स्थित &#039;न्यूट्रि एक्टिवानिया&#039; की संस्थापक डाइटीशियन अवनी कौल के अनुसार,&amp;nbsp; 60 की उम्र के बाद वजन कम करने का तरीका युवावस्था जैसा नहीं होना चाहिए. इस उम्र में बहुत से लोग वजन घटाने के लिए केवल वेट मशीन पर दिखने वाले नंबर पर ध्यान देते हैं. एक्सपर्ट्स के मुताबिक यह तरीका सही तस्वीर नहीं दिखाता. बढ़ती उम्र में असली लक्ष्य केवल वजन कम करना नहीं, बल्कि शरीर की अतिरिक्त चर्बी घटाते हुए मसल्स को बचाए रखना होना चाहिए.
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उम्र बढ़ने के साथ शरीर का मेटाबॉलिज्म स्वाभाविक रूप से धीमा होने लगता है. ऐसे में तेजी से वजन घटाने के लिए बहुत कम कैलोरी लेना नुकसान पहुंचा सकता है. इससे फैट के साथ मसल्स भी कम हो सकती हैं. मसल्स कम होने से शरीर की ताकत घट सकती है, मेटाबॉलिज्म और धीमा हो सकता है और गिरने या हड्डियों में फ्रैक्चर होने का खतरा भी बढ़ सकता है. इसलिए 60 के बाद बॉडी फैट कम करने के साथ मसल्स को बनाए रखने पर ध्यान देना जरूरी है.

स्ट्रेंथ ट्रेनिंग क्यों है जरूरी?
हेल्दी एजिंग में एक्सरसाइज की अहम भूमिका होती है. खासतौर पर रेजिस्टेंस या स्ट्रेंथ ट्रेनिंग मसल्स को मजबूत बनाए रखने में मदद कर सकती है. एक्सपर्ट्स सप्ताह में कम से कम दो से तीन बार धीरे-धीरे क्षमता के अनुसार रेजिस्टेंस एक्सरसाइज करने की सलाह देते हैं.
इसके लिए वेट लिफ्टिंग, रेजिस्टेंस बैंड, बॉडीवेट एक्सरसाइज या मशीन की मदद से की जाने वाली एक्सरसाइज को शामिल किया जा सकता है. 6,000 से ज्यादा बुजुर्गों पर आधारित एक सिस्टमैटिक रिव्यू में भी रेजिस्टेंस ट्रेनिंग से मसल्स की ताकत, मसल मास और शारीरिक प्रदर्शन में सुधार पाया गया, खासकर जब इसके साथ सही पोषण भी लिया गया. इसके अलावा मध्यम तीव्रता वाली कार्डियो एक्सरसाइज को शामिल करने से दिल की सेहत बेहतर रखने और फैट कम करने में मदद मिल सकती है.
डाइट पर भी देना होगा ध्यान
60 की उम्र के बाद डाइट की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है. उम्र से जुड़ी मसल्स की कमी को सार्कोपीनिया कहा जाता है. इससे मेटाबॉलिज्म धीमा हो सकता है. ऐसे में बहुत कम खाना या बेहद सख्त डाइट अपनाना सही नहीं है, क्योंकि इससे मसल्स और तेजी से कम हो सकती हैं. एक्सपर्ट्स के अनुसार बुजुर्गों को आमतौर पर रोजाना शरीर के प्रति किलो वजन के हिसाब से करीब 1.0 से 1.2 ग्राम प्रोटीन की जरूरत हो सकती है. हालांकि किसी बीमारी की स्थिति में इसकी मात्रा डॉक्टर या डायटिशियन की सलाह के अनुसार तय होनी चाहिए. डाइट में अंडे, मछली, चिकन, डेयरी प्रोडक्ट्स, सोया, दालें और लीन मीट जैसे प्रोटीन के स्रोत शामिल किए जा सकते हैं. इसके अलावा फल, सब्जियां, साबुत अनाज और हेल्दी फैट लें और शरीर को हाइड्रेट रखें.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 06 Aug 2026 15:30:15 +0530</pubDate>
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        <title>Rare Stomach Cancer : मुंबई की 2 महिलाओं में मिला बेहद रेयर पेट का कैंसर, दिखे ओवेरियन ट्यूमर जैसे लक्षण</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/rare-stomach-cancer-मुंबई-की-2-महिलाओं-में-मिला-बेहद-रेयर-पेट-का-कैंसर-दिखे-ओवेरियन-ट्यूमर-जैसे-लक्षण</link>
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        <description><![CDATA[ Rare Stomach Cancer : पेट दर्द, वजन कम होना या पीरियड्स में गड़बड़ी जैसी समस्याएं अक्सर नॉर्मल बीमारियों से जोड़कर देखी जाती हैं, लेकिन मुंबई में सामने आए दो मामलों ने डॉक्टरों को भी चौंका दिया. इसमें दोनों महिलाओं में शुरुआत में ओवेरियन ट्यूमर होने का शक हुआ, लेकिन जांच आगे बढ़ने पर पता चला कि असली बीमारी पेट का एक बेहद रेयर कैंसर था, जो फैल कर ओवरी तक पहुंच चुका था. डॉक्टरों का कहना है कि ऐसे मामलों में सही समय पर बीमारी की पहचान होना बेहद जरूरी है. इलाज इस बात पर निर्भर करता है कि कैंसर की शुरुआत शरीर के किस हिस्से से हुई है.&amp;nbsp;
क्या हैं दोनों मामले?
पहला मामला 25 साल की एक महिला का है, जो पेट दर्द, अनियमित पीरियड्स, भूख कम लगना और बिना वजह वजन घटने की शिकायत लेकर मुंबई के अस्पताल पहुंची थी. जांच में उसकी दाईं ओवरी में बड़ा ट्यूमर दिखाई दिया, जिसके बाद शुरुआत में ओवेरियन कैंसर होने की आशंका जताई गई. हालांकि आगे की जांच में पता चला कि ओवरी का ट्यूमर असली बीमारी नहीं था, बल्कि कैंसर की शुरुआत पेट से हुई थी और वहां से फैल कर ओवरी तक पहुंच गया था. वहीं दूसरा मामला 37 साल की दो बच्चों की मां का है. उन्हें पेट दर्द, पीरियड्स में गड़बड़ी, वजन कम होना और मल त्याग की आदतों में बदलाव जैसी परेशानी थी. जांच में दोनों ओवरी में बड़े ट्यूमर मिले. बाद में डॉक्टरों ने पुष्टि की कि ये ट्यूमर भी पेट के कैंसर के कारण ओवरी तक फैले थे.&amp;nbsp;
क्या होता है क्रूकेनबर्ग ट्यूमर?
डॉक्टरों के अनुसार इस बीमारी को क्रूकेनबर्ग ट्यूमर कहा जाता है. यह मेटास्टेटिक ओवेरियन कैंसर का एक रेयर और आक्रामक रूप है. इसमें कैंसर की शुरुआत ओवरी में नहीं होती, बल्कि सबसे ज्यादा मामलों में पेट से होती है और वहां से कैंसर की कोशिकाएं एक या दोनों ओवरी तक पहुंच जाती हैं. &amp;nbsp;कुछ मामलों में इसकी शुरुआत बड़ी आंत, अपेंडिक्स, पैंक्रियाज या ब्रेस्ट से भी हो सकती है.&amp;nbsp;
कितनी रेयर है यह बीमारी?
क्रूकेनबर्ग ट्यूमर सभी ओवेरियन ट्यूमर के केवल 1 से 2 प्रतिशत मामलों में पाया जाता है. यह बीमारी ज्यादातर प्रजनन आयु की महिलाओं में देखी जाती है, हालांकि किसी भी उम्र में हो सकती है. डॉक्टरों के अनुसार, जब तक यह ओवरी में पहुंचकर पता चलता है, तब तक कैंसर शरीर में फैल चुका होता है. इसी वजह से इसका इलाज ज्यादा चुनौतीपूर्ण माना जाता है.&amp;nbsp;
किन लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए?
इस बीमारी के लक्षण ओवेरियन कैंसर और कई सामान्य पेट साथ ही गाएनियोकोरोजिकल डिजीज समस्याओं जैसे ही हो सकते हैं. इनमें लगातार पेट दर्द, पेट फूलना, पीरियड्स का अनियमित होना, भूख कम लगना, बिना वजह वजन घटना, थोड़ा खाने पर ही पेट भर जाना और मल त्याग की आदतों में बदलाव शामिल हैं. अगर किसी महिला में ओवेरियन मास के साथ लगातार पेट दर्द, भूख कम लगना, तेजी से वजन घटना या मल त्याग में बदलाव जैसे लक्षण हों, तो सिर्फ ओवेरियन कैंसर ही नहीं, बल्कि पेट या आंत के कैंसर की भी जांच की जानी चाहिए. डॉक्टरों के अनुसार, क्रूकेनबर्ग ट्यूमर सबसे ज्यादा 25 से 40 साल की महिलाओं में पाया जाता है. इसकी पहचान अक्सर देर से होती है. शुरुआती लक्षण किसी सामान्य बीमारी जैसे लगते हैं और पेट का कैंसर बिना साफ संकेतों के आगे बढ़ता रहता है.&amp;nbsp;
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कैसे होती है बीमारी की पहचान?
अल्ट्रासाउंड और सीटी स्कैन से ओवरी में ट्यूमर का पता लगाया जा सकता है, लेकिन केवल इन जांचों से यह तय नहीं हो सकता कि कैंसर की शुरुआत कहां से हुई. इसके लिए डॉक्टर एंडोस्कोपी, टिश्यू बायोप्सी और विशेष पैथोलॉजी जांच की मदद लेते हैं.&amp;nbsp;
इलाज कैसे किया जाता है?
अगर जरूरत हो तो ओवरी के ट्यूमर को हटाने या मरीज की परेशानी कम करने के लिए सर्जरी की जाती है, लेकिन इलाज का मुख्य फोकस उस अंग पर होता है, जहां से कैंसर की शुरुआत हुई हो. पेट के कैंसर के मामलों में मरीज को एडवांस गैस्ट्रिक कैंसर के लिए दी जाने वाली कीमोथेरेपी दी जाती है. कुछ मरीजों में ट्यूमर की जांच रिपोर्ट के आधार पर टारगेटेड थेरेपी या इम्यूनोथेरेपी भी दी जा सकती है.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 06 Aug 2026 15:30:13 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>High Blood Pressure in Pregnancy: प्रेग्नेंसी में हाई BP कंट्रोल करने के लिए खाएं ये 6 चीजें, होगा फायदा</title>
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        <description><![CDATA[ High Blood Pressure in Pregnancy: प्रेग्नेंसी में हाई BP कंट्रोल करने के लिए खाएं ये 6 चीजें, होगा फायदा ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 06 Aug 2026 15:30:11 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Pradeep Rawat Death: किस कैंसर से पीड़ित थे आमिर&amp;असिन की जिंदगी तबाह करने वाले &amp;apos;गजनी&amp;apos;?</title>
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        <description><![CDATA[ Actor Pradeep Rawat Death News Blood Cancer: फिल्म &#039;गजनी&#039; और &#039;लगान&#039; में अपने किरदारों के लिए पहचाने जाने वाले एक्टर प्रदीप रावत का मंगलवार शाम भिवंडी के एक अस्पताल में निधन हो गया. वह 74 साल के थे और पिछले करीब पांच साल से ब्लड कैंसर से जूझ रहे थे. उनके बिजनेस मैनेजर सिद्धार्थ तिवारी ने &amp;nbsp;इसकी जानकारी दी. उनके मुताबिक प्रदीप रावत पहले बीमारी से रिकवर हो गए थे, लेकिन कुछ महीने पहले कैंसर दोबारा लौट आया था. पिछले कुछ महीनों से वह अस्पताल में भर्ती थे और बीते कुछ दिनों में उनकी हालत ज्यादा बिगड़ गई थी.
हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली वेबसाइट clevelandclinic के अनुसार, ब्लड कैंसर एक गंभीर बीमारी है, जो शरीर में ब्लड सेल्स बनने और उनके काम करने की प्रक्रिया को प्रभावित करती है. दुनिया में हर साल करीब 12 लाख लोग ब्लड कैंसर से प्रभावित होते हैं. इसके ज्यादातर मामले बोन मैरो से शुरू होते हैं. बोन मैरो हड्डियों के अंदर मौजूद मुलायम और स्पंजी हिस्सा होता है, जहां स्टेम सेल्स बनते हैं. यही स्टेम सेल्स आगे चलकर रेड ब्लड सेल्स, व्हाइट ब्लड सेल्स और प्लेटलेट्स में बदलते हैं.

रेड ब्लड सेल्स शरीर के अलग-अलग हिस्सों तक ऑक्सीजन पहुंचाते हैं. व्हाइट ब्लड सेल्स संक्रमण से लड़ते हैं, जबकि प्लेटलेट्स खून बहने को रोकने में मदद करते हैं. ब्लड कैंसर होने पर शरीर में ब्लड सेल्स बनने की सामान्य प्रक्रिया बिगड़ जाती है. असामान्य कैंसर सेल्स तेजी से बढ़ने लगते हैं और सामान्य ब्लड सेल्स की जगह लेने लगते हैं. ये असामान्य सेल्स सामान्य ब्लड सेल्स की तरह अपना काम भी नहीं कर पाते.
कितने प्रकार का होता है ब्लड कैंसर?
ब्लड कैंसर मुख्य रूप से तीन प्रकार का होता है. पहला ल्यूकेमिया है, जिसकी शुरुआत आमतौर पर बोन मैरो से होती है. इसमें असामान्य और अक्सर अपरिपक्व व्हाइट ब्लड सेल्स तेजी से बढ़ने लगते हैं और खून में पहुंच सकते हैं. दूसरा लिम्फोमा है, जो शरीर के लिम्फेटिक सिस्टम को प्रभावित करता है. इसकी शुरुआत लिम्फोसाइट्स नाम के व्हाइट ब्लड सेल्स से होती है. इसके दो प्रमुख प्रकार हॉजकिन लिम्फोमा और नॉन-हॉजकिन लिम्फोमा हैं.
तीसरा मायलोमा है, जिसकी शुरुआत बोन मैरो में होती है और यह प्लाज्मा सेल्स को प्रभावित करता है. मल्टीपल मायलोमा इसका सबसे आम प्रकार है. इसके अलावा मायलोप्रोलिफेरेटिव नियोप्लाज्म और मायलोडिस्प्लास्टिक सिंड्रोम जैसे कुछ दुर्लभ ब्लड कैंसर भी होते हैं.

ब्लड कैंसर के लक्षण क्या हैं?
ब्लड कैंसर के लक्षण इसके प्रकार के अनुसार अलग हो सकते हैं. लगातार थकान, सांस फूलना, लिम्फ नोड्स में सूजन और बार-बार संक्रमण होना इसके सामान्य लक्षणों में शामिल हैं. इसके अलावा हड्डियों या जोड़ों में दर्द, रात में बहुत ज्यादा पसीना आना, लिवर या स्प्लीन का बढ़ना, लगातार बुखार और बिना किसी स्पष्ट कारण के वजन कम होना भी इसके संकेत हो सकते हैं.
शरीर पर आसानी से नीले निशान पड़ना या असामान्य ब्लीडिंग भी ध्यान देने योग्य संकेत हैं. त्वचा पर छोटे लाल धब्बे या बैंगनी पैच दिखाई दे सकते हैं. हालांकि ये लक्षण दूसरी बीमारियों में भी हो सकते हैं. इसलिए केवल इन लक्षणों के आधार पर ब्लड कैंसर नहीं माना जा सकता. अगर परेशानी कई सप्ताह तक बनी रहे तो डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है.
क्यों होता है ब्लड कैंसर?
ब्लड कैंसर तब शुरू हो सकता है जब ब्लड सेल्स के डीएनए में बदलाव यानी म्यूटेशन होने लगता है. डीएनए कोशिकाओं को बताता है कि उन्हें कब बढ़ना, विभाजित होना और खत्म होना है. डीएनए में गड़बड़ी होने पर असामान्य ब्लड सेल्स तेजी से बढ़ने लगते हैं. धीरे-धीरे ये सामान्य सेल्स को पीछे छोड़ देते हैं और बोन मैरो पर्याप्त स्वस्थ ब्लड सेल्स नहीं बना पाता.
उम्र बढ़ने के साथ ब्लड कैंसर का जोखिम बढ़ सकता है. पुरुषों में कुछ ब्लड कैंसर अधिक पाए जाते हैं. धूम्रपान या सेकेंड हैंड स्मोक के संपर्क में रहना, लंबे समय तक बेंजीन और फॉर्मल्डिहाइड जैसे केमिकल्स के संपर्क में रहना, पहले कीमोथेरेपी या रेडिएशन थेरेपी लेना और कुछ आनुवंशिक स्थितियां जोखिम बढ़ा सकती हैं. कुछ प्रकार के ब्लड कैंसर में पारिवारिक इतिहास भी भूमिका निभा सकता है. हालांकि अधिकांश मरीजों के परिवार में पहले ब्लड कैंसर का मामला होना जरूरी नहीं है.
कैसे होती है ब्लड कैंसर की जांच?
डॉक्टर सबसे पहले मरीज के लक्षण और मेडिकल हिस्ट्री समझते हैं. इसके बाद ब्लड टेस्ट कराया जा सकता है. कम्प्लीट ब्लड काउंट यानी CBC से रेड ब्लड सेल्स, व्हाइट ब्लड सेल्स और प्लेटलेट्स की संख्या देखी जाती है. ब्लड केमिस्ट्री टेस्ट भी किया जा सकता है. जरूरत पड़ने पर CT स्कैन, MRI और PET स्कैन जैसी इमेजिंग जांच की जाती हैं. बोन मैरो बायोप्सी भी महत्वपूर्ण जांच है, जिसमें बोन मैरो का नमूना लेकर सामान्य और असामान्य ब्लड सेल्स की जांच की जाती है. कैंसर को बढ़ाने वाले जेनेटिक बदलावों का पता लगाने के लिए भी जांच हो सकती है.
ब्लड कैंसर का इलाज कैसे होता है?
इलाज कैंसर के प्रकार और मरीज की स्थिति पर निर्भर करता है. कीमोथेरेपी ब्लड कैंसर के प्रमुख उपचारों में शामिल है. इसमें दवाओं की मदद से कैंसर सेल्स को खत्म करने या उनकी बढ़त रोकने की कोशिश की जाती है. रेडिएशन थेरेपी में रेडिएशन से असामान्य सेल्स के डीएनए को नुकसान पहुंचाया जाता है. इम्यूनोथेरेपी शरीर के इम्यून सिस्टम को कैंसर से लड़ने में मदद करती है. मोनोक्लोनल एंटीबॉडी और CAR T-cell थेरेपी इसके उदाहरण हैं. टारगेटेड थेरेपी कैंसर सेल्स की खास कमजोरियों या जेनेटिक बदलावों को निशाना बनाती है.
कुछ मरीजों में स्टेम सेल ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ सकती है. ऑटोलॉगस स्टेम सेल ट्रांसप्लांट में मरीज के अपने स्वस्थ स्टेम सेल्स को सुरक्षित करके हाई डोज कीमोथेरेपी के बाद वापस शरीर में दिया जाता है. वहीं एलोजेनिक स्टेम सेल ट्रांसप्लांट में उपयुक्त डोनर से स्वस्थ स्टेम सेल्स लिए जाते हैं.
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        <pubDate>Wed, 05 Aug 2026 23:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>Safest Alcohol For Liver: कौन&amp;सी शराब पीने से खराब नहीं होता लिवर, क्या है नशा करने का सही पैमाना?</title>
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        <description><![CDATA[ Safest Alcohol For Liver: अक्सर सोशल मीडिया या दोस्तों के बीच बैठे हो, तब इस बात पर बहस छिड़ जाती है कि शराब पीने से लिवर को कितना नुकसान पहुंचता है. इस पर कुछ लोग कहते हैं कि बीयर पीने से लिवर को नुकसान नहीं होता, तो कुछ का मानना है कि रेड वाइन सेहत के लिए अच्छी होती है. लेकिन क्या वाकई कोई ऐसी शराब है जिसे पीने से लिवर खराब नहीं होता. आइए जानते है कि इस पर विशेषज्ञों की क्या राय हैं.&amp;nbsp;
क्या कोई शराब सुरक्षित है?
दुनिया में ऐसी कोई शराब नहीं बनी है, जिसे पीने से लिवर पूरी तरह सुरक्षित रहे. चाहे आप कितनी ही महंगी विस्की पिएं, बियर पिएं, वोदका पिएं या फिर रेड वाइन, हर तरह की शराब में एथिल अल्कोहल होता है. जो लिवर को बुरी तरह नुकसान पहुंचाता है. जब आप शराब पीते है तो उसे फिल्टर करने का पूरा काम लिवर को ही करना पड़ता है. लिवर के लिए बीयर और विस्की दोनों एक जैसे है. लिवर शराब को बाहर निकालना होता है. इसलिए हर तरह की शराब लिवर को नुकसान पहंचाती है.
लिवर हमारे शरीर में एक फैक्ट्री की तरह काम करता है. यह एक घंटे में लगभग 10 से 14 ग्राम के छोटे शराब के पैक को ही पचा पाता है. ऐसे में जब कोई व्यक्ति ज्यादा तेजी से शराब पीता है, तो लिवर पर दबाव बढ़ जाता है. शराब को पचाने के लिए लिवर एसिटल्डिहाइड नाम का एक बेहद जहरीला केमिकल छोड़ता है. लेकिन अगर शरीर में इसकी मात्रा बढ़ जाती है, तो यह लिवर की कोशिकाओं को नष्ट करने लगता है. इसके कारण सबसे पहले लिवर पर चर्बी जमा हो जाती है, जिसे फैटी लिवर कहते है. अगर कोई व्यक्ति लंबे समय तक शराब पीता रहे, तो यह बीमारी आगे चलकर लिवर सिरोसीक में बदल जाती है, जो काफी जानलेवा साबित होती है.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ें -&amp;nbsp;हफ्तों पुरानी खांसी और बलगम में खून? जानें फेफड़ों के कैंसर के शुरुआती लक्षण
क्या बीयर वाइन से कम नुकसानदेह?
अक्सर लोगों को लगता है कि बीयर में अल्कोहल की मात्रा कम होने से यह लिवर को ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचाती है. लेकिन यहां पर एक बहुत बड़ी गलती होती है, क्योंकि विस्की या वोदका पीने वाले जहां 1 या 2 छोटे पैग लेते है. वहीं बियर पीने वाले एक बार में ही 2 से 3 बोतलें पी जाते हैं. इसलिए मात्रा ज्यादा होने के कारण अंत में शरीर में उतना ही अल्कोहल पहुंचता है. इसलिए बियर भी शरीर को कम नुकसान नहीं पहुंचाती. कई लोगों के लिए शराब को पूरी तरह छोड़ना तो मुश्किल है, लेकिन मेडिकल साइंस के मुताबिक सेहत का ध्यान रखते हुए बियर को 350 मिलीलीटर का एक छोटा केन और वाइन का 150 मिलीलीटर का एक छोटा ग्लास से ज्यादा का सेवन नहीं करते हैं, तो इससे लिवर पर कम दबाव पड़ता है और लिवर के खराब होने का खतरा भी कम होता है.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ें -&amp;nbsp;नाक-कान छिदवाने की सही उम्र क्या है, क्या कहते हैं डॉक्टर्स?
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 05 Aug 2026 23:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>Having Pizza During Pregnancy: प्रेग्नेंसी में पिज्जा खा सकते हैं या नहीं, क्या कहते हैं डॉक्टर?</title>
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        <description><![CDATA[ Having Pizza During Pregnancy: प्रेग्नेंसी में पिज्जा खा सकते हैं या नहीं, क्या कहते हैं डॉक्टर? ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 04 Aug 2026 19:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>रोज&amp;रोज शुरू हो जाता है सिरदर्द, ये आदतें हो सकती हैं वजह</title>
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        <description><![CDATA[ 










Common reasons for headache: बहुत से लोगों को रोज-रोज सिर दर्द होता है, लेकिन वह इसे मामूली समझ कर नजरअंदाज कर देते हैं. सिर दर्द को कभी भी हल्के में नहीं लेना चाहिए, क्योंकि इसके पीछे कई ऐसे कारण होते हैं जो आगे चलकर बड़ी परेशानी बन सकते हैं. आइए जानते हैं इसके मुख्य कारण क्या-क्या होते हैं और इससे राहत कैसे पाई जा सकती है.
सिर दर्द होने के मुख्य कारण
कम पानी पीना - जब शरीर में पानी की कमी हो जाती है, तो सिर दर्द शुरू हो जाता है. पानी कम पीने से शरीर डिहाइड्रेट हो जाता है, जिससे दिमाग तक सही मात्रा में ब्लड फ्लो नहीं हो पाता और दर्द होने लगता है.
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समय से खाना न खाना - सिर दर्द का एक बड़ा कारण यह भी है कि जब हम समय पर खाना नहीं खाते, तो ब्लड शुगर कम हो जाता है, जिसकी वजह से सिर में दर्द शुरू हो जाता है. खाली पेट रहने से भी यह समस्या और बढ़ जाती है.
स्क्रीन का ज्यादा इस्तेमाल - फोन या कंप्यूटर का ज्यादा इस्तेमाल करने से भी सिर दर्द होता है. स्क्रीन से निकलने वाली रोशनी आंखों पर जोर डालती है, जिससे आंखें थक जाती हैं और यह थकान धीरे-धीरे सिर दर्द में बदल जाती है.
अधूरी नींद - नींद कम लेना या देर रात तक जागना भी एक मुख्य कारण हो सकता है. पूरी नींद न मिलने से शरीर और दिमाग दोनों को आराम नहीं मिलता, जिससे अगले दिन सिर भारी और दर्द जैसा महसूस होता है.
ज्यादा तनाव लेना - मानसिक दबाव या चिंता, माइग्रेन और तनाव वाली परेशानियों को बढ़ावा देती है. ज्यादा सोचने या स्ट्रेस लेने से गर्दन और सिर की मांसपेशियां भी टाइट हो जाती हैं, जिससे दर्द होने लगता है.
गलत पोश्चर में बैठना - लंबे समय तक गलत तरीके से बैठे रहना, जैसे झुककर काम करना, भी सिर और गर्दन में दर्द की वजह बन सकता है.
कैफीन का ज्यादा या अचानक कम सेवन - जो लोग रोज ज्यादा चाय-कॉफी पीते हैं, अगर वह अचानक इसे कम कर दें, तो भी सिर दर्द हो सकता है.
कैसे पाएं राहत?
अगर आपको अक्सर सिर दर्द रहता है और साथ ही आपका रूटीन भी बिगड़ा हुआ है, तो सबसे पहले इसे सुधारने की कोशिश करें, क्योंकि खराब रूटीन भी सिर दर्द का एक बड़ा कारण हो सकता है. दिन भर में पर्याप्त पानी पिएं और समय पर खाना खाने की आदत डालें. फोन और लैपटॉप का इस्तेमाल करते समय बीच-बीच में आंखों को आराम दें. रोज कम से कम 7-8 घंटे की नींद जरूर लें, ताकि शरीर पूरी तरह रिकवर हो सके.
तनाव कम करने के लिए हल्की एक्सरसाइज, योगा या मेडिटेशन को अपनी दिनचर्या में शामिल करें. इससे मानसिक दबाव कम होता है और सिर दर्द की समस्या भी धीरे-धीरे कम होने लगती है.
ध्यान रहे कि अगर सिर दर्द रोज हो रहा है, तो डॉक्टर को जरूर दिखाएं. जरूरत पड़ने पर डॉक्टर दवा भी देंगे, जिससे आराम मिल सकता है. लेकिन अगर दवा लेने के बाद भी यह लगातार बना रहे, तो जांच जरूर करवाएं. जांच से इसके पीछे का सही कारण पता चल सकता है, ताकि समय रहते सही इलाज शुरू किया जा सके.
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        <pubDate>Tue, 04 Aug 2026 19:30:08 +0530</pubDate>
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        <title> Causes Of Lungs Cancer: हफ्तों पुरानी खांसी और बलगम में खून? जानें फेफड़ों के कैंसर के शुरुआती लक्षण</title>
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        <description><![CDATA[ &amp;nbsp;Causes Of Lungs Cancer: अक्सर खांसी होने पर लोग डॉक्टर के पास जाते हैं. ज्यादातर खांसी हमारे लिए हानिकारक नहीं होती और कुछ दिनों या हफ्तें भर में ठिक भी हो जाती है. लेकिन तब क्या करें, जब कई दिनों तक खांसी ठिक ही न हो. ऐसे में क्या यह किसी खतरनाक बीमारी का संकेत हो कसता है. इस पर मैक्स स्मार्ट हॉस्पिटल के पल्मोनोलॉजी और ट्रांसप्लांट फिजिशियन निदेशक डॉ. अपार जिंदल ने फेफड़ों के कैंसर के कुछ संभावित लक्षणों के बारे में बताया.&amp;nbsp;
फैफड़ों के कैंसर के शुरुआती लक्षण
इस पर डॉ. अपार जिंदल का कहना है कि फैफड़ो का कैंसर धीरे-धीरे शुरू होता है. शुरुआती दिनों में फेफड़ों के कैंसर का कोई लक्षण नहीं दिखता. कभी-कभी सिर्फ हल्की खांसी होती है, जिसे लोग आम इन्फेक्शन, स्मोकिंग का असर या एलर्जी समझकर नजरअंदाज कर दिया जाता हैं. यही वजह है कि ज्यादातर मरीजों में इस बीमारी का पता तब चलता है, जब यह बहुत ज्यादा बढ़ चुकी होती है. डॉ. जिंदल के मुताबिक, अगर खांसी तीन हफ्ते से ज्यादा पुरानी हो, खांसी का तरीका बदल गया हो या बलगम में खून आ रहा हो, तो इसे हल्के में न लें. यह टीबी, फेफड़ों के कैंसर या फेफड़ों की अन्य गंभीर बीमारियों जैसे ILD का इशारा हो सकता है.&amp;nbsp;डॉ. अपार जिंदल के अनुसार, कुछ और भी चेतावनी भरे लक्षण हैं जिन पर ध्यान देना जरूरी है. जैसे&amp;mdash;सांस का ज्यादा फूलना, सीने में दर्द, बार-बार फेफड़ों में इन्फेक्शन होना, सांस लेते समय घरघराहट जैसी आवाज आना, बिना वजह वजन घटना,भूख न लगना, हर वक्त थकान रहना या आवाज बैठ जाना. हालांकि, ये लक्षण होने का मतलब हमेशा फेफड़ों का कैंसर नहीं होता, लेकिन फिर भी डॉक्टर से इसकी पूरी जांच करवाना बहुत जरूरी है.&amp;nbsp;
फेफड़ों के कैंसर के कारण
आमतौर पर लोग सोचते हैं कि फेफड़ों का कैंसर सिर्फ सिगरेट याा बीड़ी पीने वालों को ही होता है, लेकिन ऐसा नहीं है. हां तंबाकू इसका सबसे बड़ा कारण है, पर ऐसे कई मरीज हैं जिन्होंने कभी धूम्रपान नहीं किया. इस बीमारी की मुख्य वजह दूसरों के सिगरेट का धुआं, हवा में फैला प्रदूषण, फैक्ट्रियों की धूल और केमिकल, जहरीली गैसें या परिवार में पहले किसी को कैंसर होना यानी आनुवंशिक कारण को माना जाता है.&amp;nbsp;
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फैफड़ों के कैंसर का उपचार&amp;nbsp;
डॉ. अपार जिंदल ने बताया कि नई तकनीकों से अब फेफड़ों के कैंसर का पता बहुत जल्दी चल जाता है. इसके लिए डॉक्टर मरीज की हिस्ट्री देखने के बाद चेस्ट एक्स-रे और सीटी स्कैन करते हैं. अगर कुछ गड़बड़ी दिखे, तो ब्रोंकोस्कोपी या बायोप्सी जैसी जांच से बीमारी की पुष्टी कि जाती है. अब तो जेनेटिक जांच भी होती है, जिससे हर मरीज के हिसाब से खास इलाज तय किया जाता है. अब तो कैंसर का इलाज भी अब बहुत एडवांस हो गया है. बीमारी के स्टेज के हिसाब से अब बिना बड़े चीर-फाड़ की सर्जरी, एडवांस रेडिएशन, कीमोथेरेपी, टार्गेटेड थेरेपी और इम्यूनोथेरेपी से इलाज होता है. अगर बीमारी का पता शुरुआती दौर में चल जाए, तो इसे पूरी तरह ठीक किया जा सकता है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Tue, 04 Aug 2026 19:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>Abhijeet Dipke Health: बार&amp;बार बीमार क्यों हो रहे अभिजीत दीपके, टाइफाइड के बाद क्या रखें ध्यान?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/abhijeet-dipke-health-बार-बार-बीमार-क्यों-हो-रहे-अभिजीत-दीपके-टाइफाइड-के-बाद-क्या-रखें-ध्यान</link>
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        <description><![CDATA[ Abhijit Dipke Health Update Typhoid Recovery: कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके की शनिवार (1 अगस्त) को एक बार फिर तबीयत बिगड़ गई. महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर स्थित उनके घर पर डॉक्टर ने उनकी जांच की और फिलहाल आराम करने की सलाह दी है. इससे पहले 25 जुलाई को नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान दीपके ने बताया था कि उन्हें टाइफाइड हुआ है और पिछले कुछ दिनों से उनका इलाज चल रहा है.
डॉक्टर विशाल लहाने के मुताबिक, अभिजीत दीपके का ब्लड प्रेशर थोड़ा कम था. उन्हें उल्टी और दस्त की शिकायत भी थी। इसके बाद उन्हें आईवी फ्लूइड दिया गया. फिलहाल उन्हें बुखार नहीं है. डॉक्टर के अनुसार, अगर उनकी सेहत में सुधार नहीं होता है तो ब्लड टेस्ट कराया जाएगा और रिपोर्ट के आधार पर आगे का इलाज तय किया जाएगा. ऐसे में सवाल उठता है कि टाइफाइड से ठीक होने के बाद भी कमजोरी या दूसरी परेशानियां क्यों बनी रह सकती हैं और इस बीमारी के बाद किन बातों का ध्यान रखना जरूरी है?
टाइफाइड के बाद तुरंत सामान्य नहीं होता शरीर
kauveryhospital की रिपोर्ट के अनुसार, टाइफाइड एक बैक्टीरियल इंफेक्शन है, जो साल्मोनेला टाइफी बैक्टीरिया के कारण होता है. यह मुख्य रूप से दूषित पानी और भोजन के जरिए फैलता है. टाइफाइड होने पर तेज बुखार, उल्टी, दस्त, थकान, सिरदर्द, भूख कम लगना और शरीर में दर्द जैसी समस्याएं हो सकती हैं. एंटीबायोटिक दवाएं शुरू होने के कुछ दिनों बाद मरीज के लक्षणों में सुधार दिखाई दे सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि शरीर पूरी तरह ठीक हो गया है. बीमारी के दौरान शरीर में पानी और जरूरी इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी हो सकती है. यही वजह है कि बुखार उतरने के बाद भी कई लोगों को कमजोरी, थकान और पाचन से जुड़ी समस्याएं परेशान कर सकती हैं.

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टाइफाइड के बाद दोबारा लौट सकते हैं लक्षण
कुछ मरीजों में इलाज पूरा होने के बाद टाइफाइड के लक्षण दोबारा दिखाई दे सकते हैं. इसे रिलैप्स कहा जाता है. इलाज के बाद फिर से बुखार या पहले जैसे लक्षण दिखाई दें तो इसे सामान्य कमजोरी मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. ऐसी स्थिति में डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी है. डॉक्टर जरूरत के मुताबिक जांच कर सकते हैं और उसके आधार पर आगे का इलाज तय किया जाता है. खुद से दोबारा एंटीबायोटिक शुरू करना या पहले बची हुई दवा लेना सही नहीं है.

कमजोरी और थकान को न करें नजरअंदाज
टाइफाइड शरीर पर काफी असर डाल सकता है. बीमारी ठीक होने के बाद भी कुछ समय तक सामान्य काम करने पर जल्दी थकान महसूस हो सकती है. पहले की तरह तेजी से चलने या ज्यादा शारीरिक मेहनत करने में परेशानी हो सकती है. ऐसे में शरीर को पर्याप्त आराम देना जरूरी है। ठीक महसूस होते ही अचानक भारी एक्सरसाइज या बहुत ज्यादा शारीरिक मेहनत शुरू करने से बचें. अपनी रोजमर्रा की गतिविधियों को धीरे-धीरे बढ़ाना बेहतर है। अगर कमजोरी बहुत ज्यादा है या लंबे समय तक बनी रहती है तो डॉक्टर की सलाह लें.
खाने में इन बातों का रखें ध्यान
टाइफाइड के दौरान और उसके बाद डाइजेशन सिस्टम संवेदनशील हो सकता है. इसलिए रिकवरी के दौरान हल्का और आसानी से पचने वाला खाना लेना बेहतर होता है. बहुत ज्यादा तला-भुना, मसालेदार और प्रोसेस्ड खाना खाने से बचना चाहिए. एक बार में बहुत ज्यादा खाने के बजाय थोड़ी-थोड़ी मात्रा में खाना लिया जा सकता है. लंबे समय तक खाली पेट रहने से भी बचें. घर का ताजा बना खाना प्राथमिकता में रखें. बाहर का खाना खाना जरूरी हो तो ताजा तैयार और अच्छी तरह पका हुआ गर्म भोजन चुनें.
शरीर में पानी की कमी न होने दें
टाइफाइड में बुखार, उल्टी और दस्त के कारण शरीर में पानी की कमी होने का खतरा रहता है. रिकवरी के दौरान भी हाइड्रेशन पर ध्यान देना जरूरी है. पर्याप्त पानी और डॉक्टर की सलाह के मुताबिक दूसरे तरल पदार्थ लिए जा सकते हैं. अगर लगातार उल्टी या दस्त हो रहे हैं और मरीज पानी भी नहीं रख पा रहा है तो घर पर इंतजार करने के बजाय डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए. गंभीर डिहाइड्रेशन में अस्पताल में आईवी फ्लूइड की जरूरत पड़ सकती है.
दवाओं का कोर्स बीच में न छोड़ें
टाइफाइड का इलाज डॉक्टर की सलाह के मुताबिक करना बेहद जरूरी है. लक्षण कम होने या बुखार उतरने के बाद अपनी मर्जी से एंटीबायोटिक बंद नहीं करनी चाहिए. डॉक्टर ने जितने दिनों के लिए दवा दी है, उसका कोर्स उसी तरह पूरा करना जरूरी है. रिकवरी के दौरान दोबारा बुखार, लगातार उल्टी-दस्त, बहुत ज्यादा कमजोरी, पेट में तेज दर्द या हालत बिगड़ने जैसे लक्षण दिखाई दें तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 04 Aug 2026 19:30:06 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>क्या नॉर्मल तेल से अच्छे होते हैं नारियल और एवोकाडो ऑयल, जानें सेहत के लिए क्या अच्छा?</title>
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        <description><![CDATA[ Healthy Oil: आजकल हेल्थ को लेकर जागरूक लोग अपने किचन में इस्तेमाल होने वाले तेल पर भी खास ध्यान देने लगे हैं. सोशल मीडिया और फिटनेस ट्रेंड्स के चलते नारियल ऑयल और एवोकाडो ऑयल को हेल्दी ऑप्शन&amp;nbsp; बताया जाता है. ऐसे में कई लोगों के मन में सवाल आता है कि क्या ये तेल वास्तव में डेली&amp;nbsp; कुकिंग ऑयल से बेहतर हैं या फिर यह सिर्फ एक ट्रेंड है.
&amp;nbsp;तेल की अपनी खासियत होती है
डाइट एक्सपर्ट्स के मुताबिक कोई भी एक तेल सभी लोगों के लिए सबसे अच्छा नहीं माना जा सकता. हर तेल की अपनी न्यूट्रिशन प्रोफाइल, फैटी एसिड और इस्तेमाल का तरीका अलग होता है. इसलिए तेल का चुनाव आपकी सेहत, उम्र और खाने की आदतों पर भी निर्भर करता है.
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नारियल ऑयल के फायदे
नारियल ऑयल में सैचुरेटेड फैट की मात्रा ज्यादा होती है. इसकी वजह से यह हाई हीट पर भी अच्छा&amp;nbsp; रहता है और जल्दी खराब नहीं होता. कुछ रिसर्च में इसे अच्छे कोलेस्ट्रॉल यानी एचडीएल बढ़ाने से जोड़ा गया है. हालांकि जिन लोगों का एलडीएल&amp;nbsp; कोलेस्ट्रॉल पहले से ज्यादा है, या जिन्हें दिल की बीमारी का खतरा है, उन्हें इसका सेवन सीमित मात्रा में करने की सलाह दी जाती है.
जान लें के बारे में एवोकाडो ऑयल
एवोकाडो ऑयल में मोनोअनसैचुरेटेड फैट भरपूर मात्रा में पाया जाता है, जिसे दिल की सेहत के लिए अच्छा माना जाता है. इसमें विटामिन ई और एंटीऑक्सीडेंट भी मौजूद होते हैं. यह सलाद, हल्की कुकिंग और मध्यम से तेज आंच पर खाना बनाने के लिए भी अच्छा ऑप्शन&amp;nbsp; माना जाता है. हालांकि इसकी कीमत और तेलों की तुलना में काफी कम&amp;nbsp; होती है.
दूसरे ऑयल भी खराब नहीं
सरसों, मूंगफली, तिल, सोयाबीन, सूरजमुखी और राइस ब्रान जैसे सामान्य कुकिंग ऑयल भी सही मात्रा में इस्तेमाल किए जाएं तो शरीर को जरूरी फैटी एसिड उपलब्ध कराते हैं. एक्सपर्ट्स अक्सर सलाह देते हैं कि एक ही तरह का तेल लंबे समय तक इस्तेमाल करने के बजाय समय समय पर अलग अलग तेलों का संतुलित इस्तेमाल करना बेहतर रहता है.
इन बातों का रखें ध्यान
सबसे जरूरी बात तेल की मात्रा है. चाहे नारियल ऑयल हो, एवोकाडो ऑयल या सामान्य कुकिंग ऑयल, जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल किसी भी तेल का नुकसान पहुंचा सकता है. इसके अलावा बार बार एक ही तेल को गर्म करके इस्तेमाल करने से बचना चाहिए, क्योंकि इससे हानिकारक तत्व बनने का खतरा बढ़ जाता है.
जान लें यह सीक्रेट राज
अगर आप पूरी तरह स्वस्थ हैं, तो अपनी जरूरत और बजट के हिसाब से अलग अलग हेल्दी तेलों का संतुलित इस्तेमाल कर सकते हैं. वहीं जिन लोगों को दिल की बीमारी, हाई कोलेस्ट्रॉल या दूसरी स्वास्थ्य परेशानियाँ&amp;nbsp; हैं, उन्हें तेल बदलने से पहले डॉक्टर या डाइटिशियन की सलाह लेना बेहतर रहेगा. सही तेल वही है जो आपकी सेहत, खानपान और लाइफस्टाइल&amp;nbsp; के मुताबिक संतुलित मात्रा में इस्तेमाल किया जाए.
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        <pubDate>Tue, 04 Aug 2026 19:30:04 +0530</pubDate>
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        <title>Robotic Valve Replacement: सफदरजंग का विश्व रिकॉर्ड, रोबोट से की अनोखी हार्ट सर्जरी</title>
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        <description><![CDATA[ दिल्ली के वीएमएमसी और सफदरजंग अस्पताल ने ऐसा कारनामा कर दिखाया, जिसने पूरी दुनिया में भारत का नाम रोशन कर दिया. सफदरजंग अस्पताल के कार्डियोथोरेसिक एंड वैस्कुलर सर्जरी विभाग ने दुनिया में पहली बार ऐसी रोबोटिक हार्ट सर्जरी की, जो आज तक मेडिकल हिस्ट्री में कभी नहीं हुई. यह सर्जरी एक ऐसे मरीज की गई है, जिसके दिल की बनावट जन्म से ही आम लोगों से बिल्कुल अलग और बेहद जटिल थी.&amp;nbsp;
मरीज की बीमारी आखिर थी क्या?
सबसे पहले हम यह जानते हैं कि मरीज को आखिर परेशानी क्या थी? आम तौर पर हम सभी का दिल छाती के बाईं तरफ होता है, लेकिन इस मरीज में जन्म से ही दो बेहद दुर्लभ और अजीब समस्याएं थीं.&amp;nbsp;

डेक्स्ट्रोकार्डिया: यह एक ऐसी शारीरिक स्थिति है जिसमें इंसान का दिल छाती के बाईं ओर होने के बजाय दाईं ओर होता है. लाखों में से किसी एक व्यक्ति के साथ ऐसा होता है.
कंजेनिटली करेक्टेड ट्रांसपोजिशन ऑफ ग्रेट आर्टरीज: यह बीमारी और भी ज्यादा जटिल है. इसमें दिल के निचले हिस्सों की बनावट आम इंसानों से उल्टी होती है. आसान भाषा में समझें तो दिल के जिस हिस्से को शरीर में खून भेजने का काम करना चाहिए, वह हिस्सा फेफड़ों में खून भेज रहा होता है. इसके कारण दिल के दाहिने हिस्से पर पूरे शरीर में खून पहुंचाने का बहुत ज्यादा दबाव पड़ने लगता है.


इन दोनों जन्मजात बीमारियों की वजह से मरीज के दिल का एवी वाल्व पूरी तरह खराब हो चुका था. वाल्व दिल में एक दरवाजे की तरह काम करता है. वाल्व खराब होने के कारण मरीज के दिल की काम करने की ताकत लगातार कम हो रही थी और उसकी जान को खतरा था.
डॉक्टरों के सामने क्या थी चुनौती?
मरीज का दिल दाईं तरफ था और दिल के अंदर की नसें भी उल्टी जुड़ी हुई थीं, इसलिए पुराने तरीके से छाती चीरकर सर्जरी करना बहुत खतरनाक हो सकता था. डॉ. अनुभव गुप्ता और उनकी टीम ने इस मुश्किल को हल करने के लिए आधुनिक रोबोटिक तकनीक का सहारा लेने का फैसला किया. आम तौर पर जब रोबोट से हार्ट सर्जरी की जाती है तो मशीन को छाती के दाईं तरफ से शरीर में डाला जाता है, क्योंकि दिल बाईं तरफ होता है. वहीं, इस मरीज का दिल तो पहले से ही दाईं तरफ था. ऐसे में डॉक्टरों ने बिल्कुल नया तरीका खोजा.&amp;nbsp;
कैसे हुई यह जादुई सर्जरी?
ऑपरेशन थिएटर में जाने से पहले डॉक्टरों ने पूरी तैयारी की.

सीटी स्कैन और 3डी तस्वीरें: सबसे पहले मरीज के दिल का सीटी स्कैन किया गया. फिर कंप्यूटर की मदद से उसकी एक 3डी तस्वीर बनाई गई. इससे डॉक्टरों को मरीज के उल्टे दिल की एकदम सटीक जानकारी मिल गई कि कौन-सी नस कहां है.
बिना हड्डी काटे ऑपरेशन: यह ऑपरेशन पुराने तरीके से नहीं किया गया, जिसमें छाती की हड्डी को बीच से काटा जाता है. इसके बजाय डॉक्टरों ने मरीज की छाती पर केवल कुछ छोटे-छोटे छेद किए.
रोबोट का कमाल: इन्हीं छेदों के जरिए रोबोट के पतले उपकरणों को शरीर के अंदर डाला गया. एक हाई-डेफिनिशन 3डी कैमरे की मदद से डॉक्टरों को बाहर स्क्रीन पर दिल की बहुत बड़ी और साफ तस्वीर दिख रही थी. &amp;nbsp;डॉक्टर बाहर बैठे-बैठे रोबोट को निर्देश दे रहे थे और रोबोट अंदर दिल का खराब वाल्व निकालकर उसकी जगह नया वाल्व लगा रहा था.


रोबोटिक सर्जरी से मरीज को क्या फायदे हुए?

हड्डी न काटने से मरीज को भयंकर दर्द से छुटकारा मिल गया.
छोटे कट लगने के कारण मरीज का खून बहुत कम बहा.
बड़े घाव न होने की वजह से इंफेक्शन का खतरा लगभग खत्म हो गया.
घाव छोटा होने के कारण मरीज बहुत जल्दी स्वस्थ होकर अपने घर जा सकेगा.

इस कामयाबी के पीछे की टीम
यह ऐतिहासिक उपलब्धि सफदरजंग अस्पताल की डायरेक्टर डॉ. कविता शर्मा के नेतृत्व में हासिल हुई. सीटीवीएस विभाग के प्रमुख प्रोफेसर (डॉ.) अनुभव गुप्ता के अनुभवी डॉक्टरों की टीम ने अपनी सूझबूझ और आधुनिक रोबोटिक तकनीक के सही इस्तेमाल से इस असंभव लगने वाले काम को संभव कर दिखाया.
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        <pubDate>Mon, 03 Aug 2026 15:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>दूध नहीं पीता बच्चा? ये चीजें नहीं होने देंगी कैल्शियम की कमी</title>
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        <description><![CDATA[ Child not drinking milk: आपने अक्सर देखा होगा की कई बच्चे दूध पीना बिल्कुल पसंद नहीं करते. वह नखरे दिखाते हैं. ऐसे में माता-पिता को चिंता होने लगती है कि कहीं बच्चे के शरीर में कैल्शियम की कमी न हो जाए. कैल्शियम बच्चों की हड्डियों और दांतों को मजबूत बनाने के लिए बहुत जरूरी होता है. अगर आपका बच्चा भी दूध नहीं पीता, तो घबराने की जरूरत नहीं है. कुछ दूसरी चीजें भी हैं, जिनसे बच्चे को अच्छी मात्रा में कैल्शियम मिल सकता है.
दही और पनीर खिलाएं
अगर बच्चा दूध नहीं पीता तो उसे दही या पनीर खिलाया जा सकता है. कई बच्चों को दूध से ज्यादा दही और पनीर पसंद आता है. ये दोनों कैल्शियम के लिए अच्छा विकल्प हैं और शरीर के लिए भी फायदेमंद होते हैं. इसके अलावा बच्चे को हरी सब्जियां दें. पालक, मेथी और बथुआ जैसी हरी पत्तेदार सब्जियों में भी कैल्शियम पाया जाता है. आप इन्हें पराठे, सूप या दूसरी डिश में मिलाकर बच्चे को खिला सकते हैं.
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रागी भी है अच्छा विकल्प
रागी में कैल्शियम अच्छी मात्रा में होता है. आप रागी का दलिया, चीला या डोसा बनाकर बच्चे को दे सकते हैं. यह छोटे बच्चों के लिए भी अच्छा माना जाता है. बादाम, और चिया सीड्स में भी कैल्शियम मिलता है. इन्हें पीसकर या छोटे-छोटे टुकड़ों में बच्चे के खाने में मिलाया जा सकता है. छोटे बच्चों को पूरा सूखा मेवा देने से बचें, क्योंकि इससे गले में फंसने का खतरा हो सकता है. इसके अलावा, सोया से बनी कुछ चीजें, जैसे टोफू भी कैल्शियम के लिए अच्छा माना जाता है. अगर बच्चा खा सकता है, तो इसे खाने में शामिल किया जा सकता है.
धूप भी है जरूरी
सिर्फ कैल्शियम खाना ही काफी नहीं है. शरीर को कैल्शियम अच्छी तरह इस्तेमाल करने के लिए विटामिन D भी चाहिए. इसलिए बच्चे को रोज कुछ देर सुबह की धूप में खेलने दें.
कब डॉक्टर से सलाह लें?
अगर बच्चा लंबे समय से दूध नहीं पी रहा है, ठीक से खाना भी नहीं खाता, उसकी लंबाई या वजन नहीं बढ़ रहा है या डॉक्टर को कैल्शियम की कमी का शक लगता है, तो बिना सलाह के कोई सप्लीमेंट न दें. पहले बच्चों के लिए डॉक्टर से जरूर बात करें. दूध न पीने का मतलब यह नहीं है कि बच्चे के शरीर में कैल्शियम की कमी जरूर होगी. अगर उसकी डाइट में दही, पनीर, हरी सब्जियां, रागी और दूसरी चीजें शामिल हैं, तो उसे पर्याप्त कैल्शियम मिल सकता है. सबसे जरूरी बात है कि बच्चे का खाना अच्छा हो और साफ सुथरा यानि बाहर का खाना बच्चे को न खिलाए.
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        <pubDate>Sun, 02 Aug 2026 23:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>साल में तीन हेल्थ चेकअप घटा सकते हैं अस्पताल का खर्च, रिपोर्ट में खुलासा</title>
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        <description><![CDATA[ आजकल काम का दबाव, गलत खाना और तनाव लोगों की सेहत पर बुरा असर डाल रहे हैं. खासकर ऑफिस में काम करने वाले लोगों में दिल की बीमारी, डायबिटीज और मानसिक तनाव के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. हाल ही में CII और डिजिटल हेल्थ प्लेटफॉर्म MediBuddy की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि जो कर्मचारी साल में तीन बार हेल्थ चेकअप कराते हैं, उन्हें अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत दूसरे लोगों के मुकाबले काफी कम पड़ती है.
अगर आप नौकरी करते हैं, तो अपनी सेहत को नजरअंदाज न करें. समय पर हेल्थ चेकअप कराएं, रिपोर्ट को समझें और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर से सलाह लें. यह करना आपके लिए जरूरी हैं. छोटी-छोटी अच्छी आदतें भविष्य में बड़ी बीमारियों से बचाने में मदद कर सकती हैं.
सिर्फ जांच नहीं, उसके बाद इलाज भी जरूरी
रिपोर्ट के अनुसार, कई लोग हेल्थ चेकअप तो करा लेते हैं, लेकिन रिपोर्ट आने के बाद डॉक्टर की सलाह नहीं लेते. आधे से ज्यादा कर्मचारी जांच के बाद कोई कदम ही नहीं उठाते. ऐसे में बीमारी का खतरा बना रहता है और समय पर इलाज नहीं हो पाता. इसलिए सिर्फ जांच कराना ही काफी नहीं है, बल्कि उसके बाद सही इलाज और नियमित देखभाल भी जरूरी है.
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दिल की बीमारी और डायबिटीज बढ़ रही है
यह भी सामने आया है कि ऑफिस में काम करने वाले लोगों में दिल से जुड़ी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं. कम उम्र के लोगों में भी हार्ट अटैक और दूसरी दिल की समस्याएं देखने को मिल रही हैं. वहीं, डायबिटीज के मामले भी लगातार बढ़ रहे हैं. लंबे समय तक बैठकर काम करना, तनाव, नींद की कमी और खराब खाना इसकी बड़ी वजह माने जा रहे हैं.
हर उम्र के कर्मचारियों की अलग चुनौती
रिपोर्ट बताती है कि अलग-अलग उम्र के कर्मचारियों की स्वास्थ्य समस्याएं भी अलग हैं. कम उम्र के कर्मचारियों में चिंता और तनाव ज्यादा देखा जा रहा है. वहीं 30 से 40 साल के लोगों में काम का दबाव, थकान और लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियां बढ़ रही हैं. अधिक उम्र के कर्मचारियों में पुरानी बीमारियों का खतरा ज्यादा रहता है.
कंपनियों को भी बदलनी होगी सोच
रिपोर्ट के मुताबिक, ज्यादातर कंपनियां अभी भी कर्मचारियों की सेहत को लेकर शुरुआती तौर पर ही काम कर रही हैं. डॉक्टरों का कहना है कि कंपनियों को केवल हेल्थ चेकअप कराने तक सीमित नहीं रहना चाहिए. कर्मचारियों को समय-समय पर डॉक्टर की सलाह, फॉलो-अप और जरूरी मदद भी मिलनी चाहिए.
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        <pubDate>Sun, 02 Aug 2026 23:30:09 +0530</pubDate>
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        <title> Kidney Health Tips:दिल नहीं किडनी का भी रखिए ख्याल, इन पांच आदतों को अपनाकर पाएं हेल्दी लाइफ</title>
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        <description><![CDATA[ Kidney Health Tips: दिल की सेहत को लेकर तो लोग काफी सजग रहते हैं, लेकिन किडनी की बात आते ही ज्यादातर लोग बेफिक्र हो जाते हैं. जबकि किडनी शरीर का वह अंग है, जो दिल की तरह ही चौबीस घंटे बिना रुके काम करता है. खून से गंदगी और एक्स्ट्रा फ्लूइड छानना, ब्लड प्रेशर कंट्रोल करना और शरीर का इलेक्ट्रोलाइट बैलेंस बनाए रखना, यह सब किडनी ही संभालती है. डॉक्टरों के मुताबिक सिर्फ पांच आसान आदतें अपनाकर भी किडनी को लंबे समय तक हेल्दी रखा जा सकता है.
पानी पीने में कोताही बिल्कुल न करें
किडनी को स्वस्थ रखने की सबसे पहली और सबसे आसान आदत है, भरपूर पानी पीना. डॉक्टरों की सलाह है कि रोजाना 8 से 12 गिलास पानी पीना चाहिए, हालांकि यह मात्रा उम्र, मौसम और शारीरिक गतिविधि के हिसाब से बदल सकती है. पानी शरीर से टॉक्सिन्स बाहर निकालने में मदद करता है, जिससे किडनी पर दबाव कम पड़ता है.
ब्लड प्रेशर पर रखें नजर
बहुत कम लोग जानते हैं कि हाई ब्लड प्रेशर सिर्फ दिल के दौरे या स्ट्रोक का ही नहीं, बल्कि किडनी खराब होने का भी सबसे बड़ा कारण बनता है. सामान्य ब्लड प्रेशर 140/80 mmHg से कम माना जाता है, अगर यह 140/90 या उससे ज्यादा रहने लगे, तो तुरंत लाइफस्टाइल में बदलाव और डॉक्टर से सलाह जरूरी है, खासकर डायबिटीज या हाई कोलेस्ट्रॉल जैसी परेशानी भी साथ में हों तो.
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खानपान में करें जरूरी बदलाव
रोजाना ज्यादा नमक, फास्ट फूड, पैकेज्ड स्नैक्स और प्रोसेस्ड फूड खाने से किडनी पर असर पड़ सकता है. हेल्दी डाइट में हरी सब्जियां, मौसमी फल, साबुत अनाज, दालें और प्रोटीन से भरपूर चीजें शामिल करें. संतुलित भोजन न सिर्फ किडनी बल्कि दिल और पूरे शरीर की सेहत के लिए भी फायदेमंद होता है.
एक्टिविटी अपनाना है जरूरी
रोजाना की भागदौड़ में एक्सरसाइज को नजरअंदाज करना आम बात है, लेकिन दौड़ना, साइकिलिंग या स्विमिंग जैसी हल्की फुल्की एक्टिविटी भी किडनी की सेहत के लिए फायदेमंद साबित होती है. इसके साथ ही खाने में आम नमक की जगह सेंधा नमक का इस्तेमाल करना भी एक अच्छी आदत मानी जाती है, क्योंकि इसमें सोडियम की मात्रा काफी कम होती है.
समय पर जांच कराना न भूलें
किडनी लगातार काम करने वाला अंग है, इसलिए समय समय पर इसकी जांच कराते रहना बेहद जरूरी है. नियमित चेकअप से किसी भी समस्या का पता शुरुआती स्टेज में ही चल जाता है, जिससे इलाज आसान और असरदार हो जाता है. अगर डायबिटीज है, तो ब्लड शुगर लेवल को कंट्रोल में रखना भी किडनी को सुरक्षित रखने का अहम हिस्सा है.
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        <pubDate>Sun, 02 Aug 2026 23:30:06 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords> Kidney, Health, Tips:दिल, नहीं, किडनी, का, भी, रखिए, ख्याल, इन, पांच, आदतों, को, अपनाकर, पाएं, हेल्दी, लाइफ</media:keywords>
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        <title>Alzheimer Early Detection: एआई टेस्ट से अल्जाइमर का जल्दी लगेगा पता, महंगे स्कैन से मिलेगी राहत</title>
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        <description><![CDATA[ Alzheimer Early Detection: आज के वक्त में एआई का हर क्षेत्र में जमकर उपयोग किया जा रहा है. क्योंकि यह भारी कामों को कम समय में पूरा करने की क्षमता रखता है. ऐसे में एआई ने अब हेल्थ सेक्टर में भी अपना जलवा दिखाना शुरू कर दिया है. अब वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक विकसित कर ली है, जिससे अल्जाइमर यानी भूलने की बीमारी का पता बहुत पहले और बेहद आसानी से लगाया जा सकेगा. इस नई खोज में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद ली जा रही है. इस तकनीक के आने से मरीजों को महंगे मेडिकल स्कैन और दर्दनाक टेस्ट से बड़ी राहत मिल जाएगी.&amp;nbsp;
क्या है अल्जाइमर बीमारी और इसकी चुनौती?
दरअसल अल्जाइमर दिमाग से जुड़ी एक खतरनाक बीमारी है, जिसमें इंसान की याददाश्त धीरे-धीरे कमजोर होने लगती है. इस बीमारी में इंसान छोटी-छोटी बातें, जैसे लोगों के नाम, रास्ते या रोजमर्रा के काम भूलने लगता है और उम्र बढ़ने के साथ यह बीमारी और गंभीर होती जाती है. अब तक इस बीमारी को पकड़ना बहुत मुश्किल काम था. क्योंकि जब तक मरीज के लक्षण गंभीर नहीं हो जाते, तब तक बीमारी का सही पता नहीं चल पाता था. &amp;nbsp;इसके लिए मरीजों को पीईटी स्कैन या रीढ़ की हड्डी का टेस्ट कराना पड़ता है. ये टेस्ट न सिर्फ बहुत महंगे होते हैं. ये टेस्ट न सिर्फ बहुत महंगे होते हैं, बल्कि छोटे शहरों या अस्पतालों में आसानी से उपलब्ध भी नहीं होते हैं.
यह भी पढ़ेंः क्या स्मार्टवॉच पहनने से होता है कैंसर, क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
कैसे काम करेगा नया एआई टेस्ट?
वैज्ञानिकों ने जो नया एआई मॉडल तैयार किया है, वह बेहद एडवांस है और यह टेस्ट मुख्य रूप से दो तरह से काम करता है. सबसे पहले यह एआई सिस्टम मरीज के सामान्य स्वास्थ्य रिकॉर्ड, जैसे ब्लड टेस्ट की रिपोर्ट, उम्र और काम से जुड़े डेटा को देखता है. इसके बाद दूसरे तरीके में एआई दिमाग के शुरुआती बदलावों को बहुत बारीकी से पहचान लेगा, जिन्हें डॉक्टर सामान्य स्कैन में आसानी से नहीं देख पाते हैं. यह एआई सिस्टम केवल कुछ ही मिनटों में बता देता है कि किसी व्यक्ति को आने वाले समय में अल्जाइमर होने का कितना खतरा है. भारत में इसका खर्च लगभग 1 लाख से 2 लाख रुपये प्रति स्कैन तक होता है. वहीं अब सिर्फ 7 हजार से 10 हजार रुपये में बिना किसी दर्द के 18 मिनट के भीतर इसकी सटीक जांच हो जाती है.&amp;nbsp;
मरीजों को कैसे मिलेगी राहत?
इस नए टेस्ट के आने से मेडिकल सेक्टर में एक बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा. इसके आने से अल्जाइमर जैसी खतरनाक बीमारियों का वक्त रहते पता लगाया जा सकेगा. अल्जाइमर को पूरी तरह ठीक नहीं किया जा सकता, लेकिन अगर इसका पता बहुत शुरुआती स्टेज में चल जाए, तो दवाओं और सही लाइफस्टाइल से इसके असर को बहुत धीमा किया जा सकता है. साथ ही महंगे एमआरआई या पीईटी स्कैन कराने में हजारों रुपये खर्च होते हैं. लेकिन एआई टेस्ट से जांच कराने से खर्च काफी कम हो जाएगा. साथ ही रीढ़ की हड्डी से लिक्विड निकालने वाले सुई वाले टेस्ट बहुत दर्दनाक होते हैं, लेकिन एआई टेस्ट में ऐसा कुछ नहीं होगा.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ेंः क्या आप भी बार-बार कराते हैं ब्लड टेस्ट? जानें नुकसान ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 01 Aug 2026 22:30:16 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Sleeping With Earplugs: कान में ईयरप्लग लगाकर सोते हैं तो हो जाएं सावधान, बढ़ सकता है खतरा</title>
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        <description><![CDATA[ Is Sleeping With Earplugs Safe Every Night: अगर आपको रात में खर्राटों, ट्रैफिक के शोर या आसपास की आवाजों की वजह से नींद नहीं आती, तो संभव है कि आपने कभी न कभी ईयरप्लग का इस्तेमाल किया हो. कई लोग अच्छी और बिना रुकावट वाली नींद के लिए रोजाना ईयरप्लग लगाकर सोते हैं. लेकिन क्या हर रात कई घंटों तक कान के अंदर ईयरप्लग लगाए रखना पूरी तरह सुरक्षित है? क्या इससे लंबे समय में कानों पर कोई बुरा असर पड़ सकता है?
ईएनटी विशेषज्ञ डॉ. ज्योतिर्मय एस. हेगड़े ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि अगर ईयरप्लग सही तरीके से इस्तेमाल किए जाएं, उनकी नियमित सफाई की जाए और उनका साइज कान के अनुसार सही हो, तो ज्यादातर स्वस्थ लोगों के लिए इन्हें लगाकर सोना सुरक्षित माना जाता है. खासकर उन लोगों के लिए जिन्हें खर्राटों, ट्रैफिक के शोर या नाइट शिफ्ट की वजह से दिन में सोना पड़ता है, ईयरप्लग अच्छी नींद लेने में मदद कर सकते हैं.
सही तरीके से इस्तेमाल करना है जरूरी
डॉ. हेगड़े बताते हैं कि ईयरप्लग का सही साइज चुनना बहुत जरूरी है. अगर ईयरप्लग बहुत बड़ा है या उसे जरूरत से ज्यादा अंदर धकेल दिया जाए, तो इससे कान में दर्द या असहजता हो सकती है. इसलिए हमेशा निर्माता द्वारा दिए गए निर्देशों के अनुसार ही ईयरप्लग लगाना और निकालना चाहिए. अगर ईयरप्लग लगाते समय दर्द महसूस हो रहा है, तो यह संकेत हो सकता है कि उसका आकार सही नहीं है या उसे गलत तरीके से लगाया गया है.
रोजाना इस्तेमाल करने वालों को रखना होगा ज्यादा ध्यान
जो लोग हर रात ईयरप्लग लगाकर सोते हैं, उन्हें कानों की सफाई का विशेष ध्यान रखना चाहिए. नियमित उपयोग के दौरान अगर कान में दर्द, खुजली, भारीपन या किसी तरह की परेशानी महसूस होने लगे, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. एक्सपर्ट के मुताबिक, रोजाना इस्तेमाल करने वालों को समय-समय पर अपने कानों की स्थिति पर नजर रखनी चाहिए ताकि किसी भी समस्या का पता शुरुआत में ही चल सके.
ईयरवैक्स जमा होने का बढ़ सकता है खतरा
ईयरप्लग के लगातार इस्तेमाल से सबसे आम समस्या कान में मैल यानी ईयरवैक्स जमा होना हो सकती है. सामान्य तौर पर कान का मैल धीरे-धीरे अपने आप बाहर निकल जाता है. लेकिन अगर लंबे समय तक ईयरप्लग का इस्तेमाल किया जाए, तो यह प्राकृतिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है. गलत तरीके से लगाए गए ईयरप्लग मैल को कान के अंदर और गहराई तक धकेल सकते हैं. इससे कान बंद होने जैसा महसूस हो सकता है, सुनाई कम देने लग सकता है या कान में भारीपन महसूस हो सकता है.

गंदे ईयरप्लग बढ़ा सकते हैं इंफेक्शन का खतरा
अगर एक ही ईयरप्लग को बार-बार बिना साफ किए इस्तेमाल किया जाए, तो उसमें बैक्टीरिया और फंगस पनप सकते हैं. ऐसे ईयरप्लग कान के अंदर संक्रमण का कारण बन सकते हैं. इसके अलावा लंबे समय तक गंदे या खराब तरीके से लगाए गए ईयरप्लग कान की त्वचा को नुकसान भी पहुंचा सकते हैं. इससे कान की नली में खरोंच, जलन, सूजन या दबाव के कारण छोटे घाव बनने का खतरा बढ़ जाता है.
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किन लोगों को ईयरप्लग लगाने से पहले डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए?
हालांकि ज्यादातर लोग सुरक्षित तरीके से ईयरप्लग इस्तेमाल कर सकते हैं, लेकिन कुछ लोगों को नियमित उपयोग से पहले डॉक्टर से सलाह जरूर लेनी चाहिए. अगर आपको बार-बार कान में संक्रमण होता है, कान में एक्जिमा या त्वचा से जुड़ी पुरानी समस्या है, कान की नली बहुत संकरी है, अक्सर ईयरवैक्स जमा हो जाता है, हाल ही में कान की सर्जरी हुई है या कान के पर्दे में छेद है, तो बिना डॉक्टर की सलाह के ईयरप्लग का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए.

दोबारा इस्तेमाल होने वाले ईयरप्लग की सफाई कैसे करें?
अगर आप री-यूजेबल ईयरप्लग इस्तेमाल करते हैं, तो हर बार उपयोग के बाद उन्हें साबुन और साफ पानी से धोना चाहिए. धोने के बाद उन्हें पूरी तरह सूखने दें और उसके बाद ही दोबारा इस्तेमाल करें. अगर ईयरप्लग फटने लगें, उनका रंग बदल जाए, वे सख्त हो जाएं या अच्छी तरह साफ न हो पा रहे हों, तो उन्हें तुरंत बदल देना चाहिए. वहीं डिस्पोजेबल ईयरप्लग को दोबारा इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. अगर वे गंदे हो जाएं, अपना आकार खो दें या पहले की तरह फैलना बंद कर दें, तो उन्हें फेंक देना ही बेहतर होता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 01 Aug 2026 22:30:13 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Soya Chaap Adulteration: सोया चाप टेस्टी लेकिन मिलावटी, सेहत के लिए हो सकता है खतरनाक!</title>
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        <description><![CDATA[ Soya Chaap Adulteration: सोया चाप टेस्टी लेकिन मिलावटी, सेहत के लिए हो सकता है खतरनाक! ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 31 Jul 2026 14:30:03 +0530</pubDate>
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        <title>Exam Preparation: क्या रातभर जागकर पढ़ते हैं? जानें बड़े नुकसान</title>
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        <description><![CDATA[ Why Late Night Studying Is Bad For Exams: परीक्षा नजदीक आते ही छात्रों पर पूरे सिलेबस को खत्म करने और ज्यादा से ज्यादा रिवीजन करने का दबाव बढ़ जाता है. ऐसे में कई छात्र रातभर जागकर पढ़ाई करना शुरू कर देते हैं. उन्हें लगता है कि नींद के कुछ घंटे कम करके पढ़ाई के लिए अतिरिक्त समय निकाला जा सकता है. खासकर जब सिलेबस अधूरा हो तो पूरी रात जागकर पढ़ना परीक्षा की तैयारी का आसान तरीका लग सकता है. लेकिन यह आदत फायदे की जगह नुकसान पहुंचा सकती है.
रात में कुछ घंटे ज्यादा पढ़ लेने का मतलब यह जरूरी नहीं कि परीक्षा में प्रदर्शन भी बेहतर होगा. नींद पूरी न होने पर याददाश्त, एकाग्रता और तार्किक तरीके से सोचने की क्षमता प्रभावित हो सकती है. इसका नतीजा यह हो सकता है कि जिस जानकारी को छात्र पहले अच्छी तरह याद कर चुका था, उसे भी परीक्षा के दौरान याद करने में परेशानी होने लगे. वीबी एनाटॉमी एकेडमी की संस्थापक, काउंसलर और मेडिकल एजुकेटर डॉ. वैशाली भराम्बे ने एचटी लाइफस्टाइल से बातचीत में बताया कि परीक्षा के दौरान पढ़ाई के लिए नींद छोड़ना सही रणनीति नहीं है. इससे छात्रों की मेहनत का उल्टा असर पड़ सकता है.
रातभर जागकर पढ़ाई करने से क्यों हो सकता है नुकसान?
परीक्षा के समय अक्सर छात्र ज्यादा चैप्टर कवर करने, चीजों को याद करने और रिवीजन पूरा करने के लिए पूरी रात जागते हैं. पहली नजर में ऐसा लगता है कि इससे पढ़ाई के लिए कुछ अतिरिक्त घंटे मिल रहे हैं. लेकिन नींद की कमी का सीधा असर दिमाग के काम करने के तरीके पर पड़ सकता है डॉ. भराम्बे के मुताबिक, विज्ञान में बार-बार यह सामने आया है कि नींद की कमी सीखने की क्षमता को कम करती है. पर्याप्त नींद न लेने से याददाश्त, एकाग्रता और लॉजिकल थिंकिंग प्रभावित होती है. छात्र रात में ज्यादा घंटे पढ़ाई जरूर कर सकते हैं, लेकिन उस समय दिमाग की नई जानकारी को समझने और उसे याद रखने की क्षमता कमजोर हो सकती है.

यानी केवल ज्यादा समय तक किताब लेकर बैठने का मतलब ज्यादा सीखना या परीक्षा में बेहतर नंबर हासिल करना नहीं है. नींद पूरी न होने पर परीक्षा देते समय पहले से याद की गई जानकारी को याद करने में भी परेशानी हो सकती है.
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परीक्षा में सवाल समझने में भी हो सकती है परेशानी
नींद की कमी का असर केवल याददाश्त तक सीमित नहीं रहता. कमजोर एकाग्रता के कारण छात्रों के लिए परीक्षा के सवालों को ठीक तरह से समझना भी मुश्किल हो सकता है. इसके अलावा जवाब को सही तरीके से लिखने और छोटी-छोटी गलतियों से बचने में भी परेशानी हो सकती है. लॉजिकल थिंकिंग प्रभावित होने से केस आधारित या प्रैक्टिकल सवालों को हल करना मुश्किल हो सकता है. छात्र ने क्लास में जो कॉन्सेप्ट पढ़े हैं, उन्हें किसी नए सवाल या समस्या से जोड़ने में भी परेशानी आ सकती है.

ऐसे में रातभर जागकर छात्र भले ही कुछ अतिरिक्त चैप्टर पढ़ ले या पिछले वर्षों के प्रश्नपत्र हल कर ले, लेकिन नींद की कमी के कारण परीक्षा हॉल में अपनी तैयारी को सही तरीके से पेश करना मुश्किल हो सकता है.
शरीर और दिमाग के लिए क्यों जरूरी है नींद?
नींद केवल शरीर को आराम देने का समय नहीं है. डॉ. भराम्बे इसे शरीर के स्वस्थ तरीके से काम करने के लिए जरूरी जैविक प्रक्रिया बताती हैं. अच्छी और पर्याप्त नींद के दौरान दिमाग खुद को रिकवर करता है और एकाग्रता बेहतर होती है. नींद के दौरान शरीर में हार्मोन का संतुलन भी बहाल होता है और सेलुलर रिपेयर की प्रक्रिया चलती है. पर्याप्त नींद बेहतर निर्णय लेने, सही तरीके से सोचने और भावनात्मक रूप से स्थिर रहने में भी मदद करती है.
लगातार नींद कम लेने से बढ़ सकती हैं दूसरी परेशानियां
लंबे समय तक पर्याप्त नींद न लेने का असर शरीर और मानसिक स्वास्थ्य के कई हिस्सों पर पड़ सकता है. एक्सपर्ट के मुताबिक, लगातार नींद की कमी से एंग्जायटी, सिरदर्द और डिप्रेशन का खतरा बढ़ सकता है. इसके साथ ही शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी कमजोर हो सकती है. परीक्षा के समय इन समस्याओं का असर और ज्यादा महसूस हो सकता है. एंग्जायटी के कारण परीक्षा से पहले खुद को शांत रखना मुश्किल हो सकता है. सिरदर्द होने पर परीक्षा के दौरान लंबे समय तक ध्यान लगाकर लिखने में परेशानी आ सकती है. वहीं कमजोर इम्युनिटी के कारण परीक्षा के आसपास बीमार पड़ने का खतरा भी बढ़ सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 22:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>Hepatitis B Treatment: क्या खत्म होगा हेपेटाइटिस बी? मिली बड़ी कामयाबी</title>
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        <description><![CDATA[ Bepirovirsen Hepatitis B Drug: हेपेटाइटिस बी के इलाज में लगभग दो दशक बाद एक बड़ी उम्मीद सामने आई है. बेपिरोविर्सेन नाम की एक नई प्रायोगिक दवा ने वर्ल्ड लेवल पर हुए क्लिनिकल ट्रायल में ऐसे नतीजे दिए हैं, जिससे भविष्य में कुछ मरीजों को जीवनभर दवा लेने की जरूरत नहीं पड़ सकती. हालांकि एक्सपर्ट का कहना है कि भारत के लिए फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती नई दवा नहीं, बल्कि उन करोड़ों लोगों तक पहुंचना है जिन्हें यह संक्रमण है लेकिन इसकी जानकारी तक नहीं है.
विश्व हेपेटाइटिस दिवस (28 जुलाई) के मौके पर लिवर एक्सपर्ट्स ने कहा कि भारत में अनुमानित 3.5 करोड़ लोग हेपेटाइटिस बी के साथ जीवन जी रहे हैं. इसके बावजूद बड़ी संख्या में मरीजों की कभी जांच ही नहीं हो पाती और इलाज करा रहे लोगों की संख्या 10 लाख से भी कम है.
भारत में पहचान और इलाज पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत
इंस्टीट्यूट ऑफ लिवर एंड बाइलियरी साइंसेज के निदेशक डॉ. एस.के. सरीन का कहना है कि भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती संक्रमित लोगों की पहचान करना, उनकी स्क्रीनिंग कराना और समय पर इलाज से जोड़ना है. उनके अनुसार, वर्तमान में उपलब्ध एंटीवायरल दवाएं बहुत महंगी नहीं हैं और राष्ट्रीय वायरल हेपेटाइटिस नियंत्रण कार्यक्रम के तहत भी उपलब्ध हैं. इसके बावजूद जरूरतमंद मरीजों का केवल एक छोटा हिस्सा ही इलाज तक पहुंच पाता है.
29 देशों में हुआ फेज-3 ट्रायल
द न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित फेज-3 क्लिनिकल ट्रायल में 29 देशों के 1,834 मरीजों को शामिल किया गया. अध्ययन में जिन मरीजों को सामान्य एंटीवायरल दवा के साथ बेपिरोविर्सेन दिया गया, उनमें से करीब 19 प्रतिशत मरीजों में ऐसा परिणाम देखने को मिला जिसे विशेषज्ञ &#039;फंक्शनल क्योर&#039; कहते हैं. इसका मतलब यह है कि इलाज बंद करने के छह महीने बाद भी उनके शरीर में वायरस का पता नहीं चला. वहीं प्लेसीबो लेने वाले मरीजों में ऐसा कोई परिणाम नहीं मिला.
करीब 20 साल बाद बड़ी उपलब्धि
डॉ. सरीन ने इस अध्ययन को हेपेटाइटिस बी के इलाज में लगभग 20 वर्षों की सबसे बड़ी उपलब्धि बताया. उनका कहना है कि यह भविष्य की नई दवाओं की दिशा तय करने वाला कदम साबित हो सकता है. उनके मुताबिक, वर्ष 2030 तक इस बीमारी के इलाज के लिए कई नई दवाएं उपलब्ध होने की संभावना है. हालांकि सबसे अहम बात यह होगी कि ये दवाएं सुरक्षित हों, नियामक संस्थाओं से मंजूरी प्राप्त करें और आम मरीजों की पहुंच में हों.
मौजूदा दवाओं से कैसे अलग है नई दवा?
आज इस्तेमाल की जा रही एंटीवायरल दवाएं वायरस को पूरी तरह खत्म नहीं करतीं, बल्कि उसकी गतिविधि को दबाकर रखती हैं. यही वजह है कि अधिकतर मरीजों को लंबे समय तक, कई बार पूरी जिंदगी दवा लेनी पड़ती है. इसके विपरीत, बेपिरोविर्सेन वायरस के जीवन चक्र के शुरुआती चरण में ही उसकी गतिविधि को रोकने का प्रयास करती है. इससे वायरस की संख्या कम होने के साथ-साथ उन वायरल प्रोटीन का निर्माण भी घटता है, जो शरीर की इम्यून सिस्टम को कमजोर बनाते हैं. यही कारण है कि एक्सपर्ट इसे इलाज के क्षेत्र में एक अलग और महत्वपूर्ण कदम मान रहे हैं.
&#039;फंक्शनल क्योर&#039; क्यों है अहम?
सर गंगा राम अस्पताल के इंस्टीट्यूट ऑफ लिवर, गैस्ट्रोएंटरोलॉजी एंड पैंक्रियाटो-बिलियरी साइंसेज के चेयरमैन डॉ. अनिल अरोड़ा के अनुसार, केवल वायरस को दबाकर रखना और फंक्शनल क्योर हासिल करना दोनों अलग बातें हैं. उनका कहना है कि यदि मरीज फंक्शनल क्योर तक पहुंचता है तो भविष्य में लिवर सिरोसिस और लिवर कैंसर जैसी गंभीर जटिलताओं का खतरा काफी कम हो सकता है. इसके साथ ही संक्रमण दूसरे लोगों तक फैलने की संभावना भी घट जाती है.

हर मरीज के लिए नहीं होगी यह दवा
हालांकि विशेषज्ञों ने यह भी स्पष्ट किया है कि फिलहाल यह दवा सभी मरीजों के लिए उपयुक्त नहीं मानी जा सकती. डॉ. सरीन के मुताबिक, शुरुआती अनुमान यही है कि इसका सबसे अधिक लाभ उन मरीजों को मिलेगा जिनका इंफेक्शन पहले से एंटीवायरल दवाओं से नियंत्रित है और जिनके शरीर में वायरस की मात्रा कम है.
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टीकाकरण की अहमियत अब भी बरकरार
एक्सपर्ट का कहना है कि नई दवा को रोकथाम का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए. डॉ. सरीन ने जोर देकर कहा कि नवजात बच्चों का सार्वभौमिक टीकाकरण हेपेटाइटिस बी को खत्म करने की सबसे मजबूत रणनीति बना हुआ है. उन्होंने सलाह दी कि संक्रमित मरीजों के परिवार के सदस्य, स्वास्थ्यकर्मी, डायलिसिस कराने वाले मरीज और अन्य उच्च जोखिम वाले लोग अपनी जांच जरूर कराएं और यह सुनिश्चित करें कि उन्हें हेपेटाइटिस बी का टीका लगा है या नहीं.

भारत आने में लग सकते हैं 2 से 5 साल
एक्सपर्ट का अनुमान है कि इंटरनेशनल स्तर पर सभी जरूरी मंजूरियां मिलने के बाद इस दवा को भारत तक पहुंचने में दो से पांच साल का समय लग सकता है. इसके अलावा इसकी कीमत भी एक बड़ा मुद्दा होगी. ऐसे में फिलहाल भारत के लिए सबसे जरूरी कदम अधिक से अधिक लोगों की जांच, समय पर इलाज और टीकाकरण को बढ़ावा देना माना जा रहा है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 04:30:05 +0530</pubDate>
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        <media:keywords>Hepatitis, Treatment:, क्या, खत्म, होगा, हेपेटाइटिस, बी, मिली, बड़ी, कामयाबी</media:keywords>
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        <title>Cancer Cases In Elderly: क्या बुजुर्गों में बढ़ रहा कैंसर का खतरा? जानें सच</title>
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        <description><![CDATA[ Elderly Cancer Detection Warning Signs: उम्र बढ़ने के साथ कैंसर का खतरा भी तेजी से बढ़ता है. अमेरिका और ब्रिटेन से सामने आए आंकड़े बताते हैं कि बुजुर्गों में कैंसर न केवल बड़ी स्वास्थ्य समस्या बन रहा है, बल्कि कई मामलों में बीमारी की पहचान भी काफी देर से हो रही है. स्थिति यह है कि बड़ी संख्या में बुजुर्ग मरीजों को कैंसर का पता तब चलता है, जब उनकी हालत बिगड़ने के बाद उन्हें इमरजेंसी में अस्पताल पहुंचाना पड़ता है. देर से बीमारी का पता चलने के कारण इलाज मुश्किल हो सकता है और मरीज के बचने की संभावना भी कम हो जाती है.
जर्नल ऑफ द नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट में 14 जुलाई को ऑनलाइन प्रकाशित एक स्टडी में बुजुर्ग कैंसर मरीजों में इमरजेंसी प्रेजेंटेशन यानी आपात स्थिति में कैंसर का पता चलने और इससे जुड़ी मृत्यु दर का स्टडी किया गया. यूनिवर्सिटी ऑफ नॉर्थ कैरोलिना, चैपल हिल की कैरोलिन ए. थॉम्पसन और उनके सहयोगियों ने अमेरिका के नेशनल मेडिकेयर समूह के आंकड़ों का विश्लेषण किया. इसमें 2008 से 2017 के बीच 16 प्रमुख प्रकार के कैंसर से पीड़ित 9,29,378 मरीजों को शामिल किया गया.

स्टडी में सामने आया कि करीब 28 फीसदी मामलों में कैंसर का पता इमरजेंसी प्रेजेंटेशन के दौरान चला. इनमें 22 फीसदी मरीज इनपेशेंट और 6 फीसदी आउटपेशेंट इमरजेंसी प्रेजेंटेशन वाले थे. हालांकि कैंसर के प्रकार के हिसाब से इसमें बड़ा अंतर देखने को मिला. ब्रेस्ट और प्रोस्टेट कैंसर में इमरजेंसी प्रेजेंटेशन की दर 10 फीसदी से कम थी. वहीं लिवर, फेफड़े, पेट, कोलन, ओवेरियन और पैंक्रियाटिक कैंसर में यह आंकड़ा 40 फीसदी से ज्यादा था.
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इमरजेंसी में कैंसर का पता चलना बढ़ा रहा मौत का खतरा
रिसर्च में मरीजों की सर्वाइवल रेट में भी बड़ा अंतर सामने आया. जिन मरीजों में कैंसर का पता इमरजेंसी की स्थिति में नहीं चला था, उनमें एक साल तक जीवित रहने की दर 81 फीसदी थी. आउटपेशेंट इमरजेंसी प्रेजेंटेशन वाले मरीजों में यह 60 फीसदी और इनपेशेंट इमरजेंसी प्रेजेंटेशन वाले मरीजों में केवल 36 फीसदी रही.

इनपेशेंट इमरजेंसी प्रेजेंटेशन वाले मरीजों में 30 दिनों के भीतर मृत्यु का एडजस्टेड जोखिम सामान्य तरीके से कैंसर का पता चलने वाले मरीजों की तुलना में करीब चार गुना था. रिसर्च के मुताबिक, यह अंतर मरीज की उम्र, कैंसर की स्टेज, दूसरी बीमारियों और शारीरिक कमजोरी जैसे कारणों को ध्यान में रखने के बाद भी बना रहा. रिसर्चर कैरोलिन थॉम्पसन के मुताबिक, कैंसर का पता किस तरह और किन परिस्थितियों में चलता है, इससे भी मरीज की आगे की स्थिति के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है.
70 साल से ज्यादा उम्र वालों में आधे से अधिक मामले
ब्रिटेन में कैंसर रिसर्च यूके की एक रिपोर्ट भी बुजुर्गों में कैंसर को लेकर गंभीर स्थिति की ओर इशारा करती है. रिपोर्ट के अनुसार, कैंसर का खतरा उम्र के साथ तेजी से बढ़ता है. ब्रिटेन में कैंसर के आधे से ज्यादा मामले 70 साल से अधिक उम्र के लोगों में सामने आते हैं, जबकि कुल आबादी में इस आयु वर्ग की हिस्सेदारी केवल 14 फीसदी है. कैंसर के 10 में से 9 मामले 50 साल या उससे अधिक उम्र के लोगों में पाए जाते हैं.
इसके बावजूद बुजुर्गों में कैंसर की पहचान कई बार बीमारी के काफी आगे बढ़ने के बाद होती है. 80 साल से अधिक उम्र के लोगों में हर तीन में से करीब एक कैंसर का मामला इमरजेंसी एडमिशन के बाद सामने आया. इसके मुकाबले 50 साल से कम उम्र के लोगों में यह आंकड़ा 15 फीसदी है.
बुजुर्ग मरीजों को कम मिल रहा इलाज
रिपोर्ट में इलाज को लेकर भी उम्र के आधार पर अंतर सामने आया है. बुजुर्ग मरीजों को कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी मिलने की संभावना कम पाई गई. अंतरराष्ट्रीय आंकड़ों के मुताबिक, ब्रिटेन में 85 साल या उससे अधिक उम्र के कैंसर मरीजों में केवल 2.4 फीसदी को कीमोथेरेपी दी गई. ऑस्ट्रेलिया में यह आंकड़ा 8.1 फीसदी और कनाडा के ओंटारियो में 14 फीसदी था.
ब्रिटेन में इस आयु वर्ग के 6.2 से 9.6 फीसदी कैंसर मरीजों को रेडियोथेरेपी मिली, जबकि कनाडा के कुछ हिस्सों में यह दर 20 फीसदी से ज्यादा और ऑस्ट्रेलिया के कुछ क्षेत्रों में 16 फीसदी से अधिक रही. हालांकि दूसरी बीमारियों के कारण कुछ बुजुर्ग मरीज कठिन इलाज के लिए शारीरिक रूप से फिट नहीं हो सकते हैं. रिपोर्ट में चिंता जताई गई कि कई बार मरीज की वास्तविक फिटनेस के बजाय केवल उसकी उम्र को आधार बनाकर इलाज का फैसला किया जाता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 04:30:04 +0530</pubDate>
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        <title>Does Paan Cause Cancer: क्या पान खाने से सच में होता है कैंसर? जानिए सच्चाई</title>
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        <description><![CDATA[ Does Paan Cause Cancer: कई लोग शौक &amp;nbsp;से पान खाते &amp;nbsp;हैं, वही पान कुछ लोगों की दिनचर्या का एक हिस्सा है &amp;nbsp;पान के पत्ते &amp;nbsp;स्वास्थ &amp;nbsp;के लिए काफी लाभकारी &amp;nbsp;हैं पर क्या आप यह जानते है उसी पान में कुछ चीजों के मिलने पर वह उतने ही हानिकारक हो सकते हैं इतने हानिकारक की यह जानलेवा बीमारी कैंसर को भी न्योता देते हैं अगर आप पान खाते &amp;nbsp;हुए इन कुछ बातों का ध्यान रखते हैं तो आप कैंसर जैसी भयानक बीमारी से बच सकते है&amp;nbsp;
पान का पत्ता कैसे बन जाता है जानलेवा&amp;nbsp;
आप जान लें की लाभकारी पान का पत्ता कैसे बन जाता है जान का दुश्मन, अगर आप सिर्फ पान का पत्ता चबाते हैं तो यह आपके स्वास्थ को कोई हानि नहीं पहुंचाता पर जब इसमें &amp;nbsp;तंबाकू ,सुपारी, गुटका, चुना व तंबाखू वाले मसले मिलते हैं तो यह स्वस्थ के लिए बेहद हानी कारक बन जाते हैं, तंबाखू को मुह के कैंसर का सबसे बड़ा कारण माना जाता है वही साथ ही सुपारी गुटका चुना आदि मिलने से यह खतरा और बढ़ जाता है
कैसे करते हैं यह शरीर पर वार&amp;nbsp;
तंबाकू के पोधे में निकोटिन पाया जाता है. जो बहुत ही जल्दी दिमाग पर असर डालता है जिससे लत बहुत जल्दी लगती है, वही &amp;nbsp;चुना मुंह &amp;nbsp;में घुल कर मुह के अंदर घाव बनाता है. जिससे की तंबाकू सीधा रक्त में जा मिलता है यह धीरे धीरे &amp;nbsp;शरीर में मिल &amp;nbsp;कर उसे खोखला करना शुरू &amp;nbsp;कर देते हैं. निकोटिन दिमाग पर 10 सेकेंड्स में असर करने लगता है व डोपामाइन&#039; &amp;nbsp;नाम का न्यूरोट्रांसमीटर रिलीज करता है, जिससे कुछ पल के लिए खुशी, संतुष्टि और आराम का अहसास होता है. इसका असर बहुत जल्दी खत्म होता है तब दिमाग फिर से नशे की मांग करने लगता है जिसे तलब या क्रैविंग कहते हैं यह केंद्रीय तंत्रिका तंत्र &amp;nbsp;को कुछ देर के लिए सुन्न कर देता है, जिससे व्यक्ति को तनाव कम होने का झूठा भ्रम होता है.
आपको बता दें कि अगर सादा पान है तो इससे कैंसर होने का खतरा न के बराबर है, लेकिन इसमें मिलाया जाने वाला तंबाकू आपके शरीर को कैंसर दे सकता है.
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यह कैंसर में कैसे बदल जाता है
लगातार घाव होने और रसायनों के कारण मुंह के अंदर फाइब्रोसिस कड़ापन होने लगता है. यह खतरनाक रसायन मुंह की स्वस्थ कोशिकाओं के केंद्र में मौजूद डीएनए पर हमला करते हैं डीएनए &amp;nbsp;कोड &amp;nbsp;यह तय करता है की कौनसी &amp;nbsp;कोशिका को कब बढ़ाना है व कब मारना पर इनके सेवन से इसका कोड काम करना बंद कर देता है जिससे शरीर का नियंत्रण कोशिकाओं पर काम करना बंद कर देते हैं. डीएनए डैमेज होने के कारण बिगड़ी हुई कोशिकाएं मरती नहीं हैं, बल्कि बहुत तेजी से नई खराब कोशिकाएं बनाने लगती हैं.कुछ ही समय में यह कैंसर का रूप ले लेते हैं.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 04:30:03 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Spider Veins: आपके पापा के पैर में दिख रहे मकड़ी जैसे जाले, कितनी गंभीर है यह समस्या?</title>
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        <description><![CDATA[ Spider Veins On Legs Causes And Symptoms: उम्र बढ़ने के साथ माता-पिता के शरीर में कई तरह के बदलाव दिखाई देने लगते हैं. अगर आपके पापा के पैरों पर अचानक लाल, नीली या बैंगनी रंग की बेहद पतली नसें दिखाई देने लगी हैं, जो देखने में मकड़ी के जाले या पेड़ की शाखाओं जैसी लगती हैं, तो इन्हें नजरअंदाज न करें. मेडिकल भाषा में इस स्थिति को स्पाइडर वेन्स या टेलैंजिएक्टेसिया कहा जाता है. &amp;nbsp;आमतौर पर स्पाइडर वेन्स अपने आप में खतरनाक नहीं होतीं, लेकिन कुछ मामलों में ये पैरों में ब्लड फ्लो से जुड़ी समस्या का शुरुआती संकेत हो सकती हैं.
क्या होती हैं स्पाइडर वेन्स?
हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली वेबसाइट clevelandclinic के अनुसार, स्पाइडर वेन्स त्वचा की सतह के ठीक नीचे मौजूद छोटी ब्लड वेसल्स के डैमेज होने के कारण दिखाई देती हैं. इनका रंग लाल, नीला या बैंगनी हो सकता है. ये अक्सर एक जगह पर कई पतली लाइनों के समूह में दिखाई देती हैं, जिसकी वजह से इनका आकार मकड़ी के जाले जैसा नजर आता है. नाम में &#039;वेन्स&#039; होने के बावजूद ये सामान्य नसें नहीं होतीं. ये शरीर की नसों और धमनियों से जुड़ी बेहद छोटी ब्लड वेसल्स होती हैं, जिनमें कैपिलरीज, वेन्यूल्स और आर्टिरियोल्स शामिल हैं. स्पाइडर वेन्स शरीर के अलग-अलग हिस्सों में हो सकती हैं, लेकिन पैरों, हाथों और चेहरे पर इनका दिखाई देना ज्यादा आम है.
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क्या पैरों पर मकड़ी जैसे जाले दिखना खतरनाक है?
अधिकतर मामलों में स्पाइडर वेन्स से सेहत को कोई गंभीर नुकसान नहीं होता. कई लोगों के लिए यह केवल त्वचा की बनावट या दिखावट से जुड़ी समस्या होती है. हालांकि, कुछ मामलों में स्पाइडर वेन्स क्रॉनिक वेनस इनसफिशिएंसी यानी सीवीआई का शुरुआती संकेत हो सकती हैं. इस स्थिति में पैरों की नसों को खून वापस हार्ट तक पहुंचाने में परेशानी होने लगती है. समय के साथ यह समस्या बढ़ने पर दूसरी परेशानियां भी पैदा हो सकती हैं. &amp;nbsp;इसलिए पैरों में अचानक स्पाइडर वेन्स दिखाई देने पर डॉक्टर को इसकी जानकारी देना बेहतर है, खासकर अगर इसके साथ दूसरे लक्षण भी महसूस हो रहे हों.
स्पाइडर वेन्स के साथ दिख सकते हैं ये लक्षण
सिर्फ स्पाइडर वेन्स होने पर आमतौर पर दर्द या दूसरे लक्षण महसूस नहीं होते. व्यक्ति को इनका पता अक्सर पैरों को देखने पर ही चलता है. लेकिन अगर स्पाइडर वेन्स के साथ वैरिकोज वेन्स या ब्लड फ्लो की दूसरी समस्या भी है तो लंबे समय तक खड़े रहने के बाद परेशानी बढ़ सकती है. ऐसे लोगों को पैरों में जलन, ऐंठन, खुजली और दर्द महसूस हो सकता है। पैर भारी या थके हुए लग सकते हैं. त्वचा के करीब मौजूद वैरिकोज वेन के फटने पर ब्लीडिंग भी हो सकती है. ऐसे लक्षण होने पर केवल दिखाई देने वाली स्पाइडर वेन्स का इलाज पर्याप्त नहीं होता. डॉक्टर इसके पीछे मौजूद ब्लड फ्लो की समस्या का इलाज कर सकते हैं.

आखिर क्यों बनने लगती हैं स्पाइडर वेन्स?
स्पाइडर वेन्स तब बनती हैं जब त्वचा के नीचे मौजूद छोटी ब्लड वेसल्स कमजोर होकर फैल जाती हैं. ऐसा क्यों होता है, इसकी सटीक वजह हर व्यक्ति में पता नहीं चलत. हालांकि, हार्मोन में बदलाव, कुछ जेनेटिक डिसऑर्डर, कनेक्टिव टिशू से जुड़ी बीमारियां और किसी तरह की चोट इसके कारणों में शामिल हो सकती हैं. कुछ लोगों में इसका खतरा ज्यादा होता है। लंबे समय तक एक ही जगह बैठे या खड़े रहना, परिवार में स्पाइडर या वैरिकोज वेन्स की हिस्ट्री होना और मोटापा इसका जोखिम बढ़ा सकता है. गर्भावस्था, हार्मोनल बर्थ कंट्रोल, मेनोपॉज के लिए हार्मोन थेरेपी, लंबे समय तक धूप में रहना और धूम्रपान भी जोखिम से जुड़े कारकों में शामिल हैं.

डॉक्टर को कब दिखाना चाहिए?
अगर आपके पापा के पैर पर केवल पतली स्पाइडर वेन्स दिखाई दे रही हैं और कोई दूसरी परेशानी नहीं है, तो आमतौर पर घबराने की जरूरत नहीं होती. लेकिन कुछ बदलावों पर तुरंत ध्यान देना जरूरी है. अगर दिखाई देने वाली रक्त वाहिका सूज जाए, उसका रंग बदल जाए या छूने पर वह गर्म और दर्दनाक महसूस हो तो डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए. ये ब्लड क्लॉट से जुड़े संकेत हो सकते हैं। इसी तरह पैरों की त्वचा पर घाव, रैश या रंग में बदलाव दिखाई देना, लगातार जलन, दर्द या ऐंठन होना भी मेडिकल जांच की जरूरत का संकेत हो सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 28 Jul 2026 00:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>Transmissible Cancer: मछलियों में फैला दुर्लभ कैंसर, वैज्ञानिकों की बढ़ी चिंता</title>
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        <description><![CDATA[ Lake Memphremagog Transmissible Cancer: कैंसर को आमतौर पर ऐसी बीमारी माना जाता है, जो किसी इंसान या जानवर के शरीर के अंदर ही विकसित होती है. शरीर की अपनी सेल्स जब अनकंट्रोल तरीके से बढ़ने लगती हैं, तब कैंसर की शुरुआत होती है. लेकिन साइंटिस्ट को एक ऐसा दुर्लभ कैंसर मिला है, जो केवल एक जीव के शरीर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि एक मछली से दूसरी मछली में फैल सकता है.नेचर जर्नल में प्रकाशित एक नई स्टडी में वैज्ञानिकों ने ब्राउन बुलहेड कैटफिश में इस तरह के कैंसर का पता लगाया है. ये मछलियां अमेरिका के वर्मोंट और कनाडा के क्यूबेक तक फैली लेक मेम्फ्रेमागॉग में पाई जाती हैं.
क्या है इन मछलियों में खास?
साइंटिस्ट के मुताबिक, इन मछलियों में पाया गया मेलानोमा हर मछली के शरीर में अलग-अलग विकसित नहीं हो रहा है. इसके बजाय कैंसर की सेल्स एक मछली से दूसरी मछली तक पहुंच रही हैं और वहां बढ़ रही हैं. इसे मछलियों में मिला पहला ज्ञात ट्रांसमिसिबल यानी फैलने वाला कैंसर माना जा रहा है. साथ ही यह पहली बार है, जब किसी मीठे पानी के इकोसिस्टम में इस तरह का कैंसर मिला है.
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कब होता है कैंसर?
आमतौर पर कैंसर तब होता है, जब किसी व्यक्ति या जानवर की स्वस्थ सेल्स में समय के साथ जेनेटिक बदलाव होने लगते हैं. इसके बाद सेल्स अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगती हैं. ये कैंसर सेल्स उसी शरीर में रहती हैं और शरीर के दूसरे हिस्सों तक फैल सकती हैं. लेकिन ट्रांसमिसिबल कैंसर इससे अलग है. इसमें कैंसर की जीवित सेल्स एक जीव के शरीर से निकलकर दूसरे जीव में प्रवेश कर जाती हैं और वहां बढ़ने लगती हैं. इस तरह कैंसर की एक ही सेल्स अलग-अलग जीवों के शरीर में जाकर लगभग किसी परजीवी की तरह जीवित रह सकती है.

इसकी पुष्टि करने के लिए साइंटिस्ट ने प्रभावित मछलियों के ट्यूमर और स्वस्थ टिश्यू के जीनोम का एनालिसिस किया. जांच में सामने आया कि अलग-अलग कैटफिश से लिए गए ट्यूमर जेनेटिक रूप से एक-दूसरे से काफी मिलते-जुलते थे. वहीं, वे उन मछलियों के स्वस्थ टिश्यू से अलग थे, जिनके शरीर में ट्यूमर मौजूद था. ट्यूमर में लाखों में से कई जेनेटिक वेरिएंट ऐसे मिले, जो अलग-अलग मछलियों के ट्यूमर में समान थे, लेकिन हेल्दी सेल्स में मौजूद नहीं थे. इससे साइंटफिक को मजबूत सबूत मिला कि ये ट्यूमर अलग-अलग पैदा होने के बजाय एक ही कैंसर सेल लाइन से निकले हैं.
साइंटिस्ट का कहना है कि ब्राउन बुलहेड मेलानोमा जानवरों में प्राकृतिक रूप से पाए गए ट्रांसमिसिबल कैंसर के दुर्लभ उदाहरणों में शामिल हो गया है. इससे पहले कुत्तों, तस्मानियन डेविल और समुद्र में रहने वाली शेलफिश की कुछ प्रजातियों में ऐसे कैंसर पाए जा चुके हैं.
दूसरे मछलियों तक कैसे पहुंच रहा कैंसर?
हालांकि, यह कैंसर एक मछली से दूसरी मछली तक कैसे पहुंच रहा है, इसका सटीक तरीका अभी पता नहीं चला है. साइंटिस्ट ने ब्राउन बुलहेड कैटफिश के व्यवहार को देखते हुए कुछ संभावनाएं बताई हैं. इनमें एक संभावना प्रजनन के मौसम से जुड़ी है. इस दौरान मछलियां बड़ी संख्या में एक जगह इकट्ठा होती हैं और एक-दूसरे के काफी करीब आती हैं. ऐसे में कैंसर की जीवित कोशिकाओं को एक मछली से दूसरी मछली तक पहुंचने का मौका मिल सकता है.

दूसरी संभावना पानी से जुड़ी है. मछलियों की त्वचा, गलफड़े और मुंह लगातार पानी के संपर्क में रहते हैं. ऐसे में अगर कैंसर सेल्स पानी में मौजूद हों, तो वे इन रास्तों से दूसरी मछली के शरीर में प्रवेश कर सकती हैं. ब्राउन बुलहेड झील की तलहटी के आसपास रहती हैं और इनके शरीर पर सुरक्षा देने वाले स्केल्स भी नहीं होते. वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर कैंसर कोशिकाएं झील के तल की मिट्टी में कुछ समय तक जीवित रहती हैं, तो वहां से गुजरने वाली मछलियां उनके संपर्क में आ सकती हैं. हालांकि, अभी ये केवल संभावनाएं हैं और स्टडी में इंफेक्शन का कोई निश्चित रास्ता साबित नहीं हुआ है.
क्या इंसानों में भी फैल सकता है कैंसर?
इस खोज के बाद लोगों के मन में यह सवाल भी उठ सकता है कि क्या यह कैंसर इंसानों में फैल सकता है. मौजूदा साइंटफिक जानकारी के अनुसार इसका कोई सबूत नहीं है. स्टडी केवल ब्राउन बुलहेड कैटफिश पर केंद्रित थी और रिसर्चर ने इंसानों में इसके फैलने का कोई खतरा नहीं बताया है. इंसानों का इम्यून सिस्टम आमतौर पर दूसरे व्यक्ति से आने वाली बाहरी कोशिकाओं को पहचानकर नष्ट कर देता है. यही कारण है कि ऑर्गन ट्रांसप्लांट के बाद मरीजों को इम्यून सिस्टम दबाने वाली दवाएं देनी पड़ती हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 28 Jul 2026 00:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>Childhood Obesity In India: बच्चों में बढ़ता मोटापा! जंक फूड एड्स पर लगेगी रोक, जानें ICMR का नया रोडमैप</title>
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        <description><![CDATA[ ICMR Roadmap For Childhood Obesity: भारत में बच्चों और किशोरों में बढ़ता मोटापा अब बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बनता जा रहा है. वर्ल्ड ओबेसिटी एटलस 2026 के मुताबिक, देश में करीब 4.1 करोड़ बच्चे पहले से ही ओवरवेट या मोटापे की समस्या से जूझ रहे हैं. मौजूदा स्थिति इसी तरह बनी रही तो 2030 तक दुनिया में बचपन के मोटापे के कुल मामलों में भारत की हिस्सेदारी 11 फीसदी से ज्यादा हो सकती है. इस बढ़ती समस्या को देखते हुए इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च ने बच्चों के खानपान और उनके आसपास के फूड एनवायरनमेंट को बेहतर बनाने के लिए एक रोडमैप पेश किया है.
इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रिशन की अगुवाई वाले &#039;लेट्स फिक्स आवर फूड&#039; कंसोर्टियम ने &#039;प्रायोरिटी पॉलिसी एक्शंस टू प्रमोट हेल्दियर डाइट्स एंड फूड एनवायरनमेंट्स फॉर चिल्ड्रन एंड एडोलसेंट्स इन इंडिया&#039;नाम से पॉलिसी डॉक्यूमेंट जारी किया है. इसे नीति आयोग के सदस्य डॉ. एम. श्रीनिवास ने लॉन्च किया. इसका उद्देश्य बच्चों और किशोरों में बढ़ रहे मोटापे के साथ खानपान से जुड़ी डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर जैसी गैर-संचारी बीमारियों के खतरे को कम करना है. करीब तीन साल के रिसर्च, अलग-अलग राज्यों में किए गए आकलन और विभिन्न पक्षों से मिले सुझावों के आधार पर इसमें कई अहम कदम सुझाए गए हैं.

जंक फूड के विज्ञापनों पर सख्ती
इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के रोडमैप में बच्चों और किशोरों को टारगेट करने वाले अनहेल्दी फूड के विज्ञापनों पर कड़े नियम बनाने की बात कही गई है. खासतौर पर ज्यादा फैट, नमक और चीनी वाले एचएफएसएस फूड की मार्केटिंग को लेकर स्वैच्छिक नियमों की जगह कानूनी प्रतिबंध लागू करने की सिफारिश की गई है. डिजिटल प्लेटफॉर्म, टेलीविजन और दूसरे माध्यमों पर ऐसे एडवरटाइजमेंट में भ्रामक हेल्थ क्लेम पर भी रोक लगाने की बात कही गई है. रिपोर्ट में अनहेल्दी फूड की आसान उपलब्धता, आक्रामक मार्केटिंग और पोषण से जुड़ी जानकारी की कमी को मोटापा बढ़ने के प्रमुख कारणों में शामिल किया गया है.
पैकेट के सामने साफ दिखे खाने में क्या है
पॉलिसी डॉक्यूमेंट में पैकेज्ड फूड के फ्रंट पर आसान और स्पष्ट न्यूट्रिशन लेबल लगाने की सिफारिश भी की गई है. इसका मकसद यह है कि माता-पिता और बच्चे किसी पैकेट को खरीदने से पहले आसानी से समझ सकें कि उसमें फैट, सोडियम या शुगर की मात्रा ज्यादा तो नहीं है. इस तरह के फ्रंट-ऑफ-पैक लेबल लोगों को खाने की चीजों के बीच बेहतर विकल्प चुनने में मदद कर सकते हैं. बच्चों को फूड लेबल समझाने के लिए डिजिटल लिटरेसी मॉड्यूल और इंटरैक्टिव ई-लर्निंग प्लेटफॉर्म पर भी जोर दिया गया है।. आईसीएमआर-एमआईएन की ओर से किशोरों के लिए कॉमिक बुक जैसे माध्यमों का इस्तेमाल भी किया जा रहा है, ताकि वे ज्यादा नमक और खराब फैट वाले खाद्य पदार्थों को पहचान सकें.

&amp;nbsp;स्कूलों के आसपास जंक फूड पर लगाम
रोडमैप में स्कूलों के फूड एनवायरनमेंट पर खास ध्यान दिया गया है. स्कूल कैंटीन और आसपास के फूड वेंडर्स को रेगुलेट करने की सिफारिश की गई है, ताकि बच्चों की जंक फूड तक आसान पहुंच कम की जा सके. इसके साथ ही फल और दूसरे पौष्टिक खाद्य पदार्थों को किफायती कीमत पर उपलब्ध कराने पर जोर दिया गया है. मौजूदा FSSAI नियम स्कूल परिसर और उसके गेट के 50 मीटर के दायरे में ज्यादा सैचुरेटेड फैट, ट्रांस फैट, एडेड शुगर और सोडियम वाले खाद्य पदार्थों की बिक्री और विज्ञापन पर रोक लगाते हैं. नए दस्तावेज में इन नियमों को सख्ती से लागू करने, नियमित निरीक्षण और बेहतर निगरानी की जरूरत बताई गई है.
उत्तर प्रदेश के निजी स्कूलों में किए गए एक पायलट असेसमेंट में सामने आया कि कई स्कूल कैंटीन में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड स्नैक्स और शुगर वाले ड्रिंक्स आसानी से उपलब्ध थे. वहीं, पोषण से जुड़ी सेवाएं सीमित थीं और मौजूदा नीतियों का पालन भी कमजोर पाया गया. स्कूलों में स्थिति पर नजर रखने के लिए &#039;न्यूट्रिशन एनवायरनमेंट असेसमेंट टूलकिट फॉर स्कूल्स&#039; भी तैयार किया गया है. इसकी मदद से स्कूल अपने फूड एनवायरनमेंट का आकलन कर सकते हैं और कैंटीन में हेल्दी विकल्प बढ़ाने की दिशा में कदम उठा सकते हैं.
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&amp;nbsp;जंक फूड पर लग सकता है हेल्थ टैक्स
आईसीएमआर के रोडमैप में ज्यादा फैट, नमक और चीनी वाले खाद्य पदार्थों के साथ शुगर-स्वीटेंड बेवरेज पर हेल्थ टैक्स लगाने का सुझाव भी दिया गया है. इसके पीछे मकसद ऐसे खाद्य पदार्थों की खपत को कम करना है. इसके साथ ऐसी नीतियां बनाने पर जोर दिया गया है, जिनसे पौष्टिक और हेल्दी फूड लोगों के लिए ज्यादा किफायती हो सके. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत में बीमारी के कुल बोझ में अनहेल्दी डाइट की हिस्सेदारी 56.4 फीसदी होने का अनुमान है. ऐसे में बच्चों की खाने की आदतों में शुरुआती उम्र से बदलाव को जरूरी माना गया है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 28 Jul 2026 00:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>Flu Prevention be Vaccine: फ्लू को हल्के में न लें, हर साल लगवाएं वैक्सीन</title>
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        <description><![CDATA[ Flu Prevention be Vaccine: फ्लू को हल्के में न लें, हर साल लगवाएं वैक्सीन ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 28 Jul 2026 00:30:05 +0530</pubDate>
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        <title>Egg Freezing VS IVF Treatment: मां बनने की प्लानिंग? Egg Freezing या IVF... क्या चुनें</title>
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        <description><![CDATA[ Egg Freezing VS IVF Treatment: मातृत्व को लेकर महिलाओं की सोच अब पहले से बहुत अलग हो चुकी है. पहले जहां सिर्फ यह चर्चा होती थी कि बच्चा कब प्लान किया जाए, वहीं आज ज्यादा महिलाएं अपनी प्रजनन क्षमता को भविष्य के लिए सुरक्षित रखने पर ध्यान दे रही हैं. लेकिन इसी दौरान एक सवाल अक्सर सामने आता है, क्या एग फ्रीजिंग और IVF एक ही प्रक्रिया है? डॉक्टरों के अनुसार इसका जवाब साफ है, दोनों में बुनियादी अंतर है, और यह जानना हर महिला के लिए जरूरी है.
एग फ्रीजिंग क्यों है भविष्य को सुरक्षित रखने का जरिया
IVF विशेषज्ञ के अनुसार, एग फ्रीजिंग उन महिलाओं के लिए एक निवारक विकल्प है, जो अभी मां नहीं बनना चाहतीं, लेकिन अपनी भविष्य की प्रजनन क्षमता को पूरी तरह अनिश्चितता पर नहीं छोड़ना चाहतीं हैं. इस प्रक्रिया में करीब 10 से 12 दिनों तक हार्मोनल इंजेक्शन दिए जाते हैं, जिससे ओवरी में कई परिपक्व एग्स तैयार होते हैं. इन एग्स को निकालकर बिना निषेचित किए फ्रीज कर दिया जाता है, ताकि भविष्य में जरूरत पड़ने पर इन्हें पिघलाकर IVF प्रक्रिया में इस्तेमाल किया जा सके. उम्र बढ़ने के साथ एग्स की संख्या और गुणवत्ता दोनों घटती हैं, इसलिए कम उम्र में एग्स फ्रीज करना ज्यादा फायदेमंद माना जाता है, विशेष रूप से उन महिलाओं के लिए जो कीमोथेरेपी जैसे इलाज से गुजर रही हों.
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क्या एग फ्रीजिंग बच्चे की गारंटी देती है? डॉक्टरों ने साफ किया भ्रम
फर्टिलिटी एक्सपर्ट के अनुसार, एग फ्रीजिंग केवल प्रजनन क्षमता की संभावना सुरक्षित रखती है, यह भविष्य में गर्भधारण की गारंटी नहीं देती. एग्स के सफलतापूर्वक फ्रीज होने के बाद भी गर्भधारण कई कारकों पर निर्भर करता है, जैसे एग्स का पिघलने के बाद सुरक्षित रहना, निषेचन का सफल होना और महिला का समग्र स्वास्थ्य.
IVF का मकसद अलग, सीधे गर्भधारण में मदद
वहीं IVF यानी इन विट्रो फर्टिलाइजेशन मुख्य रूप से बांझपन का इलाज है. इसमें भी ओवरी को उत्तेजित कर एग्स निकाले जाते हैं, लेकिन इन्हें फ्रीज करने के बजाय प्रयोगशाला में स्पर्म के साथ निषेचित कर भ्रूण तैयार किया जाता है, जिसे बाद में गर्भाशय में प्रत्यारोपित किया जाता है. IVF विशेषज्ञ के अनुसार, IVF ब्लॉक्ड फैलोपियन ट्यूब, कम स्पर्म काउंट, ओव्यूलेशन संबंधी विकार और उम्र से जुड़ी प्रजनन समस्याओं में मदद कर सकता है.
उम्र क्यों बनी रहती है सबसे बड़ा फैक्टर
डॉ. डॉक्टर के मुताबिक, 30 साल के बाद प्रजनन क्षमता धीरे धीरे और 35 के बाद तेजी से घटने लगती है. डॉक्टरों की सलाह है कि 12 महीने की कोशिश के बाद भी गर्भधारण न हो, या महिला की उम्र 35 से अधिक हो तो सिर्फ 6 महीने बाद ही फर्टिलिटी विशेषज्ञ से सलाह ले लेनी चाहिए, ताकि सही समय पर सही निर्णय लिया जा सके.
दोनों में बेहतर कौन?
यहीं पर एक अहम बात समझनी जरूरी है, एग फ्रीजिंग और IVF एक दूसरे के प्रतिस्पर्धी विकल्प नहीं हैं, और इनमें से कोई एक स्वाभाविक रूप से &quot;बेहतर&quot; नहीं है. जो महिला अपने प्रजनन विकल्पों को भविष्य के लिए सुरक्षित रखना चाहती है, उसके लिए एग फ्रीजिंग सही हो सकता है, जबकि जो कपल बांझपन से जूझते हुए गर्भधारण की कोशिश कर रहे हैं, उनके लिए IVF सही रास्ता हो सकता है. डॉक्टरों के अनुसार सबसे जरूरी और आसान पहला कदम यही है कि इस विषय पर समय रहते बातचीत शुरू कर दी जाए, क्योंकि फर्टिलिटी के मामले में अपने विकल्पों की जानकारी होना भी उतना ही मायने रखता है, जितना उन्हें हासिल करना.
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        <pubDate>Mon, 27 Jul 2026 12:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Cervical Precancer Drug: सर्वाइकल प्री&amp;कैंसर की नई दवा जल्द! ICMR ने लिया बड़ा फैसला</title>
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        <description><![CDATA[ Cervical Precancer Drug: भारत में हर साल करीब 80 हजार महिलाएं सर्वाइकल कैंसर की चपेट में आती हैं, जो दुनिया भर के कुल मामलों का करीब एक तिहाई हिस्सा है. अब तक इसके प्री-कैंसर स्टेज के इलाज के लिए सर्जरी ही सबसे भरोसेमंद तरीका रहा है, लेकिन अब भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद यानी ICMR ने एक ऐसा फैसला लिया है, जो आने वाले समय में इस पूरी तस्वीर को बदल सकता है.
आखिर क्या है यह बड़ा फैसला, जिसने बढ़ाई उम्मीदें
21 जुलाई 2026 को पीआईबी दिल्ली की ओर से जारी बयान के मुताबिक, ICMR ने अपनी मेडिकल इनोवेशन पेटेंट मित्र पहल के तहत तीन स्वदेशी बायोमेडिकल टेक्नोलॉजी को प्रमुख भारतीय फार्मा और वैक्सीन कंपनियों को लाइसेंस दिया है. इन्हीं में से एक है SHetA2, जो एक नई एंटी HPV दवा है, इसे पुणे स्थित एमक्योर फार्मास्युटिकल्स को आगे विकसित करने के लिए सौंपा गया है. यह दवा खासतौर पर सर्वाइकल इंट्राएपिथेलियल नियोप्लासिया यानी CIN के इलाज के लिए बनाई गई है, यह वही प्री कैंसर स्थिति है जो समय रहते न पकड़ी जाए तो आगे चलकर सर्वाइकल कैंसर में बदल सकती है.
दो देशों के वैज्ञानिकों की साझा मेहनत का नतीजा है यह दवा
SHetA2 को ICMR की नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ कैंसर प्रिवेंशन एंड रिसर्च के डॉ. शौकत हुसैन और अमेरिका की ओक्लाहोमा यूनिवर्सिटी के स्टीफेंसन कैंसर सेंटर की डॉ. डोरिस एम. बेनब्रुक ने मिलकर विकसित किया है. इसकी सबसे बड़ी खासियत इसकी टारगेटेड अप्रोच है, यह खासतौर पर HPV से प्रभावित प्री कैंसर और कैंसर कोशिकाओं को ही चुन चुनकर खत्म करती है, जबकि आसपास की स्वस्थ कोशिकाओं को सुरक्षित रखती है. अगर यह दवा आगे चलकर क्लिनिकल ट्रायल्स में सफल साबित होती है, तो यह उन पहली टारगेटेड दवाओं में शामिल हो सकती है, जो बिना सर्जरी के प्री कैंसर स्थिति का इलाज कर सकेगी.
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ICMR प्रमुख ने बताया, क्यों है यह भारत के लिए अहम कदम
डिपार्टमेंट ऑफ हेल्थ रिसर्च के सचिव और ICMR के डायरेक्टर जनरल डॉ. राजीव बहल ने इस मौके पर कहा कि ICMR की प्रतिबद्धता है कि सरकारी फंडिंग से हुई रिसर्च आम मरीजों के लिए असरदार उत्पादों में तब्दील हो. उन्होंने बताया कि मेडिकल इनोवेशन पेटेंट मित्र जैसी पहल के जरिए रिसर्चर्स और इंडस्ट्री के बीच साझेदारी को मजबूत किया जा रहा है, ताकि वैज्ञानिक खोज को व्यावसायिक उत्पाद तक पहुंचाने का रास्ता आसान बन सके.
अभी क्लिनिकल प्रूफ आना बाकी, लेकिन उम्मीदें बड़ी
हालांकि लाइसेंसिंग मिलने का मतलब यह नहीं कि यह दवा तुरंत मरीजों के इलाज में इस्तेमाल होने लगेगी. बाजार में आने से पहले इसे क्लिनिकल ट्रायल्स के कई चरणों से गुजरना होगा, ताकि इसकी सुरक्षा और असर वैज्ञानिक रूप से साबित हो सके. फिर भी, अगर SHetA2 सफल रहती है, तो यह न सिर्फ सर्वाइकल कैंसर के खिलाफ जंग में एक बड़ा हथियार बनेगी, बल्कि भारत में स्वदेशी दवा अनुसंधान को भी नई मजबूती देगी.
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        <pubDate>Mon, 27 Jul 2026 12:30:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Type 2 Diabetes Dengue Risk : टाइप&amp;2 डायबिटीज वाले सावधान, डेंगू का खतरा ज्यादा</title>
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        <description><![CDATA[ Type 2 Diabetes Dengue Risk : टाइप-2 डायबिटीज वाले सावधान, डेंगू का खतरा ज्यादा ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 27 Jul 2026 12:30:04 +0530</pubDate>
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        <title>Mustard Oil vs Olive Oil Benefits: सरसों या जैतून... हार्ट पेशेंट के लिए कौन सा तेल सही?</title>
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        <description><![CDATA[ Mustard Oil vs Olive Oil Benefits : घर में खाना बनाने के लिए अलग-अलग तरह के तेल का इस्तेमाल किया जाता है. कहीं सरसों के तेल को सबसे अच्छा माना जाता है तो कहीं जैतून (ऑलिव) के तेल को दिल के लिए बेहतर बताया जाता है. एक ओर सरसों का तेल सालों से भारतीय रसोई का हिस्सा रहा है, वहीं दूसरी ओर ऑलिव ऑयल को मेडिटेरेनियन डाइट की वजह से दुनियाभर में लोकप्रिय माना जाता है. ऐसे में अक्सर लोगों के मन में सवाल उठता है कि आखिर हार्ट की सेहत के लिए कौन-सा तेल ज्यादा फायदेमंद है. तो आइए आज हम आपको बताते हैं कि सरसों का तेल या फिर जैतून का तेल हार्ट पेशेंट के लिए किसमें खाना बनाना फायदेमंद है.&amp;nbsp;
क्यों जरूरी है सही तेल का चुनाव?
पहले माना जाता था कि हर तरह का फैट शरीर के लिए नुकसानदायक होता है, लेकिन अब पोषण विशेषज्ञों की राय बदल चुकी है. अब ज्यादा ध्यान इस बात पर दिया जाता है कि आप किस तरह का फैट खा रहे हैं. &amp;nbsp;बार-बार गर्म किया गया तेल, ट्रांस फैट और जरूरत से ज्यादा सैचुरेटेड फैट दिल के लिए नुकसानदायक माने जाते हैं. वहीं मोनोअनसैचुरेटेड फैट और ओमेगा-3 जैसे &amp;nbsp;अनसैचुरेटेड फैट कोलेस्ट्रॉल को बेहतर रखने और ब्लड वेसल्स में सूजन कम करने में मदद कर सकते हैं. इसी वजह से हार्ट हेल्थ की चर्चा में सरसों का तेल और ऑलिव ऑयल दोनों का नाम आता है.&amp;nbsp;
सरसों या जैतून का तेल हार्ट पेशेंट के लिए किसमें खाना बनाना फायदेमंद है?
हार्ट पेशेंट के लिए ऑलिव ऑयल में खाना बनाना फायदेमंद माना जाता है, खासकर एक्स्ट्रा वर्जिन ऑलिव ऑयल, मोनोअनसैचुरेटेड फैट और ओलिक एसिड से भरपूर होता है. इसके अलावा इसमें पॉलीफेनॉल नाम के नेचुरल एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं. &amp;nbsp;ये एंटीऑक्सीडेंट ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और सूजन को कम करने में मदद कर सकते हैं. यही दोनों कारण धमनियों को नुकसान पहुंचाने और हार्ट डिजीज का खतरा बढ़ाने से जुड़े माने जाते हैं.
अध्ययनों में यह भी पाया गया है कि एक्स्ट्रा वर्जिन ऑलिव ऑयल एचडीएल (अच्छे कोलेस्ट्रॉल) को बेहतर बनाने और एलडीएल के ऑक्सीकरण को कम करने में मदद कर सकता है. एलडीएल का ऑक्सीकरण धमनियों में प्लाक बनने की प्रक्रिया से जुड़ा माना जाता है. इसके अलावा, NIH में प्रकाशित एक बड़े मेटा-विश्लेषण में पाया गया कि ऑलिव ऑयल का ज्यादा सेवन करने वाले लोगों में हार्ट डिजीज का खतरा कम देखा गया.&amp;nbsp;
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क्या हर तरह की कुकिंग के लिए सही है ऑलिव ऑयल?
ऑलिव ऑयल के फायदे अपनी जगह हैं, लेकिन भारतीय रसोई में खाना बनाने का तरीका अलग होता है. हमारे यहां अक्सर डीप फ्राई, तड़का या तेज आंच पर लंबे समय तक खाना पकाया जाता है. ऐसी स्थिति में एक्स्ट्रा वर्जिन ऑलिव ऑयल में मौजूद कुछ फायदेमंद तत्व तेज गर्मी के कारण कम हो सकते हैं. हालांकि रिफाइंड ऑलिव ऑयल ज्यादा तापमान सहन कर सकता है, लेकिन उसमें एंटीऑक्सीडेंट का फायदा कम हो जाता है. इसके अलावा टेस्ट और पारंपरिक खानपान के लिए जरूर होता है. कई भारतीय डिश में ऑलिव ऑयल का टेस्ट लोगों को स्वाभाविक नहीं लगता है.&amp;nbsp;
सरसों का तेल क्यों है खास?
सरसों का तेल लंबे समय से भारतीय रसोई का हिस्सा रहा है. इसमें मोनोअनसैचुरेटेड फैट के साथ अल्फा-लिनोलेनिक एसिड (ALA) नाम का ओमेगा-3 फैटी एसिड भी पाया जाता है. ओमेगा-3 फैट शरीर में सूजन कम करने में मदद कर सकता है और यही कारण है कि इसे दिल की सेहत के लिए जरूरी माना जाता है. भारतीय शोधों में भी सरसों के तेल के संभावित हार्ट संबंधी फायदों पर अध्ययन किया गया है. सरसों के पारंपरिक तेल में एरूसिक एसिड भी पाया जाता है. विशेषज्ञों के अनुसार, सरसों के तेल का इस्तेमाल संतुलित मात्रा में किया जाना चाहिए.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 26 Jul 2026 20:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>हार्ट अटैक जितना तेज हो सकता है पीरियड्स का दर्द</title>
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        <description><![CDATA[ पीरियड्स के दौरान दर्द होना आम बात है. ज्यादातर महिलाओं को इस समय हल्का दर्द या ऐंठन महसूस होती है. हालांकि, कुछ महिलाओं का दर्द इतना ज्यादा होता है कि उनके लिए उठना-बैठना या रोजमर्रा के काम करना भी मुश्किल हो जाता है. कई बार तो यह दर्द इतना ज्यादा बढ़ जाता है कि कुछ मामलों में&amp;nbsp; पीरियड्स का दर्द हार्ट अटैक के दर्द जितना गंभीर हो सकता है. हाल ही में एनेस्थीसियोलॉजी और इंटरवेंशनल पेन मेडिसिन के विशेषज्ञ डॉ. कुनाल सूद ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर एक शेयर किया और इसके बारे में विस्तार से बताया है.&amp;nbsp;
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डॉक्टर ने क्या बताया?
डॉ. कुनाल सूद ने कहा कि यह बात पूरी तरह गलत नहीं है. उन्होंने बताया कि यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन (UCL) में हुई एक रिसर्च में पाया गया कि कुछ महिलाओं को पीरियड्स के दौरान पेट में होने वाली तेज ऐंठन का दर्द, दर्द की तीव्रता के मामले में हार्ट अटैक जितना महसूस हो सकता है. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि पीरियड्स और हार्ट अटैक एक जैसी बीमारी हैं. तुलना सिर्फ दर्द की गंभीरता को लेकर की जा रही है.
किन महिलाओं में ज्यादा हो सकता है दर्द?
डॉक्टर के मुताबिक, ऐसा दर्द खासकर सेकेंडरी डिसमेनोरिया (Secondary Dysmenorrhea) में देखने को मिल सकता है. इसका एक बड़ा कारण एंडोमेट्रियोसिस (Endometriosis) नाम की बीमारी है, जिसमें महिलाओं को पीरियड्स के दौरान बहुत ही तेज और गंभीर दर्द होता है.&amp;nbsp;
क्या है एंडोमेट्रियोसिस?
एंडोमेट्रियोसिस एक ऐसी बीमारी है जिसमें गर्भाशय की अंदरूनी परत जैसी कोशिकाएं गर्भाशय के बाहर बढ़ने लगती हैं. यह बीमारी अंडाशय (Ovaries), फैलोपियन ट्यूब (Fallopian Tubes) और पेल्विक हिस्से को प्रभावित कर सकती है. कुछ मामलों में यह आंत और मूत्राशय तक भी पहुंच सकती है.इस बीमारी की वजह से महिलाओं को पीरियड्स के दौरान बहुत ज्यादा दर्द, ज्यादा ब्लीडिंग, पेट के निचले हिस्से में लगातार दर्द और गर्भधारण करने में परेशानी हो सकती है.
डॉक्टर ने क्या सलाह दी?
डॉ. कुनाल सूद का कहना है कि महिलाओं के पीरियड्स के दर्द को हल्के में नहीं लेना चाहिए. अगर दर्द बहुत ज्यादा हो और हर महीने रोजमर्रा के काम प्रभावित होने लगें, तो डॉक्टर से सलाह जरूर लेनी चाहिए. उन्होंने इस विषय पर और रिसर्च करने के साथ-साथ बेहतर इलाज की जरूरत पर भी जोर दिया.
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        <pubDate>Sun, 26 Jul 2026 20:30:05 +0530</pubDate>
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        <title>Abhijeet Dipke Typhoid : अभिजीत दिपके को टाइफाइड, कब खतरनाक हो जाती है यह बीमारी?</title>
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        <description><![CDATA[ Abhijeet Dipke Typhoid : बारिश के मौसम में टाइफाइड के मामले तेजी से बढ़ने लगते हैं. यह एक ऐसी बीमारी है, जिसे अक्सर लोग सामान्य बुखार समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन समय पर इलाज न मिलने पर यह गंभीर रूप ले सकती है. हाल ही में कॉकरोच जनता पार्टी के फाउंडर और अध्यक्ष अभिजीत दिपके ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो शेयर कर बताया कि उन्हें टाइफाइड हो गया है और उनका इलाज चल रहा है.
उन्होंने कहा कि उनकी ब्लड रिपोर्ट में टाइफाइड की पुष्टि हुई है और उन्हें रोज सुबह-शाम IV (इंट्रावेनस) के जरिए इलाज दिया जा रहा है. ऐसे में आइए जानते हैं कि टाइफाइड कैसे फैलता है, इसके लक्षण क्या हैं और कब यह बीमारी खतरनाक हो जाती है.
टाइफाइड क्या है और कैसे फैलता है?
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, टाइफाइड एक गंभीर बैक्टीरियल संक्रमण है, जो साल्मोनेला टाइफी (Salmonella Typhi) बैक्टीरिया के कारण होता है. यह बैक्टीरिया दूषित खाना और गंदा पानी पीने से शरीर में पहुंचता है. शरीर में प्रवेश करने के बाद यह तेजी से खून में फैलने लगता है और संक्रमण बढ़ाता है. हर साल दुनिया भर में करीब 1.1 करोड़ से 2.1 करोड़ लोग टाइफाइड से संक्रमित होते हैं और लगभग 2 लाख लोगों की मौत इस बीमारी के कारण हो जाती है. वहीं पैराटाइफाइड के करीब 50 लाख मामले भी हर साल सामने आते हैं, जिनमें बड़ी संख्या दक्षिण एशिया की होती है.
टाइफाइड के लक्षण क्या हैं?
टाइफाइड के शुरुआती लक्षण आमतौर पर बैक्टीरिया के संपर्क में आने के 10 से 14 दिन बाद दिखाई देने लगते हैं. इस बीमारी में मरीज को धीरे-धीरे तेज बुखार आने लगता है. इसके अलावा सिरदर्द, थकान, कमजोरी, पेट दर्द, जी मिचलाना, उल्टी, भूख कम लगना, कब्ज या डायरिया, मांसपेशियों में दर्द और शरीर पर रैशेज भी हो सकते हैं. अगर इलाज न कराया जाए, तो यह बीमारी 3 से 4 हफ्ते या उससे ज्यादा समय तक बनी रह सकती है.
कब खतरनाक हो जाती है यह बीमारी?
अगर समय पर इलाज न मिले, तो टाइफाइड गंभीर रूप ले सकती है. विशेषज्ञों के अनुसार, बीमारी के अलग-अलग स्टेज में मरीज को तेज बुखार, पेट फूलना, तेजी से वजन घटना, डिहाइड्रेशन, डिलीरियम, आंतों में गंभीर चोट, अंदरूनी ब्लीडिंग, दिमाग में सूजन, किडनी फेल होना, निमोनिया, पैंक्रियाज में सूजन और मेनिन्जाइटिस जैसी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं. इसलिए लगातार तेज बुखार या अन्य गंभीर लक्षण दिखने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए.
टाइफाइड में IV क्यों लगाया जाता है?
टाइफाइड के गंभीर मामलों में मरीज के शरीर में पानी की कमी हो सकती है. ऐसे में IV के जरिए शरीर में तरल पदार्थ और जरूरी दवाएं दी जाती हैं. IV से दवाएं सीधे ब्लड स्ट्रीम में पहुंचती हैं, इसलिए उनका असर जल्दी होता है. इसी वजह से कई मरीजों के इलाज में IV थेरेपी का इस्तेमाल किया जाता है.
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टाइफाइड का पता कैसे लगाया जाता है?
अगर किसी व्यक्ति में टाइफाइड जैसे लक्षण दिखाई दें, तो डॉक्टर जांच की सलाह देते हैं. इसके लिए ब्लड टेस्ट, ब्लड कल्चर, स्टूल और यूरिन टेस्ट, विडाल टेस्ट और टाइफी डॉट टेस्ट जैसे परीक्षण किए जा सकते हैं. कुछ गंभीर मामलों में, जब एंटीबायोटिक दवाओं के बाद भी सुधार नहीं होता, तब बोन मैरो कल्चर कराने की सलाह भी दी जा सकती है.
टाइफाइड से बचाव कैसे करें?
टाइफाइड से बचने के लिए साफ और सुरक्षित पानी पीना, ताजा और अच्छी तरह पका हुआ खाना, खाना खाने और बनाने से पहले साबुन से हाथ धोना, सड़क किनारे खुले में मिलने वाला खाना खाने से बचना और घर के आसपास साफ-सफाई बनाए रखना जरूरी है. जिन इलाकों में टाइफाइड के मामले ज्यादा होते हैं, वहां जाने से पहले डॉक्टर की सलाह पर टाइफाइड वैक्सीन भी लगवाई जा सकती है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 26 Jul 2026 20:30:03 +0530</pubDate>
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        <title>Sonam Wangchuk News: 26 दिन के अनशन के बाद अचानक से भरपेट खाना खा लें तो क्या होगा, बॉडी कैसे करेगी रिएक्ट?</title>
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        <description><![CDATA[ Sonam Wangchuk Ends Hunger Strike: सोनम वांगचुक ने 26 दिनों की भूख हड़ताल के बाद अपना अनशन खत्म कर दिया. उन्होंने बताया कि सरकार की ओर से लिखित आश्वासन मिलने के बाद उन्होंने यह फैसला लिया. सरकार ने आश्वासन दिया है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं होगी. 26 दिन का अनशन खत्म करने के बाद सोनम वांगचुक को लेकर एक बड़ा सवाल चर्चा में है कि आखिर लंबे समय तक भूखे रहने के बाद शरीर कैसे प्रतिक्रिया करता है. तो आइए आज हम आपको बताते हैं कि 26 दिन के अनशन के बाद अचानक से भरपेट खाना खा लें तो क्या होगा और बॉडी कैसे रिएक्ट करेगी?&amp;nbsp;
अनशन के बाद अचानक से भरपेट खाना खा लें तो क्या होगा?
लगातार कई दिनों तक भूखे रहने के बाद शरीर सामान्य तरीके से काम नहीं करता. ऐसे समय में अगर कोई व्यक्ति अचानक भरपेट खाना खा ले तो यह शरीर के लिए फायदेमंद होने की जगह नुकसानदायक भी साबित हो सकता है. लंबे समय तक खाना न मिलने पर शरीर खुद को बचाने के लिए अपनी एनर्जी बचाने लगता है और धीरे-धीरे उसका मेटाबॉलिज्म भी बदल जाता है. ऐसे में जब अचानक दोबारा ज्यादा मात्रा में खाना मिलता है, तो शरीर को उसे संभालने में दिक्कत हो सकती है. यही वजह है कि डॉक्टर लंबे उपवास या भूख हड़ताल के बाद खाने की शुरुआत हमेशा सावधानी से करने की सलाह देते हैं.
लंबे समय तक भूखे रहने पर शरीर में क्या होता है?
जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक भरपेट खाना नहीं खाता, तो शरीर धीरे-धीरे स्टार्वेशन मोड यानी भूख से बचाव की स्थिति में चला जाता है. इस दौरान शरीर पहले खाने से मिलने वाली एनर्जी का इस्तेमाल करता है, लेकिन खाना न मिलने पर फैट और फिर शरीर में मौजूद प्रोटीन को एनर्जी के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर देता है. इस दौरान शरीर में कार्बोहाइड्रेट की उपलब्धता कम हो जाती है और इंसुलिन का स्तर भी घटने लगता है. साथ ही शरीर में कई जरूरी विटामिन और इलेक्ट्रोलाइट्स जैसे फास्फोरस, पोटेशियम, मैग्नीशियम, कैल्शियम और थायमिन की मात्रा भी कम होने लगती है.
बॉडी कैसे रिएक्ट करती है?
अगर लंबे समय तक भूखे रहने के बाद कोई व्यक्ति अचानक ज्यादा मात्रा में खाना खा लेता है, तो शरीर का मेटाबॉलिज्म तेजी से बदल जाता है. खाना मिलने पर शरीर फिर से कार्बोहाइड्रेट को एनर्जी में बदलना शुरू करता है और इंसुलिन का स्तर तेजी से बढ़ जाता है. इंसुलिन बढ़ने के कारण फास्फोरस, पोटेशियम और मैग्नीशियम जैसे इलेक्ट्रोलाइट्स खून से निकलकर तेजी से शरीर की कोशिकाओं के अंदर चले जाते हैं. इससे खून में इन जरूरी तत्वों की कमी हो सकती है. यही स्थिति रीफीडिंग सिंड्रोम (Refeeding Syndrome) कहलाती है, जो गंभीर मामलों में जानलेवा भी हो सकती है.
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रीफीडिंग सिंड्रोम क्या है?
रीफीडिंग सिंड्रोम ऐसी स्थिति है, जो लंबे समय तक भूखे रहने वाले व्यक्ति में दोबारा खाना शुरू होने पर हो सकती है. इसमें शरीर के इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन तेजी से बिगड़ जाता है और कई अंग प्रभावित हो सकते हैं. इसका असर दिल, फेफड़ों, किडनी, मांसपेशियों, पाचन तंत्र, ब्लड और तंत्रिका तंत्र पर पड़ सकता है. अगर समय रहते इलाज न मिले, तो यह स्थिति जानलेवा भी बन सकती है.
किन लोगों में इसका खतरा ज्यादा होता है?
रीफीडिंग सिंड्रोम का खतरा उन लोगों में सबसे ज्यादा होता है, जो लंबे समय तक भूखे रहे हों या कुपोषण का शिकार रहे हों. इसके अलावा बहुत सख्त डाइट करने वाले, लंबे समय तक फास्ट रखने वाले, एनोरेक्सिया जैसे ईटिंग डिसऑर्डर, कैंसर, अनियंत्रित डायबिटीज, सीलिएक डिजीज या इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज से पीड़ित मरीज, लंबे समय से शराब का सेवन करने वाले, निगलने में दिक्कत वाले लोग, कीमोथेरेपी या रेडिएशन थेरेपी ले रहे मरीज और लंबे समय तक IV के जरिए पोषण पाने वाले लोगों में भी इसका जोखिम ज्यादा माना जाता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 25 Jul 2026 00:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>Waist Size And Health: वजन नहीं, कमर का साइज खोलेगा सेहत का राज! मोटापा मापने में BMI से ज्यादा असरदार फॉर्मूला</title>
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        <description><![CDATA[ Why BMI Is Not Enough To Measure Obesity: सालों से मोटापा मापने के लिए बॉडी मास इंडेक्स का इस्तेमाल किया जाता रहा है. डॉक्टर किसी व्यक्ति की लंबाई और वजन के आधार पर यह तय करते हैं कि वह सामान्य वजन, अधिक वजन या मोटापे की कैटेगरी में आता है या नहीं. हालांकि अब स्वास्थ्य एक्सपर्ट का मानना है कि सिर्फ बॉडी मास इंडेक्स के आधार पर किसी व्यक्ति के स्वास्थ्य का सही आकलन करना पर्याप्त नहीं है. कई ऐसे लोग होते हैं जिनका बॉडी मास इंडेक्स सामान्य होता है, लेकिन पेट के आसपास जमा अतिरिक्त चर्बी उन्हें डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और दिल की बीमारियों के खतरे में डाल सकती है.
किस नए नियम को लागू किया गया?
इसी को देखते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने स्कूलों में बच्चों की जांच के दौरान कमर और लंबाई के अनुपात यानी वेस्ट-टू-हाइट रेशियो को भी शामिल करने की सिफारिश की है. विशेषज्ञों का कहना है कि यह तरीका शरीर में खासकर पेट के आसपास जमा चर्बी का बेहतर अंदाजा देता है, जो भविष्य में होने वाली कई गंभीर बीमारियों का संकेत हो सकती है.
बॉडी मास इंडेक्स से कैसे पता चलता है?
बॉडी मास इंडेक्स की गणना व्यक्ति के वजन को उसकी लंबाई के वर्ग से भाग देकर की जाती है. यह तरीका आसान और सस्ता होने की वजह से दुनिया भर में इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी कमी यह है कि यह मांसपेशियों और चर्बी के बीच अंतर नहीं बता पाता. उदाहरण के लिए, किसी खिलाड़ी की मांसपेशियां ज्यादा होने के कारण उसका बॉडी मास इंडेक्स अधिक आ सकता है, जबकि उसके शरीर में अतिरिक्त चर्बी नहीं होती. दूसरी ओर, सामान्यबॉडी मास इंडेक्स वाला व्यक्ति भी पेट पर अधिक फैट जमा होने के कारण गंभीर स्वास्थ्य जोखिम झेल सकता है.
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किस बात को लेकर सबसे ज्यादा चिंता
एक्सपर्ट के अनुसार सबसे ज्यादा चिंता पेट के आसपास जमा चर्बी की होती है. यह चर्बी लीवर, पैंक्रियास और आंतों जैसे महत्वपूर्ण अंगों के आसपास जमा होकर शरीर में सूजन बढ़ा सकती है और इंसुलिन रेजिस्टेंस, हाई ब्लड प्रेशर, हाई कोलेस्ट्रॉल, टाइप-2 डायबिटीज, हृदय रोग और स्ट्रोक जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ा सकती है.
कैसे निकलता है इसकै रेशियो?
वेस्ट-टू-हाइट रेशियो निकालना भी बेहद आसान है. इसके लिए कमर की माप को लंबाई से भाग दिया जाता है और दोनों माप एक ही इकाई, जैसे सेंटीमीटर में होनी चाहिए. विशेषज्ञों के मुताबिक किसी भी वयस्क की कमर उसकी कुल लंबाई के आधे से कम होनी चाहिए. उदाहरण के तौर पर अगर किसी व्यक्ति की लंबाई 170 सेंटीमीटर है तो उसकी कमर 85 सेंटीमीटर से कम रहना बेहतर माना जाता है.
हालांकि एक्सपर्ट यह भी स्पष्ट करते हैं कि बॉडी मास इंडेक्स को पूरी तरह छोड़ने की जरूरत नहीं है. बड़े स्तर पर लोगों की स्क्रीनिंग और मोटापे का आकलन करने में इसकी उपयोगिता आज भी बनी हुई है. लेकिन अगर बॉडी मास इंडेक्स के साथ वेस्ट-टू-हाइट रेशियो को भी शामिल किया जाए तो व्यक्ति के स्वास्थ्य की ज्यादा सटीक तस्वीर सामने आ सकती है.
इन चीजों पर ध्यान देना भी जरूरी
डॉक्टरों का कहना है कि किसी भी व्यक्ति के स्वास्थ्य का सही आकलन केवल वजन या कमर की माप से नहीं किया जा सकता. इसके साथ ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर, कोलेस्ट्रॉल, खानपान, शारीरिक गतिविधि, पारिवारिक बीमारी का हिस्ट्री और लाइफस्टाइल जैसी बातों पर भी ध्यान देना जरूरी है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 25 Jul 2026 00:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>Japanese Encephalitis: डेंगू&amp;मलेरिया से भी खतरनाक है यह बीमारी! मच्छर के काटते ही सूज जाता है दिमाग</title>
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        <description><![CDATA[ Japanese Encephalitis Treatment And Diagnosis: मानसून आते ही मौसम सुहाना हो जाता है, लेकिन इसके साथ मच्छरों का खतरा भी तेजी से बढ़ जाता है. ज्यादातर लोग मच्छर से होने वाली&amp;nbsp; बीमारियों में डेंगू और मलेरिया के बारे में जानते हैं, लेकिन बहुत कम लोग इस बात से वाकिफ हैं कि कुछ मच्छर ऐसे वायरस भी फैलाते हैं, जो सीधे दिमाग को प्रभावित कर सकते हैं. ऐसी ही एक गंभीर बीमारी है जापानी इंसेफेलाइटिस. यह बीमारी भले ही डेंगू जितनी आम न हो, लेकिन गंभीर मामलों में जानलेवा साबित हो सकती है और मरीज को जीवनभर के लिए न्यूरोलॉजिकल समस्याएं भी दे सकती है.
यह बीमारी जापानी इंसेफेलाइटिस वायरस से होती है, जो फ्लैविवायरस परिवार का सदस्य है. यही परिवार डेंगू और वेस्ट नाइल वायरस का भी है. यह वायरस इंफेक्टेड क्यूलेक्स मच्छरों के काटने से फैलता है. ये मच्छर आमतौर पर धान के खेतों, तालाबों, दलदली इलाकों और बारिश के बाद जमा पानी में पनपते हैं. डेंगू फैलाने वाले मच्छरों के विपरीत, क्यूलेक्स मच्छर शाम ढलने के बाद से लेकर सुबह तक ज्यादा सक्रिय रहते हैं.
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कैसे होता है &amp;nbsp;इंसेफेलाइटिस?
फोर्टिस अस्पताल मोहाली के न्यूरोलॉजी विशेषज्ञ डॉ. ईशांक गोयल के अनुसार, वायरस पहले खून में प्रवेश करता है और फिर ब्लड-ब्रेन बैरियर को पार कर दिमाग तक पहुंच जाता है. इसके बाद दिमाग में सूजन आ जाती है, जिसे मेडिकल भाषा में इंसेफेलाइटिस कहा जाता है
हर साल इसके कितने मामले सामने आते हैं?
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के अनुसार, हर साल दुनिया में जापानी इंसेफेलाइटिस के करीब 68 हजार मामले सामने आते हैं. दक्षिण-पूर्व एशिया और पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित हैं. भारत में भी हर साल इसके मामले दर्ज किए जाते हैं और बच्चों में इसका खतरा सबसे अधिक माना जाता है. एक्सपर्ट के मुताबिक, 15 साल से कम उम्र के बच्चों, ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों, धान के खेतों में काम करने वाले किसानों और बिना टीकाकरण वाले यात्रियों में संक्रमण का जोखिम ज्यादा होता है.
क्या होते हैं इसके शुरुआती लक्षण?
इस बीमारी की शुरुआत सामान्य वायरल इंफेक्शन जैसी लग सकती है. शुरुआत में बुखार, सिरदर्द, उल्टी, थकान और कमजोरी जैसे लक्षण दिखाई देते हैं. लेकिन अगर वायरस दिमाग तक पहुंच जाए, तो मरीज में तेज बुखार, भ्रम की स्थिति, बेहोशी, दौरे पड़ना, गर्दन में अकड़न, चलने में परेशानी और होश खोने जैसे गंभीर लक्षण विकसित हो सकते हैं. ऐसी स्थिति में तुरंत अस्पताल पहुंचना जरूरी होता है. डॉक्टरों का कहना है कि केवल सीटी स्कैन से इस बीमारी का पता हमेशा नहीं चल पाता. जरूरत पड़ने पर एमआरआई और खून या सेरेब्रोस्पाइनल फ्लूइड की जांच के जरिए इसकी पुष्टि की जाती है.
क्या इसका कोई इलाज है?
जापानी इंसेफेलाइटिस का कोई विशेष इलाज उपलब्ध नहीं है. इलाज के दौरान मरीज की स्थिति को स्थिर रखने और दिक्कतों को कंट्रोल करने की कोशिश की जाती है. इसलिए बचाव सबसे प्रभावी उपाय माना जाता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 25 Jul 2026 00:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>Sonam Wangchuk : 26 दिन का उपवास तोड़ने के कितने दिन बाद ले सकते हैं नॉर्मल डाइट, किन चीजों से चाहिए बचना?</title>
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        <description><![CDATA[ Sonam Wangchuk Ends Hunger Strike : 26 दिनों तक भूख हड़ताल करने के बाद सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने अपना अनशन खत्म कर दिया है. सोनम वांगचुक को सरकार ने आश्वासन दिया है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं होगी. साथ ही पेपर लीक रोकने और परीक्षा प्रणाली में सुधार पर संसद में चर्चा होगी. इसके बाद एक बड़ा सवाल सामने आया है कि इतने लंबे समय तक भूखे रहने के बाद खाना कैसे शुरू करना चाहिए. कई लोगों को लगता है कि अनशन खत्म होते ही भरपेट खाना खा लेना सही होता है, लेकिन मेडिकल एक्सपर्ट्स ऐसा नहीं मानते हैं. ऐसे में आइए जानते हैं कि &amp;nbsp;26 दिन का उपवास तोड़ने के कितने दिन बाद नॉर्मल डाइट ले सकते हैं और किन चीजों से बचना चाहिए.&amp;nbsp;
क्या उपवास खत्म होते ही सामान्य खाना खा सकते हैं?
मेडिकल एक्सपर्ट्स के अनुसार, लंबे समय तक चले उपवास या भूख हड़ताल के तुरंत बाद सामान्य या भरपेट खाना शुरू करना सुरक्षित नहीं माना जाता है. लंबे समय तक खाना न मिलने से शरीर का मेटाबॉलिज्म बदल जाता है. ऐसे में अगर अचानक सामान्य या ज्यादा खाना खाया जाए, तो शरीर पर बुरा असर पड़ सकता है. इसलिए लंबे उपवास या भूख हड़ताल के बाद धीरे-धीरे और हल्के खाने से शुरुआत करने की सलाह दी जाती है, जिससे शरीर सुरक्षित तरीके से सामान्य स्थिति में लौट सके. जब शरीर उस खाने को आसानी से पचाने लगे, तभी धीरे-धीरे नॉर्मल डाइट की ओर बढ़ना चाहिए.
26 दिन का उपवास तोड़ने के कितने दिन बाद नॉर्मल डाइट ले सकते हैं?
अगर उपवास कई दिनों या हफ्तों तक चला हो, तो नॉर्मल डाइट की शुरुआत जल्दबाजी में नहीं करनी चाहिए. पहले शरीर को तरल लिक्विड और हल्का खाना दिया जाता है. इसके बाद थोड़ी-थोड़ी मात्रा में दिन में कई बार खाना खाया जा सकता है. जब शरीर इस खाने को अच्छी तरह पचाने लगे, तब धीरे-धीरे दाल, दही, पनीर, उबला अंडा या अन्य प्रोटीन वाले फूड प्रोडक्ट्स शामिल किए जा सकते हैं. इसके बाद ही नॉर्मल डाइट की ओर बढ़ने की सलाह दी जाती है. अगर उपवास बहुत लंबा रहा हो, तो यह प्रक्रिया डॉक्टर की निगरानी में ही की जानी चाहिए. अचानक भरपेट या भारी खाना खाने से रीफीडिंग सिंड्रोम जैसी गंभीर समस्या का खतरा हो सकता है.&amp;nbsp;
उपवास के बाद सबसे पहले क्या खाना चाहिए?
उपवास खत्म होने के बाद शुरुआत सबसे पहले शरीर को हाइड्रेट करने से करनी चाहिए. इसके लिए सादा पानी, ओआरएस या डॉक्टर की सलाह के अनुसार इलेक्ट्रोलाइट्स दिए जा सकते हैं. इसके बाद हल्का और आसानी से पचने वाला खाना जैसे दलिया, पतली खिचड़ी, सब्जियों का सूप, दही, नारियल पानी या पका हुआ पपीता लिया जा सकता है. शुरुआत में कम मात्रा में और कई बार खाना बेहतर माना जाता है.
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किन चीजों से चाहिए बचना?
लंबे उपवास के तुरंत बाद तला-भुना, मसालेदार, बहुत ज्यादा मीठा और भारी खाना खाने से बचना चाहिए. एक बार में भरपेट खाना भी सही नहीं माना जाता है. ज्यादा फैट, एक्स्ट्रा चीनी और मसालों वाले फूड प्रोडक्ट्स पाचन तंत्र पर अतिरिक्त दबाव डाल सकते हैं. इसलिए खाने की मात्रा और चीजों का ध्यान रखना जरूरी होता है.
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        <pubDate>Sat, 25 Jul 2026 00:30:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Cardiac Arrest Survival Case: 40 घंटे तक बंद रही दिल की धड़कन, फिर भी जिंदा बचा इंसान? मेडिकल साइंस भी हैरान</title>
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        <description><![CDATA[ How A Man Survived 40 Hours Without Heartbeat: सोचिए, आपका दिल धड़कना बंद कर दे. कुछ सेकंड या मिनट के लिए नहीं, बल्कि 40 घंटे से भी ज्यादा समय तक. न अपनी कोई धड़कन, न शरीर की सामान्य हलचल, सिर्फ मशीनों के सहारे जिंदगी टिकी हो और डॉक्टर हर पल कोशिश कर रहे हों कि किसी तरह आपको वापस लाया जा सके. &amp;nbsp;पूर्वी चीन में एक व्यक्ति के साथ कुछ ऐसा ही हुआ, जिसने हर उम्मीद के खिलाफ फिर से जिंदगी की राह पकड़ ली.&amp;nbsp;
क्या है मामला?
यह मामला तब सामने आया जब करीब चालीस साल का एक व्यक्ति सीने में जकड़न और सांस लेने में परेशानी की शिकायत लेकर झेजियांग यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन के सेकेंड अफिलिएटेड अस्पताल पहुंचा. शुरुआत में यह सामान्य समस्या लग रही थी, लेकिन अचानक उसकी हालत बिगड़ गई. दिल और सांस दोनों ने एक साथ काम करना बंद कर दिया. &amp;nbsp;शरीर की वह लय, जो इंसान को जिंदा रखती है, एकदम थम गई.&amp;nbsp;
झटकों का भी नहीं हुआ असर
डॉक्टरों ने तुरंत उसे बचाने की कोशिश शुरू की. &amp;nbsp;दिल को फिर से चालू करने के लिए कई बार झटके दिए गए, लेकिन कोई असर नहीं हुआ. आमतौर पर जिन तरीकों से दिल दोबारा धड़कने लगता है, वे इस बार पूरी तरह नाकाम रहे. &amp;nbsp;ऐसा लग रहा था जैसे शरीर ने जवाब दे दिया हो.
लेकिन डॉक्टरों ने हार नहीं मानी. उन्होंने उसे एक ऐसी मशीन से जोड़ दिया, जो दिल और लंग्स का काम संभाल सकती है. इस व्यवस्था के जरिए शरीर से खून बाहर निकालकर उसमें से गंदी हवा हटाई जाती है, उसमें ऑक्सीजन मिलाई जाती है और फिर उसे वापस शरीर में भेजा जाता है. इसके साथ ही एक और उपकरण लगाया गया, जो दिल पर दबाव कम करने और खून के प्रवाह को बनाए रखने में मदद करता है.
इसे भी पढ़ें-Explained: मुंबई में तरबूज तो झारखंड में गोलगप्पे खाने से मौत! किन खानों से होती फूड पॉइजनिंग, आखिर खाएं क्या?
दो दिन तक मशीन के भरोसे
करीब दो दिनों तक वह व्यक्ति पूरी तरह इन मशीनों के भरोसे रहा. उसके शरीर में अपनी कोई धड़कन नहीं थी, सिर्फ मशीनों के सहारे ही जीवन के संकेत बने हुए थे. हर पल डॉक्टरों के लिए चुनौती भरा था, क्योंकि इतनी लंबी अवधि तक दिल का बंद रहना आम तौर पर वापसी की उम्मीद को लगभग खत्म कर देता है. फिर एक ऐसा पल आया जिसने सबको हैरान कर दिया. &amp;nbsp;40 घंटे से ज्यादा समय बीतने के बाद उसके दिल ने दोबारा काम करना शुरू कर दिया. धीरे-धीरे धड़कन सामान्य होने लगी और शरीर ने प्रतिक्रिया देना शुरू कर दिया. यह किसी चमत्कार से कम नहीं था.
तीन हफ्ते बाद अस्पताल से बाहर निकला
करीब तीन हफ्तों के इलाज के बाद वह व्यक्ति अपने पैरों पर चलकर अस्पताल से बाहर निकल गया. जांच में पता चला कि उसे दिल की मांसपेशियों में गंभीर सूजन की समस्या थी, जो बहुत तेजी से दिल को प्रभावित कर सकती है. सही समय पर इलाज, आधुनिक तकनीक और डॉक्टरों की लगातार कोशिशों ने उसे नई जिंदगी दे दी. यह घटना इस बात की याद दिलाती है कि मेडिकल साइंस और इंसानी जिद मिलकर असंभव को भी संभव बना सकते हैं. कभी-कभी उम्मीद वहीं से लौटती है, जहां सब कुछ खत्म होता हुआ नजर आता है.
इसे भी पढ़ें-Heart Fights Cancer: दिल धड़क रहा है यानी कैंसर से लड़ रहा है, नई स्टडी से जागी उम्मीद
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 23 Jul 2026 20:30:13 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Anti Aging Drug: क्या बूढ़ा होने से रोकने वाली दवाएं सच में होती हैं असरकारक, जानें आपके लिए ये कितनी खतरनाक?</title>
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        <description><![CDATA[ Anti Aging Medicines Risks And Side Effects: अगर कोई कहे कि एक ऐसी दवा है जो बढ़ती उम्र की रफ्तार धीमी कर सकती है, आपको लंबे समय तक फिट रख सकती है और उम्र से जुड़ी कई बीमारियों का खतरा कम कर सकती है, तो शायद यकीन करना मुश्किल हो. पिछले कुछ वर्षों में ऐसी एंटी-एजिंग दवाओं को लेकर दुनिया भर में काफी चर्चा बढ़ी है. कई रिसर्च में इनके फायदे दिखे हैं, लेकिन क्या ये दवाएं सच में असर करती हैं और क्या इन्हें लेना पूरी तरह सुरक्षित है? यही सबसे बड़ा सवाल है.
बीबीसी साइंस की रिपोर्ट के अनुसार,साइंटिस्ट का कहना है कि उम्र बढ़ना अपने आप में एक बीमारी नहीं है, लेकिन इसके साथ शरीर में कई बायोलॉजिकल बदलाव होने लगते हैं. यही बदलाव हार्ट रोग, कैंसर, डिमेंशिया और दूसरी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ा सकते हैं. इसलिए साइंटिस्ट ऐसी दवाओं पर काम कर रहे हैं जो उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा करके लंबे समय तक शरीर को स्वस्थ रखने में मदद कर सकें. इसे हेल्थस्पैन बढ़ाना कहा जाता है, यानी जीवन के स्वस्थ वर्षों को बढ़ाना, न कि सिर्फ उम्र बढ़ाना.
दवाओं पर की जा रही स्टडी
रिसर्च में कुछ दवाओं और नेचुरल मिक्स जैसे मेटफॉर्मिन, रैपामाइसिन, क्वेरसेटिन और डासाटिनिब पर अध्ययन किया जा रहा है. जानवरों पर हुए कई प्रयोगों में इनसे अच्छे नतीजे मिले हैं. कुछ मामलों में उम्र बढ़ने की रफ्तार धीमी हुई और शारीरिक क्षमता में भी सुधार देखा गया. हालांकि इंसानों पर इन दवाओं के असर को लेकर अभी बड़े स्तर के क्लिनिकल ट्रायल जारी हैं और अंतिम निष्कर्ष आना बाकी है.
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क्या इसके कुछ नुकसान भी होते हैं?
एक्सपर्ट बिना डॉक्टर की सलाह के एंटी-एजिंग दवाएं लेने से बचने की सलाह देते हैं. कई दवाएं मूल रूप से दूसरी बीमारियों, जैसे डायबिटीज या कैंसर के इलाज के लिए बनाई गई हैं. इन्हें सिर्फ उम्र कम दिखाने या लंबे समय तक जवान बने रहने की उम्मीद में लेना नुकसानदायक हो सकता है. इनके साइड इफेक्ट्स, दूसरी दवाओं के साथ प्रतिक्रिया और लंबे समय तक इस्तेमाल के जोखिम अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं.
बाजार में बिकने वाले कई सप्लीमेंट और एंटी-एजिंग प्रोडक्ट भी बड़े-बड़े दावे करते हैं, लेकिन हर दावे के पीछे मजबूत साइंटफिक प्रमाण नहीं होते. एक्सपर्ट का मानना है कि फिलहाल स्वस्थ लाइफस्टाइल ही बढ़ती उम्र के असर को कम करने का सबसे भरोसेमंद तरीका है. संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, अच्छी नींद, तनाव पर कंट्रोल और समय-समय पर स्वास्थ्य जांच लंबे समय तक फिट रहने में सबसे ज्यादा मददगार साबित होते हैं
इसे भी पढ़ें-Heart Fights Cancer: दिल धड़क रहा है यानी कैंसर से लड़ रहा है, नई स्टडी से जागी उम्मीद
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 23 Jul 2026 20:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Frequent Bowel Movements: क्या आपको भी थोड़ी&amp;थोड़ी देर में जाना पड़ता है बाथरूम? जानिए किस बीमारी का है यह संकेत</title>
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        <description><![CDATA[ Sudden Increase In Stool Frequency Reasons: अगर आपको पहले की तुलना में बार-बार लैट्रिन जाने की जरूरत महसूस होने लगी है, तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए. हालांकि हर व्यक्ति के बाथरूम जाने का पैटर्न अलग होता है. कोई दिन में एक बार जाता है तो कोई दो या तीन बार भी जा सकता है. लेकिन अगर अचानक आपकी लैट्रिन जाने की संख्या बढ़ गई है और यह बदलाव कई दिनों तक बना हुआ है, तो इसके पीछे कोई स्वास्थ्य समस्या हो सकती है.&amp;nbsp;
एक्सपर्ट के मुताबिक दिन में तीन बार से लेकर सप्ताह में तीन बार तक मल त्याग होना सामान्य माना जा सकता है. इसलिए केवल संख्या के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि कोई समस्या है या नहीं. असली चिंता तब होती है, जब आपकी सामान्य आदत में अचानक बदलाव आ जाए और बार-बार लैट्रिन जाने की जरूरत महसूस होने लगे.
क्या होते हैं इसके पीछे कारण?
clevelandclinic के अनुसार, इसके पीछे कई सामान्य कारण भी हो सकते हैं. यदि आपने हाल ही में अपनी डाइट में फाइबर वाली चीजें जैसे फल, हरी सब्जियां और साबुत अनाज बढ़ाए हैं, तो इससे मल त्याग की संख्या बढ़ सकती है. इसी तरह ज्यादा कॉफी या चाय पीना भी आंतों की गतिविधि तेज कर सकता है. कई लोगों में बहुत ज्यादा मसालेदार, तला-भुना खाना या ऐसा भोजन जिसे शरीर आसानी से पचा नहीं पाता, उसकी वजह से भी बार-बार लैट्रिन जाने की समस्या हो सकती है.
दवाइयां और सप्लीमेंट भी इसका कारण&amp;nbsp;
कुछ दवाइयां और सप्लीमेंट भी इसका कारण बन सकते हैं. विटामिन सी, मैग्नीशियम, कुछ एंटीबायोटिक और कुछ एंटीडिप्रेसेंट दवाओं के सेवन से मल त्यागने की संख्या बढ़ सकती है. महिलाओं में पीरियड्स या गर्भावस्था के दौरान हार्मोन में होने वाले बदलाव भी इस समस्या की वजह बन सकते हैं, वहीं तनाव और चिंता का सीधा असर भी पाचन तंत्र पर पड़ता है, जिससे कई लोगों को बार-बार बाथरूम जाने की जरूरत महसूस होती है.
इसे भी पढ़ेंः&amp;nbsp;&amp;nbsp;Quit Smoking: ये 4 तरीके अपना लिए तो तुरंत छूट जाएगी सिगरेट, गलती से भी नहीं लगाएंगे हाथ
क्या होते हैं इसके लक्षण?
अगर बार-बार लैट्रिन जाने के साथ पेट दर्द, खून आना, तेज बुखार, मतली, कमजोरी या तेजी से वजन कम होना जैसे लक्षण भी दिखाई दें, तो यह किसी गंभीर बीमारी का संकेत हो सकता है. फूड पॉइजनिंग, आंतों का इंफेक्शन, हाइपरथायरॉयडिज्म, सीलिएक डिजीज, क्रोहन डिजीज, इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज या बड़ी आंत से जुड़ी अन्य समस्याएं भी इसकी वजह हो सकती हैं. लंबे समय तक रहने वाली समस्या को नजरअंदाज करना ठीक नहीं है. अगर यह परेशानी कुछ दिनों से ज्यादा बनी हुई है, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। कारण पता लगाने के लिए ब्लड टेस्ट, स्टूल टेस्ट, ब्रीथ टेस्ट या जरूरत पड़ने पर इमेजिंग जांच कराई जा सकती है.
इसे भी पढ़ें:&amp;nbsp;Monsoon Health Care Tips: मानसून सीजन में जल्दी बीमार पड़ जाते हैं बच्चे, ऐसे रखें उनकी सेहत का ख्याल?
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 23 Jul 2026 20:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>आ रहा है डेंगू मलेरिया का मौसम, अपने बच्चों का ऐसे रखें ख्याल, पछताने से पहले पढ़ लें खबर</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/आ-रहा-है-डेंगू-मलेरिया-का-मौसम-अपने-बच्चों-का-ऐसे-रखें-ख्याल-पछताने-से-पहले-पढ़-लें-खबर</link>
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        <description><![CDATA[ Dengue malaria prevention: बारिश का मौसम शुरू होते ही डेंगू और मलेरिया जैसी बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है. इस मौसम में मच्छरों की संख्या तेजी से बढ़ जाती है, जिससे बच्चों के बीमार होने का खतरा ज्यादा रहता है. छोटे बच्चों की रोगों से लड़ने की क्षमता बड़ों के मुकाबले कम होती है. इसलिए माता-पिता को पहले से ही सावधानी बरतनी चाहिए. थोड़ी सी लापरवाही भी बच्चों की सेहत पर भारी पड़ सकती है. ऐसे में जरूरी है कि घर की साफ-सफाई से लेकर बच्चों के खान-पान तक हर बात का ध्यान रखा जाए.
घर के आसपास पानी जमा न होने दें
डेंगू और मलेरिया मच्छरों के काटने से फैलते हैं. इसलिए घर और उसके आसपास साफ-सफाई का खास ध्यान रखें. कूलर, गमले, बाल्टी, टायर या किसी भी ऐसी जगह पर पानी जमा न होने दें, क्योंकि ऐसी जगहों पर मच्छर आसानी से बढ़ जाते हैं. हफ्ते में एक बार कूलर का पानी जरूर बदलें और पानी की टंकियों को हमेशा ढककर रखें.
यह भी पढ़े: Gum Disease Symptoms: क्या बारिश में आपके मसूड़ों से भी आता है खून? एक्सपर्ट से जानिए इसके पीछे की बड़ी वजह
बच्चों को मच्छरों से बचाना है जरूरी
बच्चों को सुबह और शाम के समय पूरे बाजू के कपड़े पहनाएं. अगर बच्चा बाहर खेलने जाता है, तो मच्छर भगाने वाली क्रीम या पैच का इस्तेमाल किया जा सकता है. रात में सोते समय मच्छरदानी का इस्तेमाल करें. साथ ही कोशिश करें कि घर के अंदर मच्छर न रहें.
खाने-पीने का रखें खास ध्यान
बारिश के मौसम में बच्चों को हमेशा साफ और ताजा खाना खिलाएं. बाहर का खुला या बासी खाना खाने से बचाएं. उन्हें पर्याप्त पानी पिलाएं और खाने में फल, हरी सब्जियां, दाल और दूसरी पौष्टिक चीजें शामिल करें, ताकि उनका शरीर मजबूत बना रहे. अगर बच्चा कम पानी पीता है, तो उसे थोड़ी-थोड़ी देर में पानी या दूसरे स्वस्थ पदार्थ देते रहें. अच्छी डाइट बच्चों की रोगों से लड़ने की ताकत बढ़ाने में मदद करती है.
इन लक्षणों को बिल्कुल नजरअंदाज न करें
अगर बच्चे को तेज बुखार, सिर दर्द, बदन दर्द, उल्टी, कमजोरी, आंखों के पीछे दर्द या त्वचा पर लाल चकत्ते दिखाई दें, तो इसे हल्के में न लें. बिना देर किए डॉक्टर को दिखाएं और उनकी सलाह के बिना कोई भी दवा न दें. समय पर इलाज मिलने से बीमारी गंभीर होने का खतरा कम हो सकता है. अगर बुखार दो-तीन दिन तक बना रहे, तो जांच जरूर करानी चाहिए.
यह भी पढ़े: Explained: बारिश के मौसम में डेंगू की नो टेंशन! भारत की पहली वैक्सीन कितनी कारगर? जानें कीमत, तरीका और साइड इफेक्ट्स ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 23 Jul 2026 08:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>Gum Disease Symptoms: क्या बारिश में आपके मसूड़ों से भी आता है खून? एक्सपर्ट से जानिए इसके पीछे की बड़ी वजह</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/gum-disease-symptoms-क्या-बारिश-में-आपके-मसूड़ों-से-भी-आता-है-खून-एक्सपर्ट-से-जानिए-इसके-पीछे-की-बड़ी-वजह</link>
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        <description><![CDATA[ Causes Of Bleeding Gums In Rainy Season: अगर बारिश के मौसम में ब्रश करते समय मसूड़ों से खून आने लगे या मुंह की बदबू लगातार बनी रहे, तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए. इसकी वजह सिर्फ मौसम नहीं, बल्कि इस दौरान हमारी कुछ रोजमर्रा की आदतें भी हो सकती हैं. पसंदीदा चाय-पकौड़े, मीठे स्नैक्स, कम पानी पीना और ओरल हाइजीन में लापरवाही जैसी बातें मसूड़ों की सेहत पर असर डाल सकती हैं.&amp;nbsp;
क्यों होती है परेशानी?
डॉ. जैनील पारेख, ऑर्थोडॉन्टिस्ट, लक्ष्मी डेंटल लिमिटेड के मुताबिक, मानसून सीधे तौर पर मसूड़ों की बीमारी या मुंह की बदबू का कारण नहीं बनता, लेकिन इस मौसम में लाइफस्टाइल में होने वाले बदलाव इन समस्याओं का खतरा बढ़ा देते हैं. उनका कहना है कि बारिश के दिनों में लोग अक्सर ज्यादा मीठे स्नैक्स और ड्रिंक्स का सेवन करते हैं, कम पानी पीते हैं और मुंह की सफाई पर भी पहले जितना ध्यान नहीं देते. इससे दांतों पर प्लाक जमा होने लगता है और बैक्टीरिया तेजी से बढ़ते हैं, जिससे मसूड़ों में सूजन और सांसों से बदबू आने की संभावना बढ़ जाती है.
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कौन सी दिक्कत सबसे ज्यादा होती है?
डॉ. पारेख बताते हैं कि अगर प्लाक को नियमित ब्रशिंग और दांतों के बीच की सफाई से नहीं हटाया जाए, तो मसूड़ों की सूजन, कैविटी और लगातार मुंह से बदबू जैसी समस्याएं हो सकती हैं. बारिश के मौसम में डेंटिस्ट के पास ऐसे मरीज ज्यादा पहुंचते हैं, जिन्हें मसूड़ों से खून आना, सूजन, प्लाक जमा होना, दांतों में संवेदनशीलता और शुरुआती मसूड़ों की बीमारी जैसी शिकायतें होती हैं. उनका कहना है कि अच्छी बात यह है कि समय पर इलाज और सही देखभाल से इन समस्याओं को बढ़ने से रोका जा सकता है. प्रोफेशनल क्लीनिंग, रोजाना सही तरीके से ओरल हाइजीन बनाए रखना और नियमित डेंटल चेकअप मसूड़ों को गंभीर बीमारी से बचाने में मदद करता है.&amp;nbsp;
क्या सिर्फ खाने की वजह से होती है दिक्कत?
एक्सपर्ट के अनुसार, लगातार मुंह से बदबू आना सिर्फ खाने की वजह से नहीं होता। यह मसूड़ों की खराब सेहत का शुरुआती संकेत भी हो सकता है. जब मसूड़ों के किनारों पर प्लाक जमा होता है, तो बैक्टीरिया फंसे हुए भोजन के कणों को तोड़ते हैं और सल्फर यौगिक बनाते हैं, जिनकी वजह से बदबू आती है. अगर इसे नजरअंदाज किया जाए, तो यही समस्या आगे चलकर मसूड़ों की गंभीर बीमारी का रूप ले सकती है.
किन लोगों को इसका सबसे ज्यादा खतरा?
कुछ लोगों में यह खतरा ज्यादा होता है. जिनकी ओरल हाइजीन अच्छी नहीं है, जिन्हें डायबिटीज है, जो धूम्रपान या तंबाकू का सेवन करते हैं या जिनके दांतों में ब्रेसेस लगे हैं, उनमें मसूड़ों के इंफेक्शन की आशंका अधिक रहती है. ब्रेसेस की वजह से दांतों में खाना और प्लाक आसानी से फंस जाता है, इसलिए ऐसे लोगों को सफाई पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए. मसूड़ों से ब्रश करते समय खून आना, मसूड़ों में सूजन या लालिमा, लगातार मुंह से बदबू आना, मसूड़ों में दर्द, मसूड़ों का पीछे हटना या दांतों का ढीला महसूस होना ऐसे संकेत हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. समय रहते जांच कराने से मसूड़ों और उन्हें सहारा देने वाली हड्डी को नुकसान पहुंचने से बचाया जा सकता है.
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        <pubDate>Wed, 22 Jul 2026 15:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Gum, Disease, Symptoms:, क्या, बारिश, में, आपके, मसूड़ों, से, भी, आता, है, खून, एक्सपर्ट, से, जानिए, इसके, पीछे, की, बड़ी, वजह</media:keywords>
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        <title>Regular Health Checkup: क्या आप भी बीमार होने पर ही जाते हैं डॉक्टर के पास? जान लें रेगुलर हेल्थ चेकअप के फायदे</title>
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        <description><![CDATA[ Why Preventative Health Checkup Is Important: अक्सर लोग तब ही डॉक्टर के पास जाते हैं, जब कोई बीमारी या तकलीफ महसूस होने लगती है. लेकिन कई गंभीर बीमारियां ऐसी होती हैं, जो शुरुआती चरण में कोई खास लक्षण नहीं दिखातीं. ऐसे में नियमित हेल्थ चेकअप कराना सिर्फ एक औपचारिकता नहीं, बल्कि बेहतर स्वास्थ्य की दिशा में उठाया गया जरूरी कदम है. समय-समय पर स्वास्थ्य जांच कराने से कई बीमारियों का पता शुरुआत में ही चल जाता है, जिससे उनका इलाज आसान और ज्यादा प्रभावी हो सकता है.&amp;nbsp;
रेगुलर हेल्थ चेकअप करवाने के क्या हैं फायदे?
हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली संस्था MAYO CLINIC के अनुसार, &amp;nbsp;सबसे बड़ा फायदा यह है कि नियमित हेल्थ चेकअप से बीमारियों का समय रहते पता चल जाता है. हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल, थायरॉयड और कुछ तरह के कैंसर जैसी समस्याएं शुरुआती दौर में बिना किसी स्पष्ट संकेत के भी शरीर में मौजूद हो सकती हैं. अगर इनकी पहचान समय रहते हो जाए, तो इलाज जल्दी शुरू किया जा सकता है और गंभीर दिक्कतों से बचा जा सकता है.
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कैसे बीमारियों से बचाती है?
नियमित जांच सिर्फ बीमारी पकड़ने के लिए ही नहीं, बल्कि उन्हें रोकने में भी मदद करती है. डॉक्टर आपकी उम्र, स्वास्थ्य और मेडिकल हिस्ट्री के आधार पर जरूरी जांच और वैक्सीनेशन की सलाह देते हैं. कई इंफेक्शन बीमारियों से बचाव के लिए समय पर टीकाकरण बेहद जरूरी होता है. इसके साथ ही डॉक्टर खानपान, एक्सरसाइज, वजन कंट्रोल रखने और धूम्रपान या शराब जैसी आदतों से दूरी बनाने की सलाह भी देते हैं. ये छोटी-छोटी बातें भविष्य में कई बड़ी बीमारियों के खतरे को कम कर सकती हैं.&amp;nbsp;
किन लोगों के लिए जरूरी
अगर किसी व्यक्ति को पहले से डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, अस्थमा या दिल से जुड़ी कोई बीमारी है, तो उसके लिए नियमित हेल्थ चेकअप और भी ज्यादा जरूरी हो जाता है. समय-समय पर जांच कराने से यह पता चलता रहता है कि बीमारी कंट्रोल में है या नहीं. जरूरत पड़ने पर डॉक्टर दवाओं की मात्रा बदल सकते हैं या इलाज में जरूरी बदलाव कर सकते हैं, जिससे स्वास्थ्य बेहतर बना रहता है.
आर्थिक तौर पर भी फायदेमंद
रेगुलर हेल्थ जांच आर्थिक रूप से भी फायदेमंद साबित हो सकती है.जब किसी बीमारी का पता शुरुआती चरण में चल जाता है, तो उसका इलाज अपेक्षाकृत आसान और कम खर्चीला होता है. वहीं अगर बीमारी लंबे समय तक बिना इलाज के बढ़ती रहे, तो बाद में अस्पताल में भर्ती होने, सर्जरी या महंगे इलाज की जरूरत पड़ सकती है. ऐसे में समय पर कराया गया हेल्थ चेकअप भविष्य के बड़े खर्च से भी बचा सकता है. आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में तनाव, अनरेगुलर लाइफस्टाइल और खराब खानपान कई स्वास्थ्य समस्याओं की वजह बन रहे हैं. इसलिए सिर्फ बीमार होने का इंतजार करने के बजाय साल में कम से कम एक बार डॉक्टर की सलाह से हेल्थ चेकअप जरूर कराना चाहिए.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 21 Jul 2026 23:30:09 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Cholesterol: 10 में 9 भारतीयों का कोलेस्ट्रॉल सामान्य नहीं, ICMR की स्टडी में बड़ा खुलासा</title>
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        <description><![CDATA[ Abnormal Cholesterol Symptoms In Young Adults: अगर आपको लगता है कि कोलेस्ट्रॉल की समस्या सिर्फ बढ़ती उम्र या मोटापे से जुड़ी है, तो हाल ही में आई एक स्टडी आपकी सोच बदल सकती है. इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के स्टडी के अनुसार, भारत में लगभग 10 में से 9 एडल्ट का कोलेस्ट्रॉल स्तर सामान्य नहीं है. यह समस्या सिर्फ बुजुर्गों तक सीमित नहीं है, बल्कि युवा और देखने में पूरी तरह स्वस्थ लोग भी इसकी चपेट में हैं.
किन बीमारियों का बढ़ रहा है खतरा?
यह अध्ययन 23,665 लोगों पर किया गया. रिपोर्ट के मुताबिक, 87.3 प्रतिशत भारतीय वयस्क किसी न किसी प्रकार की असामान्य रक्त फैट की समस्या से जूझ रहे हैं. इसका मतलब है कि शरीर में खराब कोलेस्ट्रॉल या ट्राइग्लिसराइड्स का स्तर बढ़ा हुआ है या फिर अच्छे कोलेस्ट्रॉल का स्तर सामान्य से कम है. ऐसी स्थिति लंबे समय में दिल की बीमारी, हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा बढ़ा सकती है.
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किन लोगों को सबसे ज्यादा खतरा?
स्टडी में यह भी सामने आया कि शहरों में रहने वाले लोगों में यह समस्या ज्यादा है. शहरी क्षेत्रों में 89 प्रतिशत लोगों का कोलेस्ट्रॉल सामान्य नहीं मिला, जबकि ग्रामीण इलाकों में भी यह आंकड़ा 86.5 प्रतिशत रहा. यानी यह समस्या अब केवल शहरों तक सीमित नहीं रह गई है. महिलाओं में भी यह परेशानी पुरुषों की तुलना में अधिक पाई गई. रिपोर्ट के अनुसार 91.1 प्रतिशत महिलाओं में कोलेस्ट्रॉल से जुड़ी गड़बड़ी मिली, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा 83.5 प्रतिशत रहा. सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि भारत में यह समस्या 30 से 39 वर्ष की उम्र में सबसे ज्यादा देखने को मिल रही है. यानी कम उम्र में ही बड़ी संख्या में लोग दिल से जुड़ी बीमारियों के खतरे की ओर बढ़ रहे हैं.
कैसे कर सकते हैं बचाव?
स्टडी में यह भी पाया गया कि केवल मोटापे, डायबिटीज या हाई ब्लड प्रेशर से पीड़ित लोगों में ही नहीं, बल्कि करीब 40 प्रतिशत ऐसे लोगों में भी कोलेस्ट्रॉल सामान्य नहीं था, जिन्हें इनमें से कोई भी बीमारी नहीं थी. इससे साफ है कि केवल फिट दिखना या वजन सामान्य होना दिल के पूरी तरह स्वस्थ होने की गारंटी नहीं है. एक्सपर्ट का कहना है कि समय-समय पर लिपिड प्रोफाइल जांच करानी चाहिए. यह एक नॉर्मल रक्त जांच है, जिससे शरीर में कुल कोलेस्ट्रॉल, अच्छे और खराब कोलेस्ट्रॉल तथा ट्राइग्लिसराइड्स का स्तर पता चलता है. अगर समस्या का पता शुरुआत में चल जाए तो खानपान में बदलाव, नियमित व्यायाम और जरूरत पड़ने पर दवाओं की मदद से इसे नियंत्रित किया जा सकता है. &amp;nbsp;हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाना, संतुलित आहार लेना, नियमित शारीरिक गतिविधि करना और समय-समय पर स हेल्थ जांच कराना हार्ट को स्वस्थ रखने के सबसे प्रभावी तरीकों में शामिल हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 21 Jul 2026 23:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>Explained: बारिश के मौसम में डेंगू की नो टेंशन! भारत की पहली वैक्सीन कितनी कारगर? जानें कीमत, तरीका और साइड इफेक्ट्स</title>
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        <description><![CDATA[ बारिश की पहली बूंद के साथ ही भारत में एक अनचाहा मेहमान दस्तक देता है- मच्छर. ये मच्छर अपने साथ लाते हैं डेंगू जैसी जानलेवा बीमारी, जो 2025 में 1.21 लाख मामलों में 131 मौतों की वजह बनी. इस बार मानसून में एक अच्छी खबर भी आई है. भारत के ड्रग कंट्रोलर जनरल (DCGI) ने देश की पहली डेंगू वैक्सीन &#039;क्यूडेंगा&#039; (QDENGA) को मंजूरी दे दी है. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे लगवाने से पहले किसी तरह की जांच कराने की जरूरत नहीं होगी. क्या यह डेंगू से पूरी तरह बचा पाएगी और कितने की मिलेगी...
डेंगू मच्छर की दुश्मन क्यूडेंगा वैक्सीन आखिर है क्या?
क्यूडेंगा जापान की दवा कंपनी टाकेडा ने बनाई है. यह एक लाइव एटेन्यूएटेड वैक्सीन है. इसका मतलब है कि इसमें डेंगू के वायरस को कमजोर करके शरीर में डाला जाता है. यह वायरस बीमारी पैदा नहीं करता है. शरीर का इम्यून सिस्टम इसे पहचानकर इसके खिलाफ एंटीबॉडी जरूर बना लेता है.
इस तरह जब कभी असली डेंगू का वायरस शरीर पर हमला करता है तो शरीर पहले से तैयार रहता है और बीमारी को गंभीर नहीं होने देता. सबसे बड़ी बात यह है कि यह वैक्सीन डेंगू के चारों प्रकारों (DENV-1, DENV-2, DENV-3 और DENV-4) से एक साथ सुरक्षा देती है. सबसे बड़ी खासियत इसे लगवाने के लिए कोई जांच नहीं होती है.
बिना जांच के वैक्सीन लगवाना कितनी बड़ी बात है?
अभी तक दुनिया में डेंगू की जो वैक्सीन थीं, उन्हें लगवाने से पहले यह जांच कराना जरूरी था कि मरीज को पहले कभी डेंगू हुआ है या नहीं. अगर किसी को पहले डेंगू नहीं हुआ था और वह वैक्सीन लेता था, तो उसे भविष्य में डेंगू होने पर बीमारी और गंभीर होने का खतरा रहता था, लेकिन क्यूडेंगा के साथ यह चिंता नहीं है.
कंपनी के बड़े पैमाने पर क्लिनिकल ट्रायल किए. इनमें 20,000 से ज्यादा बच्चों और वयस्कों को शामिल किया गया. ट्रायल से साबित हुआ कि यह वैक्सीन उन लोगों के लिए भी सुरक्षित है जिन्हें पहले कभी डेंगू नहीं हुआ. यही वजह है कि यह भारत जैसे देश के लिए गेमचेंजर साबित हो सकती है, जहां बड़े पैमाने पर जांच कराना एक बड़ी चुनौती है.
यह वैक्सीन कैसे काम करेगी और किस तरह लगवाएं?
यह वैक्सीन 6 साल से लेकर 60 साल तक के लोगों को लगाई जा सकती है. इसकी दो डोज होती हैं, जिनके बीच 3 महीने का गैप रखना जरूरी है.

पहली डोज के बाद शरीर में वायरस के खिलाफ शुरुआती सुरक्षा तैयार हो जाती है.
दूसरी डोज इस सुरक्षा को लंबे समय के लिए मजबूत कर देती है.

ट्रायल्स के आंकड़ों के मुताबिक, वैक्सीन लेने के बाद डेंगू से अस्पताल में भर्ती होने की संभावना 84% तक कम हो जाती है और संक्रमण का खतरा 61% तक घट जाता है.
क्यूडेंगा वैक्सीन की कीमत कितनी होगी और कब मिलेगी?
टाकेडा कंपनी ने अभी भारत में इस वैक्सीन की सटीक कीमत तय नहीं की है. सूत्रों के मुताबिक इसकी एक डोज 4,000 से 5,000 रुपए के बीच हो सकती है. कंपनी जल्द ही इसे भारत के प्राइवेट अस्पतालों और क्लीनिकों में मिलने लगेगी. सरकारी टीकाकरण कार्यक्रम में इसे कब और कैसे शामिल किया जाएगा, इस पर अभी फैसला होना बाकी है.
क्या यह वैक्सीन भारत में ही बनेगी?
टाकेडा ने भारत की दवा कंपनी जायडस लाइफसाइंसेज के साथ एक समझौता किया है. इसके तहत, जायडस कंपनी भारत में ही इस वैक्सीन बनएगी. इसका सीधा फायदा यह होगा कि आने वाले समय में वैक्सीन की कीमत कम होगी और देश भर में इसकी उपलब्धता तेजी से बढ़ाई जा सकेगी. इससे भारत सिर्फ अपनी जरूरत ही नहीं पूरी करेगा, बल्कि दुनिया के दूसरे देशों को भी यह वैक्सीन सप्लाई कर सकता है.
तो क्या अब डेंगू से मौत नहीं होगी?
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, यह वैक्सीन बेशक एक बहुत बड़ी उपलब्धि है, लेकिन यह सोचना गलत होगा कि डेंगू अब पूरी तरह खत्म हो जाएगा. वैक्सीन का मकसद डेंगू को गंभीर होने से रोकना और मृत्यु दर को कम करना है. यह कोई जादू की छड़ी नहीं है. डेंगू को पूरी तरह हराने के लिए मच्छरों पर कंट्रोल पाना सबसे ज्यादा जरूरी है. सही समय पर बीमारी की पहचान और सही इलाज भी उतना ही अहम है. हालांकि, यह वैक्सीन उस दिशा में एक बहुत बड़ा और ऐतिहासिक कदम है.
भारत में हर साल डेंगू का कितना कहर?
नेशनल सेंटर फॉर वेक्टर बॉर्न डिजीज कंट्रोल के मुताबिक, 2023 में भारत में डेंगू के 2.89 लाख से ज्यादा मामले सामने आए थे और लगभग 1,200 लोगों की मौत हुई थी. 2024 में यह आंकड़ा और भयावह रहा, जब देश में 3.1 लाख से ज्यादा केस दर्ज किए गए और मरने वालों की संख्या 1,400 के पार चली गई. ये आंकड़े बताते हैं कि डेंगू भारत के लिए कितनी बड़ी स्वास्थ्य चुनौती है.
इस मानसून में क्यूडेंगा वैक्सीन एक बड़ी उम्मीद लेकर आई है. यह देश के करोड़ों लोगों को डेंगू के डर से बचा सकती है और हर साल आने वाली उस आफत को रोक सकती है जो हजारों परिवारों को तोड़ देती है. यह भी याद रखना होगा कि वैक्सीन के साथ-साथ मच्छरों से बचाव, पानी जमा न होने देना और बीमारी के लक्षणों को गंभीरता से लेना उतना ही जरूरी रहेगा. तकनीक और जागरूकता दोनों साथ चलेंगी, तभी डेंगू को पूरी तरह हराया जा सकेगा.
डेंगू की रोकथाम के लिए लॉन्च हुए क्यूड़ेंगा वैक्सीन को भारत में मंजूरी मिलने पर पटना के डॉक्टर खुश हुए. PMCH अधीक्षक और मशहूर फिजिशियन डॉ. राजीव कुमार ने कहा कि यह एक रामबाण मिल गया है. जिस तरह हमने वैक्सीन के जरिए कोविड को हराया है, उसी तरह डेंगू को भी हरा देंगे. डेंगू से होने वाली मौतों में कमी आएगी और आंकड़े भी कम होंगे. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 21 Jul 2026 23:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>Testosterone Screening After 30 : क्या 30 के बाद घटने लगता है टेस्टोस्टेरोन? अमेरिकी सेना शुरू करेगी अपने जवानों की स्क्रीनिंग</title>
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        <description><![CDATA[ Testosterone Screening After 30 : अच्छी फिटनेस, शरीर की ताकत और बेहतर फिजिकल प्रफोर्मेंस की बात आती है तो टेस्टोस्टेरोन हार्मोन का नाम अक्सर सामने आता है. लेकिन इसका स्तर बढ़ जाने से कोई व्यक्ति अपने आप ज्यादा ताकतवर या बेहतर परफॉर्मेंस करने लगे, ऐसा जरूरी नहीं है. विशेषज्ञों के अनुसार शरीर की क्षमता सिर्फ टेस्टोस्टेरोन पर नहीं, बल्कि सही खानपान, नियमित एक्सरसाइज, जेनेटिक और ऑवर ऑल हेल्थ जैसे कई अन्य कारकों पर भी निर्भर करती है. &amp;nbsp;
इसी बीच अमेरिका ने अपने सैनिकों की सेहत और सैन्य तैयारी को ध्यान में रखते हुए एक बड़ा फैसला लिया है. अब 30 साल या उससे ज्यादा उम्र के सैनिकों की हर साल टेस्टोस्टेरोन जांच की जाएगी. इस फैसले के बाद टेस्टोस्टेरोन का रोल, इसकी कमी और इससे जुड़े इलाज को लेकर चर्चा तेज हो गई है. ऐसे में आइए जानते हैं कि अमेरिकी सेना अपने जवानों की स्क्रीनिंग कैसे शुरू करेगी.&amp;nbsp;
30 साल से ज्यादा उम्र के जवानों की होगी हर साल स्क्रीनिंग
अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने घोषणा की है कि अब 30 साल या उससे ज्यादा उम्र के सभी सैन्य कर्मियों की सालाना स्वास्थ्य जांच में टेस्टोस्टेरोन टेस्ट भी शामिल किया जाएगा. वहीं 30 साल से कम उम्र के सैनिक भी चाहें तो अपनी इच्छा से यह जांच करा सकेंगे. जिन जवानों में टेस्टोस्टेरोन का स्तर कम पाया जाएगा, उन्हें टेस्टोस्टेरोन रिप्लेसमेंट थेरेपी (TRT) लेने या न लेने का ऑप्शन दिया जाएगा.
क्यों लिया गया यह फैसला?
पेंटागन के मुताबिक इस पहल का मकसद हार्मोन की कमी का समय रहते पता लगाना, जवानों की लंबी अवधि की सेहत को बेहतर बनाए रखना और यह तय करना है कि वे फिजिकल और मानसिक रूप से सेवा के लिए पूरी तरह फिट रहें. रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने साफ किया है कि इस योजना का उद्देश्य किसी की क्षमता बढ़ाना नहीं, बल्कि जिन लोगों में सच में हार्मोन की कमी है, उनके टेस्टोस्टेरोन स्तर को सामान्य सीमा तक वापस लाना है.
यह भी पढ़ें - Dengue Vaccine: भारत को मिली पहली डेंगू वैक्सीन! जानिए कितनी असरदार है QDENGA और कब से लगेगी?
क्या सभी लोगों की नियमित स्क्रीनिंग जरूरी है?
अमेरिकी सेना की इस नई योजना का उद्देश्य हार्मोन की कमी वाले लोगों की पहचान करना है. हालांकि डॉक्टरों का कहना है कि केवल उम्र के आधार पर सभी लोगों की नियमित जांच जरूरी नहीं मानी जा सकती है. विशेषज्ञों के अनुसार उम्र बढ़ने के साथ टेस्टोस्टेरोन का लेवल स्वाभाविक रूप से कम हो सकता है. ऐसे में किसी व्यक्ति में हार्मोन की कमी का पता केवल एक ब्लड टेस्ट से नहीं लगाया जा सकता, बल्कि इसके लिए पूरी जांच और लक्षणों को चेक करना जरूरी होता है.
टेस्टोस्टेरोन थेरेपी कब लेनी चाहिए?
विशेषज्ञों का कहना है कि टेस्टोस्टेरोन रिप्लेसमेंट थेरेपी केवल उन्हीं लोगों को दी जानी चाहिए जिनमें मेडिकल जांच के बाद हार्मोन की कमी पाई जाए. इसे कभी भी ताकत बढ़ाने या एंटी-एजिंग उपाय के रूप में नहीं लेना चाहिए. यह इलाज केवल डॉक्टर की सलाह और नियमित निगरानी में ही किया जाना चाहिए. यह थेरेपी स्वस्थ लोगों का प्रफोर्मेंस बढ़ाने के लिए नहीं है. इसे जरूरत पड़ने पर ही दी जानी चाहिए.
बिना सलाह टेस्टोस्टेरोन लेना क्यों हो सकता है खतरनाक?
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि बिना डॉक्टर की सलाह टेस्टोस्टेरोन लेना शरीर के लिए नुकसानदायक हो सकता है. इसका गलत इस्तेमाल शरीर में प्राकृतिक हार्मोन बनने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है. इसके अलावा मुंहासे, बांझपन, रेड बल्ड सेल्स की संख्या बढ़ना, स्लीप एपनिया, पुरुषों में प्रोस्टेट से जुड़ी समस्याएं और कुछ लोगों में हार्ट संबंधी समस्याएं भी हो सकती हैं. वहीं महिलाओं में जरूरत से ज्यादा टेस्टोस्टेरोन लेने पर मुंहासे, चेहरे और शरीर पर ज्यादा बाल आना, आवाज भारी होना, पीरियड्स में गड़बड़ी और पुरुषों जैसे फिजिकल बदलाव हो सकते हैं.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ें - Cancer Treatment: क्या पपीते की पत्तियों से हो सकता है कैंसर का इलाज? नई रिसर्च पर छिड़ी बहस
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 21 Jul 2026 23:30:05 +0530</pubDate>
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        <title>Excessive Screen Time: मोबाइल की लत बना रही है &amp;apos;Smartphone Brain&amp;apos; का शिकार! युवाओं में बढ़ रहे ये लक्षण</title>
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        <description><![CDATA[ What Is Text Neck Syndrome Symptoms: कुछ साल पहले तक न्यूरोलॉजिस्ट के पास जाने का मतलब स्ट्रोक, पार्किंसन, मिर्गी या डिमेंशिया जैसी गंभीर बीमारियों से जुड़ा माना जाता था. ऐसे मरीजों में ज्यादातर बुजुर्ग होते थे और याददाश्त कमजोर होना या चलने-फिरने में परेशानी जैसी शिकायतें आम थीं. लेकिन अब यह तस्वीर तेजी से बदल रही है. आजकल न्यूरोलॉजिस्ट के पास बड़ी संख्या में युवा और किशोर ऐसे लक्षणों के साथ पहुंच रहे हैं, जिनका संबंध लंबे समय तक स्मार्टफोन इस्तेमाल करने की आदत से जोड़ा जा रहा है. बार-बार सिरदर्द होना, ध्यान न लगना, नींद खराब होना, चक्कर आना, दिमाग में धुंधलापन महसूस होना और छोटी-छोटी बातें भूल जाना जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं.
काम, पढ़ाई और लोगों से जुड़ने का तरीका बदला
सीके बिड़ला हॉस्पिटल्स, सीएमआरआई के न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. दीप दास के मुताबिक, मोबाइल फोन ने काम करने, पढ़ाई करने और लोगों से जुड़ने का तरीका बदल दिया है, लेकिन इसका जरूरत से ज्यादा और बिना कंट्रोल के इस्तेमाल ध्यान लगाने की क्षमता, नींद, मूड और दिमाग की कार्यक्षमता पर असर डाल सकता है.एक्सपर्ट लगातार नोटिफिकेशन आना, बिना रुके सोशल मीडिया स्क्रॉल करना और एक ऐप से दूसरे ऐप पर जाना दिमाग को हर समय सक्रिय बनाए रखता है. धीरे-धीरे दिमाग को लगातार नए उत्तेजना की आदत पड़ जाती है और फिर किसी एक काम पर लंबे समय तक ध्यान लगाना मुश्किल होने लगता है. यही वजह है कि कई युवा अब किताब पढ़ने, मीटिंग में बैठने या पढ़ाई करने के दौरान भी बार-बार फोन देखने लगते हैं.
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इन चीजों पर होता असर?
डॉक्टरों के अनुसार, स्मार्टफोन का असर सिर्फ ध्यान पर ही नहीं पड़ता, बल्कि नींद और याददाश्त पर भी दिखाई देता है. रात में देर तक फोन चलाने से आंखें ब्लू लाइट के संपर्क में रहती हैं, जिससे मेलाटोनिन हार्मोन का उत्पादन कम हो जाता है. यही हार्मोन शरीर के सोने और जागने के चक्र को नियंत्रित करता है. जब नींद पूरी नहीं होती, तो एकाग्रता और याददाश्त प्रभावित होती है. इसके साथ ही चिंता, अवसाद और लंबे समय तक रहने वाले सिरदर्द की समस्या भी बढ़ सकती है.
क्या होते हैं इसके लक्षण?
लंबे समय तक गर्दन झुकाकर मोबाइल देखने से गर्दन और कंधों की मांसपेशियों पर भी दबाव पड़ता है. इससे टेंशन हेडेक और माइग्रेन की समस्या बढ़ सकती है. इस स्थिति को &#039;टेक्स्ट नेक&#039; कहा जाता है. इसके अलावा लगातार स्क्रीन देखने से डिजिटल थकान भी होने लगती है, जिससे व्यक्ति मानसिक रूप से थका हुआ, चिड़चिड़ा और काम में रुचि न लेने वाला महसूस कर सकता है. कई लोगों को लंबे समय तक स्क्रीन इस्तेमाल करने के बाद नई जानकारी समझने और याद रखने में भी परेशानी होने लगती है.
डॉक्टरों का कहना है कि बच्चों और किशोरों पर इसका असर ज्यादा हो सकता है, क्योंकि उनका दिमाग अभी पूरी तरह विकसित नहीं हुआ होता. जरूरत से ज्यादा स्क्रीन टाइम उनकी पढ़ाई, नींद, शारीरिक गतिविधियों और सामाजिक व्यवहार को प्रभावित कर सकता है.&amp;nbsp;
क्या होते हैं इससे बचाव के तरीके?
एक्सपर्ट यह भी स्पष्ट करते हैं कि समस्या स्मार्टफोन नहीं, बल्कि उसका गलत इस्तेमाल है. वे 20-20-20 नियम अपनाने की सलाह देते हैं। यानी हर 20 मिनट बाद 20 सेकंड के लिए करीब 20 फीट दूर किसी चीज को देखें. इसके अलावा स्क्रीन से नियमित ब्रेक लें, सोने से कम से कम एक घंटे पहले फोन का इस्तेमाल बंद करें, सही तरीके से &amp;nbsp;बैठें, नियमित व्यायाम करें और रोज कुछ समय खुली हवा में बिताएं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 21 Jul 2026 23:30:04 +0530</pubDate>
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        <title>Joint Pain in Rain:  क्या बारिश में बढ़ जाता है जोड़ों और पुरानी चोट का दर्द? डॉक्टर ने बताया सच</title>
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        <description><![CDATA[ Joint Pain in Rain:&amp;nbsp; अगर आपको भी बारिश के मौसम में या मौसम ठंडा होते ही अपने जोड़ों या पुरानी चोट में दर्द महसूस होता है, तो आप अकेले नहीं हैं. बहुत से लोगों को शिकायत होती है कि जैसे ही बारिश शुरू होती है या मौसम बदलता है, उनके जोड़ों का दर्द या पुरानी चोट का दर्द फिर से उभर आता है. खासकर वे लोग जिन्हें अर्थराइटिस, फाइब्रोमायल्जिया, नर्व पेन, हाल ही में हुई सूजन या सर्जरी के बाद का दर्द है, उन्हें यह समस्या ज्यादा होती है. आखिर ऐसा क्यों होता है? इस सवाल का जवाब एनेस्थीसियोलॉजिस्ट और पेन मेडिसिन डॉक्टर कुनाल सूद ने अपने इंस्टाग्राम वीडियो में दिया है, बता दें कि डॉक्टर कुनाल सूद, MD, एनेस्थीसियोलॉजी और इंटरवेंशनल पेन मेडिसिन में डबल बोर्ड-सर्टिफाइड फिजिशियन हैं और उन्होंने वेन स्टेट यूनिवर्सिटी, डेट्रॉइट से अपनी रेजिडेंसी और फेलोशिप पूरी की है.&amp;nbsp;
बारिश और दर्द का क्या कनेक्शन है?
डॉक्टर सूद के मुताबिक, इसका मुख्य कारण है शरीर के अंदर बैरोमेट्रिक प्रेशर के दबाव में होने वाला बदलाव और ठंडा तापमान. जब बारिश आने वाली होती है, तो हवा का दबाव धीरे-धीरे बदलता है. इसके अलावा ठंडा मौसम शरीर के उन हिस्सों में खून का बहाव कम कर देता है, जिससे मांसपेशियां, टेंडन और टिशू अकड़े हुए और भारी महसूस होते हैं. डॉक्टर सूद बताते हैं कि किसी चोट, सर्जरी या सूजन वाली बीमारी के बाद वह हिस्सा पहले से ज्यादा कमजोर हो जाता है, और मौसम में आया यह छोटा सा बदलाव भी उस हिस्से को असर करने लगता है.&amp;nbsp;
ऐसे में बहुत से लोग यह सोचकर डर जाते हैं कि बारिश में दर्द बढ़ने का मतलब है कि अंदर कुछ नया नुकसान हो गया है.&amp;nbsp; लेकिन डॉक्टर सूद इस बात को साफ करते हैं कि ऐसा जरूरी नहीं है. उनका कहना है कि दर्द महसूस करने वाला सिस्टम पहले से कहीं ज्यादा संवेदनशील हो चुका होता है, इसलिए वह उन बदलावों को भी महसूस करने लगता है जिन्हें शरीर पहले नजरअंदाज कर देता था. यही वजह है कि कुछ लोगों को बारिश आने से पहले या बारिश के दौरान दर्द का एहसास होता है.&amp;nbsp;



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डॉक्टर की सलाह और सावधानी
अगर आपको भी अर्थराइटिस, फाइब्रोमायल्जिया, नर्व पेन, पुरानी सूजन या सर्जरी के बाद की तकलीफ है, तो मौसम बदलने पर हल्का दर्द या अकड़न होना सामान्य है.&amp;nbsp; फिर भी अगर दर्द बहुत ज्यादा बढ़ जाए या रोजमर्रा के काम में दिक्कत आने लगे, तो डॉक्टर से सलाह जरूर लें.&amp;nbsp;&amp;nbsp;
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        <pubDate>Mon, 20 Jul 2026 19:30:09 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>International Chess Day: क्या Chess खेलने से सच में बच्चों का दिमाग तेज होता है? जानिए डॉक्टर क्या कहते हैं</title>
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        <description><![CDATA[ International Chess Day 2026: हर साल 20 जुलाई को International Chess Day मनाया जाता है. शतरंज यानी Chess ऐसा खेल है, जिसमें दिमाग का खूब इस्तेमाल होता है. इसलिए कई लोग मानते हैं कि Chess खेलने से बच्चों का दिमाग तेज होता है. कई माता-पिता भी चाहते हैं कि उनका बच्चा Chess खेले, ताकि उसकी सोचने और समझने की क्षमता बेहतर हो सके. लेकिन क्या सिर्फ Chess खेलने से ही दिमाग तेज हो जाता है? आइए जानते हैं डॉक्टर इस बारे में क्या कहते हैं.
सोचने की आदत होती है बेहतर
डॉक्टरों का कहना है कि Chess खेलते समय बच्चों को हर चाल सोच-समझकर चलनी पड़ती है. उन्हें यह भी सोचना होता है कि सामने वाला खिलाड़ी अगली चाल क्या चल सकता है. इससे बच्चे जल्दबाजी में फैसला लेने की बजाय पहले सोचते हैं. धीरे-धीरे उनमें सही समय पर सही फैसला लेने की आदत बन सकती है.
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ध्यान लगाने में मिल सकती है मदद
Chess खेलते समय बच्चों का पूरा ध्यान खेल पर रहता है. अगर उनका ध्यान कुछ देर के लिए भी हट जाए, तो वे खेल हार सकते हैं. इसलिए यह खेल बच्चों की एकाग्रता बढ़ाने में मदद कर सकता है. डॉक्टरों का कहना है कि इसका फायदा पढ़ाई और दूसरी जरूरी चीजों में भी मिल सकता है.
याद रखने की ताकत बढ़ सकती है
Chess खेलते समय बच्चों को कई चालें, नियम और अलग-अलग तरीके याद रखने पड़ते हैं. इससे उनका दिमाग लगातार काम करता रहता है. डॉक्टरों के अनुसार, इससे याद रखने की क्षमता बेहतर हो सकती है. साथ ही बच्चे नई चीजें सीखने में भी रुचि दिखा सकते हैं.
धैर्य रखना भी सीखते हैं
Chess ऐसा खेल नहीं है, जिसे जल्दबाजी में खेला जाए. इसमें हर चाल सोचकर चलनी पड़ती है. कई बार जीतने के लिए लंबे समय तक इंतजार भी करना पड़ता है. इससे बच्चे धैर्य रखना सीखते हैं. साथ ही वे हर स्थिति को समझकर फैसला लेने की आदत भी बना सकते हैं.
हार और जीत दोनों से सीख मिलती है
Chess में हर बार जीत मिलना जरूरी नहीं होता. कई बार हार भी मिलती है. लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि हार से बच्चे अपनी गलतियों को समझना सीखते हैं. इससे वे अगली बार बेहतर खेलने की कोशिश करते हैं. यह आदत आगे चलकर पढ़ाई और जिंदगी के दूसरे कामों में भी काम आ सकती है.
सिर्फ Chess से नहीं होगा पूरा फायदा.
डॉक्टरों का कहना है कि सिर्फ Chess खेलने से ही बच्चे का दिमाग तेज नहीं हो जाता. इसके लिए अच्छी नींद, सही खाना, रोज थोड़ा खेलना-कूदना और पढ़ाई भी जरूरी है. जब ये सभी चीजें साथ होती हैं, तब बच्चे का दिमाग अच्छी तरह विकसित होता है. इसलिए Chess के साथ-साथ बच्चे की रोज की अच्छी आदतों पर भी ध्यान देना जरूरी है.
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        <pubDate>Mon, 20 Jul 2026 19:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Kissing Health Risks: गर्लफ्रेंड को किस करने से पहले पढ़ें यह जरूरी खबर, वरना एक भूल से हो सकते हैं बीमार</title>
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        <description><![CDATA[ Can Kissing Spread Diseases: किस करना प्यार जताने का एक सामान्य तरीका माना जाता है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि होंठों पर किया गया एक किस कुछ बीमारियों का कारण भी बन सकता है? दरअसल, किस के दौरान सिर्फ इमोशन ही नहीं, बल्कि लार का भी आदान-प्रदान होता है. इसी लार में मौजूद कुछ बैक्टीरिया और वायरस एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुंच सकते हैं. हालांकि हर किस नुकसानदायक नहीं होता, लेकिन कुछ परिस्थितियों में इससे इंफेक्शन फैलने का खतरा बढ़ सकता है.
किस करते समय क्या हो सकती है दिक्कत?
हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली वेबसाइट hawaiifamilydental के अनुसार, गहरे या फ्रेंच किस के दौरान दोनों लोगों के बीच लार का आदान-प्रदान होता है. लार में पानी, एंजाइम, इलेक्ट्रोलाइट्स और प्रोटीन के अलावा कई तरह के बैक्टीरिया और वायरस भी मौजूद होते हैं. माइक्रोबायोम जर्नल में प्रकाशित एक स्टडी के अनुसार, एक बार किस करने पर करीब 8 करोड़ (80 मिलियन) बैक्टीरिया एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुंच सकते हैं. इनमें से अधिकांश बैक्टीरिया नुकसान नहीं पहुंचाते, लेकिन अगर किसी व्यक्ति की इम्यून सिस्टम कमजोर हो, तो कुछ बैक्टीरिया इंफेक्शन का कारण बन सकते हैं.
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कौन सी बीमारी सबसे पहले फैलती है?
एक्सपर्ट के मुताबिक, किस के जरिए सबसे पहले सामान्य सर्दी-जुकाम फैलाने वाले वायरस एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुंच सकते हैं. अगर आपका पार्टनर सर्दी या जुकाम से पीड़ित है, तो इंफेक्शन का खतरा बढ़ जाता है. इसके अलावा मोनोन्यूक्लिओसिस, जिसे &#039;किसिंग डिजीज&#039; भी कहा जाता है, एप्सटीन-बार वायरस के कारण होती है और यह भी लार के जरिए फैल सकती है. इस बीमारी में थकान, बुखार और गर्दन की लसीका ग्लैंड्स में सूजन जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं.
इन बीमारियों का भी खतरा
इसके अलावा हर्पीज सिम्प्लेक्स वायरस-1 भी किस के जरिए फैल सकता है. खास बात यह है कि कई बार मुंह पर छाले दिखाई न देने पर भी यह वायरस लार के माध्यम से दूसरे व्यक्ति तक पहुंच सकता है. वहीं अगर किसी व्यक्ति को फ्लू है, तो किस करने के दौरान सांस की बूंदों के जरिए इंफ्लूएंजा वायरस फैलने की आशंका भी रहती है. मसूड़ों की बीमारी से जुड़े कुछ बैक्टीरिया भी लार के जरिए एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुंच सकते हैं, जिससे आगे चलकर मुंह से जुड़ी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है.
कब रहता है खतरा ज्यादा?
कुछ परिस्थितियां इंफेक्शन का खतरा और बढ़ा देती हैं. यदि आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर है, पार्टनर पहले से किसी इंफेक्शन से पीड़ित है, मुंह में कट या छाले हैं या ओरल हाइजीन ठीक नहीं है, तो इंफेक्शन होने की संभावना अधिक हो सकती है. हालांकि किस के सिर्फ नुकसान ही नहीं हैं.
कैसे रखें खुद को सुरक्षित?
अगर आप इंफेक्शन के खतरे को कम करना चाहते हैं, तो सबसे पहले मुंह की अच्छी सफाई का ध्यान रखें. नियमित रूप से ब्रश करें, फ्लॉस का इस्तेमाल करें और समय-समय पर डेंटल चेकअप कराएं. यदि आप या आपका पार्टनर बीमार है, तो पूरी तरह ठीक होने तक किस करने से बचें. मुंह पर कोल्ड सोर होने की स्थिति में भी नजदीकी संपर्क से बचना चाहिए.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 20 Jul 2026 19:30:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Sonam Wangchuk Health Update: एक साथ कितना वजन घटने पर मौत होनी तय? समझ लीजिए अपनी बॉडी का हेल्थ मैनेजमेंट</title>
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        <description><![CDATA[ Causes Of Sudden Unexplained Weight Loss: अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक का वजन लगातार घट रहा है. शुक्रवार (17 जुलाई) को उनकी भूख हड़ताल का 20वां दिन था, जिसके बाद उन्हें जंतर-मंतर से उठाकर सफदरजंग अस्पताल में एडमिट करा दिया गया. 28 जून से दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे प्रदर्शन के दौरान उन्होंने अन्न त्याग रखा है. डॉक्टरों के मुताबिक, पिछले 24 घंटे में उनका वजन 350 ग्राम और कम हुआ है. अब उनका वजन 56.55 किलोग्राम रह गया है. यानी अब तक उनका कुल वजन करीब 9.5 किलोग्राम कम हो चुका है.
मेडिकल टीम की ओर से जारी हेल्थ रिपोर्ट के अनुसार, वांगचुक का ब्लड प्रेशर 108/68 mm Hg, ब्लड शुगर 80 mg/dL, पल्स रेट 72 प्रति मिनट और ऑक्सीजन सैचुरेशन 96 प्रतिशत दर्ज किया गया. डॉक्टरों ने बताया कि उनमें हल्के डिहाइड्रेशन के लक्षण हैं, हालांकि उनकी मेंटल स्थिति सामान्य और सतर्क बनी हुई है. आइए जानते हैं कि एक साथ कितना वजन घटने पर मौत होनी तय है?&amp;nbsp;
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लंबे समय तक भूखे रहने पर शरीर में क्या होता है?
बीबीसी साइंस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, आखिरी बार खाना खाने के एक-दो दिन बाद शरीर में लिवर और मसल्स में जमा ग्लाइकोजन लगभग खत्म हो जाता है. इसके बाद शरीर एनर्जी के लिए जमा फैट को तोड़कर केटोन बनाने लगता है. हालांकि ब्रेन और रेड ब्लड सेल्स केवल केटोन से काम नहीं चला सकतीं. इन्हें ग्लूकोज की जरूरत होती है, जिसके लिए शरीर मांसपेशियों को तोड़ना शुरू कर देता है. यही वजह है कि लंबे समय तक भोजन न मिलने पर केवल फैट ही नहीं, बल्कि शरीर की जरूरी मांसपेशियां भी कमजोर होने लगती हैं. इनमें हार्ट की मांसपेशियां भी शामिल हैं. यदि ये अत्यधिक कमजोर हो जाएं तो हार्ट काम करना बंद कर सकता है और यह स्थिति जानलेवा बन सकती है.
कितना वजन घटना जानलेवा माना जाता है?
डॉक्टरों के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति का कुल वजन 40 से 50 प्रतिशत तक कम हो जाए तो यह जिंदगी के लिए गंभीर खतरा माना जाता है, चाहे शुरुआत में उसका वजन कितना भी रहा हो. पूरी तरह भोजन बंद होने की स्थिति में आमतौर पर 8 से 12 सप्ताह के भीतर मौत का खतरा पैदा हो सकता है. हालांकि यदि शरीर को थोड़ी-बहुत कैलोरी और पर्याप्त प्रोटीन मिलता रहे तो व्यक्ति अपेक्षाकृत अधिक समय तक जीवित रह सकता है, क्योंकि शरीर एनर्जी के लिए फैट का उपयोग करता रहता है.
तेजी से वजन घटना भी बढ़ा सकता है मौत का खतरा
हाल ही में बीएमजी जर्नल हार्ट में पब्लिश एंग्लिया रस्किन यूनिवर्सिटी के एक स्टडी में यह भी सामने आया कि मोटापे और हार्ट रोग से जूझ रहे लोगों में वजन का बहुत तेजी से घटना या बढ़ना, दोनों ही मौत के खतरे को बढ़ा सकते हैं. करीब 8,297 लोगों पर लगभग 14 साल तक किए गए इस अध्ययन में पाया गया कि जिन लोगों का वजन 10 किलोग्राम से ज्यादा बढ़ा, उनमें हार्ट संबंधी मौत का खतरा तीन गुना तक बढ़ गया. वहीं जिन लोगों का वजन 10 किलोग्राम से अधिक घटा, उनमें किसी भी कारण से मौत का जोखिम 54 प्रतिशत ज्यादा पाया गया.
डॉक्टर क्या सलाह देते हैं?
अध्ययन से जुड़े एंग्लिया रस्किन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर बारबरा पियर्सियोनेक, डॉ. रुडोल्फ शुट्टे और डॉ. जुफेन झांग का कहना है कि खासकर हार्ट रोग से पीड़ित मोटापे के मरीजों के लिए शरीर का वजन स्थिर बनाए रखना बेहद जरूरी है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 18 Jul 2026 23:30:05 +0530</pubDate>
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        <title>World Emoji Day 2026: चैटिंग में दिन&amp;रात इमोजी का इस्तेमाल, क्या &amp;apos;इमोजी चैटिंग&amp;apos; से बढ़ रही स्ट्रेस?</title>
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        <description><![CDATA[ World Emoji Day 2026: आज के डिजिटल दौर के हर चैट बॉक्स में इमोजी का इस्तेमाल बेहद बढ़ गया है. दुख, दर्द, गुस्सा, मजाक, प्यार, धन्यवाद और हर तरह के भावना के लिए अलग अलग इमोजी मौजूद हैं. जो लोग अपनी बाद शब्दों के माध्यम से समझा नहीं पाते, वह इमोजी भेजते हैं. असल में कई बार ये इमोजी किसी लंबे मैसेज से ज्यादा प्रभावशाली भावनाएं व्यक्त करते हैं. जैसे-जैसे बातचीत में इन इमोजी का इस्तेमाल बढ़ रहा है, वैसे-वैसे &#039;इमोजी स्ट्रेस&#039; भी बढ़ती जा रही है, जो आगे चलकर मानसिक तनाव का कारण बन रही है.&amp;nbsp;
विशेषज्ञों का मानना है कि इमोजी खुद तनाव की वजह नहीं हैं, लेकिन इनका जरूरत से ज्यादा इस्तोमाल कई बार गलतफहमी, जवाब मिलने की चिंता और भावनात्मक दबाव बढ़ा सकती है. ऐसे में यह समझना जरूरी है कि इमोजी का इस्तेमाल कब और कितना करना सही है. आज 17 जुलाई को विश्व इमोजी दिवस (World Emoji Day) पर आइए जानते हैं &#039;इमोजी स्ट्रेस&#039; के बारे में...
बॉडी लैंग्वेज से डिजिटल बॉडी लैंवेज तक का सफर
नई पीढ़ी बातचीत में इमोजी को डिजिटल बॉडी लैंगवेज की तरह देखते हैं. चेहरे के हावभाव और आमने-सामने की बातचीत की जगह जेन जी के लिए डिजिटल बॉडी लैंग्वेज बेहद ज़रूरी है. शब्दों में टोन और चेहरे के हाव-भाव जोड़ने के लिए वे इमोजी का इस्तेमाल करते हैं. बिना इमोजी बातचीत का टेक्स्ट उन्हें रूखा या गुस्से वाला लगता है.&amp;nbsp;&amp;nbsp;
हर व्यक्ति के लिए एक जैसा नहीं होता इमोजी&amp;nbsp;
एक ही इमोजी को अलग-अलग लोग अलग तरीके से समझ सकते हैं. उदाहरण के लिए, किसी के लिए ???? सामान्य मुस्कान हो सकती है, जबकि दूसरा व्यक्ति इसे औपचारिक या ठंडा जवाब मान सकता है. इस तरह कभी-कभी लोग अपनी उदासी या परेशानी को छुपाने के लिए हैप्पी इमोजी (????, ????) भेजते हैं. ऐसी सूरत से मानसिक तनाव बढ़ सकता है. वहीं, बिना शब्दों के केवल इमोजी जैसे- ???? से चैट करने से बातचीत में गहराई कम हो जाती है. इससे यह अहसास हो सकता है कि बातचीत सिर्फ एकतरफा हो गई है, जिससे व्यक्ति अकेलापन महसूस करता है.
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शब्दों की जगह सिर्फ इमोजी पर निर्भर रहना सही नहीं
इमोजी भावनाओं को बेहतर तरीके से व्यक्त करने में मदद करते हैं, लेकिन हर बात केवल इमोजी से कहना हमेशा पर्याप्त नहीं होता. जरूरी बातचीत में साफ शब्दों का इस्तेमाल गलतफहमियों की संभावना कम कर सकता है.&amp;nbsp;सोचिए अगर दिनरात की बातचीत सिर्फ चैट और इमोजी तक सीमित हो जाए, तो आमने-सामने संवाद कम हो सकता है. इसलिए एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि &amp;nbsp;समय-समय पर परिवार और दोस्तों से सीधे बातचीत करें, क्योंकि इससे भावनाएं बेहतर तरीके से व्यक्त हो पाती हैं.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Fri, 17 Jul 2026 19:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Sonam Wangchuk Hunger Strike: लंबे वक्त तक भूख हड़ताल से कौन&amp;से अंग सबसे पहले होते हैं खराब, कब फेल होने लगता है सिस्टम?</title>
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        <description><![CDATA[ लद्दाख के पर्यावरण को बचाने और उसे छठी अनुसूची का दर्जा दिलाने के लिए मशहूर पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक कई बार लंबी भूख हड़ताल कर चुके हैं. शून्य से भी नीचे के तापमान में, खुले आसमान के नीचे 21 दिन तक सिर्फ पानी और नमक के सहारे जिंदा रहना आसान नहीं है. क्या आपने कभी सोचा है कि जब कोई इंसान हफ्तों तक अन्न का एक भी दाना नहीं खाता तो उसके शरीर के अंदर क्या चल रहा होता है? आइए समझते हैं कि भूख हड़ताल के दौरान शरीर का सिस्टम कैसे काम करता है? कौन-सा अंग सबसे पहले जवाब देता है और मेडिकल साइंस ऐसे लोगों की जान कैसे बचाता है?
शरीर का अपना &#039;बैकअप सिस्टम&#039;
जब आप खाना बंद करते हैं तो शरीर घबराता नहीं है. पहले 24 से 48 घंटे तक शरीर अपने लिवर और मांसपेशियों में जमा ग्लूकोज का इस्तेमाल एनर्जी के लिए करता है. जब यह खत्म हो जाता है तो शरीर केटोसिस नामक प्रोसेस में चला जाता है. इसमें शरीर एनर्जी के लिए अपने जमा फैट को जलाना शुरू कर देता है. इस दौरान बहुत तेज भूख लगती है. कमजोरी महसूस होती है और सिरदर्द होता है. वांगचुक जैसे सत्याग्रही इसी शुरुआती और सबसे मुश्किल तकलीफ को अपने मजबूत इरादों से हराते हैं.
जब खुद को ही &#039;खाने&#039; लगता है शरीर
लगभग एक हफ्ते बाद शरीर की सारी चर्बी पिघलकर खत्म होने लगती है. अब जिंदा रहने के लिए शरीर के पास कोई विकल्प नहीं बचता, इसलिए वह अपनी ही मांसपेशियों को तोड़कर एनर्जी बनाने लगता है. इसे स्टार्वेशन मोड कहते हैं. इंसान का वजन तेजी से गिरने लगता है. हड्डियां दिखने लगती हैं और उठने-बैठने में भी आंखों के सामने अंधेरा छाने लगता है. ब्लड प्रेशर और पल्स रेट खतरनाक स्तर तक नीचे गिर जाते हैं.
सबसे पहले कौन-सा अंग करता है काम करना बंद?
यहीं वह पड़ाव है, जहां शरीर अंदर से टूटने लगता है. भूख हड़ताल में सबसे पहला और सबसे घातक प्रहार किडनी और हार्ट पर होता है.

किडनी का फेल होना: जब शरीर अपनी ही मांसपेशियों को तोड़ता है तो खून में जहरीले तत्व बढ़ने लगते हैं. इन्हें छानकर बाहर निकालने का काम किडनी का होता है. भोजन न मिलने से शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स (पोटैशियम, सोडियम) का संतुलन बिगड़ जाता है. पानी के अलावा कोई पोषक तत्व न मिलने के कारण किडनी पर इन जहर को साफ करने का काफी ज्यादा प्रेशर पड़ता है और वह सबसे पहले काम करना बंद करने लगती है. इसे एक्यूट किडनी इंजरी कहा जाता है.
हार्ट पर मंडराता खतरा: शरीर में पोटैशियम और मैग्नीशियम कम होते ही दिल की धड़कनें अनियमित हो जाती हैं. हार्ट के लिए खून पंप करना मुश्किल हो जाता है. लंबी भूख हड़ताल में हार्ट अटैक से मौत का खतरा सबसे ज्यादा रहता है.

कब पूरी तरह फेल हो जाता है सिस्टम?
मेडिकल साइंस के अनुसार, 3 हफ्ते बाद शरीर का पूरा सिस्टम शटडाउन की तरफ बढ़ने लगता है. यही वजह है कि सोनम वांगचुक ने अक्सर अपने अनशन की सीमा 21 दिन ही रखी है, क्योंकि इसके बाद मौत का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है.
आखिरी स्टेज में कैसे बचती है जान?
जब कोई व्यक्ति 21 दिन या उससे ज्यादा लंबी भूख हड़ताल तोड़ता है तो जान बचाना बहुत नाजुक प्रक्रिया होती है. उसे तुरंत रोटी या चावल नहीं दिया जा सकता. अगर भूखे इंसान को अचानक भारी खाना खिला दिया जाए तो शरीर उसे बर्दाश्त नहीं कर पाता. इस स्थिति को रीफीडिंग सिंड्रोम कहते हैं, जिससे हार्ट फेल हो सकता है और तुरंत मौत हो सकती है.
जान बचाने का मेडिकल तरीका

ड्रिप का सहारा: सबसे पहले नसों में ड्रिप के जरिए इलेक्ट्रोलाइट्स (पोटैशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम) और जरूरी विटामिन्स सीधे खून में पहुंचाए जाते हैं.
लिक्विड पदार्थ: मरीज को नींबू पानी, नारियल पानी या बहुत पतले जूस की कुछ-कुछ बूंदें या चम्मच से लिक्विड चीजें दी जाती हैं. आपने देखा होगा कि सोनम वांगचुक अपना अनशन हमेशा जूस पीकर ही तोड़ते हैं.
हफ्तों की निगरानी: लगातार अनशन से पाचन तंत्र पूरी तरह सिकुड़ जाता है. ऐसे में डॉक्टरों की निगरानी में मरीज को कई हफ्तों तक रहना पड़ता है और धीरे-धीरे सॉलिड फूड देकर उसे ठीक किया जाता है.

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        <pubDate>Fri, 17 Jul 2026 19:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Sonam, Wangchuk, Hunger, Strike:, लंबे, वक्त, तक, भूख, हड़ताल, से, कौन-से, अंग, सबसे, पहले, होते, हैं, खराब, कब, फेल, होने, लगता, है, सिस्टम</media:keywords>
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        <title>COVID&amp;19 Cases: आंध्र प्रदेश में कोरोना के 12 नए मामले आए सामने, 4 की मौत; स्वास्थ्य विभाग ने कहा&amp; घबराएं नहीं</title>
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        <description><![CDATA[ आंध्र प्रदेश में एक बार फिर कोविड-19 के मामले सामने आए हैं. 26 जून से 16 जुलाई के बीच राज्य के चार अलग-अलग जिलों में कोरोना के 12 नए मरीजों की पुष्टि हुई है. इस दौरान 4 मरीजों की जान भी गई है, लेकिन स्वास्थ्य विभाग ने स्पष्ट किया है कि आम जनता को घबराने की बिल्कुल जरूरत नहीं है.
मौत की मुख्य वजह पुरानी गंभीर बीमारियां
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग के सचिव वीरा पांडियन ने बताया कि जिन 4 मरीजों (कडप्पा के 3 और काकीनाडा के 1) की जान गई है, वे पहले से ही गंभीर बीमारियों से जूझ रहे थे. उन्हें हाई बीपी, शुगर और किडनी से जुड़ी पुरानी समस्याएं थीं.
कहां-कितने मरीज मिले?
26 जून से 15 जुलाई के बीच कुल 67 लोगों का कोविड टेस्ट किया गया, जिनमें से 12 लोग पॉजिटिव निकले. बता दें कि काकीनाडा के एक मरीज का टेस्ट तमिलनाडु के वेल्लोर में हुआ था.
किस जिले में कितने मिले मरीज?&amp;nbsp;

कडप्पा: 8 मरीज. यहां 26 जून को साल का पहला केस मिला था
गुंटूर: 2 मरीज
विशाखापट्टनम: 1 मरीज
काकीनाडा: 1 मरीज

राहत की बात यह है कि ये सभी मामले अलग-अलग जगहों से आए हैं. किसी भी एक इलाके में बहुत सारे मरीज एक साथ नहीं मिले हैं. इसका मतलब है कि फिलहाल कोविड का क्लस्टर नहीं बन रहा है.
मरीजों की मौजूदा स्थिति

होम आइसोलेशन: 3 मरीज
अस्पताल में भर्ती: 2 मरीज
डिस्चार्ज: 3 मरीज
कुल मौतें: 4

बता दें कि वायरस के वैरिएंट का पता लगाने के लिए 9 जुलाई को 5 सैंपल पुणे की नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (NIV) लैब भेजे गए हैं.
देश के बाकी राज्यों का क्या है हाल?
1 जुलाई से अब तक पूरे देश में कोरोना के कुल 339 मामले सामने आ चुके हैं. कुछ प्रमुख राज्यों की स्थिति इस तरह है.

केरल: 115 केस
कर्नाटक: 64 केस
महाराष्ट्र: 43 केस
तमिलनाडु: 39 केस
अंडमान-निकोबार: 18 केस
दिल्ली: 18 केस
राजस्थान: 12 केस

स्वास्थ्य मंत्री ने की यह अपील
आंध्र प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री सत्य कुमार यादव ने अपील की है कि सरकार पूरी स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है. सभी अस्पतालों, डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ को अलर्ट कर दिया गया है. लोग किसी भी तरह की दहशत में न आएं. बस जरूरी सावधानियां बरतें और स्वास्थ्य विभाग के दिशा-निर्देशों का पालन करें.
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        <pubDate>Fri, 17 Jul 2026 19:30:06 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Climate Change Sleep Loss: सावधान! बढ़ते तापमान ने उड़ाई इंसानों की नींद, साल में 56 घंटे कम सो रहे हैं लोग</title>
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        <description><![CDATA[ Climate Change Impact On Sleep: क्लाइमेट चेंज अब सिर्फ मौसम तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसका असर लोगों की नींद पर भी साफ दिखाई देने लगा है. एक नए एनालिसिस के अनुसार, बढ़ते तापमान की वजह से दुनिया भर में लोग औसतन साल में 56 घंटे कम सो रहे हैं. सबसे ज्यादा असर उन इलाकों में देखा गया है, जहां रात का तापमान लगातार बढ़ रहा है. एक्सपर्ट का कहना है कि नींद की कमी हार्ट रोग, मेंटल हेल्थ, कमजोर इम्यूनिटी और कामकाज की क्षमता में गिरावट जैसी कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकती है.
1,338 प्रमुख शहरों को शामिल किया गया
क्लाइमेट सेंट्रल की ओर से किए गए इस एनालिसिस में दुनिया के 1,338 प्रमुख शहरों को शामिल किया गया. इसमें भारत के 107 शहरों का भी स्टडी किया गया. रिपोर्ट के मुताबिक, भारत उन देशों में शामिल है जहां क्लाइमेट चेंज के कारण लोगों की नींद पर सबसे ज्यादा असर पड़ा है. खासकर दक्षिण भारत के शहरों में रहने वाले लोग हर साल 78 से 91 घंटे तक की नींद गंवा रहे हैं, जिनमें से 8 से 9 घंटे की नींद सीधे जलवायु परिवर्तन के कारण कम हो रही है.&amp;nbsp;
कौन से शहर सबसे ज्यादा प्रभावित?
रिपोर्ट के अनुसार, तमिलनाडु इस मामले में सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य है. यहां हर व्यक्ति की नींद में क्लाइमेट चेंज के कारण हर साल औसतन 7.9 घंटे की अतिरिक्त कमी दर्ज की गई है. वहीं, देश के बड़े महानगरों में चेन्नई सबसे ज्यादा प्रभावित रहा, जहां लोग साल में करीब 93 घंटे कम सो रहे हैं. इसके बाद मुंबई में 84 घंटे और कोलकाता में 80 घंटे की नींद कम होने का अनुमान लगाया गया है.
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एक समय ठंडी रातों के लिए पहचाने जाने वाले बेंगलुरु और देहरादून जैसे शहर भी अब बढ़ते तापमान की चपेट में हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, 1970 के दशक में बेंगलुरु के लोग साल में लगभग 59 घंटे की नींद गंवाते थे, लेकिन 2025 तक यह आंकड़ा बढ़कर 67 घंटे हो गया. इनमें 8 घंटे की अतिरिक्त नींद की कमी सीधे जलवायु परिवर्तन से जुड़ी है, जो देश के प्रमुख महानगरों में सबसे अधिक है. वहीं, देहरादून में पिछले पांच वर्षों के दौरान नींद की कमी में करीब 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई.
महाराष्ट्र के 22 शहरों में रहने वाले लोग औसतन 76.3 घंटे की नींद हर साल खो रहे हैं, जिनमें से 5.8 घंटे क्लाइमेट चेंज की वजह से कम हो रहे हैं. वहीं, उत्तर प्रदेश के 11 शहरों में लोगों की सालाना नींद करीब 69 घंटे कम हो रही है और इसमें 4.9 घंटे की कमी सीधे बढ़ते तापमान से जुड़ी है.
कमी अब कम से कम दोगुनी&amp;nbsp;
रिपोर्ट बताती है कि 1970 के दशक की तुलना में तापमान बढ़ने के कारण होने वाली नींद की कमी अब कम से कम दोगुनी हो चुकी है. वर्ल्ड स्तर पर मध्य पूर्व के शहरों में इसका सबसे ज्यादा असर देखा गया, जबकि दक्षिण भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई हिस्से भी इस सूची में शामिल हैं. रिसर्चर का मानना है कि अगर रात के तापमान में इसी तरह बढ़ोतरी जारी रही, तो आने वाले वर्षों में नींद की समस्या और उससे जुड़ी स्वास्थ्य चुनौतियां और गंभीर हो सकती हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 17 Jul 2026 19:30:04 +0530</pubDate>
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        <title>Cervical Pain: ऑफिस हो या घर, ये छोटी&amp;छोटी लापरवाहियां बन सकती हैं सर्वाइकल की वजह</title>
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        <description><![CDATA[ Cervical Pain: आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी और तेजी से बदलती लाइफस्टाइल में सर्वाइकल एक आम बीमारी बन चुकी है. हर दूसरा व्यक्ति सर्वाइकल के दर्द से पीड़ित है. इसका दर्द इतना खतरनाक होता है कि एक सेकेंड भी सुकून से रहना भारी है. सर्वाइकल के दर्द को केवल वही लोग समझ सकते हैं जो इस बीमारी से पीड़ित हैं. इसका दर्द इतना खतरनाक होता है कि ना तो आप ढंग से बैठ पाते हैं और न ही अच्छे से लेट पाते हैं. इसलिए चाहें आप ऑफिस में हों या घर में, छोटी-छोटी लापरवाही की वजह से आप भी इसका शिकार हो सकते हैं.&amp;nbsp;
सर्वाइकल क्या होता है?
साधारण भाषा में सर्वाइकल का मतलब गर्दन और रीढ़ की हड्डी से जुड़ी समस्या से होता है. हमारी रीढ़ की हड्डी का ऊपरी हिस्सा, जिसमें 7 हड्डियां (C1 से C7) होती हैं, उसे सर्वाइकल स्पाइन कहा जाता है. जब इस हिस्से में दर्द, अकड़न, नस पर दबाव या डिस्क से जुड़ी समस्या होती है, तो लोग इसे सर्वाइकल की समस्या कहते हैं.
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सर्वाइकल कैसे होता है?
सर्वाइकल की समस्या तब होती है, जब गर्दन की रीढ़ की हड्डियों, डिस्क या नसों पर दबाव पड़ने लगता है. इसकी वजह से गर्दन में दर्द, अकड़न और कई बार कंधे व हाथ तक दर्द फैल सकता है, जिनसे व्यक्ति को बहुत दिक्कत होती है.
सर्वाइकल होने के मुख्य कारण:

ज्यादा देर तक लैपटॉप के सामने झुक कर काम करना.
ज्यादा देर तक गर्दन नीची करके फोन का इस्तेमाल करना.
एक ही पोजीशन में घंटो बैठे रहना.
भारी वजन उठाने से अचानक गर्दन पर जोर पड़ना.

सर्वाइकल का इलाज क्या है?
सर्वाइकल का इलाज इस बात पर निर्भर करता है कि समस्या कितनी ज्यादा है. अगर शुरुआत में ही ध्यान दिया जाए तो आराम मिलना संभव है, नहीं तो इस बीमारी में ऑपरेशन की संभावना आ जाती है. जानकारी के लिए बता दें की डॉक्टर की सलाह से दर्द और सूजन कम करने वाली दवा ली जा सकती है, साथ ही फिजियोथेरेपी कराने से गर्दन की मांसपेशियां मजबूत होती हैं और दर्द कम होता है.
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        <pubDate>Fri, 17 Jul 2026 19:30:03 +0530</pubDate>
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        <title>Dengue Outbreak in Mumbai: बारिश के साथ बढ़ा बीमारियों का खतरा! मुंबई में डेंगू&amp;स्वाइन फ्लू के मामले तेजी से बढ़े</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/dengue-outbreak-in-mumbai-बारिश-के-साथ-बढ़ा-बीमारियों-का-खतरा-मुंबई-में-डेंगू-स्वाइन-फ्लू-के-मामले-तेजी-से-बढ़े</link>
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        <description><![CDATA[ Dengue Outbreak in Mumbai: देश भर में मानसून ने अपना आगमन शुरू कर दिया है, लेकिन मुंबई में इसका असर कुछ ज्यादा ही देखने को मिल रहा है. मुंबई में लगातार धाराधार बारिश की खबरें सामने आती जा रही हैं. यह परेशानी अभी खत्म हुई नहीं थी कि अब नई परेशानी ने अपना आगमन दे दिया है.&amp;nbsp; वह है डेंगू, लेप्टोस्पायरोसिस और स्वाइन फ्लू जैसी बीमारियों का खतरा, जो फिर से बढ़ गया है.&amp;nbsp; इसका कारण साफ है कि शहर भर में भारी बारिश के कारण जगह-जगह पानी और गंदगी का इकट्ठा हो जाना. यही वजह है कि इन बीमारियों के मामले बढ़ने लगे हैं. ऐसे में यह जानना बहुत जरूरी है कि इन बीमारियों से खुद को और अपने परिवार को कैसे सुरक्षित रखा जाए. आइए जानते हैं इसके बारे में पूरी जानकारी.
मुंबई में क्यों बढ़ रहा है बीमारियों का खतरा?
मुंबई में पिछले कुछ दिनों से भारी बारिश हो रही है, जिसके कारण शहर के कई हिस्सों में जलजमाव हो गया है. रिपोर्ट के मुताबिक जमे हुए पानी में चलने से लोगों के बीच लेप्टोस्पायरोसिस होने का खतरा ज्यादा होता है, खासकर तब अगर उनके शरीर पर कट, घाव या मामूली खरोंच हो. यही वजह है कि हाल ही में BMC &amp;nbsp;(Brihanmumbai Municipal Corporation) ने चेतावनी देते हुए लोगों से अपील की है कि वे इन बीमारियों से खुद को बचाएं.
इस बात को गंभीरता से लेने के पीछे इसके बढ़ते आंकड़े हैं.&amp;nbsp; बता दें कि पिछले साल के आंकड़ों के अनुसार जुलाई के आखिरी हफ्तों में डेंगू के मामलों में करीब 58 प्रतिशत और लेप्टोस्पायरोसिस के मामलों में करीब 79 प्रतिशत तक की तेज बढ़ोतरी देखी गई थी. इस साल भी मानसून के दौरान ऐसे ही हालात बनने का खतरा बना हुआ है.
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BMC की तैयारी और सावधानी की सलाह
BMC ने लोगों को सतर्क रहने के साथ-साथ मानसून से पहले ही इस समस्या से निपटने के लिए बड़ा अभियान शुरू कर दिया था.&amp;nbsp; जिसमें निगम के कीटनाशक विभाग ने कुछ महीनों में शहर के अलग-अलग हिस्सों में हजारों बार दौरा किया और 30 लाख से ज्यादा घरों के आसपास फॉगिंग करवाई, ताकि मच्छरों के पैदा होने की जगहों को खत्म किया जा सके.
इसके बावजूद स्वास्थ्य विभाग ने लोगों से अपील की है कि जो लोग जमा हुए बारिश के पानी या कीचड़ से होकर गुजरे हैं, वे 24 से 72 घंटों के भीतर डॉक्टर की सलाह लें. साथ ही विभाग ने यह भी कहा कि मानसून के मौसम में बुखार को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. ऐसे में उन्हें घरेलू उपाय करने के बजाय तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Thu, 16 Jul 2026 15:30:16 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>AIIMS Delhi ने रचा इतिहास! 4 महीने के मासूम की दुनिया की सबसे दुर्लभ लंग सर्जरी सफल</title>
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        <description><![CDATA[ AIIMS दिल्ली के डॉक्टरों ने महज चार महीने के एक बच्चे की बेहद जटिल फेफड़ों की सर्जरी सफलतापूर्वक की. बच्चे में जन्म से पहले ही दोनों फेफड़ों से जुड़ी एक दुर्लभ बीमारी कंजेनिटल पल्मोनरी एयरवे मालफॉर्मेशन (CPAM) का पता चला था. डॉक्टरों ने पूरे फेफड़े का हिस्सा निकालने के बजाय सिर्फ खराब हिस्से को हटाया, जिससे बच्चे के स्वस्थ फेफड़े के हिस्से को बचाया जा सका. इस सर्जरी की खास बात यह रही कि ऑपरेशन के महज दो दिन बाद ही बच्चे को अस्पताल से छुट्टी भी दे दी गई.
AIIMS के मुताबिक, 4 महीने के इतने छोटे बच्चे में इस तरह की सेगमेंटेक्टॉमी (फेफड़े के सिर्फ प्रभावित हिस्से को हटाने की सर्जरी) दुनिया में सामने आए सबसे कम उम्र के और बेहद दुर्लभ मामलों में शामिल है.
क्या है CPAM बीमारी?
डॉक्टरों के मुताबिक, कंजेनिटल पल्मोनरी एयरवे मालफॉर्मेशन (CPAM) फेफड़ों की एक जन्मजात बीमारी है. इसमें गर्भ में बच्चे के फेफड़े का कोई हिस्सा ठीक से विकसित नहीं हो पाता और वहां सिस्ट यानी छोटी-छोटी थैली जैसी संरचनाएं बन जाती हैं. यह हिस्सा सामान्य फेफड़े की तरह काम नहीं कर पाता.
आमतौर पर यह बीमारी एक ही फेफड़े में होती है, लेकिन इस बच्चे के दोनों फेफड़े प्रभावित थे. ऐसे में डॉक्टर पूरे फेफड़े का बड़ा हिस्सा नहीं निकाल सकते थे, क्योंकि इससे भविष्य में बच्चे के पास पर्याप्त स्वस्थ फेफड़ा नहीं बचता. ऐसे में डॉक्टरों ने सिर्फ बीमारी वाले हिस्से को हटाने का फैसला किया.
क्यों मुश्किल थी यह सर्जरी?
फेफड़े कई छोटे-छोटे हिस्सों में बंटे होते हैं, जिन्हें सेगमेंट कहा जाता है. पूरे हिस्से को निकालना आसान होता है, लेकिन सिर्फ खराब हिस्से को निकालना काफी मुश्किल होता है, क्योंकि फेफड़े के अंदर मौजूद नसों और सांस की नलियों को बहुत सावधानी से अलग करना पड़ता है.
इस बच्चे के दाएं फेफड़े के निचले हिस्से के सेगमेंट-9 और सेगमेंट-10 को हटाया गया. डॉक्टरों के मुताबिक, ये फेफड़े के सबसे मुश्किल हिस्सों में माने जाते हैं, क्योंकि इनकी नसें और सांस की नलियां फेफड़े के अंदर काफी गहराई में होती हैं.
AIIMS की टीम ने किया ऑपरेशन
इस सर्जरी का नेतृत्व AIIMS दिल्ली के पीडियाट्रिक सर्जरी विभाग के प्रोफेसर विशेष जैन ने किया. ऑपरेशन के दौरान एनेस्थीसिया विभाग के डॉ. अभिषेक ने बच्चे की सांस को सुरक्षित रखने के लिए विशेष तकनीक का इस्तेमाल किया.
AIIMS के पीडियाट्रिक सर्जरी विभाग के प्रमुख डॉ. संदीप अग्रवाल ने कहा कि इतने छोटे बच्चे में इस तरह की सर्जरी करना बड़ी उपलब्धि है. उन्होंने बताया कि यह सफलता पूरी टीम की मेहनत और AIIMS की आधुनिक सुविधाओं की वजह से संभव हो पाई. AIIMS के मुताबिक, ऑपरेशन पूरी तरह सफल रहा और बच्चे को किसी तरह की परेशानी नहीं हुई. सर्जरी के दो दिन बाद ही उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई.
कुछ महीने बाद होगी बाएं फेफड़े की सर्जरी&amp;nbsp;
डॉक्टरों के मुताबिक, अभी बच्चे के दाएं फेफड़े का इलाज किया गया है, क्योंकि बीमारी दोनों फेफड़ों में थी, इसलिए बाएं फेफड़े के प्रभावित हिस्से की सर्जरी कुछ महीनों बाद की जाएगी. तब तक डॉक्टर बच्चे की लगातार निगरानी करेंगे. डॉक्टरों को उम्मीद है कि फेफड़े के स्वस्थ हिस्से को बचाने वाली इस सर्जरी से बच्चे की आगे की जिंदगी में फेफड़ों की कार्यक्षमता बेहतर बनी रहेगी.
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        <pubDate>Thu, 16 Jul 2026 15:30:15 +0530</pubDate>
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        <title>Monsoon Health Care Tips: मानसून सीजन में जल्दी बीमार पड़ जाते हैं बच्चे, ऐसे रखें उनकी सेहत का ख्याल?</title>
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        <description><![CDATA[ Monsoon Health Care Tips: बच्चे कितने जिद्दी होते हैं यह तो हम सब जानते है और खेलने के मामले में तो वे किसी की नहीं सुनते. बस जब मन करें घर से खेलने निकल जाते हैं. चाहें बारिश हो या धूप, उनको बस खेलने से मतलब हैं. ऐसे में पेरेंट्स के सामने सबसे बड़ी परेशानी होती है बदलते मौसम में बच्चों को बारिश में भीगने से रोकना. क्योंकि बारिश के पानी में भीगने के बाद बच्चे कई बार तो बिना कपड़े बदले और बिना नहाऐ ही दूसरे कामों में व्यस्त हो जाते हैं, जिससे बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है. ऐसे में पेरेंट्स को बारिश के मौसम में बच्चों का ज्यादा ख्याल रखना होता है. आइए जानता है पेरेंट्स को क्या करना चाहिए.&amp;nbsp;
मानसून में कैसे रखें बच्चों का ख्याल?
बारिश के मौसम में नमी और दूषित पानी के वजह से बुखार, खांसी, डेंगू, और पेट सम्बन्धी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है. इसका असर बच्चों पर ज्यादा देखने को मिलता है. ऐसे में बच्चों के खान-पान और पानी का पूरा ख्याल रखना जरूरी होता है. साथ ही बच्चों को बाहर के खान-पान से दूर रखें और उन्हें हमेशा साफ और उबला हुआ या फिल्टर किया हुआ ही पानी पिलाएं.
यदि बच्चे बारिश में भीग जाएं तो तुरंत उन्हें सूखे तौलिये से साफ करके सूखे कपड़े पहनाएं क्योंकि नमी के कारण बच्चों में फंगल इन्फेक्शन का खतरा बढ़ जाता है. साथ ही बारिश के दौरान मच्छरों का खतरा बढ़ जाता है. ऐसे में इस समय पूरे शरीर को ढकने वाले कपड़े पहनाना चाहिए. इसके अलावा बच्चों की डाइट में हरी सब्जियां, मौसमी फल और विटामिन C से भरपूर चीजें शामिल करें.
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साफ-सफाई का रखें पूरा ख्याल&amp;nbsp;
बारिश के मौसम में साफ-सफाई का ख्याल रखना बहुत जरूरी होता है, क्योंकि कई सारी बिमारियों का असली कारण गंदगी ही होता है. इसलिए ध्यान रखें कि बारिश के मौसम में घर के आसपास पानी इकट्टा न होने दें, क्योंकि इससे डेंगू, मलेरिया जैसी बीमारियां का खतरा बड़ जाता है. हमेशा ध्यान रखें की बच्चे गीले मोजे और गीले कपड़े न पहनें, क्योंकि इससे शरीर ठंडा रहता है जिससे निमोनिया जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है.&amp;nbsp;अगर आप बारिश के मौसम में इन सब चीजों का ख्याल रखते है और अपने बच्चों को सिखाते हैं कि बारिश के मौसम उन्हें किन-किन बातों का सबसे ज्यादा ख्याल रखना है, तो आप इस बारिश के मौसम में अपने बच्चों के लिए स्वास्थ्य से जुड़े बेहतर निर्णय ले पाएंगे.&amp;nbsp;
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&amp;nbsp; ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 16 Jul 2026 15:30:14 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Omega&amp;3 Supplements: क्या दिमाग तेज करने के लिए खा रहे हैं ओमेगा&amp;3 कैप्सूल? इस नई रिसर्च को जरूर पढ़ लें</title>
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        <description><![CDATA[ Alzheimer And Dementia Prevention Study 2026: दिमाग को तेज बनाने और अल्जाइमर या डिमेंशिया जैसी बीमारियों से बचाव के लिए कई लोग ओमेगा-3 सप्लीमेंट्स का सहारा लेते हैं. लेकिन हाल ही में हुई एक क्लिनिकल स्टडी ने इस धारणा पर सवाल खड़े कर दिए हैं. रिसर्च के मुताबिक, केवल ओमेगा-3 सप्लीमेंट लेने से याददाश्त, सोचने-समझने की क्षमता या दिमाग की सेल्स को होने वाले नुकसान में कोई खास फायदा नहीं मिला.&amp;nbsp;
क्या सेहत के लिए फायदेमंद है?
रिसर्चर का कहना है कि ओमेगा-3 सप्लीमेंट्स को दिमाग की सेहत सुधारने का आसान उपाय नहीं माना जा सकता. स्टडी के दौरान जिन लोगों को ओमेगा-3 सप्लीमेंट दिए गए, उनके दिमाग में ओमेगा-3 का स्तर तो बढ़ा, लेकिन इससे उनकी मानसिक क्षमता में कोई उल्लेखनीय सुधार देखने को नहीं मिला. यानी केवल सप्लीमेंट लेना पर्याप्त नहीं है.
किन चीजों पर ध्यान देना जरूरी?
स्टडी के प्रमुख राइटर डॉ. हुसैन यासीन के मुताबिक,का मानना है कि अगर दिमाग को लंबे समय तक स्वस्थ रखना है, तो सिर्फ एक सप्लीमेंट पर निर्भर रहने की बजाय पूरी लाइफस्टाइल पर ध्यान देना जरूरी है. नियमित व्यायाम, तनाव कम करना, भरपूर नींद लेना और पौधों पर आधारित संतुलित आहार अपनाना दिमाग की सेहत के लिए कहीं अधिक असरदार माना गया है. इसके साथ ही सैल्मन, मैकेरल, सार्डिन जैसी फैटी फिश, अखरोट, चिया सीड्स और अलसी जैसे प्राकृतिक स्रोतों से मिलने वाला ओमेगा-3 ज्यादा फायदेमंद हो सकता है.
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कब होता है इसका असर?
रिसर्चर ने मेडिटेरेनियन डाइट का भी उदाहरण दिया. उनका कहना है कि वहां रहने वाले लोग सिर्फ सप्लीमेंट्स पर निर्भर नहीं रहते, बल्कि मछली, मेवे और बीजों से प्राकृतिक रूप से ओमेगा-3 लेते हैं. इसके साथ ही नियमित शारीरिक गतिविधि करते हैं, तनाव कम रखते हैं और संतुलित लाइफस्टाइल अपनाते हैं. यही कारण है कि वहां ओमेगा-3 का बेहतर असर देखने को मिलता है.
किन लोगों पर किया गया स्टडी?
यह स्टडी 55 से 80 वर्ष की उम्र के 365 लोगों पर किया गया, जिनमें डिमेंशिया का खतरा बढ़ाने वाले एक या अधिक जोखिम कारक मौजूद थे. दो साल तक एक समूह को रोजाना उच्च मात्रा में ओमेगा-3 सप्लीमेंट दिया गया, जबकि दूसरे समूह को प्लेसीबो दिया गया. एमआरआई स्कैन, रक्त जांच और मानसिक क्षमता से जुड़े टेस्ट के बाद पाया गया कि सप्लीमेंट लेने वालों के शरीर और दिमाग में ओमेगा-3 का स्तर बढ़ने के बावजूद उनकी याददाश्त या सोचने-समझने की क्षमता में कोई महत्वपूर्ण अंतर नहीं आया.
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क्या सच में यह फायदेमंद नहीं है?
हालांकिग्लोबल ऑर्गेनाइजेशन फॉर ईपीए एंड डीएचए ओमेगा-3 यह भी स्पष्ट करते हैं कि इसका मतलब यह नहीं है कि ओमेगा-3 शरीर के लिए जरूरी नहीं है. यह हार्ट, सेल्स और ब्रेन के सामान्य कामकाज के लिए महत्वपूर्ण पोषक तत्व है. लेकिन अगर खानपान असंतुलित हो, शारीरिक गतिविधि न हो और लाइफस्टाइल अस्वस्थ हो, तो सिर्फ ओमेगा-3 सप्लीमेंट्स से दिमाग को तेज बनाने या अल्जाइमर के खतरे को कम करने की उम्मीद करना सही नहीं होगा.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 16 Jul 2026 03:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>India&amp;UK Trade Deal: यूके से कौन&amp;कौन सी दवाएं आयात करता है भारत, जानें अब कितना कम हो जाएगा इनका दाम?</title>
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        <description><![CDATA[ India-UK Trade Deal : भारत और ब्रिटेन के बीच लंबे समय से जिस व्यापार समझौते का इंतजार किया जा रहा था, वह अब लागू हो चुका है. इस समझौते के बाद दोनों देशों के बीच कारोबार को नई रफ्तार मिलने की उम्मीद है. इसका असर सिर्फ लग्जरी कारों, स्कॉच व्हिस्की या फैशन प्रोडक्ट्स तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि हेल्थकेयर सेक्टर पर भी इसका बड़ा प्रभाव देखने को मिलेगा.
खासकर ब्रिटेन से भारत आने वाले मेडिकल डिवाइसेस और कुछ विशेष दवाओं की कीमतों में आने वाले समय में कमी आ सकती है. आइए जानते हैं कि भारत यूके से कौन-कौन सी दवाएं और मेडिकल प्रोडक्ट्स आयात करता है और नई ट्रेड डील के बाद अब इनका दाम कितना कम हो जाएगा.&amp;nbsp;
भारत-यूके ट्रेड डील क्या है?
भारत और ब्रिटेन के बीच व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौता (CETA) 15 जुलाई 2026 से लागू हो गया है. करीब साढ़े तीन साल तक चली बातचीत और 14 दौर की चर्चा के बाद यह समझौता अंतिम रूप में पहुंचा. इस डील का उद्देश्य दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ाना, आयात-निर्यात को आसान बनाना और कई प्रोडक्ट्स पर लगने वाले आयात शुल्क को कम या खत्म करना है. इस समझौते के तहत भारत के लगभग 99 प्रतिशत प्रोडक्ट्स को ब्रिटेन में शुल्क-मुक्त पहुंच मिलेगी. वहीं ब्रिटेन से आने वाले कई प्रोडक्ट्स पर भारत में आयात शुल्क तरीके से कम किया जाएगा.
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यूके कौन-कौन सी दवाएं और मेडिकल प्रोडक्ट्स आयात होती हैं?
भारत मुख्य रूप से ब्रिटेन से स्पेशलाइज्ड जेनेरिक दवाएं और कई तरह के मेडिकल डिवाइसेस आयात करता है. इनमें सर्जिकल डिवाइस, डायग्नोस्टिक मशीनें, ईसीजी मशीन, एक्स-रे मशीन और अन्य एडवांस हेल्थकेयर डिवाइस शामिल हैं. नई ट्रेड डील के बाद इन प्रोडक्ट्स पर लगने वाला आयात शुल्क कम होने से इनके भारतीय बाजार में सस्ते होने की संभावना है.
क्या घट जाएंगे इनके दाम?&amp;nbsp;
नई ट्रेड डील के तहत ब्रिटेन से आने वाले मेडिकल डिवाइसेस पर लगने वाली कस्टम ड्यूटी चरणबद्ध तरीके से कम की जाएगी. पहले जहां इन प्रोडक्ट्स पर आमतौर पर 7.5 प्रतिशत से 15 प्रतिशत तक आयात शुल्क लगता था, वहीं इसे घटाकर लगभग 3 प्रतिशत तक लाया जाएगा. इसमें इमेजिंग सिस्टम, डायग्नोस्टिक डिवाइस, सर्जिकल इंस्ट्रूमेंट्स और अन्य मेडिकल टेक्नोलॉजी प्रोडक्ट्स शामिल हैं. उद्योग से जुड़े संगठनों का मानना है कि इससे भारत में आधुनिक मेडिकल डिवाइस पहले के मुकाबले ज्यादा किफायती हो सकेंगे. आयात शुल्क कम होने से ब्रिटेन से आने वाले हेल्थकेयर डिवाइस और कुछ विशेष दवाओं की कीमतों में कमी आने की उम्मीद है. इसके अलावा अगले 10 सालों में करीब 85 प्रतिशत ऐसे प्रोडक्ट्स पूरी तरह टैरिफ-फ्री हो जाएंगे. इससे अस्पतालों, डायग्नोस्टिक सेंटरों और मरीजों को आधुनिक मेडिकल डिवाइस पहले की तुलना में कम कीमत पर उपलब्ध हो सकते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.&amp;nbsp; ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 16 Jul 2026 03:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>9 हजार का खर्च अब सिर्फ 91 रुपये! सैंपल ले जा रहा ड्रोन और दवा भी करेगा डिलीवर</title>
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        <description><![CDATA[ भारत के ग्रामीण और दूर-दराज के इलाकों में अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाना हमेशा से बड़ी चुनौती रही है. खासतौर पर टीबी जैसी गंभीर बीमारी के मामले में, जहां सही समय पर जांच और इलाज ही जान बचा सकता है. इसी मुश्किल को हल करने के लिए तेलंगाना में बेहद शानदार और आधुनिक शुरुआत हुई है.
भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) ने तेलंगाना के यादाद्री भुवनगिरी जिले में टीबी की जांच को आसान, तेज और सस्ता बनाने के लिए ड्रोन सेवा की शुरुआत की है. यह पहल अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) बीबीनगर के सहयोग से की गई. आइए समझते हैं कि यह तकनीक कैसे आम आदमी की जिंदगी बदल रही है?
9451 रुपये का खर्च सिर्फ 91 रुपये हुआ
गौरतलब है कि गांवों में रहने वाले मरीजों को अपनी टीबी की जांच कराने के लिए पहले शहर के बड़े अस्पतालों या जांच केंद्रों तक जाना पड़ता था. इसमें उनका पूरा दिन बर्बाद होता था. यात्रा में पैसे खर्च होते थे और कई बार दिहाड़ी भी छूट जाती थी.
आंकड़ों के मुताबिक, पहले एक मरीज को जांच के लिए औसतन ₹9451 खर्च करने पड़ते थे, लेकिन अब ड्रोन सेवा शुरू होने से यह खर्च घटकर महज 91 रुपये रह गया है. मरीज अब अपने घर के पास वाले छोटे स्वास्थ्य केंद्र में ही बलगम का सैंपल दे देते हैं और वहां से ड्रोन इन सैंपल्स को हवा के रास्ते बड़े जांच केंद्रों तक पहुंचा देता है. इससे मरीजों के पैसे और मेहनत दोनों बच रहे हैं.
15 दिन का काम अब 5 दिन में
टीबी के इलाज में सबसे जरूरी होता है कि बीमारी का पता जल्दी चले. पहले दूर के गांवों से सैंपल लैब तक पहुंचने और फिर उसकी रिपोर्ट वापस गांव तक आने में 15 दिन तक का समय लग जाता था. इतने लंबे इंतजार में मरीज की हालत और खराब होने का डर रहता था.&amp;nbsp;
ड्रोन तकनीक ने इस समय को सीधे 15 दिन से घटाकर सिर्फ 5 दिन कर दिया है. ताजा रिपोर्ट बताती है कि 76 प्रतिशत से ज्यादा मरीजों को उनकी जांच के नतीजे अगले ही दिन मिल रहे हैं. रिपोर्ट जल्दी आने का सीधा मतलब है कि मरीज का इलाज जल्दी शुरू हो पाता है, जो उसकी जान बचाने के लिए सबसे अहम है.
कैसे काम करता है यह सिस्टम?
इस योजना को योजनाबद्ध तरीके से लागू किया गया है. AIIMS बीबीनगर में मेन कंट्रोल सेंटर बनाया गया है, जो जिले के 11 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और 60 छोटे उपकेंद्रों से सीधा जुड़ा हुआ है. ड्रोन इसी नेटवर्क के बीच उड़ान भरते हैं, जिसे मेडिकल भाषा में हब एंड स्पोक मॉडल कहा जाता है. इसके तहत छोटे-छोटे केंद्रों से सैंपल इकट्ठे किए जाते हैं और उन्हें मुख्य लैब तक तेजी से पहुंचाया जाता है.
दवाइयां भी ला रहा ड्रोन
यह ड्रोन सेवा सिर्फ सैंपल भेजने तक सीमित नहीं है. जब मुख्य केंद्र में मरीज की रिपोर्ट पॉजिटिव आती है और डॉक्टरों दवा लिखते हैं तो वही ड्रोन वापसी की उड़ान में दूरदराज के गांवों तक टीबी की जरूरी दवाइयां भी पहुंचाता है. इसका मतलब यह है कि मरीज को दवा लेने के लिए भी शहर भागने की जरूरत नहीं है. आसमान से उड़कर दवा उनके गांव के स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंच जाती है.
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        <pubDate>Wed, 15 Jul 2026 11:30:06 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Chandipura Virus: गुजरात में फिर लौटा जानलेवा चांदीपुरा वायरस, जानें यह कितना खतरनाक</title>
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        <description><![CDATA[ Chandipura Virus Cases In Gujarat 2026: गुजरात में एक बार फिर चांदीपुरा वायरस &amp;nbsp;के मामले सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग और डॉक्टरों की चिंता बढ़ गई है. रिपोर्ट्स के अनुसार, अब तक 3 बच्चों की मौत हो तुकी है. यह वायरस भले ही बहुत आम नहीं है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी चुनौती यह है कि यह बच्चों में बेहद तेजी से गंभीर रूप ले सकता है. शुरुआत में इसके लक्षण सामान्य वायरल बुखार जैसे लगते हैं, लेकिन कुछ ही घंटों या दो-तीन दिनों के भीतर इंफेक्शन दिमाग तक पहुंचकर जानलेवा साबित हो सकता है.&amp;nbsp;
मानसून के दौरान बढ़ता है इसका खतरा
नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल के अनुसार, भारत में चांदीपुरा वायरस के प्रकोप पहले भी सामने आ चुके हैं. खासकर मानसून के दौरान इसका खतरा बढ़ जाता है, क्योंकि इस मौसम में इसे फैलाने वाली सैंडफ्लाई (रेतीली मक्खी) अधिक सक्रिय हो जाती है. &amp;nbsp;डॉ. मंजू केदारनाथ ने TOI को बताया कि यह इंफेक्शन रेयर जरूर है, लेकिन इसकी रफ्तार बेहद तेज होती है. इसलिए समय पर पहचान और इलाज सबसे जरूरी है. उनके मुताबिक, बीमारी की शुरुआत तेज बुखार, सिरदर्द, मतली और कमजोरी से होती है. इसके बाद वायरस तेजी से दिमाग पर असर डाल सकता है, जिससे उल्टी, बेचैनी, दौरे पड़ना और बेहोशी जैसी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं. यदि समय पर इलाज न मिले तो 48 से 72 घंटे के भीतर मरीज कोमा में जा सकता है और जान का खतरा भी पैदा हो सकता है.&amp;nbsp;
किन लोगों को इसका सबसे ज्यादा खतरा?
डॉक्टरों के अनुसार, 15 साल से कम उम्र के बच्चों में इसका खतरा सबसे ज्यादा रहता है. बच्चों का विकसित हो रहा नर्वस सिस्टम और कमजोर इम्यून सिस्टम उन्हें गंभीर इंफेक्शन के प्रति अधिक संवेदनशील बना सकती है. &amp;nbsp;यदि बच्चे को 101 डिग्री फारेनहाइट/ 38.3 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा बुखार, बार-बार उल्टी, दौरे, व्यवहार में बदलाव, अत्यधिक सुस्ती या बेहोशी जैसे लक्षण दिखाई दें तो तुरंत अस्पताल ले जाना चाहिए. एक्सपर्ट का कहना है कि ऐसे मामलों में शुरुआती कुछ घंटे बेहद अहम होते हैं.
क्या इसका इलाज मौजूद है?
चिंता की बात यह भी है कि फिलहाल चांदीपुरा वायरस के लिए न तो कोई विशेष एंटीवायरल दवा उपलब्ध है और न ही कोई वैक्सीन. ऐसे में मरीज को केवल अस्पताल में सहायक उपचार दिया जाता है ताकि इंफेक्शन से होने वाली दिक्कतों को कंट्रोल किया जा सके। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस वायरस से होने वाली मृत्यु दर 56 से 75 प्रतिशत तक दर्ज की गई है, इसलिए लापरवाही भारी पड़ सकती है.&amp;nbsp;
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कैसे कर सकते हैं बचाव?
&amp;nbsp;यह वायरस संक्रमित सैंडफ्लाई के काटने से फैलता है, इसलिए बचाव ही सबसे प्रभावी उपाय माना जाता है. डॉ. मंजू केदारनाथ के अनुसार, बच्चों को पूरे बाजू के कपड़े पहनाएं, उनकी उम्र के अनुसार सुरक्षित इंसेक्ट रिपेलेंट का इस्तेमाल करें और जरूरत पड़ने पर कीटनाशक लगे मच्छरदानी में सुलाएं. इसके अलावा घर के आसपास साफ-सफाई रखें, कचरा जमा न होने दें और ऐसी जगहों को साफ रखें जहां सैंडफ्लाई पनप सकती हैं.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 13 Jul 2026 14:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>Skin Whitening Cream: रातोंरात गोरा बनाने वाली क्रीमों में मिला जरूरत से ज्यादा मरकरी और लेड, इससे कितना नुकसान?</title>
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        <description><![CDATA[ Maharashtra FDA Warning On Fairness Creams: त्वचा को कुछ ही दिनों में गोरा और चमकदार बनाने का दावा करने वाली कई क्रीमों पर अब गंभीर सवाल उठ गए हैं. महाराष्ट्र फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने ऐसी पांच कॉस्मेटिक प्रोडक्ट्स में तय सीमा से कई गुना ज्यादा मरकरी और लेड पाए जाने के बाद लोगों को इनके इस्तेमाल से बचने की चेतावनी दी है. जांच में यह भी सामने आया कि कुछ उत्पादों पर निर्माण और एक्सपायरी डेट जैसी जरूरी जानकारी तक नहीं दी गई थी. इसके बाद इन उत्पादों के निर्माण और बिक्री को लेकर जांच शुरू कर दी गई है.&amp;nbsp;
किन प्रोडक्ट को लेकर उठे सवाल?
FDA की जांच में जिन प्रोडक्ट्स के नाम सामने आए हैं, उनमें Goree Beauty Cream, Goree Beauty Whitening Body Lotion, Goree Whitening Soap, Face Fresh Gold Plus तथा Golden Star Beauty Cream शामिल हैं. एक्सपर्ट का कहना है कि ये भारी धातुएं शरीर के लिए बेहद नुकसानदायक हो सकती हैं और लंबे समय तक इस्तेमाल करने पर गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है.
इससे कितना खतरा होता है?
डॉ. तुषार पलवे के मुताबिक, मरकरी को अवैध रूप से स्किन व्हाइटनिंग क्रीम में इसलिए मिलाया जाता है क्योंकि यह मेलानिन बनने की प्रक्रिया को रोक देता है. इसकी वजह से 10 से 15 दिनों के भीतर त्वचा पहले से ज्यादा गोरी दिखाई देने लगती है. हालांकि इसका लगातार इस्तेमाल किडनी, दिमाग और शरीर के दूसरे अंगों को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है. उनका कहना है कि अगर क्रीम में मरकरी की मात्रा बहुत ज्यादा हो तो 10 से 12 दिनों में ही किडनी पर असर शुरू हो सकता है, जबकि कम मात्रा होने पर भी कई महीनों तक रोजाना इस्तेमाल करने से नुकसान धीरे-धीरे बढ़ता रहता है.&amp;nbsp;
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सिर्फ स्किन ही नहीं, इनको भी होता है नुकसान
हालांकि इसका असर केवल त्वचा तक सीमित नहीं रहता. मरकरी त्वचा के जरिए शरीर में प्रवेश कर किडनी और बोन मेरो में जमा हो सकता है. डॉक्टरों के मुताबिक, इससे किडनी की काम करने की क्षमता धीरे-धीरे प्रभावित होने लगती है और गंभीर मामलों में डायलिसिस तक की नौबत आ सकती है. इसके अलावा हाथ कांपना, याददाश्त कमजोर होना, चिंता, अनिद्रा, चिड़चिड़ापन और एकाग्रता में कमी जैसी न्यूरोलॉजिकल समस्याएं भी हो सकती हैं. कुछ मामलों में सुनने और देखने की क्षमता भी प्रभावित हो सकती है.
 किसी भी क्रीम का इस्तेमाल करने से बचें
जांच में लेड भी तय सीमा से अधिक पाया गया. एक्सपर्ट के अनुसार, लेड का त्वचा को गोरा करने में कोई साइंटफिक उपयोग नहीं है. इसकी मौजूदगी खराब गुणवत्ता वाले कच्चे माल या असुरक्षित निर्माण प्रक्रिया की ओर इशारा करती है. लेड शरीर में जमा होकर दिमाग, किडनी, ब्लड बनाने वाले अंगों और प्रजनन तंत्र को नुकसान पहुंचा सकता है. डॉक्टरों का कहना है कि लेड की कोई भी मात्रा पूरी तरह सुरक्षित नहीं मानी जाती और अगर मरकरी के साथ इसका संपर्क हो तो स्वास्थ्य जोखिम और बढ़ जाता है. स्किन एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि केवल गोरा दिखने के लिए किसी भी क्रीम का इस्तेमाल करने से बचें. अगर चेहरे पर दाग-धब्बे या पिग्मेंटेशन की समस्या है तो पहले स्किन एक्सपर्ट से जांच कराएं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 13 Jul 2026 14:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>Cancer Survivors:  कैंसर से जिंदा बचना काफी नहीं, अब बेहतर जिंदगी जीना भी जरूरी</title>
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        <description><![CDATA[ Cancer Survivors:&amp;nbsp;अब तक कैंसर के इलाज का मतलब सिर्फ मरीज को बचाना माना जाता था, लेकिन अब यह सोच बदल रही है. एक नई रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि आने वाले समय में दुनिया भर में कैंसर के मामलों में बढ़ोतरी हो सकती है. लेकिन इसके साथ एक और बड़ी समस्या भी है, जिसे इन आकड़ों में गिना नहीं जाता है, वह है कैंसर से बच चुके मरीजों की बढ़ती संख्या, जिन्हें लंबे समय तक मेडिकल और मानसिक सहारे की जरूरत होती है. डॉ के अनुसार, जल्दी बीमारी का पता लगने, बेहतर इलाज के तरीकों और सर्जरी में सुधार की वजह से अब मरीज पहले से कहीं ज्यादा लंबे समय तक जिंदा रह रहे हैं, लेकिन इससे एक नई स्वास्थ्य चुनौती भी खड़ी हो गई है.
इलाज खत्म होना यात्रा का अंत नहीं
डॉक्टर बताते हैं कि ज्यादातर मरीज यह मान लेते हैं कि इलाज पूरा होते ही उनकी कैंसर से जुड़ी परेशानी खत्म हो जाती है, लेकिन असल में यहीं से एक नया दौर शुरू होता है. उनके मुताबिक, कैंसर या उसके इलाज के साइड इफेक्ट सालों तक बने रहते हैं. जैसे मरीजों को थकान, नसों में परेशानी, दिल से जुड़ी बीमारियां, हार्मोन में बदलाव, बच्चे पैदा करने से जुड़ी दिक्कतें और कैंसर के दोबारा होने का खतरा. इसलिए ऐसे मरीजों को सलाह दी जाती है कि वे समय-समय पर डॉक्टर से जांच करवाते रहें. सबसे खतरनाक बात तो ये है की कई मरीज तो बीमारी के दोबारा लौटने की चिंता, डिप्रेशन, ध्यान लगाने में परेशानी, जैसी चीजों से जूझते हैं.&amp;nbsp;
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सर्वाइवर्स की देखभाल पर देना होगा ज्यादा ध्यान
विशेषज्ञों का कहना है कि कैंसर से बच चुके मरीजों नियमित जांच, फिजियोथेरेपी, सही खानपान, मानसिक सेहत के लिए सहारा, दर्द से राहत और मरीजों को सही जानकारी होना बहुत जरूरी है. इससे उनका आत्मविश्वास बड़ता है.&amp;nbsp; उनके मुताबिक, अब स्वास्थ्य व्यवस्था को सिर्फ कैंसर का इलाज करने तक सीमित न रहकर, ठीक हो चुके मरीजों की देखभाल पर भी उतना ही ध्यान देना होगा. WHO की रिपोर्ट भी इसी बात को दोहराती है. रिपोर्ट के मुताबिक कैंसर सिर्फ शरीर को ही नहीं, बल्कि जिंदगी के कई और पहलुओं को भी प्रभावित करता है. इसलिए जरूरी है की इन बातों का भी पूरा ध्यान रखा जाए.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Mon, 13 Jul 2026 02:30:16 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Mental Health Special Theaters : मेंटल हेल्थ सुधारने के लिए इस देश में बन रहे स्पेशल थिएटर, यहां कैसे होता है इलाज?</title>
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        <description><![CDATA[ Mental Health Special Theaters : हॉस्पिटल का नाम सुनते ही सबसे पहले मशीनों की आवाज, दवाइयों, इलाज की चिंता और तनाव भरा माहौल याद आता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि दुनिया में एक ऐसा देश है जहां हॉस्पिटल्स के अंदर खास थिएटर बनाए गए हैं. इन थिएटरों का मकसद मरीजों को कुछ समय के लिए हॉस्पिटल के माहौल से बाहर निकालकर उन्हें नॉर्मल लाइफ जैसा एहसास कराना और उनकी मेंटल हेल्थ को बेहतर बनाने में मदद करना है. &amp;nbsp;तो आइए जानते हैं कि मेंटल हेल्थ सुधारने के लिए किस देश में स्पेशल थिएटर बन रहे और यहां इलाज कैसे होता है.
मेंटल हेल्थ सुधारने के लिए किस देश में स्पेशल थिएटर बन रहे?
ब्रिटेन में मरीजों की मानसिक सेहत बेहतर बनाने के लिए हॉस्पिटल्स के अंदर मेडिसिनेमा नाम से खास थिएटर बनाए गए हैं. इन थिएटरों में हॉस्पिटल में भर्ती बच्चे और बड़े मरीज नई फिल्मों का आनंद ले सकते हैं, जिससे कुछ समय के लिए दर्द, तनाव और हॉस्पिटल के माहौल को भूल सकें. अभी ब्रिटेन के अलग-अलग हॉस्पिटल्स में ऐसे 9 मेडिसिनेमा थिएटर संचालित हो रहे हैं. यहां डॉक्टर और नर्स मरीजों की स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार तय करते हैं कि कौन फिल्म देखने जा सकता है. इस पहल का उद्देश्य इलाज के साथ-साथ मरीजों को मानसिक राहत देना और उन्हें नॉर्मल लाइफ जैसा एक्सपीरियंस कराना है&amp;nbsp;
यहां इलाज कैसे होता है?
मेडिसिनेमा के संचालन की जिम्मेदारी साइमन हिक्सन संभालते हैं. वे हर सुबह हॉस्पिटल के अलग-अलग वार्ड में जाकर डॉक्टरों और नर्सों से बात करते हैं और यह तय करते हैं कि कौन-से मरीज फिल्म देखने की स्थिति में हैं. &amp;nbsp;फिल्म शुरू होने से पहले नर्स और मरीजों को उनके वार्ड से थिएटर तक लेकर आते हैं. थिएटर में सिर्फ सीटें ही नहीं हैं, बल्कि ऐसे विशेष स्थान भी बनाए गए हैं, जहां चार बेड पर लेटे मरीज और तीन रिक्लाइनर पर बैठने वाले मरीज भी आराम से फिल्म देख सकते हैं.
इसे भी पढ़ें- Cancer Risk: लगातार 30 मिनट से ज्यादा बैठना बढ़ा सकता है कैंसर का खतरा, नई रिसर्च में दावा, जानें इसकी वजह&amp;nbsp;
हर उम्र के मरीजों के लिए खुला है यह थिएटर
एक स्क्रीनिंग के दौरान यहां अलग-अलग उम्र और स्वास्थ्य स्थिति वाले मरीज मौजूद थे. इनमें एक प्रेगनेंट महिला, ऑटोइम्यून बीमारी से जूझ रहा 4 वर्षीय बच्चा, हड्डी की बीमारी से पीड़ित 71 वर्षीय महिला और अन्य मरीज शामिल थे. &amp;nbsp;72 वर्षीय गैरी कुक, जो एक दुर्घटना में अपने पैरों में गंभीर चोट लगने के बाद भर्ती थे, ने फिल्म शुरू होने से पहले मजाक में पूछा कि अगर फिल्म के दौरान किसी को बाथरूम जाना पड़े या किसी मरीज को अचानक हार्ट अटैक आ जाए तो क्या होगा. इस पर पास मौजूद नर्स ने बताया कि जरूरत पड़ने पर मेडिकल स्टाफ तुरंत मदद के लिए मौजूद रहेगा.&amp;nbsp;
कैसे हुई मेडिसिनेमा की शुरुआत?
करीब 30 साल पहले क्रिस्टीन हिल ने सेंट थॉमस हॉस्पिटल में कुछ बच्चों को हॉस्पिटल के बगीचे में खुशी से समय बिताते देखा. तभी उनके मन में हॉस्पिटल के अंदर सिनेमा शुरू करने का विचार आया, जिससे मरीज भी फिल्मों के जरिए कुछ समय के लिए अपनी परेशानी भूल सकें. शुरुआती विरोध के बाद भी उन्होंने हॉस्पिटल के एक लेक्चर थिएटर को सिनेमा में बदलने के लिए पैसे इकट्ठा किए. इसके बाद दिसंबर 1999 में पहला मेडिसिनेमा शुरू हुआ, जहां सबसे पहले इंस्पेक्टर गैजेट फिल्म दिखाई गई.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 11 Jul 2026 18:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>NPPA New Drug Prices: ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और हार्ट समेत 39 नई दवाओं की कीमतें तय, सरकार ने जारी किया आदेश</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/nppa-new-drug-prices-ब्लड-प्रेशर-डायबिटीज-और-हार्ट-समेत-39-नई-दवाओं-की-कीमतें-तय-सरकार-ने-जारी-किया-आदेश</link>
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        <description><![CDATA[ NPPA New Drug Prices: देश में आम मरीजों को दवाओं की मनमानी कीमतों से राहत देने के लिए नेशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी यानी NPPA ने एक बड़ा कदम उठाया है. अथॉरिटी ने ड्रग्स (प्राइसेस कंट्रोल) ऑर्डर यानी डीपीसीओ 2013 के तहत 39 नई दवाओं की खुदरा कीमत तय कर दी हैं. इनमें हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, दिल की बीमारियां, एचआईवी, आंखों के इंफेक्शन और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाएं शामिल हैं. यह कदम इन दवाओं को मरीजों के लिए ज्यादा किफायती बनाने की इरादे से उठाया गया है.
8 जुलाई को जारी हुआ आदेश&amp;nbsp;
फार्मास्युटिकल्स विभाग की तरफ से 8 जुलाई 2026 को यह मूल्य अधिसूचना जारी की गई, जिससे डीपीसीओ 2013 के पैराग्राफ 5,11 और 15 के तहत नोटिफाई किया गया है. हालांकि आपको बता दें कि यह आदेश पहले से बाजार में उपलब्ध दवाओं की कीमत घटाने के लिए नहीं, बल्कि नई दवा फॉर्मूलेशन की अधिकतम खुदरा कीमत तय करने के लिए जारी किया गया है. इन कीमतों पर लागू होने वाला जीएसटी अलग से लिया जाएगा.&amp;nbsp;
कई जरूरी दवाओं की खुदरा कीमतें तय&amp;nbsp;
एनपीपीए की ओर से जारी सूची में हाई ब्लड प्रेशर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली Amlodipine+Bisoprolo+Telmisartan टैबलेट की खुदरा कीमत 14.74 रुपये प्रति टैबलेट तय की गई है. आंखों की सर्जरी के बाद और बैक्टीरिया संक्रमण के इलाज में इस्तेमाल होने वाले Nepafenac+Moxifloxacin Ophthalmic Solution दवाओं की कीमत 68.64 रुपये प्रति मिलीलीटर तय की गई है. वहीं हार्ट अटैक और स्ट्रोक के खतरे को कम करने के लिए दी जाने वाली Clopidogrel+ Aspirin+Atorvastatin कैप्सूल की कीमत 6.37 रुपये प्रति कैप्सूल तय की गई है. लिस्ट में डायबिटीज के इलाज में इस्तेमाल होने वाली कई फिक्स्ड डोज कॉम्बिनेशन दवाओं की कीमतें भी तय की गई है. इनमें Dapagliflozin, Empagliflozin, Sitagliptin, Metformin, Glimepiride और Voglibose आधारित दवाएं शामिल है.
इसके अलावा संक्रमण के इलाज में उपयोग होने वाली Amoxicilline+Clavulanate टैबलेट और डिस्पर्सिबल टैबलेट, ग्लूकोमा की इलाज में इस्तेमाल होने वाली आई ड्रॉप, एचआईवी थेरेपी किट, &amp;nbsp;विटामिन डी3 ओरल सॉल्यूशन और कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली Imatinib Oral Solution जैसी दवाओं की कीमतें भी निर्धारित की गई है. इसके अलावा एनपीपीए की लिस्ट में सबसे महंगी दवाओं में Tenecteplase (TNK-tpa) Injection 50mg भी शामिल है. हार्ट अटैक के इलाज में इस्तेमाल होने वाली इंजेक्शन की खुदरा कीमत 60,238.27 रुपये प्रति वायल तय की गई है.&amp;nbsp;
दुकानदारों के लिए प्राइस लिस्ट दिखाना अनिवार्य&amp;nbsp;
एनपीपीए ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि सभी रिटेलर और डीलरों के लिए निर्माता कंपनियों की तरफ से जारी की गई प्राइस लिस्ट अपने दुकान में साफ तौर पर लगाना अनिवार्य है. डीपीसीओ 2013 के पैरा 24 (4) का हवाला देते हुए अथॉरिटी ने कहा कि हर रिटेलर और डीलर को अपनी दुकान के ऐसे हिस्से में प्राइस लिस्ट और सप्लीमेंट्री प्राइस लिस्ट प्रदर्शित करनी होगी, जहां से इसे कोई भी ग्राहक आसानी से देख और जान सकेगा.&amp;nbsp;
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तय कीमत से ज्यादा वसूलने पर होगी करवाई&amp;nbsp;
नोटिफिकेशन में यह भी साफ किया गया है कि अगर कोई निर्माता या मार्केटिंग कंपनी अधिसूचित खुदरा कीमत का पालन नहीं करती है तो उसे ज्यादा वसूली की गई रकम सहित सरकार के पास जमा करनी होगी. एनपीपीए के अनुसार अगर इन दवाओं की खुदरा कीमत इस आदेश और उसमें दिए गए नोटिस के मुताबिक तय नहीं की जाती, तो संबंधित कंपनी को डीपीसीओ 2013 और एसेंशियल कमोडिटीज एक्ट 1955 के प्रावधानों के तहत ज्यादा वसूली गई रकम ब्याज के साथ जमा करनी होगी.
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        <pubDate>Sat, 11 Jul 2026 18:30:09 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Alcohol Based Drug: 12% से अधिक अल्कोहलिक दवाओं पर सरकार सख्त, डॉक्टर की पर्ची और लाइसेंस के बिना नहीं होगी बिक्री  </title>
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        <description><![CDATA[ Alcohol Based Drug: अगर आप भी बिना डॉक्टर की सलाह के मेडिकल स्टोर से दवाएं खरीद लेते हैं, तो यह खबर आपके लिए जरूरी है. केंद्र सरकार ने 12 प्रतिशत से ज्यादा एथिल अल्कोहल वाली औषधीय दवाओं की बिक्री और निर्माण को लेकर नियम सख्त कर दिए हैं. अब ऐसी दवाओं को पहले की तरह सामान्य तरीके से न तो बनाया जा सकेगा और न ही मेडिकल स्टोर से आसानी से खरीदा जा सकेगा. सरकार ने इन दवाओं को ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक एक्ट 1940 के तहत लाइसेंस व्यवस्था में लाते हुए, ड्रग्स रूल्स 1945 की अनुसूची एच1 में शामिल कर दिया है.
इसका मतलब है कि अब इनकी बिक्री केवल रजिस्टर्ड डॉक्टर के प्रिस्क्रिप्शन पर ही होगी और मेडिकल स्टोर को हर बिक्री का रिकॉर्ड भी रखना होगा. स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार यह फैसला उन औषधीय दवाओं के दुरुपयोग को रोकने के लिए लिया गया है जिनमें एथिल अल्कोहल की मात्रा काफी ज्यादा होती है.&amp;nbsp;
किन दवाओं पर लागू होगा नया नियम?&amp;nbsp;
नया नियम उन ओरल मेडिसिनल फॉर्मूलेशन पर लागू होगा, जिनमें 12 प्रतिशत से ज्यादा एथिल अल्कोहल हो और जो 30 मिलीलीटर से बड़े पैक में बेचे जाते हो. इनमें इलायची, अदरक और दूसरे सुगंधित पदार्थ से तैयार किए जाने वाले कुछ टिंचर और हर्बल लिक्विड प्रिपरेशन भी शामिल है. यह प्रोडक्ट ड्रग्स रूल की अनुसूची के तहत लाइसेंस से छूट प्राप्त कैटेगरी में आते थे. इसी छूट का फायदा उठाकर कुछ प्रोडक्ट में 60 से 90 प्रतिशत तक एथिल अल्कोहल का इस्तेमाल किया जा रहा था, जिससे उनके गलत इस्तेमाल की आशंका बढ़ गई थी. &amp;nbsp;
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सरकार की सख्ती के बाद अब क्या बदलेगा?&amp;nbsp;
सरकार के नए संशोधन के बाद ऐसी सभी दवाओं को लाइसेंस लेकर ही बनाया और बेचा जा सकेगा. साथ ही उन्हें अनुसूची एच1 के तहत रखा गया है. इसका सीधा असर यह होगा की दवा केवल रजिस्टर्ड डॉक्टर के प्रिस्क्रिप्शन पर मिलेगी, मेडिकल स्टोर को हर बिक्री का रिकॉर्ड सुरक्षित रखना होगा, इन दवाओं की सप्लाई केवल लाइसेंस प्राप्त फार्मास्यूटिकल चैन के जरिए ही होगी और बिना नियम की अनुमति के इनका निर्माण और वितरण भी नहीं किया जा सकेगा. सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि नियम राजपत्र में अधिसूचना प्रकाशित होने के 6 महीने के बाद लागू होगा, ताकि निर्माता और विक्रेता नए नियमों के अनुसार अपनी व्यवस्था कर सके.&amp;nbsp;
सरकार ने सख्ती क्यों की?&amp;nbsp;
स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार इलायची और अदरक जैसे पदार्थों से बनने वाले कुछ टिंचर मूल रूप से औषधीय उपयोग के लिए तैयार किए जाते हैं. इन्हें पाचन संबंधी समस्याओं सहित दूसरे चिकित्सीय जरूरतों में इस्तेमाल किया जाता रहा है, हालांकि जांच में सामने आया कि कुछ प्रोडक्ट में एथिल अल्कोहल की मात्रा 80 से 90 प्रतिशत तक थी, जिसके कारण इनका इस्तेमाल शराब के ऑप्शन के रूप में किया जाने लगा. इसी को देखते हुए सरकार ने नियमों में बदलाव कर इन प्रोडक्ट को सख्त निगरानी के दायरे में लाने का फैसला किया है.
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        <pubDate>Sat, 11 Jul 2026 18:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>Swiggy पर FSSAI का बड़ा एक्शन, ग्राहकों की शिकायतों के बाद जारी किए 9 नोटिस</title>
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        <description><![CDATA[ Swiggy Instamart FSSAI Notice: ऑनलाइन फूड डिलीवरी कंपनी स्विगी एक बार फिर चर्चा में है. भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने स्विगी इंस्टामार्ट को फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड एक्ट 2006 के कथित उल्लंघन से जुड़े मामले में 9 नोटिस जारी किए हैं. यह नोटिस ग्राहकों की ओर से लगातार में मिली शिकायतों के आधार पर भेजे गए हैं, जिनमें एक्सपायर्ड, सड़े-गले, दूषित और खाने योग्य नहीं रहे खाने के प्रोडक्ट की डिलीवरी का आरोप लगाया गया है.
FSSAI ने कंपनी से सभी आरोपों पर डॉक्यूमेंट के साथ विस्तृत स्पष्टीकरण और नियमों के पालन की रिपोर्ट मांगी है. साथ ही स्पष्ट किया है कि निर्धारित समय के अंदर जवाब नहीं मिलने पर फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड एक्ट 2006 के तहत कानूनी कार्रवाई की जा सकती है.&amp;nbsp;
किन शिकायतों के आधार पर जारी किए गए 9 नोटिस?

ग्राहकों ने शिकायत की कि स्विगी इंस्टामार्ट के जरिए एक्सपायर, सड़े-गले, दूषित और मानव उपभोग के लिए असुरक्षित खाने के प्रोडक्ट डिलीवर किए गए हैं.&amp;nbsp;
FSSAI के अनुसार नॉइस एग्स ऐसे ब्रांड नाम से बेचे जा रहे थे, जो कंपनी के मौजूदा FSSAI लाइसेंस में स्वीकृत प्रोडक्ट कैटेगरी का हिस्सा नहीं था. प्राधिकरण ने निर्देश दिया कि वैध लाइसेंस मिलने तक इस प्रोडक्ट की बिक्री न की जाए और जरूरत होने पर लाइसेंस में संशोधन कराया जाए.&amp;nbsp;
शिकायतों में कहा गया कि Healthify 100% Whey Protein 1 किलो और Noice Home Style Madras Mixture with Peanuts जैसे प्रोडक्ट एक्सपायरी डेट गुजरने के बाद भी ग्राहकों तक पहुंचाए गए.
Akshayakalpa Organic Egg के बारे में शिकायत मिली कि अंडे एक्सपायर्ड, सड़े हुए, बदबूदार और दूषित थे, जिससे वह खाने योग्य नहीं थे. शिकायत बढ़ाए जाने के बावजूद कथित तौर पर कोई सुधारात्मक कार्रवाई नहीं की गई.&amp;nbsp;
एक अन्य शिकायत में काके दा पराठा खराब और बदबूदार हालत में डिलीवरी होने की बात कही गई. शिकायत के बावजूद उचित कार्रवाई नहीं होने का भी आरोप लगाया गया.&amp;nbsp;
वहीं एक इन्फेंट फूड फॉर्मूलेशन के खराब, दूषित और असुरक्षित स्थिति में मिलने की शिकायत दर्ज हुई. आरोप है कि ग्राहक की ओर से खराब प्रोडक्ट लौटने के बाद भी उसी तरह का खराब प्रोडक्ट दोबारा भेज दिया गया.&amp;nbsp;
FSSAI को ऐसी शिकायत भी मिली है, जिनमें दूषित अंडे, खराब दूध और फटे या क्षतिग्रस्त पैक्ड फूड आइटम ग्राहकों तक पहुंचाने का आरोप लगाया गया.&amp;nbsp;
नोटिस में यह भी कहा गया कि कुछ मामलों में गलत, अमान्य या गलत FSSAI लाइसेंस नंबर का इस्तेमाल किया गया. साथ ही कुछ फूड बिजनेस एंटिटी ऐसे नामों में लिस्टेड मिली जो उनके FSSAI रजिस्ट्रेशन से मेल नहीं खाते हैं.&amp;nbsp;
कई शिकायत में आरोप लगाया गया कि शिकायत दर्ज होने और एस्केलेड किए जाने के बाद भी संतोषजनक जवाब, शिकायत निवारण या सकारात्मक कार्रवाई नहीं की गई. एक मामले में केवल रिफंड देकर मामला बंद करने की बात सामने आई, जबकि खाद्य सुरक्षा से जुड़े मुद्दे का समाधान नहीं किया गया. FSSAI ने विक्रेता ऑन बोर्डिंग, कंप्लायंस वेरिफिकेशन, ट्रेसेब्लिटी, फूड क्वालिटी मॉनिटरिंग, उपभोक्ता शिकायत निवारण और फूड सेफ्टी सिस्टम की पर्याप्तता पर &amp;nbsp;भी सवाल उठाए गए.&amp;nbsp;

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FSSAI ने स्विगी इंस्टामार्ट से क्या मांग की?
फूड रेगुलेटर ने कंपनी को निर्देश दिया कि वह सभी आरोपों पर दस्तावेजों के साथ विस्तृत जवाब दे. इसके अलावा गुणवत्ता नियंत्रण, फूड सेफ्टी मॉनिटरिंग, इन्वेंटरी मैनेजमेंट, स्टॉक रोटेशन, स्टोरेज, हैंडलिंग और अतिरिक्त नियंत्रण से जुड़ी पूरी जानकारी उपलब्ध कराई कराई. FSSAI ने कंपनी से यह भी कहा कि वह प्रत्येक मामले का रूट कॉज एनालिसिस, अपनाए गए कलेक्टिव एंड प्रीवेंटिव एक्शन उपभोक्ता शिकायतों के निस्तारण की जानकारी और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए उठाए गए कदमों का विवरण भी सौंपे. निर्धारित समय के अंदर अनुपालन रिपोर्ट नहीं देने पर फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड एक्ट 2006 के तहत आगे की कार्रवाई की जा सकती है.
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        <pubDate>Sat, 11 Jul 2026 18:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>Ginger Turmeric Tea: मानसून में सर्दी&amp;खांसी से रहना है दूर? रोज पिएं अदरक&amp;हल्दी की ये गर्म चाय</title>
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        <description><![CDATA[ Ginger Turmeric Tea: मानसून में सर्दी-खांसी से रहना है दूर? रोज पिएं अदरक-हल्दी की ये गर्म चाय ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 10 Jul 2026 14:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Vitamin Deficiency Symptoms: क्या पूरी नींद लेने के बाद भी छाई रहती है थकान? इग्नोर किया तो हो सकती है गंभीर बीमारी!</title>
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        <description><![CDATA[ Early Signs Of Vitamin Deficiency You Should Not Ignore: अगर आप अक्सर थकान महसूस करते हैं या आपके नाखून जल्दी टूट जाते हैं, तो यह शरीर का संकेत हो सकता है कि अंदर कुछ कमी चल रही है. आज की तेज रफ्तार जिंदगी में खराब खानपान, ज्यादा तनाव और पैकेट वाले खाने की आदत के कारण पोषण की कमी आम होती जा रही है. &amp;nbsp;दिक्कत यह है कि ये समस्याएं धीरे-धीरे सामने आती हैं, इसलिए लोग इन्हें नजरअंदाज कर देते हैं.&amp;nbsp;
क्या कहते हैं एक्सपर्ट
अमृता अस्पताल, फरीदाबाद में आंतरिक रोग एक्सपर्ट डॉ. मोहित शर्मा ने TOI को बताया कि पोषण की कमी लोगों की सोच से ज्यादा आम है, खासकर शहरों में. उनके अनुसार इसके लक्षण अक्सर हल्के और सामान्य होते हैं, इसलिए सही समय पर पहचानना मुश्किल हो जाता है.&amp;nbsp;
क्या होते हैं इसके लक्षण?
सबसे पहला संकेत है लगातार थकान महसूस होना. अगर पूरी नींद लेने के बाद भी शरीर में सुस्ती बनी रहती है, तो यह शरीर में जरूरी तत्वों की कमी का इशारा हो सकता है. &amp;nbsp;यह स्थिति धीरे-धीरे काम करने की क्षमता और एनर्जी दोनों को प्रभावित करने लगती है. &amp;nbsp;दूसरा संकेत है बालों का जरूरत से ज्यादा झड़ना. &amp;nbsp;मौसम बदलने पर थोड़ा बहुत बाल गिरना सामान्य है, लेकिन अगर यह लगातार और ज्यादा हो रहा है, तो यह अंदरूनी कमी का असर हो सकता है. बालों की जड़ों को सही पोषण न मिलने पर उनका प्राकृतिक विकास चक्र बिगड़ने लगता है.
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ये भी होते हैं संकेत
तीसरा संकेत है मुंह में बार-बार छाले होना या होंठों का फटना. &amp;nbsp;अक्सर लोग इसे छोटी समस्या समझकर अनदेखा कर देते हैं, लेकिन यह भी शरीर में पोषण की कमी का संकेत हो सकता है. केवल बाहरी उपचार से राहत मिलती है, लेकिन असली कारण अंदर ही रहता है. चौथा संकेत है हाथ-पैरों में झुनझुनी या सुन्नपन महसूस होना. यह एक ऐसा लक्षण है जिसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह नसों पर असर का संकेत हो सकता है. &amp;nbsp;समय रहते ध्यान न देने पर यह समस्या आगे चलकर गंभीर रूप ले सकती है.&amp;nbsp;
पांचवां संकेत है त्वचा का पीला पड़ना और नाखूनों का कमजोर होना. &amp;nbsp;अगर चेहरा फीका दिखने लगे या नाखून बार-बार टूटने लगें, तो यह भी शरीर में जरूरी पोषक तत्वों की कमी की ओर इशारा करता है.&amp;nbsp;
कैसे पता कर सकते हैं आप?
डॉ. मोहित शर्मा के अनुसार, अच्छी बात यह है कि ऐसी कमी का पता एक साधारण खून की जांच से चल सकता है. सही समय पर खानपान में बदलाव या जरूरत पड़ने पर सप्लीमेंट लेने से बड़ी समस्या से बचा जा सकता है. शरीर के छोटे-छोटे संकेतों को समझना ही बेहतर सेहत की पहली सीढ़ी है.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 10 Jul 2026 02:30:14 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Intermittent Fasting Risks: क्या आप भी करते हैं 16:8 फास्टिंग? रिसर्च का ये डराने वाला सच जान लें</title>
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        <description><![CDATA[ Can Intermittent Fasting Increase Heart Disease Risk: आजकल उपवास सिर्फ धार्मिक परंपरा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि फिटनेस की दुनिया में भी तेजी से लोकप्रिय हो गया है. 16:8 जैसे तरीकों से लेकर दिन में एक बार खाने तक, लोगों को यह आसान तरीका लगता है कम खाओ, जल्दी वजन घटाओ और बेहतर महसूस करो. शुरूआती दौर में कई लोगों को इसके फायदे भी दिखे, जैसे वजन कम होना, शुगर नियंत्रण में रहना और कोलेस्ट्रॉल घटाना. लेकिन अब नई रिसर्च इस ट्रेंड को लेकर कुछ गंभीर सवाल खड़े कर रही है.&amp;nbsp;
क्या निकला रिसर्च में?
हाल ही में 20 हजार से ज्यादा लोगों पर किए गए एक एनालिसिस में पाया गया कि जो लोग दिन में सिर्फ 8 घंटे या उससे कम समय में खाना खाते हैं, उनमें दिल से जुड़ी बीमारियों से मौत का खतरा ज्यादा देखा गया. &amp;nbsp;कुछ मामलों में यह खतरा 91 प्रतिशत तक अधिक पाया गया. इसका मतलब यह नहीं है कि उपवास हर किसी के लिए नुकसानदायक है, लेकिन यह धारणा जरूर चुनौती में आ गई है कि कम समय में खाना हमेशा बेहतर होता है.&amp;nbsp;
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क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
डॉ. दिव्य रंजन बेहेरा ने TOI को बताया कि लंबे समय तक उपवास रखने से शरीर में अचानक कई बदलाव होते हैं. खून में शर्करा का स्तर तेजी से घटता-बढ़ता है, तनाव से जुड़े हार्मोन बढ़ते हैं और वसा का स्तर भी प्रभावित होता है. &amp;nbsp;ये सभी बदलाव दिल पर दबाव डाल सकते हैं. वहीं डॉ. दीतेश एम के अनुसार, लंबे अंतराल तक भोजन न करने से शुगर, खनिज तत्व और हार्मोन में उतार-चढ़ाव होता है, जिससे दिल की धड़कन अनियमित हो सकती है.
पानी की कमी
एक और बड़ा कारण है पानी की कमी, जब लोग लंबे समय तक नहीं खाते, तो अक्सर पानी भी कम पीते हैं. &amp;nbsp;इससे शरीर में जरूरी खनिज जैसे पोटैशियम और मैग्नीशियम घट सकते हैं, जो दिल की सामान्य धड़कन के लिए जरूरी होते हैं. &amp;nbsp;डॉ. सुनील रॉय टी एन बताते हैं कि इन खनिजों की कमी और पानी की कमी से दिल को सामान्य गति बनाए रखने के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है.&amp;nbsp;
किन लोगों को रखनी चाहिए सावधानी&amp;nbsp;
हर व्यक्ति के लिए उपवास समान रूप से सुरक्षित नहीं है. &amp;nbsp;जिन लोगों को पहले से डायबिटीज, हाई बीपी या हार्ट से जुड़ी समस्या है, उन्हें विशेष सावधानी बरतनी चाहिए, इसके अलावा जो लोग कुछ विशेष दवाइयां लेते हैं, उनके लिए भी यह तरीका जोखिम भरा हो सकता है. हेल्दी व्यक्ति भी शरीर के संकेतों को नजरअंदाज नहीं कर सकते, बार-बार थकान, चक्कर आना, सीने में असहजता या धड़कन तेज होना जैसे लक्षण इस बात का संकेत हैं कि शरीर पर दबाव बढ़ रहा है.
जरूरत से ज्यादा सख्ती बरतने से शारीरिक और मानसिक दोनों तरह की थकान बढ़ सकती है. कम ऊर्जा, चिड़चिड़ापन और काम करने की क्षमता में कमी जैसे असर धीरे-धीरे सामने आने लगते हैं. इसलिए संतुलन सबसे जरूरी है. &amp;nbsp;उपवास अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन जब यह जरूरत से ज्यादा सख्त या बिना योजना के किया जाता है, तब समस्या पैदा होती है। सही तरीका यही है कि खानपान में संतुलन रखा जाए और किसी भी बड़े बदलाव से पहले डॉक्टर की सलाह ली जाए.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 10 Jul 2026 02:30:13 +0530</pubDate>
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        <title>Gastro Shield Diet:  पेट को कभी बूढ़ा नहीं होने देगी ये नई &amp;apos;गैस्ट्रो&amp;शील्ड&amp;apos; डाइट, जानें 40 की उम्र के बाद क्यों है जरूरी </title>
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        <description><![CDATA[ Gastro Shield Diet:&amp;nbsp;बढ़ती उम्र के हर आदमी की एक ही समस्या होती है कि उनके पेट की आंतों की कार्यक्षमता कम हो जाती है. इसका कारण यह है कि 40 की उम्र के बाद उनके शरीर में एंजाइम बनने की प्रक्रिया कम हो जाती है. यही वजह है कि उनके खाना पचाने की क्षमता पहले जैसी नहीं रहती है. ऐसे में बहुत से लोगों को समझ नहीं आता कि वे अपनी डाइट किस तरह की रखें. आइए जानते हैं इसके बारे में पूरी जानकारी.
विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि 40 की उम्र के बाद उनकी पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है, जिस पर वे गैस्ट्रो-शील्ड पर विश्वास करते हैं. बता दें कि गैस्ट्रो-शील्ड एक ऐसा तरीका है, जो पेट की परत यानी गट लाइनिंग को मजबूत बनाकर रखता है. साथ ही यह पेट में सूजन होने से भी बचाता है.
गैस्ट्रो-शील्ड डाइट में क्या-क्या खाना चाहिए?
विशेषज्ञों के अनुसार इस डाइट का मुख्य आधार फाइबर से भरपूर खाना है, जैसे साबुत अनाज, दाल, हरी सब्जियां और फल, जो सेहत के साथ-साथ पेट के लिए भी बहुत फायदेमंद साबित होते हैं. इसके साथ ही दही, छाछ, इडली-डोसा जैसे पदार्थ भी डाइट में शामिल करने चाहिए, क्योंकि माना जाता है कि इनमें प्राकृतिक रूप से अच्छे बैक्टीरिया पाए जाते हैं. बात बस यहीं तक खत्म नहीं होती है, बहुत समय पहले से विशेषज्ञ इस तरह की डाइट के अलावा रोजाना पर्याप्त पानी पीते रहने की सलाह भी देते आ रहे हैं. ऐसा करने से यह आपके पाचन तंत्र को सही ढंग से काम करने में मदद करता है.&amp;nbsp;
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किन चीजों से बचना चाहिए
अच्छी डाइट के अलावा अगर उन चीजों की बात करें, जिनसे विशेषज्ञ दूर रहने की सलाह देते हैं, तो उनमें सबसे जरूरी बात है कि बहुत ज्यादा तेल-भुना, मसालेदार और प्रोसेस्ड खाना खाने से बचें. इससे पेट की परत को नुकसान पहुंचता है. इसके अलावा ज्यादा चीनी और मैदे से बनी चीजें भी अच्छे बैक्टीरिया के लिए नुकसानदेह मानी जाती हैं. और सबसे जरूरी बात, बार-बार बिना जरूरत के दर्द निवारक दवाइयां लेने से भी पेट की परत कमजोर हो जाती है. इसलिए किसी भी दवाई का सेवन करने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लेनी चाहिए.
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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        <pubDate>Thu, 09 Jul 2026 10:30:19 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Gastro, Shield, Diet:, पेट, को, कभी, बूढ़ा, नहीं, होने, देगी, ये, नई, गैस्ट्रो-शील्ड, डाइट, जानें, की, उम्र, के, बाद, क्यों, है, जरूरी </media:keywords>
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        <title>Benefits Of Matcha Tea:  ग्रीन&amp;टी का जमाना गया! अब वजन घटाने के लिए सेलिब्रिटीज क्यों पी रहे हैं हरी &amp;apos;माचा चाय&amp;apos;?</title>
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        <description><![CDATA[ Benefits Of Matcha Tea:&amp;nbsp;आज के समय में हरे रंग की चाय सोशल मीडिया पर एक अलग ही ट्रेंड बन गई है, जिसे सभी लोग माचा टी के नाम से जान रहे हैं. इस अचानक से आए ट्रेंड को देखकर हर किसी के दिमाग में यही सवाल आ रहा है कि आखिर यह नए प्रकार की चाय होती कैसी है. ऐसे में आपको बता दें कि यह असल में ग्रीन-टी का ही एक खास रूप है, लेकिन इसे बनाने का तरीका अलग होता है. सादी ग्रीन-टी में सिर्फ पानी में पत्तियां उबाली जाती हैं, जबकि माचा में पूरी पत्ती का पाउडर पानी में घोलकर पिया जाता है. यही वजह है कि माचा को ग्रीन-टी के मुकाबले ज्यादा फायदेमंद माना जा रहा है.
सेलिब्रिटीज को माचा इतनी क्यों पसंद आ रही है?
ऐसे ही अचानक से माचा सोशल मीडिया पर ट्रेंड नहीं आ गई है. इसे चर्चा में लाने में सबसे बड़ा हाथ आजकल के सेलिब्रिटीज और कंटेंट क्रिएटर्स का है. वे अपने रोज के रूटीन में माचा को शामिल कर रहे हैं.&amp;nbsp; इसके पीछे की वजह है कि माचा में कैटेचिन नाम का एक एंटीऑक्सीडेंट पाया जाता है, खासकर EGCG नाम का तत्व, जो शरीर की चर्बी घटाने में मदद करता है.&amp;nbsp; कई रिपोर्ट्स के मुताबिक माचा हमारे शरीर की कैलोरी बर्न करने की क्षमता को भी बढ़ाता है. इसके अलावा माचा में कैफीन और एल-थियेनिन के तत्व भी पाए जाते हैं, जो दिमाग को शांत रखते हैं और ऊर्जा देते हैं. यही कारण है कि अब चाय और कॉफी की जगह कई लोग सुबह माचा पीना पसंद कर रहे हैं.
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क्या सच में माचा से वजन कम होता है?
इस जानकारी के बाद अक्सर हर किसी के दिमाग में यही सवाल आता है कि क्या किया जा रहा दावा वाकई में उतना सच्चा है? क्या सच में माचा वजन कम करने में मदद करता है? तो इसके जवाब में बता दें कि माचा कोई जादुई या चमत्कारी ड्रिंक नहीं है, जो अचानक से अकेले ही वजन घटा देगा. विशेषज्ञों के अनुसार, चाहे वे माचा पिएं या फिर कोई भी वजन कम करने वाली अद्भुत ड्रिंक, ये सभी केवल वजन कम करने में मदद कर सकती हैं.&amp;nbsp; इनका असर इतना नहीं होता कि केवल इन्हें पीने से वजन कम हो जाए.&amp;nbsp; यानी बिना खान-पान पर ध्यान दिए, बिना एक्सरसाइज किए केवल इन ड्रिंक्स के भरोसे बैठने से वजन पर कोई असर नहीं पड़ता.&amp;nbsp;
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
यह भी पढ़ेंः&amp;nbsp; Pregnancy Test Kit: प्रेग्नेंसी किट कैसे पता कर लेती है आप प्रेग्नेंट हैं या नहीं? समझिए इसके पीछे का साइंस ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 09 Jul 2026 10:30:17 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Benefits, Matcha, Tea:, ग्रीन-टी, का, जमाना, गया, अब, वजन, घटाने, के, लिए, सेलिब्रिटीज, क्यों, पी, रहे, हैं, हरी, माचा, चाय</media:keywords>
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        <title>Pregnancy Test Kit: प्रेग्नेंसी किट कैसे पता कर लेती है आप प्रेग्नेंट हैं या नहीं? समझिए इसके पीछे का साइंस</title>
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        <description><![CDATA[ Pregnancy Test Kit:&amp;nbsp;प्रेग्नेंसी का समय हर महिला के लिए एक बहुत खास समय होता है. एक महिला प्रेग्नेंट है या नहीं, यह पता करने के लिए हर महिला प्रेग्नेंसी किट पर भरोसा करती है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा जिस प्रेग्नेंसी किट पर महिला आंख बंद करके भरोसा कर लेती हैं, वह किट यह चीज तय कैसे करती है कि महिला प्रेग्नेंट है.
इसके जवाब में बता दें कि जब कोई महिला प्रेग्नेंट होती है, तो उसके शरीर में एक खास हार्मोन बनना शुरू हो जाता है, जिसका नाम &amp;nbsp;hCG&amp;nbsp;होता है, यानी ह्यूमन कोरियोनिक गोनाडोट्रोपिन (Human Chorionic Gonadotropin). यह हार्मोन आमतौर पर मां बनने के 8 से 12 दिन में बनना शुरू हो जाता है. जैसे-जैसे प्रेग्नेंसी आगे बढ़ती है, यह हार्मोन शरीर में बढ़ता जाता है. यही एचसीजी हार्मोन प्रेग्नेंसी किट की पूरी टेस्टिंग के लिए काम आता है. यह हार्मोन खून के साथ-साथ पेशाब में भी पहुंच जाता है, और इसी वजह से पेशाब से टेस्ट करना मुमकिन हो पाता है.
किट के अंदर क्या होता है?
प्रेग्नेंसी किट के अंदर एक खास तरह की पट्टी लगी होती है, जिस पर एंटीबॉडी नाम के छोटे-छोटे कण चिपके होते हैं. ये एंटीबॉडी सिर्फ एचसीजी हार्मोन को ही पहचानते हैं, बाकी किसी चीज को नहीं. जब पेशाब को किट पर डाला जाता है, तो अगर पेशाब में एचसीजी हार्मोन मौजूद है, तो यह एंटीबॉडी से जुड़ जाता है. यह जुड़ाव एक केमिकल रिएक्शन शुरू करता है, जिससे रंग बदलने लगता है. यही वजह है कि किट में सिर्फ पेशाब का इस्तेमाल होता है, खून का नहीं.
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दो लाइन का मतलब क्या होता है?
ज्यादातर प्रेग्नेंसी किट में दो जगह लाइन दिखाने का इंतजाम होता है. एक लाइन कंट्रोल लाइन कहलाती है, जो यह बताती है कि किट सही तरीके से काम कर रही है. दूसरी लाइन टेस्ट लाइन होती है, जो सिर्फ तभी दिखती है जब पेशाब में एचसीजी हार्मोन मौजूद होता है. अगर दोनों लाइन दिखें, तो इसका मतलब है कि महिला प्रेग्नेंट है. अगर सिर्फ एक लाइन दिखे तो इसका मतलब है कि प्रेग्नेंसी नहीं है.
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        <pubDate>Wed, 08 Jul 2026 18:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Pregnancy, Test, Kit:, प्रेग्नेंसी, किट, कैसे, पता, कर, लेती, है, आप, प्रेग्नेंट, हैं, या, नहीं, समझिए, इसके, पीछे, का, साइंस</media:keywords>
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        <title>Causes Of Swollen Feet: पैर में बार&amp;बार आ रही सूजन कर ही इस गंभीर बीमारी का इशारा, तुरंत भागें डॉक्टर के पास</title>
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        <description><![CDATA[ Causes Of Swollen Feet: पैर में बार-बार आ रही सूजन कर ही इस गंभीर बीमारी का इशारा, तुरंत भागें डॉक्टर के पास ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 08 Jul 2026 18:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Oxytocin Health Risks: RML में सब&amp;स्टैंडर्ड ऑक्सीटोसिन की 2700 वायल फेल, जानें क्यों है यह दवा आपके लिए जानलेवा?</title>
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        <description><![CDATA[ Postpartum Hemorrhage Treatment: ऑक्सीटोसिन की 2700 वायल गुणवत्ता जांच में फेल होने के बाद इस दवा की सुरक्षा को लेकर कई सवाल उठने लगे हैं, ऑक्सीटोसिन का इस्तेमाल प्रसव के दौरान लेबर शुरू कराने और डिलीवरी के बाद ज्यादा ब्लीडिंग को रोकने के लिए किया जाता है, ऐसे में जब इसकी गुणवत्ता पर सवाल खड़े हों, तो यह जानना जरूरी हो जाता है कि खराब या मानक के अनुरूप न होने वाली ऑक्सीटोसिन मरीजों की सेहत पर कितना असर डाल सकती है. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर एक्सपर्ट क्या कहते हैं.&amp;nbsp;
क्यों जरूरी है यह दवा?
हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली वेबसाइट Medicinenet ऑक्सीटोसिन शरीर में बनने वाला एक प्राकृतिक हार्मोन है, जिसे दवा के रूप में भी तैयार किया जाता है. अस्पतालों में इसका उपयोग गर्भाशय के संकुचन बढ़ाने, प्रसव को आगे बढ़ाने और डिलीवरी के बाद अत्यधिक रक्तस्राव को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है. औषधि एक्सपर्ट और फार्माकोलॉजिस्ट डॉ. वी. उदय किरण के अनुसार, के अनुसार यह एक महत्वपूर्ण और जीवनरक्षक दवा है, लेकिन इसकी क्वालिटी और सही मात्रा दोनों का सुरक्षित होना बेहद जरूरी है.&amp;nbsp;
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महिलाओं की मौत के बाद सवाल
राजस्थान के कोटा में सी-सेक्शन के बाद पांच महिलाओं की मौत के मामले में भी ऑक्सीटोसिन को लेकर सवाल उठे थे. जांच के दौरान जिस बैच की जांच की गई, उसमें ऑक्सीटोसिन का एक्टिव इंग्रीडिएंट नहीं मिला,. इसके बाद दवा निर्माता और वितरक के खिलाफ नियामक एजेंसियों ने कार्रवाई की और विश्व स्वास्थ्य संगठन &amp;nbsp;ने भी इस मामले में भारत सरकार से जानकारी मांगी. हालांकि, बाद में राजस्थान सरकार की आठ सदस्यीय एक्सपर्ट समिति और एम्स, नई दिल्ली की छह सदस्यीय टीम की रिपोर्ट में कहा गया कि इन मौतों का सीधा कारण केवल खराब ऑक्सीटोसिन को नहीं माना जा सकता. समिति के अनुसार सभी महिलाओं की चिकित्सीय स्थिति अलग-अलग थी और किसी एक वजह को जिम्मेदार ठहराने के पर्याप्त प्रमाण नहीं मिले.&amp;nbsp;
जांच में यह जरूर सामने आया कि अस्पतालों में कई स्तर पर गंभीर कमियां थीं। हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी वाली महिलाओं की पर्याप्त निगरानी नहीं की गई। कई मरीजों के ब्लड प्रेशर, पल्स रेट, यूरिन आउटपुट, लिवर फंक्शन टेस्ट और दवाओं से जुड़े रिकॉर्ड अधूरे पाए गए। कुछ मामलों में पोस्टमार्टम भी नहीं कराया गया, जिससे मौत के वास्तविक कारण की पुष्टि करना मुश्किल हो गया।
इससे क्या होती है दिक्कत?
Medicinenet के अनुसार, ऑक्सीटोसिन के दुष्प्रभाव की बात है, तो इसके इस्तेमाल के दौरान कुछ मरीजों में मतली, उल्टी, एलर्जी, असामान्य हार्ट रेट,ब्लड प्रेशर में बदलाव और दुर्लभ मामलों में गर्भाशय फटने जैसी गंभीर जटिलताएं भी हो सकती हैं. इसलिए यह दवा केवल डॉक्टर की निगरानी में ही दी जाती है. इसकी मात्रा मरीज की स्थिति के अनुसार तय की जाती है और इसे स्वयं इस्तेमाल करना या बिना मेडिकल सलाह के लेना खतरनाक हो सकता है. एक्सपर्ट का कहना है कि किसी भी दवा की गुणवत्ता में कमी चिंता का विषय है, लेकिन हर गंभीर घटना का कारण केवल दवा नहीं होती. सुरक्षित इलाज के लिए अच्छी गुणवत्ता वाली दवा, सही चिकित्सकीय निगरानी, समय पर इलाज और अस्पतालों में तय प्रोटोकॉल का पालन, सभी समान रूप से जरूरी हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 08 Jul 2026 18:30:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Egg Vs Dal: दाल&amp;सब्जी के मुकाबले एक अंडे से कितना मिलता है प्रोटीन, बच्चों के पोषण पर कितना पड़ेगा असर?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/egg-vs-dal-दाल-सब्जी-के-मुकाबले-एक-अंडे-से-कितना-मिलता-है-प्रोटीन-बच्चों-के-पोषण-पर-कितना-पड़ेगा-असर</link>
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        <description><![CDATA[ Kolkata Mid Day Meal Egg Removed: कोलकाता के सरकारी स्कूलों में मिड-डे मील से अंडे हटाकर उनकी जगह शाकाहारी विकल्प देने के फैसले के बाद बच्चों के पोषण को लेकर बहस तेज हो गई है. सवाल यह उठ रहा है कि क्या दाल और सब्जी अंडे जितना प्रोटीन दे सकती हैं और इसका बच्चों की सेहत पर क्या असर पड़ सकता है. चलिए आपको इसके बारे में बताते हैं कि आखिर इसका क्या असर होगा.&amp;nbsp;
अंडे क्यों होते हैं बेहतर विकल्प?
अंडे को लंबे समय से उच्च गुणवत्ता वाले प्रोटीन का सस्ता और आसान सोर्स माना जाता है. एक सामान्य अंडे में करीब 6 से 7 ग्राम प्रोटीन होता है. इसमें शरीर के लिए जरूरी सभी आवश्यक अमीनो एसिड पाए जाते हैं, इसलिए इसे कम्प्लीट प्रोटीन भी कहा जाता है. यही वजह है कि बढ़ते बच्चों के खानपान में अंडे को अहम माना जाता है.&amp;nbsp;
दाल और सब्जी का विकल्प?
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि दाल प्रोटीन का अच्छा स्रोत नहीं है. जानी-मानी पोषण सलाहकार और &#039;गोल्ज-पोषण एवं आहार समाधान&#039; की संस्थापक डॉ. सुषमा अप्पैया के अनुसार, लगभग 50 ग्राम कच्ची दाल पकने के बाद करीब 12 ग्राम प्रोटीन देती है. यानी एक कटोरी दाल से दो अंडों के बराबर के आसपास प्रोटीन मिल सकता है. &amp;nbsp;इसके अलावा दाल में फाइबर, आयरन और कई जरूरी पोषक तत्व भी मौजूद होते हैं, जो शरीर के लिए फायदेमंद हैं.&amp;nbsp;
क्या है दोनों में अंतर?
अंडे और दाल में एक बड़ा अंतर है. अंडे का प्रोटीन शरीर आसानी से अवशोषित कर लेता है, जबकि दाल में मौजूद प्रोटीन के साथ कार्बोहाइड्रेट भी अधिक मात्रा में होता है. इसलिए न्यूट्रिशन एक्सपर्ट अक्सर संतुलित आहार में दोनों को शामिल करने की सलाह देते हैं. अगर किसी कारण से अंडा नहीं दिया जा रहा है, तो दाल के साथ दूध, दही, पनीर, सोया या दूसरी प्रोटीन युक्त चीजें शामिल करना जरूरी माना जाता है, ताकि बच्चों की दैनिक प्रोटीन जरूरत पूरी हो सके. &amp;nbsp;भारत के अलग-अलग राज्यों में मिड-डे मील का मेन्यू अलग है. कई राज्यों में बच्चों को सप्ताह में कुछ दिन अंडा दिया जाता है, जबकि कुछ राज्यों में दाल, चना, पनीर, दूध और दूसरी शाकाहारी चीजों के जरिए पोषण देने की व्यवस्था की जाती है.&amp;nbsp;
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बच्चों के लिए क्या जरूरी?
एक्सपर्ट का कहना है कि बच्चों के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि उन्हें रोजाना पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन, विटामिन और मिनरल्स मिलें. अगर अंडे की जगह ऐसा शाकाहारी विकल्प दिया जाता है जो समान पोषण उपलब्ध कराए, तो बच्चों के विकास पर असर कम पड़ सकता है. लेकिन केवल अंडा हटाकर पोषण की भरपाई न की जाए, तो इससे बढ़ते बच्चों की सेहत और शारीरिक विकास प्रभावित होने का खतरा बढ़ सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 08 Jul 2026 06:30:12 +0530</pubDate>
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        <media:keywords>Egg, Dal:, दाल-सब्जी, के, मुकाबले, एक, अंडे, से, कितना, मिलता, है, प्रोटीन, बच्चों, के, पोषण, पर, कितना, पड़ेगा, असर</media:keywords>
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        <title>Calories Burned: स्वीमिंग, रनिंग या रस्सी कूद... 1 घंटे में किसमें खर्च होती है सबसे ज्यादा कैलोरी, क्या बेहतर?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/calories-burned-स्वीमिंग-रनिंग-या-रस्सी-कूद-1-घंटे-में-किसमें-खर्च-होती-है-सबसे-ज्यादा-कैलोरी-क्या-बेहतर</link>
        <guid>https://hindi.attentionindia.com/calories-burned-स्वीमिंग-रनिंग-या-रस्सी-कूद-1-घंटे-में-किसमें-खर्च-होती-है-सबसे-ज्यादा-कैलोरी-क्या-बेहतर</guid>
        <description><![CDATA[ Which Exercise Burns Most Calories: अगर आपका लक्ष्य वजन कम करना या ज्यादा कैलोरी बर्न करना है, तो अक्सर मन में सवाल आता है कि आखिर स्वीमिंग, रनिंग और रस्सी कूद में सबसे ज्यादा कैलोरी किस एक्सरसाइज से खर्च होती है. तीनों ही बेहतरीन कार्डियो वर्कआउट हैं, लेकिन कैलोरी बर्न करने की क्षमता इनकी तीव्रता, आपकी स्पीड और शरीर के वजन पर भी निर्भर करती है. चलिए आपको इसके बारे में बताते हैं.&amp;nbsp;
किसमें सबसे ज्यादा कैलोरी बर्न होती है?
हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली वेबसाइट healthline के अनुसार रनिंग एक घंटे में सबसे ज्यादा कैलोरी बर्न करने वाली एक्सरसाइज में शामिल है. करीब 70 किलोग्राम वजन वाला व्यक्ति एक घंटे की तेज दौड़ में लगभग 800 कैलोरी तक खर्च कर सकता है. &amp;nbsp;अगर दौड़ने की रफ्तार ज्यादा हो, तो यह आंकड़ा और बढ़ सकता है. यही वजह है कि वजन घटाने की कोशिश कर रहे लोगों के लिए रनिंग को सबसे असरदार कार्डियो एक्सरसाइज माना जाता है.&amp;nbsp;
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रस्सी कूद कितना फायदेमंद?
वहीं रस्सी कूद भी कैलोरी बर्न करने का बेहद प्रभावी तरीका है। एक घंटे तक लगातार मध्यम गति से रस्सी कूदने पर करीब 550 से 700 कैलोरी तक बर्न हो सकती हैं. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके लिए किसी जिम या बड़े उपकरण की जरूरत नहीं होती. घर की थोड़ी-सी जगह में भी यह एक्सरसाइज आसानी से की जा सकती है. इसके साथ ही, इससे पैरों की ताकत, स्टैमिना और हार्ट हेल्थ को भी फायदा मिलता है.&amp;nbsp;
स्वीमिंग हेल्थ के लिए कितना कारगर
अगर बात स्वीमिंग की करें, तो यह पूरे शरीर की एक्सरसाइज मानी जाती है. सामान्य गति से एक घंटे तक तैरने पर लगभग 500 कैलोरी तक खर्च हो सकती हैं. हालांकि अलग-अलग स्टाइल और स्पीड में स्वीमिंग करने पर कैलोरी बर्न का आंकड़ा बढ़ भी सकता है. खास बात यह है कि स्वीमिंग में शरीर के लगभग सभी प्रमुख मसल्स एक साथ काम करते हैं और जोड़ों पर दबाव भी कम पड़ता है. &amp;nbsp;इसलिए जिन लोगों को घुटनों या जोड़ों में दर्द रहता है, उनके लिए यह बेहतर विकल्प माना जाता है.
कैलोरी बर्न ही फिटनेस का पैमाना नहीं&amp;nbsp;
अगर केवल सबसे ज्यादा कैलोरी बर्न करने की बात करें, तो रनिंग पहले स्थान पर रहती है. इसके बाद रस्सी कूद और फिर सामान्य गति से की जाने वाली स्वीमिंग आती है. हालांकि सिर्फ कैलोरी बर्न ही फिटनेस का पैमाना नहीं है. अगर आपको जोड़ों की समस्या है, तो स्वीमिंग ज्यादा सुरक्षित हो सकती है. वहीं कम समय में असरदार वर्कआउट चाहिए, तो रस्सी कूद एक अच्छा विकल्प है. &amp;nbsp;फिटनेस एक्सपर्ट्स का मानना है कि किसी भी एक्सरसाइज से बेहतर परिणाम पाने के लिए उसे नियमित रूप से करना जरूरी है., शुरुआत हमेशा अपनी क्षमता के अनुसार करें, वर्कआउट से पहले वार्म-अप करें और बाद में कूल-डाउन करना न भूलें.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 08 Jul 2026 06:30:11 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>AIIMS Study: बिना मिर्गी के पड़ने वाले दौरों पर योग निद्रा कितनी असरदार? एम्स की नई रिसर्च ने चौंकाया</title>
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        <description><![CDATA[ योग निद्रा को तनाव कम करने, अच्छी नींद लाने और मन को शांत रखने के लिए फायदेमंद माना जाता है, लेकिन क्या इससे उन लोगों को भी फायदा मिलता है, जिन्हें मिर्गी जैसे दौरे पड़ते हैं, जबकि उन्हें असल में मिर्गी नहीं होती?
इसी सवाल का जवाब जानने के लिए एम्स (AIIMS) दिल्ली के न्यूरोलॉजी विभाग की प्रोफेसर डॉ. मंजरी त्रिपाठी और उनकी टीम ने एक रिसर्च की. इस स्टडी की मुख्य लेखक डॉ. सारन्या बी. गोमाथी हैं. 50 मरीजों पर हुई इस स्टडी में पाया गया कि मरीजों की हालत में सुधार जरूर हुआ, लेकिन इलाज के साथ योग निद्रा कराने से कोई अलग फायदा नहीं मिला. यह रिसर्च अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल एपिलेप्सी एंड बिहेवियर(Epilepsy &amp;amp; Behavior) में प्रकाशित हुई है.
योग निद्रा क्या है?
योग निद्रा योग की एक ऐसी तकनीक है, जिसमें व्यक्ति आराम से लेटकर आंखें बंद करता है और प्रशिक्षक या ऑडियो के बताए निर्देशों का पालन करता है. इसमें सांस पर ध्यान दिया जाता है, शरीर को पूरी तरह आराम दिया जाता है और मन को शांत करने की कोशिश की जाती है. इसे तनाव, चिंता और नींद की समस्या कम करने में मददगार माना जाता है.
किस बीमारी पर हुई रिसर्च?
यह रिसर्च फंक्शनल डिसोसिएटिव सीजर्स (FDS) नाम की बीमारी पर की गई. इस बीमारी में मरीज को मिर्गी जैसे दौरे पड़ते हैं, लेकिन जांच में पता चलता है कि उसे मिर्गी नहीं है. यानी दौरे तो मिर्गी जैसे दिखते हैं, लेकिन उनकी वजह कुछ और होती है. इसी कारण कई बार मरीजों का लंबे समय तक मिर्गी समझकर इलाज चलता रहता है. इस बीमारी की सही पहचान वीडियो-ईईजी नाम की एक खास जांच से होती है.
कैसे हुई स्टडी?
जनवरी 2021 से फरवरी 2022 के बीच डॉक्टरों ने 72 मरीजों की जांच की. इनमें से 50 मरीजों को रिसर्च में शामिल किया गया. सबसे पहले सभी मरीजों को उनकी बीमारी के बारे में आसान भाषा में समझाया गया और काउंसलिंग दी गई. इसके बाद 25 मरीजों को योग निद्रा कराई गई, जबकि बाकी 25 मरीजों को उसी समय का एक सामान्य ऑडियो सुनाया गया, जिसमें योग निद्रा की मुख्य तकनीकें शामिल नहीं थीं. इसके बाद सभी मरीजों की छह महीने तक निगरानी की गई.
रिसर्च में क्या पता चला?
छह महीने बाद दोनों समूहों के मरीजों में अच्छा सुधार देखने को मिला. मरीजों को पहले के मुकाबले कम दौरे पड़े. उनकी चिंता और अवसाद भी कम हुआ और रोजमर्रा की जिंदगी पहले से बेहतर हुईए लेकिन जिन मरीजों ने योग निद्रा की, उन्हें दूसरे समूह की तुलना में कोई अलग फायदा नहीं मिला. यानी इलाज के साथ योग निद्रा जोड़ने से इस स्टडी में बेहतर नतीजे नहीं मिले.
किन लोगों पर हुई स्टडी?
स्टडी में शामिल ज्यादातर मरीज युवा महिलाएं थीं. करीब 66 फीसदी मरीजों का पहले मिर्गी समझकर इलाज किया जा चुका था. वहीं, ज्यादातर मरीजों ने पढ़ाई का दबाव, घरेलू तनाव या पारिवारिक समस्याओं जैसी बातों का जिक्र किया. आधे से ज्यादा मरीज चिंता और अवसाद जैसी मानसिक समस्याओं से भी जूझ रहे थे.
डॉक्टरों ने क्या कहा?
रिसर्च करने वाले डॉक्टरों का कहना है कि इस स्टडी में योग निद्रा से कोई नुकसान या दुष्प्रभाव नहीं देखा गया. हालांकि, यह साबित नहीं हो सका कि इस बीमारी के इलाज में योग निद्रा जोड़ने से मरीजों को अलग से ज्यादा फायदा मिलता है. इसलिए इस विषय पर बड़े स्तर पर और लंबे समय तक रिसर्च किए जाने की जरूरत है.
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        <pubDate>Tue, 07 Jul 2026 01:30:14 +0530</pubDate>
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        <title>Monsoon Diseases: बारिश के मौसम में सबसे ज्यादा फैलने वाली 7 बीमारियां कौन&amp;सी, इनसे बचने के आसान उपाय क्या?</title>
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        <description><![CDATA[ Common Monsoon Diseases And Prevention: मानसून की बारिश जहां गर्मी से राहत दिलाती है, वहीं अपने साथ कई तरह की बीमारियों का खतरा भी लेकर आती है. हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली वेबसाइट Healthline के अनुसार, बारिश के दौरान जगह-जगह पानी जमा हो जाता है, जिससे मच्छरों का प्रजनन तेजी से बढ़ता है. वहीं दूषित पानी और गंदगी के कारण बैक्टीरिया और वायरस भी तेजी से फैलते हैं. ऐसे में थोड़ी-सी लापरवाही आपकी सेहत पर भारी पड़ सकती है. चलिए आपको बताते हैं बारिश के मौसम में सबसे ज्यादा होने वाली 7 बीमारियों और उनसे बचने के आसान उपायों के बारे में.&amp;nbsp;
डेंगू
बारिश के मौसम में डेंगू के मामले तेजी से बढ़ते हैं. यह एडीज मच्छर के काटने से फैलता है. तेज बुखार, सिरदर्द, आंखों के पीछे दर्द, शरीर और जोड़ों में तेज दर्द इसके प्रमुख लक्षण हैं. इससे बचने के लिए घर के आसपास पानी जमा न होने दें, मच्छरदानी का इस्तेमाल करें और पूरे शरीर को ढकने वाले कपड़े पहनें.
इसे भी पढ़ेंः सुबह सिर्फ 10 मिनट का ये योगा बदल देगा आपका दिन, एनर्जी, फोकस और फिटनेस तीनों में होगा फायदा&amp;nbsp;
मलेरिया
मलेरिया इंफेक्टेड मच्छर के काटने से होता है. इसमें ठंड लगकर बुखार आना, पसीना आना, कमजोरी और सिरदर्द जैसे लक्षण दिखाई देते हैं. मच्छरों से बचाव के लिए रिपेलेंट का इस्तेमाल करें और शाम के समय विशेष सावधानी बरतें.
चिकनगुनिया
यह भी मच्छरों के जरिए फैलने वाली बीमारी है. इसमें अचानक तेज बुखार के साथ जोड़ों में इतना दर्द हो सकता है कि चलना-फिरना मुश्किल हो जाए. घर और आसपास साफ-सफाई रखने तथा मच्छरों की रोकथाम करने से इसका खतरा काफी कम किया जा सकता है.
टाइफाइड
दूषित भोजन और पानी के कारण टाइफाइड होने का खतरा मानसून में बढ़ जाता है. लगातार बुखार, पेट दर्द, कमजोरी और पाचन संबंधी समस्याएं इसके सामान्य लक्षण हैं. हमेशा उबला या साफ पानी पिएं और खुले में बिकने वाले खाने से परहेज करें.
हेपेटाइटिस ए
यह इंपेक्शन भी गंदे पानी और दूषित भोजन के जरिए फैलता है. इसमें आंखों और त्वचा का पीला पड़ना, भूख कम लगना, थकान और पेट दर्द जैसी समस्याएं हो सकती हैं. भोजन और पानी की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखना इसका सबसे अच्छा बचाव है.
गैस्ट्रोएंटेराइटिस
बारिश के मौसम में पेट से जुड़ी समस्याएं भी काफी बढ़ जाती हैं. दूषित खाना या पानी खाने से दस्त, उल्टी, पेट दर्द और डिहाइड्रेशन की शिकायत हो सकती है. हमेशा ताजा और अच्छी तरह पका हुआ भोजन खाएं और पर्याप्त मात्रा में पानी पीते रहें.
सर्दी-जुकाम और फ्लू
मौसम में अचानक बदलाव और बढ़ी हुई नमी के कारण वायरल इंफेक्शन तेजी से फैलते हैं. नाक बहना, गले में खराश, खांसी और हल्का बुखार इसके आम लक्षण हैं. हाथों की नियमित सफाई करें, पर्याप्त नींद लें और पौष्टिक भोजन खाकर अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत रखें.
बारिश के मौसम में छोटी-सी सावधानी कई गंभीर बीमारियों से बचा सकती है. साफ पानी पीना, घर के आसपास पानी जमा न होने देना, संतुलित आहार लेना और जरूरत पड़ने पर समय रहते डॉक्टर से सलाह लेना आपकी और पूरे परिवार की सेहत को सुरक्षित रखने में मदद कर सकता है.
इसे भी पढ़ेंः&amp;nbsp; Brain Cancer: ब्रेन कैंसर के इलाज में नई उम्मीद, Vitamin B12 थैरेपी ने दिखाया कमाल
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 07 Jul 2026 01:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>Checking Phone After Waking Up: सुबह उठते ही देखते हैं फोन? ये आदत बना देगी इस गंभीर बीमारी का मरीज, आज ही संभलें</title>
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        <description><![CDATA[ Checking Phone After Waking Up:&amp;nbsp;सुबह-सुबह उठते ही कई लोगों की आदत होती है कि वे गर्म पानी पीते हैं, एक्सरसाइज करने जाते हैं, ये सारी बातें तो अच्छी आदतों में गिनी जाती हैं, पर एक ओर आदत होती है जिसे अक्सर हर कोई नजरअंदाज कर देता है, वह है सुबह की शुरुआत फोन देखकर करना. आज के समय में नींद खुलते ही सबसे पहला काम मैसेज, सोशल मीडिया और खबरें चेक करना बन गया है.
कई रिपोर्ट्स में यह बात सामने आई है कि करीब 70 से 80 प्रतिशत लोग जागने के 10 से 15 मिनट के अंदर ही अपना फोन उठा लेते हैं. यह आदत देखने में बहुत छोटी लगती है, लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि यह आदत धीरे-धीरे शरीर और दिमाग दोनों पर नुकसान पहुंचाती है. वे यह भी बताते हैं कि समय रहते इस आदत को नहीं सुधारा गया, तो यह आगे चलकर एक बड़ी परेशानी का रूप ले सकती है.
सुबह-सुबह मोबाइल चलाने से दिमाग पर क्या पड़ता है असर
यह बात जानकर कई लोगों के दिमाग में आता है कि आखिर सुबह-सुबह फोन चलाने से क्या होता है. ऐसे में बता दें कि असल में जब हम सोकर उठते हैं, तो हमारा दिमाग एक हल्की सी नींद और जागने के बीच की अवस्था में होता है, जिसे विशेषज्ञ &quot;स्लीप इनर्शिया&quot; कहते हैं. इस समय दिमाग को धीरे-धीरे जागने और शांत तरीके से एक्टिव होने की जरूरत होती है. लेकिन जैसे ही हम फोन उठाकर मैसेज, ईमेल या सोशल मीडिया देखना शुरू करते हैं, तब दिमाग पर अचानक से बहुत सारी जानकारी का बोझ पड़ जाता है.
हालांकि ये प्रतिक्रियाएं जरूरत पड़ने पर की जाएं तो उसका असर उतना नहीं होता है, जैसे सोते वक्त किसी की कॉल आ जाए या फिर कोई जरूरी मैसेज आ जाए, लेकिन वहीं अगर यह प्रक्रिया रोज दोहराई जाए, तो धीरे-धीरे शरीर हमेशा हल्के तनाव की स्थिति में रहने लगता है.
यह भी पढ़ेंः Oral Cancer Treatment: अल्ट्रासाउंड से हो सकता है ओरल कैंसर सेल्स का खात्मा, इस स्टडी ने जगाई उम्मीद
फोन की स्क्रीन कैसे बिगाड़ती है नींद और मानसिक सेहत
सिर्फ मानसिक सेहत ही नहीं, बल्कि यह आदत नींद के पूरे पैटर्न को भी बिगाड़ देती है. सुबह फोन की स्क्रीन से निकलने वाली तेज रोशनी शरीर की प्राकृतिक घड़ी यानी बॉडी क्लॉक को गड़बड़ कर देती है, जिससे रात में नींद ठीक से नहीं आती. नींद पूरी न होने का असर पूरे दिन की एनर्जी, याददाश्त और काम करने की क्षमता पर पड़ता है. इसके अलावा जो लोग सुबह उठते ही नकारात्मक खबरें या तनाव भरी जानकारी देखने लगते हैं, उनका पूरा दिन ही चिड़चिड़ापन और बेचैनी में गुजरता है.
सुबह मोबाइल की आदत छोड़ने के आसान और असरदार तरीके
इस परेशानी के साथ-साथ विशेषज्ञ इससे बचने के तरीके भी बताते हुए कहते हैं कि, जिन लोगों को सुबह उठते ही फोन चलाने की आदत होती है उन्हें सबसे पहले फोन को बेडरूम से बाहर या बिस्तर से दूर चार्जिंग पर रखना चाहिए, ताकि उठते ही हाथ फोन की तरफ न बढ़े. इसके अलावा अलार्म के लिए फोन की जगह अलार्म घड़ी का इस्तेमाल करना चाहिए.&amp;nbsp;
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
यह भी पढ़ेंः&amp;nbsp; 20-20-20 Rule: दिनभर स्क्रीन देखने वालों के लिए 20-20-20 का वह नियम, जो चश्मे का नंबर बढ़ने से रोक देगा ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 06 Jul 2026 09:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>Benefits of Figs:  अंजीर खाने के पांच अनोखे तरीके, बचपन से लेकर प्रेग्नेंसी और बुढ़ापे तक होगा चमत्कार</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/benefits-of-figs-अंजीर-खाने-के-पांच-अनोखे-तरीके-बचपन-से-लेकर-प्रेग्नेंसी-और-बुढ़ापे-तक-होगा-चमत्कार</link>
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        <description><![CDATA[ Benefits of Figs:  अंजीर खाने के पांच अनोखे तरीके, बचपन से लेकर प्रेग्नेंसी और बुढ़ापे तक होगा चमत्कार ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 06 Jul 2026 09:30:05 +0530</pubDate>
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        <title>Brain Cancer: ब्रेन कैंसर के इलाज में नई उम्मीद, Vitamin B12 थैरेपी ने दिखाया कमाल</title>
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        <description><![CDATA[ Brain Cancer:&amp;nbsp;वाशिंगटन डीसी से एक बड़ी खबर सामने आई है. ऑन्कोसाइंस नाम की एक साइंस पत्रिका में छपी नई स्टडी में ग्लियोब्लास्टोमा नाम के दिमाग के सबसे खतरनाक कैंसर के इलाज को लेकर एक नया तरीका खोजा गया है. यह कैंसर इतना जानलेवा है कि सर्जरी, रेडिएशन और कीमोथेरेपी के बावजूद मरीज आमतौर पर 1 महीने से ज्यादा जीवित नहीं रह पाते हैं. इसकी एक बड़ी वजह है ब्लड-ब्रेन बैरियर, यानी दिमाग के चारों तरफ मौजूद एक सुरक्षा दीवार, जो ज्यादातर दवाओं को दिमाग के अंदर ट्यूमर तक पहुंचने ही नहीं देती. इस रिसर्च की अगुवाई नाइट्रिक ऑक्साइड सर्विसेज कंपनी के जोसेफ ए. बावर और क्लीवलैंड क्लिनिक फाउंडेशन टॉसिग कैंसर सेंटर के वैज्ञानिकों ने मिलकर की है.&amp;nbsp;
विटामिन बी12 से बनी खास दवा
वैज्ञानिकों ने नाइट्रोसिलकोबालामिन नाम का एक कंपाउंड तैयार किया है, जिसे संक्षेप में एनओ-सीबीएल कहा जाता है. यह असल में विटामिन बी12 का ही एक बदला हुआ रूप है, जो शरीर में नाइट्रिक ऑक्साइड छोड़ता है. इस दवा को टेस्ट करने के लिए वैज्ञानिकों ने कई तरीके अपनाए, जैसे कैंसर सेल्स के एक बड़े पैनल पर इसका असर देखना, चूहों में ग्लियोब्लास्टोमा ट्यूमर पर इसकी जांच करना, और इंसानी कैंसर सेल्स पर इसे दूसरी दवाओं के साथ मिलाकर टेस्ट करना.&amp;nbsp; नतीजों में पाया गया कि यह दवा कई तरह के कैंसर पर असर दिखाती है, और दिमाग से जुड़े ट्यूमर पर भी इसका मध्यम असर देखा गया. सबसे बड़ी बात यह रही कि जानवरों पर हुए प्रयोग में यह दवा शरीर में देने के बाद सफलतापूर्वक ब्लड-ब्रेन बैरियर को पार करके सीधे ट्यूमर तक जा पहुंची.&amp;nbsp;
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ट्यूमर में टिककर करती है असर
रिसर्च में एक और खास बात सामने आई कि यह दवा ट्यूमर में जाकर लंबे समय तक टिकी रहती है. ट्यूमर के अंदर नाइट्रेट का स्तर इलाज के बाद कम से कम चौबीस घंटे तक ऊंचा बना रहा, जबकि शरीर के बाकी सामान्य हिस्सों में यह स्तर जल्दी घट गया. इससे पता चलता है कि यह दवा खासतौर पर ट्यूमर में ही रुककर सीधे वहीं नाइट्रिक ऑक्साइड छोड़ती है. इसके अलावा जब लैब में इस दवा को मौजूदा कैंसर इलाज जैसे ट्रेल और टेमोजोलोमाइड के साथ मिलाकर टेस्ट किया गया, तो कैंसर सेल्स की बढ़त पहले से कहीं ज्यादा रुक गई.
यानी यह दवा अकेले काम करने के साथ-साथ मौजूदा इलाज को भी ज्यादा असरदार बना सकती है, यहां तक कि उन ट्यूमर पर भी जो टेमोजोलोमाइड जैसी दवा के खिलाफ प्रतिरोधी हो चुके हैं.&amp;nbsp;हालांकि यह नतीजे उम्मीद जगाने वाले जरूर हैं, लेकिन वैज्ञानिकों ने साफ कहा है कि यह अभी एक शुरुआती पायलट स्टडी है और इसे असली इलाज में इस्तेमाल करने से पहले और गहरी रिसर्च की जरूरत होगी.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Sun, 05 Jul 2026 21:30:14 +0530</pubDate>
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        <title>20&amp;20&amp;20 Rule: दिनभर स्क्रीन देखने वालों के लिए 20&amp;20&amp;20 का वह नियम, जो चश्मे का नंबर बढ़ने से रोक देगा</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/20-20-20-rule-दिनभर-स्क्रीन-देखने-वालों-के-लिए-20-20-20-का-वह-नियम-जो-चश्मे-का-नंबर-बढ़ने-से-रोक-देगा</link>
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        <description><![CDATA[ Screen Time Eye Care: आज के समय में मोबाइल, लैपटॉप और कंप्यूटर के बिना दिन की कल्पना करना मुश्किल है. ऑफिस का काम हो, ऑनलाइन पढ़ाई या फिर सोशल मीडिया, ज्यादातर लोगों की नजर घंटों तक स्क्रीन पर टिकी रहती है. इसका असर सबसे पहले आंखों पर पड़ता है. लंबे समय तक स्क्रीन देखने से आंखों में जलन, सूखापन, धुंधला दिखाई देना, सिरदर्द और आंखों का थक जाना जैसी समस्याएं होने लगती हैं. ऐसे में आंखों को राहत देने के लिए विशेषज्ञ 20-20-20 नियम अपनाने की सलाह देते हैं.&amp;nbsp;
क्या है 20-20-20 नियम?
20-20-20 नियम बेहद आसान है. इसका मतलब है कि हर 20 मिनट तक स्क्रीन देखने के बाद 20 सेकंड का ब्रेक लें और लगभग 20 फीट दूर रखी किसी चीज को देखें. इसके लिए आपको दूरी बिल्कुल नापने की जरूरत नहीं है. आप खिड़की से बाहर किसी पेड़, इमारत या दूर मौजूद किसी भी वस्तु पर नजर टिकाकर अपनी आंखों को आराम दे सकते हैं. इससे आंखों की मांसपेशियों को लगातार एक ही दूरी पर फोकस करने से राहत मिलती है. कई लोग काम में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि उन्हें ब्रेक लेने का ध्यान ही नहीं रहता. ऐसी स्थिति में मोबाइल या कंप्यूटर पर 20 मिनट का रिमाइंडर सेट किया जा सकता है. आज कई ऐसे ऐप भी उपलब्ध हैं जो समय-समय पर स्क्रीन से नजर हटाने की याद दिलाते हैं.&amp;nbsp;
क्या होती है दिक्कत?
हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली वेबसाइट healthlineके अनुसार, लगातार स्क्रीन देखने पर हमारी पलकें सामान्य से काफी कम झपकती हैं. आमतौर पर एक व्यक्ति एक मिनट में करीब 15 बार पलकें झपकाता है, लेकिन स्क्रीन पर काम करते समय यह संख्या काफी कम हो सकती है. इसकी वजह से आंखों में सूखापन, जलन और थकान महसूस होने लगती है. इसी स्थिति को डिजिटल आई स्ट्रेन या कंप्यूटर विजन सिंड्रोम भी कहा जाता है.&amp;nbsp;
क्या इससे फायदा होता है?
कुछ स्टडी में पाया गया है कि 20-20-20 नियम अपनाने से आंखों के सूखेपन और स्क्रीन की वजह से होने वाली असहजता में कमी आ सकती है. हालांकि यह कहना सही नहीं होगा कि इससे चश्मे का नंबर बढ़ना पूरी तरह रुक जाता है. एक्सपर्ट मानते हैं कि यह नियम आंखों पर पड़ने वाले दबाव को कम करने और लंबे समय तक स्क्रीन इस्तेमाल करने के दौरान आराम देने में मददगार हो सकता है.
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 लुब्रिकेटिंग आई ड्रॉप्स का इस्तेमाल किया जा सकता है
अगर आप रोजाना कई घंटे स्क्रीन पर काम करते हैं, तो कुछ और बातों का भी ध्यान रखें. कंप्यूटर स्क्रीन आंखों से लगभग एक हाथ की दूरी पर रखें और स्क्रीन का ऊपरी हिस्सा आंखों के स्तर से थोड़ा नीचे हो. बहुत तेज या बहुत कम रोशनी में काम करने से बचें और स्क्रीन की ब्राइटनेस आसपास की रोशनी के अनुसार रखें. समय-समय पर पलकें झपकाते रहें और जरूरत महसूस होने पर डॉक्टर की सलाह से लुब्रिकेटिंग आई ड्रॉप्स का इस्तेमाल किया जा सकता है.
यह भी पढ़ेंः&amp;nbsp;Male Fertility: सिर्फ सिगरेट या तंबाकू नहीं, इन वजहों से भी जीरो हो जाता है स्पर्म काउंट; नहीं बन पाएंगे पापा
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 05 Jul 2026 21:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Processed Food Health Risks: पैकेट बंद खाने में छिपे वो 3 सीक्रेट केमिकल, जो बिना वजन बढ़ाए अंदर ही अंदर सड़ा रहे आपका लिवर</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/processed-food-health-risks-पैकेट-बंद-खाने-में-छिपे-वो-3-सीक्रेट-केमिकल-जो-बिना-वजन-बढ़ाए-अंदर-ही-अंदर-सड़ा-रहे-आपका-लिवर</link>
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        <description><![CDATA[ Hidden Chemicals In Packaged Foods: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में पैकेट बंद और प्रोसेस्ड फूड का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है. चिप्स, बिस्किट, रेडी-टू-ईट मील, डिब्बाबंद सूप, फास्ट फूड और पैक्ड स्नैक्स जैसी चीजें लोगों की रोजमर्रा की डाइट का हिस्सा बन चुकी हैं. लेकिन एक्सपर्ट का कहना है कि कई बार सिर्फ खाना ही नहीं, बल्कि उसकी पैकेजिंग भी सेहत के लिए चिंता का कारण बन सकती है.
रिसर्च के मुताबिक, कुछ पैकेजिंग मटेरियल में मौजूद रसायन धीरे-धीरे खाने में मिल सकते हैंय लंबे समय तक इनके संपर्क में रहने से शरीर के कई अंगों पर असर पड़ सकता है, जिनमें लिवर भी शामिल है, यूरोपियन यूनियन की संस्था interreg-baltic.eu के अनुसार, कुछ पैकेजिंग मटेरियल में मौजूद केमिकल समय के साथ खाने में मिल सकते हैं और लंबे समय तक इनके संपर्क में रहने से शरीर पर निगेटिव असर पड़ सकता है. चलिए आपको इसके बारे में बताते हैं.&amp;nbsp;
फॉरएवर केमिकल्स
फॉरएवर केमिकल्स ऐसे केमिकल्स हैं जिनका इस्तेमाल तेल और पानी को रोकने वाली पैकेजिंग बनाने में किया जाता है. फास्ट फूड रैपर, पिज्जा बॉक्स और माइक्रोवेव पॉपकॉर्न बैग जैसी चीजों में इनका उपयोग किया जाता रहा है. इन्हें फॉरएवर केमिकल्स इसलिए कहा जाता है क्योंकि ये शरीर और वातावरण में लंबे समय तक बने रह सकते हैं. कुछ स्टडी में इनका संबंध लिवर, थायरॉयड और इम्यून सिस्टम पर पड़ने वाले प्रभावों से जोड़ा गया है.
बिस्फेनॉल-ए
बिस्फेनॉल-ए और इससे जुड़े अन्य बिसफेनॉल्स प्लास्टिक कंटेनर और डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों की अंदरूनी परत में इस्तेमाल किए जाते हैं. समय के साथ ये खाने में मिल सकते हैं. रिसर्च बताती है कि ये हार्मोन के सामान्य कामकाज को प्रभावित कर सकते हैं और लंबे समय तक अधिक संपर्क स्वास्थ्य के लिए चिंता का कारण बन सकता है.
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फ्थैलेट्स
फ्थैलेट्स का इस्तेमाल प्लास्टिक को मुलायम और लचीला बनाने के लिए किया जाता है. ये फूड प्रोसेसिंग उपकरणों और कुछ प्लास्टिक पैकेजिंग के जरिए भोजन तक पहुंच सकते हैं. एक्सपर्ट के मुताबिक, ये हार्मोनल संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं और लंबे समय तक इनके संपर्क में रहना स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं माना जाता.&amp;nbsp;
क्या है इनका विकल्प
अगर इन केमिकल्स के संपर्क को कम करना चाहते हैं, तो प्लास्टिक की जगह कांच, स्टेनलेस स्टील या सिरेमिक के बर्तनों का इस्तेमाल करें. प्लास्टिक कंटेनर में खाना गर्म करने से बचें, क्योंकि गर्मी के कारण केमिकल्स तेजी से भोजन में मिल सकते हैं. इसके साथ ही, इस बात का ध्यान रखें कि जितना संभव हो ताजा और कम प्रोसेस्ड भोजन चुनें.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 05 Jul 2026 21:30:11 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Male Fertility: सिर्फ सिगरेट या तंबाकू नहीं, इन वजहों से भी जीरो हो जाता है स्पर्म काउंट; नहीं बन पाएंगे पापा</title>
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        <description><![CDATA[ Causes Of Low Sperm Count In Men: आजकल पुरुषों में कम स्पर्म काउंट की समस्या तेजी से बढ़ रही है. ज्यादातर लोग मानते हैं कि इसका कारण सिर्फ सिगरेट या तंबाकू है, लेकिन हकीकत इससे कहीं अलग है. कई स्वास्थ्य समस्याएं और रोजमर्रा की कुछ आदतें भी स्पर्म काउंट को बुरी तरह प्रभावित कर सकती हैं. अगर समय रहते इस पर ध्यान न दिया जाए, तो पिता बनने में परेशानी आ सकती है. चलिए आपको इसके पीछे का कारण बताते हैं.&amp;nbsp;
कब होता है स्पर्म काउंट कम?
जब वीर्य में मौजूद स्पर्म की संख्या सामान्य से कम हो जाती है, तो इसे लो स्पर्म काउंट या ओलिगोस्पर्मिया कहा जाता है. हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली वेबसाइट mayoclinic की रिपोर्ट के अनुसार, यदि एक मिलीलीटर वीर्य में 1.5 करोड़ से कम स्पर्म हों, तो इसे सामान्य से कम माना जाता है. वहीं अगर वीर्य में स्पर्म बिल्कुल न हों, तो इस स्थिति को एजूस्पर्मिया कहा जाता है. ऐसी स्थिति में प्राकृतिक रूप से गर्भधारण की संभावना काफी कम हो जाती है.
क्या होते हैं इसके संकेत?
कम स्पर्म काउंट का सबसे बड़ा संकेत यह है कि लंबे समय तक कोशिश करने के बाद भी गर्भधारण नहीं हो पाता. कई मामलों में इसके अलावा कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते. हालांकि कुछ पुरुषों में हार्मोन संबंधी गड़बड़ी या दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं की वजह से यौन इच्छा में कमी, इरेक्शन की दिक्कत, टेस्टिकल में दर्द, सूजन या गांठ जैसे लक्षण भी नजर आ सकते हैं.
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क्या होते हैं इसके कारण?
सिर्फ धूम्रपान और तंबाकू ही नहीं, बल्कि मोटापा, लगातार तनाव, जरूरत से ज्यादा शराब पीना, नशीले पदार्थों का सेवन और हार्मोन असंतुलन भी स्पर्म काउंट को प्रभावित कर सकते हैं. इसके अलावा कुछ इंफेक्शन, वैरिकोसील जैसी बीमारी, थायरॉयड की समस्या और कुछ दवाओं का लंबे समय तक इस्तेमाल भी पुरुषों की प्रजनन क्षमता पर असर डाल सकता है. एक्सपर्ट का कहना है कि अगर एक साल तक बिना किसी गर्भनिरोधक के नियमित संबंध बनाने के बाद भी गर्भधारण न हो, तो डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए. जिन लोगों को पहले से टेस्टिकल, प्रोस्टेट या यौन स्वास्थ्य से जुड़ी कोई समस्या रही है, उन्हें जांच कराने में देरी नहीं करनी चाहिए. समय पर जांच होने से कारण का पता लगाकर सही इलाज शुरू किया जा सकता है.
क्या इसको ठीक किया जा सकता है?
अच्छी बात यह है कि हर मामले में लो स्पर्म काउंट का मतलब हमेशा बांझपन नहीं होता. आज कई तरह की दवाएं, लाइफस्टाइल में बदलाव और आधुनिक फर्टिलिटी ट्रीटमेंट की मदद से गर्भधारण की संभावना बढ़ाई जा सकती है. संतुलित आहार लेना, नियमित व्यायाम करना, वजन नियंत्रित रखना, तनाव कम करना और धूम्रपान व तंबाकू से दूरी बनाना स्पर्म की गुणवत्ता और संख्या दोनों को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 04 Jul 2026 00:30:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>क्या सेहत के लिए सच में खतरनाक है अजीनो मोटो? कितने सेवन से शरीर को होता है नुकसान</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/क्या-सेहत-के-लिए-सच-में-खतरनाक-है-अजीनो-मोटो-कितने-सेवन-से-शरीर-को-होता-है-नुकसान</link>
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        <description><![CDATA[ आजकल लोग जंक फूड खाना काफी पसंद करते हैं, वहीं चाइनीज फूड, पैकेज्ड स्नेक्स और कई प्रोसेस्ड फूड में अजीनो मोटो का इस्तेमाल होता है. इसी अजीनो मोटो को लेकर कई बार यह भी दावा किया जाता है कि इससे हार्ट अटैक, ब्लड प्रेशर, मोटापा या दिमाग से जुड़ी कई गंभीर समस्याएं हो सकती है. वहीं दूसरी और एक्सपर्ट्स मानते हैं कि सीमित मात्रा में इसका सेवन ज्यादातर लोगों के लिए सुरक्षित है, लेकिन कई बार यह हमारी सेहत के लिए खतरनाक भी हो सकता है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि क्या सच में अजीनो मोटो सेहत के लिए खतरनाक होता है और इसके सेवन से शरीर को कितना नुकसान होता है.&amp;nbsp;
क्या है अजीनो मोटो?
अजीनो मोटो दरअसल मोनोसोडियम ग्लूटामेट का एक ब्रांड नाम है. इसका उपयोग खाने का स्वाद बढ़ाने के लिए किया जाता है. यह खाने में उमामी स्वाद जोड़ता है, जिसे मीठा, खट्टा, नमकीन और कड़वे के बाद पांचवा स्वाद माना जाता है. एमएसजी को गन्ना, चुकंदर, मक्का या कसावा जैसे पौधों से फर्मेंटेशन प्रक्रिया के जरिए तैयार किया जाता है. इसका सबसे ज्यादा इस्तेमाल नूडल्स, फ्राइड राइस, सूप, मंचूरियन, प्रोसेस्ड फूड, स्नैक्स, सॉस और कई फास्ट फूड आइटम में किया जाता है. वहीं कई लोग यह भी मान लेते हैं कि एमएसजी और अजीनो मोटो अलग है. लेकिन एमएसजी प्रोडक्ट का नाम है, जबकि अजीनो मोटो जापान की वह कंपनी है, जिसने इसका उत्पादन शुरू किया. समय के साथ यह ब्रांड इतना लोकप्रिय हो गया कि लोग एमएसजी को ही अजीनो मोटो कहने लगे.&amp;nbsp;
क्या अजीनो मोटो सच में पहुंचाता है नुकसान?&amp;nbsp;
एक्सपर्ट्स के अनुसार सीमित मात्रा में एमएसजी का सेवन ज्यादातर हेल्दी लोगों के लिए सुरक्षित माना जाता है. यूएस फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन भी इसे जनरली रिकॉग्नाइज्ड एज सेफ यानी सुरक्षित खाद्य सामग्री की कैटेगरी में रखता है. हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि इसका ज्यादा मात्रा में सेवन पूरी तरह सुरक्षित है. किसी भी खाद्य पदार्थ की तरह इसका जरूरत से ज्यादा उपयोग हेल्थ पर असर डाल सकता है.&amp;nbsp;
ये भी पढ़ें-एनर्जी बढ़ाने का दावा या ग्राहकों से धोखा? FSSAI के निशाने पर Red Bull और Sting जैसे टॉप ब्रांड्स
ज्यादा सेवन से बढ़ सकती है दिक्कत&amp;nbsp;
कई लोगों को एमएसजी वाला खाना खाने के बाद सिर दर्द, पसीना आना, चेहरे पर गर्माहट महसूस होना, सीने में भारीपन या कमजोरी जैसी शिकायत हो सकती है. इसे पहले चाइनीज रेस्टोरेंट सिंड्रोम के नाम से भी जाना जाता था. हालांकि यह समस्या हर व्यक्ति में नहीं होती. वहीं एक्सपर्ट्स का भी कहना है कि एमएसजी में सोडियम होता है, इसलिए अगर कोई व्यक्ति पहले से हाई ब्लड प्रेशर का मरीज है या उसे हार्ट प्रॉब्लम का खतरा है तो उसे ज्यादा मात्रा में एमएसजी वाले खाने से बचना चाहिए. इसके अलावा इससे ज्यादा टेस्टी खाना बार-बार खाने की आदत भी बढ़ सकती है, जिससे जरूरत से ज्यादा कैलोरीज का सेवन होने लगता है. लंबे समय में यह वजन बढ़ने और मोटापे का कारण बन सकता है.
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
ये भी पढ़ें-Childhood Trauma: माइग्रेन से लेकर गंभीर बीमारियों तक... जानें बचपन की तकलीफें आपको कैसे कर सकती हैं परेशान? ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 03 Jul 2026 23:30:06 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>क्या, सेहत, के, लिए, सच, में, खतरनाक, है, अजीनो, मोटो, कितने, सेवन, से, शरीर, को, होता, है, नुकसान</media:keywords>
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        <title>Childhood Trauma: माइग्रेन से लेकर गंभीर बीमारियों तक... जानें बचपन की तकलीफें आपको कैसे कर सकती हैं परेशान?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/childhood-trauma-माइग्रेन-से-लेकर-गंभीर-बीमारियों-तक-जानें-बचपन-की-तकलीफें-आपको-कैसे-कर-सकती-हैं-परेशान</link>
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        <description><![CDATA[ How Childhood Trauma Affects Adult Health: बचपन की तकलीफें हमेशा सिर्फ यादों तक सीमित नहीं रहतीं. कई बार उनका असर इंसान के शरीर और दिमाग पर इतने लंबे समय तक बना रहता है कि सालों बाद भी लोग समझ नहीं पाते कि उनकी परेशानी की शुरुआत आखिर कहां से हुई थी. अब नई रिसर्च यह बताने लगी हैं कि बचपन में झेला गया डर, हिंसा, उपेक्षा या इमोशनल अस्थिरता बड़े होने के बाद शारीरिक और मेंटल हेल्थ पर गहरा असर डाल सकती है.&amp;nbsp;
तमाम बीमारियों का जड़ है पुराना अनुभव
कई लोग सालों तक माइग्रेन, पेट की परेशानी, नींद न आना, लगातार थकान, एंग्जायटी या शरीर में दर्द जैसी समस्याओं का इलाज करवाते रहते हैं, लेकिन असली वजह उनके बचपन के अनुभव हो सकते हैं. आधुनिक साइंस &amp;nbsp;अब यह मानने लगा है कि बचपन का ट्रॉमा सिर्फ इमोशनल समस्या नहीं है, बल्कि यह शरीर के नर्वस सिस्टम, हार्मोन, इम्यूनिटी और लंबे समय तक बीमारी के खतरे को भी प्रभावित कर सकता है.&amp;nbsp;
बचपन में हुई हिंसा के शिकार का क्या होता है असर?
एक्सपर्ट डॉ. प्रितिका सिंह ने TOI को बताया &amp;nbsp;कि कई मरीज ऐसे होते हैं जिनकी रिपोर्ट सामान्य आती है, लेकिन उनकी जिंदगी की कहानी कुछ और कहती है. उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि एक 40 साल की महिला लगातार पीठ दर्द, पेट की समस्या और एंग्जायटी से जूझ रही थी. कई डॉक्टरों को दिखाने के बाद भी उसकी परेशानी की वजह समझ नहीं आई, जबकि उसके बचपन में घरेलू हिंसा और इमोशनल उपेक्षा जैसी घटनाएं जुड़ी थीं.&amp;nbsp;
हमारे शरीर पर क्या होता है असर?
एक्सपर्ट के मुताबिक, जब कोई बच्चा लंबे समय तक डर या असुरक्षा वाले माहौल में रहता है तो उसका शरीर लगातार फाइट या फ्लाइट मोड में रहने लगता है. इससे स्ट्रेस हार्मोन लंबे समय तक बढ़े रहते हैं, जो धीरे-धीरे शरीर के कई अंगों पर असर डालते हैं. यही वजह है कि कई लोगों में आगे चलकर हाई ब्लड प्रेशर, ऑटोइम्यून बीमारियां, डिप्रेशन, मोटापा और नींद से जुड़ी समस्याएं देखने को मिलती हैं.&amp;nbsp;
इसे भी पढ़ें -&amp;nbsp;Heart Fights Cancer: दिल धड़क रहा है यानी कैंसर से लड़ रहा है, नई स्टडी से जागी उम्मीद
बचपन की हिंसा के शिकार लोगों के हेल्थ पर क्या होता है असर?
इस विषय पर सबसे चर्चित रिसर्च अमेरिका में हुई एसीई मानी जाती है, जिसे सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन और कैसर परमानेंटे ने किया था. इस स्टडी में 17 हजार से ज्यादा लोगों को शामिल किया गया था. रिसर्च में सामने आया कि जिन लोगों ने बचपन में हिंसा, उपेक्षा, घरेलू तनाव या नशे जैसी परिस्थितियां झेली थीं, उनमें बड़े होने के बाद गंभीर बीमारियों का खतरा ज्यादा पाया गया.
जेएएमए पीडियाट्रिक्स में प्रकाशित एक अन्य रिसर्च में भी बचपन के ट्रॉमा और ऑटोइम्यून बीमारियों के बीच संबंध देखा गया. इन स्टडी ने डॉक्टरों के सोचने का तरीका बदल दिया. अब ट्रॉमा को सिर्फ मानसिक याद नहीं बल्कि शरीर पर असर डालने वाली बॉयोलॉजिकल स्थिति माना जा रहा है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 02 Jul 2026 19:30:11 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Foods That Can Shorten Lifespan: किन चीजों का सेवन करने पर सबसे ज्यादा रहता है उम्र घटने का खतरा? जान लीजिए काम की बात</title>
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        <description><![CDATA[ Foods That Can Shorten Lifespan : आजकल की खराब लाइफस्टाइल और गलत खान-पान की वजह से कम उम्र में ही कई स्वास्थ्य समस्याएं होने लगी हैं. समय के साथ शरीर के सेल्स और टिशू में बदलाव आते हैं, जिससे शरीर की ताकत धीरे-धीरे कम होने लगती है और कई बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है. हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि रोजाना की खान-पान की आदतें इस प्रक्रिया को काफी हद तक प्रभावित करती हैं. बैलेंस और हेल्दी डाइट जहां लंबे समय तक स्वस्थ रहने में मदद करता है, वहीं कुछ फूड प्रोडक्ट्स ऐसे भी हैं जिनका नियमित सेवन शरीर में सूजन बढ़ा सकता है, स्किन को समय से पहले बूढ़ा दिखा सकता है और लंबे समय में कई गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ा सकता है. ऐसे में आइए जानते हैं कि किन चीजों का सेवन करने पर उम्र घटने का खतरा सबसे ज्यादा रहता है.&amp;nbsp;
किन चीजों का सेवन करने पर उम्र घटने का खतरा सबसे ज्यादा रहता है
1. तली हुई चीजें - बहुत ज्यादा टेंपरेचर पर तली हुई चीजों का नियमित सेवन शरीर में फ्री रेडिकल्स बनने का कारण बन सकता है. ये फ्री रेडिकल्स सेल्स को नुकसान पहुंचाते हैं और स्किन की इलास्टिसिटी कम कर सकते हैं. इससे झुर्रियां, सूजन और मुंहासों जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं.&amp;nbsp;
2. सफेद ब्रेड - सफेद ब्रेड जैसे रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट शरीर में ऐसे तत्व बनाते हैं जिन्हें एडवांस्ड ग्लाइकेशन एंड प्रोडक्ट्स (AGEs) कहा जाता है. ये शरीर में सूजन बढ़ा सकते हैं और लंबे समय में उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को तेज कर सकते हैं.&amp;nbsp;
3. प्रोसेस्ड मीट - सॉसेज, बेकन, सलामी, पेपरोनी और हॉट डॉग जैसे प्रोसेस्ड मीट में सोडियम, फैट और प्रिजर्वेटिव ज्यादा मात्रा में होते हैं. शोध के अनुसार, इनका ज्यादा सेवन स्किन को डिहाइड्रेट कर सकता है और कोलेजन को नुकसान पहुंचा सकता है, जिससे स्किन जल्दी ढीली पड़ सकती है.&amp;nbsp;
4. ज्यादा नमक वाला खाना - शरीर के लिए नमक जरूरी है, लेकिन इसकी ज्यादा मात्रा नुकसान पहुंचा सकती है. ज्यादा नमक खाने से शरीर में पानी की कमी और वॉटर रिटेंशन की समस्या हो सकती है. इससे स्किन रूखी दिखने लगती है और समय से पहले उम्र बढ़ने के संकेत नजर आ सकते हैं.&amp;nbsp;
5. बहुत ज्यादा मसालेदार खाना &amp;nbsp;- बहुत ज्यादा तीखा और मसालेदार खाना शरीर में सूजन बढ़ा सकता है.इससे स्किन लाल पड़ सकती है और मुंहासों की समस्या बढ़ सकती है. लगातार ऐसा खाना खाने से स्किन पर उम्र का असर जल्दी दिखाई दे सकता है.&amp;nbsp;
6. ज्यादा चीनी वाली चीजें - रिफाइंड चीनी शरीर में सूजन बढ़ाती है और कोलेजन साथ ही इलास्टिन को नुकसान पहुंचाती है. यही दोनों तत्व स्किन को मुलायम और लचीला बनाए रखने में मदद करते हैं. ज्यादा चीनी खाने से वजन बढ़ने और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा भी बढ़ सकता है.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ें - देश में तीन में से एक व्यक्ति है लिवर से जुड़ी बीमारियों का शिकार, नड्डा बोले- जगरूकता है जरूरी
7. ट्रांस फैट वाले फास्ट फूड - फास्ट फूड और जंक फूड में अक्सर ट्रांस फैट ज्यादा होता है. इससे धमनियां और ब्लड वेसल्स सख्त हो सकती हैं, जिससे स्किन तक बल्ड का फ्लो कम हो जाता है. इसका असर समय से पहले झुर्रियां आने और उम्र बढ़ने के रूप में दिखाई दे सकता है.&amp;nbsp;
8. जला हुआ मांस - बहुत ज्यादा जला हुआ मांस ऐसे तत्व पैदा कर सकता है जो शरीर में सूजन बढ़ाते हैं. शोध के अनुसार, इससे कोलेजन टूट सकता है और स्किन पर समय से पहले उम्र बढ़ने के लक्षण दिखाई दे सकते हैं.&amp;nbsp;
9. जरूरत से ज्यादा कैफीन - कैफीन शरीर से पानी बाहर निकालने का काम करती है. बहुत ज्यादा कॉफी पीने से शरीर में पानी की कमी हो सकती है, जिससे स्किन रूखी और बेजान दिखाई दे सकती है. विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि कॉफी पीने के साथ पर्याप्त मात्रा में पानी भी पीना चाहिए.&amp;nbsp;
10. शराब - शराब का नियमित सेवन शरीर में विषैले पदार्थों के जमा होने का कारण बन सकता है. इससे लिवर पर असर पड़ता है और शरीर की विषैले तत्वों को बाहर निकालने की क्षमता कमजोर हो सकती है. इसके कारण स्किन में रूखापन, कोलेजन की कमी और इलास्टिसिटी कम होने जैसी समस्याएं हो सकती हैं.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 01 Jul 2026 15:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Foods, That, Can, Shorten, Lifespan:, किन, चीजों, का, सेवन, करने, पर, सबसे, ज्यादा, रहता, है, उम्र, घटने, का, खतरा, जान, लीजिए, काम, की, बात</media:keywords>
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        <title>Mini Stroke: मौत के करीब ले जाएगी रातभर जागने की आदत, बढ़ रहा मिनी स्ट्रोक का खतरा, एक्सपर्ट ने दी चेतावनी</title>
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        <description><![CDATA[ How Sleep Deprivation Increases Mini Stroke Risk: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में रात का समय भी पहले जैसा नहीं रहा. आधी रात के बाद तक मोबाइल की स्क्रीन चमकती रहती है, बिस्तर पर लेटे-लेटे लोग ऑफिस के ईमेल चेक करते हैं और सोशल मीडिया स्क्रॉल करते-करते पता ही नहीं चलता कि कब रात बीत गई. खासकर युवा प्रोफेशनल्स के लिए यह अब सामान्य लाइफस्टाइल बन चुकी है. लेकिन न्यूरोलॉजिस्ट्स चेतावनी दे रहे हैं कि यह आदत सिर्फ थकान ही नहीं, बल्कि मिनी स्ट्रोक जैसे गंभीर खतरे को भी बढ़ा सकती है.
क्या होता है मिनी स्ट्रोक?
मिनी स्ट्रोक, जिसे मेडिकल भाषा में ट्रांजिएंट इस्केमिक अटैक कहा जाता है, तब होता है जब कुछ समय के लिए ब्रेन के किसी हिस्से में ब्लड फ्लो रुक जाता है. इसके लक्षण कुछ मिनटों में खत्म हो सकते हैं, लेकिन इसे हल्के में लेना बड़ी गलती साबित हो सकता है. अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ &amp;nbsp;के अनुसार, जिन लोगों को ट्रांजिएंट इस्केमिक होता है, उनमें से लगभग हर तीन में एक व्यक्ति को आगे चलकर स्ट्रोक हो सकता है और इनमें से करीब आधे मामले एक साल के भीतर सामने आते हैं.&amp;nbsp;
नींद से क्यों होती है ये दिक्कत?
&amp;nbsp;डॉ. चंदना आर गौड़ा ने TOI को बताया कि नींद की कमी तेजी से न्यूरोलॉजिकल और हार्ट संबंधी समस्याओं का बड़ा कारण बनती जा रही है. उनका कहना है कि लगातार कम नींद लेने से शरीर में तनाव बढ़ाने वाले हार्मोन का स्तर ऊंचा रहता है, ब्लड प्रेशर प्रभावित होता है, सूजन बढ़ती है और मेटाबॉलिज्म बिगड़ता है. ये सभी कारक मिलकर मिनी स्ट्रोक और बाद में स्ट्रोक का खतरा बढ़ा सकते हैं.
अच्छी नींद क्यों है जरूरी?
एक्सपर्ट के अनुसार, अच्छी नींद सिर्फ शरीर को आराम नहीं देती बल्कि ब्लड वेसल्स की मरम्मत, ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने और सूजन कम करने में भी मदद करती है. जब लगातार नींद पूरी नहीं होती, तो शरीर के ये जरूरी सिस्टम प्रभावित होने लगते हैं. नेशनल हार्ट, लंग एंड ब्लड इंस्टीट्यूट की रिसर्च भी बता चुकी है कि लंबे समय तक नींद की कमी हाई ब्लड प्रेशर, मोटापा, डायबिटीज और हृदय रोगों का जोखिम बढ़ाती है, जो स्ट्रोक के प्रमुख कारण माने जाते हैं.
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रिवेंज बेडटाइम प्रॉक्रैस्टिनेशन &amp;nbsp;क्या होता है?
हाल के वर्षों में एक नया शब्द भी चर्चा में आया है, जिसे रिवेंज बेडटाइम प्रॉक्रैस्टिनेशन कहा जाता है। इसका मतलब है काम के लंबे दिन के बाद अपने लिए समय निकालने के चक्कर में जानबूझकर देर तक जागना, जबकि शरीर को आराम की जरूरत होती है. डॉ. गौड़ा के मुताबिक, देर रात तक फोन चलाना, लगातार स्क्रीन देखना और सिर्फ कुछ घंटे की नींद लेना आज कई युवाओं की आदत बन चुकी है, जो भविष्य में गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं की वजह बन सकती है.
क्या होते हैं इसके लक्षण?
मिनी स्ट्रोक की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसके संकेत अक्सर नजरअंदाज कर दिए जाते हैं. शरीर के एक हिस्से में अचानक कमजोरी या सुन्नपन, बोलने में दिक्कत, चक्कर आना, धुंधला दिखाई देना, चेहरे का एक तरफ झुक जाना या कुछ मिनटों तक भ्रम की स्थिति बने रहना इसके शुरुआती लक्षण हो सकते हैं. एक्सपर्ट का कहना है कि ऐसे किसी भी संकेत को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 01 Jul 2026 15:30:06 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Ginger Tea Health Risks: फायदेमंद समझकर ज्यादा अदरक की चाय पीना पड़ न जाए भारी! आज ही जान लें ये जरूरी बातें</title>
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        <description><![CDATA[ Who Should Avoid Ginger Tea: तरुणा मिश्रा का एक शेर है कि, &#039;आज फिर चाय बनाते हुए वो याद आया, आज फिर चाय में पत्ती नहीं डाली मैंने.&#039; ये हो गई शायर की पंक्तियां, लेकिन अगर आप चाय में पत्तियों के साथ-साथ अदरक कूट-कूटकर डाल रहे हैं या फिर ठेले पर बन रही अदरक की चाय की सुगंध से खींचे चले जा रहे हैं, तो अब सावधान होने की जरूरत है. दरअसल, अदरक की चाय आपकी तलब को शांत तो कर देती है, लेकिन आपको अस्पताल भी पहुंचा सकती है. चलिए आपको बताते हैं कि कब इससे दिक्कत होने लगती है और किन लोगों को इससे बचकर रहना चाहिए.
क्या अदरक की चाय नुकसानदायक?
कई लोगों का तो दिन ही इसकी एक कप चाय के बिना शुरू नहीं होता. इतना ही नहीं, कुछ लोग इसे सेहत के लिए इतना फायदेमंद मानते हैं कि दिन में कई बार अदरक की चाय पी जाते हैं. Healthline की रिपोर्ट के अनुसार, हेल्थ एक्सपर्ट्स के मुताबिक, एक दिन में करीब 4 ग्राम से ज्यादा अदरक का सेवन नहीं करना चाहिए. सामान्य तौर पर चाय के जरिए इतनी मात्रा तक पहुंचना आसान नहीं होता, लेकिन अगर आप दिनभर अदरक वाली चाय, काढ़ा और अदरक से बनी दूसरी चीजें लेते रहते हैं, तो कुल मात्रा बढ़ सकती है.
क्या होती है इससे दिक्कत?
कुछ लोगों को अदरक की चाय पीने के बाद सीने में जलन, एसिडिटी या पेट में हल्की जलन महसूस हो सकती है. कई बार लोग इसे अदरक से एलर्जी समझ लेते हैं, जबकि यह सिर्फ मसालेदार चीजों की तरह होने वाली सामान्य जलन भी हो सकती है. हालांकि अगर चाय पीने के बाद मुंह या शरीर पर चकत्ते पड़ने लगें, खुजली हो या पेट में तेज परेशानी महसूस हो, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए.
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किन लोगों को होती है इससे दिक्कत?
अगर आपको पहले से पित्त की थैली यानी गॉलब्लैडर से जुड़ी कोई समस्या है, तो अदरक की चाय को नियमित रूप से पीने से पहले डॉक्टर से राय लेना बेहतर माना जाता है. वहीं अदरक ब्लड प्रेशर को थोड़ा कम करने में भी मदद कर सकता है. ऐसे में जिन लोगों का ब्लड प्रेशर पहले से कम रहता है या जो ब्लड प्रेशर की दवा ले रहे हैं, उन्हें सावधानी बरतनी चाहिए. अदरक में ऐसे प्राकृतिक तत्व भी पाए जाते हैं, जो खून को थोड़ा पतला करने का असर दिखा सकते हैं. इसलिए जिन लोगों को ब्लीडिंग डिसऑर्डर है या जो ब्लड थिनर दवाएं लेते हैं, उन्हें भी बिना डॉक्टर की सलाह के जरूरत से ज्यादा अदरक का सेवन नहीं करना चाहिए.
सिर्फ नुकसानदायक नहीं फायदेमंद भी
हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि अदरक की चाय नुकसान ही करती है. सही मात्रा में इसका सेवन कई लोगों के लिए फायदेमंद भी हो सकता है. रिसर्च बताती हैं कि यह मतली, उल्टी, अपच और पेट खराब होने जैसी समस्याओं में राहत पहुंचाने में मदद कर सकती है. कुछ लोगों को सर्जरी या कीमोथेरेपी के बाद होने वाली मतली में भी इससे फायदा मिलता है. इसके अलावा अदरक में मौजूद जिंजरोल नाम का तत्व शरीर में सूजन कम करने में मदद कर सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 30 Jun 2026 23:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Diabetes Diet: डायबिटीज में फल खाना जहर नहीं, एक्सपर्ट से जानें कौन से फल हैं फायदेमंद और किनसे करें परहेज?</title>
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        <description><![CDATA[ Which Fruits Are Best For Diabetes Patients: भारत इस समय तेजी से बढ़ती डायबिटीज की चुनौती का सामना कर रहा है. साल 2023 में पब्लिश इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च- इंडिया डायबिटीज स्टडी के अनुसार देश में करीब 10.1 करोड़ लोग डायबिटीज से पीड़ित हैं, जबकि लगभग 13.6 करोड़ लोग प्रीडायबिटिक कैटेगरी में आते हैं. यानी ये लोग आने वाले वर्षों में डायबिटीज के शिकार हो सकते हैं. शहरी क्षेत्रों के साथ-साथ ग्रामीण इलाकों में भी इस बीमारी के बढ़ते मामलों ने खानपान और लाइफस्टाइल को लेकर नई चिंताएं खड़ी कर दी हैं.
क्या डायबिटीज में फलों को खाना बंद कर देना चाहिए?
डायबिटीज से जुड़े सबसे आम भ्रमों में से एक यह है कि मरीजों को फल खाना पूरी तरह बंद कर देना चाहिए, क्योंकि फलों में प्राकृतिक शर्करा होती है. हालांकि एक्सपर्ट का कहना है कि यह धारणा पूरी तरह सही नहीं है. किसी फल का असर केवल उसकी मिठास से तय नहीं होता, बल्कि उसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स, ग्लाइसेमिक लोड , फाइबर की मात्रा, फ्रुक्टोज का स्तर और सेवन की मात्रा भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.&amp;nbsp;
किन फलों को ज्यादा खाने से बचना चाहिए?
कुछ फल ऐसे होते हैं जिनमें कार्बोहाइड्रेट की मात्रा अपेक्षाकृत अधिक होती है. इनमें आम, चीकू, अंगूर, पका हुआ केला, सीताफल और कटहल शामिल हैं. इनका सेवन यदि अधिक मात्रा में किया जाए तो भोजन के बाद ब्लड शुगर तेजी से बढ़ सकता है. इसलिए इन फलों को सीमित मात्रा में खाने की सलाह दी जाती है.
कौन से फल डायबिटीज मरीजों के लिए बेहतर विकल्प?
वहीं कुछ फल डायबिटीज मरीजों के लिए बेहतर विकल्प माने जाते हैं. अमरूद, सेब, नाशपाती, संतरा, पपीता, कीवी और बेरीज जैसे फल फाइबर से भरपूर होते हैं और शरीर में ग्लूकोज को धीरे-धीरे रिलीज करते हैं. इससे ब्लड शुगर अचानक बढ़ने की संभावना कम हो जाती है. एक्सपर्ट के अनुसार अमरूद डायबिटीज मरीजों के लिए काफी फायदेमंद हो सकता है. इसमें प्रति 100 ग्राम लगभग 5 ग्राम फाइबर पाया जाता है, जो लंबे समय तक पेट भरा रखने में मदद करता है और भोजन के बाद ब्लड शुगर में आने वाले उतार-चढ़ाव को कंट्रोल करने में सहायक होता है.
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सीमित मात्रा में खाना फायदेमंद
फरीदाबाद स्थित अमृता अस्पताल के एंडोक्रिनोलॉजी एवं डायबिटीज विभाग के प्रमुख डॉ. निशांत रायजादा ने TOI को बताया कि अधिकांश मरीज फलों को केवल उनकी मिठास के आधार पर देखते हैं, जबकि शरीर की प्रतिक्रिया फाइबर, कार्बोहाइड्रेट की मात्रा और हिस्से के आकार पर ज्यादा निर्भर करती है. सीमित मात्रा में खाए गए साबुत फल डायबिटीज डाइट का सुरक्षित हिस्सा हो सकते हैं. &amp;nbsp;एक्सपर्ट फलों के रस को लेकर भी सावधानी बरतने की सलाह देते हैं. जूस बनाने की प्रक्रिया में फलों का अधिकांश फाइबर निकल जाता है, जिससे ग्लूकोज तेजी से रक्त में पहुंचता है. एक गिलास जूस में कई फलों के बराबर शर्करा हो सकती है, लेकिन उससे पेट भरने का एहसास नहीं होता.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 30 Jun 2026 23:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Organ Meat Health Risks: मटन खाते हैं? कलेजी, दिमाग और गुर्दा हर किसी के लिए नहीं, डॉक्टर भी देते हैं वार्निंग</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/organ-meat-health-risks-मटन-खाते-हैं-कलेजी-दिमाग-और-गुर्दा-हर-किसी-के-लिए-नहीं-डॉक्टर-भी-देते-हैं-वार्निंग</link>
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        <description><![CDATA[ Health Benefits And Risks Of Organ Meat: मटन खाने के शौकीन लोगों की थाली में अक्सर कलेजी, दिमाग, गुर्दा और दिल जैसी चीजें भी शामिल होती हैं. इन्हें ऑर्गन मीट या ऑफल कहा जाता है. कई लोग इन्हें स्वाद के लिए खाते हैं, तो कुछ इन्हें पोषण का खजाना मानते हैं. सच भी यही है कि इन अंगों में कई जरूरी विटामिन और मिनरल्स भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं. लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि ये हर किसी के लिए सुरक्षित नहीं हैं. कुछ लोगों के लिए इनका ज्यादा सेवन फायदे की जगह नुकसान पहुंचा सकता है.
किन लोगों को इससे बचकर रहना चाहिए?
हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली वेबसाइट webmd के अनुसार, &amp;nbsp;फायदों के बावजूद कलेजी, दिमाग और गुर्दा रोजाना या जरूरत से ज्यादा नहीं खाना चाहिए. खासकर कलेजी और दिल में कोलेस्ट्रॉल काफी अधिक होता है. अगर किसी व्यक्ति का कोलेस्ट्रॉल पहले से बढ़ा हुआ है या उसे दिल की बीमारी का खतरा है, तो ज्यादा मात्रा में ऑर्गन मीट खाना हार्ट अटैक और स्ट्रोक का जोखिम बढ़ा सकता है. इसके अलावा, जिन लोगों को गाउट &amp;nbsp;की समस्या है, उन्हें भी कलेजी, गुर्दा और दूसरे ऑर्गन मीट से दूरी बनाने की सलाह दी जाती है. इनमें प्यूरिन की मात्रा ज्यादा होती है, जो शरीर में यूरिक एसिड बढ़ाकर जोड़ों के दर्द और सूजन की समस्या को और गंभीर बना सकती है.
डॉक्टर यह भी बताते हैं कि हीमोक्रोमैटोसिस जैसी बीमारी से पीड़ित लोगों को भी ऑर्गन मीट सीमित मात्रा में ही खाना चाहिए. इस बीमारी में शरीर में पहले से ही आयरन अधिक होता है, इसलिए आयरन से भरपूर कलेजी जैसी चीजें नुकसान पहुंचा सकती हैं.
पूरी तरह फिट लोगों को क्या ध्यान रखना चाहिए?
एक्सपर्ट की सलाह है कि अगर आप पूरी तरह स्वस्थ हैं, तब भी ऑर्गन मीट को रोज की डाइट का हिस्सा बनाने के बजाय कभी-कभार और सीमित मात्रा में ही खाएं. वहीं अगर आपको दिल की बीमारी, हाई कोलेस्ट्रॉल, गाउट या आयरन ओवरलोड जैसी कोई समस्या है, तो इन्हें खाने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लें. स्वाद के साथ सेहत का संतुलन बनाए रखना ही सबसे बेहतर विकल्प माना जाता है.
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एक्सपर्ट के अनुसार, कलेजी, गुर्दा और दिल में विटामिन बी12, आयरन, जिंक और कई बी-विटामिन अच्छी मात्रा में मौजूद होते हैं. यही वजह है कि जिन लोगों में आयरन की कमी होती है, उनके लिए सीमित मात्रा में कलेजी फायदेमंद मानी जाती है. इससे शरीर में आयरन का स्तर बढ़ सकता है और कमजोरी या थकान जैसी समस्याओं में भी राहत मिल सकती है.
फायदेमंद भी होता है
कलेजी में मौजूद विटामिन बी1 और अन्य पोषक तत्व दिमाग की काम करने की क्षमता को बेहतर बनाए रखने में मदद कर सकते हैं. वहीं विटामिन बी2 शरीर के सेल्स को स्वस्थ रखने के साथ कुछ तरह के कैंसर के खतरे को कम करने में भी भूमिका निभा सकता है. इसके अलावा दिल, कलेजी और गुर्दे में पाया जाने वाला विटामिन बी12 और फोलेट ब्लड में होमोसिस्टीन के स्तर को नियंत्रित रखने में मदद करता है, जिससे हार्ट संबंधी बीमारियों का जोखिम कम हो सकता है.
इसे भी पढ़ें -&amp;nbsp;Childhood Cancer: अब जानलेवा नहीं रहा चाइल्डहुड कैंसर! 85% बच्चों की बच रही जान
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 30 Jun 2026 23:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>देश में तीन में से एक व्यक्ति है लिवर से जुड़ी बीमारियों का शिकार, नड्डा बोले&amp; जगरूकता है जरूरी</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/देश-में-तीन-में-से-एक-व्यक्ति-है-लिवर-से-जुड़ी-बीमारियों-का-शिकार-नड्डा-बोले-जगरूकता-है-जरूरी</link>
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        <description><![CDATA[ केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने आईएलबीएस (ILBS) के दसवें दीक्षांत समारोह में संस्थान की कामयाबियों की सराहना करते हुए कहा कि यह संस्थान न केवल देश में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत का नाम रोशन कर रहा है. उन्होंने बताया कि ILBS केवल लिवर रोगों के उपचार तक सीमित नहीं है, बल्कि बीमारी की रोकथाम और जनजागरण के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है. नड्डा ने कहा कि आजकल घर-घर फैटी लिवर की चर्चा हो रही है और इस बीमारी के प्रति जागरूकता फैलाने में ILBS ने बड़ा रोल निभाया है.
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे अपनी शिक्षा और ज्ञान को समाज तक पहुंचाएं और स्वस्थ भारत के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाएं. अपने संबोधन में स्वास्थ्य मंत्री ने देश के स्वास्थ्य ढांचे के विस्तार का भी उल्लेख किया और बताया कि 20वीं सदी के अंत तक देश में केवल एक एम्स था, जबकि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में 6 नए एम्स स्थापित किए गए. उन्होंने कहा कि आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एम्स की संख्या बढ़कर 23 हो चुकी है और मोदी सरकार के आने के बाद मेडिकल कॉलेजों की संख्या में भी काफी वृद्धि हुई है.
देश में 186000 आयुष्मान आरोग्य मंदिर
केंद्रीय मंत्री नड्डा ने यह भी बताया कि देशभर में 1,86,000 आयुष्मान आरोग्य मंदिर कार्यरत हैं, जहां प्राथमिक स्तर पर बीमारियों की जांच होती है. उन्होंने कहा कि स्वस्थ भारत के लक्ष्य को हासिल करने के लिए समय पर जांच और बीमारी की शीघ्र पहचान अत्यंत आवश्यक है. इस अवसर पर स्वास्थ्य मंत्री ने मेडिकल छात्रों को उनकी उपाधियां भी प्रदान कीं और उनके उज्जवल भविष्य की कामना की.
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हर तीन में एक व्यक्ति फैटी लिवर का शिकार&amp;nbsp;
कार्यक्रम में ILBS के वाइस चांसलर डॉ. एस.के. सरीन ने बताया कि ILBS दुनिया की एकमात्र लिवर यूनिवर्सिटी है और साल 2025 में यहां 1,60,000 मरीजों को देखा गया, जो कि कई यूरोपीय देशों में देखे जाने वाले मरीजों की संख्या से भी अधिक है. डॉ. सरीन ने कहा कि अब तक संस्थान में 1,392 लिवर ट्रांसप्लांट सफलतापूर्वक किए गए हैं और 69 ईडब्ल्यूएस कैटेगरी के मरीजों का भी ट्रांसप्लांट हुआ है. डॉ. सरीन ने यह भी कहा कि देश में हर तीन में से एक व्यक्ति फैटी लिवर से ग्रस्त है और इसलिए आयुष्मान भारत योजना में किडनी की तरह लिवर ट्रांसप्लांट की भी मांग की जानी चाहिए. उन्होंने गुणवत्ता चिकित्सा सेवाओं, अनुसंधान और प्रशिक्षण को आगे बढ़ाने पर जोर देते हुए कहा कि ILBS का यह दसवाँ दीक्षांत समारोह उनके समर्पण और प्रयासों का प्रतीक है.
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        <pubDate>Tue, 30 Jun 2026 23:30:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Milky Urine: सुबह&amp;सुबह होता है एकदम दूधिया पेशाब? लापरवाही न करें तुरंत डॉक्टर से मिलें</title>
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        <description><![CDATA[ Causes of Milky Urine: हेल्थ एक्सपर्ट्स अक्सर कहते हैं कि इंसान के यूरिन से शरीर में होने वाली कई बीमारियों के संकेत मिल सकते हैं. पेशाब का रंग यह बता सकता है कि आपका शरीर पूरी तरह स्वस्थ है या किसी बीमारी से लड़ रहा है. ऐसे में अगर आपके पेशाब का रंग अचानक एकदम दूधिया या सफेद दिखाई देने लगे, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. आइए जानते हैं कि ऐसा क्यों होता है और यह किन बीमारियों का संकेत हो सकता है.
क्या होती है दिक्कत?
अगर सुबह उठते ही पेशाब का रंग सामान्य पीले की बजाय एकदम सफेद या दूधिया नजर आए, तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए. कई लोग इसे मामूली बदलाव समझकर अनदेखा कर देते हैं, लेकिन कुछ मामलों में यह शरीर के अंदर होने वाली गंभीर समस्या का संकेत हो सकता है. डॉक्टर इस स्थिति को काइल्यूरिया कहते हैं, जिसमें पेशाब के साथ एक खास तरह का दूधिया तरल पदार्थ मिलने लगता है.
क्या होता है ऐसा?
Fortis Healthcare की एक रिपोर्ट के अनुसार, हमारा शरीर भोजन में मौजूद वसा को पचाने के बाद एक सफेद रंग का तरल पदार्थ बनाता है, जिसे काइल ( कहा जाता है. यह सामान्य रूप से लसीका सिस्टम के जरिए ब्लड तक पहुंचता है. लेकिन जब किसी कारण से लसीका वेसल्स में रुकावट या क्षति आ जाती है, तो यह लिक्विड पेशाब की नली में मिल सकता है. इसी वजह से पेशाब का रंग दूध जैसा सफेद दिखाई देने लगता है.
दूधिया यूरिन का सबसे बड़ा संकेत इसका असामान्य सफेद रंग होता है. कई लोगों में यह समस्या ज्यादा तैलीय या वसा वाले भोजन के बाद अधिक दिखाई देती है. कुछ मरीजों को कमर के निचले हिस्से में हल्का दर्द भी महसूस हो सकता है. अगर पेशाब के साथ खून आए, पेशाब करने में परेशानी हो या बार-बार ऐसा हो रहा हो, तो बिना देर किए डॉक्टर से जांच करानी चाहिए.
क्या होता है इसके पीछे कारण?
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, भारत समेत कई उष्णकटिबंधीय देशों में इसका एक प्रमुख कारण फाइलेरिया इंफेक्शन हो सकता है. मच्छर के काटने से शरीर में पहुंचने वाले परजीवी लसीका वेसल्स को नुकसान पहुंचाते हैं. इसके कारण उनमें रुकावट पैदा होती है और दबाव बढ़ने पर काइल पेशाब में मिलने लगता है. हालांकि, हर मामले में इसकी वजह इंफेक्शन ही नहीं होती.
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इन कारणों की वजह से भी हो सकती है दिक्कत
कुछ लोगों में पेट या पेल्विक हिस्से में चोट लगने, ट्यूमर, जन्मजात लसीका सिस्टम की गड़बड़ी या अन्य बीमारियों के कारण भी यह समस्या हो सकती है. इसलिए केवल लक्षण देखकर कारण तय नहीं किया जा सकता. सही वजह जानने के लिए डॉक्टर की जांच जरूरी होती है. इस समस्या की पुष्टि के लिए डॉक्टर सबसे पहले यूरिन टेस्ट कराने की सलाह देते हैं. जरूरत पड़ने पर अल्ट्रासाउंड, सीटी स्कैन, एमआरआई या अन्य जांच भी कराई जा सकती हैं, ताकि यह पता चल सके कि लसीका द्रव कहां से लीक हो रहा है. जांच की रिपोर्ट के आधार पर ही आगे का इलाज तय किया जाता है.
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        <pubDate>Mon, 29 Jun 2026 22:30:14 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Brain Tumor Symptoms: मामूली सिरदर्द कब बन जाता है गंभीर खतरा? डॉक्टर से जानें ब्रेन ट्यूमर के छिपे हुए लक्षण</title>
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        <description><![CDATA[ Early Warning Signs Of Brain Tumor: सिरदर्द एक ऐसी समस्या है जिससे लगभग हर व्यक्ति कभी न कभी परेशान होता है. ज्यादातर मामलों में इसकी वजह तनाव, नींद की कमी, डिहाइड्रेशन, लंबे समय तक स्क्रीन देखने या थकान जैसी सामान्य स्थितियां होती हैं. थोड़ा आराम, पर्याप्त पानी और जरूरत पड़ने पर दवा लेने से यह ठीक भी हो जाता है. लेकिन जब सिरदर्द बार-बार लौटने लगे, पहले से अलग महसूस हो या इसके साथ कुछ असामान्य लक्षण दिखाई दें, तब इसे नजरअंदाज करना सही नहीं है.&amp;nbsp;
इस गंभीर बीमारी के हो सकते हैं लक्षण
अक्सर लोग मानते हैं कि ब्रेन ट्यूमर का पहला संकेत असहनीय सिरदर्द होता है, लेकिन हकीकत इससे अलग है. कई बार शुरुआती लक्षण इतने सामान्य होते हैं कि लोग उन्हें तनाव, बढ़ती उम्र या काम के दबाव का असर समझ लेते हैं. यही वजह है कि बीमारी का पता लगने में देरी हो जाती है. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर्स एंड स्ट्रोक के अनुसार, ब्रेन ट्यूमर के लक्षण उसके आकार, स्थान और बढ़ने की गति पर निर्भर करते हैं. सिरदर्द के अलावा याददाश्त में बदलाव, नजर कमजोर होना, व्यवहार में परिवर्तन, दौरे पड़ना और संतुलन बिगड़ना भी इसके संकेत हो सकते हैं.&amp;nbsp;
कैसे होती है ब्रेन ट्यूमर की शुरुआत?
डॉ. उज्ज्वल येओले ने TOI को बताया कि यह एक बड़ा भ्रम है कि ब्रेन ट्यूमर हमेशा सिरदर्द से ही शुरू होता है. कई मरीजों में शुरुआत में याददाश्त कमजोर होने लगती है, ध्यान केंद्रित करने में परेशानी होती है या व्यवहार में बदलाव दिखाई देता है. कुछ लोगों को बोलने में कठिनाई होने लगती है, जबकि कुछ की नजर धुंधली होने लगती है. चूंकि दिमाग का हर हिस्सा अलग-अलग कार्यों को कंट्रोल करता है, इसलिए ट्यूमर का असर भी उसी के अनुसार दिखाई देता है.
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कब आपको डॉक्टर के पास जाना चाहिए?
डॉ. उज्ज्वल येओले के मुताबिक, हर सिरदर्द चिंता की बात नहीं है, लेकिन अगर दर्द लगातार बढ़ रहा हो, बार-बार हो रहा हो, नींद से जगा दे या पहले के मुकाबले अलग महसूस हो तो डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए. खासतौर पर अगर इसके साथ उल्टी, धुंधला दिखना, कमजोरी, भ्रम या अन्य न्यूरोलॉजिकल लक्षण भी मौजूद हों तो जांच करवाना जरूरी हो जाता है. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर्स एंड स्ट्रोक की रिसर्च भी बताती है कि गंभीर न्यूरोलॉजिकल समस्याओं से जुड़े सिरदर्द समय के साथ बढ़ सकते हैं और उनके साथ अन्य लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं.
क्या होते हैं इसके लक्षण?
ब्रेन ट्यूमर के कुछ संकेत ऐसे होते हैं जिन्हें परिवार के लोग मरीज से पहले पहचान लेते हैं. अचानक चिड़चिड़ापन बढ़ना, बात करने के तरीके में बदलाव, सामाजिक गतिविधियों से दूरी बनाना या बार-बार चीजें भूलना ऐसे संकेत हो सकते हैं जिन्हें अक्सर लोग मानसिक तनाव समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. इसी तरह धुंधला या डबल दिखना, चलते समय संतुलन बिगड़ना, हाथ-पैरों में कमजोरी महसूस होना या सही शब्द खोजने में परेशानी होना भी चेतावनी के संकेत हो सकते हैं. ब्रेन ट्यूमर को पूरी तरह रोकने का कोई निश्चित तरीका फिलहाल मौजूद नहीं है. हालांकि समय रहते लक्षणों को पहचानना और जांच करवाना सबसे अहम कदम है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 29 Jun 2026 22:30:13 +0530</pubDate>
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        <title>Anemia Mukt Bharat Abhiyan: एनीमिया मुक्त कैसे होगा भारत? सरकार ने बदला पूरा मॉडल, अब डिजिटल ट्रैकिंग से होगा इलाज</title>
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        <description><![CDATA[ How India Plans to Become Anemia Free: भारत में एनीमिया आज भी सबसे बड़ी स्वास्थ्य चुनौतियों में से एक है. इसका असर सिर्फ महिलाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि गर्भवती महिलाओं, बच्चों और नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य पर भी पड़ता है. यही वजह है कि अब केंद्र सरकार ने देश को एनीमिया मुक्त बनाने के लिए अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है. सरकार का मानना है कि सिर्फ आयरन की गोलियां बांटने से इस समस्या पर पूरी तरह काबू नहीं पाया जा सकता. इसलिए अब जांच, इलाज, सही खानपान और डिजिटल निगरानी को भी अभियान का अहम हिस्सा बनाया गया है.
नई गाइडलाइन जारी किया गया
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा ने एनीमिया मुक्त भारत अभियान के संशोधित दिशा-निर्देश जारी किए हैं. नई गाइडलाइन के तहत अब पुराने 6x6x6 मॉडल की जगह 7x7x7 रणनीति लागू की जाएगी. इसका उद्देश्य एनीमिया की समय रहते पहचान करना, इलाज सुनिश्चित करना और मरीजों की लगातार निगरानी करना है. इस नई रणनीति की सबसे बड़ी खासियत यह है कि पहली बार कम वजन वाले नवजात शिशुओं (0 से 6 महीने) को भी अभियान में शामिल किया गया है. सरकार का मानना है कि अगर जीवन की शुरुआत से ही एनीमिया की रोकथाम पर काम किया जाए, तो आगे चलकर बच्चों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले गंभीर असर को काफी हद तक कम किया जा सकता है.
इन चीजों को जोड़ा गया
सरकार ने अभियान में &#039;ईटिंग राइट&#039; पहल को भी जोड़ा है. इसके तहत लोगों को आयरन से भरपूर और संतुलित भोजन को अपनी रोजमर्रा की आदत बनाने के लिए जागरूक किया जाएगा. सिर्फ दवाओं पर निर्भर रहने के बजाय पोषण के जरिए एनीमिया को रोकने पर भी बराबर जोर दिया जाएगा. नई गाइडलाइन में पहले अपनाए जा रहे टी3 मॉडल टेस्ट, ट्रीट और टॉक को अब टी4 मॉडल में बदल दिया गया है. इसमें &#039;ट्रैक&#039; को भी शामिल किया गया है. यानी किसी व्यक्ति में एनीमिया मिलने के बाद सिर्फ इलाज ही नहीं होगा, बल्कि यह भी देखा जाएगा कि इलाज का असर हो रहा है या नहीं और जरूरत पड़ने पर आगे की चिकित्सा समय पर मिल रही है या नहीं.
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जिन पर दवाओं का असर नहीं होता उनके लिए क्या?
गर्भवती और स्तनपान कराने वाली उन महिलाओं के लिए, जिन्हें गंभीर एनीमिया है या जिन पर आयरन की गोलियों का असर नहीं होता, अब नस के जरिए आयरन देने की व्यवस्था भी राष्ट्रीय उपचार प्रोटोकॉल का हिस्सा होगी. इसके लिए फेरिक कार्बोक्सीमाल्टोज और आयरन सुक्रोज जैसी दवाओं का इस्तेमाल किया जाएगा. अभियान को ज्यादा प्रभावी बनाने के लिए डिजिटल सिस्टम भी तैयार किया गया है. गर्भवती महिलाओं की हीमोग्लोबिन जांच का रिकॉर्ड जननी पोर्टल पर दर्ज होगा, जबकि बच्चों की जानकारी राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम औरयू-विन पोर्टल पर अपलोड की जाएगी. बाद में इन सभी प्लेटफॉर्म को एकीकृत एनीमिया मुक्त भारत पोर्टल से जोड़ा जाएगा. इससे सरकार को यह पता लगाने में आसानी होगी कि किस क्षेत्र में एनीमिया की स्थिति कैसी है और किन लोगों तक इलाज या पोषण सेवाएं अभी भी नहीं पहुंच पाई हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 29 Jun 2026 22:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Best Time To Eat Dessert: मीठा खाने की आदत बदल सकती है सेहत, डॉक्टर ने बताया मिठाई खाने का सही समय</title>
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        <description><![CDATA[ Best Time To Eat Dessert:&amp;nbsp;मीठा खाना लगभग हर किसी को पसंद होता है, और खाना खाने के बाद कुछ मीठा खाने की आदत हर किसी कि होती है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जो मीठा आप खा रहे हैं वो आप सही समय पर खा रहे हैं या नही क्या ये आपके शरीर पर असर डाल सकता है?&amp;nbsp; ऐसे में डॉक्टरों का कहना है कि सिर्फ यह मायने नहीं रखता कि आप कितना मीठा खा रहे हैं, बल्कि यह भी बात मायने रखती है कि आप उसे किस समय खा रहे हैं. अगर मीठा खाने का तरीका और समय सही हो, तो इससे शरीर पर नुकसान कम होता है, जबकि गलत समय पर मीठा खाना ब्लड शुगर और वजन दोनों को बिगाड़ सकता है.
खाली पेट नहीं, खाना खाने के बाद खाएं मिठाई
रिसर्च बताती है कि मीठा हमेशा खाना खाने के बाद खाना चाहिए, खाली पेट या भूखे रहते हुए नहीं.&amp;nbsp; जब हम खाली पेट सीधे मीठा खा लेते हैं, तो शरीर में शुगर बहुत तेजी से बढ़ती है, जिससे ब्लड शुगर का स्तर अचानक ऊपर चला जाता है और फिर तेजी से नीचे भी आ जाता है.&amp;nbsp; लेकिन अगर वही मीठा सब्जी, दाल, रोटी जैसी चीजें खाने के बाद खाई जाए, तो शरीर में पहले से मौजूद प्रोटीन, फाइबर और दूसरे पोषक तत्व शुगर को धीरे-धीरे अब्जॉर्ब&amp;nbsp; करने में मदद करते हैं.&amp;nbsp; इससे शुगर का स्तर नॉर्मल भी रहता है.
इसके अलावा वैज्ञानिक रिसर्च यह भी कहती है कि रात के खाने के बाद मीठा खाना सबसे ज्यादा नुकसानदायक होता है.&amp;nbsp; एक स्टडी में पाया गया कि रात के खाने के बाद मीठा खाने से ब्लड शुगर का स्तर बिगड़ता है, और इसका असर अगले दिन की सुबह तक भी बना रह सकता है.&amp;nbsp; &amp;nbsp;इसके मुकाबले दिन में, खास तौर पर दोपहर के खाने के बाद मीठा खाना ज्यादा बेहतर माना जाता है, क्योंकि उस समय शरीर एक्टिव रहता है.&amp;nbsp;
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रात में मीठा खाने से बढ़ सकता है ब्लड शुगर
इसी कड़ी में डॉक्टरों की एक और सलाह यह भी है कि मीठे को कभी असली खाने की जगह नहीं लेना चाहिए, बल्कि इसे एक छोटे और सीमित हिस्से के तौर पर ही खाना चाहिए.&amp;nbsp; साथ ही जिन लोगों को डायबिटीज या शुगर से जुड़ी कोई परेशानी है, उन्हें मीठा खाने से पहले हमेशा अपने डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए.&amp;nbsp;डॉक्टर ने यह चेतावनी भी दी कि खाली पेट मीठा खाने से ब्लड शुगर बहुत तेजी से बढ़ सकता है, और यह खास तौर पर डायबिटीज, प्रीडायबिटीज, इंसुलिन रेजिस्टेंस, मोटापे या मेटाबॉलिक सिंड्रोम जैसी समस्याओं से जूझ रहे लोगों के लिए यह नुकसानदायक हो सकता है.&amp;nbsp;कुल मिलाकर, मीठा पूरी तरह छोड़ने की जरूरत नहीं होती है, बस उसके खाने के समय पर ध्यान देना चाहिए.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Sun, 28 Jun 2026 17:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>सभी वैक्सीन और कैंसर की दवाओं पर भी अब QR कोड जरूरी, सरकार ने बदले नियम</title>
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        <description><![CDATA[ QR Codes Mandatory for Vaccines: केंद्र सरकार ने दवाओं को लेकर एक बड़ा फैसला लिया है. अब वैक्सीन, एंटीबायोटिक दवाएं, कैंसर की दवाएं और नशीली दवाओं पर भी QR कोड लगाना जरूरी होगा. स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने इसके लिए ड्रग्स रूल्स 1945 में बदलाव किया है. अभी तक यह नियम सिर्फ देश की टॉप 300 दवा ब्रांड्स पर लागू था. अब इसका दायरा बढ़ाकर इसमें सभी वैक्सीन, एंटीबायोटिक दवाएं, NDPS एक्ट के तहत आने वाली नशीली और साइकोट्रॉपिक दवाएं और कैंसर की सभी दवाएं भी शामिल कर दी गई हैं.
प्रोडक्ट की पैकेजिंग पर जरूरी होगा QR कोड
नए नियम के मुताबिक दवा बनाने वाली कंपनियों को अपने प्रोडक्ट की पैकेजिंग पर बार कोड या QR कोड लगाना होगा. अगर पैकेजिंग पर जगह कम होगी तो यह कोड सेकेंडरी पैकेजिंग पर लगाया जा सकेगा. इस कोड को स्कैन करने पर लोग दवा की पूरी जानकारी देख सकेंगे. QR कोड में दवा का यूनिक कोड, उसका जेनेरिक और ब्रांड नाम, कंपनी का नाम और पता, बैच नंबर, बनने और एक्सपायरी की तारीख, मैन्युफैक्चरिंग लाइसेंस नंबर और जरूरत पड़ने पर दवा में मिले तत्वों की जानकारी होगी.
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नकली और घटिया दवाओं की आसान होगी पहचान
सरकार का कहना है कि इस फैसले से नकली और घटिया दवाओं पर रोक लगाने में मदद मिलेगी. सप्लाई चेन में दवा की हर स्टेज पर पहचान और जांच आसान हो जाएगी. इससे एंटीबायोटिक दवाओं के गलत असर से जुड़ी समस्या यानी एंटी माइक्रोबियल रेजिस्टेंस से लड़ने में भी मदद मिलेगी क्योंकि नकली और कमजोर एंटीबायोटिक दवाओं की पहचान करना आसान होगा.
1 जुलाई 2027 से लागू हो जाएगा नियम&amp;nbsp;
कंपनियों को नए नियम लागू करने के लिए पूरा समय दिया गया है. वैक्सीन, नशीली दवाओं और कैंसर की दवाओं पर यह नियम 1 जुलाई 2027 से लागू होगा. वहीं एंटीबायोटिक दवाओं पर यह नियम 1 जुलाई 2028 से लागू किया जाएगा.
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        <pubDate>Fri, 26 Jun 2026 04:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Childhood Obesity Causes: इन 5 फूड हैबिट्स से बच्चों को जल्दी घेर लेता है मोटापा, जानिए कैसे छुड़ाएं इससे पीछा?</title>
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        <description><![CDATA[ Food Habits That Cause Obesity In Children: बदलती लाइफस्टाइल का असर सिर्फ बड़े और बुजुर्गों पर ही नहीं हो रहा है, बल्कि बच्चे भी इसकी चपेट में आ रहे हैं. आजकल के बच्चों में मोटापा एक बड़ी दिक्कत बनता जा रहा है. और इसकी सबसे बड़ी वजह सिर्फ बाहर का खाना या जंक फूड नहीं है, बल्कि घर के भीतर बनी कुछ ऐसी फूड हैबिट्स भी हैं, जो धीरे-धीरे बच्चों का वजन बढ़ाने लगती हैं. कई बार मां-बाप को लगता है कि वे बच्चे की हर जरूरत पूरी कर रहे हैं, लेकिन अनजाने में वही आदतें आगे चलकर मोटापे की वजह बन जाती हैं. अगर समय रहते इन पर ध्यान न दिया जाए, तो बच्चा कम उम्र में ही मोटापे की चपेट में आ सकता है.
बच्चों को तुरंत खाना क्यों नहीं देना चाहिए?
सबसे पहली आदत है, बच्चे के हर बार भूख लगने की बात पर तुरंत कुछ खाने को दे देना. कई बार बच्चे सच में भूखे नहीं होते, बल्कि बोरियत, आदत या किसी चीज की क्रेविंग की वजह से खाने की मांग करते हैं. ऐसे में अगर हर बार उन्हें कुछ न कुछ दे दिया जाए, तो ओवरईटिंग की आदत बन सकती है. इससे बचने के लिए बच्चों का फिक्स मील टाइम और स्नैक टाइम तय करना जरूरी है.
बात-बात पर स्नैक्स पकड़ाने की आदत
दूसरी आदत है, हर समय साथ में स्नैक्स लेकर चलना और मौका मिलते ही बच्चे को पकड़ा देना. आजकल कार, स्कूल बैग या बाहर जाते समय बच्चों के लिए स्नैक्स रखना आम बात हो गई है. लेकिन बार-बार स्नैकिंग से बच्चा यह समझ ही नहीं पाता कि असली भूख क्या होती है. ऐसे में जरूरत से ज्यादा कैलोरी शरीर में जाने लगती है. बेहतर होगा कि बच्चे को हर बार चिप्स, कुकीज या मीठी चीजें देने के बजाय फल, सब्जियां या हल्के हेल्दी स्नैक्स दिए जाएं.
बच्चों के लिए अलग से खाना बनाना
तीसरी आदत है, बच्चों के लिए अलग से उनकी पसंद का खाना बनाना. कई घरों में ऐसा होता है कि अगर बच्चा घर का सामान्य खाना नहीं खा रहा, तो उसके लिए अलग से मैगी, फ्रेंच फ्राइज, नगेट्स या दूसरी पसंदीदा चीजें बना दी जाती हैं. इससे बच्चा हेल्दी खाने से दूर होने लगता है और उसे लगता है कि हर बार उसकी पसंद का ही खाना मिलेगा. इससे बचने के लिए जरूरी है कि बच्चे को धीरे-धीरे वही संतुलित खाना खाने की आदत डाली जाए, जो घर में बाकी लोग खा रहे हैं.
इन चीजों से भी करना चाहिए परहेज
चौथी आदत है, पानी और दूध की जगह मीठे ड्रिंक्स देना. सॉफ्ट ड्रिंक, पैकेज्ड जूस, फ्लेवर्ड ड्रिंक या मीठे शरबत बच्चों के शरीर में बहुत तेजी से अतिरिक्त शुगर पहुंचाते हैं. यही शुगर आगे चलकर वजन बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाती है. इसलिए बच्चों को पानी पीने की आदत डालना और मीठे पेय से दूरी बनाना जरूरी है.
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बच्चों के वजन को लेकर ये गलतियां न करें
पांचवीं और सबसे जरूरी बात यह है कि बच्चों के वजन को लेकर या तो बहुत निगेटिव रवैया अपनाया जाता है या फिर इस पर बिल्कुल बात ही नहीं की जाती. दोनों ही तरीके गलत हैं. बच्चे को शर्मिंदा करने के बजाय परिवार में हेल्दी खाने और एक्टिव रहने की आदत पर जोर देना चाहिए. अगर शुरुआत से ये पांच फूड हैबिट्स सुधर जाएं, तो बच्चों को मोटापे से काफी हद तक बचाया जा सकता है.
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        <pubDate>Fri, 26 Jun 2026 04:30:06 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Childhood, Obesity, Causes:, इन, फूड, हैबिट्स, से, बच्चों, को, जल्दी, घेर, लेता, है, मोटापा, जानिए, कैसे, छुड़ाएं, इससे, पीछा</media:keywords>
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        <title>Alka Yagnik health: किन लोगों को होती है अलका याज्ञनिक वाली बीमारी? जानें इसके लक्षण और बचाव के तरीके</title>
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        <description><![CDATA[ Alka Yagnik viral video Padma Bhushan: रोडवेज का सफर हो या फिर अकेले में कुछ गुनगुनाने का मन हो, तो हमारे जेहन में एक नाम आता है अलका याज्ञनिक का, जिन्होंने हमें तमाम कल्ट सॉन्ग्स दिए हैं. फिर चाहे वह ताल से ताल मिला हो या फिर दिल ने ये कहा है दिल से, ऐसे तमाम गाने हैं, जो आज भी लोगों के दिलों और दिमाग में छाए रहते हैं. लेकिन क्या आपको पता है कि आपके दिलों पर राज करने वाली यह सिंगर एक गंभीर बीमारी से गुजर रही है.
दरअसल 23 जून को भारत सरकार की तरफ से दिए जाने वाले तीसरे सबसे बड़े पुरस्कार पद्म भूषण से उनको नवाजा गया. इसको लेकर उन्होंने एक भावुक नोट शेयर किया. इसमें उन्होंने अपनी हेल्थ के बारे में भी बताया.
किस बीमारी से गुजर रही हैं अलका याज्ञनिक
सिंगर ने म्यूजिक में योगदान के लिए आभार जताने के साथ-साथ हेल्थ को लेकर ऐसा अपडेट दिया, जिसने उनके फैंस को दुखी कर दिया. साल 2024 में उन्होंने अपनी इस रेयर बीमारी के बारे में लोगों को जानकारी दी थी, जिसका नाम सेंसोरिन्यूरल नर्व हियरिंग लॉस है. वह अभी तक इस बीमारी से उबर नहीं पाई हैं. पिछले कुछ समय से वह लाइमलाइट से दूर ही रहती हैं. जब उनको पद्म भूषण से नवाजा जा रहा था, तो 60 वर्षीय सिंगर एक वायरल वीडियो में अटेंडेंट की मदद लेती दिखीं, जिसने सभी को भावुक कर दिया. चलिए आपको बताते हैं कि यह बीमारी कितनी खतरनाक है और इसके लक्षण और इलाज क्या हैं.&amp;nbsp;
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कितना खतरनाक है सेंसोरिन्यूरल नर्व हियरिंग लॉस
सेंसोरिन्यूरल नर्व हियरिंग लॉस एक रेयर हियरिंग डिसऑर्डर होता है, जिसमें इंसान की सुनने की क्षमता काफी प्रभावित हो जाती है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अलका को यह बीमारी अचानक एक वायरल अटैक की वजह से हुई थी, जिसे सिंगर ने अपनी जिंदगी का एक झटका बताया था और फैंस से दुआ करने की अपील की थी. हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली संस्था clevelandclinic के अनुसार, यह तब किसी को होता है, जब ध्वनि आपके भीतरी कान तक नहीं पहुंच पाती. यह स्थिति अचानक भी हो सकती है या फिर इंसान इसकी चपेट में धीरे-धीरे भी आ सकता है. यह इंसान में जन्म के साथ मौजूद हो सकता है और बाद में भी इस तरह की दिक्कत हो सकती है.
क्या इसका इलाज संभव है
clevelandclinic की रिपोर्ट के अनुसार, अभी तक इस रेयर बीमारी का इलाज संभव नहीं है. हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि आप सुन नहीं सकते. इसके लिए हियरिंग एड, कॉक्लियर इम्प्लांट या अन्य उपकरण आपको फिर से सुनने में मदद कर सकते हैं. अगर इसके होने के कारणों की बात करें, तो इसमें इंफेक्शन, चोट और तेज ध्वनि के संपर्क शामिल होते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 25 Jun 2026 00:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Pushups Benefits: रोज 100 पुशअप्स मारने पर कितने दिन में बन जाएगी बॉडी, क्या कहते हैं जिम एक्सपर्ट?</title>
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        <description><![CDATA[ How Long Does It Take To Build Muscle With Pushups:&amp;nbsp; आजकल हर कोई फिट दिखना चाहता है. इसके लिए कई लोग जिम जा रहे हैं, कई लोग घर पर तरह-तरह की एक्सरसाइज कर रहे हैं और कई लोग कई-कई किलोमीटर की दौड़ लगा रहे हैं, ताकि खुद को इस बदलती लाइफस्टाइल में भी फिट रख सकें. ऐसे में सवाल आता है कि आखिर जो लोग रोज पुशअप्स मारते हैं, उनको अपनी बॉडी बनाने में कितना समय लगता है. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर एक्सपर्ट क्या कहते हैं और कैसे आप अपनी बॉडी पुशअप्स मारकर बना सकते हैं.
क्या पुशअप्स बॉडी बनाने के लिए बेहतर विकल्प है?
रोज 100 पुशअप्स मारने से बॉडी कितने दिनों में बनेगी, यह जानने से पहले यह जान लेते हैं कि आखिर पुशअप्स मारने से बॉडी बनती है या फिर नहीं बनती है. हेल्थ और फिटनेस पर जानकारी देने वाली वेबसाइट vinmec के अनुसार, यह आसान लेकिन काफी असरदार एक्सरसाइज है. इसको करने के लिए आपको किसी जिम या फिर किसी खास जगह की जरूरत नहीं होती है, आप इसको आसानी से कहीं भी कर सकते हैं. इसको कई फिटनेस रूटीन में शामिल किया जाता है और इसे अलग-अलग लक्ष्यों के लिए अनुकूलित किया जा सकता है. यह उन लोगों के लिए काफी फायदेमंद हो सकता है, जो नियमित रूप से खेलकूद या फिटनेस गतिविधियों में भाग लेते हैं. इससे कंधों, छाती और बाहों की ताकत बढ़ाने में मदद मिल सकती है.
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रोज 100 पुशअप्स मारने से बॉडी कितने दिनों में बनेगी?
रिपोर्ट के अनुसार, अगर आप शुरुआती हैं, तो दूसरे हफ्ते तक आपको अपनी बाहों, छाती और शरीर के दूसरे बड़े हिस्सों में बदलाव महसूस होने लग सकता है. हालांकि, अगर 100 पुशअप्स आपके लिए पहले से ही आसान हैं, तो इससे ज्यादा फायदा नहीं मिलेगा और यह एक्सरसाइज ताकत बढ़ाने के बजाय एंड्योरेंस ट्रेनिंग जैसी हो सकती है.
क्या होते हैं इसके फायदे?
अगर आप इसको डेली करते हैं, तो इससे आपके वर्कआउट रूटीन में काफी सुधार होता है और ट्राइसेप्स, पेक्स और कंधे की मांसपेशियों के विकास में मदद मिलती है. हार्ट हेल्थ और बॉडी की स्टैमिना बेहतर हो सकती है. हालांकि, यह ध्यान रखें कि अगर आपसे एक बार में 100 नहीं लगते, तो आप इन्हें चार या फिर पांच सेट में कर सकते हैं.
क्या होती है दिक्कत?
कई रिपोर्ट्स में इस बात का जिक्र किया गया है कि इससे शरीर के आगे के हिस्से यानी छाती और ट्राइसेप्स की मांसपेशियां ज्यादा मजबूत हो जाती हैं, लेकिन पीठ के हिस्से में इसका ज्यादा असर नहीं दिखता है, जिसके कारण शरीर का संतुलन बिगड़ सकता है. यही कारण है कि एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि आप पुश-अप्स के साथ पुल-अप्स, डिप्स और स्क्वैट्स को भी जोड़ सकते हैं, जिससे शरीर को संतुलन मिलता है. अगर 100 पुश-अप्स करना आपके लिए मुश्किल है, तो आपकी मांसपेशियों को ज्यादा आराम की जरूरत हो सकती है. ताकत बढ़ाने के लिए, आमतौर पर मांसपेशियों को कम से कम 48 घंटे आराम देने की सलाह दी जाती है. पर्याप्त आराम के बिना इन मांसपेशियों पर लगातार जोर डालने से चोट लगने का खतरा बढ़ सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 25 Jun 2026 00:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Air In Injection Side Effects: क्या सच में इंजेक्शन में एयर बाकी रह जाने से हो जाती है मौत, क्या है इसके पीछे का सच?</title>
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        <description><![CDATA[ Injection Air Bubble Myth Or Fact: इंजेक्शन लगने से पहले डॉक्टर या नर्स अक्सर सिरिंज में मौजूद हवा को बाहर निकालते दिखते हैं. ऐसे में कई लोगों के मन में सवाल उठता है कि अगर इंजेक्शन में थोड़ी-सी हवा रह जाए, तो क्या इससे मौत हो सकती है? फिल्मों और सोशल मीडिया में भी इस बात को लेकर तरह-तरह की बातें कही जाती हैं. लेकिन सच यह है कि हर बार सिरिंज में हवा का छोटा-सा बुलबुला दिखना जानलेवा नहीं होता. मामला इस बात पर निर्भर करता है कि हवा कितनी मात्रा में शरीर में गई है और वह शरीर के किस हिस्से तक पहुंची है.
क्या सच में वह जानलेवा होता है?
दरअसल, जब हवा का बुलबुला नस या आर्टरीज में पहुंचकर खून के बहाव में रुकावट पैदा करता है, तो इस स्थिति को एयर एम्बोलिज्म कहा जाता है. यह तब खतरनाक हो सकता है, जब हवा की मात्रा ज्यादा हो या वह शरीर के किसी संवेदनशील हिस्से, जैसे ब्रेन, हार्ट या लंग्स तक पहुंच जाए. यही वजह है कि डॉक्टर इंजेक्शन या ड्रिप लगाते समय इस बात का ध्यान रखते हैं कि हवा शरीर में न जाए.
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कब होती है इंसान को दिक्कत?
हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली वेबसाइट Medicalnewstoday की रिपोर्ट्स के मुताबिक, नसों में बहुत कम मात्रा में पहुंची हवा कई बार शरीर खुद ही संभाल लेता है और उससे कोई गंभीर नुकसान नहीं होता. हालांकि, अगर हवा सीधे ब्लड सर्कुलेशन में ज्यादा मात्रा में चली जाए, तो दिक्कत बढ़ सकती है. यही स्थिति एयर एम्बोलिज्म का रूप ले सकती है. रिपोर्ट्स में यह भी बताया गया है कि अगर हवा दिमाग तक पहुंच जाए, तो यह जानलेवा हो सकती है. कुछ मामलों में बहुत कम मात्रा में हवा भी गंभीर स्थिति पैदा कर सकती है, लेकिन ऐसा आमतौर पर सामान्य इंजेक्शन लगने के दौरान नहीं होता.
किन मेडिकल प्रक्रियाओं में यह खतरनाक?
असल में, एयर एम्बोलिज्म का खतरा ज्यादा उन मेडिकल प्रक्रियाओं में माना जाता है, जहां हवा के सीधे खून की नसों तक पहुंचने की संभावना होती है. जैसे कुछ तरह की सर्जरी, सेंट्रल लाइन, डायलिसिस या बड़े मेडिकल प्रोसीजर. यही वजह है कि सामान्य मसल इंजेक्शन और नस में लगने वाले कुछ इंजेक्शन के बीच फर्क समझना जरूरी है. हर इंजेक्शन में हवा का छोटा बुलबुला दिखना मौत का संकेत नहीं होता. इंजेक्शन में थोड़ी हवा दिखने भर से घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन यह भी सही है कि शरीर में हवा जाने को पूरी तरह हल्के में नहीं लिया जाता. डॉक्टर और नर्स इसी वजह से सावधानी बरतते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 25 Jun 2026 00:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>Early Pregnancy Diet: Early pregnancy में क्यों नहीं खाना चाहिए पपीता&amp;पाइनएप्पल, कैसे बनते हैं अनचाहे गर्भपात की वजह?</title>
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        <description><![CDATA[ Foods To Avoid In Early Pregnancy: प्रेग्नेंसी की शुरुआत होते ही महिलाओं को खानपान को लेकर तमाम तरह की सलाह दी जाती है. इनमें सबसे ज्यादा जिस बात को लेकर सावधानी बरतने को कहा जाता है, वह है पपीता और पाइनएप्पल. अक्सर घर के बड़े-बुजुर्ग से लेकर कई डॉक्टर तक शुरुआती गर्भावस्था में इन दोनों फलों से दूरी बनाने की सलाह देते हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्यों कहा जाता है और क्या सच में ये फल अनचाहे गर्भपात की वजह बन सकते हैं.
किन पपीते को नहीं खाना चाहिए?
सबसे पहले बात पपीते की करें, तो इसे लेकर सबसे ज्यादा चिंता कच्चे या अधपके पपीते को लेकर होती है. दरअसल, कच्चे पपीते में लेटेक्स और पपेन जैसे तत्व ज्यादा मात्रा में पाए जाते हैं. इन्हें गर्भावस्था में जोखिम भरा माना जाता है, क्योंकि कुछ रिसर्च और लैब स्टडी में इन तत्वों का असर गर्भाशय को उत्तेजित करने वाला पाया गया है. माना जाता है कि ये गर्भाशय में कंस्ट्रक्शन बढ़ा सकते हैं और इसी वजह से शुरुआती प्रेग्नेंसी में कच्चे पपीते से दूरी बनाने की सलाह दी जाती है. यही कारण है कि अधपका या हरा पपीता गर्भवती महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं माना जाता.
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क्या पका पपीता खा सकते हैं?
&amp;nbsp;हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली वेबसाइट healthline के अनुसार, पूरी तरह पका हुआ पपीता इससे अलग होता है. पके पपीते में लेटेक्स की मात्रा काफी कम हो जाती है और इसमें विटामिन C, फोलेट, फाइबर और दूसरे पोषक तत्व भी होते हैं. इसलिए कुछ एक्सपर्ट मानते हैं कि कम मात्रा में पका पपीता हर गर्भवती महिला के लिए खतरनाक नहीं होता. फिर भी, क्योंकि इस पर इंसानों में बहुत ठोस रिसर्च मौजूद नहीं है, इसलिए ज्यादातर मामलों में डॉक्टर सावधानी बरतने की सलाह देते हैं.
&amp;nbsp;पाइनएप्पल कितना नुकसानदायक?
अब बात पाइनएप्पल की करें, तो इसे लेकर भी गर्भपात का डर अक्सर सुनने को मिलता है. इसकी वजह ब्रोमेलिन नाम का एंजाइम है, जो पाइनएप्पल में पाया जाता है. माना जाता है कि यह सर्विक्स को नरम करने और गर्भाशय पर असर डालने का काम कर सकता है. हालांकि, सामान्य मात्रा में पाइनएप्पल खाने से गर्भपात हो जाएगा, ऐसा कोई मजबूत वैज्ञानिक सबूत नहीं है. दिक्कत तब मानी जाती है, जब इसे बहुत ज्यादा मात्रा में लिया जाए या शरीर किसी वजह से पहले से संवेदनशील स्थिति में हो.
यही वजह है कि शुरुआती प्रेग्नेंसी में पपीता और पाइनएप्पल को लेकर पूरी तरह लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए. खासकर अगर महिला की प्रेग्नेंसी हाई रिस्क है, पहले गर्भपात हो चुका है, ब्लीडिंग की दिक्कत है या डॉक्टर ने खानपान में खास सावधानी बरतने को कहा है, तो इन फलों को खाने से पहले सलाह जरूर लेनी चाहिए.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 25 Jun 2026 00:30:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Early, Pregnancy, Diet:, Early, pregnancy, में, क्यों, नहीं, खाना, चाहिए, पपीता-पाइनएप्पल, कैसे, बनते, हैं, अनचाहे, गर्भपात, की, वजह</media:keywords>
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        <title>Paratha Side Effects: सुबह के नाश्ते में पराठा खाना पड़ सकता है महंगा, एक्सपर्ट्स के मुताबिक होते हैं ये पांच बड़े नुकसान</title>
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        <pubDate>Wed, 24 Jun 2026 08:30:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Best Time To Eat Watermelon: कहीं आप भी तो गलत समय पर नहीं खा रहे तरबूज? पेट की बीमारियों का बढ़ सकता है खतरा!</title>
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        <description><![CDATA[ What Is The Best Time To Eat Watermelon For Digestion: गर्मी और तरबूज का रिश्ता ऐसा है जैसे धूप और पसीना, एक-दूसरे के बिना अधूरा. &amp;nbsp;बाजार में कटा हुआ, रस टपकाता तरबूज देखते ही मन ललचा जाता है. लेकिन एक बात ज्यादातर लोग नजरअंदाज कर देते हैं कि इसे खाने का सही समय. यह सिर्फ स्वाद की बात नहीं है, बल्कि इस बात से भी जुड़ा है कि आपका शरीर इसे कैसे पचाता है. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर एक्सपर्ट क्या कहते हैं.&amp;nbsp;
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
मेदांता अस्पताल की निधि सहाई ने TOI को बताया कि तरबूज खाने का सबसे सही समय सुबह के नाश्ते और दोपहर के खाने के बीच का होता है. इस दौरान डाइजेशन सिस्टम सबसे ज्यादा सक्रिय रहता है. यह कोई यूं ही दी गई सलाह नहीं है, बल्कि शरीर की अपनी लय होती है, जिसके अनुसार अलग-अलग समय पर पाचन क्षमता बदलती रहती है. तरबूज में लगभग 90 प्रतिशत पानी होता है और इसमें प्राकृतिक शर्करा भी होती है. ऐसे में शरीर को इसे सही तरीके से पचाने के लिए तैयार रहना जरूरी होता है. सुबह नाश्ते के बाद जब डाइजेशन सिस्टम सक्रिय हो चुका होता है, तब इसे खाना सबसे फायदेमंद रहता है.&amp;nbsp;
क्या होती है इससे दिक्कत?
निधि सहाई के अनुसार, हल्के भरे पेट में तरबूज खाने से पेट फूलने की समस्या कम होती है और पाचन भी बेहतर रहता है. कई लोग सोचते हैं कि खाली पेट फल खाना ठीक होता है, लेकिन तरबूज के मामले में पेट का थोड़ा सक्रिय होना जरूरी है. यही कारण है कि सुबह का मध्य समय सबसे सही माना जाता है. एक दिलचस्प बात यह भी है कि तरबूज व्यायाम से पहले ऊर्जा देने वाला अच्छा विकल्प हो सकता है. कसरत से लगभग आधा घंटा पहले इसे खाने से शरीर को तुरंत एनर्जी मिलती है और पानी की कमी भी नहीं होती। यही वजह है कि कई खिलाड़ी इसे अपनी दिनचर्या में शामिल करते हैं.
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कब नहीं खाना चाहिए?
लेकिन रात में तरबूज खाना ठीक नहीं माना जाता. उस समय शरीर आराम की स्थिति में जाने लगता है और पाचन प्रक्रिया धीमी हो जाती है. ऐसे में तरबूज की शर्करा और पानी शरीर को असहज कर सकते हैं, जिससे गैस या भारीपन महसूस हो सकता है. हर व्यक्ति के लिए यह सलाह एक जैसी नहीं होती. जिन लोगों का डाइजेशन सिस्टम सेंसिटिव होता है या जिन्हें आंत से जुड़ी समस्या रहती है, उन्हें खास सावधानी बरतनी चाहिए. ऐसे लोगों को तरबूज खाने के बाद पेट दर्द या सूजन जैसी दिक्कत हो सकती है.
मात्रा का ध्यान रखना भी जरूरी
मात्रा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितना समय. अक्सर लोग इसे हल्का समझकर ज्यादा खा लेते हैं, लेकिन जरूरत से ज्यादा तरबूज खाने से पेट पर दबाव पड़ता है. निधि सहाई सलाह देती हैं कि एक से दो कटोरी मात्रा पर्याप्त होती है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 23 Jun 2026 20:30:13 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Gym Workout Death: वर्कआउट में पुलिस अफसर की अचानक मौत, जिम जाने वाले नोट कर लें ये बात, वरना हो सकती है दिक्कत</title>
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        <description><![CDATA[ Why Healthy People Die During Exercise: जिम में वर्कआउट के दौरान उत्तराखंड पुलिस के 38 वर्षीय स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप अधिकारी गिरीश भट्ट की अचानक मौत ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सिर्फ फिट दिखना ही स्वस्थ होने की गारंटी है? एक्सपर्ट का कहना है कि रेगुलर एक्सरसाइज करने वाला व्यक्ति भी कई बार ऐसी छिपी हुई स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहा होता है, जिनका पता समय रहते नहीं चल पाता.
दरअसल, चंपावत जिले में तैनात गिरीश भट्ट जिम में अभ्यास कर रहे थे, तभी उनकी तबीयत बिगड़ गई और वे अचानक गिर पड़े. उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया. उनकी मौत की वास्तविक वजह की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है. परिवार और सहकर्मियों के लिए यह घटना गहरे सदमे की तरह है।. गिरीश भट्ट अपने पीछे पत्नी और दो बेटों को छोड़ गए हैं.
हेल्दी दिखने वाले लोगों में क्यों हो रही है दिक्कत?
इस घटना के बाद एक बार फिर यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर स्वस्थ दिखने वाले लोग भी अचानक गंभीर मेडिकल इमरजेंसी का शिकार कैसे हो जाते हैं.डॉ. रचित गुलाटी ने TOI को बताया कि कि फिटनेस और स्वास्थ्य को एक जैसा मान लेना बड़ी भूल है. कई बार व्यक्ति बाहर से पूरी तरह फिट नजर आता है, लेकिन उसके शरीर में हाई ब्लड प्रेशर, अनियमित हार्ट रिद्म, आर्टरीज में रुकावट या जेनेटिक हार्ट रोग जैसी समस्याएं चुपचाप मौजूद रहती हैं.&amp;nbsp;
क्या शरीर पहले से देता है संकेत?
डॉ. रचित गुलाटी के अनुसार, शरीर अक्सर किसी बड़ी समस्या से पहले संकेत देता है, लेकिन लोग उन्हें सामान्य थकान या मेहनत का असर समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. वर्कआउट के दौरान या बाद में असामान्य सांस फूलना, सीने में भारीपन, चक्कर आना, दिल की धड़कन तेज महसूस होना या जरूरत से ज्यादा थकान जैसे लक्षण गंभीर चेतावनी हो सकते हैं.
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क्या है इसके पीछे कारण?
एक्सपर्ट का मानना है कि लंबे अंतराल के बाद अचानक भारी व्यायाम शुरू करना, दूसरों से प्रतिस्पर्धा में जरूरत से ज्यादा मेहनत करना या बिना स्वास्थ्य जांच के हाई-इंटेंसिटी वर्कआउट करना जोखिम बढ़ा सकता है. खासतौर पर 35 वर्ष से अधिक उम्र के लोग, जिनके परिवार में हार्ट रोग का इतिहास रहा हो या जो डायबिटीज, मोटापा, धूम्रपान और हाई बीपी जैसी समस्याओं से जुड़े हों, उन्हें नियमित स्वास्थ्य जांच करानी चाहिए.
किन चीजों का रखना चाहिए ध्यान?
डॉ. रचित गुलाटी यह भी बताते हैं कि सुरक्षित फिटनेस के लिए सिर्फ व्यायाम ही नहीं, बल्कि पर्याप्त नींद, सही मात्रा में पानी पीना, वॉर्म-अप, कूल-डाउन और वर्कआउट के बीच उचित रिकवरी भी उतनी ही जरूरी है. सोशल मीडिया पर दिखने वाली अत्यधिक मेहनत वाली फिटनेस संस्कृति हर किसी के लिए सही नहीं होती.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 23 Jun 2026 04:30:04 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Prenatal Yoga Benefits: प्रेग्नेंसी में कमर दर्द और खराब नींद से मिलेगा छुटकारा, बस रोज करें ये एक काम</title>
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        <description><![CDATA[ Benefits Of Prenatal Yoga During Pregnancy:&amp;nbsp;गर्भावस्था के दौरान अच्छी नींद लेना कई महिलाओं के लिए बड़ी चुनौती बन जाता है. बढ़ता वजन, शरीर में दर्द, बार-बार करवट बदलना और हार्मोनल बदलाव अक्सर रात की नींद खराब कर देते हैं. ऐसे में कई एक्सपर्ट प्रीनेटल योग को एक असरदार विकल्प मानते हैं. नियमित रूप से किए जाने वाले हल्के योग अभ्यास न केवल शरीर को आराम पहुंचाते हैं, बल्कि मानसिक तनाव को कम करने में भी मदद कर सकते हैं.&amp;nbsp;
योग से कैसे होता है फायदा?
डॉ. नेहा शुक्ला ने TOI को बताया कि प्रेग्नेंसी में एक्टिव लाइफस्टाइल बनाए रखना बेहद जरूरी है. उनके अनुसार, प्रीनेटल योग महिलाओं को शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रखने का एक सुरक्षित तरीका हो सकता है. इसमें नियंत्रित श्वास, हल्की स्ट्रेचिंग और रिलैक्सेशन तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है. गर्भावस्था के दौरान सिर्फ शरीर ही नहीं, मन भी कई बदलावों से गुजरता है. प्रसव को लेकर चिंता, भविष्य की जिम्मेदारियां और हार्मोनल उतार-चढ़ाव कई महिलाओं में तनाव और बेचैनी बढ़ा सकते हैं. ऐसे समय में योग और ध्यान मन को शांत करने का काम करते हैं. डॉ. नेहा शुक्ला के मुताबिक, नियमित योग अभ्यास से महिलाओं में आत्मविश्वास बढ़ सकता है और भावनात्मक संतुलन बनाए रखने में मदद मिल सकती है.&amp;nbsp;
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कैसे होता है यह फायदेमंद?
प्रीनेटल योग का एक महत्वपूर्ण हिस्सा प्राणायाम भी है. गहरी और नियंत्रित सांस लेने की तकनीकें शरीर में ऑक्सीजन के प्रवाह को बेहतर बनाती हैं. यही तकनीकें प्रसव के समय भी महिलाओं के लिए फायदेमंद साबित हो सकती हैं. एक्सपर्ट का मानना है कि सही तरीके से की गई ब्रीदिंग एक्सरसाइज महिलाओं को प्रसव के दौरान अधिक शांत और केंद्रित रहने में मदद कर सकती है.
आम परेशानियों को भी कम करने में भी मददगार
मेंटल हेल्थ के अलावा प्रीनेटल योग शरीर की कई आम परेशानियों को भी कम करने में मदद कर सकता है. प्रेग्नेंसी बढ़ने के साथ पीठ, कमर और कूल्हों पर दबाव बढ़ने लगता है. कुछ विशेष योगासन मांसपेशियों को मजबूत बनाने, शरीर की लचक बढ़ाने और सही पोस्चर बनाए रखने में मदद करते हैं. इससे कमर दर्द, जकड़न और सूजन जैसी समस्याओं से राहत मिल सकती है. बेहतर ब्लड फ्लो भी इसका एक अहम लाभ माना जाता है.&amp;nbsp;
इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए
एक्सपर्ट के अनुसार प्रेग्नेंसी में हर योगासन सुरक्षित नहीं होता. डॉ. नेहा शुक्ला के अनुसार, गहरे ट्विस्ट, कठिन बैकबेंड और ज्यादा तीव्र व्यायाम से बचना चाहिए. जिन महिलाओं को सर्वाइकल इनसफिशिएंसी, अनियंत्रित हाई बीपी, गंभीर एनीमिया, प्लेसेंटा प्रिविया या समय से पहले प्रसव का खतरा हो, उन्हें विशेष सावधानी बरतनी चाहिए. यही कारण है कि प्रीनेटल योग शुरू करने से पहले डॉक्टर और प्रशिक्षित योग एक्सपर्ट की सलाह लेना जरूरी माना जाता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 16:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>Yoga And Alzheimer&amp;apos;s Disease: भूलने की आदत होगी दूर, योग से याददाश्त रहेगी एकदम लोहे जैसी मजबूत, एम्स स्टडी में खुलासा</title>
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        <description><![CDATA[ Yoga Benefits For Brain Health: हर साल 21 जून को पूरी दुनिया अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाती है. संयुक्त राष्ट्र ने भारत के प्रस्ताव पर दिसंबर 2014 में इसे आधिकारिक अंतरराष्ट्रीय दिवस के रूप में मान्यता दी थी. इस वर्ष योग दिवस की थीम स्वस्थ उम्र बढ़ने के लिए योग रखी गई है. दिलचस्प बात यह है कि इस बार यह थीम सिर्फ एक संदेश नहीं, बल्कि साइंटफिक रिसर्च के जरिए भी मजबूती पाती नजर आ रही है.
किन बीमारियों में फायदेमंद है योग?
दिल्ली स्थित एम्स के रिसर्चर ने हाल ही में एक स्टडी में पाया है कि नियमित योग अभ्यास अल्जाइमर रोग के शुरुआती चरण के मरीजों के लिए फायदेमंद हो सकता है. अल्जाइमर रोग जर्नल में प्रकाशित इस रिसर्च को एम्स के शरीर रचना साइंस और न्यूरोलॉजी विभाग ने मिलकर किया है. अध्ययन में हल्के अल्जाइमर से पीड़ित मरीजों को शामिल किया गया. इन प्रतिभागियों ने 12 सप्ताह तक रोजाना 60 मिनट की निगरानी में योग सत्र किए. रिसर्च के शुरुआत और अंत में उनकी मानसिक क्षमता, डिप्रेशन के लक्षणों और आंतों में मौजूद बैक्टीरिया की संरचना का इवोल्यूशन किया गया.&amp;nbsp;
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क्या हुआ योग करने से बदलाव?
परिणामों में तीनों स्तरों पर पॉजिटिव बदलाव देखने को मिले. मॉन्ट्रियल कॉग्निटिव असेसमेंट के आधार पर मरीजों की कॉग्निटिव क्षमता में सुधार दर्ज किया गया. वहीं पीएचक्यू-9 &amp;nbsp;स्केल से मापे गए डिप्रेशन के लक्षणों में भी उल्लेखनीय कमी आई. सबसे दिलचस्प बदलाव आंतों के माइक्रोबायोम में देखने को मिला. योग कार्यक्रम के बाद फैसालिबैक्टेरियम प्राउसनिट्जी, रोज़बुरिया इंटेस्टिनालिस, बिफिडोबैक्टीरियम और अक्करमैन्सिया जैसे लाभकारी बैक्टीरिया की संख्या बढ़ी. ये बैक्टीरिया शॉर्ट-चेन फैटी एसिड बनाते हैं, जिन्हें सूजन कम करने और ब्रेन व आंतों के बेहतर स्वास्थ्य से जोड़ा जाता है. दूसरी ओर कॉलिन्सेला एरोफैसिएन्स और क्लेब्सिएला जैसे सूजन बढ़ाने वाले माइक्रोबायोम में कमी दर्ज की गई.
इसके पीछे किसका है रोल?
एक्सपर्ट का मानना है कि इसके पीछे गट-ब्रेन एक्सिस महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. पिछले कुछ वर्षों में हुए कई स्टडी में यह सामने आया है कि आंतों में मौजूद बैक्टीरिया न केवल प्रतिरक्षा प्रणाली और सूजन को प्रभावित करते हैं, बल्कि ब्रेन के कामकाज पर भी असर डाल सकते हैं. एम्स के डिपार्टमेंट ऑफ एनाटॉमी की प्रोफेसर और स्टडी की प्रमुख रिसर्चर डॉ. रीमा दादा का कहना है कि यह अध्ययन शुरुआती संकेत देता है कि योग जैसी लाइफस्टाइल आधारित गतिविधियां आंतों में स्वस्थ माइक्रोबायोम वातावरण बनाने में मदद कर सकती हैं. उनके अनुसार लाभकारी बैक्टीरिया में वृद्धि और हानिकारक माइक्रोबायोम में कमी ब्रेन हेल्थ को बेहतर बनाने वाली जैविक प्रक्रियाओं से जुड़ी हो सकती है.
क्या योग अल्जाइमर का इलाज है?
वहीं एम्स दिल्ली के न्यूरोलॉजी विभाग की प्रमुख डॉ. मंजरी त्रिपाठी ने स्पष्ट किया कि योग को अल्जाइमर का इलाज नहीं माना जा सकता. हालांकि शुरुआती चरण के मरीजों और हल्की कॉग्निटिव कमजोरी वाले लोगों के लिए यह एक सहायक चिकित्सा पद्धति के रूप में उपयोगी साबित हो सकती है. उन्होंने कहा कि अध्ययन में मानसिक क्षमता, मनोदशा और आंतों के माइक्रोबियल कम्युनिटी &amp;nbsp;में पॉजिटिव बदलाव दर्ज किए गए हैं. हालांकि रिसर्चर ने यह भी स्वीकार किया है कि अध्ययन का नमूना छोटा था और इसे अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 04:30:06 +0530</pubDate>
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        <media:keywords>Yoga, And, Alzheimers, Disease:, भूलने, की, आदत, होगी, दूर, योग, से, याददाश्त, रहेगी, एकदम, लोहे, जैसी, मजबूत, एम्स, स्टडी, में, खुलासा</media:keywords>
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        <title>FSSAI New Rules: जंग लगे चाकू से खाना बनाकर आपकी सेहत से खिलवाड़ कर रहे रेस्तरां, FSSAI ने जारी की एडवायजरी</title>
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        <description><![CDATA[ आजकल बाहर खाना खाना हमारी जिंदगी का एक अहम हिस्सा बन गया है. वीकेंड हो, कोई छुट्टी हो या फिर ऑफिस के बाद की थकान, हम अक्सर अपने परिवार या दोस्तों के साथ किसी होटल, रेस्टोरेंट या ढाबे पर खाना खाने निकल जाते हैं. जब हम किसी रेस्टोरेंट में जाते हैं तो वहां की सजावट, एसी की हवा और साफ-सुथरी टेबल देखकर खुश हो जाते हैं. क्या आपने कभी सोचा है कि जिस किचन में आपका खाना बन रहा है, वहां कितनी साफ-सफाई है?
हाल ही में भारत की खाद्य सुरक्षा एजेंसी FSSAI (फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया) ने ऐसा खुलासा किया है, जिसे जानकर आप हैरान रह जाएंगे. यह खबर उन सभी लोगों के लिए बहुत जरूरी है, जो अक्सर बाहर का खाना खाते हैं.
किचन के अंदर का छिपा हुआ सच
FSSAI की टीम ने देश के कई होटलों, ढाबों और फूड स्टॉल्स की जांच की. इस जांच में डराने वाली बात सामने आई. अधिकारियों ने पाया कि कई जगहों पर खाना बनाने और सब्जियां काटने के लिए ऐसे चाकू और ब्लेड का इस्तेमाल किया जा रहा था, जो पूरी तरह से खराब हो चुके थे. किचन में ऐसे चाकू मिले, जिनमें जंग लगा था. कई चाकू बीच से टूटे हुए थे, उनके किनारे घिस चुके थे और कुछ चाकू के हैंडल का पेंट निकलकर खाने में गिर रहा था. बाहर से चमचमाते होटलों के किचन में जब यह हाल देखा गया तो खाद्य विभाग तुरंत हरकत में आ गया.
15 जून 2026 को जारी हुई सख्त एडवाइजरी
इस गंभीर लापरवाही को देखते हुए FSSAI ने 15 जून 2026 को पूरे देश के सभी फूड बिजनेस के लिए बेहद सख्त एडवाइजरी जारी कर दी. विभाग ने साफ कर दिया है कि लोगों की सेहत के साथ किसी भी तरह का खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.
जंग लगे और टूटे चाकू से क्या है खतरा?
शायद आप सोचें कि चाकू में थोड़ी सी जंग लगने या उसके टूटे होने से क्या फर्क पड़ता है? साइंस और डॉक्टरों के मुताबिक, यह आपकी सेहत के लिए बहुत बड़ा खतरा है.

जंग का पेट में जाना: जब जंग लगे चाकू से सब्जियां या मीट काटा जाता है तो लोहे के जंग के छोटे-छोटे कण कटकर खाने में मिल जाते हैं. यह खाना जब हमारे पेट में जाता है तो इससे पेट में इंफेक्शन, दर्द और कई गंभीर बीमारियां हो सकती हैं.
बैक्टीरिया का घर: जो चाकू टूटे हुए होते हैं या जिनमें दरारें आ जाती हैं. उन दरारों के अंदर खाने के छोटे टुकड़े फंस जाते हैं. इन्हें चाहे जितना धो लिया जाए, ये पूरी तरह साफ नहीं होते. इन दरारों में खतरनाक बैक्टीरिया पनपने लगते हैं, जो हर बार कटने वाले नए खाने में मिल जाते हैं. इससे आपको फूड पॉइजनिंग हो सकती है.
केमिकल का खतरा: जिन चाकू पर घटिया पेंट या कोटिंग होती है, वह पेंट समय के साथ उखड़ने लगता है. यह पेंट केमिकल से बना होता है, जो सीधे आपके सलाद या सब्जी के जरिए आपके शरीर में पहुंच जाता है.

FSSAI के नए और सख्त नियम
इस खतरे को हमेशा के लिए खत्म करने के लिए FSSAI ने सभी ढाबा और रेस्टोरेंट मालिकों को कुछ कड़े निर्देश दिए हैं, जिनका पालन करना अब अनिवार्य हो गया है.

सिर्फ फूड-ग्रेड चाकू का इस्तेमाल: अब किचन में केवल हाई क्वालिटी वाले (फूड-ग्रेड) और जंग-रोधी स्टेनलेस स्टील के चाकू ही इस्तेमाल किए जा सकेंगे.
खराब चाकू को तुरंत फेंकना: अगर किसी भी चाकू में थोड़ा-सा भी जंग लगा है, उसका हैंडल टूटा है या उसकी धार कटी-फटी है तो उसे तुरंत किचन से बाहर करना होगा.
नियमित सफाई जरूरी: सभी कटिंग उपकरणों और चाकू को हर इस्तेमाल के बाद अच्छे से धोना और साफ रखना होगा. उन्हें ऐसी जगह रखना होगा, जहां उन पर नमी न आए.

नियम तोड़ा तो होगी कड़ी कार्रवाई
FSSAI ने सभी राज्यों के फूड सेफ्टी अफसरों को आदेश दिया है कि वे अपनी नियमित चेकिंग के दौरान अब सिर्फ बर्तन और एक्सपायरी डेट ही नहीं देखेंगे, बल्कि किचन में इस्तेमाल हो रहे चाकू की भी बारीकी से जांच करेंगे. अगर किसी भी होटल, रेस्टोरेंट या सड़क किनारे लगे ठेले पर खराब या जंग लगा चाकू मिला तो उस पर फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स एक्ट के तहत भारी जुर्माना लगाया जा सकता है. बार-बार गलती दोहराने पर रेस्टोरेंट का लाइसेंस भी रद्द किया जा सकता है.
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        <pubDate>Sat, 20 Jun 2026 12:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>FSSAI, New, Rules:, जंग, लगे, चाकू, से, खाना, बनाकर, आपकी, सेहत, से, खिलवाड़, कर, रहे, रेस्तरां, FSSAI, ने, जारी, की, एडवायजरी</media:keywords>
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        <title>Men Health After 40: 40 पार पुरुषों के शरीर में एक्टिव होते हैं साइलेंट किलर, जान बचानी है तो जरूर कराएं ये 4 टेस्ट</title>
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        <description><![CDATA[ Essential Health Tests Every Man: 40 की उम्र को अक्सर लोग सिर्फ एक संख्या मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन हेल्थ एक्सपर्ट के मुताबिक यही वह दौर है जब शरीर धीरे-धीरे बदलावों का संकेत देना शुरू कर देता है. पहले जहां देर रात तक जागना, अनियमित खानपान और तनाव का असर जल्दी नहीं दिखता था, वहीं 40 के बाद शरीर इन आदतों का हिसाब मांगने लगता है. ऐसे में नियमित स्वास्थ्य जांच कई गंभीर बीमारियों को शुरुआती चरण में पकड़ने का सबसे प्रभावी तरीका बन सकती है.
40 के बाद शरीर में कई बदलाव होने लगते हैं
&amp;nbsp;डॉ. शेली महाजन ने TOI को बताया कि 40 की उम्र के बाद पुरुषों के शरीर में कई जैविक बदलाव शुरू हो जाते हैं. मेटाबॉलिज्म की गति कम होने लगती है, हार्मोनल परिवर्तन होते हैं और वर्षों से चली आ रही लाइफस्टाइल का असर स्वास्थ्य पर दिखने लगता है. भारतीयों में जैनेटिक जोखिम और शहरी जीवन से जुड़ा तनाव इन चुनौतियों को और बढ़ा देता है.&amp;nbsp;
किन चीजों पर ध्यान देने की जरूरत होती है
डायबिटीज की समस्या&amp;nbsp;
डायबिटीज भी ऐसी ही एक बीमारी है जो लंबे समय तक बिना लक्षण के शरीर को नुकसान पहुंचाती रहती है. बढ़ता वजन, फिजिकल एक्टिविटी की कमी और तनाव इसके प्रमुख कारण माने जाते हैं. डॉ. महाजन बताती हैं कि केवल फास्टिंग ब्लड शुगर टेस्ट पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है. एचबीए1सी जांच पिछले दो से तीन महीनों के औसत ब्लड शुगर स्तर की जानकारी देती है, जिससे प्रीडायबिटीज और डायबिटीज के जोखिम को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है.
हार्ट हेल्थ पर ध्यान देने की जरूरत
हार्ट हेल्थ पर ध्यान देना जरूरी है. कई बार दिल से जुड़ी समस्याएं बिना किसी स्पष्ट लक्षण के वर्षों तक विकसित होती रहती हैं. नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन में पब्लिश रिसर्च के अनुसार भारत में हार्ट रोग वयस्कों की मृत्यु के प्रमुख कारणों में शामिल हैं. डॉ. शेली महाजन के अनुसार भारतीयों में पश्चिमी देशों के लोगों की तुलना में कम उम्र में हार्ट संबंधी समस्याएं देखने को मिलती हैं. इसलिए लिपिड प्रोफाइल और ब्लड प्रेशर की नियमित जांच भविष्य के जोखिमों का समय रहते पता लगाने में मदद कर सकती है.&amp;nbsp;
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विटामिन की कमी भी कारण
इसके अलावा विटामिन डी और विटामिन बी12 की कमी भी भारतीय पुरुषों में आम समस्या बन चुकी है. लगातार थकान, मसल्स में कमजोरी और ध्यान केंद्रित करने में परेशानी जैसे लक्षण अक्सर उम्र या तनाव का असर समझ लिए जाते हैं, जबकि इनके पीछे पोषक तत्वों की कमी भी हो सकती है. डॉ. शेली महाजन के अनुसार विटामिन डी की कमी हड्डियों को कमजोर कर सकती है और कैल्शियम के ऑब्जर्व को प्रभावित करती है.
किन जांचों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए
40 की उम्र के बाद प्रोस्टेट, लिवर और किडनी की नियमित जांच भी नजरअंदाज नहीं करनी चाहिए. प्रोस्टेट से जुड़ी कई समस्याएं शुरुआती चरण में कोई लक्षण नहीं दिखातीं. वहीं नॉन-अल्कोहोलिक फैटी लिवर डिजीज और किडनी से जुड़ी बीमारियां भी लंबे समय तक चुपचाप बढ़ती रहती हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 20 Jun 2026 12:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>Silent Tuberculosis: नॉर्थ ईस्ट में बिना लक्षण फैल रही यह खतरनाक बीमारी, हर 3 में से 1 शख्स चपेट में</title>
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        <description><![CDATA[ One In Three TB Cases In Northeast India Are Asymptomatic: देश के सबसे खूबसूरत हिस्से नार्थ- ईस्ट से डराने वाली तस्वीर निकल कर सामने आई है. पूर्वोत्तर में टीबी को लेकर किए गए एक बड़े स्क्रीनिंग अभियान ने चिंता बढ़ा दी है. जांच में पाया गया कि टीबी से इंफेक्टेड पाए गए लोगों में बड़ी संख्या ऐसे मरीजों की थी, जिनमें बीमारी के कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं दे रहे थे. यानी ये लोग सामान्य रूप से अपनी दिनचर्या में व्यस्त थे और उन्हें खुद भी इस इंफेक्शन का अंदाजा नहीं था.
34 प्रतिशत बिना लक्षण वाले मामले मिले
स्वास्थ्य मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट 2025-26 के अनुसार, नेशनल ट्यूबरक्लोसिस एलिमिनेशन प्रोग्राम के तहत जनवरी से अक्टूबर 2025 के बीच पूर्वोत्तर राज्यों में कमजोर और जोखिम वाले वर्गों के लोगों की विशेष जांच की गई. इस दौरान कुल 41,727 टीबी मरीजों की पहचान हुई, जिनमें से 14,356 मरीज ऐसे थे जिन्हें कोई लक्षण नहीं था. यह संख्या कुल मामलों का करीब 34 प्रतिशत है.
39 लाख लोगों की जांच की गई
टीबी उन्मूलन अभियान के तहत पूर्वोत्तर के आठ राज्यों में लगभग 39 लाख लोगों की स्क्रीनिंग की गई. इनमें से करीब 6 लाख लोगों का चेस्ट एक्स-रे भी किया गया. स्वास्थ्य एक्सपर्ट का मानना है कि सक्रिय जांच अभियान के कारण ऐसे मरीजों की पहचान संभव हो सकी, जो सामान्य परिस्थितियों में अस्पताल तक नहीं पहुंचते. &amp;nbsp;आंकड़ों के अनुसार असम में सबसे अधिक 10,362 एसिम्प्टोमैटिक टीबी मरीज मिले. इसके बाद मेघालय में 1,055, नागालैंड में 857 और त्रिपुरा में 510 मामले दर्ज किए गए. अरुणाचल प्रदेश में 479, मणिपुर में 465, सिक्किम में 380 और मिजोरम में 248 ऐसे मरीज पाए गए, जिनमें टीबी के सामान्य लक्षण मौजूद नहीं थे.
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टीबी नियंत्रण अभियान के लिए बड़ी चुनौती
एक्सपर्ट का कहना है कि ऐसे मरीज टीबी नियंत्रण अभियान के लिए बड़ी चुनौती साबित होते हैं. चूंकि इनमें बीमारी के लक्षण नहीं होते, इसलिए वे लंबे समय तक बिना इलाज के रह सकते हैं. इससे इंफेक्शन के फैलने का खतरा भी बना रहता है. यही वजह है कि अब स्वास्थ्य विभाग केवल अस्पतालों में आने वाले मरीजों पर निर्भर रहने के बजाय घर-घर और समुदाय स्तर पर जांच अभियान चला रहा है.&amp;nbsp;
एआई तकनीक का उपयोग
टीबी की जल्द पहचान के लिए कई राज्यों ने आधुनिक तकनीक का भी सहारा लेना शुरू कर दिया है. मेघालय में कफ अगेंस्ट टीबी ऐप और एआई आधारित पोर्टेबल एक्स-रे यूनिट का इस्तेमाल किया जा रहा है. इसके अलावा भी कई राज्यों में इस तरह की सुविधा है. सबसे हैरानी वाली बात यह है कि &amp;nbsp;रिपोर्ट के मुताबिक सितंबर 2025 तक पूर्वोत्तर क्षेत्र में 10.7 लाख से अधिक संभावित टीबी मरीजों की जांच की गई. इस दौरान संभावित टीबी जांच दर में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई. वर्ष 2024 में यह दर प्रति लाख आबादी पर 2,062 थी, जो 2025 में बढ़कर 2,645 हो गई.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 20 Jun 2026 12:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>Red Chilli Benefits: क्या डायबिटिक नर्व पेन में आराम दिलाती है लाल मिर्च, जानें क्या कहते हैं एक्सपर्ट?</title>
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        <description><![CDATA[ Can Red Chilli Relieve Diabetic Nerve Pain: डायबिटीज के मरीजों में नर्व पेन यानी नसों से जुड़ा दर्द एक आम लेकिन बेहद परेशान करने वाली समस्या है. कई लोगों को पैरों और हाथों में जलन, झनझनाहट, सुन्नपन या बिजली के झटके जैसा दर्द महसूस होता है. अब एक नई रिव्यू में सामने आया है कि लाल मिर्च में पाया जाने वाला एक खास तत्व ऐसे दर्द से राहत दिलाने में मदद कर सकता है. चलिए आपको इसके बारे में विस्तार से बताते हैं .&amp;nbsp;
क्या सच में लाल मिर्च फायदेमंद है?
हाल ही में जर्नल ऑफ द एसोसिएशन ऑफ फिजिशियंस ऑफ इंडिया में प्रकाशित एक रिव्यू में 1,800 से अधिक मरीजों पर किए गए 22 क्लीनिकल अध्ययनों का एनालिसिस किया गया. इसमें पाया गया कि लाल मिर्च से प्राप्त होने वाला कैप्साइसिननसों से जुड़े दर्द, खासकर डायबिटिक पेरिफेरल न्यूरोपैथी और पोस्टहर्पेटिक न्यूराल्जिया में राहत पहुंचा सकता है.&amp;nbsp;
इस रिव्यू का नेतृत्व चेन्नई स्थित डॉ. मोहन डायबिटीज स्पेशियलिटी सेंटर के चेयरमैन और डायबिटीज एक्सपर्ट डॉ. वी. मोहन, मुंबई के शिल्पा मेडिकल रिसर्च सेंटर के डायबिटोलॉजिस्ट डॉ. मंगेश तिवास्कर, लीलावती अस्पताल के ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. अभय नेने और चिकित्सा मामलों की एक्सपर्ट डॉ. सोनाली गोखले समेत अन्य एक्सपर्ट ने किया.
कितना असरदार है लाल मिर्च?
एक्सपर्ट के अनुसार, 0.075 प्रतिशत कैप्साइसिन क्रीम सबसे प्रभावी पाई गई. यह एक ऐसी टॉपिकल क्रीम है जिसे त्वचा पर लगाया जाता है. इसमें लाल मिर्च के सक्रिय तत्व की नियंत्रित मात्रा मौजूद होती है, जो दर्द पैदा करने वाली नसों पर काम करती है. डॉ. वी मोहन का कहना है कि कैप्साइसिन को केवल दर्द निवारक बाम का हिस्सा समझना सही नहीं होगा. उनके मुताबिक यह नसों में दर्द के संकेत पहुंचाने वाले तंतुओं पर सीधे असर करता है. यही वजह है कि यह सामान्य दर्द निवारक उपायों से अलग माना जाता है. उन्होंने यह भी बताया कि कम मात्रा वाले उत्पादों की तुलना में 0.075 प्रतिशत कैप्साइसिन फॉर्मूलेशन अधिक असरदार साबित हो सकता है.&amp;nbsp;
किन दिक्कतों में यह असरदार?
डॉ. मंगेश तिवास्कर के अनुसार, फिलहाल सबसे मजबूत साइंटफिक प्रमाण डायबिटिक पेरिफेरल न्यूरोपैथी और पोस्टहर्पेटिक न्यूराल्जिया के लिए उपलब्ध हैं. हालांकि नसों से जुड़ा दर्द विटामिन बी की कमी, थायरॉइड की समस्या, अत्यधिक शराब के सेवन, कीमोथेरेपी या अन्य न्यूरोलॉजिकल बीमारियों के कारण भी हो सकता है. ऐसे मामलों में भी स्थानीय स्तर पर राहत मिलने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. एक्सपर्ट बताते हैं कि न्यूरोपैथिक पेन को अक्सर सामान्य दर्द समझ लिया जाता है, जिससे सही उपचार नहीं मिल पाता. कई लोग साधारण दर्द निवारक दवाओं या बाम का उपयोग करते हैं, जबकि वे नसों से जुड़े दर्द की मूल वजह पर असर नहीं डालते.
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किस बात का हमें रखना चाहिए ध्यान?
डॉ. सोनाली गोखले के अनुसार, यह रिव्यू बताती है कि 0.075 प्रतिशत कैप्साइसिन क्रीम को ऐसे मरीजों के लिए बेहतर विकल्प माना जा सकता है, जिन्हें लंबे समय तक दवाएं लेने में परेशानी होती है या जो स्थानीय स्तर पर उपचार चाहते हैं. हालांकि एक्सपर्ट यह भी सलाह देते हैं कि किसी भी प्रकार के नर्व पेन में खुद से इलाज शुरू करने के बजाय पहले डॉक्टर से सही जांच और सलाह जरूर लेनी चाहिए.
इसे भी पढ़ें-&amp;nbsp;जंग लगे चाकू से खाना बनाकर आपकी सेहत से खिलवाड़ कर रहे रेस्तरां, FSSAI ने जारी की एडवायजरी
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 20 Jun 2026 12:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>एक साथ कितने हार्ट अटैक झेल सकता है हमारा दिल, कब मुश्किल हो जाता है जान बचाना?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/एक-साथ-कितने-हार्ट-अटैक-झेल-सकता-है-हमारा-दिल-कब-मुश्किल-हो-जाता-है-जान-बचाना</link>
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        <description><![CDATA[ एक साथ कितने हार्ट अटैक झेल सकता है हमारा दिल, कब मुश्किल हो जाता है जान बचाना? ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 17 Jun 2026 23:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>Microplastics vs Fertility: इस वजह से आपके घर में पैदा नहीं हो रहे बच्चे, पुरुषों और महिलाओं में लगातार बढ़ रहा बांझपन</title>
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        <description><![CDATA[ How Microplastics Affect Fertility: प्लास्टिक आज हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है. पीने के पानी से लेकर खाने की पैकेजिंग, घर की धूल और यहां तक कि हवा में भी प्लास्टिक के बेहद छोटे कण मौजूद हैं. इन्हें माइक्रोप्लास्टिक कहा जाता है. पहले इन्हें केवल पर्यावरण की समस्या माना जाता था, लेकिन अब साइंटिस्ट की चिंता इस बात को लेकर बढ़ रही है कि ये कण इंसानी शरीर के अंदर भी पहुंच चुके हैं और स्वास्थ्य पर असर डाल सकते हैं.&amp;nbsp;
मनुष्य तक बढ़ी इनकी पहुंच
माइक्रोप्लास्टिक ऐसे छोटे प्लास्टिक कण होते हैं जिनका आकार पांच मिलीमीटर से भी कम होता है. &amp;nbsp;समय के साथ बड़े प्लास्टिक उत्पाद टूटकर इन सूक्ष्म कणों में बदल जाते हैं. हाल के वर्षों में वैज्ञानिकों ने इन्हें ह्यूमन ब्लड, फेफड़ों, प्लेसेंटा, स्पर्म और यहां तक कि महिलाओं के ओवरी में मौजूद फॉलिक्युलर फ्लूइड में भी पाया है. यही वजह है कि अब इनके फर्टिलिटी पर प्रभाव को लेकर रिसर्च तेज हो गए हैं.&amp;nbsp;
क्या यह बांझपन का कारण बन सकता है?
साल 2024 में यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू मैक्सिको के रिसर्चर की तरफ से पब्लिश एक स्टडी में मानव टेस्टिकुलर टिश्यू में माइक्रोप्लास्टिक कण पाए गए. वहीं कुछ अन्य स्टजी में महिलाओं के फॉलिक्युलर फ्लूइड में भी इनकी मौजूदगी दर्ज की गई है. हालांकि साइंटिस्ट अभी सीधे तौर पर यह नहीं कह रहे कि माइक्रोप्लास्टिक ही बांझपन का कारण है, लेकिन इसके संभावित प्रभावों को लेकर चिंता जरूर बढ़ी है.&amp;nbsp;
इंसानों को क्या हो रही है दिक्कत?
कोलकाता स्थित नोवा आईवीएफ की फर्टिलिटी विशेषज्ञ डॉ. अनिंदिता सिंह के अनुसार, रिसर्च बताते हैं कि माइक्रोप्लास्टिक शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ा सकते हैं. इस स्थिति में शरीर में रिएक्टिव ऑक्सीजन स्पीशीजनामक हानिकारक अणु तेजी से बढ़ने लगते हैं, जो सेल्स को नुकसान पहुंचा सकते हैं. डॉ. अनिंदिता सिंह बताती हैं कि माइक्रोप्लास्टिक माइटोकॉन्ड्रिया की कार्यप्रणाली को प्रभावित कर सकते हैं और एस्ट्रोजन व टेस्टोस्टेरोन जैसे हार्मोन के संतुलन में भी हस्तक्षेप कर सकते हैं.
एक्सपर्ट का मानना है कि लंबे समय तक माइक्रोप्लास्टिक के संपर्क में रहने से पुरुषों में स्पर्म की गतिशीलता कम हो सकती है, डीएनए को नुकसान पहुंच सकता है और फर्टिलिटी प्रभावित हो सकती है. वहीं महिलाओं में ओवरी की क्षमता, अंडों की गुणवत्ता और फर्टिलाइजेशन की प्रक्रिया पर नकारात्मक असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है.
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फर्टिलिटी के अलावा बाकी क्या दिक्कत?
फर्टिलिटी के अलावा माइक्रोप्लास्टिक को इम्यून सिस्टम, हार्ट स्वास्थ्य, मेटाबॉलिज्म और एंडोक्राइन सिस्टम के लिए भी संभावित खतरा माना जा रहा है. हालांकि साइंटिस्ट अभी इस विषय पर और रिसर्च कर रहे हैं, लेकिनएक्सपर्ट एहतियात बरतने की सलाह दे रहे हैं. डॉ. अनिंदिता सिंह के मुताबिक, प्लास्टिक की बोतलों की जगह कांच या स्टील का इस्तेमाल करना, प्लास्टिक कंटेनर में खाना गर्म करने से बचना, कम पैकेज्ड खाद्य पदार्थों का सेवन करना, फिल्टर किया हुआ पानी पीना और फल, सब्जियां व साबुत अनाज से भरपूर एंटी-इन्फ्लेमेटरी डाइट अपनाना माइक्रोप्लास्टिक के संपर्क को कम करने में मदद कर सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 16 Jun 2026 14:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>Signs Of Hearing Loss: बहरा होने से पहले कानों में दिखते हैं ये कई शुरुआती लक्षण, डॉक्टरों ने दी बड़ी चेतावनी</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/signs-of-hearing-loss-बहरा-होने-से-पहले-कानों-में-दिखते-हैं-ये-कई-शुरुआती-लक्षण-डॉक्टरों-ने-दी-बड़ी-चेतावनी</link>
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        <description><![CDATA[ Early Signs Of Hearing Loss You Should Not Ignore: अक्सर लोग मानते हैं कि सुनने की क्षमता कम होने का मतलब है कि व्यक्ति अचानक आवाजें सुनना बंद कर दे. लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल अलग है. ज्यादातर मामलों में सुनने की समस्या धीरे-धीरे शुरू होती है और शुरुआती संकेत इतने सामान्य लगते हैं कि लोग उन्हें उम्र, थकान या आसपास के शोर का असर समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. यही वजह है कि कई लोगों को तब तक अपनी समस्या का एहसास नहीं होता, जब तक बातचीत करना मुश्किल न होने लगे.&amp;nbsp;
क्यों जरूरी है इसको शुरू से पहचानना?
यूएस नेशनल इंस्टीट्यूट ऑन डेफनेस एंड अदर कम्युनिकेशन डिसऑर्डर्स के अनुसार, उम्र बढ़ने के साथ होने वाली सुनने की क्षमता में कमी धीरे-धीरे विकसित होती है और दुनिया भर में लाखों लोगों को प्रभावित करती है. फोर्टिस हॉस्पिटल, मुलुंड, मुंबई में सीनियर कंसल्टेंट ईएनटी डॉ. संजय भाटिया का कहना है कि अगर शुरुआती संकेतों को समय रहते पहचान लिया जाए तो लंबे समय तक सुनने की क्षमता और लाइफ की क्वालिटी को बेहतर बनाए रखा जा सकता है.
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क्या होते हैं इसके लक्षण?
सुनने की समस्या का पहला संकेत हमेशा आवाज का कम सुनाई देना नहीं होता. कई बार लोग सुन तो लेते हैं कि कोई बात कर रहा है, लेकिन शब्द साफ समझ नहीं आते. खासकर भीड़भाड़ वाली जगहों, पारिवारिक समारोहों या रेस्तरां जैसे माहौल में बातचीत समझना मुश्किल हो जाता है. डॉ. संजय भाटिया के अनुसार, यह शुरुआती सुनने की समस्या का एक सामान्य संकेत हो सकता है.
अपनी ही बात दोहरानी पड़े, तो दिक्कत
यदि आपको बार-बार लोगों से अपनी बात दोहराने के लिए कहना पड़ता है, तो यह भी चेतावनी का संकेत हो सकता है. शुरुआत में यह सामान्य लग सकता है, लेकिन जब यह आदत रोजमर्रा की बातचीत का हिस्सा बन जाए तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. कई बार परिवार के सदस्य या दोस्त सबसे पहले इस बदलाव को नोटिस करते हैं.
लगातार आवाज बढ़ाना भी संकेत
एक और आम संकेत है टीवी, मोबाइल या रेडियो की आवाज लगातार बढ़ाना. अक्सर घर के दूसरे लोगों को आवाज बहुत तेज लगती है, जबकि सुनने में परेशानी महसूस कर रहा व्यक्ति उसे सामान्य मानता है. यह बदलाव धीरे-धीरे होता है, इसलिए कई लोग इसे गंभीरता से नहीं लेते.
फोन पर बातचीत में दिक्कत महसूस होना?
फोन पर बातचीत करने में कठिनाई भी सुनने की क्षमता कम होने का संकेत हो सकती है. &amp;nbsp;आमने-सामने की बातचीत में चेहरे के हावभाव और होंठों की गतिविधि समझने में मदद करती है, लेकिन फोन पर केवल आवाज के आधार पर बात समझनी होती है. ऐसे में सुनने में हल्की कमी भी साफ नजर आने लगती है.
घंटी बजने, भिनभिनाहट या सीटी जैसी आवाज
इसके अलावा कानों में लगातार घंटी बजने, भिनभिनाहट या सीटी जैसी आवाज सुनाई देना भी चिंता का विषय हो सकता है. इस स्थिति को टिनिटस कहा जाता है, जो कई बार किसी इम्प्लिसिट लिसनिंग &amp;nbsp;समस्या का संकेत होता है. डॉ. संजय भाटिया चेतावनी देते हैं कि सुनने की समस्या को नजरअंदाज करना केवल कानों तक सीमित नहीं रहता. समय के साथ यह सामाजिक दूरी, निराशा, तनाव और अवसाद का कारण भी बन सकता है. इसलिए यदि ये लक्षण लगातार दिखाई दें तो एक्सपर्ट से सलाह लेना जरूरी है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 16 Jun 2026 14:30:06 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Diabetes Shoulder: कंधे के दर्द से लेकर जकड़न तक, ये लक्षण न करें इग्नोर, डॉक्टर ने डायबिटीज को लेकर दी चेतावनी</title>
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        <description><![CDATA[ Why Diabetes Increases The Risk Of Frozen Shoulder: अगर आपको डायबिटीज है और पिछले कुछ समय से कंधे में दर्द, जकड़न या हाथ घुमाने में परेशानी महसूस हो रही है, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. डायबिटीज से जुड़ी एक ऐसी समस्या भी है जिसके बारे में कम लोग जानते हैं, लेकिन यह काफी आम है. इसे आम बोलचाल में डायबिटीज शोल्डर कहा जाता है, जबकि मेडिकल टर्म में इसे फ्रोजन शोल्डर कहा जाता है. यह स्थिति धीरे-धीरे कंधे की गतिविधियों को सीमित कर सकती है और रोजमर्रा के कामों को मुश्किल बना सकती है.
इस संबंध में जर्नल ऑफ डायबिटीज इन्वेस्टिगेशन में पब्लिश एक स्टडी में पाया गया कि डायबिटीज से पीड़ित लोगों में कंधे संबंधी समस्याओं की दर लगभग 27.5 प्रतिशत थी, जबकि सामान्य मरीजों में यह आंकड़ा केवल 5 प्रतिशत के आसपास देखा गया. यह अंतर बताता है कि डायबिटीज और फ्रोजन शोल्डर के बीच गहरा संबंध है.
क्या है फ्रोजन शोल्डर?
फ्रोजन शोल्डर एक ऐसी स्थिति है जिसमें कंधे के जोड़ के आसपास मौजूद कनेक्टिव टिश्यू मोटे और कड़े हो जाते हैं. इसके कारण कंधे को हिलाना-डुलाना मुश्किल होने लगता है. शुरुआत में दर्द महसूस होता है और समय के साथ कंधे की मूवमेंट काफी सीमित हो सकती है.
डायबिटीज में क्यों बढ़ जाता है इसका खतरा?
एक्सपर्ट के अनुसार लंबे समय तक ब्लड शुगर का स्तर अधिक रहने से शरीर के टिश्यू में बदलाव आने लगते हैं. अतिरिक्त ग्लूकोज कोलेजन नामक प्रोटीन को प्रभावित कर सकता है, जिससे टिश्यू अपनी लचक खोने लगते हैं. यही प्रक्रिया कंधे के जोड़ को भी प्रभावित कर सकती है. इसके अलावा लगातार रहने वाली सूजन और टिश्यू तक कम ब्लड फ्लो भी इस समस्या को बढ़ाने में भूमिका निभा सकते हैं.
फ्रोजन शोल्डर के तीन चरण
यह समस्या आमतौर पर तीन चरणों में विकसित होती है. पहला चरण फ्रीजिंग स्टेज कहलाता है, जिसमें दर्द धीरे-धीरे बढ़ता है और कंधे की मूवमेंट कम होने लगती है. इसके बाद फ्रोजन स्टेज आता है, जहां दर्द कुछ हद तक कम हो सकता है, लेकिन जकड़न बनी रहती है. अंतिम चरण थॉइंग स्टेज होता है, जिसमें धीरे-धीरे कंधे की गतिशीलता वापस आने लगती है. पूरी प्रक्रिया कई महीनों से लेकर दो साल तक चल सकती है.
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कैसे होती है पहचान?
डॉक्टर आमतौर पर मरीज की मेडिकल हिस्ट्री, खासकर डायबिटीज की जानकारी, शारीरिक जांच और जरूरत पड़ने पर एक्स-रे या एमआरआई जैसे इमेजिंग टेस्ट की मदद से इस समस्या का निदान करते हैं. समय पर पहचान होने से स्थिति को बिगड़ने से रोका जा सकता है.
क्या है इसका इलाज?
फ्रोजन शोल्डर के इलाज का मुख्य उद्देश्य दर्द कम करना और कंधे की सामान्य गतिविधि को वापस लाना होता है. इसके लिए दर्द और सूजन कम करने वाली दवाएं दी जा सकती हैं. फिजियोथेरेपी और नियमित स्ट्रेचिंग एक्सरसाइज रिकवरी में सबसे अहम भूमिका निभाती हैं. इसके साथ ही ब्लड शुगर को नियंत्रित रखना भी बेहद जरूरी है. गंभीर मामलों में डॉक्टर इंजेक्शन या अन्य चिकित्सा प्रक्रियाओं की सलाह दे सकते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 16 Jun 2026 02:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>Alcohol In Plastic Bottles: क्या आप भी प्लास्टिक की बोतल में रखकर पीते हैं शराब, जानें यह सेहत के लिए कितना खराब?</title>
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        <description><![CDATA[ Health Risks Of Drinking Alcohol Stored In Plastic Bottles: कई लोग शराब खरीदने के बाद उसे छोटी बोतल में भरकर रखने के लिए प्लास्टिक की बोतलों का इस्तेमाल करते हैं. यात्रा के दौरान या सुविधा के लिए भी शराब को प्लास्टिक कंटेनर में ट्रांसफर कर दिया जाता है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यह आदत आपकी सेहत और शराब की गुणवत्ता दोनों पर असर डाल सकती है? एक्सपर्ट का मानना है कि अगर शराब को लंबे समय तक प्लास्टिक की बोतल में रखा जाए तो इससे कुछ समस्याएं पैदा हो सकती हैं. हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि प्लास्टिक की बोतल तुरंत खराब हो जाएगी या शराब उसमें छेद कर देगी, लेकिन लंबे समय तक स्टोर करने पर इसके कुछ निगेटिव प्रभाव देखने को मिल सकते हैं.
क्यों चिंता की बात मानी जाती है?
शराब में मौजूद अल्कोहल एक तरह का सॉल्वेंट होता है, यानी यह कुछ पदार्थों के साथ केमिकल प्रतिक्रिया कर सकता है. यही वजह है कि एक्सपर्ट आमतौर पर सलाह देते हैं कि शराब को लंबे समय तक प्लास्टिक की बोतलों में स्टोर करने से बचना चाहिए. खासकर अगर आप उसे कई महीनों या सालभर तक रखने की योजना बना रहे हैंय प्लास्टिक कोई एक सामग्री नहीं है। बाजार में कई तरह के प्लास्टिक इस्तेमाल किए जाते हैं और कुछ प्लास्टिक अल्कोहल को दूसरों की तुलना में बेहतर तरीके से संभाल सकते हैं. फिर भी अधिकांश एक्सपर्ट मानते हैं कि लंबे समय के लिए कांच की बोतल सबसे सुरक्षित विकल्प होती है.
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स्वाद पर भी पड़ सकता है असर
व्हिस्की और अन्य प्रीमियम शराब पसंद करने वाले लोगों की सबसे बड़ी चिंता स्वाद को लेकर होती है. माना जाता है कि लंबे समय तक प्लास्टिक में रखने से शराब के मूल स्वाद और खुशबू में बदलाव आ सकता है. यही कारण है कि महंगी और उच्च क्वालिटी वाली शराब लगभग हमेशा कांच की बोतलों में ही बेची जाती है. कांच का कंटेनर शराब के स्वाद को लंबे समय तक सुरक्षित रखने में मदद करता है, जबकि प्लास्टिक में स्टोर की गई शराब धीरे-धीरे अपना असली फ्लेवर खो सकती है. यदि कोई व्यक्ति शराब के स्वाद और गुणवत्ता को महत्व देता है, तो उसे प्लास्टिक की बजाय कांच की बोतल का उपयोग करना चाहिए.
क्या सेहत पर भी असर पड़ सकता है?
एक चिंता यह भी रहती है कि प्लास्टिक से कुछ रसायन शराब में मिल सकते हैं. हालांकि इस विषय पर अभी सीमित शोध उपलब्ध हैं, लेकिन एक्सपर्ट मानते हैं कि लंबे समय तक प्लास्टिक में रखे पेय पदार्थों में रासायनिक लीचिंग का जोखिम बढ़ सकता है. चाइना पैकेजिंग रिसर्च एंड टेस्ट सेंटर की रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्लास्टिक से निकलने वाले कुछ रसायन शरीर में पहुंचकर चक्कर आना, सिरदर्द, पेट में असहजता और अन्य शारीरिक समस्याओं का कारण बन सकते हैं. हालांकि इसका असर हर व्यक्ति में अलग-अलग हो सकता है, लेकिन लंबे समय तक ऐसी शराब का सेवन करने से स्वास्थ्य संबंधी जोखिम बढ़ सकते हैं. यही वजह है कि शराब उद्योग में प्रीमियम उत्पादों को लगभग हमेशा कांच की बोतलों में पैक किया जाता है. कांच केमिकल रूप से काफी स्थिर होता है और शराब के साथ प्रतिक्रिया नहीं करता.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 15 Jun 2026 09:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>LDL&amp;C vs ApoB: कोलेस्ट्रॉल नॉर्मल होने के बाद भी हार्ट अटैक का खतरा, जानिए LDL&amp;C और ApoB का फर्क?</title>
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        <description><![CDATA[ LDL-C vs ApoB: कोलेस्ट्रॉल नॉर्मल होने के बाद भी हार्ट अटैक का खतरा, जानिए LDL-C और ApoB का फर्क? ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 14 Jun 2026 21:30:17 +0530</pubDate>
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        <title>Sudden hearing loss Causes : अचानक एक कान से सुनाई देना पड़ गया बंद, तुरंत कराएं इलाज नहीं तो हो जाएगा परमानेंट बहरापन</title>
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        <description><![CDATA[ Sudden hearing loss Causes : हम अक्सर कान में हल्का भारीपन या कम सुनाई देने जैसी समस्याओं को मामूली समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. कई लोग सोचते हैं कि कान में मैल जम गया होगा या सर्दी-जुकाम की वजह से ऐसा हो रहा होगा और कुछ दिनों में अपने आप ठीक हो जाएगा, लेकिन अगर अचानक एक कान से सुनाई देना कम हो जाए या पूरी तरह बंद हो जाए, तो इसे बिल्कुल भी हल्के में नहीं लेना चाहिए.
विशेषज्ञों के अनुसार, कई बार यह समस्या नॉर्मल कारणों से होती है, लेकिन कुछ मामलों में यह एसएसएचएल (Sudden Sensorineural Hearing Loss) का संकेत हो सकती है. यह एक मेडिकल इमरजेंसी मानी जाती है. अगर इसका इलाज समय रहते शुरू न किया जाए, तो सुनने की क्षमता हमेशा के लिए प्रभावित हो सकती है. लेकिन समय पर पहचान और सही इलाज से कई मरीजों की सुनने की क्षमता दोबारा वापस आ सकती है. इसलिए जरूरी है कि इसके कारणों, लक्षणों और इलाज के बारे में सही जानकारी हो.&amp;nbsp;
अचानक एक कान से कम सुनाई देने के क्या हो सकते हैं कारण?
1. कान में मैल जम जाना - कई बार कान में जरूरत से ज्यादा वैक्स जमा हो जाता है, जिससे आवाजा का रास्ता बंद हो जाता है और सुनने में परेशानी होने लगती है. इसके लक्षण कान में भारीपन महसूस होना, खुजली होना,आवाज का दबा-दबा सुनाई देना हो सकते हैं.ऐसी स्थिति में डॉक्टर ड्रॉप्स या सुरक्षित तरीके से मैल निकाल देते हैं और सुनने की क्षमता सामान्य हो सकती है.&amp;nbsp;
2. कान में संक्रमण या तरल पदार्थ जमा होना - सर्दी, फ्लू, एलर्जी या गले के संक्रमण के बाद कान के पर्दे के पीछे तरल पदार्थ जमा हो सकता है. इससे आवाज का कंपन ठीक तरह से अंदर नहीं पहुंच पाता है. इसके लक्षण कान में दर्द, बुखार, कान बंद होने जैसा एहसास, सुनाई कम देना है. वायरल संक्रमण अक्सर कुछ दिनों में ठीक हो जाते हैं, जबकि बैक्टीरियल संक्रमण में एंटीबायोटिक की जरूरत पड़ सकती है.&amp;nbsp;
3. &amp;nbsp;यूस्टेशियन ट्यूब में रुकावट - यह ट्यूब कान के अंदर और गले के बीच दबाव को संतुलित करने का काम करती है. एलर्जी, साइनस या जुकाम की वजह से इसमें सूजन आ सकती है.&amp;nbsp;
4. बैरोट्रॉमा यानी दबाव की वजह से चोट - हवाई यात्रा, पहाड़ों की यात्रा या स्कूबा डाइविंग के दौरान वातावरण का दबाव तेजी से बदलता है. इससे कान में पॉप जैसी आवाज आ सकती है और सुनाई देना प्रभावित हो सकता है. इस स्थिति में अक्सर बार-बार निगलना, जम्हाई लेना, च्युइंग गम चबाना मददगार हो सकता है,&amp;nbsp;
5. तेज आवाज का असर - लंबे समय तक तेज संगीत, मशीनों या पटाखों जैसी तेज आवाजों के संपर्क में रहने से कान के अंदर मौजूद सेंसिटिव सेल्स पर असर पड़ सकता है.&amp;nbsp;
6. एसएसएचएल &amp;nbsp;- यह सबसे खतरनाक स्थिति है, जिसमें कुछ घंटों या अधिकतम तीन दिनों के अंदर अचानक सुनने की क्षमता कम हो जाती है. कई बार मरीज सुबह उठता है और उसे एक कान से आवाज बहुत कम सुनाई देती है. इसके साथ कान में बजने की आवाज, चक्कर आना, संतुलन बिगड़ना, कान में पॉप या क्लिक महसूस होना, बिना दर्द के सुनाई देना कम हो जाना जैसे लक्षण भी हो सकते हैं. डॉक्टरों के अनुसार, यह मेडिकल इमरजेंसी है और इसका इलाज 72 घंटे के अंदर शुरू हो जाना चाहिए.&amp;nbsp;
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कैसे होता है इसका इलाज?
1. अगर कान में वैक्स जमा होने की वजह से सुनाई कम दे रहा है, तो डॉक्टर वैक्स को नरम करने वाली ड्रॉप्स देते हैं. इसके बाद सुरक्षित तरीके से सफाई या माइक्रोसक्शन तकनीक से मैल निकालकर सुनने की क्षमता होती है.&amp;nbsp;
2. कान में संक्रमण होने पर दर्द और बुखार कम करने की दवाएं दी जाती हैं. अगर संक्रमण बैक्टीरिया की वजह से हो या लंबे समय तक बना रहे, तो एंटीबायोटिक और डॉक्टर की निगरानी जरूरी होती है.&amp;nbsp;
3. सर्दी, एलर्जी या साइनस के कारण कान का दबाव बिगड़ने पर नाक के स्टेरॉयड स्प्रे और डिकंजेस्टेंट दवाएं दी जा सकती हैं. वाल्साल्वा तकनीक की मदद से कान के अंदर का दबाव संतुलित करने की कोशिश की जाती है.&amp;nbsp;
4, तेज आवाज के कारण सुनाई देने में दिक्कत होने पर कुछ दिनों तक शोर से दूर रहने और आराम की सलाह दी जाती है. नुकसान से बचने के लिए ईयरप्लग का इस्तेमाल और टिनिटस होने पर साउंड थेरेपी मददगार हो सकती है.&amp;nbsp;
5. एसएसएचएल में डॉक्टर तुरंत स्टेरॉयड थेरेपी शुरू कर सकते हैं. स्टेरॉयड गोलियों या कान के अंदर इंजेक्शन के रूप में दिए जाते हैं जिससे सुनने की क्षमता वापस आने की संभावना बढ़ सके.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 14 Jun 2026 21:30:16 +0530</pubDate>
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        <title>Heat Rash And Prickly Heat Home Remedies: चुभती&amp;जलती गर्मी में शुरू हो गया घमौरियों मौसम, ऐसे करें अपनी देखभाल</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/heat-rash-and-prickly-heat-home-remedies-चुभती-जलती-गर्मी-में-शुरू-हो-गया-घमौरियों-मौसम-ऐसे-करें-अपनी-देखभाल</link>
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        <description><![CDATA[ Heat Rash And Prickly Heat Home Remedies : गर्मी के मौसम में तापमान बढ़ते ही पसीना, चिपचिपाहट और स्किन से जुड़ी समस्याएं लोगों को परेशान करने लगती हैं. इन्हीं समस्याओं में से एक घमौरियां है, जिन्हें मेडिकल भाषा में हीट रैश या मिलिरिया कहा जाता है. यह समस्या बच्चों से लेकर बड़ों तक किसी को भी हो सकती है, लेकिन छोटे बच्चों और सेंसिटिव स्किन वाले लोगों में इसका खतरा ज्यादा होता है. इससे स्किन में सूजन आने लगती है और लाल दाने, जलन, चुभन साथ ही तेज खुजली जैसी समस्याएं शुरू हो जाती हैं.&amp;nbsp;
अक्सर लोग घमौरियों से राहत पाने के लिए प्रिकली हीट पाउडर का इस्तेमाल करने लगते हैं, लेकिन कई मामलों में यह पाउडर पोर्स को और ज्यादा बंद कर सकता है, जिससे परेशानी बढ़ सकती है. विशेषज्ञों का मानना है कि घमौरियों को ठीक करने का सबसे अच्छा तरीका स्किन को ठंडा और सूखा रखना है. इसके अलावा कुछ आसान घरेलू उपाय भी राहत दिलाने में मदद कर सकते हैं. तो आइए जानते हैं कि चुभती-जलती गर्मी में घमौरियां होने पर अपनी देखभाल कैसे करें.&amp;nbsp;
कब होती हैं घमौरियां?
घमौरियां तब होती हैं जब शरीर का पसीना स्किन के नीचे फंस जाता है. पसीने को बाहर निकालने वाली छोटी-छोटी नलिकाएं बंद हो जाती हैं और पसीना स्किन के अंदर जमा होने लगता है. इससे लाल दाने निकल आते हैं और प्रभावित हिस्से में खुजली साथ ही जलन महसूस होती है. यह समस्या खासतौर पर गर्म और नमी वाले मौसम में ज्यादा देखने को मिलती है. गर्दन, छाती, पीठ, जांघों और स्किन की सिलवटों वाले हिस्सों में घमौरियां अधिक होती हैं.&amp;nbsp;
घमौरियों के क्या लक्षण होते हैं?
घमौरियों के लक्षण शुरुआत में मामूली लग सकते हैं, लेकिन समय के साथ ये काफी परेशान करने वाले हो जाते हैं. इसमें स्किन पर छोटे-छोटे लाल दाने निकल आते हैं, जिनमें तेज खुजली, जलन और चुभन महसूस हो सकती है. साथ ही प्रभावित हिस्से की स्किन में हल्की सूजन भी दिखाई दे सकती है और पसीना आने पर ये परेशानी और बढ़ जाती है. खासकर गर्मी और उमस वाले माहौल में दाने ज्यादा चुभने लगते हैं. बच्चों में घमौरियों की वजह से बेचैनी बढ़ सकती है और बार-बार उस जगह को खुजलाने लगते हैं, जिससे स्किन में संक्रमण का खतरा भी बढ़ सकता है.&amp;nbsp;
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चुभती-जलती गर्मी में घमौरियां होने पर अपनी देखभाल कैसे करें?
1. कोल्ड कंप्रेस - अगर घमौरियों वाली जगह पर ठंडी सिकाई की जाए तो जलन और सूजन में जल्दी आराम मिल सकता है. इसके लिए बर्फ को सीधे स्किन पर लगाने के बजाय किसी साफ कपड़े में लपेटकर इस्तेमाल करें. ठंडे पानी में कपड़ा भिगोकर भी सिकाई की जा सकती है.&amp;nbsp;
2. ठंडे पानी से नहाने की आदत डालें - दिन में एक या दो बार ठंडे पानी से नहाने से स्किन का तापमान कम होता है. इससे खुजली और जलन में राहत मिलती है. साथ ही स्किन पर जमा पसीना और गंदगी साफ होकर पोर्स खुलने में मदद मिलती है.&amp;nbsp;
3. कैलामाइन लोशन और एलोवेरा जेल का करें इस्तेमाल - कैलामाइन लोशन स्किन को ठंडक पहुंचा कर खुजली कम करने में मदद करता है. वहीं एलोवेरा जेल में एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं, जो लालिमा और सूजन को शांत कर सकते हैं. ताजा एलोवेरा जेल प्रभावित हिस्से पर लगाकर कुछ देर बाद धो लें.&amp;nbsp;
4. ओटमील और बेकिंग सोडा भी हैं फायदेमंद - ओटमील में एंटीऑक्सीडेंट और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण पाए जाते हैं, जो स्किन को आराम पहुंचाने में मदद कर सकते हैं. ओट्स को पीसकर पेस्ट बनाकर लगाया जा सकता है. इसके अलावा पानी में बेकिंग सोडा मिलाकर तैयार पेस्ट भी खुजली और जलन कम करने में मदद कर सकता है.&amp;nbsp;
5. सूती कपड़े पहनें और शरीर को ठंडा रखें - घमौरियों से बचाव के लिए ढीले और सूती कपड़े पहनना सबसे अच्छा माना जाता है. सिंथेटिक कपड़े पसीना रोक सकते हैं और परेशानी बढ़ा सकते हैं. घर के अंदर पंखे या एसी का इस्तेमाल करें और शरीर को ज्यादा गर्म होने से बचाएं.&amp;nbsp;
इन बातों का भी रखें खास ध्यान
1. ज्यादा पानी और लिक्विड ड्रिंक्स पीकर शरीर को हाइड्रेट रखें.
2. नारियल पानी, नींबू पानी, सत्तू और लस्सी का सेवन करें.
3. बच्चों के डायपर समय-समय पर बदलते रहें.
4. हैवी मॉइस्चराइजर और ऐसे प्रोडक्ट्स से बचें जो पोर्स बंद कर सकते हैं.
5. अगर घमौरियां कई दिनों तक ठीक न हों, पस बनने लगे या बुखार के साथ दिखाई दें तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लें.
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        <pubDate>Sun, 14 Jun 2026 21:30:14 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Brain Tumor: मोबाइल फोन से लेकर सिरदर्द का असली सच, कैसे फैलता है ब्रेन ट्यूमर? डॉक्टरों ने खोला बड़ा राज</title>
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        <description><![CDATA[ Common Brain Tumour Myths And Facts: ब्रेन ट्यूमर का नाम सुनते ही ज्यादातर लोगों के मन में डर बैठ जाता है. फिल्मों, सोशल मीडिया और अधूरी जानकारियों की वजह से इसके बारे में कई ऐसी धारणाएं बन गई हैं जो पूरी तरह सही नहीं हैं. हकीकत यह है कि ब्रेन ट्यूमर एक मुश्किल बीमारी है और इसके बारे में फैली गलतफहमियां कई बार मरीजों और उनके परिवारों को जरूरत से ज्यादा डराने का काम करती हैं. यही कारण है कि विशेषज्ञ समय-समय पर इन मिथकों को दूर करने की सलाह देते हैं. एस्टर इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोसाइंसेज एंड स्पाइन केयर के ग्रुप डायरेक्टर प्रोफेसर डॉ. सतीश रुद्रप्पा के अनुसार, कई बार बीमारी से ज्यादा नुकसान उसके बारे में फैली गलत जानकारी पहुंचाती है.&amp;nbsp;
क्या ब्रेन ट्यूमर कैंसर होता है?
सबसे बड़ी गलतफहमी यह है कि हर ब्रेन ट्यूमर कैंसर होता है. डॉ. सतीश रुद्रप्पा बताते हैं कि सभी ब्रेन ट्यूमर कैंसरयुक्त नहीं होते. कई ट्यूमर ऐसे होते हैं, जो शरीर के दूसरे हिस्सों में नहीं फैलते. हालांकि, ब्रेन के भीतर जगह सीमित होने के कारण ऐसे ट्यूमर भी दबाव बनाकर बोलने, चलने, याददाश्त, देखने या संतुलन जैसी महत्वपूर्ण क्षमताओं को प्रभावित कर सकते हैं. इसलिए किसी ट्यूमर की गंभीरता केवल उसके कैंसर होने या न होने से तय नहीं होती, बल्कि उसकी स्थिति, आकार और बढ़ने की गति भी महत्वपूर्ण होती है.&amp;nbsp;
क्या सिरदर्द ब्रेन ट्यूमर का लक्षण है?
एक और आम धारणा है कि ब्रेन ट्यूमर का पहला लक्षण हमेशा सिरदर्द होता है. लेकिन एक्सपर्ट का कहना है कि ऐसा जरूरी नहीं है. डॉ. रुद्रप्पा के मुताबिक, हर मरीज में लक्षण अलग-अलग हो सकते हैं. कुछ लोगों में दौरे पड़ना, नजर कमजोर होना, बोलने में परेशानी, हाथ-पैरों में कमजोरी, संतुलन बिगड़ना या व्यवहार में बदलाव जैसे संकेत सिरदर्द से पहले भी दिखाई दे सकते हैं. यही वजह है कि लगातार बने रहने वाले न्यूरोलॉजिकल लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.
किन लोगों को होता है ब्रेन ट्यूमर?
कई लोग यह भी मानते हैं कि ब्रेन ट्यूमर सिर्फ बुजुर्गों को होता है. जबकि सच्चाई यह है कि यह किसी भी उम्र में हो सकता है. बच्चों, युवाओं और मध्यम आयु वर्ग के लोगों में भी विभिन्न प्रकार के ब्रेन ट्यूमर देखे जाते हैं. इसलिए उम्र कम होने के कारण लक्षणों को हल्के में लेना सही नहीं है.
मोबाइल फोन और ब्रेन ट्यूमर का संबंध क्या है?
मोबाइल फोन के इस्तेमाल और ब्रेन ट्यूमर के बीच संबंध को लेकर भी लंबे समय से बहस चल रही है. डॉ. सतीश रुद्रप्पा का कहना है कि दुनिया भर में कई दशकों से इस विषय पर रिसर्च किए जा रहे हैं, लेकिन अब तक ऐसा कोई ठोस साइंटफिक प्रमाण नहीं मिला है जो यह साबित करे कि सामान्य रूप से मोबाइल फोन का इस्तेमाल सीधे ब्रेन ट्यूमर का कारण बनता है. यूएस नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट भी बताती है कि बड़े स्टडी में मोबाइल फोन के नियमित उपयोग और ब्रेन ट्यूमर के जोखिम के बीच स्पष्ट संबंध नहीं पाया गया है.
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क्या ब्रेन ट्यूमर के बाद लाइफ खत्म हो जाती है?
सबसे नुकसानदायक मिथक यह है कि ब्रेन ट्यूमर का मतलब जीवन का अंत है. एक्सपर्ट का कहना है कि आधुनिक चिकित्सा ने इस क्षेत्र में बड़ी प्रगति की है. बेहतर ब्रेन इमेजिंग, अत्याधुनिक सर्जरी, सटीक रेडिएशन थेरेपी और नई दवाओं की मदद से आज कई मरीज इलाज के बाद सामान्य और संतोषजनक जीवन जी रहे हैं. इसलिए समय पर जांच, सही इलाज और एक्सपर्ट की सलाह इस बीमारी से लड़ने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 14 Jun 2026 21:30:13 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Eye Care Tips: आंखों के नीचे सूजन और डार्क सर्कल बढ़ गए हैं? जानें इसकी वजह और बचाव</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/eye-care-tips-आंखों-के-नीचे-सूजन-और-डार्क-सर्कल-बढ़-गए-हैं-जानें-इसकी-वजह-और-बचाव</link>
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        <description><![CDATA[ Eye Care Tips: गर्मियों का मौसम आते ही लोग स्किन पर टैनिंग, पिंपल्स, पसीना और डिहाइड्रेशन जैसी समस्याओं की शिकायत करने लगते हैं, साथ ही तेज गर्मी का असर आपकी आंखों के आसपास की स्किन पर भी पड़ता है. कई लोगों की आंखों के नीचे सूजन आने लगती है, डार्क सर्कल गहरे दिखाई देने लगते हैं और चेहरा हमेशा थका-थका नजर आने लगता है.&amp;nbsp;अक्सर लोग इसे सिर्फ नींद की कमी समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन एक्सपर्ट्स का कहना है कि गर्मियों में बढ़ी हुई गर्मी, डिहाइड्रेशन, तेज धूप और लाइफस्टाइल की कुछ गलत आदतें भी इसके पीछे बड़ी वजह हो सकती हैं.
विशेषज्ञों के अनुसार, अगर समय रहते सही कदम उठाए जाएं तो आंखों के नीचे की सूजन और डार्क सर्कल की समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है. तो आइए जानते हैं कि गर्मियों में ऐसा क्यों होता है और इससे बचने के लिए आपको क्या करना चाहिए.&amp;nbsp;
गर्मियों में आंखों के नीचे सूजन क्यों आ जाती है?
आंखों के आसपास की स्किन बहुत पतली होती है. गर्म मौसम में शरीर ज्यादा पसीना छोड़ता है, जिससे डिहाइड्रेशन होने लगता है. इसके अलावा तेज धूप, प्रदूषण, ज्यादा नमक वाला खाना, पूरी नींद न लेना और लंबे समय तक मोबाइल या लैपटॉप स्क्रीन के सामने बैठे रहना भी आंखों के नीचे सूजन की वजह बन सकता है. डॉक्टरों के मुताबिक, इस स्थिति को पेरिऑर्बिटल पफीनेस (Periorbital Puffiness) कहा जाता है. इसमें आंखों के आसपास के ढीले टिशूज में पानी जमा होने लगता है, जिससे सूजन दिखाई देने लगती है.&amp;nbsp;
गर्मियों में डार्क सर्कल क्यों बढ़ जाते हैं?
डार्क सर्कल कई कारणों से हो सकते हैं. कुछ लोगों में यह स्किन के नीचे मौजूद ब्लड वेसल्स के ज्यादा दिखाई देने की वजह से होते हैं, जबकि कुछ में थकान, नींद की कमी और डिहाइड्रेशन इसकी वजह बनते हैं. कई बार धूप के ज्यादा संपर्क में रहने से आंखों के नीचे पिगमेंटेशन बढ़ जाता है, जिससे काले घेरे और ज्यादा गहरे दिखाई देने लगते हैं. शरीर में पानी की कमी होने पर आंखों के नीचे की स्किन बेजान और धंसी हुई भी नजर आ सकती है.&amp;nbsp;
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इससे बचने के लिए आपको क्या करना चाहिए
1. ठंडी सिकाई से मिलेगी राहत - अगर आंखों के नीचे सूजन है, तो ठंडी सिकाई काफी फायदेमंद हो सकती है. आप खीरे के ठंडे स्लाइस, फ्रिज में रखे हुए जेल आई मास्क, ठंडे चम्मच या ठंडी की हुई टी बैग्स को 10 से 15 मिनट तक बंद आंखों पर रख सकते हैं. इससे ब्लड वेसल्स सिकुड़ती हैं और सूजन कम होने में मदद मिलती है.&amp;nbsp;
2.टी बैग्स का इस्तेमाल भी कर सकते हैं - ग्रीन टी और ब्लैक टी बैग्स में कैफीन और एंटीऑक्सीडेंट्स पाए जाते हैं, जो आंखों के आसपास की सूजन को कुछ समय के लिए कम करने में मदद कर सकते हैं. हालांकि टी बैग्स को अच्छी तरह ठंडा करने के बाद ही इस्तेमाल करें. गर्म टी बैग्स आंखों की नाजुक स्किन को नुकसान पहुंचा सकते हैं.
3. शरीर को हाइड्रेट रखें - गर्मियों में ज्यादा पसीना निकलने से शरीर में पानी की कमी हो जाती है. इसका असर सबसे पहले चेहरे और आंखों के आसपास दिख सकता है. दिनभर पूरी मात्रा में पानी पिएं और खीरा, तरबूज, संतरा जैसे पानी से भरपूर फलों को अपनी डाइट में शामिल करें. इससे स्किन की नमी बनी रहती है और आंखों के नीचे की थकान कम नजर आती है.&amp;nbsp;
4. नमक का सेवन कम करें - बहुत ज्यादा नमक खाने से शरीर में पानी रुकने लगता है, जिससे आंखों की सूजन बढ़ सकती है. प्रोसेस्ड फूड, पैकेट वाले स्नैक्स और ज्यादा नमकीन चीजों का सेवन कम करें. इससे शरीर में फ्लूइड रिटेंशन कम होगा और आंखों की सूजन में राहत मिल सकती है.&amp;nbsp;
5. भरपूर नींद लेना जरूरी है - अगर आप रोजाना पूरी नींद नहीं लेते, तो डार्क सर्कल और पफीनेस दोनों ज्यादा नजर आने लगते हैं. रोजाना 7 से 8 घंटे की अच्छी नींद लेने की कोशिश करें. इससे स्किन और ब्लड वेसल्स को रिकवर होने का समय मिलता है और चेहरा ज्यादा फ्रेश दिखाई देता है.&amp;nbsp;
6. धूप से आंखों की सुरक्षा करें - तेज धूप आंखों के नीचे पिगमेंटेशन बढ़ा सकती है और &amp;nbsp;स्किन की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को तेज कर सकती है. घर से बाहर निकलते समय UV प्रोटेक्शन वाले सनग्लासेस पहनें और चेहरे के लिए परफेक्ट सनस्क्रीन का इस्तेमाल करें. इससे आंखों के आसपास की नाजुक स्किन सुरक्षित रहती है.&amp;nbsp;
कब डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है?
ज्यादातर मामलों में आंखों के नीचे हल्की सूजन और डार्क सर्कल अस्थायी होते हैं और सही देखभाल से ठीक हो जाते हैं, लेकिन अगर सूजन लगातार बनी रहे, आंखों में लालिमा, खुजली, दर्द हो या एक आंख में अचानक ज्यादा सूजन आ जाए, तो इसे नजरअंदाज न करें. ऐसे लक्षण एलर्जी, संक्रमण, थायराइड की समस्या या किसी अन्य स्वास्थ्य समस्या का संकेत हो सकते हैं. ऐसी स्थिति में तुरंत डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ें - एक कटोरी भीगे चने खाने से कितना प्रोटीन मिलता है, जिम वालों के लिए कितनी बेस्ट ये डाइट?
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 14 Jun 2026 05:30:16 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Eye, Care, Tips:, आंखों, के, नीचे, सूजन, और, डार्क, सर्कल, बढ़, गए, हैं, जानें, इसकी, वजह, और, बचाव</media:keywords>
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        <title>एक कटोरी भीगे चने खाने से कितना प्रोटीन मिलता है, जिम वालों के लिए कितनी बेस्ट ये डाइट?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/एक-कटोरी-भीगे-चने-खाने-से-कितना-प्रोटीन-मिलता-है-जिम-वालों-के-लिए-कितनी-बेस्ट-ये-डाइट</link>
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        <description><![CDATA[ आमतौर पर जिन लोगों को अपनी स्ट्रेंथ बढ़ानी होती है या जो लोग जिम जा रहे होते हैं, वे अधिकतर महंगे-महंगे प्रोटीन शेक, कैप्सूल और पाउडर के भरोसे रहते हैं. मन में यही लगा रहता है कि जितना महंगा सप्लीमेंट, उतना जल्दी रिजल्ट. ऐसे में कई लोगों को यह पता नहीं होता कि प्रोटीन के लिए जिस चीज पर वे इतने पैसे खर्च कर रहे हैं, उसका एक बड़ा हिस्सा वे सिर्फ एक छोटी सी आदत अपनाकर भी हासिल कर सकते हैं.
एक्सपर्ट्स बताते हैं कि ऐसे लोगों को हर रोज एक कटोरा चना खाना चाहिए. यह कोई पुरानी दादी-नानी की बात नहीं है या फिर यूं ही नहीं कही जाती, बल्कि इसके पीछे वैज्ञानिक कारण भी मौजूद हैं. अगर आप भी अपनी ताकत बढ़ाना चाहते हैं या मसल्स बनाना चाहते हैं तो यह जानकारी आपके लिए फायदेमंद साबित हो सकती है. &amp;nbsp;आइए आपको बताते हैं कि चने से कितना प्रोटीन मिलता है और इसे खाने के क्या-क्या फायदे हैं.
यह भी पढ़ेंः Nipah Outbreak in Kerala: केरल में निपाह वायरस की दस्तक, जानें यह कैसे फैलता है और कितना खतरनाक?
एक कटोरी चने में कितना प्रोटीन होता है
एक्सपर्ट्स बताते हैं कि चना प्रोटीन का सबसे बेहतरीन स्रोत माना जाता है. साथ ही इसमें मौजूद प्रोटीन आसानी से पच भी जाता है. वहीं जो लोग वजन बढ़ाना चाहते हैं, वे चने को गुड़ के साथ भी खा सकते हैं. बता दें कि 100 ग्राम भीगे हुए चने में करीब 15 से 17 ग्राम प्रोटीन होता है. अगर आप एक अच्छी कटोरी भरकर चने खाते हैं यानी करीब 150 से 200 ग्राम तो आपको एक बार में ही 20 से 25 ग्राम तक प्रोटीन मिल जाता है.यह उतना ही प्रोटीन है जितना कई महंगे प्रोटीन शेक में होता है. कई लोग वेट गेन करने, मसल्स को बेहतर बनाने और अपनी शारीरिक ताकत बढ़ाने के लिए चना, गुड़ और दूध का सेवन करते हैं. इसका एक कारण यह भी है कि इनमें कैल्शियम अच्छी मात्रा में मौजूद होता है. लेकिन चने की खासियत सिर्फ प्रोटीन की मात्रा नहीं है, एक्सपर्ट्स कहते हैं कि चने का प्रोटीन आसानी से पच जाता है यानी शरीर इसे जल्दी और अच्छे से सोख लेता है. यही वजह है कि जिम जाने वालों के लिए यह सबसे बेस्ट और सस्ती डाइट मानी जाती है.&amp;nbsp;
इसके अलावा चने का एक और फायदा यह बताया जाता है कि यह शरीर में जमा अतिरिक्त पानी को कम करने में मदद कर सकता है, जिससे शरीर टाइट और फिट दिखता है. कैल्शियम के साथ-साथ चने में आयरन भी अच्छी मात्रा में पाया जाता है. वहीं जब चने को गुड़ के साथ खाया जाता है तो चने में मौजूद आयरन की &amp;nbsp;absorption और भी ज्यादा बढ़ जाती है, जिससे शरीर को इसका बेहतर लाभ मिलता है.&amp;nbsp;
सिर्फ जिम वाले नहीं, हर किसी के लिए फायदेमंद है चना
चने के फायदे सिर्फ जिम जाने वालों तक सीमित नहीं हैं. जिन लोगों को अस्थमा की परेशानी है उनके लिए भी भीगे चने बहुत फायदेमंद होते हैं क्योंकि यह फेफड़ों को मजबूत बनाने में मदद करते हैं. कैल्शियम और आयरन दोनों एक साथ मिलने की वजह से यह खून की कमी यानी एनीमिया में भी काम आता है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Sat, 13 Jun 2026 13:30:06 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Walking Benefits: रोजाना 10 हजार कदम चलने का भ्रम खत्म, सिर्फ 4000 कदम चलकर भी पूरी तरह फिट रहेगा दिल</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/walking-benefits-रोजाना-10-हजार-कदम-चलने-का-भ्रम-खत्म-सिर्फ-4000-कदम-चलकर-भी-पूरी-तरह-फिट-रहेगा-दिल</link>
        <guid>https://hindi.attentionindia.com/walking-benefits-रोजाना-10-हजार-कदम-चलने-का-भ्रम-खत्म-सिर्फ-4000-कदम-चलकर-भी-पूरी-तरह-फिट-रहेगा-दिल</guid>
        <description><![CDATA[ Walking 4000 Steps A Day May Reduce Early Death Risk: स्वस्थ रहने के लिए रोजाना 10 हजार कदम चलने की सलाह अक्सर दी जाती है, लेकिन एक नए स्टडी ने इस धारणा पर सवाल खड़े किए हैं. रिसर्च के मुताबिक, उम्रदराज महिलाएं यदि प्रतिदिन 4,000 कदम चलती हैं, तो इससे समय से पहले मृत्यु और हार्ट रोगों का खतरा काफी हद तक कम किया जा सकता है. &amp;nbsp;खास बात यह है कि इसके लिए हर दिन लंबी वॉक करना भी जरूरी नहीं है.&amp;nbsp;
कितना चलना सही रहता है?
स्टडी में सामने आया कि यदि महिलाएं सप्ताह में केवल एक या दो दिन भी 4,000 कदम चलने का लक्ष्य हासिल कर लेती हैं, तब भी उन्हें महत्वपूर्ण स्वास्थ्य लाभ मिल सकते हैं. रिसर्चर का कहना है कि हेल्थ पर पॉजिटिव असर डालने में यह ज्यादा मायने रखता है कि कुल कितने कदम चले गए, न कि सप्ताह में कितने दिन गतिविधि की गई. यह निष्कर्ष लंबे समय से लोकप्रिय 10,000 कदम प्रतिदिन वाले मानक को चुनौती देता है. एक्सपर्ट का मानना है कि स्वास्थ्य लाभ पाने के लिए कोई एक निश्चित या सर्वश्रेष्ठ पैटर्न नहीं है. सबसे जरूरी बात शरीर को सक्रिय रखना है और लोग अपनी सुविधा के अनुसार किसी भी तरीके से शारीरिक गतिविधि कर सकते हैं.
महिलाओं के लिए क्या है खास?
स्टडी में पाया गया कि अपेक्षाकृत कम सक्रिय महिलाओं की तुलना में वे महिलाएं, जिन्होंने सप्ताह में एक या दो दिन 4,000 कदम प्रतिदिन पूरे किए, उनमें किसी भी कारण से मृत्यु का जोखिम 26 प्रतिशत कम था. वहीं हार्ट रोग से जुड़ी मौत का खतरा 27 प्रतिशत तक घटा हुआ पाया गया. रिसर्च के अनुसार, यदि यही लक्ष्य सप्ताह में तीन दिन पूरा किया जाए तो फायदे और बढ़ सकते हैं. ऐसी महिलाओं में समय से पहले मृत्यु का जोखिम 40 प्रतिशत तक कम देखा गया. इसके अलावा हृदय रोग का खतरा भी 27 प्रतिशत तक कम पाया गया.&amp;nbsp;
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हालांकि 5,000 से 7,000 कदम प्रतिदिन चलने वाली महिलाओं को भी अतिरिक्त लाभ मिला, लेकिन इसमें बढ़ोतरी अपेक्षाकृत सीमित रही. इस समूह में मृत्यु का जोखिम 32 प्रतिशत कम था, जबकि हार्ट रोग से मृत्यु के खतरे में लगभग 16 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई. रिसर्चर का कहना है कि एक स्तर के बाद लाभ की गति धीमी पड़ने लगती है.
किन लोगों को रिसर्च में किया गया था शामिल?
अमेरिका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी सहित कई संस्थानों के रिसर्चर की तरफ से किए गए इस स्टडी को ब्रिटिश जर्नल ऑफ स्पोर्ट्स मेडिसिन में प्रकाशित किया गया है. स्टडी में 13,547 महिलाओं को शामिल किया गया, जिनकी औसत आयु करीब 72 वर्ष थी. स्टडी की शुरुआत में इनमें से किसी को भी हार्ट रोग या कैंसर नहीं था. रिसर्च के दौरान प्रतिभागियों को सात दिनों तक स्टेप काउंट मापने वाले उपकरण पहनाए गए और करीब 11 वर्षों तक उनकी स्वास्थ्य स्थिति पर नजर रखी गई. इस अवधि में 1,765 महिलाओं की मृत्यु हुई, जबकि 781 महिलाओं में हार्ट रोग विकसित हुआ.
स्टडी के अंत में रिसर्चर ने निष्कर्ष निकाला कि रोजाना अधिक कदम चलना बेहतर स्वास्थ्य परिणामों से जुड़ा है. उनके अनुसार, उम्रदराज महिलाओं के लिए सप्ताह में एक या दो दिन भी 4,000 कदम चलना समय से पहले मृत्यु और हृदय रोग के खतरे को कम करने की दिशा में एक प्रभावी कदम साबित हो सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 11 Jun 2026 21:30:15 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Walking, Benefits:, रोजाना, हजार, कदम, चलने, का, भ्रम, खत्म, सिर्फ, 4000, कदम, चलकर, भी, पूरी, तरह, फिट, रहेगा, दिल</media:keywords>
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        <title>Daily Walking Distance: एक दिन में कितने किलोमीटर चलना होता है ठीक, इससे ज्यादा चले तो कितना खतरा?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/daily-walking-distance-एक-दिन-में-कितने-किलोमीटर-चलना-होता-है-ठीक-इससे-ज्यादा-चले-तो-कितना-खतरा</link>
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        <description><![CDATA[ How Many Kilometers Should You Walk In A Day: चलना सबसे आसान और असरदार एक्सरसाइज में से एक माना जाता है. यह न सिर्फ हार्ट को स्वस्थ रखने में मदद करता है, बल्कि वजन कंट्रोल करने, मूड बेहतर बनाने और शरीर को सक्रिय रखने में भी अहम भूमिका निभाता है. लेकिन अक्सर लोगों के मन में सवाल उठता है कि आखिर एक दिन में कितनी वॉक करना सही है और क्या जरूरत से ज्यादा चलना नुकसान भी पहुंचा सकता है?. हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली बेवसाइट goodrx के एक्सपर्ट के अनुसार हर व्यक्ति के लिए चलने की आदर्श दूरी अलग-अलग हो सकती है. &amp;nbsp;यह उसकी फिटनेस, उम्र, स्वास्थ्य स्थिति और चलने की गति पर निर्भर करता है. जो व्यक्ति नियमित रूप से व्यायाम करता है, वह नए व्यक्ति की तुलना में अधिक दूरी आराम से तय कर सकता है.
कितना चलना माना जाता है सही?
एक्सपर्ट्स सप्ताह में कम से कम 150 मिनट की मध्यम तीव्रता वाली शारीरिक गतिविधि करने की सलाह देते हैं. इसका मतलब है कि आप हफ्ते में छह दिन करीब 25 मिनट तेज चाल से चल सकते हैं. आमतौर पर यह दूरी 2 से 3 किलोमीटर के आसपास हो सकती है, हालांकि यह व्यक्ति की गति पर निर्भर करती है. 10,000 कदम प्रतिदिन चलने का लक्ष्य काफी लोकप्रिय है, लेकिन एक्सपर्ट का कहना है कि यह कोई जादुई संख्या नहीं है. एक रिसर्च में पाया गया कि रोजाना लगभग 7,000 कदम चलने वाले लोगों में समय से पहले मृत्यु का जोखिम कम देखा गया. हालांकि 7,000 और 10,000 से अधिक कदम चलने वालों के बीच स्वास्थ्य लाभ में बहुत बड़ा अंतर नहीं पाया गया. अब 4000 स्टेप को लेकर भी क्लेम क्या जा रहा है.
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कब बढ़ सकता है खतरा?
ज्यादा चलना हर किसी के लिए फायदेमंद नहीं होता. यदि शरीर को पर्याप्त आराम न मिले और लगातार जरूरत से ज्यादा वॉक की जाए, तो ओवरट्रेनिंग जैसी स्थिति पैदा हो सकती है. ऐसे में शरीर कुछ संकेत देने लगता है जिन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. अगर वॉक के बाद लंबे समय तक मांसपेशियों में दर्द बना रहे, शरीर भारी महसूस हो, लगातार थकान रहे या पहले की तुलना में आपकी परफॉर्मेंस कम हो जाए, तो यह संकेत हो सकता है कि आप जरूरत से ज्यादा चल रहे हैं. इसके अलावा बार-बार मोच आना, चोट लगना, चलने की इच्छा कम होना, चिड़चिड़ापन बढ़ना, भूख कम लगना और बार-बार सर्दी-जुकाम होना भी ओवरएक्सर्शन के संकेत माने जाते हैं.
अपने शरीर की सुनें
एक्सपर्ट का मानना है कि किसी तय संख्या के पीछे भागने से ज्यादा जरूरी है कि आप अपनी क्षमता के अनुसार सक्रिय रहें. अगर आप वॉकिंग की शुरुआत कर रहे हैं, तो धीरे-धीरे दूरी और समय बढ़ाएं. वहीं फिट लोग अपनी क्षमता के अनुसार गति, दूरी या वॉक की फ्रीक्वेंसी बढ़ा सकते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 11 Jun 2026 21:30:14 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>क्या सच में आलू खाने से एसिडिटी की दिक्कत होती है? जानें इसको खाने के सही तरीके</title>
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        <description><![CDATA[ Does Eating Potatoes Really Cause Acidity: आलू भारतीय रसोई का ऐसा हिस्सा है जो लगभग हर घर में किसी न किसी रूप में खाया जाता है. लेकिन कई लोग आलू खाने के बाद पेट में जलन, गैस, भारीपन या एसिडिटी की शिकायत करते हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सच में आलू एसिडिटी बढ़ाता है या इसके पीछे कोई और वजह होती है? एक्सपर्ट के अनुसार ज्यादातर मामलों में समस्या आलू से नहीं, बल्कि उसे खाने के तरीके और व्यक्ति की पाचन क्षमता से जुड़ी होती है.&amp;nbsp;
क्या सच में इससे गैस बनती है?
Ubiehealth की रिपोर्ट के अनुसार, आलू में रेजिस्टेंट स्टार्च पाया जाता है. यह एक प्रकार का स्टार्च है जो पूरी तरह पच नहीं पाता और बड़ी आंत तक पहुंच जाता है. वहां मौजूद बैक्टीरिया इसे फर्मेंट करते हैं, जिससे गैस बनने लगती है, कुछ लोगों में यही गैस पेट फूलने, भारीपन और एसिडिटी जैसे लक्षण पैदा कर सकती है खासकर जिन लोगों का डाइजेशन सिस्टम सेंसिटिवहोता है, उन्हें यह समस्या ज्यादा महसूस हो सकती है.
किन लोगों को हो सकती है दिक्कत?
यदि आप इरिटेबल बाउल सिंड्रोम या बार-बार होने वाली डाइजेशन संबंधी परेशानियों से जूझ रहे हैं, तो ज्यादा मात्रा में आलू खाने से भी असहजता बढ़ सकती है. हालांकि आलू को सामान्य तौर पर पाचन के लिए सुरक्षित माना जाता है, लेकिन बड़ी मात्रा में इसका सेवन कुछ लोगों में गैस और पेट दर्द का कारण बन सकता है.&amp;nbsp;
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कैसे सही तरीके से कर सकते हैं यूज?
आलू खाने का तरीका भी काफी मायने रखता है. उबले या बेक किए गए आलू आमतौर पर आसानी से पच जाते हैं, जबकि फ्रेंच फ्राइज, चिप्स या ज्यादा तेल-मसाले में बने आलू पेट पर अतिरिक्त दबाव डाल सकते हैं. तैलीय भोजन पाचन प्रक्रिया को धीमा कर देता है, जिससे एसिडिटी और गैस की समस्या बढ़ सकती है. इसलिए यदि आलू खाने के बाद जलन महसूस होती है, तो सबसे पहले उसकी तैयारी के तरीके पर ध्यान देना चाहिए. एक्सपर्ट यह भी सलाह देते हैं कि हरे रंग के या अंकुरित आलू खाने से बचना चाहिए. ऐसे आलू में सोलनाइन नामक नेचुरल टॉक्सिक तत्व की मात्रा बढ़ सकती है, जो पेट दर्द, मतली और पाचन संबंधी परेशानियों का कारण बन सकता है.
अगर आपको लगता है कि आलू खाने के बाद बार-बार एसिडिटी हो रही है, तो कुछ दिनों तक अपने खानपान का रिकॉर्ड रखें. ध्यान दें कि आपने आलू किस रूप में खाया, कितनी मात्रा में खाया और उसके बाद कौन से लक्षण दिखाई दिए. &amp;nbsp;इससे सही कारण समझने में मदद मिल सकती है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 13:30:17 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Diabetes Care Tips: शुगर पेशेंट हैं तो आज से गांठ बांध लें ये 5 बातें, वरना वक्त से पहले आ जाएगी मौत</title>
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        <description><![CDATA[ Diabetes Care Tips: शुगर पेशेंट हैं तो आज से गांठ बांध लें ये 5 बातें, वरना वक्त से पहले आ जाएगी मौत ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 13:30:15 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Monsoon Health Tips: मॉनसून में इन बीमारियों का खतरा सबसे ज्यादा, इन 5 बातों का ख्याल रख अपनों को बचा सकते हैं आप</title>
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        <description><![CDATA[ Monsoon Health Tips: मॉनसून में इन बीमारियों का खतरा सबसे ज्यादा, इन 5 बातों का ख्याल रख अपनों को बचा सकते हैं आप ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 13:30:14 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Monsoon, Health, Tips:, मॉनसून, में, इन, बीमारियों, का, खतरा, सबसे, ज्यादा, इन, बातों, का, ख्याल, रख, अपनों, को, बचा, सकते, हैं, आप</media:keywords>
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        <title>Mental Health Crisis: हर दिन 42 मौतें, डिप्रेशन और तनाव बना बड़ी चुनौती, एक्सपर्ट ने बताए ये शुरुआती लक्षण</title>
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        <description><![CDATA[ Warning Signs Of Mental Health Problems: मेंटल हेल्थ आज भारत के सामने उभरती हुई सबसे बड़ी हेल्थ चुनौतियों में से एक बनता जा रहा है. इसका गंभीर संकेत &amp;nbsp;2024 के नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो &amp;nbsp;के आंकड़ों में भी देखने को मिला है. रिपोर्ट के अनुसार, मध्य प्रदेश में वर्ष 2024 के दौरान 15,491 लोगों ने आत्महत्या की, यानी औसतन हर दिन 42 लोगों ने अपनी जान गंवाई. यह आंकड़ा सिर्फ एक अपराध या सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि गहराते मेंटल हेल्थ संकट की ओर भी इशारा करता है.
मेंटल हेल्थ क्यों चुनौती की तरह उभर रहा?
एक्सपर्ट का मानना है कि छात्रों और युवाओं में बढ़ता तनाव इस संकट का एक बड़ा कारण बनकर उभरा है. प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव, करियर को लेकर अनिश्चितता और लगातार बढ़ती अपेक्षाएं युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही हैं. आंकड़ों के मुताबिक मध्य प्रदेश छात्र आत्महत्या के मामलों में देश में तीसरे स्थान पर है और राष्ट्रीय स्तर पर होने वाली छात्र आत्महत्याओं में लगभग 10 प्रतिशत हिस्सेदारी अकेले इसी राज्य की है.
लड़कियों के मामले हैरान कर देने वाले
चिंताजनक बात यह है कि छात्राओं पर मानसिक दबाव का असर अधिक दिखाई दे रहा है. वर्ष 2024 में राज्य में 731 छात्राओं और 716 छात्रों ने आत्महत्या की. इसे बढ़ते शैक्षणिक दबाव, सामाजिक अपेक्षाओं और भावनात्मक तनाव से जोड़कर देखते हैं. हेल्थ एक्सपर्ट का कहना है कि आत्महत्या कभी भी अचानक लिया गया फैसला नहीं होता. इसके पीछे लंबे समय से चल रही मानसिक परेशानियां, डिप्रेशन, चिंता और इमोशनल संघर्ष छिपे हो सकते हैं. इसलिए शुरुआती संकेतों को पहचानना बेहद जरूरी है.
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क्या होते हैं इसके लक्षण?
अहमदाबाद स्थित एक निजी मनोचिकित्सा केंद्र की कंसलटेंट और &#039;हैप्पीनेस फर्स्ट&#039; की एक्सपर्ट डॉ. विधि पटेल वैष्णव के अनुसार यदि कोई व्यक्ति बार-बार मौत या आत्महत्या की बातें करने लगे, अत्यधिक चिंता और बेचैनी महसूस करे, खुद को निरर्थक समझने लगे, अचानक लोगों से दूरी बनाने लगे या अपनी प्रिय चीजें दूसरों को देने लगे, तो इसे गंभीर चेतावनी संकेत माना जाना चाहिए. ऐसे मामलों में तुरंत एक्सपर्ट की मदद लेना जरूरी है. डॉ का कहना है कि समय पर मेडिकल सहायता और इमोशनल सहयोग कई जिंदगियां बचा सकता है. अच्छी नींद, नियमित व्यायाम, परिवार और दोस्तों से खुलकर बात करना, स्क्रीन टाइम कम करना और जीवन में संतोष की भावना विकसित करना मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मददगार हो सकता है.
मेंटल हेल्थ पर ध्यान देने की जरूरत
एक्सपर्ट यह भी मानते हैं कि मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को गांव और छोटे शहरों तक पहुंचाना समय की जरूरत है. स्कूलों और कॉलेजों में काउंसलिंग सुविधाएं, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर प्रशिक्षित मानसिक स्वास्थ्य एक्सपर्ट और जागरूकता अभियान इस दिशा में अहम भूमिका निभा सकते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 13:30:13 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Weight Loss Drug: मोटापा कम करने का नया कमाल, 52 नहीं अब सिर्फ 12 इंजेक्शन में चलेगा काम, जानें कैसे?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/weight-loss-drug-मोटापा-कम-करने-का-नया-कमाल-52-नहीं-अब-सिर्फ-12-इंजेक्शन-में-चलेगा-काम-जानें-कैसे</link>
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        <description><![CDATA[ Pfizer&amp;rsquo;s Berobenatide Weight Loss Drug: मोटापे और डायबिटीज के इलाज में एक बड़ा बदलाव आने की संभावना दिखाई दे रही है. दवा कंपनी फाइजर ने अपनी नई प्रायोगिक दवा बेरोबेनेटाइड के मिड-स्टेज ट्रायल के नतीजे जारी किए हैं. &amp;nbsp;खास बात यह है कि यदि यह दवा भविष्य में मंजूरी हासिल कर लेती है, तो यह दुनिया की पहली ऐसी जीएलपी-1 आधारित वेट लॉस थेरेपी हो सकती है जिसे हर हफ्ते नहीं, बल्कि महीने में सिर्फ एक बार इंजेक्शन के रूप में लेना होगा.&amp;nbsp;
इस तरह कैसे दी जाती है दवा?
मौजूदा समय में वेगोवी और जेडबाउंड जैसी लोकप्रिय वेट लॉस दवाएं साप्ताहिक इंजेक्शन के रूप में दी जाती हैं. इसके विपरीत ब्राबांटिया का उद्देश्य मरीजों के लिए इलाज को अधिक सुविधाजनक बनाना है. शुरुआती चरण में मरीजों को साप्ताहिक डोज दी जाएगी, जिसके बाद उन्हें महीने में केवल एक इंजेक्शन लेना होगा. इसका मतलब है कि सालभर में 52 इंजेक्शन की जगह केवल 12 इंजेक्शन की जरूरत पड़ेगी.&amp;nbsp;
वेस्पर-3 नामक क्लिनिकल ट्रायल में डायबिटीज से पीड़ित न होने वाले प्रतिभागियों का वजन 12.3 प्रतिशत तक कम हुआ. &amp;nbsp;दिलचस्प बात यह रही कि जो मरीज बाद में मासिक डोज पर गए, उनका वजन कम होना जारी रहा और वजन घटने की प्रक्रिया किसी ठहराव पर नहीं पहुंची.&amp;nbsp;
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क्या इनके असर दिखते हैं?
हालांकि वेगोवी और जेडबाउंड जैसी दवाओं ने बड़े और लंबे स्टडी में लगभग 15 प्रतिशत और 20 प्रतिशत से अधिक वजन घटाने के परिणाम दिखाए हैं, &amp;nbsp;लेकिनफोर्टिस सीडीओसी हॉस्पिटल फॉर डायबिटीज एंड एलाइड साइंसेज के चेयरमैन और एम्स दिल्ली के पूर्व प्रोफेसर डॉ. अनूप मिश्रा का कहना है कि अलग-अलग ट्रायल्स के परिणामों की सीधी तुलना नहीं की जानी चाहिए.
क्या है इसकी खासियत?
डॉ. अनूप मिश्रा के अनुसार बेरोबेनेटाइड की सबसे बड़ी खासियत वजन घटाने का प्रतिशत नहीं, बल्कि इसकी मासिक डोजिंग है. उनका मानना है कि भारत जैसे देश में लंबे समय तक इलाज जारी रखना बड़ी चुनौती होता है. ऐसे में महीने में केवल एक बार इंजेक्शन लेने की सुविधा मरीजों की उपचार के प्रति प्रतिबद्धता बढ़ा सकती है और इलाज छोड़ने की संभावना कम कर सकती है. एक्सपर्ट के मुताबिक अब इस दवा के फेज-3 ट्रायल्स पर नजर रहेगी. इसमें लंबे समय तक वजन कम रहने की क्षमता, सुरक्षा, गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल साइड इफेक्ट्स, हार्ट और किडनी पर प्रभाव जैसे पहलुओं का मूल्यांकन किया जाएगा. यह भी देखा जाएगा कि शरीर में पूरे महीने तक सक्रिय रहने वाली यह दवा किसी नए जोखिम को तो जन्म नहीं देती.
कब तक मार्केट में आ सकती है?
डॉ. मिश्रा का मानना है कि भविष्य में मोटापे के इलाज का फोकस केवल वजन घटाने तक सीमित नहीं रहेगा. हार्ट रोग, किडनी स्वास्थ्य, ब्लड शुगर कंट्रोल, दवा की कीमत और मरीज की व्यक्तिगत स्वास्थ्य स्थिति जैसे कारक भी इलाज तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे. उनके अनुसार आने वाले वर्षों में लंबे समय तक असर करने वाली दवाएं, कॉम्बिनेशन थेरेपी और पर्सनलाइज्ड ट्रीटमेंट मोटापे के इलाज की दिशा तय करेंगे. यदि यह अपने अंतिम ट्रायल्स में सफल रहती है, तो इसके 2028 के अंत या 2029 के मध्य तक मरीजों के लिए उपलब्ध होने की संभावना है. एक्सपर्ट मानते हैं कि यह दवा मोटापे को एक लंबे समय तक चलने वाली बीमारी के रूप में प्रबंधित करने के तरीके को बदल सकती है.
इसे भी पढ़ें -&amp;nbsp;Summer Health Tips: दिनभर धूप में करते हैं काम तो जा सकती है जान, इन स्मार्ट तरीकों से खुद का रखें ख्याल
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 13:30:11 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>भारत में ज्यादा चीनी, विदेश में बिना शुगर, बेबी फूड को लेकर नेस्ले की रिपोर्ट पर फिर बहस तेज</title>
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        <description><![CDATA[ भारत में ज्यादा चीनी, विदेश में बिना शुगर, बेबी फूड को लेकर नेस्ले की रिपोर्ट पर फिर बहस तेज ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 01:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>Fatty Liver Disease: शहरी भारत में हर तीसरा व्यक्ति फैटी लिवर का शिकार, नजरअंदाज किया तो हो सकता है कैंसर</title>
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        <description><![CDATA[ Can Weight Loss Reverse Fatty Liver Disease: फैटी लिवर को लंबे समय तक एक मामूली समस्या माना जाता रहा. कई लोगों को अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट में इसका जिक्र मिलता था, लेकिन क्योंकि कोई खास लक्षण नहीं दिखते थे, इसलिए इसे नजरअंदाज कर दिया जाता था. &amp;nbsp;हालांकि अब डॉक्टरों का कहना है कि यह गलती भविष्य में गंभीर परेशानी का कारण बन सकती है. भारत में फैटी लिवर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. मोटापा, टाइप-2 डायबिटीज, अनहेल्दी खानपान, कम शारीरिक गतिविधि, खराब नींद और तनावपूर्ण लाइफस्टाइल इसके प्रमुख कारण माने जा रहे हैं. सबसे चिंता की बात यह है कि यह बीमारी कई सालों तक बिना किसी स्पष्ट लक्षण के शरीर में बढ़ती रहती है.&amp;nbsp;
क्यों जल्दी पहचान करना जरूरी?
&amp;nbsp;डॉ. शलीन अग्रवाल ने TOI को बताया कि &amp;nbsp;फैटी लिवर उन गिनी-चुनी लिवर बीमारियों में शामिल है जिन्हें शुरुआती चरण में काफी हद तक ठीक किया जा सकता है. लेकिन इसके लिए समय रहते कदम उठाना बेहद जरूरी है. दरअसल, जब लिवर की सेल्स में जरूरत से ज्यादा फैट जमा होने लगता है, तो लिवर के सामान्य कामकाज पर असर पड़ना शुरू हो जाता है. लिवर शरीर में पोषक तत्वों को प्रोसेस करने, विषैले पदार्थों को बाहर निकालने और मेटाबॉलिज्म को नियंत्रित करने जैसे कई महत्वपूर्ण काम करता है. इसलिए इसकी सेहत बिगड़ने का असर पूरे शरीर पर पड़ सकता है.
भारत में क्या है स्थिति?
जर्नल ऑफ क्लिनिकल एंड एक्सपेरिमेंटल हेपेटोलॉजी में प्रकाशित एक रिसर्च के अनुसार, शहरी भारत में हर तीन में से एक व्यक्ति किसी न किसी स्तर के फैटी लिवर से प्रभावित हो सकता है. एक्सपर्ट का मानना है कि मोटापा और डायबिटीज बढ़ने के साथ यह आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है.&amp;nbsp;
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क्या आप इसको घर पर ठीक कर सकते हैं?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वजन घटाकर फैटी लिवर को ठीक किया जा सकता है? इस पर डॉ. शलीन अग्रवाल कहते हैं कि शुरुआती अवस्था में इसका जवाब हां है. उनका कहना है कि लिवर में खुद को रिपेयर करने की अद्भुत क्षमता होती है, बशर्ते नुकसान स्थायी न हुआ हो. नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ हेल्थ के नेतृत्व में हुए कई स्टडी में पाया गया है कि शरीर के कुल वजन का केवल 5 प्रतिशत कम करने से लिवर में जमा फैट घट सकता है. वहीं 7 से 10 प्रतिशत वजन कम करने पर लिवर की सूजन में भी सुधार देखा गया है. कुछ मामलों में शुरुआती फाइब्रोसिस यानी लिवर पर बनने वाले निशानों को भी कम किया जा सकता है.&amp;nbsp;
किन बातों का रखना चाहिए ध्यान?
एक्सपर्ट क्रैश डाइट या तेजी से वजन घटाने की सलाह नहीं देते. उनका कहना है कि संतुलित भोजन, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद, ब्लड शुगर कंट्रोल और लंबे समय तक स्वस्थ आदतें अपनाना ही सबसे प्रभावी उपाय है. डॉ. शलीन अग्रवाल चेतावनी देते हैं कि अगर फैटी लिवर को नजरअंदाज किया जाए तो यह आगे चलकर लिवर में सूजन, फाइब्रोसिस, सिरोसिस, लिवर फेलियर और यहां तक कि लिवर कैंसर का कारण भी बन सकता है. &amp;nbsp;कई बार मरीज तब अस्पताल पहुंचते हैं जब स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी होती है कि लिवर ट्रांसप्लांट ही एकमात्र विकल्प बचता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 01:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Heart Health: कलाई पर रखें उंगली और 10 सेकंड में जानें दिल का हाल, एक्सपर्ट ने बताया बीमारी पकड़ने का तरीका</title>
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        <description><![CDATA[ How To Check Your Pulse For Heart Problems: आज के दौर में लोग अपनी सेहत को लेकर पहले से कहीं ज्यादा जागरूक हो गए हैं. कोई स्मार्टवॉच से कदम गिन रहा है तो कोई ब्लड प्रेशर और नींद पर नजर रख रहा है. लेकिन दिल की सेहत से जुड़ा एक बेहद आसान और पुराना तरीका आज भी ज्यादातर लोग नजरअंदाज कर देते हैं कि अपनी नाड़ी यानी पल्स चेक करना. चलिए आपको बताते हैं कि क्यों यह आपके लिए जरूरी है.&amp;nbsp;
पल्स जांचकर हार्ट के बारे में पता करना
एक्सपर्ट का कहना है कि केवल 10 सेकंड में अपनी पल्स जांचकर दिल की एक ऐसी समस्या का शुरुआती संकेत पाया जा सकता है, जो लंबे समय तक बिना किसी लक्षण के शरीर में मौजूद रह सकती है. यह जानकारी खास तौर पर वर्ल्ड हार्ट रिदम वीक के दौरान महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जिसका उद्देश्य लोगों को दिल की धड़कन से जुड़ी बीमारियों के प्रति जागरूक करना है.&amp;nbsp;
कैसे काम करता है यह?
हार्ट की सबसे आम रिदम संबंधी समस्याओं में से एक है एट्रियल फिब्रिलेशन . &amp;nbsp;इस स्थिति में दिल के ऊपरी चैम्बर अनियमित तरीके से धड़कने लगते हैं और दिल की सामान्य लय बिगड़ जाती है. समस्या यह है कि कई लोगों को इसके कोई स्पष्ट लक्षण महसूस नहीं होते. कुछ मरीजों को धड़कन तेज महसूस होना, सांस फूलना, चक्कर आना या थकान हो सकती है, लेकिन कई लोग पूरी तरह सामान्य महसूस करते हैं.&amp;nbsp;
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कई बार बिना किसी लक्षण के मौजूद
अमेरिका के नेशनल हार्ट, लंग एंड ब्लड इंस्टीट्यूट के अनुसार, एट्रियल फिब्रिलेशन कई बार बिना किसी लक्षण के मौजूद रह सकता है और इसका पता केवल नियमित जांच के दौरान चलता है. &amp;nbsp;यदि इसका समय पर इलाज न किया जाए तो स्ट्रोक और अन्य हार्ट संबंधी दिक्कतों का खतरा बढ़ सकता है. डॉ. प्रदीप जैन ने TOI को बताया कि एक साधारण पल्स चेक कई बार दिल की अनियमित धड़कन का शुरुआती संकेत दे सकता है.&amp;nbsp;
10 सेकंड में कैसे पता कर सकते हैं?
उनके अनुसार, अपनी तर्जनी और मध्यमा उंगली को अंगूठे के नीचे कलाई के अंदरूनी हिस्से पर रखें और करीब 10 सेकंड तक धड़कन महसूस करें. यदि धड़कन नियमित और समान अंतराल पर महसूस हो रही है तो आमतौर पर चिंता की बात नहीं होती. लेकिन अगर धड़कन कभी तेज, कभी धीमी या अनियमित महसूस हो, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी हो सकता है. हालांकि एक्सपर्ट यह भी स्पष्ट करते हैं कि केवल पल्स चेक करके एट्रियल फिब्रिलेशन या किसी अन्य बीमारी की पुष्टि नहीं की जा सकती. यह सिर्फ एक शुरुआती चेतावनी संकेत की तरह काम करता है, जिससे समय रहते मेडिकल जांच कराई जा सके. डॉ. प्रदीप जैन के मुताबिक, बढ़ती उम्र, हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, मोटापा, हार्ट रोग और शारीरिक गतिविधि की कमी जैसी स्थितियां अनियमित दिल की धड़कन का जोखिम बढ़ा सकती हैं. भारत में इन समस्याओं के तेजी से बढ़ते मामलों को देखते हुए लोगों को अपने दिल की लय पर ध्यान देना चाहिए.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 09 Jun 2026 09:30:06 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Cardio Vs Strength Training: लंबी उम्र के लिए कार्डियो या स्ट्रेंथ ट्रेनिंग में क्या सही? 58% घटता है समय से पहले मौत का खतरा</title>
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        <description><![CDATA[ Is Strength Training Better Than Cardio For Longevity: फिटनेस की दुनिया में लंबे समय से एक बहस चलती आ रही है कि बेहतर स्वास्थ्य और लंबी उम्र के लिए कार्डियो ज्यादा जरूरी है या फिर स्ट्रेंथ ट्रेनिंग? एक तरफ दौड़ना, साइकिल चलाना और तेज चाल से चलने जैसी गतिविधियों के समर्थक हैं, तो दूसरी ओर वजन उठाने और मांसपेशियों को मजबूत बनाने वाली एक्सरसाइज को सबसे प्रभावी मानने वाले लोग हैं. लेकिन अब हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के रिसर्चर की एक बड़ी स्टडी ने इस बहस को नई दिशा दे दी है.
अलग-अलग एक्सरसाइज से क्या होता है असर?
ब्रिटिश जर्नल ऑफ स्पोर्ट्स मेडिसिन में पब्लिश इस रिसर्च में 1 लाख 47 हजार 374 एडल्ट के स्वास्थ्य और व्यायाम की आदतों का करीब 30 वर्षों तक एनालिसिस किया गया. रिसर्चर ने यह जानने की कोशिश की कि अलग-अलग प्रकार की एक्सरसाइज का मृत्यु दर, हृदय रोग, कैंसर और ब्रेन संबंधी बीमारियों पर क्या असर पड़ता है. रिसर्चर का सबसे दिलचस्प निष्कर्ष यह रहा कि ज्यादा व्यायाम हमेशा ज्यादा फायदा नहीं देता. खासतौर पर स्ट्रेंथ ट्रेनिंग के मामले में एक तय सीमा के बाद लाभ बढ़ना लगभग रुक जाता है. रिसर्च के अनुसार, सप्ताह में 90 से 120 मिनट तक मांसपेशियों को मजबूत बनाने वाली एक्सरसाइज करना सबसे फायदेमंद साबित हुआ.&amp;nbsp;
कितने घंटे स्ट्रेंथ ट्रेनिंग फायदेमंद?
जो लोग हर सप्ताह लगभग डेढ़ से दो घंटे स्ट्रेंथ ट्रेनिंग करते थे, उनमें किसी भी कारण से मृत्यु का खतरा 13 प्रतिशत कम पाया गया. वहीं हार्ट संबंधी बीमारियों से मौत का जोखिम 19 प्रतिशत और अल्जाइमर जैसी ब्रेन संबंधी बीमारियों से मृत्यु का खतरा 27 प्रतिशत तक कम देखा गया. &amp;nbsp;रिसर्चर का कहना है कि दो घंटे से अधिक स्ट्रेंथ ट्रेनिंग करने पर अतिरिक्त लाभ बहुत सीमित हो जाते हैं. &amp;nbsp;हालांकि इस स्टडी का निष्कर्ष यह नहीं है कि स्ट्रेंथ ट्रेनिंग कार्डियो से बेहतर है. असल में सबसे ज्यादा फायदे उन लोगों को मिले जिन्होंने दोनों तरह की एक्सरसाइज को अपनी रूटीन का हिस्सा बनाया. कार्डियो और स्ट्रेंथ ट्रेनिंग का संतुलित कम्बिनेशन समय से पहले मृत्यु के जोखिम को 58 प्रतिशत तक कम करने से जुड़ा पाया गया.
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स्ट्रेंथ ट्रेनिंग करने से क्या होता है फायदा?
एक्सपर्ट का मानना है कि उम्र बढ़ने के साथ शरीर में मांसपेशियां कम होने लगती हैं, जिसे सारकोपेनिया कहा जाता है. इसके कारण कमजोरी, गिरने का खतरा, धीमा मेटाबॉलिज्म और रोजमर्रा के काम करने में परेशानी जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं. स्ट्रेंथ ट्रेनिंग इन दिक्कतों को कम करने में मदद करती है. इसके अलावा यह हड्डियों को मजबूत बनाती है, इंसुलिन सेंसिटिविटी में सुधार करती है, ब्लड शुगर को कंट्रोल रखने में मदद करती है और ऑस्टियोपोरोसिस के खतरे को भी कम कर सकती है. डंबल, रेजिस्टेंस बैंड, बॉडीवेट एक्सरसाइज, योग, पिलाटीज और यहां तक कि कुछ कठिन बागवानी गतिविधियां भी इसमें शामिल मानी जाती हैं. एक्सपर्ट के अनुसार, तीव्रता से ज्यादा महत्वपूर्ण नियमितता है.
किसको चुनना बेहतर?
हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की इस स्टडी का संदेश साफ है. यदि आप लंबा और स्वस्थ जीवन जीना चाहते हैं तो कार्डियो और स्ट्रेंथ ट्रेनिंग में से किसी एक को चुनने की जरूरत नहीं है. सप्ताह में लगभग दो घंटे स्ट्रेंथ ट्रेनिंग और नियमित कार्डियो एक्सरसाइज का कम्बिनेशन आपके स्वास्थ्य को बेहतर बनाने और कई गंभीर बीमारियों के दिक्कतों को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 08 Jun 2026 21:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Cardio, Strength, Training:, लंबी, उम्र, के, लिए, कार्डियो, या, स्ट्रेंथ, ट्रेनिंग, में, क्या, सही, 58, घटता, है, समय, से, पहले, मौत, का, खतरा</media:keywords>
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        <title>Causes of Frequent Urination: पेट खराब होने पर बार बार क्यों आता है पेशाब, जानिए किन चीजों को करना चाहिए अवॉइड?</title>
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        <description><![CDATA[ Causes of Frequent Urination: पेट खराब होने पर बार बार क्यों आता है पेशाब, जानिए किन चीजों को करना चाहिए अवॉइड? ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 08 Jun 2026 21:30:11 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Cancer Drug Shortage: कैंसर मरीजों के लिए बढ़ी चिंता, जरूरी कीमो दवाओं की कमी से इलाज पर मंडराया संकट</title>
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        <description><![CDATA[ Cancer Drug Shortage:&amp;nbsp; कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों और उनके परिवारों के लिए इन दिनों एक नई चिंता सामने आ गई है. देश के कई अस्पतालों में कीमोथेरेपी में इस्तेमाल होने वाली कुछ जरूरी दवाओं की कमी की खबरें सामने आ रही हैं. डॉक्टरों का कहना है कि Cisplatin और Carboplatin जैसी दवाएं कई तरह के कैंसर के इलाज में अहम भूमिका निभाती हैं. इस कमी के कारण देश भर में कैंसर के मरीजों के इलाज में रुकावटें आ रही हैं. बता दें कि ये दोनों दवाएं फेफड़े, Cervix, Ovary, और सिर-गर्दन &amp;nbsp;के कैंसर के इलाज के लिए बहुत जरूरी मानी जाती हैं. &amp;nbsp;कई जगह मरीज और उनके परिजन दवा की तलाश में एक मेडिकल स्टोर से दूसरे मेडिकल स्टोर तक भटक रहे हैं. &amp;nbsp;डॉक्टरों की चिंता यह है कि अगर समय पर दवा नहीं मिली मरीजों के कीमोथेरेपी सेशन को टालना पड़ रहा है या फिर इलाज का कोई दूसरा तरीका ढूंढना पड़ रहा है.&amp;nbsp;
आखिर क्यों खास हैं ये दवाएं?
Cisplatin और Carboplatin जैसी प्लैटिनम आधारित दवाएं कैंसर के इलाज में रीढ़ की हड्डी मानी जाती हैं. &amp;nbsp;इनका इस्तेमाल फेफड़ों, स्तन, सर्वाइकल, ओवेरियन, मुंह और कई अन्य प्रकार के कैंसर के इलाज में किया जाता है. कई मामलों में ये दवाएं मरीज के इलाज का मुख्य हिस्सा होती हैं. लेकिन इस समय देश में इनकी भारी कमी हो गई है. माना जा रहा है कि इस संकट की मुख्य वजह कच्चे माल (API) की कमी, कंपनियों की बढ़ती मैन्युफैक्चरिंग लागत और दुनिया भर में सप्लाई चेन का प्रभावित होना है. साथ ही जानकारों के मुताबिक, पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव और प्लैटिनम की कीमतों में आई भारी तेजी ने इस समस्या को और बढ़ा दिया है. शुरुआत में अस्पतालों ने अपने पुराने स्टॉक से काम चलाया, लेकिन अब वह भी खत्म हो चुका है. डॉक्टरों को मजबूरी में मरीजों के कीमोथेरेपी शेड्यूल और इलाज के तरीकों में बदलाव करना पड़ रहा है, जो मरीजों के ठीक होने की संभावनाओं के लिहाज से बेहद चिंताजनक है.&amp;nbsp;
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डॉक्टरों और विशेषज्ञों के बयानों पर केंद्रित पैराग्राफ फॉर्मेट
दवाओं की इस कमी से देश के बड़े अस्पतालों में स्थिति बेहद गंभीर हो चुकी है. दिल्ली के एम्स (AIIMS) के सर्जिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. एमडी रे ने बताया कि इन जरूरी दवाओं के न मिलने से कैंसर रोगियों का पूरा ट्रीटमेंट प्लान बिगड़ सकता है, जिससे मरीजों का सर्वाइवल रेट पर बुरा असर पड़ सकता है और बीमारी दोबारा लौटने का खतरा बढ़ जाता है. &amp;nbsp;वहीं, सर गंगा राम अस्पताल के मेडिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के अध्यक्ष डॉ. श्याम गर्ग ने चेतावनी देते हुए कहा है कि स्थिति इतनी गंभीर है कि अस्पताल में मुश्किल से केवल एक या दो दिन का ही स्टॉक बचा है. &amp;nbsp;
मरीजों और परिवारों के लिए सबसे जरूरी बात
डॉक्टरों का कहना है कि मरीजों को घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन सतर्क रहना जरूरी है. &amp;nbsp;यदि किसी मरीज का इलाज इन दवाओं से चल रहा है तो उसे अपने डॉक्टर के संपर्क में रहना चाहिए और दवा की उपलब्धता को लेकर समय-समय पर जानकारी लेते रहना चाहिए. किसी भी स्थिति में बिना डॉक्टर की सलाह के इलाज में बदलाव नहीं करना चाहिए.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Sun, 07 Jun 2026 13:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Cancer, Drug, Shortage:, कैंसर, मरीजों, के, लिए, बढ़ी, चिंता, जरूरी, कीमो, दवाओं, की, कमी, से, इलाज, पर, मंडराया, संकट</media:keywords>
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        <title>Food Safety: खाने की थाली बन रही मौत की वजह! खराब फूड से हर साल 15 लाख बच्चों की मौत, WHO ने जारी की रिपोर्ट</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/food-safety-खाने-की-थाली-बन-रही-मौत-की-वजह-खराब-फूड-से-हर-साल-15-लाख-बच्चों-की-मौत-who-ने-जारी-की-रिपोर्ट</link>
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        <description><![CDATA[ Food Safety : विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की एक नई रिपोर्ट ने फूड सेफ्टी को लेकर चौंकाने वाले आंकड़े सामने रखे हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, गंदे और खराब खाने की वजह से हर साल लाखों लोग बीमार पड़ रहे हैं, जबकि बड़ी संख्या में लोगों की जान भी जा रही है. वहीं सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि छोटे बच्चे इस खतरे का सबसे बड़ा शिकार बन रहे हैं. पांच साल से कम उम्र के बच्चों में खराब खाने से होने वाली बीमारियों का खतरा बड़े बच्चों और एडल्ट्स की तुलना में लगभग तीन गुना ज्यादा है. दुनिया की कुल आबादी में इन बच्चों की हिस्सेदारी केवल 9 प्रतिशत है, लेकिन फूड बोर्न डिजीज के करीब एक-तिहाई मामले इन्हीं से जुड़े हैं.&amp;nbsp;
छोटे बच्चों पर सबसे ज्यादा खतरा क्यों है?
WHO की रिपोर्ट के अनुसार, छोटे बच्चों का इम्यून सिस्टम पूरी तरह ग्रो नहीं होता है. यही वजह है कि खराब खाने में मौजूद बैक्टीरिया, वायरस और परजीवियों से जल्दी प्रभावित हो जाते हैं. खराब खाने की वजह से होने वाली कई बीमारियां डायरिया से जुड़ी होती हैं. छोटे बच्चों के लिए डायरिया जानलेवा साबित हो सकता है, क्योंकि इससे शरीर में पानी और जरूरी पोषक तत्वों की कमी हो जाती है.&amp;nbsp;
2021 में करोड़ों लोग हुए बीमार
रिपोर्ट के अनुसार, सिर्फ साल 2021 में खराब खाने की वजह से दुनिया भर में करीब 86.6 करोड़ लोग बीमार पड़े. वहीं लगभग 15 लाख लोगों की मौत हो गई. विशेषज्ञों का मानना है कि इनमें से बड़ी संख्या में मौतों और बीमारियों को रोका जा सकता था. अगर साफ पानी उपलब्ध हो, खाने को सही तरीके से तैयार और स्टोर किया जाए, साफ-सफाई का ध्यान रखा जाए और समय पर इलाज मिल जाए तो इस खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है.&amp;nbsp;
खाने में मौजूद केमिकल हैं इतने खतरनाक&amp;nbsp;
अक्सर लोग सोचते हैं कि खराब खाने का मतलब सिर्फ बैक्टीरिया या वायरस से संक्रमण है, लेकिन WHO ने चेतावनी दी है कि खाने में मौजूद कुछ केमिकल भी बेहद खतरनाक हो सकते हैं, सीसा (Lead) और मिथाइलमरकरी जैसे केमिकल बच्चों के ग्रो हो रहे दिमाग को नुकसान पहुंचा सकते हैं. इससे बच्चों के मानसिक विकास, सीखने की क्षमता और तंत्रिका तंत्र पर लंबे समय तक असर पड़ सकता है. विशेषज्ञों का कहना है कि केमिकल प्रदूषण को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है, जबकि इसके प्रभाव कई बार लाइफटाइम बने रह सकते हैं.&amp;nbsp;
फूड बोर्न डिजीज हुई मौतों में केमिकल सबसे बड़ा कारण कैसे है?
रिपोर्ट में बताया गया है कि खाने से जुड़ी बीमारियों के ज्यादातर मामले बैक्टीरिया, वायरस और परजीवियों की वजह से होते हैं, लेकिन मौतों के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार केमिकल प्रदूषण है. 2021 में खराब खाने से जुड़ी कुल मौतों में लगभग 73 प्रतिशत हिस्सेदारी केमिकल खतरों की रही. इनमें अकार्बनिक आर्सेनिक (Inorganic Arsenic) और सीसा सबसे बड़े कारण रहे. ये दोनों तत्व हार्ट डिजीज स्ट्रोक और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ाते हैं. WHO के अनुसार, फूड बोर्न डिजीज हुई मौतों में करीब 42 प्रतिशत मामलों का संबंध अकार्बनिक आर्सेनिक से था, जबकि 31 प्रतिशत मौतें सीसे के संपर्क से जुड़ी थीं.&amp;nbsp;
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WHO ने क्या कहा?
WHO &amp;nbsp;ने कहा कि फूड सेफ्टी कोई सामान्य मुद्दा नहीं है. यह हर फैमिली और हर दिन के खाने से जुड़ा हुआ विषय है. उन्होंने कहा कि खराब खाना लंबे समय से पब्लिक हेल्थ के लिए बड़ी चुनौती रहा है, लेकिन अब सामने आए नए आंकड़े यह दिखाते हैं कि इसका इंसानों और अर्थव्यवस्था पर कितना बड़ा असर पड़ रहा है. रिपोर्ट में दुनिया के कई क्षेत्रों के बीच बड़ी असमानता भी सामने आई है, हालांकि साल 2000 के बाद से फूड बोर्न डिजीज का कुल बोझ कुछ कम हुआ है, लेकिन अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया आज भी सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्रों में शामिल हैं. दुनिया भर में होने वाली लगभग 75 प्रतिशत फूड बोर्न डिजीज और करीब 60 प्रतिशत मौतें इन्हीं क्षेत्रों में दर्ज की गई हैं. खराब खाने असर सिर्फ स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है. WHO के अनुसार, 2021 में खराब खाने की वजह से वैश्विक अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान हुआ. बीमारी के कारण लोगों के काम न कर पाने से दुनिया को लगभग 310 अरब अमेरिकी डॉलर की प्रोडक्टिवीटी का नुकसान हुआ.&amp;nbsp;
आगे और बढ़ सकती है चुनौती
WHO का कहना है कि जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण प्रदूषण और एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति बढ़ता Antimicrobial Resistance आगे फूड सेफ्टी की चुनौती को और मुश्किल बना सकता है. रिपोर्ट में 2000 से 2021 के बीच 194 देशों में 42 प्रमुख फूड खतरों का अध्ययन किया गया. इसमें बैक्टीरिया, वायरस, परजीवी और रासायनिक प्रदूषकों को शामिल किया गया था. विशेषज्ञों का मानना है कि बेहतर आंकड़ों और निगरानी व्यवस्था की मदद से देश फूड सेफ्टी से जुड़े सबसे बड़े खतरों की पहचान कर सकते हैं और समय रहते जरूरी कदम उठा सकते हैं.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 07 Jun 2026 13:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>Hidden Cholesterol Marker: क्या कोलेस्ट्रॉल नॉर्मल होने पर भी आ सकता है हार्ट अटैक? एक्सपर्ट से जानें</title>
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        <description><![CDATA[ Hidden Cholesterol Marker: बदलती लाइफस्टाइल के चलते हमें हार्ट से जुड़ी तमाम तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. ऐसे में &amp;nbsp;हार्ट की सेहत की बात होती है तो आमतौर पर लोग एलडीएल, एचडीएल और ट्राइग्लिसराइड जैसे कोलेस्ट्रॉल के आंकड़ों पर ध्यान देते हैं. ज्यादातर लोग मानते हैं कि अगर उनकी कोलेस्ट्रॉल रिपोर्ट नॉर्मल है तो उनका दिल पूरी तरह सुरक्षित है. लेकिन हाल के वर्षों में कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां लोगों को कम उम्र में हार्ट अटैक आया, जबकि उनकी सामान्य कोलेस्ट्रॉल रिपोर्ट में कोई बड़ी गड़बड़ी नहीं थी. यही वजह है कि अब डॉक्टर केवल LDL, HDL और ट्राइग्लिसराइड्स पर ही ध्यान नहीं दे रहे हैं, बल्कि कुछ ऐसे छिपे हुए जोखिमों की भी जांच करने की सलाह दे रहे हैं जो सामान्य टेस्ट में नजर नहीं आते. एक्सपर्ट्स का कहना है कि कई बार शरीर के अंदर ऐसी समस्याएं मौजूद होती हैं जो रिपोर्ट में नहीं दिखतीं, लेकिन दिल की सेहत पर गंभीर असर डाल सकती हैं.&amp;nbsp;
क्या है Lp(a), जिसे बताया जा रहा है छिपा हुआ खतरा?
डॉक्टरों के अनुसार Lipoprotein(a) या Lp(a) एक खास तरह का कोलेस्ट्रॉल कण होता है, जो दिखने में LDL यानी बैड कोलेस्ट्रॉल जैसा होता है, लेकिन इसमें एक अतिरिक्त प्रोटीन जुड़ा होता है. यही वजह है कि यह रक्त नलिकाओं में चर्बी जमा होने की प्रक्रिया को तेज कर सकता है. सबसे बड़ी बात यह है कि सामान्य लिपिड प्रोफाइल टेस्ट में Lp(a) की जांच नहीं की जाती. ऐसे में किसी व्यक्ति की कोलेस्ट्रॉल रिपोर्ट सामान्य आ सकती है, लेकिन फिर भी उसके दिल को खतरा बना रह सकता है.&amp;nbsp;
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बढ़ रहे हैं हार्ट अटैक के मामले
भारत में डॉक्टरों को एक चिंताजनक ट्रेंड दिखाई दे रहा है. कई लोग जिनकी कोलेस्ट्रॉल रिपोर्ट सामान्य होती है, वे भी 30 से 40 की उम्र में हार्ट अटैक का शिकार हो रहे हैं. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ का मानना है कि इसके पीछे जेनेटिक कारणों से बढ़ा हुआ Lp(a) लेवल एक अहम वजह हो सकता है. यह फैक्टर ज्यादातर जेनेटिक्स से प्रभावित होता है, इसलिए डाइट या एक्सरसाइज का इस पर सीमित असर पड़ता है.
भारत में तेजी से बढ़ रहे हैं मामले
एक्सपर्ट के अनुसार भारत में समय से पहले दिल की बीमारी के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. कई रिपोर्टों में बताया गया है कि देश में होने वाली कुल मौतों का बड़ा हिस्सा हार्ट रोगों से जुड़ा है. चिंता की बात यह है कि कई मरीजों में हार्ट अटैक पश्चिमी देशों की तुलना में 10 से 15 साल पहले हो रहा है. जेनेटिक प्रवृत्ति, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, अनएक्टिव लाइफस्टाइल और छिपे हुए लिपिड मार्कर जैसे Lp(a) इस जोखिम को बढ़ा सकते हैं.
डॉक्टरों का कहना है कि जिन लोगों के परिवार में कम उम्र में हार्ट अटैक, स्ट्रोक या दिल की बीमारी के मामले रहे हों, उन्हें कम से कम एक बार Lp(a) टेस्ट जरूर करवाना चाहिए. इसके अलावा हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, मोटापा और खराब लाइफस्टाइल वाले लोगों को भी दिल की जांच को गंभीरता से लेना चाहिए. हालांकि Lp(a) को सीधे कम करना आसान नहीं माना जाता, लेकिन इसकी जानकारी होने पर दूसरे जोखिमों जैसे LDL कोलेस्ट्रॉल, ब्लड प्रेशर और ब्लड शुगर को बेहतर तरीके से कंट्रोल किया जा सकता है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Sun, 07 Jun 2026 13:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>Home Remedies for Phlegm: इन तीन घरेलू नुस्खों से एक बार में निकल जाएगा फेफड़ों में जमा कफ, यहां जानिए</title>
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        <description><![CDATA[ Home Remedies for Phlegm: इन तीन घरेलू नुस्खों से एक बार में निकल जाएगा फेफड़ों में जमा कफ, यहां जानिए ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 07 Jun 2026 01:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>Pneumonia Vaccine: उम्र 50 पार और बार&amp;बार रहता है खांसी&amp;जुकाम? जान लें कब है निमोनिया वैक्सीन की जरूरत</title>
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        <description><![CDATA[ Who Should Get The Pneumonia Vaccine: निमोनिया एक गंभीर इंफेक्शन है, जो लंग्स को प्रभावित करता है और कई बार जानलेवा भी साबित हो सकता है. इससे बचाव के लिए डॉक्टर निमोनिया वैक्सीन, जिसे न्यूमोकोकल वैक्सीन भी कहा जाता है, लगवाने की सलाह देते हैं. यह वैक्सीन स्ट्रेप्टोकोकस न्यूमोनिए नामक बैक्टीरिया से होने वाले इंफेक्शन से सुरक्षा प्रदान करती है. यही बैक्टीरिया निमोनिया के अलावा कान, साइनस और खून से जुड़े गंभीर इंफेक्शन का कारण भी बन सकता है.
दो तरह के वैक्सीन उपलब्ध
वर्तमान में न्यूमोकोकल वैक्सीन के दो प्रमुख प्रकार उपलब्ध हैं. पहला है न्यूमोकोकल कंजुगेट वैक्सीन, जिसमें PCV15, PCV20 और PCV21 शामिल हैं. दूसरा है न्यूमोकोकल पॉलीसैकराइड वैक्सीन. इनका उपयोग व्यक्ति की उम्र और स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार किया जाता है. हालांकि यह वैक्सीन हर प्रकार के निमोनिया को पूरी तरह नहीं रोक सकती, लेकिन इंफेक्सन का खतरा काफी हद तक कम कर देती है. यदि वैक्सीन लगवाने के बाद भी किसी व्यक्ति को निमोनिया हो जाए, तो बीमारी आमतौर पर कम गंभीर होती है.
किन लोगों को लगवानी चाहिए वैक्सीन?
अमेरिका के सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन &amp;nbsp;की सलाह के अनुसार 50 वर्ष या उससे अधिक उम्र के लोगों को यह वैक्सीन जरूर लगवानी चाहिए. इसके अलावा 5 साल से कम उम्र के बच्चों, कमजोर इम्यून सिस्टम वाले लोगों और कुछ पुरानी बीमारियों से जूझ रहे मरीजों को भी इसकी आवश्यकता हो सकती है.&amp;nbsp;
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किन लोगों को होता है इसका सबसे ज्यादा खतरा?
एक्सपर्ट के मुताबिक, हार्ट रोग, सिकल सेल डिजीज, क्रोनिक लिवर डिजीज, डायबिटीज, अस्थमा, एम्फायसीमा और क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज जैसी बीमारियों से पीड़ित लोगों में निमोनिया का खतरा अधिक होता है. इसी तरह कीमोथेरेपी कराने वाले मरीज, अंग प्रत्यारोपण करा चुके लोग और एचआईवी/एड्स से इंफेक्टेड व्यक्ति भी उच्च जोखिम वाली कैटेगरी में आते हैं. स्मोकिंग करने वालों और अत्यधिक शराब का सेवन करने वालों में भी इंफेक्शन का खतरा बढ़ जाता है, क्योंकि इन आदतों का असर शरीर की इम्यून सिस्टम पर असर पर पड़ता है.
क्या हर साल लगती है वैक्सीन?
निमोनिया वैक्सीन की सबसे अच्छी बात यह है कि इसे फ्लू वैक्सीन की तरह हर साल नहीं लगवाना पड़ता. अधिकांश लोगों के लिए एक बार लगवाई गई वैक्सीन लंबे समय तक सुरक्षा प्रदान करती है. हालांकि 65 वर्ष से अधिक उम्र के कुछ लोगों और विशेष स्वास्थ्य स्थितियों वाले मरीजों को अतिरिक्त डोज की जरूरत पड़ सकती है. इस बारे में डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है. बच्चों के लिए यह वैक्सीन चार डोज में दी जाती है. आमतौर पर 2, 4, 6 और 12 से 15 महीने की उम्र में इसके डोज लगाए जाते हैं. यदि किसी बच्चे का टीकाकरण समय पर पूरा नहीं हुआ है, तो डॉक्टर की सलाह के अनुसार बाद में भी इसे पूरा किया जा सकता है.
क्या होते हैं इसके साइड इफेक्ट्स?
जहां तक साइड इफेक्ट्स की बात है, वे आमतौर पर हल्के होते हैं. इंजेक्शन वाली जगह पर दर्द, सूजन या लालिमा, हल्का बुखार, भूख कम लगना और मांसपेशियों में दर्द जैसी शिकायतें हो सकती हैं. गंभीर एलर्जी की प्रतिक्रिया बहुत रेयर होती है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 06 Jun 2026 09:30:06 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Rotten Mangoes: सावधान! मार्केट में बिक रहा सड़े और कीड़ों वाले आम का जूस, हो सकती है ये गंभीर बीमारी</title>
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        <description><![CDATA[ Rotten Mangoes: सावधान! मार्केट में बिक रहा सड़े और कीड़ों वाले आम का जूस, हो सकती है ये गंभीर बीमारी ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 05 Jun 2026 20:30:14 +0530</pubDate>
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        <title>Frozen Dessert Health Risks: जानें सेहत के लिए कैसे नुकसानदेह है फ्रोजन डेजर्ट, न्यूट्रिशनिस्ट ने दी बड़ी चेतावनी</title>
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        <description><![CDATA[ Why Frozen Desserts Are Harmful To Health: गर्मी के मौसम में आइसक्रीम और फ्रोजन डेजर्ट की मांग तेजी से बढ़ जाती है. लेकिन हाल ही में क्वालिटी वॉल्स ने अपने उत्पादों में पाम ऑयल की जगह डेयरी आधारित सामग्री इस्तेमाल करने की घोषणा ने एक बार फिर इस बहस को तेज कर दिया है कि आखिर फ्रोजन डेजर्ट और असली आइसक्रीम में क्या अंतर है और क्या फ्रोजन डेजर्ट वास्तव में सेहत के लिए नुकसानदेह हो सकते हैं.
क्या है मामला?
क्वालिटी वॉल्स ने घोषणा की है कि वह 2027 तक अपने पूरे पोर्टफोलियो को पाम ऑयल आधारित फॉर्मूले से हटाकर दूध आधारित उत्पादों में बदलने की योजना बना रही है. कंपनी का यह कदम ऐसे समय में आया है जब उपभोक्ताओं के बीच खाद्य उत्पादों की क्वालिटी और सामग्री को लेकर जागरूकता बढ़ रही है. एक्सपर्ट का मानना है कि इस फैसले से पूरे फ्रोजन डेजर्ट उद्योग पर असर पड़ सकता है.
क्यों यह हमारे लिए नुकसानदायक?
एक रिपोर्ट के अनुसार, न्यूट्रिशनिस्ट मैक सिंह के अनुसार, आज की पीढ़ी पारंपरिक कुल्फी और घर में बनने वाली ठंडी मिठाइयों से दूर होकर फ्रोजन डेजर्ट की ओर बढ़ रही है. हालांकि, उनके मुताबिक इन उत्पादों में इस्तेमाल होने वाली कई सामग्रियां स्वास्थ्य के लिए चिंता का कारण बन सकती हैं. रिपोर्ट के अनुसार, मैक सिंह बताते हैं कि फ्रोजन डेजर्ट में अक्सर पाम ऑयल का इस्तेमाल किया जाता है, जिसमें सैचुरेटेड फैट की मात्रा अधिक होती है. ज्यादा मात्रा में इसका सेवन हृदय स्वास्थ्य पर निगेटिव प्रभाव डाल सकता है और खराब कोलेस्ट्रॉल के स्तर को बढ़ा सकता है. इससे धमनियों में रुकावट का खतरा भी बढ़ सकता है.
मैक सिंह यह भी बताते हैं कि कई फ्रोजन डेजर्ट में असली दूध की जगह मिल्क सॉलिड्स या होल मिल्क पाउडर का उपयोग किया जाता है. उनका कहना है कि इनमें ऑक्सीडाइज्ड कोलेस्ट्रॉल मौजूद हो सकता है, जो ब्लड बेसल्स को नुकसान पहुंचाने और हृदय रोगों का जोखिम बढ़ाने से जुड़ा माना जाता है. यही वजह है कि ऐसे उत्पादों का नियमित सेवन स्वास्थ्य एक्सपर्ट की तरफ से उचित नहीं माना जाता.&amp;nbsp;
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फ्रोजन डेजर्ट में लिक्विड ग्लूकोज का भी इस्तेमाल
इसके अलावा फ्रोजन डेजर्ट में लिक्विड ग्लूकोज का भी इस्तेमाल किया जाता है, जो चीनी का एक प्रोसेस्ड रूप है. स्वाद और रंग को आकर्षक बनाने के लिए इनमें सिंथेटिक फ्लेवर और आर्टिफिशियल रंग भी मिलाए जाते हैं. कई उत्पादों में वेजिटेबल सोया प्रोटीन, स्टेबलाइजर्स, इमल्सीफायर्स और अन्य एडिटिव्स भी शामिल होते हैं. यही कारण है कि इन्हें अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड की श्रेणी में रखा जाता है.
कई शो में यह भी सामने आया है कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों का अधिक सेवन मोटापा, डायबिटीज, हार्ट रोग और खराब आंत हेल्थ जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ा सकता है. &amp;nbsp;एक्सपर्ट का कहना है कि जब लोग ऐसे उत्पादों पर अधिक निर्भर हो जाते हैं, तो वे पोषक तत्वों से भरपूर नेचुरल खाद्य पदार्थों का सेवन कम कर देते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 05 Jun 2026 20:30:13 +0530</pubDate>
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        <title>Exercise And Fertility: ज्यादा एक्सरसाइज से महिला&amp;पुरुषों में घट सकती है फर्टिलिटी, डॉक्टर ने दी बड़ी चेतावनी</title>
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        <description><![CDATA[ Can Excessive Exercise Affect Fertility: आजकल फिटनेस सिर्फ सेहत तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह एक लाइफस्टाइल और सोशल मीडिया ट्रेंड बन चुकी है. सिक्स-पैक एब्स, तेजी से वजन घटाने की चुनौतियां, मैराथन ट्रेनिंग और सख्त डाइट प्लान्स लोगों को आकर्षित कर रहे हैं. हालांकि रेगुलर एक्सरसाइज शरीर के लिए बेहद फायदेमंद है, लेकिन एक्सपर्ट का कहना है कि जब फिटनेस जुनून में बदल जाती है, तब इसका असर शरीर के कई महत्वपूर्ण कार्यों पर पड़ सकता है, जिसमें रिप्रोडक्टिवन क्षमता भी शामिल है.&amp;nbsp;
रिप्रोडक्टिव सिस्टम पर क्यों पड़ता है असर?
एक्सपर्ट के मुताबिक हमारा शरीर बेहद समझदार तरीके से काम करता है. जब उसे लगता है कि शरीर पर जरूरत से ज्यादा शारीरिक दबाव पड़ रहा है या ऊर्जा की कमी हो रही है, तो वह सबसे पहले उन प्रक्रियाओं को धीमा करना शुरू कर देता है जो जीवित रहने के लिए तुरंत जरूरी नहीं हैं. ऐसे में रिप्रोडक्टिव सिस्टम सबसे पहले प्रभावित होने वाले हिस्सों में से एक हो सकती है.
सही तरीके से किए गए एक्सरसाइज के क्या होते हैं फायदे?
डॉ. क्षितिज मुर्दिया ने TOI को बताया कि कि नियमित और संतुलित एक्सरसाइज कई तरह से फायदेमंद होता है. इससे मेटाबॉलिज्म बेहतर होता है, हार्मोन संतुलित रहते हैं और संपूर्ण स्वास्थ्य में सुधार आता है. खासकर मोटापा, डायबिटीज और अन्य लाइफस्टाइल समस्याओं से जूझ रहे लोगों में मध्यम स्तर का व्यायाम प्रजनन क्षमता को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है.
कब होने लगती है लोगों को दिक्कत?
समस्या तब शुरू होती है जब लोग ज्यादा एक्सरसाइज, सख्त डाइटिंग और फिटनेस लक्ष्यों का पीछा करने लगते हैं. डॉ. क्षितिज मुर्दिया के अनुसार, जरूरत से ज्यादा एक्सरसाइज और पर्याप्त आराम की कमी शरीर को लगातार तनाव की स्थिति में रखती है. लंबे समय तक ऐसा होने पर हार्मोनल संतुलन बिगड़ सकता है और प्रजनन क्षमता प्रभावित हो सकती है.
महिलाओं में क्या होता है असर?
अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ &amp;nbsp;से जुड़े रिसर्च भी बताते हैं कि अत्यधिक व्यायाम और कम ऊर्जा उपलब्धता &amp;nbsp;रिप्रोडक्टिव में प्रजनन हार्मोन और पीरियड्स को प्रभावित कर सकती है. जब शरीर को पर्याप्त कैलोरी नहीं मिलती, तो ब्रेन यह संकेत मान लेता है कि संसाधनों की कमी है। इसके बाद वह &amp;nbsp;रिप्रोडक्टिव से जुड़े हार्मोनों का उत्पादन कम कर सकता है.
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महिलाओं में इसका सबसे पहला संकेत अनियमित पीरियड्स या पीरियड्स का पूरी तरह बंद हो जाना हो सकता है. कई महिलाएं इसे फिटनेस की उपलब्धि समझ लेती हैं, जबकि यह शरीर के लिए चेतावनी का संकेत हो सकता है. डॉ. क्षितिज मुर्दिया बताते हैं कि ऐसी स्थिति में शरीर गर्भधारण के लिए खुद को तैयार नहीं मानता और ओव्यूलेशन की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है.&amp;nbsp;
पुरुषों में क्या होती है दिक्कत?
यह समस्या केवल महिलाओं तक सीमित नहीं है. पुरुषों में भी जरूरत से ज्यादा व्यायाम टेस्टोस्टेरोन के स्तर को कम कर सकता है. इसके अलावा ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और सूजन बढ़ने से स्पर्म की गुणवत्ता पर असर पड़ सकता है, जिससे प्रजनन क्षमता कमजोर हो सकती है. एक्सपर्ट का मानना है कि फिटनेस और फर्टिलिटी एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं. जरूरी है कि एक्सरसाइज संतुलित हो, पर्याप्त पोषण लिया जाए, नींद पूरी हो और शरीर को रिकवरी का समय मिले.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 05 Jun 2026 04:30:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Exercise, And, Fertility:, ज्यादा, एक्सरसाइज, से, महिला-पुरुषों, में, घट, सकती, है, फर्टिलिटी, डॉक्टर, ने, दी, बड़ी, चेतावनी</media:keywords>
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        <title>Financial Education For Children: बच्चों को बचपन से सिखाएं बचत का ये फॉर्मूला, कभी नहीं करेंगे फालतू फिजूलखर्ची</title>
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        <description><![CDATA[ How To Teach Children The Value Of Money: आज के दौर में पैसा खर्च करने के बहाने पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गए हैं. ऑनलाइन शॉपिंग, इंस्टेंट डिलीवरी और एक क्लिक पर मिलने वाली सुविधाओं ने खरीदारी को बेहद आसान बना दिया है. हालांकि यह सुविधा लोगों की जिंदगी को आसान बनाती है, लेकिन इसके कारण इंतजार करने और किसी लक्ष्य के लिए मेहनत करने की आदत भी कम होती जा रही है. बच्चों के लिए यह चुनौती और भी बड़ी है, क्योंकि वे अक्सर तुरंत मिलने वाली चीजों को ही प्राथमिकता देते हैं. एक्सपर्ट का मानना है कि ऐसी आदतें आगे चलकर आवेग में खरीदारी करने और फाइनेंशियल रूप से कमजोर बनने का कारण बन सकती हैं.
यही वजह है कि माता-पिता के लिए बच्चों को कम उम्र से ही पैसों की समझ देना और लक्ष्य तय करना सिखाना बेहद जरूरी हो जाता है. यह सीख केवल आर्थिक मामलों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि भविष्य में रिश्तों, करियर और जीवन के अन्य महत्वपूर्ण निर्णयों में भी मददगार साबित होती है.&amp;nbsp;
बच्चों को सीखाने का सबसे आसान तरीका
बच्चों को बचत के लिए प्रेरित करने का सबसे आसान तरीका है उन्हें कोई सार्थक लक्ष्य देना. जब बच्चे के मन में कोई खास खिलौना, साइकिल या पसंदीदा वस्तु होती है, तो वह उसे पाने के लिए बचत करने के लिए अधिक प्रेरित होता है. माता-पिता बच्चों को यह समझा सकते हैं कि हर इच्छा तुरंत पूरी नहीं होती और कुछ चीजों के लिए इंतजार करना पड़ता है. इससे बच्चों में धैर्य और जिम्मेदारी की भावना विकसित होती है.
जरूरत और इच्छा के बीच का अंतर
इसके साथ ही बच्चों को जरूरत और इच्छा के बीच का अंतर समझाना भी बेहद जरूरी है. जरूरतें वे चीजें होती हैं जो रोजमर्रा की जिंदगी के लिए आवश्यक हैं, जबकि इच्छाएं वे होती हैं जो खुशी तो देती हैं लेकिन उनके बिना भी काम चल सकता है. उदाहरण के तौर पर किराने की खरीदारी के दौरान माता-पिता बच्चों से पूछ सकते हैं कि कौन-सी चीज जरूरी है और कौन-सी बाद में भी खरीदी जा सकती है. इससे बच्चों में पैसों की सही कीमत समझने की आदत विकसित होती है.&amp;nbsp;
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पॉकेट मनी को लेकर क्या करें
पॉकेट मनी भी बच्चों को आर्थिक जिम्मेदारी सिखाने का एक प्रभावी माध्यम बन सकती है. यदि सही तरीके से उपयोग किया जाए तो यह केवल खर्च करने के लिए दिया गया पैसा नहीं, बल्कि एक सीखने का अवसर बन जाता है. पॉकेट मनी के जरिए बच्चे अपने फैसले खुद लेना सीखते हैं और उनके परिणाम भी समझते हैं. माता-पिता उन्हें बचत और खर्च के लिए अलग-अलग राशि रखने की आदत डाल सकते हैं.
&amp;nbsp;बचत करना सिखाना सबसे महत्वपूर्ण
एक्सपर्ट के अनुसार, बच्चों को खर्च करने से पहले बचत करना सिखाना सबसे महत्वपूर्ण फाइनेंशियल आदतों में से एक है. जब बच्चे उपहार, इनाम या पॉकेट मनी से मिलने वाले पैसों का कुछ हिस्सा बचाने लगते हैं, तो वे धीरे-धीरे समझते हैं कि छोटी-छोटी बचत भविष्य में बड़े फायदे दे सकती है. यही आदत उन्हें लक्ष्य तय करने, धैर्य रखने और समझदारी से आर्थिक निर्णय लेने में मदद करती है.
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        <pubDate>Wed, 03 Jun 2026 23:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Financial, Education, For, Children:, बच्चों, को, बचपन, से, सिखाएं, बचत, का, ये, फॉर्मूला, कभी, नहीं, करेंगे, फालतू, फिजूलखर्ची</media:keywords>
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        <title>Blue Bruises On Body: कोई चोट नहीं लगी फिर भी शरीर पर दिख रहे नीले निशान, क्या ये किसी बीमारी का संकेत?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/blue-bruises-on-body-कोई-चोट-नहीं-लगी-फिर-भी-शरीर-पर-दिख-रहे-नीले-निशान-क्या-ये-किसी-बीमारी-का-संकेत</link>
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        <description><![CDATA[ Causes Of Random Bruises On The Body: कई बार ऐसा होता है कि शरीर पर अचानक नीले या बैंगनी रंग के निशान दिखाई देने लगते हैं और व्यक्ति को याद भी नहीं रहता कि उसे कहीं चोट लगी हो. अक्सर लोग इसे सामान्य बात समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन कुछ मामलों में यह शरीर की किसी अंदरूनी समस्या का संकेत भी हो सकता है. इसलिए बार-बार बिना कारण पड़ने वाले निशानों को हल्के में लेना सही नहीं है. चलिए आपको इसके बारे में बताते हैं.&amp;nbsp;
क्यों पड़ते हैं निशान?
हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली बेवसाइट healthline की रिपोर्ट के अनुसार, &amp;nbsp;एक्सपर्ट के अनुसार, कभी-कभी बहुत ज्यादा शारीरिक मेहनत या भारी एक्सरसाइज करने से भी त्वचा के नीचे मौजूद छोटी- छोटी ब्लड वेसल्स प्रभावित हो सकती हैं. मसल्स पर अधिक दबाव पड़ने से ये नसें फट जाती हैं और त्वचा के नीचे खून जमा होने लगता है, जिससे नीले निशान बन जाते हैं. ऐसे मामलों में व्यक्ति को चोट का एहसास नहीं होता, लेकिन निशान दिखाई दे सकते हैं.&amp;nbsp;
दवा भी हो सकता है कारण
कुछ दवाएं भी इसकी वजह बन सकती हैं. खासतौर पर ब्लड थिनर, एस्पिरिन, इबुप्रोफेन और नेप्रोक्सेन जैसी दवाएं खून को जमने में अधिक समय लगाती हैं. जब खून सामान्य गति से नहीं जमता तो त्वचा के नीचे उसका रिसाव बढ़ जाता है और आसानी से नीले निशान बनने लगते हैं. अगर किसी नई दवा के बाद यह समस्या शुरू हुई है तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है.&amp;nbsp;
जरूरी पोषक तत्वों की कमी की तरफ इशारा
शरीर में कुछ जरूरी पोषक तत्वों की कमी भी इस समस्या को बढ़ा सकती है. विटामिन C की कमी से त्वचा और ब्लड वेसल्स कमजोर हो सकती हैं, जिससे मामूली दबाव पर भी निशान पड़ जाते हैं. वहीं आयरन की कमी खून की वेसल्स को प्रभावित करती है और विटामिन K की कमी खून के थक्के बनने की प्रक्रिया को धीमा कर सकती है. ऐसे में बिना वजह बार-बार नीले निशान दिखना पोषण संबंधी कमी का संकेत हो सकता है.&amp;nbsp;
ये भी होते हैं जिम्मेदार
इसके अलावा इम्यून थ्रोम्बोसाइटोपेनिया जैसी रेयर बीमारी में शरीर में प्लेटलेट्स की संख्या कम हो जाती है. प्लेटलेट्स खून को जमाने में अहम भूमिका निभाते हैं. इनकी कमी होने पर त्वचा पर अचानक नीले या बैंगनी निशान उभर सकते हैं. कुछ मामलों में बार-बार पड़ने वाले नीले निशान गंभीर बीमारियों जैसे नॉन-हॉजकिन लिम्फोमा या अन्य ब्लड संबंधी दिक्कतों का संकेत भी हो सकते हैं. हालांकि ऐसा कम होता है, लेकिन अगर इसके साथ अत्यधिक थकान, वजन घटना या बार-बार खून बहने जैसी समस्याएं भी हों तो जांच कराना जरूरी हो जाता है.
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कब डॉक्टर को दिखाना चाहिए?
अगर शरीर पर बिना चोट के बार-बार नीले निशान दिखाई दें, निशान का आकार लगातार बढ़ रहा हो, नाक से बार-बार खून आता हो या खून बहना आसानी से बंद न हो रहा हो, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए. सही समय पर जांच कराने से किसी गंभीर बीमारी का पता शुरुआती चरण में लगाया जा सकता है और समय रहते इलाज शुरू किया जा सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 03 Jun 2026 23:30:09 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Heart Disease: इरेक्टाइल डिस्फंक्शन हो सकता है दिल की बीमारी का संकेत, कभी नजरअंदाज न करें ये साइन</title>
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        <description><![CDATA[ Can Erectile Dysfunction Be A Sign Of Heart Disease: उम्र बढ़ने के साथ शरीर कई तरह के संकेत देने लगता है. अक्सर पुरुष थकान, खराब नींद, खर्राटे या यौन स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानियों को सामान्य उम्र बढ़ने का हिस्सा मानकर नजरअंदाज कर देते हैं. लेकिन एक्सपर्ट का कहना है कि ये समस्याएं सिर्फ रोजमर्रा की दिक्कतें नहीं हैं, बल्कि कई बार हार्ट और ब्लड वेसल्स से जुड़ी गंभीर बीमारियों की शुरुआती चेतावनी भी हो सकती हैं.&amp;nbsp;
25 वर्षों का अनुभव रखने वाले कार्डियोथोरेसिक सर्जन डॉ. जेरेमी लंदन ने हाल ही में एक इंस्टाग्राम वीडियो में ऐसे चार संकेतों के बारे में बताया, जिन्हें पुरुष अक्सर हल्के में लेते हैं. उनके मुताबिक, ये लक्षण भविष्य में होने वाली हार्ट संबंधी समस्याओं का संकेत हो सकते हैं.&amp;nbsp;
इरेक्टाइल डिस्फंक्शन को क्यों नहीं लेना चाहिए हल्के में?
सबसे महत्वपूर्ण संकेतों में से एक है इरेक्टाइल डिस्फंक्शन . डॉ. लंदन के अनुसार, इसे केवल यौन हेल्थ की समस्या समझना बड़ी गलती हो सकती है. दरअसल, इरेक्शन से जुड़ी आर्टरीज शरीर की सबसे पतली ब्लड वेसल्स में शामिल होती हैं. जब इनमें ब्लॉकेज या ब्लड फ्लो में कमी आने लगती है, तो इसका असर सबसे पहले यौन स्वास्थ्य पर दिखाई दे सकता है. यही वजह है कि कई बार इरेक्टाइल डिस्फंक्शन, सीने में दर्द या हार्ट अटैक जैसे लक्षण आने से कई साल पहले ही दिल की बीमारी का संकेत दे देता है. एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि यदि अचानक इरेक्टाइल डिस्फंक्शन की समस्या शुरू हो जाए तो केवल दवा लेने के बजाय हार्ट की जांच भी करानी चाहिए.&amp;nbsp;
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लो टेस्टोस्टेरोन भी एक वजह
डॉ. लंदन ने दूसरा महत्वपूर्ण संकेत लो टेस्टोस्टेरोन बताया. बहुत से पुरुष इसे बढ़ती उम्र का सामान्य असर मान लेते हैं, लेकिन उनके अनुसार इसके पीछे पेट के आसपास बढ़ती चर्बी, खराब नींद और फिजिकल एक्टिविटी की कमी जैसी वजहें हो सकती हैं. यदि इन कारणों को समय रहते नियंत्रित कर लिया जाए तो हार्मोनल स्वास्थ्य में सुधार संभव है. इसलिए किसी भी दवा या सप्लीमेंट की ओर बढ़ने से पहले लाइफस्टाइल में बदलाव करना जरूरी है.
कब शुरू करना चाहिए हार्ट का ध्यान रखना?
तीसरा संकेत है दिल की बीमारी का पुरुषों में जल्दी दिखाई देना. डॉ. लंदन बताते हैं कि महिलाओं को मेनोपॉज तक एस्ट्रोजन हार्मोन से हार्ट सुरक्षा मिलती रहती है, जबकि पुरुषों में यह सुरक्षा नहीं होती. यही कारण है कि पुरुषों में हार्ट रोग महिलाओं की तुलना में लगभग एक दशक पहले विकसित हो सकता है. इसलिए हार्ट की सेहत का ध्यान 60 साल की उम्र में नहीं, बल्कि 30 और 40 की उम्र से ही शुरू कर देना चाहिए.&amp;nbsp;
तेज खर्राटे भी एक तरह के सिग्नल
चौथा संकेत है स्लीप एपनिया. अगर किसी व्यक्ति को तेज खर्राटे आते हैं, रात में बार-बार नींद टूटती है या पर्याप्त नींद लेने के बाद भी थकान महसूस होती है, तो यह स्लीप एपनिया का संकेत हो सकता है. डॉ. लंदन चेतावनी देते हैं कि यह स्थिति हाई ब्लड प्रेशर, हार्ट रिद्म की गड़बड़ी और हार्ट पर अतिरिक्त दबाव बढ़ा सकती है. चिंता की बात यह है कि बड़ी संख्या में पुरुष इस समस्या से पीड़ित होते हैं, लेकिन उन्हें इसका पता ही नहीं होता.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 03 Jun 2026 23:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Heart, Disease:, इरेक्टाइल, डिस्फंक्शन, हो, सकता, है, दिल, की, बीमारी, का, संकेत, कभी, नजरअंदाज, न, करें, ये, साइन</media:keywords>
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        <title>Tea And Health: किस उम्र के लोगों को कितनी पीनी चाहिए चाय? बीमार होने से पहले जानें हिसाब&amp;किताब</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/tea-and-health-किस-उम्र-के-लोगों-को-कितनी-पीनी-चाहिए-चाय-बीमार-होने-से-पहले-जानें-हिसाब-किताब</link>
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        <description><![CDATA[ How Much Tea Should Different Age Groups Drink: भारत में सुबह की शुरुआत अक्सर चाय के बिना अधूरी मानी जाती है. किसी को बेड टी पसंद होती है, तो कोई दिनभर में कई कप चाय पी जाता है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आपकी उम्र के हिसाब से कितनी चाय पीना सही है? क्योंकि जरूरत से ज्यादा चाय पीने की आदत धीरे-धीरे शरीर पर बुरा असर डाल सकती है.
चाय में हेल्दी विकल्प
हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली वेबसाइट healthline के अनुसार, चाय में मौजूद कैफीन और दूसरे कंपाउंड्स शरीर को एनर्जी देने के साथ-साथ नुकसान भी पहुंचा सकते हैं, खासकर तब जब इसकी मात्रा जरूरत से ज्यादा हो जाए. हाल के वर्षों में ग्रीन टी को हेल्दी ड्रिंक के तौर पर काफी लोकप्रियता मिली है, क्योंकि इसमें कैटेचिन नाम के एंटीऑक्सीडेंट्स पाए जाते हैं. रिसर्च में इन्हें हार्ट डिजीज, टाइप-2 डायबिटीज और कुछ तरह के कैंसर के खतरे को कम करने से जोड़ा गया है.&amp;nbsp;
स्टडीज के मुताबिक, ग्रीन टी मेटाबॉलिज्म बढ़ाने और फैट बर्निंग में भी मदद कर सकती है. रिसर्च में पाया गया कि नियमित रूप से ग्रीन टी पीने वाले लोगों में वजन कंट्रोल और ओवरऑल हेल्थ बेहतर देखी गई.&amp;nbsp;
एक दिन में कितना चाय पीना चाहिए?
लेकिन सवाल यह है कि कितनी चाय सही मानी जाती है? एक्सपर्ट्स के अनुसार, यह उम्र, हेल्थ कंडीशन और लाइफस्टाइल पर निर्भर करता है. आमतौर पर किशोरों और युवाओं को दिनभर में 1 से 2 कप से ज्यादा कैफीन वाली चाय नहीं पीनी चाहिए. वहीं स्वस्थ वयस्कों के लिए 3 से 5 कप ग्रीन टी तक फायदेमंद मानी गई है. कई स्टडीज में यह मात्रा हेल्थ बेनिफिट्स के लिए बेहतर बताई गई है.
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हमें क्या हो सकता है नुकसान?
हालांकि डॉक्टर चेतावनी देते हैं कि जरूरत से ज्यादा चाय पीना शरीर के लिए नुकसानदायक हो सकता है. बहुत अधिक कैफीन लेने से बेचैनी, नींद की कमी, सिरदर्द, पेट में गड़बड़ी और एंग्जायटी जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं. &amp;nbsp;प्रेग्नेंट महिलाओं को खासतौर पर कैफीन की मात्रा पर ध्यान देने की सलाह दी जाती है. रिसर्च के मुताबिक, जरूरत से ज्यादा कैफीन गर्भावस्था के दौरान जोखिम बढ़ा सकती है. एक्सपर्ट्स मानते हैं कि पूरे दिन में 300 मिलीग्राम से ज्यादा कैफीन नहीं लेना चाहिए.&amp;nbsp;
किन बातों का रखना चाहिए ध्यान?
हेल्थ एक्सपर्ट्स यह भी कहते हैं कि चाय पीने का समय भी मायने रखता है. खाली पेट ज्यादा चाय पीने से एसिडिटी और डइजेशन संबंधी समस्याएं हो सकती हैं. वहीं खाने के तुरंत बाद चाय पीने से शरीर में आयरन का अब्जार्व कम हो सकता है. डॉक्टर्स के मुताबिक, चाय पूरी तरह छोड़ने की जरूरत नहीं है, लेकिन इसकी मात्रा और समय का ध्यान रखना बेहद जरूरी है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 02 Jun 2026 19:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Tea, And, Health:, किस, उम्र, के, लोगों, को, कितनी, पीनी, चाहिए, चाय, बीमार, होने, से, पहले, जानें, हिसाब-किताब</media:keywords>
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        <title>Diabetes Problems: यूपी में शुगर का कहर, हर 5वां पुरुष और 6ठी महिला चपेट में, सर्वे में हुआ चौंकाने वाला खुलासा</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/diabetes-problems-यूपी-में-शुगर-का-कहर-हर-5वां-पुरुष-और-6ठी-महिला-चपेट-में-सर्वे-में-हुआ-चौंकाने-वाला-खुलासा</link>
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        <description><![CDATA[ Obesity And Diabetes Rising Across India: भारत इस समय एक ऐसे हेल्थ संकट का सामना कर रहा है, जहां एक तरफ मोटापा और डायबिटीड तेजी से बढ़ रहे हैं, तो दूसरी ओर कुपोषण अब भी बड़ी चुनौती बना हुआ है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण- एनएफएचएस-6, 2023-24 के ताजा आंकड़े बताते हैं कि देश में पोषण से जुड़ी दो विपरीत समस्याएं एक साथ मौजूद हैं. कई राज्यों में लोग अधिक वजन और मोटापे से जूझ रहे हैं, जबकि उसी आबादी का एक बड़ा हिस्सा अब भी कुपोषण का शिकार है.
मोटापा के मामले में बढोतरी
सर्वे के अनुसार, 15 से 49 वर्ष की आयु वर्ग की 30.7 प्रतिशत महिलाएं और 27.3 प्रतिशत पुरुष अब अधिक वजन या मोटापे की कैटेगरी में आते हैं. एनएफएचएस-5 की तुलना में यह वृद्धि काफी तेज है. खासतौर पर शहरी क्षेत्रों में स्थिति ज्यादा गंभीर दिखाई दे रही है, जहां लगभग 43 प्रतिशत महिलाएं और 36.3 प्रतिशत पुरुष मोटापे या अधिक वजन से प्रभावित हैं.&amp;nbsp;
मैलोन्यूट्रिशन की समस्या भी बढ़ी
दूसरी तरफ, कुपोषण की समस्या खत्म होने के बजाय और बढ़ती दिखाई दे रही है. रिपोर्ट के मुताबिक, देश में लगभग हर पांचवां एडल्ट अब भी कम वजन की श्रेणी में आता है. पुरुषों में कम वजन की दर 16.2 प्रतिशत से बढ़कर 19.7 प्रतिशत हो गई है, जबकि महिलाओं में यह 18.7 प्रतिशत से बढ़कर 19.7 प्रतिशत तक पहुंच गई है. यह स्थिति बताती है कि पोषण संबंधी असमानताएं अभी भी बरकरार हैं.&amp;nbsp;
डायबिटीज के मामले भी बढ़े
एनएफएचएस-6 ने डायबिटीज को लेकर भी चिंता बढ़ा दी है. 15 वर्ष से अधिक उम्र की 17.8 प्रतिशत महिलाओं में ब्लड शुगर का स्तर सामान्य से अधिक पाया गया या वे डायबिटीज की दवा ले रही थीं. पुरुषों में यह आंकड़ा 20.9 प्रतिशत दर्ज किया गया, यानी हर पांचवां पुरुष डायबिटीज या उससे जुड़ी दवाओं पर निर्भर है. यह संख्या पिछले सर्वेक्षण की तुलना में काफी बढ़ी है. रिपोर्ट में कई राज्यों में स्थिति और अधिक चिंताजनक दिखाई दी. पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और तमिलनाडु में मोटापे के मामलों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है. वहीं बिहार, झारखंड, राजस्थान, असम, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में कुपोषण की समस्या बढ़ती हुई दिखाई दी. उत्तर प्रदेश में भी मोटापा, कुपोषण और डायबिटीज तीनों के मामलों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है.&amp;nbsp;
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उत्तर प्रदेश की क्या स्थिति
राज्य में डायबिटीज की रफ्तार राष्ट्रीय औसत से कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ रही है. हालात ऐसे हैं कि अब प्रदेश का लगभग हर पांचवां पुरुष और हर छठी महिला डायबिटीज से प्रभावित है. सर्वे के मुताबिक, पूरे देश में महिलाओं के बीच मधुमेह बढ़ने की दर 4.3 प्रतिशत दर्ज की गई है, लेकिन उत्तर प्रदेश में यह आंकड़ा 5.5 प्रतिशत तक पहुंच चुका है. पुरुषों में भी स्थिति चिंताजनक है. जहां राष्ट्रीय स्तर पर वृद्धि दर 5.3 प्रतिशत है, वहीं उत्तर प्रदेश में यह करीब 8 प्रतिशत दर्ज की गई है.&amp;nbsp;
हाई बीपी के मामलों में गिरावट
बीपी के मामलों में कुछ राहत जरूर देखने को मिली है. महिलाओं और पुरुषों दोनों में हाई बीपी की समस्या की दर में हल्की गिरावट दर्ज की गई है, लेकिन इसके बावजूद देश का लगभग हर पांचवा एडल्ट अब भी हाई ब्लड प्रेशर से प्रभावित है. एक्सपर्ट के अनुसार यह हार्ट रोग, स्ट्रोक और किडनी से जुड़ी गंभीर बीमारियों का बड़ा जोखिम कारक बना हुआ है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 02 Jun 2026 19:30:09 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Diabetes, Problems:, यूपी, में, शुगर, का, कहर, हर, 5वां, पुरुष, और, 6ठी, महिला, चपेट, में, सर्वे, में, हुआ, चौंकाने, वाला, खुलासा</media:keywords>
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        <title>Obesity Myths: कम खाने से नहीं घटता वजन, मोटापे से जुड़े इन बड़े मिथकों का एक्सपर्ट ने बताया पूरा सच</title>
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        <description><![CDATA[ Common Obesity Myths Explained By Experts: मोटापा दुनिया की सबसे गलत समझी जाने वाली हेल्थ समस्याओं में से एक है. इसकी वजह यह नहीं है कि साइंस के पास जवाब नहीं हैं, बल्कि समस्या यह है कि वर्षों से चली आ रही गलत धारणाओं, भ्रामक डाइट सलाह और सामाजिक पूर्वाग्रहों ने सही जानकारी को पीछे धकेल दिया है. वॉय इंडिया (पूर्व में अर्लीफिट) की सह-संस्थापक और सीओओ सलोनी पालीवाल के अनुसार, मोटापे को लेकर कई ऐसे मिथक हैं जो न केवल गलत हैं, बल्कि लोगों के स्वास्थ्य को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं.
क्या लाइफस्टाइल की वजह से ऐसा होता है?
सबसे बड़ा भ्रम यह है कि मोटापा केवल व्यक्ति की लाइफस्टाइल का परिणाम होता है. जबकि रिसर्च बताते हैं कि इसके पीछे जैनेटिक, हार्मोन, नींद, तनाव, आंतों के माइक्रोबायोम और पर्यावरण जैसे कई कारक मिलकर काम करते हैं. &amp;nbsp;यही कारण है कि एक जैसी डाइट और समान शारीरिक गतिविधि के बावजूद दो लोगों का वजन अलग-अलग हो सकता है.&amp;nbsp;
क्या कम खाने से यह ठीक हो जाता है?
दूसरा आम मिथक है कि &quot;कम खाओ और ज्यादा चलो-फिरो&quot; ही इसका समाधान है. सलोनी पालीवाल बताती हैं कि यह सलाह पूरी तरह गलत नहीं है, लेकिन मोटापे जैसी जटिल और लंबे समय तक चलने वाली बीमारी के इलाज के लिए पर्याप्त भी नहीं है. भूख को नियंत्रित करने वाले हार्मोन और शरीर की मेटाबॉलिज्म इस प्रक्रिया को कहीं अधिक मुश्किल बनाते हैं.
क्या वजन कम न होना आपकी जिम्मेदारी है?
इसी तरह कई लोग मानते हैं कि वजन कम न कर पाने के पीछे इच्छाशक्ति की कमी जिम्मेदार होती है. जबकि घ्रेलिन, लेप्टिन, इंसुलिन और कॉर्टिसोल जैसे हार्मोन भूख और खाने की इच्छा को प्रभावित करते हैं. ऐसे में केवल और मेहनत करो कहना समस्या का समाधान नहीं है. एक्सपर्ट का कहना है कि हर मोटापा बाहर से दिखाई नहीं देताच कई लोगों में शरीर के अंदर अंगों के आसपास चर्बी जमा होती है, जिसे विसरल ओबेसिटी कहा जाता है. दक्षिण एशियाई आबादी में यह जोखिम विशेष रूप से अधिक देखा जाता है. इसलिए केवल वजन या बीएमआई के आधार पर स्वास्थ्य का आकलन करना पर्याप्त नहीं माना जाता.&amp;nbsp;
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क्या एक बार वजन घटने के बाद दोबारा बढ़ सकता है?
एक और बड़ी गलतफहमी यह है कि एक बार वजन घट जाने के बाद वह हमेशा कम बना रहता है. रिसर्च बताते हैं कि शरीर अपने पुराने वजन को बनाए रखने की कोशिश करता है, जिससे समय के साथ वजन दोबारा बढ़ने की संभावना रहती है. इसी वजह से मोटापे के लिए लंबे समय तक मेडिकल सहायता की जरूरत पड़ सकती है. जीएलपी-1 दवाओं जैसे सेमाग्लूटाइड और टिरजेपाटाइड को लेकर भी कई मिसकनसेप्शन हैं. हालांकि क्लीनिकल ट्रायल्स में इन दवाओं ने अच्छे परिणाम दिखाए हैं और ये भूख तथा मेटाबॉलिज्म को नियंत्रित करने में मदद करती हैं. एक्सपर्ट के अनुसार, इनका उपयोग आसान रास्ता चुनना नहीं, बल्कि सही तरीके से इलाज करवाना होता है.&amp;nbsp;
क्या मोटापा कोई बीमारी है?
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन, अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन और दुनिया की प्रमुख एंडोक्राइनोलॉजी संस्थाएं मोटापे को एक क्रॉनिक बीमारी मानती हैं. यह टाइप-2 डायबिटीज, हृदय रोग, स्लीप एपनिया और कई प्रकार के कैंसर जैसी 200 से अधिक बीमारियों से जुड़ी हुई है. इसलिए मोटापे को केवल वजन बढ़ने की समस्या मानना सही नहीं है, बल्कि इसे एक गंभीर स्वास्थ्य स्थिति के रूप में समझना और समय रहते उपचार लेना जरूरी है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 02 Jun 2026 03:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Late Night Eating Heart Health Side Effects: रात 9 बजे के बाद खाते हैं खाना, दिल को हो सकता है बड़ा नुकसान</title>
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        <description><![CDATA[ Late Night Eating Heart Health Side Effects : आज की बिजी और खराब लाइफस्टाइल में देर रात खाना खाना आम बात बन गई है. ऑफिस का काम, ट्रैफिक, मोबाइल और टीवी के बढ़ते यूज के कारण कई लोग रात 9 बजे के बाद ही डिनर कर पाते हैं. कुछ लोगों के लिए तो 10 से 11 बजे खाना खाना रोजमर्रा की आदत बन चुकी है.
यह आदत मामूली लग सकती है, लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि देर रात खाना खाने का असर सिर्फ पाचन तंत्र पर ही नहीं बल्कि दिल की सेहत पर भी पड़ सकता है. ऐसे में बहुत देर से खाना खाने पर शरीर की प्राकृतिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है, जिससे लंबे समय में कई स्वास्थ्य समस्याएं पैदा होने का खतरा बढ़ जाता है. ऐसे में आइए जानते हैं कि रात 9 बजे के बाद खाना खाने से दिल को क्या नुकसान हो सकता है.&amp;nbsp;
शरीर की बॉडी क्लॉक कैसे करती है काम?
हमारे शरीर में एक नेचुरल 24 घंटे की बॉडी क्लॉक होती है, जिसे सर्कैडियन रिदम कहा जाता है. यही क्लॉक यह तय करती है कि शरीर कब जागेगा, कब सोएगा, कब हार्मोन रिलीज होंगे और भोजन को कैसे पचाया जाएगा. रात होने पर शरीर की एक्टिविटी धीरे-धीरे कम होने लगती हैं. ब्लड प्रेशर नीचे आने लगता है और शरीर खुद को अगले दिन के लिए तैयार करता है, लेकिन अगर इस दौरान भारी खाना खा कर लिया जाए तो शरीर को आराम मिलने के बजाय अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती है.&amp;nbsp;&amp;nbsp;देर रात खाना खाने से दिल को क्या नुकसान हो सकता है?&amp;nbsp;विशेषज्ञों का कहना है कि देर रात खाना खाने से पाचन तंत्र उस समय भी एक्टिव रहता है जब शरीर आराम की तैयारी कर रहा होता है. इससे शरीर का सामान्य संतुलन बिगड़ सकता है. रात में देर से खाना खाने से ब्लड प्रेशर लंबे समय तक ऊंचा रह सकता है. इसके अलावा शरीर में शुगर को कंट्रोल करने की क्षमता भी प्रभावित हो सकती है. समय के साथ यह आदत हाई ब्लड प्रेशर, टाइप-2 डायबिटीज और हार्ट की बीमारियों के खतरे को बढ़ा सकती है.&amp;nbsp;&amp;nbsp;देर रात खाने और स्ट्रोक का क्या है संबंध?
कुछ अध्ययनों में यह पाया गया है कि जो लोग रोजाना देर रात खाना खाते हैं, उनमें स्ट्रोक का खतरा ज्यादा हो सकता है. इसका एक कारण यह माना जाता है कि देर रात खाने से शरीर की बॉडी क्लॉक के काम करने में रुकावट आ सकती है और हार्ट से जुड़ी कई प्रक्रियाओं पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, हालांकि सिर्फ एक-दो बार देर से खाना खाने से कोई बड़ा नुकसान नहीं होता है, लेकिन अगर यह रोज की आदत बन जाए तो जोखिम बढ़ सकता है.&amp;nbsp;
नींद की क्वालिटी भी हो सकती है खराब
देर रात खाना खाने का असर नींद पर भी पड़ता है. खाना खाने के तुरंत बाद सोने से एसिडिटी और एसिड रिफ्लक्स की समस्या हो सकती है. इसमें पेट का एसिड खाने की नली की तरफ आने लगता है, जिससे सीने में जलन और बेचैनी महसूस होती है, जब नींद बार-बार टूटती है या अच्छी नींद नहीं आती तो इसका सीधा असर दिल की सेहत पर पड़ सकता है. खराब नींद शरीर में सूजन बढ़ा सकती है और तनाव वाले हार्मोन्स का स्तर भी बढ़ा सकती है.&amp;nbsp;
रात में शरीर को क्यों चाहिए आराम?
दिनभर काम करने के बाद रात का समय शरीर की मरम्मत और रिकवरी के लिए बेहद जरूरी होता है. इसी दौरान शरीर के कई जरूरी अंग खुद को रिचार्ज करते हैं. सोते समय ब्लड प्रेशर सामान्य रूप से कम हो जाता है, तनाव हार्मोन घटने लगते हैं और शरीर को आराम मिलता है, लेकिन अगर रात में भारी खाना खाया जाए तो शरीर को खाना पचाने के लिए अतिरिक्त एनर्जी लगानी पड़ती है, जिससे रिकवरी प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ें -White Water Discharge: अगर बार बार हो रहा व्हाइट वॉटर डिस्चार्ज तो संभल जाएं, इस गंभीर बीमारी का हो सकता है खतरा
किन लोगों को ज्यादा सावधान रहने की जरूरत है?
कुछ लोगों के लिए देर रात खाना खाना ज्यादा नुकसानदायक साबित हो सकता है. &amp;nbsp;इनमें हाई ब्लड प्रेशर के मरीज, डायबिटीज से पीड़ित लोग. मोटापे से जूझ रहे लोग, हार्ट हेल्थ के जोखिम वाले व्यक्ति और कोलेस्ट्रॉल की समस्या वाले लोग शामिल हैं. इन लोगों को अपने डिनर के समय और खाने की मात्रा पर विशेष ध्यान देना चाहिए.&amp;nbsp;
रात का खाना किस समय खाना सबसे बेहतर माना जाता है?
स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह है कि रात का खाना शाम 7 से 8 बजे के बीच कर लेना चाहिए. इसके अलावा डिनर और सोने के समय के बीच कम से कम 2 से 3 घंटे का अंतर होना चाहिए. इससे खाने को पचने के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है और नींद भी बेहतर आती है. रात का खाना हल्का और संतुलित रखना बेहतर माना जाता है. डिनर में ज्यादा तला-भुना, ज्यादा तेल वाला या बहुत ज्यादा मीठा खाना खाने से बचना चाहिए.रात के खाने में दाल और सब्जियां, सलाद, मल्टीग्रेन रोटी, हल्की खिचड़ी, सूप और दही शामिल कर सकते हैं.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 02 Jun 2026 03:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Late, Night, Eating, Heart, Health, Side, Effects:, रात, बजे, के, बाद, खाते, हैं, खाना, दिल, को, हो, सकता, है, बड़ा, नुकसान</media:keywords>
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        <title>Pankaj Bhadouria Breast Cancer: मास्टरशेफ विनर पंकज भदौरिया को ब्रेस्ट कैंसर, 50 के पार महिलाओं में क्यों बढ़ जाता है खतरा?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/pankaj-bhadouria-breast-cancer-मास्टरशेफ-विनर-पंकज-भदौरिया-को-ब्रेस्ट-कैंसर-50-के-पार-महिलाओं-में-क्यों-बढ़-जाता-है-खतरा</link>
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        <description><![CDATA[ MasterChef Winner Pankaj Bhadouria Breast Cancer : मास्टरशेफ इंडिया सीजन 1 की विजेता और मशहूर सेलिब्रिटी शेफ पंकज भदौरिया ने हाल ही में सोशल मीडिया पर एक इमोशनल पोस्ट शेयर कर बताया कि उन्हें ब्रेस्ट कैंसर का पता चला है. इस पोस्ट के सामने आने के बाद उनके फैंस में चिंता बढ़ गई है. पंकज भदौरिया ने लोगों से अपनी सेहत के लिए स्पोर्ट की अपील भी की है.&amp;nbsp;
ब्रेस्ट कैंसर दुनिया भर में महिलाओं में पाए जाने वाले सबसे आम कैंसरों में से एक है. हर साल लाखों महिलाएं इस बीमारी की चपेट में आती हैं, हालांकि यह बीमारी किसी भी उम्र में हो सकती है, लेकिन 50 साल की उम्र के बाद इसका खतरा काफी बढ़ जाता है. डॉक्टरों के अनुसार, उम्र बढ़ने के साथ शरीर में होने वाले हार्मोनल और जैविक बदलाव इसकी बड़ी वजह बनते हैं. ऐसे में आइए जानते हैं कि आखिर ब्रेस्ट कैंसर क्या है, 50 साल के बाद महिलाओं में इसका खतरा ज्यादा क्यों हो जाता है और इसके शुरुआती लक्षण क्या हैं.&amp;nbsp;
क्या होता है ब्रेस्ट कैंसर?
ब्रेस्ट कैंसर एक ऐसी बीमारी है, जिसमें ब्रेस्ट की कुछ कोशिकाएं असामान्य तरीके से बढ़ने लगती हैं. समय के साथ ये कोशिकाएं एक गांठ या ट्यूमर का रूप ले सकती हैं. अगर समय रहते इसका इलाज न कराया जाए तो कैंसर कोशिकाएं शरीर के दूसरे हिस्सों तक भी फैल सकती हैं. यही वजह है कि डॉक्टर शुरुआती पहचान और समय पर इलाज को बेहद जरूरी मानते हैं.&amp;nbsp;
50 &amp;nbsp;के बाद महिलाओं में इसका खतरा ज्यादा क्यों हो जाता है?
1. विशेषज्ञों के मुताबिक उम्र बढ़ने के साथ ब्रेस्ट कैंसर का जोखिम भी बढ़ता जाता है. खासतौर पर 50 वर्ष की उम्र के बाद महिलाओं के शरीर में कई ऐसे बदलाव होते हैं जो कैंसर के खतरे को बढ़ा सकते हैं.&amp;nbsp;
2.महिलाओं में एक उम्र के बाद पीरियड्स बंद हो जाते हैं, जिसे मेनोपॉज कहा जाता है. इस दौरान शरीर में हार्मोन का संतुलन बदलने लगता है. हार्मोन में होने वाले अंतर ब्रेस्ट के टिशू को प्रभावित कर सकते हैं और असामान्य कोशिकाओं के विकसित होने का खतरा बढ़ा सकते हैं. यही कारण है कि मेनोपॉज के बाद ब्रेस्ट कैंसर के मामले ज्यादा देखने को मिलते हैं.
3. हमारे शरीर की कोशिकाएं लगातार काम करती रहती हैं.बढ़ती उम्र के साथ डीएनए में छोटी-छोटी परेशानियां जमा होने लगती हैं.सामान्य परिस्थितियों में शरीर इनकी मरम्मत कर लेता है, लेकिन उम्र बढ़ने पर यह क्षमता कमजोर होने लगती है. इससे खराब कोशिकाओं के तेजी से बढ़ने और कैंसर में बदलने का खतरा बढ़ जाता है.&amp;nbsp;
4. 50 वर्ष के बाद महिलाओं में वजन बढ़ने की समस्या आम हो जाती है.विशेषज्ञों के अनुसार शरीर में अतिरिक्त चर्बी एस्ट्रोजन हार्मोन के स्तर को बढ़ा सकती है. जब शरीर में फैट ज्यादा होता है तो सूजन की स्थिति भी बनी रहती है, जो कैंसर कोशिकाओं के बढ़ने के लिए तैयार कर सकती है.&amp;nbsp;
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किन महिलाओं को ज्यादा सावधान रहने की जरूरत है?
कुछ महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर का खतरा सामान्य से ज्यादा हो सकता है. जैसे परिवार में किसी को पहले ब्रेस्ट कैंसर रहा हो, &amp;nbsp;ज्यादा वजन या मोटापे की समस्या, फिजिकल एक्टिविटी की कमी, देर से मेनोपॉज होना, अस्वस्थ खानपान और लाइफस्टाइल, धूम्रपान और शराब का सेवन इन स्थितियों में नियमित जांच कराना और स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देना जरूरी हो जाता है.&amp;nbsp;
ब्रेस्ट कैंसर के शुरुआती लक्षण क्या हैं?
ब्रेस्ट कैंसर के शुरुआती चरण में अक्सर दर्द नहीं होता, इसलिए कई महिलाएं इसके संकेतों को नजरअंदाज कर देती हैं. हालांकि कुछ लक्षण ऐसे हैं जिन्हें बिल्कुल भी हल्के में नहीं लेना चाहिए. &amp;nbsp;जैसे स्तन या बगल में गांठ, स्तन के आकार में बदलाव, स्किन में बदलाव, निप्पल में बदलाव, निप्पल से असामान्य डिसचार्ज. डॉक्टरों का कहना है कि ब्रेस्ट कैंसर का जितना जल्दी पता चल जाता है, उसका इलाज उतना ही आसान और सफल होता है. शुरुआती अवस्था में कैंसर आमतौर पर ब्रेस्ट तक ही सीमित रहता है. ऐसे में सर्जरी, दवाओं और अन्य ट्रीटमेंट से बचाव किया जा सकता है.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 02 Jun 2026 03:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Best Time To Drink Tea: सुबह की चाय या शाम की चाय? जानिए आपकी सेहत के लिए कौन&amp;सा समय है सबसे बेहतर</title>
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        <description><![CDATA[ Best Time To Drink Tea: कई लोगों का दिन चाय के बिना शुरू ही नहीं होता. सुबह आंख खुलते ही सबसे पहले चाय की याद आती है, तो कुछ लोग शाम की थकान दूर करने के लिए चाय का सहारा लेते हैं. भारत में चाय सिर्फ एक पेय नहीं, बल्कि लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा माना जाता है. घर की बातचीत हो, ऑफिस का ब्रेक हो या दोस्तों की मुलाकात, चाय हर मौके पर साथ नजर आती है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि चाय पीने का सही समय कौन-सा है? सुबह की चाय ज्यादा फायदेमंद होती है या शाम की? बता दें कि इस सवाल का जवाब आपकी जरूरत और शरीर की स्थिति पर निर्भर करता है.&amp;nbsp;
सुबह की चाय देती है एनर्जी
विशेषज्ञों के मुताबिक सुबह की चाय शरीर को जगाने और दिमाग को सक्रिय करने में मदद करती है. चाय में मौजूद कैफीन आपको तरोताजा महसूस करा सकती है और काम पर ध्यान लगाने में मदद कर सकती है. वहीं ग्रीन टी में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स शरीर के लिए फायदेमंद माने जाते हैं और यह मेटाबॉलिज्म को बेहतर बनाने में भी मदद कर सकते हैं. साथ ही काली चाय और मसाला चाय भी सुबह ऊर्जा देने का काम करती हैं.&amp;nbsp;
लेकिन सिर्फ चाय पीना ही नहीं, उसे सही तरीके से पीना भी जरूरी है. डाइटिशियन के अनुसार, सुबह खाली पेट बहुत कड़क या तेज चाय नहीं पीनी चाहिए. ऐसा करने से कुछ लोगों को पेट में जलन, गैस या बेचैनी महसूस हो सकती है. इसलिए चाय को नाश्ते या किसी हल्के स्नैक के साथ लेना ही बेहतर माना जाता है. सुबह के समय अदरक वाली चाय, नींबू वाली चाय या दूसरी हर्बल चाय भी अच्छी मानी जाती हैं. ये शरीर को हाइड्रेट रखने के साथ-साथ पाचन को भी बेहतर बनाने में मदद कर सकती हैं. इस तरह अगर चाय सही समय और सही तरीके से पी जाए तो यह दिन की अच्छी शुरुआत का हिस्सा बन सकती है.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ेंः Testosterone Reducing Foods: ये चीजें रोज खाते हैं तो तुरंत छोड़ दीजिए, गिर जाएगा टेस्टोस्टेरोन और कम हो जाएगी कामेच्छा
शाम की चाय सुकून देती है
दिनभर की भागदौड़ के बाद शाम की चाय कई लोगों के लिए आराम का जरिया होती है. लेकिन विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि शाम के समय ज्यादा कैफीन वाली चाय पीने से बचना चाहिए. साथ ही देर शाम कड़क चाय पीने से नींद पर असर पड़ सकता है और कुछ लोगों को बेचैनी भी महसूस हो सकती है. &amp;nbsp;ऐसे में हर्बल चाय बेहतर विकल्प मानी जाती है. वहीं कैमोमाइल टी, पेपरमिंट टी, लैवेंडर टी और तुलसी की चाय शाम के समय पी जा सकती है. इसके अलावा कैमोमाइल टी शरीर को आराम देने और अच्छी नींद में मदद कर सकती है. साथ ही पेपरमिंट टी पाचन को बेहतर बनाने और पेट फूलने जैसी समस्या को कम करने में मददगार मानी जाती है. तुलसी की चाय तनाव कम करने और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाने में सहायक हो सकती है.&amp;nbsp;
आखिर चाय पीने का सबसे अच्छा समय कौन-सा है?
विशेषज्ञों का कहना है कि इसका कोई एक जवाब नहीं है. अगर आपको सुबह काम के लिए ऊर्जा और फोकस चाहिए तो सुबह की चाय आपके लिए बेहतर हो सकती है. वहीं अगर आप दिनभर की थकान के बाद आराम चाहते हैं तो शाम की हर्बल चाय अच्छा विकल्प हो सकती है. &amp;nbsp;बस सबसे जरूरी बात यह है कि चाय को सीमित मात्रा में ही पी जाए. बहुत ज्यादा चाय पीने से शरीर में पानी की कमी, एसिडिटी और नींद की परेशानी हो सकती है. इसलिए सही समय और सही मात्रा में पी गई चाय न सिर्फ स्वाद देती है, बल्कि आपकी दिनचर्या को भी बेहतर बना सकती है.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ेंः Digestive Health: दस्त के साथ भयंकर कब्ज को न करें इग्नोर, हो सकता है कैंसर का संकेत, जानें लक्षण ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 02 Jun 2026 03:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>Doing Shampoo Everyday In Summer: गर्मियों में क्या रोज शैंपू करना सही है, क्या इससे ठीक रहते हैं बाल?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/doing-shampoo-everyday-in-summer-गर्मियों-में-क्या-रोज-शैंपू-करना-सही-है-क्या-इससे-ठीक-रहते-हैं-बाल</link>
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        <description><![CDATA[ Doing Shampoo Everyday In Summer: गर्मियों के मौसम में तेज धूप, धूल-मिट्टी और पसीने के कारण बालों का रुखा और चिपचिपा होना एक आम दिक्कत है. बहुत से लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि क्या गर्मियों में रोज शैंपू करना सही है? क्या रोज बाल धोने से बाल सही रहते हैं? आइए इस लेख में जानते हैं कि बालों की सेहत के लिए क्या सही है और क्या गलत.
क्या रोज शैंपू करना फायदेमंद है?
गर्मियों में पसीना अधिक आने से सिर की त्वचा पर गंदगी जमा हो जाती है. इस गंदगी को साफ करने के लिए बाल धोना जरूरी है. लेकिन रोजाना शैंपू करना बालों के लिए बिल्कुल भी सही नहीं है. हमारे सिर की त्वचा में प्राकृतिक तेल होता है, जो बालों को नमी प्रदान करता है. जब आप रोज केमिकल वाले शैंपू का इस्तेमाल करते हैं, तो यह प्राकृतिक तेल पूरी तरह खत्म हो जाता है. इससे बाल रूखे, बेजान और कमजोर होकर टूटने लगते हैं.
रोज शैंपू करने के नुकसान
अगर आप रोजाना शैंपू करते हैं, तो सिर की त्वचा बहुत सूखी हो जाती है. इस सूखेपन को कम करने के लिए त्वचा और अधिक तेल बनाने लगती है. इसके कारण बाल और ज्यादा चिपचिपे दिखने लगते हैं. इसके अलावा, रोजाना बाल धोने से बालों की जड़ें कमजोर होती हैं और बाल झड़ने की समस्या तेजी से बढ़ सकती है.
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गर्मियों में बाल धोने का सही तरीका
गर्मियों में बालों को साफ रखना जरूरी है, लेकिन इसके लिए रोज शैंपू करने की जरूरत नहीं है. आप हफ्ते में केवल दो या तीन बार ही शैंपू का इस्तेमाल करें. अगर किसी दिन बाल ज्यादा चिपचिपे लगें, तो आप शैंपू के बिना केवल साफ पानी से भी बालों को धो सकते हैं. हमेशा हल्के या नेचुरल तत्वों से बने शैंपू का ही प्रयोग करें.
बालों को स्वस्थ रखने के आसान उपाय
शैंपू करने के बाद बालों में कंडीशनर लगाना कभी न भूलें. कंडीशनर बालों की नमी को बनाए रखता है. तेज धूप में बाहर निकलते समय बालों को सूती कपड़े या स्कार्फ से ढक कर रखें. इसके साथ ही, शरीर में पानी की कमी न होने दें और अच्छा खान-पान रखें.
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        <pubDate>Tue, 02 Jun 2026 03:30:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Detox Your Body Tips: क्या आपका शरीर Detox मांग रहा है? पहचानें संकेत और जानें उपाय</title>
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        <description><![CDATA[ Detox Your Body Tips:&amp;nbsp;क्या आपका शरीर टॉक्सिन्स से भर गया है? हमारा शरीर खुद को साफ करता है, लेकिन खराब खानपान और प्रदूषण के कारण कभी-कभी इसे बाहर से भी मदद की जरूरत होती है. आइए जानते हैं वे संकेत जो बताते हैं कि आपके शरीर को डिटॉक्स की जरूरत है.
इन लक्षणों को न करें नजरअंदाज
सुबह उठते ही थकावट महसूस करना
क्या आप 8 घंटे की नींद के बाद भी थका हुआ महसूस करते हैं? बिना काम किए कमजोरी लगना शरीर में जमी गंदगी का बड़ा संकेत है. जब लिवर और पेट पर टॉक्सिन्स का दबाव बढ़ता है, तो शरीर की एनर्जी खत्म होने लगती है.
पेट का फूलना और लगातार गैस बनना
अगर आपका पेट हमेशा भारी रहता है, गैस बनती है या कब्ज की समस्या है, तो समझ लें कि आपका पाचन तंत्र खराब हो रहा है. लिवर में गंदगी जमा होने से खाना ठीक से नहीं पचता.
चेहरे पर अचानक दाने होना
महंगे फेस वॉश लगाने के बाद भी पिंपल्स, मुंहासे या डल स्किन की समस्या अगर दूर नहीं हो रही है तो यह संकेत है कि आपका &amp;nbsp;लिवर खून को साफ नहीं कर पा रहा है, और शरीर त्वचा के रास्ते गंदगी बाहर निकाल रहा है. चमकदार त्वचा के लिए पेट की सफाई जरूरी है.
डाइटिंग के बाद भी अगर वजन नहीं घट रहा 
अगर आप कम खा रहे हैं और वर्कआउट भी कर रहे हैं, फिर भी वजन कम नहीं हो रहा, तो इसका कारण टॉक्सिन्स हो सकते हैं. ये शरीर के मेटाबॉलिज्म को धीमा कर देते हैं, जिससे फैट बर्न होना बंद हो जाता है.
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ये आसान घरेलू उपाय जो कर देंगे शरीर को साफ
शरीर को डिटॉक्स करना बहुत आसान है:

रोज सुबह खाली पेट गुनगुने पानी में नींबू का रस और शहद मिलाकर पिएं. यह लिवर को तुरंत साफ करता है.
खीरा, पुदीना, धनिया और पालक का जूस हफ्ते में तीन बार पिएं. यह खून को साफ करता है.
कुछ दिनों के लिए पैकेट बंद खाना, ज्यादा मीठा और तली-भुनी चीजों से पूरी तरह दूरी बना लें.
दिन में कम से कम 3 से 4 लीटर पानी पिएं ताकि गंदगी यूरिन के रास्ते बाहर निकल जाए.

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        <pubDate>Mon, 01 Jun 2026 15:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>Kidney Health Tips: किडनी खराब होने से पहले शरीर नहीं देता बड़ा संकेत, डॉक्टर की चेतावनी&amp; देर होने का न करें इंतजार</title>
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        <description><![CDATA[ Kidney Health Tips:&amp;nbsp;हम में से ज्यादातर लोग मानते हैं कि कोई भी गंभीर बीमारी आने से पहले शरीर कुछ न कुछ संकेत जरूर देता है. लेकिन किडनी की बीमारी के मामले में अक्सर ऐसा नहीं होता. यही वजह है कि डॉक्टर इसे &quot;साइलेंट डिजीज&quot; यानी चुपचाप बढ़ने वाली बीमारी कहते हैं. वहीं किडनी हमारे शरीर के सबसे जरूरी अंगों में से एक है. यह खून को साफ करती है, शरीर से गंदगी बाहर निकालती है, पानी का संतुलन बनाए रखती है और तो ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने में भी मदद करती है. लेकिन किडनी की सबसे बड़ी खासियत ही कई बार सबसे बड़ा खतरा बन जाती है.
&amp;nbsp;डॉक्टरों के मुताबिक किडनी इतनी मजबूत होती है कि नुकसान होने के बाद भी लंबे समय तक अपना काम करती रहती है. इसी कारण कई लोगों को तब तक पता नहीं चलता कि उनकी किडनी खराब हो रही है, जब तक बीमारी काफी आगे नहीं बढ़ जाती.&amp;nbsp;
किडनी की बीमारी को क्यों कहा जाता है &#039;साइलेंट किलर&#039;?
विशेषज्ञों का कहना है कि किडनी की बीमारी धीरे-धीरे बढ़ती है और शुरुआती दौर में कोई साफ लक्षण नहीं दिखते. वहीं कई लोग पूरी तरह सामान्य जीवन जीते रहते हैं और उन्हें लगता है कि वे पूरी तरह स्वस्थ हैं. &amp;nbsp;लेकिन अंदर ही अंदर किडनी लगातार कमजोर होती रहती है. &amp;nbsp;डॉक्टर के अनुसार, जब लोगों को पहली बार बीमारी का पता चलता है, तब तक कई मामलों में किडनी अपनी 85 से 90 प्रतिशत तक क्षमता खो चुकी होती है. यही वजह है कि केवल लक्षणों का इंतजार करना खतरनाक हो सकता है. वहीं कई मरीजों को बीमारी का पता तब चलता है जब किसी सामान्य हेल्थ चेकअप में रिपोर्ट खराब आती है या फिर अचानक ऐसी स्थिति बन जाती है कि डायलिसिस की जरूरत पड़ने लगती है. इसलिए डॉक्टर बार-बार लोगों को नियमित जांच कराने की सलाह देते हैं.&amp;nbsp;
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देर से पता चलने पर मरीज और परिवार दोनों पर पड़ता है असर
किडनी की बीमारी का देर से पता चलना सिर्फ शरीर के लिए ही नहीं, बल्कि मानसिक रूप से भी बड़ा झटका साबित हो सकता है. डॉक्टर बताते हैं कि कई मामलों में ऐसा होता है कि मरीज अस्पताल पहुंचते समय खुद को पूरी तरह स्वस्थ मानते हैं, लेकिन जांच के बाद उन्हें पता चलता है कि उनकी किडनी गंभीर रूप से खराब हो चुकी होती है. ऐसे में मरीज और उनके परिवार दोनों के लिए इस सच्चाई को स्वीकार करना आसान नहीं होता. वहीं अचानक डायलिसिस, लंबे इलाज और भविष्य की चिंता लोगों को परेशान कर देती है. &amp;nbsp;इलाज का खर्च, जीवनशैली में बदलाव और आगे की योजना जैसी कई बातें एक साथ सामने आ जाती हैं. यही कारण है कि डॉक्टर कहते हैं कि बीमारी को शुरुआती दौर में पकड़ लेना सबसे बेहतर रास्ता है.&amp;nbsp;
किन लोगों को ज्यादा खतरा और कैसे बचाएं अपनी किडनी?
डॉक्टरों के अनुसार कुछ लोगों में किडनी की बीमारी का खतरा ज्यादा होता है. इनमें डायबिटीज के मरीज, हाई ब्लड प्रेशर से पीड़ित लोग, किडनी की बीमारी का पारिवारिक इतिहास रखने वाले लोग, मोटापे से जूझ रहे व्यक्ति, धूम्रपान करने वाले, दिल के मरीज और 60 साल से अधिक उम्र के लोग शामिल होते हैं. &amp;nbsp; इसलिए ऐसे लोगों को नियमित रूप से किडनी की जांच कराने कि सलाह दी जाती है.&amp;nbsp;
वहीं अच्छी बात यह है कि किडनी को सुरक्षित रखने के लिए बहुत मुश्किल कदम उठाने की जरूरत नहीं होती. इसके लिए ब्लड प्रेशर और शुगर को नियंत्रण में रखना, पर्याप्त पानी पीना, कम नमक वाला संतुलित भोजन खाना, नियमित व्यायाम करना, धूम्रपान और ज्यादा शराब से बचना तथा बिना डॉक्टर की सलाह के दर्द की दवाओं का अधिक इस्तेमाल न करना किडनी को स्वस्थ रखने में मदद कर सकता है. डॉक्टरों का साफ कहना है कि किडनी की बीमारी का इंतजार लक्षणों से नहीं, बल्कि समय पर जांच से करना चाहिए. क्योंकि सही समय पर पता चल जाए तो किडनी को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Mon, 01 Jun 2026 15:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>Weight Loss Drug: वजन तो घटेगा, लेकिन मांसपेशियां हो सकती हैं कमजोर! Ozempic लेने वालों के लिए चेतावनी</title>
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        <description><![CDATA[ Weight Loss Drug:&amp;nbsp;आजकल वजन कम करने के लिए लोग कई तरह के तरीके अपना रहे हैं. जिसमें Ozempic नाम की दवा काफी चर्चा में चल रही है. वहीं दुनिया भर में लाखों लोग इस दवा का इस्तेमाल डायबिटीज कंट्रोल करने और वजन घटाने के लिए कर रहे हैं. इस दवा में मौजूद Semaglutide भूख को कम करने में मदद करता है, जिससे व्यक्ति कम खाना खाता है और उसका वजन तेजी से घटने लगता है. लेकिन अब विशेषज्ञों ने एक ऐसी बात बताई है, जिस पर ध्यान देना बहुत जरूरी है. इससे वजन घटाने के दौरान सिर्फ चर्बी ही नहीं, बल्कि शरीर की मांसपेशियां भी कमजोर हो सकती हैं. यही वजह है कि डॉक्टर अब लोगों को सिर्फ दवा पर भरोसा करने के बजाय व्यायाम को भी अपनी दिनचर्या में शामिल करने की सलाह दे रहे हैं.&amp;nbsp;
सिर्फ वजन कम होना ही काफी नहीं
जब कोई व्यक्ति वजन कम करना चाहता है, तो उसका मकसद शरीर की अतिरिक्त चर्बी घटाना होता है. लेकिन कई बार वजन कम होने के साथ-साथ मांसपेशियों का भी नुकसान होने लगता है जो की शरीर के लिए अच्छी बात नहीं मानी जाती है, क्योंकि मांसपेशियां हमारे शरीर को ताकत देती हैं, चलने-फिरने में मदद करती हैं और शरीर की ऊर्जा को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती हैं. वहीं अगर मांसपेशियां ज्यादा कमजोर हो जाएं, तो व्यक्ति जल्दी थक सकता है और लंबे समय तक अपना वजन कंट्रोल रखना भी मुश्किल हो सकता है. &amp;nbsp;खासकर बढ़ती उम्र के लोगों के लिए यह समस्या और ज्यादा चिंता की बात बन सकती है.&amp;nbsp;
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रिसर्च में क्या सामने आया?
यूरोपियन एथेरोस्क्लेरोसिस सोसायटी (EAS) कांग्रेस 2026 में पेश की गई एक नई स्टडी में इस मुद्दे पर खास ध्यान दिया गया. &amp;nbsp;शोधकर्ताओं ने मोटापे और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं से ग्रस्त चूहों पर अध्ययन किया. कुछ चूहों को केवल Semaglutide दिया गया, कुछ को सिर्फ एक्सरसाइज कराई गई और कुछ को दोनों चीजें साथ में दी गईं. 14 हफ्तों बाद जो नतीजे सामने आए, वे काफी दिलचस्प थे. &amp;nbsp;सिर्फ Semaglutide लेने वाले समूह में शरीर की चर्बी 31 प्रतिशत तक कम हुई, लेकिन उनकी लीन मास यानी मांसपेशियों में 11 प्रतिशत की कमी भी देखी गई. &amp;nbsp;वहीं जिन चूहों को दवा के साथ नियमित व्यायाम भी कराया गया, उनमें चर्बी 45 प्रतिशत तक घटी और मांसपेशियों का नुकसान केवल 8 प्रतिशत तक सीमित रहा.&amp;nbsp;
एक्सरसाइज ने दिया बड़ा फायदा
शोध में यह भी देखा गया कि दवा और एक्सरसाइज का मेल सिर्फ वजन कम करने तक सीमित नहीं रहा. इससे इंसुलिन की कार्यक्षमता बेहतर हुई, खून में फैट का स्तर सुधरा और शरीर में सूजन भी कम हुई है. इतना ही नहीं, लिवर में जमा अतिरिक्त चर्बी भी कम देखने को मिला है. सबसे खास बात यह रही कि जिन चूहों ने दवा के साथ एक्सरसाइज की, उनकी मांसपेशियों की ताकत और पकड़ने की क्षमता में भी सुधार हुआ. यानी शरीर सिर्फ पतला नहीं हुआ, बल्कि ज्यादा मजबूत भी बना.
हालांकि यह अध्ययन अभी जानवरों पर किया गया है और इंसानों पर और रिसर्च की जरूरत है, लेकिन इसके नतीजे एक साफ संदेश देते हैं कि अगर आप Ozempic जैसी दवाओं से वजन कम कर रहे हैं, तो नियमित एक्सरसाइज को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है. &amp;nbsp;सही मायनों में स्वस्थ वजन घटाने का रास्ता दवा और व्यायाम, दोनों के संतुलित मेल से होकर गुजरता है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Mon, 01 Jun 2026 15:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>Oral Health: बार&amp;बार सूज रहे मसूड़े या खराब रहती है ओरल हेल्थ तो न करें नजरअंदाज, हो सकती हैं बांझपन की शिकार</title>
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        <description><![CDATA[ Poor Oral Health May Increase Infertility Risk: महिलाओं की फर्टिलिटी को प्रभावित करने वाले कारणों की बात होती है तो आमतौर पर हार्मोन, उम्र, लाइफस्टाइल या किसी बीमारी का जिक्र किया जाता है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आपके मसूड़ों की सेहत भी मां बनने की क्षमता पर असर डाल सकती है? हाल ही में सामने आए एक रिसर्च ने चौंकाने वाला खुलासा किया है. रिसर्चर का कहना है कि मुंह में लंबे समय तक रहने वाली सूजन महिलाओं की फर्टिलिटी को प्रभावित कर सकती है और कुछ मामलों में बांझपन का खतरा भी बढ़ा सकती है.&amp;nbsp;
कैसे यह फर्टिलिटी को प्रभावित करता है?
हिब्रू यूनिवर्सिटी ऑफ जेरूसलम के रिसर्चर ने अपने इस स्टडी में पाया गया कि मुंह में लगातार बनी रहने वाली सूजन केवल दांतों और मसूड़ों तक सीमित नहीं रहती. यह शरीर में इम्यून सिस्टम की प्रतिक्रिया को बढ़ाकर दूसरे अंगों को भी प्रभावित कर सकती है, जिनमें ओवरी भी शामिल हैं. स्टडी के एनालिसिस जर्नल ऑफ डेंटल रिसर्च में पब्लिश किए गए हैं.&amp;nbsp;
किस चीज पर किया गया रिसर्च?
रिसर्च के दौरान साइंटिस्ट ने चूहों पर स्टडी किया और दांतों से जुड़ी सूजन की स्थिति का एनालिसिस किया. जांच में सामने आया कि मुंह में होने वाली सूजन से निकलने वाले संकेत पूरे शरीर में फैल जाते हैं और ओवरी तक पहुंच सकते हैं. इसका रिजल्ट ओवरी में सूजन बढ़ाने वाले केमिकल का स्तर अधिक पाया गया. इसके साथ ही इम्यून सिस्टम में बदलाव, टिश्यू को नुकसान और एग्स की क्वालिटी में गिरावट भी देखी गई.
जानवरों पर किए गए रिसर्च का किया निकला रिजल्ट?
रिसर्चर ने यह भी पाया कि जिन एग्स पर सूजन का असर पड़ा, वहां एग्स के विकास की प्रक्रिया प्रभावित हो गई. ओवरी में मौजूद छोटी थैलियां, जिनमें एग्स विकसित होते हैं, उनकी वृद्धि सामान्य नहीं रही. इसके कारण एग्स की क्वालिटी कमजोर हुई और सफल प्रेग्नेंसी की संभावना कम होती दिखाई दी. स्टडी में शामिल जानवरों में जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या भी कम दर्ज की गई.
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लंबे समय तक रहने वाले सूजन का क्या होता है असर?
सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि एग्स में डीएनए को नुकसान पहुंचने और जीन के काम करने के तरीके में बदलाव के संकेत भी मिले. रिसर्चर के अनुसार ये बदलाव काफी हद तक वैसे ही थे जैसे बढ़ती उम्र के साथ प्रजनन क्षमता में गिरावट के दौरान देखे जाते हैं. इससे संकेत मिलता है कि लंबे समय तक बनी रहने वाली सूजन महिलाओं की फर्टिलिटी क्षमता को समय से पहले प्रभावित कर सकती है. स्टडी &amp;nbsp;का नेतृत्व करने वाले माइकल क्लटस्टाइन ने कहा कि अक्सर सूजन को केवल स्थानीय समस्या माना जाता है, लेकिन हमारे एनालिसिस बताते हैं कि इसका असर पूरे शरीर पर पड़ सकता है. उन्होंने कहा कि मुंह में लगातार बनी रहने वाली सूजन महिलाओं में बांझपन का एक ऐसा कारण हो सकती है, जिस पर अभी तक पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 01 Jun 2026 02:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Morning Phone Habit Harm: सुबह आंख खुलते ही उठा लेते हैं फोन, सुबह की यह आदत खराब कर देती है पूरा दिन </title>
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        <description><![CDATA[ Morning Phone Habit Harm: आज की डिजिटल लाइफस्टाइल में सुबह की शुरुआत अक्सर मोबाइल फोन के साथ होती है. अलार्म बंद करते ही लोग बिस्तर से उठने के बजाय सबसे पहले फोन की स्क्रीन देखते हैं. मैसेज, सोशल मीडिया नोटिफिकेशन, ईमेल और न्यूज स्क्रोल करना एक आम आदत बन चुकी है. लेकिन एक्सपर्ट के अनुसार यह छोटी सी आदत धीरे-धीरे शरीर, दिमाग और मेंटल हेल्थ पर बड़ा असर डाल सकती है. डॉक्टर और रिसर्च दोनों इस बात की चेतावनी देते हैं कि सुबह उठते हैं ही मोबाइल देखना पूरे दिन की मानसिक स्थिति और प्रोडक्टिविटी को प्रभावित कर सकता है.
सुबह मोबाइल देखते ही दिमाग पर पड़ता है असर&amp;nbsp;
सुबह नींद से जागते ही दिमाग को धीरे-धीरे एक्टिव होने की जरूरत होती है. लेकिन मोबाइल की तेज रोशनी और लगातार आने वाले नोटिफिकेशन उसे अचानक स्ट्रेस मोड में डाल देते हैं. इससे दिमाग पर एक तरह का डिजिटल प्रेशर बनता है, जिससे ध्यान केंद्रित करने की क्षमता घट सकती है और बेचैनी बढ़ सकती है.&amp;nbsp;
स्ट्रेस हार्मोन और हार्ट रेट पर असर &amp;nbsp;
एक्सपर्ट्स के अनुसार सुबह मोबाइल देखने से शरीर में स्ट्रेस हार्मोन का स्तर बढ़ सकता है. इससे हार्ट रेट और ब्लड प्रेशर अचानक ऊपर जा सकता है. खासकर उन लोगों के लिए यह स्थिति ज्यादा खतरनाक होती है जो पहले से डायबिटीज, हाई बीपी या मोटापे की समस्या से जूझ रहे हैं.&amp;nbsp;
मानसिक स्वास्थ्य पर सीधा असर&amp;nbsp;
सुबह-सुबह सोशल मीडिया या न्यूज देखने से दिमाग पर एक साथ बहुत सारी जानकारी का दबाव पड़ता है. कई बार नेगेटिव खबरें मूड को प्रभावित करती है, जिससे पूरा दिन तनाव, चिड़चिड़ापन और बेचैनी रहती है. लंबे समय तक यह आदत एंग्जायटी और मेंटल स्ट्रेस को बढ़ा सकती है.&amp;nbsp;
प्रोडक्टिविटी और फोकस हो जाता है कम&amp;nbsp;
सुबह का समय ज्यादा फोकस और प्लानिंग के लिए अच्छा माना जाता है, लेकिन मोबाइल स्क्रोल करने से ध्यान भटक जाता है और कई बार अनावश्यक समय बर्बाद हो जाता है. इसका पूरा असर पूरे दिन की प्रोडक्टिविटी पर पड़ता है और काम में मन लगाने में दिक्कत आती है.&amp;nbsp;
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आंखों की सेहत पर भी खतरा&amp;nbsp;
मोबाइल स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट आंखों पर असर डालते हैं. सुबह-सुबह इसका इस्तेमाल करने से आंखों में जलन, थकान, सूखापन और भारीपन जैसे समस्या हो सकती है. लगातार यह आदत आंखों की रोशनी पर भी नेगेटिव इफेक्ट डाल सकती है.
सही तरीके से कैसे करें सुबह की शुरुआत?&amp;nbsp;
एक्सपर्ट्स के अनुसार सुबह उठते ही मोबाइल देखने की आदत से बचना चाहिए और दिन की शुरुआत उठते ही 15 से 30 मिनट तक स्क्रीन से दूरी बनाने, गुनगुना पानी पीने, हल्की स्ट्रेचिंग या योग करने, गहरी सांस लेने की एक्सरसाइज करने और कुछ देर प्राकृतिक रोशनी में समय बिताने से करें.
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        <pubDate>Sun, 31 May 2026 09:30:05 +0530</pubDate>
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        <title>Cancer Risk: सही लाइफस्टाइल से टल सकता है 40% कैंसर का खतरा, एक्सपर्ट से जानें बचाव का तरीका</title>
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        <description><![CDATA[ Daily Habits That Increase Cancer Risk: कैंसर को लेकर लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि यह बीमारी केवल बढ़ती उम्र, खराब किस्मत या जेनेटिक कारणों से होती है. लेकिन अब नई रिसर्च इस सोच को बदल रही है. जर्नल नेचर मेडिसिन में प्रकाशित एक स्टडी के अनुसार, करीब 40 प्रतिशत कैंसर के मामले और लगभग आधी कैंसर से होने वाली मौतें ऐसे जोखिमों से जुड़ी हैं जिन्हें सही लाइफस्टाइल अपनाकर काफी हद तक टाला जा सकता है.
हमारी कौन सी आदतें कर रही हैं हमें बीमार
एक्सपर्ट के मुताबिक समस्या यह है कि कैंसर का खतरा बढ़ाने वाली कई आदतें हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुकी हैं. देर रात तक जागना, घंटों एक ही जगह बैठे रहना, बाहर का प्रोसेस्ड खाना खाना, तनाव को नजरअंदाज करना और फिजिकल एक्टिविटी की कमी धीरे-धीरे शरीर पर असर डालती है. शुरुआत में इनका नुकसान दिखाई नहीं देता, लेकिन सालों तक यही आदतें गंभीर बीमारियों की वजह बन सकती हैं. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन की रिपोर्ट बताती है कि तंबाकू, मोटापा, शराब का सेवन, अनहेल्दी खानपान, फिजिकल एक्टिविटी की कमा और वायु प्रदूषण कैंसर के सबसे बड़े रोके जा सकने वाले कारणों में शामिल हैं. भारत में भी लाइफस्टाइल से जुड़े कैंसर के मामलों में लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है.
कम उम्र के लोग क्यों आ रहे हैं इसकी चपेट में?
&amp;nbsp;डॉ. अनिंद्य मुखर्जी ने TOI को बताया कि अब कैंसर सिर्फ बुजुर्गों की बीमारी नहीं रह गया है. कम उम्र के लोगों में भी ऐसे कैंसर तेजी से सामने आ रहे हैं जो पहले 50 साल की उम्र के बाद अधिक देखे जाते थे. उनका कहना है कि धूम्रपान, शराब, मोटापा, खराब खानपान, एक्सरसाइज की कमी, प्रदूषण और लगातार तनाव जैसे कारणों ने हर उम्र के लोगों में कैंसर का जोखिम बढ़ा दिया है.&amp;nbsp;
जरूरत से ज्यादा फैट से कौन से कैंसर का खतरा रहता है?
अमेरिका के नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट की रिसर्च के अनुसार शरीर में जरूरत से ज्यादा फैट कई तरह के कैंसर से जुड़ी हुई है. इनमें स्तन, कोलोरेक्टल, यूट्रस, किडनी, लिवर और पैंक्रियाज कैंसर शामिल हैं. एक्सपर्ट बताते हैं कि जब शरीर लंबे समय तक खराब लाइफस्टाइल का सामना करता है तो अंदरूनी सूजन बढ़ने लगती है. यह सूजन हेल्दी सेल्स &amp;nbsp;को नुकसान पहुंचाती है और कैंसर के लिए अनुकूल माहौल तैयार कर सकती है.
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तंबाकी और पैसिव स्मोकिंग से खतरा
डॉ. मुखर्जी के अनुसार तंबाकू आज भी कैंसर का सबसे बड़ा रोके जा सकने वाला कारण है. इसका असर सिर्फ लंग्स पर नहीं बल्कि मुंह, गले, पेट, किडनी, ब्लैडर और कई अन्य अंगों पर भी पड़ता है वहीं पैसिव स्मोकिंग भी उतनी ही खतरनाक है. इसके अलावा वायु प्रदूषण तेजी से उभरता खतरा बन रहा है, खासकर शहरों में रहने वाले लोगों के लिए.
कैसे कर सकते हैं खुद का बचाव?
डॉ. मुखर्जी के मुताबिक कैंसर से बचाव के लिए स्वस्थ वजन बनाए रखना, नियमित एक्सरसाइज करना, ताजे फल और सब्जियां खाना, तंबाकू से दूर रहना, शराब का सेवन सीमित करना, तनाव को नियंत्रित रखना और पर्याप्त नींद लेना बेहद जरूरी है.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 30 May 2026 21:30:13 +0530</pubDate>
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        <title>Ebola Virus Outbreak: कितना खतरनाक है इबोला का नया स्ट्रेन, अब तक मिले 900 से ज्यादा संक्रमित; 223 की हुई मौत</title>
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        <description><![CDATA[ Ebola Virus Outbreak : दुनिया में कोरोना के बाद अब एक और खतरनाक वायरस ने चिंता बढ़ा दी है. अफ्रीकी देशों डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो और युगांडा में इबोला वायरस का संक्रमण तेजी से फैल रहा है. हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (WHO) ने इसे अंतरराष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित कर दिया है. इस बार इबोला का जो नया स्ट्रेन सामने आया है, उसे बुंडीबुग्यो स्ट्रेन कहा जा रहा है.
विशेषज्ञों के मुताबिक, यह वायरस तेजी से संक्रमण फैलाने वाला है और फिलहाल इसके लिए कोई पूरी तरह मंजूर वैक्सीन या खास इलाज मौजूद नहीं है. इसी वजह से दुनियाभर की हेल्थ एजेंसियां अलर्ट मोड पर आ गई हैं. ऐसे में आइए जानते हैं कि इबोला का नया स्ट्रेन कितना खतरनाक है, इससे अब तक 900 से ज्यादा संक्रमित मिले और 223 की मौत हुई.&amp;nbsp;
इबोला का नया स्ट्रेन कितना खतरनाक है?
डॉक्टरों के मुताबिक, इबोला वायरस कोरोना से ज्यादा जानलेवा है. कोरोना में जहां मृत्यु दर काफी कम थी, वहीं इबोला से संक्रमित होने वाले लगभग आधे मरीजों की मौत हो सकती है. मेडिकल रिपोर्ट्स के अनुसार, इबोला का फेटैलिटी रेट करीब 50 प्रतिशत तक पहुंच सकता है. हालांकि यह वायरस कोरोना की तरह हवा में तेजी से नहीं फैलता है.&amp;nbsp;
कैसे फैलता है इबोला वायरस?
विशेषज्ञों के अनुसार, इबोला वायरस संक्रमित व्यक्ति के खून, पसीने, लार या शरीर के अन्य तरल पदार्थों के सीधे संपर्क में आने से फैलता है. यह वायरस हवा के जरिए नहीं फैलता, इसलिए इसका ट्रांसमिशन कोरोना की तुलना में काफी धीमा माना जाता है. यही वजह है कि इसके वैश्विक महामारी बनने का खतरा कम बताया जा रहा है.
अब तक कितने मामले सामने आए?
WHO और अमेरिकी स्वास्थ्य एजेंसियों की रिपोर्ट के अनुसार अब तक 900 से ज्यादा संदिग्ध मामले सामने आ चुके हैं. इनमें 100 से ज्यादा मामलों की कन्फर्मेशन हो चुकी है. कई लोगों की मौत भी दर्ज की गई है. कांगो के इटुरी, नॉर्थ किवु और साउथ किवु इलाके इस समय सबसे ज्यादा प्रभावित बताए जा रहे हैं. वहीं युगांडा में भी संक्रमण के कई मामले सामने आए हैं.
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भारत में कितना खतरा है?
भारत में इबोला का कोई मामला सामने नहीं आया है, लेकिन केंद्र सरकार ने सावधानी बढ़ा दी हैं. स्वास्थ्य मंत्रालय ने कांगो, युगांडा और दक्षिण सूडान से आने वाले यात्रियों के लिए हेल्थ एडवाइजरी जारी की है. एयरपोर्ट्स पर स्क्रीनिंग बढ़ा दी गई है और क्वारंटाइन व्यवस्था को भी मजबूत किया गया है. साथ ही भारत की वैज्ञानिक और फार्मा कंपनियां इबोला से बचाव के लिए वैक्सीन और एंटीबॉडी डेवलपमेंट में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के पास मजबूत फार्मास्यूटिकल क्षमता और रिसर्च नेटवर्क है, जिसकी मदद से इबोला जैसी बीमारियों से लड़ने के लिए बेहतर तैयारी की जा सकती है.
इबोला से बचने के लिए क्या सावधानी रखें?
इबोला से बचने के लिए संक्रमित व्यक्ति के सीधे संपर्क में आने से बचना बेहद जरूरी है. अफ्रीकी देशों की गैर जरूरी यात्रा से बचें. नियमित रूप से हाथ साफ करें और किसी भी तरह के बुखार, उल्टी, कमजोरी या ब्लीडिंग जैसे लक्षण दिखने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें. अगर कोई व्यक्ति हाल ही में प्रभावित देशों से लौटा है, तो उसकी स्वास्थ्य जांच जरूर करानी चाहिए.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 30 May 2026 21:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>Tobacco Side Effects On Bones: क्या तंबाकू आपकी हड्डियों और रीढ़ को भी पहुंचा रहा नुकसान? एक्सपर्ट ने बताया डराने वाला सच</title>
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        <description><![CDATA[ Tobacco Side Effects On Bones: क्या तंबाकू आपकी हड्डियों और रीढ़ को भी पहुंचा रहा नुकसान? एक्सपर्ट ने बताया डराने वाला सच ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 30 May 2026 21:30:11 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Physical Relationship Health: बिस्तर पर वक्त बढ़ाने के लिए आप भी लेते हैं टॉनिक? इन गंभीर बीमारियों को मिल रहा न्यौता</title>
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        <description><![CDATA[ Health Risks Of Sexual Performance Tonics: आजकल बाजार में पुरुषों की ताकत बढ़ाने और शारीरिक संबंध के दौरान ज्यादा देर तक टिके रहने का दावा करने वाले टॉनिक और सप्लीमेंट्स की भरमार है. सोशल मीडिया से लेकर मेडिकल स्टोर तक, हर जगह ऐसे प्रोडक्ट्स आसानी से मिल जाते हैं. कई लोग बिना डॉक्टर की सलाह के इनका इस्तेमाल भी शुरू कर देते हैं. लेकिन एक्सपर्ट्स चेतावनी दे रहे हैं कि ये आदत शरीर को फायदा पहुंचाने के बजाय गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ा सकती है.
क्या सच में ये फिजिकल एक्टिविटी को मजबूत करते हैं?
स्क्रिप्स क्लिनिक के प्राइमरी केयर फिजिशियन डॉ लुइगी सिमोन के मुताबिक, शारीरिक क्षमता बढ़ाने का दावा करने वाले ज्यादातर सप्लीमेंट्स पर वैज्ञानिक तरीके से पर्याप्त रिसर्च नहीं हुई है. उनका कहना है कि कई बार लोगों को सिर्फ मेंटल तौर पर फर्क महसूस होता है, लेकिन इन प्रोडक्ट्स के असर को लेकर ठोस सबूत मौजूद नहीं हैं. डॉ सिमोन ने साफ कहा कि ताकत बढ़ाने या लंबे समय तक बेहतर प्रदर्शन करने जैसे दावे अभी तक पूरी तरह साबित नहीं हो पाए हैं.
क्या हो सकती है इनसे दिक्कत?
एक्सपर्ट के अनुसार, ऐसे सप्लीमेंट्स हर व्यक्ति के लिए सुरक्षित नहीं होते. कई बार इनमें ऐसे तत्व पाए जाते हैं जो एलर्जी, ब्लड प्रेशर की समस्या या दूसरी दवाओं के साथ खतरनाक रिएक्शन पैदा कर सकते हैं. कुछ प्रोडक्ट्स में छिपे हुए केमिकल या दवाइयां भी मिल सकती हैं, जो शरीर को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती हैं. यही वजह है कि बिना जांचे-परखे किसी भी टॉनिक का इस्तेमाल करना जोखिम भरा माना जा रहा है.
अगर यूज करने के बाद कोई दिक्कत हो तो क्या करें?
डॉक्टर्स का कहना है कि अगर किसी व्यक्ति को शारीरिक संबंध से जुड़ी कोई समस्या महसूस हो रही है, तो उसे खुद इलाज करने के बजाय डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए. कई बार हाई ब्लड प्रेशर, दिल की बीमारी, डायबिटीज या तनाव जैसी समस्याएं भी इसका कारण बन सकती हैं. ऐसे मामलों में असली बीमारी का इलाज ज्यादा जरूरी होता है, न कि सिर्फ ताकत बढ़ाने वाले टॉनिक का सहारा लेना.
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इस बात का जरूर रखें ध्यान
डॉ लुइगी सिमोन बताते हैं कि कई लोग शर्म या झिझक की वजह से डॉक्टर से खुलकर बात नहीं करते और सीधे सप्लीमेंट्स लेना शुरू कर देते हैं. लेकिन ऐसा करना खतरनाक साबित हो सकता है। उनका कहना है कि डॉक्टर आपकी समस्या की असली वजह समझकर सही इलाज बता सकते हैं. अगर किसी दवा की वजह से दिक्कत हो रही हो, तो डॉक्टर दवा बदलने की सलाह भी दे सकते हैं. एक्सपर्ट्स यह भी बताते हैं कि बाजार में मिलने वाले सप्लीमेंट्स दवाइयों की तरह सख्त जांच प्रक्रिया से नहीं गुजरते फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन यानी एफडीए इन प्रोडक्ट्स को बाजार में आने से पहले पूरी तरह मंजूरी नहीं देता ऐसे में कई बार इनके अंदर मौजूद चीजें शरीर के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 29 May 2026 13:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Basic Life Support: CPR क्यों है बेहद जरूरी, हर इंसान को क्यों सीखनी चाहिए जिंदगी बचाने वाली यह तकनीक?</title>
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        <description><![CDATA[ Basic Life Support: CPR क्यों है बेहद जरूरी, हर इंसान को क्यों सीखनी चाहिए जिंदगी बचाने वाली यह तकनीक? ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 29 May 2026 13:30:06 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Brain Health: दिमाग को खोखला कर रही मोबाइल की लत, डॉक्टरों ने बताया नींद और थकान का खौफनाक सच</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/brain-health-दिमाग-को-खोखला-कर-रही-मोबाइल-की-लत-डॉक्टरों-ने-बताया-नींद-और-थकान-का-खौफनाक-सच</link>
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        <description><![CDATA[ How Screen Time Affects Brain Health: आज की जिंदगी में इंसान शायद ही कभी सच में शांत बैठ पाता है. पहले लंबा सफर खिड़की के बाहर देखते हुए कट जाता था, लाइन में इंतजार करते समय लोग आसपास की चीजों को महसूस करते थे और रात को सोने से पहले दिमाग खुद-ब-खुद धीमा पड़ जाता था. लेकिन अब हर खाली पल किसी न किसी स्क्रीन से भर चुका है. कभी मोबाइल नोटिफिकेशन, कभी छोटी वीडियो, कभी पॉडकास्ट, तो कभी लगातार आने वाले मैसेज. ऐसे में दिमाग को असली आराम मिल ही नहीं पा रहा.&amp;nbsp;
क्या इससे हमारे ऊपर असर पड़ रहा है?
न्यूरोलॉजिस्ट्स का कहना है कि लगातार मिलने वाला यह बैकग्राउंड स्टिमुलेशन इंसान के दिमाग के काम करने के तरीके को बदल रहा है. बाहर से देखने पर भले कोई इंसान आराम करता दिखाई दे, लेकिन दिमाग लगातार एक्टिव रहता है. यही वजह है कि आजकल लोग बिना ज्यादा शारीरिक मेहनत किए भी मानसिक रूप से थका हुआ महसूस करते हैं.&amp;nbsp;
क्या हमारा ब्रेन हमेशा एक्टिव रहने के लिए बना है?
होसमैट हॉस्पिटल्स के न्यूरोलॉजिस्ट डॉ प्रभु ने TOI को बताया कि, इंसानी दिमाग को कभी भी इस तरह लगातार एक्टिव रहने के लिए नहीं बनाया गया था. पहले दिनभर में छोटे-छोटे ऐसे पल मिल जाते थे, जब दिमाग खुद शांत हो जाता था. लेकिन अब हर खाली जगह डिजिटल चीजों से भर चुकी है. डॉ प्रभु कहते हैं कि स्मार्टफोन, सोशल मीडिया, लगातार आने वाले नोटिफिकेशन और हर समय जुड़े रहने का दबाव इंसानी दिमाग को लगातार एक्टिव रखता है.&amp;nbsp;
हमेशा एक्टिव कहने का क्या होता है असर?
एक्सपर्ट बताते हैं कि समस्या यह है कि यह थकान तुरंत महसूस नहीं होती. लोगों को लगता है कि मोबाइल स्क्रॉल करना या देर रात तक वीडियो देखना आराम देने वाला काम है, लेकिन असल में दिमाग लगातार नई जानकारी को प्रोसेस करता रहता है. यही कारण है कि नर्वस सिस्टम हमेशा हल्की सतर्क अवस्था में बना रहता है. धीरे-धीरे यह आदत मानसिक थकान, ध्यान की कमी और इमोशनल बर्नआउट में बदल सकती है. नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ हेल्थ की रिसर्च में भी सामने आया है कि जरूरत से ज्यादा स्क्रीन देखने और देर रात तक डिजिटल चीजों में लगे रहने से नींद की क्वालिटी, इमोशनल संतुलन और ध्यान लगाने की क्षमता पर असर पड़ता है. खासतौर पर देर रात की लगातार स्क्रॉलिंग दिमाग को अलर्ट मोड में बनाए रखती है.&amp;nbsp;
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क्यों हमारे लिए सही नींद जरूरी है?
अरेटे हॉस्पिटल्स के न्यूरोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ सुरेश बाबू पी बताते हैं कि दिमाग के अंदर एक खास सफाई सिस्टम होता है, जिसे ग्लिम्फैटिक सिस्टम कहा जाता है. यह सिस्टम गहरी नींद के दौरान सबसे ज्यादा सक्रिय होता है और दिनभर जमा होने वाले जहरीले मेटाबॉलिक पदार्थों को बाहर निकालने का काम करता है. डॉ सुरेश बाबू पी के अनुसार, अगर लगातार नींद की कमी रहे या रात में ज्यादा स्क्रीन इस्तेमाल की जाए, तो लंबे समय में दिमाग की काम करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है. उन्होंने कम से कम 6 से 8 घंटे की बिना रुकावट नींद लेने और रात में स्क्रीन टाइम घटाने की सलाह दी है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 29 May 2026 13:30:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Brain, Health:, दिमाग, को, खोखला, कर, रही, मोबाइल, की, लत, डॉक्टरों, ने, बताया, नींद, और, थकान, का, खौफनाक, सच</media:keywords>
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        <title>Digital Detox: क्या है डिजिटल डिटॉक्स? जल्द नहीं समझे तो घेर लेंगी बीमारियां, नर्क बन जाएगा घर</title>
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        <description><![CDATA[ Side Effects Of Excessive Screen Time: आज की दुनिया में मोबाइल, लैपटॉप और सोशल मीडिया हमारी जिंदगी का ऐसा हिस्सा बन चुके हैं कि बिना स्क्रीन के कुछ घंटे बिताना भी मुश्किल लगने लगा है. सुबह आंख खुलते ही फोन और रात को सोने से पहले आखिरी नजर भी स्क्रीन पर ही जाती है. लेकिन डॉक्टरों और रिसर्च में अब लगातार यह चेतावनी दी जा रही है कि अगर समय रहते &quot;डिजिटल डिटॉक्स&quot; नहीं समझा गया, तो यह आदत धीरे-धीरे शरीर और दिमाग दोनों को बीमार बना सकती है.&amp;nbsp;
क्या होता है डिजिटल डिटॉक्स का मतलब?
डिजिटल डिटॉक्स का मतलब है कुछ समय के लिए मोबाइल, सोशल मीडिया, लैपटॉप और बाकी डिजिटल उपकरणों से दूरी बनाना, ताकि दिमाग और शरीर को लगातार मिलने वाले डिजिटल दबाव से राहत मिल सके. Aspenvalleyhealth के एक्सपर्ट मानते हैं कि इसे सिर्फ नया ट्रेंड नहीं, बल्कि मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य से जुड़ा जरूरी कदम मान है.&amp;nbsp;
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बढ़ रही है इससे दिक्कत?
डॉक्टरों के मुताबिक, लगातार स्क्रीन पर समय बिताने से लोगों में नींद की समस्या, तनाव, सिरदर्द, आंखों में जलन और चिड़चिड़ापन तेजी से बढ़ रहा है. देर रात तक फोन चलाने की आदत दिमाग को आराम नहीं करने देती. सोशल मीडिया पर लगातार दूसरों की &quot;परफेक्ट जिंदगी&quot; देखने से तुलना की भावना बढ़ती है, जिससे आत्मविश्वास और मानसिक शांति दोनों प्रभावित होते हैं. रिसर्च में यह भी पाया गया है कि लगातार फोन चेक करने की आदत दिमाग की ध्यान केंद्रित करने की क्षमता को कमजोर करती है. कई लोग बिना वजह बार-बार मोबाइल देखने लगते हैं. यहां तक कि फोन पास न होने पर बेचैनी, घबराहट और तनाव महसूस होने लगता है. एक्सपर्ट इसे डिजिटल निर्भरता का शुरुआती संकेत मानते हैं.&amp;nbsp;
लगातार स्कीन देखने के क्या होते हैं नुकसान?
लंबे समय तक स्क्रीन देखने का असर सिर्फ दिमाग पर नहीं, शरीर पर भी पड़ता है. &quot;टेक नेक&quot; यानी लगातार झुककर मोबाइल देखने की वजह से गर्दन दर्द, पीठ दर्द और सिरदर्द की समस्या बढ़ रही है. आंखों में सूखापन, धुंधला दिखना और रोशनी से परेशानी भी अब आम हो चुकी है. डॉक्टरों का कहना है कि कम उम्र के लोग भी अब ऐसी समस्याओं के साथ अस्पताल पहुंच रहे हैं, जो पहले ज्यादा उम्र में दिखाई देती थीं. सबसे बड़ा असर रिश्तों पर पड़ रहा है. एक ही घर में रहने वाले लोग घंटों मोबाइल में व्यस्त रहते हैं, लेकिन आपस में बातचीत कम होती जा रही है. परिवार के साथ समय बिताने के बजाय लोग सोशल मीडिया पर ज्यादा सक्रिय रहते हैं. &amp;nbsp;धीरे-धीरे घर में चुप्पी, दूरी और तनाव बढ़ने लगता है. यही वजह है कि एक्सपर्ट चेतावनी दे रहे हैं कि अगर डिजिटल आदतों पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो घर का माहौल भी मानसिक तनाव का कारण बन सकता है.&amp;nbsp;
कैसे कर सकते हैं इसको ठीक?
हालांकि राहत की बात यह है कि छोटी-छोटी आदतें बड़ा बदलाव ला सकती हैं. एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि सुबह उठने के बाद कम से कम एक घंटा फोन से दूरी रखें. खाने के समय मोबाइल इस्तेमाल न करें और सोने से दो घंटे पहले स्क्रीन बंद कर दें. सप्ताह में एक दिन डिजिटल ब्रेक लेना भी दिमाग को राहत दे सकता है. रिसर्च में यह भी सामने आया है कि जब लोग कुछ समय के लिए प्रकृति, परिवार और वास्तविक बातचीत के साथ समय बिताते हैं, तो तनाव कम होता है, नींद बेहतर होती है और दिमाग ज्यादा शांत महसूस करता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 29 May 2026 01:30:18 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Tips for Comfortable Sleep: रात को नहीं आ रही नींद, करें ये काम और चैन से सो जाएं</title>
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        <description><![CDATA[ Tips for Comfortable Sleep:&amp;nbsp;आजकल बड़ी संख्या में लोग रात में नींद न आने की समस्या से परेशान हैं। देर रात तक जागना, बार-बार आंख खुलना और सुबह थकान महसूस होना अब आम बात बन चुकी है. हेल्थ एक्सपर्ट्स का कहना है कि खराब लाइफस्टाइल और मोबाइल की आदत इसके पीछे सबसे बड़ी वजह है. हालांकि कुछ आसान बदलाव करके इस परेशानी से राहत पाई जा सकती है.
नींद से जुड़े विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर रात में जल्दी और गहरी नींद चाहिए तो सोने से पहले दिमाग को शांत करना बेहद जरूरी है. एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि बिस्तर पर जाने से कम से कम आधा घंटा पहले मोबाइल और लैपटॉप का इस्तेमाल बंद कर देना चाहिए. स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट दिमाग को एक्टिव रखती है, जिससे नींद आने में देरी होती है.
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एक्सपर्ट ने बताया सबसे आसान तरीका
विशेषज्ञों के अनुसार, सोने से पहले 5 से 10 मिनट तक गहरी सांस लेने की एक्सरसाइज करना काफी फायदेमंद हो सकता है.इससे दिमाग शांत होता है और शरीर रिलैक्स महसूस करता है.कई डॉक्टर इसे नेचुरल स्लीप थेरेपी भी मानते हैं.
रात में चाय-कॉफी पीना पड़ सकता है भारी
हेल्थ एक्सपर्ट्स चेतावनी देते हैं कि शाम के बाद ज्यादा चाय या कॉफी पीने से भी नींद खराब हो सकती है। इनमें मौजूद कैफीन कई घंटों तक दिमाग को सक्रिय रखता है.ऐसे में रात के समय हल्का खाना खाने की सलाह दी जाती है.
कमरे का माहौल भी करता है असर
विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर कमरे में ज्यादा रोशनी या शोर होगा तो दिमाग पूरी तरह आराम नहीं कर पाता. इसलिए सोते समय कमरे की लाइट धीमी रखें और शांत माहौल बनाने की कोशिश करें. इससे शरीर जल्दी स्लीप मोड में चला जाता है.
हर दिन एक जैसा रखें सोने का समय
डॉक्टरों का कहना है कि शरीर की बॉडी क्लॉक को सही रखना बेहद जरूरी है.अगर रोज अलग-अलग समय पर सोया जाए तो नींद का पैटर्न बिगड़ सकता है. इसलिए रोज लगभग एक ही समय पर सोने और सुबह उठने की आदत डालनी चाहिए.इसके साथ ही एक्सपर्ट्स यह भी मानते हैं कि अच्छी नींद सिर्फ थकान दूर नहीं करती बल्कि मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को भी बेहतर बनाती है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Fri, 29 May 2026 01:30:16 +0530</pubDate>
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        <title>Brain Health: B12 नॉर्मल होने पर भी सुन्न हो रहे हाथ&amp;पैर और घट रही याददाश्त, रिसर्च में सामने आया सच</title>
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        <description><![CDATA[ Can Normal Vitamin B12 Levels Still Affect Brain Health: विटामिन बी12 को लंबे समय से शरीर और दिमाग के लिए बेहद जरूरी न्यूट्रिएंट माना जाता रहा है. डॉक्टर आमतौर पर ब्लड टेस्ट के जरिए यह जांचते हैं कि शरीर में इसकी मात्रा सही है या नहीं. अगर रिपोर्ट तय सीमा से ऊपर होती है, तो इंसान को पूरी तरह नॉर्मल माना जाता है. लेकिन अब एक नई रिसर्च ने इस सोच पर सवाल खड़े कर दिए हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि कई बुजुर्गों में बी12 लेवल नॉर्मल होने के बावजूद दिमाग और नसों से जुड़ी दिक्कतें शुरू हो सकती हैं.&amp;nbsp;
&amp;nbsp;बी12 लेवल नॉर्मल होने के बावजूद दिक्कत क्यों?
यह रिसर्च कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के साइंटिस्ट ने की है, जिसके नतीजे एक मेडिकल जर्नल में प्रकाशित हुए हैं. स्टडी में पाया गया कि कुछ बुजुर्गों में सामान्य बी12 लेवल होने के बावजूद ब्रेन फंक्शन और नर्वस सिस्टम पर असर दिखाई देने लगा था. विटामिन बी12 शरीर में रेड ब्लड सेल्स बनाने, नसों को हेल्दी रखने और डीएनए बनाने में अहम रोल निभाता है. इसकी कमी से एनीमिया, कमजोरी, हाथ-पैर सुन्न होना, याददाश्त कमजोर होना और बैलेंस बिगड़ने जैसी समस्याएं हो सकती हैं. अब तक डॉक्टर मुख्य रूप से गंभीर कमी वाले मामलों पर ध्यान देते रहे हैं, लेकिन नई रिसर्च कहती है कि दिक्कतें इससे काफी पहले शुरू हो सकती हैं.
रिसर्च में हुआ चौंकाने वाला खुलासा
रिसर्च टीम ने करीब 71 साल औसत उम्र वाले 231 हेल्दी बुजुर्गों पर स्टडी किया. इनमें किसी को डिमेंशिया या हल्की मेंटल कमजोरी की समस्या नहीं थी. साइंटिस्ट ने सिर्फ कुल बी12 लेवल ही नहीं, बल्कि एक्टिव बी12 की भी जांच की. यह वही रूप है, जिसे शरीर वास्तव में इस्तेमाल कर पाता है. दिलचस्प बात यह रही कि ज्यादातर लोगों का बी12 लेवल मेडिकल मानकों के हिसाब से सामान्य था. इसके बावजूद जिन लोगों में एक्टिव बी12 कम था, उनमें सोचने की स्पीड और विजुअल प्रोसेसिंग धीमी पाई गई. रिसर्च में यह भी सामने आया कि उनके दिमाग की नसें संकेतों पर धीमी प्रतिक्रिया दे रही थीं.
जांच में निकल रही है खामियां
ब्रेन स्कैन में साइंटिस्ट ने एक और अहम बात देखी. जिन लोगों में एक्टिव बी12 कम था, उनके दिमाग में व्हाइट मैटर लीजन ज्यादा पाए गए. व्हाइट मैटर दिमाग के अलग-अलग हिस्सों के बीच संदेश पहुंचाने का काम करता है. इन हिस्सों को नुकसान पहुंचने का संबंध स्ट्रोक, डिमेंशिया और मानसिक गिरावट से जोड़ा जाता है. न्यूरोलॉजिस्ट एक्सपर्ट ने कहा कि यह स्टडी दिखाती है कि मौजूदा मेडिकल मानक बी12 की शुरुआती ब्रेन और न्यूरोलॉजिकल समस्याओं को पूरी तरह पकड़ नहीं पा रहे हैं. उनके मुताबिक, कई लोगों में साफ लक्षण दिखने से पहले ही नसों और दिमाग पर असर शुरू हो सकता है.
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क्या होता है विटामिन बी12 &amp;nbsp;का असर?
वैज्ञानिकों का कहना है कि उम्र बढ़ने के साथ शरीर में बी12 को एब्जार्व करने की क्षमता कम हो जाती है. कुछ दवाइयां, पाचन से जुड़ी समस्याएं और पूरी तरह शाकाहारी डाइट भी बी12 की कमी का खतरा बढ़ा सकती है. हालांकि रिसर्चर्स ने साफ किया है कि यह स्टडी सीधे तौर पर यह साबित नहीं करती कि कम एक्टिव बी12 ही मेंटल गिरावट की वजह है. लेकिन यह जरूर दिखाती है कि सामान्य रिपोर्ट आने के बावजूद ब्रेन में बदलाव शुरू हो सकते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 29 May 2026 01:30:15 +0530</pubDate>
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        <title>Wegovy Side Effects: स्लिम होने के लिए दवा लेने वाले हो जाएं सावधान, हमेशा के लिए जा सकती है आंखों की रोशनी</title>
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        <description><![CDATA[ Eye Problems Linked To Weight Loss Drugs: वजन कम करने के लिए इस्तेमाल होने वाली मशहूर दवा वेगोवी को लेकर एक नई मेडिकल स्टडी ने चिंता बढ़ा दी है. रिसर्च में दावा किया गया है कि यह दवा आंखों से जुड़ी एक दुर्लभ लेकिन गंभीर समस्या का खतरा बढ़ा सकती है, जिससे अचानक नजर जाने की नौबत तक आ सकती है. &amp;nbsp;चलिए आपको बताते हैं कि आखिर इसको लेकर रिसर्च में निकला क्या है.&amp;nbsp;
क्यों आंखों को है इससे खतरा?
यह स्टडी एक मेडिकल जर्नल में प्रकाशित हुई है, जिसमें साइंटिस्ट ने पाया कि सेमाग्लूटाइड बेस्ड दवाओं में वेगोवी का कनेक्शन इस्केमिक ऑप्टिक न्यूरोपैथी नाम की आंखों की बीमारी से सबसे ज्यादा जुड़ा दिखाई दिया. यह ऐसी स्थिति होती है, जब आंखों की नस तक ब्लड सप्लाई कम हो जाती है या रुक जाती है. इससे अचानक नजर धुंधली हो सकती है और कुछ मामलों में आंखों की रोशनी हमेशा के लिए भी जा सकती है.
डायबिटीज के लिए बनी थी दवा
दरअसल, जीएलपी-1 दवाएं पहले टाइप-2 डायबिटीज के इलाज के लिए बनाई गई थीं, लेकिन अब इन्हें तेजी से मोटापा कम करने के लिए भी इस्तेमाल किया जा रहा है. &amp;nbsp;वेगोवी और ओजेम्पिक दोनों में सेमाग्लूटाइड नाम का एक्टिव कंपाउंड होता है. फर्क सिर्फ इतना है कि वेगोवी खास तौर पर मोटापा कम करने के लिए मंजूर की गई है, जबकि ओजेम्पिक मुख्य रूप से डायबिटीज मरीजों को दी जाती है.&amp;nbsp;
रिसर्चर्स ने 2017 से 2024 के बीच अमेरिकी दवा निगरानी सिस्टम में दर्ज साइड इफेक्ट रिपोर्ट्स का विश्लेषण किया. वैज्ञानिकों ने करीब 3 करोड़ रिपोर्ट्स को जांचा, जिनमें 31 हजार से ज्यादा केस सेमाग्लूटाइड दवाओं से जुड़े थे. स्टडी में वेगोवी, ओजेम्पिक, रायबेल्सस, माउंजारो और जैपबाउंड जैसी दवाओं की तुलना की गई.
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कम मरीज के बावजूद इसका रिस्क क्यों ज्यादा?
हालांकि ओजेम्पिक के कुल मामले ज्यादा सामने आए, क्योंकि यह दवा लंबे समय से इस्तेमाल हो रही है, लेकिन आंकड़ों में वेगोवी का रिस्क सबसे ज्यादा दिखाई दिया. रिसर्च में वेगोवी से जुड़े 28 और ओजेम्पिक से जुड़े 47 मामले सामने आए. इसके बावजूद वेगोवी में इस आंखों की बीमारी का खतरा सामान्य से लगभग 75 गुना ज्यादा पाया गया, जबकि ओजेम्पिक में यह करीब 19 गुना था. साइंटिस्ट का मानना है कि इसके पीछे कई वजहें हो सकती हैं. वेगोवी आमतौर पर ज्यादा डोज में दी जाती है. इसके अलावा इंजेक्शन वाली दवाएं शरीर में तेजी से असर करती हैं. रिसर्चर्स का कहना है कि तेजी से वजन घटना, शरीर में पानी की कमी, ब्लड प्रेशर में बदलाव या नसों के रेगुलेशन में बदलाव आंखों की नस तक ब्लड सप्लाई कम कर सकते हैं.&amp;nbsp;
क्या सच में यह दवा है जिम्मेदार?
हालांकि एक्सपर्ट ने साफ कहा है कि यह स्टडी सीधे तौर पर यह साबित नहीं करती कि वेगोवी ही इस बीमारी की वजह है. रिसर्च में इस्तेमाल किए गए डेटा सिस्टम की अपनी सीमाएं भी हैं. कई मामलों में पूरी मेडिकल हिस्ट्री उपलब्ध नहीं थी और कुछ रिपोर्ट्स मीडिया कवरेज की वजह से ज्यादा दर्ज हो सकती हैं. फिर भी एक्सपर्ट्स का कहना है कि इस रिसर्च को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, क्योंकि दुनिया भर में मोटापा और डायबिटीज के इलाज में इन दवाओं का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है. &amp;nbsp;साइंटिस्ट अब इन दवाओं पर आगे और गहरी रिसर्च करने की तैयारी कर रहे हैं.
इसे भी पढ़ें-Stress And Heart Health: लगातार तनाव से 20-30 की उम्र में हाई हो रहा बीपी, जानें ऑफिस स्ट्रेस क्यों बन रहा साइलेंट किलर?
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 29 May 2026 01:30:13 +0530</pubDate>
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        <title>Fix the Fitness: रोज कसरत करने के बावजूद भी नहीं घट रहा वजन? अपनाएं ये तीन तरीके, जीरो साइज हो जाएगा फिगर</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/fix-the-fitness-रोज-कसरत-करने-के-बावजूद-भी-नहीं-घट-रहा-वजन-अपनाएं-ये-तीन-तरीके-जीरो-साइज-हो-जाएगा-फिगर</link>
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        <description><![CDATA[ अक्सर देखने में आता है कि लोग हद से ज्यादा एक्सरसाइज करते हैं, इसके बावजूद उनका वजन कम नहीं होता.इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं क्या आप भी इस समस्या से परेशान हैं? तो जानिए कैसे आप पा सकते हैं इस समस्या से निजात &amp;nbsp;
कई लोग वजन घटाने के लिए सालों तक जिम में पसीना बहाते हैं. लेकिन रोज भारी कसरत करने के बाद भी जब वजन का कांटा टस से मस नहीं होता, तो निराशा होना लाजमी है. &amp;nbsp;दरअसल, वजन कम करना सिर्फ कसरत पर निर्भर नहीं करता. इसके पीछे शरीर का मेटाबॉलिज्म,खान-पान और जीवनशैली जैसे कई महत्वपूर्ण कारक काम करते हैं.
अगर आप भी इस समस्या से जूझ रहे हैं, तो आइए आपको बताते हैं इसके लिए कुछ आसान और वैज्ञानिक तरीके जिनको अपनाकर आप अपने फिटनेस गोल को हासिल कर सकते हैं
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फैट से झट से फिट होने के रामबाण उपाय
1. खान-पान में सुधार और कैलोरी मैनेजमेंट- वजन घटाने का सबसे पहला और बुनियादी नियम है कैलोरी डेफिसिट. इसका मतलब है कि आप दिनभर में जितनी कैलोरी कसरत के जरिए बर्न करते हैं, उससे कम कैलोरी भोजन के माध्यम से ग्रहण करें. लोग अक्सर सोचते हैं कि कसरत करने के बाद वे कुछ भी खा सकते हैं. लेकिन यह एक बड़ी भूल है. एक हैवी वर्कआउट के बाद खाया गया एक समोसा या कोल्ड ड्रिंक आपकी पूरी मेहनत पर पानी फेर सकता है. इसलिए अपनी डाइट में प्रोटीन, फाइबर और हरी सब्जियों को शामिल करें और मीठे, मैदा व जंक फूड से पूरी तरह दूरी बना लें.&amp;nbsp;
&amp;nbsp;2.तनाव से दूरी और पर्याप्त आराम- कम नींद और अत्यधिक मानसिक तनाव वजन न घटने के दो सबसे बड़े और छुपे हुए कारण हैं. जैसे जब आप 7-8 घंटे की गहरी नींद नहीं लेते हैं, तो शरीर का मेटाबॉलिज्म धीमा हो जाता है. इसके अलावा, तनाव के दौरान शरीर में कोर्टिसोल नामक हार्मोन का लेवल बढ़ जाता है. यह हार्मोन शरीर में विशेषकर पेट के आसपास जिद्दी चर्बी जिसे बैली फैट भी कहा जाता है को जमा करने का काम करता है.इसके साथ ही कसरत का पूरा फायदा उठाने के लिए समय पर सोएं, योग करें और खुद को तनावमुक्त रखें.&amp;nbsp;
3. कसरत के तरीकों में बदलाव- अगर आप रोज एक ही तरह की कसरत जैसे &amp;nbsp;कार्डियो या सिर्फ रनिंग महीनों से कर रहे हैं, तो आपका शरीर उसका आदी हो जाता है. इसे वेट लॉस प्लेटो कहते हैं. इस स्थिति को तोड़ने के लिए अपने रूटीन में बदलाव करें. जैसे कार्डियो के साथ स्ट्रेंथ ट्रेनिंग (वजन उठाना) और हाई-इंटेनसिटी इंटरवल ट्रेनिंग को शामिल करें. इसके अलावा, हफ्ते में मिलने वाले चीट डे पर जरूरत से ज्यादा खाने की आदत से बचें.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Wed, 27 May 2026 21:30:14 +0530</pubDate>
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        <title>Foods To Avoid During Nautapa: बर्गर&amp;पिज्जा से लेकर कोल्ड ड्रिंक तक.. नौतपा में भूलकर भी न खाएं ये चीजें, हो सकता है उल्टा असर</title>
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        <description><![CDATA[ Foods You Should Avoid During Nautapa Heatwave: नौतपा की शुरुआत होते ही गर्मी अपने सबसे खतरनाक रूप में पहुंच जाती है. तेज धूप, गर्म हवाएं और लगातार बढ़ता तापमान शरीर को तेजी से थका देता है. ऐसे मौसम में सिर्फ बाहर की गर्मी ही नहीं, बल्कि खानपान भी आपकी सेहत पर बड़ा असर डालता है. Sahyadrihospital की रिपोर्ट के अनुसार, गर्मी में कुछ चीजें खाने से शरीर का तापमान और बढ़ सकता है, जिससे डिहाइड्रेशन, हीट स्ट्रोक, उल्टी, दस्त और कमजोरी जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है. इसलिए नौतपा में खानपान को लेकर ज्यादा सावधानी बरतने की जरूरत होती है।.&amp;nbsp;
&amp;nbsp;तली-भुनी चीजों से दूरी
एक्सपर्ट के मुताबिक, तली-भुनी चीजें जैसे बर्गर, पिज्जा, फ्रेंच फ्राइज और दूसरी ऑयली फूड्स गर्मियों में शरीर पर अतिरिक्त दबाव डालती हैं. इन्हें पचाने में शरीर को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है, जिससे अंदरूनी गर्मी बढ़ सकती है. इसके अलावा ज्यादा मसालेदार खाना भी नौतपा में परेशानी बढ़ा सकता है. मिर्च में मौजूद तत्व शरीर का तापमान बढ़ा सकते हैं, खासकर उन लोगों में जो ज्यादा मसालेदार भोजन खाने के आदी नहीं हैं. &amp;nbsp;इसके साथ एक्सपर्ट रेड मीट से भी दूरी बनाने की सलाह देते हैं. रेड मीट को पचाने में शरीर ज्यादा ऊर्जा खर्च करता है, जिससे शरीर का तापमान बढ़ सकता है.&amp;nbsp;
पीने वाली इन चीजों से दूरी
कोल्ड ड्रिंक और सोडा गर्मी में राहत जरूर देते हैं, लेकिन एक्सपर्ट्स मानते हैं कि इनमें मौजूद ज्यादा शुगर शरीर में पानी की कमी बढ़ा सकती है. यही वजह है कि इन्हें ज्यादा मात्रा में पीना नुकसानदायक हो सकता है. &amp;nbsp;इसी तरह चाय, कॉफी और एनर्जी ड्रिंक्स में मौजूद कैफीन शरीर को डिहाइड्रेट कर सकता है और शरीर का तापमान बढ़ा सकता है.&amp;nbsp;
पैकेज्ड स्नैक्स से भी दूरी
हेल्थ रिपोर्ट्स के अनुसार, ज्यादा नमक वाले पैकेज्ड स्नैक्स जैसे चिप्स और नमकीन भी शरीर का फ्लूइड बैलेंस बिगाड़ सकते हैं. अधिक सोडियम शरीर की सेल्स से पानी खींचता है, जिससे डिहाइड्रेशन का खतरा बढ़ जाता है. वहीं रेड मीट और भारी भोजन को पचाने में शरीर ज्यादा ऊर्जा खर्च करता है, जिससे गर्मी और सुस्ती महसूस हो सकती है.&amp;nbsp;
बासी खाने से बचने की सलाह
नौतपा के दौरान बासी खाना और खुले में रखा भोजन खाने से भी बचने की सलाह दी जाती है. तेज गर्मी में भोजन जल्दी खराब हो सकता है, जिससे फूड पॉइजनिंग, दस्त और टायफाइड जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है. बहुत ज्यादा बर्फ वाली चीजें भी शरीर को अचानक तापमान का झटका दे सकती हैं. वहीं शराब शरीर से तेजी से पानी बाहर निकालती है, जिससे गंभीर डिहाइड्रेशन हो सकता है.&amp;nbsp;
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किन चीजों का करना चाहिए सेवन
नौतपा में शरीर को ठंडा और हाइड्रेट रखना सबसे जरूरी है. इसके लिए नारियल पानी, छाछ, लस्सी, सत्तू, बेल का शरबत और ताजे फलों का सेवन फायदेमंद माना जाता है. दिनभर पर्याप्त मात्रा में पानी पीना चाहिए और खाली पेट घर से बाहर निकलने से बचना चाहिए. सही खानपान अपनाकर नौतपा की भीषण गर्मी के असर से काफी हद तक बचा जा सकता है.
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        <pubDate>Wed, 27 May 2026 21:30:13 +0530</pubDate>
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        <title>Heatwave Health Risks: हीटवेव से ब्रेन और किडनी पर हो रहा असर, गर्मी के इन खतरनाक लक्षणों को कतई न करें इग्नोर</title>
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        <description><![CDATA[ Doctors Explain Dangerous Effects Of Heatwave On Body: देश के कई हिस्सों में बढ़ती गर्मी और हीटवेव अब लोगों की सेहत पर गंभीर असर डालने लगी है. अस्पतालों में ऐसे मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है जिन्हें तेज धूप, डिहाइड्रेशन और अत्यधिक गर्मी की वजह से सिरदर्द, चक्कर, आंखों में जलन और न्यूरोलॉजिकल समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. डॉक्टरों का कहना है कि लंबे समय तक गर्मी में रहने से शरीर का संतुलन बिगड़ सकता है और यह स्थिति कई बार जानलेवा भी साबित हो सकती है.
ज्यादा गर्मी से क्या होती है दिक्कत?
दिल्ली-एनसीआर के अस्पतालों में इन दिनों डिहाइड्रेशन से जुड़ी परेशानियों के मामले लगातार सामने आ रहे हैं. खासतौर पर बच्चों, बुजुर्गों और पहले से किसी बीमारी से जूझ रहे लोगों में इसका खतरा ज्यादा देखा जा रहा है. गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में इंटरनल मेडिसिन विभाग की वाइस चेयरमैन डॉ. सुशीला कटारिया के मुताबिक, शरीर की तापमान कंट्रोल करने की क्षमता की भी एक सीमा होती है. जब गर्मी उस सीमा से आगे बढ़ जाती है तो शरीर में पानी और नमक की कमी होने लगती है. उन्होंने बताया कि हीट एग्जॉशन के शुरुआती लक्षणों में सिरदर्द, मांसपेशियों में ऐंठन, मतली और कमजोरी शामिल हैं. अगर समय रहते इलाज न मिले तो यह हीट स्ट्रोक में बदल सकता है, जो दिमाग और किडनी को प्रभावित कर सकता है.
&amp;nbsp;

#WATCH | Gurugram, Haryana: On heat wave, Vice Chairman of internal medicine, Medanta Gurugram, Dr Sushila Kataria says, &amp;ldquo;&amp;hellip;there&amp;rsquo;s a limit of the body&amp;rsquo;s thermostat regulation, beyond which, exposure to heat causes loss of water and salt. The initial symptoms of heat exhaustion&amp;hellip; pic.twitter.com/78EP1nLENL
&amp;mdash; ANI (@ANI) May 25, 2026



इससे बचने के लिए क्या कर सकते हैं आप?
डॉ. कटारिया ने कहा कि सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे के बीच जरूरत न हो तो बाहर निकलने से बचना चाहिए. शरीर को हाइड्रेट रखने के लिए पानी, नारियल पानी और ओआरएस सबसे बेहतर विकल्प हैं. वहीं चाय और कॉफी जैसे पेय शरीर में पानी की कमी और बढ़ा सकते हैं. उन्होंने लोगों को ढीले, सूती और हल्के रंग के कपड़े पहनने की सलाह भी दी. इसके &amp;nbsp;साथ ही फेफड़े, दिल और किडनी की बीमारी से जूझ रहे लोगों को मौसम बदलने के दौरान नियमित रूप से डॉक्टर से सलाह लेने को कहा.
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इन दिक्कतों को कतई न करें इग्नोर
एक्सपर्ट के मुताबिक, अगर किसी व्यक्ति को लगातार भ्रम होना, बोलने में परेशानी, अत्यधिक सुस्ती, बेहोशी या दौरे जैसी समस्याएं महसूस हों तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. ये गंभीर न्यूरोलॉजिकल इमरजेंसी के संकेत हो सकते हैं और तुरंत मेडिकल सहायता की जरूरत पड़ सकती है. डॉक्टरों का यह भी कहना है कि गर्मियों में आंखों की सेहत को लोग अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि तेज गर्मी और धूप आंखों में जलन और इंफेक्शन का खतरा बढ़ा सकती है. इसके अलावा चक्कर आना, तेज थकान, उल्टी, शरीर में अत्यधिक गर्मी महसूस होना, तेज धड़कन और मांसपेशियों में ऐंठन जैसे लक्षण भी हीट स्ट्रोक के संकेत हो सकते हैं.
इसे भी पढ़ें-Heart Health: सुबह का सिरदर्द-थकान है साइलेंट किलर का अलर्ट, न करें इग्नोर वरना होंगे खतरनाक बीमारी के शिकार
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 27 May 2026 21:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>Bad Cholesterol: दवाइयों का झंझट होगा खत्म, सिर्फ जीन थैरेपी से होगा बैड कोलेस्ट्रॉल का वन टाइम इलाज</title>
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        <description><![CDATA[ How Gene Therapy Reduces LDL Cholesterol: हार्ट की बीमारियों और बैड कोलेस्ट्रॉल से परेशान करोड़ों लोगों के लिए साइंटिस्ट ने एक बड़ी उम्मीद जगाई है. साइंटिस्ट का दावा है कि अब ऐसा इलाज विकसित किया जा रहा है, जिसमें सिर्फ एक बार जीन थैरेपी लेने से बैड कोलेस्ट्रॉल लंबे समय तक कंट्रोल में रह सकता है. अगर आने वाले बड़े ट्रायल्स में भी इसके नतीजे सफल रहे, तो भविष्य में कई मरीजों को जिंदगीभर कोलेस्ट्रॉल की दवाएं खाने की जरूरत शायद न पड़े.&amp;nbsp;
क्या सच में यह काम करता है?
साइंटिस्ट ने एक नई जीन थैरेपी वर्व-102 पर रिसर्च की है, जिसके नतीजे प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल में प्रकाशित हुए हैं. इस स्टडी में पाया गया कि यह थैरेपी शरीर में मौजूद बैड एलडीएल कोलेस्ट्रॉल को 62 प्रतिशत तक कम करने में सफल रही. यह रिसर्च उन मरीजों पर की गई, जिन्हें जन्म से ही हाई कोलेस्ट्रॉल की समस्या थी या कम उम्र में हार्ट की बीमारी का खतरा बढ़ चुका था. शुरुआती ट्रायल में कुल 35 मरीज शामिल किए गए थे. साइंटिस्ट ने देखा कि जिन मरीजों को ज्यादा डोज दी गई, उनमें एलडीएल कोलेस्ट्रॉल का स्तर औसतन 78 एमजी/डीएल तक घट गया. सबसे खास बात यह रही कि कई मरीजों में इसका असर एक साल तक बना रहा.&amp;nbsp;
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हार्ट के बीमारियों के लिए काफी अहम
ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज दिल्ली के कार्डियोलॉजी प्रोफेसर डॉ अम्बुज रॉय ने इस स्टडी को हार्ट की बीमारियों के इलाज के क्षेत्र में बेहद महत्वपूर्ण बताया है. उनका कहना है कि यह रिसर्च साबित करती है कि पीसीएसके9 जीन की इन-विवो बेस एडिटिंग के जरिए शरीर में लंबे समय तक एलडीएल कोलेस्ट्रॉल को कम किया जा सकता है. अगर भविष्य में इसकी लॉन्ग टर्म सेफ्टी पूरी तरह सुरक्षित साबित हो जाती है, तो यह हार्ट की बीमारियों के इलाज में बड़ा बदलाव ला सकती है.
&amp;nbsp;जीन थैरेपी शरीर में कैसे काम करती है?
साइंटिस्ट के मुताबिक, यह थैरेपी लिवर में मौजूद पीसीएसके9 नाम के जीन को स्थायी रूप से बंद कर देती है. यही जीन शरीर में कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कंट्रोल करने में अहम भूमिका निभाता है, इसके लिए एडवांस बेस एडिटिंग तकनीक का इस्तेमाल किया गया है, जिसे जीन एडिटिंग का ज्यादा सटीक और आधुनिक तरीका माना जाता है.
खराब कोलेस्ट्रॉल किस तरह हमारे लिए खतरनाक?
दुनियाभर में हाई एलडीएल कोलेस्ट्रॉल को हार्ट अटैक, स्ट्रोक और ब्लॉकेज की सबसे बड़ी वजहों में गिना जाता है. कई मरीज दवाइयां लेने के बावजूद पूरी तरह सुरक्षित नहीं हो पाते. ऐसे में साइंटिस्ट को उम्मीद है कि यह नई थैरेपी भविष्य में वन टाइम ट्रीटमेंट का रास्ता खोल सकती है. राहत की बात यह है कि शुरुआती ट्रायल में कोई बड़ा सुरक्षा खतरा सामने नहीं आया. &amp;nbsp;रिसर्च से जुड़ी दवा कंपनी ने कहा है कि वह इस साल वर्व-102 के दूसरे चरण के क्लिनिकल ट्रायल शुरू करेगी.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 27 May 2026 21:30:11 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Fertility Tips: मां&amp;बाप बनने में आ रही दिक्कत? रोज की ये छोटी&amp;छोटी आदतें बन सकती हैं बड़ी वजह</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/fertility-tips-मां-बाप-बनने-में-आ-रही-दिक्कत-रोज-की-ये-छोटी-छोटी-आदतें-बन-सकती-हैं-बड़ी-वजह</link>
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        <description><![CDATA[ Fertility Tips: मां-बाप बनने में आ रही दिक्कत? रोज की ये छोटी-छोटी आदतें बन सकती हैं बड़ी वजह ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 26 May 2026 13:30:11 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Nautapa Care Guide Kids And Seniors: नौतपा का सबसे ज्यादा खतरा बच्चों और बुजुर्गों को, ऐसे रखें उनका ख्याल</title>
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        <description><![CDATA[ गर्मियों के सबसे गर्म 9 दिनों को नौतपा कहा जाता है.इस साल नौतपा 25 मई से शुरू होकर 2 जून तक रहेगा. इस दौरान सूर्य की किरणें सीधे धरती पर पड़ती हैं जिससे तापमान तेजी से बढ़ जाता है.उत्तर भारत के कई शहरों में तापमान 45 डिग्री के पार पहुंच जाता है.तेज धूप, लू और डिहाइड्रेशन के कारण इस समय बीमार होने का खतरा काफी बढ़ जाता है.खासकर बच्चे और बुजुर्गों को अधिक सावधानी रखने की जरूरत होती है.
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, नौतपा के दौरान शरीर जल्दी डिहाइड्रेट होता है और हीट स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है. बच्चे, बुजुर्ग, गर्भवती महिलाएं और हार्ट या डायबिटीज के मरीज इस मौसम में जल्दी बीमार पड़ सकते हैं. शरीर का तापमान ज्यादा बढ़ने पर चक्कर, उल्टी, बुखार और कमजोरी जैसी समस्याएं हो सकती हैं. इसलिए इस मौसम में खानपान और दिनचर्या का खास ध्यान रखना जरूरी है.
बच्चों को क्यों है ज्यादा खतरा?
बच्चों को नौतपा में सबसे ज्यादा खतरा रहता है,क्योंकि उनकी इम्यूनिटी कमजोर होती है.ज्यादा खेलने और धूप में रहने से उनके शरीर में पानी की कमी जल्दी हो जाती है. छोटे बच्चों को लू लगने का खतरा भी ज्यादा रहता है. ऐसे में बच्चों को समय-समय पर ORS, नींबू पानी और नारियल पानी देते रहें.दोपहर 12 बजे से 4 बजे तक उन्हें बाहर खेलने न भेजें और हल्के सूती कपड़े पहनाएं.
बुजुर्ग लोग क्यों होते हैं ज्यादा खतरे में?
बुजुर्गों के लिए भी नौतपा काफी मुश्किल भरा समय होता है. बढ़ती उम्र के साथ शरीर की गर्मी सहने की क्षमता कम होने लगती है. शरीर में पानी की कमी जल्दी होने लगती है और हीट स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है.इसलिए बुजुर्गों को ठंडे कमरे में रखें और उन्हें बार-बार पानी पिलाते रहें.
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क्या करें और क्या न करें?
नौतपा के दौरान ज्यादा पानी पिएं और तरबूज, खीरा, खरबूजा जैसे मौसमी फलों का सेवन करें. खाली पेट धूप में बाहर न निकलें और बाहर जाते समय छाता या टोपी का इस्तेमाल करें.अगर तेज बुखार,चक्कर,उल्टी या सांस लेने में परेशानी हो तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें. थोड़ी सी सावधानी और सही देखभाल से बच्चों और बुजुर्गों को नौतपा की तेज गर्मी से सुरक्षित रखा जा सकता है.
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        <pubDate>Tue, 26 May 2026 13:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Green Chili Side Effects: एक दिन में कितनी हरी मिर्च खानी चाहिए? जरूरत से ज्यादा खाने में हो सकता है यह नुकसान</title>
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        <description><![CDATA[ Green Chili Side Effects:&amp;nbsp;अक्सर लोग अपने खाने के साथ सलाद में हरी मिर्च खाना बहुत पसंद करते हैं. कुछ लोग तो बिना हरी मिर्च के खाना अधूरा ही मानते हैं. इसकी तीखी स्वाद वजह से खाना और भी टेस्टी लगने लगता है, इसलिए ज्यादातर घरों में रोजाना हरी मिर्च जरूर खाई जाती है.&amp;nbsp; वही हरी मिर्च खाने के फायदे तो आपने जरूर सुने होंगे, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसे जरूरत से ज्यादा खाना नुकसान भी कर सकता है? खाने के स्वाद को बढ़ाने वाली ये छोटी सी मिर्च शरीर के लिए तब तक फायदेमंद है जब तक इसे सही मात्रा में खाया जाए.&amp;nbsp; बिना सोचे समझे ज्यादा मात्र में हरी मिर्च खाने से पेट में जलन, एसिडिटी और दूसरी दिक्कतें शुरू हो सकती हैं. इसलिए यह समझना बहुत जरूरी है कि एक दिन में कितनी हरी मिर्च खाना सही रहता है और कब यह नुकसान देने लगती है?
एक दिन में कितनी हरी मिर्च खाना सही है?
अगर सामान्य तौर पर बात करें तो एक स्वस्थ व्यक्ति के लिए एक दिन में करीब 1 से 2 हरी मिर्च खाना ठीक माना जाता है.&amp;nbsp; कुछ लोग अपनी सहनशक्ति के हिसाब से 3 से 4 मिर्च भी खा लेते हैं, लेकिन यह हर किसी के लिए सही नहीं होता बीबी है. खासकर अगर आपका पेट थोड़ा कमजोर है या आपको पहले से ही गैस, एसिडिटी या जलन की समस्या रहती है तो आपको बहुत कम मात्रा में ही हरी मिर्च खानी चाहिए. साथ&amp;nbsp; ही ध्यान रहे कि हरी मिर्च को हमेशा खाने के साथ ही लेना बेहतर होता है, खाली पेट इसे खाने से पेट में जलन और असहजता बढ़ सकती है. सही मात्रा में ली गई हरी मिर्च खाने का स्वाद भी बढ़ाती है और शरीर को नुकसान भी नहीं पहुंचाती.
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हरी मिर्च खाने के फायदे
हरी मिर्च सिर्फ स्वाद ही नहीं बढ़ाती, बल्कि इसके कई फायदे भी हैं. इसमें विटामिन C, एंटीऑक्सीडेंट और कुछ ऐसे तत्व होते हैं जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने में मदद करते हैं. साथ ही यह मेटाबॉलिज्म को भी तेज करती है, जिससे खाना जल्दी पचता है. कुछ लोग इसे वजन कम करने में भी मददगार मानते हैं क्योंकि यह शरीर में गर्मी पैदा करके कैलोरी बर्न करने की प्रक्रिया को थोड़ा बढ़ा देती है. इसके अलावा हरी मिर्च खाने से शरीर में एंडोर्फिन हार्मोन रिलीज होता है, जिससे मूड अच्छा महसूस होता है और हल्की खुशी भी मिलती है.
ज्यादा हरी मिर्च खाने से होने वाले नुकसान
लेकिन अगर आप हरी मिर्च जरूरत से ज्यादा खाने लगते हैं तो यह फायदे की जगह नुकसान करने लगती है. ज्यादा मिर्च खाने से पेट में जलन, एसिडिटी, गैस और सीने में जलन जैसी समस्याएं हो सकती हैं. साथ ही कुछ लोगों को मुंह में छाले या गले में जलन भी हो जाती है. जिन लोगों को पहले से पेट का अल्सर या पाइल्स की समस्या होती है, उनके लिए ज्यादा हरी मिर्च खाना और भी नुकसानदायक हो सकता है. इसलिए हमेशा संतुलन बनाए रखना बहुत जरूरी है .&amp;nbsp; सही मात्रा में खाई गई हरी मिर्च जहां स्वाद और सेहत दोनों देती है, वहीं ज्यादा मात्रा में यह शरीर को परेशान कर सकती है.
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        <pubDate>Tue, 26 May 2026 13:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>Body Parts In Danger From Heat: ज्यादा गर्मी से जल्दी बीमार होते हैं शरीर के ये अंग, इतनी बुरी हो जाती है हालत</title>
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        <description><![CDATA[ Body Parts In Danger From Heat: हर साल बढ़ती गर्मी शहर से लेकर गांवों में रहने वाले लोगों को परेशान करती रही है. कहीं न कहीं से खबर आ ही जाती है कि गर्मी की वजह से मौतें हो रही हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ज्यादा गर्मी से शरीर के कौन से अंग खराब होने लगते हैं, आइए इनके बारे में जानते हैं.
भयंकर गर्मी से जोखिम में हैं ये शरीर के अंग
इतनी गर्मी में शरीर के कई अंगों पर बहुत खराब असर पड़ता है. जिससे उनके खराब होने का डर बना रहता है. यह हैं शरीर के कुछ अंग जिनपर ज्यादा होता है खतरा.

गर्मी पर सबसे पहले अटैक करती है. शरीर का तापमान बढ़ने पर उसे ठंडा करने के लिए खून दिमाग से त्वचा की तरफ जाने लगता है, जिससे चक्कर आना, बेहोशी और भ्रम की स्थिति पैदा होने लगती है.
दिल पर भी मंडराता है बढ़ती गर्मी का खतरा. शरीर को ठंडा रखने के लिए दिल को तेज पंप करना पड़ता है. इससे हृदय पर गंभीर तनाव बढ़ता है, जो हार्ट अटैक या अन्य हृदय संबंधी समस्याओं का कारण बन सकता है.
किडनी पर भी दबाव बढ़ता है. तेज गर्मी और Dehydration के कारण गुर्दे काम करना बंद कर सकते हैं. पसीने के रूप में बहुत अधिक पानी निकलने से गुर्दे पर अधिक दबाव पड़ता हैं और इनके खराब होने का भी डर बना रहता है.

मानव शरीर केवल एक हद तक ही गर्मी झेल सकता है. मगर इस समय पड़ रही गर्मी आपकी तबीयत को बहुत खराब कर सकती है, जिस वजह से सबको गर्मी से बचाव के बारे में जानना ही चाहिए.
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क्या है खुद को और अंगों को बचाने के उपाय?
बढ़ती गर्मी में कुछ सावधानियां आपकी जान बचा सकते हैं, जैसे.

दोपहर में बाहर निकलने से बचना चाहिए और ठंडी जगह पर रहने की कोशिश करनी चाहिए.
शरीर को ठंडा रखने के लिए पानी, छाछ, शरबत आदि पीते रहना होगा.
कपड़ों का भी ध्यान से चयन करना होगा हल्के रंग के कपड़े पहनने से शरीर कम गर्म होता है.
कोई भी दिक्कत होने पर डॉक्टर से तुरंत संपर्क करें किसी भी लक्षण को हल्के में न आंकें.

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        <pubDate>Tue, 26 May 2026 13:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Ebola Virus: अफ्रीका में तेजी से फैल रहा इबोला वायरल, जानिए क्या हैं इससे बचाव के उपाय?</title>
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        <description><![CDATA[ Why Ebola Virus Is Spreading Rapidly In Africa: अफ्रीका के कई हिस्सों में इबोला वायरस एक बार फिर तेजी से फैल रहा है और इसे लेकर दुनियाभर की स्वास्थ्य एजेंसियों की चिंता बढ़ गई है. खासतौर पर कांगो और युगांडा में सामने आए मामलों ने हेल्थ एक्सपर्ट्स को अलर्ट कर दिया है. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन और इम्पीरियल कॉलेज लंदन के रिसर्चर्स की एक नई एनालिसिस में दावा किया गया है कि कांगो में इबोला इंफेक्शन के वास्तविक मामले आधिकारिक आंकड़ों से कहीं ज्यादा हो सकते हैं.&amp;nbsp;
रिपोर्ट के मुताबिक, मई के मध्य तक इबोला के 400 से 800 मामले सामने आ चुके हो सकते हैं, जबकि कुछ एक्सपर्ट्स ने यह संख्या 1000 से ज्यादा होने की आशंका भी जताई है। सबसे ज्यादा मामले कांगो के इटुरी प्रांत में मिले हैं, जहां अप्रैल के आखिर से लगातार संक्रमण फैल रहा है.&amp;nbsp;
कैसे फैलता है इसका खतरा?
सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के अनुसार, इबोला एक बेहद खतरनाक वायरल बीमारी है, जो इंफेक्टेड व्यक्ति के खून, पसीने, उल्टी, लार या दूसरे बॉडी फ्लूइड्स के संपर्क में आने से फैलती है. हेल्थ एक्सपर्ट्स के अनुसार, यह वायरस हवा या पानी से नहीं फैलता, लेकिन इंफेक्टेड व्यक्ति के बहुत करीब आने पर खतरा बढ़ जाता है. खासकर डॉक्टर, नर्स और मरीज की देखभाल करने वाले लोग सबसे ज्यादा जोखिम में रहते हैं.
क्या होते हैं इसके शुरुआती लक्षण?
इबोला के शुरुआती लक्षण अक्सर सामान्य वायरल बुखार जैसे दिखाई देते हैं, इसलिए शुरुआत में इसकी पहचान करना मुश्किल हो सकता है. इंफेक्टेड व्यक्ति को तेज बुखार, सिरदर्द, बदन दर्द, कमजोरी और गले में दर्द महसूस हो सकता है. बीमारी बढ़ने पर उल्टी, दस्त, स्किन रैश और कई मामलों में अंदरूनी या बाहरी ब्लीडिंग भी शुरू हो सकती है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि इंफेक्शन के बाद लक्षण दिखने में 2 से 21 दिन तक लग सकते हैं. हालांकि, औसतन 8 से 10 दिन के भीतर मरीज में बीमारी के संकेत दिखने लगते हैं. राहत की बात यह है कि लक्षण शुरू होने से पहले इंफेक्टेड व्यक्ति वायरस नहीं फैलाता.
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कैसे कर सकते हैं इससे बचाव?
अपोलो हॉस्पिटल के डॉक्टर्स के मुताबिक, इबोला से बचाव के लिए सावधानी सबसे जरूरी हथियार है. इंफेक्टेड मरीज के संपर्क में आने से बचें, हाथों को बार-बार साबुन से धोएं और किसी भी बीमार व्यक्ति के खून या बॉडी फ्लूइड्स को छूने से बचें. अगर कोई व्यक्ति हाल ही में इबोला प्रभावित इलाके से लौटा हो और उसे तेज बुखार या कमजोरी महसूस हो रही हो, तो तुरंत मेडिकल जांच करवानी चाहिए. हेल्थ एजेंसियां यह भी मानती हैं कि वैक्सीनेशन और कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग इबोला को रोकने में सबसे प्रभावी हथियार साबित हो रहे हैं. &amp;nbsp;वहीं, हेल्थ वर्कर्स के लिए पीपीई किट, मास्क, ग्लव्स और सख्त संक्रमण नियंत्रण उपायों को बेहद जरूरी बताया गया है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 26 May 2026 13:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>Explained: आंत&amp;पेट में ऑक्सीजन पहुंचना बंद, शरीर में खून के थक्के और किस्सा खत्म! कितनी गर्मी झेलने के बाद कैसे हो जाती मौत?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/explained-आंत-पेट-में-ऑक्सीजन-पहुंचना-बंद-शरीर-में-खून-के-थक्के-और-किस्सा-खत्म-कितनी-गर्मी-झेलने-के-बाद-कैसे-हो-जाती-मौत</link>
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        <description><![CDATA[ दुनिया के 100 सबसे गर्म शहरों की लिस्ट में सूडान, चाड, ईरान या मिडिल ईस्ट के रेगिस्तानी इलाकों का नाम होना चाहिए. लेकिन हैरान करने वाली सच्चाई ये है कि इस पूरी लिस्ट में से 97 शहर अकेले भारत के हैं. ये कोई मजाक नहीं, बल्कि मई 2026 की वो भयानक सच्चाई है जिसने पूरे देश को झुलसा कर रख दिया है. बालंगीर, सासाराम, बांदा और वाराणसी जैसे शहरों में पारा 48 डिग्री सेल्सियस के पार जा चुका है. हालात इतने बदतर हैं कि तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में अब तक 37 से ज्यादा लोग हीटवेव की वजह से अपनी जान गंवा चुके हैं.
ये कहानी सिर्फ आसमान से बरसती आग की नहीं है, ये कहानी है हमारे शरीर की उस आखिरी लड़ाई की, जो ये भीषण गर्मी से लड़ रहा है. आइए समझते हैं कि ये रिकॉर्डतोड़ गर्मी में हमारा शरीर कितना तापमान झेल सकता है, गर्मी आखिर जान कैसे ले लेती है और हम इस आफत से खुद को और अपनों को कैसे बचा सकते हैं...
दुनिया की सबसे गर्म लिस्ट पर भारत का कब्जा: 97 शहर, एक कहानी
22 मई 2026 की दोपहर AQI.in के लाइव डेटा ने जो तस्वीर पेश की, वो डराने वाली थी. दुनिया के 100 सबसे गर्म शहरों में से 97 भारत में थे. बालंगीर (ओडिशा) और सासाराम (बिहार) में तापमान 48 डिग्री सेल्सियस रिकॉर्ड हुआ, जबकि वाराणसी (उत्तर प्रदेश) 47 डिग्री सेल्सियस के साथ तीसरे नंबर पर रहा। इन शहरों में नमी का स्तर 6 से 8 प्रतिशत के बीच था, जो स्थितियों को &#039;बेहद गर्म&#039; (एक्सट्रीम हॉट) कैटेगरी में डाल रहा था.
गौर करने वाली बात ये है कि इस लिस्ट में बाकी तीन शहर भी भारत के पड़ोसी देश नेपाल के थे- धनगढ़ी, नेपालगंज और लुम्बिनी संस्कृतिक. मतलब पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा गर्मी भारतीय उपमहाद्वीप में पड़ रही थी. ये कोई पहली बार नहीं है. इससे पिछले हफ्ते 19 मई को तो हालात और भी गंभीर थे, जब दुनिया के सभी 100 सबसे गर्म शहर भारत में ही थे. औरैया, बांदा और इटावा (तीनों उत्तर प्रदेश) 46 डिग्री सेल्सियस के साथ टॉप पर थे.
आखिर इंसानी शरीर कितनी गर्मी झेल सकता है?
ये सवाल शायद आपके मन में भी आया होगा. इसका जवाब सिर्फ थर्मामीटर पर लिखे नंबर में नहीं, बल्कि एक खास टर्म में छिपा है- &#039;वेट-बल्ब टेम्परेचर&#039;
वेट-बल्ब टेम्परेचर दरअसल तापमान और नमी का वो खतरनाक कॉम्बिनेशन है जो हमारे शरीर की ठंडा होने की क्षमता को पूरी तरह बंद कर देता है. आमतौर पर हमारा शरीर पसीने को भाप बनाकर खुद को ठंडा रखता है. लेकिन जब हवा में बहुत ज्यादा नमी हो, तो पसीना सूखता नहीं, शरीर की गर्मी बाहर नहीं निकल पाती और शरीर का तापमान लगातार बढ़ता जाता है.
लंबे समय तक ये माना जाता रहा कि 35 डिग्री सेल्सियस का वेट-बल्ब तापमान (जो 100% नमी पर 35 डिग्री सेल्सियस या 50% नमी पर 46 डिग्री सेल्सियस के बराबर होता है) वो आखिरी हद है, जिसके बाद इंसानी शरीर खुद को ठंडा नहीं रख सकता. लेकिन पेन स्टेट यूनिवर्सिटी की एक चौंकाने वाली रिसर्च ने इस मिथक को तोड़ दिया. उनके PSU H.E.A.T. प्रोजेक्ट में जब युवा और स्वस्थ लोगों को अलग-अलग तापमान और नमी में रखा गया, तो पता चला कि शरीर की ठंडा रहने की क्षमता 35 डिग्री सेल्सियस से काफी पहले ही खत्म होने लगती है.
नई रिसर्च के मुताबिक, ये खतरनाक हद सिर्फ 31 डिग्री सेल्सियस वेट-बल्ब तापमान पर ही शुरू हो जाती है.
इसे ऐसे समझिए- अगर नमी 100% हो तो 31 डिग्री सेल्सियस और अगर नमी 60% हो तो 38 डिग्री सेल्सियस का सामान्य तापमान भी जानलेवा हो सकता है. &#039;हमारी रिसर्च बताती है कि गर्मी और नमी का खतरनाक कॉम्बिनेशन, वैज्ञानिकों के पिछले अनुमान से कहीं ज्यादा तेजी से जानलेवा बन सकता है.&#039;
कैसे होती है गर्मी से मौत?
गर्मी से मौत का सबसे बड़ा कारण है हीटस्ट्रोक, यानी शरीर का तापमान इतना बढ़ जाना कि अंग काम करना बंद कर दें. लेकिन क्या आप जानते हैं कि गर्मी तीन अलग-अलग तरीकों से जान लेती है?

हीटस्ट्रोक: जब दिमाग और अंग सब फेल हो जाएं. जब शरीर का अंदरूनी तापमान 40 डिग्री सेल्सियस पार कर जाता है, तब हीटस्ट्रोक होता है. यूनिवर्सिटी ऑफ सिडनी के प्रोफेसर ओली जे बताते हैं कि इस दौरान शरीर ठंडा होने के लिए खून की धारा को त्वचा की तरफ मोड़ देता है. इसका नतीजा ये होता है कि आंतों और पेट तक खून और ऑक्सीजन पहुंचना बंद हो जाता है. नतीजा? आंतों में मौजूद टॉक्सिन्स खून में लीक होने लगते हैं. &#039;ये एक चेन रिएक्शन शुरू करता है. पूरे शरीर में खून के थक्के बनने लगते हैं, एक के बाद एक अंग फेल होने लगते हैं और आखिर में मौत हो जाती है.&#039;
दिल पर जानलेवा दबाव: ह्यूस्टन मेथोडिस्ट हॉस्पिटल के इमरजेंसी मेडिसिन डायरेक्टर नील गांधी बताते हैं कि गर्मी के दौरान वो अक्सर ऐसे मरीज देखते हैं जिनके शरीर का तापमान 104 या 105 डिग्री फॉरेनहाइट से भी ऊपर पहुंच जाता है. &#039;बस कुछ डिग्री और बढ़ने पर ऐसे मरीज की जान जाने का बहुत ज्यादा खतरा हो जाता है.&#039; गर्मी में शरीर ठंडा रहने के लिए दिल को सामान्य से कई गुना ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है. प्रोफेसर जे के के मुताबिक, &#039;आप अपने दिल से सामान्य से बहुत ज्यादा काम करवा रहे होते हैं. जिसे पहले से दिल की बीमारी है, उसके लिए तो ये ऐसा है जैसे खराब हैमस्ट्रिंग (जांघ की मांसपेशी) के साथ बस दौड़ने की कोशिश करना. कुछ न कुछ तो टूटेगा ही.&#039;
डिहाइड्रेशन: पसीने के जरिए शरीर से इतना पानी निकल जाता है कि किडनी पर जबरदस्त दबाव पड़ता है. हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर रेनी सालास बताती हैं, &#039;डिहाइड्रेशन शॉक में बदल सकता है, जिससे अंगों तक खून, ऑक्सीजन और पोषक तत्व पहुंचना बंद हो जाते हैं. इससे दौरे पड़ सकते हैं और मौत हो सकती है.&#039; इसके अलावा, गर्मी दिमाग पर भी सीधा असर करती है. इससे इंसान कन्फ्यूज हो जाता है, सोचने-समझने की शक्ति खो देता है और बेहोश हो सकता है.

अभी तक सरकारी रिकॉर्ड में पूरे भारत में हीटवेव से करीब 37-40 मौतें दर्ज की गई हैं. लेकिन ये आंकड़ा असलियत से बहुत कम है. टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, बहुत सारी म ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 26 May 2026 01:30:16 +0530</pubDate>
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        <title>Nail Polish Cancer Risk: नेल पॉलिश से भी हो सकता है कैंसर, आप भी रोज लगाती हैं तो हो जाएं सावधान</title>
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        <description><![CDATA[ Side Effects Of Wearing Nail Polish Daily: खूबसूरत और स्टाइलिश नाखूनों का ट्रेंड पिछले कुछ सालों में तेजी से बढ़ा है. लंबे, डिजाइनर और रंग-बिरंगे नेल्स अब फैशन का अहम हिस्सा बन चुके हैं. सोशल मीडिया पर सेलिब्रिटीज और इंफ्लुएंसर्स हर हफ्ते नए नेल आर्ट और नेल पॉलिश लुक्स दिखाते नजर आते हैं. एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2023 में ग्लोबल नेल सैलून मार्केट की वैल्यू करीब 11.96 बिलियन डॉलर थी, जो 2030 तक 20.30 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकती है.&amp;nbsp;
क्या चमकदार नाखून आपके लिए हानिकारक हैं?
&amp;nbsp;इन चमकदार नाखूनों के पीछे एक ऐसा खतरा भी छिपा हो सकता है, जिसे ज्यादातर लोग नजरअंदाज कर देते हैं. हाल के दिनों में यह चर्चा तेजी से बढ़ी है कि नेल पॉलिश में मौजूद कुछ केमिकल्स कैंसर का खतरा बढ़ा सकते हैं. गुरुग्राम की सर्जिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. वर्तिका विशवानी के मुताबिक, पारंपरिक नेल पॉलिश में फॉर्मल्डिहाइड, टोल्यून और डीबीपी जैसे कई हानिकारक केमिकल्स पाए जाते हैं. उन्होंने बताया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने फॉर्मल्डिहाइड को कैंसर पैदा करने वाले पदार्थों की सूची में शामिल किया है.&amp;nbsp;
क्या नेल पॉलिश लगाना ही नहीं चाहिए?
हालांकि डॉक्टर का कहना है कि कभी-कभार नेल पॉलिश लगाने वालों में कैंसर का खतरा काफी कम होता है. लेकिन जो लोग रोजाना इन केमिकल्स के संपर्क में रहते हैं, जैसे नेल सैलून में काम करने वाले कर्मचारी, उनमें खतरा बढ़ सकता है. लगातार केमिकल्स की गंध और धुएं के संपर्क में रहने से नाक और गले से जुड़े कैंसर का जोखिम बढ़ने की आशंका रहती है.
इसे भी पढ़ें-Mouth Cancer In Young Adults: नॉन-स्मोकर्स युवाओं में तेजी से फैल रहा ओरल कैंसर, इन लक्षणों को कतई न करें इग्नोर
किस कैंसर का रहता है खतरा?
एक्सपर्ट का कहना है कि सिर्फ नेल पॉलिश ही नहीं, बल्कि उसे जल्दी सुखाने के लिए इस्तेमाल होने वाली यूवी लाइट्स भी चिंता का कारण बन सकती हैं. साल 2023 की एक स्टडी में दावा किया गया था कि यूवी लैंप डीएनए को नुकसान पहुंचा सकते हैं, जिससे स्किन कैंसर का खतरा बढ़ सकता है. हालांकि यह रिसर्च अभी लैब स्तर तक सीमित है और इंसानों पर इसके असर को लेकर स्टडी जारी है.&amp;nbsp;
किन बातों का रखना चाहिए ध्यान?
डॉक्टरों के मुताबिक अगर सही सावधानी बरती जाए तो नेल पॉलिश का इस्तेमाल अपेक्षाकृत सुरक्षित हो सकता है. इसके लिए फ्री लेबल वाली ऐसी नेल पॉलिश चुनने की सलाह दी जाती है जिनमें खतरनाक केमिकल्स कम हों. इसके अलावा नेल पॉलिश खरीदते समय उसमें मौजूद केमिकल्स की जानकारी जरूर पढ़नी चाहिए और फॉर्मल्डिहाइड, टोल्यून, कैम्फर और डीबीपी जैसे तत्वों से बचना चाहिए. अगर यूवी लैंप का इस्तेमाल किया जा रहा है, तो हाथों पर सनस्क्रीन लगाना भी जरूरी माना जाता है. दिलचस्प बात यह है कि साल 2026 में नेचुरल और सिंपल नेल्स का ट्रेंड तेजी से लोकप्रिय हो रहा है. फैशन इंडस्ट्री में अब कम मेकअप और बिना ज्यादा नेल पॉलिश वाले साफ-सुथरे नाखूनों को क्वाइट लग्जरी स्टाइल का हिस्सा माना जा रहा है.
इसे भी पढ़ें-AC And Heatwave Health Risks: AC से निकलते ही धूप में जाना पड़ सकता है भारी, अचानक तापमान बदलने से पड़ सकते हैं बीमार
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 26 May 2026 01:30:15 +0530</pubDate>
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        <title>Eating 2 Eggs Daily: अंडे से कोलेस्ट्रॉल बढ़ने का डर छोड़ें, रोज 2 अंडे खाने से शरीर में दिखेंगे ये बड़े बदलाव</title>
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        <description><![CDATA[ What Happens If You Eat 2 Eggs Every Day: कई सालों तक अंडों को लेकर लोगों के मन में उलझन बनी रही. कभी इन्हें हेल्दी प्रोटीन का सबसे आसान सोर्स बताया गया, तो कभी कोलेस्ट्रॉल बढ़ाने वाला खाद्य पदार्थ. लेकिन अब रिसर्च और एक्सपर्ट्स की राय पहले से कहीं ज्यादा साफ है. ज्यादातर स्वस्थ लोगों के लिए रोज दो अंडे खाना नुकसानदायक नहीं, बल्कि फायदेमंद आदत हो सकती है, अगर बाकी डाइट भी संतुलित हो.
एक अंडे से आपके शरीर को क्या- क्या मिलता है?
एक बड़े अंडे में करीब 70 से 72 कैलोरी और लगभग 6 ग्राम प्रोटीन होता है. इसके अलावा इसमें कोलीन, बी-विटामिन्स, ल्यूटिन और जीएक्सैंथिन जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो दिमाग, आंखों और नर्व सिस्टम के लिए जरूरी माने जाते हैं. यही वजह है कि अंडे खाने के बाद पेट लंबे समय तक भरा हुआ महसूस होता है. हावर्ड हेल्थ के मुताबिक, प्रोटीन से भरपूर अंडे भूख को कंट्रोल करने और बार-बार खाने की इच्छा कम करने में मदद कर सकते हैं.
रोज अंडे खाने से क्या होगा इफेक्ट?
अगर कोई व्यक्ति रोज सुबह दो अंडे खाना शुरू करता है, तो शुरुआती एक हफ्ते में सबसे बड़ा बदलाव उसकी भूख और एनर्जी में दिखाई दे सकता है. अंडे धीरे पचते हैं, इसलिए बार-बार स्नैकिंग की जरूरत कम महसूस होती है. खासतौर पर अगर उनकी जगह मीठा सीरियल, पेस्ट्री या सफेद ब्रेड वाला नाश्ता हटाया जाए, तो सुबह की क्रेविंग्स भी कम हो सकती हैं.
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क्या डेली अंडे खाने से हमें कोई दिक्कत होती है?
दूसरे और तीसरे हफ्ते तक असर थोड़ा और स्थिर दिखाई देने लगता है।.प्रोसेस्ड ब्रेकफास्ट की जगह अंडे लेने से कई लोगों को एनर्जी ज्यादा स्थिर महसूस होती है और भारीपन या सुस्ती कम लगती है. हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली संस्था मायो क्लिनिक के अनुसार अंडों में मौजूद कोलेस्ट्रॉल, ट्रांस फैट और ज्यादा सैचुरेटेड फैट जितना नुकसान नहीं पहुंचाता. एक्सपर्ट्स का कहना है कि अंडों से ज्यादा फर्क इस बात से पड़ता है कि उन्हें किस चीज के साथ खाया जा रहा है.
अंडे के साथ क्या कॉम्बिनेशन
असल चिंता का विषय अक्सर अंडा नहीं, बल्कि उसके साथ खाया जाने वाला बेकन, सॉसेज, ज्यादा मक्खन, चीज और रिफाइंड ब्रेड होते हैं। अगर अंडों को सब्जियों, ओट्स, होल ग्रेन टोस्ट, बीन्स या एवोकाडो जैसी चीजों के साथ खाया जाए, तो यह एक संतुलित और हेल्दी मील बन सकता है. मायो क्लिनिक के अनुसार अंडों के साथ खाए जाने वाले कई खाद्य पदार्थ हार्ट रिस्क बढ़ाने में ज्यादा भूमिका निभाते हैं.
इन लोगों को रखना चाहिए ध्यान
हालांकि हर किसी के लिए रोज दो अंडे सही हों, ऐसा जरूरी नहीं. जिन लोगों को डायबिटीज, हाई एलडीएल कोलेस्ट्रॉल या फैमिली हिस्ट्री में हार्ट डिजीज की समस्या है, उन्हें अपनी पूरी डाइट और ब्लड रिपोर्ट पर ध्यान देने की जरूरत होती है. कुछ रिसर्च में डायबिटीज वाले लोगों में ज्यादा अंडे खाने और हार्ट डिजीज रिस्क के बीच संबंध भी देखा गया है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 26 May 2026 01:30:14 +0530</pubDate>
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        <title>Tulsi Gabbard Bone Cancer: तुलसी गबार्ड के पति को हुआ बोन कैंसर, जानें यह कितना खतरनाक और इसके लक्षण?</title>
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        <description><![CDATA[ Tulsi Gabbard Bone Cancer:&amp;nbsp;अमेरिका में खुफिया विभाग की प्रमुख (DNI) तुलसी गबार्ड ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, तुलसी ने अपने पति की खराब सेहत के कारण यह फैसला लिया है. दरअसल, उनके पति अब्राहम विलियम्स हड्डियों के कैंसर यानी बोन कैंसर से जूझ रहे हैं. तुलसी गबार्ड ने प्रेस से बातचीत में बताया कि वह इस मुश्किल समय में अपने पति के साथ हर पल रहना चाहती हैं और कैंसर के खिलाफ इस लड़ाई में उनका पूरा साथ देना चाहती हैं. इस खबर के सामने आने के बाद लोग बोन कैंसर के बारे में ज्यादा जानना चाहते हैं कि आखिर यह बीमारी कितनी खतरनाक होती है और इसके लक्षण क्या हैं.
क्या होता है बोन कैंसर?
बोन कैंसर एक ऐसी बीमारी है जिसमें हड्डियों की कोशिकाएं असामान्य तरीके से बढ़ने लगती हैं. यह कैंसर सीधे हड्डियों में शुरू हो सकता है या फिर शरीर के किसी दूसरे हिस्से से हड्डियों तक फैल सकता है. डॉक्टरों के मुताबिक यह बीमारी काफी दुर्लभ मानी जाती है, लेकिन अगर समय पर इलाज न मिले तो यह गंभीर रूप ले सकती है. कई बार शुरुआत में इसके लक्षण सामान्य दर्द जैसे लगते हैं, इसलिए लोग इसे नजरअंदाज कर देते हैं. यही लापरवाही बाद में बड़ी परेशानी बन सकती है.
बोन कैंसर के लक्षण क्या हैं?
बोन कैंसर का सबसे आम लक्षण हड्डियों में लगातार दर्द होना है. यह दर्द रात के समय ज्यादा बढ़ सकता है. इसके अलावा शरीर के किसी हिस्से में सूजन, गांठ या कमजोरी महसूस हो सकती है. कई लोगों को चलने-फिरने में परेशानी होने लगती है और छोटी चोट में भी हड्डी टूट सकती है. कुछ मरीजों को थकान, बुखार और वजन कम होने जैसी दिक्कतें भी होती हैं. डॉक्टरों का कहना है कि अगर लंबे समय तक हड्डियों में दर्द बना रहे तो तुरंत जांच करवानी चाहिए ताकि बीमारी का समय पर पता चल सके.
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कितना खतरनाक है यह कैंसर और क्या है इलाज?
बोन कैंसर एक गंभीर बीमारी है, लेकिन सही समय पर इलाज शुरू हो जाए तो मरीज ठीक भी हो सकते हैं. इसका इलाज कैंसर की स्थिति और प्रकार पर निर्भर करता है. डॉक्टर सर्जरी, रेडिएशन और दवाइयों की मदद से इसका इलाज करते हैं. कई मामलों में कैंसर वाली हड्डी के हिस्से को हटाना भी पड़ सकता है. डॉक्टर सलाह देते हैं कि शरीर में लंबे समय तक रहने वाले दर्द या सूजन को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. तुलसी गबार्ड के पति की बीमारी ने एक बार फिर लोगों का ध्यान इस खतरनाक बीमारी की तरफ खींचा है और यह याद दिलाया है कि समय पर जांच और इलाज बहुत जरूरी है.
बोन कैंसर से बचाव के लिए क्या करें?
डॉक्टरों के अनुसार हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाकर बोन कैंसर के खतरे को कम किया जा सकता है. इसके लिए संतुलित और पौष्टिक आहार लेना बहुत जरूरी है. डाइट में ऐसी चीजें शामिल करनी चाहिए जो हड्डियों को मजबूत बनाए रखें. नियमित व्यायाम करने से शरीर एक्टिव रहता है और कई गंभीर बीमारियों का खतरा कम होता है. इसके अलावा धूम्रपान और शराब से दूरी बनाकर रखना चाहिए. अगर शरीर में लगातार दर्द हो, खासकर हड्डियों में दर्द महसूस हो, तो तुरंत डॉक्टर से जांच करवानी चाहिए. समय-समय पर हेल्थ चेकअप कराते रहना भी बेहद जरूरी माना जाता है. तुलसी गबार्ड के पति की बीमारी ने एक बार फिर लोगों को यह समझाया है कि समय पर जांच और सही इलाज कितनी बड़ी भूमिका निभाते हैं.
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        <pubDate>Sun, 24 May 2026 21:30:13 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Sattu Benefits In Summer: गर्मियों में वरदान है बिहार का सत्तू, इस तरह पिएंगे तो शरीर के पास आने से भी डरेगी लू</title>
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        <description><![CDATA[ How Sattu Helps Protect The Body From Heatwave: गर्मियों की शुरुआत होते ही लोग शरीर को ठंडा रखने के लिए तरह-तरह के ड्रिंक्स पीना शुरू कर देते हैं. कोई कोल्ड ड्रिंक का सहारा लेता है तो कोई पैकेट वाले जूस का. लेकिन बिहार का पारंपरिक सत्तू आज भी गर्मी से राहत देने वाले सबसे असरदार देसी सुपरफूड्स में गिना जाता है. खास बात यह है कि यह सिर्फ शरीर को ठंडक ही नहीं देता, बल्कि लू, डिहाइड्रेशन और कमजोरी जैसी समस्याओं से बचाने में भी मदद करता है.&amp;nbsp;
क्यों है सत्तू का ड्रिंक खास?
सत्तू भुने हुए चने से तैयार किया जाता है और लंबे समय से बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में गर्मियों के सबसे भरोसेमंद पेय के रूप में इस्तेमाल होता आया है. अब हेल्थ एक्सपर्ट्स भी इसे नेचुरल एनर्जी ड्रिंक मान रहे हैं. क्योंकि इसमें प्रोटीन, फाइबर, आयरन, मैग्नीशियम और पोटैशियम जैसे जरूरी पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो शरीर को अंदर से मजबूत बनाए रखते हैं.&amp;nbsp;
गर्मी के मौसम में क्यों है फायदेमंद?
गर्मी में शरीर से पसीने के जरिए तेजी से पानी और मिनरल्स निकलने लगते हैं. यही वजह है कि कई लोगों को थकान, चक्कर, डिहाइड्रेशन और लू जैसी समस्याएं होने लगती हैं. सत्तू इन समस्याओं से बचाने में मदद कर सकता है. इसमें मौजूद इलेक्ट्रोलाइट्स शरीर में पानी का संतुलन बनाए रखते हैं और शरीर को लंबे समय तक हाइड्रेटेड रखने में मदद करते हैं. Artemishospitals के हेल्थ एक्सपर्ट्स के मुताबिक, सत्तू की तासीर ठंडी मानी जाती है. जब इसे ठंडे पानी, नींबू या छाछ के साथ मिलाकर पिया जाता है, तो यह शरीर की अंदरूनी गर्मी को कम करने में मदद करता है। यही कारण है कि गांवों में खेतों में काम करने वाले लोग आज भी तेज धूप में निकलने से पहले सत्तू पीना पसंद करते हैं.
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सत्तू पीने के क्या होते हैं फायदे?
सिर्फ ठंडक ही नहीं, सत्तू पेट के लिए भी काफी फायदेमंद माना जाता है. इसमें भरपूर फाइबर होता है, जो पाचन को बेहतर बनाता है और कब्ज, गैस व एसिडिटी जैसी समस्याओं को कम करने में मदद करता है. यही वजह है कि गर्मियों में भारी और तली-भुनी चीजों की जगह लोग सत्तू का सेवन ज्यादा करते हैं. डॉक्टरों का कहना है कि सत्तू ब्लड शुगर को तेजी से बढ़ने नहीं देता. इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम होता है, इसलिए डायबिटीज मरीज भी सीमित मात्रा में इसका सेवन कर सकते हैं. इसके साथ ही इसमें मौजूद प्रोटीन लंबे समय तक पेट भरा रखने में मदद करता है, जिससे बार-बार भूख नहीं लगती और वजन कंट्रोल करने में भी मदद मिल सकती है.
इस बात का जरूर रखें ध्यान
हालांकि एक्सपर्ट्स सलाह देते हैं कि सत्तू हमेशा सही मात्रा में ही पीना चाहिए. जरूरत से ज्यादा सेवन करने पर कुछ लोगों को पेट फूलना या गैस जैसी दिक्कत हो सकती है.
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        <pubDate>Sun, 24 May 2026 21:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Summer Heat And Lungs: बढ़ती गर्मी में खराब हो सकते हैं आपके फेफड़े, सांस के मरीज बढ़ने की आशंका</title>
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        <description><![CDATA[ How Summer Heat Affects Lung Health: देश का एक हिस्सा इस समय गर्मी से बेहाल है. कई जिलों में पारा 46- 47 डिग्री तक पहुंच गया है, लोग घर से निकलने से परहेज करने लगे हैं. ऐसे में बढ़ती गर्मी सिर्फ असहजता ही नहीं बढ़ा रही, बल्कि फेफड़ों की सेहत के लिए भी बड़ा खतरा बनती जा रही है. डॉक्टरों के मुताबिक अस्थमा, क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज , एलर्जी और अन्य सांस संबंधी बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए तेज गर्मी और उमस गंभीर परेशानी पैदा कर सकती है. &amp;nbsp;बढ़ता तापमान, हवा में नमी, प्रदूषण, धूल, छोटे कण और स्मॉग मिलकर फेफड़ों पर अतिरिक्त दबाव डालते हैं, जिससे सांस लेने में दिक्कत बढ़ सकती है और रेस्पिरेटरी अटैक का खतरा भी बढ़ जाता है.&amp;nbsp;
तापमान से कैसे पड़ता है फेफडों पर असर
पटना स्थित ऑरो सुपरस्पेशलिटी हॉस्पिटल की विशेषज्ञ डॉ. अंजली सौरभ बताती हैं कि अत्यधिक गर्मी केवल शरीर का तापमान ही नहीं बढ़ाती, बल्कि यह सीधे फेफड़ों की काम करने की क्षमता, ऑक्सीजन लेवल और एयरवे इंफ्लेमेशन को भी प्रभावित करती है. शरीर खुद को ठंडा रखने के लिए ज्यादा मेहनत करता है, जिससे हार्ट रेट और सांस लेने की गति बढ़ जाती है. स्वस्थ लोगों को यह केवल बेचैनी जैसा महसूस हो सकता है, लेकिन अस्थमा औरक्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज के मरीजों में यह स्थिति सांस फूलने और थकान को गंभीर बना सकती है.&amp;nbsp;
क्यों बढ़ जाती है जलन?
डॉक्टरों के अनुसार उमस यानी ह्यूमिडिटी समस्या को और बढ़ा देती है. नमी वाली भारी हवा में सांस लेना मुश्किल महसूस होता है क्योंकि इससे पसीना जल्दी नहीं सूखता और शरीर को ठंडा होने में परेशानी होती है. यही नहीं, ज्यादा नमी प्रदूषण, धुएं और एलर्जी पैदा करने वाले कणों को जमीन के करीब रोककर रखती है, जिससे सांस की नलियों में जलन बढ़ सकती है.
एक्सपर्ट बताते हैं कि गर्मियों में खासतौर पर भीड़भाड़ वाले शहरों में ग्राउंड लेवल ओजोन और स्मॉग तेजी से बनता है. यह स्थिति खांसी, घरघराहट, सीने में जकड़न और अस्थमा अटैक का कारण बन सकती है. अस्थमा के मरीजों में गर्म और उमस भरा मौसम एयरवे को ज्यादा संवेदनशील बना देता है. वहीं क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज मरीजों में सांस फूलना, ज्यादा खांसी, थकान और बलगम बनने जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं.
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किन लोगों को होती है सबसे ज्यादा दिक्कत?
डॉक्टरों के मुताबिक बुजुर्ग, छोटे बच्चे, धूम्रपान करने वाले लोग, हार्ट डिजीज से पीड़ित मरीज, बाहर काम करने वाले कर्मचारी और प्रदूषित शहरों में रहने वाले लोग सबसे ज्यादा जोखिम में हैं. जिन लोगों की लंग्स की क्षमता पहले से कमजोर होती है, उन्हें थोड़ी देर की गर्मी भी गंभीर परेशानी में डाल सकती है. एक्सपर्ट ने चेतावनी दी है कि अगर तेज सांस फूलना, लगातार घरघराहट, सीने में जकड़न, बात करने में दिक्कत, होंठ नीले पड़ना, चक्कर आना या लगातार खांसी जैसे लक्षण दिखाई दें तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए. समय रहते इलाज मिलने से गंभीर स्थिति से बचा जा सकता है.&amp;nbsp;
क्या कर सकते हैं बचाव
डॉक्टरों की सलाह है कि दोपहर 11 बजे से शाम 4 बजे तक घर के अंदर रहें, एयर क्वालिटी इंडेक्स पर नजर रखें और ज्यादा प्रदूषण वाले दिनों में बाहर निकलने से बचें. घर के अंदर की हवा को साफ और ठंडा रखने के लिए खिड़कियां बंद रखें, पर्दों का इस्तेमाल करें और धूम्रपान से दूरी बनाए रखें. एक्सपर्ट का कहना है कि छोटी-छोटी सावधानियां गर्मियों में फेफड़ों को सुरक्षित रखने में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 24 May 2026 21:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>Mouth Cancer In Young Adults: नॉन&amp;स्मोकर्स युवाओं में तेजी से फैल रहा ओरल कैंसर, इन लक्षणों को कतई न करें इग्नोर</title>
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        <description><![CDATA[ Why Are Non Smokers Getting Mouth Cancer: कई सालों तक मुंह के कैंसर को एक ऐसी बीमारी माना जाता रहा, जो ज्यादातर उम्रदराज पुरुषों में होती है. खासकर उन लोगों में, जो लंबे समय से सिगरेट या तंबाकू का सेवन करते रहे हों. लेकिन अब भारत के डॉक्टर एक बेहद चिंताजनक बदलाव देख रहे हैं. 20 और 30 की उम्र के युवा, जिनमें कई लोग कभी स्मोकिंग तक नहीं करते, एडवांस स्टेज ओरल कैंसर के साथ अस्पताल पहुंच रहे हैं.
क्या सिगरेट नहीं पीने वाले भी हो रहे हैं शिकार?
इनमें कुछ फिटनेस को लेकर बेहद सजग होते हैं, कुछ ने कभी सिगरेट को हाथ तक नहीं लगाया होता. कई लोग अपने करियर की शुरुआत कर रहे होते हैं या नई शादीशुदा जिंदगी जी रहे होते हैं. इसके बावजूद डॉक्टरों के पास ऐसे मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है. भारत पहले से ही दुनिया में ओरल कैंसर के सबसे ज्यादा मामलों वाले देशों में शामिल है. इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के मुताबिक, देश में तंबाकू और सुपारी आधारित उत्पादों के व्यापक इस्तेमाल की वजह से मुंह का कैंसर सबसे आम कैंसरों में से एक बना हुआ है. हालांकि अब डॉक्टरों का कहना है कि खतरा सिर्फ स्मोकिंग तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका रूप बदल चुका है.&amp;nbsp;
लोगों के बीच इसको लेकर गलतफहमी
अपोलो हॉस्पिटल्स के सीनियर कंसलटेंट और हेड एंड नेक ऑन्कोलॉजी एक्सपर्ट डॉ. अक्षत मलिक ने TOI को बताया कि युवाओं के बीच सबसे बड़ी गलतफहमी यही है कि सिर्फ सिगरेट पीने से ही मुंह का कैंसर होता है. उनके मुताबिक &quot;पहले मुंह के कैंसर को उम्रदराज पुरुषों की बीमारी माना जाता था, जो लंबे समय से स्मोकिंग करते हों. लेकिन अब 40 साल से कम उम्र के लोगों में तेजी से केस बढ़ रहे हैं, जिनमें बड़ी संख्या नॉन-स्मोकर्स की भी है.&quot;
किन चीजों का सेवन खतरनाक है?
डॉक्टर बताते हैं कि आज कई युवा सिगरेट की जगह गुटखा, खैनी, पान मसाला, सुपारी और पान जैसे उत्पादों का सेवन करते हैं. ये चीजें सामाजिक और कल्चरल रूप से सामान्य मानी जाती हैं, इसलिए लोग इन्हें नुकसानदेह नहीं समझते. लेकिन मेडिकल एक्सपर्ट्स के मुताबिक, ये आदतें बेहद खतरनाक साबित हो सकती हैं. डॉ मलिक बताते हैं कि ज्यादातर ओरल कैंसर मरीज सिगरेट नहीं पीते, बल्कि तंबाकू के दूसरे रूपों का इस्तेमाल करते हैं, जैसे गुटखा, खैनी, पान मसाला, सुपारी या पान.&quot;
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कैसे हो सकता है नुकसान?
ये पदार्थ लंबे समय तक मसूड़ों और गालों के अंदरूनी हिस्सों के संपर्क में रहते हैं, जिससे सेल्स को लगातार नुकसान पहुंचता रहता है. सबसे बड़ी समस्या यह है कि कई लोग खुद को तंबाकू यूजर मानते ही नहीं, इसलिए उन्हें अपने जोखिम का अंदाजा तक नहीं होता. इसके अलावा मुंह के अंदर लगातार होने वाली छोटी-छोटी समस्याएं भी बड़ा खतरा बन सकती हैं. जैसे टूटा हुआ दांत, जो जीभ को बार-बार चोट पहुंचाता हो, खराब फिटिंग वाले डेंचर, लंबे समय तक रहने वाले इंफेक्शन या खराब ओरल हाइजीन. लोग अक्सर इन चीजों को नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन लगातार होने वाली सूजन और घाव धीरे-धीरे कैंसर का कारण बन सकते हैं.
युवाओं में तेजी से फैल रहा खतरा?
सबसे चिंता की बात यह है कि युवाओं में होने वाला ओरल कैंसर ज्यादा तेजी से फैल सकता है. डॉ. मलिक के अनुसार, &quot;हम मानते हैं कि युवाओं में होने वाला ओरल कैंसर अधिक आक्रामक होता है और तेजी से फैल सकता है.&quot; डॉक्टरों का कहना है कि इस बीमारी में सबसे बड़ा खतरा देर से पहचान होना है. शुरुआती लक्षण अक्सर मामूली लगते हैं, जैसे मुंह में लंबे समय तक रहने वाला छाला, सफेद या लाल धब्बे, खाना खाते समय जलन, निगलने में दिक्कत या गर्दन में गांठ. लोग इन्हें सामान्य समझकर नजरअंदाज कर देते हैं.
इसे भी पढ़ें-&amp;nbsp;दिन में आसमान से बरस रही आग, रातों की भी उड़ी नींद, डॉक्टर से जानें यह कितना खतरनाक?
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 23 May 2026 13:30:09 +0530</pubDate>
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        <media:keywords>Mouth, Cancer, Young, Adults:, नॉन-स्मोकर्स, युवाओं, में, तेजी, से, फैल, रहा, ओरल, कैंसर, इन, लक्षणों, को, कतई, न, करें, इग्नोर</media:keywords>
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        <title>Heat Stroke: कितनी लू लगने पर आ जाती है जान पर आफत, क्या हैं इससे बचने के आसान तरीके?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/heat-stroke-कितनी-लू-लगने-पर-आ-जाती-है-जान-पर-आफत-क्या-हैं-इससे-बचने-के-आसान-तरीके</link>
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        <description><![CDATA[ Heat Stroke: कितनी लू लगने पर आ जाती है जान पर आफत, क्या हैं इससे बचने के आसान तरीके? ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 23 May 2026 13:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>Right Way to Eat Mango: आम खाने के बाद खराब हो जाता है पेट? गर्मी में ऐसे ले सकते हैं फलों के राजा का मजा</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/right-way-to-eat-mango-आम-खाने-के-बाद-खराब-हो-जाता-है-पेट-गर्मी-में-ऐसे-ले-सकते-हैं-फलों-के-राजा-का-मजा</link>
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        <description><![CDATA[ Right Way to Eat Mango:&amp;nbsp;अगर आप भी मैंगों लवर हैं और सालभर बेसब्री से आम का इंतजार करते हैं तो फलों के राजा आम का सीजन अब शुरु हो चुका है. ऐसे में आम के दीवानों ने अपने-अपने घरों को आम से भरना भी शुरु कर दिया होगा. हालांकि, कई बार देखने में आता है कि ज्यादा आम खाने से पेट खराब हो जाता है. ऐसे में यह सवाल उठता है कि आखिर ऐसी परेशानी क्यों होती है और इससे कैसे बचा जा सकता है?&amp;nbsp;
अगर आप भी आम खाने के बाद पेट खराब होने की समस्या से परेशान हैं तो इसका मतलब खराबी आम में नहीं है, बल्कि आपके खाने के तरीके में है. आइए जानते हैं कि गर्मी में पेट खराब किए बिना आम का मजा कैसे लिया जा सकता है.
आम खाने से क्यों खराब होता है पेट?
आम की तासीर गर्म होती है. इसमें फाइबर और नेचुरल शुगर की मात्रा बहुत अधिक होती है. जब हम एक साथ बहुत सारे आम खा लेते हैं तो पाचन तंत्र पर दबाव पड़ता है. इसके अलावा, आजकल आमों को पकाने के लिए कैल्शियम कार्बाइड जैसे केमिकल्स का इस्तेमाल किया जाता है जो पेट में इन्फेक्शन और मरोड़ का कारण बन सकते हैं.
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पानी में भिगोकर रखें- आम खाने से कम से कम 1 से 2 घंटे पहले उसे ठंडे पानी में भिगोकर छोड़ दें. इससे आम की अतिरिक्त गर्मी कम हो जाती है. साथ ही छिलके पर लगे हानिकारक केमिकल भी साफ हो जाते हैं.&amp;nbsp;
सीमित मात्रा में खाएं- स्वाद के चक्कर में एक बार में ज्यादा आम न खाएं. दिनभर में एक या दो आम खाना ही काफी है.
खाने का सही समय- आम को सुबह के नाश्ते में या दोपहर के लंच के बीच खाएं. रात को सोने से ठीक पहले आम खाने से बचें, क्योंकि इससे पाचन बिगड़ सकता है और वजन भी बढ़ सकता है.
दूध या दही के साथ कॉम्बिनेशन- आयुर्वेद के अनुसार, खट्टे आम को दूध के साथ नहीं मिलाना चाहिए. हालांकि, पूरी तरह पके और मीठे आम का शेक बनाकर लिया जा सकता है, जो शरीर को ठंडक देता है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Sat, 23 May 2026 13:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>Uric Acid Myth Dal: दाल बनाते समय झाग हटाना सही या गलत, क्या इसमें सच में होता है यूरिक एसिड?</title>
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        <description><![CDATA[ Uric Acid Myth Dal: दाल बनाते समय झाग हटाना सही या गलत, क्या इसमें सच में होता है यूरिक एसिड? ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 23 May 2026 13:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>Nautapa 2026: नौतपा में भूलकर भी न पहन लेना 100 रुपये वाला चश्मा, खराब हो सकती हैं आंखें </title>
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        <description><![CDATA[ Nautapa 2026: हर साल गर्मियों में एक ऐसा समय आता है जब सूरज की गर्मी सबसे ज्यादा तेज हो जाती है. इस समय को &amp;ldquo;नौतपा&amp;rdquo; कहा जाता है. नौतपा का मतलब होता है लगातार 9 दिनों तक पड़ने वाली भीषण गर्मी. इस साल 25 मई से लेकर 2 जून तक नौतपा का असर रहने वाला है. इन दिनों में तापमान काफी बढ़ जाता है, गर्म हवाएं चलती हैं और दोपहर में बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है.
मौसम विशेषज्ञ भी इस दौरान लोगों को ज्यादा सावधानी बरतने की सलाह देते हैं. ऐसे में कई लोग गर्मी से आंखो को बचाने के लिए सड़क के किनारे से चश्मा खरीद लेते हैं, जिसका खामियाजा उनकी आंखों को उठाना पड़ता है.
सस्ता चश्मा आंखों के लिए क्यों है खतरनाक?
गर्मी बढ़ते ही लोग धूप से बचने के लिए सड़क किनारे मिलने वाले 100 या 150 रुपये के सस्ते काले चश्मे खरीद लेते हैं. देखने में ये चश्मे स्टाइलिश लगते हैं, लेकिन आंखों को नुकसान पहुंचा सकते हैं. ऐसे चश्मों में सही UV Protection नहीं होता, जिससे सूरज की हानिकारक किरणें सीधे आंखों तक पहुंच जाती हैं. इससे आंखों में जलन, पानी आना, सिर दर्द और धुंधला दिखने जैसी समस्याएं हो सकती हैं.&amp;nbsp;
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नौतपा में आंखों का ऐसे रखें ध्यान
डॉक्टरों का कहना है कि नौतपा के दौरान अच्छी क्वालिटी का सनग्लास ही पहनना चाहिए. चश्मा खरीदते समय यह जरूर देखें कि उसमें UV Protection मौजूद हो. इसके अलावा तेज धूप में बाहर निकलते समय छाता, टोपी या गमछे का इस्तेमाल करना भी फायदेमंद होता है. कोशिश करें कि दोपहर 12 बजे से 4 बजे के बीच कम बाहर निकलें क्योंकि इसी समय धूप सबसे ज्यादा खतरनाक होती है.&amp;nbsp;
छोटी सी लापरवाही पड़ सकती है भारी
नौतपा के दिनों में शरीर के साथ-साथ आंखों की देखभाल करना भी बेहद जरूरी है. केवल फैशन के लिए सस्ता चश्मा पहनना भविष्य में परेशानी का कारण बन सकता है. गर्मी के इस मौसम में खूब पानी पिएं, आंखों को बार-बार ठंडे पानी से धोएं और अगर आंखों में ज्यादा जलन हो तो डॉक्टर से सलाह लें. साथ ही सही सावधानी अपनाकर आप नौतपा की तेज गर्मी में भी अपनी आंखों को सुरक्षित रख सकते हैं.
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        <pubDate>Sat, 23 May 2026 13:30:05 +0530</pubDate>
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        <title>Vanessa Trump: डोनाल्ड ट्रंप की इस रिश्तेदार को हुआ इतना खतरनाक कैंसर, जानें इसके लक्षण और बचाव के तरीके</title>
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        <description><![CDATA[ Vanessa Trump Reveals Breast Cancer Diagnosis: अमेरिका की पूर्व मॉडल और सोशलाइट वैनेसा ट्रंप ने हाल ही में अपनी सेहत को लेकर एक बेहद भावुक जानकारी साझा की. 20 मई 2026 को उन्होंने सोशल मीडिया पर बताया कि उन्हें ब्रेस्ट कैंसर हो गया है. 48 वर्षीय वैनेसा ने कहा कि हाल ही में उनका एक मेडिकल प्रोसीजर हुआ है और अब वह अपनी ऑन्कोलॉजी टीम के साथ मिलकर लंबे इलाज की तैयारी कर रही हैं. इस खबर के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने उनके जल्द ठीक होने की दुआ की. उनकी बेटी काई ट्रंप ने भी उन्हें सबसे मजबूत इंसान बताया.
कितना खतरनाक है ब्रेस्ट कैंसर?
हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली संस्था clevelandclinic के अनुसार, ब्रेस्ट कैंसर महिलाओं में होने वाले सबसे आम कैंर्स में से एक माना जाता है. यह बीमारी तब शुरू होती है, जब ब्रेस्ट की सेल्स असामान्य तरीके से तेजी से बढ़ने लगती हैं और धीरे-धीरे ट्यूमर का रूप ले लेती हैं. कई मामलों में यह कैंसर शरीर के दूसरे हिस्सों तक भी फैल सकता है, इसलिए समय रहते इसकी पहचान बेहद जरूरी मानी जाती है. हाल ही में अमेरिका की पूर्व मॉडल और सोशलाइट वैनेसा ट्रंप ने खुलासा किया कि उन्हें ब्रेस्ट कैंसर हो गया है. इस खबर के बाद दुनियाभर में लोग उनकी सेहत को लेकर चिंता जता रहे हैं. 48 वर्षीय वैनेसा ने बताया कि उनका मेडिकल प्रोसीजर हो चुका है और अब वह अपनी ऑन्कोलॉजी टीम के साथ इलाज पर काम कर रही हैं.
किनको रहता है इसका खतरा?
हेल्थ एक्सपर्ट्स के मुताबिक, ब्रेस्ट कैंसर सिर्फ बड़ी उम्र की महिलाओं को ही नहीं, बल्कि कम उम्र की महिलाओं को भी प्रभावित कर सकता है. हालांकि 50 साल की उम्र के बाद इसका खतरा ज्यादा बढ़ जाता है. कुछ मामलों में पुरुषों में भी यह बीमारी देखी जाती है. डॉक्टरों का कहना है कि ब्रेस्ट में गांठ महसूस होना इसका सबसे सामान्य लक्षण है, लेकिन इसके अलावा भी कई संकेत हो सकते हैं. जैसे ब्रेस्ट के आकार में बदलाव, त्वचा का लाल या मोटा होना, निप्पल से खून या तरल पदार्थ निकलना, अंडरआर्म में गांठ या लगातार दर्द महसूस होना. कई बार शुरुआती स्टेज में कोई बड़ा लक्षण नजर नहीं आता, इसलिए नियमित जांच बेहद जरूरी मानी जाती है.
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क्या होते हैं इसके कारण?
एक्सपर्ट के अनुसार, बढ़ती उम्र, फैमिली हिस्ट्री, मोटापा, स्मोकिंग, शराब का सेवन, हार्मोनल बदलाव और खराब लाइफस्टाइल इसके बड़े रिस्क फैक्टर्स हो सकते हैं. वहीं BRCA1 और BRCA2 जैसे जेनेटिक म्यूटेशन भी कई महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर का खतरा बढ़ा सकते हैं. डॉक्टर बताते हैं कि समय पर जांच होने पर इस बीमारी का इलाज संभव है. इसके लिए मैमोग्राफी, ब्रेस्ट अल्ट्रासाउंड, एमआरआई और बायोप्सी जैसी जांच की जाती हैं. वहीं इलाज में सर्जरी, कीमोथेरेपी, रेडिएशन, इम्यूनोथेरेपी और हार्मोन थेरेपी शामिल हो सकती हैं. एक्सपर्ट का कहना है कि हेल्दी डाइट, नियमित एक्सरसाइज, वजन कंट्रोल में रखना और समय-समय पर स्क्रीनिंग करवाना ब्रेस्ट कैंसर के खतरे को कम करने में मदद कर सकता है.
पब्लिक लाइफ से दूर नजर आती हैं वैनेस ट्रंप
वैनेसा ट्रंप पिछले कई सालों से सार्वजनिक जीवन का हिस्सा रही हैं. डोनाल्ड ट्रंप जूनियर से शादी के बाद वह अक्सर चर्चाओं में रहीं. दोनों ने 13 साल साथ बिताए और उनके पांच बच्चे हैं. हालांकि 2018 में दोनों का तलाक हो गया था, लेकिन बच्चों की परवरिश को लेकर दोनों ने हमेशा पॉजिटिव रिश्ता बनाए रखा.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 23 May 2026 01:30:37 +0530</pubDate>
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        <title>दिन में आसमान से बरस रही आग, रातों की भी उड़ी नींद, डॉक्टर से जानें यह कितना खतरनाक?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/दिन-में-आसमान-से-बरस-रही-आग-रातों-की-भी-उड़ी-नींद-डॉक्टर-से-जानें-यह-कितना-खतरनाक</link>
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        <description><![CDATA[ राजधानी दिल्ली समेत पूरा उत्तर भारत इन दिनों भीषण गर्मी और लू (Heatwave) की भयानक चपेट में है. मई के इस महीने में हालात ऐसे हो गए हैं कि मानो आसमान से धूप नहीं, बल्कि आग बरस रही हो. आमतौर पर गर्मियों में दिन के वक्त तेज धूप होती है, लेकिन शाम ढलने के बाद मौसम थोड़ा ठंडा हो जाता है. हालांकि, इस बार मौसम का मिजाज बिल्कुल अलग है. दिल्ली और उत्तर भारत के लोगों को इस बार गर्मी की &#039;डबल मार&#039; झेलनी पड़ रही है, क्योंकि सूरज ढलने के बाद भी तपिश कम नहीं हो रही है. आइए डॉक्टर से जानते हैं कि यह आपकी सेहत के लिए कितना खतरनाक है?
रात में भी 40 डिग्री तक पहुंच रहा तापमान
इस बार की गर्मी ने पिछले कई रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं. परेशानी सिर्फ तेज धूप की नहीं है, बल्कि &#039;गर्म रातों&#039; की है. रात के समय भी दिल्ली समेत उत्तर भारत के कई प्रमुख शहरों का तापमान 35 से 40 डिग्री सेल्सियस के बीच पहुंच रहा है. जब रात में तापमान कम नहीं होता तो इंसानी शरीर को खुद को ठंडा करने और रिकवर करने का समय नहीं मिल पाता, जिससे बीमार पड़ने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है.
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आंकड़ों के मुताबिक, पहाड़ों पर भी गर्मी का कहर है. जम्मू-कश्मीर में रात का न्यूनतम तापमान सामान्य से 3 से 5 डिग्री सेल्सियस तक ज्यादा दर्ज किया जा रहा है. वहीं, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, बिहार, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में भी रात का तापमान सामान्य से 1.6 डिग्री से लेकर 3 डिग्री तक ज्यादा बना हुआ है. कंक्रीट के जंगलों की वजह से रात के समय इमारतें और सड़कें दिन भर सोखी गई गर्मी को बाहर फेंकते हैं, जिससे रातें और ज्यादा दमघोंटू हो गई हैं.
कई राज्यों में रेड और येलो अलर्ट जारी
हालात की गंभीरता को देखते हुए मौसम विभाग ने कई राज्यों के लिए सख्त चेतावनियां जारी की हैं.&amp;nbsp;

रेड अलर्ट (Red Alert): उत्तर प्रदेश, दिल्ली, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के विदर्भ इलाके में भीषण हीटवेव का &#039;रेड अलर्ट&#039; जारी किया गया है. इसका मतलब है कि इन राज्यों में गर्मी जानलेवा स्तर तक पहुंच चुकी है और लोगों को बिना बहुत जरूरी काम के बाहर नहीं निकलना चाहिए.
येलो अलर्ट (Yellow Alert): जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों के साथ-साथ उत्तर भारत के कई अन्य इलाकों में &#039;येलो अलर्ट&#039; है, जहां आमतौर पर मौसम ठंडा रहता था.

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. नरेश कुमार ने मौजूदा हालात पर चिंता जताते हुए बताया है कि मौसम के पैटर्न में फिलहाल बड़े बदलाव के संकेत नहीं हैं. दिन और रात में गर्मी का यह जानलेवा सिलसिला कम से कम अगले 7 दिन तक इसी तरह जारी रहने की आशंका है.
डॉक्टरों की चेतावनी: सेहत के लिए है गंभीर खतरा
गर्मी का यह रूप सेहत के लिए मेडिकल इमरजेंसी जैसा है. नोएडा स्थित कैलाश अस्पताल के इंटरनल मेडिसिन विभाग के एचओडी (HOD) डॉ. एके शुक्ला के मुताबिक, इस बार की गर्मी सिर्फ दिन में नहीं, बल्कि रात में भी सेहत के लिए बड़ा और गंभीर खतरा बन गई है. जब रात में शरीर का तापमान सामान्य नहीं हो पाता तो डिहाइड्रेशन और हीट स्ट्रोक (लू लगना) का खतरा बढ़ जाता है. डॉक्टरों ने विशेष रूप से उन लोगों को ज्यादा सावधान रहने की सलाह दी है, जो पहले से किसी बीमारी से जूझ रहे हैं. अगर आपको हाइपरटेंशन (High Blood Pressure), डायबिटीज (Sugar), या दिल से जुड़ी कोई बीमारी है तो यह मौसम आपके लिए बेहद खतरनाक है.&amp;nbsp;
हीटवेव से खुद को और परिवार को कैसे बचाएं?
अगले एक हफ्ते तक राहत की कोई उम्मीद नहीं है, इसलिए बचाव ही सबसे बड़ी दवा है. स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने कुछ आसान, लेकिन बेहद जरूरी उपाय बताए हैं.

हाइड्रेशन है सबसे जरूरी: प्यास न लगने पर भी थोड़ी-थोड़ी देर में पानी पीते रहें. शरीर में पानी की कमी न होने दें. पानी के अलावा ओआरएस (ORS) का घोल, नींबू पानी, छाछ, लस्सी और नारियल पानी का सेवन लगातार करें.
सिर और शरीर को ढंकें: अगर दिन के समय घर से बाहर निकलना मजबूरी है तो सीधे धूप के संपर्क में आने से बचें. सिर को टोपी, गमछे या छाते से अच्छी तरह ढक कर रखें. हमेशा सूती (Cotton), हल्के रंग और ढीले कपड़े पहनें.
खान-पान का रखें ध्यान: ज्यादा तला-भुना और मसालेदार खाना खाने से बचें. तरबूज, खरबूजा, खीरा और ककड़ी जैसे पानी वाले फलों को अपनी डाइट में शामिल करें.
लक्षणों को न करें नजरअंदाज: अगर अचानक तेज सिरदर्द, चक्कर आना, उल्टी महसूस होना, अत्यधिक पसीना आना या पसीना एकदम से बंद हो जाना और धड़कन तेज होने जैसे लक्षण दिखें तो इसे हल्के में न लें. यह हीट स्ट्रोक (Heatstroke) हो सकता है. ऐसे में तुरंत किसी ठंडी जगह पर जाएं और मेडिकल मदद लें.

ये भी पढ़ें: खांसी, जुकाम, खराश और थकान? मौसम का बदलाव नहीं, शरीर में है ये कमी, पढ़ें डॉक्टर की चेतावनी ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 21 May 2026 21:30:09 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Night Heatwave: दिन में ही नहीं, रात में भी चल रही लू! बच्चों और महिलाओं के लिए क्यों बढ़ रहा खतरा?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/night-heatwave-दिन-में-ही-नहीं-रात-में-भी-चल-रही-लू-बच्चों-और-महिलाओं-के-लिए-क्यों-बढ़-रहा-खतरा</link>
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        <description><![CDATA[ Night Heatwave: दिन में ही नहीं, रात में भी चल रही लू! बच्चों और महिलाओं के लिए क्यों बढ़ रहा खतरा? ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 21 May 2026 21:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>Ebola Virus: कितना खतरनाक है अफ्रीका में फैला इबोला वायरस? जानें इस बीमारी के लक्षण और इलाज का तरीका</title>
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        <description><![CDATA[ How Ebola Virus Spreads Among Humans: अफ्रीका के कुछ हिस्सों में फैले इबोला वायरस ने एक बार फिर दुनिया की चिंता बढ़ा दी है. हाल ही में वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन ने कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य और युगांडा में फैल रहे इबोला इंफेक्शन &amp;nbsp;को इंटरनेशनल लेवल पर सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित किया है. रिपोर्ट के मुताबिक, 16 मई तक डीआरसी के इटुरी प्रांत में 246 संदिग्ध मामले और 80 संदिग्ध मौतें दर्ज की गईं, जबकि कुछ मामलों की लैब में पुष्टि भी हो चुकी है.&amp;nbsp;
क्या एक नई महामारी की हो चुकी शुरुआत?
&amp;nbsp;डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक डॉ. टेड्रोस अधानोम घेब्रेयसस ने कहा है कि मौजूदा स्थिति अभी महामारी के स्तर तक नहीं पहुंची है, लेकिन इंफेक्शन की गंभीरता को देखते हुए अंतरराष्ट्रीय सहयोग बेहद जरूरी है. डीआरसी के स्वास्थ्य मंत्री सैमुअल-रोजर काम्बा ने बताया कि इस बार जो स्ट्रेन सामने आया है, उसका फिलहाल कोई प्रभावी वैक्सीन या विशेष इलाज उपलब्ध नहीं है और इसकी मृत्यु दर 50 प्रतिशत तक पहुंच सकती है.&amp;nbsp;
क्या है इबोला बीमारी?
इबोला एक बेहद खतरनाक और जानलेवा बीमारी है, जो ऑर्थोइबोलावायरस परिवार के वायरस से होती है. अब तक इसके छह अलग-अलग प्रकार पहचाने जा चुके हैं, लेकिन इनमें से तीन स्ट्रेन बड़े प्रकोप की वजह बने हैं, जो इंसानों में गंभीर इंफेक्शन फैलाती है। यह वायरस आमतौर पर जानवरों से इंसानों में पहुंचता है. एक्सपर्ट के मुताबिक, फल खाने वाले चमगादड़ों को इसका नेचुरल फैलने का तरीका माना जाता है. इंफेक्शन जानवरों के खून, शरीर के तरल पदार्थ या इंफेक्टेड व्यक्ति के सीधे संपर्क में आने से यह वायरस तेजी से फैल सकता है. यही वजह है कि अस्पतालों में इलाज के दौरान स्वास्थ्यकर्मियों के इंफेक्टेड होने का खतरा भी काफी अधिक रहता है. यहां तक कि इंफेक्टेड व्यक्ति के अंतिम संस्कार के दौरान सीधे संपर्क में आने से भी वायरस फैलने का खतरा रहता है.
कैसे होते हैं इसके लक्षण?&amp;nbsp;
&amp;nbsp;वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के मुताबिक, इबोला के शुरुआती लक्षण सामान्य वायरल बुखार जैसे लगते हैं, जिससे इसकी पहचान मुश्किल हो जाती है. इंफेक्शन के दो से 21 दिनों के भीतर अचानक तेज बुखार, अत्यधिक थकान, शरीर दर्द, सिरदर्द और गले में खराश शुरू हो सकती है. इसके बाद मरीज को उल्टी, दस्त, पेट दर्द, त्वचा पर चकत्ते और किडनी-लिवर से जुड़ी समस्याएं होने लगती हैं. कई मामलों में मरीज मानसिक भ्रम, चिड़चिड़ापन और आक्रामक व्यवहार भी दिखाने लगता है. हालांकि आम लोगों के बीच यह धारणा है कि इबोला में हमेशा खून बहता है, लेकिन एक्सपर्ट का कहना है कि ब्लीडिंग हर मरीज में नहीं होती और यह बीमारी के बाद के चरणों में दिखाई देती है.
इसके अलावा इबोला की पहचान करना भी आसान नहीं होता, क्योंकि इसके शुरुआती लक्षण कई दूसरी इंफेक्शन बीमारियों जैसे मलेरिया, टाइफाइड, मेनिनजाइटिस और सामान्य वायरल बुखार से काफी मिलते-जुलते हैं. यही वजह है कि कई बार शुरुआती चरण में मरीज की बीमारी पकड़ में नहीं आ पाती. डॉक्टरों के मुताबिक, अगर समय रहते सही जांच और पहचान न हो, तो इंफेक्शन तेजी से गंभीर रूप ले सकता है.
कब-कब दिखा इसका प्रकोप?
इबोला का इतिहास भी बेहद डरावना रहा है. इसका पहला बड़ा प्रकोप साल 1976 में सामने आया था, जब सूडान और कांगो में लगातार दो बड़े इंफेक्शन दर्ज किए गए. इसके बाद 2000-01 में युगांडा में वायरस तेजी से फैला. लेकिन सबसे भयावह प्रकोप 2013 से 2016 के बीच पश्चिम अफ्रीका में देखने को मिला. उस दौरान गिनी, लाइबेरिया और सिएरा लियोन जैसे देशों में 28 हजार से ज्यादा मामले सामने आए और 11 हजार से अधिक लोगों की मौत हो गई. यह अब तक का सबसे घातक इबोला प्रकोप माना जाता है. इंफेक्शन बाद में अमेरिका और यूरोप तक भी पहुंचा, जहां कुछ मामले अफ्रीका से लौटे यात्रियों और स्वास्थ्यकर्मियों में पाए गए. इसके बाद 2018 से 2020 के बीच डीआरसी और युगांडा में फिर बड़े स्तर पर इंफेक्शन फैला और हाल ही में 2025 में युगांडा में नए मामले सामने आए.
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क्या है इसका इलाज?
रिसर्चर्स का कहना है कि इबोला का इलाज अब भी बड़ी चुनौती बना हुआ है. लंदन के इम्पीरियल कॉलेज के मेडिकल एक्सपर्ट के मुताबिक, फिलहाल जो इलाज उपलब्ध हैं, वे केवल जायर स्ट्रेन पर असर करते हैं. वहीं मौजूदा बंडीबुग्यो स्ट्रेन के लिए न तो कोई स्वीकृत वैक्सीन है और न ही प्रभावी एंटीवायरल दवा. ऐसे में इलाज मुख्य रूप से शरीर में पानी और इलेक्ट्रोलाइट संतुलन बनाए रखने, ऑक्सीजन स्तर स्थिर रखने और मरीज की हालत संभालने पर आधारित है.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 21 May 2026 21:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Ebola, Virus:, कितना, खतरनाक, है, अफ्रीका, में, फैला, इबोला, वायरस, जानें, इस, बीमारी, के, लक्षण, और, इलाज, का, तरीका</media:keywords>
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        <title>Heatwave Alert: भीषण गर्मी&amp;लू का अलर्ट जारी, हीट स्ट्रोक से बचने के लिए अपनाएं ये उपाय, वरना जा सकती है जान</title>
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        <description><![CDATA[ How To Protect Yourself From Heatwave: गर्मी का कहर लगातार बढ़ता जा रहा है और इसी को देखते हुए आयुष मंत्रालय ने 18 मई को भीषण गर्मी और लू से बचाव को लेकर एक पब्लिक हेल्थ एडवाइजरी जारी की है. मंत्रालय ने लोगों को ज्यादा से ज्यादा पानी पीने, दोपहर की तेज धूप से बचने, हल्के सूती कपड़े पहनने और शरीर में पानी की कमी ना होने देने की सलाह दी है. एडवाइजरी में कहा गया है कि अगर चक्कर आना, सिरदर्द, मतली, शरीर का तापमान बहुत बढ़ना, बेहोशी, दौरे पड़ना या मानसिक स्थिति में बदलाव जैसे लक्षण दिखें तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह हीट स्ट्रोक के संकेत हो सकते हैं.&amp;nbsp;
किन लोगों को सबसे ज्यादा सावधान रहना चाहिए?
आयुष मंत्रालय के मुताबिक यह एडवाइजरी आम लोगों के साथ-साथ बच्चों, गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों, बाहर काम करने वाले मजदूरों और दिल की बीमारी या हाई ब्लड प्रेशर जैसी पुरानी बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए खास तौर पर जरूरी है. काम करने वाली जगहों और सार्वजनिक आयोजनों में छाया वाली जगह, आराम के लिए ब्रेक और लगातार पानी उपलब्ध कराने पर भी जोर दिया है.
शरीर को ठंडा रखने के लिए क्या करना चाहिए?
एडवाइजरी में आयुर्वेद, योग, यूनानी और होम्योपैथी से जुड़े पारंपरिक उपायों का भी जिक्र किया गया है. शरीर को ठंडा रखने के लिए छाछ, नारियल पानी, नींबू पानी और इलेक्ट्रोलाइट वाले पेय पदार्थ पीने की सलाह दी गई है. साथ ही निम्बूकफल पानक, आम्र प्रपानक और चिंचा पानक जैसे पारंपरिक पेय पदार्थों को भी गर्मी में फायदेमंद बताया गया है. मंत्रालय ने खीरा, तरबूज, खरबूजा, पेठा, टमाटर और नींबू जैसी ठंडी तासीर वाली चीजों को रोजाना खाने में शामिल करने की सलाह दी है.
कब जा सकती है जान?
अमेरिका के सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के अनुसार, अत्यधिक गर्मी शरीर को ठीक से ठंडा होने नहीं देती, जिससे गंभीर बीमारियां और मौत तक हो सकती है. संस्था के मुताबिक छोटे बच्चे, बुजुर्ग और पुरानी बीमारियों से पीड़ित लोग सबसे ज्यादा जोखिम में होते हैं.
शरीर को हाइड्रेट रखने का क्या है तरीका?
एक्सपर्ट्स के अनुसार लू से बचने के लिए सबसे जरूरी है शरीर को हाइड्रेट रखना. दिनभर खूब पानी पीना चाहिए, भले ही प्यास ना लगे. कैफीन और ज्यादा मीठे पेय पदार्थों से बचना चाहिए, क्योंकि ये शरीर में पानी की कमी बढ़ा सकते हैं. नारियल पानी, नींबू पानी और इलेक्ट्रोलाइट ड्रिंक्स शरीर में जरूरी मिनरल्स बनाए रखने में मदद करते हैं.
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इतने घंटे तक घर से बाहर न निकलें
दोपहर 12 बजे से शाम 4 बजे तक धूप सबसे ज्यादा खतरनाक मानी जाती है. इस दौरान घर के अंदर रहने की कोशिश करनी चाहिए. अगर बाहर निकलना जरूरी हो तो छाता, टोपी और धूप का चश्मा इस्तेमाल करना बेहतर माना जाता है. हल्के रंग के ढीले और सूती कपड़े शरीर को ठंडा रखने में मदद करते हैं.&amp;nbsp;
खाने की चीजों पर रखें ध्यान
एक्सपर्ट्स यह भी सलाह देते हैं कि ज्यादा तला-भुना और मसालेदार खाना खाने से बचें, क्योंकि इससे शरीर में गर्मी बढ़ती है. अगर किसी को ज्यादा पसीना आना, चक्कर, कमजोरी या मांसपेशियों में ऐंठन महसूस हो तो तुरंत ठंडी जगह पर ले जाकर पानी पिलाना चाहिए. जरूरत पड़ने पर तुरंत डॉक्टर की मदद लेना जरूरी है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 21 May 2026 21:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Blood Cancer Symptoms: स्किन पर लगातार दिख रहे लाल चकत्ते तो तुरंत कराएं सीबीसी, हो सकता है ब्लड कैंसर</title>
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        <description><![CDATA[ Persistent Red Rashes Could Be A Sign Of Blood Cancer: स्किन पर बार-बार लाल चकत्ते दिखना या छोटे-छोटे लाल धब्बे उभरना कई लोग सामान्य एलर्जी या मौसम का असर समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. लेकिन डॉक्टरों के मुताबिक, अगर ये निशान लंबे समय तक बने रहें और इलाज के बाद भी ठीक न हों, तो इन्हें हल्के में लेना खतरनाक हो सकता है. कई मामलों में यह ब्लड कैंसर यानी ल्यूकेमिया का शुरुआती संकेत भी हो सकता है. ऐसे में समय रहते सीबीसी यानी कम्प्लीट ब्लड काउंट टेस्ट कराना बेहद जरूरी माना जाता है.&amp;nbsp;
कैसे होती है ब्लड कैंसर की शुरुआत?
यूके ब्लड कैंसर संस्थान की रिपोर्ट के अनुसार, &amp;nbsp;ब्लड कैंसर हड्डियों के भीतर मौजूद बोन मैरो में शुरू होता है, जहां खून की सेल्स बनती हैं. जब खून बनाने वाली सेल्स के डीएनए में बदलाव होने लगते हैं, तो असामान्य व्हाइट ब्लड सेल्स तेजी से बढ़ने लगती हैं. धीरे-धीरे ये स्वस्थ रक्त कोशिकाओं की जगह लेने लगती हैं, जिससे शरीर की सामान्य काम करने की क्षमता प्रभावित होने लगती है.
क्या होते हैं इसके लक्षण?
एक्सपर्ट के अनुसार, ब्लड कैंसर के लक्षण हर व्यक्ति में अलग हो सकते हैं. लेकिन त्वचा पर दिखाई देने वाले लाल चकत्ते, बैंगनी धब्बे या बिना चोट के नीले निशान इसके अहम संकेतों में शामिल हैं. कई बार ये छोटे-छोटे लाल बिंदुओं की तरह नजर आते हैं, जिन्हें पेटीकीए कहा जाता है. कुछ लोगों में बड़े लाल या बैंगनी पैच भी दिखाई दे सकते हैं. खास बात यह है कि इन निशानों पर दबाव डालने के बाद भी इनका रंग फीका नहीं पड़ता.
स्किन पर क्यों पड़ने लगते हैं चकत्ते?
डॉक्टरों का कहना है कि ब्लड कैंसर में शरीर में प्लेटलेट्स की संख्या कम होने लगती है, जिससे खून का थक्का बनने की प्रक्रिया प्रभावित होती है. यही वजह है कि त्वचा पर अचानक लाल या बैंगनी निशान उभरने लगते हैं. इसके अलावा बार-बार बुखार आना, अत्यधिक थकान, सांस फूलना, बिना वजह वजन घटना, रात में ज्यादा पसीना आना और शरीर में गांठ महसूस होना भी गंभीर संकेत हो सकते हैं.
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कब डॉक्टर को दिखाना चाहिए?
विशेषज्ञ मानते हैं कि कई लोग इन लक्षणों को सामान्य कमजोरी, एलर्जी या संक्रमण समझकर महीनों तक नजरअंदाज करते रहते हैं. जबकि शुरुआती जांच बीमारी को जल्दी पकड़ने में मदद कर सकती है. सीबीसी टेस्ट के जरिए शरीर में लाल और व्हाइट ब्लड सेल्स तथा प्लेटलेट्स की स्थिति का पता लगाया जाता है.अगर रिपोर्ट में असामान्य बदलाव दिखाई दें, तो डॉक्टर आगे की जांच की सलाह देते हैं.
इस बात का रखें ध्यान
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि हर लाल चकत्ता ब्लड कैंसर का संकेत नहीं होता, लेकिन अगर त्वचा पर बार-बार निशान दिखें, लगातार खुजली रहे या शरीर में असामान्य बदलाव महसूस हों, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए. एक्सपर्ट का कहना है कि समय पर जांच और सही इलाज से ब्लड कैंसर के इलाज की संभावना काफी बेहतर हो सकती है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 21 May 2026 21:30:06 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>High Blood Pressure: हाई बीपी और स्ट्रेस का अचूक उपाय है प्राणिक हीलिंग, शरीर को छुए बिना ऐसे होता है इलाज</title>
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        <description><![CDATA[ How Stress Increases High Blood Pressure: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हाई ब्लड प्रेशर की समस्या तेजी से बढ़ रही है और इसके पीछे तनाव यानी स्ट्रेस को सबसे बड़ा लेकिन सबसे ज्यादा नजरअंदाज किया जाने वाला कारण माना जा रहा है. देर रात तक काम करना, नींद पूरी न होना, हर समय चिंता में रहना, मानसिक थकान और घंटों मोबाइल-लैपटॉप जैसी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस के सामने बिताना आज के युवाओं की लाइफस्टाइल का हिस्सा बन चुका है. यही कारण है कि कम उम्र में भी लोग हाई बीपी जैसी गंभीर समस्या का सामना कर रहे हैं.
डॉक्टर लंबे समय से इस बात पर जोर देते आए हैं कि लगातार तनाव शरीर में एड्रेनालिन और कोर्टिसोल जैसे हार्मोन बढ़ा देता है. इससे दिल की धड़कन तेज होती है और ब्लड प्रेशर लगातार ऊंचा रहने लगता है. अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहे, तो दिल से जुड़ी गंभीर बीमारियों का खतरा भी बढ़ सकता है.&amp;nbsp;
दवाई या थैरेपी क्या है बढ़िया विकल्प?
हालांकि दवाइयां और बेहतर लाइफस्टाइल अब भी हाई ब्लड प्रेशर कंट्रोल करने के सबसे जरूरी तरीके हैं, लेकिन हाल के वर्षों में लोग ऐसी थेरेपी की ओर भी ध्यान देने लगे हैं जो मानसिक शांति देने में मदद करती हैं. इन्हीं में से एक है प्राणिक हीलिंग. &amp;nbsp;वर्ल्ड प्राणिक हीलिंग के डायरेक्टर श्रीराम राजगोपाल के अनुसार, प्राणिक हीलिंग एक एनर्जी बेस्ड हीलिंग तकनीक है, जो प्राण यानी लाइफ एनर्जी के सिद्धांत पर आधारित मानी जाती है, इस पद्धति में बिना शरीर को छुए व्यक्ति के एनर्जी फील्ड, ऑरा और चक्रों को संतुलित करने की कोशिश की जाती है. माना जाता है कि इससे शरीर और मन दोनों को आराम मिलता है और व्यक्ति इमोशनल रूप से ज्यादा संतुलित महसूस करता है.
तनाव से जुड़े हाई बीपी का शरीर पर क्या असर होता है?
तनाव से जुड़ा हाई ब्लड प्रेशर अक्सर अनियमित खानपान, फिजिकल एक्टिविटी की कमी, ज्यादा स्क्रीन टाइम और काम-आराम के बीच संतुलन न होने से भी जुड़ा होता है. इसका असर सिर्फ शरीर पर ही नहीं, बल्कि इमोशनल और भावनात्मक स्थिति पर भी पड़ता है। ऐसे में प्राणिक हीलिंग जैसी तकनीकें लोगों को रिलैक्स करने और अपनी भावनाओं को बेहतर तरीके से समझने में मदद कर सकती हैं.
प्राणिक हीलिंग थैरेपी से क्या होता है फायदा?
इस थैरेपी में ट्विन हार्ट्स मेडिटेशन को काफी अहम माना जाता है. माना जाता है कि यह मेडिटेशन तनाव कम करने और मन को शांत रखने में मदद करता है. वहीं प्राणिक साइकोथेरेपी का उद्देश्य डर, गुस्सा, चिंता और निराशा जैसी निगेटिव भावनाओं को कम करना है. इसके अलावा प्राणिक ब्रीदिंग यानी नियंत्रित सांस लेने की तकनीक नर्वस सिस्टम को शांत करने और मानसिक सुकून देने में सहायक मानी जाती है.
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इन लोगों को ज्यादा ध्यान देने की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि जब तनाव कम होता है, मन शांत रहता है और भावनाओं पर बेहतर नियंत्रण होता है, तो ब्लड प्रेशर भी संतुलित रहने लगता है. हालांकि यह समझना जरूरी है कि प्राणिक हीलिंग को दवाइयों का विकल्प नहीं माना जाता. हाई ब्लड प्रेशर से पीड़ित लोगों को डॉक्टर की सलाह और नियमित दवाइयों के साथ ही मेडिटेशन और प्राणिक हीलिंग जैसी तकनीकों को अपनाना चाहिए.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 20 May 2026 16:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>Sour Burps Causes: सुबह उठते ही आ रही है खट्टी डकार? एसिडिटी नहीं कुछ और है समस्या, लिवर दे रहा संकेत</title>
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        <pubDate>Wed, 20 May 2026 16:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>Bael Fruit Benefits: गर्मियों में पेट की समस्याओं से हैं परेशान? बेल दिलाएगा राहत, ऐसे करें सेवन</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/bael-fruit-benefits-गर्मियों-में-पेट-की-समस्याओं-से-हैं-परेशान-बेल-दिलाएगा-राहत-ऐसे-करें-सेवन</link>
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        <description><![CDATA[ Bael Fruit Benefits:&amp;nbsp;गर्मी का मौसम आते ही कई लोगों को पेट से जुड़ी दिक्कतें शुरू हो जाती हैं. किसी को पेट दर्द, किसी को गैस, तो किसी को बार-बार दस्त और अपच की समस्या परेशान करने लगती है. ऐसे समय में बाजारों में तरह- तरह के पेय पदार्थ मिलते है. जैसे गन्ने का जूस, मौसमी का जूस, नारियल पानी इत्यादि, वैसे तो ये सारे ही पेय गर्मी के मौसम में बेहद फायदे माने जाते हैं, लेकिन आयुर्वेद में एक ऐसे फल का जिक्र किया है जो पेट का सबसे अच्छा दोस्त माना जाता है, जिसका नाम है बेल. स्वामी रामदेव के मुताबिक बेल फल भगवान शिव को बेहद प्रिय माना जाता है. यह स्वादिष्ट होने के साथ सेहत के लिए भी बहुत फायदेमंद है. साथ ही कब्ज, कोलाइटिस और पेट से जुड़ी कई परेशानियों में बेल असरदार घरेलू उपाय माना जाता है. &amp;nbsp;माना जाता है कि बेल शरीर को अंदर से ठंडक के साथ हाइड्रेट भी रखता है और यही वजह है कि पुराने समय से लोग बेल का शरबत और इसका गूदा गर्मी में इस्तेमाल करते आ रहे हैं.&amp;nbsp;
पेट को राहत देने में क्यों खास है बेल?
आयुर्वेद के मुताबिक बेल फल पाचन को मजबूत करने में मदद करता है. &amp;nbsp;अगर किसी को कब्ज, गैस, एसिडिटी या पेट फूलने जैसी परेशानी रहती है तो बेल काफी फायदेमंद माना जाता है. स्वामी रामदेव स्वाद और सेहत से भरपूर पतंजलि बेल कैंडी और बेल मुरब्बा खाने की सलाह देते हैं. बेल कैंडी यानी बेल फल से बनी मीठी टॉफी या छोटे-छोटे टुकड़े होते हैं, जिन्हें सुखाकर और मिठास मिलाकर तैयार किया जाता है. ये पाचन को बेहतर बनाने के साथ एसिडिटी, अपच और पेट की जलन में मदद करती है, जबकि बेल मुरब्बा पाचन सुधारने और पेट की दिक्कतों को कम करने में असरदार माना जाता है.&amp;nbsp;
साथ ही खास बात यह है कि बेल का कच्चा फल दस्त और पेट खराब होने में भी इस्तेमाल किया जाता है. कच्चे बेल का पाउडर बनाया जा सकता है और पके हुए बेल को सीधे फल की तरह खाया जाता है. &amp;nbsp;कई रिसर्च में भी बताया गया है कि बेल में ऐसे गुण पाए जाते हैं जो पेट को शांत रखने और आंतों को मजबूत बनाने में मदद करते हैं. &amp;nbsp;यही कारण है कि गांवों में आज भी पेट खराब होने पर बेल का सेवन घरेलू इलाज की तरह किया जाता है. &amp;nbsp; &amp;nbsp;
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गर्मी में शरीर को अंदर से ठंडा रखता है बेल
बेल सिर्फ पेट ही नहीं संभालता, बल्कि गर्मी से होने वाली दिक्कतों से भी बचाने में मदद करता है. &amp;nbsp;साथ ही इसमें विटामिन A, B और C के साथ आयरन और पोटैशियम जैसे जरूरी पोषक तत्व भी पाए जाते हैं. &amp;nbsp;ये शरीर की कमजोरी दूर इम्यूनिटी बढ़ाने और थकान कम करने में भी मदद करते हैं. इसके अलावा बेल की तरह ही जीरा, अजवाइन और सौंफ भी पेट की गैस, सूजन, कब्ज और IBS जैसी समस्याओं में मदद करते हैं.&amp;nbsp;
कैसे करें बेल का सेवन?
गर्मियों में बेल का शरबत सबसे ज्यादा पसंद किया जाता है. इसके लिए पके हुए बेल का गूदा निकालकर पानी में मिलाया जाता है. फिर इसमें थोड़ा गुड़ या शहद डालकर पिया जाता है. आयुर्वेद के जानकार बताते हैं कि इसे सुबह या दोपहर में पीना ज्यादा फायदेमंद रहता है. हालांकि जरूरत से ज्यादा सेवन करने से बचना चाहिए. अगर किसी को पहले से कोई गंभीर बीमारी है, तो डॉक्टर की सलाह लेकर ही इसे अपनी डाइट में शामिल करना बेहतर होता है. लेकिन इतना जरूर है कि बेल आज भी गर्मियों में पेट और शरीर दोनों को राहत देने वाला एक भरोसेमंद देसी फल माना जाता है.
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        <pubDate>Wed, 20 May 2026 16:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Bael, Fruit, Benefits:, गर्मियों, में, पेट, की, समस्याओं, से, हैं, परेशान, बेल, दिलाएगा, राहत, ऐसे, करें, सेवन</media:keywords>
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        <title>Weak Immunity: खांसी, जुकाम, खराश और थकान? मौसम का बदलाव नहीं, शरीर में है ये कमी, पढ़ें डॉक्टर की चेतावनी</title>
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        <description><![CDATA[ Why Do People Fall Sick Frequently: मौसम बदलते ही लोग अक्सर बार-बार होने वाली खांसी, जुकाम, गले में खराश और थकान का जिम्मेदार ठंडी हवा, बारिश, गर्मी या प्रदूषण को मान लेते हैं. लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि हर बार मौसम ही बीमारी की असली वजह नहीं होता. कई बार समस्या हमारी रोजमर्रा की उन आदतों में छिपी होती है, जो धीरे-धीरे शरीर को अंदर से कमजोर कर देती हैं. आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग देर रात तक जागना, खाना स्किप करना, लगातार स्क्रीन के सामने बैठना और तनाव में रहना सामान्य बात मान चुके हैं. शरीर कुछ समय तक इन आदतों को झेल लेता है, लेकिन धीरे-धीरे इसका असर इम्यूनिटी पर दिखने लगता है. यही वजह है कि कई लोग बार-बार बीमार पड़ने लगते हैं.
कैसे कमजोर होता है आपकी इम्यून सिस्टम?
डॉ रशीका, कंसल्टेंट पल्मोनोलॉजिस्ट, अपोलो हॉस्पिटल्स के मुताबिक अच्छी नींद सिर्फ घंटों की नहीं, बल्कि क्वालिटी की भी होती है. उनका कहना है कि लगातार कम और खराब नींद लेने से शरीर की इम्यून सिस्टम कमजोर होने लगती है. ऐसे लोग बार-बार सर्दी, खांसी और अस्थमा जैसी समस्याओं का शिकार हो सकते हैं. अगर कोई व्यक्ति रात में बार-बार उठता है, खर्राटे लेता है या सोने से पहले देर तक मोबाइल चलाता है, तो शरीर को सही तरह से रिकवरी का मौका नहीं मिल पाता.
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इम्यून सिस्टम कमजोर होने से क्या होती है दिक्कत?
अमेरिका के CDC की रिसर्च भी बताती है कि नींद की कमी इम्यूनिटी को कमजोर करने के साथ-साथ दिल की बीमारी, मोटापा और मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर डाल सकती है. गहरी नींद के दौरान शरीर खुद को रिपेयर करता है और इंफेक्शन से लड़ने वाले प्रोटीन बनाता है.
क्या इसमें हमारी लाइफस्टाइल का भी रोल है?
एक्सपर्ट का कहना है कि खराब खानपान भी लोगों को जल्दी बीमार बना रहा है. डॉ रशीका के अनुसार, लोग अक्सर खाना छोड़ देते हैं या प्रोसेस्ड और बाहर के खाने पर ज्यादा निर्भर हो जाते हैं. इससे शरीर को जरूरी पोषक तत्व नहीं मिल पाते. शरीर को मजबूत इम्यूनिटी के लिए प्रोटीन, आयरन, जिंक, विटामिन, फाइबर और पर्याप्त पानी की जरूरत होती है, लेकिन आजकल लोग पैकेज्ड फूड, मीठे स्नैक्स और इंस्टेंट मील्स ज्यादा खा रहे हैं.
पानी कम पीने और घर में बैठे रहने के नुकसान
नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ हेल्थ &amp;nbsp;की एक स्टडी में भी बताया गया है कि पोषण सीधे इम्यून सिस्टम और शरीर में सूजन के स्तर को प्रभावित करता है. वहीं पानी कम पीना भी बड़ी समस्या बन चुका है. डॉक्टरों के मुताबिक पर्याप्त पानी न पीने से शरीर में म्यूकस गाढ़ा हो जाता है, जिससे इंफेक्शन का खतरा बढ़ सकता है. डॉक्टर यह भी मानते हैं कि लंबे समय तक घर या ऑफिस के बंद कमरों में रहना भी सेहत को नुकसान पहुंचा सकता है. एयर कंडीशनर वाले कमरे, धूल, खराब वेंटिलेशन और भीड़भाड़ वाले इनडोर स्पेस में वायरस और एलर्जी फैलाने वाले तत्व ज्यादा समय तक बने रह सकते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 20 May 2026 00:30:16 +0530</pubDate>
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        <title>Global Health Crisis: Covid&amp;19 से नहीं लिया सबक! अगली महामारी के लिए कितनी तैयार दुनिया, WHO की रिपोर्ट ने मचाई खलबली</title>
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        <description><![CDATA[ Is The World Ready For The Next Pandemic: कोविड-19 के बाद दुनिया ने सोचा था कि अब अगली महामारी से निपटने की तैयारी पहले से बेहतर होगी, लेकिन नई रिपोर्ट ने एक बार फिर चिंता बढ़ा दी है. मिडिल अफ्रीका के कई हिस्सों में इबोला के नए प्रकोप, साथ ही हंतावायरस, मंकीपॉक्स और बर्ड फ्लू जैसी बीमारियों के बढ़ते खतरे के बीच एक ग्लोबल रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि दुनिया भविष्य की महामारियों के लिए पहले से ज्यादा कमजोर होती जा रही है.&amp;nbsp;
दुनियाभर में तेजी से बढ़ रहा है इंफेक्शन का खतरा
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन और वर्ल्ड बैंक के समर्थन से बने स्वतंत्र संगठन ग्लोबल प्रिपेयर्डनेस मॉनिटरिंग बोर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक इंफेक्शन बीमारियों का खतरा अब पहले से ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है. रिपोर्ट में कहा गया कि पिछले दस सालों की तुलना में अब देश और स्वास्थ्य व्यवस्था महामारी से उबरने में कम सक्षम हो गए हैं. यह चेतावनी ऐसे समय में आई है जब वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन ने कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य और युगांडा में फैले इबोला के नए प्रकोप को अंतरराष्ट्रीय सार्वजनिक हेल्थ इमरजेंसी घोषित किया है. इस बार इबोला का कम समझा जाने वाला बुंडिबुग्यो स्ट्रेन सामने आया है, जिसने चिंता और बढ़ा दी है.
क्यों तेजी से फैल रहा है इंफेक्शन का खतरा?
79वीं वर्ल्ड हेल्थ असेंबली के दौरान जारी रिपोर्ट ए वर्ल्ड ऑन द एज: प्रायोरिटीज फॉर ए पैंडेमिक-रेजिलिएंट फ्यूचर &amp;nbsp;में कहा गया कि महामारी से निपटने की तैयारियों पर हुए निवेश तेजी से बढ़ते खतरों के मुकाबले काफी कम साबित हो रहे हैं. रिपोर्ट के अनुसार बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव, जलवायु परिवर्तन से जुड़ी पर्यावरणीय गड़बड़ी, बढ़ती वैश्विक आवाजाही और अंतरराष्ट्रीय विकास फंडिंग में कमी वर्ल्ड हेल्थ सिक्योरिटी को कमजोर कर रही है.
रिपोर्ट में किन बातों को लेकर की गई चर्चा?
रिपोर्ट में 2014-16 और 2019-20 के इबोला प्रकोप, कोविड-19 और मंकीपॉक्स जैसी बड़ी स्वास्थ्य आपात स्थितियों की समीक्षा की गई. इसमें पाया गया कि कोविड के बाद नई स्वास्थ्य व्यवस्थाएं और योजनाएं तो बनाई गईं, लेकिन महामारी से निपटने की वैश्विक क्षमता अब भी बेहद असमान बनी हुई है. सबसे चिंताजनक बात वैक्सीन और दवाओं की पहुंच को लेकर सामने आई. रिपोर्ट के मुताबिक मंकीपॉक्स वैक्सीन गरीब देशों तक पहुंचने में करीब दो साल लग गए, जो कोविड वैक्सीन से भी ज्यादा देरी थी. बोर्ड ने चेतावनी दी कि दुनिया वैक्सीन, जांच और इलाज की समान पहुंच के मामले में पीछे की तरफ बढ़ रही है.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि महामारी अब सिर्फ स्वास्थ्य संकट नहीं रह गई, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं और लोगों के भरोसे पर भी असर डाल रही है. कोविड और इबोला दोनों के दौरान राजनीतिक ध्रुवीकरण, साइंटफिक संस्थाओं पर हमले और गलत सूचनाओं का तेज प्रसार देखने को मिला. इसके प्रभाव महामारी खत्म होने के बाद भी लंबे समय तक बने रहते है.&amp;nbsp;
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भारत के लिए रिपोर्ट क्यों अहम?
भारत के लिए भी यह रिपोर्ट बेहद अहम मानी जा रही है. दुनिया के सबसे बड़े कोविड प्रकोपों में से एक झेल चुके भारत में घनी आबादी, तेजी से बढ़ते शहर और बड़े पैमाने पर होने वाला आंतरिक पलायन भविष्य की महामारियों का खतरा बढ़ाते हैं. पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट्स पहले भी चेतावनी दे चुके हैं कि देश में बीमारी निगरानी व्यवस्था, ग्रामीण स्वास्थ्य ढांचा और इमरजेंसी फंडिंग सिस्टम को और मजबूत करने की जरूरत है.
इसे भी पढ़ें -&amp;nbsp;Heart Fights Cancer: दिल धड़क रहा है यानी कैंसर से लड़ रहा है, नई स्टडी से जागी उम्मीद
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 20 May 2026 00:30:15 +0530</pubDate>
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        <title>Male Fertility: सिर्फ मां नहीं, पिता की उम्र और आदतें भी तय करती हैं बच्चे की सेहत, भूलकर भी न करें ये गलती</title>
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        <description><![CDATA[ How Father&amp;rsquo;s Health Affects Child Development: शहर हो या फिर गांव सालों तक प्रेग्नेंसी से जुड़ी ज्यादातर चर्चाएं सिर्फ मां की सेहत के इर्द-गिर्द ही घूमती रहीं. डॉक्टर प्रेग्नेंसी के दौरान पोषण, हार्मोन, स्कैन, विटामिन और एंटीनटल केयर पर जोर देते थे, जबकि पिता की भूमिका को केवल इमोशनल सहारे तक सीमित माना जाता था. लेकिन अब साइंटिफिक रिसर्च इस सोच को बदल रही है. एक्सपर्ट का कहना है कि बच्चे की सेहत सिर्फ मां ही नहीं, बल्कि पिता की हेल्थ पर भी काफी हद तक निर्भर कर सकती है.
बच्चों की सेहत पर पिता का क्या होता है असर?
दुनियाभर में हो रही नई रिसर्च में यह समझने की कोशिश की जा रही है कि गर्भधारण से पहले पिता की उम्र, तनाव, स्मोकिंग, शराब की आदत, नींद की कमी और यहां तक कि प्रदूषण के संपर्क का भी बच्चे की सेहत पर असर पड़ सकता है. इसका मतलब यह नहीं कि ज्यादा उम्र में पिता बनने वाले लोगों के बच्चों को जरूर कोई समस्या होगी, लेकिन रिसर्च यह जरूर दिखा रही है कि पिता की हेल्थ भी उतनी ही अहम है जितनी मां की.
देर से पिता बनने पर क्या होती है दिक्कत?
हाल के वर्षों में एडवांस्ड पैटरनल एज यानी ज्यादा उम्र में पिता बनने को लेकर काफी चर्चा हुई है. कई स्टडी में पाया गया कि 45 साल से ज्यादा उम्र के पुरुषों के बच्चों में ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर और कुछ न्यूरोडेवलपमेंटल समस्याओं का जोखिम थोड़ा बढ़ सकता है. रिसर्चर्स मानते हैं कि इसका संबंध स्पर्म में समय के साथ होने वाले छोटे-छोटे डीएनए बदलावों से हो सकता है. जामा साइकियाट्री में पब्लिश एक बड़ी स्टडी ने पिता की उम्र और बच्चों में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं के बीच संबंध पर चर्चा की थी. वहीं नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ की एक समीक्षा में यह पाया गया कि अधिक उम्र के पुरुषों में स्पॉन्टेनियस जेनेटिक म्यूटेशन का खतरा बढ़ सकता है। हालांकि डॉक्टर साफ कहते हैं कि यह सिर्फ रिस्क पैटर्न हैं, कोई निश्चित भविष्यवाणी नहीं.
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क्या लाइफस्टाइल का भी होता है कोई असर?
एक्सपर्ट के मुताबिक सिर्फ उम्र ही नहीं, बल्कि लाइफस्टाइल भी बेहद अहम भूमिका निभाती है, &amp;nbsp;स्मोकिंग स्पर्म की क्वालिटी को प्रभावित कर सकती है और डीएनए को नुकसान पहुंचा सकती है. इसके अलावा तनाव, मोटापा, शराब, खराब नींद और प्रदूषण जैसी चीजें भी एपिजेनेटिक्स को प्रभावित कर सकती हैं, जो यह तय करता है कि जीन शरीर में कैसे काम करेंगे. रिप्रोडक्टिव बायोलॉजी एंड एंडोक्रिनोलॉजी में प्रकाशित एक विस्तृत समीक्षा में भी पिता की उम्र और लाइफस्टाइल का प्रजनन स्वास्थ्य पर असर बताया गया है. वहीं नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ हेल्थ ने भी हाल के वर्षों में पिता की प्रीकॉन्सेप्शन हेल्थ यानी प्रेग्नेंसी से पहले की सेहत को महत्वपूर्ण माना है.
हेल्दी पीढ़ी के लिए ये चीजें हैं बहुत जरूरी
डॉ मीनू हांडा, डायरेक्टर, फर्टिलिटी एंड हेड एकेडमिक-रिप्रोडक्टिव मेडिसिन, मदरहुड हॉस्पिटल गुरुग्राम के अनुसार, अब एक्सपर्ट इस बात पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं कि गर्भधारण से पहले दोनों माता-पिता कितने स्वस्थ हैं. उनका कहना है कि पुरुषों की प्रजनन क्षमता और उनकी लाइफस्टाइल को लंबे समय तक नजरअंदाज किया गया, जबकि अच्छी नींद, संतुलित खानपान, कम तनाव, स्मोकिंग और शराब से दूरी जैसी आदतें आने वाली पीढ़ी की सेहत के लिए भी अहम हो सकती हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 20 May 2026 00:30:14 +0530</pubDate>
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        <title>Heart Health: सुबह का सिरदर्द&amp;थकान है साइलेंट किलर का अलर्ट, न करें इग्नोर वरना होंगे खतरनाक बीमारी के शिकार</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/heart-health-सुबह-का-सिरदर्द-थकान-है-साइलेंट-किलर-का-अलर्ट-न-करें-इग्नोर-वरना-होंगे-खतरनाक-बीमारी-के-शिकार</link>
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        <description><![CDATA[ Early Symptoms Of Hypertension People Ignore: हाई ब्लड प्रेशर को अक्सर साइलेंट किलर कहा जाता है, क्योंकि इसके शुरुआती लक्षण इतने हल्के होते हैं कि लोग उन्हें सामान्य थकान या तनाव समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. लेकिन हार्ट एक्सपर्ट्स चेतावनी देते हैं कि लंबे समय तक बढ़ा हुआ ब्लड प्रेशर धीरे-धीरे दिल, दिमाग, किडनी और ब्लड वेसल्स को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर एकस्पर्ट क्या कहते हैं.&amp;nbsp;
ब्लड प्रेशर बढ़ने के नुकसान क्या होते हैं?
TOI में डॉ. रमाकांत पांडा की एक रिपोर्ट के अनुसार, &amp;nbsp;उन्होंने ऑपरेशन थिएटर और मरीजों के बीच चार दशक बिताए हैं और इस दौरान देखा है कि कैसे हाई ब्लड प्रेशर बिना शोर किए शरीर को अंदर ही अंदर कमजोर करता रहता है. डॉक्टर के मुताबिक, लगातार बढ़ा हुआ ब्लड प्रेशर दिल को ज्यादा मेहनत करने पर मजबूर करता है. इससे हार्ट की मांसपेशियां मोटी होने लगती हैं और धमनियां धीरे-धीरे सख्त पड़ जाती हैं. यही स्थिति आगे चलकर हार्ट फेलियर, स्ट्रोक और किडनी डैमेज जैसी गंभीर बीमारियों की वजह बन सकती है.
क्या होते हैं इसके शुरुआती लक्षण?
एक्सपर्ट्स के अनुसार, सुबह उठते ही सिर के पीछे हल्का लेकिन लगातार दर्द महसूस होना हाई ब्लड प्रेशर का शुरुआती संकेत हो सकता है. कारियो एट अल. (2003) की स्टडी में पाया गया कि सुबह के समय अचानक बढ़ने वाला ब्लड प्रेशर स्ट्रोक और दूसरी कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों का खतरा बढ़ा सकता है. इसके अलावा मामूली काम करने पर ज्यादा थकान महसूस होना या जल्दी सांस फूलना भी खतरे की घंटी हो सकती है. फ्रेमिंघम हार्ट स्टडी में लेवी एट अल. (1990) ने बताया था कि लंबे समय तक हाई ब्लड प्रेशर रहने से हार्ट की दीवारें मोटी हो जाती हैं, जिससे हार्ट फेलियर और अचानक मौत का खतरा बढ़ जाता है.&amp;nbsp;
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हाई बीपी के क्या होते हैं नुकसान?
डॉक्टरों का कहना है कि गर्दन की नसों में तेज धड़कन महसूस होना, ध्यान लगाने में परेशानी, सोचने की क्षमता धीमी पड़ना या बार-बार नकसीर आना भी शरीर के अंदर बढ़ते दबाव का संकेत हो सकता है. 2020 लैंसेट कमीशन ऑन डिमेंशिया की रिपोर्ट में हाई ब्लड प्रेशर को डिमेंशिया और याददाश्त कमजोर होने का बड़ा कारण माना गया है. &amp;nbsp;रात में बार-बार पेशाब आने की समस्या को लोग अक्सर सामान्य मान लेते हैं, लेकिन एक्सपर्ट्स के मुताबिक यह किडनी पर बढ़ते दबाव का संकेत हो सकता है. 2020 लैंसेट कमीशन ऑन डिमेंशिया की रिपोर्ट में की रिसर्च में बताया गया कि हाई ब्लड प्रेशर क्रॉनिक किडनी डिजीज की बड़ी वजह है.
महिलाओं और पुरुषों में क्या होता है अंतर?
महिलाओं और पुरुषों में इसके लक्षण अलग-अलग तरीके से नजर आ सकते हैं. जी एट अल. (2020) की जामा कार्डियोलॉजी में प्रकाशित स्टडी के अनुसार, मेनोपॉज के बाद महिलाओं में ब्लड प्रेशर तेजी से बढ़ सकता है और उनमें स्ट्रोक व हार्ट फेलियर का खतरा ज्यादा रहता है. वहीं पुरुषों में हाई ब्लड प्रेशर अक्सर कम उम्र में शुरू होता है और हार्ट अटैक जैसी गंभीर समस्याओं के रूप में सामने आता है.
इसे भी पढ़ें -&amp;nbsp;Heart Fights Cancer: दिल धड़क रहा है यानी कैंसर से लड़ रहा है, नई स्टडी से जागी उम्मीद
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 19 May 2026 08:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>Physical Activity And Mood: नई रिसर्च में सामने आया मूड और फिजिकल एक्टिविटी का सीधा संबंध, जानें क्या हुआ खुलासा?</title>
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        <pubDate>Tue, 19 May 2026 08:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>Cancer And Sugar: कैंसर की जगह शरीर को भूखा मार रही शुगर&amp;फ्री डाइट, जानें एक्सट्रीम कैंसर डाइट का छिपा खतरा</title>
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        <description><![CDATA[ Can Stopping Sugar Cure Cancer: कैंसर को लेकर सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा फैलने वाली बातों में से एक ये है कि &quot;शुगर कैंसर को बढ़ाती है&quot; और अगर इंसान पूरी तरह शुगर या कार्बोहाइड्रेट खाना बंद कर दे, तो ट्यूमर भूखा मर जाएगा. इसी वजह से कई फैमिली मरीज की डाइट से चावल, रोटी, फल और दूसरी कार्ब वाली चीजें हटाने लगती हैं. पहली नजर में ये बात सही लगती है, क्योंकि कैंसर सेल्स ग्लूकोज का ज्यादा इस्तेमाल करती हैं. लेकिन असली साइंस इससे कहीं ज्यादा कॉम्प्लिकेटेड है.&amp;nbsp;
क्या यह सच है या नहीं?
सीके बिरला हॉस्पिटल, नई दिल्ली के डायरेक्टर सर्जिकल ऑन्कोलॉजी एंड रोबोटिक सर्जरी डॉ. मनदीप सिंह मल्होत्रा इस सोच को डेंजरस हाफ ट्रुथ बताते हैं. उनका कहना है कि साइंस का एक हिस्सा सही है, लेकिन लोग उससे गलत निष्कर्ष निकाल लेते हैं. कैंसर में सही न्यूट्रिशन का मतलब बॉडी को भूखा रखना नहीं, बल्कि उसे इतना मजबूत रखना है कि वह इलाज झेल सके और इम्यूनिटी बनी रहे.
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क्या है शुगर और कैंसर वाली थ्योरी?
असल में शुगर और कैंसर वाली थ्योरी की शुरुआत 1924 में हुई थी, जब जर्मन साइंटिस्ट ओटो वारबर्ग ने खोजा कि कैंसर सेल्स सामान्य सेल्स के मुकाबले ज्यादा तेजी से ग्लूकोज इस्तेमाल करती हैं. इसे वारबर्ग इफेक्ट कहा गया. आज भी &amp;nbsp;पॉजिट्रॉन एमिशन टोमोग्राफी - कंप्यूटेड टोमोग्राफी स्कैन इसी सिद्धांत पर काम करता है, क्योंकि ट्यूमर ग्लूकोज को तेजी से खींचते हैं और स्कैन में चमकने लगते हैं. यूएस नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट की रिसर्च भी बताती है कि कैंसर सेल्स एनर्जी इस्तेमाल करने का तरीका बदल देती हैं.
कार्बोहाइड्रेट बंद करने से क्या है नुकसान?
लेकिन सोशल मीडिया पर अक्सर एक जरूरी बात नहीं बताई जाती कि सिर्फ कैंसर सेल्स ही नहीं, बल्कि दिमाग, हार्ट, मसल्स, ब्लड सेल्स और इम्यून सिस्टम को भी ग्लूकोज की जरूरत होती है. अगर इंसान पूरी तरह कार्बोहाइड्रेट बंद कर देता है, तो बॉडी खुद ग्लूकोज बनाना शुरू कर देती है. इस प्रोसेस को ग्लूकोनियोजेनेसिस कहा जाता है. इसके लिए शरीर मसल्स और प्रोटीन तोड़ता है. यानी कैंसर को तो एनर्जी मिलती रहती है, लेकिन मरीज कमजोर होने लगता है.&amp;nbsp;
इलाज के दौरान किन चीजों का रखें ध्यान?
डॉक्टर ये नहीं कहते कि अनलिमिटेड शुगर खाना सही है. रिफाइंड शुगर, कोल्ड ड्रिंक्स, कैंडी, पेस्ट्री और ज्यादा प्रोसेस्ड फूड हेल्थ के लिए नुकसानदायक होते हैं. लेकिन इलाज के दौरान बॉडी को बैलेंस्ड डाइट की जरूरत होती है. एक्सपर्ट्स होल ग्रेन्स, दालें, सब्जियां, नट्स, हेल्दी फैट और प्रोटीन वाली चीजें खाने की सलाह देते हैं, ताकि बॉडी को धीरे-धीरे एनर्जी मिलती रहे और ताकत बनी रहे.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 18 May 2026 20:30:15 +0530</pubDate>
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        <title>High Blood Pressure: हाई बीपी और डायबिटीज बन रहे साइलेंट किलर, शरीर के इन 5 लक्षणों को भूलकर भी न करें इग्नोर</title>
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        <description><![CDATA[ Early Signs Of High Blood Pressure And Diabetes: हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज आज के समय की सबसे तेजी से बढ़ती बीमारियों में शामिल हैं. डॉक्टरों का कहना है कि ये दोनों बीमारियां अक्सर साथ-साथ शरीर में असर डालती हैं और शुरुआत में इनके लक्षण इतने हल्के होते हैं कि लोग उन्हें सामान्य थकान या स्ट्रेस समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. लेकिन समय के साथ यही समस्याएं हार्ट, किडनी, आंखों, दिमाग और ब्लड वेसल्स को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती हैं.&amp;nbsp;
भारत में डायबिटीज की दिक्कत क्यों बढ़ रही है?
इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च-INDIAB स्टडी के मुताबिक, भारत में हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज का सीधा संबंध मोटापे, कम फिजिकल एक्टिविटी और खराब लाइफस्टाइल से जुड़ा हुआ है. स्टडी में यह भी सामने आया कि शहरों के साथ-साथ गांवों में भी बड़ी संख्या में लोग इन बीमारियों से अनजान हैं.&amp;nbsp;
किन लक्षणों को नहीं करना चाहिए इग्नोर?
कोरोना रेमेडीज लिमिटेड के एसोसिएट वाइस प्रेसिडेंट और हेड ऑफ मेडिकल अफेयर्स डॉ. अमीत सोनी कहते हैं कि हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज आपस में जुड़ी मेटाबॉलिक कंडीशंस हैं. कई बार एक बीमारी दूसरी की स्थिति को तेजी से खराब कर देती है. लगातार सिर दर्द, धुंधला दिखना, असामान्य थकान, पैरों में सूजन और बार-बार यूरिन आना जैसे संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, क्योंकि ये ब्लड शुगर और ब्लड प्रेशर दोनों के बिगड़ने का संकेत हो सकते हैं.&amp;nbsp;
डायबिटीज से आर्टरीज को क्या नुकसान होता है?
डॉक्टरों के मुताबिक, बार-बार होने वाला सिर दर्द खासतौर पर सुबह के समय या थोड़ी मेहनत के बाद महसूस होना हाई ब्लड प्रेशर का संकेत हो सकता है. वहीं अगर इसके साथ डायबिटीज भी हो, तो ब्लड वेसल्स को नुकसान पहुंचने का खतरा और बढ़ जाता है. डायबिटीज आर्टरीज को सख्त बना देती है, जिससे हार्ट को खून पंप करने में ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है.&amp;nbsp;
सह्याद्री सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, पुणे के एंडोक्रिनोलॉजी और डायबिटीज डायरेक्टर डॉ. उदय फड़के ने TOI को बताया कि डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर बिना किसी बड़े लक्षण के एक ही व्यक्ति में मौजूद हो सकते हैं. दोनों मिलकर हार्ट डिजीज, स्ट्रोक, किडनी प्रॉब्लम और आंखों की रोशनी जाने का खतरा बढ़ा देते हैं.&amp;nbsp;
आंखों के नसों के नुकसान का क्या होता है लक्षण?
डॉक्टरों का कहना है कि धुंधला दिखना, आंखों के सामने काले धब्बे नजर आना या अचानक फोकस करने में परेशानी होना सिर्फ आंखों की थकान नहीं हो सकती. यह डायबिटिक रेटिनोपैथी या हाई ब्लड प्रेशर से आंखों की नसों को हुए नुकसान का संकेत भी हो सकता है.&amp;nbsp;
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क्या होते हैं इसके लक्षण?
इसके अलावा पैरों में सूजन, लगातार थकान, रात में बार-बार पेशाब आना और बहुत ज्यादा प्यास लगना भी शरीर के अंदर चल रही गंभीर समस्या की चेतावनी हो सकते हैं. डॉक्टरों के अनुसार, जब किडनी ब्लड से अतिरिक्त शुगर और फ्लूइड को ठीक से फिल्टर नहीं कर पाती, तब ये लक्षण दिखने लगते हैं.
क्यों बढ़ रहा है इसका खतरा?
एक्सपर्ट्स मानते हैं कि खराब नींद, घंटों बैठकर काम करना, ज्यादा नमक और पैकेज्ड फूड खाना, स्मोकिंग, शराब और कम एक्सरसाइज की आदत युवाओं में इन बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ा रही है. डॉक्टर सलाह देते हैं कि 30 साल की उम्र के बाद नियमित ब्लड प्रेशर और ब्लड शुगर चेक करवाना बेहद जरूरी है. इसे साथ ही रोजाना वॉक, हेल्दी डाइट, बेहतर नींद और वजन कंट्रोल जैसी छोटी आदतें भविष्य में बड़ी बीमारियों से बचाने में मदद कर सकती हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 18 May 2026 20:30:14 +0530</pubDate>
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        <title>Natural remedies for acid reflux: पेट की जलन से छुटकारा पाने के लिए आजमाएं ये 5 भारतीय हर्ब्स, एसिड रिफ्लक्स को कर सकती हैं कम</title>
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        <description><![CDATA[ Natural remedies for acid reflux: पेट की जलन से छुटकारा पाने के लिए आजमाएं ये 5 भारतीय हर्ब्स, एसिड रिफ्लक्स को कर सकती हैं कम ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 18 May 2026 20:30:14 +0530</pubDate>
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        <title>Sleep And Ageing: 6 घंटे से कम और 8 घंटे से ज्यादा सोते हो तो जल्दी हो जाओगे बूढ़े, स्टडी में खुलासा</title>
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        <description><![CDATA[ Risks Of Sleeping Too Much Or Too Little: रात में बहुत कम या जरूरत से ज्यादा सोना सिर्फ थकान ही नहीं बढ़ाता, बल्कि ये बॉडी के कई जरूरी अंगों की उम्र भी तेजी से बढ़ा सकता है. नेचर जर्नल में 13 मई को पब्लिश हुई एक नई स्टडी में दावा किया गया है कि कम और ज्यादा दोनों तरह की नींद ब्रेन, हार्ट, फेफड़ों और इम्यून सिस्टम पर बुरा असर डाल सकती है. रिसर्च के मुताबिक सबसे कम खतरा उन लोगों में देखा गया जो रोज करीब 6.4 से 7.8 घंटे की नींद लेते हैं.&amp;nbsp;
नींद क्यों है हमारे लिए जरूरी?
इस स्टडी को कोलंबिया यूनिवर्सिटी के असिस्टेंट प्रोफेसर ऑफ रेडियोलॉजी जुनहाओ वेन ने लीड किया. उन्होंने कहा कि हमारी रिसर्च दिखाती है कि बहुत कम और बहुत ज्यादा दोनों तरह की नींद शरीर के लगभग हर अंग की उम्र बढ़ने की रफ्तार तेज कर सकती है. इससे ये साफ होता है कि अच्छी नींद ब्रेन और पूरी बॉडी को हेल्दी रखने में बेहद जरूरी है.&amp;nbsp;
रिसर्च में क्या पता लगाया गया?
रिसर्चर्स ने एजिंग को मापने के लिए मशीन लर्निंग टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया. टीम ने 17 अलग-अलग ऑर्गन सिस्टम्स के लिए 23 बायोलॉजिकल क्लॉक्स तैयार किए. इन क्लॉक्स में मेडिकल स्कैन, ब्लड टेस्ट और बॉडी प्रोटीन से जुड़ी जानकारी शामिल की गई, जिससे पता लगाया गया कि किसी इंसान के अंग उसकी असली उम्र के मुकाबले कितनी तेजी से बूढ़े हो रहे हैं.
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किन लोगों की उम्र तेजी से बढ़ती है?
इस स्टडी में यूके बायोबैंक के करीब पांच लाख लोगों के हेल्थ डेटा का एनालिसिस किया गया. रिसर्च में एक यू-शेप पैटर्न सामने आया. यानी जो लोग रोज 6 घंटे से कम सोते थे और जो 8 घंटे से ज्यादा सोते थे, दोनों में एजिंग की स्पीड ज्यादा पाई गई. सबसे हेल्दी स्लीप रेंज करीब 7 घंटे मानी गई. कम नींद लेने वाले लोगों में डिप्रेशन, एंग्जायटी, मोटापा, टाइप 2 डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और हार्ट डिजीज का खतरा ज्यादा देखा गया. वहीं कम और ज्यादा दोनों तरह की नींद फेफड़ों की बीमारियों जैसे क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज और अस्थमा से भी जुड़ी मिली. इसके अलावा एसिड रिफ्लक्स जैसी पेट की समस्याओं का रिस्क भी बढ़ता पाया गया.
कम नींद लेने के क्या होते हैं नुकसान?
जुनहाओ वेन के मुताबिक नींद सिर्फ दिमाग से जुड़ी चीज नहीं है, बल्कि इसका असर पूरी बॉडी पर पड़ता है. उन्होंने कहा कि स्लीप ड्यूरेशन हमारी पूरी फिजियोलॉजी से जुड़ी होती है और इसका असर शरीर के लगभग हर हिस्से पर दिखाई देता है. रिसर्च टीम ने बुजुर्ग लोगों में डिप्रेशन पर भी असर देखा. एनालिसिस में सामने आया कि कम नींद सीधे तौर पर डिप्रेशन को बढ़ा सकती है, जबकि ज्यादा नींद ब्रेन और बॉडी फैट में होने वाले बदलावों के जरिए इसका असर डाल सकती है. रिसर्चर्स का मानना है कि कम और ज्यादा सोने वाले लोगों के लिए अलग-अलग तरह की हेल्थ केयर की जरूरत पड़ सकती है.
हालांकि स्टडी ये साबित नहीं करती कि सिर्फ नींद ही तेजी से बूढ़ा होने की वजह है, लेकिन रिसर्चर्स का कहना है कि सही स्लीप हैबिट्स बढ़ती उम्र में हेल्थ को बेहतर बनाए रखने का अहम हिस्सा हो सकती हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 18 May 2026 04:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>Watermelon Eating Tips :कटे हुए तरबूज को खाएं या न खाएं?  हेल्थ एक्सपर्ट्स से जानें गर्मियों में सही स्टोरेज नियम</title>
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        <description><![CDATA[ Watermelon Eating Tips : गर्मियों में तरबूज हर किसी का फेवरेट है. यह रस भरा और ठंडक देने वाला फल है. भारत में लोग अक्सर मार्केट से पहले से कटे हुए तरबूज खरीद लेते हैं या घर पर तरबूज काटकर फ्रिज में रख लेते हैं, जिससे दिन भर कभी भी खा सकें, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि कटे हुए तरबूज को सही तरीके से नहीं रखने पर यह जल्दी खराब हो सकता है और सेहत के लिए अनहेल्दी हो सकता है. डाइटिशियन और हेल्थ एक्सपर्ट्स बताते हैं कि कटे हुए तरबूज को संभालने और स्टोर करने में थोड़ी लापरवाही बड़ी परेशानी का कारण बन सकती है. खासकर गर्मियों में जब तापमान और नमी ज्यादा होती है, बैक्टीरिया तेजी से बढ़ सकते हैं. ऐसे में आइए जानते हैं कटे हुए तरबूज को खाएं या न खाएं, इसे सुरक्षित कैसे स्टोर करें और किन बातों का ध्यान रखना जरूरी है.&amp;nbsp;
कटे हुए तरबूज को खाएं या न खाएं?
पूरा तरबूज अपने मोटे छिलके के कारण लंबे समय तक सुरक्षित रहता है, लेकिन जब इसे काटा जाता है, तो इसका मुलायम और रस भरा हिस्सा हवा, हाथों, चाकू और अन्य सतहों से बैक्टीरिया के संपर्क में आ जाता है. तरबूज में बहुत ज्यादा पानी और प्राकृतिक शुगर होती है. यह बैक्टीरिया के लिए एक उपयुक्त वातावरण तैयार कर देता है. अगर इसे तुरंत फ्रिज में नहीं रखा गया, तो बैक्टीरिया जल्दी बढ़ सकते हैं और फल खराब हो सकता है. वहीं गर्मियों में कई घंटे कटे हुए तरबूज को बाहर छोड़ना खतरनाक हो सकता है. यह समय सल्मोनेला (Salmonella) और लिस्टेरिया (Listeria) जैसे खराब बैक्टीरिया के लिए सही होता है. ये बैक्टीरिया पेट दर्द, उल्टी, दस्त, बुखार और डिहाइड्रेशन जैसी बीमारियों का कारण बन सकते हैं.&amp;nbsp;
कटे हुए तरबूज को सुरक्षित कैसे स्टोर करें?
डाइटिशियन के अनुसार, कटे हुए तरबूज को हमेशा एयरटाइट कंटेनर में रखें या अच्छी तरह ढक कर फ्रिज में स्टोर करें. इसे 4&amp;deg;C या उससे कम तापमान में रखना चाहिए. कटे हुए तरबूज को 1 या 2 दिन के अंदर खाना सबसे अच्छा है. फ्रेशनेस, टेस्ट और पोषण बनाए रखने के लिए हमेशा ताजा कटे हुए फल को प्राथमिकता दें.&amp;nbsp;
तरबूज काटने से पहले क्या करें?
कई लोग तरबूज काटने से पहले उसके छिलके को नहीं धोते, यह एक आम गलती है. बैक्टीरिया छिलके पर हो सकते हैं, और चाकू के जरिए यह फल के अंदर पहुंच सकते हैं. कटने से पहले तरबूज को साफ पानी से धोएं. साफ चाकू, कटिंग बोर्ड और कंटेनर का इस्तेमाल करें.
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गर्मियों में सही स्टोरेज क्यों जरूरी है?
गर्मी और नमी की वजह से फूड पॉइजनिंग के मामले बढ़ जाते हैं. खासकर बच्चों, बुजुर्गों, प्रेग्नेंट महिलाओं और कमजोर इम्यूनिटी वाले लोगों के लिए यह ज्यादा जोखिम भरा हो सकता है. ऐसे में फूड हाइजीन प्रैक्टिस अपनाने से बीमारियों से बचा जा सकता है. जैसे फ्रिज में सही तरीके से स्टोर करें. कटने से पहले फलों को धोएं. पुराना या स्टेल खाना न खाएं. ताजे फल समय पर खाएं.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ें - Sitting Too Long On Toilet: क्या आप भी टॉयलेट में 15 मिनट से ज्यादा बैठते हैं? डॉक्टर ने बताया कितनी खतरनाक है ये आदत
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 17 May 2026 16:30:13 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Sitting Too Long On Toilet: क्या आप भी टॉयलेट में 15 मिनट से ज्यादा बैठते हैं? डॉक्टर ने बताया कितनी खतरनाक है ये आदत</title>
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        <description><![CDATA[ Sitting Too Long On Toilet: आजकल ज्यादातर लोग वॉशरूम में मोबाइल फोन लेकर जाते हैं. सोशल मीडिया स्क्रोल करते-करते या वीडियो देखते हुए कई बार लोग जरूरत से ज्यादा समय टॉयलेट सीट पर बिताने लगते हैं. देखने में यह आदत भले ही नॉर्मल लगे, लेकिन डॉक्टरों के अनुसार, इसका सीधा असर पाचन तंत्र और रेक्टल हेल्थ पर पड़ सकता है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि रोजाना 10 से 15 मिनट से ज्यादा समय टॉयलेट में बिताना कई स्वास्थ्य समस्याओं को बढ़ा सकता है.&amp;nbsp;
क्यों खतरनाक हो सकती है यह आदत?
गैस्ट्रो और जीआई सर्जनों के अनुसार लंबे समय तक टॉयलेट सीट पर बैठे रहने से रेक्टम और एनस के आसपास की नसों पर ज्यादा दबाव पड़ता है. लगातार ऐसा होने पर नसों में सूजन आ सकती है, जिससे बवासीर यानी पाइल्स की समस्या शुरू हो सकती है. इसके कारण दर्द, खुजली और मल त्याग के दौरान ब्लीडिंग जैसी परेशानी भी हो सकती है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि वेस्टर्न स्टाइल कमोड पर बैठने की पोजीशन भी कई बार समस्या बढ़ा सकती है. सामान्य स्क्वाटिंग पोजीशन की तुलना में कमोड पर बैठने से रेक्टल एरिया पर ज्यादा प्रभाव दबाव पड़ सकता है. ऐसे में अगर कोई व्यक्ति फोन इस्तेमाल करते हुए ज्यादा देर तक बैठा रहे तो स्थिति और गंभीर हो सकती है.&amp;nbsp;
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क्या ज्यादा देर बैठने से बढ़ सकती है कब्ज?&amp;nbsp;
कई लोग कब्ज होने पर लंबे समय तक टॉयलेट में बैठे रहते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे पेट पूरी तरह साफ हो जाएगा. लेकिन डॉक्टरों के अनुसार यह आदत कब्ज को और बढ़ा सकती है. ज्यादा देर तक जोर लगाने से पेल्विक फ्लोर की मांसपेशियां पर असर पड़ता है और बॉवेल मूवमेंट भी प्रभावित होता है. इससे एनल फिशर और रेक्टल प्रोलैप्स जैसे समस्याओं का खतरा भी बढ़ सकता है.&amp;nbsp;
इन तरीकों से बच सकते हैं समस्या से&amp;nbsp;
डॉक्टरों का कहना है कि टॉयलेट में मोबाइल फोन का इस्तेमाल कम करना सबसे जरूरी है. इसके अलावा खाने में फाइबर की मात्रा बढ़ाना, पर्याप्त पानी पीना और नियमित एक्सरसाइज करना जरूरी माना जाता है. इससे पाचन तंत्र बेहतर रहता है और मल त्याग में ज्यादा समय नहीं लगता. वहीं अगर किसी व्यक्ति को रोजाना 10 मिनट से ज्यादा समय टॉयलेट में लग रहा है, मल त्याग के दौरान दर्द हो रहा है या ब्लीडिंग दिखाई दे रही है तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. डॉक्टर के अनुसार ऐसे लक्षण किसी गंभीर समस्या के संकेत हो सकते हैं और समय रहते जांच करना जरूरी है.
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        <pubDate>Sun, 17 May 2026 00:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>Dual Organ Transplant: एक फैसला और युवक को मिली नई जिंदगी, AIIMS में 18 साल बाद हुआ ड्यूल ऑर्गन ट्रांसप्लांट</title>
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        <description><![CDATA[ AIIMS Dual Organ Transplant After 18 Years: ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज दिल्ली में 18 साल बाद एक ऐसी सर्जरी हुई, जिसने 30 साल के युवक को नई जिंदगी दे दी. लंबे समय से टाइप-1 डायबिटीज से जूझ रहे इस मरीज की हालत इतनी गंभीर हो चुकी थी कि पिछले दो साल से उसे डायलिसिस के सहारे जिंदगी बितानी पड़ रही थी. लेकिन एक ब्रेन डेड डोनर के परिवार के फैसले ने उसकी जिंदगी पूरी तरह बदल दी. एम्स में डॉक्टरों ने पहली बार एक साथ पैंक्रियाज और किडनी ट्रांसप्लांट कर मरीज को नया जीवन दिया.&amp;nbsp;
18 साल बाद हुआ इस तरह का काम
यह ड्यूल ऑर्गन ट्रांसप्लांट एम्स में 18 साल बाद किया गया. मरीज एंड-स्टेज रीनल डिजीज से पीड़ित था, जो लंबे समय से चली आ रही टाइप-1 डायबिटीज की वजह से हुई थी. इस बीमारी में किडनी धीरे-धीरे काम करना बंद कर देती है और मरीज को इंसुलिन के साथ डायलिसिस का सहारा लेना पड़ता है. मरीज को दोनों अंग एक 50 वर्षीय ब्रेन डेड डोनर से मिले, जिनका अंगदान पीजीआई रोहतक में किया गया था.
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ट्रांसप्लांट मरीज के लिए जीवन बदल देने वाला साबित हुआ
एम्स दिल्ली के सर्जरी विभाग के प्रोफेसर डॉ. असुरी कृष्णा ने बताया कि यह ट्रांसप्लांट मरीज के लिए जीवन बदल देने वाला साबित हुआ. सर्जरी के बाद अब मरीज को बहुत कम मात्रा में इंसुलिन की जरूरत पड़ रही है. पहले वह ठीक से चल भी नहीं पाता था, लेकिन अब उसकी स्थिति काफी बेहतर है और वह सामान्य जीवन की ओर लौट रहा है.
किन मरीजों का होता है सिमल्टेनियस पैंक्रियास-किडनी?
डॉक्टरों के मुताबिक, सिमल्टेनियस पैंक्रियास-किडनी यानी एसपीरे उन मरीजों के लिए किया जाता है, जो टाइप-1 डायबिटीज के साथ गंभीर किडनी फेलियर का सामना कर रहे होते हैं. इस प्रक्रिया में एक साथ स्वस्थ पैंक्रियाज और किडनी ट्रांसप्लांट की जाती है. इसका सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि मरीज को डायलिसिस से छुटकारा मिल जाता है और कई मामलों में इंसुलिन इंजेक्शन की जरूरत भी लगभग खत्म हो जाती है.
डॉ. असुरी कृष्णा ने बताया कि एम्स में इस तरह की सर्जरी पिछले 18 सालों से नहीं हुई थी. इसकी बड़ी वजह उत्तर भारत में बेहद कम ऑर्गन डोनेशन और प्रशिक्षित ट्रांसप्लांट सर्जनों की कमी रही. &amp;nbsp;2008 में पहली सर्जरी के बाद कुछ एक्सपर्ट संस्थान छोड़कर चले गए थे, जिसके बाद नए डॉक्टरों को ट्रेनिंग देने और सही मरीज की पहचान करने में समय लगा.
टाइप-1 डायबिटीज के मरीजों की संख्या में इजाफा
एक्सपर्ट का कहना है कि टाइप-1 डायबिटीज के मरीजों की उम्र अब पहले से ज्यादा बढ़ रही है, जिसकी वजह से ऐसे मरीजों की संख्या भी बढ़ रही है जिन्हें आगे चलकर किडनी और पैंक्रियाज दोनों के ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ती है. ऐसे में यह सफल सर्जरी सिर्फ एक मेडिकल उपलब्धि नहीं, बल्कि ऑर्गन डोनेशन की अहमियत का बड़ा उदाहरण भी मानी जा रही है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 15 May 2026 20:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>Health Tips: बारिश आने से पहले क्यों बढ़ने लगती हैं वायरल बीमारियां? खबर पढ़ टाल लें जान का खतरा</title>
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        <description><![CDATA[ Monsoon Health Tips: गर्मी की तपती दोपहर के बाद जब आसमान में अचानक काले बादल छाने लगते हैं और ठंडी हवाएं चलती हैं तो हर किसी को सुकून महसूस होती है. यह मौसमी बदलाव और बारिश का संकेत होता है. हालांकि, यही बदलता मौसम गर्मी से राहत के साथ-साथ कई वायरल बीमारियों का खतरा भी लेकर आता है.
बारिश से पहले अक्सर लोग अचानक बुखार, खांसी, जुकाम, गले में दर्द और पेट से जुड़ी परेशानियों का शिकार होने लगते हैं. इसका कारण है बारिश आने से पहले मौसम में नमी का बढ़ना है. तापमान ऊपर-नीचे होता रहता है और हवा में बैक्टीरिया व वायरस तेजी से फैलने लगते हैं. यही वजह है कि डॉक्टर इस मौसम को सबसे संवेदनशील समय बताते हैं. अगर थोड़ी भी लापरवाही हो जाए तो छोटी बीमारी भी बड़ी परेशानी बन सकती है.
बदलते मौसम में क्या-क्या बदलाव आते हैं?
बारिश शुरू होने से पहले वातावरण तेजी से बदलता है. तेज गर्मी के बाद अचानक हवा में नमी बढ़ जाती है, जिससे पसीना ज्यादा आता है और शरीर जल्दी थकने लगता है. कई जगहों पर धूल-मिट्टी उड़ती है तो कहीं गंदा पानी जमा होने लगता है. यही गंदगी मच्छरों और कीटाणुओं को बढ़ने का मौका देती है. साथ ही मौसम का यह उतार-चढ़ाव शरीर की रोगों से लड़ने की ताकत को भी कमजोर कर देता है. दिन में गर्मी और रात में ठंडक होने से लोग समझ नहीं पाते कि क्या पहनें और क्या खाएं. कई बार लोग ठंडी चीजें ज्यादा खाने लगते हैं या बारिश की पहली फुहार में भीग जाते हैं, जिससे वायरल संक्रमण का खतरा और बढ़ जाता है. यही समय होता है जब डेंगू, मलेरिया, वायरल फीवर, टाइफाइड और पेट के इंफेक्शन जैसी बीमारियां तेजी से फैलने लगती हैं.&amp;nbsp;
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कौन-कौन सी बीमारियां सबसे ज्यादा फैलती हैं?
बारिश से पहले और बारिश के शुरुआती दिनों में सबसे ज्यादा वायरल फीवर और फ्लू के मामले सामने आते हैं. &amp;nbsp;इसके अलावा गले में संक्रमण, खांसी-जुकाम और सांस से जुड़ी परेशानियां भी तेजी से बढ़ने लगती है. वहीं जिन लोगों की इम्यूनिटी कमजोर होती है, उन्हें यह मौसम ज्यादा प्रभावित कर सकता है. साथ ही छोटे बच्चे और बुजुर्ग भी इसके प्रभाव में आकर जल्दी बीमार पड़ सकते हैं. गंदा पानी और बाहर का खाना खाने से पेट दर्द, उल्टी, दस्त और फूड पॉइजनिंग जैसी समस्याएं भी होने लगती हैं. इसके अलावा अचानक बारिश के वजह से कई जगहों पर पानी जमा होने लगता है, जिससे मच्छर बढ़ जाते हैं जो डेंगू और मलेरिया जैसी खतरनाक बीमारियों को जन्म देते हैं. शुरुआत में लोग इन लक्षणों को मामूली समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन यही गलती बाद में बड़ी परेशानी बन सकती है. &amp;nbsp;इसलिए शरीर में कमजोरी, तेज बुखार या लगातार खांसी दिखे तो तुरंत सावधानी बरतनी चाहिए.&amp;nbsp;
कैसे करें बचाव&amp;nbsp;
इस मौसम में थोड़ी सी समझदारी आपकी और आपके परिवार की सेहत बचा सकती है. इसके लिए सबसे जरूरी है साफ-सफाई का ध्यान रखना. इसमें घर के आसपास पानी जमा न होने दें ताकि मच्छर न पनपें. साथ ही बाहर का खुला या बासी खाना खाने से बचें और ज्यादा से ज्यादा ताजा व हल्का भोजन करें. शरीर को मजबूत रखने के लिए पानी पीते रहें और कोशिश करें फल-सब्जियां अच्छी मात्रा में खाएं. इसके अलावा &amp;nbsp;बारिश के मौसम में भीगने के बाद तुरंत कपड़े बदल लेना चाहिए ताकि शरीर में ठंड न लगे. वहीं छोटे बच्चों और बुजुर्गों का खास ध्यान रखना जरूरी है क्योंकि उनकी रोगों से लड़ने की ताकत कम होती है. अगर बुखार या कमजोरी लगातार बनी रहे तो घरेलू इलाज के भरोसे बैठने के बजाय डॉक्टर से सलाह जरूर लें.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Fri, 15 May 2026 04:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Sleep Cycle: कैसे लगातार स्क्रीन टाइम से बिगड़ती है स्लीप साइकिल? आज ही कर लें सुधार वरना हो जाएगा नुकसान </title>
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        <description><![CDATA[ Sleep Problems: आज के समय में ज्यादातर लोगों की जिंदगी मोबाइल, लैपटॉप और टीवी के आसपास ही घूमती है. खासकर ऑफिस में काम करने वाले लोग सुबह से शाम तक कंप्यूटर स्क्रीन के सामने बैठे रहते हैं. काम खत्म होने के बाद भी दिमाग को आराम नहीं मिलता, क्योंकि घर पहुंचकर हाथ में फिर मोबाइल आ जाता है. कोई सोशल मीडिया देखता है, कोई वीडियो देखता है तो कोई देर रात तक चैट करता रहता है.
धीरे-धीरे यही आदत शरीर को अंदर से थकाने लगती है. इंसान को लगता है कि वह बस फोन चला रहा है, लेकिन उसकी आंखें और दिमाग लगातार काम कर रहे होते हैं. यही वजह है कि रात को जल्दी नींद नहीं आती और सुबह उठते ही शरीर टूटा-टूटा सा महसूस होता है. कई लोग इसे छोटी बात समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन यही खराब आदत आगे चलकर बड़ी परेशानी बन जाती है.
स्क्रीन की रोशनी नींद की दुश्मन कैसे बनती है
मोबाइल और लैपटॉप से निकलने वाली नीली रोशनी यानी ब्लू लाइट हमारे दिमाग को यह एहसास कराती है कि अभी दिन है. ऐसे में शरीर ठीक से &amp;ldquo;स्लीप मोड&amp;rdquo; में नहीं जा पाता. आमतौर पर रात के समय शरीर मेलाटोनिन नाम का हार्मोन बनाता है, जो नींद लाने में मदद करता है. हालांकि, जब सोने से पहले लंबे समय तक स्क्रीन देखी जाती है तो यह हार्मोन कम बनने लगता है. यही कारण है कि इंसान बिस्तर पर लेट तो जाता है, लेकिन देर तक करवटें बदलता रहता है. लगातार ऐसा होता रहता है तो इससे शरीर को पूरा आराम नहीं मिल पाता, जिससे अगले दिन सिर भारी लगना, आंखों में जलन होना और छोटी-छोटी बातों पर चिड़चिड़ापन महसूस होना आम बात बन जाती है.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ेंः क्या किडनी स्टोन निकालने के लिए गटक जाते हैं बीयर? हो सकते हैं इस बीमारी के शिकार
खराब स्लीप साइकिल से शरीर और दिमाग दोनों होते हैं कमजोर
जब नींद पूरी नहीं होती, तो उसका असर सिर्फ चेहरे की थकान तक सीमित नहीं रहता. इससे धीरे-धीरे शरीर की ताकत भी कम होने लगती है, जिस कारण दिनभर सुस्ती रहना, काम में मन न लगना और ध्यान बार-बार भटकना शुरुआती संकेत सामने आने लगते हैं. रात को नींद अच्छी तरह पूरी ना होने पर कई लोग ऑफिस में बैठे-बैठे जम्हाई लेते रहते हैं, क्योंकि उनका दिमाग ठीक से आराम नहीं कर पाया होता है. साथ ही लगातार खराब नींद की वजह से आंखों के नीचे काले घेरे भी आने लगते हैं. इतना ही नहीं, कई रिसर्च में यह भी सामने आया है कि लंबे समय तक खराब स्लीप साइकिल दिल, दिमाग और मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर डाल सकती है. कुछ लोग रात को देर तक फोन चलाने के बाद सुबह उठ ही नहीं पाते, जिससे उनका पूरा रूटीन बिगड़ जाता है. यही वजह है कि डॉक्टर भी सोने से पहले स्क्रीन टाइम कम करने की सलाह देते हैं,&amp;nbsp;
आज से बदल लें ये छोटी आदतें
अगर आप भी देर रात तक मोबाइल चलाने की आदत से परेशान हैं, तो कुछ आसान बदलाव से आप अपने आप की मदद कर सकते है, जैसे कोशिश करें कि सोने से कम से कम एक घंटा पहले फोन और लैपटॉप से दूरी बना लें. रात में हल्की रोशनी रखें और बेवजह सोशल मीडिया स्क्रॉल करने से बचें. इसके अलावा अगर काम की वजह से पूरा दिन स्क्रीन पर बिताना पड़ता है, तो बीच-बीच में आंखों को आराम देना बहुत जरूरी होता है. हर 20 से 30 मिनट बाद कुछ सेकंड के लिए स्क्रीन से नजर हटाएं. साथ ही सोने से पहले किताब पढ़ना, हल्का संगीत सुनना या परिवार के साथ थोड़ा समय बिताना भी दिमाग को शांत करता है. याद रखिए, अच्छी नींद सिर्फ आराम नहीं देती, बल्कि पूरे शरीर को नई ताकत भी देती है. इसलिए हर डॉक्टर यही सलाह देता है कि हर आदमी को एक दिन में 7 से 8 घंटे कि निंद लेनी ही चाहिए. &amp;nbsp;ऐसे में आज ही अपनी स्लीप साइकिल को सुधारना शुरू करें, वरना छोटी सी लापरवाही धीरे-धीरे आपकी सेहत पर भारी पड़ सकती है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Fri, 15 May 2026 04:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Bluetooth Earbuds: क्या आपका ब्लूटूथ ईयरबड्स बन सकता है ब्रेन कैंसर का कारण, जानें एक्सपर्ट ने क्या दी चेतावनी?</title>
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        <description><![CDATA[ Can Bluetooth Earbuds Cause Brain Cancer: आजकल ब्लूटूथ ईयरबड्स और वायरलेस हेडफोन्स लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं. ऑफिस कॉल से लेकर जिम, ट्रैवल और यहां तक कि सोते समय पॉडकास्ट सुनने तक, लोग घंटों इन्हें इस्तेमाल करते हैं. लेकिन इनके बढ़ते इस्तेमाल के साथ एक सवाल भी तेजी से चर्चा में है, क्या लंबे समय तक ब्लूटूथ ईयरबड्स इस्तेमाल करने से ब्रेन कैंसर का खतरा बढ़ सकता है?
कैसे काम करता है ब्लूटूथ टेक्नोलॉजी?
दरअसल ब्लूटूथ टेक्नोलॉजी रेडियो फ्रीक्वेंसी यानी RF रेडिएशन के जरिए काम करती है. यही वजह है कि कई लोग इसे लेकर डर जाते हैं, क्योंकि रेडिएशन शब्द सुनते ही कैंसर जैसी बीमारियों का ख्याल आने लगता है. हालांकि एक्सपर्ट्स का कहना है कि ब्लूटूथ डिवाइस से निकलने वाला रेडिएशन &quot;नॉन-आयोनाइजिंग रेडिएशन&quot; की कैटेगरी में आता है, जो एक्स-रे जैसे खतरनाक आयोनाइजिंग रेडिएशन से काफी अलग होता है.
क्या घंटों इस्तेमाल करने से इसका कोई असर होता है?
यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिल्वेनिया के बायोइंजीनियरिंग प्रोफेसर एमेरिटस डॉ. केन फोस्टर के मुताबिक ब्लूटूथ डिवाइस से निकलने वाला रेडिएशन मोबाइल फोन की तुलना में काफी कम होता है. उन्होंने Health को बताया कि अगर कोई व्यक्ति घंटों वायरलेस ईयरबड्स इस्तेमाल करता है, तब भी उसका रेडिएशन एक्सपोजर फोन को कान से लगाकर बात करने से कम माना जाता है.&amp;nbsp;
क्या ब्लूटूथ हमारे डीएनए को नुकसान पहुंचा सकते हैं?
एक्सपर्ट बताते हैं कि आयोनाइजिंग रेडिएशन शरीर के डीएनए को नुकसान पहुंचा सकता है और कैंसर का खतरा बढ़ा सकता है. लेकिन ब्लूटूथ डिवाइस नॉन-आयोनाइजिंग रेडिएशन इस्तेमाल करते हैं, जिसमें इतनी ऊर्जा नहीं होती कि वह सेल्स को उसी तरह नुकसान पहुंचा सके. यही वजह है कि अभी तक किसी रिसर्च में ब्लूटूथ ईयरबड्स और ब्रेन कैंसर के बीच सीधा संबंध साबित नहीं हुआ है. हालांकि साइंटिस्ट यह भी मानते हैं कि वायरलेस डिवाइस और RF रेडिएशन पर अभी और रिसर्च की जरूरत है. फिलहाल उपलब्ध स्टडीज में ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं मिला है जो यह बताए कि ब्लूटूथ ईयरबड्स ब्रेन ट्यूमर या कैंसर का कारण बनते हैं.&amp;nbsp;
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इस्तेमाल करते समय क्या रखना चाहिए सावधानी?
डॉ. केन फोस्टर का कहना है कि अगर कोई व्यक्ति अतिरिक्त सावधानी बरतना चाहता है तो वह जरूरत न होने पर ईयरबड्स निकाल सकता है या वायर्ड हेडफोन का इस्तेमाल कर सकता है. लेकिन उनके मुताबिक लोगों को ज्यादा चिंता उस खतरे की करनी चाहिए जो तुरंत नुकसान पहुंचा सकता है, जैसे तेज आवाज में लंबे समय तक गाने सुनना. एक्सपर्ट के अनुसार जरूरत से ज्यादा तेज आवाज में ईयरबड्स इस्तेमाल करने से सुनने की क्षमता पर असर पड़ सकता है. इसलिए सलाह दी जाती है कि हेडफोन का इस्तेमाल 60 से 90 मिनट तक सीमित रखें, बीच-बीच में ब्रेक लें और वॉल्यूम 60 से 80 प्रतिशत से ज्यादा न रखें.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 15 May 2026 04:30:06 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Oily Food Side Effects: खाने में ज्यादा तेल मतलब बीमारियां, जानें कम इस्तेमाल से कितनी सुधर सकती है सेहत?</title>
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        <description><![CDATA[ What Happens When You Eat Too Much Oily Food: भारतीय किचन में तेल का इस्तेमाल लगभग हर खाने का हिस्सा माना जाता है. तड़का लगाने से लेकर डीप फ्राई तक, कई डिशेज बिना तेल के अधूरी लगती हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जरूरत से ज्यादा तेल आपकी सेहत पर कितना भारी पड़ सकता है? आजकल एक्सपर्ट्स लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि ज्यादा ऑयली खाना धीरे-धीरे शरीर को कई बीमारियों की तरफ धकेल सकता है.&amp;nbsp;
भारत में कितने प्रतिशत लोग ऑयली फूड खाना पसंद करते हैं?
Redcliffelabs की रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत में करीब 38 प्रतिशत लोग नियमित रूप से तले हुए स्नैक्स और प्रोसेस्ड फूड खाते हैं, जबकि सिर्फ 28 प्रतिशत लोग ही संतुलित डाइट लेते हैं, जिसमें फल, सब्जियां और पोषक तत्वों से भरपूर चीजें शामिल होती हैं. स्टडीज में यह भी सामने आया है कि हाई-कैलोरी और ऑयली फूड का सेवन लगातार बढ़ रहा है.
क्यों तला हुआ खाना पसंद करते हैं लोग?&amp;nbsp;
एक्सपर्ट्स का कहना है कि लोग अक्सर तला हुआ खाना इसलिए ज्यादा खाते हैं, क्योंकि इसका स्वाद उन्हें पसंद आता है और यह तुरंत क्रेविंग को शांत करता है. लेकिन यही आदत आगे चलकर कई हेल्थ समस्याओं की वजह बन सकती है.&amp;nbsp;
ज्यादा ऑयली खाने से क्या होता है नुकसान
हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली बेवसाइट Redcliffelabs के अनुसार, बहुत ज्यादा ऑयली खाना सबसे पहले डाइजेशन पर असर डालता है. कई लोगों को तला हुआ खाना खाने के बाद पेट भारी लगना, ब्लोटिंग, एसिडिटी और अपच जैसी दिक्कतें महसूस होती हैं. दरअसल, ज्यादा फैट वाले खाने को पचाने में शरीर को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है, जिससे डाइजेशन स्लो हो जाता है.&amp;nbsp;
आपके मूड पर भी होता है असर
सिर्फ पेट ही नहीं, ज्यादा ऑयली खाना मूड पर भी असर डाल सकता है. रिपोर्ट्स में बताया गया है कि प्रोसेस्ड और फ्राइड फूड में मौजूद अनहेल्दी ट्रांस फैट्स शरीर में सूजन बढ़ा सकते हैं, जो दिमाग के काम करने के तरीके को प्रभावित कर सकते हैं. कुछ स्टडीज में ज्यादा फ्राइड फूड खाने वालों में डिप्रेशन और एंग्जायटी के लक्षण भी ज्यादा पाए गए हैं.&amp;nbsp;
इसे भी पढ़ें -&amp;nbsp;Heart Fights Cancer: दिल धड़क रहा है यानी कैंसर से लड़ रहा है, नई स्टडी से जागी उम्मीद
वजन और हार्ट हेल्थ पर भी होता है नुकसान&amp;nbsp;
लंबे समय तक ज्यादा तेल वाला खाना खाने से वजन तेजी से बढ़ सकता है. फ्राइड फूड में कैलोरी बहुत ज्यादा होती है, लेकिन जरूरी पोषक तत्व कम होते हैं. यही वजह है कि लगातार ऑयली खाना मोटापे और उससे जुड़ी कई बीमारियों का खतरा बढ़ा देता है. &amp;nbsp;ज्यादा तेल हार्ट हेल्थ के लिए भी नुकसानदायक माना जाता है. एक्सपर्ट्स के मुताबिक, इससे एलडीएल यानी बैड कोलेस्ट्रॉल बढ़ सकता है और गुड कोलेस्ट्रॉल कम हो सकता है. समय के साथ यह धमनियों में प्लाक जमा कर सकता है, जिससे हार्ट अटैक, स्ट्रोक और हाई ब्लड प्रेशर का खतरा बढ़ जाता है.&amp;nbsp;
फैटी लिवर का भी शिकार हो सकते हैं आप
रिपोर्ट्स यह भी बताती हैं कि जरूरत से ज्यादा तला हुआ खाना टाइप-2 डायबिटीज के जोखिम को बढ़ा सकता है. फ्राइड फूड इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ाने में भूमिका निभाता है, जो डायबिटीज की बड़ी वजह मानी जाती है. इसके अलावा फैटी लिवर जैसी समस्याएं भी ज्यादा ऑयली डाइट से जुड़ी हुई हैं.&amp;nbsp;
&amp;nbsp;हालांकि अच्छी बात यह है कि छोटे-छोटे बदलाव करके सेहत में बड़ा सुधार लाया जा सकता है. एक्सपर्ट्स सलाह देते हैं कि डीप फ्राई चीजों की जगह बेक्ड या ग्रिल्ड फूड चुनें. इसके साथ ही खाने में हरी सब्जियां, फल, साबुत अनाज और हेल्दी फैट्स को शामिल करना शरीर के लिए फायदेमंद हो सकता है.
इसे भी पढ़ें-&amp;nbsp;Vitamin D Deficiency: क्या बिना बात रहता है बदन दर्द और खराब मूड, कहीं इस विटामिन की कमी से तो नहीं हो रहा ऐसा?
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 14 May 2026 00:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Oily, Food, Side, Effects:, खाने, में, ज्यादा, तेल, मतलब, बीमारियां, जानें, कम, इस्तेमाल, से, कितनी, सुधर, सकती, है, सेहत</media:keywords>
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        <title>Cesarean delivery risk: सीजेरियन डिलीवरी के दौरान क्या सच में होता है किडनी फेल होने का खतरा?</title>
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        <description><![CDATA[ Cesarean Delivery Risk: राजस्थान के कोटा मेडिकल कॉलेज से सामने आए लगातार मौतों और किडनी फेल होने के मामलों ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है. सिजेरियन डिलीवरी के बाद महिलाओं की तबीयत बिगड़ने और कई मरीजों के डायलिसिस तक पहुंचने की खबरों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या सी सेक्शन के दौरान सच में किडनी फेल होने का खतरा होता है. इसे लेकर डॉक्टरों का कहना है कि सिजेरियन डिलीवरी सामान्य प्रक्रिया नहीं बल्कि एक बड़ी सर्जरी होती है और अगर ऑपरेशन के बाद इंफेक्शन फैल जाए तो स्थिति तेजी से गंभीर हो सकती है. ऐसे में चलिए अब आपको बताते हैं कि सीजेरियन डिलीवरी के दौरान क्या सच में किडनी फेल होने का खतरा होता है.&amp;nbsp;
कोटा में लगातार बढ़ रहे मामले&amp;nbsp;
कोटा के न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल और जेके लोन अस्पताल में पिछले कुछ दिनों में कई प्रसूताओं महिलाओं की तबीयत बिगड़ी है. वहीं अब तक चार महिलाओं की मौत हो चुकी है, जबकि कई महिलाओं में किडनी फेल होने और ब्लड प्रेशर गिरने जैसी समस्याएं सामने आई है. कुछ मरीजों का डायलिसिस और आईसीयू में इलाज चल रहा है. मामले की जांच के लिए जयपुर से एक्सपर्ट डॉक्टरों की टीम भी कोटा पहुंची है.&amp;nbsp;
कैसे बढ़ता है संक्रमण का खतरा?&amp;nbsp;
डॉक्टरों के अनुसार सिजेरियन डिलीवरी के बाद इन्फेक्शन सबसे बड़ा खतरा होता है. अगर बैक्टीरिया शरीर में फैल जाए तो यह खून तक पहुंच सकते हैं और फिर शरीर में सेप्सिस की स्थिति पैदा हो सकती है. सेप्सिस होने पर शरीर के कई अंग प्रभावित होने लगते हैं और सबसे पहले असर किडनी पर दिखाई देता है. यही वजह है कि कुछ मामलों में मरीजों की किडनी काम करना बंद कर देती है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि प्रेगनेंसी और ऑपरेशन के दौरान शरीर की प्रतिरोधक क्षमता पहले से कमजोर होती है. इससे इंफेक्शन तेजी से फैल सकता है. अगर समय पर इलाज और निगरानी न हो तो संक्रमण ब्लड प्रेशर को अचानक गिरा देता है. जिससे किडनी तक पर्याप्त ब्लड नहीं पहुंच पाता और किडनी फेल होने का खतरा बढ़ जाता है.&amp;nbsp;
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नॉर्मल डिलीवरी से ज्यादा संवेदनशील क्यों है सी सेक्शन?&amp;nbsp;
डॉक्टरों के अनुसार सी सेक्शन में पेट और गर्भाशय की कई परतों को काटकर बच्चे को बाहर निकाला जाता है. यही कारण है कि सामान्य डिलीवरी की तुलना में इसमें संक्रमण, ज्यादा ब्लीडिंग, ब्लड क्लॉट और पोस्ट ऑपरेटिव समस्याओं का खतरा ज्यादा रहता है. खासतौर पर जिन महिलाओं को एनीमिया, डायबिटीज, मोटापा या लंबे समय तक लेबर पेन जैसे समस्याएं होती है, उनमें खतरा और बढ़ जाता है. इमरजेंसी सिजेरियन के मामलों में खतरा और ज्यादा माना जाता है.
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        <pubDate>Thu, 14 May 2026 00:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Kidney Stone: क्या किडनी स्टोन निकालने के लिए गटक जाते हैं बीयर? हो सकते हैं इस बीमारी के शिकार</title>
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        <description><![CDATA[ Why Beer Can Increase Kidney Stone Risk: किडनी स्टोन को लेकर सोशल मीडिया पर कई तरह के दावे किए जाते हैं. इन्हीं में से एक दावा यह भी है कि बीयर पीने से पथरी जल्दी निकल जाती है. कई लोग दोस्तों या रिश्तेदारों के अनुभव सुनकर इस बात को सच मान लेते हैं. लेकिन एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह सिर्फ एक मिथक है और इस पर भरोसा करना नुकसानदायक साबित हो सकता है.&amp;nbsp;
फायदे की जगह हो सकता है नुकसान
पुणे के सह्याद्री सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल में कंसल्टेंट नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. अतुल डी. सजगुरे साफ कहते हैं कि बीयर किडनी स्टोन के खतरे को कम नहीं करती. उनके मुताबिक, शराब शरीर में डिहाइड्रेशन बढ़ा सकती है, जिससे लंबे समय में पथरी बनने का जोखिम और ज्यादा बढ़ जाता है. मुंबई के पी.डी. हिंदुजा हॉस्पिटल एंड मेडिकल रिसर्च सेंटर में कंसल्टेंट नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. जतिन कोठारी ने TOI को बताया &amp;nbsp;कि लोगों को लगता है कि बीयर एक लिक्विड है, इसलिए यह शरीर को हाइड्रेट रखेगी. लेकिन असल में शराब का असर बिल्कुल उल्टा होता है. अल्कोहल शरीर में डाइयूरेटिक की तरह काम करता है, यानी यह बार-बार पेशाब के जरिए शरीर से ज्यादा पानी बाहर निकालता है. ऐसे में अगर कोई व्यक्ति पर्याप्त पानी नहीं पी रहा और सिर्फ बीयर पर भरोसा कर रहा है, तो शरीर में पानी की कमी हो सकती है.&amp;nbsp;
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बढ़ जाता है वजन बढ़ने और मेटाबॉलिक सिंड्रोम का खतरा 
डॉ. कोठारी के अनुसार, डिहाइड्रेशन की वजह से पेशाब में मौजूद मिनरल्स ज्यादा कंसंट्रेट हो जाते हैं, जिससे पथरी बनने की संभावना बढ़ जाती है. यानी जिस चीज को लोग इलाज समझ रहे होते हैं, वही कई बार समस्या को और बढ़ा सकती है. एक्सपर्ट्स का यह भी कहना है कि बीयर सिर्फ डिहाइड्रेशन ही नहीं बढ़ाती, बल्कि शरीर में यूरिक एसिड का स्तर भी बढ़ा सकती है. हाई यूरिक एसिड यूरिक एसिड स्टोन बनने की बड़ी वजह माना जाता है. इसके अलावा ज्यादा मात्रा में बीयर पीने से वजन बढ़ने और मेटाबॉलिक सिंड्रोम का खतरा भी बढ़ सकता है, जो आगे चलकर किडनी स्टोन की समस्या को और गंभीर बना सकता है.&amp;nbsp;
डॉ. कोठारी बताते हैं कि कई लोग पानी की जगह बीयर पीने लगते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे किडनी फ्लश हो जाएगी. लेकिन पानी की कमी और अल्कोहल का असर मिलकर स्थिति को और खराब कर सकता है.&amp;nbsp;
क्या है सबसे आसान तरीका?
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, किडनी स्टोन से बचाव का सबसे आसान और असरदार तरीका पर्याप्त मात्रा में पानी पीना है. डॉ. सजगुरे सलाह देते हैं कि दिनभर में 8 से 12 गिलास पानी जरूर पीना चाहिए, ताकि यूरिन पतला रहे और मिनरल्स जमा न हों. वहीं डॉ. कोठारी के अनुसार, नींबू पानी भी फायदेमंद हो सकता है, क्योंकि इसमें मौजूद साइट्रेट पथरी बनने की प्रक्रिया को रोकने में मदद करता है.&amp;nbsp;
डॉक्टर्स का कहना है कि किडनी स्टोन सिर्फ एक कारण से नहीं बनता. खानपान, कम पानी पीना, ज्यादा नमक, मेटाबॉलिक समस्याएं और जेनेटिक कारण भी इसके पीछे जिम्मेदार हो सकते हैं. इसलिए सोशल मीडिया पर फैल रहे मिथकों पर भरोसा करने के बजाय सही मेडिकल सलाह लेना ज्यादा जरूरी है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 14 May 2026 00:30:11 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Prateek Yadav Death: क्या फिटनेस फ्रीक होने से गई प्रतीक की जान, जानें एक्सरसाइज को लेकर क्या कहते हैं एक्सपर्ट?</title>
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        <description><![CDATA[ What Happened To Prateek Yadav: समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के छोटे बेटे प्रतीक यादव का 38 साल की उम्र में निधन हो गया. अचानक तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टर उन्हें बचा नहीं सके. शुरुआती जानकारी के मुताबिक वह लंबे समय से फेफड़ों से जुड़ी बीमारी और लंग्स में खून के थक्के की समस्या से जूझ रहे थे. हालांकि उनकी मौत के बाद एक और सवाल तेजी से चर्चा में है क्या जरूरत से ज्यादा फिटनेस भी शरीर के लिए खतरा बन सकती है?.
फिटनेस को लेकर थे काफी एक्टिव 
प्रतीक यादव फिटनेस को लेकर काफी गंभीर माने जाते थे. &amp;nbsp;उनके सोशल मीडिया अकाउंट पर जिम वर्कआउट, हैवी डेडलिफ्ट और एक्सट्रीम ट्रेनिंग की कई तस्वीरें और वीडियो मौजूद हैं. वह कार ड्राइविंग और जानवरों के भी शौकीन थे। राजनीति से दूरी रखने वाले प्रतीक अक्सर अपनी फिटनेस लाइफस्टाइल की वजह से चर्चा में रहते थे.&amp;nbsp;
क्या ज्यादा एक्सरसाइज हेल्थ के लिए नुकसानदायक?
हम सभी जानते हैं कि एक्सरसाइज शरीर के लिए जरूरी है. यह दिल को मजबूत बनाती है, वजन कंट्रोल रखने में मदद करती है और मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर करती है. लेकिन एक्सपर्ट मानते हैं कि जरूरत से ज्यादा या गलत तरीके से की गई एक्सरसाइज शरीर को नुकसान भी पहुंचा सकती है.&amp;nbsp;
ओवर एक्सरसाइजिंग शरीर के लिए कितनी खतरनाक?
लुइसियाना स्थित Excel Rehabilitation Services के फिजिकल थेरेपिस्ट डेविड मिरांडा कहते हैं कि ओवर एक्सरसाइजिंग शरीर के लिए नुकसानदायक हो सकती है और कई बार यह स्वास्थ्य के लिए खतरनाक भी बन जाती है. &amp;nbsp;वहीं Mercy Medical Center के ऑर्थोपेडिक स्पोर्ट्स मेडिसिन सर्जन डॉ. मार्क स्लाबॉ बताते हैं कि बहुत तेजी से शरीर पर ज्यादा दबाव डालना ओवरट्रेनिंग की स्थिति पैदा कर सकता है.&amp;nbsp;
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कितनी एक्सरसाइज शरीर के लिए सही?
अमेरिकी हेल्थ विभाग के अनुसार वयस्कों को हर हफ्ते 150 से 300 मिनट तक मॉडरेट फिजिकल एक्टिविटी या 75 से 150 मिनट तक इंटेंस एक्सरसाइज करनी चाहिए. इसके साथ हफ्ते में कम से कम दो दिन स्ट्रेंथ ट्रेनिंग की सलाह दी जाती है. हालांकि एक्सपर्ट यह भी मानते हैं कि हर व्यक्ति की बॉडी अलग होती है और अपनी क्षमता से ज्यादा ट्रेनिंग करना खतरनाक हो सकता है.
क्या प्रतीक की मौत फिटनेस फ्रीक होने से हुई?
डॉक्टरों के मुताबिक ओवरट्रेनिंग तब होती है जब शरीर को रिकवरी का पर्याप्त समय नहीं मिलता. लगातार हैवी वर्कआउट, कम नींद, खराब डाइट और जरूरत से ज्यादा एक्सरसाइज शरीर पर दबाव बढ़ा सकते हैं. Emory School of Medicine के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. ओलुसेउन ओलुफाडे कहते हैं कि अगर कोई शुरुआती व्यक्ति लगातार कई दिनों तक भारी ट्रेनिंग करता है तो इससे गंभीर इंजरी का खतरा बढ़ सकता है. हालांकि अभी तक यह कहना जल्दबाजी होगी कि प्रतीक यादव की मौत का सीधा संबंध उनकी फिटनेस लाइफस्टाइल से था. डॉक्टरों का कहना है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद ही उनकी मौत की असली वजह साफ हो पाएगी.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 14 May 2026 00:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>A1 vs A1 Milk: A1 और A2 दूध में क्या होता है अंतर, आपकी सेहत के लिए कौन&amp;सा ज्यादा पौष्टिक? </title>
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        <description><![CDATA[ A1 vs A1 Milk: दूध भारतीय खानपान का एक अहम हिस्सा माना जाता है. सुबह की चाय से लेकर बच्चों के नाश्ते और रात के हल्के भोजन तक लगभग हर घर में दूध का इस्तेमाल होता है. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में A1 और A2 दूध को लेकर बहस काफी तेज हुई है. बाजार में A2 दूध को ज्यादा हेल्दी और आसानी से पचने वाला बताकर बेचा जा रहा है. जबकि कई लोग इसे सिर्फ एक मार्केटिंग ट्रेंड मानते हैं. ऐसे में लोगों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही रहता है कि आखिर A1 और A2 में अंतर क्या है और सेहत के लिए कौन सा दूध बेहतर माना जाता है.&amp;nbsp;
क्या होता है A1 और A2 दूध?
दूध में मौजूद कुल प्रोटीन का लगभग 80 फीसदी हिस्सा केसीन प्रोटीन का होता है. इसमें बीटा केसीन प्रमुख रूप से पाया जाता है. इसी बेटा केसीन के अलग-अलग प्रकारों में A1 और A2 सबसे ज्यादा चर्चा में रहते हैं. A1 दूध में A1 प्रकार का बीटा केसीन पाया जाता है. जबकि A2 दूध में A2 प्रकार का बीटा केसीन मौजूद होता है. वैज्ञानिकों का मानना है कि इन दोनों प्रोटीन में केवल एक अमीनो एसिड का अंतर होता है, लेकिन शरीर पर इनका प्रभाव अलग-अलग पड़ता है.&amp;nbsp;
किस गाय से मिलता है A1 और A2?
दूध का प्रकार काफी हद तक गाय की नस्ल पर निर्भर करता है. भारतीय देसी गायों जैसे गिर, साहिवाल, रेड सिंधी और थारपारकर नस्ल की गाय का दूध आमतौर पर &amp;nbsp;A2 माना जाता है. वहीं होल्स्टीन, फ्रीजियन और कुछ यूरोपीय नस्ल को गायों में A1 दूध पाया जाता है. आम बाजार में मिलने वाले कई पैकेट वाले दूध में A1 और A2 प्रकार के प्रोटीन हो सकते हैं, जबकि A2 में सिर्फ A2 बीटा केसीन होता है.&amp;nbsp;
पाचन पर कैसे पड़ता है असर?&amp;nbsp;
A1 और A2 दूध को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा पाचन को लेकर होती है. रिसर्च में यह बात सामने आई है कि जब A1 दूध पचता है तो शरीर में बीसीएम-7 यानी बीटा कैसे मॉर्फिन-7 नाम का एक पेप्टाइड बनता है. कुछ वैज्ञानिक इसे पेट संबंधी बीमारी से जोड़कर देखते हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ लोगों को A1 दूध पीने के बाद गैस, ब्लोटिंग और पेट की बीमारी हो सकती है. वहीं A2 दूध के पाचन के दौरान बीसीएम-7 बहुत कम या नहीं बनता है. इसलिए इसे पेट के लिए हल्का माना जाता है.&amp;nbsp;
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क्या A2 दूध ज्यादा हेल्दी है?
A2 ग्रुप को लेकर यह दावा किया जा रहा है कि यह शरीर के लिए ज्यादा अनुकूल हो सकता है. कुछ रिसर्च में से बेहतर डाइजेशन, पेट की कम परेशानी और ओवरऑल गट हेल्थ से जोड़ा गया है. हालांकि एक्सपर्ट्स यह भी साफ करते हैं कि अभी तक ऐसे ठोस वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिले हैं, जिनसे यह पूरी तरह साबित हो सके कि कि A2 दूध हर व्यक्ति के लिए A1 दूध से बेहतर ही है.
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        <pubDate>Thu, 14 May 2026 00:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>Overhydration Risk: क्या गर्मी में सिर्फ पानी पीना है खतरनाक? डॉक्टर से जानें चौंकाने वाला सच</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/overhydration-risk-क्या-गर्मी-में-सिर्फ-पानी-पीना-है-खतरनाक-डॉक्टर-से-जानें-चौंकाने-वाला-सच</link>
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        <description><![CDATA[ Can Drinking Too Much Water Be Dangerous: गर्मी के दिनों में अक्सर हम यही मानते हैं कि ज्यादा से ज्यादा पानी पीना ही शरीर को स्वस्थ रखने का सबसे आसान तरीका है. लेकिन क्या सिर्फ पानी पीना ही काफी है? एक हालिया मामला इस सोच को पूरी तरह बदल देता है. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर एक्सपर्ट क्या कहते हैं.&amp;nbsp;
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
डॉ. रोमेल टिक्कू ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि &amp;nbsp;एक 25 साल का युवक पूरे दिन धूप में बाइक से इधर-उधर घूमता रहा. उसने खुद को हाइड्रेट रखने के लिए करीब 5 लीटर पानी पिया, लेकिन दिनभर कुछ खाया नहीं. न फल, न कोई नमक वाला पेय सिर्फ सादा पानी, शुरुआत में उसे हल्का चक्कर और मतली महसूस हुई, जिसे उसने थकान समझकर नजरअंदाज कर दिया. &amp;nbsp;लेकिन कुछ ही घंटों में हालत बिगड़ गई, बोलने में दिक्कत, ज्यादा नींद और उलझन जैसी परेशानी शुरू हो गई. जांच में पता चला कि उसके शरीर में सोडियम का स्तर खतरनाक रूप से गिर चुका था. इसे तीव्र हाइपोनेट्रेमिया कहा जाता है.&amp;nbsp;
क्यों होता है ऐसा?
यह कोई एक मामला नहीं है. देशभर में बढ़ती गर्मी के साथ ऐसे केस तेजी से सामने आ रहे हैं, जहां लोग पानी तो खूब पीते हैं, लेकिन जरूरी खनिजों की कमी से बीमार पड़ जाते हैं. असल में पसीना सिर्फ पानी नहीं होता, उसमें सोडियम, पोटैशियम और दूसरे जरूरी तत्व भी निकल जाते हैं. &amp;nbsp;जब शरीर से ये तत्व लगातार कम होते रहते हैं और हम सिर्फ पानी पीते रहते हैं, तो खून में उनका संतुलन बिगड़ जाता है. यही स्थिति खतरनाक बन जाती है.
सोडियम की कमी से क्या दिक्कत होती है?
सोडियम की कमी खास तौर पर ब्रेन के लिए खतरनाक होती है. जब इसका स्तर गिरता है, तो शरीर की सेल्स में पानी भरने लगता है, जिससे सूजन बढ़ती है. शुरुआत में सिरदर्द, थकान, चक्कर और उलझन जैसे लक्षण दिखते हैं, लेकिन अगर ध्यान न दिया जाए तो यह स्थिति दौरे या बेहोशी तक पहुंच सकती है. वहीं दूसरी तरफ, अगर कोई व्यक्ति पर्याप्त पानी नहीं पीता, तो शरीर में सोडियम का स्तर बढ़ सकता है. इसे हाइपरनेट्रेमिया कहा जाता है, जिसमें शरीर की सेल्स सिकुड़ने लगती हैं. इसके लक्षण प्यास, मुंह सूखना, चिड़चिड़ापन और गंभीर मामलों में दौरे तक हो सकते हैं.&amp;nbsp;
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पोटैशियम भी जरूरी
पोटैशियम भी उतना ही जरूरी है, लेकिन इसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है. इसकी कमी से मांसपेशियों में कमजोरी, ऐंठन और दिल की धड़कन में गड़बड़ी हो सकती है. इसलिए गर्मियों में सिर्फ पानी पीना ही काफी नहीं है, बल्कि शरीर में जरूरी तत्वों का संतुलन बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है. छाछ, नींबू पानी में नमक-शक्कर, नारियल पानी और संतुलित भोजन इस कमी को पूरा करने में मदद करते हैं.&amp;nbsp;
इन चीजों का रखें ध्यान
डॉ. डॉ. रोमेल टिक्कू का कहना है कि सही तरीके से पानी पीना ही असली बचाव है. समय-समय पर ब्रेक लेना, तेज धूप से बचना और शरीर के संकेतों को नजरअंदाज न करना जरूरी है. &amp;nbsp;यह समझना जरूरी है कि शरीर को सिर्फ पानी नहीं, बल्कि संतुलित पोषण चाहिए. अगर हम इस छोटी सी बात को नजरअंदाज करते हैं, तो यह बड़ी समस्या में बदल सकती है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 12 May 2026 04:30:16 +0530</pubDate>
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        <title>Stroke Recovery: दोबारा स्ट्रोक पड़ने का खतरा 40 पर्सेंट तक हो जाएगा कम, आज ही रोजाना खाना शुरू कर दें यह दवा</title>
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        <description><![CDATA[ Risk Of Brain Stroke Due To High Blood Pressure: स्ट्रोक से बच जाना किसी भी मरीज के लिए बड़ी राहत की बात होती है, लेकिन असली चुनौती उसके बाद शुरू होती है. बहुत से लोग जो स्ट्रोक से उबर जाते हैं, उनमें दोबारा स्ट्रोक होने का खतरा बना रहता है. &amp;nbsp;खासतौर पर उन मरीजों में यह जोखिम ज्यादा होता है जिन्हें दिमाग में खून बहने वाला स्ट्रोक यानी इंट्रासेरेब्रल हेमरेज हुआ हो. चलिए आपको बताते हैं कि इसका कारण क्या है.&amp;nbsp;
क्यों होते हैं दोबारा स्ट्रोक?
इस तरह के स्ट्रोक का सबसे बड़ा कारण हाई ब्लड प्रेशर होता है. जब लंबे समय तक हाई बीपी ज्यादा रहता है, तो खून की नसों की दीवारें कमजोर पड़ने लगती हैं. धीरे-धीरे यह स्थिति इतनी गंभीर हो सकती है कि नस फट जाए और दिमाग में खून बहने लगे. इसलिए दोबारा स्ट्रोक से बचने का सबसे असरदार तरीका है ब्लड प्रेशर को कंट्रोल में रखना. हालांकि, यह काम उतना आसान नहीं होता जितना सुनने में लगता है. कई मरीजों को दिन में अलग-अलग समय पर कई तरह की दवाइयां लेनी पड़ती हैं. खासकर बुजुर्गों या दूसरी बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए यह रूटीन निभाना मुश्किल हो जाता है. कभी दवा छूट जाती है, तो कभी सही समय पर नहीं ली जाती, जिससे इलाज का असर कम हो जाता है.&amp;nbsp;
क्या निकला स्टडी में?
न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में पब्लिश रिपोर्ट के अनुसार, &amp;nbsp;इसी परेशानी को ध्यान में रखते हुए एक नई स्टडी की गई, जिसमें इलाज को आसान बनाने का तरीका खोजा गया. रिसर्चर ने एक ऐसी गोली पर काम किया जिसमें ब्लड प्रेशर की तीन आम दवाइयों को कम मात्रा में मिलाया गया है. इस गोली का नाम GMRx2 रखा गया है. यह स्टडी TRIDENT ट्रायल के तहत की गई, जिसमें अलग-अलग देशों के 1600 से ज्यादा मरीज शामिल हुए. &amp;nbsp;ये सभी मरीज पहले दिमाग में खून बहने वाले स्ट्रोक का सामना कर चुके थे और उनका ब्लड प्रेशर अभी भी सामान्य स्तर से ऊपर था.&amp;nbsp;
क्या निकला रिजल्ट?
मरीजों को दो समूहों में बांटा गया. एक समूह को यह नई कॉम्बिनेशन गोली दी गई, जबकि दूसरे समूह को सामान्य इलाज के साथ प्लेसीबो दिया गया. इसके बाद दोनों समूहों के परिणामों की तुलना की गई. नतीजे काफी चौंकाने वाले रहे. &amp;nbsp;जिन मरीजों ने यह कॉम्बिनेशन गोली ली, उनमें दोबारा स्ट्रोक का खतरा करीब 40 प्रतिशत तक कम हो गया. यह एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है, क्योंकि दोबारा स्ट्रोक अक्सर ज्यादा गंभीर साबित होता है.
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इन चीजों के लिए भी कारगर
इसके अलावा, इस गोली को लेने वाले मरीजों में ब्लड प्रेशर भी बेहतर तरीके से कंट्रोल में पाया गया. रिसर्चर का कहना है कि ब्लड प्रेशर में थोड़ा सा भी सुधार लंबे समय में बड़े फायदे दे सकता है. स्टडी में यह भी सामने आया कि इस गोली से दिल से जुड़ी गंभीर समस्याओं, जैसे हार्ट अटैक और दिल की बीमारी से होने वाली मौत का खतरा भी कम हुआ. यानी यह इलाज सिर्फ स्ट्रोक ही नहीं, बल्कि दिल की सेहत के लिए भी फायदेमंद हो सकता है.
हालांकि, अभी कुछ सीमाएं भी हैं. इस स्टडी को कुछ सालों तक ही फॉलो किया गया है, इसलिए लंबे समय के असर को समझना बाकी है. इसके साथ ही, यह इलाज हर मरीज के लिए उपयुक्त हो, ऐसा जरूरी नहीं है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 12 May 2026 04:30:15 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Coconut Water Benefits: क्या खाली पेट नारियल पानी पी सकते हैं, जान लें इसके चौंकाने वाले फायदे</title>
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        <description><![CDATA[ Coconut Water Benefits: गर्मियों के मौसम में नारियल पानी सबसे ज्यादा पसंद किए जाने वाले हेल्दी ड्रिंक्स में से एक माना जाता है. यह शरीर को तुरंत हाइड्रेट करने के साथ-साथ ठंडक भी पहुंच जाता है. यही वजह है कि फिटनेस और हेल्थ एक्सपर्ट्स भी सुबह खाली पेट नारियल पानी पीने की सलाह देते हैं. इसमें मौजूद पोटैशियम, मैग्निशियम, कैल्शियम, इलेक्ट्रोलाइट्स और एंटीऑक्सीडेंट्स शरीर को कई तरह से फायदा पहुंचा सकते हैं. हालांकि हर चीज की तरह इसका सेवन भी सही मात्रा और सही तरीके से करना जरूरी माना जाता है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि क्या खाली पेट नारियल पानी पी सकते हैं और इसके फायदे क्या-क्या होते हैं.&amp;nbsp;
शरीर को हाइड्रेट रखने में मददगार नारियल पानी
नारियल पानी को नेचुरल इलेक्ट्रोलाइट ड्रिंक कहा जाता है. इसमें मौजूद पोटैशियम, सोडियम और मैग्नीशियम शरीर में पानी का संतुलन बनाए रखने में मदद करता है. गर्मी, ज्यादा पसीना आने या वर्कआउट के बाद इसका सेवन कर शरीर को एनर्जी देने में मदद कर सकता है. रातभर की नींद के बाद सुबह खाली पेट इसे पीने से शरीर को जल्दी हाइड्रेशन मिलता है.&amp;nbsp;
पाचन को बेहतर बनाने में भी सहायक&amp;nbsp;
खाली पेट नारियल पानी पीने से पाचन प्रक्रिया बेहतर हो सकती है. इसमें मौजूद एंजाइम और फाइबर पेट को हल्का रखने में मदद करते हैं. नियमित सेवन से कब्ज, ब्लोटिंग और एसिडिटी जैसी समस्याओं से राहत मिल सकती है. कई हेल्थ एक्सपर्ट्स इसे नेचुरल डिटॉक्स ड्रिंक भी मानते हैं, क्योंकि यह शरीर से टॉक्सिन बाहर निकालने में मदद करता है.&amp;nbsp;
वजन घटाने में भी मिल सकती है मदद&amp;nbsp;
जो लोग वजन कम करना चाहते हैं, उनके लिए भी नारियल पानी फायदेमंद माना जाता है. इसमें कैलोरी काफी कम होती है और यह लंबे समय तक पेट भरा होने का एहसास दिला सकता है. इससे बार-बार भूख लगने और अनहेल्दी स्नैकिंग की आदत कम हो सकती है. साथ ही यह मेटाबॉलिज्म को बेहतर करने में भी मददगार माना जाता है.
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स्किन और बालों के लिए भी फायदेमंद&amp;nbsp;
नारियल पानी में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट और विटामिन स्किन को अंदर से हाइड्रेट रखने में मदद करते हैं. नियमित सेवन से स्किन में निखार आ सकता है और स्किन फ्रेश दिख सकती है. कई लोगों का मानना है कि इससे बालों की मजबूती और चमक बनाए रखने में भी मदद मिलती है.&amp;nbsp;
किन लोगों को नारियल पानी से बरतनी चाहिए सावधानी?
नारियल पानी काफी फायदेमंद माना जाता है, लेकिन हर व्यक्ति के लिए यह समान रूप से सही नहीं हो सकता है. जिन लोगों को लो-ब्लड प्रेशर की समस्या रहती हैं, उन्हें खाली पेट इसका सेवन करने से चक्कर या कमजोरी महसूस हो सकती है. क्योंकि यह ब्लड प्रेशर को कम करने में असर दिखा सकता है. डायबिटीज के मरीजों को भी सीमित मात्रा में ही नारियल पानी पीने की सलाह दी जाती है. इसमें नेचुरल शुगर होती है, इसलिए ज्यादा मात्रा में सेवन ब्लड शुगर लेवल को प्रभावित कर सकता है. वहीं किडनी से जुड़ी समस्या वाले लोगों को भी डॉक्टर की सलाह के बिना इसका ज्यादा सेवन नहीं करना चाहिए, क्योंकि इसमें पोटेशियम की मात्रा ज्यादा होती है. कुछ लोगों को खाली पेट नारियल पानी पीने से भी पेट में गड़बड़ी, गैस या हल्की दस्त हो सकती है. ऐसे में खाली पेट नारियल पानी पीने की शुरुआत कम मात्रा में करना बेहतर होता है.
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        <pubDate>Tue, 12 May 2026 04:30:14 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Eye Cancer Risk Factors: आंखों में रहता है दर्द या दिखाई देने लगा है धुंधला तो हल्के में न लें, हो सकता है EYE कैंसर</title>
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        <description><![CDATA[ Can Blurry Vision Be A Sign Of Eye Cancer: आंखों में लगातार दर्द रहना, धुंधला दिखाई देना या नजर कमजोर लगना कई लोग सामान्य थकान समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. लेकिन एक्सपर्ट्स मानते हैं कि कुछ मामलों में ये लक्षण आंखों के कैंसर यानी आई कैंसर का संकेत भी हो सकते हैं. हालांकि यह बीमारी बहुत आम नहीं है, लेकिन समय पर पहचान न होने पर यह आंखों की रोशनी ही नहीं, जान के लिए भी खतरा बन सकती है.&amp;nbsp;
क्या आंखों की रोशनी बचाई जा सकती है?
&amp;nbsp;आंखों के बारे में जानकारी देने वाली संस्था Centreforsight के अनुसार, आई कैंसर तब होता है जब आंख के अंदर मौजूद सेल्स अनकंट्रोल तरीके से बढ़ने लगती हैं. यह समस्या आंख के अलग-अलग हिस्सों जैसे रेटिना, आइरिस या यूविया में हो सकती है. रिसर्च बताती है कि अगर बीमारी शुरुआती चरण में पकड़ में आ जाए तो इलाज ज्यादा असरदार होता है और आंखों की रोशनी बचाने की संभावना भी बढ़ जाती है.&amp;nbsp;
कितने तरह के होते हैं आई कैंसर?
आई कैंसर के कई प्रकार होते हैं. इनमें इंट्राऑक्यूलर मेलानोमा वयस्कों में सबसे ज्यादा देखा जाता है. इसके लक्षणों में धुंधला दिखाई देना, आंख की पुतली पर काले धब्बे पड़ना या पुतली के आकार में बदलाव शामिल हो सकते हैं. वहीं रेटिनोब्लास्टोमा नाम का कैंसर छोटे बच्चों में ज्यादा पाया जाता है.&amp;nbsp;
क्या होते हैं इसके लक्षण?
एक्सपर्ट्स कहते हैं कि आंखों में होने वाले कुछ बदलावों को कभी हल्के में नहीं लेना चाहिए. अगर लगातार धुंधलापन महसूस हो, सीधी लाइनें टेढ़ी दिखने लगें, आंख की पुतली का आकार बदल जाए या देखने का दायरा कम होने लगे तो तुरंत जांच करवानी चाहिए. कई मामलों में आंख के आसपास सूजन, गांठ या लगातार लालिमा भी गंभीर संकेत हो सकते हैं.
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क्या आई कैंसर से आंखों में दर्द होता है?
खास बात यह है कि आई कैंसर शुरुआती स्टेज में हमेशा दर्द नहीं देता. यही वजह है कि कई लोग देर से डॉक्टर के पास पहुंचते हैं. एक्सपर्ट का मानना है कि नियमित आई चेकअप इस बीमारी को समय रहते पकड़ने का सबसे अच्छा तरीका है. खासकर उन लोगों को ज्यादा सावधान रहने की जरूरत होती है जिनकी आंखें हल्के रंग की हों या परिवार में कैंसर की हिस्ट्री रही हो. &amp;nbsp;रिसर्च में यह भी सामने आया है कि लंबे समय तक तेज अल्ट्रावायलेट किरणों के संपर्क में रहना, स्मोकिंग, ज्यादा शराब और हानिकारक केमिकल्स वाले वातावरण में काम करना आई कैंसर का खतरा बढ़ा सकते हैं. बढ़ती उम्र के साथ भी इसका जोखिम बढ़ने लगता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 12 May 2026 04:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>Summer Care Tips: खून सूखना&amp;जलन या सूजन... ज्यादा गर्मी से हमारे शरीर पर क्या पड़ता है असर, यह कितनी खतरनाक?</title>
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        <description><![CDATA[ Summer Care Tips: खून सूखना-जलन या सूजन... ज्यादा गर्मी से हमारे शरीर पर क्या पड़ता है असर, यह कितनी खतरनाक? ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 12 May 2026 04:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Summer, Care, Tips:, खून, सूखना-जलन, या, सूजन..., ज्यादा, गर्मी, से, हमारे, शरीर, पर, क्या, पड़ता, है, असर, यह, कितनी, खतरनाक</media:keywords>
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        <title>Bird Flu alert in Maharashtra: महाराष्ट्र में बर्ड फ्लू का खतरा, इंसानों तक कैसे पहुंच सकता है संक्रमण? जानें लक्षण और बचाव</title>
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        <description><![CDATA[ Bird Flu alert in Maharashtra : महाराष्ट्र के कुछ इलाकों में हाल ही में म बर्ड फ्लू (Avian Influenza) के मामलों की खबरों ने स्वास्थ्य अधिकारियों और आम लोगों में चिंता बढ़ा दी है. संक्रमित पक्षियों की पहचान होने के बाद राज्य में निगरानी और रोकथाम के उपाय बढ़ा दिए गए हैं. देश के अन्य राज्यों में भी पिछले कुछ महीनों में H5N1 वायरस के संक्रमण की पुष्टि होने के बाद हजारों प क्षियों को मार दिया गया. कई लोगों के लिए बर्ड फ्लू अभी भी एक दूर की बीमारी लगती है, जो सिर्फ मुर्गियों और पोल्ट्री फार्मों तक सीमित है, लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि असली चिंता तब है जब इंसान भी इससे संक्रमित पक्षियों या उनके आसपास के वातावरण के संपर्क में आते हैं.&amp;nbsp;
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, बर्ड फ्लू के वायरस मुख्य रूप से पक्षियों में फैलते हैं, लेकिन कुछ प्रकार जैसे H5N1 इंसानों में भी जा सकते हैं. हालांकि इस समय एक इंसान से दूसरे इंसान में संक्रमण का कोई बड़ा प्रमाण नहीं मिला है.विशेषज्ञों का कहना है कि अभी घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन चेतावनी को नजरअंदाज करना भी खतरनाक हो सकता है. तो आइए जानते हैं कि &amp;nbsp;बर्ड फ्लू का संक्रमण इंसानों तक कैसे पहुंच सकता है. इसके शुरुआती लक्षण और बचाव क्या है.&amp;nbsp;
बर्ड फ्लू का संक्रमण इंसानों तक कैसे पहुंच सकता है?
कई लोग सोचते हैं कि बर्ड फ्लू इंसानों में आसानी से फैल सकता है, लेकिन यह एक मिथक है. अब तक कोई प्रमाण नहीं मिला है कि H5N1 इंसानों के बीच लगातार फैल रहा है. विशेषज्ञों के अनुसार, बर्ड फ्लू या एवियन इन्फ्लूएंजा मुख्य रूप से मुर्गियों, बत्तख और अन्य पोल्ट्री में फैलने वाला वायरस है. H5N1 जैसे कुछ प्रकार इंसानों को संक्रमित कर सकते हैं. यह मुख्य रूप से संक्रमित पक्षियों के संपर्क में आने, संक्रमित सतहों को छूने या पक्षियों के मारे जाने के दौरान फैलता है. वायरस इंसान के शरीर में आंख, नाक या मुंह के रास्ते प्रवेश कर सकता है. पोल्ट्री फार्मों में मौजूद संक्रमित बूंदें या धूल के कण सांस के जरिए भी संक्रमण फैला सकते हैं.
क्यों विशेषज्ञ इस आउटब्रेक पर नजर बनाए हुए हैं?
बर्ड फ्लू नई बीमारी नहीं है, लेकिन चिंता इस वजह से बढ़ रही है कि H5N1 अब पक्षियों और कुछ जानवरों में तेजी से फैल रहा है. पिछले कुछ वर्षों में यह वायरस एशिया, यूरोप, अफ्रीका और अमेरिका में फैल चुका है. 2024 में अमेरिका में डेयरी गायों में भी बर्ड फ्लू पाया गया था और कुछ फार्म वर्कर्स संक्रमित हुए थे. वायरस लगातार बदलता रहता है. हर बार जब यह जानवरों में फैलता है, तो इसके जीन में बदलाव होने की संभावना बढ़ जाती है. इसका मतलब यह नहीं कि तुरंत महामारी आएगी, लेकिन यही वजह है कि सरकारें और स्वास्थ्य संगठन हर मामले को गंभीरता से ले रहे हैं. WHO के अनुसार वर्तमान में जनस्वास्थ्य का जोखिम कम है, लेकिन निगरानी और तेजी से पहचान बेहद जरूरी है.
यह भी पढ़ें - Vaginal Health Myths: वेजाइनल वॉश से लेकर डिस्चार्ज तक... पर्सनल हाइजीन को लेकर यहां दूर कर लें सारी कंफ्यूजन
बर्ड फ्लू के लक्षण
बर्ड फ्लू के शुरुआती लक्षण सामान्य वायरल संक्रमण जैसे दिखते हैं. जैसे बुखार,खांसी, गले में खराश, शरीर में दर्द, थकान, सांस लेने में दिक्कत. विशेषज्ञों का कहना है कि लक्षण कोविड-19 या सामान्य फ्लू जैसे लग सकते हैं. इसलिए अगर आपने पोल्ट्री या मृत पक्षियों के संपर्क में आने के बाद फ्लू जैसे लक्षण महसूस किए तो उन्हें नजरअंदाज न करें. गंभीर मामलों में बर्ड फ्लू तेजी से बढ़ सकता है और निमोनिया, सांस संबंधी परेशानी और अस्पताल में भर्ती की जरूरत पैदा कर सकता है. बिना जांच किए एंटीबायोटिक दवा लेना खतरनाक हो सकता है.&amp;nbsp;
बर्ड फ्लू के बचाव
1. चिकन और अंडे अच्छी तरह से पकाएं. WHO के अनुसार सही तरीके से पकाई गई पोल्ट्री से H5N1 वायरस नहीं फैलता है.&amp;nbsp;
2. मास्क पहनें, खासकर भीड़-भाड़ वाली जगहों पर, हाथों को नियमित रूप से धोएं और साफ रखें.&amp;nbsp;
3. पोल्ट्री फार्म में काम करते समय सतर्क रहें. पक्षियों को संभालते समय सुरक्षा उपकरण (ग्लव्स, मास्क) का इस्तेमाल करें.&amp;nbsp;
4. बुखार, खांसी या सांस लेने में दिक्कत जैसी कोई भी परेशानी महसूस होने पर देर न करें.
5. बीमार या मृत पक्षियों को न छुएं. असामान्य पक्षी मौत की सूचना तुरंत स्थानीय अधिकारियों को दें.&amp;nbsp;
6. कच्ची पोल्ट्री छूने के बाद हाथ धोएं, सोशल मीडिया पर बिना पुष्टि की अफवाहें फैलाने से बचें. &amp;nbsp;
यह भी पढ़ें - &amp;nbsp;Fitness Supplements Side Effects : फिटनेस सप्लीमेंट लेते हुए ये गलतियां तो नहीं करते आप, लिवर को हो सकता है नुकसान&amp;nbsp;Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 11 May 2026 00:30:18 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Bird, Flu, alert, Maharashtra:, महाराष्ट्र, में, बर्ड, फ्लू, का, खतरा, इंसानों, तक, कैसे, पहुंच, सकता, है, संक्रमण, जानें, लक्षण, और, बचाव</media:keywords>
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        <title>Kidney Care Tips: 40 के बाद क्यों बढ़ जाता है किडनी रोग का खतरा, कैसे रखें अपनी किडनी को हमेशा हेल्दी और मजबूत?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/kidney-care-tips-40-के-बाद-क्यों-बढ़-जाता-है-किडनी-रोग-का-खतरा-कैसे-रखें-अपनी-किडनी-को-हमेशा-हेल्दी-और-मजबूत</link>
        <guid>https://hindi.attentionindia.com/kidney-care-tips-40-के-बाद-क्यों-बढ़-जाता-है-किडनी-रोग-का-खतरा-कैसे-रखें-अपनी-किडनी-को-हमेशा-हेल्दी-और-मजबूत</guid>
        <description><![CDATA[ Kidney Care Tips:&amp;nbsp;उम्र बढ़ने के साथ शरीर धीरे-धीरे बदलने लगता है, लेकिन कई बार हम इन बदलावों को नजरअंदाज कर देते हैं. खासकर 40 की उम्र के बाद किडनी की सेहत पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत होती है. डॉक्टरों के मुताबिक, इस उम्र के बाद किडनी की काम करने की क्षमता धीरे-धीरे कम होने लगती है. ऐसे में परेशानी की बात यह है कि किडनी से जुड़ी बीमारियां शुरुआत में ज्यादा लक्षण नहीं दिखातीं, और जब तक यह समझ आती है, तब तक काफी नुकसान हो चुका होता है. यही वजह है कि विशेषज्ञ अब लोगों को 40 के बाद अपनी किडनी का खास ध्यान रखने की सलाह दे रहे हैं. &amp;nbsp;
एक स्टडी के अनुसार, क्रॉनिक किडनी डिजीज (CKD) समय से पहले मौत की तेजी से बढ़ती वजहों में से एक बन चुकी है. यह कोई बहुत कम लोगों में होने वाली बीमारी नहीं है, बल्कि अब तेजी से बढ़ रही समस्या है, जिस पर दुनियाभर के डॉक्टर चिंता जता रहे हैं.
क्यों बढ़ जाता है किडनी पर खतरा?
डॉक्टरों का कहना है कि बढ़ती उम्र के साथ ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और मोटापे जैसी समस्याएं बढ़ने लगती हैं, जो एक समय के बाद किडनी पर बुरा असर डालती हैं. इसके अलावा कम पानी पीना, ज्यादा नमक खाना, फास्ट फूड और दर्द की दवाइयों का ज्यादा इस्तेमाल भी किडनी को नुकसान पहुंचा सकता है. कई लोग बार-बार पेशाब रोकने की आदत भी रखते हैं, जिससे संक्रमण और दूसरी दिक्कतों का खतरा बढ़ जाता है. वही &amp;nbsp;विशेषज्ञ मानते हैं कि ये छोटी-छोटी आदतें धीरे-धीरे किडनी को कमजोर कर सकती हैं.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ेंः वेजाइनल वॉश से लेकर डिस्चार्ज तक... पर्सनल हाइजीन को लेकर यहां दूर कर लें सारी कंफ्यूजन
किन संकेतों को भूलकर भी नजरअंदाज न करें?
किडनी खराब होने के शुरुआती संकेत अक्सर बहुत सामान्य होते हैं. जैसे जल्दी थकान महसूस होना, पैरों या चेहरे पर सूजन आना, बार-बार पेशाब लगना या पेशाब के रंग में बदलाव होना. वही कई लोगों को रात में बार-बार पेशाब के लिए उठना पड़ता है, लेकिन वे इसे उम्र का असर मानकर नजरअंदाज कर देते हैं. डॉक्टरों के अनुसार, अगर शरीर लगातार ऐसे संकेत दे रहा हो तो तुरंत जांच करवानी चाहिए. साथ ही समय पर इलाज शुरू हो जाए तो बड़ी बीमारी से बचा जा सकता है.
किडनी को स्वस्थ रखने के लिए क्या करें?
विशेषज्ञों का कहना है कि किडनी को स्वस्थ रखने के लिए सबसे जरूरी है सही लाइफस्टाइल अपनाना. इसके लिए रोज पर्याप्त मात्रा में पानी पीना चाहिए ताकि शरीर से गंदगी बाहर निकलती रहे. खाने में नमक और ज्यादा प्रोसेस्ड फूड कम करना चाहिए. साथ ही रोज हल्की एक्सरसाइज या वॉक करने की आदत डालनी चाहिए. डॉक्टर यह भी सलाह देते हैं कि बिना जरूरत दर्द की दवाइयां बार-बार नहीं लेनी चाहिए, क्योंकि इससे किडनी पर बुरा असर पड़ सकता है.
समय पर जांच कराना है सबसे जरूरी
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक, 40 की उम्र पार करने के बाद साल में कम से कम एक बार किडनी की जांच जरूर करवानी चाहिए. खासकर जिन लोगों को डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर या परिवार में किडनी की बीमारी का इतिहास हो, उन्हें ज्यादा सावधान रहने की जरूरत है. वही &amp;nbsp;साधारण ब्लड और यूरिन टेस्ट से किडनी की स्थिति का पता लगाया जा सकता है. डॉक्टरों का कहना है कि अगर समय रहते ध्यान दिया जाए तो किडनी से जुड़ी कई गंभीर बीमारियों से बचा जा सकता है. छोटी-सी सावधानी भविष्य में बड़ी परेशानी से बचाने में मदद कर सकती है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Mon, 11 May 2026 00:30:17 +0530</pubDate>
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        <title>Vaccines After 18: 18 के बाद कहीं आप भी तो नहीं भूल गए ये जरूरी टीके? जानिए क्यों आज भी हैं बेहद जरूरी</title>
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        <description><![CDATA[ Vaccines After 18: 18 के बाद कहीं आप भी तो नहीं भूल गए ये जरूरी टीके? जानिए क्यों आज भी हैं बेहद जरूरी ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 10 May 2026 08:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>Delhi TB Screening: राजधानी में टीबी के खिलाफ बड़ी कार्रवाई, स्लम और हाई रिस्क इलाकों से सामने आए 12000 मरीज</title>
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        <description><![CDATA[ Delhi Detects 12000 TB Cases In Six Weeks: दिल्ली में टीबी के खिलाफ चलाए जा रहे बड़े अभियान के दौरान महज छह हफ्तों में 12 हजार से ज्यादा मरीजों की पहचान हुई है. स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के मुताबिक 24 मार्च से 4 मई के बीच चलाए गए &#039;टीबी मुक्त भारत अभियान 2.0&#039; के तहत राजधानी के स्लम इलाकों, भीड़भाड़ वाली बस्तियों और हाई रिस्क क्षेत्रों में बड़े स्तर पर स्क्रीनिंग की गई, जिससे हजारों ऐसे मरीज सामने आए जिनमें पहले टीबी की पहचान नहीं हो पाई थी. यह अभियान अभी भी जारी है.&amp;nbsp;
12 हजार मरीज मिले
दिल्ली में राष्ट्रीय टीबी मुक्त कार्यक्रम के तहत चल रहे इस अभियान में कुल 12 हजार से ज्यादा मरीजों की पुष्टि हुई. इनमें 1,323 बच्चे शामिल हैं, जबकि 10,755 वयस्क मरीज पाए गए. आंकड़ों के अनुसार 6,360 पुरुष, 5,715 महिलाएं और तीन ट्रांसजेंडर व्यक्ति टीबी संक्रमित मिले हैं.&amp;nbsp;
हेल्थ अधिकारियों का क्या है कहना?
राज्य स्वास्थ्य विभाग के एक सीनियर अधिकारी ने बताया कि दिल्ली की 24 चेस्ट क्लीनिकों में हर महीने औसतन करीब 6 हजार टीबी मरीज सामने आते हैं, लेकिन 24 मार्च से शुरू हुए 100 दिवसीय अभियान के बाद मरीजों की पहचान में तेजी आई है. अधिकारी के मुताबिक बड़े पैमाने पर पोर्टेबल एक्स-रे मशीनें लगाई गई हैं, जिसकी वजह से ज्यादा स्क्रीनिंग हो रही है और अधिक मरीजों की पहचान संभव हो पाई है.&amp;nbsp;
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, &amp;nbsp;एक अन्य वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि अब तक सबसे बड़ी चुनौती उन मरीजों की पहचान करना था जिनमें कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते थे. उन्होंने बताया कि इस विशेष अभियान का मकसद ऐसे लोगों को शुरुआती चरण में पकड़ना है, जो इंफेक्टेड तो हैं लेकिन अभी बीमारी के लक्षण सामने नहीं आए हैं. अधिकारी ने कहा कि जिन मरीजों की पहचान बाद में होनी थी, वे अब पहले ही सामने आ गए हैं.
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इन इलाकों पर फोकस
अभियान के दौरान खास तौर पर स्लम इलाकों, रैन बसेरों, जे.जे. कॉलोनियों, नशा मुक्ति केंद्रों, वृद्धाश्रमों और घनी आबादी वाले क्षेत्रों पर फोकस किया गया. 24 मार्च से 4 मई के बीच 984 आयुष्मान आरोग्य शिविर आयोजित किए गए, &amp;nbsp;हाई रिस्क वार्डों और इलाकों में 224 शिविर लगाए गए, जबकि जेलों, वृद्धाश्रमों और अन्य सामुदायिक स्थानों पर 79 विशेष शिविर आयोजित किए गए. जिसमें कुल 71,603 लोगों की स्क्रीनिंग की गई.&amp;nbsp;
जारी रहेगा अभियान
स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक अब इस अभियान को नियमित सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था का हिस्सा बना दिया गया है और 100 दिन का अभियान खत्म होने के बाद भी स्क्रीनिंग जारी रहेगी. अधिकारियों ने बताया कि हैंडहेल्ड एक्स-रे मशीनें इस अभियान की सबसे बड़ी ताकत बनकर सामने आई हैं. हालांकि टीबी की पुष्टि अब भी माइक्रोबायोलॉजिकल जांच से ही की जाती है, लेकिन पोर्टेबल एक्स-रे की मदद से संदिग्ध मरीजों को तेजी से चिन्हित किया जा रहा है. इसमें धूम्रपान करने वाले लोग, शराब पीने वाले, एचआईवी और डायबिटीज मरीज, जेलों और वृद्धाश्रमों में रहने वाले लोग, स्लम निवासी, भिखारी, निर्माण मजदूर, रिक्शा चालक और गिग वर्कर्स को प्राथमिकता के आधार पर स्क्रीनिंग में शामिल किया गया.
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        <pubDate>Sat, 09 May 2026 20:30:25 +0530</pubDate>
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        <title>Weight Loss Drugs Health Risk: GLP&amp;1 ड्रग्स से घट रहा वजन, लेकिन आंखों पर पड़ सकता है असर; विशेषज्ञों ने किया अलर्ट</title>
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        <description><![CDATA[ Weight Loss Drugs Health Risk: GLP-1 ड्रग्स से घट रहा वजन, लेकिन आंखों पर पड़ सकता है असर; विशेषज्ञों ने किया अलर्ट ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 09 May 2026 20:30:24 +0530</pubDate>
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        <title>जन्म के बाद नवजात में इस वजह से होने लगती है इंटर्नल ब्लीडिंग, Vitamin K इंजेक्शन से बच सकती है जान</title>
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        <pubDate>Sat, 09 May 2026 20:30:22 +0530</pubDate>
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        <title>Hantavirus Outbreak: क्या कोरोना की तरह फैलेगा हंतावायरस, जानिए WHO प्रमुख ने क्या दी चेतावनी?</title>
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        <description><![CDATA[ Can Hantavirus Spread Like Covid-19: दुनियाभर में इस समय हंतावायरस को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है. लोगों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह इंफेक्शन भी कोरोना की तरह फैल सकता है? क्या फिर से लॉकडाउन लग सकता है, मास्क पहनना जरूरी होगा और दुनिया एक नई महामारी की तरफ बढ़ रही है? इन तमाम सवालों पर विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी WHO ने स्थिति साफ कर दी है.&amp;nbsp;
&amp;nbsp;वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन की तरफ से जानकारी
गुरुवार शाम हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन की महामारी प्रबंधन निदेशक डॉ. मारिया वान केरखोव ने साफ कहा कि &quot;यह कोविड नहीं है और न ही फ्लू जैसा वायरस है. इसका फैलने का तरीका पूरी तरह अलग है.&quot; उन्होंने बताया कि अभी जहाज पर मौजूद किसी यात्री या क्रू में नए लक्षण नहीं मिले हैं. पहले भी एंडीज वायरस के मामलों में इंसान से इंसान में इंफेक्शन केवल बेहद करीबी संपर्क में ही देखा गया था.&amp;nbsp;
पहले भी देखे गए हैं मामले
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के अलर्ट एंड रिस्पॉन्स कोऑर्डिनेशन विभाग के निदेशक ने बताया कि साल 2018-19 में अर्जेंटीना में भी ऐसा ही मामला सामने आया था, जहां एक इंफेक्टेड व्यक्ति पब्लिक प्रोग्राम में शामिल हुआ और कई लोग इंफेक्टेड हो गए थे. उन्होंने कहा कि अभी भी स्थिति सीमित दायरे में है और अगर संपर्क में आए लोगों की पहचान और आइसोलेशन जैसे कदम ठीक से अपनाए जाएं तो इंफेक्शन को रोका जा सकता है. &amp;nbsp;
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डब्ल्यूएचओ के प्रमुख का बयान
डब्ल्यूएचओ प्रमुख &amp;nbsp;टेड्रोस अदनोम घेब्रेयसस ने बताया कि हंतावायरस चूहों और दूसरे कृंतकों से फैलने वाला वायरस है, जो इंसानों में गंभीर बीमारी पैदा कर सकता है. लोग आमतौर पर इंफेक्टेड चूहों के यूरिन, लार या मल के संपर्क में आने से इंफेक्टेड होते हैं. उन्होंने कहा कि इस मामले में एंडीज स्ट्रेन मिला है, जो लैटिन अमेरिका में पाया जाता है और इंसानों के बीच सीमित स्तर पर फैलने की क्षमता रखता है. उन्होंने बताया कि जहाज पर पहला मामला 6 अप्रैल को सामने आया था. एक व्यक्ति में लक्षण दिखे और 11 अप्रैल को उसकी मौत हो गई. शुरुआत में उसके सैंपल नहीं लिए गए क्योंकि लक्षण दूसरे सांस से जुड़े इंफेक्शन जैसे लग रहे थे. बाद में उसकी पत्नी भी इंफेक्टेड हुई और सेंट हेलेना से जोहान्सबर्ग जाते समय उसकी हालत बिगड़ गई. 26 अप्रैल को उसकी मौत हो गई. &amp;nbsp;वहीं कुछ और मरीजों का इलाज अलग-अलग देशों में चल रहा है.&amp;nbsp;
&amp;nbsp;

&amp;ldquo;Last Saturday, the United Kingdom notified @WHO under the International Health Regulations of a cluster of passengers with severe respiratory illness on a Dutch-flagged cruise ship, the MV Hondius, which had travelled from Argentina to Cabo Verde.So far, eight cases have been&amp;hellip;
&amp;mdash; World Health Organization (WHO) (@WHO) May 7, 2026



किन देशों में इस वायरस का असर?
फिलहाल जहाज पर करीब 150 यात्री और क्रू सदस्य मौजूद हैं, जो 23 देशों से जुड़े हैं. कई देशों ने निगरानी बढ़ा दी है. अर्जेंटीना, दक्षिण अफ्रीका, नीदरलैंड, जर्मनी, ब्रिटेन, सिंगापुर और अमेरिका समेत कई देशों में संपर्क में आए लोगों की जांच और निगरानी की जा रही है. &amp;nbsp;हालांकि अभी तक अधिकतर लोग बिना लक्षण के हैं. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन ने उन 12 देशों को जानकारी दी है, जिनके नागरिक सेंट हेलेना में जहाज से उतरे थे. इनमें ब्रिटेन, कनाडा, डेनमार्क, जर्मनी, नीदरलैंड, न्यूजीलैंड, सेंट किट्स एंड नेविस, सिंगापुर, स्वीडन, स्विट्जरलैंड, तुर्किये और अमेरिका के नागरिक शामिल हैं.
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        <pubDate>Sat, 09 May 2026 04:30:09 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Supplements Side Effects: रोज सप्लीमेंट्स खाने वाले तुरंत हो जाएं अलर्ट, डॉक्टर ने बताई नुकसान की पूरी सच्चाई</title>
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        <description><![CDATA[ Are Daily Supplements Really Necessary: आजकल सुबह उठते ही सप्लीमेंट्स की बोतल खोलना कई लोगों की रोज की आदत बन चुकी है. किसी को लगता है इससे शरीर की रोग इम्यून क्षमता बढ़ेगी, कोई ज्यादा एनर्जी के लिए विटामिन खा रहा है, तो कोई बेहतर सेहत की उम्मीद में हर दिन अलग-अलग कैप्सूल ले रहा है. सोशल मीडिया, जिम ट्रेनर और विज्ञापन भी यही भरोसा दिलाते हैं कि अच्छी सेहत का रास्ता सप्लीमेंट्स से होकर गुजरता है. लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि शरीर किसी गोदाम की तरह काम नहीं करता, जहां अतिरिक्त विटामिन जमा होते ही सेहत अपने आप बेहतर हो जाए.&amp;nbsp;
क्या कहते हैं एक्सपर्ट
दिल्ली के सीके बिरला अस्पताल में इंटरनल मेडिसिन एक्सपर्ट अमित प्रकाश सिंह ने &amp;nbsp;TOI को बताया कि लोग अक्सर यह मान लेते हैं कि अगर कोई विटामिन शरीर के लिए अच्छा है, तो उसकी ज्यादा मात्रा और भी ज्यादा फायदा देगी. जबकि हकीकत इससे अलग है. शरीर केवल उतनी ही मात्रा में पोषक तत्वों को इस्तेमाल करता है, जितनी उसे जरूरत होती है. अगर शरीर को पहले से पर्याप्त पोषण मिल रहा है, तो अतिरिक्त सप्लीमेंट्स कई बार बिना फायदा दिए शरीर से बाहर निकल जाते हैं.&amp;nbsp;
&amp;nbsp;ज्यादा सेवन कई बार नुकसानदायक
उन्होंने बताया कि कुछ विटामिन जैसे विटामिन सी पानी में घुल जाते हैं और शरीर से बाहर निकल जाते हैं, लेकिन विटामिन ए और डी जैसे तत्व शरीर में जमा हो सकते हैं. यही वजह है कि जरूरत से ज्यादा सेवन कई बार नुकसानदायक बन जाता है. अमेरिका की यूएस प्रिवेंटिव सर्विसेज टास्क फोर्स की एक बड़ी रिसर्च में भी यह साफ हुआ कि स्वस्थ लोगों में रोजाना विटामिन लेने से दिल की बीमारी या कैंसर से बचाव का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला.&amp;nbsp;
&amp;nbsp;शरीर के अंगों पर असर&amp;nbsp;
डॉक्टरों के मुताबिक सबसे बड़ी गलतफहमी यह है कि लोग नेचुरल चीजों को पूरी तरह सुरक्षित मान लेते हैं. जबकि कई हर्बल और नेचुरल सप्लीमेंट भी शरीर पर बुरा असर डाल सकते हैं. डॉ. कहते हैं कि जरूरत से ज्यादा विटामिन ए और डी शरीर में जमा होकर लिवर, किडनी और हड्डियों को नुकसान पहुंचा सकते हैं. बिना जरूरत आयरन की गोलियां लेने से पेट खराब हो सकता है और लंबे समय में शरीर के अंगों पर असर पड़ सकता है.
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विशेषज्ञों का कहना है कि असली भोजन का मुकाबला कोई सप्लीमेंट नहीं कर सकता. फल, सब्जियां, दालें, मेवे और साबुत अनाज सिर्फ विटामिन ही नहीं देते, बल्कि फाइबर, एंटीऑक्सीडेंट और कई जरूरी पोषक तत्व भी साथ लाते हैं. यही वजह है कि डॉक्टर अक्सर सप्लीमेंट्स से पहले खानपान सुधारने की सलाह देते हैं. एक संतरा सिर्फ विटामिन सी नहीं देता, बल्कि शरीर को पानी, फाइबर और दूसरे जरूरी तत्व भी पहुंचाता है.&amp;nbsp;
क्या नहीं लेना चाहिए सप्लीमेंट
हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि सप्लीमेंट्स बेकार हैं. कुछ परिस्थितियों में ये बेहद जरूरी साबित होते हैं. जैसे विटामिन डी की कमी, खून की कमी, गर्भावस्था के दौरान फोलिक एसिड या ऐसे मरीज जिनके शरीर में पोषक तत्व सही तरह एब्जार्व नहीं हो पाते. लेकिन ऐसी स्थिति में भी सही मात्रा और डॉक्टर की निगरानी जरूरी मानी जाती है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 09 May 2026 04:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>World Ovarian Cancer Day: क्या आपको भी रहती है पेट फूलने की दिक्कत? इसे हल्के में न लें, वरना हो जाएगा यह कैंसर</title>
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        <description><![CDATA[ World Ovarian Cancer Day: हममें से कई महिलाएं अक्सर सुबह उठते ही पेट में भारीपन या सूजन महसूस करती हैं. जीन्स थोड़ी टाइट लगने लगती है और मन में पहला ख्याल आता है कि शायद कल ज्यादा नमक खा लिया होगा या आज बस पेट ठीक नहीं है. कुछ लोग इसे गैस, अपच या तनाव समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. पानी ज्यादा पी लेते हैं, हल्का खाना खाते हैं, या थोड़ा टहल लेते हैं, लेकिन जब यही समस्या बार-बार होने लगे और हफ्तों तक ठीक न हो, तो इसे नजरअंदाज करना खतरे से खाली नहीं है. डॉक्टरों के अनुसार, लगातार बना रहने वाला पेट फूलना कभी-कभी अंडाशय (Ovary) के कैंसर का शुरुआती संकेत हो सकता है, जिसे महिलाएं अक्सर साधारण पाचन समस्या समझ लेती हैं.
ऐसे में हर साल 8 मई को विश्व ओवेरियन कैंसर डे (World Ovarian Cancer Day) मनाया जाता है. इस दिन का उद्देश्य महिलाओं में होने वाले अंडाशय (Ovary) के कैंसर के बारे में जागरूकता बढ़ाना है. यह कैंसर अक्सर शुरुआत में साफ लक्षण नहीं दिखाता, इसलिए इसे देर से पहचाना जाता है. तो आइए आज जानते हैं कि कैसे पेट फूलने की दिक्कत कैंसर का शुरुआती संकेत हो सकता है.&amp;nbsp;
ओवरी कैंसर कब संकेत देता है?
विशेषज्ञ बताते हैं कि ओवरी कैंसर कोई ऐसा रोग नहीं है जो अचानक तेज लक्षणों के साथ सामने आए. यह धीरे-धीरे शरीर में संकेत देता है और अक्सर सामान्य समस्याओं जैसा ही लगता है. डॉक्टरों के अनुसार, यही कारण है कि इसे अक्सर साइलेंट डिजीज कहा जाता है. कई महिलाएं इसे समझ ही नहीं पातीं और सोचती हैं कि यह हार्मोन बदलाव, तनाव या पेट की गड़बड़ी है.&amp;nbsp;
लगातार पेट फूलना क्यों है गंभीर संकेत?
अगर पेट फूलने की समस्या &amp;nbsp;कई दिनों या हफ्तों तक लगातार बनी रहे. किसी दवा या घरेलू उपाय से ठीक न हो, बार-बार दोहराए तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए. डॉक्टर बताते हैं कि ओवरी कैंसर से जुड़ा पेट फूलना आम गैस या अपच जैसा नहीं होता है. यह लगातार बना रहता है और कम नहीं होता है. कई महिलाएं महसूस करती हैं कि पेट हमेशा भरा-भरा लगता है. बिना ज्यादा खाए ही पेट भर जाता है. कपड़े टाइट होने लगते हैं. शरीर फूला हुआ सा लगता है.&amp;nbsp;
कैसे पेट फूलने की दिक्कत कैंसर का शुरुआती संकेत हो सकता है?
ओवरी कैंसर अक्सर सिर्फ एक लक्षण से नहीं पहचान में आता है. इसके साथ कई छोटे-छोटे संकेत भी दिखाई दे सकते हैं. जैसे हल्का या लगातार दर्द महसूस हो सकता है. थोड़ा सा खाने पर ही भूख खत्म हो जाना. अचानक खाने की इच्छा कम हो जाना. बिना वजह बार-बार यूरिन जाना. पूरी नींद के बाद भी शरीर में कमजोरी और थकावट रहना. बिना कारण वजन कम या बढ़ जाना, डॉक्टरों का कहना है कि अगर ये लक्षण 2 हफ्ते से ज्यादा बने रहें, तो कैंसर का शुरुआती संकेत हो सकता है. ऐसे में जांच जरूर करानी चाहिए.&amp;nbsp;
&amp;nbsp;किन महिलाओं को ज्यादा सावधान रहना चाहिए?
हर महिला को यह बीमारी हो सकती है, लेकिन कुछ लोगों में खतरा ज्यादा होता है. जैसे 50 साल से ज्यादा उम्र की महिलाएं, परिवार में ओवरी या ब्रेस्ट कैंसर का इतिहास, BRCA1 या BRCA2 जैसे जीन म्यूटेशन, एंडोमेट्रियोसिस की समस्या, मोटापा या खराब लाइफस्टाइल.&amp;nbsp;
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जल्दी पहचान क्यों है जरूरी?
डॉक्टरों का कहना है कि अगर ओवरी कैंसर शुरुआती स्टेज में पकड़ में आ जाए, तो इलाज के सफल होने की संभावना काफी बढ़ जाती है. आजकल कई आधुनिक इलाज उपलब्ध हैं, जैसे सर्जरी के नए तरीके, कीमोथेरेपी, टारगेटेड थेरेपी, लेकिन ये सभी तभी ज्यादा असरदार होते हैं जब बीमारी जल्दी पकड़ में आए.&amp;nbsp;
बचाव के लिए क्या करें?
ओवेरियन कैंसर से बचाव के लिए महिलाओं को नियमित रूप से गाइनेकोलॉजिकल जांच करवानी चाहिए. स्वस्थ वजन बनाए रखना भी जरूरी है, क्योंकि मोटापा कई तरह की बीमारियों का खतरा बढ़ा सकता है. रोजाना हरी सब्जियां और फल खाने से शरीर को जरूरी पोषण मिलता है और इम्यून सिस्टम मजबूत रहता है. नियमित एक्सरसाइज करने से शरीर सक्रिय रहता है और हार्मोन संतुलन बेहतर होता है. इसके साथ ही धूम्रपान और शराब से दूरी बनाना चाहिए. अपनी परिवार की मेडिकल हिस्ट्री के बारे में जानकारी रखें, जिससे अगर किसी तरह का जोखिम हो तो समय रहते सावधानी और जांच की जा सके.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 09 May 2026 04:30:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Does Rice Cause Weight Gain: क्या चावल खाने से सच में बढ़ता है मोटापा, जानिए क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?</title>
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        <description><![CDATA[ Does Eating Rice Every Day Cause Weight Gain: भारत में चावल करोड़ों लोगों की थाली का अहम हिस्सा है. लेकिन जब भी वजन बढ़ने या मोटापे की बात होती है, तो सबसे पहले लोग चावल को दोष देने लगते हैं. कई लोग डाइट शुरू करते ही चावल खाना बंद कर देते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे तेजी से मोटापा बढ़ता है. हालांकि एक्सपर्ट का कहना है कि सिर्फ चावल खाने से वजन नहीं बढ़ता, बल्कि यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस तरह का चावल, कितनी मात्रा में और किस तरीके से खा रहे हैं.&amp;nbsp;
क्या सच में वजन बढ़ता है?
हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली बेवसाइट healthline के मुताबिक भूरा और जंगली चावल साबुत अनाज की कैटेगरी में आते हैं. इनमें रेशा, विटामिन और खनिज भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं. यही वजह है कि इन्हें सेहत के लिए ज्यादा फायदेमंद माना जाता है. दूसरी ओर सफेद चावल को साफ करने की प्रक्रिया में उसका ऊपरी हिस्सा और कई जरूरी पोषक तत्व निकल जाते हैं, जिससे उसमें रेशे की मात्रा काफी कम हो जाती है.
अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के अनुसार साबुत अनाज वाले चावल पाचन को बेहतर बनाने में मदद करते हैं और लंबे समय तक पेट भरा हुआ महसूस कराते हैं. इससे बार-बार भूख नहीं लगती और कुल भोजन की मात्रा कम हो सकती है, जो वजन कंट्रोल रखने में मददगार माना जाता है.
क्या कहती है रिसर्च?
रिसर्च में यह भी पाया गया कि जो लोग साबुत अनाज ज्यादा खाते हैं, उनमें मोटापा और वजन बढ़ने का खतरा अपेक्षाकृत कम देखा गया. ऐसे लोगों में दिल की बीमारी और डायबिटीज का खतरा भी कम पाया गया. वहीं सफेद चावल में पोषक तत्व कम होने के कारण इसे अक्सर खाली ऊर्जा देने वाला भोजन माना जाता है. हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि सफेद चावल सीधे शरीर को नुकसान पहुंचाता है.&amp;nbsp;
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सफेद चावल&amp;nbsp;
एक्सपर्ट बताते हैं कि सफेद चावल में स्टार्च और शर्करा की मात्रा ज्यादा होती है. यही कारण है कि इसे खाने के बाद कई बार रक्त में शर्करा तेजी से बढ़ सकती है. अगर कोई व्यक्ति बहुत ज्यादा मात्रा में सफेद चावल खाता है और फिजिकल &amp;nbsp;करता है, तो वजन बढ़ने की संभावना बढ़ सकती है. हालांकि हर प्रकार का चावल एक जैसा असर नहीं दिखाता. कुछ चावल जल्दी पच जाते हैं, जबकि कुछ धीरे-धीरे एनर्जी देते हैं. धीरे पचने वाले चावल लंबे समय तक पेट भरा रखने में मदद कर सकते हैं. यही वजह है कि एक्सपर्ट संतुलित मात्रा में चावल खाने की सलाह देते हैं, न कि पूरी तरह छोड़ने की.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 08 May 2026 16:30:11 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>किन देशों के लोगों में थैलसीमिया होने का खतरा ज्यादा, जानें क्या है इसकी वजह?</title>
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        <description><![CDATA[ किन देशों के लोगों में थैलसीमिया होने का खतरा ज्यादा, जानें क्या है इसकी वजह? ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 08 May 2026 16:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>Office Dehydration: ऑफिस की चाय&amp;कॉफी और AC की हवा आपको कर रही बीमार, बढ़ रहा किडनी खराब होने का खतरा</title>
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        <description><![CDATA[ Why Office Workers Get Dehydrated In AC Rooms: पहली नजर में यही लगता है कि तेज धूप में काम करने वाले लोग ही सबसे ज्यादा डिहाइड्रेशन का शिकार होते होंगे. लेकिन असल तस्वीर कुछ अलग है. कई बार पूरे दिन एसी में बैठे ऑफिस जाने वाले लोग दिन के अंत तक ज्यादा डिहाइड्रेटेड मिलते हैं, बस फर्क इतना है कि यह समस्या धीरे-धीरे और चुपचाप बढ़ती है. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर एक्सपर्ट क्या कहते हैं.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
केयर हॉस्पिटल्स, हैदराबाद के नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. पी. विक्रांत रेड्डी ने TOI को बताया कि यह अब उनके लिए नई बात नहीं रही. उनके अनुसार, ऐसा लगता है कि बाहर काम करने वाले लोग ज्यादा डिहाइड्रेट होंगे, लेकिन व्यवहार में अक्सर ऑफिस में बैठे लोग ही कम पानी पीते हैं.&quot; इसकी वजह आलस नहीं, बल्कि हमारा काम करने का तरीका और माहौल है.
एयर कंडीशनर का क्या होता है असर?
एयर कंडीशनर में बैठने से शरीर के संकेत कमजोर पड़ जाते हैं. आमतौर पर प्यास हमें पानी पीने का संकेत देती है, लेकिन जब न पसीना आता है, न गर्मी लगती है, तो यह संकेत धीरे-धीरे नजरअंदाज हो जाता है. ऐसे में घंटों निकल जाते हैं और हमें एहसास भी नहीं होता कि शरीर पानी खो रहा है. डॉ. रेड्डी बताते हैं कि ठंडी हवा आराम जरूर देती है, लेकिन वह सूखापन भी बढ़ाती है. शरीर त्वचा और सांस के जरिए लगातार पानी खोता रहता है, बस यह नजर नहीं आता. यही कारण है कि एसी में बैठने वाले लोग बिना महसूस किए डिहाइड्रेशन की तरफ बढ़ जाते हैं.
चाय और कॉफी भी नुकसानदायक
ऑफिस में चाय और कॉफी का चलन भी इस समस्या को बढ़ाता है. दिनभर लोग कई कप चाय या कॉफी पीते रहते हैं और मान लेते हैं कि उन्होंने पर्याप्त तरल ले लिया है. लेकिन हकीकत यह है कि ये ड्रिंक्स पानी की जगह ले लेती हैं, उसे बढ़ाती नहीं हैं. डॉ. रेड्डी के मुताबिक, लोगों को लगता है कि वे दिनभर कुछ न कुछ पीते रहे हैं, लेकिन असल में उनका शरीर उतना हाइड्रेट नहीं होता जितना होना चाहिए. यही वजह है कि दिन के अंत तक थकान और भारीपन महसूस होता है.
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क्या होते हैं इसके लक्षण?
डिहाइड्रेशन के लक्षण भी बहुत सामान्य लगते हैं कि जैसे हल्का सिरदर्द, ध्यान में कमी या शाम तक थकावट. लोग इन्हें काम का दबाव या नींद की कमी समझ लेते हैं, जबकि कई बार असली कारण पानी की कमी होता है. लंबे समय तक बैठे रहने से यह समस्या और बढ़ जाती है. जब हम घंटों एक जगह बैठकर काम करते हैं, तो शरीर के संकेतों पर ध्यान ही नहीं जाता. न उठने का मौका मिलता है, न पानी पीने का ध्यान आता है.
क्या हो सकती है दिक्कत?
डॉक्टर चेतावनी देते हैं कि अगर लंबे समय तक पानी की कमी बनी रहे, तो इससे किडनी स्टोन या यूरिन इंफेक्शन का खतरा बढ़ सकता है. ये असर तुरंत नहीं दिखते, लेकिन धीरे-धीरे गंभीर हो सकते हैं. अच्छी बात यह है कि इसका समाधान बहुत मुश्किल नहीं है. बस दिनभर थोड़ा-थोड़ा पानी पीने की आदत डालनी होगी, चाय-कॉफी पर निर्भरता कम करनी होगी और बीच-बीच में उठकर ब्रेक लेना होगा.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 08 May 2026 00:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>20 मई को बंद रहेंगी दवा की दुकानें! ऑनलाइन फॉर्मेसी के खिलाफ 12 लाख केमिस्टों का &amp;apos;भारत बंद&amp;apos;</title>
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        <description><![CDATA[ अगर आप या आपके परिवार का कोई भी सदस्य नियमित रूप से किसी बीमारी की दवा लेता है तो यह खबर आपके लिए बेहद अहम है. दरअसल, 20 मई 2026 (बुधवार) को देशभर में दवाइयों की किल्लत हो सकती है, क्योंकि ऑल इंडिया ऑर्गनाइजेशन ऑफ केमिस्ट्स एंड ड्रगिस्ट्स (AIOCD) के नेतृत्व में देश भर के 12.40 लाख से भी ज्यादा केमिस्ट &#039;भारत बंद&#039; की तैयारी कर रहे हैं. ऐसे में देश के ज्यादातर शहरों, कस्बों और गांवों में दवा की दुकानें पूरी तरह से बंद रहने की आशंका है.&amp;nbsp;
हड़ताल पर क्यों जा रहे हैं केमिस्ट?
दवा विक्रेताओं के इस बड़े विरोध प्रदर्शन की मुख्य वजह इंटरनेट पर बिकने वाली दवाएं यानी &#039;ई-फार्मेसी&#039; और बड़ी कॉरपोरेट कंपनियों द्वारा दिया जाने वाला भारी डिस्काउंट है. केमिस्टों का साफ तौर पर कहना है कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर दवाओं की बिक्री बिना किसी सख्त नियम-कानून के हो रही है. इससे उनके व्यापार पर तो ताला लगने की नौबत आ ही गई है, लेकिन यह मरीजों की जान के लिए भी बड़ा खतरा बनता जा रहा है.
केमिस्टों ने बताईं अपनी 3 सबसे बड़ी चिंताएं
बिना सही जांच के मिल रहीं दवाएं: केमिस्टों का सबसे बड़ा आरोप यह है कि ऑनलाइन वेबसाइट्स और ऐप्स पर बिना किसी डॉक्टर की सही पर्ची के धड़ल्ले से दवाएं बेची जा रही हैं. इंटरनेट पर लोग एक ही पर्चे को बार-बार अपलोड करके दवाएं मंगा रहे हैं. कई मामलों में तो फर्जी पर्चों के जरिए नशीली दवाएं और हैवी एंटीबायोटिक्स आसानी से घर पहुंच रही हैं. इससे आम लोगों की सेहत को नुकसान पहुंच रहा है.
बड़ी कंपनियों की भारी छूट से छोटे दुकानदार बर्बाद: बड़े कॉरपोरेट घराने ऑनलाइन प्लेटफार्म्स पर दवाइयों पर इतनी भारी छूट दे रहे हैं कि उनके सामने मोहल्ले, गांव-कस्बों और छोटे शहरों के साधारण केमिस्ट टिक ही नहीं पा रहे हैं. लगातार हो रहे भारी घाटे की वजह से छोटे दुकानदारों का व्यापार ठप होने लगा है और दुकानें बंद हो रही हैं.
कोरोना काल के ढीले नियमों का गलत इस्तेमाल: कोरोना महामारी (Covid-19) के दौरान जब घर से निकलना मुश्किल था, तब सरकार ने दवाओं की बिक्री से जुड़े कुछ नियमों में अस्थायी तौर पर ढील दी थी. केमिस्टों का कहना है कि महामारी खत्म होने के बाद भी वे नियम आज तक लागू हैं और ई-फार्मेसी कंपनियां इसका जमकर गलत फायदा उठा रही हैं.
क्या हैं संगठन की मुख्य मांगें?

कोरोना काल में जारी किए गए अस्थायी नियम (G.S.R. 220(E)) को तुरंत प्रभाव से रद्द किया जाए.
ऑनलाइन फॉर्मेसी को छूट देने वाली अधिसूचना (G.S.R. 817(E)) को पूरी तरह वापस लिया जाए.
बड़ी कंपनियों द्वारा बाजार के नियम तोड़कर दी जाने वाली भारी छूट पर पाबंदी लगे.

मरीजों की जान और 5 करोड़ लोगों के रोजगार का सवाल
AIOCD के अध्यक्ष जे. एस. शिंदे और महासचिव राजीव सिंघल ने चेतावनी दी है कि यह लड़ाई सिर्फ केमिस्टों का धंधा बचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर मरीजों की सुरक्षा से जुड़ा हुआ गंभीर मामला है. इन अवैध ई-फॉर्मेसी और भारी छूट के कारण दवा व्यापार से जुड़े करीब 5 करोड़ लोगों की रोजी-रोटी पर बड़ा संकट आ गया है. संगठन ने अल्टीमेटम दिया है कि अगर 20 मई तक उनकी समस्याओं पर ध्यान देकर कोई ठोस समाधान नहीं निकाला गया तो यह हड़ताल सिर्फ एक दिन की नहीं रहेगी. इसके बाद देशभर के केमिस्ट लंबे समय तक आंदोलन करने को मजबूर होंगे, जिससे पूरे देश की स्वास्थ्य व्यवस्था प्रभावित हो सकती है.
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        <pubDate>Thu, 07 May 2026 08:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>Healthy foods for Bones: आपकी हड्डियों को मजबूत कर देंगे ये देसी फूड, 40 के बाद भी बोल्ट की तरह दौड़ेंगे आप</title>
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        <pubDate>Thu, 07 May 2026 08:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>Watermelon Health Tips: क्या आप भी गलत तरीके से खा रहे तरबूज? रात में भूलकर भी न करें ये काम, जानें इसे खाने का सही समय</title>
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        <pubDate>Wed, 06 May 2026 20:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>White Fat Vs Brown Fat: क्या हर तरह का फैट होता है बुरा? जानें मोटापा और बीमारियों का असली कनेक्शन</title>
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        <description><![CDATA[ Difference Between White Fat And Brown Fat: जब भी हम शरीर में जमा फैट की बात करते हैं, तो अक्सर उसे सिर्फ अच्छा या बुरा मान लेते हैं. लेकिन सच्चाई इससे कहीं ज्यादा जटिल है. फैट सिर्फ वजन बढ़ाने वाला तत्व नहीं, बल्कि शरीर के अंदर एक एक्टिव सिस्टम की तरह काम करता है, जो हमारी सेहत को गहराई से प्रभावित करता है. हाल के वर्षों में हुई रिसर्च ने यह साफ कर दिया है कि सिर्फ फैट की मात्रा नहीं, बल्कि यह शरीर में कहां जमा हो रहा है, यही असली फर्क पैदा करता है.
क्या निकला रिसर्च में?
यूनिवर्सिटी ऑफ ग्लासगो की एक स्टडी में यह सामने आया कि एक ही तरह की डाइट लेने के बावजूद अलग-अलग लोगों में फैट अलग तरीके से जमा होता है. यूरोपियन लोगों में यह फैट ज्यादा तर त्वचा के नीचे जमा होता है, जबकि दक्षिण एशियाई लोगों खासकर भारतीयों में यह फैट शरीर के अंदर अंगों के आसपास जमा होता है, जिसे विसरल फैट कहा जाता है. यही वजह है कि भारतीयों में डायबिटीज और दिल की बीमारियां जल्दी देखने को मिलती हैं.&amp;nbsp;
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
&amp;nbsp;न्यूट्रिशनिस्ट रयान फर्नांडो ने बताया कि फैट एक एंडोक्राइन ऑर्गन की तरह काम करता है, जो हार्मोन बनाता है और मेटाबॉलिज्म को प्रभावित करता है. इसलिए एक जैसे वजन वाले दो लोगों की सेहत एक जैसी नहीं होती. वहीं, डॉ. वी मोहन के अनुसार, भारतीयों में त्वचा के नीचे फैट स्टोर करने की क्षमता कम होती है, जिससे अतिरिक्त फैट सीधे शरीर के अंदर जमा होने लगता है.&amp;nbsp;
व्हाइट और ब्राउन फैट में अंतर
फैट के भी अलग-अलग प्रकार होते हैं व्हाइट फैट और ब्राउन फैट. व्हाइट फैट वही होता है, जो शरीर में जमा होकर मोटापा बढ़ाता है और बीमारियों का कारण बनता है. दूसरी तरफ ब्राउन फैट शरीर के लिए फायदेमंद होता है. यह कैलोरी जलाने में मदद करता है, ब्लड शुगर कंट्रोल करता है और दिल की सेहत को बेहतर बनाता है. डॉ. मोहन बताते हैं कि ज्यादा व्हाइट फैट शरीर में सूजन बढ़ाता है और इससे डायबिटीज, हार्ट डिजीज और कुछ कैंसर का खतरा बढ़ सकता है. वहीं ब्राउन फैट शरीर में अच्छे हार्मोन जैसे एडिपोनेक्टिन को बढ़ाता है, जो मेटाबॉलिज्म के लिए फायदेमंद होता है.&amp;nbsp;
साइंटिस्ट इसपर कर रहे हैं काम
वैज्ञानिक अब इस बात पर भी काम कर रहे हैं कि कैसे व्हाइट फैट को ब्राउन फैट में बदला जा सके. हालांकि, यह प्रक्रिया अभी पूरी तरह इंसानों में साबित नहीं हुई है, लेकिन इस दिशा में रिसर्च जारी है. कीट यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर नरेश बाल बताते हैं कि कुछ नेचुरल तत्व जैसे काली मिर्च और मिर्च में पाए जाने वाले कंपाउंड ब्राउन फैट को सक्रिय करने में मदद कर सकते हैं.
डॉ. नटराजन गणेशन के अनुसार शरीर फैट को यूं ही नहीं जलाता, बल्कि फैट की क्वालिटी भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है जितनी मात्रा. &amp;nbsp;यानी हेल्दी फैट जैसे नट्स और ऑलिव ऑयल शरीर के लिए ज्यादा फायदेमंद होते हैं.
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लाइफस्टाइल की अहम भूमिका
इसके अलावा, हमारी लाइफस्टाइल भी बड़ी भूमिका निभाती है. ज्यादा प्रोसेस्ड फूड, चीनी और कम एक्टिव लाइफस्टाइल शरीर में व्हाइट फैट बढ़ाते हैं. वहीं पारंपरिक भारतीय आहार, जिसमें हल्दी, अदरक, हरी चाय और मसाले शामिल होते हैं ब्राउन फैट को सक्रिय करने में मदद कर सकते हैं.

भारत में क्या है इसका असर
भारत में इसके असर अब साफ दिखाई देने लगे हैं. यूनिसेफ की चाइल्ड न्यूट्रिशन रिपोर्ट 2025 के अनुसार, 2030 तक भारत में 2.7 करोड़ से अधिक बच्चे और किशोर मोटापे का शिकार हो सकते हैं, जो वैश्विक बोझ का लगभग 11 प्रतिशत होगा. वहीं, नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि पिछले कुछ दशकों में एडल्ट में मोटापा तेजी से बढ़ा है, महिलाओं में करीब 91 प्रतिशत और पुरुषों में 146 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 06 May 2026 20:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Women Health Summer: क्या गर्मी से बिगड़ रहे हैं पीरियड्स? डॉक्टर से जानें क्या है इसका सच</title>
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        <description><![CDATA[ Impact Of High Temperature On Hormones In Women: गर्मियों का मौसम सिर्फ पसीना और थकान ही नहीं लाता, बल्कि कई महिलाओं के लिए शरीर की अंदरूनी लय को भी बदल देता है. आमतौर पर मासिक धर्म को एक नियमित और तय चक्र माना जाता है, लेकिन तेज गर्मी के दौरान यह संतुलन बिगड़ सकता है. कभी पीरियड्स जल्दी आ जाते हैं, कभी देर से, तो कभी फ्लो सामान्य से अलग महसूस होता है. यह कोई संयोग नहीं है, बल्कि शरीर की नेचुरल प्रतिक्रिया है, जो तापमान, पानी की कमी और तनाव के असर से जुड़ी होती है.&amp;nbsp;
क्या कहते हैं एक्सपर्ट
डॉ. श्रुति कोटांगले, कंसल्टेंट गायनेकोलॉजिस्ट ने TOI को बताया कि गर्मी का असर सिर्फ सांस या यूरिन से जुड़ी समस्याओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह पीरियड को भी प्रभावित कर सकता है. शरीर में पानी की कमी और बढ़ता तापमान हार्मोनल बदलाव ला सकता है. दरअसल, जब तापमान बढ़ता है तो शरीर खुद को ठंडा रखने के लिए ज्यादा मेहनत करता है. इस प्रक्रिया में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन जैसे हार्मोन प्रभावित हो सकते हैं, जो पीरियड्स को नियंत्रित करते हैं.&amp;nbsp;
फ्लो में भी बदलाव
गर्मी के दिनों में कई महिलाओं को फ्लो में बदलाव महसूस होता है. किसी महीने ब्लीडिंग ज्यादा हो सकती है, तो कभी बहुत हल्की. इसका कारण शरीर में पानी की कमी और ब्लड सर्कुलेशन में बदलाव होता है. डिहाइड्रेशन के कारण खून गाढ़ा हो सकता है, जबकि हीट स्ट्रेस गर्भाशय के संकुचन को प्रभावित करता है. डॉ. कोटांगले कहती हैं कि हर महिला में इसका असर अलग होता है, इसलिए फ्लो में बदलाव सामान्य है.&amp;nbsp;
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पानी की कमी और डिप्रेशन
पानी की कमी और तनाव भी इस पूरी प्रक्रिया में बड़ी भूमिका निभाते हैं. गर्मियों में शरीर जल्दी डिहाइड्रेट होता है, जिससे क्रैम्प्स बढ़ सकती है.ल &amp;nbsp;इसके साथ ही, गर्मी के कारण कॉर्टिसोल यानी स्ट्रेस हार्मोन भी बढ़ जाता है, जो मूड स्विंग्स, थकान और चिड़चिड़ापन बढ़ा सकता है. यही वजह है कि इस मौसम में कई महिलाओं को पीरियड्स के दौरान ज्यादा थकावट और भावनात्मक उतार-चढ़ाव महसूस होता है.
नींद का भी असर
गर्मी का असर नींद पर भी पड़ता है. नींद ठीक न हो तो हार्मोनल संतुलन और बिगड़ जाता है. यह एक चक्र की तरह काम करता है कि गर्मी नींद को प्रभावित करती है, नींद हार्मोन को और हार्मोन पीरियड्स को. अत्यधिक गर्मी पीएमएस के लक्षणों को भी बढ़ा सकती है, जैसे सिरदर्द, उल्टी, शरीर दर्द और बेचैनी. हालांकि, यह जरूरी नहीं कि हर महिला को ये बदलाव महसूस हों.&amp;nbsp;
किन बातों का ध्यान रखना चाहिए
इस दौरान सबसे जरूरी है सही दिनचर्या अपनाना। पर्याप्त पानी पीना बेहद जरूरी है कि दिनभर में कम से कम 3-4 लीटर. तरबूज, खीरा जैसे फल और नारियल पानी, छाछ जैसे पारंपरिक पेय शरीर को हाइड्रेट रखने में मदद करते हैं. हल्का भोजन, कम कैफीन और नियमित नींद भी शरीर को संतुलित रखते हैं. हल्की एक्सरसाइज या योग से भी आराम मिल सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 06 May 2026 20:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Handwashing Benefits: क्या सिर्फ पानी से हाथ धोना है काफी? डॉक्टर से जानें बीमारियों का बड़ा सच</title>
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        <description><![CDATA[ Why Handwashing Is Important For Health: हाथ धोना एक बहुत साधारण सी आदत लगती है. इसमें न ज्यादा समय लगता है, न किसी खास साधन की जरूरत होती है. फिर भी यही छोटी-सी आदत हमें कई तरह के इंफेक्शन से बचा सकती है. यही वजह है कि आधुनिक चिकित्सा के इस दौर में भी डॉक्टर बार-बार हाथ धोने की सलाह देते हैं. यह सिर्फ व्यक्तिगत सफाई का मामला नहीं है, बल्कि पूरे समाज के स्वास्थ्य से जुड़ा एक महत्वपूर्ण कदम है.&amp;nbsp;
टीकों और एंटीबायोटिक्स के आने से बहुत पहले भी हाथों की सफाई ने लोगों की जान बचाने में बड़ी भूमिका निभाई थी. कोविड-19 महामारी के दौरान भी यही बात फिर से सामने आई कि साफ हाथ इंफेक्शन की चेन को तोड़ने का सबसे आसान तरीका हैं.&amp;nbsp;
क्यों हाथ धोना जरूरी
हम रोजमर्रा की जिंदगी में कई चीजों को छूते हैं, जैसे दरवाजे के हैंडल, मोबाइल फोन, पैसे, रेलिंग या फिर किसी से हाथ मिलाना. इन सब पर सूक्ष्म जीव मौजूद हो सकते हैं. डॉ. प्रतीक गोपानी &amp;nbsp;ने TOI को बताया कि बहुत से लोग हाथ धोने को गंभीरता से नहीं लेते, जबकि यह आदत कई गंभीर इंफेक्शन से बचाती है और समग्र स्वास्थ्य को बेहतर बनाती है. जब गंदे हाथ चेहरे, आंख, नाक या मुंह तक पहुंचते हैं, तो यही जीव शरीर में प्रवेश कर जाते हैं और बीमारियों की शुरुआत होती है.&amp;nbsp;
इससे कौन सी बीमारियां फैलती हैं
इसी तरह हैजा, टाइफाइड, डायरिया और इन्फ्लुएंजा जैसी बीमारियां फैलती हैं. खास बात यह है कि इंफेक्शन सिर्फ गंदे माहौल में ही नहीं, बल्कि साफ दिखने वाली जगहों पर भी हो सकता है. इसलिए सतर्क रहना जरूरी है.&amp;nbsp;
रिसर्च में क्या निकला
साइंटिस्ट रिसर्च भी इस बात की पुष्टि करते हैं. सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के अनुसार, सही तरीके से हाथ धोने से इंफेक्शन का खतरा करीब 20 प्रतिशत तक कम हो सकता है. जिन देशों में साफ पानी और स्वच्छता की बेहतर सुविधा होती है, वहां इंफेक्शन के मामलों में स्पष्ट गिरावट देखी गई है.&amp;nbsp;
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इन चीजों को नहीं करना चाहिए इग्नोर
अक्सर लोग रोजमर्रा के छोटे-छोटे मौकों को नजरअंदाज कर देते हैं, जहां हाथ धोना जरूरी होता है. जैसे कि शौचालय इस्तेमाल करने के बाद, खाना बनाने या खाने से पहले, कच्चे भोजन को छूने के बाद, खांसने या छींकने के बाद, पालतू जानवरों या कचरे को छूने के बाद, और बाहर से घर आने पर. बच्चों और बुजुर्गों के लिए यह आदत और भी ज्यादा जरूरी है, क्योंकि उनकी रोग इम्यून सिस्टम अपेक्षाकृत कमजोर होती है.
हाथ धोने का सही तरीका
हाथ धोने का तरीका भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि उसे करना. लगभग 20 सेकंड तक साबुन और पानी से हाथ धोना चाहिए. हथेलियों, हाथों के पीछे, उंगलियों के बीच और नाखूनों के नीचे अच्छी तरह सफाई करनी चाहिए. साबुन गंदगी और कीटाणुओं को हटाने में मदद करता है, जबकि केवल पानी से धोना पर्याप्त नहीं होता. अगर साबुन उपलब्ध न हो, तो अल्कोहल-आधारित सैनिटाइजर इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन यह पूरी तरह विकल्प नहीं है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 06 May 2026 20:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>8 Hours Sleep But Still Tired: 8 घंटे सोकर भी नहीं मिट रही थकान, इस गंभीर बीमारी की ओर इशारा कर रहा शरीर</title>
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        <description><![CDATA[ Why Body Feels Exhausted Even After Good Sleep: रात को समय पर सोना, देर रात तक मोबाइल न चलाना और पूरे आठ घंटे की नींद लेना, इसके बावजूद अगर सुबह उठते ही शरीर टूटा हुआ महसूस हो, आंखों में भारीपन रहे और दिनभर थकान पीछा न छोड़े, तो इसे सामान्य मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. कई बार शरीर इस तरह किसी गंभीर समस्या का संकेत देता है. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर एक्सपर्ट क्या कहते हैं.&amp;nbsp;
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
Hartford HealthCare Medical Group के स्लीप स्पेशलिस्ट Dr. Steven Thau के मुताबिक, सिर्फ नींद के घंटे पूरे होना काफी नहीं है, बल्कि यह भी जरूरी है कि नींद कितनी गहरी और आरामदायक रहे. कई लोग बिस्तर पर तो आठ घंटे बिताते हैं, लेकिन उनका शरीर असली आराम तक पहुंच ही नहीं पाता.
किस वजह से सुबह रहती है थकान?
नींद के दौरान शरीर अलग-अलग चरणों से गुजरता है. इनमें हल्की नींद, गहरी नींद और आरईएम स्लीप शामिल होती है. अगर किसी वजह से बार-बार नींद टूटती रहे, तो शरीर गहरी नींद तक नहीं पहुंच पाता. यही कारण है कि सुबह उठने पर थकान बनी रहती है. तनाव, कमरे में शोर, देर रात तक स्क्रीन देखने की आदत और ज्यादा कैफीन लेने जैसी चीजें गहरी नींद को प्रभावित कर सकती हैं.&amp;nbsp;
लगातार थकान बीमारी का संकेत
इस लगातार बनी रहने वाली थकान के पीछे एक गंभीर बीमारी भी हो सकती है, जिसे स्लीप एपनिया कहा जाता है. यह ऐसी स्थिति है जिसमें सोते समय व्यक्ति की सांस कुछ सेकंड के लिए रुक जाती है. &amp;nbsp;डॉ &amp;nbsp;बताते हैं कि कई लोगों को इसका पता तक नहीं चलता, लेकिन दिमाग बार-बार शरीर को सांस लेने के लिए जगाता रहता है. इससे नींद पूरी होने के बावजूद शरीर को आराम नहीं मिल पाता. जोर से खर्राटे आना, नींद में घुटन महसूस होना या दिनभर अत्यधिक सुस्ती रहना इसके संकेत हो सकते हैं.
इसके अलावा, रोज अलग-अलग समय पर सोना और उठना भी शरीर कीसर्कैडियन रिदम को बिगाड़ देता है. यही वजह है कि छुट्टियों में ज्यादा देर तक सोने के बाद भी कई लोग और ज्यादा थका हुआ महसूस करते हैं.
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लाइफस्टाइल का भी प्रभाव
खानपान की आदतें भी नींद की क्वालिटी पर असर डालती हैं. देर रात भारी खाना, मसालेदार भोजन या शराब लेने से नींद बार-बार टूट सकती है. वहीं शरीर में पानी की कमी होने पर भी बेचैनी और थकान महसूस होती है. मेंटल तनाव और चिंता भी बड़ी वजह बनते हैं. जब दिमाग लगातार सक्रिय रहता है, तो शरीर आराम की स्थिति में नहीं पहुंच पाता. ऐसे में ध्यान, गहरी सांस लेने की आदत और सोने से पहले शांत माहौल बनाने से फायदा मिल सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 06 May 2026 20:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>Hantavirus Outbreak: कितना खतरनाक है लग्जरी क्रूज पर फैला हंता वायरस, जिसने ले ली तीन लोगों की जान?</title>
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        <description><![CDATA[ How Dangerous Is Hantavirus Infection: अटलांटिक महासागर में सफर कर रहे एक लग्जरी क्रूज पर संदिग्ध हंता वायरस इंफेक्शन ने चिंता बढ़ा दी है. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के अनुसार, इस घटना में तीन लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि एक मामले की पुष्टि हुई है और पांच अन्य संदिग्ध मामलों की जांच जारी है. एमवी होंडियस नाम के इस क्रूज पर फैले इस &amp;nbsp;ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर यह वायरस कितना खतरनाक है और इससे बचाव कैसे संभव है.&amp;nbsp;
क्या है हंता वायरस?
हंता वायरस कोई एक वायरस नहीं, बल्कि वायरस के एक समूह का नाम है, जो मुख्य रूप से चूहों जैसे ऐसे स्तनधारी जीवों में पाया जाता है जो भोजन को कुतरकर खाते हैं. यह इंसानों में सीधे नहीं फैलता, बल्कि इंफेक्टेड चूहों के मल, यूरिन या लार के सूखे कण जब हवा में मिल जाते हैं और सांस के जरिए शरीर में प्रवेश करते हैं, तब इंफेक्शन होता है. सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के मुताबिक, यही इसका सबसे सामान्य फैलने का तरीका है.&amp;nbsp;
हजारों लोग होते हैं प्रभावित
दुनियाभर में हर साल इस वायरस से हजारों लोग प्रभावित होते हैं. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ के आंकड़ों के अनुसार, हेमोरेजिक फीवर विथ रीनल सिंड्रोम के करीब 1.5 लाख मामले हर साल सामने आते हैं, जिनमें से आधे से ज्यादा चीन में दर्ज होते हैं. वहीं अमेरिका में 1993 से 2023 के बीच करीब 890 मामलों की पुष्टि हुई है. हालांकि, इसका एक स्ट्रेन सियोल वायरस दुनिया के कई हिस्सों में पाया जाता है.&amp;nbsp;
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इस वायरस की सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
इस वायरस की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इसका कोई निश्चित इलाज नहीं है. डॉक्टर आमतौर पर मरीज के लक्षणों के आधार पर इलाज करते हैं, जिसमें ऑक्सीजन थेरेपी, वेंटिलेशन सपोर्ट और गंभीर मामलों में डायलिसिस तक की जरूरत पड़ सकती है. कई मरीजों को आईसीयू में भर्ती करना पड़ता है, खासकर जब इंफेक्शन तेजी से लंग्स को प्रभावित करता है.&amp;nbsp;
कब आया था यह चर्चा में?
बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, हाल ही में फरवरी 2025 में एक मामला चर्चा में आया था, जब ऑस्कर विजेता अभिनेता जीन हैकमैन की पत्नी बेट्सी अराकावा की मौत भी हंता वायरस से जुड़ी सांस की बीमारी के कारण हुई थी. जांच में पाया गया कि उनके घर के आसपास चूहों के घोंसले मौजूद थे, जिससे इंफेक्शन की आशंका बढ़ी. एक्सपर्ट के अनुसार, इस वायरस से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका है चूहों जैसे जानवरों से दूरी बनाना. घर या काम करने की जगह पर चूहों के आने-जाने के रास्तों को बंद करना, सफाई के दौरान मास्क और दस्ताने पहनना, और गंदगी को सीधे हाथ से न छूना बेहद जरूरी है.&amp;nbsp;
क्रूज में क्यों होती है दिक्कत?
क्रूज जैसी बंद जगहों पर इस तरह के इंफेक्शन का खतरा इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि यहां सीमित स्थान में कई लोग एक साथ रहते हैं. ऐसे में अगर इंफेक्शन फैलता है, तो उसे नियंत्रित करना मुश्किल हो जाता है.
इसे भी पढ़ें- Dopamine Burnout: क्या सब कुछ होते हुए भी लगता है खालीपन? जानिए क्या होता है &#039;डोपामिन बर्नआउट&#039;
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 06 May 2026 04:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>kidney Disease Early Symptoms: शरीर में दिखें ये लक्षण तो हो जाएं सावधान, धीरे&amp;धीरे खत्म हो जाएगी आपकी किडनी</title>
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        <description><![CDATA[ kidney Disease Early Symptoms : हमारे शरीर में किडनी दो बहुत ही जरूरी अंग होते हैं, जो लगातार बिना रुके काम करते रहते हैं. इनका मुख्य काम खून को साफ करना, शरीर से टॉक्सिन्स को बाहर निकालना, पानी और मिनरल्स का संतुलन बनाए रखना और ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करना होता है, लेकिन समस्या यह है कि किडनी की बीमारी धीरे-धीरे बढ़ती है और शुरुआत में इसके लक्षण बहुत हल्के होते हैं या बिल्कुल समझ नहीं आते हैं. अक्सर लोग इन संकेतों को सामान्य कमजोरी या दूसरी छोटी समस्याएं समझकर नजरअंदाज कर देते हैं.जब तक बीमारी का पता चलता है, तब तक किडनी काफी हद तक प्रभावित हो चुकी होती है. इसलिए जरूरी है कि शरीर में दिखने वाले शुरुआती संकेतों को समय रहते पहचान लिया जाए. तो आइए जानते हैं कि शरीर में कौन से लक्षण दिखें तो सावधान हो जाएं. &amp;nbsp;
किडनी बीमारी क्या होती है?
क्रॉनिक किडनी डिजीज (CKD) एक ऐसी स्थिति है जिसमें किडनी धीरे-धीरे अपनी काम करने की क्षमता खोने लगती है. यह अचानक नहीं होती, बल्कि महीनों या सालों में धीरे-धीरे बढ़ती है. जब किडनी सही से काम नहीं करती, तो शरीर में गंदगी और टॉक्सिन्स जमा होने लगते हैं, जिससे कई तरह की समस्याएं पैदा होती हैं.&amp;nbsp;
शरीर में कौन से लक्षण दिखें तो सावधान हो जाएं?
1. लगातार थकान और कमजोरी - अगर आपको बिना ज्यादा काम किए भी लगातार थकान महसूस होती है, तो यह किडनी की समस्या का संकेत हो सकता है. किडनी जब सही से काम नहीं करती, तो शरीर में खून की कमी (एनीमिया) हो जाती है. इससे शरीर में ऑक्सीजन कम पहुंचती है और व्यक्ति हमेशा थका-थका महसूस करता है.&amp;nbsp;
2. नींद न आना या नींद में परेशानी - किडनी खराब होने पर शरीर में टॉक्सिन्स जमा होने लगते हैं, जिससे नींद प्रभावित होती है. कई लोगों को रात में बार-बार नींद टूटने या बेचैनी की समस्या होती है.&amp;nbsp;
3. स्किन का रूखा और खुजलीदार होना - जब किडनी शरीर से गंदगी को सही से बाहर नहीं निकाल पाती, तो खून में मिनरल्स का संतुलन बिगड़ जाता है. इससे स्किन ड्राई हो जाती है और लगातार खुजली होती है.&amp;nbsp;
4.बार-बार पेशाब आना या पेशाब में बदलाव - अगर आपको बार-बार पेशाब आने लगे, खासकर रात में, तो यह किडनी की खराबी का संकेत हो सकता है. इसके अलावा झागदार पेशाब, बहुत कम या ज्यादा पेशाब, रंग में बदलाव भी हो सकते हैं
5. पेशाब में खून आना - अगर पेशाब में खून दिखे या उसका रंग गुलाबी/भूरा हो जाए, तो यह गंभीर संकेत हो सकता है. यह किडनी की फिल्टरिंग सिस्टम के खराब होने का संकेत है.&amp;nbsp;
6. झागदार पेशाब (Foamy Urine) - अगर पेशाब में बहुत ज्यादा झाग बने, तो इसका मतलब हो सकता है कि पेशाब में प्रोटीन जा रहा है, जो किडनी डैमेज का संकेत है.
7.आंखों के आसपास सूजन - किडनी जब प्रोटीन को रोक नहीं पाती, तो शरीर से प्रोटीन बाहर निकलने लगता है, जिससे आंखों के नीचे सूजन आ जाती है.&amp;nbsp;
8. पैरों और टखनों में सूजन - अगर पैरों, टखनों या शरीर के निचले हिस्से में सूजन रहती है, तो इसका कारण शरीर में पानी और नमक का जमा होना हो सकता है, जो किडनी की खराबी से जुड़ा होता है.&amp;nbsp;
9. भूख कम लगना - किडनी ठीक से काम न करे तो शरीर में टॉक्सिन्स बढ़ जाते हैं, जिससे भूख कम लगती है और व्यक्ति भूख खो देता है.&amp;nbsp;
10 मांसपेशियों में दर्द और ऐंठन - किडनी शरीर में कैल्शियम और फास्फोरस का संतुलन बनाए रखती है. जब यह बिगड़ता है, तो मांसपेशियों में दर्द और ऐंठन होने लगती है.&amp;nbsp;
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किडनी को नुकसान पहुंचाने वाले कारण
लंबे समय तक हाई ब्लड शुगर किडनी की ब्लड वेसल्स को नुकसान पहुंचाता है. इसके अलावा हाई ब्लड प्रेशर किडनी पर दबाव डालता है और धीरे-धीरे उसे कमजोर करता है. कुछ दर्द निवारक दवाइयों का ज्यादा इस्तेमाल किडनी को नुकसान पहुंचा सकता है. लंबे समय तक शरीर में पानी की कमी किडनी पर बुरा असर डालती है. गलत खान-पान और एक्सरसाइज की कमी भी किडनी बिमारी का कारण बन सकती है.&amp;nbsp;
किडनी को स्वस्थ कैसे रखें?
1. &amp;nbsp;शुगर और ब्लड प्रेशर को कंट्रोल रखें - ये दोनों किडनी खराब होने के सबसे बड़े कारण हैं.&amp;nbsp;
2. बैलेंस डाइट लें - हरी सब्जियां, फल और कम नमक वाला खाना खाएं.&amp;nbsp;
3. ज्यादा पानी पिएं - शरीर को हाइड्रेट रखना बहुत जरूरी है.&amp;nbsp;
4. धूम्रपान और शराब से बचें - ये दोनों किडनी और पूरे शरीर को नुकसान पहुंचाते हैं.&amp;nbsp;
5. नियमित जांच कराएं - अगर आपको डायबिटीज, BP या फैमिली हिस्ट्री है, तो समय-समय पर किडनी टेस्ट कराना जरूरी है.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 06 May 2026 04:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Spine Surgery Technique: AIIMS की अनोखी स्पाइन सर्जरी तकनीक बनी दुनिया की पसंद, गंभीर मरीजों को मिल रही नई जिंदगी</title>
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        <description><![CDATA[ Spine Surgery Technique: आज के समय में चिकित्सा क्षेत्र तेजी से आगे बढ़ रहा है और इसी कड़ी में एक बड़ी सफलता सामने आई है. दिल्ली के All India Institute of Medical Sciences में विकसित एक खास सर्जरी तकनीक ने उन मरीजों के लिए नई उम्मीद पैदा कर दी है जो गंभीर रीढ़ की विकृति से परेशान थे. पहले ऐसे मरीजों के लिए इलाज बहुत मुश्किल और जोखिम भरा माना जाता था, लेकिन अब यह नई तकनीक उनकी जिंदगी बदल रही है. इस नवाचार ने न केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी डॉक्टरों का ध्यान अपनी ओर खींचा है. &amp;nbsp;
सात साल की मेहनत से तैयार हुई तकनीक
यह नई सर्जरी तकनीक पिछले लगभग सात सालों में विकसित की गई है और इसे डॉक्टरों की एक टीम ने तैयार किया है. यह तकनीक असल में पोस्टेरियर वर्टिब्रल कॉलम रिसेक्शन (PVCR)&amp;rdquo;का एक बदला हुआ रूप है, &amp;nbsp;PVCR एक जटिल ऑपरेशन होता है, जिसका इस्तेमाल उन मरीजों के इलाज में किया जाता है जिनकी रीढ़ की हड्डी बहुत ज्यादा टेढ़ी या कठोर हो जाती है और इससे उनकी जिंदगी पर बुरा असर पड़ता है. इस नई तकनीक को वरिष्ठ हड्डी रोग विशेषज्ञ Dr Bhavuk Garg ने विकसित किया है. इस नई विधि में ऑपरेशन के दौरान रीढ़ के कुछ हिस्सों को अंत तक सुरक्षित रखा जाता है, जिससे सर्जरी के दौरान शरीर की स्थिरता बनी रहती है. इस वजह से पहले की तुलना में जटिलताओं का खतरा काफी कम हो जाता है और मरीज के ठीक होने की संभावना बढ़ जाती है. &amp;nbsp; All India Institute of Medical Sciences के डॉक्टरों का कहना है कि पिछले सात सालों में इस प्रक्रिया ने उन मरीजों के लिए नई उम्मीद जगाई है, जिन्हें पहले सर्जरी में बहुत ज्यादा जोखिम का सामना करना पड़ता था और जिनके पास इलाज के विकल्प भी सीमित थे.&amp;nbsp;
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मरीजों को मिल रहा बड़ा फायदा
गंभीर रीढ़ विकृति से पीड़ित मरीजों को कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है जैसे रीढ़ का टेढ़ा होना, लगातार दर्द, सांस लेने में परेशानी और सीधे खड़े न हो पाना. कई बार इसका असर उनके मानसिक और सामाजिक जीवन पर भी पड़ता है. लेकिन इस नई तकनीक के जरिए सर्जरी कराने के बाद मरीजों की हालत में काफी सुधार देखा गया है. जो लोग पहले चलने फिरने या सामान्य काम करने में असमर्थ थे, वे अब फिर से स्कूल, काम और सामान्य जीवन में लौट पा रहे हैं. परिवार के लोगों के अनुसार यह बदलाव उनके लिए जिंदगी बदल देने वाला साबित हुआ है. &amp;nbsp;एक वरिष्ठ हड्डी रोग विशेषज्ञ ने बताया, &amp;ldquo;पहले इन सर्जरी से लोग डरते थे, क्योंकि इसमें बड़े न्यूरोलॉजिकल या जानलेवा जोखिम हो सकते थे. लेकिन अब बेहतर तकनीक और अनुभव की वजह से इसके नतीजे काफी अच्छे हो गए हैं.&amp;rdquo;&amp;nbsp;
विदेशों में भी बढ़ी मांग और पहचान
एम्स द्वारा विकसित इस तकनीक को अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिल रही है. विदेशों के स्पाइन सर्जन भी इस विधि में रुचि दिखा रहे हैं और इसे अपनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक जटिल स्पाइन बीमारियों के इलाज में एक बड़ी उपलब्धि साबित हो रही है. इससे भारत की चिकित्सा क्षमता को वैश्विक स्तर पर नई पहचान मिली है और देश उन्नत स्पाइन सर्जरी के क्षेत्र में मजबूत स्थिति बना रहा है.
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        <pubDate>Tue, 05 May 2026 15:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>रामपुर जिला अस्पताल में बढ़े आंखों के मरीज, जानें गर्मी के मौसम में क्यों होती है दिक्कत?</title>
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        <description><![CDATA[ भीषण गर्मी की वजह से आंखों से संबंधित बीमारियों के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं. इस बीच रामपुर के जिला अस्पताल की ओपीडी में रोजाना 40-50 मरीज आंखों की शिकायत लेकर पहुंच रहे हैं. बढ़ते तापमान को देखते हुए हेल्थ डिपार्टमेंट अलर्ट मोड पर आ गया है और लोगों से सावधानी बरतने की अपील की जा रही है.
कैसे नजर आ रहे लक्षण?
मौसम में बढ़ती गर्मी का असर अब लोगों की आंखों पर साफ दिखाई देने लगा है. रामपुर जिला अस्पताल और ग्रामीण क्षेत्रों के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर आंखों के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. मरीजों में आंखों से पानी आना, खुजली, सूजन, लालिमा और दर्द जैसी समस्याएं आम हो गई हैं.
डॉक्टर ने बताई वजह
डॉ. संजय कपूर का कहना है कि तेज धूप, धूल और गर्म हवाओं की वजह से आंखों में संक्रमण और एलर्जी के मामले बढ़ रहे हैं. अस्पताल प्रशासन ने इन मरीजों के इलाज के लिए विशेष इंतजाम किए हैं और दवाइयों की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित की गई है.
गलती से भी न बरतें लापरवाही
मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. दीपा सिंह ने बताया कि गर्मियों में आंखों की समस्याएं बढ़ना आम बात है, लेकिन लापरवाही खतरनाक हो सकती है. उन्होंने लोगों से अपील की है कि बिना डॉक्टर की सलाह के मेडिकल स्टोर से दवा न लें और किसी भी तरह की परेशानी होने पर तुरंत नजदीकी अस्पताल या सीएचसी/पीएचसी में जाकर जांच कराएं. उन्होंने बताया कि फिलहाल स्वास्थ्य विभाग पूरी तरह सतर्क है, लेकिन बढ़ती गर्मी के बीच लोगों को भी अपनी सेहत को लेकर जागरूक रहने की जरूरत है, ताकि आंखों की इन समस्याओं से बचा जा सके.
गर्मियों में तेजी से होती हैं आंखों की ये बीमारियां
कंजंक्टिवाइटिस: यह गर्मियों में होने वाली सबसे कॉमन प्रॉब्लम है. यह बैक्टीरियल, वायरल या एलर्जी के कारण हो सकती है. पसीना, धूल और एक-दूसरे के संपर्क में आने से यह तेजी से फैलती है. इसमें आंखें लाल होना, सूजन आना, पानी गिरना, खुजली होना, दर्द, आंखों में पीला या सफेद कीचड़ आना जैसे लक्षण नजर आते हैं.
आंखों में एलर्जी: गर्मियों में लू, धूल के कण, प्रदूषण और परागकण आंखों में एलर्जी पैदा करते हैं. इसकी वजह से आंखों में तेज खुजली, लालिमा, जलन और बार-बार पानी आने की दिक्कत होती है.
ड्राई आई सिंड्रोम: चिलचिलाती धूप, लू और लंबे समय तक एसी बैठने के कारण आंखों की नमी कम हो जाती है और आंसू जल्दी सूख जाते हैं. इस दिक्कत में आंखों में सूखापन महसूस होने, जलन, आंखों में रेत या किरकिरी पड़ने और थकान जैसे लक्षण होते हैं.&amp;nbsp;
स्टाई या गुहेरी: गर्मियों में पसीने और गंदगी के कारण पलकों की ग्रंथियों में बैक्टीरिया का इंफेक्शन हो जाता है, जिससे पलक के किनारे पर छोटी फुंसी निकल आती है. पलक के किनारे पर लाल सूजन, दर्द, चुभन और छूने पर तकलीफ होना इसके लक्षण हैं.
यूवी किरणों से नुकसान: सूरज की अल्ट्रावायलेट (UV) किरणें सीधे आंखों पर पड़ने से कॉर्निया को नुकसान पहुंच सकता है. इसे &#039;आंखों का सनबर्न&#039; भी कह सकते हैं. तेज रोशनी से परेशानी, आंखों में लालिमा, तेज दर्द और पानी आना इसके लक्षण हैं.
कॉर्नियल अल्सर: अगर एलर्जी या ड्राई आई के कारण आंखों को बहुत ज्यादा रगड़ा जाए या कॉन्टैक्ट लेंस साफ न रखे जाएं तो कॉर्निया पर घाव हो सकता है. यह गर्मियों में बैक्टीरिया पनपने के कारण बढ़ सकता है.
गर्मियों में आंखों को बचाने के तरीके

बाहर निकलते समय हमेशा अच्छी क्वालिटी के UV-प्रोटेक्टेड सनग्लासेस पहनें.
आंखों को दिन में 2-3 बार ठंडे और साफ पानी से धोएं.
गंदे हाथों से आंखों को छूने या रगड़ने से बचें.
अगर आप एसी में ज्यादा रहते हैं या कंप्यूटर पर काम करते हैं तो डॉक्टर की सलाह से लुब्रिकेटिंग आई ड्रॉप्स का इस्तेमाल करें.
आई फ्लू या इंफेक्शन होने पर तुरंत डॉक्टर को दिखाएं. खुद से कोई दवा न डालें.
पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं, ताकि शरीर और आंखों में नमी बनी रहे.

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        <pubDate>Mon, 04 May 2026 08:30:11 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Rectal Cancer: रेक्टल कैंसर से ज्यादा क्यों हो रही युवाओं की मौत, लाइफस्टाइल में क्या बदलाव करने की जरूरत?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/rectal-cancer-रेक्टल-कैंसर-से-ज्यादा-क्यों-हो-रही-युवाओं-की-मौत-लाइफस्टाइल-में-क्या-बदलाव-करने-की-जरूरत</link>
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        <description><![CDATA[ Why Rectal Cancer Is Increasing In Young Adults: कई सालों तक कोलोरेक्टल कैंसर को बुजुर्गों की बीमारी माना जाता रहा. हेल्थ सलाह भी ज्यादातर उम्रदराज लोगों की जांच पर ही केंद्रित रही, जबकि युवाओं को कम जोखिम वाला समझा गया. लेकिन अब तस्वीर बदलती नजर आ रही है, और यह बदलाव चिंता बढ़ाने वाला है. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर क्या नया निकला है.&amp;nbsp;
स्टडी में चौंकाने वाले खुलासे
स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ न्यूयॉर्क अपस्टेट मेडिकल यूनिवर्सिटी की मिथिली मेनन पथियिल के नेतृत्व में हुई एक स्टडी, जो Digestive Disease Week (DDW 2026) में पेश की गई, रिपोर्ट में बताया गया कि कम उम्र के लोगों में रेक्टल कैंसर से मौत के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. खासकर 30 के मध्य से 40 की शुरुआत तक की उम्र वाले लोगों में यह बढ़ोतरी ज्यादा देखी गई है.&amp;nbsp;
किस तरह से बदल रहे हैं मौत के आंकड़े?
रिसर्चर ने 1999 से 2023 तक के आंकड़ों का एनालिसिस किया. इसमें 20 से 44 साल के लोगों के रिकॉर्ड को शामिल किया गया। इतने लंबे समय के डेटा से यह समझने में मदद मिली कि मौत के आंकड़े किस तरह बदलते गए. नतीजे काफी चिंताजनक रहे. कुल मिलाकर कोलोरेक्टल कैंसर से मौत के मामले बढ़े हैं, लेकिन रेक्टल कैंसर की वजह से मौत की दर कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ रही है. कई समूहों में यह बढ़ोतरी कोलन कैंसर के मुकाबले दो से तीन गुना ज्यादा पाई गई.&amp;nbsp;
अलग- अलग समुदायों पर स्टडी
स्टडी में यह भी सामने आया कि अलग-अलग समुदायों में असर अलग है. हिस्पैनिक लोगों में रेक्टल कैंसर से मौत के मामले सबसे तेजी से बढ़े, जबकि अमेरिका के पश्चिमी हिस्सों में रहने वाले लोगों में भी यह वृद्धि ज्यादा देखी गई. &amp;nbsp;इससे संकेत मिलता है कि सामाजिक, पर्यावरण या लाइफस्टाइल से जुड़े कारण इसमें भूमिका निभा सकते हैं. भविष्य को समझने के लिए रिसर्चर ने 2035 तक का अनुमान भी लगाया. इसके अनुसार अगर हालात नहीं बदले, तो आने वाले वर्षों में रेक्टल कैंसर से मौत के मामले और बढ़ सकते हैं. खासकर 35 से 44 साल के लोगों में जोखिम सबसे ज्यादा बना रहेगा.
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क्या है सबसे बड़ी वजह?
इस स्टडी में एक अहम वजह देरी से पहचान को माना गया है. कम उम्र के लोग अक्सर कैंसर के लक्षणों को नजरअंदाज कर देते हैं. डॉक्टर भी कई बार युवाओं में कैंसर की संभावना कम मानते हैं. जैसे मलद्वार से खून आना या पेट साफ करने की आदत में बदलाव, इन्हें अक्सर छोटी समस्या समझ लिया जाता है. इसी कारण युवा मरीजों में बीमारी का पता देर से चलता है. जहां बुजुर्गों में लक्षण दिखने के एक महीने के भीतर इलाज शुरू हो जाता है, वहीं युवा कई महीनों तक इंतजार करते रहते हैं. यह देरी स्थिति को ज्यादा गंभीर बना सकती है.&amp;nbsp;
इसे भी पढ़ें-Heart Fights Cancer: दिल धड़क रहा है यानी कैंसर से लड़ रहा है, नई स्टडी से जागी उम्मीद
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 03 May 2026 20:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Rectal, Cancer:, रेक्टल, कैंसर, से, ज्यादा, क्यों, हो, रही, युवाओं, की, मौत, लाइफस्टाइल, में, क्या, बदलाव, करने, की, जरूरत</media:keywords>
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        <title>Heart Attack Recovery: रोज नहीं करते ब्रश तो आपके हार्ट पर लगातार बढ़ रहा खतरा, इस स्टडी में हुआ डराने वाला खुलासा</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/heart-attack-recovery-रोज-नहीं-करते-ब्रश-तो-आपके-हार्ट-पर-लगातार-बढ़-रहा-खतरा-इस-स्टडी-में-हुआ-डराने-वाला-खुलासा</link>
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        <description><![CDATA[ How To Improve Heart Recovery After Heart Attack: ज्यादातर लोग मानते हैं कि ब्रश और फ्लॉस करना सिर्फ दांत साफ रखने और बदबू से बचने के लिए जरूरी है. लेकिन नई स्टडी बताती है कि मुंह की सेहत का दिल पर भी गहरा असर पड़ सकता है, खासकर हार्ट अटैक के बाद. चलिए आपको बताते हैं कि स्टडी में क्या निकला.&amp;nbsp;&amp;nbsp;हार्ट अटैक के बाद रिकवरी मुश्किल
जापान की टोक्यो मेडिकल एंड डेंटल यूनिवर्सिटी की एक स्टडी, जो इंटरनेशनल जर्नल ऑफ ओरल साइंस में प्रकाशित हुई है, उसमें एक चौंकाने वाला संबंध सामने रखा है. इसमें बताया गया है कि मुंह में पाई जाने वाली एक आम बैक्टीरिया हार्ट के ठीक होने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है. यानी अगर मुंह की सेहत खराब है, तो हार्ट अटैक के बाद रिकवरी मुश्किल हो सकती है.
रिकवरी की कोशिश करता है हार्ट 
हार्ट अटैक के बाद शरीर खुद को ठीक करने की कोशिश करता है. इसमें एक अहम प्रक्रिया होती है, जिसे ऑटोफैगी कहा जाता है. इसमें सेल्स अपने अंदर जमा खराब हिस्सों को साफ करके दोबारा इस्तेमाल करती हैं, जिससे दिल को ठीक होने में मदद मिलती है. रिसर्चर ने खास तौर पर पोर्फाइरोमोनस जिंजिवालिस नाम की बैक्टीरिया पर ध्यान दिया. यह बैक्टीरिया मुंह में पाया जाता है और मसूड़ों की बीमारी का कारण बनता है. अगर समय पर इलाज न हो, तो मसूड़े सूज जाते हैं, खून आने लगता है और दांत भी गिर सकते हैं.&amp;nbsp;
क्या है जिंजिपेन?
साइंटिस्ट को पहले से पता था कि यह बैक्टीरिया शरीर के दूसरे हिस्सों में भी पहुंच सकता है, लेकिन यह दिल को कैसे प्रभावित करता है, यह साफ नहीं था. इसे समझने के लिए उन्होंने जिंजिपेन नाम के एक पदार्थ का अध्ययन किया, जो यह बैक्टीरिया बनाता है. &amp;nbsp;जिंजिपेन एक तरह का प्रोटीन होता है, जो शरीर के टिश्यू को नुकसान पहुंचाने में मदद करता है और शरीर की इम्यून सिस्टम से बच निकलता है. रिसर्चर ने यह जानने की कोशिश की कि यह हार्ट के सेल्स पर क्या असर डालता है.
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क्या निकला नतीजा?
इसके लिए उन्होंने बैक्टीरिया का एक ऐसा रूप तैयार किया, जिसमें जिंजिपेन नहीं बनता था. फिर इसकी तुलना सामान्य बैक्टीरिया से की गई. &amp;nbsp;नतीजे साफ थे कि जिन सेल्स पर बिना जिंजिपेन वाला बैक्टीरिया असर कर रहा था, वे ज्यादा स्वस्थ रहीं. जबकि सामान्य बैक्टीरिया के संपर्क में आई सेल्स को ज्यादा नुकसान हुआ. चूहों पर किए गए प्रयोग में भी यही बात सामने आई। जिन चूहों में सामान्य बैक्टीरिया था, उनमें हार्ट अटैक के बाद दिल को ज्यादा नुकसान हुआ. रिसर्च में पाया गया कि जिंजिपेन ऑटोफैगी की प्रक्रिया को बाधित करता है. इससे सेल्स के अंदर खराब पदार्थ जमा होने लगते हैं, जो दिल की मरम्मत को धीमा कर देते हैं. यही वजह है कि दिल को ठीक होने में ज्यादा समय लगता है और नुकसान बढ़ जाता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 03 May 2026 20:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>Can Diabetics Eat Watermelon: क्या शुगर के मरीज तरबूज खा सकते हैं, क्या कहते हैं एक्सपर्ट‌?</title>
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        <description><![CDATA[ Does Watermelon Raise Blood Sugar Levels: तरबूज गर्मियों का सबसे पसंदीदा फल है, लेकिन जब बात डायबिटीज की आती है तो लोग अक्सर कंफ्यूज हो जाते हैं कि क्या इसे खाना सुरक्षित है या नहीं? एक्सपर्ट्स का कहना है कि तरबूज पूरी तरह से मना नहीं है, लेकिन मात्रा और तरीके का ध्यान रखना बेहद जरूरी है. चलिए आपको बताते हैं कि इसको खाने के दौरान किन बातों का ध्यान रखना चाहिए.
क्यों शुगर के मरीजों के लिए नुकसानदायक हो सकता है?
हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली बेवसाइट healthline की रिपोर्ट के अनुसार, &amp;nbsp;तरबूज में प्राकृतिक शर्करा होती है, जो ब्लड शुगर को प्रभावित कर सकती है. लेकिन इसका असर इस बात पर निर्भर करता है कि आप कितना खा रहे हैं. उदाहरण के तौर पर, एक कप कटे हुए तरबूज करीब 152 ग्राम &amp;nbsp;में लगभग 9.42 ग्राम शुगर और 11.5 ग्राम कार्बोहाइड्रेट होता है, वहीं, एक बड़ा स्लाइस करीब 286 ग्राम में यह मात्रा और ज्यादा हो जाती है। इसलिए हिस्से पर कंट्रोल रखना जरूरी है.
क्या डायबिटीज के मरीज इसको खा सकते हैं?
अच्छी बात यह है कि सीमित मात्रा में तरबूज संतुलित डाइट का हिस्सा बन सकता है. अमेरिकन डायबिटीज एसोसिएशन भी सलाह देता है कि डायबिटीज के मरीज ताजे फल खा सकते हैं, बशर्ते उनमें अतिरिक्त शुगर न हो. तरबूज में फाइबर के साथ-साथ विटामिन ए, सी, पोटैशियम, मैग्नीशियम, विटामिन बी6, आयरन और कैल्शियम जैसे पोषक तत्व होते हैं, जो शरीर के लिए फायदेमंद हैं.&amp;nbsp;
इसे भी पढ़ें -&amp;nbsp;Watermelon Safety Tips: तरबूज को इंजेक्शन लगाकर तो नहीं किया गया है लाल, खाने से पहले ऐसे करें चेक
आपके लिए हेल्दी&amp;nbsp;
विटामिन ए आंखों की सेहत के लिए अच्छा है, जबकि विटामिन सी इम्यूनिटी बढ़ाने और दिल को स्वस्थ रखने में मदद करता है. तरबूज में मौजूद एंटीऑक्सिडेंट्स शरीर को फ्री रेडिकल्स से बचाने में भी सहायक होते हैं. इसमें लाइकोपीन नाम का तत्व भी होता है, जो दिल से जुड़ी बीमारियों के खतरे को कम करने में मदद कर सकता है और डायबिटीज के मरीजों में हार्ट की बीमारी का खतरा वैसे भी ज्यादा होता है.&amp;nbsp;
हाइड्रेटेड रखता है शरीर 
तरबूज का एक और फायदा इसकी हाई वॉटर कंटेंट है. यह 90 प्रतिशत से ज्यादा पानी से भरपूर होता है, जिससे शरीर हाइड्रेटेड रहता है और पेट भरा हुआ महसूस होता है. इसके साथ ही, इसमें मौजूद फाइबर पाचन को बेहतर बनाने में मदद करता है.&amp;nbsp;
संतुलन में खाने की सलाह
अगर ग्लाइसेमिक इंडेक्स की बात करें, तो तरबूज का जीआई लगभग 72 होता है, जो थोड़ा ज्यादा माना जाता है. लेकिन इसका ग्लाइसेमिक लोड कम होता है, यानी सही मात्रा में खाने पर यह ब्लड शुगर को बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं करता. यही वजह है कि एक्सपर्ट्स इसे पूरी तरह से मना नहीं करते, बल्कि संतुलन में खाने की सलाह देते हैं. डायबिटीज के मरीजों के लिए यह भी जरूरी है कि वे तरबूज को अकेले ज्यादा मात्रा में खाने के बजाय संतुलित भोजन के साथ लें. इसके साथ ही, सूखे फल या जूस की बजाय ताजे फल को ज्यादा प्रिफर करना बेहतर होता है.
इसे भी पढ़ें -&amp;nbsp;&amp;nbsp;Biryani and Watermelon Myth: क्या बिरयानी के बाद तरबूज खाना जानलेवा है? जानिए- क्या कहते हैं डॉक्टर्स
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 03 May 2026 08:30:11 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>GLP 1 Drugs Reduce Alcohol Addiction: सिर्फ मोटापा नहीं, शराब की लत भी कम कर सकती हैं GLP&amp;1 दवाएं, रिसर्च में किया गया दावा</title>
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        <description><![CDATA[ 
GLP 1 Drugs Reduce Alcohol Addiction:&amp;nbsp; मोटापा कम करने के लिए इस्तेमाल होने वाली जीएलपी-1 आधारित दवाएं अब एक नए कारण से चर्चा में है. हाल ही में प्रकाशित एक रिसर्च में सामने आया कि यह दवाएं शराब की लत को कम करने में भी मदद कर सकती है. मेडिकल जर्नल द लैंसेट छपी रिसर्च ने मोटापा और शराब की लत दोनों से जूझ रहे लोगों के इलाज को लेकर नई उम्मीद पैदा की है. हालांकि एक्सपर्ट्स का कहना है कि अभी इस दिशा में और बड़े स्तर पर रिसर्च की जरूरत है. ऐसे में चलिए अब आपको बताते हैं कि जीएलपी दवाएं मोटापे के साथ शराब की लत को कैसे कम कर सकती है और रिसर्च में क्या-क्या दावा किया गया है?
क्या कहती है नई रिसर्च?
यह रिसर्च 108 ऐसे लोगों पर की गई जो मोटापे के साथ-साथ अल्कोहल यूज डिसऑर्डर से जूझ रहे थे. इस दौरान सभी लोगों को काउंसलिंग कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी दी गई और उन्हें दो कैटेगरी में बांटा गया. एक कैटेगरी को हफ्ते में एक बार सेमाग्लूटाइड का इंजेक्शन दिया गया, जबकि दूसरे को प्लेसीबो दिया गया. स्टडी की शुरुआत में रिसर्च में शामिल लोगों पिछले 30 दिनों में औसतन 17 दिन भारी शराब पीने के थे. 6 महीने बाद सेमाग्लूटाइड लेने वाले लोगों में यह संख्या घटकर 5 दिन रह गई. जबकि प्लेसीबो समूह में या आंकड़ा करीब 9 दिन रहा. यानी भारी शराब पीने के दिनों में औसतन 12 दिन की कमी दर्ज की गई, जो प्लेसीबो कैटेगरी के मुकाबले लगभग 50 प्रतिशत ज्यादा है. इसके अलावा कुल शराब सेवन की मात्रा में भी गिरावट देखी गई, जहां शुरुआत में लोग औसतन 2200 ग्राम शराब का सेवन कर रहे थे. वहीं 6 महीने बाद यह घटकर सेमाग्लूटाइड समूह में 650 ग्राम और प्लेसीबो समूह में 1175 ग्राम रह गया.
कैसे काम करती है यह दवाएं?
सेमाग्लूटाइड और टिर्जेपाटाइड जैसी GLP-1 दवाएं शरीर में बनने वाले हार्मोन की तरह काम करती है. यह भूख को कम करती है, पेट भरा होने का एहसास बढ़ाती है और पाचन की गति धीमी कर देती है. रिसर्च के अनुसार इन दवाओं का असर दिमाग के उन हिस्सों पर भी पड़ता है, जो भूख और रिवॉर्ड सिस्टम को कंट्रोल करते हैं, जिससे शराब की लत पर भी असर पड़ सकता है.
ये भी पढ़ें-Healthy Diet After 60 : 60 साल के बाद कैसे रखें दिल-किडनी और लिवर का ख्याल? इस डाइट से 100 साल होगी उम्र
शराब की लत वैश्विक स्तर पर भी बड़ी समस्या
अल्कोहल यूज डिसऑर्डर एक गंभीर स्थिति है, जिसमें व्यक्ति चाहकर भी शराब पीना बंद नहीं कर पाता है. वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाईजेशन के अनुसार दुनियाभर में करीब 40 करोड़ लोग इस समस्या से जूझ रहे हैं, जो वैश्विक आबादी का लगभग 7 प्रतिशत है. साल 2019 में शराब के कारण करीब 26 लाख लोगों की मौत हुई. इनमें से 16 लाख मौतें गैर-संचारी बीमारियों, 7 लाख चोटों और तीन लाख संक्रामक बीमारियों से जुड़ी थी. वहीं शराब का सेवन 200 से ज्यादा बीमारियों और स्वास्थ्य स्थितियों से जुड़ा पाया गया. जिनमें लिवर, दिल और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियां शामिल है. वहीं रिपोर्ट के अनुसार अब तक अल्कोहल यूज डिसऑर्डर के इलाज के लिए बहुत कम दवाएं उपलब्ध है. यूएस फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने अब तक सिर्फ तीन दवाओं डिसल्फिराम, ऐकेम्प्रोसेट और नालट्रेक्सोन को मंजूरी दी है. ऐसे में नए और प्रभावी इलाज की जरूरत भी लंबे समय से महसूस की जा रही है. वहीं भारत में भी जीएलपी-1 आधारित दवाएं तेजी से लोकप्रिय हो रही है.&amp;nbsp;
ये भी पढ़ें-Smoking Side Effects: सालों स्मोकिंग के बाद भी आप क्यों हैं &#039;ठीक&#039;? डॉक्टरों का ये जवाब कर देगा हैरान
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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        <pubDate>Sat, 02 May 2026 16:30:25 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Vitamin Deficiency For Mental Health : डिप्रेशन और एंग्जायटी का छिपा कारण हो सकती है शरीर में इन विटामिन्स की कमी, ऐसे पहचानें संकेत</title>
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        <pubDate>Sat, 02 May 2026 16:30:23 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Painkillers In Summer: क्या गर्मियों में आप भी बार&amp;बार ले रहे पेनकिलर, जानें किडनी के लिए यह कितने खतरनाक?</title>
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        <description><![CDATA[ Painkillers In Summer: क्या गर्मियों में आप भी बार-बार ले रहे पेनकिलर, जानें किडनी के लिए यह कितने खतरनाक? ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 02 May 2026 00:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>Smoking Side Effects: सालों स्मोकिंग के बाद भी आप क्यों हैं &amp;apos;ठीक&amp;apos;? डॉक्टरों का ये जवाब कर देगा हैरान</title>
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        <description><![CDATA[ Does Smoking Cause Damage Without Symptoms: &quot;मैं सालों से धूम्रपान कर रहा हूं और मुझे कुछ नहीं हुआ&quot;,&amp;nbsp; यह बात सुनने में भले ही सुकून देने वाली लगे, लेकिन डॉक्टर इसे कभी भरोसेमंद संकेत नहीं मानते. शरीर का चुप रहना हमेशा सुरक्षित होने का संकेत नहीं होता. कई बार यह सिर्फ उस समय की शांति होती है, जब अंदर ही अंदर नुकसान धीरे-धीरे बढ़ रहा होता है. चलिए आपको बताते हैं कि एक्सपर्ट क्या कहते हैं.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट
डॉ हरीश भाटिया, जो श्वसन रोग एक्सपर्ट हैं, उन्होंने TOI को बताया कि उनके पास रोज ऐसे लोग आते हैं जो खुद को बिल्कुल ठीक बताते हैं. उन्हें लगता है कि सब सामान्य है, जबकि असल में शरीर के भीतर बदलाव शुरू हो चुके होते हैं. &amp;nbsp;उनका कहना है कि फेफड़े शुरुआती दौर में शिकायत नहीं करते. वे हवा को साफ करते हैं, छोटे-छोटे नुकसान की मरम्मत करते हैं और लंबे समय तक दबाव झेलते रहते हैं. &amp;nbsp;लेकिन रोज-रोज धूम्रपान से जो जहरीले तत्व शरीर में जाते हैं, उनका असर धीरे-धीरे जमा होता रहता है.&amp;nbsp;
समस्या यह है कि जब शरीर किसी स्थिति के साथ तालमेल बैठा लेता है, तो हमें लगता है सब ठीक है. &amp;nbsp;जैसे किसी शोर के साथ धीरे-धीरे आदत हो जाती है, वैसे ही शरीर भी इस नुकसान को सहन करने लगता है, &amp;nbsp;लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि नुकसान रुक गया है.&amp;nbsp;
क्या ठीक लगने से सबकुछ ठीक होता है
डॉ भाटिया के अनुसार, ठीक महसूस करना इस बात का संकेत नहीं है कि आप सुरक्षित हैं, बल्कि यह दिखाता है कि शरीर अभी तक खुद को संभाल रहा है. अंदर ही अंदर कई बदलाव होते रहते हैं, सांस की नलियां धीरे-धीरे संकरी होने लगती हैं, लंग्स की लचक कम हो जाती है, ब्लड वेसल्स सख्त होने लगती हैं और शरीर में ऑक्सीजन का फ्लो प्रभावित होता है. यह सब बिना किसी दर्द या स्पष्ट संकेत के सालों तक चलता रहता है.
धीरे- धीरे विकसित होती है दिक्कत
डॉ पंकज खटाना, जो सामान्य रोग एक्सपर्ट हैं, बताते हैं कि धूम्रपान से जुड़ी बीमारियां अचानक नहीं आतीं, बल्कि धीरे-धीरे विकसित होती हैं. इसमें सांस से जुड़ी पुरानी बीमारी, लंग्स का कैंसर और दिल की बीमारी शामिल हैं. अक्सर इनका पता तब चलता है जब शरीर पहले ही काफी नुकसान झेल चुका होता है. &amp;nbsp;वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन और भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट्स भी बताती हैं कि तंबाकू से जुड़ी बीमारियां रोकी जा सकने वाली मौतों का बड़ा कारण हैं.
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सबसे खतरनाक बात यह है कि कई बार पहला संकेत ही गंभीर होता है, जैसे दिल का दौरा या लकवा. डॉ खटाना कहते हैं कि जब तक लक्षण सामने आते हैं, तब तक शरीर काफी नुकसान झेल चुका होता है. यही वजह है कि मैं ठीक हूं वाली सोच जोखिम भरी हो सकती है.&amp;nbsp;
किन चीजों से मिलता है फायदा
अच्छी बात यह है कि धूम्रपान छोड़ने से किसी भी उम्र में फायदा मिलता है. &amp;nbsp;कुछ ही दिनों में दिल की धड़कन और रक्तचाप सामान्य होने लगते हैं, महीनों में लंग्स की काम करने की क्षमता सुधरती है और समय के साथ गंभीर बीमारियों का खतरा भी कम होता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 02 May 2026 00:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Healthy Diet After 60 : 60 साल के बाद कैसे रखें दिल&amp;किडनी और लिवर का ख्याल? इस डाइट से 100 साल होगी उम्र</title>
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        <description><![CDATA[ Healthy Diet After 60: जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, शरीर की जरूरतें बदलने लगती हैं. 60 साल के बाद शरीर पहले जितनी तेजी से काम नहीं करता, पाचन धीमा हो जाता है, मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं और दिल, किडनी और लिवर पर ज्यादा दबाव पड़ने लगता है. इस उम्र में सही खानपान और अच्छी लाइफस्टाइल अपनाना बहुत जरूरी हो जाता है. अगर आप बैलेंस डाइट लेते हैं और थोड़ी-बहुत नियमित एक्सरसाइज करते हैं, तो न सिर्फ बीमारियों से बच सकते हैं बल्कि लंबी और हेल्दी लाइफ भी जी सकते हैं. यहां तक कि 90 या 100 साल तक भी, तो आइए जानते हैं कि 60 साल के बाद दिल-किडनी और लिवर का ख्याल कैसे रखें और कौन सी डाइट सबसे बेहतर होती है?
60 के बाद शरीर में क्या बदलाव आते हैं
उम्र बढ़ने के साथ शरीर में कई बदलाव होते हैं. जैसे मेटाबॉलिज्म धीमी हो जाती है. भूख कम लग सकती है. मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं. शरीर में पानी की कमी जल्दी हो सकती है. दिल और ब्लड प्रेशर की समस्याएं बढ़ सकती हैं. कोलेस्ट्रॉल और शुगर बढ़ने का खतरा रहता है. इसी वजह से बुजुर्गों को कम लेकिन पोषण से भरपूर खाना खाने की सलाह दी जाती है.&amp;nbsp;
60 साल के बाद दिल का ख्याल कैसे रखें?
दिल को स्वस्थ रखने के लिए सबसे जरूरी सही खानपान और नियमित एक्टिविटी है.वहीं दिल को हेल्दी रखने के लिए तला-भुना और बाहर का खाना कम करें. नमक कम खाएं. एक्सट्रा फैट जैसे घी, बटर, फास्ट फूड कम करें. साथ ही ओमेगा-3 फैटी एसिड वाला खाना खाएं. जैसे मछली, अखरोट, अलसी के बीज, ओलिव ऑयल, फल और सब्जियां, साबुत अनाज. इसके अलावा रोज 20-30 मिनट टहलना दिल के लिए बहुत फायदेमंद है और धूम्रपान पूरी तरह छोड़ दें.&amp;nbsp;
60 साल के बाद किडनी को कैसे सुरक्षित रखें?
&amp;nbsp;किडनी को स्वस्थ रखने के लिए सबसे जरूरी है कि आप अपने खानपान और लाइफस्टाइल का ध्यान रखें. किडनी शरीर से गंदगी और अतिरिक्त पानी को बाहर निकालने का काम करती है. ऐसे में ज्यादा नमक और प्रोसेस्ड फूड जैसे पैकेट वाले या बाहर के खाने से बचना चाहिए. रोजाना पर्याप्त मात्रा में पानी पीना जरूरी है, लगभग 7-10 गिलास. साथ ही बिना डॉक्टर की सलाह के कोई भी दवा नहीं लेनी चाहिए, क्योंकि कुछ दवाएं किडनी को नुकसान पहुंचा सकती हैं. साथ ही डायबिटीज और ब्लड प्रेशर को कंट्रोल में रखना बहुत जरूरी. इसके अलावा अच्छी डाइट में ताजे फल जैसे सेब और नाशपाती, हरी सब्जियां, हल्का और घर का बना खाना शामिल करना चाहिए.&amp;nbsp;
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लिवर को कैसे स्वस्थ रखें?
लिवर शरीर का फिल्टर है, जो टॉक्सिन्स को साफ करता है. लिवर को हेल्दी रखने के लिए शराब से पूरी तरह दूरी रखें. बहुत ज्यादा मीठा और फैटी खाना कम करें और वजन कंट्रोल में रखें. लिवर के लिए अच्छे फूड्स जैसे हरी सब्जियां (पालक, मेथी), हल्दी वाला दूध, नींबू पानी, दालें और बीन्स, पर्याप्त पानी अपने रूटीन में शामिल करें.&amp;nbsp;
60 के बाद कैसा होना चाहिए डेली डाइट प्लान?
1. 60 साल के बाद डेली डाइट प्लान में सुबह की शुरुआत गुनगुने पानी या नींबू पानी से करनी चाहिए, इसके बाद हल्का नाश्ता जैसे दलिया, ओट्स या ताजे फल लेना अच्छा रहता है जिससे दिन की एनर्जी सही तरीके से मिल सके.
2. दोपहर के खाने में 2-3 रोटी , दाल या पनीर, हरी सब्जियां और सलाद शामिल करना चाहिए. जिससे प्रोटीन, फाइबर और विटामिन का संतुलन बना रहे.
3. शाम के समय हल्का नाश्ता जैसे फल, भुना चना या थोड़े नट्स लेना बेहतर होता है जिससे भूख भी कंट्रोल रहे और तला-भुना खाने का मन कम हो.
4. रात का खाना हल्का रखना चाहिए, जिसमें कम तेल और कम मसाले वाला खाना हो, जिससे पाचन आसानी से हो सके और नींद भी अच्छी आए.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 01 May 2026 08:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Summer Health Tips:  क्या गर्मियों में आपको भी कम लगती है भूख, जानें ऐसा होना कब सही और कब खतरनाक?</title>
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        <description><![CDATA[ Summer Health Tips:&amp;nbsp; गर्मियों का मौसम आते ही कई लोगों को यह महसूस होता है कि उनकी भूख पहले की तुलना में कम हो गई है. यह बदलाव अक्सर चिंता का कारण बनता है, लेकिन हर बार ऐसा होना गलत नहीं होता. &amp;nbsp;दरअसल, एक्सपर्ट्स के अनुसार, तेज गर्मी में शरीर खुद को ठंडा रखने के लिए अपने काम करने के तरीके में बदलाव करता है. इसी वजह से भूख कम लगना एक सामान्य प्रक्रिया हो सकती है. शरीर का मेटाबॉलिज्म थोड़ा धीमा हो जाता है ताकि ज्यादा गर्मी पैदा न हो, जिससे खाने की इच्छा भी कम हो जाती है.&amp;nbsp;
&amp;ldquo;गर्मी से निपटने के लिए शरीर भूख को धीमा कर देता है&amp;rdquo;: एक्सपर्ट की राय
डॉक्टर के अनुसार, &amp;ldquo;the body slows hunger to beat the heat&amp;rdquo; यानी शरीर गर्मी से बचने के लिए भूख को खुद ही कम कर देता है. जब बाहर का तापमान ज्यादा होता है, तो शरीर पाचन प्रक्रिया को धीमा कर देता है क्योंकि खाना पचाने में ऊर्जा लगती है और इससे शरीर में गर्मी बढ़ती है. यही कारण है कि गर्मियों में हल्का और कम खाना खाने का मन करता है. यह शरीर का एक तरह का एडजस्टमेंट है, जिससे वह खुद को ओवरहीट होने से बचाता है.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ेंः गर्मी में गन्ने का जूस पीना आपके लिए कितना सुरक्षित? डॉक्टर ने बताएं इसके छिपे खतरे
कब भूख कम लगना सामान्य माना जाता है?
अगर आपको गर्मियों में हल्की भूख लग रही है लेकिन आप सामान्य रूप से पानी पी रहे हैं, एक्टिव हैं और कोई कमजोरी महसूस नहीं हो रही, तो यह स्थिति सामान्य मानी जाती है. ऐसे समय में लोग अक्सर फल, सलाद, दही और लिक्विड चीजें ज्यादा पसंद करते हैं. साथ ही शरीर खुद ही ऐसे फूड की मांग करता है जो हल्के हों और आसानी से पच जाएं. यह संकेत है कि शरीर मौसम के हिसाब से खुद को ढाल लेता है और इसमें घबराने की जरूरत नहीं होती.&amp;nbsp;
कब बन सकता है यह खतरे का संकेत?
हालांकि हर बार भूख कम लगना सही नहीं होता. अगर लंबे समय तक भूख न लगे, तेजी से वजन घटने लगे, कमजोरी, चक्कर या डिहाइड्रेशन महसूस हो, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. साथ ही यह किसी अंदरूनी समस्या या बीमारी का संकेत हो सकता है. खासकर अगर भूख में कमी के साथ उल्टी, बुखार या लगातार थकान भी हो रही हो, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी है. यह स्थिति सिर्फ मौसम का असर नहीं बल्कि स्वास्थ्य से जुड़ी गंभीर समस्या भी हो सकती है.
खुद को कैसे रखें सुरक्षित और हेल्दी?
गर्मियों में भूख कम लगने पर जबरदस्ती ज्यादा खाने के बजाय संतुलित और हल्का आहार लेना बेहतर होता है. शरीर को हाइड्रेट रखना सबसे जरूरी है, इसलिए पानी, नारियल पानी और जूस का सेवन बढ़ाना चाहिए. साथ ही, छोटे-छोटे मील्स लेना फायदेमंद होता है. वही अगर आपको अपनी स्थिति सामान्य से अलग लग रही है, तो लापरवाही न करें और समय रहते मेडिकल सलाह लें. सही खानपान और सावधानी से आप गर्मियों में भी अपनी सेहत को बेहतर बनाए रख सकते हैं.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ेंः गर्मी से सिर्फ शरीर पर नहीं, ब्लड प्रेशर पर भी पड़ता है असर, जानें एक्सपर्ट ने क्या दी चेतावनी? ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 01 May 2026 08:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Pesticides Exposure Cancer Risk : पेस्टिसाइड्स के लगातार संपर्क से बढ़ सकता है 150% तक कैंसर का खतरा, नई स्टडी का दावा, जानें क्या है वजह</title>
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        <description><![CDATA[ Pesticides Exposure Cancer Risk : हम अपनी डेली लाइफ में जो खाना खाते हैं, जो पानी पीते हैं और जिस हवा में सांस लेते हैं, उसमें कई तरह के केमिकल मौजूद हो सकते हैं, इन्हीं में से एक जरूरी केमिकल समूह कीटनाशक यानी पेस्टिसाइड्स है, जिनका यूज खेती में फसलों को कीड़ों और बीमारियों से बचाने के लिए किया जाता है.&amp;nbsp;
हाल ही में एक नई अंतरराष्ट्रीय रिसर्च ने चिंता बढ़ा दी है. इस अध्ययन के अनुसार, जिन इलाकों में पेस्टिसाइड्स का ज्यादा यूज होता है, वहां रहने वाले लोगों में कुछ प्रकार के कैंसर होने का खतरा 150 प्रतिशत तक बढ़ सकता है. यह रिपोर्ट पर्यावरणीय स्वास्थ्य और रसायनों के प्रभाव को लेकर एक गंभीर चेतावनी मानी जा रही है.&amp;nbsp;
नई स्टडी क्या कहती है?
यह रिसर्च जर्नल Nature Health में प्रकाशित हुई है. इसमें बताया गया है कि लोग एक साथ सिर्फ एक नहीं कई पेस्टिसाइड्स के संपर्क में रहते हैं. पहले के अध्ययन सिर्फ एक-एक केमिकल को अलग-अलग देखकर किए जाते थे, लेकिन असली लाइफ में हम मिक्सचर एक्सपोजर यानी कई रसायनों के संयुक्त प्रभाव में रहते हैं. इस अध्ययन ने इस स्थिति को ध्यान में रखकर विश्लेषण किया है, जो इसे पहले की रिसर्च से ज्यादा जरूरी बनाता है. इस अध्ययन के लिए दक्षिण अमेरिकी देश पेरू को चुना गया.&amp;nbsp;
पेरू को क्यों चुना गया?
दक्षिण अमेरिकी देश पेरू में कृषि बड़े पैमाने पर होती है. अलग-अलग तरह के पर्यावरणीय क्षेत्र मौजूद हैं. सामाजिक और आर्थिक असमानताएं ज्यादा हैं. इसलिए इस अध्ययन के लिए &amp;nbsp;पेरू को चुना गया. ऐसे में यहां रिसर्च में पाया गया कि ग्रामीण और आदिवासी समुदाय सबसे ज्यादा प्रभावित हैं. कई लोगों पर एक साथ लगभग 12 अलग-अलग पेस्टिसाइड्स का असर पाया गया. ये स्तर कई जगहों पर काफी ज्यादा था.&amp;nbsp;
रिसर्च में कैसे किया गया विश्लेषण?
वैज्ञानिकों ने 31 सामान्य रूप से इस्तेमाल होने वाले पेस्टिसाइड्स का अध्ययन किया. 2014 से 2019 तक उनके फैलाव को ट्रैक किया और 2007 से 2020 तक 1.5 लाख से ज्यादा कैंसर मरीजों के स्वास्थ्य डेटा से तुलना की, रिसर्च में पाया गया कि जिन क्षेत्रों में पेस्टिसाइड्स का स्तर ज्यादा था, वहां कैंसर के मामले भी ज्यादा थे. खास बात यह है कि जिन पेस्टिसाइड्स का अध्ययन किया गया, वे अभी तक WHO के तहत कैंसर पैदा करने वाले (carcinogenic) नहीं माने गए हैं. इसके बावजूद उनके संयुक्त प्रभाव से स्वास्थ्य पर गंभीर असर देखा गया.&amp;nbsp;
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शरीर पर क्या असर होता है?
रिसर्च के अनुसार, पेस्टिसाइड्स शरीर में धीरे-धीरे असर डालते हैं. यह कोशिकाओं (cells) के सामान्य कामों में बाधा डालते हैं. लंबे समय में शरीर की इम्यूनिटी कमजोर कर सकते हैं. इससे लिवर सबसे ज्यादा प्रभावित होता है. यह बदलाव तुरंत दिखाई नहीं देते, लेकिन समय के साथ गंभीर बीमारियों का कारण बन सकते हैं. आज के समय में रसायनों की सुरक्षा जांच आमतौर पर एक-एक केमिकल को अलग-अलग जांचती है और उसके लिए सुरक्षित सीमा तय करती है, लेकिन समस्या यह है कि असली जिंदगी में लोग एक साथ कई रसायनों के संपर्क में रहते हैं.&amp;nbsp;
रिसर्च में और क्या-क्या बताया गया?
रिसर्च यह भी बताती है कि एल नीनो (El Ni&amp;ntilde;o) जैसे जलवायु बदलाव पेस्टिसाइड्स के उपयोग और उनके फैलाव को प्रभावित कर सकते हैं. इससे पर्यावरण में इन रसायनों की मात्रा और बढ़ सकती है. हालांकि यह अध्ययन पेरू पर आधारित है, लेकिन इसके निष्कर्ष दुनिया भर पर लागू हो सकते हैं क्योंकि कई देशों में बड़े पैमाने पर खेती होती है, पेस्टिसाइड्स का उपयोग सामान्य है. नियम और निगरानी हर जगह एक जैसी नहीं है. इसलिए यह एक वैश्विक स्वास्थ्य चिंता बन सकती है.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 30 Apr 2026 20:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Summer Migraine Problem: गर्मियों में क्यों बढ़ जाते हैं माइग्रेन के मामले, इससे बचने के लिए क्या करें?</title>
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        <description><![CDATA[ 
Summer Migraine Problem: जैसे-जैसे तापमान बढ़ता है और लाइफस्टाइल बदलता है, वैसे-वैसे माइग्रेन से जूझ रहे लोगों की परेशानी भी बढ़ने लगती है. डॉक्टर के अनुसार माइग्रेन साल भर रहने वाली न्यूरोलॉजिकल समस्या है. लेकिन गर्मियों में इसके अटैक की संख्या और तीव्रता दोनों बढ़ जाती है. इसका सीधा कारण गर्मी नहीं, बल्कि इस मौसम में बढ़ने वाले ट्रिगर्स होते हैं. न्यूरोलॉजिस्ट के अनुसार जिन लोगों को पहले से माइग्रेन की समस्या है, उनमें गर्मियों के दौरान अटैक ज्यादा बार आते हैं. इसकी वजह पर्यावरण और लाइफस्टाइल से जुड़े ऐसे कारक हैं, जिन्हें इस मौसम में कंट्रोल करना मुश्किल हो जाता है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि गर्मियों में माइग्रेन के मामले क्यों बढ़ जाते हैं और इससे बचने के लिए आप क्या कर सकते हैं?
डिहाइड्रेशन बनता है बड़ा कारण
गर्मी के मौसम में पसीने के जरिए ज्यादा पानी निकलता है, जिससे डिहाइड्रेशन होता है जो माइग्रेन ट्रिगर करने का सबसे बड़ा कारण माना जाता है. शरीर में पानी की कमी से ब्लड फ्लो और ब्रेन फंक्शन प्रभावित होते हैं, जिससे सिर दर्द शुरू हो सकता है. हल्की पानी की कमी भी संवेदनशील लोगों में अटैक का कारण बन सकती है.
तेज धूप और रोशनी बढ़ाती है परेशानी
तेज धूप और उसकी चमक माइग्रेन के मरीजों के लिए परेशानी बढ़ा सकती है. लंबे समय तक धूप में रहने से आंखों और दिमाग पर दबाव पड़ता है, जिससे सिर दर्द शुरू हो सकता है. खासकर दोपहर के समय बाहर रहना खतरे को और बढ़ा देता है.
बदलती लाइफस्टाइल भी है जिम्मेदार
गर्मियों में लोगों की दिनचर्या अक्सर बदल जाती है. देर रात तक जागना, समय पर खाना न खाना, यात्रा और थकान यह सब माइग्रेन को ट्रिगर करते हैं. नींद की कमी, खाली पेट रहना और ज्यादा थकावट अटैक को और गंभीर बना सकते हैं.
शहरों में रहने वाले लोगों में खतरा ज्यादा
शहरी इलाकों में रहने वाले लोगों को माइग्रेन का खतरा और ज्यादा हो सकता है. कंक्रीट और प्रदूषण के कारण शहरों में तापमान ज्यादा रहता है, जिससे शरीर पर एक्स्ट्रा दबाव पड़ता है और ट्रिगर्स तेज हो जाते हैं. वहीं माइग्रेन केवल साधारण सिर दर्द नहीं होता है, इसमें सिर के एक तरफ तेज धड़कता हुआ दर्द, मतली, उल्टी, तेज रोशनी और आवाज से परेशानी, चक्कर और थकान जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं. कई मामलों में यह दर्द कई घंटे से लेकर 2 से 3 दिन तक रह सकता है.
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बचाव के लिए क्या करें?
गर्मियों में माइग्रेन से बचाव के लिए आप कोशिश करें कि दिनभर पर्याप्त मात्रा में पानी पिए. धूप में निकलने से बचें, खासकर दोपहर के समय में. वहीं बाहर जाते समय चश्मा या सिर ढक कर रखें. समय पर संतुलित भोजन करें, रोजाना 7 से 8 घंटे की नींद लें और ज्यादा थकान और शरीर को ओवरहीट होने से बचाएं. इसके अलावा अगर माइग्रेन के अटैक पहले से ज्यादा बार आने लगे, दर्द ज्यादा तेज हो जाए या रोजमर्रा की जिंदगी पर असर डालने लगे तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है.
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        <pubDate>Thu, 30 Apr 2026 04:30:11 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Biryani and Watermelon Myth: क्या बिरयानी के बाद तरबूज खाना जानलेवा है? जानिए&amp; क्या कहते हैं डॉक्टर्स</title>
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        <description><![CDATA[ Biryani and Watermelon Myth: मुंबई से सामने आई एक दर्दनाक घटना ने लोगों के मन में कई सवाल खड़े कर दिए हैं. दरअसल एक ही परिवार के चार लोगों की बिरयानी खाने से अचानक तबीयत बिगड़ी जिसके बाद उनकी मौत हो गई. बताया जा रहा है कि परिवार के सदस्यों ने बिरयानी खाने के बाद तरबूज खाया था, जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था. लेकिन इस घटना के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या बिरयानी खाने के बाद तरबूज खाना जानलेवा हो सकता है. हालांकि कई डॉक्टर भी इसे लेकर अपनी-अपनी राय बता रहे हैं. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि क्या बिरयानी खाने के बाद तरबूज जानलेवा है, इसे लेकर डॉक्टर क्या कहते हैं. क्या बिरयानी और तरबूज साथ खाने से हो सकती है मौत?मेडिकल एक्सपर्ट्स के अनुसार बिरयानी और तरबूज जैसे फूड आइटम्स को साथ या थोड़े अंतराल में खाने से सीधे मौत होना संभव नहीं है. डॉक्टर Ishwar gilada का कहना है कि यह दोनों अलग-अलग तरह के फूड है, जिनका पाचन समय अलग-अलग हो सकता है. लेकिन इसे तुरंत जानलेवा स्थिति बनना सामान्य नहीं है. डॉक्टर के अनुसार इस तरह के मामलों में सबसे पहले शक फूड प्वाइजनिंग पर जाता है. अगर खाना या फल लंबे समय तक खुले में रखा हो या बासी हो जाए तो उसमें खतरनाक बैक्टीरिया हो सकते हैं. स्टैफिलोकोकस, साल्मोनेला और ई. कोलाई जैसे बैक्टीरिया खाने के जरिए शरीर में पहुंचकर उल्टी, दस्त और गंभीर संक्रमण का कारण बनते हैं. कुछ मामलों में यह स्थिति से सेप्सिस तक पहुंच सकती है जो जानलेवा हो सकती है. क्या फूड प्वाइजनिंग से तुरंत हो सकती है मौत?डॉक्टर बताते हैं कि फूड प्वाइजनिंग के बाद शरीर में लक्षण विकसित होने और स्थिति गंभीर होने में आमतौर पर कुछ समय लगता है. अगर व्यक्ति पहले से हेल्दी हो तो इंफेक्शन से लड़ने की कोशिश करता है. हालांकि लगातार उल्टी-दस्त होने पर शरीर में पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी हो जाती है, जिससे ब्लड प्रेशर अचानक गिर सकता है और शॉक की स्थिति बन सकती है. यही स्थिति कुछ मामले में खतरनाक साबित हो सकती है. खाने के कांबिनेशन को लेकर क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि नॉनवेज और पानी से भरपूर फलों का पाचन समय अलग होता है. तरबूज जल्दी पचता है, जबकि मांस को पचाने में ज्यादा समय लगता है. ऐसे में दोनों साथ खाने पर पाचन संबंधी दिक्कतें हो सकती है, लेकिन इसे सीधे मौत की वजह नहीं माना जा सकता है. ये भी पढ़ें-प्रेग्नेंसी के टाइम मलेरिया तो हो जाएं सावधान, बन सकता है प्रीमैच्योर डिलीवरी की वजह&amp;nbsp;
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एक्सपर्ट्स ने कहा जांच के बाद ही साफ होगी तस्वीर इंफेक्शन स्पेशलिस्ट डॉ. ईश्वर गिलाडा के अनुसार इस तरह की घटना में असली कारण जानना आसान नहीं होता है. उन्होंने कहा कि अगर एक ही खाना कई लोगों ने खाया और सभी प्रभावित नहीं हुए तो यह देखना जरूरी है कि पीड़ितों ने अलग से क्या खाया या कोई अन्य वजह तो नहीं थी. उनके अनुसार सड़ा हुआ खाना बैक्टीरियल इन्फेक्शन का कारण बन सकता है, लेकिन कुछ मामलों में बाहरी कारण जैसे किसी केमिकल या टॉक्सिन की मिलावट की आशंकाओं से भी इनकार नहीं किया जा सकता है. उन्होंने साफ कहा की मौत की असली वजह पोस्टमार्टम और फोरेंसिक जांच के बाद ही सामने आएगी. डॉक्टर बताते हैं कि कई बार तरबूज में कलर लाने के लिए कोई केमिकल इंजेक्ट किया जाता है. अगर वह केमिकल कॉन्टैमिनेटेड है या फिर किसी ने फौल प्ले करके उसमें टॉक्सिन डाला है या कुछ जहर डाला है तो इससे तरबूज खाने वालों के शरीर में जहर फैल सकता है. लेकिन चारों लोगों की मौत कैसे हुई यह जानकारी पोस्टमार्टम के बाद ही पूरी तरह स्पष्ट हो पाएगी.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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        <pubDate>Tue, 28 Apr 2026 08:30:04 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Breast Cancer: जांच में देरी बन रही खतरा! देश में तेजी से बढ़ रहे ब्रेस्ट कैंसर के मामले, स्टडी में अहम खुलासा</title>
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        <description><![CDATA[ Breast Cancer:&amp;nbsp;ब्रेस्ट कैंसर आज के समय में महिलाओं में होने वाली सबसे आम बीमारियों में से एक है. यह तब शुरू होता है जब स्तन की कुछ कोशिकाएं जरूरत से ज्यादा तेजी से बढ़ने लग जाती हैं और एक गांठ बना लेती हैं. अगर इसे शुरुआती समय में पहचान लिया जाए, तो इसका इलाज काफी हद तक संभव होता है. लेकिन समस्या तब गंभीर हो जाती है, जब यह कैंसर शरीर के दूसरे हिस्सों में फैलने लगता है. इस प्रक्रिया को मेटास्टेसिस (Metastasis) कहा जाता है. इसमें कैंसर की कोशिकाएं खून के जरिए शरीर के अन्य अंगों जैसे हड्डियों, फेफड़ों या लिवर तक पहुंच सकती हैं.
जब तक महिलाएं इसे दिखाने अस्पताल तक पहुंचती हैं, तब तक यह उनके पूरे शरीर में फैल चुका होता है, जिसे डॉक्टर&#039;डी नोवो मेटास्टेटिक डिजीज&#039; (De Novo Metastatic Disease) कहते हैं. एक बड़ी हॉस्पिटल आधारित स्टडी में यह बात सामने आई है, जो न केवल हमें कैंसर के बारे में बल्कि पूरे भारतीय हेल्थकेयर सिस्टम की स्थिति के बारे में भी बताती है.
क्या है स्टडी?
नेशनल कैंसर रजिस्ट्री के हॉस्पिटल बेस्ड कैंसर रजिस्ट्री के 76 हजार ब्रेस्ट कैंसर मरीजों के डेटा के आधार पर इस रिसर्च को किया गया है. इसमें यह सामने आया कि लगभग 13 प्रतिशत महिलाएं मेटास्टेटिक ब्रेस्ट कैंसर का शिकार हैं, जबकि अमेरिका में यह आंकड़ा करीब 6 प्रतिशत है. इसके अलावा, स्टडी में यह भी पाया गया कि भारत में कई महिलाएं स्टेज 3 या स्टेज 4 पर जाकर ही इलाज करवाती हैं, जिससे इलाज जटिल और महंगा हो जाता है. देर से जांच, जागरूकता की कमी और नियमित स्क्रीनिंग का अभाव इसके बड़े कारण माने गए हैं.
क्या होता है कारण?
इस स्टडी से यह बात स्पष्ट हुई है कि उम्र का मेटास्टेटिक बीमारी से सीधा संबंध नहीं होता और न ही पहले से मौजूद बीमारियां जैसे डायबिटीज या हाइपरटेंशन इसके मुख्य कारण हैं. असली कारण ट्यूमर की प्रकृति होती है. ट्यूमर कितना बड़ा है, कितना आक्रामक है और शरीर में कितनी दूर तक फैल चुका है, यही सब बातें बीमारी की गंभीरता तय करती हैं.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?
अपोलो एथेना वुमन कैंसर सेंटर की लीड डॉ. गीता कडायप्रथ बताती हैं कि ब्रेस्ट कैंसर मुख्य रूप से दो तरीकों से फैलता है. पहला, लिम्फ नोड्स के जरिए, जो ब्रेस्ट से होते हुए बगल, गर्दन और छाती तक संक्रमण फैलाते हैं. दूसरा, ब्लडस्ट्रीम के जरिए. ब्रेस्ट में ब्लड वेसल्स का बड़ा नेटवर्क होता है, जो कैंसर कोशिकाओं को हड्डियों, स्पाइन और पेल्विस तक पहुंचा देता है. उन्होंने आगे बताया कि कैंसर का फैलाव उसके प्रकार पर भी निर्भर करता है. हार्मोन सेंसिटिव कैंसर आमतौर पर हड्डियों में तेजी से फैलता है, जबकि ट्रिपल नेगेटिव ब्रेस्ट कैंसर ज्यादा आक्रामक होता है और अक्सर दिमाग और फेफड़ों तक फैल सकता है, साथ ही लीवर को भी प्रभावित कर सकता है.
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अस्पताल का चुनाव
स्टडी के इस पहलू ने एक गंभीर तस्वीर सामने रखी है. जिन महिलाओं का इलाज प्राइवेट NGO द्वारा संचालित अस्पतालों में हुआ, उनमें मेटास्टेसिस का खतरा अपेक्षाकृत कम पाया गया. वहीं, सरकारी या पब्लिक कैंसर सेंटर में इलाज कराने वाली महिलाओं में यह खतरा ज्यादा देखा गया. यह अंतर कई कारणों से हो सकता है, जैसे जांच में देरी, सुविधाओं की कमी, लंबी कतारें और विशेषज्ञ डॉक्टरों तक समय पर पहुंच न होना. यह भारत के हेल्थकेयर सिस्टम की एक कड़वी सच्चाई को उजागर करता है, जहां समय पर इलाज और जागरूकता की कमी अब भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है.
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        <pubDate>Sun, 26 Apr 2026 12:30:09 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Healthy Diet Tips: कमजोर पेट के लिए बेहतरीन हैं आसानी से पचने वाली ये 5 दालें, नहीं होगी गैस और भारीपन की समस्या</title>
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        <description><![CDATA[ Healthy Diet Tips: कमजोर पेट के लिए बेहतरीन हैं आसानी से पचने वाली ये 5 दालें, नहीं होगी गैस और भारीपन की समस्या ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 26 Apr 2026 12:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>IVF Success Factors: मां बनने की राह में &amp;apos;स्ट्रेस&amp;apos; बड़ा रोड़ा... तनाव&amp;एंग्जायटी से घट रहा IVF का सक्सेस रेट</title>
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        <description><![CDATA[ IVF Success Factors: मां बनने का सपना हर महिला के लिए खास होता है, लेकिन जब यह सपना आसानी से पूरा नहीं होता तो IVF जैसे इलाज उम्मीद की एक नई किरण बनकर सामने आती है. इसी बीच एक नई स्टडी ने इस सफर से जुड़ी एक अहम सच्चाई को सामने लाया है. रिपोर्ट के अनुसार IVF ट्रीटमेंट के दौरान महिलाओं का मानसिक स्वास्थ्य और भावनात्मक स्वास्थ्य यानी उनका स्ट्रेस और एंग्जायटी लेवल, इसके परिणामों को प्रभावित कर सकता है. वही जिन महिलाओं में तनाव कम पाया गया, उनमें IVF के सफल होने की संभावना अधिक देखी गई है. इससे साफ होता है कि इलाज के साथ-साथ मानसिक संतुलन भी बेहद जरूरी है.
स्टडी में क्या सामने आया?
पुणे के एक IVF सेंटर में की गई इस स्टडी में लगभग 120 महिलाओं को शामिल किया गया. इस दौरान उनके स्ट्रेस और एंग्जायटी लेवल को मापा गया और फिर IVF के नतीजों से तुलना किया गया. आंकड़ों के अनुसार करीब 40 प्रतिशत महिलाओं का IVF सफल रहा. इन महिलाओं का एंग्जायटी स्कोर औसतन 5.5 था, जबकि जिनका IVF सफल नहीं हुआ उनका स्कोर 6.7 तक पाया गया. इसी तरह स्ट्रेस स्कोर में भी अंतर देखा गया, जहां सफल मामलों में यह 7.4 था और असफल मामलों में 8.7 तक पहुंच गया. यह साफ संकेत देता है कि ज्यादा तनाव ट्रीटमेंट के नतीजों को प्रभावित कर सकता है.
यह भी पढ़ेंः बिना वजह मोबाइल फोन स्क्रॉल करने की पड़ गई आदत, जानिए इसका दिमाग पर क्या पड़ता है असर?
एक्सपर्ट्स की क्या है राय?
फर्टिलिटी एक्सपर्ट्स का कहना है कि स्ट्रेस केवल मानसिक समस्या नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर शरीर पर भी पड़ता है. डॉक्टरों के अनुसार लंबे समय तक रहने वाला तनाव शरीर में कोर्टिसोल हार्मोन को बढ़ा देता है, जिससे हार्मोनल बैलेंस बिगड़ सकता है. इंडिया आईवीएफ फर्टिलिटी की डॉक्टर ऋचिका सहाय शुक्ला के अनुसार, आईवीएफ कराने वाली बहुत सी महिलाएं सिर्फ शारीरिक रूप से ही नहीं, बल्कि सालों की चिंता और बार-बार नाकामयाब होने की वजह से मन से भी बहुत थक चुकी होती हैं. इसका असर एग क्वालिटी पर पड़ता है और IVF के रिजल्ट को भी प्रभावित कर सकता है. एक्सपर्ट्स यह भी बताते हैं कि IVF की प्रक्रिया भावनात्मक रूप से काफी चुनौतीपूर्ण होती है, क्योंकि इसमें महिलाओं को अनिश्चितता और कई बार असफलता का सामना करना पड़ता है. भारत में करीब 2.8 करोड़ लोग बांझपन की समस्या से जूझ रहे हैं, और हर साल लगभग 3 से 3.5 लाख आईवीएफ उपचार किए जाते हैं.
इन्फर्टिलिटी और स्ट्रेस का संबंध
इन्फर्टिलिटी को मेडिकल तौर पर तब माना जाता है जब 12 महीने तक नियमित और असुरक्षित संबंध के बाद भी गर्भधारण न हो. स्टडी के अनुसार लगभग 9 प्रतिशत कपल्स इस समस्या से जूझ रहे हैं. इसे जिंदगी के सबसे बड़े तनावों में से एक माना जाता है, जो लोगों को मानसिक रूप से काफी परेशान कर सकता है. इससे प्रभावित लोगों में चिंता, उदासी और ज्यादा तनाव जैसी समस्याएं अक्सर देखने को मिलती हैं. रिसर्च में यह भी सामने आया है कि IVF ट्रीटमेंट के दौरान मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना उतना ही जरूरी है जितना मेडिकल इलाज, क्योंकि दोनों मिलकर ही बेहतर परिणाम देने में मदद करते हैं. डॉ. शुक्ला के मुताबिक, जिन महिलाओं को सही जानकारी दी जाती है, उन्हें भरोसा दिलाया जाता है और भावनात्मक सहारा मिलता है, वे अक्सर इलाज में बेहतर परिणाम दिखाती हैं.
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        <pubDate>Sun, 26 Apr 2026 12:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>IVF, Success, Factors:, मां, बनने, की, राह, में, स्ट्रेस, बड़ा, रोड़ा..., तनाव-एंग्जायटी, से, घट, रहा, IVF, का, सक्सेस, रेट</media:keywords>
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        <title>Summer Heatwave Tips: हीटवेव से बेहाल! तेज गर्मी में क्या करें और क्या न करें? डॉक्टर से जानें बचाव के 6 आसान उपाय</title>
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        <description><![CDATA[ Summer Heatwave Tips: हीटवेव से बेहाल! तेज गर्मी में क्या करें और क्या न करें? डॉक्टर से जानें बचाव के 6 आसान उपाय ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 26 Apr 2026 12:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>Scalp Sunburn: सिर्फ त्वचा ही नहीं, स्कैल्प भी हो सकता है सनबर्न का शिकार, एक्सपर्ट बोले&amp; इसे न करें नजरअंदाज</title>
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        <description><![CDATA[ Scalp Sunburn: सिर्फ त्वचा ही नहीं, स्कैल्प भी हो सकता है सनबर्न का शिकार, एक्सपर्ट बोले- इसे न करें नजरअंदाज ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 26 Apr 2026 12:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>Endless Scrolling: बिना वजह मोबाइल फोन स्क्रॉल करने की पड़ गई आदत, जानिए इसका दिमाग पर क्या पड़ता है असर?</title>
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        <description><![CDATA[ Endless scrolling: इंटरनेट पर शॉर्ट वीडियो की स्क्रॉलिंग आप भी करते होंगे, स्क्रॉलिंग करते समय बस दिमाग में यह चल रहा होता है कि बस कुछ वीडियो और, 2-4 वीडियो और, और यही थोड़ा-थोड़ा कब घंटों में बदल जाता है पता ही नहीं चलता. अंत में बस यह सोचते हैं कि आज काफी समय बर्बाद हो गया. बात सही है, समय तो बर्बाद होता है, लेकिन आपको पता है इससे आपके मस्तिष्क पर क्या प्रभाव पड़ता है? यह आपके ध्यान केंद्रित करने की क्षमता और आपके आवेगों पर नियंत्रण करने की क्षमता को काफी ज्यादा प्रभावित करता है.
लगातार स्क्रॉलिंग की आदत...
शॉर्ट वीडियो को इस तरह से बनाया जाता है कि कम समय में ज्यादा बात या जानकारी दी जा सके. इनमें फास्ट जंप कट्स और अचानक ध्यान खींचने वाले विजुअल्स का इस्तेमाल होता है, जो तुरंत ही लोगों का ध्यान खींचकर उन्हें व्यस्त रखते हैं. इसमें शुरुआत में कोई समस्या नहीं दिखती, लेकिन लंबे समय के साथ यह आपके मस्तिष्क को प्रभावित करता है. Frontiers in Human Neuroscience द्वारा जारी की गई रिपोर्ट के मुताबिक, जिन लोगों को शॉर्ट वीडियो की लत होती है उनमें आत्म-नियंत्रण और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता कमजोर हो सकती है.
आपके मस्तिष्क पर इसका असर
शोधकर्ताओं ने एक रिसर्च की, जिसमें उन्होंने कुछ लोगों का EEG स्कैन किया जब वे ध्यान लगाने वाला काम कर रहे थे. उन्होंने पाया कि जो लोग ज्यादा स्क्रॉलिंग वाला कंटेंट देखते हैं, उनका दिमाग बाकी लोगों की तुलना में कम ध्यान केंद्रित कर पा रहा था.
यह भी पढ़ेंः Heat stroke: सूरज की तपिश से बढ़ने लगे हीट स्ट्रोक के मामले, डॉक्टर से जानें बचने के तरीके
शॉर्ट वीडियो की आदत कैसे लग जाती है?
शॉर्ट वीडियो की आदत धीरे-धीरे लगती है क्योंकि ये बहुत जल्दी-जल्दी नया और मजेदार कंटेंट दिखाती हैं. जब आप एक वीडियो देखते हैं तो वह आपको कोई भावनात्मक प्रतिक्रिया महसूस कराती है, जिससे आगे और वीडियो देखने का मन करने लगता है. लंबे समय तक आपका मस्तिष्क छोटे और तेज कंटेंट का आदी हो जाता है, जिसके बाद लंबी वीडियो देखने और समझने की इच्छा कम होने लगती है और आप धीरे-धीरे शॉर्ट वीडियो की लत में फंस जाते हैं.
यह सिर्फ ध्यान केंद्रित करने की बात नहीं है...
यह आपके दिमाग की काम करने की पूरी प्रक्रिया को प्रभावित करती है. लगातार छोटे-छोटे और तेज कंटेंट देखने की आदत से दिमाग तुरंत मिलने वाले इनाम का आदी हो जाता है, जिससे धैर्य कम होने लगता है और लंबे समय तक किसी एक काम पर फोकस करना मुश्किल हो जाता है. धीरे-धीरे सोचने-समझने की क्षमता और निर्णय लेने की क्षमता पर भी असर पड़ सकता है, क्योंकि दिमाग गहराई से सोचने की बजाय जल्दी-जल्दी बदलते कंटेंट के हिसाब से ढलने लग जाता है.
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&amp;nbsp; ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 26 Apr 2026 00:30:11 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>AC Side Effects:  गर्मियों में AC का ज्यादा उपयोग सेहत के लिए खतरनाक, जानिए डॉक्टरों ने क्या दी चेतावनी?</title>
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        <description><![CDATA[ AC Side Effects:  गर्मियों में AC का ज्यादा उपयोग सेहत के लिए खतरनाक, जानिए डॉक्टरों ने क्या दी चेतावनी? ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 24 Apr 2026 20:30:16 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Yawning Effect On Ears : जम्हाई लेते ही सुनाई क्यों देने लगता है साफ? जानिए इसके पीछे का कारण और एक्सपर्ट की राय</title>
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        <description><![CDATA[ Yawning Effect On Ears : हम सभी दिन में कई बार जम्हाई लेते हैं. कभी नींद आने पर, कभी थकान में, या कभी बिना किसी खास वजह के, आमतौर पर हम इसे सिर्फ नींद या बोरियत से जोड़कर देखते हैं, लेकिन शरीर में होने वाली यह साधारण सी क्रिया असल में कई काम करती है. आपने कई बार देखा होगा कि जम्हाई लेने के तुरंत बाद आसपास की आवाजें थोड़ी ज्यादा साफ और तेज सुनाई देने लगती हैं. यह कोई भ्रम नहीं है, बल्कि इसके पीछे वैज्ञानिक कारण मौजूद हैं. तो आइए आज हम आपको बताते हैं कि जम्हाई लेते ही साफ सुनाई क्यों देने लगता है और इसके पीछे का कारण और एक्सपर्ट की राय क्या है.&amp;nbsp;
जम्हाई का कानों पर क्या असर होता है?
हमारे कान के अंदर एक छोटी सी नली होती है जिसे Eustachian tube (यूस्टेशियन ट्यूब) कहा जाता है. यह नली हमारे मिडिल ईयर को गले से जोड़ती है. आमतौर पर यह बंद रहती है. जब हम जम्हाई लेते हैं, तो मुंह और जबड़े के खिंचाव की वजह से यह नली खुल जाती है. इससे कान के अंदर और बाहर के हवा के प्रेशर में संतुलन बन जाता है. ईयरड्रम &amp;nbsp;सही तरीके से हिलने लगता है. आवाजें ज्यादा साफ सुनाई देने लगती हैं. जम्हाई एक तरह से आपके कानों का रीसेट बटन दबा देती है.&amp;nbsp;
जम्हाई लेते ही साफ सुनाई क्यों देने लगता है?
जम्हाई लेते समय कान के अंदर मौजूद दो छोटे मांसपेशियां Tensor tympani muscle और Stapedius muscle, कुछ समय के लिए सक्रिय हो जाती हैं. ये कान की हड्डियों को थोड़ी देर के लिए टाइट कर देती हैं. इससे आवाज थोड़ी देर के लिए कम सुनाई देती है. जैसे ही ये मांसपेशियां रिलैक्स होती हैं, सुनने की क्षमता बेहतर महसूस होती है. इसलिए जम्हाई के बाद आपको आवाजें क्लियर लगती हैं.&amp;nbsp;
प्लेन में कान क्यों बंद हो जाते हैं और जम्हाई क्यों मदद करती है?
आपने महसूस किया होगा कि हवाई जहाज में सफर करते समय कान बंद हो जाते हैं और पॉप की आवाज आती है. इसका कारण भी वही प्रेशर का असंतुलन है. ऐसे में जम्हाई लेने से यूस्टेशियन ट्यूब खुलती है, दबाव बराबर होता है. साथ ही कान तुरंत हल्के और साफ महसूस होते हैं.
इसके पीछे का कारण
जम्हाई लेने से शरीर में ब्लड फ्लो थोड़ा बढ़ जाता है. इससे दिमाग ज्यादा एक्टिव महसूस करता है, सुनने की प्रक्रिया थोड़ी बेहतर हो सकती है और आप आसपास की आवाजों को ज्यादा ध्यान से पकड़ पाते हैं.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ें - Aspirin Cancer Prevention: क्या कैंसर के खतरे को कम कर सकती है एस्पिरिन? जान लें इसके पीछे की वजह
एक्सपर्ट की राय क्या है?
कुछ एक्सपर्ट मानते हैं कि जम्हाई हमारे शरीर का एक प्राकृतिक सुरक्षा तंत्र (defence mechanism) भी हो सकती है. यह कान के अंदर की मांसपेशियों को एक्टिव करती है. ये मांसपेशियां तेज या अंदरूनी आवाजों जैसे अपनी आवाज, दांत पीसना से कान को बचाती हैं. यह अंदरूनी शोर को कम करके बाहरी आवाजों को बेहतर सुनने में मदद करती है.&amp;nbsp;
कब हो सकती है समस्या?
अगर आपको बार-बार जम्हाई लेकर ही कान खोलने पड़ते हैं, या एक कान खुलता है, दूसरा नहीं, कान में भारीपन बना रहता है, बार-बार पॉप की जरूरत महसूस होती है तो यह यूस्टेशियन ट्यूब में दिक्कत का संकेत हो सकता है. इसके कारण एलर्जी, साइनस की समस्या या एसिड रिफ्लक्स हो सकते हैं. ऐसे में डॉक्टर, ENT स्पेशलिस्ट से सलाह लेना जरूरी है. &amp;nbsp;
यह भी पढ़ें - Oral Cancer Causes: क्या तंबाकू और शराब न पीने वालों को भी हो सकता है मुंह का कैंसर, जवाब सुन नहीं होगा यकीन&amp;nbsp;Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 24 Apr 2026 20:30:16 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Yawning, Effect, Ears, जम्हाई, लेते, ही, सुनाई, क्यों, देने, लगता, है, साफ, जानिए, इसके, पीछे, का, कारण, और, एक्सपर्ट, की, राय</media:keywords>
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        <title>Lung Detox Tips: सिगरेट पीते&amp;पीते कमजोर हो गए हैं लंग्स, ऐसे कर सकते हैं डिटॉक्स</title>
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        <description><![CDATA[ Lung Detox Tips: सिगरेट पीते-पीते कमजोर हो गए हैं लंग्स, ऐसे कर सकते हैं डिटॉक्स ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 24 Apr 2026 20:30:15 +0530</pubDate>
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        <title>Fake Weight Loss Injection: मोटापा कम करने वाला ये इंजेक्शन बाजार में मिल रहा नकली, जानें पहचानने का तरीका</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/fake-weight-loss-injection-मोटापा-कम-करने-वाला-ये-इंजेक्शन-बाजार-में-मिल-रहा-नकली-जानें-पहचानने-का-तरीका</link>
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        <description><![CDATA[ Fake Weight Loss Injection: देशभर में तेजी से पॉपुलर हो रहे वेट लॉस इंजेक्शन खासकर डायबिटीज और वजन घटाने के लिए इस्तेमाल होने वाले इंजेक्शन अब एक बड़े खतरे के रूप में सामने आ रहे हैं. दरअसल, गुरुग्राम में ड्रग कंट्रोल डिपार्टमेंट की कार्रवाई में नकली इंजेक्शन बनाने और बेचने वाले रैकेट का खुलासा हुआ है. करीब 70 लाख रुपये के फर्जी इंजेक्शन बरामद किए है. पुलिस की जांच में सामने आया है कि आरोपी किराए के फ्लैट में ही नकली इंजेक्शन तैयार कर रहे थे. चीन से मंगाए गए सस्ते केमिकल सिरिंज और पैकेजिंग की मदद से इन्हें बिल्कुल असली जैसा बनाया जा रहा था.
हैरानी के बात यह है कि आम लोगों के लिए ही नहीं बल्कि मेडिकल प्रोफेशनल्स के लिए भी असली और नकली दवा में फर्क करना मुश्किल हो रहा था. शुरुआती जानकारी के अनुसार, इन नकली इंजेक्शनों की सप्लाई ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए भी की जा रही थी. ऐसे में चलिए अब आपको बताते हैं कि मोटापा कम करने वाले कौन से नकली इंजेक्शन बाजार में मिल रहे हैं और इन्हें पहचानने का तरीका क्या है.
क्या है मौनजारो इंजेक्शन और क्यों बढ़ रही मांग?
ड्रग कंट्रोलर के अनुसार, मौनजारो एक एंटी-डायबिटिक दवा है, जिसे डॉक्टर की सलाह पर वजन घटाने के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है. सोशल मीडिया, सेलिब्रिटी ट्रेंड और तेजी से वजन कम करने की चाहत के कारण इसकी मांग तेजी से बढ़ी है. इसी बढ़ती डिमांड का फायदा उठाकर नकली दवाओं का कारोबार फैल रहा है और कई लोग वजन घटाने के लिए इस्तेमाल होने वाले नकली मौनजारो इंजेक्शन को बाजार में बेच रहे हैं.
नकली इंजेक्शन से क्या हो सकते हैं खतरे?
एक्सपर्ट के अनुसार, नकली वेट लॉस इंजेक्शन शरीर के लिए बहुत खतरनाक साबित हो सकता है. इनमें या तो असली दवा का एक्टिव तत्व नहीं होता या फिर जहरीले केमिकल मिलाए जाते हैं. इसे लेने से इलाज का असर नहीं होता, जिससे बीमारी बनी रहती है. वहीं शरीर में टॉक्सिक रिएक्शन हो सकते हैं. गंभीर स्थिति में अस्पताल में भर्ती तक की नौबत आ सकती है और लंबे समय में शरीर के अंगों को नुकसान पहुंच सकता है. डॉक्टरों का कहना है कि मरीज को सही दवा नहीं मिलती तो पूरा इलाज फेल हो सकता है. इसके अलावा गलत या अधूरी दवा एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस का खतरा बढ़ जाता है, जिससे फ्यूचर में इलाज और मुश्किल हो सकता है.
भारत में क्यों बढ़ रहा है नकली दवाओं का खतरा?
एक्सपर्ट्स बताते हैं कि भारत में नकली दवाओं की समस्या नई नहीं है, लेकिन अब इसका दायरा बहुत बढ़ गया है. नियम मौजूद होने के बावजूद हर जगह उनका सख्ती से पालन नहीं हो पाता, जिससे सप्लाई चैन में खामियां रह जाती है और नकली दवाएं आसानी से बाजार में पहुंच जाती है.
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कैसे करें नकली इंजेक्शन की पहचान?

डॉक्टर के अनुसार नकली इंजेक्शन की पहचान करने के लिए कुछ जरूरी सावधानियां बरतनी चाहिए. जैसे हमेशा लाइसेंस वाली मेडिकल शॉप से ही दवा खरीदें.
बिना डॉक्टर की प्रिस्क्रिप्शन के इंजेक्शन न लें.
पैकेजिंग को ध्यान से जांचे, स्पेलिंग मिस्टेक टूटी सील या अजीब लेबल से सावधान रहें.
अगर बॉक्स पर क्यूआर कोड हो तो उसे जरूर वेरीफाई करें.
सोशल मीडिया या ऑनलाइन अनजान प्लेटफाॅर्म से दवा खरीदने से बचना चाहिए.

ये भी पढ़ें-Aspirin Cancer Prevention: क्या कैंसर के खतरे को कम कर सकती है एस्पिरिन? जान लें इसके पीछे की वजह
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 24 Apr 2026 20:30:14 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Fake, Weight, Loss, Injection:, मोटापा, कम, करने, वाला, ये, इंजेक्शन, बाजार, में, मिल, रहा, नकली, जानें, पहचानने, का, तरीका</media:keywords>
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        <title>Heart Attack Risk In Healthy People: एकदम फिट दिखने वालों को क्यों आ रहा हार्ट अटैक? डॉक्टर से जानें असली वजह</title>
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        <description><![CDATA[ Hidden Causes Of Heart Disease In Young Adults: क्या आप पूरी तरह फिट और हेल्दी दिखते हैं, फिर भी दिल की बीमारी का खतरा हो सकता है? यह सवाल सुनने में अजीब लग सकता है, लेकिन सच्चाई कुछ और ही है. अक्सर हम मान लेते हैं कि अगर हम अच्छा खाते हैं, थोड़ा-बहुत व्यायाम करते हैं और सक्रिय रहते हैं, तो हार्ट पूरी तरह सुरक्षित है. लेकिन असलियत यह है कि दिल की सेहत सिर्फ बाहरी फिटनेस से तय नहीं होती. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर एकस्पर्ट क्या कहते हैं.&amp;nbsp;
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
डॉ. समनजॉय मुखर्जी , जो मणिपाल हॉस्पिटल, द्वारका में इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी विभाग के प्रमुख हैं, उन्होंने TOI को बताया कि &quot;हम में से ज्यादातर लोग सोचते हैं कि सही खानपान और थोड़ा व्यायाम हमें हार्ट अटैक से बचा लेगा, लेकिन यह पूरी तस्वीर नहीं है.&quot; दरअसल, फिटनेस जो हमें दिखाई देती है कि जैसे सही वजन, अच्छी स्टैमिना या साफ त्वचा, वह सिर्फ सतही संकेत हैं. शरीर के अंदर चल रही प्रक्रियाएं, जैसे इन्फ्लेमेशन, आर्टरीज को होने वाला नुकसान या हार्मोनल असंतुलन, बाहर से नजर नहीं आते. यही छिपे हुए कारक धीरे-धीरे दिल की बीमारी का खतरा बढ़ाते हैं.&amp;nbsp;
भारत में हार्ट रोग के मामला
इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के अनुसार, भारत में 70 साल से कम उम्र के लोगों में आधे से ज्यादा हार्ट रोग के मामले सामने आते हैं. इसका मतलब यह है कि उम्र या बाहरी फिटनेस भी पूरी सुरक्षा की गारंटी नहीं देती. तनाव भी एक बड़ा लेकिन अनदेखा कारण है. यह हमेशा स्पष्ट नहीं दिखता, बल्कि डेडलाइन, नींद की कमी और मानसिक दबाव के रूप में धीरे-धीरे शरीर को प्रभावित करता है. इससे ब्लड प्रेशर बढ़ता है और शरीर में सूजन बढ़ती है, जो दिल पर सीधा असर डालती है. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन की रिपोर्ट भी बताती है कि लगातार तनाव हाई ब्लड प्रेशर और हार्ट संबंधी समस्याओं का खतरा बढ़ाता है.
इसे भी पढ़ें-&amp;nbsp;Metabolic Diseases In India: भारत में तेजी से फैल रही हैं मेटाबॉलिक बीमारियां, कहीं आप भी तो नहीं इसके शिकार?
काफी लोगों को इसके बारे में पता नहीं होता
इसके अलावा, जेनेटिक्स भी अहम भूमिका निभाता है. अगर परिवार में कम उम्र में दिल की बीमारी के मामले रहे हैं, तो जोखिम अपने आप बढ़ जाता है, चाहे आपकी लाइफस्टाइल कितनी भी अच्छी क्यों न हो. कई ऐसी साइलेंट बीमारियां भी हैं, जो बिना लक्षण के शरीर को नुकसान पहुंचाती रहती हैं. जैसे हाई ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल और डायबिटीज. &amp;nbsp;नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ से जुड़े स्टडी में पाया गया है कि बड़ी संख्या में लोगों को अपने हाई ब्लड प्रेशर के बारे में पता ही नहीं होता.
नींद भी जरूरी
नींद भी दिल की सेहत के लिए बेहद जरूरी है. कम या खराब नींद दिल की धड़कन को प्रभावित कर सकती है, तनाव बढ़ा सकती है और मेटाबॉलिज्म को बिगाड़ सकती है। इसलिए सिर्फ बाहर से फिट दिखना काफी नहीं है. नियमित जांच, जैसे ब्लड प्रेशर, शुगर, कोलेस्ट्रॉल और ईसीजी कराना जरूरी है. सही समय पर जोखिम की पहचान ही हार्ट को सुरक्षित रखने का सबसे बड़ा तरीका है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 24 Apr 2026 20:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Aspirin Cancer Prevention: क्या कैंसर के खतरे को कम कर सकती है एस्पिरिन? जान लें इसके पीछे की वजह</title>
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        <description><![CDATA[ Can Daily Aspirin Prevent Cancer Risk: क्या एक साधारण दर्द की गोली कैंसर के खतरे को कम कर सकती है? यह सवाल सुनने में थोड़ा अजीब लग सकता है, लेकिन हाल के रिसर्च इस ओर इशारा कर रहे हैं कि एस्पिरिन सिर्फ दर्द से राहत देने तक सीमित नहीं है. कुछ मामलों में यह कैंसर के खतरे को कम करने में भी भूमिका निभा सकती है. चलिए आपको बताते हैं कि रिसर्च में क्या निकला.
क्या निकला रिसर्च में&amp;nbsp;
इस दिशा में सबसे अहम रिसर्च जॉन बर्न्स &amp;nbsp;के नेतृत्व में हुई, जिन्होंने लिंच सिंड्रोम वाले मरीजों पर एक बड़ा क्लिनिकल ट्रायल किया. यह एक जेनेटिक स्थिति है, जिसमें लोगों में कोलोरेक्टल कैंसर का खतरा काफी ज्यादा होता है. इस स्टडी में पाया गया कि जो लोग रोज़ाना एस्पिरिन लेते रहे, उनमें कैंसर का खतरा लगभग आधा हो गया. करीब 10 साल तक चले इस ट्रायल में 600 मिलीग्राम एस्पिरिन की डोज़ दी गई और नतीजे इतने मजबूत थे कि कई देशों में हेल्थ गाइडलाइंस तक बदल दी गईं. इसके बाद कम डोज यानी 75 से 100 मिलीग्राम पर भी स्टडी हुआ, जिसमें शुरुआती संकेत मिले कि कम मात्रा भी उतनी ही असरदार हो सकती है.
मरीजों पर किया गया ट्रायल
इसी तरह स्वीडन के करोलिंस्का इंस्टीट्यूट में एना मार्टलिंग के नेतृत्व में 2,980 मरीजों पर एक और बड़ा रैंडमाइज्ड कंट्रोल्ड ट्रायल किया गया. इसमें पाया गया कि जिन लोगों ने सर्जरी के बाद रोजाना एस्पिरिन ली, उनमें कैंसर के दोबारा होने का खतरा आधे से भी कम हो गया. यह स्टडी 2025 में पब्लिश हुई और इसके बाद वहां की मेडिकल प्रैक्टिस में भी बदलाव देखने को मिला.&amp;nbsp;
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एस्पिरिन कैसे काम करती है
अब सवाल यह उठता है कि आखिर एस्पिरिन ऐसा कैसे करती है. बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन की ऑन्कोलॉजी एक्सपर्ट रुथ लैंगली के अनुसार, यह दवा शरीर में उन प्रक्रियाओं को प्रभावित करती है जो कैंसर सेल्स के फैलाव से जुड़ी होती हैं. वहीं, केम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की रिसर्च बताती है कि एस्पिरिन खून के थक्के बनने से जुड़े तत्वों को कम करके कैंसर सेल्स को इम्यून सिस्टम के सामने उजागर कर सकती है, जिससे शरीर उन्हें पहचानकर नष्ट कर सके.&amp;nbsp;
आपको किस बात का ध्यान रखना चाहिए
हालांकि, यह समझना जरूरी है कि एस्पिरिन कोई जादुई इलाज नहीं है. इसके साइड इफेक्ट भी हो सकते हैं, जैसे पेट में जलन, अल्सर या इंटरनल ब्लीडिंग इसलिए डॉक्टर की सलाह के बिना इसे लेना खतरनाक हो सकता है. &amp;nbsp;रिसर्च यह जरूर दिखाती है कि एस्पिरिन कैंसर के खतरे को कम करने में मदद कर सकती है, लेकिन यह हर व्यक्ति के लिए एक जैसा असर नहीं दिखाती. इसलिए इसे अपनाने से पहले विशेषज्ञ की सलाह लेना ही सबसे सुरक्षित तरीका है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 24 Apr 2026 04:30:11 +0530</pubDate>
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        <media:keywords>Aspirin, Cancer, Prevention:, क्या, कैंसर, के, खतरे, को, कम, कर, सकती, है, एस्पिरिन, जान, लें, इसके, पीछे, की, वजह</media:keywords>
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        <title>Oral Cancer Causes: क्या तंबाकू और शराब न पीने वालों को भी हो सकता है मुंह का कैंसर, जवाब सुन नहीं होगा यकीन</title>
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        <description><![CDATA[ Can Non Smokers Get Oral Cancer: क्या तंबाकू और शराब नहीं पीते हैं तो क्या आप पूरी तरह सुरक्षित हैं? ज्यादातर लोग यही मानते हैं, लेकिन सच्चाई इससे थोड़ी अलग है. मुंह का कैंसर सिर्फ उन लोगों तक सीमित नहीं है जो तंबाकू या शराब का सेवन करते हैं. कई मामलों में यह बीमारी बिना किसी स्पष्ट वजह के भी विकसित हो सकती है, जो इसे और ज्यादा खतरनाक बनाता है. &amp;nbsp;हर साल बड़ी संख्या में लोग इस बीमारी की चपेट में आते हैं, लेकिन शुरुआती लक्षण इतने हल्के होते हैं कि अक्सर नजरअंदाज हो जाते हैं. यही वजह है कि ज्यादातर केस तब सामने आते हैं जब बीमारी काफी आगे बढ़ चुकी होती है और इलाज मुश्किल हो जाता है.
कैसे होते हैं
ओरल कैंसर &amp;nbsp;दरअसल मुंह के सेल्स में होने वाले बदलाव से शुरू होता है, जो धीरे-धीरे अनकंट्रोल रूप से बढ़ने लगती हैं, तंबाकू और शराब इसके सबसे बड़े कारण जरूर हैं, लेकिन यही पूरी कहानी नहीं है, UThealth Houston की रिपोर्ट के अनुसार, अब एक्सपर्ट मानते हैं कि इसके पीछे कई और फैक्टर भी जिम्मेदार हो सकते हैं. डॉ. साइमन यंग प्रोफेसर व एक्टिंग चेयर, कैट्ज डिपार्टमेंट ऑफ ओरल एंड मैक्सिलोफेशियल सर्जरी के अनुसार, इनमें एक बड़ा कारण एचपीवी इंफेक्शन भी है, जो खासतौर पर गले से जुड़े कैंसर में भूमिका निभाता है. इसके अलावा लंबे समय तक सूजन रहना, धूप का असर, उम्र बढ़ना और शरीर की अपनी संवेदनशीलता भी जोखिम को बढ़ा सकती है. यही कारण है कि कुछ लोगों में बिना किसी स्पष्ट कारण के भी यह बीमारी हो जाती है.&amp;nbsp;
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क्या है इसका सबसे बड़ी दिक्कत
सबसे बड़ी समस्या यह है कि मुंह का कैंसर शुरुआत में दर्द नहीं देता. यही वजह है कि लोग इसे गंभीरता से नहीं लेते. अगर मुंह में घाव लंबे समय तक ठीक नहीं हो रहा, लाल या सफेद धब्बे दिखाई दे रहे हैं, या निगलने और बोलने में दिक्कत हो रही है, तो यह संकेत हो सकते हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. एक्सपर्ट के अनुसार, किसी भी तरह का लक्षण अगर दो हफ्तों से ज्यादा समय तक बना रहे, तो तुरंत जांच करानी चाहिए. समय पर पहचान ही इस बीमारी से बचने का सबसे बड़ा तरीका है, क्योंकि शुरुआती स्टेज में इलाज ज्यादा असरदार होता है.
क्या निकला रिसर्च में
UThealth Houston की रिपोर्ट के अनुसार रिसर्च में यह भी सामने आया है कि नियमित जांच और जागरूकता से इस बीमारी के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है. यही वजह है कि अब डॉक्टर सिर्फ तंबाकू और शराब से दूर रहने की सलाह ही नहीं देते, बल्कि नियमित ओरल चेकअप को भी उतना ही जरूरी मानते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 24 Apr 2026 04:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Oral, Cancer, Causes:, क्या, तंबाकू, और, शराब, न, पीने, वालों, को, भी, हो, सकता, है, मुंह, का, कैंसर, जवाब, सुन, नहीं, होगा, यकीन</media:keywords>
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        <title>Heat stroke: सूरज की तपिश से बढ़ने लगे हीट स्ट्रोक के मामले, डॉक्टर से जानें बचने के तरीके</title>
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        <description><![CDATA[ Heat stroke:&amp;nbsp; अप्रैल जैसे-जैसे खत्म हो रहा है, गर्मी बढ़ती जा रही है. घर से बाहर निकलते ही धूप लोगों की परेशानी कर देती है. इस तेज धूप और लगातार हर दिन बढ़ता तापमान इन दिनों हीट स्ट्रोक के मामले तेजी से बढ़ा रहा है. ऐसे में लंबे समय तक धूप में घूमना या भारी शारीरिक गतिविधि करने से शरीर का तापमान सामान्य से काफी ज्यादा बढ़ जाता है, जिससे हीट स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है. ऐसे में आइए जानते हैं गर्मी के दिनों में हीट स्ट्रोक से कैसे बचा जाए.&amp;nbsp;
हीट स्ट्रोक क्या है?
डॉ. राहुल चिराग (कंसल्टेंट फिजिशियन, Care Hospitals) के अनुसार, हीट स्ट्रोक एक ऐसी स्थिति है जिसमें शरीर का तापमान अत्यधिक गर्मी या लंबे समय तक तेज गर्मी में रहने के कारण बहुत बढ़ जाता है. यह तब होता है जब शरीर का तापमान 104&amp;deg;F या उससे अधिक हो जाता है. यह समस्या भीषण गर्मी में अधिक देखने को मिलती है. डॉक्टर के मुताबिक, हीट स्ट्रोक दो प्रकार का होता है-एक्सर्शनल और नॉन-एक्सर्शनल. एक्सर्शनल हीट स्ट्रोक अधिकतर खिलाड़ियों और मजदूरों में होता है क्योंकि वे तेज धूप में भारी शारीरिक काम या एक्सरसाइज करते हैं, जबकि नॉन-एक्सर्शनल हीट स्ट्रोक बुजुर्गों और छोटे बच्चों में अधिक देखा जाता है क्योंकि इनके शरीर की तापमान नियंत्रित करने की क्षमता कमजोर होती है.
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हीट स्ट्रोक के लक्षण और खतरे
हीट स्ट्रोक के लक्षणों की बात की जाए तो इसमें बुखार, सिरदर्द, भ्रम की स्थिति, चिड़चिड़ापन, बेहोशी या दौरे पड़ना शामिल है. इसके अलावा स्किन का ड्राई और गर्म होना, दिल की धड़कन तेज हो जाना और सांस का तेज चलना भी हीट स्ट्रोक के संकेत हो सकते हैं. समय पर इलाज न मिलने पर यह स्थिति जानलेवा भी साबित हो सकती है, इसलिए लक्षण दिखते ही तुरंत ध्यान देते हुए डॉक्टर से मिलना जरूरी है.
हीट स्ट्रोक से बचाव और उपचार के तरीके
हीट स्ट्रोक से बचाव के लिए दोपहर की तेज धूप में बाहर निकलने से बचना चाहिए. हल्के और ढीले कपड़े पहनने चाहिए. अधिक से अधिक पानी और तरल पदार्थों का सेवन करना चाहिए&amp;nbsp; और धूप में छाता या टोपी का उपयोग करना चाहिए. इसके उपचार के लिए व्यक्ति को तुरंत ठंडी या छायादार जगह पर ले जाकर शरीर को ठंडा करना चाहिए. ढीले कपड़े कर देने चाहिए और ठंडे पानी की पट्टियां लगानी चाहिए. अगर स्थिति गंभीर हो जैसे बेहोशी या तेज बुखार हो तो तुरंत अस्पताल ले जाना चाहिए.
यह भी पढ़ेंः पेन किलर लेने के तुरंत बाद कैसे खत्म हो जाता है शरीर का दर्द, कैसे काम करती है दवा?
&amp;nbsp; ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 24 Apr 2026 04:30:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>5 Food Items for Summer: आज से ही खाना शुरू कर दें ये 5 चीजें, आसपास भी नहीं फटकेगी लू</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/5-food-items-for-summer-आज-से-ही-खाना-शुरू-कर-दें-ये-5-चीजें-आसपास-भी-नहीं-फटकेगी-लू</link>
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        <description><![CDATA[ 5 Food Items for Summer: आज से ही खाना शुरू कर दें ये 5 चीजें, आसपास भी नहीं फटकेगी लू ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 23 Apr 2026 12:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Diabetes Eye Problems: शुगर के मरीज हो जाएं अलर्ट! जानिए कैसे आपकी आंखों को अंदर से अंधा बना रही है डायबिटीज?</title>
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        <description><![CDATA[ How Diabetes Affects Eyes And Vision: डायबिटीज को अक्सर दिल, किडनी और नसों से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन आंखें भी इससे बुरी तरह प्रभावित हो सकती हैं. यह नुकसान अचानक नहीं होता, बल्कि धीरे-धीरे बिना दर्द के बढ़ता है और तब सामने आता है जब स्थिति संभालना मुश्किल हो जाता है. यही वजह है कि इसे समझना और समय रहते सावधानी बरतना बेहद जरूरी है. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर डॉक्टर का क्या कहना है.&amp;nbsp;
क्या कहते हैं एक्सपर्ट
डॉ. नुसरत बुखारी ने TOI को बताया कि &quot;डायबिटीज सिर्फ दिल, किडनी, लीवर और नसों को ही नहीं, बल्कि आंखों को भी प्रभावित करती है.&quot; यह बात कई लोग तब समझते हैं जब समस्या बढ़ चुकी होती है. आंख एक कैमरे की तरह काम करती है, जिसमें पीछे की परत यानी रेटिना तस्वीरों को कैद करके दिमाग तक भेजती है. इस रेटिना में बहुत ही महीन ब्लड वेसल्स होती हैं. जब लंबे समय तक ब्लड शुगर का स्तर ज्यादा रहता है, तो ये नसें कमजोर होने लगती हैं. इनमें सूजन आ सकती है, रिसाव हो सकता है या ये बंद भी हो सकती हैं. कुछ मामलों में शरीर नई ब्लड वेसल्स बनाता है, लेकिन ये बेहद नाजुक होती हैं और ज्यादा नुकसान पहुंचा सकती हैं.
क्या होती है इससे दिक्कत
इस स्थिति को डायबिटिक रेटिनोपैथी कहा जाता है. यह बिना किसी शुरुआती लक्षण के धीरे-धीरे गंभीर रूप ले सकती है और दुनिया भर में नजर कमजोर होने के बड़े कारणों में से एक है. इसके अलावा, डायबिटीज आंखों से जुड़ी अन्य समस्याओं का भी कारण बन सकती है. डायबिटीज के कारण होने वाली आंखों की समस्याओं में डायबिटिक रेटिनोपैथी, डायबिटिक मैक्युलर एडीमा, मोतियाबिंद और ग्लूकोमा शामिल हैं. डॉ. नुसरत बुखारी के अनुसार &quot;अनकंट्रोल डायबिटीज वाले लोगों में इन समस्याओं का खतरा काफी ज्यादा होता है.&quot; खास बात यह है कि इन बीमारियों के शुरुआती संकेत अक्सर नजर नहीं आते.
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क्या होती है दिक्कत
यही वजह है कि कई लोग तब तक सामान्य महसूस करते रहते हैं जब तक समस्या गंभीर नहीं हो जाती. जब लक्षण दिखते हैं, तो उनमें धुंधला दिखना, आंखों के सामने काले धब्बे नजर आना, रात में देखने में दिक्कत और अचानक नजर में बदलाव शामिल हो सकते हैं. डॉ. बुखारी चेतावनी देती हैं कि आंखों की समस्याएं बिना किसी स्पष्ट संकेत के बढ़ सकती हैं और बाद में तनाव और चिंता का कारण बनती हैं. डायबिटीज शरीर में एक तरह की चेन रिएक्शन भी पैदा करती है. हाई ब्लड शुगर के साथ हाई ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल की समस्या जुड़ जाए, तो स्थिति और खराब हो जाती है. धूम्रपान करने से ऑक्सीजन की आपूर्ति भी कम हो जाती है, जिससे आंखों को और नुकसान पहुंचता है. इसी कारण हर व्यक्ति में इसके असर अलग-अलग हो सकते हैं.&amp;nbsp;
कैसे कर सकते हैं इस दिक्कत को ठीक
हालांकि, राहत की बात यह है कि सही देखभाल से इस नुकसान को रोका या कम किया जा सकता है. ब्लड शुगर को कंट्रोल रखना, नियमित जांच कराना, संतुलित और फाइबर युक्त आहार लेना, रोजाना फिजिकल एक्टिविटी करना और तनाव को कम करना बेहद जरूरी है. इसके साथ ही, साल में कम से कम एक बार आंखों की जांच जरूर करानी चाहिए, भले ही नजर सामान्य लग रही हो.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 23 Apr 2026 12:30:06 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Diabetes, Eye, Problems:, शुगर, के, मरीज, हो, जाएं, अलर्ट, जानिए, कैसे, आपकी, आंखों, को, अंदर, से, अंधा, बना, रही, है, डायबिटीज</media:keywords>
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        <title>Fitness Routine Tips : उम्र सिर्फ एक नंबर! 80 साल की दादी रोज 90 मिनट करती हैं वर्कआउट, यहां जानिए उनका फिटनेस रूटीन</title>
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        <description><![CDATA[ Fitness Routine Tips : आज के समय में जहां लोग 40-50 की उम्र के बाद ही अपने शरीर को कमजोर मानने लगते हैं, वहीं एक 80 साल की दादी ने पूरी दुनिया को दिखा दिया है कि अगर इरादा मजबूत हो तो उम्र कोई मायने नहीं रखती है. यह कहानी एक ऐसी महिला की है , जिन्होंने अपने जीवन के 70वें साल में खुद को पूरी तरह बदलने का फैसला किया. कभी दवाइयों और बीमारियों पर निर्भर रहने वाली यह महिला आज जिम में घंटों पसीना बहाती हैं, भारी वजन उठाती हैं और हजारों लोगों के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं. उनका मानना है कि हमारा शरीर किसी भी उम्र में बदल सकता है. इसके लिए सिर्फ सही दिशा और डेली रूटीन की जरूरत है. तो आइए आज हम आपको बताते हैं कि 80 साल की दादी का फिटनेस रूटीन क्या है.&amp;nbsp;
कौन हैं 80 साल की यह दादी?
ये 80 साल की दादी कनाडा की रहने वाली जोन मैकडॉनल्ड है, जो आज के समय में फिटनेस की एक बड़ी मिसाल बन चुकी हैं. उन्होंने साबित कर दिया है कि अगर इंसान के अंदर मजबूत इरादा हो, तो वह किसी भी उम्र में अपने शरीर को बदल सकता है.जोन पहले कई बीमारियों से जूझ रही थीं. उन्हें हाई ब्लड प्रेशर, एसिडिटी, चक्कर आना और गठिया जैसी समस्याएं थीं. लेकिन आज वही महिला जिम में भारी वजन उठाती हैं, रोजाना कसरत करती हैं और लाखों लोगों के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं. उनकी कहानी बताती है कि फिटनेस का कोई एक्सपायरी डेट नहीं होता है.
दवाइयों से फिटनेस तक का सफर कैसे शुरू हुआ?
70 साल की उम्र में उनका वजन करीब 90 किलो था. &amp;nbsp;उन्हें कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएं थीं जैसे हाई ब्लड प्रेशर, एसिडिटी (acid reflux), चक्कर आना (vertigo), जोड़ों में दर्द (arthritis), डॉक्टर उनकी दवाइयों की मात्रा बढ़ा रहे थे, लेकिन उन्होंने हार मानने की जगह खुद को बदलने का फैसला लिया. इस बदलाव में उनकी बेटी ने उनका साथ दिया, जो फिटनेस एक्सपर्ट थीं. धीरे-धीरे उन्होंने एक्सरसाइज और सही खान-पान शुरू किया और लगभग 3 साल में 29 किलो वजन कम कर लिया.&amp;nbsp;
80 साल की दादी का फिटनेस रूटीन क्या है?
1. वॉर्म-अप से शुरुआत - हर वर्कआउट से पहले जोन अच्छे से वॉर्म-अप करती हैं. जिससे मांसपेशियां और जोड़ों को चोट से बचाया जा सके.
2. हफ्ते में 5 दिन स्ट्रेंथ ट्रेनिंग - &amp;nbsp;वह हफ्ते में पांच दिन स्ट्रेंथ ट्रेनिंग करती हैं. वह भारी वजन उठाने से नहीं डरतीं और अपने वर्कआउट में बेंच प्रेस, स्क्वाट्स, लैट पुल डाउन और मशीन एक्सरसाइज शामिल करती हैं. शुरुआत में उन्होंने मशीनों का ज्यादा इस्तेमाल किया. जिससे शरीर पर ज्यादा दबाव न पड़े, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने खुद को मजबूत बनाकर फ्री वेट्स की तरफ कदम बढ़ाया.
3. कार्डियो - स्ट्रेंथ ट्रेनिंग के साथ-साथ वह कार्डियो पर भी पूरा ध्यान देती हैं. वह हफ्ते में तीन से सात दिन तक कार्डियो करती हैं और हर बार 15 से 45 मिनट तक एक्सरसाइज करती हैं. इससे उनका दिल स्वस्थ रहता है और उनकी स्टैमिना भी बढ़ता है.&amp;nbsp;
4. स्ट्रेचिंग - जोन हर वर्कआउट के बाद 15 मिनट तक स्ट्रेचिंग करती हैं. इससे मांसपेशियों को आराम मिलता है, शरीर में लचीलापन बना रहता है और रिकवरी जल्दी होती है. यही वजह है कि वह लगातार एक्टिव और फिट बनी रहती हैं.
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जोन की डाइट और लाइफस्टाइल
फिटनेस सिर्फ जिम तक सीमित नहीं है, बल्कि खान-पान और सोच भी उतनी ही जरूरी है. ऐसे में जोन रोज करीब 150 ग्राम प्रोटीन लेती हैं, भरपूर 3 लीटर पानी पीती हैं और सिर्फ कैलोरी गिनने की जगह प्रोटीन, कार्ब्स और फैट यानी मैक्रो प्लानिंग पर फोकस करती हैं. खास बात यह है कि वह पूरी तरह नेचुरल तरीके से फिट बनी हैं और किसी भी तरह के स्टेरॉयड या दवाओं का सहारा नहीं लेतीं, इसके साथ ही वह अपने दिमाग को एक्टिव रखने के लिए मेडिटेशन ऐप्स का इस्तेमाल करती हैं, ब्रेन गेम्स खेलती हैं और नई भाषा सीखती रहती हैं. जोड़ों की देखभाल के लिए वह घुटनों पर सपोर्ट पहनती हैं और जरूरत पड़ने पर बैक सपोर्ट भी लेती हैं, जिससे वह बिना चोट के लगातार एक्टिव रह पाती हैं.&amp;nbsp;
WHO के नियमों से भी आगे
जोन का रूटीन विश्व स्वास्थ्य संगठन के फिटनेस नियमों से भी ज्यादा प्रभावी है. जहां 65 &amp;nbsp;से ज्यादा उम्र के लोगों के लिए 150 से 300 मिनट एक्टिविटी की सलाह दी जाती है, वहीं जोन इससे ज्यादा करती हैं. वह हफ्ते में 2 दिन स्ट्रेंथ ट्रेनिंग की सलाह है, लेकिन वह 5 दिन करती हैं. बैलेंस और स्ट्रेंथ पर भी पूरा ध्यान देती हैं.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 23 Apr 2026 00:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Ashwagandha Leaves Ban: अब दवाओं में इस्तेमाल नहीं होंगी अश्वगंधा की पत्तियां, जानें FSSAI ने इस पर क्यों लगाई रोक?</title>
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        <description><![CDATA[ FSSAI New Health Supplement Rules: अश्वगंधा को लंबे समय से एक ऐसे प्राकृतिक उपाय के रूप में पेश किया जाता रहा है, जो तनाव कम करने से लेकर नींद सुधारने तक हर समस्या में मददगार माना जाता है. आयुर्वेद की यह पुरानी जड़ी-बूटी आज के दौर में वेलनेस इंडस्ट्री का बड़ा हिस्सा बन चुकी है. लेकिन अब इसी अश्वगंधा को लेकर एक बड़ा फैसला सामने आया है, जिसने उपभोक्ताओं और सप्लीमेंट बनाने वाली कंपनियों दोनों को चौंका दिया है.&amp;nbsp;
क्या है मामला?
FSSAI और आयुष मंत्रालय ने अश्वगंधा की पत्तियों के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है. हालांकि यह पूरी तरह से बैन नहीं है, बल्कि एक सीमित प्रतिबंध है. यानी अश्वगंधा के पूरे पौधे पर नहीं, सिर्फ उसकी पत्तियों के उपयोग पर रोक लगाई गई है. वहीं, इसकी जड़ का इस्तेमाल पहले की तरह जारी रहेगा. 16 अप्रैल को जारी आदेश में FSSAI ने राज्यों को सख्त निगरानी रखने के निर्देश दिए हैं. इसके साथ ही यह भी कहा गया है कि अगर कोई कंपनी अश्वगंधा की पत्तियों या उनके एक्सट्रैक्ट का इस्तेमाल करती पाई जाती है, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाए. इसके अलावा कंपनियों को अब यह भी स्पष्ट रूप से बताना होगा कि उनके प्रोडक्ट में पौधे का कौन-सा हिस्सा इस्तेमाल किया गया है.
क्यों लिया गया यह फैसला?
दरअसल, यह फैसला साइंटफिक रिसर्च के आधार पर लिया गया है. रिसर्च में पाया गया है कि अश्वगंधा की पत्तियों में विदेनोलाइड्स नाम के तत्व ज्यादा मात्रा में होते हैं, खासकर विदाफेरिन-ए, जो शरीर पर काफी असर डाल सकते हैं. एक्सपर्ट के मुताबिक, इन तत्वों की अधिकता से लिवर को नुकसान, पेट से जुड़ी समस्याएं और यहां तक कि नर्वस सिस्टम पर भी असर पड़ सकता है.
तेजी से बढ़ रहा अश्वगंधा का इस्तेमाल 
इसी संभावित खतरे को देखते हुए सरकार ने एहतियात के तौर पर यह कदम उठाया है. खासतौर पर ऐसे समय में जब अश्वगंधा का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है और यह कैप्सूल, पाउडर और ड्रिंक्स के रूप में बाजार में आसानी से उपलब्ध है. दूसरी तरफ, अश्वगंधा की जड़ को सुरक्षित माना गया है. आयुर्वेद में सदियों से इसी हिस्से का इस्तेमाल होता आया है और आधुनिक रिसर्च भी इसे सही मात्रा में लेने पर सुरक्षित बताती है. &amp;nbsp;इसलिए नियामक संस्थाओं ने जड़ आधारित उत्पादों को अनुमति दी हुई है.
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क्या मानते हैं एक्सपर्ट?
विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला प्रिकॉशनरी एप्रोच का हिस्सा है, यानी जब तक पूरी तरह से सुरक्षित साबित न हो, तब तक संभावित जोखिम वाले तत्वों से दूरी रखना बेहतर है. डाइटिशियन कनिका मल्होत्रा ने indian express को बताया कि अश्वगंधा शरीर को तनाव से निपटने में मदद करता है, नींद सुधारता है और ऊर्जा बढ़ाने में सहायक होता है, लेकिन पारंपरिक रूप से इसका इस्तेमाल सिर्फ जड़ के रूप में ही किया जाता रहा है.
वहीं, डाइटिशियन गरिमा गोयल कहती हैं कि यह प्रतिबंध उपभोक्ताओं के लिए फायदेमंद है, क्योंकि अब कंपनियों को साफ-साफ बताना होगा कि वे किस हिस्से का उपयोग कर रही हैं. इससे लोगों को यह समझने में आसानी होगी कि वे क्या खा रहे हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 23 Apr 2026 00:30:09 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Ashwagandha, Leaves, Ban:, अब, दवाओं, में, इस्तेमाल, नहीं, होंगी, अश्वगंधा, की, पत्तियां, जानें, FSSAI, ने, इस, पर, क्यों, लगाई, रोक</media:keywords>
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        <title>Explained: भारत में दिन से ज्यादा गर्म क्यों हो गईं रातें? कम नींद, चिड़चिड़ापन और हाई ब्लड प्रेशर से कब मिलेगा सुकून</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/explained-भारत-में-दिन-से-ज्यादा-गर्म-क्यों-हो-गईं-रातें-कम-नींद-चिड़चिड़ापन-और-हाई-ब्लड-प्रेशर-से-कब-मिलेगा-सुकून</link>
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        <description><![CDATA[ भारत में दिन की गर्मी तो सबको पता है, लेकिन अब सूरज ढलने के बाद भी राहत नहीं मिल रही है. रातें पहले से कहीं ज्यादा गर्म हो गई हैं और यह ट्रेंड तेजी से बढ़ रहा है. भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने चेतावनी दी है कि महाराष्ट्र और तेलंगाना के कुछ हिस्सों को छोड़कर पूरे देश में न्यूनतम तापमान सामान्य से ऊपर रहने वाला है. कई जगहों पर न्यूनतम तापमान सामान्य से 6.4 डिग्री सेल्सियस तक ज्यादा हो गया है. IMD के अनुसार, जब न्यूनतम तापमान सामान्य से 4.5 से 6.4 डिग्री ज्यादा होता है तो उसे &#039;वार्म नाइट&#039; कहते हैं और 6.4 डिग्री से ज्यादा को &#039;सीवियर वार्म नाइट&#039;. ये गर्म रातें अब आम हो गई हैं, लेकिन क्यों और कैसे? एक्सप्लेनर में समझते हैं...&amp;nbsp;
सवाल 1: भारत में रात में गर्मी क्यों बढ़ती जा रही है? &amp;nbsp;
जवाब: रातें अब देश की हीट क्राइसिस का बड़ा हिस्सा बन गई हैं. इसके दो बड़े कारण हैं. एक वैश्विक जलवायु परिवर्तन और दूसरा शहरों में बढ़ता शहरीकरण. कंक्रीट, एस्फॉल्ट और शीशे दिन भर सूरज की गर्मी सोख लेते हैं और रात में धीरे-धीरे गर्मी छोड़ते हैं. ऊंची-ऊंची इमारतें हवा का रुख रोक लेती हैं, जिससे गर्मी जमीन के पास ही फंस जाती है.
गर्मी पर रिसर्च रिपोर्ट्स के मुताबिक, शहरों में रात के तापमान में होने वाले 60 प्रतिशत बढ़ोतरी का कारण यही स्थानीय गर्मी रोकना है, जबकि 40 प्रतिशत ग्रीनहाउस गैसों के कारण है. इसके साथ नमी भी बढ़ रही है. उत्तर भारत में 2012-2022 के बीच शहरों में नमी 30-40 प्रतिशत से बढ़कर 40-50 प्रतिशत हो गई.
दिल्ली, चंडीगढ़, जयपुर और लखनऊ में यह बढ़ोतरी 6-9 प्रतिशत तक रही. ज्यादा नमी से पसीना सूखता नहीं और शरीर ठंडा नहीं हो पाता. एयर कंडीशनर चलाने से बाहर और गर्मी निकलती है, जो एक फीडबैक लूप बना रही है. एलनीनो के दौरान यह समस्या और बढ़ जाती है. इस साल एलनीनो विकसित हो रहा है, इसलिए 2026 की सर्दियां और 2027 की गर्मियां खासतौर पर नजर रखने वाली हैं.
&amp;nbsp;

दिल्ली में रात का न्यूनतम तापमान 40 डिग्री सेल्सियस तक रहता है

सवाल 2: कितनी तेजी से बढ़ रही हैं गर्म रातें?
जवाब: 2025 में ScienceDirect ने 1980-2020 के बीच यानी 40 सालों की एक स्टडी की. इसके मुताबिक, गर्म रातें हर दशक में 2 से 8 दिन बढ़ गई हैं, खासकर पूर्वोत्तर, उत्तर-पश्चिम और प्रायद्वीपीय भारत में. काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (CEEW) की 2025 जिला-स्तरीय रिपोर्ट कहती है कि 734 जिलों में से 417 जिले यानी आधे से ज्यादा हाई या वेरी हाई हीट रिस्क जोन में हैं. इनमें दिल्ली, महाराष्ट्र, गोवा, केरल, गुजरात, राजस्थान, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश शामिल हैं.
पूरे देश की 76 प्रतिशत आबादी इन हाई रिस्क जोनों में रहती है. 2012-2022 के बीच बड़े शहरों में गर्म रातों की संख्या बढ़ी है. मुंबई में हर गर्मी में 15 अतिरिक्त बहुत गर्म रातें, बेंगलुरु में 11, भोपाल और जयपुर में 7-7 और दिल्ली में 6 हो गई हैं. CEEW रिपोर्ट के मुताबिक, गर्म रातें गर्म दिनों से भी तेजी से बढ़ रही हैं.
शहर अब रात में &#039;ओवन&#039; जैसा महसूस होता है. खराब शहरी प्लानिंग, कम हरियाली, सूखते जल स्रोत, कंक्रीट बढ़ना और तीन लैंडफिल ने गर्मी बढ़ा दी है. मुंबई, बेंगलुरु, भोपाल, जयपुर, चेन्नई और दिल्ली जैसे बड़े शहरों में गर्म रातें सबसे ज्यादा बढ़ी हैं. स्मार्ट सिटी स्टडी (2001-2024) में श्रीनगर में दिन और कंपाउंड हीटवेव सबसे ज्यादा, गुजरात के दाहोद में सबसे तीव्र कंपाउंड हीटवेव और वाराणसी में सबसे तीव्र नाइट-टाइम हीटवेव दर्ज हुई.
सवाल 3: क्यों कहते हैं कि गर्म रातें दिन से भी ज्यादा खतरनाक हैं? &amp;nbsp;
जवाब: मेडिकल एक्सपर्ट्स कहते हैं कि दिन में गर्मी पड़ती है तो रात में शरीर ठंडा होकर रिकवर करता है, लेकिन गर्म रातों में यह राहत नहीं मिलती. इससे डिहाइड्रेशन, नींद खराब होना, हाई ब्लड प्रेशर, थकान, चिड़चिड़ापन और हीट-स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है. बुजुर्ग, बच्चे और दिल-फेफड़ों के मरीज सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं.
मुंबई के ग्लेनीगल्स हॉस्पिटल की डॉ. मंजुषा अग्रवाल कहती हैं, &#039;यह डिहाइड्रेशन, नींद की समस्या, हाई ब्लड प्रेशर और हीट संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ाता है. बार-बार गर्म रातें थकान, चिड़चिड़ापन और लगातार हीट स्ट्रेस बढ़ाती हैं.&#039;
गर्म रातों की वजह से सिरदर्द, चक्कर, थकान, मांसपेशियों में ऐंठन, डिहाइड्रेशन और नींद की कमी आम हो गई है. इससे याददाश्त कम होना, एकाग्रता की समस्या, चिंता और डिप्रेशन भी हो सकता है. 1998-2017 के बीच दुनिया में 1.66 लाख लोगों की मौत हीटवेव से हुई थी. भारत में 2023 में 48,000 हीटस्ट्रोक केस और 159 मौतें दर्ज हुईं, लेकिन असली संख्या ज्यादा है.
&amp;nbsp;

गर्म रातों में सबसे बड़ी बीमारी नींद की समस्या बन जाती है

सवाल 4: रोजमर्रा की जिंदगी और अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ रहा है? &amp;nbsp;
जवाब: गर्म रातों से काम की क्षमता घट रही है. CSE रिपोर्ट के मुताबिक, 2030 तक भारत में ग्लोबल वार्मिंग से 5.8 प्रतिशत वर्किंग ऑवर्स (करीब 3.4 करोड़ फुल-टाइम जॉब्स) गंवाने का अनुमान है. रात में AC चलाने से बिजली की मांग बढ़ती है और बाहर गर्मी निकलने से समस्या और बढ़ती है. मजदूरों और आउटडोर वर्कर्स को दिन-रात दोनों समय गर्मी झेलनी पड़ रही है.
सवाल 5: तो क्या वो चांदनी में ठंडी रातें कभी लौट कर नहीं आएंगी?
जवाब: 2015-2100 के बीच एक 2025 मॉडलिंग स्टडी के अनुसार, गर्म रातें हर दशक में 10 से 13 दिन बढ़ सकती हैं. कंपाउंड हीटवेव और आम होंगे. बचाव के लिए शहरों में कूल रूफ, रिफ्लेक्टिव पेवमेंट, ज्यादा पेड़, बेहतर हवा के रास्ते और कम कंक्रीट जरूरी है. सरकार और शहरों को शहरी प्लानिंग सुधारनी होगी. IMD अब रात के तापमान की भी चेतावनी दे रहा है. कुल मिलाकर अगर इंसान अपने दिनचर्या के तरीके सुधार ले, तो पर्यावरण सुधरेगा जिससे ठंडी चांदनी रातें लौट सकती हैं. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 22 Apr 2026 08:30:06 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Explained:, भारत, में, दिन, से, ज्यादा, गर्म, क्यों, हो, गईं, रातें, कम, नींद, चिड़चिड़ापन, और, हाई, ब्लड, प्रेशर, से, कब, मिलेगा, सुकून</media:keywords>
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        <title>Right Time For Exercise: क्या है एक्सरसाइज करने का सही वक्त, जानिए अचानक हार्ट अटैक के शिकार क्यों हो रहे युवा?</title>
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        <guid>https://hindi.attentionindia.com/right-time-for-exercise-क्या-है-एक्सरसाइज-करने-का-सही-वक्त-जानिए-अचानक-हार्ट-अटैक-के-शिकार-क्यों-हो-रहे-युवा</guid>
        <description><![CDATA[ Right Time For Exercise: आज के समय में फिट शरीर को लेकर युवाओं में काफी जागरूकता बढ़ गई है. हर कोई चाहता है कि उसका शरीर मजबूत, फिट और मस्कुलर दिखे. इसी वजह से जिम जाना और एक्सरसाइज करना अब एक आम आदत बन गई है, लेकिन चिंता की बात यह है कि पिछले कुछ सालों में युवाओं में हार्ट अटैक और अचानक कार्डियक अरेस्ट के मामले तेजी से बढ़े हैं. खासकर वे लोग जो नियमित रूप से जिम जाते हैं या भारी वर्कआउट करते हैं, उनमें भी ऐसे मामले सामने आ रहे हैं. ऐसे में आइए आज हम आपको बताते हैं कि एक्सरसाइज का सही समय क्या है, और क्यों कुछ गलत आदतें या लापरवाही हार्ट अटैक का कारण बन सकती हैं.&amp;nbsp;
एक्सरसाइज करना हार्ट के लिए कितना फायदेमंद होती है?
आमतौर पर एक्सरसाइज को सेहत के लिए बहुत अच्छा माना जाता है. यह वजन कम करने, मसल्स मजबूत करने और दिल को स्वस्थ रखने में मदद करती है, लेकिन अगर एक्सरसाइज गलत तरीके से या जरूरत से ज्यादा की जाए, तो यह शरीर और दिल पर उल्टा असर भी डाल सकती है.&amp;nbsp;
क्यों बढ़ रहा है युवाओं में हार्ट अटैक का खतरा?
1. अचानक बहुत ज्यादा हार्ड वर्कआउट करना -&amp;nbsp;कई लोग बिना तैयारी के सीधे भारी वजन उठाना, तेज दौड़ना या हाई-इंटेंसिटी एक्सरसाइज शुरू कर देते हैं. इससे दिल पर अचानक दबाव पड़ता है, जो खतरनाक हो सकता है.&amp;nbsp;
2. पहले से मौजूद दिल की बीमारी का पता न होना -&amp;nbsp;बहुत से लोगों को पता ही नहीं होता कि उन्हें ब्लॉकेज, हाई बीपी या दिल की कोई समस्या है. ऐसे में ज्यादा मेहनत वाली एक्सरसाइज दिल के लिए जोखिम बढ़ा सकती है.&amp;nbsp;
3.शरीर में पानी की कमी (डिहाइड्रेशन) -वर्कआउट के दौरान पसीना निकलता है. अगर पानी या इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी हो जाए तो दिल की धड़कन और ब्लड प्रेशर प्रभावित हो सकते हैं.&amp;nbsp;
4. गलत डाइट और सप्लीमेंट का इस्तेमाल - कुछ लोग एनर्जी ड्रिंक, स्टेरॉयड या बिना सलाह के सप्लीमेंट लेते हैं. ये चीजें दिल की धड़कन को तेज कर सकती हैं और खतरा बढ़ा सकती हैं.&amp;nbsp;
5. बहुत ज्यादा गर्मी या ठंड में एक्सरसाइज - बहुत ज्यादा गर्मी या ठंड के मौसम में एक्सरसाइज करने से शरीर पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है, जिससे हार्ट पर असर हो सकता है.
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क्या है एक्सरसाइज करने का सही वक्त?
एक्सरसाइज का सही समय हर व्यक्ति के रूटीन और शरीर की जरूरत पर निर्भर करता है. सुबह एक्सरसाइज करने से मेटाबॉलिज्म तेज होता है, शरीर दिनभर एक्टिव रहता है, मानसिक तनाव कम होता है और मूड बेहतर रहता है, हालांकि सुबह शरीर थोड़ा जकड़ा हुआ होता है इसलिए वार्म-अप जरूरी है. वहीं शाम के समय एक्सरसाइज करने से शरीर ज्यादा लचीला होता है, ताकत बेहतर महसूस होती है, चोट लगने का खतरा कम होता है और तनाव भी कम होता है, लेकिन कुछ लोगों में देर शाम की एक्सरसाइज नींद को प्रभावित कर सकती है.&amp;nbsp;
किन लोगों को ज्यादा सावधानी रखनी चाहिए?
जिनको पहले से हार्ट प्रॉब्लम है, हाई बीपी या डायबिटीज वाले लोग, बहुत ज्यादा मोटापे से परेशान लोग, लंबे समय से एक्सरसाइज न करने वाले लोगों को ज्यादा सावधानी रखनी चाहिए. साथ ही एकदम से भारी वर्कआउट शुरू करना गलत है. शरीर को समय देना जरूरी है. एक्सरसाइज से पहले और बाद में हल्की स्ट्रेचिंग करनी चाहिए. वर्कआउट के दौरान सांस रोकना दिल पर दबाव डाल सकता है. अगर चक्कर, सीने में दर्द या घबराहट महसूस हो तो तुरंत एक्सरसाइज रोक दें.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 22 Apr 2026 08:30:04 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Height Increase Tips: किन तरीकों से उम्र निकलने के बाद भी बढ़ा सकते हैं लंबाई? जानिए ये आसान तरीके</title>
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        <description><![CDATA[ Height Increase Tips: आखिर लंबी हाईट कौन नहीं चाहता, हर किसी की यही ख्वाहिश होती है कि उसकी हाईट परफेक्ट हो. लेकिन कई लोगों का मानना है कि एक उम्र के बाद लंबाई नहीं बढ़ती. हालांकि हमारे शरीर में हड्डियों की ग्रोथ एक तय उम्र तक ही होती है. साथ ही ऐसा माना जाता है कि लंबाई का 60 से 80 प्रतिशत हिस्सा आपके जेनेटिक्स से आता है जिसे आप कंट्रोल नहीं कर सकते. लेकिन बाकी का 40 से 20 प्रतिशत हिस्सा आप कंट्रोल कर सकते हैं, ऐसे में आपको बता दें कि सही जानकारी होने से आप आसानी से अपने शरीर की पोस्टर और पर्सनैलिटी को बेहतर बना सकते हैं. अगर आप भी अपनी हाईट को लेकर परेशान हैं तो घबराने की जरूरत नहीं है. सही लाइफस्टाइल, डाइट और कुछ एक्सरसाइज से आप अच्छा फर्क महसूस कर सकते हैं.
अच्छी नींद और सही लाइफस्टाइल अपनाएं
लंबाई और शरीर के विकास में अच्छी नींद का भी अहम योगदान होता है. रोजाना 6 से 8 घंटे की गहरी नींद लेने से शरीर को आराम मिलता है और ग्रोथ हार्मोन बेहतर तरीके से काम करता है, इसलिए पर्याप्त नींद लेना भी लंबाई बढ़ाने का तरीका हो सकता है. साथ ही सही तरीके से बैठना और चलना भी जरूरी है, क्योंकि गलत पोस्टर आपकी लंबाई को कम दिखा सकता है. जैसे झुक कर खड़ा होना, कमर सीधी करके न बैठना. ऐसे में अगर आप अपनी रोजमर्रा की आदतों में सुधार करते हैं, तो आप न केवल लंबा दिख सकते हैं बल्कि खुद को ज्यादा कॉन्फिडेंट भी महसूस करा सकते हैं.&amp;nbsp;
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बैलेंस डाइट और सही पोषण जरूरी
बैलेंस डाइट लेने से शरीर की ओवरऑल ग्रोथ में मदद मिलती है, जिससे हाईट बढ़ने के चांस काफीहद तक बढ़ जाते हैं. इसलिए एक्सपर्ट का मानना है कि अगर आप अपनी लंबाई और बॉडी ग्रोथ को बेहतर करना चाहते हैं, तो सही डाइट लेना बहुत जरूरी है. ऐसे में अगर आप कम उम्र से ही अच्छी डाइट लेते है तो जाहिर सी बात है आपको हाईट बढ़ाने के लिए उतनी मेहनत नहीं करनी पड़ेगी. अच्छी डाइट में &amp;nbsp;प्रोटीन, कैल्शियम और विटामिन से भरपूर भोजन जैसे दूध, दही, हरी सब्जियां और फल लें जो आपके शरीर को मजबूती देगा . साथ ही पानी ज्यादा पीना भी जरूरी है, ताकि शरीर हाइड्रेट रहे. इसके अलावा जंक फूड और ज्यादा तेल वाली चीजों से दूरी बनाकर आप अपनी सेहत को बेहतर रख सकते हैं, जिससे आपकी ओवरऑल ग्रोथ पर अच्छा असर पड़ता है.
सही एक्सरसाइज और स्ट्रेचिंग का महत्व
लंबाई को बेहतर दिखाने में एक्सरसाइज और स्ट्रेचिंग का बहुत बड़ा रोल होता है. रोजाना स्ट्रेचिंग करने से शरीर की मसल्स लचीली बनती हैं और रीढ़ की हड्डी सीधी रहती है.बच्चों, युवाओं और हाइट बढ़ाने वाले लोगों को दिन में कम से कम 20 से 30 मिनट एक्सरसाइज जरूर करनी चाहिए. &amp;nbsp;जैसे कि हैंगिंग, टो टच और योगासन करना काफी फायदेमंद होता है. &amp;nbsp;इससे आपकी बॉडी की पोस्टर सुधरती है और आप पहले से ज्यादा लंबे नजर आते हैं. &amp;nbsp;
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        <pubDate>Tue, 21 Apr 2026 20:30:14 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Microplastics Health Risk: दिनभर च्विंगम चबाते हैं तो हो जाएं सावधान, पापा बनने में आ सकती है दिक्कत</title>
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        <description><![CDATA[ Does Chewing Gum Affect Male Fertility: ऑफिस जाते समय कॉफी लेना, दिनभर च्युइंग गम चबाना या जिम वियर पहनना, ये सब हमारी रोजमर्रा की आदतें हैं. लेकिन अब एक्सपर्ट चेतावनी दे रहे हैं कि ये छोटी-छोटी चीजें आपकी फर्टिलिटी पर असर डाल सकती हैं. खासकर च्युइंग गम, जो देखने में बिल्कुल सामान्य लगता है, अंदर ही अंदर बड़ा खतरा बन सकता है. चलिए आपको बताते हैं कि ये कैसे आपके फर्टिलिटी को प्रभावित करते हैं.&amp;nbsp;
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
फर्टिलिटी एक्सपर्ट Dr Phoebe Howells के मुताबिक, इसके पीछे वजह है माइक्रोप्लास्टिक्स. ये बेहद छोटे प्लास्टिक कण होते हैं, जो हमारे आसपास की चीजों, जैसे पैकेजिंग, कपड़े, और यहां तक कि च्युइंग गम से निकलकर शरीर में पहुंच जाते हैं. हालिया रिसर्च में यह सामने आया है कि एक च्युइंग गम चबाने से सैकड़ों माइक्रोप्लास्टिक कण शरीर में जा सकते हैं, जिनमें से ज्यादातर पहले कुछ मिनटों में ही रिलीज हो जाते हैं. यही कण धीरे-धीरे शरीर में जमा होकर हार्मोनल सिस्टम को प्रभावित करते हैं.&amp;nbsp;
पुरुषों और महिलाओं पर क्या होता है प्रभाव?
डॉ. हॉवेल्स बताती हैं कि माइक्रोप्लास्टिक्स में मौजूद केमिकल्सस जैसे BPA, फ्थेलेट्स और PFAS शरीर के हार्मोन को डिस्टर्ब कर सकते हैं. पुरुषों में यह स्पर्म काउंट, क्वालिटी और मूवमेंट पर असर डाल सकते हैं, जबकि महिलाओं में ओव्यूलेशन और पीरियड साइकल पर असर पड़ सकता है.
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क्या निकला रिसर्च में
यूरोपियन सोसाइटी ऑफ ह्यूमन रिप्रोडक्शन एंड एम्ब्रियोलॉजी में पेश एक 2025 की स्टडी में पाया गया कि फर्टिलिटी ट्रीटमेंट करा रही महिलाओं के 69 प्रतिशत सैंपल और पुरुषों के 55 प्रतिशत सैंपल में माइक्रोप्लास्टिक्स मौजूद थे. &amp;nbsp;वहीं यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू मेक्सिको की 2024 की रिसर्च में मानव टेस्टिकल टिशू में भी माइक्रोप्लास्टिक्स पाए गए.&amp;nbsp;
किन चीजों से होती है दिक्कत?
समस्या सिर्फ च्युइंग गम तक सीमित नहीं है। चाय के टी-बैग, टेकअवे कॉफी कप, प्लास्टिक कंटेनर और सिंथेटिक कपड़े, ये सभी माइक्रोप्लास्टिक्स के बड़े सोर्स हैं. खासकर गर्म चीजों के संपर्क में आने पर इनसे ज्यादा कण निकलते हैं, जो सीधे शरीर में पहुंच जाते हैं. डॉक्टरों का कहना है कि प्लास्टिक को पूरी तरह से जीवन से हटाना संभव नहीं है, क्योंकि यह हर जगह मौजूद है. लेकिन छोटे-छोटे बदलाव करके इसके असर को कम किया जा सकता है. जैसे प्लास्टिक की जगह ग्लास या सिरेमिक का इस्तेमाल करना, ढीले-ढाले और नेचुरल फैब्रिक पहनना और च्युइंग गम की जगह नेचुरल विकल्प चुनना.
फर्टिलिटी सिर्फ उम्र या खानपान पर निर्भर नहीं करती, बल्कि हमारे आसपास का माहौल भी इसमें बड़ी भूमिका निभाता है. अगर आप भविष्य में पैरेंट बनने की योजना बना रहे हैं, तो इन छोटी आदतों पर ध्यान देना जरूरी है. क्योंकि कई बार जो चीजें हमें सबसे सामान्य लगती हैं, वही लंबे समय में सबसे ज्यादा असर डालती हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 20 Apr 2026 12:30:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Alzheimer Risk Factors: शरीर में आयरन कम है तो हल्के में न लें, हो सकता है अल्जाइमर; इस देश में 1 करोड़ लोगों पर खतरा</title>
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        <description><![CDATA[ Can Iron Deficiency Increase Alzheimer Risk: आयरन की कमी को अक्सर लोग सिर्फ कमजोरी या थकान से जोड़कर देखते हैं. लेकिन अब नई रिसर्च इस धारणा को बदल रही है. साइंटिस्ट का कहना है कि शरीर में कम हीमोग्लोबिन सिर्फ ऊर्जा ही नहीं, बल्कि दिमाग पर भी असर डाल सकता है और यह असर धीरे-धीरे डिमेंशिया जैसी गंभीर बीमारी की ओर ले जा सकता है. 17 अप्रैल 2026 को जामा नेटवर्क ओपन में प्रकाशित एक स्टडी ने इस कड़ी को और मजबूत किया है. इसमें कैरोलिंस्का इंस्टीट्यूट &amp;nbsp;और स्टॉकहोम विश्वविद्यालय के रिसर्चर ने 2200 से ज्यादा बुजुर्गों पर लंबे समय तक स्टडी किया.
क्या निकला रिसर्च में?
इस रिसर्च में देखा गया कि जिन लोगों में एनीमिया था, उनके खून में अल्जाइमर से जुड़े बायोमार्कर पहले से ही ज्यादा थे. इसके साथ ही, फॉलो-अप के दौरान उनमें डिमेंशिया विकसित होने का खतरा भी ज्यादा पाया गया. यानी आयरन की कमी सिर्फ एक साधारण समस्या नहीं, बल्कि दिमागी बीमारियों का संकेत भी हो सकती है. स्टडी के मुताबिक, जिन लोगों में कम हीमोग्लोबिन और अल्जाइमर से जुड़े प्रोटीन जैसे p-tau217 दोनों मौजूद थे, उनमें डिमेंशिया का जोखिम सबसे ज्यादा था. यह संकेत देता है कि शरीर में खून की कमी और दिमागी बदलाव एक-दूसरे से जुड़े हो सकते हैं.&amp;nbsp;
आयरन की कमी से क्या होती है दिक्कत?
आयरन की कमी से शरीर में ऑक्सीजन की सप्लाई भी प्रभावित होती है. जब ब्रेन को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलती, तो उसकी कार्यक्षमता धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगती है. यही कारण है कि एनीमिया को अब केवल शारीरिक नहीं, बल्कि न्यूरोलॉजिकल समस्या के तौर पर भी देखा जा रहा है. एक और दिलचस्प बात यह सामने आई कि पुरुषों में एनीमिया होने पर डिमेंशिया का खतरा महिलाओं के मुकाबले ज्यादा देखा गया, जबकि महिलाओं में यह समस्या ज्यादा आम होती है. रिसर्चर का मानना है कि इसके पीछे शरीर की अलग-अलग जैविक प्रतिक्रिया जिम्मेदार हो सकती है.&amp;nbsp;
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कितने लोग इससे प्रभावित?
आंकड़ों के अनुसार, दुनियाभर में करीब 1.2 अरब लोग आयरन की कमी से होने वाले एनीमिया से प्रभावित हैं. वहीं यूके में ही लगभग 1 करोड़ लोग इस समस्या से जूझ रहे हैं, जो इसे एक बड़ी पब्लिक हेल्थ चिंता बना देता है.
क्या इसका कोई इलाज है?
अच्छी बात यह है कि आयरन की कमी को काफी हद तक रोका जा सकता है. संतुलित आहार, आयरन से भरपूर फूड, जैसे हरी पत्तेदार सब्जियां, अनाज और रेड मीट और जरूरत पड़ने पर सप्लीमेंट लेने से इसे कंट्रोल किया जा सकता है. एक्सपर्ट का मानना है कि अगर समय रहते एनीमिया की पहचान और इलाज किया जाए, तो डिमेंशिया के खतरे को कम किया जा सकता है. क्योंकि लगभग 45 प्रतिशत मामलों में सही लाइफस्टाइल और समय पर जांच से इस बीमारी को टाला या धीमा किया जा सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 20 Apr 2026 12:30:04 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Pain killers: पेन किलर लेने के तुरंत बाद कैसे खत्म हो जाता है शरीर का दर्द, कैसे काम करती है दवा?</title>
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        <description><![CDATA[ Pain killers: जब शरीर में किसी प्रकार का दर्द होता है, तो लोग अक्सर पेन किलर का रुख करते हैं. खास बात यह है कि दवा लेने के कुछ ही समय बाद दर्द कम होना शुरू हो जाता है. आखिर यह कैसे संभव हो पाता है? शरीर में दर्द उठते ही यह एक प्रकार का संकेत होता है कि कहीं न कहीं कोई समस्या, चोट या सूजन हुई है. जब भी यह दर्द होता है, तो शरीर में Prostaglandius नामक केमिकल बनते हैं, जो नसों के जरिए दिमाग को संकेत देते हैं कि कहां दर्द हो रहा है.
कैसे काम करती है पेन किलर?
अधिकांश पेन किलर जैसे paracetamol और ibuprofen, शरीर में इन दर्द पैदा करने वाले केमिकल्स के निर्माण को कम करने में सहायक होती हैं. ये दवाइयां Prostaglandius के बनने की प्रक्रिया को रोकने में मदद करती हैं. जब ये केमिकल कम बनते हैं, तो नसों तक दर्द का संकेत कम पहुंचता है. परिणामस्वरूप, हमें दर्द में राहत महसूस होने लगती है.
क्यों दिखता है इतनी जल्दी असर?
ये दवाइयां पेट में जाते ही जल्दी से खून में जाकर घुल जाती हैं. खून के जरिए ये फिर तेजी से पूरे शरीर में पहुंचती हैं. ये खास रूप से दिमाग और दर्द वाले हिस्से पर अपना असर दिखाती हैं. आमतौर पर, अधिकांश पेन किलर 20 से 30 मिनट के भीतर ही असर दिखाना शुरू कर देती हैं.
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कितने प्रकार के होते हैं पेन किलर?
पेन किलर अलग-अलग प्रकार के होते हैं और उनका काम करने का तरीका भी अलग-अलग होता है.

Analgesics - आम पेन किलर जैसे paracetamol, दर्द और बुखार को कम करती हैं, लेकिन सूजन पर ज्यादा असर नहीं डाल पातीं.
NSAIDs - ibuprofen जैसी दवाइयां, जो दर्द के साथ-साथ सूजन पर भी असर दिखाती हैं.
Opioids - ये तब दिए जाते हैं जब दर्द नियंत्रित नहीं हो पा रहा हो, क्योंकि ये सीधे दिमाग पर असर डालती हैं. लेकिन इन्हें बिना डॉक्टर की सलाह के लेना हानिकारक हो सकता है.

पेन किलर को सही मात्रा और जरूरत के हिसाब से ही इस्तेमाल करना चाहिए. ज्यादा या बार-बार लेने से पेट में जलन या अल्सर, किडनी या लिवर पर असर और ब्लड प्रेशर बढ़ने जैसे साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं.
सावधानियां बरतनी हैं जरूरी

हमेशा निर्धारित मात्रा में ही दवा लें.
खाली पेट पेन किलर लेने से बचें.
अगर दर्द लंबे समय तक रहे, तो तुरंत डॉक्टर से मिलें.
बच्चों और बुजुर्गों को दवा देते समय विशेष सावधानी बरतें.

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        <pubDate>Mon, 20 Apr 2026 12:30:03 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Sleep Apnea Risk: स्लीप एपनिया कर रहा परेशान तो हो जाएं अलर्ट, वरना चुपके&amp;चुपके दबोच लेगी मौत</title>
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        <description><![CDATA[ How Sleep Apnea Increases Heart Disease Risk: नींद को अक्सर हम शरीर के आराम और रिकवरी का समय मानते हैं. लेकिन दुनिया भर में लाखों लोग ऐसे हैं जिनके लिए नींद उतनी सुकूनभरी नहीं होती जितनी होनी चाहिए. एक आम लेकिन नजरअंदाज की जाने वाली समस्या है ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया, जो सोते समय सांस लेने की प्रक्रिया को बार-बार बाधित करती है. चलिए आपको बताते हैं कि यह कितना खतरनाक साबित हो सकता है आपके लिए और इसको लेकर रिसर्च में क्या निकला है.&amp;nbsp;
क्या निकला रिसर्च में?
हाल ही में यूरोपियन कांग्रेस ऑन ओबेसिटी 2026 में पेश की जाने वाली एक बड़ी स्टडी ने इस समस्या को लेकर गंभीर संकेत दिए हैं. इसमें पाया गया कि स्लीप एपनिया से जूझ रहे लोगों में दिल से जुड़ी बीमारियों या मौत का खतरा 71 प्रतिशत तक ज्यादा हो सकता है. यह रिसर्च लंदन के इंपीरियल कॉलेज हेल्थ पार्टनर्स और इम्पीरियल कॉलेज हेल्थकेयर एनएचएस ट्रस्ट के साइंटिस्ट ने की, जिसे एली-लिली एंड कंपनी का भी सपोर्ट मिला.
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स्लीप एपनिया क्या होता है?
स्लीप एपनिया तब होता है जब सोते समय बार-बार एयरवे ब्लॉक हो जाता है, जिससे सांस कुछ समय के लिए रुक जाती है. शरीर तुरंत प्रतिक्रिया देता है और व्यक्ति हल्के से जागता है, ताकि सांस दोबारा शुरू हो सके. यह प्रक्रिया रात में कई बार दोहराई जाती है, जिससे नींद की क्वालिटी खराब होती है और शरीर में ऑक्सीजन का स्तर गिरता है. लंबे समय तक ऐसा होने से दिल और ब्लड वेसल्स पर दबाव बढ़ता है. इससे ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है, हार्ट रिदम बिगड़ सकती है और शरीर में सूजन बढ़ सकती है. यही वजह है कि स्लीप एपनिया को दिल की बीमारियों से जोड़कर देखा जाता है.&amp;nbsp;
मोटापे से क्या है कनेक्शन?
इस समस्या का मोटापे से भी गहरा संबंध है। लगभग 40 से 70 प्रतिशत स्लीप एपनिया के मरीज ओवरवेट या मोटापे से ग्रस्त होते हैं. गर्दन के आसपास जमा फैट एयरवे को संकरा कर देता है, जिससे सांस लेने में रुकावट बढ़ती है. वहीं स्लीप एपनिया खुद वजन कम करना मुश्किल बना देता है, जिससे एक खतरनाक चक्र बन जाता है. इस स्टडी में करीब 29 लाख लोगों के हेल्थ रिकॉर्ड का एनालिसिस किया गया. इनमें 20,000 से ज्यादा स्लीप एपनिया के मरीजों की तुलना लगभग 1 लाख ऐसे लोगों से की गई, जिन्हें यह समस्या नहीं थी. चार साल तक इन लोगों की निगरानी की गई.&amp;nbsp;
क्या निकला रिजल्ट?
नतीजे काफी चिंताजनक रहे. स्लीप एपनिया वाले लगभग 26 प्रतिशत लोगों को हार्ट अटैक, स्ट्रोक या मौत जैसी गंभीर स्थिति का सामना करना पड़ा, जबकि बिना एपनिया वाले लोगों में यह आंकड़ा करीब 17 प्रतिशत था. सिर्फ हार्ट की बीमारी ही नहीं, बल्कि स्लीप एपनिया से जुड़े लोगों में डायबिटीज, मोटापा, जोड़ों की समस्याएं और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी दिक्कतें भी ज्यादा देखी गईं. इसके साथ ही, ऐसे लोग हेल्थकेयर सेवाओं का ज्यादा उपयोग करते हैं.
हालांकि इसके इलाज मौजूद हैं, जैसे CPAP मशीन, जो सोते समय एयरवे को खुला रखती है. लेकिन कई लोग या तो इस बीमारी से अनजान रहते हैं या सही इलाज नहीं ले पाते, जिससे खतरा और बढ़ जाता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 20 Apr 2026 00:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Heart attack in women: 30 की उम्र में ही दिल पर मंडराने लगता है खतरा, महिलाओं को जरूर रहना चाहिए अलर्ट</title>
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        <description><![CDATA[ हार्ट अटैक दिन-प्रतिदिन सामान्य होते जा रहे हैं. यह सुनने में अजीब तो लग रहा होगा, लेकिन यह डरावना सत्य हमें सतर्क करने के लिए काफी है. फिर भी लोग इस बात को काफी नजरअंदाज कर रहे हैं, जैसे कि यह कोई समस्या ही नहीं है. अगर बात करें महिलाओं की, तो 30 से 40 साल की उम्र के बीच की महिलाओं को यह खतरा कुछ ज्यादा ही तेजी से घेरता जा रहा है. महिलाएं ज्यादातर शुरुआती चेतावनी संकेतों को नजरअंदाज कर देती हैं, जिससे सही समय पर जांच नहीं हो पाती और जब होती है, तब तक काफी देर हो जाती है.
हाल की कहानी
साउथ मुंबई में रहने वाली 35 साल की वर्किंग प्रोफेशनल ऋचा कुमार दो बच्चों की मां हैं. उन्होंने हमेशा अपने आप को फिट समझा. वह हमेशा थोड़ी सी थकान और छाती में हल्के दर्द जैसे इशारों को काम के लोड के कारण होने वाली तकलीफ समझकर नजरअंदाज करती रहीं. जनवरी 2026 में अचानक सीने में तेज दर्द होने के कारण उन्हें हार्ट अटैक आया. आगे जांच करने पर पता चला कि यह जेनेटिकली जुड़ा हुआ है, क्योंकि उनके पापा को भी उनकी 35 की उम्र में यह दिक्कतें आई थीं. ऋचा ने समय रहते एंजियोप्लास्टी करवाई और चौथे दिन ही 80 प्रतिशत ब्लॉकेज से राहत पा ली.
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एक्सपर्ट की राय
Dr. Bipeenchandra Bhaame के अनुसार, &quot;ऐसे बहुत मरीज हैं जो कम उम्र में ही दिल से जुड़ी बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं.&quot; आगे बताते हुए उन्होंने कहा, &quot;हम युवा महिलाओं, खासकर 30 से 40 के बीच की महिलाओं में ये लक्षण ज्यादा देख रहे हैं. जेनेटिक्स इसमें एक अहम भूमिका निभाता है. बहुत से लोगों को मोटापे की दिक्कत या तंबाकू की लत नहीं होती, फिर भी वे अपने पारिवारिक इतिहास के कारण इसका शिकार बन जाते हैं. महिलाएं समय के अभाव के कारण हल्के सीने के दर्द और सांस फूलने जैसी परेशानियों को नजरअंदाज कर देती हैं. इन सब से लड़ने के लिए संतुलित आहार, रोजाना व्यायाम, तनाव प्रबंधन और ध्यान काफी मददगार साबित होते हैं.&quot;
Dr. Sonamm Tiwari के अनुसार, &quot;महिलाओं की हृदय से जुड़ी सेहत उनकी जिम्मेदारियों के कारण नजरअंदाज कर दी जाती है, क्योंकि महिलाओं में पुरुषों जैसे लक्षण नहीं दिखते. हार्मोनल बदलाव और गर्भावस्था से जुड़ी समस्याएं उनके दिल पर असर डाल सकती हैं. महिलाओं में थकावट, पीठ का दर्द, जबड़े का दर्द जैसे संकेत देखने को मिलते हैं. समय पर जांच एक अहम भूमिका निभाती है, इसलिए इसे नजरअंदाज न करें.&quot;
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        <pubDate>Mon, 20 Apr 2026 00:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Mouth Breathing Effects: क्या सुबह उठकर आपको भी लगती है थकान? मुंह से सांस लेने की आदत हो सकती है वजह</title>
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        <description><![CDATA[ How Mouth Breathing Affects Sleep Quality: सांस लेना एक ऐसी प्रक्रिया है, जिस पर हम शायद ही कभी ध्यान देते हैं. लेकिन यही साधारण-सी लगने वाली आदत हमारे शरीर की ऊर्जा, नींद और लंबी अवधि की सेहत को गहराई से प्रभावित कर सकती है. खासकर तब, जब सांस नाक की बजाय मुंह से ली जा रही हो और वो भी बिना हमें पता चले. अक्सर लोग मानते हैं कि मुंह से सांस लेना सिर्फ तब होता है जब नाक बंद हो या भारी एक्सरसाइज चल रही हो. लेकिन कई मामलों में यह एक आदत बन जाती है, खासकर नींद के दौरान. सुबह उठते समय सूखे होंठ, बार-बार प्यास लगना या हल्की थकान ये सब संकेत हो सकते हैं कि सांस लेने का तरीका बदल गया है.&amp;nbsp;
क्या कहते हैं एक्सपर्ट
बेंगलुरु के SDMIAH में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. सम्हिता उल्लोड बताती हैं कि &quot;मुंह से सांस लेना यानी नाक की जगह मुंह से सांस लेना एक असामान्य स्थिति मानी जाती है, खासकर अगर यह नींद के दौरान लगातार हो। ऐसे मामलों में सही जांच और इलाज जरूरी होता है.&quot; असल में हमारा शरीर नाक से सांस लेने के लिए ही बना है. नाक सिर्फ हवा का रास्ता नहीं, बल्कि एक प्राकृतिक फिल्टर की तरह काम करती है. यह हवा को साफ करती है, उसमें नमी जोड़ती है और धूल व बैक्टीरिया को रोकती है. जब हम मुंह से सांस लेते हैं, तो ये पूरी प्रक्रिया छूट जाती है.
क्या होती है दिक्कत
डॉ. उल्लोड के मुताबिक &quot;नाक से सांस लेने पर हवा फिल्टर होती है, ह्यूमिडिफाई होती है और हानिकारक कणों को शरीर में जाने से रोका जाता है.&quot; लेकिन मुंह से सांस लेने पर ठंडी, सूखी और बिना फिल्टर की हवा सीधे फेफड़ों तक पहुंचती है, जिससे समय के साथ सांस लेने पर असर पड़ सकता है. इसका एक और बड़ा असर एनर्जी स्तर पर पड़ता है. कई बार लोग पूरी नींद लेने के बाद भी थकान महसूस करते हैं. इसकी एक वजह मुंह से सांस लेना भी हो सकता है. इससे शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती और ऊर्जा उत्पादन प्रभावित होता है.
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डॉ. उल्लोड बताती हैं कि इससे थकान, ध्यान में कमी और धीरे-धीरे श्वसन संबंधी समस्याएं हो सकती हैं. इसके अलावा, नींद की गुणवत्ता भी खराब होती है. मुंह से सांस लेने की वजह से नींद बार-बार टूट सकती है, भले ही हमें इसका एहसास न हो. नींद से जुड़ी यह समस्या आगे चलकर स्लीप एपनिया जैसी गंभीर स्थिति को भी बढ़ा सकती है. डॉ. उल्लोड कहती हैं कि यह आदत स्लीप एपनिया को और खराब कर सकती है और नींद को टुकड़ों में बांट देती है.
बच्चों पर क्या होता है असर
बच्चों में इसका असर और भी गहरा हो सकता है। लंबे समय तक मुंह से सांस लेने से चेहरे की बनावट, दांतों की स्थिति और यहां तक कि पोस्टर पर भी असर पड़ सकता है. अच्छी बात यह है कि इस आदत को बदला जा सकता है. लेकिन इसके लिए सबसे जरूरी है कारण को पहचानना. अगर नाक बंद रहती है, एलर्जी है या साइनस की समस्या है, तो पहले उसका इलाज जरूरी है. इसके साथ ही प्राणायाम जैसी ब्रीदिंग एक्सरसाइज, &amp;nbsp;रेगुलर फिजिकल एक्टिविटी और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह लेना मददगार साबित हो सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 18 Apr 2026 20:30:15 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Summer Health Tips: गर्मी में धूप में घूमते&amp;घूमते गायब हो जाती है एनर्जी, ये काम करेंगे तो दिनभर रहेंगे एक्टिव</title>
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        <description><![CDATA[ Summer Health Tips: गर्मी का मौसम शुरू होते ही तेज धूप और बढ़ता तापमान हमारे डेली रूटीन और सेहत पर असर डालने लगता है. आजकल इतनी ज्यादा गर्मी पड़ रही है कि थोड़ी देर बाहर रहने पर ही शरीर थक जाता है. कई लोगों को चक्कर आना, सिर दर्द, कमजोरी या बेहोशी जैसी दिक्कतें भी होने लगती हैं, जिसका बड़ा कारण शरीर में पानी की कमी यानी डिहाइड्रेशन और तेज गर्मी होता है. लेकिन अगर आप अपने रूटीन और खानपान में थोड़े बदलाव कर लें, तो इस समस्या से बचा जा सकता है.
सही मात्रा में पानी पीना, हल्का और ठंडक देने वाला खाना खाना, और धूप से बचाव करना आपको दिनभर एनर्जेटिक और एक्टिव बनाए रख सकता है. तो आइए जानते हैं कि &amp;nbsp;गर्मी में धूप में घूमते-घूमते एनर्जी कैसे गायब हो जाती है और एनर्जी को दिनभर एक्टिव रखने के लिए क्या करें.&amp;nbsp;
गर्मी में धूप में घूमते-घूमते एनर्जी कैसे गायब हो जाती है
गर्मी में धूप में घूमते-घूमते तेज तापमान का सीधा असर शरीर पर पड़ता है. जब आप धूप में रहते हैं, तो शरीर खुद को ठंडा रखने के लिए ज्यादा पसीना निकालता है. इस प्रक्रिया में शरीर से पानी और जरूरी इलेक्ट्रोलाइट्स बाहर निकल जाते हैं, जिससे डिहाइड्रेशन हो जाता है. वहीं पानी की कमी होने पर ब्लड सर्कुलेशन धीमा पड़ता है और शरीर को सही मात्रा में ऑक्सीजन और पोषण नहीं मिल पाता, जिससे थकान, कमजोरी और चक्कर आने लगते हैं. इसके अलावा तेज धूप में शरीर का तापमान बढ़ जाता है, जिससे दिल को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है और एनर्जी तेजी से खर्च होती है. यही कारण है कि गर्मी में थोड़ी देर धूप में रहने पर भी शरीर जल्दी थका हुआ और सुस्त महसूस करता है.&amp;nbsp;
एनर्जी को दिनभर एक्टिव रखने के लिए क्या करें
1. शरीर को हाइड्रेट रखें - &amp;nbsp;गर्मी में सबसे जरूरी है शरीर में पानी की कमी न होने देना. दिनभर थोड़ा-थोड़ा पानी पीते रहें. प्यास लगने का इंतजार न करें. इसके अलावा आप नारियल पानी, नींबू पानी, छाछ और ओआरएस जैसे पेय भी ले सकते हैं. ये शरीर में जरूरी मिनरल्स और नमक की कमी को पूरा करते हैं. साथ ही तरबूज, खरबूजा, खीरा और संतरा जैसे फल भी खाएं क्योंकि इनमें पानी भरपूर होता है.&amp;nbsp;
2. खानपान में बदलाव करें - गर्मी के मौसम में हल्का और पाचन के लिए सही खाना खाएं. तला-भुना, मसालेदार और ज्यादा ऑयली खाना शरीर में गर्मी बढ़ाता है. &amp;nbsp;आप अपनी डाइट में दही, सलाद, मूंग दाल और हरी सब्जियां शामिल करें. साथ ही सुबह भीगे हुए बादाम और केला खाने से शरीर को तुरंत एनर्जी मिलती है और कमजोरी दूर होती है.&amp;nbsp;
&amp;nbsp;3. धूप से बचाव - कोशिश करें कि दोपहर 12 बजे से 4 बजे के बीच बाहर न निकलें, क्योंकि इस समय धूप सबसे ज्यादा तेज होती है. अगर बाहर जाना जरूरी हो, तो सिर को टोपी, दुपट्टे या छाते से ढकें. हल्के रंग के ढीले और सूती कपड़े पहनें, जिससे शरीर को ठंडक मिलती है.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ें - Drinking Risks: सावधान! हफ्ते में एक दिन भी ज्यादा शराब पीना लिवर के लिए घातक, नई स्टडी में हुआ बड़ा खुलासा
4. घर लौटने के बाद ये गलतियां न करें - धूप से आने के तुरंत बाद ठंडा पानी न पिएं. पहले थोड़ा आराम करें और फिर सामान्य तापमान का पानी पिएं. घर आते ही तुरंत नहाने या कपड़े बदलने से बचें. 5 से 10 मिनट आराम करने के बाद ही ऐसा करें. इसके अलावा प से आने के तुरंत बाद सीधे एसी में जाने के बजाय पहले पंखे के नीचे बैठें, ताकि शरीर का तापमान सामान्य हो जाए.&amp;nbsp;
5. ठंडी चीजों से भी रखें दूरी - धूप से आने के तुरंत बाद आइसक्रीम, ठंडे फल या फ्रिज का पानी लेने से बचें. इससे गले में खराश या कफ की समस्या हो सकती है.&amp;nbsp;
6. शरीर को आराम और नींद दें - &amp;nbsp;गर्मी में शरीर जल्दी थक जाता है, इसलिए पूरी नींद लेना बहुत जरूरी है. दिनभर एक्टिव रहने के लिए रात में कम से कम 7 से 8 घंटे की नींद जरूर लें.&amp;nbsp;
7. हल्की एक्सरसाइज और योग करें - &amp;nbsp;सुबह या शाम के समय हल्की एक्सरसाइज, योग या मेडिटेशन करने से शरीर फिट रहता है और तनाव भी कम होता है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Sat, 18 Apr 2026 20:30:14 +0530</pubDate>
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        <title>Bone Broth Soup Benefits : बोन ब्रोथ सूप से बढ़ाएं प्रोटीन और पाएं मजबूत गट हेल्थ, जानें इसके फायदे</title>
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        <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 12:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>Drinking Risks: सावधान! हफ्ते में एक दिन भी ज्यादा शराब पीना लिवर के लिए घातक, नई स्टडी में हुआ बड़ा खुलासा</title>
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        <description><![CDATA[ Is Occasional Binge Drinking Dangerous: अक्सर लोग ऐसा ही सोचते हैं कि कभी-कभार ज्यादा शराब पी लेना कोई बड़ी बात नहीं है. खासकर तब, जब वे पूरे हफ्ते बहुत कम या बिल्कुल नहीं पीते. लेकिन अब एक नई स्टडी इस धारणा को चुनौती दे रही है और बता रही है कि ऐसी आदतें लिवर के लिए खतरनाक साबित हो सकती हैं. अमेरिका के केक मेडिसिन और निवर्सिटी ऑफ साउथ कैलिफोर्निया के रिसर्चर के तरफ से की गई यह स्टडी प्रतिष्ठित जर्नल क्लिनिकल गैस्ट्रोएंटरोलॉजी और हेपेटोलॉजी में पब्लिश हुई है. इसमें सामने आया है कि कभी-कभार भी ज्यादा मात्रा में शराब पीना लिवर डैमेज के खतरे को काफी बढ़ा सकता है.
क्या निकला रिसर्च में?&amp;nbsp;&amp;nbsp;
यह रिसर्च खास तौर पर एक बीमारी मेटाबोलिक डिसफंक्शन-एसोसिएटेड स्टीटोटिक लिवर डिजीज (MASLD) पर केंद्रित थी, जो आज दुनिया में तेजी से बढ़ती लिवर से जुड़ी समस्याओं में से एक है. इस बीमारी में लिवर में फैट जमा हो जाता है, जो आगे चलकर सूजन और स्कारिंग जैसी गंभीर स्थितियों का कारण बन सकता है. आमतौर पर यह समस्या मोटापा, डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर से जूझ रहे लोगों में ज्यादा देखी जाती है.&amp;nbsp;
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&amp;nbsp;शराब पीने पर कितना असर?
रिसर्चर ने सिर्फ यह नहीं देखा कि लोग कितनी शराब पीते हैं, बल्कि यह भी समझने की कोशिश की कि पीने का तरीका कितना असर डालता है. उन्होंने एपिसोडिक हेवी ड्रिंकिंग यानी एक ही दिन में ज्यादा शराब पीने की आदत पर फोकस किया. इसमें महिलाओं के लिए एक दिन में चार या उससे ज्यादा ड्रिंक और पुरुषों के लिए पांच या उससे ज्यादा ड्रिंक शामिल किए गए, वह भी महीने में कम से कम एक बार. यह भी सामने आया कि युवा और पुरुष इस तरह की ड्रिंकिंग के प्रति ज्यादा झुकाव रखते हैं. इसके साथ ही, एक बार में ज्यादा शराब पीने वालों में लिवर को होने वाला नुकसान भी ज्यादा गंभीर पाया गया. एक्सपर्ट का मानना है कि एक साथ ज्यादा शराब पीने से लिवर पर अचानक दबाव पड़ता है, जिससे सूजन और नुकसान का खतरा बढ़ जाता है.&amp;nbsp;
रिजल्ट चौंकाने वाले
2017 से 2023 के बीच 8,000 से ज्यादा एडल्ट के डेटा का एनालिसि करने पर चौंकाने वाले नतीजे सामने आए. जिन लोगों को MASLD था और जो इस तरह की हेवी ड्रिंकिंग करते थे, उनमें एडवांस्ड लिवर फाइब्रोसिस का खतरा लगभग तीन गुना ज्यादा पाया गया. यह वह स्थिति है, जब लिवर में स्कार टिश्यू बन जाता है और उसकी काम करने की क्षमता प्रभावित होने लगती है. स्टडी की एक अहम बात यह रही कि कुल शराब की मात्रा से ज्यादा मायने उसका सेवन करने का तरीका रखता है. यानी दो लोग अगर हफ्ते में बराबर मात्रा में शराब पीते हैं, तो जो व्यक्ति उसे एक ही दिन में खत्म करता है, उसके लिवर पर ज्यादा खतरा मंडराता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 12:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>Therapy For Hearing Loss: जन्म से बहरेपन का इलाज अब मुमकिन! इस इंजेक्शन से लौटेगी बच्चों की सुनने की शक्ति</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/therapy-for-hearing-loss-जन्म-से-बहरेपन-का-इलाज-अब-मुमकिन-इस-इंजेक्शन-से-लौटेगी-बच्चों-की-सुनने-की-शक्ति</link>
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        <description><![CDATA[ Can Gene Therapy Cure Congenital Deafness: जन्म से सुनने की समस्या झेल रहे लोगों के लिए दुनिया हमेशा से कुछ हद तक खामोश रही है. इस स्थिति को कंजेनिटल डेफनेस कहा जाता है, जो जन्म के साथ ही शुरू हो जाती है और व्यक्ति के बातचीत, पढ़ाई और रोजमर्रा की जिंदगी पर गहरा असर डालती है. अक्सर इसके पीछे जेनेटिक कारण होते हैं, यानी कुछ खास जीन में बदलाव, जो पीढ़ियों के जरिए आगे बढ़ते हैं. अब तक ऐसे मामलों में हियरिंग एड या कॉक्लियर इम्प्लांट जैसे विकल्प ही उपलब्ध थे, जो मदद तो करते हैं, लेकिन पूरी तरह से प्राकृतिक सुनने की क्षमता वापस नहीं ला पाते.&amp;nbsp;
नई उम्मीद
इसी बीच स्वीडन के करोलिंस्का इंस्टिट्यूट &amp;nbsp;से आई एक नई स्टडी ने उम्मीद की नई किरण जगाई है. यह रिसर्च प्रतिष्ठित जर्नल नेचर में प्रकाशित हुआ है. इसमें बताया गया है कि जीन थेरेपी के जरिए एक खास तरह की जेनेटिक बहरापन को काफी हद तक ठीक किया जा सकता है, वह भी बच्चों और युवाओं दोनों में.&amp;nbsp;
कहां हुई है खोज?
इस रिसर्च में साइंटिस्ट ने चीन के अस्पतालों और विश्वविद्यालयों के साथ मिलकर 1 से 24 साल की उम्र के 10 मरीजों पर काम किया. इन सभी में सुनने की समस्या OTOF जीन में बदलाव के कारण थी. यह जीन ओटोफरलिन नाम के एक प्रोटीन को बनाने में अहम भूमिका निभाता है, जो कान से दिमाग तक ध्वनि संकेत पहुंचाने में मदद करता है. जब यह प्रोटीन ठीक से काम नहीं करता, तो कान आवाज को महसूस तो कर लेता है, लेकिन दिमाग तक सही तरीके से सिग्नल नहीं पहुंच पाता.
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ऐसे निकला समस्या का हल
इस समस्या के समाधान के लिए रिसर्चर ने जीन थेरेपी का इस्तेमाल किया. इसमें एक स्वस्थ जीन को शरीर में पहुंचाया जाता है. इसके लिए एक सुरक्षित वायरस एडेनो-असोसिएटेड वायरस का इस्तेमाल किया गया, जिसके जरिए काम करने वाला OTOF जीन सीधे कान के अंदर पहुंचाया गया. यह प्रक्रिया कॉक्लिया के निचले हिस्से में मौजूद राउंड विंडो नाम की जगह पर एक छोटे इंजेक्शन के जरिए की गई. नतीजे काफी उत्साहजनक रहे. कई मरीजों ने सिर्फ एक महीने के भीतर ही सुनने में सुधार महसूस करना शुरू कर दिया. छह महीने बाद सभी प्रतिभागियों में स्पष्ट रूप से फायदा देखा गया. वे पहले की तुलना में काफी धीमी आवाजें भी सुनने लगे, जो पहले उनके लिए असंभव था.
बच्चों में सुधार
खास बात यह रही कि बच्चों में सुधार सबसे ज्यादा देखा गया, खासकर 5 से 8 साल की उम्र के बीच. एक छोटी बच्ची ने तो इलाज के कुछ महीनों के भीतर लगभग सामान्य सुनने की क्षमता हासिल कर ली और अपनी मां से आसानी से बातचीत करने लगी. इससे यह भी संकेत मिलता है कि समय रहते इलाज शुरू किया जाए तो परिणाम और बेहतर हो सकते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 12:30:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Weight Loss Tips: क्रैश डाइट नहीं, बैलेंस्ड लाइफस्टाइल से घटेगा वजन, चेन्नई की इंफ्लुएंसर ने बताया फिटनेस सीक्रेट</title>
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        <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 00:30:09 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Health Warning Signs: शरीर के इन छोटे संकेतों को न करें इग्नोर, वरना डैमेज हो सकते हैं लिवर और किडनी</title>
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        <description><![CDATA[ Early Signs Your Body Is In Trouble: हमारा शरीर कभी अचानक से बीमार नहीं पड़ता, बल्कि वह पहले छोटे-छोटे संकेत देता है. थकान, दिमाग का भारी लगना, त्वचा में बदलाव या हल्की-फुल्की असहजता, ये सब यूं ही नहीं होते. ये संकेत बताते हैं कि शरीर के अंदर कहीं न कहीं दबाव बन रहा है. समस्या यह है कि ज्यादातर लोग इन संकेतों को नजरअंदाज कर देते हैं और तब ध्यान देते हैं जब दर्द शुरू हो जाता है.&amp;nbsp;
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
डॉ. भानु मिश्रा ने TOI को बताया कि &quot;ज्यादातर अंगों को होने वाला नुकसान बिना किसी स्पष्ट लक्षण के ही होता है. लोग इन संकेतों को इसलिए नजरअंदाज कर देते हैं क्योंकि ये साफ नजर नहीं आते.&quot; यही सबसे बड़ा खतरा है कि जब तक लक्षण गंभीर बनते हैं, तब तक नुकसान गहरा हो चुका होता है.&amp;nbsp;
थकान सबसे आम समस्या
थकान एक आम समस्या है, लेकिन अगर सही नींद लेने के बाद भी थकावट बनी रहती है, तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए. यह सिर्फ व्यस्त दिनचर्या की वजह से नहीं होता, बल्कि यह लिवर या किडनी पर बढ़ते दबाव का संकेत हो सकता है. &amp;nbsp;डॉ. भानु &amp;nbsp;के अनुसार, &quot;क्रॉनिक थकान का मतलब सिर्फ नींद की कमी नहीं, बल्कि लिवर या किडनी में समस्या भी हो सकती है.&quot; ऐसी थकान धीरे-धीरे आपकी सोच और ऊर्जा दोनों को प्रभावित करती है.&amp;nbsp;
ब्रेन के इन सिग्नल को न करें नजरअंदाज
दिमाग भी अपने तरीके से संकेत देता है। बार-बार सिरदर्द होना, ध्यान लगाने में दिक्कत या दिमाग का धुंधला लगना अक्सर लोग तनाव या स्क्रीन टाइम का असर मान लेते हैं. लेकिन &amp;nbsp;एक्सपर्ट बताते हैं कि यह डिहाइड्रेशन, हाई ब्लड प्रेशर या शरीर में टॉक्सिन्स बढ़ने का संकेत हो सकता है. याददाश्त में कमी या फोकस में गिरावट दिमाग पर पड़ रहे दबाव का संकेत है.
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इन संकेतों को भी न करें नजरअंदाज
शरीर के कुछ और संकेत भी बहुत कुछ बताते हैं. जैसे पेशाब का रंग बदलना, पैरों में सूजन या आंखों के आसपास फुलाव, ये सब किडनी स्ट्रेस की ओर इशारा कर सकते हैं. इसी तरह बार-बार पेट फूलना, भूख कम लगना या खाने के बाद असहजता महसूस होना लिवर या पैंक्रियाज की परेशानी का संकेत हो सकता है. त्वचा, बाल और नाखून भी शरीर के अंदर की स्थिति को दिखाते हैं. एक्सपर्ट के अनुसार, त्वचा का फीका पड़ना, खुजली या हल्का पीलापन इस बात का संकेत हो सकता है कि शरीर के अंदर कुछ ठीक नहीं है. इसके अलावा बालों का पतला होना या नाखूनों का कमजोर होना भी पोषण की कमी या आंतरिक असंतुलन दर्शाता है. कई बार हल्की-फुल्की समस्याएं जैसे पीठ में जकड़न, पैरों में सुन्नता या खड़े होने पर चक्कर आना भी नजरअंदाज कर दिए जाते हैं.
इससे बचने के लिए क्या कर सकते हैं?
इन सभी संकेतों से बचाव का सबसे अच्छा तरीका है कि रोजमर्रा की अच्छी आदतें अपनाना. पर्याप्त पानी पीना, संतुलित आहार लेना, प्रोसेस्ड फूड और ज्यादा नमक-चीनी से दूरी बनाना, नियमित व्यायाम और पूरी नींद, ये सब शरीर को स्वस्थ रखने में मदद करते हैं. इसके साथ ही, बिना लक्षण के भी समय-समय पर हेल्थ चेकअप कराना जरूरी है. यही नहीं, एक अहम स्टडी जो इंटरनेशनल जर्नल ऑफ फैमिली मेडिसिन एंड प्राइमरी केयर में पब्लिश हुई है, बताती है कि आजकल लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियां चुपचाप बढ़ रही हैं और अक्सर इनका पता तब चलता है जब लोग रूटीन चेकअप करवाते हैं. यानी शरीर पहले संकेत देता है, लेकिन हम उन्हें समझ नहीं पाते. इसलिए समय से चेकअप करवाना जरूरी है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 00:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Blood Kick Trend: भोपाल में फैला &amp;apos;ब्लड किक&amp;apos; का जानलेवा नशा, सुकून के लिए अपना ही खून निकाल रहे युवा</title>
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        <description><![CDATA[ Is Injecting Your Own Blood Dangerous: भोपाल में एक बेहद खतरनाक और चिंताजनक ट्रेंड सामने आ रहा है, जिसे डॉक्टर ब्लड किक के नाम से पहचान रहे हैं. यह कोई सामान्य नशा नहीं है, न इसमें शराब है, न ड्रग्स. लेकिन इसके स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर उतने ही गंभीर और जानलेवा हो सकते हैं. इस अजीब आदत में कुछ युवा अपने ही शरीर से खून निकालकर उसे दोबारा इंजेक्ट करते हैं, ताकि उन्हें कुछ पलों के लिए ऊर्जा, सुकून या कंट्रोल का एहसास हो सके.
जनवरी 2026 से अब तक गांधी मेडिकल कॉलेज में ऐसे कम से कम पांच मामले सामने आ चुके हैं. सभी मरीज 18 से 25 साल के हैं. शुरुआत में परिवार को सिर्फ व्यवहार में बदलाव दिखता है, चिड़चिड़ापन, गुस्सा, अकेले रहना. लेकिन धीरे-धीरे यह स्थिति इतनी गंभीर हो जाती है कि उन्हें साइकेट्रिक के पास ले जाना पड़ता है.
&amp;nbsp;पारंपरिक नशे से बिल्कुल अलग
हमीदिया अस्पताल के डॉक्टरों का कहना है कि यह पारंपरिक नशे से बिल्कुल अलग मामला है. इन युवाओं में न शराब के लक्षण मिलते हैं, न ड्रग्स के. लेकिन शरीर पर सुई के निशान साफ दिखाई देते हैं. उनका मानना होता है कि अपने ही खून को दोबारा शरीर में डालने से उन्हें तुरंत राहत मिलती है, जबकि असल में यह एक खतरनाक मानसिक और शारीरिक जाल है.
एक्सपर्ट क्या कहते हैं?
एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार, साइकेट्रिस्ट डॉ जेपी अग्रवाल के अनुसार, यह व्यवहारिक लत है, कोई इलाज नहीं. दिमाग इस प्रक्रिया को एक इनाम की तरह लेने लगता है. खून निकालने का दर्द और उसके बाद मिलने वाला एहसास धीरे-धीरे आदत बन जाता है. वे बताते हैं यह खून के बारे में नहीं, बल्कि उस झूठे सुकून के बारे में है, जिसे व्यक्ति महसूस करता है.
बेहद गंभीर मामले
एक्सपर्ट के अनुसार, इसके खतरे बेहद गंभीर हैं. बार-बार खुद को इंजेक्शन लगाने से शरीर में इंफेक्शन फैल सकता है. सेप्सिस, एचआईवी, हेपेटाइटिस जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है. इसके अलावा नसों को नुकसान, खून के थक्के, एनीमिया और यहां तक कि अंग फेल होने का जोखिम भी रहता है. शरीर की प्राकृतिक प्रक्रिया इस तरह के दबाव को झेल नहीं पाती और कुछ मामलों में यह अचानक मौत का कारण बन सकता है.
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मेंटल हेल्थ पर असर
डॉक्टर यह भी बताते हैं कि यह समस्या सिर्फ शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य से भी गहराई से जुड़ी है. इसके पीछे अक्सर डिप्रेशन, आत्म-नुकसान की प्रवृत्ति या ध्यान पाने की इच्छा छिपी होती है. यानी यह एक तरह से अंदर के दर्द का संकेत है, जो बाहर सुकून के रूप में दिखाई देता है. सोशल मीडिया भी इस खतरनाक ट्रेंड को बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभा रहा है. अजीब और जोखिम भरे कंटेंट युवाओं को एक्सपेरिमेंट करने के लिए उकसाते हैं, जो धीरे-धीरे लत में बदल जाता है.
डॉ. जेपी अग्रवाल साफ चेतावनी देते हैं, जो खून आपको जिंदा रखता है, वही गलत तरीके से इस्तेमाल होने पर जान भी ले सकता है. यह कोई थ्रिल नहीं, बल्कि क्लिनिकल डेथ की ओर बढ़ता कदम है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 16 Apr 2026 08:30:03 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Milk And Parkinson Disease:सेहतमंद समझकर रोज पी रहे हैं दूध? इस लाइलाज बीमारी का बढ़ सकता है खतरा</title>
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        <description><![CDATA[ Does Drinking Milk Increase Parkinson Disease Risk: आपने शायद कहीं न कहीं यह जरूर सुना होगा या देखा होगा कि दूध और पार्किंसन बीमारी के बीच कोई संबंध हो सकता है. यह सुनकर कई लोग चौंक जाते हैं और सोचने लगते हैं कि क्या अब दूध पीना भी नुकसानदायक है. सच यह है कि इस विषय पर जो रिसर्च हुई है, वह पूरी तरह बेबुनियाद नहीं है, लेकिन कहानी इतनी सीधी भी नहीं है कि दूध पीना बंद कर दें, वरना बीमारी हो जाएगी.&amp;nbsp;
क्या कहते हैं एक्सपर्ट
डॉ. सादिक पठान ने TOI को बताया कि कई स्टडीज में यह देखा गया है कि डेयरी प्रोडक्ट्स, खासकर ज्यादा मात्रा में दूध पीने वाले लोगों में पार्किंसन का खतरा थोड़ा बढ़ सकता है. खासतौर पर पुरुषों में यह जोखिम 20 से 40 प्रतिशत तक ज्यादा पाया गया है. हालांकि, यह सीधा कारण नहीं बल्कि एक संबंध है, जिसे अभी पूरी तरह समझा जाना बाकी है.
क्या निकला रिसर्च में?
इस विषय पर सबसे लंबी और बड़ी रिसर्च हार्वर्ड यूनिवर्सिटीसे जुड़ी स्टडीज में नर्सेस हेल्थ स्टडी और हेल्थ प्रोफेशनल्स फॉलो-अप स्टडी में सामने आई. करीब 25 साल तक लोगों की डाइट को ट्रैक करने के बाद पाया गया कि जो लोग रोजाना लो-फैट डेयरी के तीन या उससे ज्यादा सर्विंग लेते थे, उनमें पार्किंसन का खतरा 34 प्रतिशत ज्यादा था, तुलना में उन लोगों के जो बहुत कम डेयरी लेते थे.
इसी तरह अमेरिकन कैंसर सोसाइटी की कैंसर प्रिवेंशन स्टडी में भी एक दिलचस्प पैटर्न सामने आया. इसमें हजारों पुरुष और महिलाओं को शामिल किया गया और पाया गया कि डेयरी का सेवन करने वालों में यह जोखिम पुरुषों में 1.8 गुना और महिलाओं में 1.3 गुना तक बढ़ा हुआ था.
क्या दूध से ऐसा होता है?
अब सवाल यह है कि आखिर दूध में ऐसा क्या हो सकता है? कुछ रिसर्च में यह संभावना जताई गई है कि दूध में मौजूद पेस्टिसाइड के अवशेष, जैसे हेप्टाक्लोर एपॉक्साइड, दिमाग के लिए नुकसानदेह हो सकते हैं. इसके अलावा दूध में मौजूद गैलेक्टोज भी एक फैक्टर माना जा रहा है, जो ज्यादा मात्रा में लेने पर दिमाग पर असर डाल सकता है. एक और दिलचस्प थ्योरी गट-ब्रेन कनेक्शन से जुड़ी है. माना जाता है कि डेयरी हमारे गट माइक्रोबायोम को प्रभावित कर सकती है, जिससे कुछ ऐसे प्रोटीन बनते हैं जो आगे चलकर दिमाग तक पहुंच सकते हैं और बीमारी के जोखिम को बढ़ा सकते हैं.
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हालांकि, इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आपको तुरंत दूध या डेयरी प्रोडक्ट्स छोड़ देने चाहिए. रिसर्च का संकेत सिर्फ इतना है कि संतुलन जरूरी है. अगर आप बहुत ज्यादा मात्रा में खासकर लो-फैट या स्किम मिल्क लेते हैं, तो उसे थोड़ा कम करना बेहतर हो सकता है.
क्या होता है पार्किंसन के लक्षण?
भारत में पार्किंसन के मामले भी धीरे-धीरे बढ़ रहे हैं. इसके लक्षणों में हाथ कांपना, शरीर में जकड़न, धीमी मूवमेंट और पोस्टर का बिगड़ना शामिल हैं. वहीं शुरुआती संकेतों में कब्ज, सूंघने की क्षमता कम होना, नींद की समस्या और मूड स्विंग भी देखे जा सकते हैं. डॉक्टरों का मानना है कि इस बीमारी से पूरी तरह बचाव संभव नहीं है, लेकिन हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाकर जोखिम को कम जरूर किया जा सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 15 Apr 2026 20:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>बिना डायबिटीज वाले और युवा लोगों का तेजी से घटता है वजन, चौंका देगी GLP&amp;1 दवाओं पर नई स्टडी</title>
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        <description><![CDATA[ हमारे देश में नई पीढ़ी की वजन घटाने वाली दवाओं पर हुई एक स्टडी में सामने आया है कि बिना डायबिटीज वाले लोग को और कम उम्र के मरीजों में वजन तेजी से कम होता है. यह स्टडी देश में पहली बार वास्तविक परिस्थितियों में की गई है, जिसमें ओवरवेट और मोटापे से जूझ रहे लोगों पर इन दवाओं के असर को देखा गया है. यह रिसर्च 150 ऐसे लोगों पर आधारित है, जिन्हें 6 महीने तक इंजेक्शन के जरिए सेमाग्लूटाइड और टिरजेपेटाइड जैसी दवाएं दी गई. यह दोनों दवाएं जीएलपी-1 थेरेपी से जुड़ी है, जो पहले टाइप-2 डायबिटीज के इलाज के लिए विकसित की गई थी. लेकिन अब मोटापे के इलाज में भी इस्तेमाल हो रही है. इस स्टडी के नतीजे इंडियन जर्नल ऑफ एंडोक्रिनोलॉजी एंड मेटाबॉलिज्म में प्रकाशित हुए हैं.कितने लोगों का वजन कितना घटा?स्टडी के अनुसार करीब 41 प्रतिशत प्रतिभागियों का वजन 10 प्रतिशत से ज्यादा काम हुआ. कुल मिलाकर औसत वजन घटने की दर 8.2 प्रतिशत रही. इस स्टडी में डायबिटीज से ग्रस्त और बिना डायबिटीज वाले लोगों के बीच अंतर भी साफ दिखा. जिन लोगों को डायबिटीज नहीं थी, उनका वजन औसतन 11.21 प्रतिशत तक घटा, जबकि डायबिटीज वाले मरीजों में यह कमी करीब 5.48 प्रतिशत रही.कौन सी दवाएं रही ज्यादा असरदार?इस स्टडी में यह भी पाया गया है कि टिरजेपेटाइड लेने वाले मरीजों में वजन घटने की दर ज्यादा रही. इस दवा के साथ औसत वजन में 8.60 प्रतिशत की कमी देखी गई. जबकि सेमाग्लूटाइड लेने वालों में यह 5.62 प्रतिशत रही. इसके अलावा जो मरीज पहले कभी जीएलपी-1 थेरेपी नहीं ले चुके थे उनमें वजन तेजी से घटता देखा गया.स्टडी में उम्र का भी दिखा असररिसर्च में यह सामने आया कि युवाओं में वजन कम होने की प्रक्रिया तेज होती है. खासतौर पर 10 प्रतिशत से ज्यादा वजन घटाने का लक्ष्य युवा और नए मरीजों में जल्दी हासिल हुआ. हालांकि 10 प्रतिशत से कम वजन घटाने की रफ्तार पर डायबिटीज का असर खास असर नहीं देखा गया है. इसके अलावा स्टडी के अनुसार 10 प्रतिशत से ज्यादा वजन घटाने में औसतन 9.5 महीने का समय लगा. एक्सपर्ट्स का कहना है कि इन दवाओं का पूरा असर आमतौर पर 12 से 18 महीना के बीच दिखाई देता है.ये भी पढ़ें-Roti or Rice Health Benefits: उत्तर भारत के लोग ज्यादातर रोटी खाते हैं लेकिन दक्षिण के चावल, जानें सेहत के लिए क्या है बेस्ट?
डायबिटीज और मोटापे के बीच का कनेक्शनस्टडी में यह भी सामने आया है कि जिन मरीजों को डायबिटीज के साथ मोटापा भी है, उनमें वजन कम होना अपेक्षाकृत मुश्किल होता है. एक्सपर्ट के अनुसार भारतीय मरीजों में मेटाबॉलिज्म से जुड़ी समस्या ज्यादा खतरनाक होती है और इन्सुलिन रेजिस्टेंस भी ज्यादा पाया जाता है. इसके अलावा डायबिटीज के मरीज अक्सर पहले से कई दवाएं ले रहे होते हैं, जिनमें इंसुलिन भी शामिल हो सकता है. इससे वजन घटाने की प्रक्रिया धीमी में हो जाती है. वहीं बताया जा रहा है कि यह नतीजा ऐसे समय सामने आए हैं, जब सेमाग्लूटाइड का पेटेंट खत्म हो गया है, जिससे भारत के तेजी से बढ़ते एंटी ओबेसिटी मार्केट में कई जेनेरिक वर्शन का रास्ता साफ हो गया है. जिससे देश में हिंदी दवाओं की बिक्री और बढ़ गई है. वहीं एक अनुमान के अनुसार भारत में लगभग 10.1 करोड़ लोग डायबिटीज पीड़ित है. 25.4 करोड़ लोग जनरलाइज्ड ओबेसिटी से पीड़ित है और 35.1 प्रतिशत लोग पेट के मोटापे से पीड़ित है. डॉक्टरों के अनुसार यह सब बदलते खान-पान और बढ़ती हुई सेडेंटरी लाइफस्टाइल की वजह से हो रहा है.
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        <pubDate>Wed, 15 Apr 2026 20:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>Omega&amp;3 Deficiency: बाल झड़ने और रूखी त्वचा से परेशान? ये हैं ओमेगा&amp;3 की कमी के सिग्नल, आज ही खाएं ये चीजें</title>
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        <description><![CDATA[ Symptoms Of Omega-3 Deficiency: दुनिया की लगभग तीन-चौथाई आबादी यानी करीब 76 &amp;nbsp;प्रतिशत लोग ओमेगा-3 की पर्याप्त मात्रा नहीं ले रहे हैं. यह वही पोषक तत्व है जिसे हमारा शरीर खुद नहीं बना सकता. हैरानी की बात यह है कि अगर आप ज्यादातर लोगों से पूछें कि वे ओमेगा-3 कितना लेते हैं, तो या तो उन्हें इसके बारे में जानकारी नहीं होगी या फिर वे कभी-कभार लिए गए फिश ऑयल सप्लीमेंट का जिक्र करेंगे.
क्या निकला रिसर्च में
यह कोई मामूली कमी नहीं है. साल 2025 में यूनिवर्सिटी ऑफ ईस्ट एंग्लिया, यूनिवर्सिटी ऑफ साउथैम्पटन और हॉलैंड एंड बैरेट के रिसर्च के एक बड़े स्टडी में सामने आया कि दुनिया की 76 प्रतिशत आबादी EPA और DHA के रिकमंड स्तर तक नहीं पहुंच पा रही है. &amp;nbsp;ये दोनों ओमेगा-3 के महत्वपूर्ण रूप हैं, जो दिल की सेहत, दिमाग के विकास, सूजन को कंट्रोल करने और मानसिक स्वास्थ्य के लिए बेहद जरूरी होते हैं.&amp;nbsp;
क्या कहते हैं एक्सपर्ट
किम्स हॉस्पिटल्स, बेंगलुरु की चीफ ऑफ डाइटेटिक्स Ms. Chitra BK ने TOI Health को बताया कि ओमेगा-3 फैटी एसिड्स ऐसे जरूरी पोषक तत्व हैं, जो आधुनिक डाइट में अक्सर कम पाए जाते हैं. आजकल लोग प्रोटीन, विटामिन D और आयरन की बात तो करते हैं, लेकिन ओमेगा-3 की कमी को नजरअंदाज कर देते हैं. जबकि शरीर इन्हें खुद नहीं बना सकता, इसलिए इन्हें नियमित रूप से आहार में शामिल करना जरूरी है.&amp;nbsp;
लाइफस्टाइल में बदलाव आया
उन्होंने आगे बताया कि पिछले कुछ दशकों में खानपान के तरीके में बड़ा बदलाव आया है. &amp;nbsp;पहले लोग ज्यादा मछली, मेवे और बीज खाते थे, लेकिन अब प्रोसेस्ड फूड और रिफाइंड वेजिटेबल ऑयल का इस्तेमाल बढ़ गया है. इससे शरीर में ओमेगा-6 की मात्रा ज्यादा हो गई है, जो सूजन को बढ़ावा देती है और कई क्रॉनिक बीमारियों का कारण बन सकती है. इसके अलावा, खासकर शहरी युवाओं 18-25 साल और शाकाहारी लोगों में मछली का सेवन काफी कम हुआ है, जिससे DHA और EPA की कमी और बढ़ गई है.
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इसकी कमी से क्या दिक्कत होती है
अगर शरीर में ओमेगा-3 की कमी हो जाए, तो इसके संकेत धीरे-धीरे नजर आते हैं. जैसे त्वचा का रूखा होना, बालों का कमजोर होना, ध्यान केंद्रित करने में दिक्कत, मूड में बदलाव, थकान महसूस होना और जोड़ों में दर्द. अक्सर लोग इन लक्षणों को सामान्य समझकर नजरअंदाज कर देते हैं.
इसकी कमी को कैसे दूर करें
इस कमी को दूर करने के लिए रोजाना के खानपान में कुछ बदलाव करना जरूरी है. हफ्ते में कम से कम दो बार फैटी फिश जैसे सैल्मन, सार्डिन, मैकेरल या टूना शामिल करें. इसके अलावा अलसी के बीज, चिया सीड्स, अखरोट, ब्राजील नट्स, एवोकाडो, सोया प्रोडक्ट्स और कैनोला ऑयल भी अच्छे सोर्स हैं. जरूरत पड़ने पर ओमेगा-3 से भरपूर फोर्टिफाइड फूड या सप्लीमेंट भी लिए जा सकते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 15 Apr 2026 08:30:23 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Omega-3, Deficiency:, बाल, झड़ने, और, रूखी, त्वचा, से, परेशान, ये, हैं, ओमेगा-3, की, कमी, के, सिग्नल, आज, ही, खाएं, ये, चीजें</media:keywords>
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        <title>Drinking Water Before Meals: खाना खाने से पहले पानी पीने के लिए क्यों कहते हैं डॉक्टर्स, इस आदत से शरीर को कितना फायदा?</title>
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        <description><![CDATA[ Why Doctors Recommend Drinking Water Before Meals: अक्सर आपने सुना होगा कि खाना खाने से पहले पानी पीना चाहिए. डॉक्टर भी इस आदत को अपनाने की सलाह देते हैं. लेकिन क्या यह सच में फायदेमंद है या सिर्फ एक आम धारणा? इस सवाल का जवाब समझना जरूरी है, क्योंकि यह हमारी रोजमर्रा की हेल्थ से जुड़ा हुआ है. चलिए आपको बताते हैं कि आखिर डॉक्टर ऐसा क्यों कहते हैं.
क्यों खाने से पहले पानी पीना चाहिए?
Harvard Health की एक रिपोर्ट के अनुसार, &amp;nbsp;असल में, खाना खाने से पहले पानी पीने के पीछे सबसे बड़ा तर्क यह दिया जाता है कि इससे पेट पहले से थोड़ा भर जाता है, जिससे आप कम खाना खाते हैं. हमारे पेट में कुछ ऐसे नर्व्स होते हैं जो फैलाव को महसूस करके दिमाग को संकेत भेजते हैं कि अब खाना पर्याप्त है. माना जाता है कि अगर आप पहले पानी पी लेते हैं, तो यही सिग्नल जल्दी मिलने लगता है और ओवरईटिंग से बचाव होता है.
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क्या होता है इसका असर?
कुछ छोटे और सीमित समय वाली स्टडी में यह देखा भी गया है कि जो लोग खाने से पहले एक गिलास पानी पीते हैं, वे दूसरों के मुकाबले थोड़ा कम खाना खाते हैं. खासकर जो लोग वजन घटाने की कोशिश कर रहे होते हैं, उनमें यह आदत हल्का फायदा दे सकती है. हालांकि, लंबे समय में इसका असर कितना होता है, इस पर अभी भी पुख्ता सबूत नहीं हैं.
एक और कारण यह बताया जाता है कि कई बार हमें भूख नहीं बल्कि प्यास लगती है, लेकिन हम इसे समझ नहीं पाते और कुछ खा लेते हैं. ऐसे में अगर पहले पानी पी लिया जाए, तो अनावश्यक कैलोरी लेने से बचा जा सकता है. लेकिन इस थ्योरी को लेकर भी साइंटफिक प्रमाण बहुत मजबूत नहीं हैं.
वजन कम करने में मददगार
कुछ लोग यह भी मानते हैं कि पानी पीने से शरीर कैलोरी बर्न करता है, क्योंकि शरीर को पानी को अपने तापमान तक गर्म करना पड़ता है. लेकिन हाल के रिसर्च बताते हैं कि इस प्रक्रिया से बहुत कम कैलोरी खर्च होती है, इसलिए इसे वजन घटाने का बड़ा कारण नहीं माना जा सकता. हालांकि, एक बात साफ है कि अगर आप मीठे पेय या हाई-कैलोरी ड्रिंक्स की जगह पानी पीते हैं, तो यह आपकी सेहत के लिए काफी फायदेमंद हो सकता है और वजन कम करने में मदद कर सकता है. &amp;nbsp;तो क्या खाना खाने से पहले पानी पीना चाहिए? इसका जवाब पूरी तरह &amp;nbsp;हां या नहीं में नहीं है. कुछ लोगों के लिए यह आदत फायदेमंद हो सकती है, खासकर अगर इससे वे कम खाते हैं या ओवरईटिंग से बचते हैं. लेकिन इसे कोई जादुई उपाय भी नहीं माना जा सकता.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 15 Apr 2026 08:30:22 +0530</pubDate>
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        <title>Fake Cancer Drug Racket India: 1.5 लाख का &amp;apos;जादुई&amp;apos; कैंसर इंजेक्शन निकला नकली, ऐसे चल रहा था खौफनाक खेल</title>
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        <description><![CDATA[ How Fake Keytruda Reached Cancer Patients In India: पंजाब के एक साधारण घर से शुरू हुई यह कहानी भारत में कैंसर इलाज की एक खतरनाक सच्चाई को उजागर करती है. साल 2022 की शुरुआत में चंडीगढ़ के पास रहने वाली 56 वर्षीय महिला का लिवर कैंसर का इलाज PGIMER में चल रहा था. डॉक्टरों ने उन्हें एक महंगी इम्यूनोथेरेपी दवा कीट्रूडा &amp;nbsp;लेने की सलाह दी, जिसकी कीमत 100 mg की एक वायल के लिए 1.5 लाख रुपये से ज्यादा है. इतनी बड़ी रकम जुटाना आसान नहीं था, इसलिए परिवार ने सितंबर से दिसंबर के बीच 12 वायल डिस्काउंट पर करीब 16 लाख रुपये में खरीदीं। लेकिन कुछ समय बाद दिल्ली पुलिस का फोन आया और पता चला कि ये दवाएं नकली थीं, जिनमें एंटीफंगल दवा भरी गई थी.
जांच में खुलासा
यह मामला अकेला नहीं है. इंडियन एक्सप्रेस औरइंटरनेशनल कंसोर्टियम ऑफ इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट्स की संयुक्त जांच में सामने आया है कि भारत में महंगी कैंसर दवाओं, खासकर कीट्रूडा, का एक बड़ा नकली बाजार सक्रिय है. इस जांच में 12,500 से ज्यादा पन्नों के रिकॉर्ड, अस्पताल डेटा और डॉक्टरों से बातचीत शामिल रही.
बेहद संगठित तरीके से काम करता है नेटवर्क 
जांच में पता चला कि यह पूरा नेटवर्क बेहद संगठित तरीके से काम करता है. खाली वायल इकट्ठा की जाती हैं, उनमें दूसरी दवाएं भरकर दोबारा सील किया जाता है और फिर बाजार में सस्ती कीमत पर बेचा जाता है. कई बार यह कीमत असली से 40 प्रतिशत तक कम होती है, जिससे मरीजों को यह राहत लगती है, लेकिन यही उनकी सबसे बड़ी गलती बन जाती है.
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस नेटवर्क में अस्पतालों के अंदर के लोग भी शामिल पाए गए. दिल्ली के राजीव गांधी कैंसर इंस्टीट्यूट एंड रिसर्च सेंटर में काम करने वाले कुछ फार्मासिस्ट कथित तौर पर इस्तेमाल किए गए या आधे भरे वायल बाहर ले जाते थे और उन्हें इस रैकेट को बेचते थे. पुलिस ने छापेमारी में कई वायल, खाली बॉक्स और संदिग्ध बैच नंबर बरामद किए, जो सीधे मरीजों को दी गई दवाओं से मेल खाते थे. जांच में जब पुलिस ने इस पूरे नेटवर्क की परतें खोलनी शुरू कीं, तो एक अहम नाम सामने आया, परवेज. वह पहले एक अस्पताल में फार्मासिस्ट के तौर पर काम कर चुका था और बाद में इस रैकेट का अहम हिस्सा बन गया. पुलिस के मुताबिक, परवेज ही वह कड़ी था जो अस्पताल के अंदर से दवाओं को बाहर लाने और उन्हें आगे सप्लाई करने का काम संभाल रहा था.
अस्पताल में काम करने वाले लोग शामिल
परवेज ने यह भी बताया कि उसने अस्पताल में काम करने वाले कोमल और अभय से संपर्क किया, जो उसे खाली और भरी हुई वायल उपलब्ध कराते थे. उसने बताया कि मैं खाली &amp;nbsp;वायल के 3000 दूंगा और अगर अगर वो इंजेक्शन भरा उपलब्ध करवाते हैं, तो उसके बदले में 40 हजार से 50 हजार दिया जाएगा. इस तरह 8 से 9 महीने में 10- 12 भरा वायल और 120 वायर कोमल से उसे मिला और अभय ने उसे 10 खाली और 10-12 भरा वायर दिया. जो बाद में इस अवैध नेटवर्क के जरिए बेची गईं.
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मरीज की हो गई मौत
जांच में यह भी सामने आया कि अस्पतालों में सख्त प्रोटोकॉल होने के बावजूद एक बड़ी कमी थी कि खाली वायल की गिनती का कोई ठोस सिस्टम नहीं था. इसी खामी का फायदा उठाकर यह पूरा खेल चलाया गया. बाद में अस्पतालों ने निगरानी बढ़ाई, CCTV सिस्टम मजबूत किया और दवा निपटान की प्रक्रिया को और सख्त बनाया. इस रैकेट का सबसे दर्दनाक असर मरीजों पर पड़ता है. बिहार की एक महिला, जो सस्ती दवा की तलाश में ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से इंजेक्शन खरीद रही थीं, इलाज के दौरान ही हालत बिगड़ने के बाद दम तोड़ गईं. बाद में परिवार को पता चला कि दवा नकली हो सकती थी. पुलिस अधिकारियों का कहना है कि यह मामला सिर्फ एक गैंग तक सीमित नहीं है. यह एक बड़े सिस्टम की कमजोरी को दिखाता है, जहां महंगे इलाज और आर्थिक दबाव के बीच मरीज आसानी से ठगी का शिकार बन जाते हैं.
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        <pubDate>Wed, 15 Apr 2026 08:30:21 +0530</pubDate>
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        <title>Roti or Rice Health Benefits: उत्तर भारत के लोग ज्यादातर रोटी खाते हैं लेकिन दक्षिण के चावल, जानें सेहत के लिए क्या है बेस्ट?</title>
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        <description><![CDATA[ Roti or Rice Health Benefits : भारत में खाने की परंपरा बहुत अलग है. उत्तर भारत में जहां रोटी मुख्य खाना है, वहीं दक्षिण और पूर्व भारत में खाने में चावल का ज्यादा यूज होता है. अक्सर लोग इस बात पर बहस करते हैं कि रोटी ज्यादा हेल्दी है या चावल? कुछ लोग कहते हैं कि चावल खाने से वजन बढ़ता है, जबकि कई लोग मानते हैं कि चावल तो सदियों से हमारा मुख्य खाना रहा है और इसे खाने से लोग हेल्दी रहते हैं. ऐसे में आइए जानते हैं कि रोटी और चावल सेहत के लिए क्या बेस्ट है.&amp;nbsp;
रोटी और चावल सेहत के लिए क्या बेस्ट है
असल में रोटी और चावल के बीच कौन बेहतर है, इसका कोई एक सीधा जवाब नहीं है, क्योंकि यह पूरी तरह व्यक्ति के शरीर, उसकी पाचन शक्ति, लाइफस्टाइल और खाने की आदतों पर निर्भर करता है. आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान दोनों ही इस बात को मानते हैं कि हर इंसान के लिए एक जैसी डाइट सही नहीं होती है. जिन लोगों की पाचन शक्ति कमजोर होती है, उनके लिए चावल हल्का और आसानी से पचने वाला ऑप्शन होता है, जबकि जिनका शरीर ज्यादा एक्टिव है और जो शारीरिक मेहनत करते हैं, उनके लिए रोटी ज्यादा एनर्जी और लंबे समय तक पेट भरा रखने वाली होती है.&amp;nbsp;
चावल और गेहूं के फायदे&amp;nbsp;
1. चावल और गेहूं दोनों को ही जरूरी अनाज माना गया है, लेकिन इनके गुण और प्रभाव अलग-अलग बताए गए हैं. आयुर्वेद के अनुसार हर खाने का असर शरीर की प्रकृति (प्रकृति), पाचन शक्ति (अग्नि) और दोषों (वात, पित्त, कफ) पर पड़ता है.
&amp;nbsp;2. चावल को आयुर्वेद में मीठे टेस्ट वाला, शरीर को ठंडक देने वाला और हल्का अनाज माना गया है, जो आसानी से पच जाता है.&amp;nbsp;3. इसे त्रिदोष यानी वात, पित्त और कफ तीनों को संतुलित करने में मददगार बताया गया है. इसी कारण चावल को रोज खाने योग्य खाना माना गया है, खासकर जब इसे सही तरीके से पकाया जाए और बैलेंस डाइट के साथ लिया जाए.&amp;nbsp;&amp;nbsp;4. वहीं रोटी को भारी, ज्यादा पोषण देने वाला और शरीर को शक्ति प्रदान करने वाला अनाज कहा गया है.&amp;nbsp;5. यह शरीर में ताकत और एनर्जी बढ़ाने में मदद करता है और वात- पित्त दोष को शांत करता है. इसलिए गेहूं को विशेष रूप से उन लोगों के लिए अच्छा माना गया है जो शारीरिक रूप से ज्यादा एक्टिव रहते हैं या जिन्हें ज्यादा एनर्जी और ताकत की जरूरत होती है.&amp;nbsp;
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किन लोगों के लिए क्या बेहतर है?
चावल और रोटी दोनों ही अलग-अलग लोगों के लिए अलग तरह से फायदेमंद होते हैं. चावल को हल्का और आसानी से पचने वाला माना जाता है, इसलिए यह बीमार लोगों, बुजुर्गों, छोटे बच्चों और कमजोर पाचन शक्ति वाले व्यक्तियों के लिए बेहतर ऑप्शन है. ऐसे लोगों के लिए खिचड़ी या दाल-चावल जैसा हल्का खाना ज्यादा यूजफुल होता है क्योंकि ये पेट पर ज्यादा बोझ नहीं डालते और आसानी से पच जाते हैं. वहीं दूसरी ओर रोटी, यानी गेहूं से बना खाना, ज्यादा एनर्जी और ताकत देने वाला माना जाता है, इसलिए यह उन लोगों के लिए बेहतर है जो शारीरिक मेहनत करते हैं, जैसे किसान या भारी काम करने वाले लोग, या जिनकी पाचन शक्ति मजबूत होती है.&amp;nbsp;
विज्ञान क्या कहता है?
विज्ञान के अनुसार, रोटी और चावल दोनों के अपने अलग-अलग पोषण गुण हैं, ऐसे में यह तय करना कि कौन बेहतर है, इसके लिए पूरा डाइट पैटर्न ज्यादा जरूरी होता है. गेहूं में चावल की तुलना में ज्यादा प्रोटीन और फाइबर पाया जाता है, जिससे यह पेट को लंबे समय तक भरा हुआ महसूस कराता है और एनर्जी धीरे-धीरे रिलीज करता है. वहीं चावल हल्का होता है और जल्दी पच जाता है. लेकिन जब इन्हें दाल, सब्जी और घी जैसे संतुलित आहार के साथ खाया जाता है, तो दोनों का ग्लाइसेमिक इंडेक्स (GI) लगभग समान हो जाता है, यानी ब्लड शुगर पर इनका असर काफी हद तक संतुलित हो जाता है. इसलिए विज्ञान यह बताता है कि सिर्फ रोटी या चावल पर ध्यान देने की जगह पूरे खाने की क्वालिटी और बैलेंस ज्यादा फायदेमंद रखता है.&amp;nbsp;
किस अनाज से होता है शरीर को नुकसान&amp;nbsp;
आजकल हम जो अनाज खाते हैं वह बहुत ज्यादा प्रोसेस्ड और रिफाइंड हो चुका है. पॉलिश किया हुआ सफेद चावल अपने छिलके और जर्म को खो देता है, जिससे उसमें फाइबर और जरूरी पोषक तत्व कम हो जाते हैं और उसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स बढ़ जाता है, जिसके कारण यह ब्लड शुगर को तेजी से बढ़ा सकता है. इसी तरह मैदा, जो गेहूं को बहुत ज्यादा रिफाइन करके बनाया जाता है, उसमें भी फाइबर और पोषण लगभग खत्म हो जाते हैं, जिससे यह पाचन के लिए भारी और शरीर के लिए कम फायदेमंद हो जाता है.&amp;nbsp;
क्या है सही और बेस्ट ऑप्शन&amp;nbsp;
सही और बेस्ट ऑप्शन के लिए आप प्राकृतिक और कम प्रोसेस किए हुए अनाज चुनें, जैसे ब्राउन राइस या अनपॉलिश चावल, और होल व्हीट यानी साबुत गेहूं का आटा, क्योंकि इनमें फाइबर और पोषक तत्व अधिक मात्रा में सुरक्षित रहते हैं. इसके साथ ही खाने को हमेशा बैलेंस में लेना जरूरी है, जिसमें दाल, सब्जी और थोड़ी मात्रा में घी शामिल हो, ताकि शरीर को सभी जरूरी पोषक तत्व मिल सकें.
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        <pubDate>Wed, 15 Apr 2026 08:30:21 +0530</pubDate>
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        <title>Salt to Newborn Baby: यहां बच्चा पैदा होते ही चटा दिया जाता है नमक, जानें इसका सेहत पर क्या पड़ता है असर?</title>
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        <description><![CDATA[ 
Salt to Newborn Baby: हमारे देश के अलग-अलग हिस्सों में परंपराएं और रीति रिवाज जीवन के हर पड़ाव से जुड़े होते हैं. ऐसा ही एक रिवाज एक समुदाय में भी खूब प्रचलित हैं. जहां जन्म से लेकर मृत्यु तक कई खास परंपराएं निभाई जाती है, जिनमें नमक का भी विशेष महत्व माना जाता है.
हमारे देश में एक जगह पर नवजात बच्चे को जन्म के तुरंत बाद नमक चाटने की परंपरा है, जो इस समुदाय की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा मानी जाती है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि कौन सी जगह पर बच्चा पैदा होते ही नमक चटाया जाता है और इसका सेहत पर क्या असर पड़ता है.&amp;nbsp;
यहां बच्चा पैदा होते ही चटाया जाता है नमक&amp;nbsp;
मणिपुर के मैतेई समुदाय में बच्चा पैदा होते ही नमक चाटने की परंपरा है. मैतेई समुदाय में नमक सिर्फ खाने की चीज नहीं, बल्कि जीवन से जुड़े हर महत्वपूर्ण अवसर का हिस्सा माना जाता है. स्थानीय स्तर पर तैयार किया जाने वाला नमक जिसे थुम भी कहा जाता है, इसे प्राकृतिक खारे पानी के सोर्स से तैयार किया जाता है. गांव में लोग इन सोर्स से पानी इकट्ठा कर उसे उबालते हैं, जिससे नमक तैयार होता है. यही नमक बाद में घरों में उपयोग किया जाता है और बाजार में भी बेचा जाता है. वहीं इस समुदाय में मान्यता है कि बच्चों के जन्म के बाद उसे नमक चाटना जरूरी होता है. इस तरह यहां किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद भी उसके मुंह में नमक रखा जाता है. शादी, त्योहार और दूसरे पारिवारिक आयोजन में भी नमक का इस्तेमाल अनिवार्य माना जाता है. इस तरह से यहां नमक को जीवन चक्र का अहम हिस्सा माना जाता है.&amp;nbsp;
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सेहत के नजरिए से क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?
हेल्थ एक्सपर्ट्स बताते हैं कि नवजात बच्चे को जन्म के बाद शुरुआती महीनों में नमक देना ठीक नहीं होता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन और डॉक्टराें के अनुसार, बच्चों को जन्म से लेकर 6 महीने तक सिर्फ मां का दूध ही देना चाहिए. इसके बाद ठोस आहार शुरू किया जाता है, तब भी शुरुआत में नमक और चीनी से परहेज करने की सलाह दी जाती है. डॉक्टरों का कहना है कि छोटे बच्चों की किडनी पूरी तरह विकसित नहीं होती है. इसलिए ज्यादा नमक उनके लिए नुकसानदायक हो सकता है. इससे किडनी पर दबाव पड़ता है और भविष्य में हाई ब्लड प्रेशर जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है.&amp;nbsp;
कब देना चाहिए बच्चों को नमक?
हेल्थ एक्सपर्ट्स के अनुसार बच्चों को 1 साल की उम्र के बाद ही सीमित मात्रा में नमक देना शुरू करना चाहिए. 1 से 3 साल के बच्चों के लिए रोजाना नमक की मात्रा बहुत कम रखनी चाहिए, ताकि उनके शरीर पर इसका नकारात्मक असर न पड़े.
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        <title>Annual Body Checkup : हर साल कराएंगे ये 5 बॉडी टेस्ट तो वक्त रहते बड़ी मुसीबत से बच जाएंगे आप, देख लें पूरी लिस्ट</title>
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        <description><![CDATA[ Annual Body Checkup : हर साल कराएंगे ये 5 बॉडी टेस्ट तो वक्त रहते बड़ी मुसीबत से बच जाएंगे आप, देख लें पूरी लिस्ट ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 12 Apr 2026 18:30:31 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Effects of quitting gym suddenly: अचानक जिम छोड़ने से शरीर पर क्या पड़ता है असर? जान लीजिए नुकसान</title>
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        <description><![CDATA[ Effects of quitting gym suddenly: आजकल फिट रहने के लिए जिम जाना लोगों की लाइफस्टाइल का बहुत जरूरी हिस्सा बन चुका है. नियमित वर्कआउट न सिर्फ शरीर को मजबूत बनाता है, बल्कि मेंटल रूप से भी व्यक्ति को एक्टिव और रिलैक्स रखता है. जिम में एक्सरसाइज करने से मांसपेशियां मजबूत होती है, स्टेमिना बढ़ता है और शरीर में एनर्जी बनी रहती है. यही वजह है की बड़ी संख्या में लोग उत्साह के साथ जिम ज्वाइन करते हैं. लेकिन समय की कमी, आलस या मोटिवेशन की कमी के कारण कई लोग बीच में ही छोड़ देते हैं. ऐसे में शरीर पर इसके कई नेगेटिव असर देखने को मिल सकते हैं. तो चलिए आज हम आपको बताते हैं कि अचानक जिम छोड़ने से शरीर पर क्या असर पड़ता है और इसके नुकसान क्या-क्या होते हैं?
वजन बढ़ने लगता है
जिम छोड़ने के बाद सबसे पहले असर वजन पर पड़ता है. नियमित एक्सरसाइज के दौरान कैलोरीज बर्न होती है या अचानक रुक जाती है. ऐसे में शरीर में एक्स्ट्रा कैलोरी जमा होने लगती है और वजन तेजी से बढ़ सकता है. खासकर पेट की चर्बी बढ़ने का खतरा ज्यादा रहता है.
ये भी पढ़ें-Vitamin D: रात में विटामिन D लेना सही या गलत, जानें आपकी नींद और हार्मोन से इसका कितना गहरा कनेक्शन?
मांसपेशियां कमजोर होने लगती है
वर्कआउट के दौरान मांसपेशियां मजबूत और एक्टिव रहती है. लेकिन जिम छोड़ने के बाद धीरे-धीरे उनकी ताकत कम होने लगती है. कुछ हफ्तों में ही मसल्स सिकुड़ने लगती है और शरीर में कमजोरी व थकान महसूस होने लगती है. छोटी-छोटी एक्टिविटी में भी पहले के मुकाबले ज्यादा थकावट महसूस हो सकती है.
सहनशक्ति और स्टैमिना में गिरावट
जिम करने से शरीर की सहनशक्ति बढ़ती है, लेकिन एक्सरसाइज बंद करते ही यह धीरे-धीरे कम होने लगती है. करीब एक दो हफ्ते में ही शरीर की कार्डियो फिटनेस पर असर दिखने लगता है. वीओ2 मैक्स में गिरावट आने से शरीर की ऑक्सीजन उपयोग करने की क्षमता घटती है और थोड़ी सी मेहनत में भी सांस फूलने लगती है.
मेटाबॉलिज्म धीमा पड़ता है
नियमित वर्कआउट से मेटाबॉलिज्म तेज रहता है, जिससे शरीर कैलोरी जल्दी बर्न करता है. लेकिन जिम छोड़ने के बाद मेटाबॉलिज्म धीमा हो जाता है. इसका सीधा असर वजन और बॉडी फैट पर पड़ता है, जिससे शरीर में चर्बी बढ़ने लगती है.
मानसिक तनाव और मूड पर असर
एक्सरसाइज करने से शरीर में हैप्पी हार्मोन रिलीज होते हैं, जिससे मूड अच्छा रहता है. लेकिन वर्कआउट बंद करने के कुछ ही दिनों में मूड स्विंग्स, चिड़चिड़ापन और तनाव बढ़ सकता है. कई लोगों को थकान, उदासी और मोटिवेशन की कमी महसूस होने लगती है.
ब्लड शुगर और बीमारियों का खतरा
एक्सरसाइज बंद करने से ब्लड शुगर लेवल बढ़ सकता है. क्योंकि शरीर ग्लूकोज का उपयोग कम करने लगता है. लंबे समय तक एक्टिविटी कम करने से इंसुलिन संवेदनशीलता भी प्रभावित हो सकती है, जिससे डायबिटीज का खतरा बढ़ता है. इसके अलावा हाई ब्लड प्रेशर और हार्ट प्रॉब्लम जैसी समस्याओं का खतरा भी बढ़ सकता है.
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        <pubDate>Sun, 12 Apr 2026 18:30:30 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>क्या फ्रूट जूस पीने से बढ़ सकता है ब्लड शुगर? जानिए सच्चाई</title>
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        <description><![CDATA[ आजकल इंटरनेट पर हर जगह यह कहा जा रहा है कि फ्रूट जूस पीने से डायबिटीज होती है और ब्लड शुगर तेजी से बढ़ता है. लेकिन क्या सच में ऐसा है? इसका जवाब आपकी सोच से थोड़ा पेचीदा है. यह समझना बहुत ज़रूरी है कि बोली हुई बातों और असल बातों के बीच क्या फर्क है?
एक्सपर्ट की क्या है राय?
BDR Pharmaceuticals के टेक्निकल डायरेक्टर डॉ. अरविंद बडिगेर &amp;nbsp;के अनुसार फ्रूट जूस को अच्छी सेहत बनाए रखने के लिए एक अच्छा विकल्प माना जा सकता है, क्योंकि इसमें कई तरह के पोषक तत्व होते हैं. लेकिन इसका ब्लड शुगर को कंट्रोल करने पर असर थोड़ा चिंता का विषय हो सकता है. हालांकि इसे पीना नुकसानदायक नहीं है, लेकिन यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप इसे कितनी मात्रा में और कब पीते हैं.
एक रिसर्च से पता चलता है कि फ्रूट जूस में ग्लाइसेमिक इंडेक्स मध्यम से थोड़ा ज्यादा होता है, यानी यह जल्दी पचता है और खाने के बाद कुछ समय के लिए ब्लड शुगर बढ़ा सकता है. साथ ही यह एक सामान्य प्रक्रिया है, क्योंकि आप जूस के रूप में ज्यादा मात्रा में शुगर ले रहे होते हैं.
फ्रूट जूस और साबुत फल में फर्क
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि फ्रूट जूस और साबुत फल दोनों में काफी फर्क होता है. साबुत फल में फाइबर भरपूर मात्रा में होता है, जो शरीर में शुगर के अवशोषण को धीमा करता है. वहीं, जब हम फल का जूस बनाते हैं, तो उसमें से ज्यादातर फाइबर निकल जाता है और केवल शुगर वाला लिक्विड बच जाता है. यही कारण है कि जूस पीने से ब्लड शुगर तेजी से बढ़ सकता है.
यह भी पढ़ेंः बार-बार आ रही है खांसी तो हो जाएं सावधान, हो सकता है खाने की नली में कैंसर
क्या फ्रूट जूस नुकसानदायक है?
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि फ्रूट जूस पूरी तरह से नुकसानदायक है. कई स्टडी और मेटा-एनालिसिस में यह पाया गया है कि अगर जूस को सीमित मात्रा में पी लिया जाए तो यह सीधे तौर पर डायबिटीज का कारण नहीं बनता. यानी समस्या जूस में नहीं, बल्कि उसकी मात्रा और सेवन के तरीके में होती है. विशेषज्ञों का कहना है कि जूस पीने के बाद ब्लड शुगर का स्तर जल्दी बढ़ सकता है, क्योंकि इसमें मौजूद प्राकृतिक शुगर बिना फाइबर के सीधे खून में पहुंच जाती है. यही कारण है कि डायबिटीज या प्रीडायबिटीज वाले लोगों को जूस का सेवन सोच-समझकर करना चाहिए.
फ्रूट जूस में शुगर कैसे काम करती है?
फ्रूट जूस में मौजूद नैचुरल शुगर दो तरह की होती है फ्रक्टोज और ग्लूकोज. यह प्रोसेस्ड ड्रिंक्स से अलग होती है, क्योंकि यह सीधे फलों से आती है. लेकिन फ्रूट जूस पीने के तरीके में एक बड़ा फर्क होता है. जूस बनाने के दौरान फल का ज्यादातर फाइबर निकल जाता है, जबकि फाइबर बहुत जरूरी होता है, क्योंकि यह शरीर में शुगर के अवशोषण को धीमा करता है. जब फाइबर नहीं होता, तो जूस में मौजूद शुगर जल्दी शरीर में अवशोषित हो जाती है और ब्लड शुगर तेजी से बढ़ सकता है.
यह भी पढ़ेंः सारी मेडिकल रिपोर्ट नॉर्मल फिर भी बना रहता है सिरदर्द, जानें कहां है दिक्कत? ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 12 Apr 2026 18:30:29 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Asha Bhosle: सीने में इंफेक्शन से कब हो जाती है इंसान की मौत, आशा भोसले का इसी बीमारी से हुआ निधन?</title>
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        <description><![CDATA[ Asha Bhosle Death Reason: भारतीय संगीत की सबसे महान गायिकाओं में से एक आशा भोसले का 92 वर्ष की उम्र में निधन हो गया है. उन्हें शनिवार को &amp;nbsp;ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जब उन्हें दिल और सांस से जुड़ी दिक्कतें हुईं. रिपोर्ट के अनुसार, पिछले कुछ महीनों से उनकी तबीयत ठीक नहीं चल रही थी. हालत बिगड़ने पर उन्हें गंभीर अवस्था में अस्पताल लाया गया, जहां शनिवार रात उन्हें आईसीयू में भर्ती किया गया था. चलिए आपको बताते हैं कि कैसे सीने में इंफेक्शन से इंसान की मौत हो जाती है.&amp;nbsp;
सीने का इंफेक्शन कई बार मामूली सर्दी-खांसी जैसा लगता है, लेकिन कुछ मामलों में यही समस्या तेजी से गंभीर रूप ले सकती है. प्न्यूमोनिया एक ऐसी ही स्थिति है, जिसमें फेफड़ों में इंफेक्शन हो जाता है. यह बैक्टीरिया, वायरस या फंगस के कारण होता है और फेफड़ों के टिश्यू में सूजन के साथ उनमें पानी या पस भर सकता है. यही वजह है कि सांस लेना मुश्किल होने लगता है और ऑक्सीजन का स्तर गिर सकता है.&amp;nbsp;
लंग्स होते हैं प्रभावित
हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली संस्था clevelandclinic के अनुसार, &amp;nbsp;प्न्यूमोनिया एक या दोनों फेफड़ों को प्रभावित कर सकता है। जब दोनों फेफड़े इंफेक्टेड होते हैं, तो इसे डबल या बाइलेटरल प्न्यूमोनिया कहा जाता है, जो ज्यादा खतरनाक हो सकता है. खासकर बैक्टीरियल प्न्यूमोनिया वायरल की तुलना में ज्यादा गंभीर माना जाता है और कई बार अस्पताल में भर्ती की जरूरत पड़ सकती है. &amp;nbsp;रिपोर्ट में बताया गया है कि सीने का इंफेक्शन तब जानलेवा बनता है, जब यह तेजी से बढ़कर शरीर में ऑक्सीजन की सप्लाई को प्रभावित करने लगता है. अगर समय पर इलाज न मिले, तो फेफड़ों में सूजन बढ़ती जाती है और सांस लेने में दिक्कत गंभीर रूप ले लेती है. ऐसी स्थिति में मरीज को वेंटिलेटर सपोर्ट तक की जरूरत पड़ सकती है.
अलग- अलग तरह के इंफेक्शन
प्न्यूमोनिया के अलग-अलग प्रकार भी होते हैं, जो इसकी गंभीरता तय करते हैं. कम्युनिटी-एक्वायर्ड प्न्यूमोनिया आमतौर पर बाहर से होने वाला इंफेक्शन है, जबकि हॉस्पिटल-एक्वायर्ड प्न्यूमोनिया ज्यादा खतरनाक होता है क्योंकि यह एंटीबायोटिक-रेजिस्टेंट बैक्टीरिया से होता है और इलाज मुश्किल हो सकता है। इसी तरह वेंटिलेटर पर रहने वाले मरीजों में होने वाला इंफेक्शन भी जानलेवा साबित हो सकता है.
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65 साल से ऊपर के लोगों को ज्यादा खतरा
सबसे ज्यादा खतरा उन लोगों को होता है जिनकी इम्यूनिटी कमजोर होती है. 65 साल से ज्यादा उम्र के बुजुर्ग, छोटे बच्चे, पहले से दिल या फेफड़ों की बीमारी से जूझ रहे लोग, स्मोकिंग करने वाले या कीमोथेरेपी जैसी ट्रीटमेंट ले रहे मरीज इस जोखिम में ज्यादा आते हैं. ऐसे लोगों में इंफेक्शन तेजी से बढ़ सकता है और हालत जल्दी बिगड़ सकती है.
इसे भी पढ़ें-Breast Cancer Lung Metastasis: फेफड़ों में क्यों फैलता है ब्रेस्ट कैंसर? रिसर्च में हुआ ट्यूमर के &#039;सपोर्ट सिस्टम&#039; का खुलासा
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 12 Apr 2026 18:30:27 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Asha, Bhosle:, सीने, में, इंफेक्शन, से, कब, हो, जाती, है, इंसान, की, मौत, आशा, भोसले, का, इसी, बीमारी, से, हुआ, निधन</media:keywords>
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        <title>Esophageal Cancer: बार&amp;बार आ रही है खांसी तो हो जाएं सावधान, हो सकता है खाने की नली में कैंसर</title>
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        <description><![CDATA[ Esophageal Cancer : आजकल की बिजी लाइफस्टाइल में हम अक्सर छोटी-छोटी स्वास्थ्य समस्याओं को नजरअंदाज कर देते हैं. जैसे बार-बार खांसी, सीने में जलन या निगलने में हल्की परेशानी, कई बार ये सामान्य लगने वाले लक्षण गंभीर बीमारी की शुरुआत भी हो सकते हैं. ऐसी ही एक गंभीर बीमारी खाने की नली का कैंसर है.&amp;nbsp;
खाने की नली का कैंसर (Esophageal Cancer) एक तेजी से बढ़ने वाला कैंसर है. अगर इसे शुरुआती अवस्था में पहचान लिया जाए, तो इलाज के अच्छे परिणाम मिल सकते हैं, लेकिन समस्या यह है कि इसके शुरुआती लक्षण अक्सर हल्के होते हैं और लोग इन्हें अनदेखा कर देते हैं. तो आइए जानते हैं कि खाने की नली का कैंसर क्या होता है, इसके शुरुआती संकेत क्या हैं और किन लोगों को ज्यादा खतरा है.&amp;nbsp;
खाने की नली का कैंसर क्या होता है
खाने की नली एक लंबी नली होती है जो हमारे गले को पेट से जोड़ती है. जब हम खाना खाते हैं, तो यही नली खाने को पेट तक पहुंचाती है. जब इस नली की अंदरूनी परत की कोशिकाएं असामान्य तरीके से बढ़ने लगती हैं और कंट्रोल से बाहर हो जाती हैं, तो कैंसर बनता है. यह कैंसर धीरे-धीरे आसपास के पार्टस में भी फैल सकता है.&amp;nbsp;
किन लोगों को ज्यादा खतरा होता है?
कुछ आदतें और स्थितियां इस कैंसर का खतरा बढ़ा देती हैं. जिसमें बढ़ती उम्र में इसका खतरा ज्यादा होता है, इसके अलावा पुरुषों में ज्यादा देखा जाता है. वहीं धूम्रपान और शराब का सेवन करने वाले लोगों में ज्यादा खतरा होता है. साथ ही लगातार एसिडिटी या GERD, मोटापा, फल और सब्जियां कम खाना, बहुत ज्यादा गर्म ड्रिंक्स पीने वाले लोगों &amp;nbsp;को भी ज्यादा खतरा होता है.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ें - Obesity Hypoventilation Syndrome: क्या मोटापा ले सकता है जान? 160 किलो की महिला का सांस लेना हुआ मुश्किल, डॉक्टरों ने ऐसे बचाया
शुरुआती संकेत जिन्हें नजरअंदाज न करें
1. निगलने में दिक्कत (डिस्फेजिया) - शुरुआत में ठोस चीजें निगलने में परेशानी होती है, बाद में पानी पीने में भी दिक्कत हो सकती है.&amp;nbsp;
2. बिना कारण वजन घटना - अगर बिना डाइटिंग या एक्सरसाइज के वजन तेजी से कम हो रहा है, तो खाने की नली में कैंसर हो सकता है.&amp;nbsp;
3. सीने में दर्द या जलन - सीने में जलन, दबाव या दर्द महसूस होना, जिसे लोग अक्सर गैस समझ लेते हैं. ये भी खाने की नली में कैंसर का संकेत हो सकता है
4. बार-बार खांसी या आवाज बैठना - अगर खांसी लंबे समय तक ठीक नहीं हो रही या आवाज भारी हो गई है, तो सावधान हो जाएं. ये खाने की नली में कैंसर का शुरुआती संकेत हो सकता है.&amp;nbsp;
5. खाना खाते समय बार-बार रुकावट - खाना गले में अटकना या बार-बार खांसी आना भी &amp;nbsp;खाने की नली में कैंसर का संकेत हो सकता है.&amp;nbsp;
कैसे करें बचाव?
खाने की नली के कैंसर से पूरी तरह बचाव करना संभव नहीं है, लेकिन कुछ आदतें अपनाकर इसका खतरा काफी हद तक कम किया जा सकता है. जिसमें &amp;nbsp;धूम्रपान और शराब का सेवन न करें. अपनी डाइट में ताजे फल और हरी सब्जियों को शामिल करें. साथ ही अपने वजन का बैलेंस बनाए रखना और रोजाना एक्सरसाइज करना भी जरूरी है. अगर आपको बार-बार खांसी, एसिडिटी या जलन की समस्या होती है, तो उसे नजरअंदाज न करें और समय पर डॉक्टर से सलाह लें.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ें - &amp;nbsp;ग्रेड-1 फैटी लिवर में फायदेमंद हो सकता है मेथी का पानी, जानिए इसके चौंकाने वाले फायदे
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 12 Apr 2026 05:30:14 +0530</pubDate>
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        <title>Headaches Causes: सारी मेडिकल रिपोर्ट नॉर्मल फिर भी बना रहता है सिरदर्द, जानें कहां है दिक्कत?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/headaches-causes-सारी-मेडिकल-रिपोर्ट-नॉर्मल-फिर-भी-बना-रहता-है-सिरदर्द-जानें-कहां-है-दिक्कत</link>
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        <description><![CDATA[ Headaches Causes : आजकल बहुत से लोग एक अजीब समस्या से गुजर रहे हैं. इस समस्या में लोग बार-बार सिरदर्द से परेशान रहते हैं, लेकिन जब डॉक्टर के पास जाते हैं तो उनकी MRI, ब्लड टेस्ट और बाकी जांचें बिल्कुल सामान्य आती हैं. ऐसे में मन में सवाल उठता है कि जब सब कुछ ठीक है, तो दर्द क्यों हो रहा है. यह समस्या न सिर्फ शारीरिक रूप से परेशान करती है, बल्कि मानसिक रूप से भी कंफ्यूजन पैदा करती है. व्यक्ति सोचने लगता है कि शायद समस्या गंभीर नहीं है, लेकिन बार-बार होने वाला सिरदर्द रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करने लगता है. विशेषज्ञों का कहना है कि यह दर्द शरीर का एक संकेत होता है, जिसे हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं. तो आइए जानते हैं कि सारी मेडिकल रिपोर्ट नॉर्मल फिर भी बना सिरदर्द रहता है तो कहां दिक्कत है.&amp;nbsp;
रिपोर्ट नॉर्मल फिर भी बना सिरदर्द रहता है तो कहां दिक्कत है
डॉक्टरों के अनुसार, ऐसे सिरदर्द का कारण कोई बड़ी बीमारी नहीं, बल्कि हमारी रोजमर्रा की आदतें होती हैं. इसे फंक्शनल समस्या कहा जाता है, इसका मतलब शरीर के काम करने के तरीके में गड़बड़ी है, न कि किसी स्ट्रक्चरल बीमारी में, इस समस्या का कारण दिमाग में कोई चोट या ट्यूमर नहीं है, बल्कि हमारी लाइफस्टाइल धीरे-धीरे शरीर पर असर डाल रही है.
सिरदर्द के छिपे कारण क्या है
1. तनाव - आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में तनाव बहुत आम हो गया है. जब हम लगातार तनाव में रहते हैं, तो सिर और गर्दन की मांसपेशियां सख्त हो जाती हैं. ससे हल्का लेकिन लगातार रहने वाला सिरदर्द होता है, जिसे टेंशन हेडेक कहा जाता है.&amp;nbsp;
2. गलत बैठने का तरीका &amp;nbsp;- लंबे समय तक मोबाइल या लैपटॉप पर झुककर बैठना गर्दन और कंधों पर दबाव डालता है. यह दबाव धीरे-धीरे सिर तक पहुंचता है और दर्द का कारण बनता है.&amp;nbsp;
3. ज्यादा स्क्रीन देखना - घंटों स्क्रीन देखने से आंखों पर जोर पड़ता है. कम पलक झपकाना और लगातार फोकस करने से आंखों में थकान होती है, जो सिरदर्द में बदल जाती है.&amp;nbsp;
4. समय पर खाना न खाना - अगर आप अक्सर खाना छोड़ देते हैं या देर से खाते हैं, तो ब्लड शुगर कम हो जाती है. इससे कमजोरी, चिड़चिड़ापन और सिरदर्द शुरू हो सकता है.&amp;nbsp;
5. नींद की कमी या ज्यादा नींद - नींद का सीधा संबंध हमारे दिमाग से होता है. कम सोना, बार-बार नींद टूटना या बहुत ज्यादा सोना,ये सभी सिरदर्द को बढ़ा सकते हैं.&amp;nbsp;
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रिपोर्ट नॉर्मल होने का मतलब क्या है
ज्यादातर मेडिकल टेस्ट सिर्फ बड़ी बीमारियों का पता लगाने के लिए होते हैं, जैसे ट्यूमर, इंफेक्शन, न्यूरोलॉजिकल बीमारी. लेकिन ये टेस्ट यह नहीं बता सकते कि आप कितनी देर तक एक ही जगह बैठे रहते हैं, कितना पानी पीते हैं, कितना तनाव लेते हैं, आपकी नींद और खाने का पैटर्न कैसा है. यही वजह है कि रिपोर्ट नॉर्मल आने के बाद भी समस्या बनी रहती है.
सिरदर्द कम करने के लिए क्या करें&amp;nbsp;
ऐसे सिरदर्द को बिना भारी दवाइयों के भी काफी हद तक ठीक किया जा सकता है. इसके लिए ज्यादा से ज्यादा पानी पिएं, हल्की डिहाइड्रेशन भी सिरदर्द का कारण बन सकती है. इसके अलावा सही पोस्चर रखें. सीधे बैठें, स्क्रीन आंखों के स्तर पर रखें और हर 30 से 40 मिनट में ब्रेक लें. दिन में 3 से 4 बार बैलेंस डाइट लें, खाना स्किप न करें. हर दिन एक ही समय पर सोने और उठने की आदत डालें.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 12 Apr 2026 05:30:14 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Hot Water Benefits: वजन कम करने के लिए सुबह&amp;सुबह आप भी पीते हैं गर्म पानी, क्या सच में काम करता है यह हैक?</title>
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        <description><![CDATA[ Does Drinking Hot Water Help With Weight Loss: आजकल सोशल मीडिया पर एक नया वेलनेस ट्रेंड तेजी से वायरल हो रहा है. लोग दावा कर रहे हैं कि रोज सुबह सिर्फ एक कप गर्म पानी पीने से वजन कम होता है, स्किन साफ होती है और यहां तक कि पीरियड्स के दर्द व गले की खराश में भी राहत मिलती है. सुनने में यह तरीका काफी आसान और नेचुरल लगता है, इसलिए लोग इसे जल्दी अपनाने लगते हैं.
लेकिन असली सवाल यह है कि क्या सच में गर्म पानी पीने से इतने फायदे मिलते हैं, या फिर यह सिर्फ एक और वायरल ट्रेंड है? सच थोड़ा अलग है. गर्म पानी पीना सुरक्षित तो है और कई लोगों को इससे अच्छा महसूस भी होता है, लेकिन इसके पीछे ठोस वैज्ञानिक कारण साफ तौर पर साबित नहीं हुए हैं.&amp;nbsp;
क्या इससे होता है फायदा
दरअसल, इसके फायदे पानी के तापमान से ज्यादा उस आदत से जुड़े हो सकते हैं कि आप नियमित रूप से पानी पी रहे हैं. कई बार गर्माहट से मिलने वाला आराम और रिलैक्सेशन ही शरीर को बेहतर महसूस कराता है. यानी असली फायदा पानी पीने का है, न कि उसका गर्म होना. पानी हमारे शरीर के लिए बेहद जरूरी है, चाहे वह ठंडा हो, सामान्य हो या गर्म. पर्याप्त मात्रा में पानी पीने से पाचन, ब्लड सर्कुलेशन, किडनी फंक्शन और ब्लड प्रेशर जैसी कई जरूरी प्रक्रियाएं सही रहती हैं. हाल की एक स्टडी में यह भी सामने आया है कि कम पानी पीने से रोजमर्रा के तनाव को संभालना भी मुश्किल हो सकता है.&amp;nbsp;
क्या इससे वजन कम होता है
अब बात करते हैं सबसे आम दावे की कि क्या गर्म पानी वजन घटाने में मदद करता है? obesity जर्नल &amp;nbsp;में पब्लिस रिसर्च के अनुसार, अभी तक ऐसा कोई ठोस साइंटफिक प्रमाण नहीं है जो यह दिखाए कि सिर्फ गर्म पानी पीने से वजन कम होता है. हां, अगर आप मीठे या हाई-कैलोरी ड्रिंक्स की जगह पानी पीने लगते हैं, तो इससे वजन कंट्रोल में मदद मिल सकती है. कुछ रिसर्च में यह जरूर बताया गया है कि गर्म पानी आंतों की हलचल को थोड़ा बढ़ा सकता है, जिससे पाचन बेहतर होता है. लेकिन यह असर बहुत मामूली होता है और इसका सीधा संबंध फैट कम होने से नहीं है.
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गले की खराश में फायदेमंद
अब आते हैं गले की खराश पर. यहां गर्म पानी थोड़ा ज्यादा असरदार साबित होता है. गर्म तरल पदार्थ गले को आराम देते हैं, म्यूकस को ढीला करते हैं और सांस की नलियों में जलन को कम करते हैं. यही वजह है कि सर्दी-खांसी में गर्म चाय या काढ़ा पीने की सलाह दी जाती है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 11 Apr 2026 13:30:13 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>ग्रेड&amp;1 फैटी लिवर में फायदेमंद हो सकता है मेथी का पानी, जानिए इसके चौंकाने वाले फायदे</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/ग्रेड-1-फैटी-लिवर-में-फायदेमंद-हो-सकता-है-मेथी-का-पानी-जानिए-इसके-चौंकाने-वाले-फायदे</link>
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        <description><![CDATA[ Fenugreek Water Benefits : आजकल फैटी लिवर की समस्या तेजी से बढ़ रही है. खासकर ग्रेड-1 फैटी लिवर, जिसे शुरुआती अवस्था माना जाता है, यह बहुत से लोगों में बिना किसी साफ लक्षण के पाया जाता है. यह स्थिति धीरे-धीरे गलत खानपान, मोटापा, तनाव और कम फिजिकल एक्टिविटी के कारण विकसित हो सकती है. ऐसे में लोग नेचुरल और घरेलू उपायों की ओर भी ध्यान दे रहे हैं. इन्हीं में से एक उपाय &amp;nbsp;मेथी के दानों का पानी (Methi Water) है, जिसे रात भर भिगोकर सुबह खाली पेट पिया जाता है. कुछ शोध और विशेषज्ञों के अनुसार यह लिवर की सेहत को सपोर्ट करने में मदद कर सकता है, लेकिन इसे अकेला इलाज नहीं माना जाता है. तो आइए जानते हैं कि मेथी का पानी ग्रेड-1 फैटी लिवर में कैसे फायदेमंद हो सकता है.&amp;nbsp;
ग्रेड-1 फैटी लिवर क्या होता है?
ग्रेड-1 फैटी लिवर फैटी लिवर की शुरुआती अवस्था होती है. इसमें लिवर में थोड़ी मात्रा में चर्बी जमा होने लगती है. इस स्टेज में आमतौर पर कोई गंभीर लक्षण नहीं दिखते, इसलिए कई लोग इसे पहचान नहीं पाते हैं. इसके मुख्य कारण इंसुलिन रेजिस्टेंस, मोटापा, एक्सरसाइज की कमी और गलत खानपान जैसे ज्यादा तला-भुना और कार्बोहाइड्रेट वाली डाइट हो सकते हैं. वहीं अगर शुरुआती चरण में ध्यान दिया जाए तो इसे ठीक किया जा सकता है.&amp;nbsp;
मेथी का पानी फैटी लिवर में कैसे फायदेमंद हो सकता है
मेथी शरीर में इंसुलिन की कार्यक्षमता को बेहतर बनाने में मदद कर सकती है, जिससे ब्लड शुगर लेवल संतुलित रहने में मदद मिलती है. कुछ रिसर्च के अनुसार यह शरीर में फैट और कोलेस्ट्रॉल के स्तर को संतुलित करने में सहायक हो सकती है. यह पाचन और शरीर की एनर्जी प्रक्रिया को बेहतर बनाने में मदद कर सकती है, जिससे फैट जमा होने की प्रक्रिया पर अप्रत्यक्ष असर पड़ सकता है. लेकिन अभी तक ऐसा कोई मजबूत प्रमाण नहीं है जो यह साबित करे कि सिर्फ मेथी का पानी फैटी लिवर को पूरी तरह ठीक कर देता है.&amp;nbsp;
मेथी का पानी कैसे बनाएं
मेथी का पानी बनाने के लिए मेथी दानों को रातभर पानी में भिगोकर रखा जाता है. सुबह उस पानी को छानकर खाली पेट पिया जाता है. मेथी के बीजों में कुछ ऐसे प्राकृतिक तत्व पाए जाते हैं जो पाचन को बेहतर बना सकते हैं, शुगर कंट्रोल में मदद कर सकते हैं और मेटाबॉलिज्म को सपोर्ट कर सकते हैं.&amp;nbsp;
मेथी का पानी कैसे पीना चाहिए?
अगर आप इसे अपने रूटीन में शामिल करना चाहते हैं, तो ध्यान रखें 1 से 2 चम्मच मेथी दाने रातभर पानी में भिगोएं. सुबह खाली पेट उस पानी को पी लें. लेकिन जरूरत से ज्यादा सेवन न करें. साथ ही प्रेग्नेंट महिलाओं को डॉक्टर की सलाह के बिना इसका सेवन नहीं करना चाहिए. डायबिटीज की दवा लेने वाले लोग पहले डॉक्टर से सलाह लें. ज्यादा मात्रा में लेने से गैस या पेट में परेशानी हो सकती है.&amp;nbsp;
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क्या मेथी का पानी फैटी लिवर को पूरी तरह ठीक कर सकता है?
विशेषज्ञों के अनुसार मेथी का पानी सहायक उपाय हो सकता है, लेकिन यह अकेले इलाज नहीं है. फैटी लिवर को सुधारने के लिए सबसे जरूरी वजन कम करना, बैलेंस डाइट लेना, नियमित एक्सरसाइज करना और लाइफस्टाइल में सुधार करना है. डॉक्टरों के अनुसार अगर कोई व्यक्ति अपने शरीर का लगभग 5 प्रतिशत से 10 प्रतिशत वजन धीरे-धीरे कम करता है, तो शुरुआती फैटी लिवर में सुधार देखा जा सकता है.&amp;nbsp;
&amp;nbsp;फैटी लिवर को ठीक करने के लिए जरूरी टिप्स&amp;nbsp;
अगर आप ग्रेड-1 फैटी लिवर से जूझ रहे हैं, तो कम तेल और कम तला-भुना खाना, रिफाइंड शुगर और मैदा कम करना, ज्यादा सब्जियां और फाइबर लेना, कम से कम 30 से 40 मिनट तेज चलना या हल्की कसरत, हफ्ते में 5 दिन नियमित एक्सरसाइज और शरीर के अनुसार सही BMI बनाए रखना बहुत जरूरी है.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 11 Apr 2026 13:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Fatal love bite: कब जानलेवा हो जाती है &amp;apos;लव बाइट&amp;apos;, जानें कब पार्टनर को रोकना होता है जरूरी?</title>
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        <description><![CDATA[ Fatal love bite: कब जानलेवा हो जाती है &#039;लव बाइट&#039;, जानें कब पार्टनर को रोकना होता है जरूरी? ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 11 Apr 2026 01:30:18 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Married People Cancer Risk: क्या शादी करने से घट जाता है कैंसर होने का खतरा? कुंवारों को जरूर पढ़नी चाहिए यह रिसर्च</title>
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        <description><![CDATA[ Married People Cancer Risk: क्या शादी करने से घट जाता है कैंसर होने का खतरा? कुंवारों को जरूर पढ़नी चाहिए यह रिसर्च ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 11 Apr 2026 01:30:17 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Fatty Liver Disease: क्या बिना शराब पिए डैमेज हो सकता है लिवर, जानें आपकी रोजाना की कौन&amp;सी गलतियां पड़ रहीं भारी?</title>
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        <description><![CDATA[ Can Liver Cirrhosis Happen Without Alcohol: आजकल डॉक्टर एक ऐसे ट्रेंड को लेकर चिंता जता रहे हैं, जो चौंकाने वाला है. लीवर सिरोसिस, जिसे आमतौर पर शराब से जुड़ी बीमारी माना जाता था, अब उन लोगों में भी तेजी से सामने आ रहा है जो बहुत कम या बिल्कुल शराब नहीं पीते. इसकी असली वजह हमारी रोजमर्रा की आदतें हैं, खराब खानपान, बढ़ता वजन, डायबिटीज और लंबे समय तक बैठे रहने वाली लाइफस्टाइल.
साइलेंट किलर होता है यह
इस बीमारी को अक्सर साइलेंट किलर कहा जाता है, क्योंकि यह बिना किसी बड़े लक्षण के धीरे-धीरे शरीर को नुकसान पहुंचाती रहती है. जब तक इसके संकेत साफ दिखाई देते हैं, तब तक लीवर काफी हद तक डैमेज हो चुका होता है. डॉ. वसीम रमज़ान डार ने TOI को बताया कि पहले सिरोसिस को सिर्फ शराब से जोड़कर देखा जाता था, लेकिन अब यह मोटापा, खराब डाइट, डायबिटीज और फैटी लीवर जैसी लाइफस्टाइल बीमारियों से भी जुड़ा हुआ है.
कैसे होती है लिवर सिरोसिस की दिक्कत?
दरअसल, लीवर शरीर का एक बेहद अहम अंग है, जो खाने को पचाने, टॉक्सिन्स को फिल्टर करने और मेटाबॉलिज्म को संतुलित रखने का काम करता है. लेकिन जब इस पर बार-बार दबाव पड़ता है, चाहे वह फैट जमा होने से हो, इंफेक्शन से या किसी और कारण से, तो इसमें धीरे-धीरे स्कार टिश्यू बनने लगता है. यही स्थिति आगे चलकर सिरोसिस बन जाती है. शुरुआती लक्षण इतने हल्के होते हैं कि लोग अक्सर इन्हें नजरअंदाज कर देते हैं. जैसे लगातार थकान रहना, भूख कम लगना, पेट में हल्की परेशानी या बिना वजह वजन कम होना. कई लोग इसे स्ट्रेस या नींद की कमी समझकर छोड़ देते हैं. लेकिन जैसे-जैसे बीमारी बढ़ती है, लक्षण भी गंभीर हो जाते हैं. पेट में सूजन, त्वचा या आंखों का पीला पड़ना, बार-बार इंफेक्शन होना और कमजोरी महसूस होना इसके संकेत हो सकते हैं.&amp;nbsp;
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
डॉ. शंकर कुमार गुप्ता के मुताबिक, लीवर सिरोसिस सिर्फ एक अंग की बीमारी नहीं है, बल्कि यह पूरे शरीर को प्रभावित करता है. डाइजेशन, इम्युनिटी और ब्लड सर्कुलेशन सभी पर इसका असर पड़ता है. सबसे अहम बात यह है कि अगर समय रहते इसकी पहचान हो जाए, तो स्थिति को काफी हद तक संभाला जा सकता है. इसके लिए लीवर फंक्शन टेस्ट, अल्ट्रासाउंड और फाइब्रोसिस जांच जैसे टेस्ट किए जाते हैं. शुरुआती स्टेज में लाइफस्टाइल में बदलाव करके डैमेज को धीमा या आंशिक रूप से ठीक भी किया जा सकता है.
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भारत में बढ़ रहे हैं मामले
भारत में नॉन-अल्कोहोलिक फैटी लीवर डिजीज के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक, शहरी इलाकों में हर तीन में से एक व्यक्ति इस समस्या से जूझ सकता है. यही वजह है कि इसे हल्के में लेना खतरनाक हो सकता है. बचाव के लिए बहुत मुश्किल उपायों की जरूरत नहीं है, बल्कि छोटी-छोटी आदतों को सुधारना ही काफी है. हेल्दी घर का खाना खाना, रोजाना थोड़ी एक्सरसाइज करना, वजन और डायबिटीज को कंट्रोल में रखना, बिना डॉक्टर की सलाह के दवाइयां न लेना और समय-समय पर जांच कराना, ये सभी कदम लीवर को लंबे समय तक स्वस्थ रखने में मदद करते हैं. &amp;nbsp;डॉक्टरों का कहना है कि अगर बीमारी एडवांस स्टेज में पहुंच जाए, तो इलाज काफी मुश्किल और महंगा हो जाता है. कई मामलों में लीवर ट्रांसप्लांट ही आखिरी विकल्प बचता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 11 Apr 2026 01:30:16 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Fatty, Liver, Disease:, क्या, बिना, शराब, पिए, डैमेज, हो, सकता, है, लिवर, जानें, आपकी, रोजाना, की, कौन-सी, गलतियां, पड़, रहीं, भारी</media:keywords>
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        <title>Obesity Hypoventilation Syndrome: क्या मोटापा ले सकता है जान? 160 किलो की महिला का सांस लेना हुआ मुश्किल, डॉक्टरों ने ऐसे बचाया</title>
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        <description><![CDATA[ Obesity Related Breathing Disorder: कभी- कभी कुछ मामले ऐसे आते हैं अस्पतालों में, &amp;nbsp;जिनमें अगर मरीज जिंदा बच जाए, तो वह किसी चमत्कार से कम नहीं माना जाता है. ऐसा ही कुछ गुरुग्राम के सीके बिड़ला अस्पताल में हुआ, जहां डॉक्टरों की टीम ने एक बेहद मुश्किल और जोखिम भरे केस में 75 वर्षीय महिला की जान बचाकर उसे सुरक्षित डिस्चार्ज कर दिया. चलिए आपको बताते हैं कि आखिर मामला क्या है.&amp;nbsp;
किस बीमारी से जूझ रही थी महिला?
&amp;nbsp;160 किलो वजन की उस महिला कोओबेसिटी हाइपोवेंटिलेशन सिंड्रोम नाम की गंभीर बीमारी थी, जिसमें शरीर पर्याप्त रूप से सांस नहीं ले पाता और खून में ऑक्सीजन का स्तर गिरने लगता है, जबकि कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ जाती है. महिला को कई अन्य बीमारियां भी थीं, जैसे डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, एंग्जायटी और लंबे समय तक बिस्तर पर रहने की वजह से बेडसोर की समस्या थी. &amp;nbsp;वह अस्पताल के इमरजेंसी विभाग में गंभीर हालत में लाई गई थीं, जहां उन्हें दोनों फेफड़ों में निमोनिया और हार्ट की गंभीर समस्या का सामना करना पड़ रहा था. हालत इतनी नाजुक थी कि तुरंत वेंटिलेटर सपोर्ट देना पड़ा.&amp;nbsp;
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धीरे- धीरे हुआ सुधार
ICU में पहले 24 घंटों के इलाज के दौरान उनकी स्थिति में कुछ सुधार दिखा. बुखार और इंफेक्शन कम होने लगे, छाती के एक्स-रे में भी सुधार नजर आया और दिल से जुड़े संकेतक भी बेहतर होने लगे. &amp;nbsp;इन पॉजिटिव संकेतों के आधार पर डॉक्टरों ने करीब 36 घंटे बाद वेंटिलेटर हटाने का फैसला लिया. लेकिन जैसे ही वेंटिलेटर हटाया गया, मरीज की हालत अचानक बिगड़ गई. उनके शरीर में ऑक्सीजन का स्तर तेजी से गिरा और उन्हें फिर से तुरंत वेंटिलेटर पर रखना पड़ा.
डॉक्टरों ने क्या कहा?
इस पूरे मामले में अस्पताल में पल्मोनोलॉजी और क्रिटिकल केयर के एसोसिएट डायरेक्टर डॉ. कुलदीप कुमार ग्रोवर ने बताया कि यह समस्या मोटापे से जुड़ी सांस लेने की गंभीर बाधा की वजह से हुई. उन्होंने कहा कि ऐसे मरीजों में लंग्स की क्षमता कम हो जाती है और शरीर खुद से पर्याप्त सांस नहीं ले पाता. डॉ. ग्रोवर ने आगे बताया कि इस केस में मरीज के इंफेक्शन और दिल से जुड़े पैरामीटर तो सुधर रहे थे, लेकिन मोटापे के कारण उनकी सांस लेने की क्षमता बहुत कमजोर थी. यही वजह रही कि पहली बार वेंटिलेटर हटाने की कोशिश असफल रही.
ऐसे बची जान
इसके बाद डॉक्टरों की टीम ने अपनी रणनीति बदली. मरीज को लंबे समय तक धीरे-धीरे खुद सांस लेने की ट्रेनिंग दी गई, प्रेशर सपोर्ट को धीरे-धीरे कम किया गया और ब्रोंकोस्कोपी की मदद से एयरवे को पूरी तरह तैयार किया गया. इस सावधानी और प्लानिंग के बाद दूसरी बार वेंटिलेटर हटाने की प्रक्रिया सफल रही. भारत में मोटापे के बढ़ते मामलों के साथ OHS जैसी बीमारियां भी तेजी से सामने आ रही हैं. कई स्टडीज के मुताबिक, स्लीप से जुड़ी सांस की समस्याओं वाले मरीजों में इसका प्रतिशत 5 से 16 फीसदी तक पाया गया है, लेकिन अक्सर यह बीमारी तब तक पहचान में नहीं आती जब तक स्थिति गंभीर न हो जाए. डॉक्टरों का कहना है कि समय रहते जांच, वजन नियंत्रित रखना और नियमित मेडिकल चेकअप ही ऐसी गंभीर स्थितियों से बचने का सबसे अच्छा तरीका है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 11 Apr 2026 01:30:15 +0530</pubDate>
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        <media:keywords>Obesity, Hypoventilation, Syndrome:, क्या, मोटापा, ले, सकता, है, जान, 160, किलो, की, महिला, का, सांस, लेना, हुआ, मुश्किल, डॉक्टरों, ने, ऐसे, बचाया</media:keywords>
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        <title>Heart Ultrasound Test: हार्ट फेल्योर को पहले ही डिटेक्ट कर लेगी यह तकनीक, जानें मेडिकल फील्ड में कैसे आ रही क्रांति?</title>
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        <description><![CDATA[ Can AI Detect Heart Failure Early:&amp;nbsp;हार्ट फेल्योर एक गंभीर बीमारी है, जो दुनिया भर में लाखों लोगों को प्रभावित करती है. यह तब होती है, जब दिल शरीर में खून को ठीक से पंप नहीं कर पाता. बीमारी के बढ़े हुए चरण में यह जानलेवा भी बन सकती है, लेकिन सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इसे समय रहते पहचान पाना आसान नहीं होता. डॉक्टरों के सामने यही सबसे बड़ी समस्या है कि कई मरीजों में एडवांस्ड हार्ट फेल्योर का पता देर से चलता है, जिससे उन्हें सही समय पर इलाज नहीं मिल पाता. &amp;nbsp;अब एक नई रिसर्च से उम्मीद जगी है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI इस स्थिति को बदल सकता है.&amp;nbsp;
अभी किस तकनीक का यूज होता है
यह स्टडी वील कॉर्नेल मेडिसिन, कॉर्नेल टेक,कोलंबिया विश्वविद्यालय और न्यूयॉर्क-प्रेस्बिटेरियन के साइंटिस्ट ने किया गया है, जो जर्नल एनपीजे डिजिटल मेडिसिन में प्रकाशित हुआ. फिलहाल एडवांस्ड हार्ट फेल्योर की पहचान के लिए डॉक्टर एक खास टेस्ट कार्डियोपल्मोनरी एक्सरसाइज टेस्टिंग का सहारा लेते हैं. यह टेस्ट दिल और फेफड़ों की काम करने की क्षमता को मापता है, लेकिन इसके लिए विशेष उपकरण और ट्रेंड स्टाफ की जरूरत होती है, जो केवल बड़े अस्पतालों में ही उपलब्ध होता है. इसी वजह से कई मरीज इस जांच से वंचित रह जाते हैं.
रिसर्च में क्या निकला
नई रिसर्च में साइंटिस्ट ने एक ऐसा एआई सिस्टम तैयार किया है, जो दिल की अल्ट्रासाउंड जांच इकोकार्डियोग्राफी और मरीज के सामान्य मेडिकल रिकॉर्ड का एनालिसिस करके बीमारी की गंभीरता का अंदाजा लगा सकता है. खास बात यह है कि यह तकनीक पीक VO2 जैसे महत्वपूर्ण पैरामीटर का अनुमान लगा सकती है, जो आमतौर पर केवल CPET के जरिए ही मापा जाता है.
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1,000 हार्ट फेल्योर मरीजों के डेटा का इस्तेमाल&amp;nbsp;
इस सिस्टम को तैयार करने के लिए करीब 1,000 हार्ट फेल्योर मरीजों के डेटा का इस्तेमाल किया गया, जिसमें अल्ट्रासाउंड वीडियो, ब्लड फ्लो और हार्ट वॉल्व की गतिविधियों से जुड़ी जानकारी शामिल थी. इसके बाद 127 नए मरीजों पर इसका परीक्षण किया गया, जहां इस एआई मॉडल ने करीब 85 प्रतिशत सटीकता के साथ हाई-रिस्क मरीजों की पहचान की. रिसर्चर का कहना है कि यह तकनीक रोजमर्रा की मेडिकल जरूरतों में आसानी से इस्तेमाल की जा सकती है, क्योंकि इसमें वही डेटा उपयोग होता है जो पहले से उपलब्ध होता है. इससे उन मरीजों की पहचान संभव हो सकेगी, जो अभी तक नजरअंदाज हो रहे थे.
हालांकि, साइंटिस्ट ने यह भी माना है कि इस तकनीक को बड़े स्तर पर लागू करने से पहले और बड़े स्तर पर टेस्ट जरूरी है. एआई सिस्टम की विश्वसनीयता और सुरक्षा सुनिश्चित करना भी उतना ही अहम है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 09 Apr 2026 17:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Eye Discharge Causes: सावधान! नॉर्मल नहीं होता सुबह आंखों में जमने वाला मैल,  पीला या हरा रंग इस बीमारी का संकेत</title>
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        <description><![CDATA[ Why Do I Wake Up With Crusty Eyes: सुबह उठते ही अगर आंखों के कोनों में चिपचिपा या सूखा जमा हुआ पदार्थ नजर आए, तो इसे आमतौर पर आई क्रस्ट या आंखों की मैल कहा जाता है. यह कई बार सामान्य होता है, लेकिन कुछ मामलों में यह किसी समस्या का संकेत भी हो सकता है. चलिए आपको बताते हैं कि कब आपको सावधान होने की जरूरत होती है और कब यह नॉर्मल होता है.&amp;nbsp;
क्यों निकलता है यह?
&amp;nbsp;हेल्थ जानकारी देने वाली वेबसाइट MedlinePlus के अनुसार, आंखों में बनने वाला यह क्रस्ट असल में डिस्चार्ज होता है, जो सूखकर सख्त या चिपचिपा रूप ले लेता है. कुछ लोगों में यह पीले रंग का और कठोर होता है, जबकि कुछ में यह साफ, पतला या पानी जैसा भी हो सकता है. इसकी एक सामान्य वजह नींद भी होती है। जब हम सोते हैं, तो आंखें बंद रहती हैं और पलकें झपकती नहीं हैं. ऐसे में आंखों का प्राकृतिक डिस्चार्ज कोनों में जमा हो जाता है, जो सुबह उठने पर क्रस्ट के रूप में दिखाई देता है.
इसके अलावा, आंसू की नली में ब्लॉकेज भी इसका कारण बन सकता है. इस स्थिति को नासोलैक्रिमल डक्ट ऑब्स्ट्रक्शन कहा जाता है, जिसमें आंसू सही तरीके से निकल नहीं पाते. इससे आंखों में पानी आना, लालिमा और पीले-हरे रंग का चिपचिपा डिस्चार्ज देखने को मिल सकता है.
एलर्जिक कंजंक्टिवाइटिस भी वजह
एलर्जिक कंजंक्टिवाइटिस भी एक बड़ी वजह है. &amp;nbsp;धूल, पालतू जानवरों के बाल या फफूंद जैसे एलर्जन के संपर्क में आने से आंखों में खुजली, पानी आना और सूजन हो सकती है. कई मामलों में इसके साथ हल्का क्रस्ट भी बनता है. ड्राई आई की समस्या में भी आंखों के आसपास म्यूकस जैसा जमा दिखाई दे सकता है. इसमें आंखों में जलन, चुभन, लालिमा और धुंधला दिखाई देना जैसे लक्षण शामिल होते हैं.
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वहीं, बैक्टीरियल कंजंक्टिवाइटिस में आंखों से ज्यादा मात्रा में डिस्चार्ज निकलता है, जो गाढ़ा और पीले या हरे रंग का हो सकता है. इसके साथ दर्द, खुजली और रोशनी से परेशानी भी हो सकती है. एक और स्थिति ब्लेफराइटिस है, जिसमें पलकों के किनारों पर सूजन और जलन होती है। इससे पलकें चिपचिपी हो जाती हैं और उन पर पपड़ी जमने लगती है.&amp;nbsp;
कब डॉक्टर से मिलना चाहिए?
कुछ कम मामलों में केराटाइटिस या आंख की कॉर्निया से जुड़ी समस्या और स्टाई (फुंसी) भी इसकी वजह हो सकती है. इन स्थितियों में दर्द, सूजन और पस जैसा डिस्चार्ज देखने को मिल सकता है. डॉक्टर से कब मिलें, यह समझना जरूरी है. अगर आंखों में दर्द, ज्यादा सूजन, धुंधली नजर, रोशनी से परेशानी या गाढ़ा पीला-हरा डिस्चार्ज हो, तो आंखों के एक्सपर्ट से जांच करानी चाहिए. इलाज के तौर पर हल्के मामलों में घर पर ही देखभाल की जा सकती है, जैसे गुनगुने पानी से आंखों की सफाई करना या साफ कपड़े से पपड़ी हटाना, लेकिन अगर समस्या एलर्जी या इंफेक्शन से जुड़ी हो, तो डॉक्टर दवा या आई ड्रॉप्स भी दे सकते हैं.&amp;nbsp;
साफ- सफाई के दौरान क्या ध्यान रखना जरूरी?
साफ-सफाई का ध्यान रखना सबसे जरूरी है. नियमित रूप से हाथ धोना, आंखों को साफ रखना और जरूरत पड़ने पर लुब्रिकेटिंग आई ड्रॉप्स का इस्तेमाल करना इस समस्या को कम करने में मदद कर सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 09 Apr 2026 17:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>Good vs Bad Cholestrol: गुड और बैड कोलेस्ट्रॉल का खेल, क्या आप जानते हैं असली जोखिम कहां है?</title>
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        <description><![CDATA[ Good vs Bad Cholestrol: खाने के शौकीन लोगों में अक्सर कोलेस्ट्रॉल की शिकायत देखी जाती है, जो उनकी अनहेल्दी फूड और अनियमित डाइट का नतीजा होती है. इन सब के बीच लोगों ने एक आसान सा निष्कर्ष निकाल लिया है, जिसमे कोलेस्ट्रॉल को दो हिस्सों में बांट दिया गया है- गुड और बैड. इसमें LDL को बैड और HDL को गुड कोलेस्ट्रॉल कहा जाता है. अपनी रिपोर्ट में HDL का नंबर देखकर लोग खुश हो जाते हैं, लेकिन क्या यह धारणा सच है या इसके पीछे की सच्चाई कुछ और है? आइए जानते हैं.
कोलेस्ट्रॉल क्या है?
कोलेस्ट्रॉल एक वैक्स जैसा फैट होता है, जो हमारे शरीर में सेल, विटामिन D और हार्मोन बनाने में मदद करता है. हमारा लिवर शरीर की जरूरत के अनुसार कोलेस्ट्रॉल बनाता है, लेकिन हम खाने-पीने की चीजों के द्वारा भी इसे काफी मात्रा में लेते हैं. वैसे तो यह जरूरी होता है, लेकिन जब इसका स्तर बढ़ जाता है तो यह धमनियों (आर्टरी) की दीवारों में प्लाक जमा कर देता है, जिससे दिल की बीमारी और स्ट्रोक का खतरा बढ़ सकता है.
क्या LDL वाकई बैड कोलेस्ट्रॉल है?
LDL को अक्सर दिल की बीमारियों के लिए जिम्मेदार माना जाता है, लेकिन हर LDL एक जैसा नहीं होता, कुछ LDL कण बड़े और हल्के होते हैं, जबकि कुछ छोटे और घने होते हैं. छोटे और घने कण ही धमनियों में जाकर प्लाक बनने में ज्यादा भूमिका निभाते हैं. एशियन हॉस्पिटल के डॉ. दिवाकर कुमार के अनुसार, &amp;ldquo;हर LDL नुकसानदायक नहीं होता, सिर्फ LDL का एक नंबर पूरी तस्वीर नहीं बताता. दो लोगों में LDL का स्तर समान होकर भी उसका असर अलग-अलग हो सकता है.&amp;rdquo;
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क्या HDL सच में गुड कोलेस्ट्रॉल है?
HDL को आमतौर पर गुड कोलेस्ट्रॉल कहा जाता है क्योंकि यह खून से अतिरिक्त कोलेस्ट्रॉल को हटाने में मदद करता है, लेकिन इसका ज्यादा होना हमेशा सुरक्षित होने की गारंटी नहीं देता. डॉ. कुमार के अनुसार, &amp;ldquo;अगर HDL का स्तर बहुत ज्यादा है तो यह भी चिंता का कारण हो सकता है, खासकर जब लाइफस्टाइल सही न हो. डॉ. नेहा शाह के अनुसार, &amp;ldquo;यह सही है कि HDL शरीर की रक्षा करता है और LDL जोखिम बढ़ाता है, लेकिन सिर्फ इन नंबरों से पूरी सच्चाई नहीं पता चलती. जैसे- 44 HDL वाले दो लोगों में फर्क हो सकता है अगर उनके ट्राइग्लिसराइड्स अलग हों, एक में 90 और दूसरे में 210, नंबर वही है, लेकिन शरीर की स्थिति पे इसका प्रभाव अलग होता है. LDL में भी यही बात लागू होती है. रिपोर्ट में सिर्फ नंबर दिखता है, लेकिन असली फर्क इसके छोटे और घने कणों से पड़ता है, जो नसों को नुकसान पहुंचाते हैं.
कैसे बचें कोलेस्ट्रॉल के खतरे से?
कोलेस्ट्रॉल आपकी रोजमर्रा की आदतों से प्रभावित होता है. कम नींद, ज्यादा तनाव, स्मोकिंग और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड आपको कोलेस्ट्रॉल के खतरे के करीब ला सकते हैं. इससे बचने के लिए नियमित एक्सरसाइज करना फायदेमंद होता है. इसके अलावा रोजाना संतुलित भोजन और हेल्दी डाइट लेना जरूरी है और तनाव कम करने के लिए योग या मेडिटेशन करना भी मददगार हो सकता है.
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&amp;nbsp; ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 09 Apr 2026 17:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Dehydration Risks: प्यास लगने पर ही पीते हैं पानी? यह आदत आपकी किडनी को कर रही बीमार, जानें यूरोलॉजिस्ट की राय</title>
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        <description><![CDATA[ What Happens If You Don&amp;rsquo;t Drink Enough Water: हममें से ज्यादातर लोग पानी पीने को बहुत साधारण बात मानते हैं. प्यास लगी तो गिलास उठा लिया, नहीं लगी तो छोड़ दिया. लेकिन किडनी इतनी लापरवाही बर्दाश्त नहीं करती. यही छोटे-से अंग खून को साफ करते हैं, शरीर से टॉक्सिन बाहर निकालते हैं, इलेक्ट्रोलाइट संतुलित रखते हैं और तरल पदार्थों का स्तर कंट्रोल करते हैं. जब शरीर को पर्याप्त पानी नहीं मिलता, तो किडनी को ज़्यादा मेहनत करनी पड़ती है. यह सिर्फ थकान की बात नहीं, बल्कि लंबे समय में पथरी, यूरिन इन्फेक्शन और क्रॉनिक किडनी डिजीज का खतरा बढ़ सकता है. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर एक्सपर्ट क्या कहते हैं और हमें किस तरह की सावधानी रखने की जरूरत होती है.&amp;nbsp;
पानी को लेकर लोगों में क्या है गलतफहमी?
कई लोग मानते हैं कि दिनभर चाय, कॉफी या जूस पी लेना काफी है. जबकि कैफीन और शुगर वाले पेय शरीर से पानी तेजी से बाहर निकाल सकते हैं. एक और गलतफहमी है कि प्यास लगे तभी पानी पिएं. सच यह है कि जब प्यास लगती है, तब तक शरीर हल्का-सा डिहाइड्रेट हो चुका होता है और किडनी पर दबाव बढ़ चुका होता है. दूसरी तरफ कुछ लोग जरूरत से ज्यादा पानी पी लेते हैं, यह सोचकर कि ज्यादा पानी हमेशा फायदेमंद है. लेकिन बहुत कम समय में तीन से चार लीटर या उससे अधिक पानी पी लेना खतरनाक हो सकता है. इससे खून में सोडियम का स्तर गिर सकता है, जिसे हाइपोनेट्रेमिया कहा जाता है. गंभीर मामलों में यह दिमाग में सूजन, दौरे या कोमा तक की स्थिति पैदा कर सकता है.
क्या कहते हैं डॉक्टर?
यूरोलॉजिस्ट डॉ. अजय अग्रवाल ने TOI को बताया कि, किडनी को संतुलित मात्रा में पानी की जरूरत होती है. बहुत कम या बहुत ज्यादा, दोनों ही नुकसानदेह हैं. लगातार कम पानी पीने से पेशाब गाढ़ा हो जाता है, जिससे पथरी और इंफेक्शन का खतरा बढ़ता है. वहीं डायबिटीज या हार्ट रोग से जूझ रहे लोगों में जरूरत से ज्यादा तरल लेने से शरीर पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है.
कितना पानी किसको पीना चाहिए?
एक्सपर्ट &amp;nbsp;का कहना है कि 8 गिलास पानी वाला नियम हर किसी पर लागू नहीं होता. आम तौर पर महिलाओं को करीब 2.2 लीटर और पुरुषों को 3 लीटर तरल की जरूरत होती है, लेकिन यह मौसम, पसीना, व्यायाम और स्वास्थ्य स्थिति पर निर्भर करता है। पेशाब का रंग अच्छा संकेत देता है, हल्का पीला रंग सही हाइड्रेशन दिखाता है, बहुत गहरा रंग पानी की कमी और बिल्कुल साफ रंग अधिक सेवन का संकेत हो सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 09 Apr 2026 17:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>Silent Heart Attack Risk: 80% मरीज &amp;apos;लो&amp;रिस्क&amp;apos; थे, फिर भी आया हार्ट अटैक! जानें क्यों फेल हो रहे विदेशी मेडिकल फॉर्मूले?</title>
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        <description><![CDATA[ Why Heart Attacks Are Rising In Indians: दिल का दौरा हमेशा उन लोगों को ही आए, जिनमें पहले से साफ चेतावनी संकेत हों कि यह धारणा अब बदलती नजर आ रही है. हाल ही में एक भारतीय अध्ययन ने दिखाया है कि कई ऐसे मरीज भी हार्ट अटैक का शिकार हो रहे हैं, जिन्हें पहले लो-रिस्क माना गया था. दिल्ली के जीबी पंत &amp;nbsp;में डॉ. मोहित दयाल गुप्ता के नेतृत्व में किए गए इस अध्ययन में 5,000 से अधिक मरीजों के डेटा का एनालिसिस किया गया. इसमें पाया गया कि जिन लोगों को पहली बार हार्ट अटैक आया, उनमें से करीब 80 प्रतिशत को पहले से हाई-रिस्क कैटेगरी में नहीं रखा गया था.&amp;nbsp;
भारतीय में जोखिम की पहचान नहीं हुई
आमतौर पर डॉक्टर जिन ग्लोबल रिस्क कैलकुलेटर्स का इस्तेमाल करते हैं, वे यह तय करने में मदद करते हैं कि किसे इलाज या दवा की जरूरत है. लेकिन इस स्टडी में सामने आया कि ये मॉडल भारतीय मरीजों के जोखिम को सही तरीके से नहीं पहचान पा रहे हैं. अलग-अलग मॉडल्स के अनुसार सिर्फ 11 प्रतिशत से 20 प्रतिशत मरीजों को ही हाई-रिस्क बताया गया, जबकि सभी को बाद में हार्ट अटैक हुआ.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
डॉ. गुप्ता के मुताबिक, भारतीय मरीजों का पैटर्न पश्चिमी देशों से अलग है. वहां दिल की बीमारी आमतौर पर ज्यादा उम्र में होती है, जबकि भारत में यह कम उम्र में ही देखने को मिल रही है. स्टडी में मरीजों की औसत उम्र सिर्फ 54 साल पाई गई, जो इस बात का संकेत है कि हार्ट डिजीज अब पहले से ज्यादा जल्दी असर डाल रही है. रिसर्च में यह भी सामने आया कि भारतीयों में एक खास साउथ एशियन फेनोटाइप देखा जाता है. इसमें सामान्य वजन होने के बावजूद डायबिटीज और इंसुलिन रेसिस्टेंस का खतरा रहता है. इसके अलावा कोलेस्ट्रॉल का पैटर्न भी अलग होता है HDL कम और ट्राइग्लिसराइड्स ज्यादा, जबकि LDL हमेशा ज्यादा नहीं होता.
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इन चीजों से भी बढ़ता है खतरा
कई लोगों में पेट के आसपास छिपी हुई चर्बी होती है, जो BMI से पकड़ में नहीं आती. इसके साथ ही स्मोकिंग, मानसिक तनाव और अन्य पारंपरिक जोखिम कारक भी मिलकर खतरे को बढ़ाते हैं. समस्या यह है कि ज्यादातर ग्लोबल मॉडल उम्र और LDL को ज्यादा महत्व देते हैं, जिससे युवा भारतीयों का जोखिम कम आंका जाता है. कई मरीज &amp;ldquo;इंटरमीडिएट रिस्क&amp;rdquo; कैटेगरी में चले जाते हैं, जहां इलाज अक्सर टल जाता है.
इसके अलावा, ये मॉडल कुछ अहम फैक्टर्स को शामिल ही नहीं करते, जैसे इंसुलिन रेसिस्टेंस, लिपोप्रोटीन(a), ApoB, सेंट्रल ओबेसिटी और क्रॉनिक किडनी डिजीज. यही वजह है कि असली खतरा छिपा रह जाता है और इलाज तब शुरू होता है, जब स्थिति गंभीर हो चुकी होती है. &amp;nbsp;इस स्टडी के बाद एक्सपर्ट्स &amp;nbsp;ने भारत के लिए अलग रिस्क कैलकुलेटर विकसित करने की जरूरत पर जोर दिया है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 09 Apr 2026 17:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>AIIMS Dry Eye Treatment: गाय के दूध से दूर होगी ड्राई आइज की दिक्कत, दिल्ली एम्स के ट्रायल में हुआ साबित</title>
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        <description><![CDATA[ How Lactoferrin Tablets Help Treat Dry Eyes: आजकल कम उम्र मे ही लोग आंखों की दिक्कत का सामना कर रहे हैं. मोबाइल, लैपटॉप, टीवी आदि के यूज के चलते इसकी समस्या बढ़ती जा रही है. &amp;nbsp;दिल्ली के ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में किए गए एक ट्रायल के उत्साहजनक नतीजों के बाद वैज्ञानिक अब ड्राई आई &amp;nbsp;की समस्या के इलाज के लिए एक नई दवा को बाजार में लाने की तैयारी में है. यह दवा दूध से मिलने वाले प्रोटीन लैक्टोफेरिन पर आधारित है, जिसे खासतौर पर आंखों की नमी बनाए रखने और सूजन कम करने के लिए विकसित किया गया है.
कैसे किया गया है इसे तैयार?
दरअसल, यह टैबलेट गाय के कोलोस्ट्रम जिसे पहला दूध कहा जाता है, उससे प्राप्त लैक्टोफेरिन प्रोटीन से तैयार की गई है. कोलोस्ट्रम को पोषक तत्वों और बायोएक्टिव कंपाउंड्स का खजाना माना जाता है, जो शरीर की मरम्मत और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मदद करता है. इस रिसर्च से जुड़ी वैज्ञानिक डॉ सुजाता शर्मा के मुताबिक, इस दवा को विकसित करने के लिए एक जापानी कंपनी के साथ साझेदारी की गई है. इस ट्रायल पर आधारित रिसर्च पेपर फिलहाल एक साइंटिस्ट जर्नल में प्रकाशन के लिए समीक्षा के दौर में है.
ड्राई आई की दिक्कत
ड्राई आई एक आम लेकिन परेशान करने वाली समस्या है, जो तब होती है जब आंखों में आंसू पर्याप्त मात्रा में नहीं बनते या उनकी गुणवत्ता ठीक नहीं होती. इससे आंखों में जलन, लालपन और भारीपन महसूस होता है. आजकल लंबे समय तक स्क्रीन देखने की आदत इस समस्या को और बढ़ा रही है, क्योंकि इससे पलक झपकने की दर काफी कम हो जाती है. एम्स के आरपी सेंटर में करीब 200 मरीजों पर किए गए इस ट्रायल में, सीनियर आई एक्सपर्ट डॉ नम्रता शर्मा की अगुवाई में मरीजों को तीन महीने तक रोजाना 250 एमजी लैक्टोफेरिन दिया गया..&amp;nbsp;
इससे क्या हुआ सुधार?
&amp;nbsp;इसमें मरीजों की आंखों में आंसू बनने की क्षमता और उनकी गुणवत्ता दोनों में सुधार हुआ. मौजूदा समय में ड्राई आई के इलाज के लिए ज्यादातर लोग आई ड्रॉप्स या कभी-कभी स्टेरॉयड का सहारा लेते हैं, लेकिन ये केवल अस्थायी राहत देते हैं और इनके साइड इफेक्ट्स भी हो सकते हैं. इसके मुकाबले लैक्टोफेरिन आधारित यह नई थेरेपी सुरक्षित, असरदार और किफायती विकल्प के रूप में सामने आई है.&amp;nbsp;
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क्या होता है लैक्टोफेरिन?
लैक्टोफेरिन एक प्राकृतिक प्रोटीन है, जो शरीर में इम्यूनिटी बढ़ाने, सूजन कम करने और सेल्स की मरम्मत में मदद करता है. यही कारण है कि साइंटिस्ट अब इसके अन्य उपयोगों, जैसे एनीमिया के इलाज, पर भी रिसर्च कर रहे हैं. शुरुआत में इस प्रोटीन को मानव दूध से निकालने की कोशिश की गई थी, लेकिन सीमित उपलब्धता और नैतिक कारणों की वजह से यह संभव नहीं हो पाया. इसके बाद गाय के कोलोस्ट्रम को एक प्रभावी और सुलभ विकल्प के रूप में अपनाया गया. फिलहाल, रिसर्चर को उम्मीद है कि जरूरी मंजूरी मिलने के बाद यह दवा जल्द ही बाजार में उपलब्ध हो सकती है, जिससे लाखों लोगों को ड्राई आई की समस्या से राहत मिल सकेगी.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 09 Apr 2026 05:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>Moringa Leaves Benefits: मोरिंगा के पत्ते खाने से दूर हो जाती हैं ये बीमारियां, आज से ही शुरू कर दें इस्तेमाल</title>
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        <description><![CDATA[ What Happens If You Eat Moringa Leaves Daily: मोरिंगा के पत्ते, जिन्हें आम भाषा में सहजन या ड्रमस्टिक लीव्स कहा जाता है, अब धीरे-धीरे एक सुपरफूड के रूप में लोगों के बीच लोकप्रिय हो रहे हैं. &amp;nbsp;एक्सपर्ट का मानना है कि रोजमर्रा की डाइट में इन पत्तों को शामिल करने से कई तरह की बीमारियों से बचाव संभव है. यही वजह है कि स्वास्थ्य से जुड़े जानकार अब इसे नियमित खाने की सलाह दे रहे हैं. चलिए आपको बताते हैं कि सेहत के लिए यह कितना फायदेमंद होता है.&amp;nbsp;
सेहत के लिए कितना फायदेमंद?
&amp;nbsp;medanta की रिपोर्ट के अनुसार, &amp;nbsp;मोरिंगा के पत्ते पोषक तत्वों का खजाना माने जाते हैं. इनमें प्रोटीन, विटामिन A, C और E, आयरन, कैल्शियम, पोटैशियम और मैग्नीशियम भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं. &amp;nbsp;साथ ही इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट और एंटी-इन्फ्लेमेटरी गुण शरीर को कई गंभीर बीमारियों से लड़ने में मदद करते हैं. रिपोर्ट के अनुसार, मोरिंगा के पत्ते इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाते हैं, जिससे शरीर इंफेक्शन और मौसमी बीमारियों से बेहतर तरीके से लड़ पाता है. इसके अलावा यह शरीर में ऊर्जा बढ़ाने और थकान कम करने में भी मददगार साबित होता है.&amp;nbsp;
हार्ट की सेहत के लिए फायदेमंद
&amp;nbsp;हार्ट की सेहत के लिए भी मोरिंगा बेहद फायदेमंद माना जाता है. यह ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल को संतुलित रखने में मदद करता है, जिससे हार्ट रोगों का खतरा कम हो सकता है. वहीं, जिन लोगों को ब्लड शुगर की समस्या है, उनके लिए भी यह उपयोगी साबित हो सकता है, क्योंकि यह शुगर लेवल को नियंत्रित रखने में सहायक होता है. डाइजेशन को बेहतर बनाए रखने में भी मोरिंगा अहम भूमिका निभाता है. इसमें मौजूद फाइबर पेट को स्वस्थ रखने, कब्ज से राहत देने और आंतों के संतुलन को बनाए रखने में मदद करता है. इसके साथ ही यह शरीर से टॉक्सिन्स निकालने में भी सहायक माना जाता है.
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कैसे कर सकते हैं सेवन?
मोरिंगा के पत्तों का सेवन कई तरीकों से किया जा सकता है. इन्हें दाल, सब्जी या सूप में डालकर खाया जा सकता है, वहीं इसका जूस या पाउडर भी इस्तेमाल किया जा सकता है. हालांकि, एस्पर्ट सलाह देते हैं कि इसकी शुरुआत कम मात्रा से करनी चाहिए और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए. अगर आप अपनी डाइट में एक आसान और असरदार बदलाव करना चाहते हैं, तो मोरिंगा के पत्ते एक अच्छा विकल्प हो सकते हैं, जो आपको लंबे समय तक स्वस्थ रखने में मदद कर सकते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 09 Apr 2026 05:30:11 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>क्लाइमेट चेंज से डायबिटीज पर असर, जानें मौसम कैसे बदल रहा आपका ब्लड शुगर? पढ़ें सेफ्टी टिप्स</title>
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        <description><![CDATA[ Climate change impacts diabetes : आज का मौसम और बढ़ती गर्मी सिर्फ हमारी लाइफस्टाइल ही नहीं बदल रही, बल्कि हमारी सेहत पर भी गहरा असर डाल रही है. खासकर डायबिटीज के मरीजों के लिए गर्म मौसम एक बड़ी चुनौती बन सकता है. अगर हम अपने शरीर की जरूरतों का ध्यान न रखें, तो ब्लड शुगर को &amp;nbsp;कंट्रोल करना मुश्किल हो सकता है. हाल ही में डॉक्टर ने बताया है कि जलवायु परिवर्तन सीधे हमारे शरीर के काम करने के तरीके को बदल देता है. जब तापमान बढ़ता है, तो शरीर को अपना संतुलन बनाए रखने के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है. इसका सीधा असर इंसुलिन और शुगर कंट्रोल पर पड़ता है. ऐसे में गर्म मौसम डायबिटीज पर कैसे असर डालता है और इसके लिए सुरक्षा टिप्स क्या हैं.
क्लाइमेट चेंज से डायबिटीज पर असर
हमारा शरीर प्राकृतिक रूप से शुगर को कंट्रोल करने के तरीके रखता है. &amp;nbsp;ठंडे मौसम में शरीर एक खास प्रकार की फैट का इस्तेमाल करता है, जो कैलोरी जलाकर शरीर को गर्म रखता है और इंसुलिन सेंसिटिविटी बढ़ाता है, लेकिन जब लंबे समय तक गर्मी रहती है, तो यह प्रक्रिया कम होती है. इसका मतलब है कि शरीर के लिए ब्लड शुगर को संतुलित रखना मुश्किल हो जाता है.साथ ही, ज्यादा गर्मी के कारण लोग बाहर जाने और एक्सरसाइज करने से बचते हैं. कम फिजिकल एक्टिविटी डायबिटीज और वजन बढ़ने का बड़ा कारण बन सकती है.&amp;nbsp;
मौसम कैसे बदल रहा है आपका ब्लड शुगर?
1. पानी की कमी और डिहाइड्रेशन - गर्मी में पसीना ज्यादा आता है, जिससे शरीर में पानी की कमी हो जाती है. इससे ब्लड शुगर का स्तर बढ़ सकता है.&amp;nbsp;
2. शरीर को ठंडा करने में मुश्किल - डायबिटीज नसों और ब्लड वेसल्स को प्रभावित करता है, जो पसीने की ग्रंथियों को कंट्रोल करती हैं. इसके कारण शरीर ठंडा होने में असमर्थ होता है, जिससे हीट एक्सॉर्शन या गर्मी से थकान का खतरा बढ़ जाता है.&amp;nbsp;
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3. दवाओं और इंसुलिन का असर - हाई टेंपरेचर इंसुलिन और अन्य दवाओं को प्रभावित कर सकता है. गर्मी और बिजली कटौती के समय, अगर दवाओं को ठीक से स्टोर न किया जाए, तो उनका असर कम हो सकता है.
इसके लिए सुरक्षा टिप्स क्या हैं?
1. हाइड्रेशन और निगरानी - लगातार पानी पीते रहें. पानी किडनी को शरीर से अतिरिक्त शुगर निकालने में मदद करता है. &amp;nbsp;ब्लड शुगर की जांच ज्यादा बार करें क्योंकि गर्मी में ब्लड शुगर अस्थिर हो सकता है. शराब और कैफीन से बचें, क्योंकि ये शरीर को और ज्यादा डिहाइड्रेट कर सकते हैं.&amp;nbsp;
2. शरीर को ठंडा रखें - अगर शरीर पसीना नहीं निकाल पाता, तो ठंडा रहने के लिए फैंस, गीले तौलिये और ढीले कपड़े पहनें. एक्सरसाइज या चलने-फिरने का समय सुबह जल्दी या शाम को रखें, जब तापमान कम हो.&amp;nbsp;
3. दवाओं और मेडिकल सप्लाइज की सुरक्षा - इंसुलिन और डायबिटीज टेस्ट किट्स गर्मी में खराब हो सकती हैं. इन्हें कार में या धूप में न रखें. यात्रा करते समय इंसुलिन और टेस्ट किट्स को इंसुलेटेड कूलिंग पाउच में रखें. दवाओं और किट्स को ठंडी और सूखी जगह पर स्टोर करें.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 08 Apr 2026 13:30:13 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Vaccination: इन बीमारियों की वैक्सीन एकदम फ्री लगाती है सरकार, एक क्लिक में देख लें पूरी लिस्ट</title>
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        <description><![CDATA[ Vaccination: दुनिया भर में हर दिन तरह- तरह की बीमारियां फैलती है, ऐसे में इससे बचाव के समय पर टीकाकरण बहुत जरूरी हो जाता है. ऐसे में अच्छी बात यह है कि भारत सरकार ने लोगों की सेहत का ध्यान रखते हुए, जानलेवा और गंभीर बीमारियों से बचाव के लिए मुफ्त टीकाकरण की सुविधा दी है. ताकि हर नागरिक खासकर बच्चों और गर्भवती महिलाओं को सुरक्षित रखा जा सके. यह सुविधा मुख्य रूप से राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) और स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के तहत चलाई जाती है. ऐसे में कई लोगों को इसकी जानकारी नहीं होती है, आइए जानते है किन-किन बीमारियों की वैक्सीन मुफ्त में लगती है?
मुफ्त टीकाकरण कार्यक्रम क्या है?
भारत में मुफ्त टीकाकरण मुख्य रूप से सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम (Universal Immunization Programme - UIP) के अंतर्गत होता है. यह कार्यक्रम राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन का हिस्सा है और 100% केंद्र सरकार द्वारा वित्त पोषित है, जिसके तहत सरकारी अस्पतालों, PHC और आंगनवाड़ी केंद्रों में टीके मुफ्त लगते हैं.
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किन बीमारियों की वैक्सीन मिलती है फ्री?
भारत में &amp;nbsp;UIP के तहत सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर 12 से अधिक गंभीर बीमारियों के लिए मुफ्त टीकाकरण &amp;nbsp;उपलब्ध होते है जैसेः&amp;nbsp;

तपेदिक (TB) के लिए बीसीजी वैक्सीन
डिप्थीरिया, काली खांसी (Pertussis), टिटनेस के लिए &amp;nbsp;डीपीटी और टीडी (Td) टीके
पोलियो के लिए ओरल पोलियो वैक्सीन (bOPV)खसरा और रूबेला (Measles-Rubella) के लिए एमआर (MR) टीका
हेपेटाइटिस B के लिए &amp;nbsp;हेपेटाइटिस बी का टीका
मेनिनजाइटिस और निमोनिया के लिए &amp;nbsp;हिब (Hib) और पीसीवी (PCV) टीके
रोटावायरस डायरिया के लिए रोटावायरस वैक्सीन (RVV)
जापानी इंसेफलाइटिस के लिए जेई (JE) टीका
गर्भाशय ग्रीवा कैंसर (Cervical Cancer) 9 से 14 वर्ष की लड़कियों के लिए HPV वैक्सीन&amp;nbsp;

इसके बाद तय समय पर अन्य टीके लगाए जाते हैं ताकि उनकी इम्युनिटी मजबूत बनी रहे.
सरकारी अभियान और पहल&amp;nbsp;
सरकार समय-समय पर विशेष अभियान भी चलाती है, जैसे Mission Indradhanush (IMI), पल्स पोलियो कार्यक्रम, और एचपीवी (HPV) टीकाकरण अभियान जिसका उद्देश्य उन बच्चों, किशोरियों और गर्भवती महिलाओं तक टीकाकरण पहुंचाना है जो नियमित कार्यक्रम से छूट गए हैं. इस अभियान के जरिए देश के दूर-दराज और ग्रामीण क्षेत्रों में भी टीकाकरण की पहुंच सुनिश्चित की जाती है.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ेंः लंग कैंसर के मरीजों के लिए नई उम्मीद, AI टूल पहले ही भांप लेगा इलाज का असर ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 08 Apr 2026 13:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>Small Cell Lung Cancer: लंग कैंसर के मरीजों के लिए नई उम्मीद, AI टूल पहले ही भांप लेगा इलाज का असर</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/small-cell-lung-cancer-लंग-कैंसर-के-मरीजों-के-लिए-नई-उम्मीद-ai-टूल-पहले-ही-भांप-लेगा-इलाज-का-असर</link>
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        <description><![CDATA[ How AI predicts chemotherapy response in lung cancer: स्मॉल सेल लंग कैंसर दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ने और खतरनाक कैंसर में से एक माना जाता है. अक्सर जब तक इसका पता चलता है, तब तक यह शरीर के अन्य हिस्सों में फैल चुका होता है, जिसे डॉक्टर एक्सटेंसिव-स्टेज कहते हैं. इस स्थिति में इलाज मुश्किल हो जाता है और मरीज की औसत जीवित रहने की अवधि करीब एक साल तक सीमित रह जाती है. अब तक ऐसे मरीजों के इलाज के लिए प्लैटिनम-बेस्ड कीमोथेरेपी के साथ इम्यूनोथेरेपी का इस्तेमाल किया जाता रहा है. हालांकि, यह हर मरीज पर समान रूप से असरदार नहीं होता. &amp;nbsp;सबसे बड़ी समस्या यह रही है कि डॉक्टर पहले से यह तय नहीं कर पाते कि किस मरीज को इस इलाज से फायदा होगा और किसे नहीं.&amp;nbsp;
नई तकनीक विकसित हुई
इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए रोसवेल पार्क कॉम्प्रिहेंसिव कैंसर सेंटर (बफेलो, न्यूयॉर्क), &amp;nbsp;एमोरी यूनिवर्सिटी का विनशिप कैंसर इंस्टीट्यूट (अटलांटा, जॉर्जिया) &amp;nbsp;और यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल्स क्लीवलैंड मेडिकल सेंटर के शोधकर्ताओं ने एक नई तकनीक विकसित की है. यह स्टडी प्रतिष्ठित जर्नल एनपीजे प्रेसिजन ऑन्कोलॉजी में प्रकाशित हुई है, जिसमें फेनोपाईसेल &amp;nbsp;नाम के एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल का जिक्र किया गया है.&amp;nbsp;
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कैसे करता है काम
यह टूल उन टिश्यू इमेजेस का एनालिसिस करता है, जो पहले से ही मरीज के डायग्नोसिस के दौरान ली जाती हैं. आमतौर पर इन्हें माइक्रोस्कोप से देखा जाता है, लेकिन यह AI सिस्टम इन इमेजेस में ऐसे पैटर्न पहचान सकता है, जो इंसानी आंख से छूट जाते हैं. रिसर्च में 281 मरीजों के डेटा का इस्तेमाल किया गया, जिसमें पहले से मौजूद बायोप्सी सैंपल्स को एनालाइज किया गया. इस दौरान एआई ने ट्यूमर के आसपास मौजूद इम्यून सेल्स की बनावट और उनकी व्यवस्था का स्टडी किया. ये इम्यून सेल्स शरीर की इम्यून सिस्टम का हिस्सा होते हैं और कैंसर से लड़ने में अहम भूमिका निभाते हैं.
कैसे रहा इसका रिजल्ट
नतीजे काफी उत्साहजनक रहे. यह टूल इलाज शुरू होने से पहले ही यह अनुमान लगाने में सक्षम रहा कि कौन सा मरीज कीमोथेरेपी पर बेहतर प्रतिक्रिया देगा. जब इन अनुमानों की तुलना वास्तविक परिणामों से की गई, तो पाया गया कि यह तकनीक पारंपरिक तरीकों से ज्यादा सटीक साबित हुई. एक अहम खोज यह रही कि जिन मरीजों में इलाज का असर अच्छा रहा, उनके ट्यूमर के आसपास इम्यून सेल्स ज्यादा और व्यवस्थित रूप में मौजूद था. &amp;nbsp;वहीं, जिन मरीजों में असर कम था, उनमें ये सेल्स कम और बिखरे हुए पाए गए.&amp;nbsp;
रिसर्च का क्या है महत्व
यह खोज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे यह संकेत मिलता है कि शरीर की इम्यून प्रतिक्रिया इलाज के असर को प्रभावित कर सकती है. अब तक इस बीमारी में ऐसे स्पष्ट बायोलॉजिकल संकेत उपलब्ध नहीं थे, जो इलाज के निर्णय को दिशा दे सकें. फेनोपाईसेल की खास बात यह है कि यह पहले से मौजूद डेटा का उपयोग करता है, जिससे अतिरिक्त जांच या खर्च की जरूरत नहीं पड़ती. इससे मरीजों को अनावश्यक इलाज से बचाया जा सकता है और उन्हें समय रहते बेहतर विकल्पों की ओर ले जाया जा सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 08 Apr 2026 01:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Fruits To Avoid During Periods: पीरियड्स के दौरान महिलाओं का भूलकर भी नहीं खाने चाहिए ये फल, हो सकती है बड़ी दिक्कत</title>
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        <description><![CDATA[ Which Fruits Should Be Avoided During Menstruation: पीरियड्स के दौरान महिलाओं को खानपान का खास ध्यान रखना पड़ता है, क्योंकि इस समय शरीर में कई तरह के हार्मोनल बदलाव होते हैं. यही बदलाव मूड से लेकर पाचन तक सब कुछ प्रभावित करते हैं. ऐसे में जहां कुछ फल शरीर को राहत देने में मदद करते हैं, वहीं कुछ फल ऐसे भी होते हैं जिन्हें इस दौरान खाने से परेशानी बढ़ सकती है. चलिए आपको हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली बेवसाइट healthfab की रिपोर्ट के अनुसार बताते हैं कि इस दौरान किन फलों को नहीं खाना चाहिए.&amp;nbsp;
अनानास
सबसे पहले बात करें अनानास की, तो यह फल आमतौर पर सेहत के लिए अच्छा माना जाता है, लेकिन पीरियड्स के दौरान इसे सीमित मात्रा में ही खाना बेहतर होता है. इसमें मौजूद एंजाइम शरीर में ब्लड फ्लो को बढ़ा सकता है, जिससे जिन महिलाओं को ज्यादा ब्लीडिंग होती है, उनकी समस्या और बढ़ सकती है.&amp;nbsp;
तरबूज
तरबूज भी एक ऐसा फल है जिसे गर्मियों में खूब खाया जाता है, लेकिन पीरियड्स के दौरान यह दिक्कत बढ़ा सकता है. इसमें पानी की मात्रा बहुत ज्यादा होती है, जो शरीर में ब्लोटिंग और पानी रुकने की समस्या को बढ़ा सकती है. पहले से ही इस समय पेट फूलने की समस्या रहती है, ऐसे में तरबूज इसे और बढ़ा सकता है.
खट्टे फल
खट्टे फल जैसे संतरा, नींबू और ग्रेपफ्रूट भी इस दौरान सावधानी से खाने चाहिए. इनमें एसिड की मात्रा ज्यादा होती है, जो डाइजेशन सिस्टम को प्रभावित कर सकती है. कई महिलाओं को पीरियड्स के दौरान पहले से ही एसिडिटी या मतली की समस्या होती है और ऐसे फल इन लक्षणों को और बढ़ा सकते हैं.
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कच्चा केला
इसके अलावा कच्चा केला भी इस समय परेशानी का कारण बन सकता है. इसमें मौजूद रेजिस्टेंट स्टार्च पचने में कठिन होता है, जिससे कब्ज और पेट भारी होने की समस्या हो सकती है. पीरियड्स के दौरान जब शरीर पहले ही संवेदनशील होता है, तब ऐसी चीजें स्थिति को और असहज बना सकती हैं.
ड्राई फ्रूट्स
ड्राई फ्रूट्स भी आमतौर पर हेल्दी माने जाते हैं, लेकिन जिनमें अतिरिक्त चीनी मिली होती है, उनसे दूरी बनाना बेहतर है. ज्यादा शुगर शरीर में सूजन और मूड स्विंग्स को बढ़ा सकती है, जिससे पीरियड्स के दौरान परेशानी और ज्यादा महसूस हो सकती है.
कौन से फल फायदेमंद?
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि सभी फल नुकसानदायक होते हैं. पके केले, सेब, बेरीज और कीवी जैसे फल इस समय शरीर को राहत देने में मदद करते हैं. ये पाचन को बेहतर रखते हैं, सूजन कम करते हैं और शरीर को जरूरी पोषक तत्व भी देते हैं. &amp;nbsp;सबसे जरूरी बात यह है कि हर महिला का शरीर अलग होता है. जो चीज एक व्यक्ति को नुकसान पहुंचा सकती है, वही दूसरे के लिए फायदेमंद भी हो सकती है. इसलिए अपने शरीर के संकेतों को समझना और उसी के अनुसार डाइट चुनना सबसे सही तरीका है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 08 Apr 2026 01:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>Health Tests In 30s: 30 की उम्र पार करते ही शरीर में पनप सकती हैं ये बीमारियां, भूलकर भी न टालें ये टेस्ट</title>
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        <description><![CDATA[ Why Routine Health Tests Are Important In Your 30s: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में 30 की उम्र आते-आते लोग अपने करियर और जिम्मेदारियों में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि सेहत को अक्सर पीछे छोड़ देते हैं. बाहर से सब कुछ सामान्य लगता है, लेकिन यही वह उम्र होती है जब कई गंभीर बीमारियां चुपचाप शरीर में विकसित होने लगती हैं. एक्सपर्ट का मानना है कि अगर समय रहते नियमित जांच शुरू कर दी जाए, तो इन समस्याओं को शुरुआती चरण में ही पकड़ा जा सकता है.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
&amp;nbsp;30 के बाद शरीर में तमाम तरह की दिक्कतें होने लगती हैं. &amp;nbsp;भारत सरकार के एक सर्वे में पाया गया कि इस उम्र से कई बीमारियां जैसे प्रीडायबिटीज, फैटी लिवर और थायरॉयड असंतुलन बिना किसी स्पष्ट लक्षण के धीरे-धीरे बढ़ती हैं. जब तक इनके संकेत दिखते हैं, तब तक इलाज लंबा और जटिल हो सकता है. इसलिए 30 की उम्र को स्वास्थ्य के लिहाज से बेहद अहम माना जाता है, क्योंकि इसी समय से प्रिवेंशन यानी रोकथाम की शुरुआत सबसे ज्यादा असरदार होती है.&amp;nbsp;
ब्लड टेस्ट को नहीं करना चाहिए नजरअंदाज 
डॉ. अश्वनी कंसल ने TOI को बताया कि खासतौर पर ब्लड टेस्ट को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. फास्टिंग ब्लड शुगर और HbA1c जैसे टेस्ट यह बता सकते हैं कि शरीर में शुगर का स्तर किस दिशा में जा रहा है. HbA1c टेस्ट पिछले तीन महीनों का औसत शुगर लेवल दिखाता है, जिससे डायबिटीज के शुरुआती संकेत आसानी से पकड़े जा सकते हैं. इसी तरह लिपिड प्रोफाइल भी बेहद जरूरी है. यह सिर्फ कोलेस्ट्रॉल नहीं, बल्कि दिल की सेहत से जुड़े कई संकेत देता है. कई बार कुल कोलेस्ट्रॉल सामान्य होने के बावजूद ट्राइग्लिसराइड्स या HDL के असंतुलन से दिल का खतरा बढ़ सकता है.
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फैटी लिवर की दिक्कत
फैटी लिवर एक ऐसी समस्या है जो अब तेजी से बढ़ रही है, यहां तक कि उन लोगों में भी जो शराब नहीं पीते। शुरुआती चरण में इसके कोई खास लक्षण नहीं होते, लेकिन समय के साथ यह गंभीर रूप ले सकता है. एक साधारण अल्ट्रासाउंड से इसका पता लगाया जा सकता है, लेकिन लोग अक्सर इसे नजरअंदाज कर देते हैं. वजन को सिर्फ एक नंबर मानना भी सही नहीं है. BMI के साथ-साथ शरीर में फैट और मसल्स का अनुपात जानना भी जरूरी है. कई बार व्यक्ति बाहर से फिट दिखता है, लेकिन शरीर के अंदर छिपी चर्बी भविष्य में बड़ी बीमारियों का कारण बन सकती है.&amp;nbsp;
इन चीजों की जांच जरूरी
दिल और थायरॉयड से जुड़ी जांच भी समय पर करानी चाहिए. कई बार सूजन या थायरॉयड की समस्या शुरुआती स्तर पर बिना लक्षण के रहती है, लेकिन आगे चलकर यह एनर्जी , मूड और मेटाबॉलिज्म को प्रभावित कर सकती है. इसके अलावा विटामिन डी, बी12 और आयरन की कमी भी आम होती जा रही है, जिसे लोग अक्सर थकान या तनाव समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. नियमित जांच से इन कमियों का समय पर पता लगाया जा सकता है और उन्हें ठीक किया जा सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 08 Apr 2026 01:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>Kidney Health Problems: किडनी पर तनाव के शुरुआती लक्षण जिन्हें लोग अक्सर कर देते हैं नजरअंदाज; समय रहते पहचानें</title>
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        <description><![CDATA[ किडनी हमारे शरीर का वह जरूरी अंग है जो खून को साफ करती है, विषैले पदार्थों को बाहर निकालती है और शरीर में पानी व मिनरल्स का सही संतुलन बनाती है. इतना खास होते हुए भी अगर किडनी में कोई गंभीर समस्या की शुरुआत होती है तो अधिकांश लोगों को शुरुआत में पता ही नहीं चलता. किडनी की समस्या कभी एक रात में अचानक नहीं होती, बल्कि यह धीरे-धीरे बढ़ती है और काफी खतरनाक हो जाती है, जिसे बाद में नजरअंदाज करना भी मुश्किल हो जाता है.
आखिर क्यों किडनी की समस्या समय पर पता नहीं चलती?
किडनी की कार्य क्षमता इस प्रकार की होती है कि वह शरीर की स्थिति के अनुसार खुद को ढाल लेती है. अगर किडनी का थोड़ा हिस्सा काम न भी करे, तो बाकी हिस्सा अपना काम जारी रखता है. इसी वजह से, इसमें थोड़ी समस्या होने पर भी किडनी काम करती रहती है और हमें इन समस्याओं का पता तक नहीं चल पाता. डॉ. श्रीकांत अतलूरी के अनुसार, किडनी की बीमारी कभी अचानक नहीं होती, बल्कि यह धीरे-धीरे नुकसान पहुंचाती है और गंभीर रूप ले लेती है. इसी कारण किडनी की बीमारी को काफी खतरनाक माना जाता है.
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शुरुआती संकेत जिन्हें अक्सर लोग अनदेखा कर देते हैं
जब किडनी की समस्या होती है तो हमारा शरीर हमें संकेत जरूर देता है, लेकिन हम उन्हें पहचान नहीं पाते. डॉ. अतलूरी बताते हैं कि आंखों के नीचे सूजन रहना, रात को बार-बार पेशाब आना, पेशाब में झाग आना या पीला पेशाब होना- ये कुछ ऐसे लक्षण हैं जिन्हें हम अनजाने में अपने दैनिक जीवन में अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं.
लक्षण जब स्पष्ट रूप से दिखने लगते हैं
जब छोटे-छोटे लक्षण गंभीर रूप लेने लगते हैं, तो उन्हें नजरअंदाज करना मुश्किल हो जाता है- जैसे पैरों में सूजन, चेहरे पर सूजन, लगातार उल्टी जैसा महसूस होना, थोड़ी-थोड़ी सांस लेने में तकलीफ होना और लगातार ब्लड प्रेशर बढ़ना, यह वह स्थिति है जिसमें किडनी की कार्य क्षमता काफी प्रभावित हो चुकी होती है. &amp;nbsp;ऐसे में इस समस्या को बिल्कुल भी नजरअंदाज न करें और तुरंत डॉक्टर से मिलें.
किडनी की शुरुआती जांच
किडनी की समस्या अब काफी आम हो गई है और यह बहुत से लोगों के लिए चिंता का कारण बन गई है. इसकी जांच कराना भी बहुत आसान है- जैसे ब्लड टेस्ट से क्रिएटिनिन की जांच और यूरिन टेस्ट से प्रोटीन की जांच कर, हम किडनी में हुए नुकसान का समय रहते पता लगा सकते हैं. इस पर डॉ. अतलूरी कहते हैं कि यह काफी जरूरी है कि हम किडनी की जांच कराएं, क्योंकि समय रहते जांच से हम बीमारी का पता लगा सकते हैं और इसे जल्द से जल्द ठीक कर सकते हैं
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        <pubDate>Mon, 06 Apr 2026 17:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>शराब नहीं पीते फिर भी फैटी लिवर के शिकार, जानें कितनी आम हो गई है यह बीमारी?</title>
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        <description><![CDATA[ आज के समय में फैटी लिवर की समस्या काफी आम हो गई है. पहले इसे केवल उन लोगों में देखा जाता था, जो शराब का अधिक सेवन किया करते थे. हालांकि, आज के समय यह बीमारी उन लोगों में भी देखी जा रही है, जो शराब को हाथ तक नहीं लगाते. आइए इसके बारे में जानते हैं.
क्या होता है फैटी लिवर?
फैटी लिवर एक ऐसी स्थिति है जिसमें लिवर में जरूरत से ज्यादा चर्बी जमा होने लगती है, जब यह चर्बी काफी अधिक मात्रा में बढ़ जाती है, तो इसे फैटी लिवर कहा जाता है. आमतौर पर फैटी लिवर 2 प्रकार का होता है - अल्कोहलिक फैटी लिवर और नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर. जो लोग शराब नहीं पीते, उनको होने वाली इस बीमारी को नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज (NAFLD) कहा जाता है.&amp;nbsp;
डॉक्टरों की मानें तो आज के समय में नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर तेजी से बढ़ रहा है. शहरों में यह समस्या अधिक है. गलत खान-पान, ज्यादा ऑयली खाना, सही से आराम न करना, ज्यादा समय तक एक ही जगह बैठकर काम करना, व्यायाम न करना और खून में ज्यादा फैट होना इसके कुछ प्रमुख कारण हैं. इसके अलावा, अगर आपको डायबिटीज, हाई कोलेस्ट्रॉल या हाई ब्लड प्रेशर जैसी समस्या है, तो इसका जोखिम और भी बढ़ जाता है.
फैटी लिवर की सबसे बड़ी समस्या तो यह है कि शुरुआत में इसके लक्षण इतने दिखाई नहीं देते, कई बार लोगों को काफी लंबे समय तक पता ही नहीं चलता कि उन्हें यह बीमारी है. कई बार इसके लक्षणों में थकान, पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द होना, पेट फूलना, पैरों में सूजन और सांस लेने में तकलीफ जैसी समस्यॉए इसके मुख्य संकेत होते हैं.
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विशेषज्ञों के अनुसार, अगर समय रहते इस समस्या पर ध्यान दिया जाए तो इसे जल्द से जल्द ठीक किया जा सकता है. इसके लिए जरूरी है कि आप अपनी जीवनशैली बदलें, नियमित रूप से एक्सरसाइज (Exercise) करें, संतुलित भोजन लें और जंक फूड से दूरी बनाए रखें. डॉक्टरों की सलाह के अनुसार, रोजाना कम से कम 30 मिनट पैदल चलना बहुत फायदेमंद हो सकता है. इसके अलावा वजन को नियंत्रित रखना और समय- समय पर हेल्थ चेकअप कराना भी जरूरी है, जिससे समस्या बढ़ने से पहले ही आपको बीमारी का पता चल जाए.
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डॉक्टरों &amp;nbsp;का कहना है कि फैटी लिवर को नजरअंदाज करना खतरनाक साबित हो सकता है. अगर यह लंबे समय तक बना रहे, तो यह लिवर सिरोसिस (liver cirrhosis) या लिवर फेलियर (liver failure) जैसी गंभीर बीमारी में भी बदल सकता है,इसलिए अपने शरीर का ध्यान रखें, सही खान-पान, नियमित व्यायाम और स्वस्थ आदतों को अपनाएं और अपने लीवर को स्वस्थ रखें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 06 Apr 2026 17:30:09 +0530</pubDate>
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        <media:keywords>शराब, नहीं, पीते, फिर, भी, फैटी, लिवर, के, शिकार, जानें, कितनी, आम, हो, गई, है, यह, बीमारी</media:keywords>
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        <title>बच्चे के दांत निकल रहे हैं और वह हो गया है चिड़चिड़ा? इन 5 तरीकों से कम करें उसका दर्द</title>
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        <description><![CDATA[  When Do Babies Start Teething: दांत निकलने के दौरान बच्चे अचानक खाने के समय चिड़चिड़े हो जाते हैं. &amp;nbsp;जैसे ही यह बदलाव आता है, माता-पिता घबरा जाते हैं. लेकिन यह समझना जरूरी है कि दांत निकलना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है. लगभग 6 महीने की उम्र से लेकर 3 साल तक के बीच बच्चों के 20 दूध के दांत मसूड़ों से बाहर आते हैं. हर दांत निकलने में करीब डेढ़ हफ्ते का समय लग सकता है. इस दौरान हम प्रक्रिया को रोक नहीं सकते, लेकिन बच्चे की तकलीफ जरूर कम कर सकते हैं.
क्या होता है दांत निकलने का लक्षण?
दांत निकलने के सामान्य लक्षणों में मसूड़ों की सूजन, बार-बार रोना, चिड़चिड़ापन, हर चीज मुंह में डालने की कोशिश, ज्यादा लार आना, चेहरे पर रैश, नींद के पैटर्न में बदलाव और भूख कम होना शामिल हैं. हल्का बुखार हो सकता है, लेकिन तेज बुखार दांत निकलने का संकेत नहीं होता. अगर दिन में तीन-चार बार पतले दस्त हो रहे हैं, तो यह अक्सर मुंह में चीजें डालने से हुए इंफेक्शन का परिणाम हो सकता है.
ऐसे में क्या करें?
अब सवाल आता है कि ऐसे में क्या करें, तो सबसे पहले बच्चे को ठंडी और सुरक्षित चीजें चबाने के लिए दें. ठंडे टीथर, फ्रूट निबलर या घर पर बनाए गए हल्के फ्रूट पॉप्सिकल मसूड़ों को राहत देते हैं. टीथर को 10-15 मिनट फ्रीजर में ठंडा करके दें. ठंडा गीला कपड़ा उंगली पर लपेटकर बच्चे को चबाने दें या साफ गॉज से हल्की मसाज करें. हर चीज को अच्छी तरह साफ और स्टेरिलाइज करना जरूरी है. खाने के समय ठंडी दही-चावल, नरम फल या ऐसे खाद्य पदार्थ दे सकते हैं जिन्हें बच्चा हल्के से चबा सके. इस दौरान भूख कम होना सामान्य है, इसलिए जबरदस्ती खिलाने से बचें. दो हफ्तों से ज्यादा भूख में कमी रहे तो डॉक्टर से सलाह लें. नियमित समय पर उम्र के अनुसार भोजन देते रहें और जरूरत हो तो थोड़ा अतिरिक्त दूध और तरल दें.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स में पब्लिश एक रिसर्च स्टडी जिसमें 19,422 दिनों तक बच्चों के लक्षणों को दर्ज किया गया और 475 बार दांत निकलने की घटनाओं का एनालिसिस किया गया. इसमें पाया गया कि दांत निकलने से जुड़े लक्षण केवल एक सीमित 8 दिनों की अवधि में ज्यादा दिखते हैं, चार दिन पहले, जिस दिन दांत निकलता है और उसके तीन दिन बाद तक. दिलचस्प बात यह रही कि कोई भी एक लक्षण इतना आम नहीं था कि उससे पक्का कहा जा सके कि दांत निकलने वाला है. रिसर्चर ने साफ कहा कि हल्के लक्षण दांत निकलने के दौरान हो सकते हैं, लेकिन अगर बच्चा तेज बुखार या गंभीर परेशानी में है, तो उसे सिर्फ टीथिंग मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.
इसे भी पढ़ें- Flour Storage: ऐसे करेंगे स्टोर तो ज्यादा दिन तक फ्रेश रहेगा आटा, जानें कमाल के टिप्स
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 06 Apr 2026 17:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>Protein Rich Rice: क्या चावल खाने से डरते हैं? CSIR की नई खोज से बदलेगी आपकी थाली, आयरन&amp;विटामिन की नहीं होगी कमी</title>
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        <description><![CDATA[ Benefits Of Protein And Micronutrient Rich Rice: सफेद पॉलिश्ड चावल, जो लगभग हर भारतीय घर की थाली का हिस्सा है, अब हेल्थ के लिहाज से एक नया रूप लेने जा रहा है. साइंटिस्ट ने ऐसा डिजाइनर राइस तैयार किया है, जो न केवल ज्यादा प्रोटीन और जरूरी सूक्ष्म पोषक तत्वों से भरपूर है, बल्कि इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स भी कम है. यानी यह सामान्य चावल की तुलना में ब्लड शुगर को धीरे बढ़ाएगा, जो डायबिटीज के मरीजों और वजन कंट्रोल रखने वालों के लिए फायदेमंद हो सकता है.
बीमारियों को कम करने की दिशा में कदम
यह खास चावल काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च के तहत काम करने वाले नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर इंटरडिसिप्लिनरी साइंस एंड टेक्नोलॉजी ने विकसित किया है. संस्थान के मुताबिक, इस चावल में आयरन, फोलिक एसिड और विटामिन B12 जैसे जरूरी पोषक तत्व भी मिलाए गए हैं. भारत में एनीमिया और विटामिन की कमी एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या है, ऐसे में यह पहल पोषण सुरक्षा की दिशा में अहम कदम मानी जा रही है.
किन लोगों के लिए उपयोगी है चावल?
कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाला यह चावल खास तौर पर उन लोगों के लिए उपयोगी हो सकता है, जिन्हें बार-बार भूख लगती है या जिनका ब्लड शुगर तेजी से बढ़ता-घटता है. हाई प्रोटीन सामग्री मांसपेशियों की मजबूती, ऊर्जा और लंबे समय तक पेट भरे रहने की भावना में मदद कर सकती है, एक्सपर्ट का मानना है कि अगर रोजमर्रा के मुख्य खाद्य पदार्थ को ही पोषक बना दिया जाए, तो कुपोषण और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों से लड़ाई आसान हो सकती है.
क्या है लक्ष्य?
पीटीआई की रिपोर्ट में बताया गया है कि इस तकनीक को टाटा कंज्यूमर प्रोडक्ट्स लिमिटेड और तमिलनाडु की एसएस सोल फूड्स को लाइसेंस किया जाएगा. CSIR&amp;ndash;NIIST के निदेशक डॉ. सी. आनंदहरामकृष्णन को इस नए खोज के लिए टाटा ट्रांसफॉर्मेशन प्राइज 2024 भी मिला है. उनका कहना है कि लक्ष्य ऐसा मुख्य खाद्य विकसित करना है, जो स्वाद और परंपरा से समझौता किए बिना पोषण स्तर को बेहतर बनाए.
संस्थान ने इस तकनीक को उद्योग जगत को सौंपने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है, ताकि यह उत्पाद आम उपभोक्ताओं तक पहुंच सके. इसके अलावा, पोषण और स्वास्थ्य से जुड़े अन्य नए खोज भी सामने आए हैं. इनमें कम सोडियम वाला नमक शामिल है, जो स्वाद बनाए रखते हुए सोडियम की मात्रा 86 प्रतिशत तक घटाने में सक्षम है. यह हाई ब्लड प्रेशर और हृदय रोग के जोखिम को कम करने में मददगार हो सकता है. फल और सब्जियों को पोषक तत्वों सहित लंबे समय तक सुरक्षित रखने वाली तकनीकें भी विकसित की गई हैं, जिससे उनकी शेल्फ लाइफ बढ़े और पोषण बना रहे.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 06 Apr 2026 17:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>First Time Intimacy Mistakes: पहली बार बनाने जा रहे फिजिकल रिलेशन तो न करें ये गलतियां, वरना तबाह हो जाएगी जिंदगी</title>
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        <description><![CDATA[ Common Mistakes During First Intimacy: पहली बार फिजिकल रिलेशन बनाने का अनुभव फिल्मों और सोशल मीडिया की तरह हमेशा परफेक्ट या बेहद रोमांटिक नहीं होता. असल जिंदगी में यह पल कई तरह की भावनाओं के साथ आता है जिसमें उत्साह, घबराहट, दबाव और अनिश्चितता शामिल होती है. इसलिए जरूरी है कि इस फैसले से पहले दोनों लोग मानसिक रूप से तैयार हों और सही जानकारी रखें. Psychologytoday&amp;nbsp; की रिपोर्ट के अनुसार, समझदारी और खुली बातचीत इस अनुभव को बेहतर बना सकती है. चलिए आपको वे आम गलतियां बताते हैं, जो अक्सर लोग पहली बार फिजिकल रिलेशन बनाते समय कर बैठते हैं.
बातचीत न करना&amp;nbsp;
सबसे बड़ी गलती है पहले से बातचीत न करना. अगर आप किसी के साथ रिश्ते में हैं और आगे बढ़ने के बारे में सोच रहे हैं, तो इस विषय पर खुलकर बात करना जरूरी है. एक-दूसरे की उम्मीदें, डर, सीमाएं और पसंद-नापसंद जानना बेहद अहम है. जब दोनों को पता होता है कि सामने वाला क्या सोचता है, तो भरोसा मजबूत होता है और गलतफहमियां कम होती हैं.&amp;nbsp;
सुरक्षा के उपाय
दूसरी बड़ी गलती है सुरक्षा को नजरअंदाज करना. कई लोग उस पल के उत्साह में सुरक्षा उपायों की अहमियत को कम आंकते हैं. लेकिन अनचाही गर्भावस्था और यौन संचारित इंफेक्शन से बचाव के लिए सुरक्षा बेहद जरूरी है. पहली बार लापरवाही आगे भी आदत बन सकती है, जिसका नतीजा गंभीर हो सकता है. इसलिए यह जरूरी है कि फिजिकल रिलेशन बनाने से पहले आप चीजों को ध्यान से समझ लें.
इन चीजों की भी न करें गलती
अहम बात है सहमति को सही तरह से समझना. सहमति का मतलब सिर्फ हां कहना नहीं, बल्कि दोनों का सहज और सुरक्षित महसूस करना है. अगर किसी एक को भी डर, दबाव या असहजता महसूस हो रही है, तो यह सही स्थिति नहीं है. बिना स्पष्ट और स्वेच्छा से दी गई सहमति के कोई भी कदम आगे नहीं बढ़ाना चाहिए. अगर इसको सरल शब्दों में कहें, तो बिना अपने पार्टनर के मेंटल सहमित के उसके साथ जबरदस्ती न करें और न ही ऐसा दिखाएं कि आप उससे इस फैसले के लिए नाराज हैं. &amp;nbsp;फिजिकल रिलेशन बेहद निजी और भावनात्मक अनुभव होता है, जिसे कोई भी तभी अपनाए जब वह पूरी तरह तैयार हो. किसी को मनाने, मजबूर करने या भावनात्मक दबाव डालने से स्थिति बिगड़ सकती है और रिश्ते में दरार आ सकती है
इस बात का रखें ध्यान
इसके बाद जो सबसे बड़ी गलती है वह है फिजिकल रिलेशन बनाने के बाद &amp;nbsp;शेखी बघारना या दूसरों को बताना. यह अनुभव आप दोनों के बीच का निजी पल है. बिना साथी की अनुमति इसके बारे में चर्चा करना भरोसे को तोड़ सकता है. इसलिए जरूरी है कि आपसी सहमति से ही तय करें कि इस बारे में किसे बताना है और किसे नहीं. क्योंकि कभी-कभी आपकी एक बात आपके रिश्ते पर भारी पड़ सकती है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Mon, 06 Apr 2026 17:30:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Menopause Bloating Causes: पानी नहीं, ये है मेनोपॉज में ब्लोटिंग की असली वजह; गाइनेकोलॉजिस्ट से जानें आसान उपाय</title>
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        <description><![CDATA[ Menopause bloating causes : मेनोपॉज के दौरान कई महिलाओं को शरीर में सूजन, फूला हुआ महसूस होना और भारीपन जैसी समस्याएं होने लगती हैं. अक्सर महिलाएं सोचती हैं कि यह बहुत पानी पीने की वजह से हो रहा है, लेकिन विशेषज्ञों की मानें तो यह गलत है. असल में मेनोपॉज के समय शरीर में पानी रोकने की समस्या हार्मोनल और मिनरल बदलावों की वजह से होती है, पानी ज्यादा पीने की वजह से नहीं, डाइटिशियन के अनुसार, मेनोपॉज में पानी रोकना बहुत पानी पीने की समस्या नहीं है, बल्कि यह शरीर के संतुलन का मामला है. तो आइए जानते हैं कि मेनोपॉज में ब्लोटिंग की असली वजह क्या है और इसे कम करने के आसान उपाय क्या है.&amp;nbsp;
मेनोपॉज में ब्लोटिंग की असली वजह क्या है?
मेनोपॉज में ब्लोटिंग मुख्य रूप से हार्मोन और मिनरल संतुलन में बदलाव की वजह से होती है. जैसे-जैसे ईस्ट्रोजन घटता है, यह किडनी और रीनिन-एंजियोटेंसिन सिस्टम को प्रभावित करता है, जिससे शरीर अस्थायी रूप से पानी रोक सकता है. वहीं, प्रोजेस्टेरोन, जिसका हल्का डाइयूरेटिक प्रभाव होता है, कम होने पर सूजन और भारीपन बढ़ा सकता है. इसके अलावा, सोडियम की अधिकता शरीर को पानी रोकने के लिए मजबूर करती है, जबकि पोटैशियम और मैग्नीशियम का सही संतुलन कोशिकाओं में पानी बनाए रखने, किडनी को मदद देने और मांसपेशियों को आराम देने में सहायक होता है. मेनोपॉज के दौरान डाइट, तनाव और मेटाबॉलिक बदलाव इन मिनरल्स के संतुलन को बिगाड़ सकते हैं, जिससे ब्लोटिंग और फूलेपन की समस्या और बढ़ जाती है.&amp;nbsp;
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ब्लोटिंग कम करने के आसान &amp;nbsp;उपाय&amp;nbsp;
1. हाइड्रेशन - पर्याप्त पानी पीना शरीर को बताता है कि इसे पानी रोकने की जरूरत नहीं है. दिनभर नियमित रूप से पानी पीना, कम पानी पीने से बेहतर है.&amp;nbsp;
2. पोटैशियम से भरपूर डाइट - केले, नारियल पानी, पालक, और दालें खाने से सोडियम के कारण पानी रोकने की समस्या कम होती है.&amp;nbsp;
3. मैग्नीशियम से भरपूर डाइट - नट्स, बीज, साबुत अनाज और हरी पत्तेदार सब्जियां मांसपेशियों को आराम देती हैं, सूजन घटाती हैं और इलेक्ट्रोलाइट संतुलन बनाए रखती हैं.&amp;nbsp;
4. सोडियम कम करना, पूरी तरह नहीं - घर में बना हुआ खाना पूरी तरह बिना नमक का करना जरूरी नहीं है. प्रोसेस्ड और पैक्ड फूड्स जो सोडियम से भरपूर होते हैं, उन्हें कम करना ज्यादा असरदार होता है.&amp;nbsp;
5. फिजिकल एक्टिविटी - नियमित वॉकिंग और स्ट्रेंथ ट्रेनिंग से ब्लोटिंग कम होती है और शरीर में सर्कुलेशन बेहतर होता है.&amp;nbsp;
6. स्ट्रेस और नींद - अच्छी नींद और तनाव प्रबंधन भी पानी रोकने की समस्या को कम करने में मदद करता है.
कब लेनी चाहिए डॉक्टर की सलाह?
&amp;nbsp;माइल्ड ब्लोटिंग या हल्की सूजन आम है, लेकिन अगर यह लगातार बनी रहे या बढ़ जाए, तो डॉक्टर से मिलना जरूरी है. जैसे अचानक या दर्द वाली सूजन, सिर्फ एक अंग में सूजन या सांस लेने में दिक्कत, तेज वजन बढ़ना या थकान &amp;nbsp;ऐसी स्थिति में पानी रोकना किसी अन्य समस्या जैसे थायरॉइड, किडनी, दिल की बीमारी या दवा के साइड इफेक्ट का संकेत हो सकता है. अगर सूजन लगातार बनी रहे या अन्य लक्षणों के साथ हो, तो ब्लड टेस्ट और हार्ट या किडनी की जांच जरूर कराएं.&amp;nbsp;
इसे भी पढ़ें- &amp;nbsp;Health Checkup Routine : कितने समय में कराना चाहिए हेल्थ चेक-अप? डॉक्टरों ने उम्र के हिसाब से बताया पूरा प्लान
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 05 Apr 2026 13:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Insulin Resistance Liver Damage: आपके लिवर को भी &amp;apos;पत्थर&amp;apos; बना रही डायबिटीज, हर 4 में से एक मरीज को है फाइब्रोसिस का खतरा</title>
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        <description><![CDATA[ One In Four Diabetics Have Liver Fibrosis Study: भारत में डायबिटीज को अब सिर्फ ब्लड शुगर तक सीमित बीमारी मानना गलत साबित हो रहा है. 2026 की एक मल्टीसेंटर स्टडी, DiaFib-Liver Study ने इस धारणा को चुनौती दी है. स्टडी में सामने आया कि देश में टाइप-2 डायबिटीज से जूझ रहे हर चार में से एक एडल्ट में लीवर फाइब्रोसिस यानी लीवर पर गंभीर स्कारिंग मौजूद है. इतना ही नहीं, हर 20 में से एक मरीज में सिरोसिस का खतरा भी पाया गया है.
क्या निकला स्टडी में?
यह स्टडी बताती है कि डायबिटीज अब सिर्फ आंख, किडनी और नसों तक सीमित नहीं रही, बल्कि लीवर की बीमारी को भी इसकी चौथी बड़ी दिक्कत के रूप में देखा जाना चाहिए. रिसर्च में खासतौर पर मेटाबोलिक डिसफंक्शन-एसोसिएटेड स्टीटोटिक लिवर डिजीज पर फोकस किया गया है, जिसे पहले फैटी लिवर के नाम से जाना जाता था. MASLD की समस्या तब शुरू होती है जब शरीर में इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ता है और अतिरिक्त फैट लीवर में जमा होने लगता है. धीरे-धीरे यही फैट सूजन पैदा करता है और आगे चलकर फाइब्रोसिस का रूप ले लेता है, जिसमें लीवर के स्वस्थ टिश्यू की जगह स्कार टिश्यू बनने लगता है.&amp;nbsp;
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
डॉ. कपिल शर्मा ने TOI को बताया कि टाइप-2 डायबिटीज में शरीर में फैट और ग्लूकोज का असंतुलन लीवर को भी प्रभावित करता है. आंकड़ों के अनुसार, करीब 70 प्रतिशत डायबिटीज मरीजों के लीवर में फैट जमा हो जाता है, जो समय के साथ सूजन और फाइब्रोसिस में बदल सकता है. डॉक्टर बताते हैं कि इस बीमारी के कई रिस्क फैक्टर हैं, जैसे मोटापा, खराब शुगर कंट्रोल, हाई ट्राइग्लिसराइड्स और मेटाबोलिक सिंड्रोम. खास बात यह है कि कई मामलों में लीवर की बीमारी बिना किसी स्पष्ट लक्षण के बढ़ती रहती है, जिससे खतरा और बढ़ जाता है.
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सिर्फ फैट जमा होना उतना खतरनाक नहीं
रिसर्च में यह भी जोर दिया गया है कि सिर्फ फैट जमा होना उतना खतरनाक नहीं होता, जितना कि फाइब्रोसिस. क्योंकि फाइब्रोसिस यह संकेत देता है कि बीमारी गंभीर स्तर पर पहुंच चुकी है और आगे चलकर सिरोसिस, लीवर फेलियर और यहां तक कि मौत का जोखिम भी बढ़ सकता है. इसीलिए एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि डायबिटीज मरीजों में सिर्फ फैटी लिवर की जांच ही नहीं, बल्कि फाइब्रोसिस की पहचान पर ज्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए. इसके लिए नियमित जांच जैसे लिवर एंजाइम टेस्ट और फाइब्रोस्कैन कराना जरूरी है, ताकि बीमारी को शुरुआती चरण में ही पकड़ा जा सके.
क्या है बचाव का तरीका?
बचाव के लिए डॉक्टर वजन नियंत्रित रखने, संतुलित आहार लेने, नियमित एक्सरसाइज करने और रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट व शराब से दूरी बनाने की सलाह देते हैं. इसके साथ ही, ब्लड शुगर, कोलेस्ट्रॉल और ब्लड प्रेशर को कंट्रोल में रखना भी जरूरी है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 05 Apr 2026 13:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Health Checkup Routine : कितने समय में कराना चाहिए हेल्थ चेक&amp;अप? डॉक्टरों ने उम्र के हिसाब से बताया पूरा प्लान</title>
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        <description><![CDATA[ Health Checkup Routine : आज के समय में लोग अपनी सेहत को लेकर पहले से ज्यादा जागरूक हो गए हैं. जिम जाना, हेल्दी खाना, योग करना ये सब अब आम बात हो गई है, लेकिन एक जरूरी सवाल अब भी लोगों के मन में रहता है कि हेल्थ चेक-अप कितनी बार कराना चाहिए. कई लोग सोचते हैं कि साल में एक बार ब्लड टेस्ट करा लेना ही काफी है, लेकिन सच्चाई इससे कहीं ज्यादा अलग है. डॉक्टरों के अनुसार, हेल्थ चेक-अप हर व्यक्ति के लिए अलग होता है. यह आपकी उम्र, लाइफस्टाइल, बीमारी का इतिहास और परिवार की मेडिकल हिस्ट्री पर निर्भर करता है. इसलिए जरूरी है कि हम अपनी जरूरत के हिसाब से हेल्थ चेक-अप का सही समय और तरीका समझें. ऐसे में आइए जानते हैं कि हेल्थ चेक-अप कितने समय में कराना चाहिए.&amp;nbsp;
हेल्थ चेक-अप क्यों जरूरी है?
अक्सर लोग तभी डॉक्टर के पास जाते हैं जब उन्हें कोई समस्या होती है, लेकिन कई बीमारियां ऐसी होती हैं जो शुरू में कोई लक्षण नहीं दिखातीं है. रेगुलर चेक-अप से आप बीमारी को शुरुआत में ही पकड़ सकते हैं. गंभीर समस्याओं से बच सकते हैं. अपने शरीर की सही स्थिति जान सकते हैं और भविष्य के जोखिम को कम कर सकते हैं.&amp;nbsp;
क्या सिर्फ ब्लड टेस्ट ही काफी है?
बहुत से लोग मानते हैं कि ब्लड टेस्ट ही पूरा हेल्थ चेक-अप है, लेकिन यह पूरी तरह सही नहीं है. एक कंप्लीट हेल्थ चेक-अप में ब्लड टेस्ट, एक्स-रे और अल्ट्रासाउंड, ECG, इको, कैंसर स्क्रीनिंग, महिलाओं के लिए मैमोग्राम, हड्डियों की जांच शामिल हो सकते हैं. ये सभी टेस्ट शरीर के अंदर छिपी समस्याओं को समय रहते पकड़ने में मदद करते हैं.&amp;nbsp;
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हेल्थ चेक-अप कितने समय में कराना चाहिए
अगर आप फिट हैं, कोई बीमारी नहीं है और अच्छी लाइफस्टाइल फॉलो करते हैं, तो &amp;nbsp;साल में 1 बार पूरा हेल्थ चेक-अप काफी होता है. वहीं अगर आपके परिवार में दिल की बीमारी, डायबिटीज या अन्य गंभीर बीमारी हैं, तो साल में 2 बार चेक-अप कराना बेहतर है, साथ में खास टेस्ट भी कराए जाते हैं. &amp;nbsp;इसके अलावा अगर आपको पहले से डायबिटीज या कोई पुरानी बीमारी है, तो &amp;nbsp;साल में 2 बार पूरा चेक-अप जरूर कराना चाहिए, साथ ही हर 3 महीने में HbA1c टेस्ट कराएं. वहीं अगर आपका वजन ज्यादा है या लाइफस्टाइल ठीक नहीं है, तो आपको अतिरिक्त जांच की जरूरत हो सकती है. जैसे लिवर टेस्ट या फैटी लिवर की जांच. बुजुर्गों के लिए ज्यादा सावधानी जरूरी है. इसके लिए साल में कम से कम 2 बार हेल्थ चेक-अप कराना चाहिए.&amp;nbsp;
बच्चों के लिए हेल्थ चेक-अप प्लान
बच्चों के लिए हेल्थ चेक-अप का प्लान उनकी उम्र के हिसाब से अलग होता है. जैसे छोटे बेबी को हर 1 से 3 महीने में डॉक्टर के पास दिखाना चाहिए. &amp;nbsp;ताकि &amp;nbsp;वेकसीनेशन समय पर हो और उनकी ग्रोथ सही हो रही है या नहीं, यह देखा जा सके. वहीं 1 से 5 साल के बच्चों यानी टॉडलर्स को हर 3 से 6 महीने में चेक-अप कराने की जरूरत होती है, जिससे उनकी लंबाई-ऊंचाई, वजन, पोषण और सामान्य ग्रोथ की निगरानी की जा सके, इसके अलावा 6 से 12 साल के स्कूल जाने वाले बच्चों के लिए अगर बच्चा हेल्दी है तो साल में एक बार चेक-अप काफी होता है. वहीं टीनेज के लिए भी साल में एक बार चेक-अप जरूरी है, जिसमें उनकी खान-पान की आदतें, मानसिक स्वास्थ्य और लाइफस्टाइल पर ध्यान दिया जाता है जिससे हेल्दी लाइफस्टाइल बनी रहे और किसी भी समस्या को समय रहते पहचाना जा सके.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 05 Apr 2026 01:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Varun Dhawan Daughter DDH Disease: किस बीमारी से जूझ रही है वरुण धवन की बेटी, जानें इसके लक्षण और यह कितनी खतरनाक?</title>
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        <description><![CDATA[ Varun Dhawan Daughter DDH Disease: बॉलीवुड के फेमस एक्टर वरुण धवन ने हाल ही में अपनी बेटी की एक स्वास्थ्य समस्या के बारे में जानकारी दी. उन्होंने बताया कि उनकी बेटी को हिप डिस्प्लेसिया यानी डिवेलपमेंटल डिस्प्लेसिया ऑफ द हिप (DDH) है. यह खबर सुनते ही लोगों में इस बीमारी के बारे में जानने की इच्छा बढ़ गई.
यह समस्या बहुत आम नहीं मानी जाती, लेकिन यह बच्चों में होने वाली हिप जॉइंट (hip joint) की एक गंभीर समस्या है. अगर समय पर इसका इलाज नहीं किया गया, तो यह बच्चे की चलने-फिरने की क्षमता पर असर डाल सकती है और भविष्य में दर्द, चलने में परेशानी या जल्दी गठिया (arthritis) जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं. ऐसे में आइए जानते हैं कि DDH क्या है, इसके लक्षण, कारण और इलाज कैसे किया जाता है. यह कितनी खतरनाक है.&amp;nbsp;
DDH क्या है?
डिवेलपमेंटल डिस्प्लेसिया ऑफ द हिप (DDH) एक ऐसी स्थिति है जिसमें बच्चे की हिप जॉइंट सही तरीके से विकसित नहीं होती है. सामान्य स्थिति में, जांघ की हड्डी का ऊपर वाला हिस्सा हिप सॉकेट में मजबूती से फिट होता है. DDH में यह फिटिंग ढीली, अस्थिर या कभी-कभी पूरी तरह से डिस्लोकेट (dislocated) हो जाती है. यह समस्या जन्म के समय हमेशा दिखती नहीं है, इसलिए बेबी की समय पर स्क्रीनिंग बहुत जरूरी है. अगर समय पर इलाज किया जाए तो बच्चे नॉर्मल लाइफ जी सकते हैं और चलने-फिरने में कोई दिक्कत नहीं होती है.&amp;nbsp;
यह बीमारी कितनी आम है?
दुनियाभर में करीब 0.5 प्रतिशत से 1.5 प्रतिशत बच्चों को यह समस्या होती है. कुछ मामलों में हल्की अस्थिरता अपने आप ठीक हो जाती है, जबकि कुछ बच्चों को इलाज की जरूरत पड़ती है. भारत में हर 1000 बच्चों में 0 से 2.6 मामलों की संभावना होती है. यह आंकड़ा सही से पता नहीं होता, क्योंकि हल्के मामलों में यह अनदेखी हो जाती है. इस बीमारी से लड़कियां, पहली बार जन्मे बच्चे, ब्रीच पोजीशन में जन्मे बच्चे या परिवार में किसी को DDH का इतिहास वाले लोग ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं. भारत में ज्यादातर बच्चे 1 या 2 साल की उम्र में ही डायग्नोस होते हैं, जो सही उम्र से काफी लेट है. इसलिए न्यू बोर्न बेबी की समय पर स्क्रीनिंग बहुत जरूरी है ताकि समस्या का सही समय पर पता चल सके और इलाज शुरू हो सके.&amp;nbsp;
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इसके लक्षण और यह कितनी खतरनाक?
न्यू बोर्न बेबी में अक्सर नियमित चेकअप के दौरान डॉक्टर इस समस्या को पहचान लेते हैं. बच्चे के पेरेंट्स अक्सर शुरू में कोई संकेत नहीं देखते है. थोड़े बड़े बच्चों में पैरों की लंबाई असमान होना, एक पैर का सीमित हिलना या घुटनों के मुड़ने में दिक्कत और जांघ के झुर्री (thigh folds) में असमानता दिखाई दे सकते हैं. देर से पता चलने वाले मामलों में बच्चे देर से चलना शुरू करते हैं, लंपिंग करते हैं, असामान्य चाल रखते हैं या एक पैर छोटा दिख सकता है.&amp;nbsp;
DDH का इलाज
DDH का इलाज संभव है और यह अक्सर पूरी तरह ठीक हो जाता है, खासकर अगर समय पर पहचान हो. न्यू बोर्न बेबी का इलाज सॉफ्ट ब्रेस का यूज करके हिप को सही जगह पर रखा जाता है ताकि हिप सामान्य रूप से विकसित हो. वहीं 6 महीने से 2 साल के बच्चे का इलाज क्लोज्ड रिडक्शन (closed reduction) से किया जाता है, यानी बिना ऑपरेशन के हिप को सही जगह पर लाया जाता है. इसके बाद कास्ट में रखा जाता है. 2 साल से बड़े बच्चों में सर्जरी की जरूरत हो सकती है, जिसमें हिप को सही स्थिति में लाया जाता है. अगर समय पर इलाज किया जाए तो ज्यादातर बच्चों को सर्जरी की जरूरत नहीं पड़ती है.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <title>Weight Loss Tips : क्या आप पर भी सवार है वजन घटाने की धुन, जानें किन चीजों की हो जाती है कमी?</title>
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        <description><![CDATA[ Weight Loss Tips : क्या आप पर भी सवार है वजन घटाने की धुन, जानें किन चीजों की हो जाती है कमी? ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 05 Apr 2026 01:30:09 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Nose Bleeding: गर्मियां शुरू होते ही नाक से निकलने लगता है खून, जानें कब नॉर्मल और कब है टेंशन लेने की जरूरत?</title>
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        <description><![CDATA[ Nose Bleeding: मार्च और अप्रैल का सुहाना समय खत्म होते ही तेज गर्मी कभी भी दस्तक दे सकती है. ऐसे में यह बात अभी से लोगों को परेशान करने लगी है. इस मौसम के आते ही सेहत को कई तरह की समस्याएं होने लगती हैं. कई लोगों को नाक से खून आने की भी परेशानी होती है. यह समस्या खासकर तब बढ़ जाती है, जब तापमान तेजी से बढ़ने लगता है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि नाक से खून आना सिर्फ गर्मी का असर नहीं, बल्कि गंभीर बीमारी का संकेत भी हो सकता है?
इसके पीछे क्या कारण है?
नाक के अंदर की त्वचा बहुत पतली और संवेदनशील (Sensitive) होती है. इसमें छोटे-छोटे रक्त वाहिकाएं (vessels) होती हैं, जो सूखने पर कभी भी फट सकती हैं. इसके सूखने के पीछे गर्म हवाएं और कम नमी को कारण माना जाता है, जो त्वचा को बहुत खुष्क बना देता है. जोर से खांसने या छींकने पर ये नसें फट सकती हैं, जिससे खून आ सकता है. इसके अलावा एलर्जी, साइनस या अंदर लगी चोट भी इसका कारण हो सकती है. कुछ लोगों में हाई ब्लड प्रेशर या बिना डॉक्टर की सलाह के ली गई दवाएं भी नाक से खून आने की वजह बन सकती हैं
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नाक से खून आने पर क्या करें

सिर को थोड़ा ऊपर की ओर रखें, ताकि खून गले में न जाए.
नाक को हल्के से दबाकर रखें, इससे खून रुकने में मदद मिलती है.
नाक या गर्दन पर ठंडा पानी या कपड़ा रखें, इससे खून धीरे-धीरे रुक सकता है.
कमरे की हवा में नमी बनाए रखें, ताकि नाक अंदर से ज्यादा न सूखे.
अगर यह समस्या बार-बार हो या ज्यादा खून आए, तो डॉक्टर को जरूर दिखाएं.

नाक से खून आने पर &amp;nbsp;डॉक्टर को कब दिखाएं

अगर खून 30 मिनट से ज्यादा समय तक बंद न हो या बहुत ज्यादा बह रहा हो.
अगर खून गले तक आने लगे या निगलने जैसा लगे.
अगर नाक या सिर में चोट लगने के बाद खून आ रहा हो.
अगर बार-बार नाक से खून आता हो (हफ्ते में दो बार से ज्यादा).
अगर आप कोई दवा ले रहे हों या परिवार में पहले भी यह समस्या रही हो.

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&amp;nbsp; ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 05 Apr 2026 01:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Harish Rana Organ Donation: इच्छामृत्यु से पहले हरीश राणा ने दान किए हार्ट वॉल्व और कॉर्निया, इन्हें कैसे किया गया ट्रांसप्लांट?</title>
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        <description><![CDATA[ 
Harish Rana Organ Donation: 31 वर्षीय हरीश राणा की इच्छा मृत्यु के बाद एक ऐसी खबर सामने आई है, जिसने अंगदान के महत्व को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है. दरअसल, एम्स दिल्ली के डॉक्टरों ने पुष्टि की है कि उनके कॉर्निया और हार्ट वॉल्व सफलतापूर्वक निकालकर ट्रांसप्लांट के लिए सुरक्षित कर लिए गए हैं. यह फैसला उनके माता-पिता की इच्छा के अनुसार लिया गया था कि उनकी बेटे की जिंदगी दूसरों के लिए उम्मीद बन सके.
डॉक्टरों के अनुसार, कॉर्निया ट्रांसप्लांट से जहां किसी व्यक्ति की रोशनी लौटाई जा सकेगी. वहीं हार्ट वॉल्व से उन मरीजों को नया जीवन दे सकता है, जिन्हें हार्ट सर्जरी की जरूरत है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि कई बार पूरा अंग उपयोग में नहीं आ पाता, लेकिन उसके हिस्से भी दूसरों के जीवन को बचाने में बहुत जरूरी भूमिका निभाते हैं. ये भी पढ़ें-40 की उम्र में डाइट बदलना क्यों जरूरी है? जानिए दिमाग को हेल्दी रखने का राज
क्या होता है हार्ट वॉल्व रिट्रीवल?डॉक्टरों के अनुसार, हार्ड वॉल्व रिट्रीवल एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें ब्रेन डेड घोषित व्यक्ति के दिल से वॉल्व निकाले जाते हैं. यह प्रक्रिया तभी संभव होती है, जब दिल पूरी तरह ट्रांसप्लांट के लिए उपयुक्त न हो. उन्होंने बताया कि डोनर को ऑपरेशन थिएटर में ले जाकर दिल या उसके जरूरी हिस्से को सावधानी से निकाला जाता है. दिल की पंपिंग क्षमता भले ही पूरी तरह उपयोगी न हो, लेकिन उसके वाॅल्व को सुरक्षित करके दूसरे मरीजों के इलाज में इस्तेमाल किया जा सकता है. कैसे सुरक्षित रखे जाते हैं हार्ट वॉल्व?एक्सपर्ट्स के अनुसार, अगर तुरंत ट्रांसप्लांट संभव न हो तो वॉल्व को -180 डिग्री सेल्सियस तापमान पर क्रायोप्रिजर्वेशन तकनीक के जरिए सुरक्षित रखा जाता है. इस तरह यह वॉल्व करीब 5 साल तक उपयोग के लिए सुरक्षित रह सकते हैं. कैसी होती है ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया?दिल से निकाले गए वॉल्व को संस्थान के वाॅल्व बैंक में ले जाया जाता है. जहां एक्सपर्ट्स 10 से 15 मिनट में एओर्टिक और पल्मोनरी वाॅल्व को अलग करते हैं. इसके बाद उन्हें विशेष तरीके से तैयार किया जाता है, ताकि दूसरे मरीज में ट्रांसप्लांट किया जा सके. इन वॉल्व का इस्तेमाल खासतौर पर गंभीर सर्जरी, संक्रमण वाले मामलों और बच्चों के इलाज में किया जाता है. खास बात यह है कि बड़े व्यक्ति के वाॅल्व को छोटा करके बच्चों के शरीर के अनुसार ढाला जा सकता है. कॉर्निया ट्रांसप्लांट कैसे करता है मदद?डॉक्टरों का कहना है की ब्रेन डेड व्यक्ति आंख दान करने के लिए उपयुक्त होते हैं. क्योंकि कॉर्निया कुछ समय तक बिना ब्लड सर्कुलेशन के भी सुरक्षित रहता है. ऐसे में समय रहते इसे निकाल कर दूसरे मरीज में ट्रांसप्लांट किया जा सकता है. जिससे उसकी आंखों की रोशनी वापस लाई जा सकती है. एम्स के डॉक्टरों के अनुसार हर महीने तीन से चार ऐसे केस सामने आते हैं जहां हार्ट वाॅल्व रिट्रीवल और ट्रांसप्लांट किया जाता है. यह संख्या भले ही कम हो, लेकिन इससे यह साफ होता है कि अंगदान कितनी बड़ी संख्या में लोगों को नया जीवन दे सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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        <pubDate>Sun, 05 Apr 2026 01:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Thymus Gland Health: इस छोटे&amp;से अंग की वजह से लंबी होती है आपकी उम्र, यह खुलासा उड़ा देगा आपके होश</title>
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        <description><![CDATA[ How Thymus Health Affects Lifespan: क्या आपके सीने का एक छोटा सा अंग आपकी लंबी उम्र और गंभीर बीमारियों के खतरे का संकेत दे सकता है? हाल ही में सामने आई एक नई स्टडी ने इसी ओर इशारा किया है. साइंस जर्नल नेचर में प्रकाशित इस शोध के मुताबिक, थाइमस &amp;nbsp;नाम का अंग हमारे इम्यून सिस्टम और लंबे समय तक स्वस्थ रहने में अहम भूमिका निभाता है. रिसर्च में बताया गया है कि थाइमस की सेहत सीधे तौर पर हार्ट डिजीज और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के खतरे से जुड़ी हो सकती है. साइंटिस्ट का कहना है कि यह अंग अब सिर्फ एक सामान्य ग्लैंड्स नहीं, बल्कि उम्र बढ़ने और बीमारियों की संभावना को कंट्रोल करने वाला एक महत्वपूर्ण कारक बनकर उभर रहा है.
क्या है थाइमस?
थाइमस एक छोटी, दो भागों वाली ग्रंथि होती है, जो फेफड़ों के बीच ऊपरी छाती में स्थित होती है. इसका मुख्य काम टी-लिम्फोसाइट्स नामक व्हाइट ब्लड सेल्स का निर्माण करना है, जो शरीर को इंफेक्शन और बीमारियों से बचाती हैं. इस स्टडी में वैज्ञानिकों ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से 27,000 से ज्यादा मरीजों के स्कैन और मेडिकल रिकॉर्ड का एनालिसिस किया. इसके जरिए उन्होंने थाइमस की सेहत और मरीजों की बीमारी के जोखिम के बीच संबंध को समझने की कोशिश की.
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क्या निकला नतीजा?
नतीजों में पाया गया कि जिन लोगों का थाइमस हेल्दी था, उनमें मृत्यु दर करीब 13.4 प्रतिशत रही, जबकि जिनका थाइमस कमजोर था, उनमें यह आंकड़ा 25.5 प्रतिशत तक पहुंच गया. इसके अलावा, कमजोर थाइमस वाले लोगों में 5.3 प्रतिशत को फेफड़ों का कैंसर और 16.7 प्रतिशत को हार्ट संबंधी बीमारियां होने का खतरा ज्यादा पाया गया. रिसर्च यह भी बताता है कि उम्र बढ़ने के साथ थाइमस धीरे-धीरे सिकुड़ता जाता है और उसकी जगह फैटी टिश्यू ले लेते हैं. यही बदलाव शरीर की रोग इम्यून क्षमता को कमजोर कर सकता है.
रिसर्च के लिए इसका यूज
साइंटिस्ट ने आगे इस शोध को और मजबूत करने के लिए दो बड़े अध्ययन फ्रेमिंगहैम हार्ट स्टडी और नेशनल लंग स्क्रीनिंग ट्रायल के डेटा का भी उपयोग किया. इसमें AI आधारित डीप लर्निंग सिस्टम के जरिए थाइमस की स्थिति का ज्यादा सटीक आकलन किया गया. रिसर्चर का कहना है कि पारंपरिक तरीके से थाइमस की जांच उतनी सटीक नहीं होती, इसलिए AI तकनीक ने इस क्षेत्र में बड़ी भूमिका निभाई है. इस मॉडल ने अलग-अलग डेटा सेट पर भी लगातार सटीक परिणाम दिए. रिपोर्ट में यह भी सुझाव दिया गया है कि लाइफस्टाइल में बदलाव, जैसे नियमित एक्सरसाइज, अच्छी नींद और संतुलित आहार थाइमस की सेहत पर पॉजिटिव असर डाल सकते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 04 Apr 2026 09:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Laughing Epilepsy Symptoms: आपकी हंसी भी हो सकती है खतरनाक बीमारी, जानें इसके लक्षण और इलाज का तरीका</title>
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        <description><![CDATA[ अब हंसी भी बीमारी का संकेत बन सकती है, लेकिन अच्छी बात यह है कि अब इसका इलाज भी भारत में उपलब्ध है. दरअसल, जोधपुर के एम्स अस्पताल में डॉक्टरों ने दुर्लभ बीमारी &#039;लाफिंग एपिलेप्सी&#039; (हंसने वाली मिर्गी) के चार मरीजों का सफल इलाज किया. आइए इसके बारे में जानते हैं.
क्या है यह बीमारी?
यह बीमारी ऐसी है, जिसमें मरीज को बिना किसी वजह बार-बार हंसी के दौरे पड़ते हैं. यह सामान्य हंसी नहीं होती. यह मिर्गी का एक खास प्रकार है, जो दवाओं से कंट्रोल नहीं होता. सुनने में अजीब लग सकता है, लेकिन यह मरीज के लिए बहुत परेशानी भरा होता है.
क्या है लाफिंग एपिलेप्सी?
लाफिंग एपिलेप्सी को गेलास्टिक सीजर्स भी कहते हैं. इसमें मरीज अचानक हंसने लगता है, जैसे कोई मजाक सुन लिया हो. असल में यह दिमाग के किसी खास हिस्से से शुरू होने वाले दौरे होते हैं. कई बार हंसी के साथ अन्य लक्षण भी दिखते हैं, जैसे शरीर में अकड़न या बेहोशी. अगर समय पर सही इलाज न हो तो यह समस्या बढ़ सकती है. इस बीमारी के मरीजों को आमतौर पर दवाओं से आराम नहीं मिलता है. ऐसे में सर्जरी की जरूरत पड़ती है. जोधपुर एम्स के डॉक्टरों ने ऐसे ही चार मरीजों की सर्जरी नई तकनीक से की.
कैसे की गई मरीजों की सर्जरी?
डॉक्टरों ने मिनिमली इनवेसिव स्टीरियोटैक्टिक रेडियोफ्रीक्वेंसी एब्लेशन नाम की तकनीक का इस्तेमाल किया. इसमें दिमाग के उस छोटे से हिस्से को टारगेट किया जाता है, जहां से दौरे शुरू होते हैं. यह सर्जरी बड़े चीरे के बिना की गई. सिर्फ छोटे से चीरे से काम चलाया गया. इससे मरीज को कम दर्द होता है और जल्दी रिकवर भी हो जाता है.&amp;nbsp;
इन डॉक्टरों ने की सफल सर्जरी
इस सर्जरी के लिए न्यूरोलॉजी विभाग से डॉ. सम्हिता पांडा और डॉ. लोकेश सैनी ने मरीजों की जांच की. वहीं, डॉ. सरबेश तिवारी ने एमआरआई से सही जगह का पता लगाया. एनेस्थीसिया की टीम में डॉ. स्वाति छाबड़ा और डॉ. मनबीर कौर शामिल थीं तो डॉ. मोहित अग्रवाल ने सर्जरी की. वहीं, डॉ. दीपक के झा और डॉ. सूर्यनारायणन भास्कर भी इसमें शामिल रहे.&amp;nbsp;
एम्स जोधपुर का मिर्गी सर्जरी कार्यक्रम
एम्स जोधपुर में साल 2019 से मिर्गी की सर्जरी का कार्यक्रम चल रहा है. अब तक यहां 100 से ज्यादा ऐसी सर्जरी हो चुकी हैं. इनमें कई मरीज ऐसे थे, जिन पर दवाएं काम नहीं कर रही थीं. इन सर्जरी में कई मरीजों का इलाज आयुष्मान भारत योजना के तहत मुफ्त में किया गया.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Fri, 03 Apr 2026 17:30:14 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Right Age for Pregnancy: कितनी उम्र के बाद प्रेग्नेंसी हो सकती है जोखिम भरी? जानें बच्चे को जन्म देने की सही उम्र</title>
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        <description><![CDATA[ Right Age for Pregnancy : आज के समय में महिलाओं की जिंदगी पहले से काफी बदल चुकी है. पढ़ाई, करियर, आर्थिक स्वतंत्रता और अपने फैसले खुद लेने की आजादी, इन सब वजहों से कई महिलाएं मां बनने का फैसला पहले की तुलना में देर से ले रही हैं, जहां पहले कम उम्र में शादी और जल्दी प्रेग्नेंसी आम बात थी, वहीं अब महिलाएं 30 या 35 की उम्र के बाद भी मां बनने का सोचती हैं. ऐसे में कई महिलाओं के मन में यह सवाल उठता है कि क्या ज्यादा उम्र में प्रेग्नेंसी सुरक्षित होती है, क्या इसके कुछ जोखिम भी हैं और आखिर मां बनने के लिए सही उम्र क्या मानी जाती है. तो आइए जानते हैं कि कितनी उम्र के बाद प्रेग्नेंसी जोखिम भरी हो सकती है.&amp;nbsp;
प्रेग्नेंसी के लिए सही उम्र क्या है?
महिलाओं में प्रेग्नेंसी की फर्टिलिटी टीनेज में पीरियड्स शुरू होने के साथ ही शुरू हो जाती है और मेनोपॉज तक रहती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हर उम्र प्रेग्नेंसी के लिए समान रूप से सुरक्षित होती है. 20 से 30 साल की उम्र को प्रेग्नेंसी के लिए सबसे बेहतर माना जाता है. 30 के बाद धीरे-धीरे प्रेग्नेंसी की क्षमता कम होने लगती है और 35 के बाद जोखिम बढ़ने लगते हैं, इसलिए इस उम्र को एडवांस्ड मैटरनल एज कहा जाता है.&amp;nbsp;
30 के बाद क्यों घटती है फर्टिलिटी?
महिलाओं के शरीर में एग्स की संख्या जन्म से ही तय होती है. उम्र बढ़ने के साथ ये संख्या और उनकी क्वालिटी दोनों कम होती जाती हैं. 30 के बाद कंसीव करने में समय ज्यादा लग सकता है. 35 के बाद कई महिलाओं को मेडिकल सहायता की जरूरत पड़ सकती है और एग्स की क्वालिटी घटने से प्रेग्नेंसी की संभावना कम हो जाती है.&amp;nbsp;
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कितनी उम्र के बाद प्रेग्नेंसी जोखिम भरी हो सकती है
35 साल के बाद प्रेग्नेंट होने पर कुछ समस्याएं बढ़ सकती हैं. जिसमें मां के लिए हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, ज्यादा ब्लीडिंग (डिलीवरी के समय या बाद में) या सी-सेक्शन (ऑपरेशन से डिलीवरी) की संभावना ज्यादा होती है. वहीं प्रेग्नेंसी से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं. जैसे समय से पहले डिलीवरी (प्रीमेच्योर बर्थ), जुड़वां बच्चों की संभावना बढ़ना, प्लेसेंटा से जुड़ी दिक्कतें और ICU में भर्ती होने की जरूरत हो सकती है. ज्यादा उम्र में मां बनने से बच्चे पर भी कुछ प्रभाव पड़ सकते हैं. जिसमें कम वजन के साथ जन्म, समय से पहले जन्म, NICU में भर्ती होने की जरूरत और कुछ जेनेटिक बीमारियों का खतरा भी होता है.&amp;nbsp;
सही देखभाल कैसे करें?
आपकी उम्र कोई भी हो, प्रेग्नेंसी के दौरान सही देखभाल बहुत जरूरी है. जिसमें नियमित चेकअप, समय पर टेस्ट, किसी भी समस्या का जल्दी पता लगाना और डॉक्टर की सलाह का पालन करना जरूरी है. इससे मां और बच्चे दोनों को सुरक्षित रखा जा सकता है. &amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 03 Apr 2026 17:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>Tingling In Hands Causes: क्या आपके हाथ में भी होती है झुनझुनी और सुन्नपन, जानें किस वजह से होता है ऐसा?</title>
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        <description><![CDATA[ Why Do My Hands Tingle Frequently: क्या आपके हाथों में बार-बार झुनझुनी या सुन्नपन महसूस होता है? कई लोग इसे मामूली समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन एक्सपर्ट्स मानते हैं कि यह शरीर का एक संकेत भी हो सकता है, जिसे समझना जरूरी है. &amp;nbsp;अक्सर यह समस्या तब महसूस होती है जब हम गलत पोजीशन में सो जाते हैं या लंबे समय तक एक ही स्थिति में हाथ रखते हैं. ऐसे में नसों पर दबाव पड़ता है या खून का प्रवाह कुछ समय के लिए कम हो जाता है, जिससे झुनझुनी होने लगती है.
कब होती है दिक्कत?
लेकिन अगर यह परेशानी बार-बार होने लगे या लंबे समय तक बनी रहे, तो इसके पीछे कोई खास कारण भी हो सकता है. theheartysoul की रिपोर्ट के अनुसार, सबसे आम वजहों में से एक है कार्पल टनल सिंड्रोम, जिसमें कलाई की नस दब जाती है और अंगूठे, उंगलियों में झुनझुनी या दर्द होने लगता है. कभी-कभी समस्या कलाई में नहीं, बल्कि कोहनी या गर्दन से भी जुड़ी हो सकती है. नसों में कहीं भी दबाव आने से हाथ तक इसका असर पहुंच सकता है, जिससे झुनझुनी और कमजोरी महसूस होती है.
ब्लड सर्कुलेशन और डायबिटीड भी कारण
खराब ब्लड सर्कुलेशन भी इसका एक कारण हो सकता है. &amp;nbsp;ठंड में या अचानक तापमान बदलने पर उंगलियां सुन्न पड़ सकती हैं और रंग भी बदल सकता है, जिसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. इसके अलावा, डायबिटीज जैसी बीमारियां भी नसों को प्रभावित कर सकती हैं. जब नसें कमजोर होने लगती हैं, तो हाथ-पैरों में झुनझुनी, जलन या सुन्नपन महसूस होने लगता है.
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विटामिन B12 की कमी&amp;nbsp;
विटामिन B12 की कमी भी एक अहम कारण है, जो धीरे-धीरे नसों को नुकसान पहुंचा सकती है. कई बार लोग थकान या कमजोरी को नजरअंदाज करते रहते हैं, लेकिन यह संकेत हो सकता है कि शरीर में जरूरी पोषक तत्वों की कमी है. कुछ मामलों में थायरॉयड की समस्या भी हाथों में झुनझुनी का कारण बन सकती है. शरीर का मेटाबॉलिज्म बिगड़ने से नसों पर असर पड़ता है और यह समस्या बढ़ सकती है.&amp;nbsp;
ये भी होता है कारण
कंधे और गर्दन के बीच नसों या ब्लड वेसल्स पर दबाव पड़ने से भी हाथों में झुनझुनी हो सकती है. खासतौर पर जब हाथ लंबे समय तक ऊपर रखा जाए या भारी वजन उठाया जाए. &amp;nbsp;अगर झुनझुनी के साथ कमजोरी, चीजें गिरना, या दर्द बढ़ने लगे, तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए. यह संकेत हो सकता है कि नसों पर लगातार दबाव पड़ रहा है या कोई गंभीर समस्या विकसित हो रही है. अचानक एक तरफ हाथ सुन्न हो जाना, बोलने में दिक्कत या चक्कर आना जैसी स्थिति स्ट्रोक का संकेत भी हो सकती है. ऐसे में तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 03 Apr 2026 17:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Tingling, Hands, Causes:, क्या, आपके, हाथ, में, भी, होती, है, झुनझुनी, और, सुन्नपन, जानें, किस, वजह, से, होता, है, ऐसा</media:keywords>
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        <title>Child Cancer Deaths Global: भारत जैसे गरीब देशों में कैंसर से जान गंवा रहे 10 में से 9 बच्चे, डरा देगी लैंसेट की रिपोर्ट</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/child-cancer-deaths-global-भारत-जैसे-गरीब-देशों-में-कैंसर-से-जान-गंवा-रहे-10-में-से-9-बच्चे-डरा-देगी-लैंसेट-की-रिपोर्ट</link>
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        <description><![CDATA[ Why Childhood Cancer Deaths Are Higher In Poor Countries: दुनिया भर में बच्चों में कैंसर एक गंभीर और बढ़ती हुई चिंता बनता जा रहा है, लेकिन सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि इसके ज्यादातर मामले और मौतें गरीब और मध्यम आय वाले देशों में हो रही हैं. &amp;nbsp;द लैंसेट में पब्लिश ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज 2023 स्टडी ने इस असमानता को लेकर कई चौंकाने वाले आंकड़े सामने रखे हैं.&amp;nbsp; रिपोर्ट के अनुसार, साल 2023 में दुनिया भर में बच्चों में कैंसर के लगभग 3.77 लाख नए मामले सामने आए, जबकि करीब 1.44 लाख बच्चों की मौत हो गई, यह बीमारी बच्चों में मौत के प्रमुख कारणों में शामिल हो चुकी है और खसरा, टीबी और HIV/AIDS जैसी बीमारियों से भी ज्यादा जान ले रही है.&amp;nbsp;
लो और मिडिल इनकम वाले देशों में ज्यादा मौतें
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इन मौतों में से करीब 94 प्रतिशत मामले लो और मिडिल इनकम देशों में दर्ज किए गए. यानी जहां संसाधन कम हैं, वहीं बच्चों के लिए यह बीमारी सबसे ज्यादा घातक साबित हो रही है. भारत की बात करें तो यहां 2023 में करीब 17,000 बच्चों की मौत कैंसर के कारण हुई, जिससे यह बच्चों में मौत का दसवां सबसे बड़ा कारण बन गया. कैंसर केयर अस्पताल, दरभंगा के कर्क रोग एक्सपर्ट डॉक्टर स्वरूप मित्रा के अनुसार,, इसके बावजूद भारत के राष्ट्रीय कैंसर नियंत्रण कार्यक्रम में बचपन के कैंसर को अभी तक प्राथमिकता नहीं दी गई है. &amp;nbsp;इसके लिए जरूरी है कि बचपन के कैंसर को राष्ट्रीय कैंसर नियंत्रण योजनाओं में तुरंत शामिल किया जाए.
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दक्षिण एशिया की स्थिति
दक्षिण एशिया इस संकट का बड़ा केंद्र बना हुआ है, जहां दुनिया के कुल चाइल्डहुड कैंसर से होने वाली मौतों का लगभग 20.5 प्रतिशत हिस्सा दर्ज किया गया. इसके अलावा, 1990 से 2023 के बीच इन मौतों में करीब 16.9 प्रतिशत &amp;nbsp;की बढ़ोतरी भी देखी गई है. हालांकि एक पॉजिटिव पहलू यह भी है कि वैश्विक स्तर पर मौतों में कुछ कमी आई है, लेकिन इसका लाभ सभी देशों तक समान रूप से नहीं पहुंच पाया है. उच्च आय वाले देशों में इलाज बेहतर होने से बच्चों के बचने की संभावना ज्यादा है, जबकि गरीब देशों में समय पर जांच और इलाज की कमी बड़ी बाधा बन रही है.&amp;nbsp;
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
इस स्टडी की प्रमुख लेखक लिसा फोर्स कहती हैं कि स्वास्थ्य सेवाओं की असमानता के कारण ही यह अंतर पैदा हो रहा है. देर से डायग्नोसिस, जरूरी इलाज की कमी और स्वास्थ्य प्रणाली की कमजोरियां बच्चों की जान जोखिम में डाल रही हैं. रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि चाइल्डहुड कैंसर के 85 प्रतिशत नए मामले और 94 प्रतिशत मौतें इन्हीं लो और मिडिल इनकम देशों में होती हैं. इसके अलावा, DALYs यानी &quot;डिसएबिलिटी एडजस्टेड लाइफ ईयर्स&quot; का भी 94 प्रतिशत हिस्सा इन्हीं देशों में दर्ज किया गया, जो यह दिखाता है कि बीमारी का असर सिर्फ मौत तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चों की जिंदगी की क्वालिटी पर भी पड़ता है.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 03 Apr 2026 17:30:09 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Hidden Ingredients In Snacks: चीज़ के नाम पर सिर्फ मैदा और तेल! वायरल वीडियो में देखें चीज़लिंग्स के अंदर का असली सच</title>
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        <description><![CDATA[ How Much Cheese Is In Cheeslings: क्या आप भी चाय के साथ या बच्चों के टिफिन में मोनाको च़ीजलिंग्स देना पसंद करते हैं? अगर हां, तो यह खबर आपको चौंका सकती है. सालों से भारतीय घरों में पसंद किए जाने वाले इस स्नैक को लेकर एक वायरल वीडियो ने बड़ा खुलासा किया है. फूडफार्म के नाम से मशहूर हेल्थ इंफ्लुएंसर रेवंत हिमात्सिंगका ने इस प्रोडक्ट के अंदर की सच्चाई सामने रखी है. चलिए आपको इसके बारे में बताते हैं.&amp;nbsp;
वीडियो में उठाए सवाल
वीडियो में सबसे बड़ा सवाल इस स्नैक के नाम को लेकर उठाया गया है. च़ीजलिंग्स नाम सुनकर लगता है कि इसमें चीज की अच्छी मात्रा होगी, लेकिन पैकेट पर दिए गए इंग्रीडिएंट्स कुछ और ही कहानी बताते हैं. लेबल के मुताबिक, इसमें चीज की मात्रा सिर्फ 1.9 प्रतिशत है. यानी जिस स्वाद के लिए लोग इसे खरीदते हैं, वही इसमें बेहद कम मात्रा में मौजूद है. &amp;nbsp;इस बात को समझाने के लिए वीडियो में एक दिलचस्प तरीका अपनाया गया. एक ट्रांसपेरेंट जार में सभी सामग्री को उनके अनुपात के हिसाब से दिखाया गया, जिसमें मैदा और तेल लगभग पूरा जार भरते नजर आए, जबकि चीज की मात्रा इतनी कम थी कि वह मुश्किल से नजर आ रही थी.
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क्या होता है इसमें?
अगर इसमें चीज इतनी कम है, तो सवाल उठता है कि आखिर इसमें बाकी क्या है?. वीडियो में रेवंत हिमात्सिंगका बताते हैं कि असल में इस स्नैक का बड़ा हिस्सा रिफाइंड व्हीट फ्लोर यानी मैदा से बना है. chriskresser&amp;nbsp; की रिपोर्ट के अनुसार, मैदा में फाइबर और जरूरी पोषक तत्व नहीं होते, जिससे यह शरीर में तेजी से शुगर लेवल बढ़ा सकता है और वजन बढ़ने का कारण बन सकता है. इसके अलावा, इसमें पाम ऑयल का इस्तेमाल किया जाता है, जो सैचुरेटेड फैट से भरपूर होता है. लंबे समय तक इसका ज्यादा सेवन दिल से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ा सकता है. इतना ही नहीं, इस स्नैक में इनवर्ट शुगर सिरप और ज्यादा मात्रा में नमक भी होता है. यह कॉम्बिनेशन इसे स्वादिष्ट और एडिक्टिव बनाता है, जिससे एक बार खाने के बाद बार-बार खाने की इच्छा होती है.&amp;nbsp;
&amp;nbsp;

इन चीजों का भी होता है इस्तेमाल
वीडियो में इसमें शुगर और हल्दी का क्लेम किया गया है. स्वाद और टेक्सचर को बनाए रखने के लिए इसमें कई तरह के केमिकल्स भी मिलाए जाते हैं. वीडियो में इस प्रोडक्ट को TruthIn रेटिंग में 5 में से सिर्फ 1.8 अंक दिए गए हैं, जो इसे &quot;अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड&quot; की कैटेगरी में रखता है. य &amp;nbsp;खासकर बच्चों के लिए यह चिंता की बात है, क्योंकि इस तरह के प्रोसेस्ड स्नैक्स का ज्यादा सेवन उनकी सेहत पर असर डाल सकता है.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 03 Apr 2026 17:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Breast Cancer Lung Metastasis: फेफड़ों में क्यों फैलता है ब्रेस्ट कैंसर? रिसर्च में हुआ ट्यूमर के &amp;apos;सपोर्ट सिस्टम&amp;apos; का खुलासा</title>
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        <description><![CDATA[ Why Breast Cancer Spreads To Lungs: महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर भारत और दुनिया भर में कैंसर से होने वाली मौतों और मामलों में टॉप पर है. &amp;nbsp;जब ब्रेस्ट कैंसर शरीर के दूसरे हिस्सों में फैल जाता है, तो यह और ज्यादा खतरनाक हो जाता है. फेफड़े उन अंगों में शामिल हैं, जहां यह कैंसर सबसे ज्यादा फैलता है. लंबे समय से डॉक्टर जानते हैं कि फेफड़ों में पहुंचने के बाद कैंसर का इलाज मुश्किल हो जाता है, लेकिन अब तक यह पूरी तरह साफ नहीं था कि वहां ट्यूमर इतनी तेजी से क्यों बढ़ते हैं.
क्या निकला रिसर्च में?
हाल ही में यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो कैंसर सेंटर के रिसर्च ने इस पर एक अहम खोज की है. कैंसर रिसर्च कम्युनिटी में प्रकाशित इस स्टडी के मुताबिक, ब्रेस्ट कैंसर की सेल्स लंग्स के प्राकृतिक रिपेयर सिस्टम का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए करने लगती हैं. दरअसल, फेफड़ों में एक खास क्षमता होती है कि वे खुद को जल्दी ठीक कर सकें. जब एयर सैक्स यानी एल्वियोलाई को नुकसान पहुंचता है, तो शरीर तुरंत उसे रिपेयर करने की प्रक्रिया शुरू कर देता है. यह प्रक्रिया सांस लेने और लंग्स को स्वस्थ रखने के लिए बेहद जरूरी होती है.
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क्यों आसानी से फैलता है ट्यूमर?
लेकिन जब कैंसर सेल्स लंग्स में पहुंचती हैं, तो वे इस हीलिंग सिस्टम को बाधित कर देती हैं. सामान्य तौर पर जो प्रक्रिया कुछ समय के लिए चलती है, वह कैंसर की मौजूदगी में लगातार सक्रिय रहती है. इससे सूजन बनी रहती है और ऐसा माहौल तैयार होता है, जिसमें ट्यूमर आसानी से बढ़ने लगते हैं. रिसर्च में यह भी सामने आया कि एल्वियोलर टाइप-2 सेल्स इस पूरी प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाती हैं. ये सेल्स आमतौर पर फेफड़ों की मरम्मत में मदद करती हैं, लेकिन कैंसर की मौजूदगी में ये ऐसे सिग्नल छोड़ने लगती हैं, जो ट्यूमर को बढ़ावा देते हैं. वहीं कैंसर सेल्स भी इनसे संपर्क बनाए रखती हैं, जिससे यह चक्र लगातार चलता रहता है.
क्या है बचने का उपाय?
इस समस्या के समाधान के लिए वैज्ञानिकों ने एक दवा रोफ्लुमिलास्ट का परीक्षण किया, जो पहले से ही क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज के इलाज में इस्तेमाल होती है. प्रयोगों में पाया गया कि यह दवा फेफड़ों में ट्यूमर की वृद्धि को धीमा कर सकती है, क्योंकि यह कैंसर के लिए अनुकूल माहौल को बदल देती है. यह तरीका पारंपरिक इलाज से अलग है, जहां सीधे कैंसर सेल्स को खत्म करने की कोशिश की जाती है. यहां फोकस उस सपोर्ट सिस्टम को रोकने पर है, जो कैंसर को बढ़ने में मदद करता है. फिलहाल यह रिसर्च शुरुआती चरण में है और इसे इंसानों पर लागू करने के लिए और टेस्ट जरूरी हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 03 Apr 2026 05:30:17 +0530</pubDate>
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        <title>Vitamins For Older Adults: बढ़ती उम्र में विटामिन D और B12 क्यों हैं जरूरी? उम्र को मात देने के लिए अपनाएं ये डाइट टिप्स</title>
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        <description><![CDATA[ Which Vitamins Are Important After 50: उम्र बढ़ने के साथ शरीर में कई तरह के बदलाव आने लगते हैं. इसका असर ऊर्जा, हड्डियों की मजबूती, याददाश्त और इम्यून सिस्टम पर साफ दिखाई देता है. खासकर 50 की उम्र के बाद शरीर पोषक तत्वों को पहले जितनी आसानी से एब्जॉर्ब नहीं कर पाता, इसलिए सही खानपान और विटामिन्स पर ध्यान देना बेहद जरूरी हो जाता है. विटामिन्स भले ही मात्रा में छोटे होते हैं, लेकिन शरीर को सही तरीके से चलाने में इनकी भूमिका बहुत बड़ी होती है. सही विटामिन्स मिलने से न सिर्फ बीमारियों का खतरा कम होता है, बल्कि उम्र बढ़ने के बावजूद शरीर एक्टिव और फिट बना रहता है.
विटामिन D की जरूरत
knowridge की रिपोर्ट के अनुसार, सबसे पहले बात करें विटामिन D की, जिसे सनशाइन विटामिन भी कहा जाता है. यह शरीर में तब बनता है जब त्वचा धूप के संपर्क में आती है. लेकिन उम्र बढ़ने के साथ शरीर की यह क्षमता कम हो जाती है. यही कारण है कि बुजुर्गों में इसकी कमी ज्यादा देखने को मिलती है. विटामिन D का मुख्य काम कैल्शियम को एब्जॉर्ब करना है, जो हड्डियों को मजबूत रखने के लिए जरूरी होता है. इसकी कमी से हड्डियां कमजोर हो सकती हैं और फ्रैक्चर का खतरा बढ़ जाता है. रिसर्च यह भी बताती है कि पर्याप्त विटामिन D लेने से ऑस्टियोपोरोसिस का जोखिम कम हो सकता है.
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कैल्शियम और विटामिन B12 की जरूरत
कैल्शियम भी उतना ही जरूरी है, खासकर 50 के बाद. उम्र के साथ हड्डियों का घनत्व कम होने लगता है, और महिलाओं में मेनोपॉज के बाद यह प्रक्रिया तेज हो जाती है. दूध, दही, पनीर और हरी सब्जियां कैल्शियम के अच्छे सोर्स हैं. इसके अलावा, विटामिन B12 का भी खास महत्व है. यह दिमाग के सही काम करने और रेड ब्लड सेल्स के निर्माण में मदद करता है. उम्र बढ़ने के साथ शरीर में B12 का अवशोषण कम हो जाता है, जिससे थकान, कमजोरी और याददाश्त से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं.
विटामिन &amp;nbsp;C और विटामिन E की जरूरत
विटामिन C इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाता है। यह शरीर की मरम्मत में मदद करता है और त्वचा को स्वस्थ बनाए रखता है. संतरा, स्ट्रॉबेरी, कीवी और ब्रोकोली जैसे खाद्य पदार्थ इसके अच्छे सोर्स हैं. विटामिन E एक शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट है, जो सेल्स को नुकसान से बचाता है. वहीं, विटामिन K खून के थक्के बनने और हड्डियों को मजबूत रखने में मदद करता है. पालक, केल और ब्रोकोली जैसी हरी सब्जियों में यह भरपूर मात्रा में पाया जाता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 03 Apr 2026 05:30:16 +0530</pubDate>
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        <title>हार्ट अटैक से पहले शरीर देता है संकेत, क्या आप भी कर रहे हैं नजरअंदाज? </title>
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        <description><![CDATA[ आज के समय में हार्ट अटैक एक गंभीर और तेजी से बढ़ती समस्या बन चुका है, वही अक्सर लोग सोचते हैं कि हार्ट अटैक अचानक आता है, लेकिन सच्चाई यह है कि हमारा शरीर कई हफ्तों पहले ही इसके संकेत देने लगता है, अक्सर इन लक्षणों कोहल्केमें लेने या नजरअंदाज करने की वजह से बड़ी समस्या खड़ी हो जाती है. वही वैश्विक अनुमानों को अनुसार&amp;nbsp;हृदय रोग आज भी सबसे बड़ा जानलेवा रोग बना हुआ है,&amp;nbsp;दिल से जुड़ी बीमारियां दुनिया में मौत का सबसे बड़ा कारण हैं, जिससे हर साल लगभग 1.8 करोड़ मौतें होती हैं.&amp;nbsp;
तो क्या आपका शरीर वाकई दिल का दौरा पड़ने से हफ़्तों पहले चेतावनी दे सकता है? कई मामलों में, हां.&amp;nbsp;स्ट्रक्चरल हार्ट प्रोग्राम के प्रमुख डॉ. विवेक कुमार कहते हैं कि लक्षण कई दिन या हफ़्तों पहले भी दिख सकते हैं, लेकिन वे हमेशा गंभीर नहीं होते,&amp;nbsp;यह एक अजीब तरह की थकान हो सकती है जो दूर नहीं होती, या सीने में हल्का दबाव जो आता-जाता रहता है. साथ ही&amp;nbsp; कुछ लोगों को रोज़मर्रा के काम करते समय सांस फूलने लगती है, और कुछ ऐसे भी होते हैं जिन्हें कुछ भी महसूस नहीं होता.&amp;nbsp;
&amp;nbsp;
यह भी पढ़ेंः बार-बार होने वाला सिरदर्द मामूली नहीं, शरीर दे रहा ये 5 बड़े संकेत; आप तो नहीं कर रहे नजरअंदाज
एक्सपर्ट क्या कहते हैं?
रिपोर्ट में हेल्थ एक्सपर्ट्स के अनुसार, हार्ट अटैक आने से पहले शरीर कुछ चेतावनी संकेत देता है, लेकिन लोग इन्हें सामान्य थकान या गैस समझकर इग्नोर कर देते हैं, जो आगे चल कर खतरनाक हो सकता है इसलिए अगर शरीर बार-बार कोई संकेत दे रहा है, तो उसे हल्के में लेना सही नहीं है तुरंत डॉक्टर से&amp;nbsp;संपर्क करना चाहीए.&amp;nbsp;
शुरुआती लक्षण, जिन्हें लोग कर देते हैं नजरअंदाज
दिल का दौरा पड़ने के कुछ ऐसे लक्षण होते हैं जो वास्तव में दौरा पड़ने से कई दिन या सप्ताह पहले दिखाई दे सकते हैं . इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी निदेशक डॉ. विनीत भाटिया बताते है कि&amp;nbsp; शुरुआती लक्षणों में ज्यादातर हल्के सीने में दर्द या दबाव, असामान्य थकान, सांस लेने में तकलीफ, अपच जैसी बेचैनी और जबड़े, गर्दन या पीठ तक फैलने वाला दर्द शामिल होता है, इसके अलावा सांस लेने में दिक्कत होना, दिल की धड़कन तेज या अनियमित होना और चक्कर आना एक सुरुआती संकेत है , कई मरीज बाद में बताते हैं कि उन्होंने थकान को नजरअंदाज कर दिया या सीने की तकलीफ को गैस समझकर अनदेखा कर दिया था.&amp;nbsp; जो की आगे चल कर एक दर्द नाक हार्ट अटैक का कारण बन जाता है.&amp;nbsp;
&amp;nbsp;
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महिलाओं में अलग हो सकते हैं लक्षण
डॉ. विवेक कुमार बताते है की&amp;nbsp; पुरुषों और महिलाओं में लक्षण अलग-अलग हो सकते हैं,&amp;nbsp; जहां पुरुषों में सीने में दर्द एक सबसे आम लक्षण होता है, वहीं महिलाओं में सीने में तेज दर्द के बजाय थकान, मतली, या सांस फूलने जैसी समस्याएं ज्यादा देखने को मिलती हैं , इसी कारण महिलाओं में हार्ट अटैक का खतरा पहचानना थोड़ा ज्यादा मुश्किल हो जाता है.&amp;nbsp;
हमेशा सही नहीं होते टेस्ट
यह संभव है कि सामान्य जांच के नतीजे नेगेटिव आ सकते है, जैसे&amp;nbsp; ईसीजी में हृदय की लय में कोई समस्या न दिखाइ दे, और रक्त परीक्षण के परिणाम सामान्य हों,&amp;nbsp;रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि कई बार सामान्य मेडिकल टेस्ट भी हार्ट अटैक के खतरे को नहीं पहचान पाते,&amp;nbsp; छिपे हुए जोखिम अप्रत्याशित रूप से उत्पन्न हो सकते हैं और&amp;nbsp; तत्काल दिल का दौरा पड़ सकता है, इसलिए शुरुआती जांच के नतीजों की परवाह किए बिना किसी भी लक्षण को कभी भी नज़रअंदाज़ न करे.&amp;nbsp;
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टेक्नोलॉजी भी कर सकती है मदद
पहनने योग्य&amp;nbsp;&amp;nbsp;स्मार्टवॉच और हेल्थ ट्रैकिंग डिवाइस आपकी हृदय गति को ट्रैक करने और उसमें होने वाली अनियमितताओं का पता लगाने में सक्षम होतो है,&amp;nbsp; जिससे आपके हृदय की स्थिति के बारे में,&amp;nbsp;ऑक्सीजन लेवल और अन्य संकेतों को मॉनिटर करने में मदद मिलती है,&amp;nbsp; हालांकि, ये उपकरण दिल के दौरे को रोकने में सक्षम नहीं होते हैं, बल्की&amp;nbsp;&amp;nbsp;शुरुआती बदलावों को पकड़ने में सहायक हो सकते हैं, जिससे समय रहते डॉक्टर से सलाह ली जा सकती है
आपको क्या करना चाहिए?&amp;nbsp;
यदि किसी व्यक्ति को कुछ मिनटों से अधिक समय तक सीने में तकलीफ महसूस हो या सांस लेने में तकलीफ, अत्यधिक पसीना आना, बार-बार यह तकलीफ हो, तो उन्हें तुरंत डॉक्टर से सहायता लेनी चाहिए, मुश्किल बात यह है कि ये लक्षण हमेशा जरूरी नहीं लगते, लेकिन अगर कुछ गड़बड़ लगे और बार-बार हो, तो ध्यान देना जरूरी है, समय पर इलाज से बड़ी समस्या को रोका जा सकता है.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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        <pubDate>Thu, 02 Apr 2026 13:30:15 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>हार्ट, अटैक, से, पहले, शरीर, देता, है, संकेत, क्या, आप, भी, कर, रहे, हैं, नजरअंदाज </media:keywords>
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        <title>Best Time To Take Vitamin D: रात में विटामिन D लेना सही या गलत, जानें आपकी नींद और हार्मोन से इसका कितना गहरा कनेक्शन?</title>
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        <description><![CDATA[ Should You Take Vitamin D At Night: विटामिन D हमारे शरीर के लिए बेहद जरूरी पोषक तत्व है. यह न सिर्फ हड्डियों को मजबूत बनाता है, बल्कि सूजन को कंट्रोल करने और नींद के पैटर्न को संतुलित रखने में भी मदद करता है. हालांकि, कई लोग यह नहीं जानते कि इसे किस समय लेना ज्यादा फायदेमंद होता है और क्या इसका असर नींद पर पड़ सकता है. चलिए आपको बताते हैं इसके बारे में विस्तार से.&amp;nbsp;
विटामिन डी रात में लेने का असर
हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली बेवसाइट health की रिपोर्ट के अनुसार, &amp;nbsp;कुछ रिसर्च यह संकेत देती हैं कि अगर विटामिन D रात में लिया जाए, तो यह शरीर में मेलाटोनिन के बनने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है. मेलाटोनिन वही हार्मोन है जो हमारे शरीर को यह संकेत देता है कि अब सोने का समय है और यह नींद-जागने के साइकिल &amp;nbsp;सर्कैडियन रिदम को नियंत्रित करता है. चूंकि विटामिन D का मुख्य सोर्स सूर्य की रोशनी है, इसलिए माना जाता है कि दिन के समय इसका स्तर ज्यादा और रात में कम होना चाहिए. इसी वजह से कुछ एक्सपर्ट्स मानते हैं कि इसे दिन के समय लेना ज्यादा बेहतर हो सकता है, ताकि शरीर का नेचुरल स्लीप साइकिल प्रभावित न हो.
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क्या होता है इसका असर?
विटामिन D का असर सेरोटोनिन नाम के हार्मोन पर भी पड़ता है, जो मूड और मेलाटोनिन दोनों से जुड़ा होता है. सामान्य मात्रा में विटामिन D सेरोटोनिन के निर्माण में मदद करता है, लेकिन अगर इसकी मात्रा बहुत ज्यादा हो जाए तो यह उल्टा असर भी डाल सकता है और सेरोटोनिन का स्तर कम कर सकता है. हालांकि, दूसरी तरफ कुछ स्टडीज यह भी बताती हैं कि विटामिन D की कमी से नींद की गुणवत्ता खराब हो सकती है. जिन लोगों के शरीर में इसका स्तर कम होता है, उनमें स्लीप डिसऑर्डर और कम नींद की समस्या ज्यादा देखी गई है.
इस बात का रखें ध्यान
इसका एक और पहलू यह है कि विटामिन D एक फैट-सोल्युबल विटामिन है, यानी यह शरीर में बेहतर तरीके से तब एब्जॉर्ब होता है जब इसे फैट वाली चीजों के साथ लिया जाए. इसलिए इसे नाश्ते या ऐसे भोजन के साथ लेना बेहतर माना जाता है, जिसमें हेल्दी फैट मौजूद हो. &amp;nbsp;इसे दिन के किसी भी समय लिया जा सकता है, लेकिन अगर रात में लेने से नींद पर असर महसूस हो, तो इसे दिन में लेना बेहतर रहेगा. सबसे जरूरी बात यह है कि इसे नियमित रूप से लिया जाए, क्योंकि सही स्तर बनाए रखना ही इसके असली फायदे देता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 02 Apr 2026 13:30:14 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>ये पांच आदतें अपना लीं तो पक्का होगी नॉर्मल डिलीवरी, जानिए किस तरह से रखना होगा अपना ख्याल?</title>
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        <description><![CDATA[ प्रेग्नेंसी हर महिला के जीवन का एक खास समय होता है, इस दौरान मां और बच्चे दोनों की सेहत का खास ध्यान रखना बहुत जरूरी होता है, ज्यादातर महिलाएं चाहती हैं कि उनकी डिलीवरी नॉर्मल हो, &amp;nbsp;क्योकि अक्सर महिलाओं का मानना होता है कि सी-सेक्शन के मुकाबले नॉर्मल डिलीवरी के बाद रिकवरी जल्दी होती है, ऐसे मे अगर आप भी गर्भवती हैं और नॉर्मल डिलीवरी की इच्छा रखती हैं, तो इसके लिए सिर्फ किस्मत नहीं बल्कि सही आदतें और देखभाल भी बहुत जरूरी होती है, आपको अपनी डेली रूटीन में कुछ जरूरी आदतों को शामिल करना होगा, क्योंकि इससे आपको नॉर्मल डिलीवरी की संभावना बढ़ाने में मदद मिलेगी. अगर गर्भावस्था के दौरान कुछ अच्छी आदतें अपना ली जाएं, तो नॉर्मल डिलीवरी के चांस काफी बढ़ &amp;nbsp;जाता है, आइए जानते हैं ऐसी 5 जरूरी आदतों के बारे में.&amp;nbsp;
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शुरुआत से करें &amp;nbsp;हल्की एक्सरसाइज
प्रेग्नेंसी में हल्की-फुल्की एक्सरसाइज करना बहुत फायदेमंद होता है, &amp;nbsp;जैसे महिलाओं को दिन की शुरुआत से ही ब्रीदिंग एक्सरसाइज करनी चाहिए, साथ ही वॉक करना, प्रेग्नेंसी योग या स्ट्रेचिंग करना &amp;nbsp;इससे शरीर एक्टिव रहता है और शरीर, मन दोनों को शांत करने में मदद करता है साथ ही डिलीवरी के समय ज्यादा ताकत मिलती है, &amp;nbsp;ध्यान रखें कि कोई भी एक्सरसाइज करने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लें&amp;nbsp;
हेल्दी और संतुलित आहार लें&amp;nbsp;
प्रेग्नेंसी के दौरान महिलाओं को अपनी डाइट का खास ध्यान रखना चाहिए, नॉर्मल डिलीवरी के लिए सही खान-पान बहुत जरूरी है, अपनी डाइट में हल्का और पोषक तत्वों से भरपूर भोजन शामिल करें जैसे हरी सब्जियां, फल, दूध, दाल और प्रोटीन वाली चीजें, इसके अलावा मसालेदार, जंक फूड और तला-भुने खाने से परहेज करना बेहतर होता है. ताकि पाचन सही बना रहे &amp;nbsp;और सही पोषण से मां और बच्चे दोनों स्वस्थ रहते हैं.&amp;nbsp;
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पानी भरपूर मात्रा में पिएं&amp;nbsp;
प्रेग्नेंसी के दौरान शरीर को हाइड्रेट रखना बेहद जरूरी है, ऐसा करने &amp;nbsp;से शरीर में एनर्जी बनी रहती है और कई समस्याओं से बचाव होता है, दिनभर में 8-10 गिलास पानी जरूर पिएं, साथ ही प्रेग्नेंसी के दौरान पेट मे अनपच की समस्या आम होती है, ऐसे मे भरपूर मात्रा मे पानी पिने से गैस कि भारी समस्या से भी राहत मिलती है.&amp;nbsp;
तनाव से दूर रहें
अकसर गर्भावस्था के दौरान &amp;nbsp;मां &amp;nbsp;डिलीवरी &amp;nbsp;के बारे मे सोचती रहती है जिसकी वजह से वो तनाव मे रहती है साथ ही डिलीवरी तनाव का असर सीधे मां और बच्चे दोनों पर पड़ता है, &amp;nbsp;इसलिए कोशिश करना चाहिए कि खुश रहें,हमेशा पॉजिटिव सोच रखें और ज्यादा चिंता न करें, ज्यादा सोचना आपके सेहत पर असर कर सकता है. इससे बचने के लिए &amp;nbsp;म्यूजिक सुनना, मेडिटेशन करना या परिवार के साथ समय बिताना चाहिए जो तनाव कम करने में मदद करता है.&amp;nbsp;
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नियमित डॉक्टर चेकअप कराएं
अक्सर काफी महीलाएं घर के काम काज के वजह से डॉक्टर से चेकअप कराने नही जा पाती ऐसे मे आपको बता दे की &amp;nbsp;प्रेग्नेंसी के दौरान समय-समय पर डॉक्टर से चेकअप कराना बहुत जरूरी है, &amp;nbsp;इससे बच्चे की ग्रोथ और मां की सेहत का पता चलता रहता है, और &amp;nbsp;डिलीवरी का अनुमान भी लगता है, साथ ही अगर कोई समस्या हो तो समय रहते इलाज किया जा सकता है.
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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        <pubDate>Thu, 02 Apr 2026 13:30:14 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>ये, पांच, आदतें, अपना, लीं, तो, पक्का, होगी, नॉर्मल, डिलीवरी, जानिए, किस, तरह, से, रखना, होगा, अपना, ख्याल</media:keywords>
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        <title>Laptop On Lap Male Fertility: क्या लैपटॉप गोद में रखकर काम करने से नामर्द हो जाते हैं पुरुष, जानें क्या कहते हैं एक्सपर्ट?</title>
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        <description><![CDATA[ Does Laptop On Lap Reduce Sperm Count: क्या लैपटॉप गोद में रखकर काम करने से पुरुष नामर्द हो सकते हैं? यह सवाल अक्सर लोगों के मन में आता है. &amp;nbsp;एक्सपर्ट के मुताबिक, सीधे तौर पर नामर्द होने जैसी बात कहना सही नहीं है, लेकिन यह आदत पुरुषों की फर्टिलिटी यानी प्रजनन क्षमता पर असर जरूर डाल सकती है. चलिए आपको बताते हैं कि कैसे और क्यों इसका असर होता है.&amp;nbsp;
क्या होता है असर?
verywellhealth की एक रिपोर्ट के अनुसार, जब कोई व्यक्ति लैपटॉप को जांघों या गोद में रखकर लंबे समय तक काम करता है, तो उससे निकलने वाली गर्मी और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड शरीर के संवेदनशील हिस्सों को प्रभावित कर सकती है. साइंटिस्ट ने खासतौर पर दो कारणों पर ध्यान दिया है हीट और रेडिएशन जैसी ऊर्जा तरंगें. इनका असर होता है.&amp;nbsp;
गर्मी का क्या होता है असर?
सबसे पहले बात गर्मी की करें तो टेस्टिकल्स को सही तरीके से काम करने के लिए शरीर के तापमान से थोड़ा ठंडा रहना जरूरी होता है. यही वजह है कि स्क्रोटम उन्हें बाहर की ओर रखकर तापमान संतुलित करता है. लेकिन लैपटॉप की गर्मी इस संतुलन को बिगाड़ देती है. 2005 की एक स्टडी में पाया गया कि लैपटॉप गोद में रखने से स्क्रोटम का तापमान करीब 2.8 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है, जिससे स्पर्म बनने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है और उनकी गुणवत्ता भी गिर सकती है.
इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड का क्या होता है असर?
दूसरी चिंता इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड को लेकर है. ये अदृश्य ऊर्जा तरंगें लैपटॉप, वाई-फाई और मोबाइल जैसे उपकरणों से निकलती हैं. कुछ रिसर्च में पाया गया है कि वाई-फाई के संपर्क में आने से स्पर्म के डीएनए को नुकसान पहुंच सकता है और उनकी गति धीमी हो सकती है. जबकि किसी भी स्पर्म के लिए अंडे तक पहुंचने के लिए तेज और सही दिशा में मूव करना जरूरी होता है.
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कैसे पड़ता है फर्क?&amp;nbsp;
कई स्टडी में यह भी सामने आया है कि लंबे समय तक ऐसे एक्सपोजर से स्पर्म काउंट कम हो सकता है, उनके आकार और बनावट में बदलाव आ सकता है, और जेनेटिक स्तर पर भी असर पड़ सकता है. हालांकि, एक्सपर्ट यह भी कहते हैं कि लैपटॉप के इस्तेमाल और पुरुष बांझपन के बीच सीधा संबंध अभी पूरी तरह साबित नहीं हुआ है और इस पर और रिसर्च की जरूरत है. इसके साथ ही ढीले कपड़े पहनना, बहुत गर्म पानी से नहाने या सॉना से बचना और हेल्दी वेट बनाए रखना भी फर्टिलिटी को सुरक्षित रखने में मदद कर सकता है. छोटे-छोटे ये बदलाव आपकी सेहत पर बड़ा असर डाल सकते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 02 Apr 2026 01:30:19 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Blue Light Effects On Sleep: सिर्फ मोबाइल छोड़ना काफी नहीं, आपका लैपटॉप और ऑफिस की &amp;apos;सफेद रोशनी&amp;apos; भी छीन रही है नींद</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/blue-light-effects-on-sleep-सिर्फ-मोबाइल-छोड़ना-काफी-नहीं-आपका-लैपटॉप-और-ऑफिस-की-सफेद-रोशनी-भी-छीन-रही-है-नींद</link>
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        <description><![CDATA[ Why Less Phone Use Doesn&amp;rsquo;t Improve Sleep:&amp;nbsp;आजकल बहुत से लोग यह सोचकर सुकून महसूस करते हैं कि उन्होंने फोन का इस्तेमाल कम कर दिया है, इसलिए उनकी नींद और मेंटल हेल्थ बेहतर हो जाएगी. लेकिन असलियत इससे थोड़ी अलग है. आधुनिक ऑफिस लाइफ में स्क्रीन से दूरी बनाना इतना आसान नहीं है, क्योंकि लैपटॉप, मीटिंग्स और तेज रोशनी लगातार दिमाग को एक्टिव बनाए रखते हैं. चलिए आपको बताते हैं कि मोबाइल के अलावा और क्या है कारण.&amp;nbsp;
ईमेल भी है कारण
सुबह की शुरुआत ईमेल से होती है और दिन भर स्क्रीन के सामने बैठकर काम चलता रहता है. ऊपर से ऑफिस की तेज, सफेद रोशनी भी दिन जैसी ही लगती है. ऐसे में शरीर को यह संकेत ही नहीं मिल पाता कि अब आराम का समय है. नतीजा यह होता है कि रात में नींद हल्की लगती है, दिमाग शांत नहीं होता और सुबह उठना भारी महसूस होता है.
&amp;nbsp;छिपे हुए स्क्रीन एक्सपोजर
यह समस्या सिर्फ ज्यादा फोन चलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि छिपे हुए स्क्रीन एक्सपोजर से जुड़ी है. एक सामान्य ऑफिस जॉब में 6 से 10 घंटे तक स्क्रीन देखना आम बात है. फर्क सिर्फ इतना है कि यह काम का हिस्सा होता है, इसलिए लोग इसे नजरअंदाज कर देते हैं. लेकिन दिमाग के लिए स्क्रीन स्क्रीन ही होती है, चाहे वह काम की हो या मनोरंजन की.&amp;nbsp;
क्या कहते हैं एक्सपर्ट
डॉ. नेहा कपूर बताती हैं कि लोग अक्सर सोचते हैं कि फोन कम इस्तेमाल करने से वे स्क्रीन के नुकसान से बच जाएंगे, जबकि ऑफिस में लैपटॉप और कमरे की रोशनी भी शरीर की जैविक घड़ी को प्रभावित करती है. इससे मेलाटोनिन हार्मोन बनने में रुकावट आती है, जो नींद के लिए बेहद जरूरी है. &amp;nbsp;जब मेलाटोनिन का स्तर प्रभावित होता है, तो सोने का समय आगे खिसक जाता है. भले ही आप समय पर बिस्तर पर चले जाएं, लेकिन दिमाग ऑफ नहीं हो पाता. यही वजह है कि कई लोग थकान के बावजूद देर तक जागते रहते हैं.
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नींद होती है प्रभावित&amp;nbsp;
इस बात को कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं भी मान चुकी हैं. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ की रिपोर्ट के अनुसार, शाम के समय ब्लू लाइट का एक्सपोजर मेलाटोनिन को कम कर देता है और नींद की क्वालिटी खराब करता है. &amp;nbsp;वहीं सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन भी मानता है कि सोने से पहले स्क्रीन का इस्तेमाल नींद को प्रभावित करता है. सिर्फ रोशनी ही नहीं, बल्कि लगातार मानसिक सक्रियता भी एक बड़ी वजह है. दिन भर ईमेल, मैसेज और मीटिंग्स दिमाग को पूरी तरह शांत नहीं होने देते. इसका असर धीरे-धीरे दिखता है, फोकस कम होने लगता है, याददाश्त कमजोर पड़ती है और मूड में बदलाव आने लगता है.
बचने के लिए क्या हैं उपाय
हालांकि इससे बचने के लिए कुछ छोटे बदलाव काफी मदद कर सकते हैं. हर 20 मिनट में कुछ सेकंड के लिए स्क्रीन से नजर हटाना, शाम के समय स्क्रीन की ब्राइटनेस कम करना, सोने से पहले 45-60 मिनट का गैप रखना और कमरे की लाइट हल्की करना, ये सभी आदतें नींद को बेहतर बना सकती हैं. &amp;nbsp;एक्सपर्ट्स यही कहते हैं कि नींद को हल्के में नहीं लेना चाहिए. यह सिर्फ आराम नहीं, बल्कि दिमाग के सही तरीके से काम करने के लिए जरूरी प्रक्रिया है. छोटी-छोटी आदतें बदलकर भी आप अपनी नींद और मेंटल सेहत को बेहतर बना सकते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <title>Why Do I Get Headaches: बार&amp;बार होने वाला सिरदर्द मामूली नहीं, शरीर दे रहा ये 5 बड़े संकेत; आप तो नहीं कर रहे नजरअंदाज</title>
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        <description><![CDATA[ Why Am I Getting Headaches Frequently: अगर आपको बार-बार सिरदर्द होता है, तो हो सकता है आपने इसे कई बार नजरअंदाज किया हो. कभी काम का दबाव, कभी ज्यादा स्क्रीन टाइम, तो कभी नींद की कमी और एक पेनकिलर लेकर बात खत्म लेकिन जब सिरदर्द बार-बार होने लगे, तो यह सिर्फ एक साधारण परेशानी नहीं, बल्कि शरीर का संकेत भी हो सकता है कि कुछ ठीक नहीं चल रहा. चलिए आपको बताते हैं कि सरदर्द की दिक्कत क्यों होती है और इससे शरीर में किस कमी का पता चलता है.&amp;nbsp;
क्या होता है कारण?
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर्स एंड स्ट्रोक की रिपोर्ट के अनुसार, इसके कई कारण हो सकते हैं. कभी यह तनाव से जुड़ा होता है, तो कभी आपकी डेली रूटीन, पानी की कमी, नींद या खानपान से. इसलिए इसे नजरअंदाज करने के बजाय यह समझना जरूरी है कि आखिर इसके पीछे वजह क्या है. इसमें सबसे आम कारणों में से एक है तनाव. यह हमेशा खुलकर महसूस नहीं होता, बल्कि धीरे-धीरे जमा होता रहता है, काम का दबाव, जिम्मेदारियां या दिमाग में चलती चिंताएं. यह तनाव गर्दन, कंधों और जबड़े की मांसपेशियों को टाइट कर देता है, जो धीरे-धीरे सिरदर्द में बदल जाता है. ऐसा दर्द अक्सर सिर के चारों ओर भारीपन या दबाव जैसा महसूस होता है.
पानी की कमी
दूसरा बड़ा कारण है पानी की कमी. दिनभर में कई लोग पर्याप्त पानी नहीं पीते और कॉफी या चाय को ही पर्याप्त समझ लेते हैं. लेकिन शरीर को जब पर्याप्त पानी नहीं मिलता, तो उसका असर सिरदर्द के रूप में दिख सकता है. ऐसे सिरदर्द में भारीपन और सुस्ती महसूस होती है, जो खासकर दोपहर के समय बढ़ जाती है.&amp;nbsp;
स्कीन का ज्यादा यूज
आज के समय में स्क्रीन का ज्यादा इस्तेमाल भी सिरदर्द की बड़ी वजह बन गया है. लंबे समय तक मोबाइल, लैपटॉप या टीवी देखने से आंखों पर दबाव पड़ता है, जिससे आंखों के पीछे या माथे में दर्द होने लगता है. अगर थोड़ी देर आंखें बंद करने या स्क्रीन से दूर रहने पर आराम मिले, तो यह साफ संकेत है कि आंखों को आराम की जरूरत है.&amp;nbsp;
नींद की कमी भी कारण
नींद की कमी या खराब नींद भी सिरदर्द को बढ़ा सकती है. सिर्फ घंटों की नींद ही नहीं, बल्कि उसकी क्वालिटी भी मायने रखती है. अगर आप रात में बार-बार जागते हैं, देर तक मोबाइल चलाते हैं या नींद पूरी नहीं होती, तो सुबह उठते ही सिर भारी लग सकता है.
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खाना भी हो सकता है कारण
इसके अलावा, भोजन छोड़ना या देर से खाना भी सिरदर्द का कारण बन सकता है. जब लंबे समय तक खाना नहीं खाया जाता, तो ब्लड शुगर गिरने लगता है, जिससे सिरदर्द, कमजोरी और चक्कर जैसी समस्या हो सकती है.
कब ज्यादा दिक्कत?
हालांकि ज्यादातर सिरदर्द खतरनाक नहीं होते, लेकिन अगर यह बार-बार होने लगे या पहले से ज्यादा तेज हो जाए, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. बेहतर है कि आप अपनी डेली रूटीन पर ध्यान दें कि कब दर्द होता है, किस वजह से बढ़ता है और क्या करने से कम होता है. छोटे-छोटे बदलाव जैसे पर्याप्त पानी पीना, समय पर सोना, स्क्रीन से ब्रेक लेना और तनाव को संभालना, ये सब मिलकर सिरदर्द की समस्या को काफी हद तक कम कर सकते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 02 Apr 2026 01:30:16 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Why, Get, Headaches:, बार-बार, होने, वाला, सिरदर्द, मामूली, नहीं, शरीर, दे, रहा, ये, बड़े, संकेत, आप, तो, नहीं, कर, रहे, नजरअंदाज</media:keywords>
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        <title>Benefits Of Vigorous Exercise: कसरत ऐसी करो कि फूलने लगे सांस, इससे 60% कम हो जाता है मौत का खतरा!</title>
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        <description><![CDATA[ Does Intense Exercise Lower Death Risk: अगर आप रोजाना कुछ मिनट भी ऐसी कसरत करते हैं, जिसमें आपकी सांस फूलने लगे, तो यह आपके शरीर के लिए बेहद फायदेमंद साबित हो सकती है. यूरोपियन हार्ट जर्नल में प्रकाशित एक रिसर्च के मुताबिक, ऐसी तेज फिजिकल एक्टिविटी कई गंभीर बीमारियों के खतरे को कम कर सकती है. रिसर्च में पाया गया कि जो लोग रोज कुछ मिनट भी तेज कसरत करते हैं. जैसे तेज चलना, सीढ़ियां चढ़ना या दौड़ना, उनमें आर्थराइटिस, हार्ट डिजीज और डिमेंशिया जैसी बीमारियों का खतरा काफी कम होता है. खास बात यह है कि इसके लिए घंटों जिम में पसीना बहाना जरूरी नहीं, बल्कि छोटे-छोटे एक्टिव मूवमेंट भी असर दिखाते हैं.&amp;nbsp;
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
इस स्टडी के प्रमुख रिसर्चर &amp;nbsp;प्रोफेसर Minxue Shen के अनुसार, ऐसी कसरत शरीर में ऐसे बदलाव लाती है, जो हल्की-फुल्की एक्सरसाइज से नहीं मिलते. जब आप इतनी तेजी से एक्टिव होते हैं कि सांस फूलने लगे, तो दिल ज्यादा प्रभावी तरीके से खून पंप करता है, ब्लड वेसल्स ज्यादा लचीली बनती हैं और शरीर ऑक्सीजन का बेहतर इस्तेमाल करने लगता है.
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इन लोगों को किया गया शामिल&amp;nbsp;
रिसर्च में करीब 96 हजार लोगों के डेटा का एनालिसिस किया गया. इसमें देखा गया कि उनकी रोजमर्रा की एक्टिविटी और खासकर तेज कसरत का उनकी सेहत पर क्या असर पड़ता है. इसके लिए प्रतिभागियों को एक हफ्ते तक खास डिवाइस पहनाई गई, जिससे उनकी गतिविधियों को सटीक तरीके से रिकॉर्ड किया गया. इसके बाद लगभग सात साल तक उनकी हेल्थ को ट्रैक किया गया. इस दौरान शोधकर्ताओं ने पाया कि जो लोग ज्यादा विगोरस एक्टिविटी करते थे, उनमें कई बीमारियों का खतरा कम था. खास तौर पर डिमेंशिया का खतरा 63 प्रतिशत तक कम, टाइप-2 डायबिटीज का खतरा 60 प्रतिशत तक कम और मौत का खतरा 46 प्रतिशत तक कम पाया गया.
इन बीमारियों में मायने रखती है स्पीड
रिसर्च में यह भी सामने आया कि अलग-अलग बीमारियों पर इसका असर अलग तरीके से होता है. जैसे आर्थराइटिस और सोरायसिस जैसी सूजन से जुड़ी बीमारियों में एक्सरसाइज की तीव्रता ज्यादा मायने रखती है, जबकि डायबिटीज और लिवर डिजीज में एक्सरसाइज की मात्रा और तीव्रता दोनों अहम होती हैं. यह रिसर्च बताती है कि दिन में कुछ मिनट की तेज कसरत भी आपकी सेहत में बड़ा बदलाव ला सकती है.&amp;nbsp; हालांकि, एक्सपर्ट ने यह भी चेतावनी दी है कि हर किसी के लिए तेज कसरत सही नहीं होती. खासकर बुजुर्गों या पहले से किसी बीमारी से जूझ रहे लोगों को अपनी क्षमता के अनुसार ही एक्सरसाइज करनी चाहिए और जरूरत पड़े तो डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 01 Apr 2026 09:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Kidney Stone Symptoms: सिर्फ दर्दनाक नहीं, जानलेवा भी हो सकता है किडनी स्टोन, जानें सेप्सिस कब बन जाता है असली दुश्मन?</title>
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        <description><![CDATA[ When Kidney Stones Become Life Threatening: किडनी स्टोन आज के समय में एक आम समस्या बन चुकी है. नेशनल किडनी फाउंडेशन के अनुसार, हर 10 में से 1 व्यक्ति को जीवन में कभी न कभी किडनी स्टोन की समस्या होती है. अधिकतर मामलों में किडनी स्टोन दर्दनाक जरूर होता है, लेकिन जानलेवा नहीं. असली खतरा तब पैदा होता है, जब यह यूरिन के रास्ते को ब्लॉक कर देता है या किडनी में इंफेक्शन फंसा देता है.&amp;nbsp;
क्या होती है दिक्कत?
2024 की एक मेडिकल रिव्यू के मुताबिक, ब्लॉक और इंफेक्शन वाले स्टोन तेजी से सेप्सिस जैसी गंभीर स्थिति पैदा कर सकते हैं, अगर समय पर इलाज न मिले. एक्सपर्ट किडनी स्टोन से मौत बहुत कम मामलों में होती है, लेकिन यह संभव है, खासकर जब दिक्कतें बढ़ जाती हैं. &amp;nbsp;सबसे खतरनाक स्थिति तब होती है जब किडनी में ब्लॉकेज के साथ इंफेक्शन हो जाता है, जिसे ऑब्स्ट्रक्टिव पायलोनेफ्राइटिस या पायोनेफ्रोसिस कहा जाता है.&amp;nbsp;
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एक्सपर्ट के मुताबिक, जब स्टोन यूरेटर में फंस जाता है, तो यूरिन का प्रवाह रुक जाता है. इससे किडनी में दबाव बढ़ता है, सूजन आती है और बैक्टीरिया तेजी से बढ़ने लगते हैं. अगर इस स्थिति में इंफेक्शन हो जाए, तो एंटीबायोटिक दवाएं भी ठीक से काम नहीं कर पातीं और सेप्सिस का खतरा बढ़ जाता है.&amp;nbsp;
इ़लाज में देरी से स्थिति गंभीर&amp;nbsp;
रिपोर्ट्स बताती हैं कि अगर ऐसे मामलों में इलाज में देरी हो जाए, तो स्थिति गंभीर हो सकती है. जर्नल ऑफ नेपाल मेडिसिन एसोसिएसन के अनुसार, ऐसी स्थिति में तुरंत ड्रेनेज सर्जरी के जरिए यूरिन निकालना जरूरी होता है, क्योंकि सिर्फ दवाओं से इलाज संभव नहीं होता. किडनी स्टोन कब खतरनाक हो सकता है, इसे पहचानना बेहद जरूरी है. Mayo Clinic के अनुसार, अगर तेज दर्द के साथ बुखार, ठंड लगना, पेशाब में जलन या बदबू, उल्टी या पेशाब कम होना जैसे लक्षण दिखें, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए.
क्या है बचाव का रास्ता?
इसके अलावा, बड़े स्टोन 7 मिमी या उससे ज्यादा यूरिन के रास्ते को ज्यादा आसानी से ब्लॉक कर सकते हैं. यूरोपियन रेडियोलॉजी के अनुसार, छोटे स्टोन खुद निकल सकते हैं, लेकिन बड़े स्टोन के लिए इलाज जरूरी हो सकता है. डॉ. विशाल का कहना है कि समय पर इलाज से किडनी स्टोन की दिक्कतों को लगभग पूरी तरह रोका जा सकता है. ज्यादा पानी पीना, लक्षणों को नजरअंदाज न करना और समय पर जांच कराना सबसे जरूरी कदम हैं. किडनी स्टोन आमतौर पर जानलेवा नहीं होता, लेकिन अगर यह यूरिन के रास्ते को ब्लॉक कर दे और इंफेक्शन हो जाए, तो स्थिति तेजी से गंभीर बन सकती है. ऐसे में समय पर इलाज ही सबसे बड़ा बचाव है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 31 Mar 2026 17:30:44 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Early Signs before Serious Illness: चेकअप में सबकुछ नॉर्मल, फिर भी दिनभर रहती है सुस्ती और थकान? जानें दिक्कत की असली वजह</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/early-signs-before-serious-illness-चेकअप-में-सबकुछ-नॉर्मल-फिर-भी-दिनभर-रहती-है-सुस्ती-और-थकान-जानें-दिक्कत-की-असली-वजह</link>
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        <description><![CDATA[ अक्सर कई लोग अलग ही प्रकार की बेचैनी, थकान और सुस्ती से ग्रस्त रहते हैं. ऐसा महसूस होता है मानो शरीर में जान ही नहीं है. पूरी नींद सोने के बाद भी आलस और थकान बनी रहती है, जबकि अगर चेकअप कराओ तो रिपोर्ट्स एकदम नॉर्मल आती हैं.
KIMS अस्पताल के प्रमुख और वरिष्ठ सलाहकार डॉ. एस.एम. फयाज बताते हैं - हमेशा थकान महसूस होना, चक्कर आना, कम नींद आना, बिना किसी समस्या के शरीर में दर्द, सोचने-समझने की शक्ति कम महसूस होना, यह सब कोई सामान्य चीजें नहीं हैं, इन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, बल्कि यह किसी गंभीर समस्या की चेतावनी हो सकती हैं.&amp;nbsp;हमारा शरीर रातोंरात किसी गंभीर समस्या से ग्रस्त नहीं होता, बल्कि यह किसी गंभीर बीमारी के आने से पहले धीरे-धीरे संकेत देता है, ये संकेत ज्यादा गंभीर तो नहीं होते, लेकिन निरंतर जरूर होते हैं.
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जब आप ठीक महसूस नहीं करते, फिर भी रिपोर्ट सामान्य क्यों आती है?
अधिकतर टेस्ट बड़ी या स्पष्ट बीमारियों को पकड़ने के लिए बनाए जाते हैं, न कि शरीर के शुरुआती लक्षणों को पहचानने के लिए. डॉ. फयाज के अनुसार, शरीर की कई समस्याएं जैसे मेटाबॉलिज्म में बदलाव, पाचन की दिक्कत, थायरॉइड की समस्या और इंसुलिन रेजिस्टेंस-ये सब शुरुआती स्तर पर नजर नहीं आतीं. इसका सीधा मतलब यह है कि थायरॉइड और ब्लड शुगर दिनभर घट-बढ़ सकते हैं, लेकिन उनके साफ लक्षण दिखाई नहीं देते. ICMR के अनुसार मेटाबॉलिक समस्याएं धीरे-धीरे और बिना शोर के बढ़ती हैं. वहीं NIH भी मानता है कि कई बार बड़ी बीमारी का पता चलने से पहले ही शरीर के अंदर बदलाव शुरू हो जाते हैं, यही कारण है कि इंसान बीमार महसूस करता है, लेकिन उसकी रिपोर्ट सामान्य आती है.
छिपी हुई वे समस्याएं जिन्हें आसानी से नजरअंदाज कर दिया जाता है
डॉ. फयाज बताते हैं कि कुछ सामान्य समस्याएं, जिन्हें हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं, जैसे विटामिन B12 और विटामिन D की कमी, थायरॉइड में बदलाव और सही से नींद न आना. ये बदलाव छोटे होते हैं, लेकिन शरीर पर काफी असर डालते हैं. जैसे विटामिन की कमी से कमजोरी और मूड पर असर पड़ता है, पानी की कमी से थकान और सिरदर्द हो सकता है, और नींद पूरी न होने से शरीर में ऊर्जा की कमी हो जाती है, जब ये समस्याएं धीरे-धीरे बढ़ती हैं, तब जाकर इनके लक्षण साफ तौर पर महसूस होने लगते हैं.
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बार-बार टेस्ट से बेहतर जीवनशैली सुधारें और स्वस्थ रहें
ऐसे लक्षणों में बार-बार टेस्ट कराने से बेहतर है जीवनशैली पर ध्यान दें. डॉ. फयाज के अनुसार, नींद, खान-पान, पानी, व्यायाम और तनाव का सही संतुलन रखना ज्यादा फायदेमंद होता है. साथ ही, इन लक्षणों को पहचानना भी जरूरी है. कौन से लक्षण कब होते हैं, क्यों होते हैं और कितनी देर तक रहते हैं. छोटे-छोटे सुधार जैसे अच्छी नींद, सही डाइट और नियमित व्यायाम बड़ी समस्याओं को रोक सकते हैं. अगर लक्षण लंबे समय तक बने रहें, तो डॉक्टर से सलाह लें और उन्हें नजरअंदाज ना करें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 31 Mar 2026 17:30:42 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Blood Clots In Legs Causes: पैरों में क्यों जमा हो जाते हैं खून के थक्के? वैज्ञानिकों ने बता दी डराने वाली वजह</title>
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        <description><![CDATA[ Why Do Blood Clots Form In Legs: पैरों में अचानक दर्द, सूजन या भारीपन महसूस होना कई बार साधारण समस्या लग सकता है, लेकिन इसके पीछे खून के थक्के बनने जैसी गंभीर वजह भी हो सकती है. मेडिकल भाषा में इसे वेनस थ्रॉम्बोसिस कहा जाता है, जिसमें खून गाढ़ा होकर नसों में जमने लगता है और ब्लॉकेज पैदा कर देता है. अगर यही थक्का टूटकर फेफड़ों तक पहुंच जाए, तो यह जानलेवा स्थिति यानी पल्मोनरी एम्बोलिज्म का कारण बन सकता है.
क्या निकली है दिक्कत?
हाल ही में लुंड विश्वविद्यालय के साइंटिस्ट की एक रिसर्च में इस समस्या को लेकर चौंकाने वाली बात सामने आई है. इस स्टडी में पाया गया कि सिर्फ लाइफस्टाइल ही नहीं, बल्कि कुछ खास जीन भी खून के थक्के बनने के खतरे को काफी बढ़ा सकते हैं. यह रिसर्च &quot;माल्मो डाइट एंड कैंसर स्टडी&quot; के तहत करीब 30 हजार लोगों के डेटा पर की गई. इसमें वैज्ञानिकों ने 27 ऐसे जीन का अध्ययन किया, जो ब्लड क्लॉटिंग से जुड़े होते हैं. &amp;nbsp;एनालिसिस के बाद तीन प्रमुख जीन ABO, F8 और VWF की पहचान की गई, जो इस खतरे को बढ़ाते हैं.
रिसर्च के अनुसार, इनमें से हर एक जीन अकेले 10 से 30 प्रतिशत तक जोखिम बढ़ा सकता है. लेकिन अगर किसी व्यक्ति में ऐसे कई जेनेटिक फैक्टर एक साथ मौजूद हों, तो खतरा काफी ज्यादा बढ़ जाता है. जिन लोगों में पांच तक ऐसे जोखिम कारक पाए गए, उनमें ब्लड क्लॉट बनने का खतरा 180 प्रतिशत तक ज्यादा देखा गया. यह खोज इस बात को समझने में मदद करती है कि कुछ लोग बिना किसी स्पष्ट वजह के भी इस समस्या का शिकार क्यों हो जाते हैं. साइंटिस्ट ने यह भी बताया कि &quot;फैक्टर V लीडेन&quot; नाम का एक जेनेटिक म्यूटेशन पहले से जाना जाता है, जो खून के थक्के बनने की प्रवृत्ति को बढ़ाता है.
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लाइफस्टाइल की अहम भूमिका
हालांकि, सिर्फ जीन ही नहीं, लाइफस्टाइल भी इसमें अहम भूमिका निभाता है. लंबे समय तक एक ही जगह बैठे रहना, जैसे लंबी फ्लाइट या सर्जरी के बाद बेड रेस्ट, ब्लड फ्लो को धीमा कर देता है और थक्के बनने का खतरा बढ़ा देता है. इसके अलावा मोटापा, बढ़ती उम्र और ज्यादा लंबाई भी इस जोखिम को बढ़ाने वाले कारक माने गए हैं. खानपान भी इसमें भूमिका निभा सकता है. कुछ स्टडीज में यह संकेत मिला है कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड ज्यादा खाने से खतरा बढ़ सकता है, जबकि फलों, सब्जियों और ओमेगा-3 फैटी एसिड से भरपूर डाइट जोखिम को कम करने में मदद कर सकती है.
इलाज को और बेहतर बनाया जा सकता है
एक्सपर्ट का मानना है कि भविष्य में इस तरह की जेनेटिक जानकारी के आधार पर इलाज को और बेहतर बनाया जा सकता है. इससे यह तय करने में मदद मिलेगी कि किस मरीज को कितने समय तक ब्लड थिनर दवाओं की जरूरत है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 31 Mar 2026 02:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>Heart Blockage Symptoms: धमनियों में जमा प्लाक बढ़ा सकता है मुसीबत, कार्डियोलॉजिस्ट से जानें हार्ट ब्लॉकेज की वॉर्निंग</title>
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        <description><![CDATA[ Early Symptoms Of Heart Artery Blockage: हार्ट ब्लॉकेज यानी कोरोनरी आर्टरी डिजीज एक ऐसी स्थिति है जिसमें दिल तक खून पहुंचाने वाली आर्टरीज संकरी या ब्लॉक होने लगती हैं. ऐसा आमतौर पर आर्टरीज में प्लाक जमा होने की वजह से होता है, जिससे हार्ट तक ऑक्सीजन युक्त ब्लड फ्लो कम हो जाता है. यह स्थिति आगे चलकर हार्ट अटैक का खतरा भी बढ़ा सकती है. अक्सर लोग दिल की बीमारी को अचानक होने वाले तेज सीने के दर्द से जोड़कर देखते हैं, लेकिन एक्सपर्ट्स के मुताबिक इसके कई शुरुआती संकेत बहुत हल्के होते हैं और लोग उन्हें नजरअंदाज कर देते हैं.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
कार्डियक साइंसेज के एक्सपर्ट डॉक्टर प्रवीण रमण मिश्रा ने &amp;nbsp;TOI को बताया कि हार्ट की धमनियों में ब्लॉकेज होने पर सबसे सामान्य लक्षण सीने में दर्द या दबाव हो सकता है. कई लोग इसे सीने में भारीपन, जकड़न या जलन जैसा महसूस करते हैं. हालांकि यह दर्द हमेशा तेज नहीं होता, बल्कि कई बार आता-जाता रहता है, खासकर जब व्यक्ति फिजिकल एक्टिविटी करता है या तनाव में होता है. इसके अलावा सांस फूलना भी एक अहम संकेत हो सकता है. कुछ लोगों को सीढ़ियां चढ़ते समय, थोड़ी दूरी चलने पर या सामान्य काम करते हुए भी सांस लेने में कठिनाई महसूस होने लगती है.
क्या होते हैं लक्षण?
डॉक्टर बताते हैं कि हार्ट ब्लॉकेज होने पर असामान्य थकान भी महसूस हो सकती है. जब हार्ट तक पर्याप्त ऑक्सीजन वाला खून नहीं पहुंचता, तो शरीर में लगातार कमजोरी और थकान महसूस होती है. कई मामलों में दर्द सिर्फ सीने तक सीमित नहीं रहता बल्कि हाथों, गर्दन, जबड़े या पीठ तक फैल सकता है. लोग अक्सर इसे मसल्स के दर्द या गैस-एसिडिटी समझ लेते हैं. इसके अलावा चक्कर आना, मतली महसूस होना या बिना किसी खास वजह के ज्यादा पसीना आना भी चेतावनी के संकेत हो सकते हैं, खासकर जब ये लक्षण फिजिकल एक्टिविटी के दौरान दिखाई दें.
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कैसे कर सकते हैं कंट्रोल?
एक्सपर्ट के मुताबिक हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, धूम्रपान, हाई कोलेस्ट्रॉल और किसी तरह की शारीरिक एक्टिविटी का न होना हार्ट की आर्टरीज में ब्लॉकेज का खतरा बढ़ा सकती है. इसलिए दिल की सेहत बनाए रखने के लिए रेगुलर व्यायाम, संतुलित आहार और समय-समय पर हेल्थ चेकअप कराना बेहद जरूरी है. अगर इसके लक्षण बार-बार दिखाई दें या बढ़ने लगें, तो तुरंत कार्डियोलॉजिस्ट से सलाह लेना बेहतर माना जाता है, ताकि समय रहते गंभीर दिक्कतों से बचा जा सके. अगर आप इन लक्षणों कोे इग्नोर करेंगे, तो हो सकता है कि आगे चलकर आपको दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 31 Mar 2026 02:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Heart, Blockage, Symptoms:, धमनियों, में, जमा, प्लाक, बढ़ा, सकता, है, मुसीबत, कार्डियोलॉजिस्ट, से, जानें, हार्ट, ब्लॉकेज, की, वॉर्निंग</media:keywords>
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        <title>Causes Of Premature Ageing: 8 घंटे से ज्यादा बैठना स्मोकिंग जितना खतरनाक! जानें वे 8 आदतें, जो समय से पहले बना रहीं बूढ़ा</title>
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        <description><![CDATA[ Everyday Habits That Make You Age Faster: आजकल हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाना ट्रेंड बन गया है. लोग शराब छोड़ रहे हैं, जंक फूड से दूरी बना रहे हैं और फिट रहने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन इसके बावजूद एक सच्चाई ऐसी है जिसे हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं, वह है कि हमारी रोजमर्रा की कुछ आदतें धीरे-धीरे उम्र बढ़ाने का काम कर रही होती हैं. एजिंग सिर्फ झुर्रियों या सफेद बालों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शरीर के अंदर, सेल्स के स्तर पर भी होती है. चलिए इनके बारे में बताते हैं.&amp;nbsp;
लंबे समय तक बैठे रहना
सबसे पहली आदत है लंबे समय तक बैठे रहना. 13 स्टडीज पर आधारित यूएस नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन में पब्लिश एक मेटा-एनालिसिस, जिसमें 10 लाख से ज्यादा लोग शामिल थे, यह दिखाता है कि जो लोग रोज 8 घंटे से ज्यादा बैठते हैं और एक्सरसाइज नहीं करते, उनमें मृत्यु का खतरा मोटापे या स्मोकिंग जितना हो सकता है. हालांकि, रोज 60-75 मिनट की फिजिकल एक्टिविटी इस खतरे को कम कर सकती है। लंबे समय तक बैठे रहने से मेटाबॉलिज्म धीमा होता है और शरीर के डीएनए के टेलोमीयर तेजी से छोटे होते हैं, जो एजिंग को बढ़ाते हैं.&amp;nbsp;
नींद की कमी
दूसरी बड़ी वजह है नींद की कमी. अगर आप सोचते हैं कि 5 घंटे की नींद काफी है, तो यह शरीर के साथ समझौता है. नेशनल हार्ट लंग्स एंड ब्लड इंस्टिट्यूट के अनुसार, उम्र के हिसाब से नींद की जरूरत अलग-अलग होती है और इसकी अनदेखी लंबे समय में स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ा सकती है. &amp;nbsp;नींद के दौरान शरीर खुद को रिपेयर करता है, हार्मोन बैलेंस करता है और एनर्जी को रिस्टोर करता है. &amp;nbsp;लगातार नींद पूरी न होने से स्किन, इम्यूनिटी और याददाश्त पर असर पड़ता है.
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तनाव में रहने की आदत
तीसरी आदत है लगातार तनाव में रहना, जब तनाव लंबे समय तक बना रहता है, तो शरीर में कोर्टिसोल बढ़ता है, जो त्वचा को नुकसान पहुंचाता है और झुर्रियों को जल्दी लाता है। इसके अलावा यह दिल, डाइजेशन और मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर डालता है.&amp;nbsp;
स्क्रीन टाइम और कम पानी पीने की समस्या
चौथी समस्या है जरूरत से ज्यादा स्क्रीन टाइम. मोबाइल और लैपटॉप का अधिक इस्तेमाल नींद के चक्र को बिगाड़ता है और ब्लू लाइट के कारण स्किन पर भी असर डाल सकता है. देर रात तक स्क्रीन देखने की आदत एजिंग को तेज कर सकती है. पांचवीं आदत है पानी कम पीना. डिहाइड्रेशन से त्वचा बेजान दिखती है और शरीर के कई जरूरी फंक्शन धीमे पड़ जाते हैं. पानी शरीर को डिटॉक्स करने और सही तरीके से काम करने में मदद करता है.
ये भी आदतें शामिल
छठी आदत है ज्यादा चीनी और प्रोसेस्ड फूड का सेवन. ज्यादा शुगर शरीर में ग्लाइकेशन प्रक्रिया को बढ़ाती है, जिससे त्वचा की इलास्टिसिटी कम हो जाती है और झुर्रियां जल्दी आती हैं. सातवीं आदत है स्ट्रेंथ ट्रेनिंग को नजरअंदाज करना. उम्र के साथ मसल्स कम होते हैं और अगर एक्सरसाइज न की जाए तो यह प्रक्रिया तेज हो जाती है, जिससे शरीर कमजोर और सुस्त हो सकता है. आठवीं और अहम आदत है सोशल कनेक्शन को नजरअंदाज करना. रिसर्च में पाया गया है कि अकेलापन और सामाजिक दूरी समय से पहले मौत के खतरे को बढ़ा सकते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 31 Mar 2026 02:30:06 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Benefits Of Eating Figs: क्या आप भी अंजीर को समझते हैं मामूली मेवा? हड्डियों से दिल तक इसके फायदे उड़ा देंगे आपके होश!</title>
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        <description><![CDATA[ Benefits Of Soaked Figs In The Morning: आजकल सुपरफूड्स की चर्चा में अक्सर महंगे और विदेशी विकल्प छा जाते हैं, लेकिन एक साधारण सा फल अंजीर भी हमारी सेहत के लिए उतना ही फायदेमंद हो सकता है. डॉ.&amp;nbsp; शुभम वात्स्य ने हाल ही में इस पर ध्यान दिलाते हुए अपने सोशल मीडिया पोस्ट में बताया कि लोग अंजीर के पोषण को अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि यह शरीर के लिए कई तरह से लाभकारी है. चलिए आपको बताते हैं कि उन्होंने इसके बारे में क्या बताया और यह हमारे लिए कैसे फायदेमंद है.&amp;nbsp;
किस तरह हमारे लिए फायदेमंद?
फोर्ट हॉस्पिटल वसंत कुंज के सीनियर गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट और हेपेटोलॉजिस्ट डॉ. वात्स्य के मुताबिक, अंजीर खास तौर पर डाइजेशन के लिए बेहद फायदेमंद है। इसमें घुलनशील और अघुलनशील दोनों तरह का फाइबर पाया जाता है, जो इसे अन्य फलों से अलग बनाता है. यही वजह है कि यह कब्ज की समस्या में राहत देने में मदद करता है और मल को नरम बनाकर पाचन प्रक्रिया को आसान करता है. लेकिन अंजीर के फायदे सिर्फ पाचन तक सीमित नहीं हैं. यह शरीर को कई और जरूरी पोषक तत्व भी देता है. उदाहरण के तौर पर, इसमें कैल्शियम की अच्छी मात्रा होती है, जो हड्डियों को मजबूत बनाने में मदद करती है. जिन लोगों को बोन डेंसिटी की समस्या है, उनके लिए अंजीर एक नेचुरल विकल्प बन सकता है.&amp;nbsp;
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एनर्जी का अच्छा विकल्प
इसके अलावा, अंजीर में मौजूद आयरन शरीर की एनर्जी को बढ़ाने में मदद करता है. यह शरीर के मेटाबॉलिज्म को सपोर्ट करता है, जिससे दिनभर एक्टिव रहने में आसानी होती है. वहीं, इसमें मौजूद पोटैशियम, मैग्नीशियम और एंटीऑक्सीडेंट्स दिल की सेहत के लिए फायदेमंद माने जाते हैं. ये तत्व ब्लड प्रेशर को संतुलित रखने में मदद करते हैं और हार्ट को स्वस्थ बनाए रखते हैं.&amp;nbsp;
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कोलेस्ट्रॉल को करता है कंट्रोल
डॉ. वात्स्य आगे बताते हैं कि अंजीर का फाइबर कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल करने में भी मदद करता है. नियमित सेवन से शरीर में खराब कोलेस्ट्रॉल का स्तर कम हो सकता है, जिससे हार्ट से जुड़ी बीमारियों का खतरा घटता है. अंजीर खाने का सही तरीका भी उतना ही जरूरी है। सूखे अंजीर को सीधे खाने के बजाय रातभर पानी में भिगोकर सुबह खाने की सलाह दी जाती है. इससे यह नरम हो जाता है और पाचन में आसानी होती है। रोजाना 2 से 3 भीगे हुए अंजीर लेना पर्याप्त माना जाता है. अगर अंजीर का सही तरीके से सेवन किया जाए, तो यह रोजमर्रा की डाइट में एक उपयोगी हिस्सा बन सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 31 Mar 2026 02:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>Floaters And Flashes In Eyes: क्या आपकी आंखों में भी नजर आते हैं धब्बे? तुरंत भागें डॉक्टर के पास, वरना...</title>
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        <description><![CDATA[ When Eye Floaters Are Dangerous: क्या आपकी आंखों के सामने छोटे-छोटे धब्बे, लकीरें या तैरती हुई आकृतियां नजर आती हैं? अगर हां, तो इसे हल्के में लेना ठीक नहीं है. आमतौर पर यह समस्या सामान्य मानी जाती है, लेकिन कुछ मामलों में यह गंभीर बीमारी का संकेत भी हो सकती है. आंखों में दिखाई देने वाले इन धब्बों को मेडिकल भाषा में &quot;आई फ्लोटर्स&quot; कहा जाता है. ये अक्सर उम्र बढ़ने या नजर कमजोर होने के साथ दिखाई देते हैं.&amp;nbsp;
छोटी रेखाओं या धुंधले धब्बों की तरह दिखना
कई बार ये छोटी-छोटी रेखाओं या धुंधले धब्बों की तरह नजर आते हैं, जो आंखों के सामने तैरते हुए महसूस होते हैं. आमतौर पर पलक झपकाने पर ये कम हो जाते हैं और दिमाग भी इन्हें नजरअंदाज कर देता है, &amp;nbsp;लेकिन हाल ही में Radboud University Medical Center की एक स्टडी में इन फ्लोटर्स को लेकर चेतावनी दी गई है. मार्च 2026 में सामने आई इस रिसर्च के मुताबिक, अगर ये धब्बे लगातार दिखने लगें या अचानक बढ़ जाएं, तो यह आंखों की गंभीर समस्या का संकेत हो सकता है.&amp;nbsp;
किस दिक्कत की चेतावनी?
यह रिसर्च Annals of Family Medicine में प्रकाशित हुई है, जिसमें करीब 42 हजार मरीजों के डेटा का एनालिसिस किया गया. इसमें पाया गया कि जिन लोगों को बार-बार फ्लोटर्स, रोशनी की फ्लैश या दोनों लक्षण दिखाई दिए, उनमें से कुछ मामलों में रेटिना डिटैचमेंट जैसी गंभीर समस्या सामने आई. रेटिना डिटैचमेंट एक ऐसी स्थिति होती है, जिसमें आंख की अंदरूनी परत अपनी जगह से अलग होने लगती है. यह आंख का बेहद अहम हिस्सा होता है, जो रोशनी को पहचानने का काम करता है. अगर समय पर इसका इलाज न हो, तो यह नजर जाने तक की स्थिति पैदा कर सकता है.
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किन लोगों में बढ़ता है जोखिम?
स्टडी में यह भी सामने आया कि जिन लोगों को फ्लोटर्स के साथ-साथ फ्लैश दिखाई देते हैं, उनमें जोखिम और बढ़ जाता है. हालांकि यह खतरा हर किसी में नहीं होता, लेकिन इसे नजरअंदाज करना भी सही नहीं माना जाता. ब्रिटेन की हेल्थ सर्विस NHS के मुताबिक, कई बार यह समस्या &quot;पोस्टीरियर विट्रियस डिटैचमेंट&quot; के कारण होती है, जो आमतौर पर नुकसानदेह नहीं होती. इसमें आंख के अंदर मौजूद जेल जैसी संरचना में बदलाव होता है और कोलेजन के छोटे-छोटे गुच्छे बन जाते हैं. फिर भी, अगर ये धब्बे अचानक ज्यादा दिखने लगें, लगातार बने रहें या इसके साथ रोशनी की चमक, छाया या नजर धुंधली होने जैसी दिक्कतें हों, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 31 Mar 2026 02:30:05 +0530</pubDate>
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        <title>Liver Disease Symptoms: क्या आपकी हथेलियां भी रहती हैं लाल? डॉक्टर ने दी चेतावनी, लिवर की बीमारी का हो सकता है संकेत</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/liver-disease-symptoms-क्या-आपकी-हथेलियां-भी-रहती-हैं-लाल-डॉक्टर-ने-दी-चेतावनी-लिवर-की-बीमारी-का-हो-सकता-है-संकेत</link>
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        <description><![CDATA[ How Hands Reveal Liver Damage: लिवर हमारे शरीर में हर दिन चुपचाप सैकड़ों अहम काम करता है. खून को साफ करना, पाचन में मदद करना और हार्मोन को संतुलित रखना, ये सब जिम्मेदारियां इसी अंग पर होती हैं. लेकिन जब लिवर की सेहत बिगड़ने लगती है, तो वह हमेशा तेज लक्षणों के जरिए चेतावनी नहीं देता. कई बार इसके शुरुआती संकेत बहुत साधारण होते हैं और अक्सर लोग उन्हें नजरअंदाज कर देते हैं. हैरानी की बात यह है कि लिवर से जुड़ी कुछ अहम जानकारियां आपके हाथों में भी छिपी हो सकती हैं.
हथेलियों का लाल होना, त्वचा में खुजली, नाखूनों का पीला या कमजोर होना, या उंगलियों में हल्का कंपन, ये सभी फैटी लिवर, हेपेटाइटिस या सिरोसिस जैसी बीमारियों के शुरुआती संकेत हो सकते हैं. अगर इन बदलावों को समय रहते पहचान लिया जाए, तो गंभीर मुश्किलों से बचाव संभव है.
हाथ कैसे बताते हैं लिवर की सेहत का हाल?
डॉक्टरों के अनुसार, हाथ हमारे अंदरूनी स्वास्थ्य का आईना होते हैं. हथेलियों का रंग, नाखूनों की बनावट और उंगलियों की मूवमेंट से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि लिवर सही तरीके से काम कर रहा है या नहीं. Journal of Clinical and Experimental Hepatology में पब्लिश स्टडी के मुताबिक, लाल हथेलियां और नाखूनों में बदलाव, क्रॉनिक लिवर डिजीज की प्रगति से जुड़े हो सकते हैं. &amp;nbsp;इसके लक्षण कुछ इस तरह होते हैं-&amp;nbsp;
उंगलियों का मुड़ना या अकड़ना&amp;nbsp;
अगर आपकी उंगलियां धीरे-धीरे अंदर की ओर मुड़ने लगें या हथेली में खिंचाव महसूस हो, तो यह ड्यूप्यूट्रेन कॉन्ट्रैक्चर हो सकता है. यह समस्या तब होती है, जब हथेली के नीचे की त्वचा मोटी और सख्त होने लगती है. यह सिरोसिस जैसी क्रॉनिक लिवर बीमारियों और ज्यादा शराब पीने वालों में ज्यादा देखी जाती है.
सफेद नाखून और ऊपर गुलाबी लाइन
अगर नाखून ज्यादातर सफेद दिखें और उनके सिरे पर हल्की गुलाबी या लाल पट्टी नजर आए, तो यह टेरीज नेल्स हो सकते हैं. यह बदलाव लिवर सिरोसिस में खून के प्रवाह और प्रोटीन लेवल में गड़बड़ी के कारण होता है.
नाखूनों का उभरा और गोल होना
नाखूनों और उंगलियों का गोल और फूला हुआ दिखना आमतौर पर फेफड़ों या दिल की बीमारी से जुड़ा माना जाता है, लेकिन यह लंबे समय से चली आ रही लिवर बीमारी में भी देखा जा सकता है. लगातार ऐसा दिखे तो मेडिकल जांच जरूरी है.
हाथों में फड़फड़ाहट या कंपन
अगर हाथ फैलाने पर उनमें अनियंत्रित झटके या फड़फड़ाहट हो, तो इसे एस्टेरिक्सिस कहा जाता है. यह एडवांस लिवर डिजीज की गंभीर स्थिति हेपेटिक एन्सेफैलोपैथी का संकेत हो सकता है और तुरंत इलाज की जरूरत होती है.
हथेलियों और तलवों में लगातार खुजली
बिना किसी रैश के हथेलियों और पैरों के तलवों में तेज खुजली होना बाइल के जमाव का संकेत हो सकता है. यह समस्या रात में या गर्म पानी से नहाने के बाद ज्यादा बढ़ सकती है.
कब डॉक्टर से मिलना जरूरी?
अगर हाथों में ऐसे बदलाव दिखें जैसे लाल हथेलियां, नाखूनों का अजीब रंग, कंपन या लगातार खुजली, तो इन्हें नजरअंदाज न करें. समय पर जांच से लिवर को होने वाले गंभीर नुकसान को रोका जा सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 29 Mar 2026 22:30:39 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Knee Clicking Sound Causes: घुटना मोड़ने पर आ रही कट&amp;कट की आवाज, क्या आ गया रिप्लेसमेंट का टाइम?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/knee-clicking-sound-causes-घुटना-मोड़ने-पर-आ-रही-कट-कट-की-आवाज-क्या-आ-गया-रिप्लेसमेंट-का-टाइम</link>
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        <description><![CDATA[ Why Does My Knee Make Clicking Sounds When Bending: घुटना मोड़ते समय अगर कट-कट या चटकने की आवाज आने लगे, तो अक्सर लोग घबरा जाते हैं और सोचते हैं कि कहीं अब घुटना बदलवाने यानी रिप्लेसमेंट का समय तो नहीं आ गया. लेकिन एक्सपर्ट्स के मुताबिक, हर बार ऐसी आवाज किसी गंभीर बीमारी का संकेत नहीं होती. चलिए आपको बताते हैं कि कब यह गंभीर बीमारी का संकेत होता है और कब आपको घबराने की जरूरत नहीं होती है.&amp;nbsp;
क्यों आती है आवाज?
हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली बेवसाइट healthline की रिपोर्ट के अनुसार, डॉक्टर इस तरह की आवाज को &quot;क्रेपिटस&quot; कहते हैं. &amp;nbsp;यह आवाज तब सुनाई देती है जब आप घुटना मोड़ते, सीधा करते या सीढ़ियां चढ़ते-उतरते हैं. &amp;nbsp;इसमें पॉपिंग, क्लिकिंग, ग्राइंडिंग या खड़कने जैसी आवाज शामिल हो सकती है. अच्छी बात यह है कि ज्यादातर मामलों में यह स्थिति सामान्य होती है और किसी बड़े खतरे का संकेत नहीं होती. कई लोगों को बिना किसी दर्द के भी ऐसी आवाजें सुनाई देती हैं. रिसर्च में भी पाया गया है कि केवल आवाज आने से मूवमेंट या लाइफस्टाइल पर ज्यादा असर नहीं पड़ता.
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कब होती है दिक्कत?
हालांकि, कुछ मामलों में यह ऑस्टियोआर्थराइटिस जैसी समस्या से जुड़ा हो सकता है. अगर आवाज के साथ सूजन, दर्द, जकड़न, घुटने को मोड़ने-सीधा करने में दिक्कत, मांसपेशियों की कमजोरी या घुटने का अस्थिर होना जैसे लक्षण भी दिखें, तो यह संकेत हो सकता है कि अंदरूनी समस्या है. एक्सपर्ट्स बताते हैं कि सिर्फ आवाज आने पर आमतौर पर इलाज की जरूरत नहीं होती. लेकिन अगर इसके साथ दर्द भी हो, तो डॉक्टर जांच करके सही कारण पता लगाते हैं और उसी के अनुसार इलाज तय किया जाता है. अगर ऑस्टियोआर्थराइटिस जैसी समस्या सामने आती है, तो इसके लिए कई तरह के इलाज उपलब्ध हैं. इसमें वजन कंट्रोल करना, नियमित एक्सरसाइज करना, दर्द कम करने वाली दवाओं का इस्तेमाल, फिजियोथेरेपी और जरूरत पड़ने पर इंजेक्शन जैसी चीजें शामिल हो सकती हैं.
क्या बदलवाने की जरूरत होती है?
सबसे अहम सवाल यही होता है कि क्या ऐसी आवाज आने का मतलब घुटना बदलवाने की जरूरत है? एक्सपर्ट्स के अनुसार, सिर्फ आवाज के आधार पर ऐसा फैसला नहीं लिया जाता. घुटना रिप्लेसमेंट तब ही जरूरी होता है जब दर्द बहुत ज्यादा हो, चलना-फिरना मुश्किल हो जाए और बाकी इलाज असर न कर रहे हों. इसलिए अगर घुटना मोड़ने पर आवाज आ रही है, लेकिन दर्द नहीं है, तो घबराने की जरूरत नहीं है. वहीं, अगर इसके साथ अन्य लक्षण भी दिखाई दें, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी हो जाता है, ताकि समय रहते सही इलाज किया जा सके.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 29 Mar 2026 22:30:28 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Knee, Clicking, Sound, Causes:, घुटना, मोड़ने, पर, आ, रही, कट-कट, की, आवाज, क्या, आ, गया, रिप्लेसमेंट, का, टाइम</media:keywords>
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        <title>Covid Vaccine Side Effects: अब मेडिकल रिकॉर्ड में दर्ज होंगी कोविड वैक्सीन से होने वाली दिक्कतें? इस देश ने बना लिया प्लान</title>
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        <description><![CDATA[ 
covid vaccine side effects:&amp;nbsp; कोविड-19 महामारी को करीब 6 साल हो चुके हैं. इस महामारी के चलते दुनियाभर में लाखों लोगों ने अपनी जान गवाई थी. हालांकि, इसका असर आज भी पूरी दुनिया में महसूस किया जाता है, क्योंकि इससे जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं और वैक्सीन के साइड इफेक्ट्स को लेकर बहस लगातार जारी है. इस बीच एक देश कोविड वैक्सीन से होने वाली संभावित दिक्कतों को लेकर बड़ा कदम उठाने की तैयारी में है. अमेरिका अब कोविड वैक्सीन से होने वाली दिक्कतें मेडिकल रिकॉर्ड में दर्ज करने का प्लान बना रहा है.
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क्या कोविड वैक्सीन को लेकर क्या है पूरा मामलाअमेरिका से एक खबर सामने आई है, वहां स्वास्थ्य अधिकारी कोविड वैक्सीन से होने वाली संभावित दिक्कतों को लेकर बड़ा कदम उठाने की तैयारी में है. अमेरिका में ट्रंप एडमिनिस्ट्रेशन के हेल्थ अधिकारियों ने एक प्रस्ताव पर विचार शुरू किया है, जिसके तहत कोविड-19 वैक्सीन से जुड़े दुष्प्रभाव को मेडिकल रिकॉर्ड्स में अलग से दर्ज करने के लिए नया कोड बनाया जा सकता है. यह कोड डॉक्टरों की ओर से इस्तेमाल किए जाने वाले आईसीडी-10 सिस्टम में शामिल किया जाएगा. अभी तक इस सिस्टम में आम वैक्सीन से जुड़े रिएक्शन और कुछ खास वैक्सीन के रिएक्शन को कवर करता है, लेकिन इसमें कोविड वैक्सीन के लिए कोई डेजिग्नेशन नहीं है, जिसकी सेफ्टी एडमिनिस्ट्रेशन के अंदर बहस का एक बड़ा मुद्दा बन गई है.इस फैसले से क्या होगा फायदा बताया जा रहा है कि अगर यह प्रस्ताव लागू होता है तो डॉक्टर ऐसे मामलों की बेहतर पहचान कर सकेंगे, जहां कोविड वैक्सीन के बाद कुछ मरीजों को साइड इफेक्ट हुए हैं. CDC की हेल्थ इन्फॉर्मेशन स्पेशलिस्ट मैरी स्टैनफिल इस प्रपोजल को लेकर कहा कि कोड का इस्तेमाल इंश्योरेंस पेमेंट के साथ-साथ रिसर्च और स्टैटिस्टिकल एनालिसिस के लिए भी किया जाता है. इसके अलावा मेडिकल रिकॉर्ड में स्पष्ट जानकारी होने से बीमा दावों और स्वास्थ्य से जुड़े दूसरे पहलुओं पर भी असर पड़ सकता है. बताया जा रहा है कि इस प्रस्ताव पर फिलहाल लोगों से सुझाव मांगे गए हैं, जिनकी अंतिम तारीख मई तय की गई है. इसे मंजूरी मिलती है तो नया कोड 2027 तक लागू किया जा सकता है. एक्सपर्ट्स की क्या है राय कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस तरह का कोड बनने से मरीजों की पहचान और इलाज में मदद मिलेगी. वहीं कई पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट्स का कहना है कि अभी इस विषय पर और गहराई से रिसर्च की जरूरत है. उनका कहना है कि कोविड वैक्सीन से जुड़े लक्षणों और उनके कारणों को पूरी तरह समझे बिना नई मेडिकल कैटिगरी बनाना सही नहीं होगा.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Sun, 29 Mar 2026 10:30:09 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Nutrient Deficiency Causes: हेल्दी डाइट लेते हैं, फिर भी क्यों रहती है डेफिशिएंसी? डॉक्टर ने बता दी हकीकत</title>
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        <description><![CDATA[ Nutrient Deficiency Causes: आज के समय में लोग हेल्दी खाने पर काफी ध्यान देने लगे हैं. घर का बना खाना, फल, सब्जियां और संतुलित डाइट लेने के बावजूद कई लोग कमजोरी, थकान या बार-बार बीमार होने की शिकायत करते हैं. जांच करने पर आयरन, विटामिन बी12 या विटामिन डी की कमी सामने आती है. डॉक्टरों का कहना है कि यह समस्या सिर्फ खाने में नहीं बल्कि शरीर की ओर से पोषक तत्वों को सही तरीके से न सोख पाने में भी हो सकती है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि क्या आपको भी हेल्दी डाइट लेने के बाद भी डेफिशिएंसी रहती है और डॉक्टर ने इसके पीछे की हकीकत क्या बताई.
पाचन की गड़बड़ी बन सकती है बड़ी वजह&amp;nbsp;
डॉक्टरों के अनुसार, खाना खाने के बाद उसका सही तरीके से पाचन बहुत जरूरी है. अगर पेट में एसिड कम बनता है या डाइजेस्टिव एंजाइम्स कमजोर होते हैं तो खाना सही तरीके से टूट नहीं पाता है. ऐसी कंडीशन में शरीर जरूरी पोषक तत्व को सूचित नहीं कर पाता और धीरे-धीरे शरीर में पोषक तत्व की कमी होने लगती है.&amp;nbsp;
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आंतों की सेहत भी है जरूरी
छोटी आंत में मौजूद सूक्ष्म संरचनाएं पोषक तत्वों को खून में पहुंचाने का काम करती है. अगर इनमें किसी तरह की सूजन या नुकसान होता है तो आयरन, कैल्शियम और विटामिन बी12 जैसे पोषक तत्व शरीर तक नहीं पहुंच पाते. कई बार सीलिएक डिजीज या आतों से जुड़ी समस्याएं लंबे समय तक बिना लक्षण के बनी रहती है और शरीर में पोषक तत्व की कमी बढ़ती रहती है.&amp;nbsp;
खाने खाने की क्वालिटी भी बदल रही है सेहत&amp;nbsp;
एक्सपर्ट का मानना है की मिट्टी के गुणवत्ता में गिरावट और आधुनिक खेती के तरीकों के कारण फसलों में पोषक तत्व पहले जैसे नहीं रहे. वहीं प्रोसेस्ड फूड पेट तो भर देता है, लेकिन पर्याप्त पोषण नहीं देता. जिससे हमेशा पोषण की कमी की स्थिति बनी रहती है. वहीं डॉक्टर के अनुसार हर शरीर की पोषण संबंधी जरूरत एक जैसी नहीं होती है. तनाव, बीमारी या लाइफस्टाइल के अनुसार बदलती रहती है. वही प्रेग्नेंट महिलाओं, स्पोर्ट्स पर्सन या लंबे समय तक काम करने वालों को सामान्य से ज्यादा पोषक तत्व की जरूरत होती है.&amp;nbsp;
रोजाना की आदतें भी डालती है असर&amp;nbsp;
ज्यादा चाय कॉफी पीने से आयरन का अवशोषण कम हो सकता है. शराब का सेवन विटामिन स्टोरेज और आंतों की सेहत को प्रभावित करता है. वहीं कुछ दवाइयां जैसे एंटासिड, एंटीबायोटिक या मेटफार्मिन के लंबे इस्तेमाल से शरीर में पोषक तत्वों का अवशोषण कम हो सकता है. इसके अलावा पोषक तत्व की कमी अचानक नहीं होती, बल्कि समय के साथ बढ़ती है. लगातार थकान, बाल झड़ना या बार-बार संक्रमण होना या ध्यान केंद्रित करने में दिक्कत जैसे लक्षण इसके संकेत हो सकते हैं.&amp;nbsp;
सिर्फ डाइट नहीं अब्जॉर्प्शन भी जरूर सुधारना भी जरूरी&amp;nbsp;
डॉक्टरों के अनुसार, समस्या को ठीक करने के लिए सिर्फ ज्यादा खाना ही काफी नहीं है. आंतों की सेहत सुधारना जरूरी है. इसके लिए दही या छाछ जैसे फर्मेंटेड फूड, फाइबर से भरपूर आहार और सही फूड कांबिनेशन अपनाना जरूरी है. डॉक्टरों के अनुसार कैफीन और शराब का सेवन भी कम करना चाहिए. अगर पोषक तत्वों की कमी बनी रहती है तो डॉक्टरों से परामर्श भी ले सकते हैं.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 28 Mar 2026 18:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Nutrient, Deficiency, Causes:, हेल्दी, डाइट, लेते, हैं, फिर, भी, क्यों, रहती, है, डेफिशिएंसी, डॉक्टर, ने, बता, दी, हकीकत</media:keywords>
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        <title>Weight Loss Drugs In India: बिना जिम&amp;डाइट वजन घटाने वाली दवाओं का काला सच,  एक्सपर्ट्स ने बताया क्यों हैं ये खतरनाक!</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/weight-loss-drugs-in-india-बिना-जिम-डाइट-वजन-घटाने-वाली-दवाओं-का-काला-सच-एक्सपर्ट्स-ने-बताया-क्यों-हैं-ये-खतरनाक</link>
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        <description><![CDATA[ Are GLP-1 Weight Loss Drugs Safe Without Prescription: भारत में तेजी से लोकप्रिय हो रही वेट लॉस दवाओं को लेकर अब बड़ा अलर्ट जारी किया गया है. खासतौर पर GLP-1 ग्लूकागन-लाइक पेप्टाइड-1 दवाओं के बढ़ते इस्तेमाल पर एक्सपर्ट ने चिंता जताई है. मेदांता हॉस्पिटल के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर प्रसिद्ध कार्डियोवैस्कुलर सर्जन डॉ. नरेश त्रेहान &amp;nbsp;ने बिना डॉक्टर की सलाह के इन दवाओं के इस्तेमाल को खतरनाक बताया है, उनका कहना है कि ये दवाएं लाइफस्टाइल प्रोडक्ट नहीं हैं, बल्कि गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए बनाई गई हैं.&amp;nbsp;
दरअसल, हाल ही में इन दवाओं का पेटेंट खत्म होने के बाद भारत में इनके सस्ते जेनेरिक वर्जन बड़ी संख्या में उपलब्ध हो गए हैं. इसके चलते ऑनलाइन फार्मेसी और वेलनेस क्लीनिक के जरिए इनकी बिक्री तेजी से बढ़ी है. सोशल मीडिया पर तेजी से वजन घटाने के ट्रेंड ने भी इसकी मांग को और बढ़ा दिया है, जिससे लोग बिना पूरी जानकारी के इनका इस्तेमाल करने लगे हैं.&amp;nbsp;
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सरकार ने सख्ती की
सरकार ने इस बढ़ते चलन को देखते हुए सख्ती शुरू कर दी है. देशभर में 49 जगहों पर छापेमारी की गई, जिसमें वेयरहाउस, मेडिकल स्टोर और वेलनेस सेंटर शामिल थे. जांच में सामने आया कि कई जगहों पर ये दवाएं बिना प्रिस्क्रिप्शन के बेची जा रही थीं या नियमों का सही तरीके से पालन नहीं किया जा रहा था. इसके बाद ड्रग रेगुलेटर ने साफ चेतावनी दी है कि ऐसी गतिविधियों पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी.&amp;nbsp;
एक्सपर्ट का क्या है कहना?
डॉ. नरेश त्रेहान के मुताबिक, ये दवाएं वजन कम करने में असरदार जरूर हैं, लेकिन इनके साइड इफेक्ट्स भी कम नहीं हैं. ऐसे में अगर कोई व्यक्ति खुद से दवा लेना शुरू कर देता है, तो उसके लिए जोखिम काफी बढ़ सकता है.डॉ. त्रेहान ने स्पष्ट कहा कि इस तरह की दवाएं ओवर-द-काउंटर या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर आसानी से उपलब्ध नहीं होनी चाहिए. उनके अनुसार, कई लोग इसे आसान तरीका मानकर बिना एक्सरसाइज या डाइट के वजन कम करने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं, जो बेहद खतरनाक हो सकता है. इन दवाओं के दुष्प्रभावों में पैंक्रियाटाइटिस, मितली, उल्टी और लीवर पर असर जैसी समस्याएं शामिल हैं, जो गंभीर रूप ले सकती हैं.
&amp;nbsp;

#WATCH | Gurugram, Haryana: Chairman &amp;amp; MD, Medanta, Dr Naresh Trehan says, &quot;When patent of GLP-1 drug expired, several pharmaceutical companies introduced its generic version. When these were introduced, it was seen that they were freely accessible to the public. So, the Health&amp;hellip; pic.twitter.com/cK4VHPx2Qt
&amp;mdash; ANI (@ANI) March 26, 2026



लोगों को भी रखना चाहिए ध्यान
डॉ. त्रेहान ने कहा कि मरीजों की जिम्मेदारी है कि वे किसी भी दवा का इस्तेमाल डॉक्टर की सलाह से ही करें. उन्होंने लोगों को चेतावनी दी कि सेल्फ-मेडिकेशन से बचें और किसी भी इलाज के लिए एक्सपर्ट की निगरानी को प्राथमिकता दें, ताकि संभावित खतरों से बचा जा सके. सरकार अब इन दवाओं के प्रचार-प्रसार पर भी लगाम लगाने की तैयारी कर रही है. खासकर सरोगेट एडवरटाइजिंग और गलत तरीके से प्रमोशन करने पर सख्त कदम उठाए जाएंगे. इसके साथ ही यह भी प्रस्ताव है कि इन दवाओं को केवल एक्सपर्ट डॉक्टर ही लिख सकें.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 28 Mar 2026 02:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Isometric Exercise: क्या होती है आइसोमेट्रिक एक्सरसाइज, हाई ब्लड प्रेशर के मरीजों के लिए यह कितनी फायदेमंद?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/isometric-exercise-क्या-होती-है-आइसोमेट्रिक-एक्सरसाइज-हाई-ब्लड-प्रेशर-के-मरीजों-के-लिए-यह-कितनी-फायदेमंद</link>
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        <description><![CDATA[ How Isometric Exercise Helps Lower Blood Pressure: हाई ब्लड प्रेशर यानी हाइपरटेंशन आज के समय की एक आम लेकिन गंभीर समस्या बन चुका है. यह स्थिति तब होती है जब दिल से पंप होने वाला खून धमनियों की दीवारों पर ज्यादा दबाव डालता है. ब्लड प्रेशर को दो हिस्सों में मापा जाता है सिस्टोलि और डायस्टोलिक. आमतौर पर 120/80 को सामान्य माना जाता है, जबकि 130/80 से ऊपर जाने पर इसे हाई ब्लड प्रेशर की श्रेणी में रखा जाता है.
दिनभर में ब्लड प्रेशर का थोड़ा ऊपर-नीचे होना सामान्य है, लेकिन अगर यह लंबे समय तक हाई बना रहे तो खतरा बढ़ जाता है. इससे दिल को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है और धीरे-धीरे आर्टरीज अपनी लचक खोने लगती हैं. अगर समय रहते ध्यान न दिया जाए, तो यह हार्ट, किडनी, आंखों और दिमाग तक को नुकसान पहुंचा सकता है.
एक्सरसाइज असरदार
ऐसे में एक्सरसाइज को ब्लड प्रेशर कंट्रोल करने का सबसे असरदार तरीका माना जाता है। हाल ही में सामने आई एक स्टडी ने इस दिशा में एक नया पहलू जोड़ा है. हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली बेवसाइट uclahealth के अनुसार, &amp;nbsp;इंग्लैंड के रिसर्चर्स ने 13 साल में की गई 270 स्टडीज के डेटा का एनालिसिस किया, जिसमें 15 हजार से ज्यादा लोगों को शामिल किया गया. इसमें पाया गया कि ब्लड प्रेशर कम करने में आइसोमेट्रिक एक्सरसाइज सबसे ज्यादा फायदेमंद साबित हो सकती है.&amp;nbsp;
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आइसोमेट्रिक एक्सरसाइज
आइसोमेट्रिक एक्सरसाइज वह होती है, जिसमें मसल्स तो सिकुड़ती हैं, लेकिन शरीर के जॉइंट्स हिलते नहीं हैं. यानी आप एक ही पोजिशन में रहते हुए मसल्स पर दबाव डालते हैं. उदाहरण के तौर पर दीवार के सहारे बैठकर स्क्वाट करना, हैंडग्रिप को दबाना या पैरों से किसी स्थिर चीज पर दबाव डालना इसमें शामिल है. एक्सपर्ट के अनुसार, जब मसल्स लंबे समय तक सिकुड़ी रहती हैं, तो उस हिस्से में ब्लड फ्लो कुछ समय के लिए कम हो जाता है. लेकिन जैसे ही यह दबाव हटता है, खून तेजी से वापस आता है, जिससे ब्लड वेसल्स रिलैक्स होती हैं. यही प्रक्रिया ब्लड प्रेशर को कम करने में मदद करती है.
इस बात का रखना चाहिए ध्यान&amp;nbsp;
हालांकि, इसे पूरी तरह सुरक्षित मान लेना सही नहीं होगा. एक्सपर्ट्स का कहना है कि लंबे समय तक मसल्स को सिकोड़कर रखने से कुछ समय के लिए ब्लड प्रेशर बढ़ भी सकता है. इसलिए जिन लोगों को पहले से दिल की बीमारी है या जिनका ब्लड प्रेशर कंट्रोल में नहीं है, उन्हें यह एक्सरसाइज शुरू करने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लेनी चाहिए. आइसोमेट्रिक एक्सरसाइज ब्लड प्रेशर कंट्रोल करने का एक प्रभावी तरीका हो सकता है, लेकिन इसे सही तरीके और सावधानी के साथ करना बेहद जरूरी है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 28 Mar 2026 02:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Isometric, Exercise:, क्या, होती, है, आइसोमेट्रिक, एक्सरसाइज, हाई, ब्लड, प्रेशर, के, मरीजों, के, लिए, यह, कितनी, फायदेमंद</media:keywords>
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        <title>Kidney Problems: फूले हुए चेहरे को न करें इग्नोर, हो सकता है गुर्दे की बीमारी का पहला संकेत</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/kidney-problems-फूले-हुए-चेहरे-को-न-करें-इग्नोर-हो-सकता-है-गुर्दे-की-बीमारी-का-पहला-संकेत</link>
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        <description><![CDATA[ सुबह उठते ही अगर आपकी आंखें सूजी हुई लगें, तो इसे अक्सर लोग थकान, देर रात तक जागना या सोने की गलत पोजीशन का परिणाम समझ लेते हैं, लेकिन यह आम भूल कई बार गंभीर स्वास्थ्य समस्या का संकेत हो सकती है. आंखों के चारों ओर सुबह-सुबह पाई जाने वाली सूजन कभी-कभी आपके गुर्दे की कार्यक्षमता में कमी का पहला संकेत हो सकती है. नेफ्रोलॉजी विशेषज्ञ ने बताया कि गुर्दे की समस्या के शुरुआती संकेतों में आंखों की सूजन सबसे जरूरी हो सकती है. तो आइए जानते हैं कि आंखों और चेहरे की सूजन कैसे गुर्दे की बीमारी का पहला संकेत हो सकता है.
आंखों और चेहरे की सूजन कैसे गुर्दे की बीमारी का पहला संकेत&amp;nbsp;&amp;nbsp;सुबह के समय आंखों में सूजन (जिसे पेरिऑर्बिटल पफीनेस कहा जाता है) गुर्दे की बीमारी का पहला संकेत हो सकता है. यह तब होता है जब गुर्दे की फिल्टरिंग यूनिट (नेफ्रॉन) काम करना कम कर देती है और प्रोटीन का रिसाव मूत्र में शुरू हो जाता है. विशेष रूप से एल्ब्यूमिन नामक प्रोटीन प्रभावित होता है. यह प्रोटीन ब्लड में तरल पदार्थ को बनाए रखने में मदद करता है. जब यह प्रोटीन मूत्र में चला जाता है, तो शरीर में तरल पदार्थ टिशूज में जमा होने लगता है, जिससे चेहरे और खासकर आंखों के आसपास सूजन दिखाई देती है.&amp;nbsp;&amp;nbsp;सुबह क्यों ज्यादा सूजन दिखती है?&amp;nbsp;जब आप सोते समय सीधे लेटते हैं, तो ग्रेविटी की वजह से शरीर का तरल पदार्थ टिशूज में जमा हो जाता है, विशेषकर आंखों के नीचे, जैसे-जैसे दिन बढ़ता है, यह तरल पदार्थ पैरों और टखनों में चला जाता है, और आंखों की सूजन कम दिखती है.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ें - Anal Cancer Symptoms: टॉयलेट में आता है खून तो सिर्फ पाइल्स नहीं हो सकता है एनल कैंसर, जानें कितना खतरनाक?&amp;nbsp;आंखों और चेहरे की सूजन के अन्य संकेत और लक्षण&amp;nbsp;किडनी की समस्या के अलावा आंखों में सूजन के कुछ अस्थायी कारण भी हो सकते हैं. जैसे नींद की कमी, एलर्जी, बहुत ज्यादा नमक वाला खाना, डिहाइड्रेशन, लेकिन अगर सूजन लगातार बनी रहती है और इसके साथ अन्य लक्षण दिखाई देते हैं, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. वहीं झागदार या फोम जैसा यूरिन, टखनों में लगातार सूजन, थकान और कमजोरी, बढ़ता हुआ ब्लड शुगर जैसे गंभीर संकेत भी हो सकते हैं.&amp;nbsp;किसे विशेष सावधानी रखनी चाहिए?
डायबिटीज के मरीज, हाई ब्लड शुगर वाले लोग और जिनके परिवार में गुर्दे की बीमारी का इतिहास हो, ये लोग आंखों की सूजन को नजरअंदाज न करें, क्योंकि यह उनके लिए शुरुआती चेतावनी संकेत हो सकता है. गुर्दे के कई कार्य अन्य शरीर प्रणालियों से जुड़े होते हैं, जैसे हार्ट और ब्लड शुगर कंट्रोल, इसलिए शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज करना, विशेषकर आंखों की सूजन, स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा कर सकता है.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 27 Mar 2026 14:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Kidney, Problems:, फूले, हुए, चेहरे, को, न, करें, इग्नोर, हो, सकता, है, गुर्दे, की, बीमारी, का, पहला, संकेत</media:keywords>
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        <title>Sporothrix Brasiliensis Fungus: सावधान! बिल्लियों से फैल रहा जानलेवा फंगल इंफेक्शन&amp;apos;, यहां मिला रोंगटे खड़े कर देने वाला मामला</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/sporothrix-brasiliensis-fungus-सावधान-बिल्लियों-से-फैल-रहा-जानलेवा-फंगल-इंफेक्शन-यहां-मिला-रोंगटे-खड़े-कर-देने-वाला-मामला</link>
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        <description><![CDATA[ How Does Sporothrix Brasiliensis Spread In Humans: उरुग्वे में सामने आया एक नया मामला एक बड़े खतरे का संकेत बन चुका है. स्पोरोथ्रिक्स ब्रासिलिएन्सिसनाम नाम का यह फंगस, जो स्किन इंफेक्शन का कारण बनता है, अब साउथ अमेरिका में तेजी से फैलता हुआ दिख रहा है. हालिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह सिर्फ एक केस नहीं बल्कि एक ऐसे इंफेक्शन की शुरुआत है जिसे कंट्रोल करना आसान नहीं होगा. चलिए आपको बताते हैं कि यह कैसे फैलता है और इसको रोकने के लिए क्या किया जा सकता है.&amp;nbsp;
कैसे फैल रही है यह बीमारी?
न्यूज बेवसाइट earth की रिपोर्ट के अनुसार, &amp;nbsp;सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि इसका मुख्य सोर्स बिल्लियां बन रही हैं. रिसर्च में पाया गया कि उरुग्वे के कई इलाकों में इंसानों और जानवरों में यह संक्रमण बिल्लियों के जरिए फैला. खास बात यह रही कि कई इंफेक्टेड बिल्लियों का आपस में कोई कनेक्शन नहीं था, जिससे साफ है कि यह फंगस अब लोकल स्तर पर फैल चुका है.
साइंटिस्ट के अनुसार, स्पोरोथ्रिक्स ब्रासिलिएन्सिसनाम एक इमर्जिंग फंगल थ्रेट है, जो पहले ब्राजील तक सीमित था लेकिन अब दूसरे देशों में भी तेजी से फैल रहा है. इसका सबसे बड़ा कारण बिल्लियों के जरिए होने वाला ट्रासमिशन है.&amp;nbsp;
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क्या होते हैं इसके कारण?
इंफेक्टेड बिल्लियों के शरीर पर बने घाव इस फंगस का मुख्य केंद्र होते हैं. खासकर उनके चेहरे, नाक और पंजों के आसपास फंगस की मात्रा ज्यादा होती है. जब ये बिल्लियां किसी इंसान को खरोंचती या काटती हैं, तो फंगस सीधे त्वचा में प्रवेश कर जाता है और इंफेक्शन शुरू हो जाता हैच एक और वजह यह है कि सड़क पर रहने वाली बिल्लियां लगातार घूमती रहती हैं और आपस में लड़ती हैं. इससे संक्रमण एक जगह से दूसरी जगह फैलता रहता है और लोगों को इसकी भनक भी नहीं लगती. यह फंगस अपने रूप को भी बदल सकता है. बाहर यह धागे जैसा होता है, लेकिन शरीर के अंदर जाकर यह यीस्ट जैसे रूप में बदल जाता है, जिससे यह त्वचा के अंदर तेजी से बढ़ने लगता है.
कैसे होते हैं इसके लक्षण?
लक्षणों की बात करें तो यह इंफेक्शन आमतौर पर एक छोटे लाल दाने से शुरू होता है, जो बाद में घाव में बदल जाता है. कई बार ऐसे दाने एक लाइन में फैलते जाते हैं. वहीं बिल्लियों में यह घाव जल्दी ठीक नहीं होते और बाल झड़ने लगते हैं. डॉक्टर इस संक्रमण की पुष्टि लैब टेस्ट के जरिए करते हैं, लेकिन कई बार इसे सामान्य बैक्टीरियल इंफेक्शन समझ लिया जाता है, जिससे इलाज में देरी हो जाती है. हालांकि अच्छी बात यह है कि यह बीमारी ठीक हो सकती है, लेकिन समय पर सही इलाज जरूरी है. &amp;nbsp;खासकर बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर इम्यूनिटी वाले लोगों के लिए यह ज्यादा खतरनाक हो सकती है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 26 Mar 2026 22:30:18 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Tuberculosis In Women: महिलाओं में साइलेंट किलर क्यों बन रहा टीबी, जानें यह बीमारी कितनी खतरनाक?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/tuberculosis-in-women-महिलाओं-में-साइलेंट-किलर-क्यों-बन-रहा-टीबी-जानें-यह-बीमारी-कितनी-खतरनाक</link>
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        <description><![CDATA[ Why TB Is Becoming A Silent Killer In Women: टीबी अक्सर फेफड़ों की बीमारी माना जाता है, लेकिन यह सिर्फ वहीं तक सीमित नहीं है. खासकर महिलाओं में यह अब एक साइलेंट किलर के रूप में उभर रहा है, क्योंकि इसके लक्षण अक्सर साफ नजर नहीं आते और बीमारी लंबे समय तक छिपी रह जाती है. टीबी एक बैक्टीरियल इंफेक्शन है, जो हवा के जरिए फैलता है. &amp;nbsp;जब इंफेक्टेड व्यक्ति खांसता, छींकता या थूकता है, तो इसके बैक्टीरिया दूसरे लोगों तक पहुंच सकते हैं. हालांकि यह बीमारी पूरी तरह से ठीक हो सकती है, लेकिन समय पर पहचान और इलाज न मिलने पर यह जानलेवा भी साबित हो सकती है,&amp;nbsp;
महिलाओं में टीवी की बीमारी
हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली बेवसाइट cloudninecare की रिपोर्ट के अनुसार, महिलाओं में टीबी का एक खास रूप होता है फीमेल जेनिटल टीबी, जो प्रजनन अंगों को प्रभावित करता है. यह बीमारी ज्यादा खतरनाक इसलिए मानी जाती है क्योंकि इसके लक्षण बहुत स्पष्ट नहीं होते, कई बार महिलाओं को पता ही नहीं चलता कि वे इस इंफेक्शन की शिकार हैं, और जब तक पता चलता है, तब तक स्थिति गंभीर हो चुकी होती है.&amp;nbsp;
कौन से अंग होते हैं प्रभावित?
यह इंफेक्शन फेलोपियन ट्यूब, गर्भाशय, ओवरी और सर्विक्स जैसे अंगों को प्रभावित कर सकता है. सबसे ज्यादा असर फेलोपियन ट्यूब पर देखा जाता है, जिससे गर्भधारण में दिक्कतें आने लगती हैं. कई मामलों में यह बीमारी बांझपन का कारण भी बन जाती है, जो इसका सबसे बड़ा असर माना जाता है. इस बीमारी के लक्षण बहुत सामान्य हो सकते हैं, जैसे पेल्विक पेन, पीरियड्स में गड़बड़ी, ज्यादा या कम ब्लीडिंग, या असामान्य डिस्चार्ज, यही वजह है कि इसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है या किसी और समस्या समझ लिया जाता है.&amp;nbsp;
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क्या होते हैं इसके लक्षण?
टीबी के कुछ सामान्य लक्षण भी हो सकते हैं, जैसे बुखार, रात में पसीना आना, वजन कम होना और भूख न लगना. लेकिन क्योंकि ये लक्षण कई अन्य बीमारियों में भी दिखते हैं, इसलिए सही पहचान करना मुश्किल हो जाता है. इसका खतरा उन महिलाओं में ज्यादा होता है जो कमजोर इम्यूनिटी, डायबिटीज, HIV या खराब जीवन स्थितियों में रहती हैं, भीड़भाड़, पोषण की कमी और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी भी इसके फैलने का बड़ा कारण बनते हैं. &amp;nbsp;अगर समय रहते इलाज न मिले, तो यह बीमारी न सिर्फ प्रजनन क्षमता को प्रभावित करती है, बल्कि लाइफ क्वालिटी को भी खराब कर देती है. हालांकि अच्छी बात यह है कि एंटीबायोटिक्स के जरिए इसका इलाज संभव है, लेकिन इसके लिए पूरा कोर्स लेना जरूरी होता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 26 Mar 2026 22:30:17 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Signs Of Nerve Weakness: शरीर में दिख रहे ये संकेत तो समझ लें कमजोर हो रही हैं नसें, लक्षण दिखते ही भागें डॉक्टर के पास</title>
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        <description><![CDATA[ Early Signs Of Weak Nervous System: शरीर को चलाने वाला सबसे अहम सिस्टम हमारा नर्वस सिस्टम होता है. &amp;nbsp;यही सिस्टम हमारे मूड, सोचने की क्षमता, चलने-फिरने और महसूस करने तक सब कुछ कंट्रोल करता है. लेकिन जब यही सिस्टम कमजोर होने लगता है, तो शरीर अलग-अलग तरह के संकेत देने लगता है, जिन्हें अक्सर लोग नजरअंदाज कर देते हैं. &amp;nbsp;एक्सपर्ट के अनुसार, नसों से जुड़ी समस्याएं धीरे-धीरे बढ़ती हैं और कई बार इनके लक्षण समझ पाना आसान नहीं होता.&amp;nbsp;
dpuhospital की एक रिपोर्ट के अनुसार, हर पांच में से एक व्यक्ति किसी न किसी नर्व से जुड़ी समस्या का सामना कर चुका है. ऐसे में अगर शरीर में कुछ असामान्य बदलाव दिखें, तो उन्हें हल्के में लेना भारी पड़ सकता है. चलिए आपको बताते हैं कि इसके लक्षण क्या होते हैं.&amp;nbsp;
मांसपेशियों की ताकत कम होना
सबसे पहला संकेत है मांसपेशियों की ताकत कम होना. अगर आपको बिना ज्यादा मेहनत के ही कमजोरी महसूस होने लगे या शरीर में ताकत घटती दिखे, तो यह नर्वस सिस्टम के कमजोर होने का इशारा हो सकता है.
सिरदर्द होना
बार-बार सिरदर्द होना भी एक आम लक्षण है. अगर सिरदर्द लगातार बना रहता है और सामान्य दवाओं से भी ठीक नहीं होता, तो यह नसों से जुड़ी समस्या की ओर इशारा कर सकता है.
याददाश्त कमजोर होना
याददाश्त कमजोर होना भी एक अहम संकेत है. अगर आपको छोटी-छोटी बातें भूलने की आदत बढ़ती जा रही है, तो इसे उम्र का असर मानकर नजरअंदाज न करें. कई बार यह नर्वस सिस्टम की कमजोरी की वजह से भी हो सकता है.
झुनझुनी या सुन्नपन&amp;nbsp;
शरीर में झुनझुनी या सुन्नपन महसूस होना भी एक बड़ा संकेत है. खासकर हाथ-पैरों में बार-बार ऐसा होना न्यूरोपैथी की ओर इशारा कर सकता है, जिसमें नसें प्रभावित होने लगती हैं.
&amp;nbsp;जकड़न या अकड़न की समस्या
मांसपेशियों में जकड़न या अकड़न भी नजर आ सकती है. लंबे समय तक तनाव या नसों पर दबाव के कारण मांसपेशियां सख्त होने लगती हैं, जिससे चलने-फिरने में दिक्कत हो सकती है.
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पीठ दर्द की समस्या
पीठ दर्द भी कई बार नसों की कमजोरी से जुड़ा होता है. अगर दर्द बार-बार हो रहा है या बिना वजह बढ़ रहा है, तो इसे हल्के में न लें.
कंपन या दौरे पड़ना&amp;nbsp;
कंपन या दौरे पड़ना भी गंभीर संकेत हो सकते हैं. यह स्थिति तब आती है जब नर्वस सिस्टम ठीक से काम नहीं कर रहा होता और समय रहते इलाज न मिले तो यह बड़ी बीमारी का रूप ले सकती है.
ये भी होते हैं लक्षण
इसके अलावा, कुछ मामलों में यह समस्या गंभीर बीमारियों का कारण भी बन सकती है, जैसे पार्किंसन, मल्टीपल स्क्लेरोसिस या स्ट्रोक जैसी स्थितियां.
कब डॉक्टर से मिलना चाहिए?
डॉक्टरों का कहना है कि अगर इनमें से कोई भी लक्षण बार-बार नजर आए, तो तुरंत एक्सपर्ट से संपर्क करना चाहिए. समय पर जांच और इलाज से बड़ी समस्याओं से बचा जा सकता है. नसों की सेहत को नजरअंदाज करना शरीर के लिए खतरनाक साबित हो सकता है, इसलिए सतर्क रहना ही सबसे बेहतर उपाय है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 26 Mar 2026 22:30:16 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Anal Cancer Symptoms: टॉयलेट में आता है खून तो सिर्फ पाइल्स नहीं हो सकता है एनल कैंसर, जानें कितना खतरनाक?</title>
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        <description><![CDATA[ Is Blood In Stool Always Piles Or Cancer: टॉयलेट में खून आना अक्सर लोगों को डरा देता है, और सबसे पहले दिमाग में यही आता है कि कहीं यह कोई गंभीर बीमारी तो नहीं. हालांकि, ज्यादातर मामलों में इसकी वजह पाइल्स यानी बवासीर होती है, जो आम और इलाज से ठीक होने वाली समस्या है. लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि हर बार इसे हल्के में लेना सही नहीं है, क्योंकि कुछ मामलों में यही लक्षण एनल कैंसर जैसे गंभीर रोग का संकेत भी हो सकता है.
क्या होती है पाइल्स की दिक्कत?
पाइल्स की बात करें तो यह एक ऐसी स्थिति होती है, जिसमें मलाशय या गुदा के आसपास की नसें सूज जाती हैं. यह समस्या उम्र बढ़ने के साथ, कब्ज, ज्यादा देर तक बैठने या प्रेग्नेंसी के कारण हो सकती है. पाइल्स में आमतौर पर टॉयलेट के दौरान चमकीला लाल खून दिखाई देता है, इसके साथ ही खुजली, जलन और हल्की सूजन भी महसूस हो सकती है. राहत की बात यह है कि इसके लक्षण अक्सर कुछ समय बाद खुद ही कम हो जाते हैं या साधारण इलाज से ठीक हो जाते हैं.&amp;nbsp;
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कब होना चाहिए सावधान?
कैंसर के बारे में जानकारी देने वाली prolifecancercentre की रिपोर्ट के अनुसार, अगर यही खून बार-बार आने लगे या लंबे समय तक बना रहे, तो सतर्क हो जाना जरूरी है. एनल कैंसर एक रेयर लेकिन गंभीर बीमारी है, जिसमें गुदा के अंदर या आसपास असामान्य सेल्स तेजी से बढ़ने लगती हैं. शुरुआत में इसके लक्षण पाइल्स जैसे ही लग सकते हैं, जिससे कई लोग भ्रमित हो जाते हैं.
क्या होता है फर्क?
दोनों में फर्क समझना बेहद जरूरी है. पाइल्स में खून आमतौर पर टॉयलेट के दौरान ही आता है और कुछ समय बाद बंद हो जाता है, जबकि एनल कैंसर में ब्लीडिंग लगातार हो सकती है और उसका रंग भी थोड़ा गहरा हो सकता है. इसी तरह पाइल्स में दर्द अक्सर टॉयलेट या बैठने के दौरान ज्यादा होता है, लेकिन कैंसर में दर्द लगातार बना रह सकता है और समय के साथ बढ़ता जाता है.
इसके अलावा, अगर आपको मल त्याग की आदतों में बदलाव दिखे, जैसे बार-बार टॉयलेट जाना या मल का आकार बदलना, तो इसे नजरअंदाज न करें. बिना वजह वजन कम होना, थकान महसूस होना या गुदा के आसपास गांठ बनना भी गंभीर संकेत हो सकते हैं. डॉक्टरों का साफ कहना है कि अगर खून एक हफ्ते से ज्यादा समय तक दिखे, दर्द बढ़ता जाए या कोई नया लक्षण जुड़ जाए, तो तुरंत जांच करानी चाहिए. खासतौर पर 50 साल से ऊपर के लोगों को ऐसे संकेतों को बिल्कुल नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 26 Mar 2026 22:30:15 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>क्या होता है क्वाड्रिप्लेजिया, जिसने ले ली हरीश राणा की जान? बाइकर्स को सबसे ज्यादा खतरा</title>
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        <description><![CDATA[ क्या होता है क्वाड्रिप्लेजिया, जिसने ले ली हरीश राणा की जान? बाइकर्स को सबसे ज्यादा खतरा ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 25 Mar 2026 18:30:19 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Walking Speed And Health: आप भी चलते हैं धीमें तो समझ लीजिए आपका दिल दे रहा यह खतरनाक संकेत, तुरंत हो जाएं अलर्ट</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/walking-speed-and-health-आप-भी-चलते-हैं-धीमें-तो-समझ-लीजिए-आपका-दिल-दे-रहा-यह-खतरनाक-संकेत-तुरंत-हो-जाएं-अलर्ट</link>
        <guid>https://hindi.attentionindia.com/walking-speed-and-health-आप-भी-चलते-हैं-धीमें-तो-समझ-लीजिए-आपका-दिल-दे-रहा-यह-खतरनाक-संकेत-तुरंत-हो-जाएं-अलर्ट</guid>
        <description><![CDATA[ How Walking Speed Reflects Heart Health: आप कितनी तेजी से चलते हैं, यह सिर्फ आपकी आदत नहीं, बल्कि आपकी सेहत का एक अहम संकेत भी हो सकता है. आमतौर पर लोग दिल की सेहत को ब्लड प्रेशर या कोलेस्ट्रॉल से जोड़कर देखते हैं, लेकिन अब डॉक्टर एक आसान चीज पर भी ध्यान दे रहे हैं कि आपकी चलने की स्पीड. &amp;nbsp;सुनने में भले साधारण लगे, लेकिन यह बताती है कि हार्ट, लंग्स, मांसपेशियां और ब्रेन कितनी अच्छी तरह साथ काम कर रहे हैं.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
डॉ. सुनील राणा ने TOI को बताया कि वॉकिंग स्पीड को अब एक तरह का &quot;वाइटल साइन&quot; माना जाने लगा है, जैसे पल्स या ब्लड प्रेशर. अगर कोई व्यक्ति लगातार धीमी गति से चलता है, तो यह कमजोर दिल, कम मसल स्ट्रेंथ या शरीर में किसी शुरुआती समस्या का संकेत हो सकता है. क्योंकि चलने के दौरान शरीर के कई सिस्टम एक साथ काम करते हैं जैसे कि ऑक्सीजन की सप्लाई, मांसपेशियों की ताकत और नर्वस सिस्टम का तालमेल.&amp;nbsp;
इसे भी पढ़ें-&amp;nbsp;Vitamin Side Effects: सावधान! बिना डॉक्टरी सलाह के यह विटामिन लेना पड़ सकता है भारी, जा सकती है आंखों की रोशनी
स्पीड कम होना क्यों है खतरनाक?
अगर आपकी चलने की रफ्तार पहले के मुकाबले कम हो गई है, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. यह इस बात का संकेत हो सकता है कि शरीर पहले जितनी कुशलता से काम नहीं कर रहा. कई रिसर्च भी बताती हैं कि जिन लोगों की वॉकिंग स्पीड धीमी होती है, उनमें दिल से जुड़ी बीमारियों का खतरा ज्यादा होता है. यह सिर्फ दिल की बात नहीं है. चलने की स्पीड से मांसपेशियों और जोड़ों की स्थिति का भी अंदाजा लगाया जा सकता है. अगर शरीर में दर्द, जकड़न या कमजोरी है, तो व्यक्ति अनजाने में धीमा चलने लगता है. खासकर ऑस्टियोआर्थराइटिस जैसी स्थितियां भी चलने की गति को प्रभावित कर सकती हैं.
कैसे कर सकते हैं पता?
अच्छी बात यह है कि आप घर पर ही अपनी वॉकिंग स्पीड को जांच सकते हैं. इसके लिए 4-6 मीटर की दूरी नापें और सामान्य रफ्तार से चलें. फिर देखें कि इसे तय करने में कितना समय लगता है. आमतौर पर स्वस्थ व्यक्ति की स्पीड 1 से 1.4 मीटर प्रति सेकंड होती है. एक आसान तरीका यह भी है कि चलते समय आप आराम से बातचीत कर पा रहे हैं या नहीं. अगर नहीं, तो यह हार्ट और फेफड़ों पर दबाव का संकेत हो सकता है. अगर आपको अपनी स्पीड बेहतर करनी है, तो जल्दबाजी करने की जरूरत नहीं है. रोज थोड़ा तेज चलने की कोशिश करें, हफ्ते में कुछ दिन हल्की स्ट्रेंथ ट्रेनिंग करें और अपनी बॉडी पोस्चर पर ध्यान दें. धीरे-धीरे यह सुधार आपकी फिटनेस में भी दिखेगा.
इसे भी पढ़ें-&amp;nbsp;Gut Bacteria And Cancer: सावधान! आपकी आंतों में छिपा है &#039;कैंसर का विलेन&#039;, वैज्ञानिकों ने किया चौंकाने वाला खुलासा
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 25 Mar 2026 18:30:18 +0530</pubDate>
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        <title>Weight Gain Despite Healthy Eating: धोखा दे रही आपकी हेल्दी डाइट! सब सही करने के बाद भी क्यों फूल रहा शरीर? जानें चौंकाने वाली वजह</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/weight-gain-despite-healthy-eating-धोखा-दे-रही-आपकी-हेल्दी-डाइट-सब-सही-करने-के-बाद-भी-क्यों-फूल-रहा-शरीर-जानें-चौंकाने-वाली-वजह</link>
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        <description><![CDATA[ Why Am I Gaining Weight On Healthy Diet: आप हेल्दी खाना खा रहे हैं, जंक फूड से दूर हैं और एक्टिव भी रहते हैं, फिर भी वजन बढ़ रहा है? ऐसे में हमारे मन में सवाल आता है कि ऐसा क्यों होता है? यह सवाल आजकल कई लोगों को परेशान करता है. अक्सर लगता है कि सारी कोशिशों के बावजूद शरीर साथ नहीं दे रह. &amp;nbsp;लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि यह सिर्फ कैलोरी या मेहनत का मामला नहीं है, बल्कि इसके पीछे शरीर की जटिल मेटाबॉलिक प्रक्रिया काम करती है.
एक्सपर्ट बताते हैं कि कई बार शरीर खुद को नई परिस्थितियों के हिसाब से ढाल लेता है. जब लंबे समय तक कम कैलोरी ली जाती है, तो शरीर अपनी ऊर्जा बचाने लगता है. इसे मेटाबॉलिक अडैप्टेशन कहा जाता है. यानी शरीर पहले की तुलना में कम कैलोरी जलाने लगता है. ऐसे में वही डाइट, जो पहले वजन घटाने में मदद करती थी, अब वजन को बढ़ाने या स्थिर रखने लगती है.
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&amp;nbsp;इंसुलिन रेजिस्टेंस भी एक बड़ा कारण
इसके अलावा इंसुलिन रेजिस्टेंस भी एक बड़ा कारण हो सकता है. इंसुलिन सिर्फ ब्लड शुगर को ही नहीं, बल्कि शरीर में फैट स्टोर करने की प्रक्रिया को भी नियंत्रित करता है। जब शरीर इंसुलिन के प्रति संवेदनशील नहीं रहता, तो इंसुलिन का स्तर बढ़ जाता है और शरीर फैट को जलाने के बजाय जमा करने लगता ह. यह स्थिति उन लोगों में भी देखी जा सकती है, जो बाहर से पूरी तरह हेल्दी डाइट ले रहे होते हैं.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
डॉ. मोइनुद्दीन ने TOI को बताया कि एक और अहम भूमिका लेप्टिन हार्मोन की होती है, जो दिमाग को यह संकेत देता है कि पेट भर गया है लेकिन जब शरीर में लेप्टिन रेजिस्टेंस हो जाता है, तो यह संकेत सही तरीके से काम नहीं करता. नतीजा यह होता है कि व्यक्ति बिना महसूस किए जरूरत से थोड़ा ज्यादा खाने लगता है, जो धीरे-धीरे वजन बढ़ाने का कारण बनता है. हार्मोनल असंतुलन भी वजन बढ़ने के पीछे बड़ी वजह हो सकता है. जैसे हाइपोथायरायडिज्म में मेटाबॉलिज्म धीमा हो जाता है, PCOS महिलाओं में फैट स्टोरेज को प्रभावित करता है और कशिंग सिंड्रोम में बढ़ा हुआ कोर्टिसोल शरीर में चर्बी जमा करने लगता है. ये सभी स्थितियां वजन बढ़ने को आसान बना देती हैं.
हेल्दी खाने से भी बढ़ता है वजन
कई बार हम यह भूल जाते हैं कि हेल्दी खाना भी ज्यादा मात्रा में लेने पर वजन बढ़ा सकता है. ड्राई फ्रूट्स, फल, साबुत अनाज और स्मूदी पोषक जरूर होते हैं, लेकिन इनमें कैलोरी भी अधिक होती है. अगर इनका सेवन जरूरत से ज्यादा हो जाए, तो शरीर अतिरिक्त एनर्जी को फैट के रूप में स्टोर करने लगता है. सिर्फ खाना ही नहीं, बल्कि लाइफस्टाइल भी इसमें अहम भूमिका निभाता है. कम नींद, ज्यादा तनाव और शरीर में सूजन जैसी स्थितियां मेटाबॉलिज्म को प्रभावित करती हैं. नींद की कमी से भूख बढ़ाने वाले हार्मोन एक्टिव हो जाते हैं, जबकि तनाव से कोर्टिसोल बढ़ता है, जो वजन बढ़ाने में मदद करता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 25 Mar 2026 18:30:17 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Covid Variant 2026: आ गया कोरोना का &amp;apos;सुपर वेरिएंट&amp;apos;, क्या फेल हो जाएगी आपकी वैक्सीन? वैज्ञानिकों का बड़ा खुलासा</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/covid-variant-2026-आ-गया-कोरोना-का-सुपर-वेरिएंट-क्या-फेल-हो-जाएगी-आपकी-वैक्सीन-वैज्ञानिकों-का-बड़ा-खुलासा</link>
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        <description><![CDATA[ Is BA.3.2 Covid Variant Dangerous: अमेरिका में कोविड-19 का एक नया वेरिएंट तेजी से फैल रहा है, जिसे BA.3.2 नाम दिया गया है. &amp;nbsp;साइंटिस्ट का कहना है कि यह वेरिएंट मौजूदा वैक्सीन से मिलने वाली सुरक्षा को कुछ हद तक कमजोर कर सकता है. । यही वजह है कि इसे लेकर चिंता बढ़ रही है, भले ही अभी तक इसके गंभीर असर पूरी तरह सामने नहीं आए हैं.
यह नया वेरिएंट ओमिक्रॉन का ही एक रूप है, जिसे सबसे पहले 2024 में साउथ अफ्रीका में देखा गया था और बाद में 2025 में अमेरिका में भी इसकी पहचान हुई. इसके बाद यह धीरे-धीरे कई देशों में फैल गया और अब 20 से ज्यादा राज्यों में इसके संकेत मिल चुके हैं. खास बात यह है कि यह सिर्फ मरीजों में ही नहीं, बल्कि एयरपोर्ट के वेस्टवॉटर सैंपल्स में भी पाया गया है, जिससे अंदाजा लगाया जा रहा है कि इसका फैलाव दिखने से ज्यादा व्यापक हो सकता है.
कैसा है नया वायरस?
वैज्ञानिकों के मुताबिक BA.3.2 में स्पाइक प्रोटीन में करीब 70 से 75 बदलाव पाए गए हैं. यही स्पाइक प्रोटीन वायरस को इंसानी सेल्स में घुसने में मदद करता है. इन बदलावों की वजह से यह वेरिएंट ज्यादा तेजी से फैल सकता है और शरीर की इम्यूनिटी को भी चकमा दे सकता है. independent की रिपोर्ट के अनुसार, लैब में किए गए टेस्ट में यह भी सामने आया है कि मौजूदा कोविड वैक्सीन, जो JN.1 जैसे वेरिएंट्स के खिलाफ बनाई गई हैं, BA.3.2 के खिलाफ उतनी प्रभावी नहीं हो सकतीं. यही कारण है कि साइंटिस्ट भविष्य में वैक्सीन अपडेट करने की जरूरत पर जोर दे रहे हैं.&amp;nbsp;
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कितना खतरनाक है नया कोरोना?
हालांकि, राहत की बात यह है कि अभी तक इस वेरिएंट से होने वाले मामलों में गंभीरता ज्यादा नहीं देखी गई है. कुछ मरीज अस्पताल में भर्ती जरूर हुए, लेकिन सभी ठीक हो गए. एक्सपर्ट का कहना है कि सिर्फ अस्पताल में केस मिलने से यह साबित नहीं होता कि यह वेरिएंट ज्यादा खतरनाक है. फिर भी, एक्सपर्ट सतर्क रहने की सलाह दे रहे हैं.कोविड अब एंडेमिक बन चुका है, यानी यह पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है और समय-समय पर नए वेरिएंट सामने आते रहेंगे.
हर बार वायरस में बदलाव होता है, जिससे उसके फैलने या बचने की क्षमता बदल सकती है. हेल्थ एक्सपर्ट का मानना है कि इंफेक्शन को फैलने से रोकना ही सबसे जरूरी है. जितना कम वायरस फैलने का मौका मिलेगा, उतना ही कम वह नए रूप में बदल पाएगा. इस बीच, फ्लू और RSV जैसी अन्य सांस से जुड़ी बीमारियां भी बढ़ रही हैं, लेकिन कोविड का खतरा अभी खत्म नहीं हुआ है.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 25 Mar 2026 18:30:16 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Heart Attack Risk Factors: पुरुषों की तुलना में महिलाओं में कम क्यों होते हैं हार्ट अटैक के मामले, क्या है कारण?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/heart-attack-risk-factors-पुरुषों-की-तुलना-में-महिलाओं-में-कम-क्यों-होते-हैं-हार्ट-अटैक-के-मामले-क्या-है-कारण</link>
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        <description><![CDATA[ Why Women Have Lower Risk Of Heart Attacks Than Men: हार्ट अटैक आज के समय की सबसे खतरनाक और आम बीमारियों में से एक बन चुका है. यह तब होता है जब दिल तक जाने वाला ब्लड का फ्लो रुक जाता है. आमतौर पर यह ब्लॉकेज कोरोनरी आर्टरीज में होता है, जहां कोलेस्ट्रॉल, फैट और अन्य पदार्थ जमा हो जाते हैं. इसी स्थिति को कोरोनरी आर्टरी डिजीज कहा जाता है, जो हार्ट अटैक के बढ़ते मामलों की सबसे बड़ी वजह है.
क्या होता है कारण?
हार्ट अटैक के पीछे कई जोखिम कारक होते हैं, जिन्हें नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है. हाई कोलेस्ट्रॉल, बढ़ती उम्र, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, मोटापा, जेनेटिक कारण, तंबाकू और शराब का सेवन, ज्यादा तनाव और हार्ट से जुड़ी पुरानी समस्याएं ये सभी हार्ट अटैक का खतरा बढ़ाते हैं.&amp;nbsp;
महिलाओं में कम क्यों होता है ज्यादा खतरा?
Dr. KM Cherian Institute Of Medical Sciences की रिपोर्ट के अनुसार, पुरुषों और महिलाओं में हार्ट अटैक के मामलों में अंतर देखा जाता है. दोनों के लिए यह बीमारी खतरनाक है, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि पुरुषों में इसका खतरा ज्यादा होता है. पुरुषों में पहली बार हार्ट अटैक का औसत उम्र करीब 65 साल होती है, जबकि महिलाओं में यह लगभग 72 साल के आसपास देखा जाता है. यानी महिलाओं में यह खतरा पुरुषों के मुकाबले करीब 10 साल देर से बढ़ता है.
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अंतर के पीछे क्या है वजह?
इसके पीछे कई संभावित कारण माने जाते हैं. एक्सपर्ट का मानना है कि महिलाओं में मेनोपॉज से पहले हार्ट अटैक का खतरा कम होता है, जिसका एक कारण एस्ट्रोजन हार्मोन हो सकता है. हालांकि, यह पूरी तरह साबित नहीं हुआ है, लेकिन माना जाता है कि यह हार्मोन दिल की सेहत को कुछ हद तक सुरक्षित रखता है. दूसरी ओर, पुरुषों में तंबाकू और शराब का सेवन ज्यादा होता है, जो दिल की बीमारियों का बड़ा कारण है. इसके अलावा, तनाव को संभालने के मामले में भी पुरुषों की क्षमता महिलाओं की तुलना में कम मानी जाती है. लगातार तनाव और मानसिक दबाव दिल पर बुरा असर डालते हैं, जिससे हार्ट अटैक का खतरा बढ़ सकता है.
कैसे कर सकते हैं बचाव?
यह समझना जरूरी है कि हार्ट अटैक पूरी तरह रोका जा सकता है, अगर समय रहते सावधानी बरती जाए. नियमित हेल्थ चेकअप कराना, ब्लड शुगर, कोलेस्ट्रॉल और ब्लड प्रेशर को कंट्रोल में रखना बेहद जरूरी है. लाइफस्टाइल में छोटे-छोटे बदलाव भी बड़ा फर्क ला सकते हैं. &amp;nbsp;हेल्दी डाइट लेना, जिसमें फल और सब्जियां ज्यादा हों और फैट, नमक व शुगर कम हो, दिल के लिए फायदेमंद होता है.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 25 Mar 2026 02:30:09 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Dementia Risk And Diet: बॉडी में पनप रहा डिमेंशिया का जीन तो तुरंत बढ़ा दें इस चीज की खुराक, स्टडी में हुआ खुलासा</title>
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        <description><![CDATA[ Can Eating Meat Reduce Dementia Risk: अगर आपके शरीर में अल्जाइमर से जुड़ा जीन मौजूद है, तो आपकी डाइट में एक छोटा सा बदलाव डिमेंशिया के खतरे को काफी हद तक कम कर सकता है. एक नई स्टडी में सामने आया है कि जो लोग नियमित रूप से मीट का सेवन करते हैं, उनमें याददाश्त कमजोर होने और डिमेंशिया का खतरा लगभग आधा तक कम हो सकता है. साइंटिस्ट के मुताबिक, APOE नाम का जीन अल्जाइमर से जुड़ा होता है और यह बीमारी के ज्यादातर मामलों में पाया जाता है. &amp;nbsp;खासतौर पर APOE4 वेरिएंट वाले लोगों में डिमेंशिया का जोखिम ज्यादा होता है. लेकिन रिसर्च में पाया गया कि अगर ऐसे लोग अपनी डाइट में मीट की मात्रा बढ़ाते हैं, तो उनके दिमाग पर इसका पॉजिटिव असर पड़ सकता है.&amp;nbsp;
क्या निकला रिसर्च में?
यह स्टडी स्टॉकहोम यूनिवर्सिटी के रिसर्चर ने की, जिसमें 60 साल या उससे ज्यादा उम्र के 2000 से अधिक लोगों को करीब 15 साल तक ट्रैक किया गया, इस दौरान उनकी खाने-पीने की आदतों पर नजर रखी गई और खासतौर पर मीट के सेवन को फोकस में रखा गया. रिसर्च के नतीजे चौंकाने वाले थे. जिन लोगों के शरीर में APOE4 जीन था और जो सबसे ज्यादा मीट खाते थे, उनमें डिमेंशिया का खतरा उन लोगों के मुकाबले करीब 45 प्रतिशत कम पाया गया, जो मीट कम खाते थे, इतना ही नहीं, इन लोगों की सोचने-समझने की क्षमता भी बेहतर बनी रही और मानसिक गिरावट की रफ्तार धीमी देखी गई.&amp;nbsp;
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किस तरह का मीट फायदेमंद?
हालांकि, यहां एक अहम बात भी सामने आई. सभी तरह का मीट फायदेमंद नहीं होता. प्रोसेस्ड मीट जैसे बेकन, सॉसेज या ज्यादा प्रोसेस किया हुआ मांस दिमाग के लिए नुकसानदायक हो सकता है और इससे डिमेंशिया का खतरा बढ़ सकता है. यानी अगर फायदा चाहिए, तो अनप्रोसेस्ड मीट को प्राथमिकता देना जरूरी है. साइंटिस्ट का मानना है कि इस फायदे के पीछे विटामिन B12 की भूमिका हो सकती है. मीट में यह विटामिन अच्छी मात्रा में पाया जाता है, जो दिमाग की सेहत और याददाश्त के लिए बेहद जरूरी होता है. B12 की कमी होने पर याददाश्त कमजोर होना, समझने में दिक्कत और मानसिक समस्याएं तक हो सकती हैं.
ये चीजें हैं फायदेमंद
हालांकि, साइंटिस्ट यह भी मानते हैं कि यह रिसर्च अभी शुरुआती स्तर पर है और इसे पूरी तरह अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता. कुछ एक्सपर्ट का कहना है कि लाइफस्टाइल, आर्थिक स्थिति और अन्य आदतें भी इस पर असर डाल सकती हैं. फिर भी, यह साफ है कि सही खानपान, एक्टिव लाइफस्टाइल और मानसिक रूप से सक्रिय रहना दिमाग को लंबे समय तक स्वस्थ रखने में मदद करता है.
इसे भी पढ़ें-&amp;nbsp;Gut Bacteria And Cancer: सावधान! आपकी आंतों में छिपा है &#039;कैंसर का विलेन&#039;, वैज्ञानिकों ने किया चौंकाने वाला खुलासा
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 25 Mar 2026 02:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>Dry Mouth In The Morning: सुबह उठते ही सूख रहा है मुंह और आ रही है बदबू? शरीर के अंदर छिपी है यह बड़ी गड़बड़</title>
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        <description><![CDATA[ Why Do I Wake Up With Dry Mouth And Bad Breath: सुबह उठते ही मुंह सूखा-सूखा लगे और बदबू आए, तो हम अक्सर इसे सामान्य &quot;मॉर्निंग ब्रीथ&quot; मानकर नजरअंदाज कर देते हैं. &amp;nbsp;लेकिन कई बार यह सिर्फ रात भर की नींद का असर नहीं होता, बल्कि शरीर के अंदर चल रही कुछ गड़बड़ियों का संकेत भी हो सकता है. असल में हमारा मुंह शरीर का एक तरह का आईना होता है, जो बताता है कि रात के दौरान शरीर ने पानी, सांस और पाचन को कैसे संभाला. चलिए विस्तार से बताते हैं,&amp;nbsp;
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
डॉ. गर्गी सिंह ठाकुर ने TOI को बताया कि अनुसार सुबह मुंह सूखना या बदबू आना डिहाइड्रेशन, खराब नींद या मेटाबॉलिज्म से जुड़ी समस्याओं का संकेत हो सकता है. दरअसल, जब हम सोते हैं तो शरीर में लार बनना कम हो जाता है. यही लार हमारे मुंह को साफ रखती है, बैक्टीरिया को कंट्रोल करती है और खाने के कणों को हटाती है. जैसे ही इसकी मात्रा घटती है, बैक्टीरिया तेजी से बढ़ने लगते हैं और सुबह बदबू ज्यादा महसूस होती है.
मुंह सूखने की वजह क्या है?
मुंह सूखने की एक बड़ी वजह डिहाइड्रेशन भी है. अगर शरीर में पानी की कमी होती है, तो शरीर जरूरी अंगों को प्राथमिकता देता है और मुंह में लार कम बनने लगती है. एसी में सोना, रात में कैफीन या शराब लेना इस समस्या को और बढ़ा सकता है. एक और कारण है मुंह से सांस लेना. कई लोग नाक बंद होने, एलर्जी या आदत की वजह से मुंह से सांस लेते हैं, जिससे मुंह जल्दी सूख जाता है और बैक्टीरिया बढ़ने लगते हैं. यह खराब नींद का भी संकेत हो सकता है, क्योंकि मुंह से सांस लेना अक्सर खर्राटों और नींद टूटने से जुड़ा होता है.
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नींद की क्वालिटी का असर
नींद की क्वालिटी भी यहां अहम भूमिका निभाती है. अगर नींद बार-बार टूटती है या गहरी नहीं होती, तो नर्वस सिस्टम प्रभावित होता है और लार का बनना और कम हो जाता है. यही वजह है कि जो लोग ठीक से सो नहीं पाते, उन्हें सुबह यह समस्या ज्यादा होती है. कई बार बदबू का कारण पाचन से भी जुड़ा होता है. अगर खाना सही तरीके से नहीं पचता, तो शरीर में कुछ तत्व जमा होने लगते हैं, जो सांस के जरिए बाहर आते हैं और बदबू पैदा करते हैं. एसिड रिफ्लक्स या अनियमित खानपान इस समस्या को और बढ़ा सकते हैं.
तनाव और कुछ दवाइयां भी इस समस्या को बढ़ा सकती हैं. &amp;nbsp;तनाव से सांस लेने का तरीका बदल जाता है और लार कम बनने लगती है. वहीं, कुछ दवाइयां जैसे एंटीहिस्टामिन या ब्लड प्रेशर की दवाएं भी मुंह को सूखा बना सकती हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 25 Mar 2026 02:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>ज्यादा स्क्रीन टाइम बच्चों की हार्ट हेल्थ के लिए कितनी खतरनाक? चौंका देगी यह स्टडी</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/ज्यादा-स्क्रीन-टाइम-बच्चों-की-हार्ट-हेल्थ-के-लिए-कितनी-खतरनाक-चौंका-देगी-यह-स्टडी</link>
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        <description><![CDATA[ आज के डिजिटल दौर में बच्चों की लाइफस्टाइल तेजी से बदल रही है. डिजिटल दौर में बच्चे होमवर्क से ब्रेक के दौरान, सोने से पहले, ऑनलाइन क्लास, गेमिंग और स्ट्रीमिंग के लिए स्मार्टफोन का इस्तेमाल करते हैं. जिससे बच्चों का स्क्रीन टाइम तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन अब एक नई स्टडी में चेतावनी दी है कि जरूरत से ज्यादा स्क्रीन टाइम सिर्फ आंखों या दिमाग पर ही नहीं बल्कि दिल की सेहत पर भी असर डाल सकता है. स्टडी के अनुसार खाली समय में स्क्रीन पर बिताया गया हर एक्स्ट्रा घंटा चाहे वह सोशल मीडिया स्क्रोल करना हो, &amp;nbsp;वेब सीरीज देखना हो या गेम खेलना हो बच्चों में हार्ट से संबंधित बीमारियों का खतरा बढ़ा रहा है. ऐसे में चलिए अब आपको बताते हैं कि ज्यादा स्क्रीन टाइम बच्चों में हार्ट हेल्थ का खतरा कैसे बढ़ा रहा है और स्टडी में क्या सामने आया है?
क्या कहती है स्टडी?&amp;nbsp;
जर्नल ऑफ द अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन में पब्लिश रिसर्च के अनुसार बच्चों और किशोर में हर एक्स्ट्रा घंटे का स्क्रीन टाइम उनके कार्डियो मेटाबोलिक खतरे यानी दिल और मेटाबॉलिज्म से जुड़े खतरे को बढ़ा सकता है. इस रिसर्च में 1000 से ज्यादा बच्चों और युवाओं को शामिल किया गया था. वहीं रिसर्च में पाया गया है कि 6 से 10 साल के बच्चों में हर एक्स्ट्रा घंटे स्क्रीन टाइम से खतरा बढ़ता है. वहीं किशोर में यह असर और ज्यादा देखा गया है. इसके अलावा ज्यादा स्क्रीन टाइम का सीधा &amp;nbsp;संबंध नींद की कमी से भी जुड़ा पाया गया है.&amp;nbsp;
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नींद से जुड़ा बड़ा कनेक्शन&amp;nbsp;
स्टडी में यह भी सामने आया है कि कम नींद लेने वाले बच्चों में यह खतरा ज्यादा बढ़ जाता है. देर रात तक स्क्रीन देखने से नींद प्रभावित होती है, जिससे शरीर के मेटाबॉलिज्म पर असर पड़ता है. रिसर्च के अनुसार स्क्रीन टाइम और हार्ड डिस्क के बीच 12 प्रतिशत संबंध नींद की कमी के जरिए बनता है. यानी अगर बच्चों की नींद बेहतर होती है तो कुछ हद तक खतरा कम किया जा सकता है. वहीं एक्सपर्ट्स के अनुसार लंबे समय तक स्क्रीन के सामने बैठना, बच्चों की फिजिकल एक्टिविटी को कम कर देता है. इससे वजन बढ़ने का खतरा, ब्लड प्रेशर और शुगर लेवल प्रभावित हो सकते हैं और शरीर में फैट और कोलेस्ट्रॉल बढ़ सकता है. यह सभी फैक्टर आगे चलकर दिल की बीमारियों का कारण बन सकते हैं.&amp;nbsp;
भारत में क्यों बढ़ रही चिंता?
भारत में भी बच्चों में स्क्रीन टाइम तेजी से बढ़ा है, खासकर ऑनलाइन पढ़ाई और स्मार्टफोन के इस्तेमाल के बाद में यह टाइम ज्यादा हो गया है. ऐसे में यह स्टडी भारतीय परिवारों के लिए भी बहुत जरूरी मानी जा रही है. क्योंकि यहां भी बच्चों की नींद और एक्टिविटी पर असर देखा गया है. हालांकि इसे लेकर एक्सपर्ट्स का कहना है कि बच्चों की लाइफस्टाइल में छोटे बदलाव करके इस खतरे को कम किया जा सकता है. जैसे रोजाना स्क्रीन टाइम सीमित रखना, सोने से पहले स्क्रीन से दूरी बनाना, बच्चों को खेलकूद और फिजिकल एक्टिविटी के लिए प्रोत्साहित करना और घर में कुछ समय और जगह को नो स्क्रीन बनाना बनाने जैसी चीजों से पेरेंट्स बदलाव कर सकते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 24 Mar 2026 14:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>Best Time To Get Pregnant: पीरियड शुरू होने के कितने दिन बाद प्रेग्नेंसी के सबसे ज्यादा चांस, न्यू कपल्स के लिए जरूरी बात</title>
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        <description><![CDATA[ How Many Days After Period Can You Get Pregnant: अगर आप प्रेग्नेंसी प्लान कर रहे हैं, तो सबसे पहले अपने मेंस्ट्रुअल साइकिल को समझना बहुत जरूरी है. आमतौर पर एक महिला का साइकिल करीब 28 दिनों का होता है, लेकिन यह 21 से 35 दिनों के बीच भी हो सकता है. हर साइकिल चार मुख्य चरणों में बंटा होता है और इन्हीं के आधार पर यह तय होता है कि प्रेग्नेंसी के चांसेस कब सबसे ज्यादा होते हैं. चलिए आपको इसके बारे में विस्तार से बताते हैं.&amp;nbsp;
पीरियड्स को समझना सबसे जरूरी
cloudninecare की रिपोर्ट के अनुसार, साइकिल की शुरुआत पीरियड्स से होती है, जो लगभग 4 से 5 दिन तक चलते हैं. इस दौरान शरीर में हार्मोन का स्तर कम रहता है. &amp;nbsp;इसके बाद फॉलिक्युलर फेज आता है, जिसमें शरीर अगली ओव्यूलेशन के लिए तैयार होने लगता है. इस समय ओवरी में एग्स विकसित होते हैं और एस्ट्रोजन बढ़ने लगता है, जिससे गर्भाशय की परत मोटी होने लगती है. साइकिल का सबसे अहम समय ओव्यूलेशन होता है, जो आमतौर पर 28 दिन के साइकिल में 14वें दिन के आसपास होता है.
&amp;nbsp;इसी दौरान ओवरी से एक मैच्योर एग रिलीज होता है, जो लगभग 12 से 24 घंटे तक ही जीवित रहता है. इसके बाद ल्यूटल फेज आता है, जिसमें प्रोजेस्टेरोन हार्मोन बढ़ता है और शरीर प्रेग्नेंसी के लिए तैयार होता है. अगर इस समय फर्टिलाइजेशन नहीं होता, तो हार्मोन गिरने लगते हैं और फिर से पीरियड्स शुरू हो जाते हैं.
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सबसे ज्यादा चांस कब?
अब बात आती है फर्टाइल डेज की, यानी वो दिन जब प्रेग्नेंसी के चांसेस सबसे ज्यादा होते हैं. ओव्यूलेशन इस पूरे प्रोसेस का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन सिर्फ उसी दिन ही नहीं, उससे पहले के कुछ दिन भी उतने ही अहम होते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि स्पर्म महिला के शरीर में 5 दिनों तक जीवित रह सकता है. इसलिए ओव्यूलेशन से करीब 5 से 6 दिन पहले से लेकर ओव्यूलेशन के दिन तक का समय फर्टाइल विंडो माना जाता है. अगर आपका साइकिल 28 दिन का है, तो आमतौर पर 9वें दिन से 14वें दिन के बीच प्रेग्नेंसी के चांसेस सबसे ज्यादा होते हैं. हालांकि, हर महिला का साइकिल अलग होता है, इसलिए अपने शरीर के पैटर्न को समझना जरूरी है.
शरीर भी देता है संकेत
सिर्फ कैलेंडर देखना ही काफी नहीं होता, शरीर खुद भी संकेत देता है कि ओव्यूलेशन का समय नजदीक है. इस दौरान सर्वाइकल म्यूकस में बदलाव आता है, जो ज्यादा चिकना, पारदर्शी और खिंचाव वाला हो जाता है, बिल्कुल अंडे की सफेदी जैसा. कुछ महिलाओं को निचले पेट में हल्का दर्द भी महसूस होता है, जिसे मिडलशमर्ज कहा जाता है. व्यूलेशन के बाद बेसल बॉडी टेम्परेचर में हल्की बढ़ोतरी भी देखी जा सकती है. &amp;nbsp;इसके अलावा इस समय सेक्स ड्राइव भी बढ़ सकती है, जो शरीर का एक प्राकृतिक संकेत है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 24 Mar 2026 14:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>एसी में ज्यादा देर रहने से क्यों भारी हो जाता है सिर, जान लीजिए कारण?</title>
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        <description><![CDATA[ आज के आधुनिक युग में गर्मी से राहत पाने के लिए एयर कंडीशनर (एसी) का उपयोग आम बात हो गई है. घर-ऑफिस और मॉल से लेकर गाड़ियों तक एसी का इस्तेमाल किया जाता है. अगर आप भी गर्मी से बचने के लिए अपना ज्यादातर समय एसी में गुजार रहे हैं तो आपको सावधान हो जाना चाहिए, क्योंकि इसके कई साइड इफेक्ट्स हैं. यह आपको बीमार कर सकती है. हेल्थ वेबसाइट्स के मुताबिक, अगर आप अपना ज्यादा वक्त AC में बिता रहे हैं तो सिक बिल्डिंग सिंड्रोम बढ़ने का खतरा रहता है.
AC बना सकता है बीमार
एसी की ठंडी हवा राहत देने का काम करती है, लेकिन कई बार ये परेशानी का कारण बन जाती है, जिसकी वजह से सिरदर्द, गला बैठना, सर्दी-खांसी और त्वचा का सूखना जैसे लक्षण एयर कंडीशनर में बैठने के बाद अक्सर देखने को मिलते हैं. लगातार शुष्क ठंडी हवा में रहने से सांस लेने में तकलीफ, साइनस में परेशानी और मस्तिष्क में ऑक्सीजन के प्रवाह में बदलाव के कारण भारीपन महसूस होता है. एसी (AC) में ज्यादा देर रहने से सिर भारी होने या दर्द होना एक आम बात है. आइए जानते हैं ऐसा क्यों होता है?&amp;nbsp;
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एसी में रहने से सिर भारी होने के मुख्य कारण

डिहाइड्रेशन: एसी कमरे की नमी सोख लेता है, जिससे हवा बहुत शुष्क हो जाती है. यह शुष्क हवा शरीर से नमी को खींच लेती है, जिससे पानी की कमी यानी डिहाइड्रेशन हो जाता है और सिरदर्द होता है.
खून की नलियों का सिकुड़ना: खून की नलियों का सिकुड़ना, जिसको Vasoconstriction भी बोला जाता है. शरीर बहुत ठंडी हवा के संपर्क में आने पर खुद को गर्म रखने के लिए Blood vessels को सिकोड़ने लगता है, जिससे सिर और मस्तिष्क में तनाव बढ़ता है और सिर दर्द जैसी परेशानी होती है.&amp;nbsp;
साइनस की समस्या: ठंडी और सूखी हवा नाक और गले के म्यूकस मेंब्रेन को सुखा देती है, जिससे साइनस में सूजन या भारीपन हो सकता है. इस कारण से भी सिर दर्द जैसी परेशानी होती है.&amp;nbsp;
ऑक्सीजन का स्तर और ताजगी में कमी: इसके कारण कम तापमान और बंद कमरे में रहने से मांसपेशियों में अकड़न और थकान हो जाती है, जिससे सिर भारी महसूस होने लगता है.&amp;nbsp;

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इससे बचाव के उपाय
एसी का तापमान बहुत कम न रखें. इसका तापमान 24-26&amp;deg;C के आसपास रखें. साथ ही, एसी में रहने के दौरान भी समय-समय पर पानी पीते रहना बहुत जरूरी है. इसके अलावा लगातार कई घंटों तक एसी में न बैठें. बीच-बीच में बाहर निकलते रहें और एसी का एयर फिल्टर नियमित रूप से साफ करते रहना भी जरूरी है.
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        <pubDate>Tue, 24 Mar 2026 14:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>Heatwave And Nervous System: आपके नर्वस सिस्टम के लिए क्यों खतरनाक हैं आने वाली गर्मियां, जानें किन बीमारियों का खतरा?</title>
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        <description><![CDATA[ How Extreme Heat Affects The Nervous System: भारतीय गर्मियों में बाहर निकलते ही फर्क साफ महसूस होने लगता है. यह सिर्फ गर्मी नहीं होती, बल्कि एक तरह का भारीपन होता है, जो शरीर के साथ-साथ दिमाग पर भी असर डालता है. धीरे-धीरे थकान बढ़ती है, ध्यान भटकने लगता है और कई बार स्थिति इससे भी ज्यादा गंभीर हो जाती है. हम अक्सर डिहाइड्रेशन, सनबर्न या थकावट की बात करते हैं, लेकिन असल में गर्मी का सीधा असर दिमाग पर भी पड़ता है. तेज गर्मी में सिरदर्द, चक्कर आना, कन्फ्यूजन और ध्यान लगाने में दिक्कत जैसे लक्षण दिखने लगते हैं.&amp;nbsp;
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
TOI Health से बातचीत में चेन्नई के कावेरी हॉस्पिटल की सीनियर न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. शुभा सुब्रमणियन बताती हैं कि गर्मियों में ज्यादा गर्मी और उमस के कारण शरीर में पानी और सोडियम की कमी हो जाती है, जिससे दौरे तक पड़ सकते हैं. ज्यादा पसीना आने से सोडियम लेवल गिर जाता है और यह स्थिति और खतरनाक हो जाती है. कई मामलों में हीट स्ट्रोक भी हो सकता है, जिससे बेहोशी और सीजर का खतरा बढ़ जाता है. ऐसे में खासकर जिन लोगों को पहले से दौरे की समस्या है, उन्हें खुद को हाइड्रेट रखना चाहिए और हल्के, ढीले व हल्के रंग के कपड़े पहनने चाहिए.
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किन लोगों को होता है असर?
बच्चे, बुजुर्ग और जिन लोगों को पहले से न्यूरोलॉजिकल समस्याएं हैं, वे ज्यादा जोखिम में रहते हैं. इसके अलावा, जो लोग लंबे समय तक बाहर काम करते हैं, जैसे डिलीवरी वर्कर्स, ट्रैफिक पुलिस या रेहड़ी-पटरी वाले, उनके लिए यह समस्या रोज की बन जाती है. वहीं, घर के अंदर भी हमेशा सुरक्षित माहौल नहीं होता. खराब वेंटिलेशन, बिजली कटौती या कूलिंग की कमी से स्थिति और बिगड़ सकती है, जिससे दिमाग का संतुलन प्रभावित होता है.
किन बीमारियों का बढ़ता है खतरा?
डॉ. शुभा सुब्रमणियन के मुताबिक, गर्मी का असर कई ऐसी बीमारियों पर भी पड़ता है, जिनके बारे में हम ज्यादा बात नहीं करते. जैसे बच्चों में ड्रावेट सिंड्रोम जैसी एपिलेप्सी की स्थिति गर्मी में और खराब हो सकती है. इसके अलावा, अत्यधिक गर्मी से याददाश्त कमजोर होना, ब्रेन फॉग और सोचने-समझने की क्षमता पर असर पड़ सकता है. मल्टीपल स्क्लेरोसिस जैसे रोगों में लक्षण बढ़ सकते हैं, जबकि डिहाइड्रेशन के कारण स्ट्रोक का खतरा भी बढ़ जाता है.
पार्किंसन और अल्जाइमर के मरीजों के लिए भी गर्मी खतरनाक हो सकती है, क्योंकि उनके शरीर की तापमान कंट्रोल करने की क्षमता कमजोर होती है. वहीं, माइग्रेन से पीड़ित लोगों में धूप में निकलना सिरदर्द को ट्रिगर कर सकता है. गर्मी थकान को भी बढ़ाती है, जिससे रोजमर्रा की जिंदगी और मुश्किल हो जाती है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 24 Mar 2026 14:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>Colon Cancer Symptoms: युवा हैं और शरीर में दिख रहे ये 5 साइलेंट लक्षण तो हो जाएं अलर्ट, वरना यह कैंसर बना लेगा शिकार</title>
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        <description><![CDATA[ What Are The Early Signs Of Colon Cancer: आजकल युवाओं में कोलन कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, जिसे लेकर डॉक्टरों ने खास चेतावनी दी है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर यह बीमारी शरीर के अन्य हिस्सों में फैल जाती है, तो इसके बाद सर्वाइवल रेट काफी कम होकर लगभग 10 प्रतिशत तक रह जाता है. इसलिए इसके शुरुआती संकेतों को समझना बेहद जरूरी है, ताकि समय रहते इलाज शुरू किया जा सके.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कोलन कैंसर के शुरुआती लक्षण बहुत सामान्य होते हैं, जिन्हें लोग अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं. कई बार ये लक्षण दर्द भी नहीं करते, इसलिए लोग इन्हें गंभीरता से नहीं लेते. ब्रिस्टल के द लैगॉम क्लिनिक के जीपी डॉ. जैक ओग्डेन के अनुसार, ये पांच लक्षण अक्सर इतने हल्के होते हैं कि लोग इन्हें नजरअंदाज कर देते हैं, क्योंकि इनमें ज्यादा दर्द महसूस नहीं होता।, कुछ ऐसे संकेत हैं जिन पर ध्यान देना बेहद जरूरी है.&amp;nbsp;
क्या होते हैं संकेत?
पहला संकेत है आयरन की कमी यानी एनीमिया. अगर बिना किसी वजह के थकान, त्वचा का पीला पड़ना या सांस फूलने जैसी समस्याएं हो रही हैं, तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए. कई बार यह अंदरूनी ब्लीडिंग की वजह से होता है, जो ट्यूमर के कारण हो सकती है. दूसरा लक्षण है मल त्याग से जुड़ी दिक्कतें. जैसे बार-बार कब्ज या दस्त होना, या फिर स्टूल का बहुत पतला हो जाना. यह इस बात का संकेत हो सकता है कि आंत में कोई रुकावट है, जो ट्यूमर की वजह से बन रही हो.
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तीसरा संकेत है बिना कोशिश के अचानक वजन कम होना। अगर आप डाइटिंग या एक्सरसाइज नहीं कर रहे हैं, फिर भी वजन तेजी से घट रहा है, तो यह शरीर के अंदर किसी समस्या का संकेत हो सकता है. कई बार ट्यूमर की वजह से शरीर पोषक तत्वों को सही से अब्जर्व नहीं कर पाता. चौथा लक्षण पेट से जुड़ा होता है, जैसे लगातार दर्द, ऐंठन या थोड़ी सी मात्रा में खाने के बाद ही पेट भरा हुआ महसूस होना. यह संकेत भी आंत से जुड़ी समस्या की ओर इशारा कर सकता है.
मल में खून आना
पांचवां और सबसे अहम संकेत है मल में खून आना. अगर स्टूल में काला या गहरा लाल रंग दिखे, तो यह शरीर के अंदर कहीं ऊपर ब्लीडिंग का संकेत हो सकता है. हालांकि, कई बार यह बवासीर या एनल फिशर की वजह से भी हो सकता है, लेकिन इसे नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है. डॉक्टरों का कहना है कि अगर इन लक्षणों में से कोई भी लंबे समय तक बना रहे, तो तुरंत जांच करानी चाहिए. खासकर स्टूल टेस्ट और अन्य मेडिकल जांच से सही स्थिति का पता लगाया जा सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 23 Mar 2026 22:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>Kidney Stones Prevention: क्या ज्यादा से ज्यादा पानी पीने से नहीं होता किडनी में स्टोर? आपकी गलतफहमी दूर कर देगी यह स्टडी</title>
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        <description><![CDATA[ Does Drinking More Water Prevent Kidney Stones: किडनी स्टोन यानी गुर्दे की पथरी एक आम लेकिन बेहद दर्दनाक समस्या है. जिन लोगों को यह होती है, वे अक्सर बताते हैं कि इसका दर्द सबसे ज्यादा तकलीफ देने वाला होता है. यह न सिर्फ रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करता है, बल्कि कई बार अस्पताल तक जाने की नौबत भी आ जाती है. आंकड़ों के मुताबिक, काफी बड़ी संख्या में लोग जीवन में कभी न कभी इस समस्या का सामना करते हैं और कई मामलों में यह दोबारा भी हो सकती है.&amp;nbsp;
पर्याप्त पानी पीने की सलाह
इसी वजह से डॉक्टर हमेशा ज्यादा पानी पीने की सलाह देते हैं. माना जाता है कि पर्याप्त मात्रा में पानी पीने से यूरिन पतला रहता है, जिससे मिनरल्स आपस में चिपककर पथरी नहीं बना पाते. लेकिन समस्या यह है कि ज्यादातर लोग इस आदत को लंबे समय तक बनाए नहीं रख पाते. इसी बात को समझने के लिए हाल ही में एक बड़ी स्टडी की गई, जिसे Urinary Stone Disease Research Network ने संचालित किया और Duke Clinical Research Institute ने कोऑर्डिनेट किया. यह रिसर्च प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल The Lancet में प्रकाशित हुई, जिससे इसकी विश्वसनीयता और भी बढ़ जाती है.
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किन लोगों को इसमें शामिल किया गया?
इस स्टडी में अमेरिका के छह बड़े मेडिकल सेंटर से कुल 1,658 लोगों को शामिल किया गया, जिनमें किशोर और वयस्क दोनों थे. रिसर्च का मकसद यह जानना था कि क्या लोगों को ज्यादा पानी पीने के लिए खास तरीके से मोटिवेट करने पर किडनी स्टोन को दोबारा बनने से रोका जा सकता है. प्रतिभागियों को दो ग्रुप में बांटा गया. एक ग्रुप को सामान्य सलाह दी गई, जबकि दूसरे ग्रुप को एक खास &quot;हाइड्रेशन प्रोग्राम&quot; में शामिल किया गया. इस प्रोग्राम के तहत स्मार्ट बोतल, रिमाइंडर मैसेज, पर्सनल टारगेट और कोचिंग जैसी सुविधाएं दी गईं, ताकि लोग ज्यादा पानी पी सकें.
क्या निकला रिजल्ट?
करीब दो साल तक चले इस अध्ययन में पाया गया कि जिन लोगों ने इस प्रोग्राम को फॉलो किया, उन्होंने पानी पीने की मात्रा जरूर बढ़ाई. लेकिन यह बढ़ोतरी इतनी नहीं थी कि किडनी स्टोन के दोबारा बनने के खतरे को पूरी तरह कम किया जा सके. रिसर्चर्स का कहना है कि असली चुनौती लोगों का लंबे समय तक इस आदत को बनाए रखना है. भले ही लोग फायदे जानते हों और उन्हें सपोर्ट भी मिले, फिर भी रोजाना ज्यादा पानी पीना आसान नहीं होता. इसके अलावा, यह भी सामने आया कि हर व्यक्ति के लिए एक जैसा टारगेट सही नहीं हो सकता. शरीर की बनावट, लाइफस्टाइल, मौसम और हेल्थ कंडीशन जैसे कई फैक्टर यह तय करते हैं कि किसी को कितनी मात्रा में पानी की जरूरत है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 23 Mar 2026 22:30:09 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Kidney, Stones, Prevention:, क्या, ज्यादा, से, ज्यादा, पानी, पीने, से, नहीं, होता, किडनी, में, स्टोर, आपकी, गलतफहमी, दूर, कर, देगी, यह, स्टडी</media:keywords>
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        <title>FDA Supplement Alert: Amazon पर बिक रहे इन सप्लीमेंट में मिला जहर! इस्तेमाल करते हैं तो तुरंत बना लें दूरी</title>
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        <description><![CDATA[ Which Supplements Contain Toxic Ingredients: अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन के &amp;nbsp;हेल्थ अधिकारियों ने 29 तरह के सप्लीमेंट्स को लेकर चेतावनी जारी की है, क्योंकि इनमें जहरीले तत्व पाए जाने का खतरा है. ये सप्लीमेंट्स खुद को तेजोकोटे रूट या ब्राजील सीड बताकर बेचे जा रहे थे, जिन्हें आम तौर पर वजन घटाने और एंटीऑक्सीडेंट के लिए इस्तेमाल किया जाता है. लेकिन जांच में सामने आया कि इन प्रोडक्ट्स में असल में येलो ओलियंडर नाम का जहरीला पौधा मौजूद है. यह पौधा मेक्सिको और सेंट्रल अमेरिका में पाया जाता है और स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक माना जाता है.
क्या होता है इससे नुकसान?
एफडीए के मुताबिक, येलो ओलियंडर का सेवन करने से शरीर पर गंभीर असर पड़ सकता है. इससे दिल, दिमाग और डाइजेशन से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं. कई मामलों में कार्डियक अरेस्ट, पेट दर्द, उलझन और अन्य गंभीर लक्षण भी सामने आ सकते हैं, जो जानलेवा साबित हो सकते हैं. ये सप्लीमेंट्स अमेजन, ईबे और एट्सी जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स के साथ-साथ कई वेबसाइट्स पर बेचे जा रहे थे. अब एफडीए ने लोगों को सलाह दी है कि वे इन प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल तुरंत बंद कर दें और इन्हें सुरक्षित तरीके से नष्ट कर दें.&amp;nbsp;
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कुछ कंपनियों ने प्रोडक्ट वापस लेने का फैसला लिया
कुछ कंपनियों ने अपने प्रोडक्ट्स को वापस मंगवाने (रिकॉल) का फैसला किया है, जबकि कई कंपनियों से संपर्क भी नहीं हो पाया या उन्होंने रिकॉल से इनकार कर दिया है. एफडीए ने यह भी कहा है कि अगर किसी ने इन सप्लीमेंट्स का सेवन किया है, तो वह तुरंत डॉक्टर से संपर्क करे, भले ही अभी कोई लक्षण न दिख रहे हों. अगर किसी को गंभीर साइड इफेक्ट महसूस हो रहे हैं, तो तुरंत इमरजेंसी मेडिकल मदद लें ..इस मामले की जांच 2023 में शुरू हुई थी, जब सीडीसी की रिपोर्ट में पाया गया था कि तेजोकोटे रूट के नाम पर बेचे जा रहे कुछ प्रोडक्ट्स में येलो ओलियंडर मिला हुआ है.एफडीए को आशंका है कि बाजार में मौजूद ऐसे और भी कई प्रोडक्ट्स हो सकते हैं, जो अलग-अलग नामों से बेचे जा रहे हैं लेकिन उनमें यही जहरीला तत्व हो सकता है.
दरअसल, येलो ओलियंडर का इस्तेमाल इसलिए किया जाता है क्योंकि इसके जहरीले तत्व भूख कम करते हैं और उल्टी-दस्त जैसे लक्षण पैदा करते हैं, जिससे तेजी से वजन कम होता दिखता है. लेकिन यह तरीका बेहद खतरनाक है और गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकता है. इन सप्लीमेंट्स की पहचान करना भी आसान नहीं है, क्योंकि येलो ओलियंडर के बीज दिखने में कुछ नेचुरल प्रोडक्ट्स जैसे कैंडलनट जैसे लगते हैं. यही वजह है कि लोग बिना जाने इन्हें इस्तेमाल कर लेते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 23 Mar 2026 18:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>COVID And Cancer Risk: जिन लोगों को हुआ था सीवियर कोविड, वे तुरंत करा लें यह टेस्ट, वरना यह कैंसर बना लेगा शरीर में घर</title>
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        <description><![CDATA[ Can Severe COVID Increase Cancer Risk: हाल ही में सामने आई एक नई रिसर्च ने एक चौंकाने वाली बात उजागर की है. &amp;nbsp;इसमें बताया गया है कि अगर किसी व्यक्ति को कोविड-19 या फ्लू का गंभीर इंफेक्शन हुआ है, तो भविष्य में उसके कैंसर का खतरा बढ़ सकता है. यह सुनने में थोड़ा डराने वाला जरूर है, लेकिन साइंटिस्ट का मानना है कि इसके पीछे शरीर में होने वाले कुछ लंबे समय तक रहने वाले बदलाव जिम्मेदार हो सकते हैं.
क्या निकला रिसर्च में?
दरअसल, जब शरीर किसी गंभीर वायरल इंफेक्शन से गुजरता है, खासकर जो लंग्स को प्रभावित करता है, तो वह पूरी तरह से पहले जैसा नहीं हो पाता. यूनिवर्सिटी ऑफ वर्जीनिया के कार्टर सेंटर की एक नई रिसर्च में सामने आया है कि कोविड-19 या फ्लू का गंभीर इंफेक्शन भविष्य में कैंसर का खतरा बढ़ा सकता है. &amp;nbsp;वैज्ञानिकों ने पाया कि कुछ खास इम्यून सेल्स, जैसे न्यूट्रोफिल और मैक्रोफेज, जो आमतौर पर शरीर को इंफेक्शन से बचाते हैं, गंभीर बीमारी के बाद सही तरीके से काम नहीं कर पाते. कई मामलों में ये सेल्स असामान्य तरीके से व्यवहार करने लगते हैं और सूजन को कम करने के बजाय बढ़ा देते हैं. यही स्थिति आगे चलकर शरीर में एक ऐसा माहौल बना सकती है, जो ट्यूमर के बनने के लिए अनुकूल होता है.&amp;nbsp;
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किन लोगों को ज्यादा खतरा?
रिसर्च में यह भी सामने आया कि जिन लोगों को कोविड-19, फ्लू या निमोनिया की वजह से अस्पताल में भर्ती होना पड़ा था, उनमें यह खतरा ज्यादा देखा गया, इसका मतलब यह है कि इंफेक्शन की गंभीरता भी एक अहम भूमिका निभाती है. हल्के लक्षणों वाले लोगों में ऐसा जोखिम कम पाया गया. वहीं वैक्सीन लगवाने वाले लोगों पर अलग प्रभाव दिखा.&amp;nbsp;
वैक्सीन लगवाने वाले लोगों की क्या है स्थिति?
हालांकि, इस स्टडी में एक राहत देने वाली बात भी सामने आई है. जिन लोगों ने पहले से वैक्सीन लगवाई हुई थी और उन्हें हल्का इंफेक्शन हुआ, उनमें कैंसर का खतरा नहीं बढ़ा. बल्कि कुछ मामलों में यह जोखिम थोड़ा कम भी पाया गया. इससे यह संकेत मिलता है कि वैक्सीनेशन न सिर्फ गंभीर बीमारी से बचाता है, बल्कि उसके लंबे समय तक रहने वाले दुष्प्रभावों को भी कम कर सकता है. एक्सपर्ट का कहना है कि अगर किसी को गंभीर कोविड या फ्लू हुआ है, तो उसे अपनी सेहत को लेकर थोड़ी ज्यादा सतर्कता बरतनी चाहिए. समय-समय पर हेल्थ चेकअप और जरूरी स्क्रीनिंग करवाना फायदेमंद हो सकता है, खासकर अगर पहले से कोई अन्य जोखिम कारण मौजूद हों.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 23 Mar 2026 18:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>High Blood Pressure In Cold Weather: मौसम ठंडा होते ही बढ़ गया हाई बीपी का खतरा? योग गुरु रामदेव के बताए ये 4 आसन दिलाएंगे राहत</title>
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        <description><![CDATA[ Best Yoga Asanas For High BP Patients: आजकल हाई ब्लड प्रेशर यानी हाई बीपी की समस्या तेजी से बढ़ रही है. मौसम में ठंडक आने पर यह परेशानी और भी गंभीर हो जाती है. दरअसल, ठंडे मौसम के कारण रक्त वाहिकाएं सिकुड़ जाती हैं, जिससे ब्लड प्रेशर बढ़ने का खतरा रहता है. अगर लंबे समय तक बीपी कंट्रोल में न रहे, तो इसका असर हार्ट, किडनी और दिमाग पर पड़ सकता है. बुजुर्गों, मोटापे से जूझ रहे लोगों और पहले से बीपी की समस्या वाले मरीजों को इस मौसम में खास सतर्क रहने की जरूरत होती है.
ऐसे में योग को हाई बीपी कंट्रोल करने का एक प्राकृतिक और असरदार तरीका माना जाता है, योग न सिर्फ शरीर को सक्रिय रखता है, बल्कि तनाव कम करने और ब्लड सर्कुलेशन बेहतर बनाने में भी मदद करता है. योग गुरु रामदेव के अनुसार, कुछ खास योगासन सर्दियों में हाई बीपी को संतुलित रखने में मददगार हो सकते हैं.
भुजंगासन
भुजंगासन से छाती खुलती है और फेफड़ों तक ऑक्सीजन का प्रवाह बेहतर होता है. सर्दियों में जब ठंड की वजह से रक्त संचार धीमा हो जाता है, तब यह आसन ब्लड फ्लो सुधारने में मदद करता है. इससे हार्ट पर पड़ने वाला दबाव कम होता है और ब्लड प्रेशर संतुलन में रहता है.
मंडूकासन
मंडूकासन पेट और नर्वस सिस्टम पर सकारात्मक प्रभाव डालता है. यह तनाव और चिंता को कम करने में मदद करता है, जो सर्दियों में बीपी बढ़ने का बड़ा कारण बन सकते हैं. नियमित अभ्यास से शरीर को आराम मिलता है और ब्लड प्रेशर नियंत्रित रहता है.
शशांकासन
शशांकासन को मन को शांत करने वाला योगासन माना जाता है. मानसिक तनाव और दबाव सर्दियों में बीपी बढ़ा सकते हैं. यह आसन दिमाग को शांत करता है, दिल की धड़कन को सामान्य करता है और हाई बीपी कंट्रोल में मदद करता है.
स्थित कोणासन
स्थित कोणासन शरीर का संतुलन और रक्त प्रवाह बेहतर करता है. यह दिल और मांसपेशियों को सक्रिय रखता है, जिससे अचानक बीपी बढ़ने का खतरा कम होता है. नियमित अभ्यास से शरीर गर्म रहता है और ब्लड प्रेशर स्थिर बना रहता है.
हाई बीपी कंट्रोल के लिए ये बातें भी जरूरी


नमक का सेवन सीमित रखें, इससे ब्लड प्रेशर को कंट्रोल रखने में मदद मिलती है.


रोज हल्की एक्सरसाइज या वॉक करें, इससे शरीर फिट रहता है और कई दिक्कतों को कंट्रोल किया जा सकता है.


तनाव और चिंता से दूर रहें. आप जितना ज्यादा तनाव लेंगे, दिक्कत उतना ही ज्यादा बढ़ेगी.


डॉक्टर की बताई दवाएं समय पर लें


पूरी नींद जरूर लें


ये भी पढ़ें-क्या होती है हाथी पांव वाली बीमारी, क्या इसमें सच में हाथी जैसा हो जाता है पैर?
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 23 Mar 2026 18:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>Chest Pain At Night: रात के वक्त सीने में तेज दर्द होना कितना खतरनाक, डॉक्टर से जानें ऐसा होने पर क्या करें?</title>
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        <description><![CDATA[ Is Chest Pain At Night Dangerous: अगर आपको सोते समय या रात के बीच अचानक सीने में तेज दर्द महसूस हो, तो इसे हल्के में लेना खतरनाक साबित हो सकता है. कई लोग इसे गैस, एसिडिटी या थकान समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन डॉक्टरों के मुताबिक, रात में बार-बार सीने में दर्द उठना किसी गंभीर बीमारी, यहां तक कि हार्ट अटैक का संकेत भी हो सकता है. चलिए आपको बताते हैं कि कब रात में सीने में तेज दर्द आपके लिए खतरनाक हो सकता है.&amp;nbsp;
दरअसल, सीने में दर्द चाहे दिन में हो या रात में, अगर वह बार-बार हो रहा है या तेज है, तो जांच जरूरी हो जाती है. खासतौर पर नींद के दौरान दर्द से आंख खुलना एक चेतावनी मानी जाती है.
रात में सीने में दर्द क्यों उठता है?
न्यू फोर्टिस अस्पताल के कार्डियोलॉजिस्ट प्रमोद कुमार बताते हैं कि इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं. कुछ मामलों में यह मामूली भी हो सकता है, लेकिन कई बार जानलेवा स्थिति का संकेत देता है.
एंजाइना
यह तब होता है जब दिल तक खून पहुंचाने वालीआर्टरीज संकरी हो जाती हैं. इससे दिल की मांसपेशियों को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती और सीने में दबाव या दर्द महसूस होता है. यह दर्द आराम की स्थिति या नींद में भी हो सकता है और हार्ट अटैक का खतरा बढ़ा देता है.
एसिड रिफ्लक्स
लेटने की स्थिति में पेट का एसिड ऊपर की ओर आ सकता है, जिससे सीने में जलन या दबाव महसूस होता है. अगर यह दर्द दो-तीन दिन से ज्यादा बना रहे, तो डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए.
हाई ब्लड प्रेशर और फेफड़ों से जुड़ीं समस्याएं
ब्लड प्रेशर अचानक बहुत ज्यादा बढ़ने पर सीने में तेज दर्द हो सकता है. वहीं, प्ल्यूरिसी जैसी स्थिति में सांस लेते समय सीने में चुभन महसूस होती है.
कब यह हार्ट अटैक का संकेत हो सकता है?
डॉक्टरों के अनुसार, अगर सीने में दर्द के साथ ये लक्षण दिखें, तो तुरंत इमरजेंसी मदद लें-

बहुत तेज या चुभने वाला सीने का दर्द
अचानक मतली
ठंडा पसीना आना
लेटने पर सांस लेने में तकलीफ
चक्कर आना या बेहोशी
दिल की धड़कन असामान्य होना

ये हार्ट अटैक के लक्षण हो सकते हैं, जो समय पर इलाज न मिलने पर जानलेवा साबित हो सकते हैं. अगर आपको इनमें से कोई भी लक्षण दिखते हैं, तो आपको बिना समय गवाएं डॉक्टर से संपर्क करना है. अगर आपको ज्यादा दिक्कत महसूस हो, तो आप इमरजेंसी हेल्पलाइन की मदद भी ले सकते हैं.&amp;nbsp;
इसे भी पढ़ें:&amp;nbsp;नाखूनों से पहचानें सेहत का हाल, ये संकेत हो सकते हैं खतरनाक, तुरंत लें मेडिकल सलाह
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें&amp;nbsp; ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 23 Mar 2026 18:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Chest, Pain, Night:, रात, के, वक्त, सीने, में, तेज, दर्द, होना, कितना, खतरनाक, डॉक्टर, से, जानें, ऐसा, होने, पर, क्या, करें</media:keywords>
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        <title>फैटी लिवर को जड़ से खत्म कर देगी आपकी ये 5 आदतें! एकदम आसान है इन्हें करना</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/फैटी-लिवर-को-जड़-से-खत्म-कर-देगी-आपकी-ये-5-आदतें-एकदम-आसान-है-इन्हें-करना</link>
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        <description><![CDATA[  ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 18 Mar 2026 12:30:44 +0530</pubDate>
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        <title>Fatty Liver Disease: लिवर में जमा फैट है खतरे की घंटी! क्यों होती है यह समस्या और अपनी &amp;apos;लिवर फैक्ट्री&amp;apos; कैसे दुरुस्त?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/fatty-liver-disease-लिवर-में-जमा-फैट-है-खतरे-की-घंटी-क्यों-होती-है-यह-समस्या-और-अपनी-लिवर-फैक्ट्री-कैसे-दुरुस्त</link>
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        <description><![CDATA[ What To Do If Ultrasound Shows Fatty Liver: अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट में फैटी लिवर शब्द पढ़ना कई लोगों के लिए चिंता की वजह बन जाता है. फैटी लिवर, जिसे मेडिकल भाषा में MASLD कहा जाता है, तब होता है जब लिवर की सेल्स में जरूरत से ज्यादा फैट जमा हो जाती है। यह समस्या किसी को भी हो सकती है, युवा, बुजुर्ग, डायबिटीज के मरीज या सामान्य वजन वाले लोग भी इससे प्रभावित हो सकते हैं. खास बात यह है कि अक्सर इसके कोई क्लियर लक्षण नहीं होते और जांच के दौरान ही इसका पता चलता है. अच्छी खबर यह है कि शुरुआती चरण में फैटी लिवर स्थायी नहीं होता. समय रहते सही कदम उठाए जाएं तो इसे रोका और कई मामलों में ठीक भी किया जा सकता है.
किन वजहों से होती है दिक्कत?
मेडिकल तौर पर फैटी लिवर का मतलब है कि लिवर के टिश्यू में 5 प्रतिशत से ज्यादा फैट जमा हो चुका है. यह आमतौर पर मेटाबॉलिक समस्याओं जैसे मोटापा, इंसुलिन रेजिस्टेंस, खून में ज्यादा फैट या असंतुलित खान-पान की वजह से होता है, न कि हमेशा शराब के कारण, अगर इस स्थिति को नजरअंदाज किया जाए तो समय के साथ यह सूजन, फाइब्रोसिस और लिवर की काम करने की क्षमता में कमी का कारण बन सकता है. लिवर को एक फैक्ट्री की तरह समझा जा सकता है, जब इसमें जरूरत से ज्यादा फैट जमा हो जाती है तो इसकी काम की स्पीड़ धीमी पड़ने लगती है.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
&amp;nbsp;डॉ. अपूर्वा पांडे ने TOI को बताया कि अल्ट्रासाउंड में फैटी लिवर का जिक्र सुनकर घबराने की जरूरत नहीं है, क्योंकि ज्यादातर मामलों में यह स्थिति उलटी भी हो सकती है. उनके अनुसार यह समस्या अक्सर मोटापा, डायबिटीज, ज्यादा कोलेस्ट्रॉल, कम फिजिकल एक्टिविटी या अत्यधिक शराब सेवन से जुड़ी होती है. फैटी लिवर के दो मुख्य प्रकार होते हैं, नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर और अल्कोहलिक फैटी लिवर. डॉक्टरों की सलाह है कि रिपोर्ट मिलने के बाद सबसे पहले घबराने के बजाय सही जानकारी लेना जरूरी है. अपने डॉक्टर से मिलकर लिवर फंक्शन टेस्ट, फाइब्रोसिस स्कोर और अन्य जोखिम कारकों जैसे ब्लड शुगर या कोलेस्ट्रॉल की जांच करानी चाहिए.
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क्या होता है इसका इलाज?
एक्सपर्ट मानते हैं कि फैटी लिवर के शुरुआती चरण में सबसे प्रभावी इलाज लाइफस्टाइल में बदलाव है. जर्नल ऑफ हेपेटोलॉजी में प्रकाशित एक स्टडी बताता है कि संतुलित आहार और नियमित व्यायाम लिवर में जमा फैट और सूजन को कम करने में मदद कर सकते हैं. डॉ. पांडे के अनुसार वजन कम करना सबसे अहम कदमों में से एक है. शरीर के कुल वजन का लगभग 5 प्रतिशत कम होने से लिवर में जमा फैट घट सकता है, जबकि 7 से 10 प्रतिशत वजन कम होने से सूजन और फाइब्रोसिस में भी सुधार देखा गया है. इसके साथ-साथ संतुलित डाइट, नियमित व्यायाम, ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखना तथा शराब से दूरी बनाना भी जरूरी है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 18 Mar 2026 08:30:09 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Fatty, Liver, Disease:, लिवर, में, जमा, फैट, है, खतरे, की, घंटी, क्यों, होती, है, यह, समस्या, और, अपनी, लिवर, फैक्ट्री, कैसे, दुरुस्त</media:keywords>
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        <title>16&amp;18 करोड़ रुपये में आता है ये छोटा सा इंजेक्शन, जानिए किस बीमारी में होता है इस्तेमाल</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/16-18-करोड़-रुपये-में-आता-है-ये-छोटा-सा-इंजेक्शन-जानिए-किस-बीमारी-में-होता-है-इस्तेमाल</link>
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        <description><![CDATA[ आज के समय में ज्यादातर बीमारियों का इलाज दवाइयों, इंजेक्शन या ऑपरेशन से हो जाता है, लेकिन कुछ बीमारियां ऐसी होती हैं, जो हमारे जीन यानी अनुवांशिक कारणों से होती हैं और उनका इलाज इतना आसान नहीं होता, खासकर छोटे बच्चों में होने वाली कुछ दुर्लभ बीमारियां बहुत गंभीर होती हैं, ऐसी ही एक बीमारी स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी (SMA) है, जिसके इलाज के लिए एक खास इंजेक्शन आता है, जिसकी कीमत करीब 16&amp;ndash;18 करोड़ रुपये तक होती है. यह दुनिया की सबसे महंगी दवाओं में से एक मानी जाती है. तो आइए जानते हैं कि 16-18 करोड़ रुपये में कौन सा छोटा सा इंजेक्शन आता है और किस बीमारी में इस्तेमाल होता है.
16-18 करोड़ रुपये में कौन सा छोटा सा इंजेक्शन आता है
16&amp;ndash;18 करोड़ रुपये की कीमत वाला छोटा सा इंजेक्शन Zolgensma होता है. यह दुनिया की सबसे महंगी दवाओं में से एक मानी जाती है और इसका यूज एक गंभीर जेनेटिक बीमारी Spinal Muscular Atrophy (SMA) के इलाज में किया जाता है. यह एक जीन थेरेपी इंजेक्शन है. इसे आमतौर पर 2 साल से कम उम्र के बच्चों को दिया जाता है. यह सिर्फ एक बार दिया जाने वाला इंजेक्शन है.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ें- Sock Marks On Ankles: क्या आपके पैरों पर भी घंटों बने रहते हैं मोजों के निशान, जानें किस दिक्कत का हो सकता है संकेत?
किस बीमारी में इस्तेमाल होता है
16&amp;ndash;18 करोड़ रुपये के इस छोटे इंजेक्शन Zolgensma का इस्तेमाल Spinal Muscular Atrophy (SMA) बीमारी में किया जाता है. &amp;nbsp;SMA एक जेनेटिक न्यूरो-मस्कुलर डिसऑर्डर यानी अनुवांशिक बीमारी है, जो शरीर की नसों और मांसपेशियों को प्रभावित करती है. इसमें शरीर के मोटर न्यूरॉन्स ठीक से काम नहीं करते, जो मांसपेशियों को नियंत्रित करते हैं. इस बीमारी में SMN1 नाम का जीन खराब या गायब होता है, जिसकी वजह से जरूरी प्रोटीन नहीं बन पाता है.
इसके कारण बच्चे की मांसपेशियां धीरे-धीरे कमजोर होने लगती हैं. उसे बैठने, खड़े होने या चलने में परेशानी होती है. गंभीर मामलों में सांस लेने और निगलने में भी दिक्कत हो सकती है. SMA बीमारी में बच्चे के शरीर में एक जरूरी जीन (SMN1) सही से काम नहीं करता है. Zolgensma उस खराब जीन की जगह सही जीन की कॉपी शरीर में पहुंचाता है, जिससे मांसपेशियों की ताकत बेहतर हो सकती है.&amp;nbsp;
इसके लक्षण क्या हैं?
SMA के लक्षण हर बच्चे में अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन कुछ आम संकेत जैसे बच्चा समय पर बैठना या चलना नहीं सीख पाता, हाथ-पैर कमजोर रहते हैं, सिर को संभालने में दिक्कत, जल्दी थकान महसूस होना, सांस लेने या निगलने में परेशानी है. अगर ये लक्षण दिखें, तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लेना बहुत जरूरी है.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ें- High Cholesterol In Young Age: अब छोटी उम्र से ही कोलेस्ट्रॉल का खतरा, हार्ट अटैक से बचना है तो... 11 मेडिकल इंस्टीट्यूट ने जारी की गाइडलाइन
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 18 Mar 2026 00:30:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>16-18, करोड़, रुपये, में, आता, है, ये, छोटा, सा, इंजेक्शन, जानिए, किस, बीमारी, में, होता, है, इस्तेमाल</media:keywords>
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    <item>
        <title>Sock Marks On Ankles: क्या आपके पैरों पर भी घंटों बने रहते हैं मोजों के निशान, जानें किस दिक्कत का हो सकता है संकेत?</title>
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        <description><![CDATA[ Why Do Socks Leave Marks On Your Ankles: दिनभर मोजे पहनने के बाद जब हम उन्हें उतारते हैं तो अक्सर टखनों के आसपास हल्के निशान दिखाई देते हैं. ज्यादातर मामलों में यह बिल्कुल सामान्य होता है. मोजों के इलास्टिक की हल्की दबाव की वजह से त्वचा पर कुछ देर के लिए निशान बन जाते हैं और कुछ मिनटों में अपने-आप गायब भी हो जाते हैं. लेकिन अगर ये निशान ज्यादा गहरे हों, देर तक बने रहें या पैरों में सूजन के साथ दिखाई दें, तो डॉक्टर इसे शरीर के एक संकेत के रूप में देखने की सलाह देते हैं.
कई बार यह शरीर में ब्लड सर्कुलेशन या फ्लूड बैलेंस से जुड़ी किसी समस्या की ओर इशारा कर सकता है. हालांकि सिर्फ मोजों के निशान किसी बीमारी का पक्का संकेत नहीं होते. असली बात यह है कि ये निशान कितनी बार दिखते हैं, कितने गहरे होते हैं और उनके साथ अन्य लक्षण मौजूद हैं या नहीं.
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क्यों होती है दिक्कत?
दरअसल, निचले पैरों की त्वचा नरम होती है और दबाव पड़ने पर जल्दी दब जाती है. जब मोजे कई घंटों तक पैरों पर दबाव डालते हैं तो त्वचा पर हल्की गहराई बन जाती है. आमतौर पर मोजे हटाने के बाद यह निशान जल्दी ही खत्म हो जाता है. लेकिन अगर पैरों में हल्की सूजन हो तो वही दबाव त्वचा के नीचे जमा तरल को दबा देता है, जिससे निशान ज्यादा गहरे और लंबे समय तक दिखाई दे सकते हैं, डॉक्टर इस स्थिति को पेरिफेरल एडिमा कहते हैं, जिसमें पैरों और टखनों के आसपास टिश्यू में तरल जमा होने लगता है.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
वस्कुलर सर्जन डॉ. वरुण बंसल के अनुसार, कई बार मरीज सबसे पहले मोजों के गहरे निशान ही नोटिस करते हैं और बाद में उन्हें पता चलता है कि पैरों में ब्लड सर्कुलेशन से जुड़ी समस्या मौजूद है. उनके मुताबिक अगर मोजों के निशान बार-बार गहरे दिखते हैं, तो यह खराब ब्लड फ्लो, फ्लूड रिटेंशन या वीनस इंसफिशिएंसी जैसी स्थितियों का संकेत हो सकता है. वीनस इंसफिशिएंसी में पैरों की नसें खून को ठीक तरह से हार्ट तक वापस नहीं भेज पातीं, जिससे निचले हिस्से में सूजन आने लगती है.
कुछ लोगों में यह समस्या ज्यादा देखने को मिलती है. जैसे जो लोग लंबे समय तक बैठकर या खड़े होकर काम करते हैं, जिनकी लाइफस्टाइल बहुत कम एक्टिव है, या जिन्हें हार्ट, किडनी या डायबिटीज से जुड़ी समस्याएं हैं.लंबे समय तक पैरों को स्थिर रखने से ब्लड फ्लो धीमा हो जाता है और पैरों में तरल जमा होने लगता है.
इन तरीकों से बच सकते हैं आप
डॉक्टर कहते हैं कि अगर मोजों के निशान के साथ पैरों में भारीपन, सूजन, त्वचा का रंग बदलना या दर्द जैसी समस्या हो तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए. हालांकि अच्छी बात यह है कि कुछ आसान आदतें ब्लड सर्कुलेशन बेहतर रखने में मदद कर सकती हैं। नियमित चलना-फिरना, पैरों को थोड़ा ऊंचा रखकर आराम करना, स्वस्थ वजन बनाए रखना और बहुत टाइट मोजे न पहनना इसमें मददगार हो सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 17 Mar 2026 16:30:16 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Sock, Marks, Ankles:, क्या, आपके, पैरों, पर, भी, घंटों, बने, रहते, हैं, मोजों, के, निशान, जानें, किस, दिक्कत, का, हो, सकता, है, संकेत</media:keywords>
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        <title>Ear Infection Symptoms: क्या आपके कान आपको दे रहे हैं चेतावनी? इन संकेतों को पहचानें, वरना हो सकती है गंभीर समस्या</title>
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        <description><![CDATA[ When To See A Doctor For Ear Pain: अक्सर देखा जाता है कि लोग कान से जुड़े शुरुआती संकेतों को नजरअंदाज कर देते हैं. कई मरीज तब डॉक्टर के पास पहुंचते हैं जब समस्या काफी बढ़ चुकी होती है और इलाज भी जटिल हो जाता है. दरअसल, कान सिर्फ सुनने का काम नहीं करते, बल्कि शरीर के संतुलन, ब्रेन की काम करने की क्षमता और ओवरऑल हेल्थ से भी जुड़े होते हैं. इसलिए समय रहते लक्षणों को पहचानना और सही इलाज करवाना बहुत जरूरी है.
क्यों नहीं करना चाहिए इग्नोर?
डॉ. दीप्ति सिन्हा ने TOI में अपने लेख में बताया कि कान में लगातार दर्द या असहजता को कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. अगर कान में भारीपन, बंद होने जैसा एहसास या हल्का लेकिन लगातार दर्द महसूस हो रहा है, तो इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं. जैसे कान में मैल जमना, फंगल या बैक्टीरियल संक्रमण, मिडिल ईयर इंफेक्शन या यूस्टेशियन ट्यूब से जुड़ी समस्या. खासतौर पर जिन लोगों को डायबिटीज है, उनके लिए कान का इंफेक्शन ज्यादा खतरनाक हो सकता है. ऐसे मामलों में मैलिग्नेंट ओटिटिस एक्सटर्ना नाम की गंभीर बीमारी का खतरा बढ़ जाता है, जो आगे चलकर हड्डियों तक फैल सकती है.
सुनने की क्षमता भी हो सकती है प्रभावित
सुनने की क्षमता में कमी भी एक अहम चेतावनी संकेत हो सकता है. अगर आपको बार-बार लोगों से बात दोहराने के लिए कहना पड़ता है, टीवी की आवाज ज्यादा करनी पड़ती है या शोर वाली जगह पर बातचीत समझने में दिक्कत होती है, तो तुरंत हियरिंग टेस्ट कराना चाहिए. खासकर बुजुर्गों को हर साल सुनने की जांच करानी चाहिए, क्योंकि हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और किडनी की बीमारी सुनने की क्षमता को तेजी से प्रभावित कर सकती है. कई बार यह समस्या मिडिल ईयर में पानी भरने, कान के पर्दे में छेद या अन्य समस्याओं के कारण भी होती है, जिनका इलाज सर्जरी से संभव है.
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किस तरह की हो सकती है दिक्कत?
कानों में घंटी बजने, भनभनाहट या अजीब आवाज सुनाई देना, जिसे टिनिटस कहा जाता है, भी एक सामान्य लेकिन गंभीर संकेत हो सकता है. यह समस्या इनर ईयर की गड़बड़ी, नसों को नुकसान, ज्यादा शोर के संपर्क या ब्लड सर्कुलेशन से जुड़ी समस्या के कारण हो सकती है. यदि यह समस्या लगातार बनी रहती है, तो डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है. इसके अलावा चक्कर आना, सिर घूमना या संतुलन बिगड़ना भी अक्सर इनर ईयर की समस्या से जुड़ा होता है. कुछ स्थितियों जैसे वेस्टिब्युलर न्यूराइटिस, पोजिशनल वर्टिगो या लैबिरिन्थाइटिस में मरीज को अचानक तेज चक्कर और मतली की शिकायत हो सकती है.
कान से पानी या पस आना, खुजली, बदबू या गंदगी दिखना भी इंफेक्शन या कान के पर्दे में छेद का संकेत हो सकता है. बच्चों में कई बार छोटे-छोटे खिलौने या अन्य वस्तुएं भी कान में फंस जाती हैं, जिन्हें घर पर निकालने की कोशिश करना खतरनाक हो सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 17 Mar 2026 12:30:43 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Ear, Infection, Symptoms:, क्या, आपके, कान, आपको, दे, रहे, हैं, चेतावनी, इन, संकेतों, को, पहचानें, वरना, हो, सकती, है, गंभीर, समस्या</media:keywords>
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        <title>Early Signs Of Heart Disease: युवाओं में तेजी से बढ़ रहा आर्टरीज के सख्त होने का खतरा, ये लक्षण न करें नजरअंदाज</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/early-signs-of-heart-disease-युवाओं-में-तेजी-से-बढ़-रहा-आर्टरीज-के-सख्त-होने-का-खतरा-ये-लक्षण-न-करें-नजरअंदाज</link>
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        <description><![CDATA[ Why Arteries Age Faster In Your 30s: पहले हार्ट से जुड़ी बीमारियों को आमतौर पर बढ़ती उम्र की समस्या माना जाता था. माना जाता था कि 50 या 60 की उम्र के बाद ही आर्टरीज में ब्लॉकेज या हार्ट अटैक का खतरा बढ़ता है. लेकिन अब यह तस्वीर धीरे-धीरे बदल रही है. डॉक्टरों के अनुसार आजकल कई लोगों में 30 की उम्र के आसपास ही धमनियों में उम्र बढ़ने के संकेत दिखाई देने लगे हैं. चलिए आपको बताते हैं कि आखिर ऐसा क्यों होता है.&amp;nbsp;
क्यों होती है ऐसी दिक्कत
&amp;nbsp;आर्टरीज शरीर में खून को दिल से बाकी अंगों तक पहुंचाने का काम करती हैं. सामान्य तौर पर ये लचीली और मुलायम होती हैं, जिससे खून आसानी से बहता रहता है. लेकिन जब ये धीरे-धीरे सख्त होने लगती हैं तो ब्लड का फ्लो प्रभावित होने लगता है. इससे हार्ट को खून पंप करने के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है, जो आगे चलकर हार्ट रोग, स्ट्रोक और अन्य कार्डियोवैस्कुलर समस्याओं का खतरा बढ़ा सकता है,
क्या कहते हैं एक्सपर्ट
इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल के कार्डियोथोरेसिक और वैस्कुलर सर्जरी एक्सपर्ट डॉ. मुकेश गोयल के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में कम उम्र में ही आर्टरीज के सख्त होने के मामले बढ़ते देखे जा रहे हैं. उनका कहना है कि पहले इस तरह की समस्याएं आमतौर पर 50 या 60 की उम्र में देखी जाती थीं, लेकिन अब बदलती लाइफस्टाइल के कारण 30 की उम्र में भी इसके संकेत सामने आने लगे हैं.
बदलती लाइफस्टाइल बड़ी वजह
एक्सपर्ट मानते हैं कि इसके पीछे आधुनिक लाइफस्टाइल बड़ी वजह है. लंबे समय तक बैठकर काम करना, तनाव भरा कामकाजी माहौल, अनियमित नींद और प्रोसेस्ड फूड का ज्यादा सेवन धीरे-धीरे ब्लड वेसल्स पर असर डाल सकता है. इसके अलावा धूम्रपान, मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और खराब खान-पान भी आर्टरीज के जल्दी बूढ़ा होने के जोखिम को बढ़ाते हैं. कई बार यह समस्या शुरू में किसी बड़े लक्षण के रूप में सामने नहीं आती. फिर भी कुछ संकेत ऐसे हो सकते हैं जिन पर ध्यान देना जरूरी है. जैसे लगातार बढ़ता कोलेस्ट्रॉल, हल्का-सा भी बढ़ा हुआ ब्लड प्रेशर, जल्दी थकान महसूस होना या थोड़ी मेहनत में सांस फूलना. अगर परिवार में दिल की बीमारी का हिस्ट्री रहा हो तो जोखिम और बढ़ सकता है.
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कैसे कर सकते हैं बचाव
इसी वजह से डॉक्टर अब कम उम्र में ही दिल की सेहत की जांच कराने की सलाह देते हैं. कोलेस्ट्रॉल जांच, ब्लड प्रेशर मॉनिटरिंग, ब्लड शुगर टेस्ट और जरूरत पड़ने पर अन्य जांचों के जरिए आर्टरीज में शुरुआती बदलावों का पता लगाया जा सकता है. अच्छी बात यह है कि शुरुआती चरण में लाइफ में बदलाव करके इस प्रक्रिया को धीमा किया जा सकता है. रोजाना कुछ समय टहलना या व्यायाम करना, फल-सब्जियों और साबुत अनाज से भरपूर आहार लेना, नमक और प्रोसेस्ड फूड कम करना, धूम्रपान से दूरी बनाना और पर्याप्त नींद लेना दिल और आर्टरीज की सेहत के लिए फायदेमंद माना जाता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 16 Mar 2026 20:30:13 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Vitamin D Deficiency: शरीर में विटामिन &amp;apos;डी&amp;apos; की कमी कितनी खतरनाक, इससे किन बीमारियों का खतरा?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/vitamin-d-deficiency-शरीर-में-विटामिन-डी-की-कमी-कितनी-खतरनाक-इससे-किन-बीमारियों-का-खतरा</link>
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        <description><![CDATA[ What Happens When Your Body Lacks Vitamin D: विटामिन D को अक्सर सनशाइन विटामिन कहा जाता है, क्योंकि इसका सबसे बड़ा सोर्स सूरज की रोशनी है. हाल के वर्षों में यह सवाल काफी चर्चा में रहा है कि शरीर को स्वस्थ रखने के लिए विटामिन D की कितनी मात्रा जरूरी है और कैसे पता लगाया जाए कि शरीर में इसकी कमी तो नहीं है. हालांकि एक बात पर एक्सपर्ट की सहमति है वह है कि विटामिन D हमारे शरीर के लिए बेहद जरूरी है. अगर शरीर को पर्याप्त धूप नहीं मिलती या भोजन के जरिए इसकी सही मात्रा नहीं मिलती, तो इसकी कमी कई स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म दे सकती है.&amp;nbsp;
किन लोगों को होती है दिक्कत
हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली संस्था yalemedicine के अनुसार, &amp;nbsp;विटामिन D की कमी किसी भी उम्र के लोगों को प्रभावित कर सकती है. छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक यह समस्या देखी जाती है. खासकर जो बच्चे केवल ब्रेस्टफीडिंग पर निर्भर होते हैं, उन्हें मां के दूध से पर्याप्त विटामिन D नहीं मिल पाता, इसलिए कई बार डॉक्टर उन्हें सप्लीमेंट लेने की सलाह देते हैं. वहीं बढ़ती उम्र के साथ त्वचा की क्षमता कम हो जाती है, जिससे शरीर में विटामिन D बनने की प्रक्रिया भी धीमी हो जाती है.
दरअसल, विटामिन D शरीर में कैल्शियम और फॉस्फोरस को अब्जॉर्ब करने में अहम भूमिका निभाता है. ये दोनों तत्व हड्डियों को मजबूत रखने के लिए बेहद जरूरी होते हैं. जब शरीर में विटामिन D की कमी हो जाती है, तो कैल्शियम का सही तरीके से अब्जॉर्ब नहीं हो पाता. इससे हड्डियां कमजोर होने लगती हैं और कई तरह की समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है.
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इसकी कमी के क्या होते हैं लक्षण
विटामिन D की कमी होने पर शरीर में कई लक्षण दिखाई दे सकते हैं. जैसे हड्डियों में दर्द, मांसपेशियों में कमजोरी, शरीर में थकान और मांसपेशियों में ऐंठन. कुछ लोगों को हाथ-पैरों में झुनझुनी जैसा महसूस हो सकता है. गंभीर मामलों में हड्डियां जल्दी टूटने का खतरा भी बढ़ जाता है. बुजुर्गों में इसकी गंभीर कमी गिरने और फ्रैक्चर का जोखिम बढ़ा सकती है.
कमी के क्या होते हैं कारण
इस कमी के पीछे कई कारण हो सकते हैं. धूप में कम समय बिताना, पोषण की कमी, गहरे रंग की त्वचा, कुछ दवाइयों का सेवन या किडनी और लिवर से जुड़ी बीमारियां भी शरीर में विटामिन D के स्तर को प्रभावित कर सकती हैं. कुछ मामलों में यह समस्या जेनेटिक कारणों से भी हो सकती है. एक्सपर्ट के अनुसार अगर शरीर में विटामिन D का स्तर बहुत कम हो जाए, तो हड्डियों से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है. इसलिए संतुलित आहार, नियमित धूप और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह से सप्लीमेंट लेना शरीर में विटामिन D के स्तर को बनाए रखने में मदद कर सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 16 Mar 2026 16:30:35 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Vitamin, Deficiency:, शरीर, में, विटामिन, डी, की, कमी, कितनी, खतरनाक, इससे, किन, बीमारियों, का, खतरा</media:keywords>
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        <title>First Aid For Food Choking: रसगुल्ला खाने से हुई मौत, जानें सांस की नली में फंस जाए खाना तो तुरंत क्या करें?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/first-aid-for-food-choking-रसगुल्ला-खाने-से-हुई-मौत-जानें-सांस-की-नली-में-फंस-जाए-खाना-तो-तुरंत-क्या-करें</link>
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        <description><![CDATA[ What To Do When Food Blocks The Airway: झारखंड के जमशेदपुर में एक शादी समारोह के दौरान दर्दनाक हादसा सामने आया. 41 वर्षीय ललित सिंह की मौत उस समय हो गई जब रसगुल्ला खाते वक्त वह उनकी सांस की नली में फंस गया. यह घटना सोमवार सुबह मालियंता गांव में एक शादी के दौरान हुई. बताया जा रहा है कि रसगुल्ला खाने के कुछ ही सेकंड बाद ललित सिंह को अचानक सांस लेने में दिक्कत होने लगी. वहां मौजूद लोगों ने उनके गले से रसगुल्ला निकालने की कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली.&amp;nbsp;
परिवार के लोग उन्हें तुरंत एमजीएम अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. डॉक्टरों के अनुसार रसगुल्ला पूरी तरह से उनकी सांस की नली में फंस गया था, जिससे शरीर तक ऑक्सीजन पहुंचना बंद हो गया और कुछ ही मिनटों में उनकी मौत हो गई. चलिए आपको बताते हैं कि सांस की नली में खाना फंसने के बाद क्या करना चाहिए.&amp;nbsp;
क्यों फंस जाता है खाना
दरअसल खाना निगलने की प्रक्रिया काफी जटिल होती है. जब हम भोजन करते हैं तो मुंह, गले और नसों की मदद से खाना पेट तक पहुंचता है. सामान्य स्थिति में जब हम खाना निगलते हैं, तो हमारी सांस की नली कुछ समय के लिए बंद हो जाती है ताकि भोजन गलत दिशा में न जाए. लेकिन कभी-कभी अगर खाना ठीक से चबाया न जाए या जल्दी-जल्दी खाया जाए, तो वह गले या सांस की नली में फंस सकता है.
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&amp;nbsp;हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली बेवसाइट healthline के अनुसार, अगर किसी व्यक्ति की सांस की नली में खाना फंस जाए तो यह स्थिति बेहद खतरनाक हो सकती है. ऐसे समय में कुछ लक्षण तुरंत दिखाई देते हैं, जैसे व्यक्ति का बोलना बंद हो जाना, सांस लेने में परेशानी, तेज या अजीब आवाज के साथ सांस लेना, खांसी आना, चेहरा लाल या नीला पड़ना और गंभीर स्थिति में बेहोशी आ जाना.&amp;nbsp;
क्या करना चाहिए
ऐसी स्थिति में तुरंत मदद करना बहुत जरूरी होता है. सबसे पहले व्यक्ति को जोर से खांसने के लिए कहें, क्योंकि कई बार खांसी से ही फंसा हुआ खाना बाहर निकल सकता है. अगर इससे राहत न मिले तो व्यक्ति को थोड़ा आगे झुकाकर उसकी पीठ पर जोर से लगभग पांच बार थपथपाना चाहिए. इससे कई बार गले में फंसा खाना ढीला होकर बाहर निकल सकता है. अगर इसके बाद भी स्थिति नहीं सुधरती, तो हाइमलिक मैन्युवर नाम की तकनीक अपनाई जाती है. इसमें व्यक्ति के पीछे खड़े होकर उसके पेट के ऊपरी हिस्से पर झटके से दबाव डाला जाता है, जिससे फंसा हुआ खाना बाहर निकल सकता है.
इंसानों के लिए जानलेवा स्थिति
डॉक्टरों के अनुसार चोकिंग यानी सांस की नली में खाना फंसना जानलेवा आपात स्थिति होती है. इसलिए अगर किसी को सांस लेने में गंभीर परेशानी हो या वह बोल भी न पा रहा हो, तो तुरंत मेडिकल सहायता लेना और इमरजेंसी सेवाओं को बुलाना जरूरी है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 16 Mar 2026 16:30:31 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>बार&amp;बार पेनकिलर खाने से किडनी को हो सकता है नुकसान, जानें डॉक्टरों ने क्या दी चेतावनी?</title>
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        <description><![CDATA[ सिर दर्द, शरीर में दर्द, बुखार पीरियड्स के दौरान होने वाला दर्द या फिर गठिया जैसी समस्याओं में लोग अक्सर तुरंत आराम पाने के लिए पेन किलर दवाइयां ले लेते हैं. क्योंकि इनमें से कई दवाएं बिना डॉक्टर की पर्ची के मेडिकल स्टोर पर आसानी से मिल जाती है. इसलिए लोग इन्हें बिना सोचे समझे ले लेते हैं.
डॉक्टरों का कहना है कि पेन किलर का बार-बार इस्तेमाल करना सेहत के लिए खतरनाक साबित हो सकता है. डॉक्टर के अनुसार किडनी हमारे शरीर का बहुत जरूरी हिस्सा है यह खून से गंदगी और एक्स्ट्रा तरल पदार्थ को फिल्टर करती है, शरीर में इलेक्ट्रोलाइट संतुलन बनाए रखती है और ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने में मदद करती है. वहीं कई दवाएं किडनी के जरिए शरीर से बाहर निकालती है. इसलिए ज्यादा मात्रा में दवाएं लेने पर किडनी पर एक्स्ट्रा दबाव भी पड़ सकता है. ऐसे में चलिए अब आपको बताते हैं कि पेन किलर खाने से किडनी को बार-बार क्या नुकसान हो सकते हैं और डॉक्टरों ने क्या चेतावनी दी है.
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NSAIDs दवाएं बढ़ा सकती है खतरा
एक्सपर्ट के अनुसार किडनी से जुड़ी समस्याओं के साथ सबसे ज्यादा जुड़ा हुआ पेनकिलर का ग्रुप नॉन-स्टेरॉयडल एंटी-इंफ्लेमेटरी ड्रग्स यानी NSAIDs है. इसमें आमतौर पर इस्तेमाल होने वाली दवाएं Ibuprofen, Diclofenac और Naproxen शामिल है. यह दवाई शरीर में दर्द और सूजन पैदा करने वाले केमिकल को कम करके राहत देती है. हालांकि यह दवाएं शरीर में मौजूद प्रोस्टाग्लैंडिन नाम के पदार्थ को कम कर देती है जो किडनी तक खून के प्रवाह को सही बनाए रखने में मदद करता है. जब प्रोस्टाग्लैंडिन का स्तर कम हो जाता है तो किडनी तक खून का प्रवाह भी घट सकता है. जिससे लंबे समय में किडनी की कार्य क्षमता प्रभावित हो सकती है. कुछ डॉक्टरों का कहना है कि किडनी खून से दवाओं और दूसरे अपशिष्ट पदार्थों को फिल्टर करने का काम करती है. ऐसे में जब दवाओं का ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है तो किडनी को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है और इससे दवा से जुड़े नुकसान का खतरा बढ़ जाता है.
किन लोगों काे होता है ज्यादा खतरा?
डॉक्टर के अनुसार कुछ लोगों में पेन किलर से किडनी को नुकसान होने का खतरा ज्यादा होता है. इनमें बुजुर्ग, पहले से किडनी की बीमारी से जूझ रहे मरीज और डायबिटीज या हाई ब्लड प्रेशर वाले लोग शामिल है. इसके अलावा शरीर में पानी की कमी यानी डिहाइड्रेशन भी किडनी के लिए खतरा बढ़ा सकती है. क्योंकि किडनी को सही तरीके से काम करने के लिए पर्याप्त तरल पदार्थ और ब्लड सर्कुलेशन की जरूरत होती है. कुछ मामलों में खतरा तब और बढ़ जाता है, जब पेन किलर दवाओं को ब्लड प्रेशर या दिल से जुड़ी दवाओं के साथ लिया जाता है. जैसे एसीई inhibitors या Diuretics के साथ NSAIDs लेने से किडनी के काम पर एक्स्ट्रा असर पड़ सकता है.
क्या है सुरक्षित ऑप्शन?
डॉक्टर का कहना है कि पेन किलर दवाएं बार-बार लेने से किडनी पर असर पड़ता है, इसका मतलब यह नहीं है कि पेन किलर दवाओं को पूरी तरह छोड़ दी जाए. इसके बजाय सही मात्रा और डॉक्टर की सलाह के साथ उनका इस्तेमाल सुरक्षित माना जाता है. आमतौर पर इस्तेमाल होने वाली दावों में पैरासिटामोल को किडनी के लिए अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जाता है, &amp;nbsp;हालांकि ज्यादा मात्रा में लेने से लिवर को नुकसान पहुंचा सकता है. लंबे समय तक रहने वाले दर्द के मामलों में डॉक्टर Tramadol या Tapentadol जैसी दवाई भी दे सकते है, &amp;nbsp;लेकिन इनका इस्तेमाल आमतौर पर डॉक्टर की निगरानी में ही किया जाता है.
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        <pubDate>Sun, 15 Mar 2026 12:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>सिर्फ मर्दों में होती हैं ये बीमारियां, 40 की उम्र के बाद दोगुना हो जाता है खतरा</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/सिर्फ-मर्दों-में-होती-हैं-ये-बीमारियां-40-की-उम्र-के-बाद-दोगुना-हो-जाता-है-खतरा</link>
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        <description><![CDATA[ आज की तेज रफ्तार जिंदगी में पुरुष अक्सर काम, परिवार और जिम्मेदारियों के बीच अपनी सेहत को नजरअंदाज कर देते हैं. युवा उम्र में शरीर मजबूत महसूस होता है, इसलिए ज्यादातर पुरुष स्वास्थ्य जांच, सही खानपान और व्यायाम पर ज्यादा ध्यान नहीं देते, लेकिन जैसे-जैसे उम्र 40 साल के आसपास पहुंचती है, शरीर में कई तरह के बदलाव होने लगते हैं. इस समय हार्मोन में बदलाव, बढ़ता तनाव, अनियमित दिनचर्या और खराब खानपान कई बीमारियों के खतरे को बढ़ा देते हैं.&amp;nbsp;
डॉक्टरों के अनुसार 40 की उम्र के बाद पुरुषों में कई ऐसी स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है, जो धीरे-धीरे शरीर को कमजोर कर सकती हैं. कई बार ये बीमारियां शुरुआत में ज्यादा लक्षण नहीं दिखातीं, लेकिन समय के साथ गंभीर रूप ले सकती हैं. इसलिए इस उम्र के बाद पुरुषों को अपनी सेहत को लेकर ज्यादा सावधान रहने की जरूरत होती है. &amp;nbsp;तो आइए जानते हैं कि मर्दों में 40 के बाद कौन सी बीमारियों का खतरा दोगुना हो जाता है.&amp;nbsp;
मर्दों में 40 के बाद कौन सी बीमारियों का खतरा दोगुना?
प्रोस्टेट से जुड़ी समस्याएं
प्रोस्टेट पुरुषों के शरीर में मौजूद एक छोटी ग्रंथि होती है, जो वीर्य बनाने में मदद करती है. उम्र बढ़ने के साथ इसका आकार धीरे-धीरे बढ़ने लगता है. कई पुरुषों में प्रोस्टेट के बढ़ने से पेशाब करने में दिक्कत, बार-बार पेशाब आना या पेशाब के दौरान जलन जैसी समस्याएं होने लगती हैं, अगर समय पर इलाज न कराया जाए तो यह समस्या मूत्र संक्रमण या किडनी से जुड़ी परेशानी भी पैदा कर सकती है.&amp;nbsp;
हार्ट डिजीज का खतरा
पुरुषों में दिल से जुड़ी बीमारियां भी काफी आम होती हैं. खासकर 40 साल के बाद हाई ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल बढ़ना, मोटापा और धूम्रपान जैसी आदतें हार्ट अटैक का खतरा बढ़ा देती हैं. छाती में दर्द, सांस फूलना, ज्यादा पसीना आना और थकान इसके सामान्य लक्षण हो सकते हैं. इसलिए नियमित व्यायाम और संतुलित आहार दिल को स्वस्थ रखने में मदद करता है.
डायबिटीज
अनियमित खानपान, ज्यादा मीठा खाना और शारीरिक गतिविधि की कमी के कारण पुरुषों में डायबिटीज का खतरा भी बढ़ जाता है. इस बीमारी में बार-बार पेशाब आना, ज्यादा प्यास लगना, थकान और घाव का देर से भरना जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं. समय पर जांच और सही जीवनशैली अपनाकर इस बीमारी को नियंत्रित किया जा सकता है.
इसे भी पढ़ें - प्रेग्नेंसी डायबिटीज को न करें नजरअंदाज, बच्चे की सेहत पर पड़ सकता है असर
टेस्टोस्टेरोन की कमी
उम्र बढ़ने के साथ पुरुषों के शरीर में टेस्टोस्टेरोन हार्मोन का स्तर भी कम होने लगता है. इससे शरीर में कमजोरी, यौन इच्छा में कमी, मूड स्विंग्स और थकान जैसी समस्याएं हो सकती हैं. पर्याप्त नींद, नियमित व्यायाम और संतुलित भोजन इस समस्या को कम करने में मदद कर सकते हैं.
लिवर और फेफड़ों की समस्या
ज्यादा शराब पीना और धूम्रपान करना पुरुषों में लिवर और फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ा देता है. लिवर की समस्या होने पर भूख कम लगना, पेट फूलना और पीलिया जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं. वहीं धूम्रपान करने वाले पुरुषों में फेफड़ों के कैंसर का खतरा भी बढ़ जाता है.
मानसिक तनाव और डिप्रेशन
अक्सर पुरुष अपनी भावनाओं को खुल कर व्यक्त नहीं करते. काम का दबाव, आर्थिक जिम्मेदारियां और पारिवारिक तनाव धीरे-धीरे मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं. चिड़चिड़ापन, नींद न आना, निराशा और अकेलापन डिप्रेशन के संकेत हो सकते हैं.
इसे भी पढ़ें - Heart Disease Risk: कोलेस्ट्रॉल रिपोर्ट नॉर्मल, फिर भी हार्ट अटैक का खतरा? सावधान! ये कारण हो सकता है असली विलेन
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 15 Mar 2026 12:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>7&amp;8 घंटे की नींद के बाद भी थका&amp;थका रहता है शरीर, जानें कहां गायब हो रही बॉडी की एनर्जी?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/7-8-घंटे-की-नींद-के-बाद-भी-थका-थका-रहता-है-शरीर-जानें-कहां-गायब-हो-रही-बॉडी-की-एनर्जी</link>
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        <description><![CDATA[ हम अक्सर मानते हैं कि अगर हम रात को 7&amp;ndash;8 घंटे की नींद ले लें तो अगला दिन तरोताजा और एनर्जेटिक होगा. एक्सपर्ट्स का भी यही मानना है कि एक व्यक्ति को हर रात कम से कम 7 से 9 घंटे की नींद जरूर लेनी चाहिए, लेकिन कई लोगों की यह शिकायत रहती है कि रात में 8 घंटे सोने के बाद भी सुबह उठाकर वे थका हुआ महसूस करते हैं. आज की तेज रफ्तार जिंदगी में काफी लोग ऐसी समस्या का सामना कर रहे हैं, खासकर युवा प्रोफेशनल्स, जो जॉब करते हैं या किसी एग्जाम की तैयारी की कर रहे हो. अब सवाल यह है कि ऐसा क्यों हो रहा है? चलिए जानते हैं कि किन वजहों से 8 घंटे की नींद के बाद भी बॉडी थकी-थकी सी रहती है?
मोबाइल और लैपटॉप का ज्यादा यूज
कई बार लोग 7&amp;ndash;8 घंटे की नींद तो लेते हैं, लेकिन उनकी नींद गहरी और आरामदायक नहीं होती. ऐसे में शरीर को पूरा आराम नहीं मिल पाता. इसका कारण हो सकता है कि देर रात तक मोबाइल, लैपटॉप या टीवी देखना. दरअसल, स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी शरीर के मेलाटोनिन हार्मोन को दबा देती है, जिसके कारण नींद देर से आती है, बार-बार टूटती है और सुबह उठने पर भी थकान, सिर भारी लगना और सुस्ती महसूस होती है.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ेंः Diabetes Symptoms In Legs: डायबिटीज सिर्फ शुगर लेवल नहीं, पैरों से भी देती है दस्तक; इन 7 लक्षणों को न करें नजरअंदाज
विटामिन की कमी से थकान महसूस होना
कुछ विटामिन की कमी से भी आपको थकान और आलस जैसा महसूस हो सकता है. दरअसल, विटामिन D की कमी से दिनभर थकान और सुस्ती और मांसपेशियों में दर्द हो सकती है. साथ ही, विटामिन B12 की कमी के कारण भी शरीर की बैटरी लो हो जाती है. इससे शरीर में ऑक्सीजन की सप्लाई प्रभावित होती है, जिससे थकान महसूस होती है.
यह भी पढ़ेंः Stomach Cancer Risk: सिर्फ एक कॉमन वायरस की वजह से होता है पेट का कैंसर, जानें इससे बचने के तरीके
लेट नाइट कैफीन या मीठा लेना
रात को सोने से पहले चाय, कॉफी, चॉकलेट या मीठी चीजें खाने से नर्वस सिस्टम एक्टिव हो जाता है, जिससे शरीर रिलैक्स नहीं हो पाता और नींद प्रभावित हो जाती है. इसकी वजह से सारा दिन थकान जैसा महसूस होता है और सुबह फ्रेश महसूस नहीं करते हैं.
हार्मोन का असंतुलन होना
हमारे शरीर में कुछ हार्मोन होते हैं, जो नींद, भूख, मूड और एनर्जी के लेवल को कंट्रोल करते हैं. जब स्ट्रेस हार्मोन का लेवल बिगड़ जाता है तो इसका असर नींद पर पड़ता है. इससे नींद पूरी तो लगती है, लेकिन शरीर थका-थका रहता है.
हर दिन अलग-अलग समय पर सोना
हर दिन अलग-अलग समय पर सोना और उठना शरीर की बायोलॉजिकल क्लॉक बिगड़ देता है. फिर चाहे आप 7-8 घंटे भी क्यों न सो लें, शरीर को असली आराम नहीं मिलता और दिनभर थकावट महसूस होती है.
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        <pubDate>Sun, 15 Mar 2026 08:30:15 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>दूध पीने के बाद बनती है गैस, जानें किन लोगों को नहीं पीना चाहिए?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/दूध-पीने-के-बाद-बनती-है-गैस-जानें-किन-लोगों-को-नहीं-पीना-चाहिए</link>
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        <description><![CDATA[ 
दूध को हमारी सेहत के लिए बहुत फायदेमंद माना जाता रहा है. बच्चे के जन्म के बाद किसी भी इंसान का पहला भोजन भी दूध ही होता है जो मां के दूध से शुरू होता है. यही वजह है कि दूध को ताकत और पोषण का बड़ा सोर्स भी माना जाता है. हालांकि, कई लोगों को दूध पीने के बाद पेट से जुड़ी समस्या होने लगती है. कुछ लोगों को गैस बनती है, पेट फूलता है, अपच या पेट दर्द की शिकायत हो जाती है. ऐसे में कई बार यह सवाल उठता है कि दूध पीने के बाद ऐसा क्यों होता है और किन लोगों को दूध से दूरी बनाकर रखनी चाहिए. चलिए तो आज हम आपको बताते हैं कि दूध पीने के बाद गैस बनती है और किन लोगों को दूध नहीं पीना चाहिए. दूध पीने से क्यों बनती है गैस?दूध में लैक्टोज नाम की एक नेचुरल शुगर पाई जाती है. इसे पचाने के लिए शरीर को लेक्टस्ट नाम के एंजाइम की जरूरत होती है जो छोटी आंत में बनता है. जब शरीर में इस एंजाइम की मात्रा कम हो जाती है, तो लैक्टोज ठीक तरह से बच नहीं पाता है. ऐसे में दूध पीने के बाद पेट में गैस, पेट फूलना, दर्द या दस्त जैसी समस्याएं हो सकती है. ये भी पढ़ें-Heart Disease Risk: कोलेस्ट्रॉल रिपोर्ट नॉर्मल, फिर भी हार्ट अटैक का खतरा? सावधान! ये कारण हो सकता है असली विलेन
लैक्टोज इंटॉलरेंस के आम लक्षण अगर किसी व्यक्ति को दूध या दूध से बने पदार्थ जैसे पनीर, लस्सी या दूसरे डेयरी प्रोडक्ट लेने के बाद पेट से जुड़ी समस्या होने लगती है, तो यह लैक्टोज इंटॉलरेंस का संकेत हो सकता है. इसके कुछ सामान्य लक्षण जैसे पेट में गैस बनना, पेट फूलना या भारीपन महसूस होना, पेट दर्द या ऐंठन, लूज मोशन या दस्त, मतली या उल्टी जैसा महसूस होना हो सकते हैं. यह लक्षण आमतौर पर दूध पीने के 30 मिनट से 2 घंटे के अंदर दिखाई दे सकते हैं. किन लोगों को दूध से ज्यादा परेशानी हो सकती है?हर व्यक्ति को दूध पीने से समस्या नहीं होती, लेकिन कुछ लोगों में यह परेशानी ज्यादा देखने को मिलती है. जिन लोगों का पाचन तंत्र कमजोर होता है या जिन्हें पहले से गैस, एसिडिटी या पेट से जुड़ी समस्या रहती है. उन्हें दूध पचाने में दिक्कत हो सकती है. इसके अलावा उम्र बढ़ने के साथ भी कई लोगों में दूध पचाने की क्षमता कम हो जाती है. कुछ मामलों में आंत से जुड़ी बीमारियों की वजह से भी दूध पीने के बाद पेट संबंधी परेशानी बढ़ सकती है. क्या दूध पीना जरूरी है?एक्सपर्ट्स का मानना है कि बच्चों के लिए मां का दूध सबसे जरूरी होता है और यह लगभग 6 से 7 महीने तक उसकी जरूरत पूरी करता है. इसके बाद बच्चा धीरे-धीरे ठोस आहार लेना शुरू कर देता है. हालांकि दूध को हमारे खानपान और कल्चर का हिस्सा माना जाता है और कई लोग इसे प्रोटीन के अच्छे सोर्स के रूप में लेते हैं. लेकिन अगर किसी को दूध से समस्या होती है तो प्रोटीन की जरूरत दूसरी चीजों से भी पूरी की जा सकती है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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        <pubDate>Sat, 14 Mar 2026 12:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>Endometriosis Symptoms: क्या होती है एंडोमेट्रियोसिस, जिसकी वजह से महिलाओं में हो जाता है बांझपन?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/endometriosis-symptoms-क्या-होती-है-एंडोमेट्रियोसिस-जिसकी-वजह-से-महिलाओं-में-हो-जाता-है-बांझपन</link>
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        <description><![CDATA[ What Is Endometriosis And How It Causes Infertility: एंडोमेट्रियोसिस एक मुश्किल और अक्सर नजरअंदाज की जाने वाली बीमारी है, जो दुनिया भर में बड़ी संख्या में महिलाओं को प्रभावित करती है. यह समस्या आमतौर पर किशोरावस्था में पहले पीरियड से शुरू होने के बाद से लेकर मेनोपॉज तक किसी भी उम्र में हो सकती है. डॉक्टरों के अनुसार कई मामलों में यही बीमारी आगे चलकर महिलाओं में प्रेग्नेंसी में परेशानी या बांझपन का कारण बन जाती है.
क्या होता है एंडोमेट्रियोसिस?
संयुक्त राष्ट्र की स्पेशल हेल्थ एजेंसी वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के अनुसार, एंडोमेट्रियोसिस में यूट्रस की अंदरूनी परत शरीर के अन्य हिस्सों में बढ़ने लगता है. सामान्य स्थिति में यह टिश्यू सिर्फ यूट्रस की लाइनिंग में पाया जाता है, लेकिन इस बीमारी में यह ओवरी, फैलोपियन ट्यूब या पेल्विक क्षेत्र के अन्य हिस्सों में भी फैलाव हो सकता है. इससे शरीर में सूजन, दर्द और स्कार टिश्यू बनने लगते हैं, जो प्रजनन प्रणाली को प्रभावित कर सकते हैं. यही वजह है कि कई महिलाओं को प्रेग्नेंसी में दिक्कत होती है.
इसे भी पढ़ें-&amp;nbsp;पीरियड्स पेन का पैटर्न: पहले दिन ज्यादा, बाद में कम क्या है वजह? डॉक्टर ने बताया असली कारण
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के अनुसार, एक्सपर्ट का कहना है कि एंडोमेट्रियोसिस का सटीक कारण अभी तक पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाया है. हालांकि नई रिसर्च में इसे इम्यून सिस्टम से जुड़ी गड़बड़ियों से भी जोड़ा गया है. कई मामलों में यह बीमारी परिवार में पहले से मौजूद रहने पर भी देखने को मिलती है. इसके अलावा जिन महिलाओं को ल्यूपस, मल्टीपल स्क्लेरोसिस या इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज जैसी इम्यून से जुड़ी बीमारियां होती हैं, उनमें इसका खतरा थोड़ा ज्यादा हो सकता है.
कैसे होता है इनकी पहचान?
इस बीमारी की पहचान करना भी आसान नहीं होता. कई बार इसके लक्षण अलग-अलग तरह के होते हैं, इसलिए डॉक्टरों को इसे पहचानने में समय लग जाता है. रिपोर्ट्स के अनुसार कई महिलाओं में सही निदान होने में औसतन 4 से 12 साल तक का समय लग सकता है. आमतौर पर लगातार पेल्विक दर्द, भारी ब्लीडिंग, पीरियड्स के दौरान तेज दर्द या गर्भधारण में दिक्कत जैसे संकेत इसके लक्षण हो सकते हैं. जांच के लिए अल्ट्रासाउंड, एमआरआई जैसे इमेजिंग टेस्ट किए जाते हैं, जबकि कुछ मामलों में लैप्रोस्कोपी सर्जरी के जरिए भी इसकी पुष्टि की जाती है. फिलहाल एंडोमेट्रियोसिस का कोई स्थायी इलाज नहीं है, लेकिन इसके लक्षणों को दवाओं या सर्जरी के जरिए नियंत्रित किया जा सकता है.
इससे बचाव क्या हो सकता है?
अगर एंडोमेट्रियोसिस के कारण गर्भधारण में परेशानी आती है, तो डॉक्टर फर्टिलिटी ट्रीटमेंट की सलाह दे सकते हैं. इसमें ओव्यूलेशन इंडक्शन, इंट्रायूटेरिन इंसैमिनेशन या इन विट्रो फर्टिलाइजेशन जैसे विकल्प शामिल होते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 13 Mar 2026 16:30:13 +0530</pubDate>
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        <media:keywords>Endometriosis, Symptoms:, क्या, होती, है, एंडोमेट्रियोसिस, जिसकी, वजह, से, महिलाओं, में, हो, जाता, है, बांझपन</media:keywords>
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        <title>Stomach Cancer Risk: सिर्फ एक कॉमन वायरस की वजह से होता है पेट का कैंसर, जानें इससे बचने के तरीके</title>
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        <description><![CDATA[ How H Pylori Causes Stomach Cancer: पेट में रहने वाला एक सामान्य बैक्टीरिया हेलिकोबैक्टर पाइलोरी दुनिया भर में होने वाले पेट के कैंसर के बड़े कारणों में से एक माना जाता है. नेचर मेडिसिन में पब्लिश एक स्टडी के अनुसार, गैस्ट्रिक कैंसर के करीब 76 प्रतिशत मामलों का संबंध इसी बैक्टीरिया से हो सकता है. रिसर्चर का अनुमान है कि 2008 से 2017 के बीच जन्मे लोगों में लगभग 1.6 करोड़ लोगों को जीवन में कभी न कभी पेट का कैंसर हो सकता है, जिनमें से करीब 1.2 करोड़ मामले सीधे तौर पर हेलिकोबैक्टर पाइलोरी इंफेक्शन से जुड़े हो सकते हैं. यह बैक्टीरिया पेट की अंदरूनी परत में रहता है और अक्सर लंबे समय तक बिना किसी स्पष्ट लक्षण के मौजूद रह सकता है. हालांकि कई लोगों को इसका पता ही नहीं चलता, लेकिन कुछ मामलों में यह पेट के अल्सर और गंभीर स्थिति में गैस्ट्रिक कैंसर का कारण बन सकता है.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
एक्सपर्ट के अनुसार एशिया में हेलिकोबैक्टर पाइलोरी से जुड़े पेट के कैंसर के सबसे ज्यादा मामले सामने आ सकते हैं, जहां करीब 80 लाख मामलों का अनुमान लगाया गया है, जबकि उत्तर और दक्षिण अमेरिका में मिलाकर करीब 15 लाख मामलों की संभावना जताई गई है. यही वजह है कि डॉक्टर इस इंफेक्शन को पहचानना बेहद जरूरी मानते हैं, क्योंकि यह कैंसर का ऐसा जोखिम कारक है जिसे समय रहते रोका जा सकता है.
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किन लोगों में रहता है इसका खतरा ज्यादा?
कुछ लोगों में हेलिकोबैक्टर पाइलोरी इंफेक्शन का खतरा ज्यादा होता है. खासकर पूर्वी एशिया, पूर्वी यूरोप और दक्षिण अमेरिका जैसे क्षेत्रों में रहने वाले लोगों में इसका जोखिम अधिक देखा गया है. इन इलाकों से आने वाले प्रवासी भी बचपन में हुए इंफेक्शन की वजह से प्रभावित हो सकते हैं. इसके अलावा जिन लोगों के परिवार में पेट के कैंसर का इतिहास रहा हो, धूम्रपान करने वाले, मोटापे से ग्रस्त लोग, अधिक नमक या प्रोसेस्ड फूड खाने वाले और 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोग भी ज्यादा जोखिम में माने जाते हैं.
कैसे होते हैं इसके लक्षण?
हेलिकोबैक्टर पाइलोरी इंफेक्शन कई बार वर्षों तक बिना लक्षण के रह सकता है, लेकिन लगभग 30 प्रतिशत लोगों में इससे जुड़ी समस्याएं सामने आ सकती हैं. इसके संकेतों में पेट में जलन या दर्द, थोड़ी मात्रा में खाने पर ही पेट भरा महसूस होना, मतली, बार-बार डकार आना, अपच, पेट फूलना या बिना कारण वजन कम होना शामिल हैं. अगर ये लक्षण लंबे समय तक बने रहें तो डॉक्टर से जांच कराना जरूरी होता है. पेट के कैंसर के खतरे को कम करने के लिए कुछ लाइफस्टाइल से जुड़े कदम भी मददगार हो सकते हैं. संतुलित आहार लेना, जिसमें फल, सब्जियां और साबुत अनाज शामिल हों, रेगुलर फिजिकल एक्टिविटी करना, स्मोकिंग से दूरी रखना और शराब का सेवन सीमित करना महत्वपूर्ण माना जाता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 12 Mar 2026 20:30:13 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Liver Cancer Symptoms:आंखों में दिखें ये लक्षण तो तुरंत भागें डॉक्टर के पास, वरना लिवर में हो जाएगा कैंसर</title>
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        <description><![CDATA[ Eye Symptoms Of Liver Disease: लिवर हमारे शरीर का एक बेहद अहम अंग है, जो शरीर से विषैले पदार्थों को बाहर निकालने, पाचन में मदद करने और पोषक तत्वों को प्रोसेस करने का काम करता है. जब किसी कारण से लिवर ठीक तरह से काम करना बंद कर देता है, तो इस स्थिति को लिवर फेलियर कहा जाता है. यह एक गंभीर और जानलेवा समस्या हो सकती है. चलिए आपको बताते हैं कि आंखों में लिवर कैंसर के कौन से लक्षण दिखाई देते हैं.&amp;nbsp;
क्यों होती है दिक्कत?
लिवर फेलियर अक्सर किसी दूसरी बीमारी के कारण होता है. लंबे समय तक शराब का सेवन, हेपेटाइटिस बी या सी इंफेक्शन, फैटी लिवर, मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर, हाई कोलेस्ट्रॉल और डायबिटीज जैसी स्थितियां लिवर को नुकसान पहुंचा सकती हैं. अगर यह नुकसान लंबे समय तक बना रहे तो लिवर में स्थायी दाग पड़ जाते हैं, जिसे सिरोसिस कहा जाता है. यही स्थिति आगे चलकर लिवर फेलियर में बदल सकती है और कई मामलों में मरीज को लिवर ट्रांसप्लांट तक की जरूरत पड़ सकती है. हालांकि शुरुआती चरण में इलाज और लाइफस्टाइल में बदलाव से लिवर को काफी हद तक सुरक्षित रखा जा सकता है.
आंखों में दिखती है समस्या
आंखों के बारे में जानकारी देने वाली allaboutvision के अनुसार, शुरुआत में लिवर की समस्या के लक्षण बहुत साफ दिखाई नहीं देते. कई लोगों को लंबे समय तक कोई खास परेशानी महसूस नहीं होती. लेकिन जब बीमारी बढ़ने लगती है तो कुछ सामान्य संकेत दिख सकते हैं, जैसे लगातार थकान महसूस होना, मांसपेशियों में कमजोरी या ऐंठन, भूख कम लगना, त्वचा में खुजली, पेट दर्द, मतली या उल्टी जैसी समस्याएं.
जब लिवर की बीमारी ज्यादा गंभीर हो जाती है, तब इसका असर आंखों पर भी दिखाई देने लगता है. सबसे आम लक्षण आंखों का पीला पड़ना है, जिसे पीलिया कहा जाता है. यह तब होता है जब शरीर में बिलीरुबिन नाम का पीला पिगमेंट ज्यादा मात्रा में जमा हो जाता है. सामान्य स्थिति में लिवर पुराने रक्त कोशिकाओं से बनने वाले इस पिगमेंट को शरीर से बाहर निकाल देता है, लेकिन लिवर खराब होने पर यह प्रक्रिया प्रभावित हो जाती है.
कुछ मामलों में लिवर से जुड़ी समस्याएं आंखों में सूखापन भी पैदा कर सकती हैं. इसके अलावा लंबे समय तक लिवर की बीमारी रहने पर शरीर में विटामिन ए की कमी हो सकती है, जिससे रात में देखने में दिक्कत, आंखों में सूखापन या कॉर्निया से जुड़ी समस्याएं भी हो सकती हैं. कुछ लोगों की पलकों के आसपास पीले रंग की छोटी गांठें भी दिखाई दे सकती हैं, जिन्हें जैंथेलाज़्मा कहा जाता है.
आंखों में कब दिखते हैं कैंसर के लक्षण?
vinmec की रिपोर्ट के अनुसार, पीलिया लिवर कैंसर के आखिरी चरण में दिखने वाला एक अहम लक्षण हो सकता है. जब लिवर में ट्यूमर बढ़ने लगते हैं, तो वे बाइल डक्ट पर दबाव डालते हैं, जिससे बिलीरुबिन बढ़ जाता है. इसके कारण आंखें और त्वचा पीली पड़ सकती हैं, इसके साथ ही गहरा यूरिन और खुजली जैसी परेशानी भी हो सकती है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 12 Mar 2026 16:30:32 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Are Nail Extensions Safe: आपकी सेहत के लिए कितना खतरनाक है नेल एक्सटेंशन? जानें लंबे नाखूनों के नुकसान</title>
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        <description><![CDATA[ Can Acrylic Nails Cause Skin Damage: आजकल नेल एक्सटेंशन और एक्रिलिक नेल्स का ट्रेंड काफी तेजी से बढ़ रहा है. लंबे, चमकदार और स्टाइलिश नाखून कई लोगों को बेहद सुंदर लगते हैं. लेकिन एक्सपर्ट का मानना है कि इनका बार-बार इस्तेमाल त्वचा और नाखूनों के लिए नुकसानदेह भी हो सकता है. खासकर इन्हें लगाने की प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाली यूवी लाइट और कुछ केमिकल हेल्थ &amp;nbsp;से जुड़ी चिंताओं को बढ़ा सकते हैं.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
&amp;nbsp;ऑन्कोलॉजी सर्जन डॉ. जय आर अनाम ने HT के साथ इंटरव्यू के दौरान बताया कि एक्रिलिक नेल्स भले ही सुंदर और लंबे समय तक टिकने वाले लगते हों, लेकिन इनके इस्तेमाल से जुड़े कुछ छिपे हुए जोखिम भी होते हैं. उनका कहना है कि समस्या सीधे एक्रिलिक नेल्स से नहीं, बल्कि उन्हें लगाने की प्रक्रिया से जुड़ी होती है. इस प्रक्रिया में एक खास पाउडर और लिक्विड पदार्थ को मिलाकर नाखूनों पर लगाया जाता है, जिसे बाद में यूवी लैंप के नीचे सख्त किया जाता है. यही यूवी लाइट चिंता का कारण बन सकती है. एक्सपर्ट के मुताबिक यूवीए किरणें त्वचा की सेल्स के डीएनए को नुकसान पहुंचा सकती हैं. समय के साथ यह नुकसान बढ़ता जाता है और लंबे समय तक बार-बार एक्सपोजर होने पर त्वचा से जुड़ी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है. डॉक्टरों का कहना है कि कभी-कभार नेल एक्सटेंशन करवाना ज्यादा खतरनाक नहीं माना जाता, लेकिन यदि कोई व्यक्ति लगातार लंबे समय तक यह प्रक्रिया करवाता है तो जोखिम धीरे-धीरे बढ़ सकता है.
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स्किन पर भी प्रभाव
कुछ रिसर्च में यह भी बताया गया है कि यूवी लैंप के नीचे सैकड़ों बार हाथ रखने से त्वचा पर निगेटिव प्रभाव पड़ सकता है. इसके अलावा कई एक्रिलिक उत्पादों में फॉर्मल्डिहाइड और टोल्यून जैसे केमिकल भी पाए जाते हैं, जो त्वचा में जलन या एलर्जी पैदा कर सकते हैं. जब ये रसायन और यूवी किरणें एक साथ प्रभाव डालते हैं तो त्वचा पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है.
हालांकि एक्सपर्ट यह भी मानते हैं कि थोड़ी सावधानी बरतकर जोखिम को कम किया जा सकता है. नेल एक्सटेंशन करवाने से पहले उंगलियों पर सनस्क्रीन लगाना एक अच्छा उपाय माना जाता है. इसके अलावा पारंपरिक यूवी लैंप की जगह एलईडी लैंप का इस्तेमाल अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जाता है, क्योंकि इसमें अल्ट्रावायलेट किरणें कम होती हैं.
किन बातों का रखना चाहिए ध्यान?
डॉक्टर यह भी सलाह देते हैं कि नेल एक्सटेंशन को रोजमर्रा की आदत बनाने के बजाय खास मौकों तक ही सीमित रखना बेहतर है. इसके साथ ही हमेशा विश्वसनीय सैलून में ही यह प्रक्रिया करवानी चाहिए. एक और आम गलती जो लोग करते हैं, वह है घर पर ही एक्रिलिक नेल्स हटाने की कोशिश करना. इससे त्वचा और नाखूनों को नुकसान हो सकता है, इसलिए इन्हें हटाने के लिए एक्सपर्ट की मदद लेना ही सुरक्षित तरीका माना जाता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 12 Mar 2026 16:30:31 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Radiation Exposure Treatment: क्या परमाणु हमले से होने वाले रेडिएशन से बचा सकती है कोई दवा, जानें यह कितनी कारगर?</title>
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        <description><![CDATA[ Can Medicine Protect From Nuclear Radiation:&amp;nbsp;ईरान पर अमेरिका-इजरायल के हमले के बाद पर्शियन गल्फ के हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं. इस बीच अटकलें लगने लगी हैं कि अगर हालात ऐसे ही बिगड़ते रहे तो वर्ल्ड वॉर 3 भी छिड़ सकता है, जिसके बाद लोगों के मन में परमाणु हमलों का डर बढ़ रहा है. इसके चलते दुनिया के कई देशों में पोटेशियम आयोडाइड की डिमांड काफी तेजी से बढ़ गई है. माना जाता है कि यह परमाणु हमले के बाद होने वाले रेडिएशन से बचा सकती है. आइए जानते हैं कि क्या वाकई ऐसी दवा है? अगर कोई दवा है तो वह कितनी असरदार है?
परमाणु हमले से क्या होता है?
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन की रिपोर्ट के अनुसार, परमाणु दुर्घटना या हमले की स्थिति में वातावरण में रेडियोएक्टिव आयोडीन फैल सकता है. यह हवा के साथ फैलकर मिट्टी, पानी, भोजन और आसपास की चीजों को भी दूषित कर सकता है. कई बार यह त्वचा और कपड़ों पर भी जम सकता है, जिससे शरीर को बाहरी रेडिएशन का खतरा होता है. अगर ऐसा पदार्थ त्वचा पर लग जाए तो उसे गर्म पानी और साबुन से धोकर काफी हद तक हटाया जा सकता है.
लेकिन असली खतरा तब होता है जब यह रेडियोएक्टिव आयोडीन सांस के जरिए शरीर के अंदर चला जाए या दूषित भोजन और पानी के माध्यम से शरीर में पहुंच जाए. शरीर के अंदर जाने के बाद यह थायरॉयड ग्रंथि में जमा होने लगता है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि मानव शरीर आयोडीन को स्वाभाविक रूप से थायरॉयड में ही इकट्ठा करता है, चाहे वह सामान्य आयोडीन हो या रेडियोएक्टिव आयोडीन.
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कौन सी दवा काम आ सकती है?
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन ने रेडियोलॉजिकल और परमाणु आपात स्थितियों के लिए जरूरी दवाओं की एक सूची तैयार की है, जिनमें पोटैशियम आयोडाइड का नाम भी शामिल है. ईरान पर हमलों और खाड़ी देशों पर पलटवार के बाद पोटैशियम आयोडाइड की डिमांड काफी ज्यादा बढ़ गई है और लोग लगातार इसका स्टॉक कर रहे हैं. दरअसल, इन दवाओं का मकसद रेडिएशन के असर को रोकना, कम करना या रेडिएशन से हुई क्षति का इलाज करना होता है. उदाहरण के तौर पर आयोडीन की गोलियां थायरॉयड ग्लैंड को रेडियोएक्टिव आयोडीन को यूज करने से इसको रोकने में मदद कर सकती हैं. इसी तरह कुछ खास दवाएं शरीर से रेडियोएक्टिव तत्वों को बाहर निकालने में मदद करती हैं.
इसके अलावा कुछ दवाएं ऐसी भी होती हैं जो तीव्र रेडिएशन सिंड्रोम की स्थिति में बोन मैरो को होने वाले नुकसान को कम करने में मदद कर सकती हैं. वहीं उल्टी, दस्त और इंफेक्शन जैसे लक्षणों को कंट्रोल करने के लिए भी अलग-अलग दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है. एक्सपर्ट के अनुसार परमाणु या रेडिएशन आपात स्थिति में दवाएं कुछ हद तक सुरक्षा दे सकती हैं, लेकिन यह पूरी तरह से बचाव का उपाय नहीं होतीं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 12 Mar 2026 12:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>Blood Pressure Fluctuations:  सिर्फ एक रीडिंग पर न करें भरोसा, जानें क्यों बदलता रहता है दिनभर आपका ब्लड प्रेशर?</title>
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        <description><![CDATA[ Why Headaches Happen Even With Normal Blood Pressure: अक्सर लोग तब राहत महसूस करते हैं जब हेल्थ चेकअप के दौरान उनका ब्लड प्रेशर सामान्य निकलता है. उन्हें लगता है कि हार्ट पूरी तरह स्वस्थ है और चिंता की कोई बात नहीं है. लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि केवल एक बार की सामान्य रीडिंग हमेशा पूरी सच्चाई नहीं बताती. कई बार ऐसा होता है कि क्लिनिक में बीपी सामान्य दिखता है, जबकि दिनभर के दौरान इसमें उतार-चढ़ाव होता रहता है. यही कारण है कि कुछ लोगों को बार-बार सिरदर्द की शिकायत होती है, जबकि जांच में सब कुछ सामान्य नजर आता है.
क्या होते हैं इसके पीछे कारण?
दरअसल ब्लड प्रेशर एक स्थिर संख्या नहीं है. यह दिनभर में कई कारणों से बदलता रहता है. तनाव, नींद की कमी, खानपान, फिजिकल एक्टिविटी और भावनात्मक स्थिति भी इसे प्रभावित करती हैं. कुछ मामलों में लोगों को मास्क्ड हाइपरटेंशन नाम की स्थिति हो सकती है. इसमें डॉक्टर के पास जांच के समय बीपी सामान्य रहता है, लेकिन रोजमर्रा की जिंदगी में यह काफी बढ़ सकता है. लंबे समय तक ऐसा होने पर दिल और रक्त वाहिकाओं पर दबाव पड़ने लगता है.
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एक्सपर्ट क्या कहते हैं?
कार्डियोलॉजिस्ट बताते हैं कि बिना किसी स्पष्ट कारण के बार-बार होने वाला सिरदर्द कई बार इसी छिपे हुए हाई ब्लड प्रेशर का संकेत हो सकता है. कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. गीतिश गोविल के अनुसार कई लोग यह मान लेते हैं कि सामान्य बीपी का मतलब है कि उन्हें हाइपरटेंशन का खतरा नहीं है. लेकिन कुछ लोगों में दिनभर ब्लड प्रेशर बढ़ने और घटने की समस्या होती रहती है, जो धीरे-धीरे शरीर को नुकसान पहुंचा सकती है.
ये चीजें होती हैं जिम्मेदार
ऐसी स्थिति के पीछे कई रोजमर्रा की आदतें भी जिम्मेदार हो सकती हैं. ज्यादा तनाव, कम नींद, ज्यादा नमक वाला भोजन, मोटापा, धूम्रपान और फिजिकल एक्टिविटी की कमी इसके प्रमुख कारण माने जाते हैं. कई बार देखने में पूरी तरह स्वस्थ लगने वाले लोगों में भी यह समस्या धीरे-धीरे विकसित हो सकती है. ब्लड प्रेशर में अचानक बढ़ोतरी होने पर सिरदर्द का अनुभव थोड़ा अलग हो सकता है. कई लोगों को सुबह उठते ही सिर के पीछे भारीपन महसूस होता है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि बीपी बढ़ने पर दिमाग की ब्लड वेसल्स &amp;nbsp;पर दबाव पड़ता है, जिससे दर्द की अनुभूति हो सकती है.
ब्लड प्रेशर की जांच करते रहना जरूरी
डॉक्टरों के मुताबिक शरीर कई बार छोटे-छोटे संकेत देता है, जिन्हें लोग नजरअंदाज कर देते हैं. सुबह के समय सिरदर्द, धुंधला दिखाई देना, हल्की गतिविधि में सांस फूलना या बिना वजह थकान महसूस होना भी ब्लड प्रेशर में उतार-चढ़ाव के संकेत हो सकते हैं. इसलिए एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि समय-समय पर ब्लड प्रेशर की जांच करते रहना जरूरी है. केवल एक बार की जांच के बजाय नियमित मॉनिटरिंग से सही स्थिति समझ में आती है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 12 Mar 2026 08:30:16 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Diseases Caused By Contaminated Water: कैग ने बताया आचमन करने लायक नहीं गंगाजल, जानें खराब पानी से हो सकती हैं कौन&amp;कौन सी बीमारियां?</title>
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        <description><![CDATA[ What Diseases Are Caused By Contaminated Water: उत्तराखंड में नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत किए गए ऑडिट में गंगा नदी की स्थिति को लेकर कई गंभीर चिंताएं सामने आई हैं. &amp;nbsp;सीएजी &amp;nbsp;की रिपोर्ट के अनुसार देवप्रयाग से हरिद्वार के बीच गंगा के पानी में कोलिफॉर्म बैक्टीरिया की मात्रा लगभग 32 गुना तक बढ़ी हुई पाई गई. इसके अलावा कई सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट &amp;nbsp;राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के तय मानकों का पालन नहीं कर रहे हैं. रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि लगभग 32 प्रतिशत एसटीपी बिना शोधन किए हुए सीवेज को सीधे गंगा में छोड़ रहे हैं. यह ऑडिट 2018 से 2023 के बीच उत्तराखंड में नमामि गंगे कार्यक्रम के क्रियान्वयन की समीक्षा के दौरान किया गया था. यह रिपोर्ट बजट सत्र के दौरान गैरसैंण में आयोजित उत्तराखंड विधानसभा में पेश की गई.
क्या बताया गया है रिपोर्ट में?
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि गंगा किनारे बसे शहरों में इस योजना के कई हिस्सों का सही तरीके से लागू नहीं हो पाया. राज्य स्वच्छ गंगा मिशन के तहत बनाए गए कुछ श्मशान घाटों का उपयोग बहुत कम हो रहा है, क्योंकि लोगों के बीच इसके बारे में पर्याप्त अवेयरनेस नहीं फैलाई गई. इसके अलावा परियोजना के तहत वनीकरण से जुड़े कार्यों में भी अपेक्षित प्रगति नहीं हो पाई. रिपोर्ट के अनुसार योजना के लिए जो खर्च निर्धारित किया गया था, उसमें से केवल लगभग 16 प्रतिशत राशि ही प्रभावी रूप से इस्तेमाल की जा सकी.
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क्या होती है इससे बीमारियां?
यूएन की विशेष हेल्थ एजेंसी वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के अनुसार, दूषित पानी और खराब स्वच्छता कई गंभीर बीमारियों के फैलने का कारण बन सकते हैं. इनमें हैजा, दस्त, पेचिश, हेपेटाइटिस ए, टाइफाइड और पोलियो जैसी बीमारियां शामिल हैं. यदि पानी और स्वच्छता से जुड़ी सेवाएं पर्याप्त न हों या उनका सही प्रबंधन न किया जाए, तो लोगों को कई तरह के स्वास्थ्य जोखिमों का सामना करना पड़ सकता है. यह समस्या स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े संस्थानों में और भी गंभीर हो जाती है, क्योंकि वहां मरीजों और स्वास्थ्यकर्मियों दोनों के लिए इंफेक्शन का खतरा बढ़ जाता है.
आंकड़ों के अनुसार हर 100 मरीजों में से लगभग 7 मरीज विकसित देशों के अस्पतालों में और करीब 15 मरीज निम्न व मध्यम आय वाले देशों के अस्पतालों में इलाज के दौरान किसी न किसी संक्रमण का शिकार हो जाते हैं. इसका एक बड़ा कारण पानी और स्वच्छता से जुड़ी सुविधाओं की कमी भी माना जाता है.
पानी क्यों हो रहा है दूषित?
डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट में बताया गया कि शहरी, औद्योगिक और कृषि क्षेत्र से निकलने वाले गंदे पानी का सही प्रबंधन न होने की वजह से करोड़ों लोगों के पीने का पानी प्रदूषित हो रहा है. कई बार भूजल में प्राकृतिक रूप से मौजूद केमिकल भी हेल्थ के लिए खतरनाक साबित हो सकते हैं. उदाहरण के लिए आर्सेनिक और फ्लोराइड जैसे तत्व भूजल में पाए जा सकते हैं. वहीं कुछ रसायन, जैसे सीसा , पानी की सप्लाई व्यवस्था के संपर्क में आने से भी पीने के पानी में मिल सकते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 12 Mar 2026 08:30:15 +0530</pubDate>
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        <title>Burning Eyes Reasons: घंटों नहीं देखते स्क्रीन तो क्यों सूख रही हैं आपकी आंखें? जानिए ड्राई आई के छिपे कारण</title>
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        <description><![CDATA[ Why Do Eyes Feel Dry Without Screen Time: आजकल कई लोग आंखों में जलन, सूखापन या किरकिराहट महसूस करने की शिकायत करते हैं. अक्सर इसका कारण मोबाइल या लैपटॉप की स्क्रीन को माना जाता है. लेकिन आंखों के डॉक्टरों का कहना है कि कई ऐसे मरीज भी क्लिनिक पहुंच रहे हैं जो ज्यादा स्क्रीन का इस्तेमाल नहीं करते, फिर भी उनकी आंखें सूखी और थकी हुई महसूस होती हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर यह समस्या क्यों बढ़ रही है.
क्यों होती है इस तरह की दिक्कत?
दरअसल, हमारी आंखों की सतह पर एक पतली परत होती है जिसे टियर फिल्म कहा जाता है. यही परत आंखों को नम बनाए रखती है और उन्हें आरामदायक महसूस कराती है. जब यह संतुलन बिगड़ जाता है तो आंखों में सूखापन, खुजली या जलन जैसी परेशानी होने लगती है. विशेषज्ञों का कहना है कि आज की लाइफस्टाइल में कई ऐसी आदतें हैं जो धीरे-धीरे इस संतुलन को प्रभावित करती हैं.
भारत में इतने लोगों को होती है दिक्कत
इंडियन जर्नल ऑफ ऑप्थैल्मोलॉजी में पब्लिश एक स्टडी के मुताबिक उत्तर भारत में लगभग 32 प्रतिशत लोगों को ड्राई आई की समस्या का सामना करना पड़ता है. रिसर्चर का मानना है कि इसके पीछे एनवायरमेंट, उम्र और रोजमर्रा की लाइफस्टाइल बड़ी भूमिका निभाते हैं. ड्राई आई सिंड्रोम अब दुनिया भर में आंखों से जुड़ी आम समस्याओं में से एक बन चुका है. यह स्थिति तब पैदा होती है जब आंखों में पर्याप्त आंसू नहीं बनते या बनने वाले आंसू जल्दी सूख जाते हैं. आंसू सिर्फ पानी नहीं होते, बल्कि उनमें तेल, म्यूकस और कुछ प्रोटीन भी होते हैं जो आंखों को इंफेक्शन से बचाते हैं और उन्हें चिकना बनाए रखते हैं. जब यह मिक्स असंतुलित हो जाता है तो आंखों में जलन और असहजता महसूस होने लगती है.
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क्या होते हैं कारण?
शहरों में बढ़ता प्रदूषण और एयर कंडीशनर का ज्यादा इस्तेमाल भी आंखों पर असर डालता है. एयर कंडीशनिंग से हवा में नमी कम हो जाती है, जिससे आंसू जल्दी सूखने लगते हैं. इसके अलावा धूल और प्रदूषण भी आंखों में जलन बढ़ा सकते हैं. एक और अहम कारण है पलक झपकाने की आदत का कम हो जाना. जब हम किसी काम में बहुत ज्यादा ध्यान लगाते हैं, जैसे पढ़ना, लिखना या लंबी ड्राइव करना, तो पलक झपकाने की गति धीमी हो जाती है. इससे आंखों की सतह पर आंसुओं की परत ठीक से नहीं फैल पाती और सूखापन महसूस होने लगता है. एलर्जी भी कई बार आंखों में जलन और खुजली का कारण बन सकती है. पॉलिन, धूल, फफूंदी या पालतू जानवरों के बाल जैसी चीजें आंखों के आसपास की नाजुक त्वचा में सूजन पैदा कर सकती हैं.
कैसे कर सकते हैं बचाव?
इसके अलावा शरीर में पानी की कमी, नींद पूरी न होना या विटामिन A, D और ओमेगा-3 जैसे पोषक तत्वों की कमी भी आंखों के सूखेपन को बढ़ा सकती है. इसलिए एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि पर्याप्त पानी पिएं, आंखों को समय-समय पर आराम दें और जरूरत पड़ने पर आंखों की जांच जरूर कराएं. छोटी-छोटी आदतों में बदलाव करके आंखों को लंबे समय तक स्वस्थ रखा जा सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 11 Mar 2026 16:30:19 +0530</pubDate>
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        <title>Cervical Cancer In India: हर 8 मिनट में एक जान! साइलेंट किलर है सर्वाइकल कैंसर, डॉक्टर से जानें इसे रोकने के 5 कारगर तरीके</title>
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        <description><![CDATA[ Why Cervical Cancer Is Common In India: भारत में सर्वाइकल कैंसर महिलाओं के बीच सबसे गंभीर हेल्थ समस्याओं में से एक है. इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के आंकड़ों के अनुसार, देश में हर 8 मिनट में एक महिला की मौत इस बीमारी से होती है. सबसे दुखद बात यह है कि यह उन कैंसरों में से है जिन्हें काफी हद तक रोका जा सकता है. डॉ. विश्वनाथ, सीनियर कंसल्टेंट मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट ने TOI को बताया कि सर्वाइकल कैंसर धीरे-धीरे विकसित होता है. कई वर्षों तक सेल्स में बदलाव चुपचाप होता रहता है, जो समय रहते पहचान लिया जाए तो पूरी तरह रोका जा सकता है. &amp;nbsp;यही इसकी चुनौती भी है और अवसर भी. चलिए आपको बताते हैं कि कैसे इसको रोका जा सकता है,
HPV वैक्सीन
अधिकांश सर्वाइकल कैंसर के पीछे हाई-रिस्क ह्यूमन पैपिलोमा वायरस जिम्मेदार होता है. एचपीवी वैक्सीन खतरनाक स्ट्रेन्स से बचाव करती है. यह 9 से 14 वर्ष की उम्र में सबसे प्रभावी मानी जाती है, लेकिन 26 वर्ष तक भी दी जा सकती है. जिन देशों ने बड़े स्तर पर वैक्सीनेशन किया, वहां मामलों में काफी कमी देखी गई है. यह वैक्सीन लाइफस्टाइल नहीं, बल्कि कैंसर से सुरक्षा का कदम है.
रेगुलर स्क्रीनिंग
शुरुआती स्टेप में यह कैंसर कोई स्पष्ट संकेत नहीं देता. पैप स्मीयर, एचपीवी डीएनए टेस्ट या विजुअल इंस्पेक्शन जैसी जांचें सेल्स में होने वाले बदलाव को पहले ही पकड़ सकती हैं. 30 से 65 वर्ष की महिलाओं को डॉक्टर की सलाह के अनुसार नियमित जांच करानी चाहिए. सब ठीक लग रहा है सोचकर जांच टालना दिक्कतों को बढ़ा सकता है.
सुरक्षित फिजिकल रिलेशन
एचवीपी मुख्य रूप से यौन संपर्क से फैलता है. कंडोम का नियमित उपयोग इंफेक्शन के खतरे को कम करता है, हालांकि पूरी तरह खत्म नहीं करता. बहुत कम उम्र में यौन सक्रियता और कई पार्टनर्स भी जोखिम बढ़ाते हैं. जागरूकता और खुली बातचीत ही बचाव का रास्ता है.
स्मोकिंग से दूरी
तंबाकू इम्यून सिस्टम को कमजोर करता है, जिससे शरीर एचपीवी इंफेक्शन को साफ नहीं कर पाता. सिगरेट के हानिकारक रसायन सर्वाइकल म्यूकस में भी पाए गए हैं. स्मोकिंग छोड़ना धीरे-धीरे खतरा कम कर सकता है.
इन संकेतों को नजरअंदाज न करें
पीरियड्स के बीच ब्लीडिंग, संबंध के बाद खून आना, मेनोपॉज के बाद ब्लीडिंग, बदबूभरे डिस्चार्ज या लगातार पेल्विक दर्द जैसे लक्षणों को हल्के में न लें. शुरुआती पहचान होने पर इलाज के परिणाम बेहद बेहतर होते हैं. सर्वाइकल कैंसर की रोकथाम संभव है, बस जरूरत है जागरूकता, समय पर जांच और सामूहिक सहयोग की. सही जानकारी और समय पर कदम उठाने से इस बड़ी बीमारी से बचा जा सकता है.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 11 Mar 2026 12:30:19 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Childhood Cancer: लगातार बुखार, थकान और हड्डियों में दर्द... बच्चों में दिखें ये लक्षण तो न करें इग्नोर, वरना हो जाएगा कैंसर</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/childhood-cancer-लगातार-बुखार-थकान-और-हड्डियों-में-दर्द-बच्चों-में-दिखें-ये-लक्षण-तो-न-करें-इग्नोर-वरना-हो-जाएगा-कैंसर</link>
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        <description><![CDATA[ What Are The First Signs Of Cancer In A Child: बचपन में होने वाला कैंसर बाकी कैंसर की तुलना में कम दिखता है, लेकिन यह उतना रेयर भी नहीं है जितना आमतौर पर समझ लिया जाता है. भारत में हर साल लगभग 50,000 से 75,000 नए बच्चों के कैंसर के मामले सामने आते हैं, जिनमें ल्यूकेमिया और लिंफोमा प्रमुख हैं. अच्छी बात यह है कि समय पर पहचान और इलाज से 80 प्रतिशत से अधिक बच्चों के ठीक होने की संभावना रहती है. असली चुनौती शुरुआती संकेतों को समय रहते पहचानने की है. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर डॉ. क्या कहते हैं.&amp;nbsp;
क्या करने की होती है जरूरत?
डॉ. श्रावण कुमार बोडेपुडी, मणिपाल हॉस्पिटल, विजयवाड़ा &amp;nbsp;बचपन के कई कैंसर बहुत हल्के और सामान्य से लगने वाले लक्षणों के साथ शुरू होते हैं. लंबे समय तक रहने वाला बुखार, लगातार थकान या शरीर पर छोटी-सी गांठ, ये सब अक्सर सामान्य बीमारी समझकर टाल दिए जाते हैं. कई बार सही जांच और इलाज में हफ्तों या महीनों की देरी हो जाती है, खासकर उन इलाकों में जहां स्वास्थ्य सुविधाएं सीमित हैं. अगर माता-पिता सतर्क रहें और संकेतों को गंभीरता से लें, तो इलाज जल्दी शुरू किया जा सकता है.
किन लक्षणों पर ध्यान रखने की जरूरत होती है?
डॉ. श्रावण बताते हैं कि अगर कोई लक्षण दो हफ्तों से ज्यादा बना रहे या बार-बार लौटे, तो उसे नजरअंदाज न करें. बिना वजह गर्दन, बगल या पेट में गांठ या सूजन दिखाई देना, बार-बार नाक से खून आना, मसूड़ों से खून आना या त्वचा पर छोटे लाल धब्बे उभरना चेतावनी हो सकते हैं. लगातार बुखार, बार-बार इंफेक्शन, असामान्य थकान, बिना कारण वजन कम होना या भूख न लगना भी संकेत हैं. हड्डियों या जोड़ों में दर्द, जिससे बच्चा लंगड़ाकर चले या रात में दर्द की शिकायत करे, उसे भी गंभीरता से लें. सुबह के समय सिरदर्द के साथ उल्टी, दृष्टि या संतुलन में समस्या, पेट में सूजन या चेहरा पीला पड़ना, ये सब जांच की मांग करते हैं. तस्वीरों में आंखों में सफेद चमक दिखना दुर्लभ आंख के ट्यूमर का संकेत हो सकता है. जरूरी नहीं कि हर लक्षण कैंसर हो, लेकिन इनकी अनदेखी ठीक नहीं.
आपको क्या करना चाहिए?
ल्यूकेमिया में अक्सर बुखार, थकान, पीलापन और आसानी से चोट लगना दिखता है. लिंफोमा में गर्दन या बगल में सख्त और बढ़ती हुई गांठें नजर आती हैं. ब्रेन ट्यूमर सुबह के सिरदर्द और संतुलन की समस्या से जुड़ा हो सकता है, जबकि कुछ ठोस ट्यूमर पेट में सूजन या गांठ के रूप में दिखते हैं. अगर बच्चे के लक्षण बने रहें या बढ़ते जाएं, तो डॉक्टर से तुरंत संपर्क करें. सामान्य खून की जांच और इमेजिंग से शुरुआती संकेत मिल सकते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 11 Mar 2026 12:30:18 +0530</pubDate>
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        <title>Tarn Taran Momo Incident: क्या मोमोज&amp;चाप खाने से हो जाती है मौत, एक्सपर्ट्स से जानें ये कितने खतरनाक?</title>
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        <description><![CDATA[ Can Eating Momos Cause Choking Death:&amp;nbsp;पंजाब के तरनतारन शहर में एक दर्दनाक घटना सामने आई है, जहां संदिग्ध परिस्थितियों में दो सगे भाई-बहनों की मौत हो गई. बताया जा रहा है कि शनिवार शाम सड़क किनारे एक रेहड़ी से खाना खाने के बाद रात में उनकी तबीयत बिगड़ गई थी. रविवार सुबह जब माता-पिता उन्हें अस्पताल लेकर पहुंचे तो डॉक्टरों ने दोनों बच्चों को मृत घोषित कर दिया.
परिवार के अनुसार बच्चों ने शनिवार शाम को एक रेहड़ी वाले से मोमोज और चैंप खाए थे. खाना खाने के कुछ ही समय बाद दोनों को उल्टियां होने लगीं. शुरुआत में घर पर ही उल्टी रोकने की दवा दी गई, जिसके बाद वे सो गए. लेकिन रविवार सुबह जब काफी देर तक बच्चे नहीं जागे तो परिजन घबरा गए और उन्हें तुरंत अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. चलिए आपको बताते हैं कि क्या मोमोज खाने से मौत भी हो सकती है.
क्या इससे मौत भी हो सकती है?
Dr. Chandril Chugh, US Trained Adult &amp;amp; Pediatric Neurologist ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो शेयर करके बताया कि जो लोग मोमोज खाना खूब पसंद करते हैं, उन्हें इससे होने वाली 4 बीमारियों के बारे में पता होना चाहिए. उनके अनुसार इससे फैटी लिवर की दिक्कत होती है, क्योंकि सारा मैदा लिवर में जाता है और बाद में इस तरह की दिक्कत पैदा करता है. दूसरा यह ब्लड प्रेशर और हार्ट डिजीज का भी कारण बनता है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जो स्पाइसी चटनी हम इसके साथ खाते हैं, उसमें सोडियम पाई जाती है. वे आगे बताते हैं कि इसके चलते कैंसर की भी दिक्कत हो सकती है. चौथा सबसे बड़ा कारण हार्ट अटैक से होने वाली मौत का है. डॉ. चंद्रिल बताते हैं कि तेल के चलते हार्ट में ब्लॉकेज की समस्या होती है, जिसके चलते आज यंग लोगों में भी हार्ट अटैक से मौत की समस्या बढ़ रही है.
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A post shared by Dr. Chandril Chugh | US Trained Adult &amp;amp; Pediatric Neurologist (@drchandrilchugh_neurologist)





इसे भी पढ़ें -&amp;nbsp;Egg Freezing: कितने साल के लिए एग्स फ्रीज करवा सकती हैं महिलाएं, इसमें कितना खर्चा आता है?
मोमोज खाते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
एम्स नई दिल्ली के एक्सपर्ट के अनुसार मोमोज खाते समय सावधानी बेहद जरूरी है. दरअसल, मोमोज की बनावट काफी मुलायम और फिसलन भरी होती है. अगर इन्हें ठीक से चबाए बिना ही निगल लिया जाए तो इनके गले में फंसने की आशंका बढ़ जाती है, जिससे चोकिंग यानी सांस रुकने की स्थिति बन सकती है और गंभीर मामलों में जान का खतरा भी हो सकता है. यह चेतावनी उस घटना के बाद सामने आई थी, जब एक व्यक्ति मोमोज खाते समय अचानक दुकान पर ही गिर पड़ा था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में पाया गया कि उसके विंडपाइप के मुहाने पर एक डंपलिंग यानी मोमो फंसा हुआ था. मेडिकल एक्सपर्ट ने माना कि उसकी मौत मोमो के कारण गला घुटने से हुई थी.
हो सकता है&amp;nbsp;नुकसानदायक 
एक और अहम बात यह है कि ज्यादातर मोमोज मैदा से बनाए जाते हैं. मैदा दरअसल अनाज का वह हिस्सा होता है जिसमें फाइबर नहीं के बराबर होता है. इसे मुलायम और सफेद बनाने के लिए कई बार रासायनिक प्रक्रिया से गुजारा जाता है. कुछ एक्सपर्ट का मानना है कि ऐसे रसायन लंबे समय तक अधिक मात्रा में सेवन करने पर शरीर के लिए नुकसानदेह हो सकते हैं. यह पैंक्रियास पर असर डाल सकते हैं और शरीर में इंसुलिन बनने की प्रक्रिया को भी प्रभावित कर सकते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 10 Mar 2026 12:30:22 +0530</pubDate>
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