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    <title>Attention India Hindi &amp; : हेल्थ&amp;फिटनेस</title>
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    <description>Attention India Hindi &amp; : हेल्थ&amp;फिटनेस</description>
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    <dc:rights>Copyright 2024 Attention India&amp; All Rights Reserved.</dc:rights>
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        <title>Mustard Oil vs Olive Oil Benefits: सरसों या जैतून... हार्ट पेशेंट के लिए कौन सा तेल सही?</title>
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        <description><![CDATA[ Mustard Oil vs Olive Oil Benefits : घर में खाना बनाने के लिए अलग-अलग तरह के तेल का इस्तेमाल किया जाता है. कहीं सरसों के तेल को सबसे अच्छा माना जाता है तो कहीं जैतून (ऑलिव) के तेल को दिल के लिए बेहतर बताया जाता है. एक ओर सरसों का तेल सालों से भारतीय रसोई का हिस्सा रहा है, वहीं दूसरी ओर ऑलिव ऑयल को मेडिटेरेनियन डाइट की वजह से दुनियाभर में लोकप्रिय माना जाता है. ऐसे में अक्सर लोगों के मन में सवाल उठता है कि आखिर हार्ट की सेहत के लिए कौन-सा तेल ज्यादा फायदेमंद है. तो आइए आज हम आपको बताते हैं कि सरसों का तेल या फिर जैतून का तेल हार्ट पेशेंट के लिए किसमें खाना बनाना फायदेमंद है.&amp;nbsp;
क्यों जरूरी है सही तेल का चुनाव?
पहले माना जाता था कि हर तरह का फैट शरीर के लिए नुकसानदायक होता है, लेकिन अब पोषण विशेषज्ञों की राय बदल चुकी है. अब ज्यादा ध्यान इस बात पर दिया जाता है कि आप किस तरह का फैट खा रहे हैं. &amp;nbsp;बार-बार गर्म किया गया तेल, ट्रांस फैट और जरूरत से ज्यादा सैचुरेटेड फैट दिल के लिए नुकसानदायक माने जाते हैं. वहीं मोनोअनसैचुरेटेड फैट और ओमेगा-3 जैसे &amp;nbsp;अनसैचुरेटेड फैट कोलेस्ट्रॉल को बेहतर रखने और ब्लड वेसल्स में सूजन कम करने में मदद कर सकते हैं. इसी वजह से हार्ट हेल्थ की चर्चा में सरसों का तेल और ऑलिव ऑयल दोनों का नाम आता है.&amp;nbsp;
सरसों या जैतून का तेल हार्ट पेशेंट के लिए किसमें खाना बनाना फायदेमंद है?
हार्ट पेशेंट के लिए ऑलिव ऑयल में खाना बनाना फायदेमंद माना जाता है, खासकर एक्स्ट्रा वर्जिन ऑलिव ऑयल, मोनोअनसैचुरेटेड फैट और ओलिक एसिड से भरपूर होता है. इसके अलावा इसमें पॉलीफेनॉल नाम के नेचुरल एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं. &amp;nbsp;ये एंटीऑक्सीडेंट ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और सूजन को कम करने में मदद कर सकते हैं. यही दोनों कारण धमनियों को नुकसान पहुंचाने और हार्ट डिजीज का खतरा बढ़ाने से जुड़े माने जाते हैं.
अध्ययनों में यह भी पाया गया है कि एक्स्ट्रा वर्जिन ऑलिव ऑयल एचडीएल (अच्छे कोलेस्ट्रॉल) को बेहतर बनाने और एलडीएल के ऑक्सीकरण को कम करने में मदद कर सकता है. एलडीएल का ऑक्सीकरण धमनियों में प्लाक बनने की प्रक्रिया से जुड़ा माना जाता है. इसके अलावा, NIH में प्रकाशित एक बड़े मेटा-विश्लेषण में पाया गया कि ऑलिव ऑयल का ज्यादा सेवन करने वाले लोगों में हार्ट डिजीज का खतरा कम देखा गया.&amp;nbsp;
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क्या हर तरह की कुकिंग के लिए सही है ऑलिव ऑयल?
ऑलिव ऑयल के फायदे अपनी जगह हैं, लेकिन भारतीय रसोई में खाना बनाने का तरीका अलग होता है. हमारे यहां अक्सर डीप फ्राई, तड़का या तेज आंच पर लंबे समय तक खाना पकाया जाता है. ऐसी स्थिति में एक्स्ट्रा वर्जिन ऑलिव ऑयल में मौजूद कुछ फायदेमंद तत्व तेज गर्मी के कारण कम हो सकते हैं. हालांकि रिफाइंड ऑलिव ऑयल ज्यादा तापमान सहन कर सकता है, लेकिन उसमें एंटीऑक्सीडेंट का फायदा कम हो जाता है. इसके अलावा टेस्ट और पारंपरिक खानपान के लिए जरूर होता है. कई भारतीय डिश में ऑलिव ऑयल का टेस्ट लोगों को स्वाभाविक नहीं लगता है.&amp;nbsp;
सरसों का तेल क्यों है खास?
सरसों का तेल लंबे समय से भारतीय रसोई का हिस्सा रहा है. इसमें मोनोअनसैचुरेटेड फैट के साथ अल्फा-लिनोलेनिक एसिड (ALA) नाम का ओमेगा-3 फैटी एसिड भी पाया जाता है. ओमेगा-3 फैट शरीर में सूजन कम करने में मदद कर सकता है और यही कारण है कि इसे दिल की सेहत के लिए जरूरी माना जाता है. भारतीय शोधों में भी सरसों के तेल के संभावित हार्ट संबंधी फायदों पर अध्ययन किया गया है. सरसों के पारंपरिक तेल में एरूसिक एसिड भी पाया जाता है. विशेषज्ञों के अनुसार, सरसों के तेल का इस्तेमाल संतुलित मात्रा में किया जाना चाहिए.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 26 Jul 2026 20:30:06 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>हार्ट अटैक जितना तेज हो सकता है पीरियड्स का दर्द</title>
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        <description><![CDATA[ पीरियड्स के दौरान दर्द होना आम बात है. ज्यादातर महिलाओं को इस समय हल्का दर्द या ऐंठन महसूस होती है. हालांकि, कुछ महिलाओं का दर्द इतना ज्यादा होता है कि उनके लिए उठना-बैठना या रोजमर्रा के काम करना भी मुश्किल हो जाता है. कई बार तो यह दर्द इतना ज्यादा बढ़ जाता है कि कुछ मामलों में&amp;nbsp; पीरियड्स का दर्द हार्ट अटैक के दर्द जितना गंभीर हो सकता है. हाल ही में एनेस्थीसियोलॉजी और इंटरवेंशनल पेन मेडिसिन के विशेषज्ञ डॉ. कुनाल सूद ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर एक शेयर किया और इसके बारे में विस्तार से बताया है.&amp;nbsp;
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डॉक्टर ने क्या बताया?
डॉ. कुनाल सूद ने कहा कि यह बात पूरी तरह गलत नहीं है. उन्होंने बताया कि यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन (UCL) में हुई एक रिसर्च में पाया गया कि कुछ महिलाओं को पीरियड्स के दौरान पेट में होने वाली तेज ऐंठन का दर्द, दर्द की तीव्रता के मामले में हार्ट अटैक जितना महसूस हो सकता है. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि पीरियड्स और हार्ट अटैक एक जैसी बीमारी हैं. तुलना सिर्फ दर्द की गंभीरता को लेकर की जा रही है.
किन महिलाओं में ज्यादा हो सकता है दर्द?
डॉक्टर के मुताबिक, ऐसा दर्द खासकर सेकेंडरी डिसमेनोरिया (Secondary Dysmenorrhea) में देखने को मिल सकता है. इसका एक बड़ा कारण एंडोमेट्रियोसिस (Endometriosis) नाम की बीमारी है, जिसमें महिलाओं को पीरियड्स के दौरान बहुत ही तेज और गंभीर दर्द होता है.&amp;nbsp;
क्या है एंडोमेट्रियोसिस?
एंडोमेट्रियोसिस एक ऐसी बीमारी है जिसमें गर्भाशय की अंदरूनी परत जैसी कोशिकाएं गर्भाशय के बाहर बढ़ने लगती हैं. यह बीमारी अंडाशय (Ovaries), फैलोपियन ट्यूब (Fallopian Tubes) और पेल्विक हिस्से को प्रभावित कर सकती है. कुछ मामलों में यह आंत और मूत्राशय तक भी पहुंच सकती है.इस बीमारी की वजह से महिलाओं को पीरियड्स के दौरान बहुत ज्यादा दर्द, ज्यादा ब्लीडिंग, पेट के निचले हिस्से में लगातार दर्द और गर्भधारण करने में परेशानी हो सकती है.
डॉक्टर ने क्या सलाह दी?
डॉ. कुनाल सूद का कहना है कि महिलाओं के पीरियड्स के दर्द को हल्के में नहीं लेना चाहिए. अगर दर्द बहुत ज्यादा हो और हर महीने रोजमर्रा के काम प्रभावित होने लगें, तो डॉक्टर से सलाह जरूर लेनी चाहिए. उन्होंने इस विषय पर और रिसर्च करने के साथ-साथ बेहतर इलाज की जरूरत पर भी जोर दिया.
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        <pubDate>Sun, 26 Jul 2026 20:30:05 +0530</pubDate>
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        <title>Abhijeet Dipke Typhoid : अभिजीत दिपके को टाइफाइड, कब खतरनाक हो जाती है यह बीमारी?</title>
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        <description><![CDATA[ Abhijeet Dipke Typhoid : बारिश के मौसम में टाइफाइड के मामले तेजी से बढ़ने लगते हैं. यह एक ऐसी बीमारी है, जिसे अक्सर लोग सामान्य बुखार समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन समय पर इलाज न मिलने पर यह गंभीर रूप ले सकती है. हाल ही में कॉकरोच जनता पार्टी के फाउंडर और अध्यक्ष अभिजीत दिपके ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो शेयर कर बताया कि उन्हें टाइफाइड हो गया है और उनका इलाज चल रहा है.
उन्होंने कहा कि उनकी ब्लड रिपोर्ट में टाइफाइड की पुष्टि हुई है और उन्हें रोज सुबह-शाम IV (इंट्रावेनस) के जरिए इलाज दिया जा रहा है. ऐसे में आइए जानते हैं कि टाइफाइड कैसे फैलता है, इसके लक्षण क्या हैं और कब यह बीमारी खतरनाक हो जाती है.
टाइफाइड क्या है और कैसे फैलता है?
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, टाइफाइड एक गंभीर बैक्टीरियल संक्रमण है, जो साल्मोनेला टाइफी (Salmonella Typhi) बैक्टीरिया के कारण होता है. यह बैक्टीरिया दूषित खाना और गंदा पानी पीने से शरीर में पहुंचता है. शरीर में प्रवेश करने के बाद यह तेजी से खून में फैलने लगता है और संक्रमण बढ़ाता है. हर साल दुनिया भर में करीब 1.1 करोड़ से 2.1 करोड़ लोग टाइफाइड से संक्रमित होते हैं और लगभग 2 लाख लोगों की मौत इस बीमारी के कारण हो जाती है. वहीं पैराटाइफाइड के करीब 50 लाख मामले भी हर साल सामने आते हैं, जिनमें बड़ी संख्या दक्षिण एशिया की होती है.
टाइफाइड के लक्षण क्या हैं?
टाइफाइड के शुरुआती लक्षण आमतौर पर बैक्टीरिया के संपर्क में आने के 10 से 14 दिन बाद दिखाई देने लगते हैं. इस बीमारी में मरीज को धीरे-धीरे तेज बुखार आने लगता है. इसके अलावा सिरदर्द, थकान, कमजोरी, पेट दर्द, जी मिचलाना, उल्टी, भूख कम लगना, कब्ज या डायरिया, मांसपेशियों में दर्द और शरीर पर रैशेज भी हो सकते हैं. अगर इलाज न कराया जाए, तो यह बीमारी 3 से 4 हफ्ते या उससे ज्यादा समय तक बनी रह सकती है.
कब खतरनाक हो जाती है यह बीमारी?
अगर समय पर इलाज न मिले, तो टाइफाइड गंभीर रूप ले सकती है. विशेषज्ञों के अनुसार, बीमारी के अलग-अलग स्टेज में मरीज को तेज बुखार, पेट फूलना, तेजी से वजन घटना, डिहाइड्रेशन, डिलीरियम, आंतों में गंभीर चोट, अंदरूनी ब्लीडिंग, दिमाग में सूजन, किडनी फेल होना, निमोनिया, पैंक्रियाज में सूजन और मेनिन्जाइटिस जैसी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं. इसलिए लगातार तेज बुखार या अन्य गंभीर लक्षण दिखने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए.
टाइफाइड में IV क्यों लगाया जाता है?
टाइफाइड के गंभीर मामलों में मरीज के शरीर में पानी की कमी हो सकती है. ऐसे में IV के जरिए शरीर में तरल पदार्थ और जरूरी दवाएं दी जाती हैं. IV से दवाएं सीधे ब्लड स्ट्रीम में पहुंचती हैं, इसलिए उनका असर जल्दी होता है. इसी वजह से कई मरीजों के इलाज में IV थेरेपी का इस्तेमाल किया जाता है.
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टाइफाइड का पता कैसे लगाया जाता है?
अगर किसी व्यक्ति में टाइफाइड जैसे लक्षण दिखाई दें, तो डॉक्टर जांच की सलाह देते हैं. इसके लिए ब्लड टेस्ट, ब्लड कल्चर, स्टूल और यूरिन टेस्ट, विडाल टेस्ट और टाइफी डॉट टेस्ट जैसे परीक्षण किए जा सकते हैं. कुछ गंभीर मामलों में, जब एंटीबायोटिक दवाओं के बाद भी सुधार नहीं होता, तब बोन मैरो कल्चर कराने की सलाह भी दी जा सकती है.
टाइफाइड से बचाव कैसे करें?
टाइफाइड से बचने के लिए साफ और सुरक्षित पानी पीना, ताजा और अच्छी तरह पका हुआ खाना, खाना खाने और बनाने से पहले साबुन से हाथ धोना, सड़क किनारे खुले में मिलने वाला खाना खाने से बचना और घर के आसपास साफ-सफाई बनाए रखना जरूरी है. जिन इलाकों में टाइफाइड के मामले ज्यादा होते हैं, वहां जाने से पहले डॉक्टर की सलाह पर टाइफाइड वैक्सीन भी लगवाई जा सकती है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 26 Jul 2026 20:30:03 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Sonam Wangchuk News: 26 दिन के अनशन के बाद अचानक से भरपेट खाना खा लें तो क्या होगा, बॉडी कैसे करेगी रिएक्ट?</title>
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        <description><![CDATA[ Sonam Wangchuk Ends Hunger Strike: सोनम वांगचुक ने 26 दिनों की भूख हड़ताल के बाद अपना अनशन खत्म कर दिया. उन्होंने बताया कि सरकार की ओर से लिखित आश्वासन मिलने के बाद उन्होंने यह फैसला लिया. सरकार ने आश्वासन दिया है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं होगी. 26 दिन का अनशन खत्म करने के बाद सोनम वांगचुक को लेकर एक बड़ा सवाल चर्चा में है कि आखिर लंबे समय तक भूखे रहने के बाद शरीर कैसे प्रतिक्रिया करता है. तो आइए आज हम आपको बताते हैं कि 26 दिन के अनशन के बाद अचानक से भरपेट खाना खा लें तो क्या होगा और बॉडी कैसे रिएक्ट करेगी?&amp;nbsp;
अनशन के बाद अचानक से भरपेट खाना खा लें तो क्या होगा?
लगातार कई दिनों तक भूखे रहने के बाद शरीर सामान्य तरीके से काम नहीं करता. ऐसे समय में अगर कोई व्यक्ति अचानक भरपेट खाना खा ले तो यह शरीर के लिए फायदेमंद होने की जगह नुकसानदायक भी साबित हो सकता है. लंबे समय तक खाना न मिलने पर शरीर खुद को बचाने के लिए अपनी एनर्जी बचाने लगता है और धीरे-धीरे उसका मेटाबॉलिज्म भी बदल जाता है. ऐसे में जब अचानक दोबारा ज्यादा मात्रा में खाना मिलता है, तो शरीर को उसे संभालने में दिक्कत हो सकती है. यही वजह है कि डॉक्टर लंबे उपवास या भूख हड़ताल के बाद खाने की शुरुआत हमेशा सावधानी से करने की सलाह देते हैं.
लंबे समय तक भूखे रहने पर शरीर में क्या होता है?
जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक भरपेट खाना नहीं खाता, तो शरीर धीरे-धीरे स्टार्वेशन मोड यानी भूख से बचाव की स्थिति में चला जाता है. इस दौरान शरीर पहले खाने से मिलने वाली एनर्जी का इस्तेमाल करता है, लेकिन खाना न मिलने पर फैट और फिर शरीर में मौजूद प्रोटीन को एनर्जी के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर देता है. इस दौरान शरीर में कार्बोहाइड्रेट की उपलब्धता कम हो जाती है और इंसुलिन का स्तर भी घटने लगता है. साथ ही शरीर में कई जरूरी विटामिन और इलेक्ट्रोलाइट्स जैसे फास्फोरस, पोटेशियम, मैग्नीशियम, कैल्शियम और थायमिन की मात्रा भी कम होने लगती है.
बॉडी कैसे रिएक्ट करती है?
अगर लंबे समय तक भूखे रहने के बाद कोई व्यक्ति अचानक ज्यादा मात्रा में खाना खा लेता है, तो शरीर का मेटाबॉलिज्म तेजी से बदल जाता है. खाना मिलने पर शरीर फिर से कार्बोहाइड्रेट को एनर्जी में बदलना शुरू करता है और इंसुलिन का स्तर तेजी से बढ़ जाता है. इंसुलिन बढ़ने के कारण फास्फोरस, पोटेशियम और मैग्नीशियम जैसे इलेक्ट्रोलाइट्स खून से निकलकर तेजी से शरीर की कोशिकाओं के अंदर चले जाते हैं. इससे खून में इन जरूरी तत्वों की कमी हो सकती है. यही स्थिति रीफीडिंग सिंड्रोम (Refeeding Syndrome) कहलाती है, जो गंभीर मामलों में जानलेवा भी हो सकती है.
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रीफीडिंग सिंड्रोम क्या है?
रीफीडिंग सिंड्रोम ऐसी स्थिति है, जो लंबे समय तक भूखे रहने वाले व्यक्ति में दोबारा खाना शुरू होने पर हो सकती है. इसमें शरीर के इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन तेजी से बिगड़ जाता है और कई अंग प्रभावित हो सकते हैं. इसका असर दिल, फेफड़ों, किडनी, मांसपेशियों, पाचन तंत्र, ब्लड और तंत्रिका तंत्र पर पड़ सकता है. अगर समय रहते इलाज न मिले, तो यह स्थिति जानलेवा भी बन सकती है.
किन लोगों में इसका खतरा ज्यादा होता है?
रीफीडिंग सिंड्रोम का खतरा उन लोगों में सबसे ज्यादा होता है, जो लंबे समय तक भूखे रहे हों या कुपोषण का शिकार रहे हों. इसके अलावा बहुत सख्त डाइट करने वाले, लंबे समय तक फास्ट रखने वाले, एनोरेक्सिया जैसे ईटिंग डिसऑर्डर, कैंसर, अनियंत्रित डायबिटीज, सीलिएक डिजीज या इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज से पीड़ित मरीज, लंबे समय से शराब का सेवन करने वाले, निगलने में दिक्कत वाले लोग, कीमोथेरेपी या रेडिएशन थेरेपी ले रहे मरीज और लंबे समय तक IV के जरिए पोषण पाने वाले लोगों में भी इसका जोखिम ज्यादा माना जाता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 25 Jul 2026 00:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>Waist Size And Health: वजन नहीं, कमर का साइज खोलेगा सेहत का राज! मोटापा मापने में BMI से ज्यादा असरदार फॉर्मूला</title>
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        <description><![CDATA[ Why BMI Is Not Enough To Measure Obesity: सालों से मोटापा मापने के लिए बॉडी मास इंडेक्स का इस्तेमाल किया जाता रहा है. डॉक्टर किसी व्यक्ति की लंबाई और वजन के आधार पर यह तय करते हैं कि वह सामान्य वजन, अधिक वजन या मोटापे की कैटेगरी में आता है या नहीं. हालांकि अब स्वास्थ्य एक्सपर्ट का मानना है कि सिर्फ बॉडी मास इंडेक्स के आधार पर किसी व्यक्ति के स्वास्थ्य का सही आकलन करना पर्याप्त नहीं है. कई ऐसे लोग होते हैं जिनका बॉडी मास इंडेक्स सामान्य होता है, लेकिन पेट के आसपास जमा अतिरिक्त चर्बी उन्हें डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और दिल की बीमारियों के खतरे में डाल सकती है.
किस नए नियम को लागू किया गया?
इसी को देखते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने स्कूलों में बच्चों की जांच के दौरान कमर और लंबाई के अनुपात यानी वेस्ट-टू-हाइट रेशियो को भी शामिल करने की सिफारिश की है. विशेषज्ञों का कहना है कि यह तरीका शरीर में खासकर पेट के आसपास जमा चर्बी का बेहतर अंदाजा देता है, जो भविष्य में होने वाली कई गंभीर बीमारियों का संकेत हो सकती है.
बॉडी मास इंडेक्स से कैसे पता चलता है?
बॉडी मास इंडेक्स की गणना व्यक्ति के वजन को उसकी लंबाई के वर्ग से भाग देकर की जाती है. यह तरीका आसान और सस्ता होने की वजह से दुनिया भर में इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी कमी यह है कि यह मांसपेशियों और चर्बी के बीच अंतर नहीं बता पाता. उदाहरण के लिए, किसी खिलाड़ी की मांसपेशियां ज्यादा होने के कारण उसका बॉडी मास इंडेक्स अधिक आ सकता है, जबकि उसके शरीर में अतिरिक्त चर्बी नहीं होती. दूसरी ओर, सामान्यबॉडी मास इंडेक्स वाला व्यक्ति भी पेट पर अधिक फैट जमा होने के कारण गंभीर स्वास्थ्य जोखिम झेल सकता है.
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किस बात को लेकर सबसे ज्यादा चिंता
एक्सपर्ट के अनुसार सबसे ज्यादा चिंता पेट के आसपास जमा चर्बी की होती है. यह चर्बी लीवर, पैंक्रियास और आंतों जैसे महत्वपूर्ण अंगों के आसपास जमा होकर शरीर में सूजन बढ़ा सकती है और इंसुलिन रेजिस्टेंस, हाई ब्लड प्रेशर, हाई कोलेस्ट्रॉल, टाइप-2 डायबिटीज, हृदय रोग और स्ट्रोक जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ा सकती है.
कैसे निकलता है इसकै रेशियो?
वेस्ट-टू-हाइट रेशियो निकालना भी बेहद आसान है. इसके लिए कमर की माप को लंबाई से भाग दिया जाता है और दोनों माप एक ही इकाई, जैसे सेंटीमीटर में होनी चाहिए. विशेषज्ञों के मुताबिक किसी भी वयस्क की कमर उसकी कुल लंबाई के आधे से कम होनी चाहिए. उदाहरण के तौर पर अगर किसी व्यक्ति की लंबाई 170 सेंटीमीटर है तो उसकी कमर 85 सेंटीमीटर से कम रहना बेहतर माना जाता है.
हालांकि एक्सपर्ट यह भी स्पष्ट करते हैं कि बॉडी मास इंडेक्स को पूरी तरह छोड़ने की जरूरत नहीं है. बड़े स्तर पर लोगों की स्क्रीनिंग और मोटापे का आकलन करने में इसकी उपयोगिता आज भी बनी हुई है. लेकिन अगर बॉडी मास इंडेक्स के साथ वेस्ट-टू-हाइट रेशियो को भी शामिल किया जाए तो व्यक्ति के स्वास्थ्य की ज्यादा सटीक तस्वीर सामने आ सकती है.
इन चीजों पर ध्यान देना भी जरूरी
डॉक्टरों का कहना है कि किसी भी व्यक्ति के स्वास्थ्य का सही आकलन केवल वजन या कमर की माप से नहीं किया जा सकता. इसके साथ ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर, कोलेस्ट्रॉल, खानपान, शारीरिक गतिविधि, पारिवारिक बीमारी का हिस्ट्री और लाइफस्टाइल जैसी बातों पर भी ध्यान देना जरूरी है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 25 Jul 2026 00:30:09 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Japanese Encephalitis: डेंगू&amp;मलेरिया से भी खतरनाक है यह बीमारी! मच्छर के काटते ही सूज जाता है दिमाग</title>
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        <description><![CDATA[ Japanese Encephalitis Treatment And Diagnosis: मानसून आते ही मौसम सुहाना हो जाता है, लेकिन इसके साथ मच्छरों का खतरा भी तेजी से बढ़ जाता है. ज्यादातर लोग मच्छर से होने वाली&amp;nbsp; बीमारियों में डेंगू और मलेरिया के बारे में जानते हैं, लेकिन बहुत कम लोग इस बात से वाकिफ हैं कि कुछ मच्छर ऐसे वायरस भी फैलाते हैं, जो सीधे दिमाग को प्रभावित कर सकते हैं. ऐसी ही एक गंभीर बीमारी है जापानी इंसेफेलाइटिस. यह बीमारी भले ही डेंगू जितनी आम न हो, लेकिन गंभीर मामलों में जानलेवा साबित हो सकती है और मरीज को जीवनभर के लिए न्यूरोलॉजिकल समस्याएं भी दे सकती है.
यह बीमारी जापानी इंसेफेलाइटिस वायरस से होती है, जो फ्लैविवायरस परिवार का सदस्य है. यही परिवार डेंगू और वेस्ट नाइल वायरस का भी है. यह वायरस इंफेक्टेड क्यूलेक्स मच्छरों के काटने से फैलता है. ये मच्छर आमतौर पर धान के खेतों, तालाबों, दलदली इलाकों और बारिश के बाद जमा पानी में पनपते हैं. डेंगू फैलाने वाले मच्छरों के विपरीत, क्यूलेक्स मच्छर शाम ढलने के बाद से लेकर सुबह तक ज्यादा सक्रिय रहते हैं.
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कैसे होता है &amp;nbsp;इंसेफेलाइटिस?
फोर्टिस अस्पताल मोहाली के न्यूरोलॉजी विशेषज्ञ डॉ. ईशांक गोयल के अनुसार, वायरस पहले खून में प्रवेश करता है और फिर ब्लड-ब्रेन बैरियर को पार कर दिमाग तक पहुंच जाता है. इसके बाद दिमाग में सूजन आ जाती है, जिसे मेडिकल भाषा में इंसेफेलाइटिस कहा जाता है
हर साल इसके कितने मामले सामने आते हैं?
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के अनुसार, हर साल दुनिया में जापानी इंसेफेलाइटिस के करीब 68 हजार मामले सामने आते हैं. दक्षिण-पूर्व एशिया और पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित हैं. भारत में भी हर साल इसके मामले दर्ज किए जाते हैं और बच्चों में इसका खतरा सबसे अधिक माना जाता है. एक्सपर्ट के मुताबिक, 15 साल से कम उम्र के बच्चों, ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों, धान के खेतों में काम करने वाले किसानों और बिना टीकाकरण वाले यात्रियों में संक्रमण का जोखिम ज्यादा होता है.
क्या होते हैं इसके शुरुआती लक्षण?
इस बीमारी की शुरुआत सामान्य वायरल इंफेक्शन जैसी लग सकती है. शुरुआत में बुखार, सिरदर्द, उल्टी, थकान और कमजोरी जैसे लक्षण दिखाई देते हैं. लेकिन अगर वायरस दिमाग तक पहुंच जाए, तो मरीज में तेज बुखार, भ्रम की स्थिति, बेहोशी, दौरे पड़ना, गर्दन में अकड़न, चलने में परेशानी और होश खोने जैसे गंभीर लक्षण विकसित हो सकते हैं. ऐसी स्थिति में तुरंत अस्पताल पहुंचना जरूरी होता है. डॉक्टरों का कहना है कि केवल सीटी स्कैन से इस बीमारी का पता हमेशा नहीं चल पाता. जरूरत पड़ने पर एमआरआई और खून या सेरेब्रोस्पाइनल फ्लूइड की जांच के जरिए इसकी पुष्टि की जाती है.
क्या इसका कोई इलाज है?
जापानी इंसेफेलाइटिस का कोई विशेष इलाज उपलब्ध नहीं है. इलाज के दौरान मरीज की स्थिति को स्थिर रखने और दिक्कतों को कंट्रोल करने की कोशिश की जाती है. इसलिए बचाव सबसे प्रभावी उपाय माना जाता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 25 Jul 2026 00:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Sonam Wangchuk : 26 दिन का उपवास तोड़ने के कितने दिन बाद ले सकते हैं नॉर्मल डाइट, किन चीजों से चाहिए बचना?</title>
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        <description><![CDATA[ Sonam Wangchuk Ends Hunger Strike : 26 दिनों तक भूख हड़ताल करने के बाद सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने अपना अनशन खत्म कर दिया है. सोनम वांगचुक को सरकार ने आश्वासन दिया है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं होगी. साथ ही पेपर लीक रोकने और परीक्षा प्रणाली में सुधार पर संसद में चर्चा होगी. इसके बाद एक बड़ा सवाल सामने आया है कि इतने लंबे समय तक भूखे रहने के बाद खाना कैसे शुरू करना चाहिए. कई लोगों को लगता है कि अनशन खत्म होते ही भरपेट खाना खा लेना सही होता है, लेकिन मेडिकल एक्सपर्ट्स ऐसा नहीं मानते हैं. ऐसे में आइए जानते हैं कि &amp;nbsp;26 दिन का उपवास तोड़ने के कितने दिन बाद नॉर्मल डाइट ले सकते हैं और किन चीजों से बचना चाहिए.&amp;nbsp;
क्या उपवास खत्म होते ही सामान्य खाना खा सकते हैं?
मेडिकल एक्सपर्ट्स के अनुसार, लंबे समय तक चले उपवास या भूख हड़ताल के तुरंत बाद सामान्य या भरपेट खाना शुरू करना सुरक्षित नहीं माना जाता है. लंबे समय तक खाना न मिलने से शरीर का मेटाबॉलिज्म बदल जाता है. ऐसे में अगर अचानक सामान्य या ज्यादा खाना खाया जाए, तो शरीर पर बुरा असर पड़ सकता है. इसलिए लंबे उपवास या भूख हड़ताल के बाद धीरे-धीरे और हल्के खाने से शुरुआत करने की सलाह दी जाती है, जिससे शरीर सुरक्षित तरीके से सामान्य स्थिति में लौट सके. जब शरीर उस खाने को आसानी से पचाने लगे, तभी धीरे-धीरे नॉर्मल डाइट की ओर बढ़ना चाहिए.
26 दिन का उपवास तोड़ने के कितने दिन बाद नॉर्मल डाइट ले सकते हैं?
अगर उपवास कई दिनों या हफ्तों तक चला हो, तो नॉर्मल डाइट की शुरुआत जल्दबाजी में नहीं करनी चाहिए. पहले शरीर को तरल लिक्विड और हल्का खाना दिया जाता है. इसके बाद थोड़ी-थोड़ी मात्रा में दिन में कई बार खाना खाया जा सकता है. जब शरीर इस खाने को अच्छी तरह पचाने लगे, तब धीरे-धीरे दाल, दही, पनीर, उबला अंडा या अन्य प्रोटीन वाले फूड प्रोडक्ट्स शामिल किए जा सकते हैं. इसके बाद ही नॉर्मल डाइट की ओर बढ़ने की सलाह दी जाती है. अगर उपवास बहुत लंबा रहा हो, तो यह प्रक्रिया डॉक्टर की निगरानी में ही की जानी चाहिए. अचानक भरपेट या भारी खाना खाने से रीफीडिंग सिंड्रोम जैसी गंभीर समस्या का खतरा हो सकता है.&amp;nbsp;
उपवास के बाद सबसे पहले क्या खाना चाहिए?
उपवास खत्म होने के बाद शुरुआत सबसे पहले शरीर को हाइड्रेट करने से करनी चाहिए. इसके लिए सादा पानी, ओआरएस या डॉक्टर की सलाह के अनुसार इलेक्ट्रोलाइट्स दिए जा सकते हैं. इसके बाद हल्का और आसानी से पचने वाला खाना जैसे दलिया, पतली खिचड़ी, सब्जियों का सूप, दही, नारियल पानी या पका हुआ पपीता लिया जा सकता है. शुरुआत में कम मात्रा में और कई बार खाना बेहतर माना जाता है.
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किन चीजों से चाहिए बचना?
लंबे उपवास के तुरंत बाद तला-भुना, मसालेदार, बहुत ज्यादा मीठा और भारी खाना खाने से बचना चाहिए. एक बार में भरपेट खाना भी सही नहीं माना जाता है. ज्यादा फैट, एक्स्ट्रा चीनी और मसालों वाले फूड प्रोडक्ट्स पाचन तंत्र पर अतिरिक्त दबाव डाल सकते हैं. इसलिए खाने की मात्रा और चीजों का ध्यान रखना जरूरी होता है.
यह भी पढ़ें - &amp;nbsp;Sonam Wangchuk News: 26 दिन के अनशन के बाद अचानक से भरपेट खाना खा लें तो क्या होगा, बॉडी कैसे करेगी रिएक्ट? ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 25 Jul 2026 00:30:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Sonam, Wangchuk, दिन, का, उपवास, तोड़ने, के, कितने, दिन, बाद, ले, सकते, हैं, नॉर्मल, डाइट, किन, चीजों, से, चाहिए, बचना</media:keywords>
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        <title>Cardiac Arrest Survival Case: 40 घंटे तक बंद रही दिल की धड़कन, फिर भी जिंदा बचा इंसान? मेडिकल साइंस भी हैरान</title>
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        <description><![CDATA[ How A Man Survived 40 Hours Without Heartbeat: सोचिए, आपका दिल धड़कना बंद कर दे. कुछ सेकंड या मिनट के लिए नहीं, बल्कि 40 घंटे से भी ज्यादा समय तक. न अपनी कोई धड़कन, न शरीर की सामान्य हलचल, सिर्फ मशीनों के सहारे जिंदगी टिकी हो और डॉक्टर हर पल कोशिश कर रहे हों कि किसी तरह आपको वापस लाया जा सके. &amp;nbsp;पूर्वी चीन में एक व्यक्ति के साथ कुछ ऐसा ही हुआ, जिसने हर उम्मीद के खिलाफ फिर से जिंदगी की राह पकड़ ली.&amp;nbsp;
क्या है मामला?
यह मामला तब सामने आया जब करीब चालीस साल का एक व्यक्ति सीने में जकड़न और सांस लेने में परेशानी की शिकायत लेकर झेजियांग यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन के सेकेंड अफिलिएटेड अस्पताल पहुंचा. शुरुआत में यह सामान्य समस्या लग रही थी, लेकिन अचानक उसकी हालत बिगड़ गई. दिल और सांस दोनों ने एक साथ काम करना बंद कर दिया. &amp;nbsp;शरीर की वह लय, जो इंसान को जिंदा रखती है, एकदम थम गई.&amp;nbsp;
झटकों का भी नहीं हुआ असर
डॉक्टरों ने तुरंत उसे बचाने की कोशिश शुरू की. &amp;nbsp;दिल को फिर से चालू करने के लिए कई बार झटके दिए गए, लेकिन कोई असर नहीं हुआ. आमतौर पर जिन तरीकों से दिल दोबारा धड़कने लगता है, वे इस बार पूरी तरह नाकाम रहे. &amp;nbsp;ऐसा लग रहा था जैसे शरीर ने जवाब दे दिया हो.
लेकिन डॉक्टरों ने हार नहीं मानी. उन्होंने उसे एक ऐसी मशीन से जोड़ दिया, जो दिल और लंग्स का काम संभाल सकती है. इस व्यवस्था के जरिए शरीर से खून बाहर निकालकर उसमें से गंदी हवा हटाई जाती है, उसमें ऑक्सीजन मिलाई जाती है और फिर उसे वापस शरीर में भेजा जाता है. इसके साथ ही एक और उपकरण लगाया गया, जो दिल पर दबाव कम करने और खून के प्रवाह को बनाए रखने में मदद करता है.
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दो दिन तक मशीन के भरोसे
करीब दो दिनों तक वह व्यक्ति पूरी तरह इन मशीनों के भरोसे रहा. उसके शरीर में अपनी कोई धड़कन नहीं थी, सिर्फ मशीनों के सहारे ही जीवन के संकेत बने हुए थे. हर पल डॉक्टरों के लिए चुनौती भरा था, क्योंकि इतनी लंबी अवधि तक दिल का बंद रहना आम तौर पर वापसी की उम्मीद को लगभग खत्म कर देता है. फिर एक ऐसा पल आया जिसने सबको हैरान कर दिया. &amp;nbsp;40 घंटे से ज्यादा समय बीतने के बाद उसके दिल ने दोबारा काम करना शुरू कर दिया. धीरे-धीरे धड़कन सामान्य होने लगी और शरीर ने प्रतिक्रिया देना शुरू कर दिया. यह किसी चमत्कार से कम नहीं था.
तीन हफ्ते बाद अस्पताल से बाहर निकला
करीब तीन हफ्तों के इलाज के बाद वह व्यक्ति अपने पैरों पर चलकर अस्पताल से बाहर निकल गया. जांच में पता चला कि उसे दिल की मांसपेशियों में गंभीर सूजन की समस्या थी, जो बहुत तेजी से दिल को प्रभावित कर सकती है. सही समय पर इलाज, आधुनिक तकनीक और डॉक्टरों की लगातार कोशिशों ने उसे नई जिंदगी दे दी. यह घटना इस बात की याद दिलाती है कि मेडिकल साइंस और इंसानी जिद मिलकर असंभव को भी संभव बना सकते हैं. कभी-कभी उम्मीद वहीं से लौटती है, जहां सब कुछ खत्म होता हुआ नजर आता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 23 Jul 2026 20:30:13 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Anti Aging Drug: क्या बूढ़ा होने से रोकने वाली दवाएं सच में होती हैं असरकारक, जानें आपके लिए ये कितनी खतरनाक?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/anti-aging-drug-क्या-बूढ़ा-होने-से-रोकने-वाली-दवाएं-सच-में-होती-हैं-असरकारक-जानें-आपके-लिए-ये-कितनी-खतरनाक</link>
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        <description><![CDATA[ Anti Aging Medicines Risks And Side Effects: अगर कोई कहे कि एक ऐसी दवा है जो बढ़ती उम्र की रफ्तार धीमी कर सकती है, आपको लंबे समय तक फिट रख सकती है और उम्र से जुड़ी कई बीमारियों का खतरा कम कर सकती है, तो शायद यकीन करना मुश्किल हो. पिछले कुछ वर्षों में ऐसी एंटी-एजिंग दवाओं को लेकर दुनिया भर में काफी चर्चा बढ़ी है. कई रिसर्च में इनके फायदे दिखे हैं, लेकिन क्या ये दवाएं सच में असर करती हैं और क्या इन्हें लेना पूरी तरह सुरक्षित है? यही सबसे बड़ा सवाल है.
बीबीसी साइंस की रिपोर्ट के अनुसार,साइंटिस्ट का कहना है कि उम्र बढ़ना अपने आप में एक बीमारी नहीं है, लेकिन इसके साथ शरीर में कई बायोलॉजिकल बदलाव होने लगते हैं. यही बदलाव हार्ट रोग, कैंसर, डिमेंशिया और दूसरी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ा सकते हैं. इसलिए साइंटिस्ट ऐसी दवाओं पर काम कर रहे हैं जो उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा करके लंबे समय तक शरीर को स्वस्थ रखने में मदद कर सकें. इसे हेल्थस्पैन बढ़ाना कहा जाता है, यानी जीवन के स्वस्थ वर्षों को बढ़ाना, न कि सिर्फ उम्र बढ़ाना.
दवाओं पर की जा रही स्टडी
रिसर्च में कुछ दवाओं और नेचुरल मिक्स जैसे मेटफॉर्मिन, रैपामाइसिन, क्वेरसेटिन और डासाटिनिब पर अध्ययन किया जा रहा है. जानवरों पर हुए कई प्रयोगों में इनसे अच्छे नतीजे मिले हैं. कुछ मामलों में उम्र बढ़ने की रफ्तार धीमी हुई और शारीरिक क्षमता में भी सुधार देखा गया. हालांकि इंसानों पर इन दवाओं के असर को लेकर अभी बड़े स्तर के क्लिनिकल ट्रायल जारी हैं और अंतिम निष्कर्ष आना बाकी है.
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क्या इसके कुछ नुकसान भी होते हैं?
एक्सपर्ट बिना डॉक्टर की सलाह के एंटी-एजिंग दवाएं लेने से बचने की सलाह देते हैं. कई दवाएं मूल रूप से दूसरी बीमारियों, जैसे डायबिटीज या कैंसर के इलाज के लिए बनाई गई हैं. इन्हें सिर्फ उम्र कम दिखाने या लंबे समय तक जवान बने रहने की उम्मीद में लेना नुकसानदायक हो सकता है. इनके साइड इफेक्ट्स, दूसरी दवाओं के साथ प्रतिक्रिया और लंबे समय तक इस्तेमाल के जोखिम अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं.
बाजार में बिकने वाले कई सप्लीमेंट और एंटी-एजिंग प्रोडक्ट भी बड़े-बड़े दावे करते हैं, लेकिन हर दावे के पीछे मजबूत साइंटफिक प्रमाण नहीं होते. एक्सपर्ट का मानना है कि फिलहाल स्वस्थ लाइफस्टाइल ही बढ़ती उम्र के असर को कम करने का सबसे भरोसेमंद तरीका है. संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, अच्छी नींद, तनाव पर कंट्रोल और समय-समय पर स्वास्थ्य जांच लंबे समय तक फिट रहने में सबसे ज्यादा मददगार साबित होते हैं
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 23 Jul 2026 20:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Frequent Bowel Movements: क्या आपको भी थोड़ी&amp;थोड़ी देर में जाना पड़ता है बाथरूम? जानिए किस बीमारी का है यह संकेत</title>
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        <description><![CDATA[ Sudden Increase In Stool Frequency Reasons: अगर आपको पहले की तुलना में बार-बार लैट्रिन जाने की जरूरत महसूस होने लगी है, तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए. हालांकि हर व्यक्ति के बाथरूम जाने का पैटर्न अलग होता है. कोई दिन में एक बार जाता है तो कोई दो या तीन बार भी जा सकता है. लेकिन अगर अचानक आपकी लैट्रिन जाने की संख्या बढ़ गई है और यह बदलाव कई दिनों तक बना हुआ है, तो इसके पीछे कोई स्वास्थ्य समस्या हो सकती है.&amp;nbsp;
एक्सपर्ट के मुताबिक दिन में तीन बार से लेकर सप्ताह में तीन बार तक मल त्याग होना सामान्य माना जा सकता है. इसलिए केवल संख्या के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि कोई समस्या है या नहीं. असली चिंता तब होती है, जब आपकी सामान्य आदत में अचानक बदलाव आ जाए और बार-बार लैट्रिन जाने की जरूरत महसूस होने लगे.
क्या होते हैं इसके पीछे कारण?
clevelandclinic के अनुसार, इसके पीछे कई सामान्य कारण भी हो सकते हैं. यदि आपने हाल ही में अपनी डाइट में फाइबर वाली चीजें जैसे फल, हरी सब्जियां और साबुत अनाज बढ़ाए हैं, तो इससे मल त्याग की संख्या बढ़ सकती है. इसी तरह ज्यादा कॉफी या चाय पीना भी आंतों की गतिविधि तेज कर सकता है. कई लोगों में बहुत ज्यादा मसालेदार, तला-भुना खाना या ऐसा भोजन जिसे शरीर आसानी से पचा नहीं पाता, उसकी वजह से भी बार-बार लैट्रिन जाने की समस्या हो सकती है.
दवाइयां और सप्लीमेंट भी इसका कारण&amp;nbsp;
कुछ दवाइयां और सप्लीमेंट भी इसका कारण बन सकते हैं. विटामिन सी, मैग्नीशियम, कुछ एंटीबायोटिक और कुछ एंटीडिप्रेसेंट दवाओं के सेवन से मल त्यागने की संख्या बढ़ सकती है. महिलाओं में पीरियड्स या गर्भावस्था के दौरान हार्मोन में होने वाले बदलाव भी इस समस्या की वजह बन सकते हैं, वहीं तनाव और चिंता का सीधा असर भी पाचन तंत्र पर पड़ता है, जिससे कई लोगों को बार-बार बाथरूम जाने की जरूरत महसूस होती है.
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क्या होते हैं इसके लक्षण?
अगर बार-बार लैट्रिन जाने के साथ पेट दर्द, खून आना, तेज बुखार, मतली, कमजोरी या तेजी से वजन कम होना जैसे लक्षण भी दिखाई दें, तो यह किसी गंभीर बीमारी का संकेत हो सकता है. फूड पॉइजनिंग, आंतों का इंफेक्शन, हाइपरथायरॉयडिज्म, सीलिएक डिजीज, क्रोहन डिजीज, इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज या बड़ी आंत से जुड़ी अन्य समस्याएं भी इसकी वजह हो सकती हैं. लंबे समय तक रहने वाली समस्या को नजरअंदाज करना ठीक नहीं है. अगर यह परेशानी कुछ दिनों से ज्यादा बनी हुई है, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। कारण पता लगाने के लिए ब्लड टेस्ट, स्टूल टेस्ट, ब्रीथ टेस्ट या जरूरत पड़ने पर इमेजिंग जांच कराई जा सकती है.
इसे भी पढ़ें:&amp;nbsp;Monsoon Health Care Tips: मानसून सीजन में जल्दी बीमार पड़ जाते हैं बच्चे, ऐसे रखें उनकी सेहत का ख्याल?
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 23 Jul 2026 20:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>आ रहा है डेंगू मलेरिया का मौसम, अपने बच्चों का ऐसे रखें ख्याल, पछताने से पहले पढ़ लें खबर</title>
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        <description><![CDATA[ Dengue malaria prevention: बारिश का मौसम शुरू होते ही डेंगू और मलेरिया जैसी बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है. इस मौसम में मच्छरों की संख्या तेजी से बढ़ जाती है, जिससे बच्चों के बीमार होने का खतरा ज्यादा रहता है. छोटे बच्चों की रोगों से लड़ने की क्षमता बड़ों के मुकाबले कम होती है. इसलिए माता-पिता को पहले से ही सावधानी बरतनी चाहिए. थोड़ी सी लापरवाही भी बच्चों की सेहत पर भारी पड़ सकती है. ऐसे में जरूरी है कि घर की साफ-सफाई से लेकर बच्चों के खान-पान तक हर बात का ध्यान रखा जाए.
घर के आसपास पानी जमा न होने दें
डेंगू और मलेरिया मच्छरों के काटने से फैलते हैं. इसलिए घर और उसके आसपास साफ-सफाई का खास ध्यान रखें. कूलर, गमले, बाल्टी, टायर या किसी भी ऐसी जगह पर पानी जमा न होने दें, क्योंकि ऐसी जगहों पर मच्छर आसानी से बढ़ जाते हैं. हफ्ते में एक बार कूलर का पानी जरूर बदलें और पानी की टंकियों को हमेशा ढककर रखें.
यह भी पढ़े: Gum Disease Symptoms: क्या बारिश में आपके मसूड़ों से भी आता है खून? एक्सपर्ट से जानिए इसके पीछे की बड़ी वजह
बच्चों को मच्छरों से बचाना है जरूरी
बच्चों को सुबह और शाम के समय पूरे बाजू के कपड़े पहनाएं. अगर बच्चा बाहर खेलने जाता है, तो मच्छर भगाने वाली क्रीम या पैच का इस्तेमाल किया जा सकता है. रात में सोते समय मच्छरदानी का इस्तेमाल करें. साथ ही कोशिश करें कि घर के अंदर मच्छर न रहें.
खाने-पीने का रखें खास ध्यान
बारिश के मौसम में बच्चों को हमेशा साफ और ताजा खाना खिलाएं. बाहर का खुला या बासी खाना खाने से बचाएं. उन्हें पर्याप्त पानी पिलाएं और खाने में फल, हरी सब्जियां, दाल और दूसरी पौष्टिक चीजें शामिल करें, ताकि उनका शरीर मजबूत बना रहे. अगर बच्चा कम पानी पीता है, तो उसे थोड़ी-थोड़ी देर में पानी या दूसरे स्वस्थ पदार्थ देते रहें. अच्छी डाइट बच्चों की रोगों से लड़ने की ताकत बढ़ाने में मदद करती है.
इन लक्षणों को बिल्कुल नजरअंदाज न करें
अगर बच्चे को तेज बुखार, सिर दर्द, बदन दर्द, उल्टी, कमजोरी, आंखों के पीछे दर्द या त्वचा पर लाल चकत्ते दिखाई दें, तो इसे हल्के में न लें. बिना देर किए डॉक्टर को दिखाएं और उनकी सलाह के बिना कोई भी दवा न दें. समय पर इलाज मिलने से बीमारी गंभीर होने का खतरा कम हो सकता है. अगर बुखार दो-तीन दिन तक बना रहे, तो जांच जरूर करानी चाहिए.
यह भी पढ़े: Explained: बारिश के मौसम में डेंगू की नो टेंशन! भारत की पहली वैक्सीन कितनी कारगर? जानें कीमत, तरीका और साइड इफेक्ट्स ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 23 Jul 2026 08:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Gum Disease Symptoms: क्या बारिश में आपके मसूड़ों से भी आता है खून? एक्सपर्ट से जानिए इसके पीछे की बड़ी वजह</title>
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        <description><![CDATA[ Causes Of Bleeding Gums In Rainy Season: अगर बारिश के मौसम में ब्रश करते समय मसूड़ों से खून आने लगे या मुंह की बदबू लगातार बनी रहे, तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए. इसकी वजह सिर्फ मौसम नहीं, बल्कि इस दौरान हमारी कुछ रोजमर्रा की आदतें भी हो सकती हैं. पसंदीदा चाय-पकौड़े, मीठे स्नैक्स, कम पानी पीना और ओरल हाइजीन में लापरवाही जैसी बातें मसूड़ों की सेहत पर असर डाल सकती हैं.&amp;nbsp;
क्यों होती है परेशानी?
डॉ. जैनील पारेख, ऑर्थोडॉन्टिस्ट, लक्ष्मी डेंटल लिमिटेड के मुताबिक, मानसून सीधे तौर पर मसूड़ों की बीमारी या मुंह की बदबू का कारण नहीं बनता, लेकिन इस मौसम में लाइफस्टाइल में होने वाले बदलाव इन समस्याओं का खतरा बढ़ा देते हैं. उनका कहना है कि बारिश के दिनों में लोग अक्सर ज्यादा मीठे स्नैक्स और ड्रिंक्स का सेवन करते हैं, कम पानी पीते हैं और मुंह की सफाई पर भी पहले जितना ध्यान नहीं देते. इससे दांतों पर प्लाक जमा होने लगता है और बैक्टीरिया तेजी से बढ़ते हैं, जिससे मसूड़ों में सूजन और सांसों से बदबू आने की संभावना बढ़ जाती है.
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कौन सी दिक्कत सबसे ज्यादा होती है?
डॉ. पारेख बताते हैं कि अगर प्लाक को नियमित ब्रशिंग और दांतों के बीच की सफाई से नहीं हटाया जाए, तो मसूड़ों की सूजन, कैविटी और लगातार मुंह से बदबू जैसी समस्याएं हो सकती हैं. बारिश के मौसम में डेंटिस्ट के पास ऐसे मरीज ज्यादा पहुंचते हैं, जिन्हें मसूड़ों से खून आना, सूजन, प्लाक जमा होना, दांतों में संवेदनशीलता और शुरुआती मसूड़ों की बीमारी जैसी शिकायतें होती हैं. उनका कहना है कि अच्छी बात यह है कि समय पर इलाज और सही देखभाल से इन समस्याओं को बढ़ने से रोका जा सकता है. प्रोफेशनल क्लीनिंग, रोजाना सही तरीके से ओरल हाइजीन बनाए रखना और नियमित डेंटल चेकअप मसूड़ों को गंभीर बीमारी से बचाने में मदद करता है.&amp;nbsp;
क्या सिर्फ खाने की वजह से होती है दिक्कत?
एक्सपर्ट के अनुसार, लगातार मुंह से बदबू आना सिर्फ खाने की वजह से नहीं होता। यह मसूड़ों की खराब सेहत का शुरुआती संकेत भी हो सकता है. जब मसूड़ों के किनारों पर प्लाक जमा होता है, तो बैक्टीरिया फंसे हुए भोजन के कणों को तोड़ते हैं और सल्फर यौगिक बनाते हैं, जिनकी वजह से बदबू आती है. अगर इसे नजरअंदाज किया जाए, तो यही समस्या आगे चलकर मसूड़ों की गंभीर बीमारी का रूप ले सकती है.
किन लोगों को इसका सबसे ज्यादा खतरा?
कुछ लोगों में यह खतरा ज्यादा होता है. जिनकी ओरल हाइजीन अच्छी नहीं है, जिन्हें डायबिटीज है, जो धूम्रपान या तंबाकू का सेवन करते हैं या जिनके दांतों में ब्रेसेस लगे हैं, उनमें मसूड़ों के इंफेक्शन की आशंका अधिक रहती है. ब्रेसेस की वजह से दांतों में खाना और प्लाक आसानी से फंस जाता है, इसलिए ऐसे लोगों को सफाई पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए. मसूड़ों से ब्रश करते समय खून आना, मसूड़ों में सूजन या लालिमा, लगातार मुंह से बदबू आना, मसूड़ों में दर्द, मसूड़ों का पीछे हटना या दांतों का ढीला महसूस होना ऐसे संकेत हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. समय रहते जांच कराने से मसूड़ों और उन्हें सहारा देने वाली हड्डी को नुकसान पहुंचने से बचाया जा सकता है.
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        <pubDate>Wed, 22 Jul 2026 15:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Regular Health Checkup: क्या आप भी बीमार होने पर ही जाते हैं डॉक्टर के पास? जान लें रेगुलर हेल्थ चेकअप के फायदे</title>
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        <description><![CDATA[ Why Preventative Health Checkup Is Important: अक्सर लोग तब ही डॉक्टर के पास जाते हैं, जब कोई बीमारी या तकलीफ महसूस होने लगती है. लेकिन कई गंभीर बीमारियां ऐसी होती हैं, जो शुरुआती चरण में कोई खास लक्षण नहीं दिखातीं. ऐसे में नियमित हेल्थ चेकअप कराना सिर्फ एक औपचारिकता नहीं, बल्कि बेहतर स्वास्थ्य की दिशा में उठाया गया जरूरी कदम है. समय-समय पर स्वास्थ्य जांच कराने से कई बीमारियों का पता शुरुआत में ही चल जाता है, जिससे उनका इलाज आसान और ज्यादा प्रभावी हो सकता है.&amp;nbsp;
रेगुलर हेल्थ चेकअप करवाने के क्या हैं फायदे?
हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली संस्था MAYO CLINIC के अनुसार, &amp;nbsp;सबसे बड़ा फायदा यह है कि नियमित हेल्थ चेकअप से बीमारियों का समय रहते पता चल जाता है. हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल, थायरॉयड और कुछ तरह के कैंसर जैसी समस्याएं शुरुआती दौर में बिना किसी स्पष्ट संकेत के भी शरीर में मौजूद हो सकती हैं. अगर इनकी पहचान समय रहते हो जाए, तो इलाज जल्दी शुरू किया जा सकता है और गंभीर दिक्कतों से बचा जा सकता है.
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कैसे बीमारियों से बचाती है?
नियमित जांच सिर्फ बीमारी पकड़ने के लिए ही नहीं, बल्कि उन्हें रोकने में भी मदद करती है. डॉक्टर आपकी उम्र, स्वास्थ्य और मेडिकल हिस्ट्री के आधार पर जरूरी जांच और वैक्सीनेशन की सलाह देते हैं. कई इंफेक्शन बीमारियों से बचाव के लिए समय पर टीकाकरण बेहद जरूरी होता है. इसके साथ ही डॉक्टर खानपान, एक्सरसाइज, वजन कंट्रोल रखने और धूम्रपान या शराब जैसी आदतों से दूरी बनाने की सलाह भी देते हैं. ये छोटी-छोटी बातें भविष्य में कई बड़ी बीमारियों के खतरे को कम कर सकती हैं.&amp;nbsp;
किन लोगों के लिए जरूरी
अगर किसी व्यक्ति को पहले से डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, अस्थमा या दिल से जुड़ी कोई बीमारी है, तो उसके लिए नियमित हेल्थ चेकअप और भी ज्यादा जरूरी हो जाता है. समय-समय पर जांच कराने से यह पता चलता रहता है कि बीमारी कंट्रोल में है या नहीं. जरूरत पड़ने पर डॉक्टर दवाओं की मात्रा बदल सकते हैं या इलाज में जरूरी बदलाव कर सकते हैं, जिससे स्वास्थ्य बेहतर बना रहता है.
आर्थिक तौर पर भी फायदेमंद
रेगुलर हेल्थ जांच आर्थिक रूप से भी फायदेमंद साबित हो सकती है.जब किसी बीमारी का पता शुरुआती चरण में चल जाता है, तो उसका इलाज अपेक्षाकृत आसान और कम खर्चीला होता है. वहीं अगर बीमारी लंबे समय तक बिना इलाज के बढ़ती रहे, तो बाद में अस्पताल में भर्ती होने, सर्जरी या महंगे इलाज की जरूरत पड़ सकती है. ऐसे में समय पर कराया गया हेल्थ चेकअप भविष्य के बड़े खर्च से भी बचा सकता है. आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में तनाव, अनरेगुलर लाइफस्टाइल और खराब खानपान कई स्वास्थ्य समस्याओं की वजह बन रहे हैं. इसलिए सिर्फ बीमार होने का इंतजार करने के बजाय साल में कम से कम एक बार डॉक्टर की सलाह से हेल्थ चेकअप जरूर कराना चाहिए.
इसे भी पढ़ें:&amp;nbsp;Monsoon Health Care Tips: मानसून सीजन में जल्दी बीमार पड़ जाते हैं बच्चे, ऐसे रखें उनकी सेहत का ख्याल?
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 21 Jul 2026 23:30:09 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Cholesterol: 10 में 9 भारतीयों का कोलेस्ट्रॉल सामान्य नहीं, ICMR की स्टडी में बड़ा खुलासा</title>
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        <description><![CDATA[ Abnormal Cholesterol Symptoms In Young Adults: अगर आपको लगता है कि कोलेस्ट्रॉल की समस्या सिर्फ बढ़ती उम्र या मोटापे से जुड़ी है, तो हाल ही में आई एक स्टडी आपकी सोच बदल सकती है. इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के स्टडी के अनुसार, भारत में लगभग 10 में से 9 एडल्ट का कोलेस्ट्रॉल स्तर सामान्य नहीं है. यह समस्या सिर्फ बुजुर्गों तक सीमित नहीं है, बल्कि युवा और देखने में पूरी तरह स्वस्थ लोग भी इसकी चपेट में हैं.
किन बीमारियों का बढ़ रहा है खतरा?
यह अध्ययन 23,665 लोगों पर किया गया. रिपोर्ट के मुताबिक, 87.3 प्रतिशत भारतीय वयस्क किसी न किसी प्रकार की असामान्य रक्त फैट की समस्या से जूझ रहे हैं. इसका मतलब है कि शरीर में खराब कोलेस्ट्रॉल या ट्राइग्लिसराइड्स का स्तर बढ़ा हुआ है या फिर अच्छे कोलेस्ट्रॉल का स्तर सामान्य से कम है. ऐसी स्थिति लंबे समय में दिल की बीमारी, हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा बढ़ा सकती है.
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किन लोगों को सबसे ज्यादा खतरा?
स्टडी में यह भी सामने आया कि शहरों में रहने वाले लोगों में यह समस्या ज्यादा है. शहरी क्षेत्रों में 89 प्रतिशत लोगों का कोलेस्ट्रॉल सामान्य नहीं मिला, जबकि ग्रामीण इलाकों में भी यह आंकड़ा 86.5 प्रतिशत रहा. यानी यह समस्या अब केवल शहरों तक सीमित नहीं रह गई है. महिलाओं में भी यह परेशानी पुरुषों की तुलना में अधिक पाई गई. रिपोर्ट के अनुसार 91.1 प्रतिशत महिलाओं में कोलेस्ट्रॉल से जुड़ी गड़बड़ी मिली, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा 83.5 प्रतिशत रहा. सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि भारत में यह समस्या 30 से 39 वर्ष की उम्र में सबसे ज्यादा देखने को मिल रही है. यानी कम उम्र में ही बड़ी संख्या में लोग दिल से जुड़ी बीमारियों के खतरे की ओर बढ़ रहे हैं.
कैसे कर सकते हैं बचाव?
स्टडी में यह भी पाया गया कि केवल मोटापे, डायबिटीज या हाई ब्लड प्रेशर से पीड़ित लोगों में ही नहीं, बल्कि करीब 40 प्रतिशत ऐसे लोगों में भी कोलेस्ट्रॉल सामान्य नहीं था, जिन्हें इनमें से कोई भी बीमारी नहीं थी. इससे साफ है कि केवल फिट दिखना या वजन सामान्य होना दिल के पूरी तरह स्वस्थ होने की गारंटी नहीं है. एक्सपर्ट का कहना है कि समय-समय पर लिपिड प्रोफाइल जांच करानी चाहिए. यह एक नॉर्मल रक्त जांच है, जिससे शरीर में कुल कोलेस्ट्रॉल, अच्छे और खराब कोलेस्ट्रॉल तथा ट्राइग्लिसराइड्स का स्तर पता चलता है. अगर समस्या का पता शुरुआत में चल जाए तो खानपान में बदलाव, नियमित व्यायाम और जरूरत पड़ने पर दवाओं की मदद से इसे नियंत्रित किया जा सकता है. &amp;nbsp;हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाना, संतुलित आहार लेना, नियमित शारीरिक गतिविधि करना और समय-समय पर स हेल्थ जांच कराना हार्ट को स्वस्थ रखने के सबसे प्रभावी तरीकों में शामिल हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 21 Jul 2026 23:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>Explained: बारिश के मौसम में डेंगू की नो टेंशन! भारत की पहली वैक्सीन कितनी कारगर? जानें कीमत, तरीका और साइड इफेक्ट्स</title>
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        <description><![CDATA[ बारिश की पहली बूंद के साथ ही भारत में एक अनचाहा मेहमान दस्तक देता है- मच्छर. ये मच्छर अपने साथ लाते हैं डेंगू जैसी जानलेवा बीमारी, जो 2025 में 1.21 लाख मामलों में 131 मौतों की वजह बनी. इस बार मानसून में एक अच्छी खबर भी आई है. भारत के ड्रग कंट्रोलर जनरल (DCGI) ने देश की पहली डेंगू वैक्सीन &#039;क्यूडेंगा&#039; (QDENGA) को मंजूरी दे दी है. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे लगवाने से पहले किसी तरह की जांच कराने की जरूरत नहीं होगी. क्या यह डेंगू से पूरी तरह बचा पाएगी और कितने की मिलेगी...
डेंगू मच्छर की दुश्मन क्यूडेंगा वैक्सीन आखिर है क्या?
क्यूडेंगा जापान की दवा कंपनी टाकेडा ने बनाई है. यह एक लाइव एटेन्यूएटेड वैक्सीन है. इसका मतलब है कि इसमें डेंगू के वायरस को कमजोर करके शरीर में डाला जाता है. यह वायरस बीमारी पैदा नहीं करता है. शरीर का इम्यून सिस्टम इसे पहचानकर इसके खिलाफ एंटीबॉडी जरूर बना लेता है.
इस तरह जब कभी असली डेंगू का वायरस शरीर पर हमला करता है तो शरीर पहले से तैयार रहता है और बीमारी को गंभीर नहीं होने देता. सबसे बड़ी बात यह है कि यह वैक्सीन डेंगू के चारों प्रकारों (DENV-1, DENV-2, DENV-3 और DENV-4) से एक साथ सुरक्षा देती है. सबसे बड़ी खासियत इसे लगवाने के लिए कोई जांच नहीं होती है.
बिना जांच के वैक्सीन लगवाना कितनी बड़ी बात है?
अभी तक दुनिया में डेंगू की जो वैक्सीन थीं, उन्हें लगवाने से पहले यह जांच कराना जरूरी था कि मरीज को पहले कभी डेंगू हुआ है या नहीं. अगर किसी को पहले डेंगू नहीं हुआ था और वह वैक्सीन लेता था, तो उसे भविष्य में डेंगू होने पर बीमारी और गंभीर होने का खतरा रहता था, लेकिन क्यूडेंगा के साथ यह चिंता नहीं है.
कंपनी के बड़े पैमाने पर क्लिनिकल ट्रायल किए. इनमें 20,000 से ज्यादा बच्चों और वयस्कों को शामिल किया गया. ट्रायल से साबित हुआ कि यह वैक्सीन उन लोगों के लिए भी सुरक्षित है जिन्हें पहले कभी डेंगू नहीं हुआ. यही वजह है कि यह भारत जैसे देश के लिए गेमचेंजर साबित हो सकती है, जहां बड़े पैमाने पर जांच कराना एक बड़ी चुनौती है.
यह वैक्सीन कैसे काम करेगी और किस तरह लगवाएं?
यह वैक्सीन 6 साल से लेकर 60 साल तक के लोगों को लगाई जा सकती है. इसकी दो डोज होती हैं, जिनके बीच 3 महीने का गैप रखना जरूरी है.

पहली डोज के बाद शरीर में वायरस के खिलाफ शुरुआती सुरक्षा तैयार हो जाती है.
दूसरी डोज इस सुरक्षा को लंबे समय के लिए मजबूत कर देती है.

ट्रायल्स के आंकड़ों के मुताबिक, वैक्सीन लेने के बाद डेंगू से अस्पताल में भर्ती होने की संभावना 84% तक कम हो जाती है और संक्रमण का खतरा 61% तक घट जाता है.
क्यूडेंगा वैक्सीन की कीमत कितनी होगी और कब मिलेगी?
टाकेडा कंपनी ने अभी भारत में इस वैक्सीन की सटीक कीमत तय नहीं की है. सूत्रों के मुताबिक इसकी एक डोज 4,000 से 5,000 रुपए के बीच हो सकती है. कंपनी जल्द ही इसे भारत के प्राइवेट अस्पतालों और क्लीनिकों में मिलने लगेगी. सरकारी टीकाकरण कार्यक्रम में इसे कब और कैसे शामिल किया जाएगा, इस पर अभी फैसला होना बाकी है.
क्या यह वैक्सीन भारत में ही बनेगी?
टाकेडा ने भारत की दवा कंपनी जायडस लाइफसाइंसेज के साथ एक समझौता किया है. इसके तहत, जायडस कंपनी भारत में ही इस वैक्सीन बनएगी. इसका सीधा फायदा यह होगा कि आने वाले समय में वैक्सीन की कीमत कम होगी और देश भर में इसकी उपलब्धता तेजी से बढ़ाई जा सकेगी. इससे भारत सिर्फ अपनी जरूरत ही नहीं पूरी करेगा, बल्कि दुनिया के दूसरे देशों को भी यह वैक्सीन सप्लाई कर सकता है.
तो क्या अब डेंगू से मौत नहीं होगी?
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, यह वैक्सीन बेशक एक बहुत बड़ी उपलब्धि है, लेकिन यह सोचना गलत होगा कि डेंगू अब पूरी तरह खत्म हो जाएगा. वैक्सीन का मकसद डेंगू को गंभीर होने से रोकना और मृत्यु दर को कम करना है. यह कोई जादू की छड़ी नहीं है. डेंगू को पूरी तरह हराने के लिए मच्छरों पर कंट्रोल पाना सबसे ज्यादा जरूरी है. सही समय पर बीमारी की पहचान और सही इलाज भी उतना ही अहम है. हालांकि, यह वैक्सीन उस दिशा में एक बहुत बड़ा और ऐतिहासिक कदम है.
भारत में हर साल डेंगू का कितना कहर?
नेशनल सेंटर फॉर वेक्टर बॉर्न डिजीज कंट्रोल के मुताबिक, 2023 में भारत में डेंगू के 2.89 लाख से ज्यादा मामले सामने आए थे और लगभग 1,200 लोगों की मौत हुई थी. 2024 में यह आंकड़ा और भयावह रहा, जब देश में 3.1 लाख से ज्यादा केस दर्ज किए गए और मरने वालों की संख्या 1,400 के पार चली गई. ये आंकड़े बताते हैं कि डेंगू भारत के लिए कितनी बड़ी स्वास्थ्य चुनौती है.
इस मानसून में क्यूडेंगा वैक्सीन एक बड़ी उम्मीद लेकर आई है. यह देश के करोड़ों लोगों को डेंगू के डर से बचा सकती है और हर साल आने वाली उस आफत को रोक सकती है जो हजारों परिवारों को तोड़ देती है. यह भी याद रखना होगा कि वैक्सीन के साथ-साथ मच्छरों से बचाव, पानी जमा न होने देना और बीमारी के लक्षणों को गंभीरता से लेना उतना ही जरूरी रहेगा. तकनीक और जागरूकता दोनों साथ चलेंगी, तभी डेंगू को पूरी तरह हराया जा सकेगा.
डेंगू की रोकथाम के लिए लॉन्च हुए क्यूड़ेंगा वैक्सीन को भारत में मंजूरी मिलने पर पटना के डॉक्टर खुश हुए. PMCH अधीक्षक और मशहूर फिजिशियन डॉ. राजीव कुमार ने कहा कि यह एक रामबाण मिल गया है. जिस तरह हमने वैक्सीन के जरिए कोविड को हराया है, उसी तरह डेंगू को भी हरा देंगे. डेंगू से होने वाली मौतों में कमी आएगी और आंकड़े भी कम होंगे. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 21 Jul 2026 23:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>Testosterone Screening After 30 : क्या 30 के बाद घटने लगता है टेस्टोस्टेरोन? अमेरिकी सेना शुरू करेगी अपने जवानों की स्क्रीनिंग</title>
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        <description><![CDATA[ Testosterone Screening After 30 : अच्छी फिटनेस, शरीर की ताकत और बेहतर फिजिकल प्रफोर्मेंस की बात आती है तो टेस्टोस्टेरोन हार्मोन का नाम अक्सर सामने आता है. लेकिन इसका स्तर बढ़ जाने से कोई व्यक्ति अपने आप ज्यादा ताकतवर या बेहतर परफॉर्मेंस करने लगे, ऐसा जरूरी नहीं है. विशेषज्ञों के अनुसार शरीर की क्षमता सिर्फ टेस्टोस्टेरोन पर नहीं, बल्कि सही खानपान, नियमित एक्सरसाइज, जेनेटिक और ऑवर ऑल हेल्थ जैसे कई अन्य कारकों पर भी निर्भर करती है. &amp;nbsp;
इसी बीच अमेरिका ने अपने सैनिकों की सेहत और सैन्य तैयारी को ध्यान में रखते हुए एक बड़ा फैसला लिया है. अब 30 साल या उससे ज्यादा उम्र के सैनिकों की हर साल टेस्टोस्टेरोन जांच की जाएगी. इस फैसले के बाद टेस्टोस्टेरोन का रोल, इसकी कमी और इससे जुड़े इलाज को लेकर चर्चा तेज हो गई है. ऐसे में आइए जानते हैं कि अमेरिकी सेना अपने जवानों की स्क्रीनिंग कैसे शुरू करेगी.&amp;nbsp;
30 साल से ज्यादा उम्र के जवानों की होगी हर साल स्क्रीनिंग
अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने घोषणा की है कि अब 30 साल या उससे ज्यादा उम्र के सभी सैन्य कर्मियों की सालाना स्वास्थ्य जांच में टेस्टोस्टेरोन टेस्ट भी शामिल किया जाएगा. वहीं 30 साल से कम उम्र के सैनिक भी चाहें तो अपनी इच्छा से यह जांच करा सकेंगे. जिन जवानों में टेस्टोस्टेरोन का स्तर कम पाया जाएगा, उन्हें टेस्टोस्टेरोन रिप्लेसमेंट थेरेपी (TRT) लेने या न लेने का ऑप्शन दिया जाएगा.
क्यों लिया गया यह फैसला?
पेंटागन के मुताबिक इस पहल का मकसद हार्मोन की कमी का समय रहते पता लगाना, जवानों की लंबी अवधि की सेहत को बेहतर बनाए रखना और यह तय करना है कि वे फिजिकल और मानसिक रूप से सेवा के लिए पूरी तरह फिट रहें. रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने साफ किया है कि इस योजना का उद्देश्य किसी की क्षमता बढ़ाना नहीं, बल्कि जिन लोगों में सच में हार्मोन की कमी है, उनके टेस्टोस्टेरोन स्तर को सामान्य सीमा तक वापस लाना है.
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क्या सभी लोगों की नियमित स्क्रीनिंग जरूरी है?
अमेरिकी सेना की इस नई योजना का उद्देश्य हार्मोन की कमी वाले लोगों की पहचान करना है. हालांकि डॉक्टरों का कहना है कि केवल उम्र के आधार पर सभी लोगों की नियमित जांच जरूरी नहीं मानी जा सकती है. विशेषज्ञों के अनुसार उम्र बढ़ने के साथ टेस्टोस्टेरोन का लेवल स्वाभाविक रूप से कम हो सकता है. ऐसे में किसी व्यक्ति में हार्मोन की कमी का पता केवल एक ब्लड टेस्ट से नहीं लगाया जा सकता, बल्कि इसके लिए पूरी जांच और लक्षणों को चेक करना जरूरी होता है.
टेस्टोस्टेरोन थेरेपी कब लेनी चाहिए?
विशेषज्ञों का कहना है कि टेस्टोस्टेरोन रिप्लेसमेंट थेरेपी केवल उन्हीं लोगों को दी जानी चाहिए जिनमें मेडिकल जांच के बाद हार्मोन की कमी पाई जाए. इसे कभी भी ताकत बढ़ाने या एंटी-एजिंग उपाय के रूप में नहीं लेना चाहिए. यह इलाज केवल डॉक्टर की सलाह और नियमित निगरानी में ही किया जाना चाहिए. यह थेरेपी स्वस्थ लोगों का प्रफोर्मेंस बढ़ाने के लिए नहीं है. इसे जरूरत पड़ने पर ही दी जानी चाहिए.
बिना सलाह टेस्टोस्टेरोन लेना क्यों हो सकता है खतरनाक?
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि बिना डॉक्टर की सलाह टेस्टोस्टेरोन लेना शरीर के लिए नुकसानदायक हो सकता है. इसका गलत इस्तेमाल शरीर में प्राकृतिक हार्मोन बनने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है. इसके अलावा मुंहासे, बांझपन, रेड बल्ड सेल्स की संख्या बढ़ना, स्लीप एपनिया, पुरुषों में प्रोस्टेट से जुड़ी समस्याएं और कुछ लोगों में हार्ट संबंधी समस्याएं भी हो सकती हैं. वहीं महिलाओं में जरूरत से ज्यादा टेस्टोस्टेरोन लेने पर मुंहासे, चेहरे और शरीर पर ज्यादा बाल आना, आवाज भारी होना, पीरियड्स में गड़बड़ी और पुरुषों जैसे फिजिकल बदलाव हो सकते हैं.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ें - Cancer Treatment: क्या पपीते की पत्तियों से हो सकता है कैंसर का इलाज? नई रिसर्च पर छिड़ी बहस
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 21 Jul 2026 23:30:05 +0530</pubDate>
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        <title>Excessive Screen Time: मोबाइल की लत बना रही है &amp;apos;Smartphone Brain&amp;apos; का शिकार! युवाओं में बढ़ रहे ये लक्षण</title>
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        <description><![CDATA[ What Is Text Neck Syndrome Symptoms: कुछ साल पहले तक न्यूरोलॉजिस्ट के पास जाने का मतलब स्ट्रोक, पार्किंसन, मिर्गी या डिमेंशिया जैसी गंभीर बीमारियों से जुड़ा माना जाता था. ऐसे मरीजों में ज्यादातर बुजुर्ग होते थे और याददाश्त कमजोर होना या चलने-फिरने में परेशानी जैसी शिकायतें आम थीं. लेकिन अब यह तस्वीर तेजी से बदल रही है. आजकल न्यूरोलॉजिस्ट के पास बड़ी संख्या में युवा और किशोर ऐसे लक्षणों के साथ पहुंच रहे हैं, जिनका संबंध लंबे समय तक स्मार्टफोन इस्तेमाल करने की आदत से जोड़ा जा रहा है. बार-बार सिरदर्द होना, ध्यान न लगना, नींद खराब होना, चक्कर आना, दिमाग में धुंधलापन महसूस होना और छोटी-छोटी बातें भूल जाना जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं.
काम, पढ़ाई और लोगों से जुड़ने का तरीका बदला
सीके बिड़ला हॉस्पिटल्स, सीएमआरआई के न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. दीप दास के मुताबिक, मोबाइल फोन ने काम करने, पढ़ाई करने और लोगों से जुड़ने का तरीका बदल दिया है, लेकिन इसका जरूरत से ज्यादा और बिना कंट्रोल के इस्तेमाल ध्यान लगाने की क्षमता, नींद, मूड और दिमाग की कार्यक्षमता पर असर डाल सकता है.एक्सपर्ट लगातार नोटिफिकेशन आना, बिना रुके सोशल मीडिया स्क्रॉल करना और एक ऐप से दूसरे ऐप पर जाना दिमाग को हर समय सक्रिय बनाए रखता है. धीरे-धीरे दिमाग को लगातार नए उत्तेजना की आदत पड़ जाती है और फिर किसी एक काम पर लंबे समय तक ध्यान लगाना मुश्किल होने लगता है. यही वजह है कि कई युवा अब किताब पढ़ने, मीटिंग में बैठने या पढ़ाई करने के दौरान भी बार-बार फोन देखने लगते हैं.
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इन चीजों पर होता असर?
डॉक्टरों के अनुसार, स्मार्टफोन का असर सिर्फ ध्यान पर ही नहीं पड़ता, बल्कि नींद और याददाश्त पर भी दिखाई देता है. रात में देर तक फोन चलाने से आंखें ब्लू लाइट के संपर्क में रहती हैं, जिससे मेलाटोनिन हार्मोन का उत्पादन कम हो जाता है. यही हार्मोन शरीर के सोने और जागने के चक्र को नियंत्रित करता है. जब नींद पूरी नहीं होती, तो एकाग्रता और याददाश्त प्रभावित होती है. इसके साथ ही चिंता, अवसाद और लंबे समय तक रहने वाले सिरदर्द की समस्या भी बढ़ सकती है.
क्या होते हैं इसके लक्षण?
लंबे समय तक गर्दन झुकाकर मोबाइल देखने से गर्दन और कंधों की मांसपेशियों पर भी दबाव पड़ता है. इससे टेंशन हेडेक और माइग्रेन की समस्या बढ़ सकती है. इस स्थिति को &#039;टेक्स्ट नेक&#039; कहा जाता है. इसके अलावा लगातार स्क्रीन देखने से डिजिटल थकान भी होने लगती है, जिससे व्यक्ति मानसिक रूप से थका हुआ, चिड़चिड़ा और काम में रुचि न लेने वाला महसूस कर सकता है. कई लोगों को लंबे समय तक स्क्रीन इस्तेमाल करने के बाद नई जानकारी समझने और याद रखने में भी परेशानी होने लगती है.
डॉक्टरों का कहना है कि बच्चों और किशोरों पर इसका असर ज्यादा हो सकता है, क्योंकि उनका दिमाग अभी पूरी तरह विकसित नहीं हुआ होता. जरूरत से ज्यादा स्क्रीन टाइम उनकी पढ़ाई, नींद, शारीरिक गतिविधियों और सामाजिक व्यवहार को प्रभावित कर सकता है.&amp;nbsp;
क्या होते हैं इससे बचाव के तरीके?
एक्सपर्ट यह भी स्पष्ट करते हैं कि समस्या स्मार्टफोन नहीं, बल्कि उसका गलत इस्तेमाल है. वे 20-20-20 नियम अपनाने की सलाह देते हैं। यानी हर 20 मिनट बाद 20 सेकंड के लिए करीब 20 फीट दूर किसी चीज को देखें. इसके अलावा स्क्रीन से नियमित ब्रेक लें, सोने से कम से कम एक घंटे पहले फोन का इस्तेमाल बंद करें, सही तरीके से &amp;nbsp;बैठें, नियमित व्यायाम करें और रोज कुछ समय खुली हवा में बिताएं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 21 Jul 2026 23:30:04 +0530</pubDate>
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        <title>Joint Pain in Rain:  क्या बारिश में बढ़ जाता है जोड़ों और पुरानी चोट का दर्द? डॉक्टर ने बताया सच</title>
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        <description><![CDATA[ Joint Pain in Rain:&amp;nbsp; अगर आपको भी बारिश के मौसम में या मौसम ठंडा होते ही अपने जोड़ों या पुरानी चोट में दर्द महसूस होता है, तो आप अकेले नहीं हैं. बहुत से लोगों को शिकायत होती है कि जैसे ही बारिश शुरू होती है या मौसम बदलता है, उनके जोड़ों का दर्द या पुरानी चोट का दर्द फिर से उभर आता है. खासकर वे लोग जिन्हें अर्थराइटिस, फाइब्रोमायल्जिया, नर्व पेन, हाल ही में हुई सूजन या सर्जरी के बाद का दर्द है, उन्हें यह समस्या ज्यादा होती है. आखिर ऐसा क्यों होता है? इस सवाल का जवाब एनेस्थीसियोलॉजिस्ट और पेन मेडिसिन डॉक्टर कुनाल सूद ने अपने इंस्टाग्राम वीडियो में दिया है, बता दें कि डॉक्टर कुनाल सूद, MD, एनेस्थीसियोलॉजी और इंटरवेंशनल पेन मेडिसिन में डबल बोर्ड-सर्टिफाइड फिजिशियन हैं और उन्होंने वेन स्टेट यूनिवर्सिटी, डेट्रॉइट से अपनी रेजिडेंसी और फेलोशिप पूरी की है.&amp;nbsp;
बारिश और दर्द का क्या कनेक्शन है?
डॉक्टर सूद के मुताबिक, इसका मुख्य कारण है शरीर के अंदर बैरोमेट्रिक प्रेशर के दबाव में होने वाला बदलाव और ठंडा तापमान. जब बारिश आने वाली होती है, तो हवा का दबाव धीरे-धीरे बदलता है. इसके अलावा ठंडा मौसम शरीर के उन हिस्सों में खून का बहाव कम कर देता है, जिससे मांसपेशियां, टेंडन और टिशू अकड़े हुए और भारी महसूस होते हैं. डॉक्टर सूद बताते हैं कि किसी चोट, सर्जरी या सूजन वाली बीमारी के बाद वह हिस्सा पहले से ज्यादा कमजोर हो जाता है, और मौसम में आया यह छोटा सा बदलाव भी उस हिस्से को असर करने लगता है.&amp;nbsp;
ऐसे में बहुत से लोग यह सोचकर डर जाते हैं कि बारिश में दर्द बढ़ने का मतलब है कि अंदर कुछ नया नुकसान हो गया है.&amp;nbsp; लेकिन डॉक्टर सूद इस बात को साफ करते हैं कि ऐसा जरूरी नहीं है. उनका कहना है कि दर्द महसूस करने वाला सिस्टम पहले से कहीं ज्यादा संवेदनशील हो चुका होता है, इसलिए वह उन बदलावों को भी महसूस करने लगता है जिन्हें शरीर पहले नजरअंदाज कर देता था. यही वजह है कि कुछ लोगों को बारिश आने से पहले या बारिश के दौरान दर्द का एहसास होता है.&amp;nbsp;



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डॉक्टर की सलाह और सावधानी
अगर आपको भी अर्थराइटिस, फाइब्रोमायल्जिया, नर्व पेन, पुरानी सूजन या सर्जरी के बाद की तकलीफ है, तो मौसम बदलने पर हल्का दर्द या अकड़न होना सामान्य है.&amp;nbsp; फिर भी अगर दर्द बहुत ज्यादा बढ़ जाए या रोजमर्रा के काम में दिक्कत आने लगे, तो डॉक्टर से सलाह जरूर लें.&amp;nbsp;&amp;nbsp;
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        <pubDate>Mon, 20 Jul 2026 19:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>International Chess Day: क्या Chess खेलने से सच में बच्चों का दिमाग तेज होता है? जानिए डॉक्टर क्या कहते हैं</title>
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        <description><![CDATA[ International Chess Day 2026: हर साल 20 जुलाई को International Chess Day मनाया जाता है. शतरंज यानी Chess ऐसा खेल है, जिसमें दिमाग का खूब इस्तेमाल होता है. इसलिए कई लोग मानते हैं कि Chess खेलने से बच्चों का दिमाग तेज होता है. कई माता-पिता भी चाहते हैं कि उनका बच्चा Chess खेले, ताकि उसकी सोचने और समझने की क्षमता बेहतर हो सके. लेकिन क्या सिर्फ Chess खेलने से ही दिमाग तेज हो जाता है? आइए जानते हैं डॉक्टर इस बारे में क्या कहते हैं.
सोचने की आदत होती है बेहतर
डॉक्टरों का कहना है कि Chess खेलते समय बच्चों को हर चाल सोच-समझकर चलनी पड़ती है. उन्हें यह भी सोचना होता है कि सामने वाला खिलाड़ी अगली चाल क्या चल सकता है. इससे बच्चे जल्दबाजी में फैसला लेने की बजाय पहले सोचते हैं. धीरे-धीरे उनमें सही समय पर सही फैसला लेने की आदत बन सकती है.
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ध्यान लगाने में मिल सकती है मदद
Chess खेलते समय बच्चों का पूरा ध्यान खेल पर रहता है. अगर उनका ध्यान कुछ देर के लिए भी हट जाए, तो वे खेल हार सकते हैं. इसलिए यह खेल बच्चों की एकाग्रता बढ़ाने में मदद कर सकता है. डॉक्टरों का कहना है कि इसका फायदा पढ़ाई और दूसरी जरूरी चीजों में भी मिल सकता है.
याद रखने की ताकत बढ़ सकती है
Chess खेलते समय बच्चों को कई चालें, नियम और अलग-अलग तरीके याद रखने पड़ते हैं. इससे उनका दिमाग लगातार काम करता रहता है. डॉक्टरों के अनुसार, इससे याद रखने की क्षमता बेहतर हो सकती है. साथ ही बच्चे नई चीजें सीखने में भी रुचि दिखा सकते हैं.
धैर्य रखना भी सीखते हैं
Chess ऐसा खेल नहीं है, जिसे जल्दबाजी में खेला जाए. इसमें हर चाल सोचकर चलनी पड़ती है. कई बार जीतने के लिए लंबे समय तक इंतजार भी करना पड़ता है. इससे बच्चे धैर्य रखना सीखते हैं. साथ ही वे हर स्थिति को समझकर फैसला लेने की आदत भी बना सकते हैं.
हार और जीत दोनों से सीख मिलती है
Chess में हर बार जीत मिलना जरूरी नहीं होता. कई बार हार भी मिलती है. लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि हार से बच्चे अपनी गलतियों को समझना सीखते हैं. इससे वे अगली बार बेहतर खेलने की कोशिश करते हैं. यह आदत आगे चलकर पढ़ाई और जिंदगी के दूसरे कामों में भी काम आ सकती है.
सिर्फ Chess से नहीं होगा पूरा फायदा.
डॉक्टरों का कहना है कि सिर्फ Chess खेलने से ही बच्चे का दिमाग तेज नहीं हो जाता. इसके लिए अच्छी नींद, सही खाना, रोज थोड़ा खेलना-कूदना और पढ़ाई भी जरूरी है. जब ये सभी चीजें साथ होती हैं, तब बच्चे का दिमाग अच्छी तरह विकसित होता है. इसलिए Chess के साथ-साथ बच्चे की रोज की अच्छी आदतों पर भी ध्यान देना जरूरी है.
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        <pubDate>Mon, 20 Jul 2026 19:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>Kissing Health Risks: गर्लफ्रेंड को किस करने से पहले पढ़ें यह जरूरी खबर, वरना एक भूल से हो सकते हैं बीमार</title>
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        <description><![CDATA[ Can Kissing Spread Diseases: किस करना प्यार जताने का एक सामान्य तरीका माना जाता है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि होंठों पर किया गया एक किस कुछ बीमारियों का कारण भी बन सकता है? दरअसल, किस के दौरान सिर्फ इमोशन ही नहीं, बल्कि लार का भी आदान-प्रदान होता है. इसी लार में मौजूद कुछ बैक्टीरिया और वायरस एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुंच सकते हैं. हालांकि हर किस नुकसानदायक नहीं होता, लेकिन कुछ परिस्थितियों में इससे इंफेक्शन फैलने का खतरा बढ़ सकता है.
किस करते समय क्या हो सकती है दिक्कत?
हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली वेबसाइट hawaiifamilydental के अनुसार, गहरे या फ्रेंच किस के दौरान दोनों लोगों के बीच लार का आदान-प्रदान होता है. लार में पानी, एंजाइम, इलेक्ट्रोलाइट्स और प्रोटीन के अलावा कई तरह के बैक्टीरिया और वायरस भी मौजूद होते हैं. माइक्रोबायोम जर्नल में प्रकाशित एक स्टडी के अनुसार, एक बार किस करने पर करीब 8 करोड़ (80 मिलियन) बैक्टीरिया एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुंच सकते हैं. इनमें से अधिकांश बैक्टीरिया नुकसान नहीं पहुंचाते, लेकिन अगर किसी व्यक्ति की इम्यून सिस्टम कमजोर हो, तो कुछ बैक्टीरिया इंफेक्शन का कारण बन सकते हैं.
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कौन सी बीमारी सबसे पहले फैलती है?
एक्सपर्ट के मुताबिक, किस के जरिए सबसे पहले सामान्य सर्दी-जुकाम फैलाने वाले वायरस एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुंच सकते हैं. अगर आपका पार्टनर सर्दी या जुकाम से पीड़ित है, तो इंफेक्शन का खतरा बढ़ जाता है. इसके अलावा मोनोन्यूक्लिओसिस, जिसे &#039;किसिंग डिजीज&#039; भी कहा जाता है, एप्सटीन-बार वायरस के कारण होती है और यह भी लार के जरिए फैल सकती है. इस बीमारी में थकान, बुखार और गर्दन की लसीका ग्लैंड्स में सूजन जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं.
इन बीमारियों का भी खतरा
इसके अलावा हर्पीज सिम्प्लेक्स वायरस-1 भी किस के जरिए फैल सकता है. खास बात यह है कि कई बार मुंह पर छाले दिखाई न देने पर भी यह वायरस लार के माध्यम से दूसरे व्यक्ति तक पहुंच सकता है. वहीं अगर किसी व्यक्ति को फ्लू है, तो किस करने के दौरान सांस की बूंदों के जरिए इंफ्लूएंजा वायरस फैलने की आशंका भी रहती है. मसूड़ों की बीमारी से जुड़े कुछ बैक्टीरिया भी लार के जरिए एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुंच सकते हैं, जिससे आगे चलकर मुंह से जुड़ी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है.
कब रहता है खतरा ज्यादा?
कुछ परिस्थितियां इंफेक्शन का खतरा और बढ़ा देती हैं. यदि आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर है, पार्टनर पहले से किसी इंफेक्शन से पीड़ित है, मुंह में कट या छाले हैं या ओरल हाइजीन ठीक नहीं है, तो इंफेक्शन होने की संभावना अधिक हो सकती है. हालांकि किस के सिर्फ नुकसान ही नहीं हैं.
कैसे रखें खुद को सुरक्षित?
अगर आप इंफेक्शन के खतरे को कम करना चाहते हैं, तो सबसे पहले मुंह की अच्छी सफाई का ध्यान रखें. नियमित रूप से ब्रश करें, फ्लॉस का इस्तेमाल करें और समय-समय पर डेंटल चेकअप कराएं. यदि आप या आपका पार्टनर बीमार है, तो पूरी तरह ठीक होने तक किस करने से बचें. मुंह पर कोल्ड सोर होने की स्थिति में भी नजदीकी संपर्क से बचना चाहिए.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 20 Jul 2026 19:30:05 +0530</pubDate>
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        <title>Sonam Wangchuk Health Update: एक साथ कितना वजन घटने पर मौत होनी तय? समझ लीजिए अपनी बॉडी का हेल्थ मैनेजमेंट</title>
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        <description><![CDATA[ Causes Of Sudden Unexplained Weight Loss: अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक का वजन लगातार घट रहा है. शुक्रवार (17 जुलाई) को उनकी भूख हड़ताल का 20वां दिन था, जिसके बाद उन्हें जंतर-मंतर से उठाकर सफदरजंग अस्पताल में एडमिट करा दिया गया. 28 जून से दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे प्रदर्शन के दौरान उन्होंने अन्न त्याग रखा है. डॉक्टरों के मुताबिक, पिछले 24 घंटे में उनका वजन 350 ग्राम और कम हुआ है. अब उनका वजन 56.55 किलोग्राम रह गया है. यानी अब तक उनका कुल वजन करीब 9.5 किलोग्राम कम हो चुका है.
मेडिकल टीम की ओर से जारी हेल्थ रिपोर्ट के अनुसार, वांगचुक का ब्लड प्रेशर 108/68 mm Hg, ब्लड शुगर 80 mg/dL, पल्स रेट 72 प्रति मिनट और ऑक्सीजन सैचुरेशन 96 प्रतिशत दर्ज किया गया. डॉक्टरों ने बताया कि उनमें हल्के डिहाइड्रेशन के लक्षण हैं, हालांकि उनकी मेंटल स्थिति सामान्य और सतर्क बनी हुई है. आइए जानते हैं कि एक साथ कितना वजन घटने पर मौत होनी तय है?&amp;nbsp;
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लंबे समय तक भूखे रहने पर शरीर में क्या होता है?
बीबीसी साइंस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, आखिरी बार खाना खाने के एक-दो दिन बाद शरीर में लिवर और मसल्स में जमा ग्लाइकोजन लगभग खत्म हो जाता है. इसके बाद शरीर एनर्जी के लिए जमा फैट को तोड़कर केटोन बनाने लगता है. हालांकि ब्रेन और रेड ब्लड सेल्स केवल केटोन से काम नहीं चला सकतीं. इन्हें ग्लूकोज की जरूरत होती है, जिसके लिए शरीर मांसपेशियों को तोड़ना शुरू कर देता है. यही वजह है कि लंबे समय तक भोजन न मिलने पर केवल फैट ही नहीं, बल्कि शरीर की जरूरी मांसपेशियां भी कमजोर होने लगती हैं. इनमें हार्ट की मांसपेशियां भी शामिल हैं. यदि ये अत्यधिक कमजोर हो जाएं तो हार्ट काम करना बंद कर सकता है और यह स्थिति जानलेवा बन सकती है.
कितना वजन घटना जानलेवा माना जाता है?
डॉक्टरों के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति का कुल वजन 40 से 50 प्रतिशत तक कम हो जाए तो यह जिंदगी के लिए गंभीर खतरा माना जाता है, चाहे शुरुआत में उसका वजन कितना भी रहा हो. पूरी तरह भोजन बंद होने की स्थिति में आमतौर पर 8 से 12 सप्ताह के भीतर मौत का खतरा पैदा हो सकता है. हालांकि यदि शरीर को थोड़ी-बहुत कैलोरी और पर्याप्त प्रोटीन मिलता रहे तो व्यक्ति अपेक्षाकृत अधिक समय तक जीवित रह सकता है, क्योंकि शरीर एनर्जी के लिए फैट का उपयोग करता रहता है.
तेजी से वजन घटना भी बढ़ा सकता है मौत का खतरा
हाल ही में बीएमजी जर्नल हार्ट में पब्लिश एंग्लिया रस्किन यूनिवर्सिटी के एक स्टडी में यह भी सामने आया कि मोटापे और हार्ट रोग से जूझ रहे लोगों में वजन का बहुत तेजी से घटना या बढ़ना, दोनों ही मौत के खतरे को बढ़ा सकते हैं. करीब 8,297 लोगों पर लगभग 14 साल तक किए गए इस अध्ययन में पाया गया कि जिन लोगों का वजन 10 किलोग्राम से ज्यादा बढ़ा, उनमें हार्ट संबंधी मौत का खतरा तीन गुना तक बढ़ गया. वहीं जिन लोगों का वजन 10 किलोग्राम से अधिक घटा, उनमें किसी भी कारण से मौत का जोखिम 54 प्रतिशत ज्यादा पाया गया.
डॉक्टर क्या सलाह देते हैं?
अध्ययन से जुड़े एंग्लिया रस्किन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर बारबरा पियर्सियोनेक, डॉ. रुडोल्फ शुट्टे और डॉ. जुफेन झांग का कहना है कि खासकर हार्ट रोग से पीड़ित मोटापे के मरीजों के लिए शरीर का वजन स्थिर बनाए रखना बेहद जरूरी है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 18 Jul 2026 23:30:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>World Emoji Day 2026: चैटिंग में दिन&amp;रात इमोजी का इस्तेमाल, क्या &amp;apos;इमोजी चैटिंग&amp;apos; से बढ़ रही स्ट्रेस?</title>
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        <description><![CDATA[ World Emoji Day 2026: आज के डिजिटल दौर के हर चैट बॉक्स में इमोजी का इस्तेमाल बेहद बढ़ गया है. दुख, दर्द, गुस्सा, मजाक, प्यार, धन्यवाद और हर तरह के भावना के लिए अलग अलग इमोजी मौजूद हैं. जो लोग अपनी बाद शब्दों के माध्यम से समझा नहीं पाते, वह इमोजी भेजते हैं. असल में कई बार ये इमोजी किसी लंबे मैसेज से ज्यादा प्रभावशाली भावनाएं व्यक्त करते हैं. जैसे-जैसे बातचीत में इन इमोजी का इस्तेमाल बढ़ रहा है, वैसे-वैसे &#039;इमोजी स्ट्रेस&#039; भी बढ़ती जा रही है, जो आगे चलकर मानसिक तनाव का कारण बन रही है.&amp;nbsp;
विशेषज्ञों का मानना है कि इमोजी खुद तनाव की वजह नहीं हैं, लेकिन इनका जरूरत से ज्यादा इस्तोमाल कई बार गलतफहमी, जवाब मिलने की चिंता और भावनात्मक दबाव बढ़ा सकती है. ऐसे में यह समझना जरूरी है कि इमोजी का इस्तेमाल कब और कितना करना सही है. आज 17 जुलाई को विश्व इमोजी दिवस (World Emoji Day) पर आइए जानते हैं &#039;इमोजी स्ट्रेस&#039; के बारे में...
बॉडी लैंग्वेज से डिजिटल बॉडी लैंवेज तक का सफर
नई पीढ़ी बातचीत में इमोजी को डिजिटल बॉडी लैंगवेज की तरह देखते हैं. चेहरे के हावभाव और आमने-सामने की बातचीत की जगह जेन जी के लिए डिजिटल बॉडी लैंग्वेज बेहद ज़रूरी है. शब्दों में टोन और चेहरे के हाव-भाव जोड़ने के लिए वे इमोजी का इस्तेमाल करते हैं. बिना इमोजी बातचीत का टेक्स्ट उन्हें रूखा या गुस्से वाला लगता है.&amp;nbsp;&amp;nbsp;
हर व्यक्ति के लिए एक जैसा नहीं होता इमोजी&amp;nbsp;
एक ही इमोजी को अलग-अलग लोग अलग तरीके से समझ सकते हैं. उदाहरण के लिए, किसी के लिए ???? सामान्य मुस्कान हो सकती है, जबकि दूसरा व्यक्ति इसे औपचारिक या ठंडा जवाब मान सकता है. इस तरह कभी-कभी लोग अपनी उदासी या परेशानी को छुपाने के लिए हैप्पी इमोजी (????, ????) भेजते हैं. ऐसी सूरत से मानसिक तनाव बढ़ सकता है. वहीं, बिना शब्दों के केवल इमोजी जैसे- ???? से चैट करने से बातचीत में गहराई कम हो जाती है. इससे यह अहसास हो सकता है कि बातचीत सिर्फ एकतरफा हो गई है, जिससे व्यक्ति अकेलापन महसूस करता है.
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शब्दों की जगह सिर्फ इमोजी पर निर्भर रहना सही नहीं
इमोजी भावनाओं को बेहतर तरीके से व्यक्त करने में मदद करते हैं, लेकिन हर बात केवल इमोजी से कहना हमेशा पर्याप्त नहीं होता. जरूरी बातचीत में साफ शब्दों का इस्तेमाल गलतफहमियों की संभावना कम कर सकता है.&amp;nbsp;सोचिए अगर दिनरात की बातचीत सिर्फ चैट और इमोजी तक सीमित हो जाए, तो आमने-सामने संवाद कम हो सकता है. इसलिए एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि &amp;nbsp;समय-समय पर परिवार और दोस्तों से सीधे बातचीत करें, क्योंकि इससे भावनाएं बेहतर तरीके से व्यक्त हो पाती हैं.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Fri, 17 Jul 2026 19:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Sonam Wangchuk Hunger Strike: लंबे वक्त तक भूख हड़ताल से कौन&amp;से अंग सबसे पहले होते हैं खराब, कब फेल होने लगता है सिस्टम?</title>
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        <description><![CDATA[ लद्दाख के पर्यावरण को बचाने और उसे छठी अनुसूची का दर्जा दिलाने के लिए मशहूर पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक कई बार लंबी भूख हड़ताल कर चुके हैं. शून्य से भी नीचे के तापमान में, खुले आसमान के नीचे 21 दिन तक सिर्फ पानी और नमक के सहारे जिंदा रहना आसान नहीं है. क्या आपने कभी सोचा है कि जब कोई इंसान हफ्तों तक अन्न का एक भी दाना नहीं खाता तो उसके शरीर के अंदर क्या चल रहा होता है? आइए समझते हैं कि भूख हड़ताल के दौरान शरीर का सिस्टम कैसे काम करता है? कौन-सा अंग सबसे पहले जवाब देता है और मेडिकल साइंस ऐसे लोगों की जान कैसे बचाता है?
शरीर का अपना &#039;बैकअप सिस्टम&#039;
जब आप खाना बंद करते हैं तो शरीर घबराता नहीं है. पहले 24 से 48 घंटे तक शरीर अपने लिवर और मांसपेशियों में जमा ग्लूकोज का इस्तेमाल एनर्जी के लिए करता है. जब यह खत्म हो जाता है तो शरीर केटोसिस नामक प्रोसेस में चला जाता है. इसमें शरीर एनर्जी के लिए अपने जमा फैट को जलाना शुरू कर देता है. इस दौरान बहुत तेज भूख लगती है. कमजोरी महसूस होती है और सिरदर्द होता है. वांगचुक जैसे सत्याग्रही इसी शुरुआती और सबसे मुश्किल तकलीफ को अपने मजबूत इरादों से हराते हैं.
जब खुद को ही &#039;खाने&#039; लगता है शरीर
लगभग एक हफ्ते बाद शरीर की सारी चर्बी पिघलकर खत्म होने लगती है. अब जिंदा रहने के लिए शरीर के पास कोई विकल्प नहीं बचता, इसलिए वह अपनी ही मांसपेशियों को तोड़कर एनर्जी बनाने लगता है. इसे स्टार्वेशन मोड कहते हैं. इंसान का वजन तेजी से गिरने लगता है. हड्डियां दिखने लगती हैं और उठने-बैठने में भी आंखों के सामने अंधेरा छाने लगता है. ब्लड प्रेशर और पल्स रेट खतरनाक स्तर तक नीचे गिर जाते हैं.
सबसे पहले कौन-सा अंग करता है काम करना बंद?
यहीं वह पड़ाव है, जहां शरीर अंदर से टूटने लगता है. भूख हड़ताल में सबसे पहला और सबसे घातक प्रहार किडनी और हार्ट पर होता है.

किडनी का फेल होना: जब शरीर अपनी ही मांसपेशियों को तोड़ता है तो खून में जहरीले तत्व बढ़ने लगते हैं. इन्हें छानकर बाहर निकालने का काम किडनी का होता है. भोजन न मिलने से शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स (पोटैशियम, सोडियम) का संतुलन बिगड़ जाता है. पानी के अलावा कोई पोषक तत्व न मिलने के कारण किडनी पर इन जहर को साफ करने का काफी ज्यादा प्रेशर पड़ता है और वह सबसे पहले काम करना बंद करने लगती है. इसे एक्यूट किडनी इंजरी कहा जाता है.
हार्ट पर मंडराता खतरा: शरीर में पोटैशियम और मैग्नीशियम कम होते ही दिल की धड़कनें अनियमित हो जाती हैं. हार्ट के लिए खून पंप करना मुश्किल हो जाता है. लंबी भूख हड़ताल में हार्ट अटैक से मौत का खतरा सबसे ज्यादा रहता है.

कब पूरी तरह फेल हो जाता है सिस्टम?
मेडिकल साइंस के अनुसार, 3 हफ्ते बाद शरीर का पूरा सिस्टम शटडाउन की तरफ बढ़ने लगता है. यही वजह है कि सोनम वांगचुक ने अक्सर अपने अनशन की सीमा 21 दिन ही रखी है, क्योंकि इसके बाद मौत का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है.
आखिरी स्टेज में कैसे बचती है जान?
जब कोई व्यक्ति 21 दिन या उससे ज्यादा लंबी भूख हड़ताल तोड़ता है तो जान बचाना बहुत नाजुक प्रक्रिया होती है. उसे तुरंत रोटी या चावल नहीं दिया जा सकता. अगर भूखे इंसान को अचानक भारी खाना खिला दिया जाए तो शरीर उसे बर्दाश्त नहीं कर पाता. इस स्थिति को रीफीडिंग सिंड्रोम कहते हैं, जिससे हार्ट फेल हो सकता है और तुरंत मौत हो सकती है.
जान बचाने का मेडिकल तरीका

ड्रिप का सहारा: सबसे पहले नसों में ड्रिप के जरिए इलेक्ट्रोलाइट्स (पोटैशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम) और जरूरी विटामिन्स सीधे खून में पहुंचाए जाते हैं.
लिक्विड पदार्थ: मरीज को नींबू पानी, नारियल पानी या बहुत पतले जूस की कुछ-कुछ बूंदें या चम्मच से लिक्विड चीजें दी जाती हैं. आपने देखा होगा कि सोनम वांगचुक अपना अनशन हमेशा जूस पीकर ही तोड़ते हैं.
हफ्तों की निगरानी: लगातार अनशन से पाचन तंत्र पूरी तरह सिकुड़ जाता है. ऐसे में डॉक्टरों की निगरानी में मरीज को कई हफ्तों तक रहना पड़ता है और धीरे-धीरे सॉलिड फूड देकर उसे ठीक किया जाता है.

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        <pubDate>Fri, 17 Jul 2026 19:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>COVID&amp;19 Cases: आंध्र प्रदेश में कोरोना के 12 नए मामले आए सामने, 4 की मौत; स्वास्थ्य विभाग ने कहा&amp; घबराएं नहीं</title>
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        <description><![CDATA[ आंध्र प्रदेश में एक बार फिर कोविड-19 के मामले सामने आए हैं. 26 जून से 16 जुलाई के बीच राज्य के चार अलग-अलग जिलों में कोरोना के 12 नए मरीजों की पुष्टि हुई है. इस दौरान 4 मरीजों की जान भी गई है, लेकिन स्वास्थ्य विभाग ने स्पष्ट किया है कि आम जनता को घबराने की बिल्कुल जरूरत नहीं है.
मौत की मुख्य वजह पुरानी गंभीर बीमारियां
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग के सचिव वीरा पांडियन ने बताया कि जिन 4 मरीजों (कडप्पा के 3 और काकीनाडा के 1) की जान गई है, वे पहले से ही गंभीर बीमारियों से जूझ रहे थे. उन्हें हाई बीपी, शुगर और किडनी से जुड़ी पुरानी समस्याएं थीं.
कहां-कितने मरीज मिले?
26 जून से 15 जुलाई के बीच कुल 67 लोगों का कोविड टेस्ट किया गया, जिनमें से 12 लोग पॉजिटिव निकले. बता दें कि काकीनाडा के एक मरीज का टेस्ट तमिलनाडु के वेल्लोर में हुआ था.
किस जिले में कितने मिले मरीज?&amp;nbsp;

कडप्पा: 8 मरीज. यहां 26 जून को साल का पहला केस मिला था
गुंटूर: 2 मरीज
विशाखापट्टनम: 1 मरीज
काकीनाडा: 1 मरीज

राहत की बात यह है कि ये सभी मामले अलग-अलग जगहों से आए हैं. किसी भी एक इलाके में बहुत सारे मरीज एक साथ नहीं मिले हैं. इसका मतलब है कि फिलहाल कोविड का क्लस्टर नहीं बन रहा है.
मरीजों की मौजूदा स्थिति

होम आइसोलेशन: 3 मरीज
अस्पताल में भर्ती: 2 मरीज
डिस्चार्ज: 3 मरीज
कुल मौतें: 4

बता दें कि वायरस के वैरिएंट का पता लगाने के लिए 9 जुलाई को 5 सैंपल पुणे की नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (NIV) लैब भेजे गए हैं.
देश के बाकी राज्यों का क्या है हाल?
1 जुलाई से अब तक पूरे देश में कोरोना के कुल 339 मामले सामने आ चुके हैं. कुछ प्रमुख राज्यों की स्थिति इस तरह है.

केरल: 115 केस
कर्नाटक: 64 केस
महाराष्ट्र: 43 केस
तमिलनाडु: 39 केस
अंडमान-निकोबार: 18 केस
दिल्ली: 18 केस
राजस्थान: 12 केस

स्वास्थ्य मंत्री ने की यह अपील
आंध्र प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री सत्य कुमार यादव ने अपील की है कि सरकार पूरी स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है. सभी अस्पतालों, डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ को अलर्ट कर दिया गया है. लोग किसी भी तरह की दहशत में न आएं. बस जरूरी सावधानियां बरतें और स्वास्थ्य विभाग के दिशा-निर्देशों का पालन करें.
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        <pubDate>Fri, 17 Jul 2026 19:30:06 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Climate Change Sleep Loss: सावधान! बढ़ते तापमान ने उड़ाई इंसानों की नींद, साल में 56 घंटे कम सो रहे हैं लोग</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/climate-change-sleep-loss-सावधान-बढ़ते-तापमान-ने-उड़ाई-इंसानों-की-नींद-साल-में-56-घंटे-कम-सो-रहे-हैं-लोग</link>
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        <description><![CDATA[ Climate Change Impact On Sleep: क्लाइमेट चेंज अब सिर्फ मौसम तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसका असर लोगों की नींद पर भी साफ दिखाई देने लगा है. एक नए एनालिसिस के अनुसार, बढ़ते तापमान की वजह से दुनिया भर में लोग औसतन साल में 56 घंटे कम सो रहे हैं. सबसे ज्यादा असर उन इलाकों में देखा गया है, जहां रात का तापमान लगातार बढ़ रहा है. एक्सपर्ट का कहना है कि नींद की कमी हार्ट रोग, मेंटल हेल्थ, कमजोर इम्यूनिटी और कामकाज की क्षमता में गिरावट जैसी कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकती है.
1,338 प्रमुख शहरों को शामिल किया गया
क्लाइमेट सेंट्रल की ओर से किए गए इस एनालिसिस में दुनिया के 1,338 प्रमुख शहरों को शामिल किया गया. इसमें भारत के 107 शहरों का भी स्टडी किया गया. रिपोर्ट के मुताबिक, भारत उन देशों में शामिल है जहां क्लाइमेट चेंज के कारण लोगों की नींद पर सबसे ज्यादा असर पड़ा है. खासकर दक्षिण भारत के शहरों में रहने वाले लोग हर साल 78 से 91 घंटे तक की नींद गंवा रहे हैं, जिनमें से 8 से 9 घंटे की नींद सीधे जलवायु परिवर्तन के कारण कम हो रही है.&amp;nbsp;
कौन से शहर सबसे ज्यादा प्रभावित?
रिपोर्ट के अनुसार, तमिलनाडु इस मामले में सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य है. यहां हर व्यक्ति की नींद में क्लाइमेट चेंज के कारण हर साल औसतन 7.9 घंटे की अतिरिक्त कमी दर्ज की गई है. वहीं, देश के बड़े महानगरों में चेन्नई सबसे ज्यादा प्रभावित रहा, जहां लोग साल में करीब 93 घंटे कम सो रहे हैं. इसके बाद मुंबई में 84 घंटे और कोलकाता में 80 घंटे की नींद कम होने का अनुमान लगाया गया है.
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एक समय ठंडी रातों के लिए पहचाने जाने वाले बेंगलुरु और देहरादून जैसे शहर भी अब बढ़ते तापमान की चपेट में हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, 1970 के दशक में बेंगलुरु के लोग साल में लगभग 59 घंटे की नींद गंवाते थे, लेकिन 2025 तक यह आंकड़ा बढ़कर 67 घंटे हो गया. इनमें 8 घंटे की अतिरिक्त नींद की कमी सीधे जलवायु परिवर्तन से जुड़ी है, जो देश के प्रमुख महानगरों में सबसे अधिक है. वहीं, देहरादून में पिछले पांच वर्षों के दौरान नींद की कमी में करीब 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई.
महाराष्ट्र के 22 शहरों में रहने वाले लोग औसतन 76.3 घंटे की नींद हर साल खो रहे हैं, जिनमें से 5.8 घंटे क्लाइमेट चेंज की वजह से कम हो रहे हैं. वहीं, उत्तर प्रदेश के 11 शहरों में लोगों की सालाना नींद करीब 69 घंटे कम हो रही है और इसमें 4.9 घंटे की कमी सीधे बढ़ते तापमान से जुड़ी है.
कमी अब कम से कम दोगुनी&amp;nbsp;
रिपोर्ट बताती है कि 1970 के दशक की तुलना में तापमान बढ़ने के कारण होने वाली नींद की कमी अब कम से कम दोगुनी हो चुकी है. वर्ल्ड स्तर पर मध्य पूर्व के शहरों में इसका सबसे ज्यादा असर देखा गया, जबकि दक्षिण भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई हिस्से भी इस सूची में शामिल हैं. रिसर्चर का मानना है कि अगर रात के तापमान में इसी तरह बढ़ोतरी जारी रही, तो आने वाले वर्षों में नींद की समस्या और उससे जुड़ी स्वास्थ्य चुनौतियां और गंभीर हो सकती हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 17 Jul 2026 19:30:04 +0530</pubDate>
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        <title>Cervical Pain: ऑफिस हो या घर, ये छोटी&amp;छोटी लापरवाहियां बन सकती हैं सर्वाइकल की वजह</title>
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        <description><![CDATA[ Cervical Pain: आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी और तेजी से बदलती लाइफस्टाइल में सर्वाइकल एक आम बीमारी बन चुकी है. हर दूसरा व्यक्ति सर्वाइकल के दर्द से पीड़ित है. इसका दर्द इतना खतरनाक होता है कि एक सेकेंड भी सुकून से रहना भारी है. सर्वाइकल के दर्द को केवल वही लोग समझ सकते हैं जो इस बीमारी से पीड़ित हैं. इसका दर्द इतना खतरनाक होता है कि ना तो आप ढंग से बैठ पाते हैं और न ही अच्छे से लेट पाते हैं. इसलिए चाहें आप ऑफिस में हों या घर में, छोटी-छोटी लापरवाही की वजह से आप भी इसका शिकार हो सकते हैं.&amp;nbsp;
सर्वाइकल क्या होता है?
साधारण भाषा में सर्वाइकल का मतलब गर्दन और रीढ़ की हड्डी से जुड़ी समस्या से होता है. हमारी रीढ़ की हड्डी का ऊपरी हिस्सा, जिसमें 7 हड्डियां (C1 से C7) होती हैं, उसे सर्वाइकल स्पाइन कहा जाता है. जब इस हिस्से में दर्द, अकड़न, नस पर दबाव या डिस्क से जुड़ी समस्या होती है, तो लोग इसे सर्वाइकल की समस्या कहते हैं.
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सर्वाइकल कैसे होता है?
सर्वाइकल की समस्या तब होती है, जब गर्दन की रीढ़ की हड्डियों, डिस्क या नसों पर दबाव पड़ने लगता है. इसकी वजह से गर्दन में दर्द, अकड़न और कई बार कंधे व हाथ तक दर्द फैल सकता है, जिनसे व्यक्ति को बहुत दिक्कत होती है.
सर्वाइकल होने के मुख्य कारण:

ज्यादा देर तक लैपटॉप के सामने झुक कर काम करना.
ज्यादा देर तक गर्दन नीची करके फोन का इस्तेमाल करना.
एक ही पोजीशन में घंटो बैठे रहना.
भारी वजन उठाने से अचानक गर्दन पर जोर पड़ना.

सर्वाइकल का इलाज क्या है?
सर्वाइकल का इलाज इस बात पर निर्भर करता है कि समस्या कितनी ज्यादा है. अगर शुरुआत में ही ध्यान दिया जाए तो आराम मिलना संभव है, नहीं तो इस बीमारी में ऑपरेशन की संभावना आ जाती है. जानकारी के लिए बता दें की डॉक्टर की सलाह से दर्द और सूजन कम करने वाली दवा ली जा सकती है, साथ ही फिजियोथेरेपी कराने से गर्दन की मांसपेशियां मजबूत होती हैं और दर्द कम होता है.
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        <pubDate>Fri, 17 Jul 2026 19:30:03 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Dengue Outbreak in Mumbai: बारिश के साथ बढ़ा बीमारियों का खतरा! मुंबई में डेंगू&amp;स्वाइन फ्लू के मामले तेजी से बढ़े</title>
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        <description><![CDATA[ Dengue Outbreak in Mumbai: देश भर में मानसून ने अपना आगमन शुरू कर दिया है, लेकिन मुंबई में इसका असर कुछ ज्यादा ही देखने को मिल रहा है. मुंबई में लगातार धाराधार बारिश की खबरें सामने आती जा रही हैं. यह परेशानी अभी खत्म हुई नहीं थी कि अब नई परेशानी ने अपना आगमन दे दिया है.&amp;nbsp; वह है डेंगू, लेप्टोस्पायरोसिस और स्वाइन फ्लू जैसी बीमारियों का खतरा, जो फिर से बढ़ गया है.&amp;nbsp; इसका कारण साफ है कि शहर भर में भारी बारिश के कारण जगह-जगह पानी और गंदगी का इकट्ठा हो जाना. यही वजह है कि इन बीमारियों के मामले बढ़ने लगे हैं. ऐसे में यह जानना बहुत जरूरी है कि इन बीमारियों से खुद को और अपने परिवार को कैसे सुरक्षित रखा जाए. आइए जानते हैं इसके बारे में पूरी जानकारी.
मुंबई में क्यों बढ़ रहा है बीमारियों का खतरा?
मुंबई में पिछले कुछ दिनों से भारी बारिश हो रही है, जिसके कारण शहर के कई हिस्सों में जलजमाव हो गया है. रिपोर्ट के मुताबिक जमे हुए पानी में चलने से लोगों के बीच लेप्टोस्पायरोसिस होने का खतरा ज्यादा होता है, खासकर तब अगर उनके शरीर पर कट, घाव या मामूली खरोंच हो. यही वजह है कि हाल ही में BMC &amp;nbsp;(Brihanmumbai Municipal Corporation) ने चेतावनी देते हुए लोगों से अपील की है कि वे इन बीमारियों से खुद को बचाएं.
इस बात को गंभीरता से लेने के पीछे इसके बढ़ते आंकड़े हैं.&amp;nbsp; बता दें कि पिछले साल के आंकड़ों के अनुसार जुलाई के आखिरी हफ्तों में डेंगू के मामलों में करीब 58 प्रतिशत और लेप्टोस्पायरोसिस के मामलों में करीब 79 प्रतिशत तक की तेज बढ़ोतरी देखी गई थी. इस साल भी मानसून के दौरान ऐसे ही हालात बनने का खतरा बना हुआ है.
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BMC की तैयारी और सावधानी की सलाह
BMC ने लोगों को सतर्क रहने के साथ-साथ मानसून से पहले ही इस समस्या से निपटने के लिए बड़ा अभियान शुरू कर दिया था.&amp;nbsp; जिसमें निगम के कीटनाशक विभाग ने कुछ महीनों में शहर के अलग-अलग हिस्सों में हजारों बार दौरा किया और 30 लाख से ज्यादा घरों के आसपास फॉगिंग करवाई, ताकि मच्छरों के पैदा होने की जगहों को खत्म किया जा सके.
इसके बावजूद स्वास्थ्य विभाग ने लोगों से अपील की है कि जो लोग जमा हुए बारिश के पानी या कीचड़ से होकर गुजरे हैं, वे 24 से 72 घंटों के भीतर डॉक्टर की सलाह लें. साथ ही विभाग ने यह भी कहा कि मानसून के मौसम में बुखार को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. ऐसे में उन्हें घरेलू उपाय करने के बजाय तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Thu, 16 Jul 2026 15:30:16 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>AIIMS Delhi ने रचा इतिहास! 4 महीने के मासूम की दुनिया की सबसे दुर्लभ लंग सर्जरी सफल</title>
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        <description><![CDATA[ AIIMS दिल्ली के डॉक्टरों ने महज चार महीने के एक बच्चे की बेहद जटिल फेफड़ों की सर्जरी सफलतापूर्वक की. बच्चे में जन्म से पहले ही दोनों फेफड़ों से जुड़ी एक दुर्लभ बीमारी कंजेनिटल पल्मोनरी एयरवे मालफॉर्मेशन (CPAM) का पता चला था. डॉक्टरों ने पूरे फेफड़े का हिस्सा निकालने के बजाय सिर्फ खराब हिस्से को हटाया, जिससे बच्चे के स्वस्थ फेफड़े के हिस्से को बचाया जा सका. इस सर्जरी की खास बात यह रही कि ऑपरेशन के महज दो दिन बाद ही बच्चे को अस्पताल से छुट्टी भी दे दी गई.
AIIMS के मुताबिक, 4 महीने के इतने छोटे बच्चे में इस तरह की सेगमेंटेक्टॉमी (फेफड़े के सिर्फ प्रभावित हिस्से को हटाने की सर्जरी) दुनिया में सामने आए सबसे कम उम्र के और बेहद दुर्लभ मामलों में शामिल है.
क्या है CPAM बीमारी?
डॉक्टरों के मुताबिक, कंजेनिटल पल्मोनरी एयरवे मालफॉर्मेशन (CPAM) फेफड़ों की एक जन्मजात बीमारी है. इसमें गर्भ में बच्चे के फेफड़े का कोई हिस्सा ठीक से विकसित नहीं हो पाता और वहां सिस्ट यानी छोटी-छोटी थैली जैसी संरचनाएं बन जाती हैं. यह हिस्सा सामान्य फेफड़े की तरह काम नहीं कर पाता.
आमतौर पर यह बीमारी एक ही फेफड़े में होती है, लेकिन इस बच्चे के दोनों फेफड़े प्रभावित थे. ऐसे में डॉक्टर पूरे फेफड़े का बड़ा हिस्सा नहीं निकाल सकते थे, क्योंकि इससे भविष्य में बच्चे के पास पर्याप्त स्वस्थ फेफड़ा नहीं बचता. ऐसे में डॉक्टरों ने सिर्फ बीमारी वाले हिस्से को हटाने का फैसला किया.
क्यों मुश्किल थी यह सर्जरी?
फेफड़े कई छोटे-छोटे हिस्सों में बंटे होते हैं, जिन्हें सेगमेंट कहा जाता है. पूरे हिस्से को निकालना आसान होता है, लेकिन सिर्फ खराब हिस्से को निकालना काफी मुश्किल होता है, क्योंकि फेफड़े के अंदर मौजूद नसों और सांस की नलियों को बहुत सावधानी से अलग करना पड़ता है.
इस बच्चे के दाएं फेफड़े के निचले हिस्से के सेगमेंट-9 और सेगमेंट-10 को हटाया गया. डॉक्टरों के मुताबिक, ये फेफड़े के सबसे मुश्किल हिस्सों में माने जाते हैं, क्योंकि इनकी नसें और सांस की नलियां फेफड़े के अंदर काफी गहराई में होती हैं.
AIIMS की टीम ने किया ऑपरेशन
इस सर्जरी का नेतृत्व AIIMS दिल्ली के पीडियाट्रिक सर्जरी विभाग के प्रोफेसर विशेष जैन ने किया. ऑपरेशन के दौरान एनेस्थीसिया विभाग के डॉ. अभिषेक ने बच्चे की सांस को सुरक्षित रखने के लिए विशेष तकनीक का इस्तेमाल किया.
AIIMS के पीडियाट्रिक सर्जरी विभाग के प्रमुख डॉ. संदीप अग्रवाल ने कहा कि इतने छोटे बच्चे में इस तरह की सर्जरी करना बड़ी उपलब्धि है. उन्होंने बताया कि यह सफलता पूरी टीम की मेहनत और AIIMS की आधुनिक सुविधाओं की वजह से संभव हो पाई. AIIMS के मुताबिक, ऑपरेशन पूरी तरह सफल रहा और बच्चे को किसी तरह की परेशानी नहीं हुई. सर्जरी के दो दिन बाद ही उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई.
कुछ महीने बाद होगी बाएं फेफड़े की सर्जरी&amp;nbsp;
डॉक्टरों के मुताबिक, अभी बच्चे के दाएं फेफड़े का इलाज किया गया है, क्योंकि बीमारी दोनों फेफड़ों में थी, इसलिए बाएं फेफड़े के प्रभावित हिस्से की सर्जरी कुछ महीनों बाद की जाएगी. तब तक डॉक्टर बच्चे की लगातार निगरानी करेंगे. डॉक्टरों को उम्मीद है कि फेफड़े के स्वस्थ हिस्से को बचाने वाली इस सर्जरी से बच्चे की आगे की जिंदगी में फेफड़ों की कार्यक्षमता बेहतर बनी रहेगी.
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        <pubDate>Thu, 16 Jul 2026 15:30:15 +0530</pubDate>
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        <title>Monsoon Health Care Tips: मानसून सीजन में जल्दी बीमार पड़ जाते हैं बच्चे, ऐसे रखें उनकी सेहत का ख्याल?</title>
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        <description><![CDATA[ Monsoon Health Care Tips: बच्चे कितने जिद्दी होते हैं यह तो हम सब जानते है और खेलने के मामले में तो वे किसी की नहीं सुनते. बस जब मन करें घर से खेलने निकल जाते हैं. चाहें बारिश हो या धूप, उनको बस खेलने से मतलब हैं. ऐसे में पेरेंट्स के सामने सबसे बड़ी परेशानी होती है बदलते मौसम में बच्चों को बारिश में भीगने से रोकना. क्योंकि बारिश के पानी में भीगने के बाद बच्चे कई बार तो बिना कपड़े बदले और बिना नहाऐ ही दूसरे कामों में व्यस्त हो जाते हैं, जिससे बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है. ऐसे में पेरेंट्स को बारिश के मौसम में बच्चों का ज्यादा ख्याल रखना होता है. आइए जानता है पेरेंट्स को क्या करना चाहिए.&amp;nbsp;
मानसून में कैसे रखें बच्चों का ख्याल?
बारिश के मौसम में नमी और दूषित पानी के वजह से बुखार, खांसी, डेंगू, और पेट सम्बन्धी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है. इसका असर बच्चों पर ज्यादा देखने को मिलता है. ऐसे में बच्चों के खान-पान और पानी का पूरा ख्याल रखना जरूरी होता है. साथ ही बच्चों को बाहर के खान-पान से दूर रखें और उन्हें हमेशा साफ और उबला हुआ या फिल्टर किया हुआ ही पानी पिलाएं.
यदि बच्चे बारिश में भीग जाएं तो तुरंत उन्हें सूखे तौलिये से साफ करके सूखे कपड़े पहनाएं क्योंकि नमी के कारण बच्चों में फंगल इन्फेक्शन का खतरा बढ़ जाता है. साथ ही बारिश के दौरान मच्छरों का खतरा बढ़ जाता है. ऐसे में इस समय पूरे शरीर को ढकने वाले कपड़े पहनाना चाहिए. इसके अलावा बच्चों की डाइट में हरी सब्जियां, मौसमी फल और विटामिन C से भरपूर चीजें शामिल करें.
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साफ-सफाई का रखें पूरा ख्याल&amp;nbsp;
बारिश के मौसम में साफ-सफाई का ख्याल रखना बहुत जरूरी होता है, क्योंकि कई सारी बिमारियों का असली कारण गंदगी ही होता है. इसलिए ध्यान रखें कि बारिश के मौसम में घर के आसपास पानी इकट्टा न होने दें, क्योंकि इससे डेंगू, मलेरिया जैसी बीमारियां का खतरा बड़ जाता है. हमेशा ध्यान रखें की बच्चे गीले मोजे और गीले कपड़े न पहनें, क्योंकि इससे शरीर ठंडा रहता है जिससे निमोनिया जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है.&amp;nbsp;अगर आप बारिश के मौसम में इन सब चीजों का ख्याल रखते है और अपने बच्चों को सिखाते हैं कि बारिश के मौसम उन्हें किन-किन बातों का सबसे ज्यादा ख्याल रखना है, तो आप इस बारिश के मौसम में अपने बच्चों के लिए स्वास्थ्य से जुड़े बेहतर निर्णय ले पाएंगे.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ेंः Pregnancy in Monsoon: मानसून में कैसे रखें गर्भ में पल रहे बच्चे का ख्याल, Mother to be के लिए बड़े काम की है खबर
&amp;nbsp; ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 16 Jul 2026 15:30:14 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Omega&amp;3 Supplements: क्या दिमाग तेज करने के लिए खा रहे हैं ओमेगा&amp;3 कैप्सूल? इस नई रिसर्च को जरूर पढ़ लें</title>
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        <description><![CDATA[ Alzheimer And Dementia Prevention Study 2026: दिमाग को तेज बनाने और अल्जाइमर या डिमेंशिया जैसी बीमारियों से बचाव के लिए कई लोग ओमेगा-3 सप्लीमेंट्स का सहारा लेते हैं. लेकिन हाल ही में हुई एक क्लिनिकल स्टडी ने इस धारणा पर सवाल खड़े कर दिए हैं. रिसर्च के मुताबिक, केवल ओमेगा-3 सप्लीमेंट लेने से याददाश्त, सोचने-समझने की क्षमता या दिमाग की सेल्स को होने वाले नुकसान में कोई खास फायदा नहीं मिला.&amp;nbsp;
क्या सेहत के लिए फायदेमंद है?
रिसर्चर का कहना है कि ओमेगा-3 सप्लीमेंट्स को दिमाग की सेहत सुधारने का आसान उपाय नहीं माना जा सकता. स्टडी के दौरान जिन लोगों को ओमेगा-3 सप्लीमेंट दिए गए, उनके दिमाग में ओमेगा-3 का स्तर तो बढ़ा, लेकिन इससे उनकी मानसिक क्षमता में कोई उल्लेखनीय सुधार देखने को नहीं मिला. यानी केवल सप्लीमेंट लेना पर्याप्त नहीं है.
किन चीजों पर ध्यान देना जरूरी?
स्टडी के प्रमुख राइटर डॉ. हुसैन यासीन के मुताबिक,का मानना है कि अगर दिमाग को लंबे समय तक स्वस्थ रखना है, तो सिर्फ एक सप्लीमेंट पर निर्भर रहने की बजाय पूरी लाइफस्टाइल पर ध्यान देना जरूरी है. नियमित व्यायाम, तनाव कम करना, भरपूर नींद लेना और पौधों पर आधारित संतुलित आहार अपनाना दिमाग की सेहत के लिए कहीं अधिक असरदार माना गया है. इसके साथ ही सैल्मन, मैकेरल, सार्डिन जैसी फैटी फिश, अखरोट, चिया सीड्स और अलसी जैसे प्राकृतिक स्रोतों से मिलने वाला ओमेगा-3 ज्यादा फायदेमंद हो सकता है.
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कब होता है इसका असर?
रिसर्चर ने मेडिटेरेनियन डाइट का भी उदाहरण दिया. उनका कहना है कि वहां रहने वाले लोग सिर्फ सप्लीमेंट्स पर निर्भर नहीं रहते, बल्कि मछली, मेवे और बीजों से प्राकृतिक रूप से ओमेगा-3 लेते हैं. इसके साथ ही नियमित शारीरिक गतिविधि करते हैं, तनाव कम रखते हैं और संतुलित लाइफस्टाइल अपनाते हैं. यही कारण है कि वहां ओमेगा-3 का बेहतर असर देखने को मिलता है.
किन लोगों पर किया गया स्टडी?
यह स्टडी 55 से 80 वर्ष की उम्र के 365 लोगों पर किया गया, जिनमें डिमेंशिया का खतरा बढ़ाने वाले एक या अधिक जोखिम कारक मौजूद थे. दो साल तक एक समूह को रोजाना उच्च मात्रा में ओमेगा-3 सप्लीमेंट दिया गया, जबकि दूसरे समूह को प्लेसीबो दिया गया. एमआरआई स्कैन, रक्त जांच और मानसिक क्षमता से जुड़े टेस्ट के बाद पाया गया कि सप्लीमेंट लेने वालों के शरीर और दिमाग में ओमेगा-3 का स्तर बढ़ने के बावजूद उनकी याददाश्त या सोचने-समझने की क्षमता में कोई महत्वपूर्ण अंतर नहीं आया.
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क्या सच में यह फायदेमंद नहीं है?
हालांकिग्लोबल ऑर्गेनाइजेशन फॉर ईपीए एंड डीएचए ओमेगा-3 यह भी स्पष्ट करते हैं कि इसका मतलब यह नहीं है कि ओमेगा-3 शरीर के लिए जरूरी नहीं है. यह हार्ट, सेल्स और ब्रेन के सामान्य कामकाज के लिए महत्वपूर्ण पोषक तत्व है. लेकिन अगर खानपान असंतुलित हो, शारीरिक गतिविधि न हो और लाइफस्टाइल अस्वस्थ हो, तो सिर्फ ओमेगा-3 सप्लीमेंट्स से दिमाग को तेज बनाने या अल्जाइमर के खतरे को कम करने की उम्मीद करना सही नहीं होगा.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 16 Jul 2026 03:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>India&amp;UK Trade Deal: यूके से कौन&amp;कौन सी दवाएं आयात करता है भारत, जानें अब कितना कम हो जाएगा इनका दाम?</title>
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        <description><![CDATA[ India-UK Trade Deal : भारत और ब्रिटेन के बीच लंबे समय से जिस व्यापार समझौते का इंतजार किया जा रहा था, वह अब लागू हो चुका है. इस समझौते के बाद दोनों देशों के बीच कारोबार को नई रफ्तार मिलने की उम्मीद है. इसका असर सिर्फ लग्जरी कारों, स्कॉच व्हिस्की या फैशन प्रोडक्ट्स तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि हेल्थकेयर सेक्टर पर भी इसका बड़ा प्रभाव देखने को मिलेगा.
खासकर ब्रिटेन से भारत आने वाले मेडिकल डिवाइसेस और कुछ विशेष दवाओं की कीमतों में आने वाले समय में कमी आ सकती है. आइए जानते हैं कि भारत यूके से कौन-कौन सी दवाएं और मेडिकल प्रोडक्ट्स आयात करता है और नई ट्रेड डील के बाद अब इनका दाम कितना कम हो जाएगा.&amp;nbsp;
भारत-यूके ट्रेड डील क्या है?
भारत और ब्रिटेन के बीच व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौता (CETA) 15 जुलाई 2026 से लागू हो गया है. करीब साढ़े तीन साल तक चली बातचीत और 14 दौर की चर्चा के बाद यह समझौता अंतिम रूप में पहुंचा. इस डील का उद्देश्य दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ाना, आयात-निर्यात को आसान बनाना और कई प्रोडक्ट्स पर लगने वाले आयात शुल्क को कम या खत्म करना है. इस समझौते के तहत भारत के लगभग 99 प्रतिशत प्रोडक्ट्स को ब्रिटेन में शुल्क-मुक्त पहुंच मिलेगी. वहीं ब्रिटेन से आने वाले कई प्रोडक्ट्स पर भारत में आयात शुल्क तरीके से कम किया जाएगा.
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यूके कौन-कौन सी दवाएं और मेडिकल प्रोडक्ट्स आयात होती हैं?
भारत मुख्य रूप से ब्रिटेन से स्पेशलाइज्ड जेनेरिक दवाएं और कई तरह के मेडिकल डिवाइसेस आयात करता है. इनमें सर्जिकल डिवाइस, डायग्नोस्टिक मशीनें, ईसीजी मशीन, एक्स-रे मशीन और अन्य एडवांस हेल्थकेयर डिवाइस शामिल हैं. नई ट्रेड डील के बाद इन प्रोडक्ट्स पर लगने वाला आयात शुल्क कम होने से इनके भारतीय बाजार में सस्ते होने की संभावना है.
क्या घट जाएंगे इनके दाम?&amp;nbsp;
नई ट्रेड डील के तहत ब्रिटेन से आने वाले मेडिकल डिवाइसेस पर लगने वाली कस्टम ड्यूटी चरणबद्ध तरीके से कम की जाएगी. पहले जहां इन प्रोडक्ट्स पर आमतौर पर 7.5 प्रतिशत से 15 प्रतिशत तक आयात शुल्क लगता था, वहीं इसे घटाकर लगभग 3 प्रतिशत तक लाया जाएगा. इसमें इमेजिंग सिस्टम, डायग्नोस्टिक डिवाइस, सर्जिकल इंस्ट्रूमेंट्स और अन्य मेडिकल टेक्नोलॉजी प्रोडक्ट्स शामिल हैं. उद्योग से जुड़े संगठनों का मानना है कि इससे भारत में आधुनिक मेडिकल डिवाइस पहले के मुकाबले ज्यादा किफायती हो सकेंगे. आयात शुल्क कम होने से ब्रिटेन से आने वाले हेल्थकेयर डिवाइस और कुछ विशेष दवाओं की कीमतों में कमी आने की उम्मीद है. इसके अलावा अगले 10 सालों में करीब 85 प्रतिशत ऐसे प्रोडक्ट्स पूरी तरह टैरिफ-फ्री हो जाएंगे. इससे अस्पतालों, डायग्नोस्टिक सेंटरों और मरीजों को आधुनिक मेडिकल डिवाइस पहले की तुलना में कम कीमत पर उपलब्ध हो सकते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.&amp;nbsp; ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 16 Jul 2026 03:30:11 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>9 हजार का खर्च अब सिर्फ 91 रुपये! सैंपल ले जा रहा ड्रोन और दवा भी करेगा डिलीवर</title>
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        <description><![CDATA[ भारत के ग्रामीण और दूर-दराज के इलाकों में अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाना हमेशा से बड़ी चुनौती रही है. खासतौर पर टीबी जैसी गंभीर बीमारी के मामले में, जहां सही समय पर जांच और इलाज ही जान बचा सकता है. इसी मुश्किल को हल करने के लिए तेलंगाना में बेहद शानदार और आधुनिक शुरुआत हुई है.
भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) ने तेलंगाना के यादाद्री भुवनगिरी जिले में टीबी की जांच को आसान, तेज और सस्ता बनाने के लिए ड्रोन सेवा की शुरुआत की है. यह पहल अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) बीबीनगर के सहयोग से की गई. आइए समझते हैं कि यह तकनीक कैसे आम आदमी की जिंदगी बदल रही है?
9451 रुपये का खर्च सिर्फ 91 रुपये हुआ
गौरतलब है कि गांवों में रहने वाले मरीजों को अपनी टीबी की जांच कराने के लिए पहले शहर के बड़े अस्पतालों या जांच केंद्रों तक जाना पड़ता था. इसमें उनका पूरा दिन बर्बाद होता था. यात्रा में पैसे खर्च होते थे और कई बार दिहाड़ी भी छूट जाती थी.
आंकड़ों के मुताबिक, पहले एक मरीज को जांच के लिए औसतन ₹9451 खर्च करने पड़ते थे, लेकिन अब ड्रोन सेवा शुरू होने से यह खर्च घटकर महज 91 रुपये रह गया है. मरीज अब अपने घर के पास वाले छोटे स्वास्थ्य केंद्र में ही बलगम का सैंपल दे देते हैं और वहां से ड्रोन इन सैंपल्स को हवा के रास्ते बड़े जांच केंद्रों तक पहुंचा देता है. इससे मरीजों के पैसे और मेहनत दोनों बच रहे हैं.
15 दिन का काम अब 5 दिन में
टीबी के इलाज में सबसे जरूरी होता है कि बीमारी का पता जल्दी चले. पहले दूर के गांवों से सैंपल लैब तक पहुंचने और फिर उसकी रिपोर्ट वापस गांव तक आने में 15 दिन तक का समय लग जाता था. इतने लंबे इंतजार में मरीज की हालत और खराब होने का डर रहता था.&amp;nbsp;
ड्रोन तकनीक ने इस समय को सीधे 15 दिन से घटाकर सिर्फ 5 दिन कर दिया है. ताजा रिपोर्ट बताती है कि 76 प्रतिशत से ज्यादा मरीजों को उनकी जांच के नतीजे अगले ही दिन मिल रहे हैं. रिपोर्ट जल्दी आने का सीधा मतलब है कि मरीज का इलाज जल्दी शुरू हो पाता है, जो उसकी जान बचाने के लिए सबसे अहम है.
कैसे काम करता है यह सिस्टम?
इस योजना को योजनाबद्ध तरीके से लागू किया गया है. AIIMS बीबीनगर में मेन कंट्रोल सेंटर बनाया गया है, जो जिले के 11 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और 60 छोटे उपकेंद्रों से सीधा जुड़ा हुआ है. ड्रोन इसी नेटवर्क के बीच उड़ान भरते हैं, जिसे मेडिकल भाषा में हब एंड स्पोक मॉडल कहा जाता है. इसके तहत छोटे-छोटे केंद्रों से सैंपल इकट्ठे किए जाते हैं और उन्हें मुख्य लैब तक तेजी से पहुंचाया जाता है.
दवाइयां भी ला रहा ड्रोन
यह ड्रोन सेवा सिर्फ सैंपल भेजने तक सीमित नहीं है. जब मुख्य केंद्र में मरीज की रिपोर्ट पॉजिटिव आती है और डॉक्टरों दवा लिखते हैं तो वही ड्रोन वापसी की उड़ान में दूरदराज के गांवों तक टीबी की जरूरी दवाइयां भी पहुंचाता है. इसका मतलब यह है कि मरीज को दवा लेने के लिए भी शहर भागने की जरूरत नहीं है. आसमान से उड़कर दवा उनके गांव के स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंच जाती है.
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        <pubDate>Wed, 15 Jul 2026 11:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>Chandipura Virus: गुजरात में फिर लौटा जानलेवा चांदीपुरा वायरस, जानें यह कितना खतरनाक</title>
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        <description><![CDATA[ Chandipura Virus Cases In Gujarat 2026: गुजरात में एक बार फिर चांदीपुरा वायरस &amp;nbsp;के मामले सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग और डॉक्टरों की चिंता बढ़ गई है. रिपोर्ट्स के अनुसार, अब तक 3 बच्चों की मौत हो तुकी है. यह वायरस भले ही बहुत आम नहीं है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी चुनौती यह है कि यह बच्चों में बेहद तेजी से गंभीर रूप ले सकता है. शुरुआत में इसके लक्षण सामान्य वायरल बुखार जैसे लगते हैं, लेकिन कुछ ही घंटों या दो-तीन दिनों के भीतर इंफेक्शन दिमाग तक पहुंचकर जानलेवा साबित हो सकता है.&amp;nbsp;
मानसून के दौरान बढ़ता है इसका खतरा
नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल के अनुसार, भारत में चांदीपुरा वायरस के प्रकोप पहले भी सामने आ चुके हैं. खासकर मानसून के दौरान इसका खतरा बढ़ जाता है, क्योंकि इस मौसम में इसे फैलाने वाली सैंडफ्लाई (रेतीली मक्खी) अधिक सक्रिय हो जाती है. &amp;nbsp;डॉ. मंजू केदारनाथ ने TOI को बताया कि यह इंफेक्शन रेयर जरूर है, लेकिन इसकी रफ्तार बेहद तेज होती है. इसलिए समय पर पहचान और इलाज सबसे जरूरी है. उनके मुताबिक, बीमारी की शुरुआत तेज बुखार, सिरदर्द, मतली और कमजोरी से होती है. इसके बाद वायरस तेजी से दिमाग पर असर डाल सकता है, जिससे उल्टी, बेचैनी, दौरे पड़ना और बेहोशी जैसी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं. यदि समय पर इलाज न मिले तो 48 से 72 घंटे के भीतर मरीज कोमा में जा सकता है और जान का खतरा भी पैदा हो सकता है.&amp;nbsp;
किन लोगों को इसका सबसे ज्यादा खतरा?
डॉक्टरों के अनुसार, 15 साल से कम उम्र के बच्चों में इसका खतरा सबसे ज्यादा रहता है. बच्चों का विकसित हो रहा नर्वस सिस्टम और कमजोर इम्यून सिस्टम उन्हें गंभीर इंफेक्शन के प्रति अधिक संवेदनशील बना सकती है. &amp;nbsp;यदि बच्चे को 101 डिग्री फारेनहाइट/ 38.3 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा बुखार, बार-बार उल्टी, दौरे, व्यवहार में बदलाव, अत्यधिक सुस्ती या बेहोशी जैसे लक्षण दिखाई दें तो तुरंत अस्पताल ले जाना चाहिए. एक्सपर्ट का कहना है कि ऐसे मामलों में शुरुआती कुछ घंटे बेहद अहम होते हैं.
क्या इसका इलाज मौजूद है?
चिंता की बात यह भी है कि फिलहाल चांदीपुरा वायरस के लिए न तो कोई विशेष एंटीवायरल दवा उपलब्ध है और न ही कोई वैक्सीन. ऐसे में मरीज को केवल अस्पताल में सहायक उपचार दिया जाता है ताकि इंफेक्शन से होने वाली दिक्कतों को कंट्रोल किया जा सके। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस वायरस से होने वाली मृत्यु दर 56 से 75 प्रतिशत तक दर्ज की गई है, इसलिए लापरवाही भारी पड़ सकती है.&amp;nbsp;
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कैसे कर सकते हैं बचाव?
&amp;nbsp;यह वायरस संक्रमित सैंडफ्लाई के काटने से फैलता है, इसलिए बचाव ही सबसे प्रभावी उपाय माना जाता है. डॉ. मंजू केदारनाथ के अनुसार, बच्चों को पूरे बाजू के कपड़े पहनाएं, उनकी उम्र के अनुसार सुरक्षित इंसेक्ट रिपेलेंट का इस्तेमाल करें और जरूरत पड़ने पर कीटनाशक लगे मच्छरदानी में सुलाएं. इसके अलावा घर के आसपास साफ-सफाई रखें, कचरा जमा न होने दें और ऐसी जगहों को साफ रखें जहां सैंडफ्लाई पनप सकती हैं.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 13 Jul 2026 14:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>Skin Whitening Cream: रातोंरात गोरा बनाने वाली क्रीमों में मिला जरूरत से ज्यादा मरकरी और लेड, इससे कितना नुकसान?</title>
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        <description><![CDATA[ Maharashtra FDA Warning On Fairness Creams: त्वचा को कुछ ही दिनों में गोरा और चमकदार बनाने का दावा करने वाली कई क्रीमों पर अब गंभीर सवाल उठ गए हैं. महाराष्ट्र फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने ऐसी पांच कॉस्मेटिक प्रोडक्ट्स में तय सीमा से कई गुना ज्यादा मरकरी और लेड पाए जाने के बाद लोगों को इनके इस्तेमाल से बचने की चेतावनी दी है. जांच में यह भी सामने आया कि कुछ उत्पादों पर निर्माण और एक्सपायरी डेट जैसी जरूरी जानकारी तक नहीं दी गई थी. इसके बाद इन उत्पादों के निर्माण और बिक्री को लेकर जांच शुरू कर दी गई है.&amp;nbsp;
किन प्रोडक्ट को लेकर उठे सवाल?
FDA की जांच में जिन प्रोडक्ट्स के नाम सामने आए हैं, उनमें Goree Beauty Cream, Goree Beauty Whitening Body Lotion, Goree Whitening Soap, Face Fresh Gold Plus तथा Golden Star Beauty Cream शामिल हैं. एक्सपर्ट का कहना है कि ये भारी धातुएं शरीर के लिए बेहद नुकसानदायक हो सकती हैं और लंबे समय तक इस्तेमाल करने पर गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है.
इससे कितना खतरा होता है?
डॉ. तुषार पलवे के मुताबिक, मरकरी को अवैध रूप से स्किन व्हाइटनिंग क्रीम में इसलिए मिलाया जाता है क्योंकि यह मेलानिन बनने की प्रक्रिया को रोक देता है. इसकी वजह से 10 से 15 दिनों के भीतर त्वचा पहले से ज्यादा गोरी दिखाई देने लगती है. हालांकि इसका लगातार इस्तेमाल किडनी, दिमाग और शरीर के दूसरे अंगों को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है. उनका कहना है कि अगर क्रीम में मरकरी की मात्रा बहुत ज्यादा हो तो 10 से 12 दिनों में ही किडनी पर असर शुरू हो सकता है, जबकि कम मात्रा होने पर भी कई महीनों तक रोजाना इस्तेमाल करने से नुकसान धीरे-धीरे बढ़ता रहता है.&amp;nbsp;
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सिर्फ स्किन ही नहीं, इनको भी होता है नुकसान
हालांकि इसका असर केवल त्वचा तक सीमित नहीं रहता. मरकरी त्वचा के जरिए शरीर में प्रवेश कर किडनी और बोन मेरो में जमा हो सकता है. डॉक्टरों के मुताबिक, इससे किडनी की काम करने की क्षमता धीरे-धीरे प्रभावित होने लगती है और गंभीर मामलों में डायलिसिस तक की नौबत आ सकती है. इसके अलावा हाथ कांपना, याददाश्त कमजोर होना, चिंता, अनिद्रा, चिड़चिड़ापन और एकाग्रता में कमी जैसी न्यूरोलॉजिकल समस्याएं भी हो सकती हैं. कुछ मामलों में सुनने और देखने की क्षमता भी प्रभावित हो सकती है.
 किसी भी क्रीम का इस्तेमाल करने से बचें
जांच में लेड भी तय सीमा से अधिक पाया गया. एक्सपर्ट के अनुसार, लेड का त्वचा को गोरा करने में कोई साइंटफिक उपयोग नहीं है. इसकी मौजूदगी खराब गुणवत्ता वाले कच्चे माल या असुरक्षित निर्माण प्रक्रिया की ओर इशारा करती है. लेड शरीर में जमा होकर दिमाग, किडनी, ब्लड बनाने वाले अंगों और प्रजनन तंत्र को नुकसान पहुंचा सकता है. डॉक्टरों का कहना है कि लेड की कोई भी मात्रा पूरी तरह सुरक्षित नहीं मानी जाती और अगर मरकरी के साथ इसका संपर्क हो तो स्वास्थ्य जोखिम और बढ़ जाता है. स्किन एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि केवल गोरा दिखने के लिए किसी भी क्रीम का इस्तेमाल करने से बचें. अगर चेहरे पर दाग-धब्बे या पिग्मेंटेशन की समस्या है तो पहले स्किन एक्सपर्ट से जांच कराएं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 13 Jul 2026 14:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>Cancer Survivors:  कैंसर से जिंदा बचना काफी नहीं, अब बेहतर जिंदगी जीना भी जरूरी</title>
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        <description><![CDATA[ Cancer Survivors:&amp;nbsp;अब तक कैंसर के इलाज का मतलब सिर्फ मरीज को बचाना माना जाता था, लेकिन अब यह सोच बदल रही है. एक नई रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि आने वाले समय में दुनिया भर में कैंसर के मामलों में बढ़ोतरी हो सकती है. लेकिन इसके साथ एक और बड़ी समस्या भी है, जिसे इन आकड़ों में गिना नहीं जाता है, वह है कैंसर से बच चुके मरीजों की बढ़ती संख्या, जिन्हें लंबे समय तक मेडिकल और मानसिक सहारे की जरूरत होती है. डॉ के अनुसार, जल्दी बीमारी का पता लगने, बेहतर इलाज के तरीकों और सर्जरी में सुधार की वजह से अब मरीज पहले से कहीं ज्यादा लंबे समय तक जिंदा रह रहे हैं, लेकिन इससे एक नई स्वास्थ्य चुनौती भी खड़ी हो गई है.
इलाज खत्म होना यात्रा का अंत नहीं
डॉक्टर बताते हैं कि ज्यादातर मरीज यह मान लेते हैं कि इलाज पूरा होते ही उनकी कैंसर से जुड़ी परेशानी खत्म हो जाती है, लेकिन असल में यहीं से एक नया दौर शुरू होता है. उनके मुताबिक, कैंसर या उसके इलाज के साइड इफेक्ट सालों तक बने रहते हैं. जैसे मरीजों को थकान, नसों में परेशानी, दिल से जुड़ी बीमारियां, हार्मोन में बदलाव, बच्चे पैदा करने से जुड़ी दिक्कतें और कैंसर के दोबारा होने का खतरा. इसलिए ऐसे मरीजों को सलाह दी जाती है कि वे समय-समय पर डॉक्टर से जांच करवाते रहें. सबसे खतरनाक बात तो ये है की कई मरीज तो बीमारी के दोबारा लौटने की चिंता, डिप्रेशन, ध्यान लगाने में परेशानी, जैसी चीजों से जूझते हैं.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ेंः Swiggy पर FSSAI का बड़ा एक्शन, ग्राहकों की शिकायतों के बाद जारी किए 9 नोटिस
सर्वाइवर्स की देखभाल पर देना होगा ज्यादा ध्यान
विशेषज्ञों का कहना है कि कैंसर से बच चुके मरीजों नियमित जांच, फिजियोथेरेपी, सही खानपान, मानसिक सेहत के लिए सहारा, दर्द से राहत और मरीजों को सही जानकारी होना बहुत जरूरी है. इससे उनका आत्मविश्वास बड़ता है.&amp;nbsp; उनके मुताबिक, अब स्वास्थ्य व्यवस्था को सिर्फ कैंसर का इलाज करने तक सीमित न रहकर, ठीक हो चुके मरीजों की देखभाल पर भी उतना ही ध्यान देना होगा. WHO की रिपोर्ट भी इसी बात को दोहराती है. रिपोर्ट के मुताबिक कैंसर सिर्फ शरीर को ही नहीं, बल्कि जिंदगी के कई और पहलुओं को भी प्रभावित करता है. इसलिए जरूरी है की इन बातों का भी पूरा ध्यान रखा जाए.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ेंः Cancer Drug kerala Case : दवा के इंतजार में कोर्ट केस ही लड़ती रही कैंसर पेशेंट, 57 बार टली सुनवाई और हो गई मौत ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 13 Jul 2026 02:30:16 +0530</pubDate>
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        <title>Mental Health Special Theaters : मेंटल हेल्थ सुधारने के लिए इस देश में बन रहे स्पेशल थिएटर, यहां कैसे होता है इलाज?</title>
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        <description><![CDATA[ Mental Health Special Theaters : हॉस्पिटल का नाम सुनते ही सबसे पहले मशीनों की आवाज, दवाइयों, इलाज की चिंता और तनाव भरा माहौल याद आता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि दुनिया में एक ऐसा देश है जहां हॉस्पिटल्स के अंदर खास थिएटर बनाए गए हैं. इन थिएटरों का मकसद मरीजों को कुछ समय के लिए हॉस्पिटल के माहौल से बाहर निकालकर उन्हें नॉर्मल लाइफ जैसा एहसास कराना और उनकी मेंटल हेल्थ को बेहतर बनाने में मदद करना है. &amp;nbsp;तो आइए जानते हैं कि मेंटल हेल्थ सुधारने के लिए किस देश में स्पेशल थिएटर बन रहे और यहां इलाज कैसे होता है.
मेंटल हेल्थ सुधारने के लिए किस देश में स्पेशल थिएटर बन रहे?
ब्रिटेन में मरीजों की मानसिक सेहत बेहतर बनाने के लिए हॉस्पिटल्स के अंदर मेडिसिनेमा नाम से खास थिएटर बनाए गए हैं. इन थिएटरों में हॉस्पिटल में भर्ती बच्चे और बड़े मरीज नई फिल्मों का आनंद ले सकते हैं, जिससे कुछ समय के लिए दर्द, तनाव और हॉस्पिटल के माहौल को भूल सकें. अभी ब्रिटेन के अलग-अलग हॉस्पिटल्स में ऐसे 9 मेडिसिनेमा थिएटर संचालित हो रहे हैं. यहां डॉक्टर और नर्स मरीजों की स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार तय करते हैं कि कौन फिल्म देखने जा सकता है. इस पहल का उद्देश्य इलाज के साथ-साथ मरीजों को मानसिक राहत देना और उन्हें नॉर्मल लाइफ जैसा एक्सपीरियंस कराना है&amp;nbsp;
यहां इलाज कैसे होता है?
मेडिसिनेमा के संचालन की जिम्मेदारी साइमन हिक्सन संभालते हैं. वे हर सुबह हॉस्पिटल के अलग-अलग वार्ड में जाकर डॉक्टरों और नर्सों से बात करते हैं और यह तय करते हैं कि कौन-से मरीज फिल्म देखने की स्थिति में हैं. &amp;nbsp;फिल्म शुरू होने से पहले नर्स और मरीजों को उनके वार्ड से थिएटर तक लेकर आते हैं. थिएटर में सिर्फ सीटें ही नहीं हैं, बल्कि ऐसे विशेष स्थान भी बनाए गए हैं, जहां चार बेड पर लेटे मरीज और तीन रिक्लाइनर पर बैठने वाले मरीज भी आराम से फिल्म देख सकते हैं.
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हर उम्र के मरीजों के लिए खुला है यह थिएटर
एक स्क्रीनिंग के दौरान यहां अलग-अलग उम्र और स्वास्थ्य स्थिति वाले मरीज मौजूद थे. इनमें एक प्रेगनेंट महिला, ऑटोइम्यून बीमारी से जूझ रहा 4 वर्षीय बच्चा, हड्डी की बीमारी से पीड़ित 71 वर्षीय महिला और अन्य मरीज शामिल थे. &amp;nbsp;72 वर्षीय गैरी कुक, जो एक दुर्घटना में अपने पैरों में गंभीर चोट लगने के बाद भर्ती थे, ने फिल्म शुरू होने से पहले मजाक में पूछा कि अगर फिल्म के दौरान किसी को बाथरूम जाना पड़े या किसी मरीज को अचानक हार्ट अटैक आ जाए तो क्या होगा. इस पर पास मौजूद नर्स ने बताया कि जरूरत पड़ने पर मेडिकल स्टाफ तुरंत मदद के लिए मौजूद रहेगा.&amp;nbsp;
कैसे हुई मेडिसिनेमा की शुरुआत?
करीब 30 साल पहले क्रिस्टीन हिल ने सेंट थॉमस हॉस्पिटल में कुछ बच्चों को हॉस्पिटल के बगीचे में खुशी से समय बिताते देखा. तभी उनके मन में हॉस्पिटल के अंदर सिनेमा शुरू करने का विचार आया, जिससे मरीज भी फिल्मों के जरिए कुछ समय के लिए अपनी परेशानी भूल सकें. शुरुआती विरोध के बाद भी उन्होंने हॉस्पिटल के एक लेक्चर थिएटर को सिनेमा में बदलने के लिए पैसे इकट्ठा किए. इसके बाद दिसंबर 1999 में पहला मेडिसिनेमा शुरू हुआ, जहां सबसे पहले इंस्पेक्टर गैजेट फिल्म दिखाई गई.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 11 Jul 2026 18:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>NPPA New Drug Prices: ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और हार्ट समेत 39 नई दवाओं की कीमतें तय, सरकार ने जारी किया आदेश</title>
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        <description><![CDATA[ NPPA New Drug Prices: देश में आम मरीजों को दवाओं की मनमानी कीमतों से राहत देने के लिए नेशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी यानी NPPA ने एक बड़ा कदम उठाया है. अथॉरिटी ने ड्रग्स (प्राइसेस कंट्रोल) ऑर्डर यानी डीपीसीओ 2013 के तहत 39 नई दवाओं की खुदरा कीमत तय कर दी हैं. इनमें हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, दिल की बीमारियां, एचआईवी, आंखों के इंफेक्शन और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाएं शामिल हैं. यह कदम इन दवाओं को मरीजों के लिए ज्यादा किफायती बनाने की इरादे से उठाया गया है.
8 जुलाई को जारी हुआ आदेश&amp;nbsp;
फार्मास्युटिकल्स विभाग की तरफ से 8 जुलाई 2026 को यह मूल्य अधिसूचना जारी की गई, जिससे डीपीसीओ 2013 के पैराग्राफ 5,11 और 15 के तहत नोटिफाई किया गया है. हालांकि आपको बता दें कि यह आदेश पहले से बाजार में उपलब्ध दवाओं की कीमत घटाने के लिए नहीं, बल्कि नई दवा फॉर्मूलेशन की अधिकतम खुदरा कीमत तय करने के लिए जारी किया गया है. इन कीमतों पर लागू होने वाला जीएसटी अलग से लिया जाएगा.&amp;nbsp;
कई जरूरी दवाओं की खुदरा कीमतें तय&amp;nbsp;
एनपीपीए की ओर से जारी सूची में हाई ब्लड प्रेशर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली Amlodipine+Bisoprolo+Telmisartan टैबलेट की खुदरा कीमत 14.74 रुपये प्रति टैबलेट तय की गई है. आंखों की सर्जरी के बाद और बैक्टीरिया संक्रमण के इलाज में इस्तेमाल होने वाले Nepafenac+Moxifloxacin Ophthalmic Solution दवाओं की कीमत 68.64 रुपये प्रति मिलीलीटर तय की गई है. वहीं हार्ट अटैक और स्ट्रोक के खतरे को कम करने के लिए दी जाने वाली Clopidogrel+ Aspirin+Atorvastatin कैप्सूल की कीमत 6.37 रुपये प्रति कैप्सूल तय की गई है. लिस्ट में डायबिटीज के इलाज में इस्तेमाल होने वाली कई फिक्स्ड डोज कॉम्बिनेशन दवाओं की कीमतें भी तय की गई है. इनमें Dapagliflozin, Empagliflozin, Sitagliptin, Metformin, Glimepiride और Voglibose आधारित दवाएं शामिल है.
इसके अलावा संक्रमण के इलाज में उपयोग होने वाली Amoxicilline+Clavulanate टैबलेट और डिस्पर्सिबल टैबलेट, ग्लूकोमा की इलाज में इस्तेमाल होने वाली आई ड्रॉप, एचआईवी थेरेपी किट, &amp;nbsp;विटामिन डी3 ओरल सॉल्यूशन और कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली Imatinib Oral Solution जैसी दवाओं की कीमतें भी निर्धारित की गई है. इसके अलावा एनपीपीए की लिस्ट में सबसे महंगी दवाओं में Tenecteplase (TNK-tpa) Injection 50mg भी शामिल है. हार्ट अटैक के इलाज में इस्तेमाल होने वाली इंजेक्शन की खुदरा कीमत 60,238.27 रुपये प्रति वायल तय की गई है.&amp;nbsp;
दुकानदारों के लिए प्राइस लिस्ट दिखाना अनिवार्य&amp;nbsp;
एनपीपीए ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि सभी रिटेलर और डीलरों के लिए निर्माता कंपनियों की तरफ से जारी की गई प्राइस लिस्ट अपने दुकान में साफ तौर पर लगाना अनिवार्य है. डीपीसीओ 2013 के पैरा 24 (4) का हवाला देते हुए अथॉरिटी ने कहा कि हर रिटेलर और डीलर को अपनी दुकान के ऐसे हिस्से में प्राइस लिस्ट और सप्लीमेंट्री प्राइस लिस्ट प्रदर्शित करनी होगी, जहां से इसे कोई भी ग्राहक आसानी से देख और जान सकेगा.&amp;nbsp;
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तय कीमत से ज्यादा वसूलने पर होगी करवाई&amp;nbsp;
नोटिफिकेशन में यह भी साफ किया गया है कि अगर कोई निर्माता या मार्केटिंग कंपनी अधिसूचित खुदरा कीमत का पालन नहीं करती है तो उसे ज्यादा वसूली की गई रकम सहित सरकार के पास जमा करनी होगी. एनपीपीए के अनुसार अगर इन दवाओं की खुदरा कीमत इस आदेश और उसमें दिए गए नोटिस के मुताबिक तय नहीं की जाती, तो संबंधित कंपनी को डीपीसीओ 2013 और एसेंशियल कमोडिटीज एक्ट 1955 के प्रावधानों के तहत ज्यादा वसूली गई रकम ब्याज के साथ जमा करनी होगी.
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        <pubDate>Sat, 11 Jul 2026 18:30:09 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Alcohol Based Drug: 12% से अधिक अल्कोहलिक दवाओं पर सरकार सख्त, डॉक्टर की पर्ची और लाइसेंस के बिना नहीं होगी बिक्री  </title>
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        <description><![CDATA[ Alcohol Based Drug: अगर आप भी बिना डॉक्टर की सलाह के मेडिकल स्टोर से दवाएं खरीद लेते हैं, तो यह खबर आपके लिए जरूरी है. केंद्र सरकार ने 12 प्रतिशत से ज्यादा एथिल अल्कोहल वाली औषधीय दवाओं की बिक्री और निर्माण को लेकर नियम सख्त कर दिए हैं. अब ऐसी दवाओं को पहले की तरह सामान्य तरीके से न तो बनाया जा सकेगा और न ही मेडिकल स्टोर से आसानी से खरीदा जा सकेगा. सरकार ने इन दवाओं को ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक एक्ट 1940 के तहत लाइसेंस व्यवस्था में लाते हुए, ड्रग्स रूल्स 1945 की अनुसूची एच1 में शामिल कर दिया है.
इसका मतलब है कि अब इनकी बिक्री केवल रजिस्टर्ड डॉक्टर के प्रिस्क्रिप्शन पर ही होगी और मेडिकल स्टोर को हर बिक्री का रिकॉर्ड भी रखना होगा. स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार यह फैसला उन औषधीय दवाओं के दुरुपयोग को रोकने के लिए लिया गया है जिनमें एथिल अल्कोहल की मात्रा काफी ज्यादा होती है.&amp;nbsp;
किन दवाओं पर लागू होगा नया नियम?&amp;nbsp;
नया नियम उन ओरल मेडिसिनल फॉर्मूलेशन पर लागू होगा, जिनमें 12 प्रतिशत से ज्यादा एथिल अल्कोहल हो और जो 30 मिलीलीटर से बड़े पैक में बेचे जाते हो. इनमें इलायची, अदरक और दूसरे सुगंधित पदार्थ से तैयार किए जाने वाले कुछ टिंचर और हर्बल लिक्विड प्रिपरेशन भी शामिल है. यह प्रोडक्ट ड्रग्स रूल की अनुसूची के तहत लाइसेंस से छूट प्राप्त कैटेगरी में आते थे. इसी छूट का फायदा उठाकर कुछ प्रोडक्ट में 60 से 90 प्रतिशत तक एथिल अल्कोहल का इस्तेमाल किया जा रहा था, जिससे उनके गलत इस्तेमाल की आशंका बढ़ गई थी. &amp;nbsp;
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सरकार की सख्ती के बाद अब क्या बदलेगा?&amp;nbsp;
सरकार के नए संशोधन के बाद ऐसी सभी दवाओं को लाइसेंस लेकर ही बनाया और बेचा जा सकेगा. साथ ही उन्हें अनुसूची एच1 के तहत रखा गया है. इसका सीधा असर यह होगा की दवा केवल रजिस्टर्ड डॉक्टर के प्रिस्क्रिप्शन पर मिलेगी, मेडिकल स्टोर को हर बिक्री का रिकॉर्ड सुरक्षित रखना होगा, इन दवाओं की सप्लाई केवल लाइसेंस प्राप्त फार्मास्यूटिकल चैन के जरिए ही होगी और बिना नियम की अनुमति के इनका निर्माण और वितरण भी नहीं किया जा सकेगा. सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि नियम राजपत्र में अधिसूचना प्रकाशित होने के 6 महीने के बाद लागू होगा, ताकि निर्माता और विक्रेता नए नियमों के अनुसार अपनी व्यवस्था कर सके.&amp;nbsp;
सरकार ने सख्ती क्यों की?&amp;nbsp;
स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार इलायची और अदरक जैसे पदार्थों से बनने वाले कुछ टिंचर मूल रूप से औषधीय उपयोग के लिए तैयार किए जाते हैं. इन्हें पाचन संबंधी समस्याओं सहित दूसरे चिकित्सीय जरूरतों में इस्तेमाल किया जाता रहा है, हालांकि जांच में सामने आया कि कुछ प्रोडक्ट में एथिल अल्कोहल की मात्रा 80 से 90 प्रतिशत तक थी, जिसके कारण इनका इस्तेमाल शराब के ऑप्शन के रूप में किया जाने लगा. इसी को देखते हुए सरकार ने नियमों में बदलाव कर इन प्रोडक्ट को सख्त निगरानी के दायरे में लाने का फैसला किया है.
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        <pubDate>Sat, 11 Jul 2026 18:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>Swiggy पर FSSAI का बड़ा एक्शन, ग्राहकों की शिकायतों के बाद जारी किए 9 नोटिस</title>
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        <description><![CDATA[ Swiggy Instamart FSSAI Notice: ऑनलाइन फूड डिलीवरी कंपनी स्विगी एक बार फिर चर्चा में है. भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने स्विगी इंस्टामार्ट को फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड एक्ट 2006 के कथित उल्लंघन से जुड़े मामले में 9 नोटिस जारी किए हैं. यह नोटिस ग्राहकों की ओर से लगातार में मिली शिकायतों के आधार पर भेजे गए हैं, जिनमें एक्सपायर्ड, सड़े-गले, दूषित और खाने योग्य नहीं रहे खाने के प्रोडक्ट की डिलीवरी का आरोप लगाया गया है.
FSSAI ने कंपनी से सभी आरोपों पर डॉक्यूमेंट के साथ विस्तृत स्पष्टीकरण और नियमों के पालन की रिपोर्ट मांगी है. साथ ही स्पष्ट किया है कि निर्धारित समय के अंदर जवाब नहीं मिलने पर फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड एक्ट 2006 के तहत कानूनी कार्रवाई की जा सकती है.&amp;nbsp;
किन शिकायतों के आधार पर जारी किए गए 9 नोटिस?

ग्राहकों ने शिकायत की कि स्विगी इंस्टामार्ट के जरिए एक्सपायर, सड़े-गले, दूषित और मानव उपभोग के लिए असुरक्षित खाने के प्रोडक्ट डिलीवर किए गए हैं.&amp;nbsp;
FSSAI के अनुसार नॉइस एग्स ऐसे ब्रांड नाम से बेचे जा रहे थे, जो कंपनी के मौजूदा FSSAI लाइसेंस में स्वीकृत प्रोडक्ट कैटेगरी का हिस्सा नहीं था. प्राधिकरण ने निर्देश दिया कि वैध लाइसेंस मिलने तक इस प्रोडक्ट की बिक्री न की जाए और जरूरत होने पर लाइसेंस में संशोधन कराया जाए.&amp;nbsp;
शिकायतों में कहा गया कि Healthify 100% Whey Protein 1 किलो और Noice Home Style Madras Mixture with Peanuts जैसे प्रोडक्ट एक्सपायरी डेट गुजरने के बाद भी ग्राहकों तक पहुंचाए गए.
Akshayakalpa Organic Egg के बारे में शिकायत मिली कि अंडे एक्सपायर्ड, सड़े हुए, बदबूदार और दूषित थे, जिससे वह खाने योग्य नहीं थे. शिकायत बढ़ाए जाने के बावजूद कथित तौर पर कोई सुधारात्मक कार्रवाई नहीं की गई.&amp;nbsp;
एक अन्य शिकायत में काके दा पराठा खराब और बदबूदार हालत में डिलीवरी होने की बात कही गई. शिकायत के बावजूद उचित कार्रवाई नहीं होने का भी आरोप लगाया गया.&amp;nbsp;
वहीं एक इन्फेंट फूड फॉर्मूलेशन के खराब, दूषित और असुरक्षित स्थिति में मिलने की शिकायत दर्ज हुई. आरोप है कि ग्राहक की ओर से खराब प्रोडक्ट लौटने के बाद भी उसी तरह का खराब प्रोडक्ट दोबारा भेज दिया गया.&amp;nbsp;
FSSAI को ऐसी शिकायत भी मिली है, जिनमें दूषित अंडे, खराब दूध और फटे या क्षतिग्रस्त पैक्ड फूड आइटम ग्राहकों तक पहुंचाने का आरोप लगाया गया.&amp;nbsp;
नोटिस में यह भी कहा गया कि कुछ मामलों में गलत, अमान्य या गलत FSSAI लाइसेंस नंबर का इस्तेमाल किया गया. साथ ही कुछ फूड बिजनेस एंटिटी ऐसे नामों में लिस्टेड मिली जो उनके FSSAI रजिस्ट्रेशन से मेल नहीं खाते हैं.&amp;nbsp;
कई शिकायत में आरोप लगाया गया कि शिकायत दर्ज होने और एस्केलेड किए जाने के बाद भी संतोषजनक जवाब, शिकायत निवारण या सकारात्मक कार्रवाई नहीं की गई. एक मामले में केवल रिफंड देकर मामला बंद करने की बात सामने आई, जबकि खाद्य सुरक्षा से जुड़े मुद्दे का समाधान नहीं किया गया. FSSAI ने विक्रेता ऑन बोर्डिंग, कंप्लायंस वेरिफिकेशन, ट्रेसेब्लिटी, फूड क्वालिटी मॉनिटरिंग, उपभोक्ता शिकायत निवारण और फूड सेफ्टी सिस्टम की पर्याप्तता पर &amp;nbsp;भी सवाल उठाए गए.&amp;nbsp;

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FSSAI ने स्विगी इंस्टामार्ट से क्या मांग की?
फूड रेगुलेटर ने कंपनी को निर्देश दिया कि वह सभी आरोपों पर दस्तावेजों के साथ विस्तृत जवाब दे. इसके अलावा गुणवत्ता नियंत्रण, फूड सेफ्टी मॉनिटरिंग, इन्वेंटरी मैनेजमेंट, स्टॉक रोटेशन, स्टोरेज, हैंडलिंग और अतिरिक्त नियंत्रण से जुड़ी पूरी जानकारी उपलब्ध कराई कराई. FSSAI ने कंपनी से यह भी कहा कि वह प्रत्येक मामले का रूट कॉज एनालिसिस, अपनाए गए कलेक्टिव एंड प्रीवेंटिव एक्शन उपभोक्ता शिकायतों के निस्तारण की जानकारी और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए उठाए गए कदमों का विवरण भी सौंपे. निर्धारित समय के अंदर अनुपालन रिपोर्ट नहीं देने पर फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड एक्ट 2006 के तहत आगे की कार्रवाई की जा सकती है.
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        <pubDate>Sat, 11 Jul 2026 18:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>Ginger Turmeric Tea: मानसून में सर्दी&amp;खांसी से रहना है दूर? रोज पिएं अदरक&amp;हल्दी की ये गर्म चाय</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/ginger-turmeric-tea-मानसून-में-सर्दी-खांसी-से-रहना-है-दूर-रोज-पिएं-अदरक-हल्दी-की-ये-गर्म-चाय</link>
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        <description><![CDATA[ Ginger Turmeric Tea: मानसून में सर्दी-खांसी से रहना है दूर? रोज पिएं अदरक-हल्दी की ये गर्म चाय ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 10 Jul 2026 14:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Vitamin Deficiency Symptoms: क्या पूरी नींद लेने के बाद भी छाई रहती है थकान? इग्नोर किया तो हो सकती है गंभीर बीमारी!</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/vitamin-deficiency-symptoms-क्या-पूरी-नींद-लेने-के-बाद-भी-छाई-रहती-है-थकान-इग्नोर-किया-तो-हो-सकती-है-गंभीर-बीमारी</link>
        <guid>https://hindi.attentionindia.com/vitamin-deficiency-symptoms-क्या-पूरी-नींद-लेने-के-बाद-भी-छाई-रहती-है-थकान-इग्नोर-किया-तो-हो-सकती-है-गंभीर-बीमारी</guid>
        <description><![CDATA[ Early Signs Of Vitamin Deficiency You Should Not Ignore: अगर आप अक्सर थकान महसूस करते हैं या आपके नाखून जल्दी टूट जाते हैं, तो यह शरीर का संकेत हो सकता है कि अंदर कुछ कमी चल रही है. आज की तेज रफ्तार जिंदगी में खराब खानपान, ज्यादा तनाव और पैकेट वाले खाने की आदत के कारण पोषण की कमी आम होती जा रही है. &amp;nbsp;दिक्कत यह है कि ये समस्याएं धीरे-धीरे सामने आती हैं, इसलिए लोग इन्हें नजरअंदाज कर देते हैं.&amp;nbsp;
क्या कहते हैं एक्सपर्ट
अमृता अस्पताल, फरीदाबाद में आंतरिक रोग एक्सपर्ट डॉ. मोहित शर्मा ने TOI को बताया कि पोषण की कमी लोगों की सोच से ज्यादा आम है, खासकर शहरों में. उनके अनुसार इसके लक्षण अक्सर हल्के और सामान्य होते हैं, इसलिए सही समय पर पहचानना मुश्किल हो जाता है.&amp;nbsp;
क्या होते हैं इसके लक्षण?
सबसे पहला संकेत है लगातार थकान महसूस होना. अगर पूरी नींद लेने के बाद भी शरीर में सुस्ती बनी रहती है, तो यह शरीर में जरूरी तत्वों की कमी का इशारा हो सकता है. &amp;nbsp;यह स्थिति धीरे-धीरे काम करने की क्षमता और एनर्जी दोनों को प्रभावित करने लगती है. &amp;nbsp;दूसरा संकेत है बालों का जरूरत से ज्यादा झड़ना. &amp;nbsp;मौसम बदलने पर थोड़ा बहुत बाल गिरना सामान्य है, लेकिन अगर यह लगातार और ज्यादा हो रहा है, तो यह अंदरूनी कमी का असर हो सकता है. बालों की जड़ों को सही पोषण न मिलने पर उनका प्राकृतिक विकास चक्र बिगड़ने लगता है.
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ये भी होते हैं संकेत
तीसरा संकेत है मुंह में बार-बार छाले होना या होंठों का फटना. &amp;nbsp;अक्सर लोग इसे छोटी समस्या समझकर अनदेखा कर देते हैं, लेकिन यह भी शरीर में पोषण की कमी का संकेत हो सकता है. केवल बाहरी उपचार से राहत मिलती है, लेकिन असली कारण अंदर ही रहता है. चौथा संकेत है हाथ-पैरों में झुनझुनी या सुन्नपन महसूस होना. यह एक ऐसा लक्षण है जिसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह नसों पर असर का संकेत हो सकता है. &amp;nbsp;समय रहते ध्यान न देने पर यह समस्या आगे चलकर गंभीर रूप ले सकती है.&amp;nbsp;
पांचवां संकेत है त्वचा का पीला पड़ना और नाखूनों का कमजोर होना. &amp;nbsp;अगर चेहरा फीका दिखने लगे या नाखून बार-बार टूटने लगें, तो यह भी शरीर में जरूरी पोषक तत्वों की कमी की ओर इशारा करता है.&amp;nbsp;
कैसे पता कर सकते हैं आप?
डॉ. मोहित शर्मा के अनुसार, अच्छी बात यह है कि ऐसी कमी का पता एक साधारण खून की जांच से चल सकता है. सही समय पर खानपान में बदलाव या जरूरत पड़ने पर सप्लीमेंट लेने से बड़ी समस्या से बचा जा सकता है. शरीर के छोटे-छोटे संकेतों को समझना ही बेहतर सेहत की पहली सीढ़ी है.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 10 Jul 2026 02:30:14 +0530</pubDate>
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        <title>Intermittent Fasting Risks: क्या आप भी करते हैं 16:8 फास्टिंग? रिसर्च का ये डराने वाला सच जान लें</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/intermittent-fasting-risks-क्या-आप-भी-करते-हैं-168-फास्टिंग-रिसर्च-का-ये-डराने-वाला-सच-जान-लें</link>
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        <description><![CDATA[ Can Intermittent Fasting Increase Heart Disease Risk: आजकल उपवास सिर्फ धार्मिक परंपरा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि फिटनेस की दुनिया में भी तेजी से लोकप्रिय हो गया है. 16:8 जैसे तरीकों से लेकर दिन में एक बार खाने तक, लोगों को यह आसान तरीका लगता है कम खाओ, जल्दी वजन घटाओ और बेहतर महसूस करो. शुरूआती दौर में कई लोगों को इसके फायदे भी दिखे, जैसे वजन कम होना, शुगर नियंत्रण में रहना और कोलेस्ट्रॉल घटाना. लेकिन अब नई रिसर्च इस ट्रेंड को लेकर कुछ गंभीर सवाल खड़े कर रही है.&amp;nbsp;
क्या निकला रिसर्च में?
हाल ही में 20 हजार से ज्यादा लोगों पर किए गए एक एनालिसिस में पाया गया कि जो लोग दिन में सिर्फ 8 घंटे या उससे कम समय में खाना खाते हैं, उनमें दिल से जुड़ी बीमारियों से मौत का खतरा ज्यादा देखा गया. &amp;nbsp;कुछ मामलों में यह खतरा 91 प्रतिशत तक अधिक पाया गया. इसका मतलब यह नहीं है कि उपवास हर किसी के लिए नुकसानदायक है, लेकिन यह धारणा जरूर चुनौती में आ गई है कि कम समय में खाना हमेशा बेहतर होता है.&amp;nbsp;
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क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
डॉ. दिव्य रंजन बेहेरा ने TOI को बताया कि लंबे समय तक उपवास रखने से शरीर में अचानक कई बदलाव होते हैं. खून में शर्करा का स्तर तेजी से घटता-बढ़ता है, तनाव से जुड़े हार्मोन बढ़ते हैं और वसा का स्तर भी प्रभावित होता है. &amp;nbsp;ये सभी बदलाव दिल पर दबाव डाल सकते हैं. वहीं डॉ. दीतेश एम के अनुसार, लंबे अंतराल तक भोजन न करने से शुगर, खनिज तत्व और हार्मोन में उतार-चढ़ाव होता है, जिससे दिल की धड़कन अनियमित हो सकती है.
पानी की कमी
एक और बड़ा कारण है पानी की कमी, जब लोग लंबे समय तक नहीं खाते, तो अक्सर पानी भी कम पीते हैं. &amp;nbsp;इससे शरीर में जरूरी खनिज जैसे पोटैशियम और मैग्नीशियम घट सकते हैं, जो दिल की सामान्य धड़कन के लिए जरूरी होते हैं. &amp;nbsp;डॉ. सुनील रॉय टी एन बताते हैं कि इन खनिजों की कमी और पानी की कमी से दिल को सामान्य गति बनाए रखने के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है.&amp;nbsp;
किन लोगों को रखनी चाहिए सावधानी&amp;nbsp;
हर व्यक्ति के लिए उपवास समान रूप से सुरक्षित नहीं है. &amp;nbsp;जिन लोगों को पहले से डायबिटीज, हाई बीपी या हार्ट से जुड़ी समस्या है, उन्हें विशेष सावधानी बरतनी चाहिए, इसके अलावा जो लोग कुछ विशेष दवाइयां लेते हैं, उनके लिए भी यह तरीका जोखिम भरा हो सकता है. हेल्दी व्यक्ति भी शरीर के संकेतों को नजरअंदाज नहीं कर सकते, बार-बार थकान, चक्कर आना, सीने में असहजता या धड़कन तेज होना जैसे लक्षण इस बात का संकेत हैं कि शरीर पर दबाव बढ़ रहा है.
जरूरत से ज्यादा सख्ती बरतने से शारीरिक और मानसिक दोनों तरह की थकान बढ़ सकती है. कम ऊर्जा, चिड़चिड़ापन और काम करने की क्षमता में कमी जैसे असर धीरे-धीरे सामने आने लगते हैं. इसलिए संतुलन सबसे जरूरी है. &amp;nbsp;उपवास अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन जब यह जरूरत से ज्यादा सख्त या बिना योजना के किया जाता है, तब समस्या पैदा होती है। सही तरीका यही है कि खानपान में संतुलन रखा जाए और किसी भी बड़े बदलाव से पहले डॉक्टर की सलाह ली जाए.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 10 Jul 2026 02:30:13 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Intermittent, Fasting, Risks:, क्या, आप, भी, करते, हैं, 16:8, फास्टिंग, रिसर्च, का, ये, डराने, वाला, सच, जान, लें</media:keywords>
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        <title>Gastro Shield Diet:  पेट को कभी बूढ़ा नहीं होने देगी ये नई &amp;apos;गैस्ट्रो&amp;शील्ड&amp;apos; डाइट, जानें 40 की उम्र के बाद क्यों है जरूरी </title>
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        <description><![CDATA[ Gastro Shield Diet:&amp;nbsp;बढ़ती उम्र के हर आदमी की एक ही समस्या होती है कि उनके पेट की आंतों की कार्यक्षमता कम हो जाती है. इसका कारण यह है कि 40 की उम्र के बाद उनके शरीर में एंजाइम बनने की प्रक्रिया कम हो जाती है. यही वजह है कि उनके खाना पचाने की क्षमता पहले जैसी नहीं रहती है. ऐसे में बहुत से लोगों को समझ नहीं आता कि वे अपनी डाइट किस तरह की रखें. आइए जानते हैं इसके बारे में पूरी जानकारी.
विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि 40 की उम्र के बाद उनकी पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है, जिस पर वे गैस्ट्रो-शील्ड पर विश्वास करते हैं. बता दें कि गैस्ट्रो-शील्ड एक ऐसा तरीका है, जो पेट की परत यानी गट लाइनिंग को मजबूत बनाकर रखता है. साथ ही यह पेट में सूजन होने से भी बचाता है.
गैस्ट्रो-शील्ड डाइट में क्या-क्या खाना चाहिए?
विशेषज्ञों के अनुसार इस डाइट का मुख्य आधार फाइबर से भरपूर खाना है, जैसे साबुत अनाज, दाल, हरी सब्जियां और फल, जो सेहत के साथ-साथ पेट के लिए भी बहुत फायदेमंद साबित होते हैं. इसके साथ ही दही, छाछ, इडली-डोसा जैसे पदार्थ भी डाइट में शामिल करने चाहिए, क्योंकि माना जाता है कि इनमें प्राकृतिक रूप से अच्छे बैक्टीरिया पाए जाते हैं. बात बस यहीं तक खत्म नहीं होती है, बहुत समय पहले से विशेषज्ञ इस तरह की डाइट के अलावा रोजाना पर्याप्त पानी पीते रहने की सलाह भी देते आ रहे हैं. ऐसा करने से यह आपके पाचन तंत्र को सही ढंग से काम करने में मदद करता है.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ेंः Pregnancy Test Kit: प्रेग्नेंसी किट कैसे पता कर लेती है आप प्रेग्नेंट हैं या नहीं? समझिए इसके पीछे का साइंस
किन चीजों से बचना चाहिए
अच्छी डाइट के अलावा अगर उन चीजों की बात करें, जिनसे विशेषज्ञ दूर रहने की सलाह देते हैं, तो उनमें सबसे जरूरी बात है कि बहुत ज्यादा तेल-भुना, मसालेदार और प्रोसेस्ड खाना खाने से बचें. इससे पेट की परत को नुकसान पहुंचता है. इसके अलावा ज्यादा चीनी और मैदे से बनी चीजें भी अच्छे बैक्टीरिया के लिए नुकसानदेह मानी जाती हैं. और सबसे जरूरी बात, बार-बार बिना जरूरत के दर्द निवारक दवाइयां लेने से भी पेट की परत कमजोर हो जाती है. इसलिए किसी भी दवाई का सेवन करने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लेनी चाहिए.
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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        <pubDate>Thu, 09 Jul 2026 10:30:19 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Benefits Of Matcha Tea:  ग्रीन&amp;टी का जमाना गया! अब वजन घटाने के लिए सेलिब्रिटीज क्यों पी रहे हैं हरी &amp;apos;माचा चाय&amp;apos;?</title>
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        <description><![CDATA[ Benefits Of Matcha Tea:&amp;nbsp;आज के समय में हरे रंग की चाय सोशल मीडिया पर एक अलग ही ट्रेंड बन गई है, जिसे सभी लोग माचा टी के नाम से जान रहे हैं. इस अचानक से आए ट्रेंड को देखकर हर किसी के दिमाग में यही सवाल आ रहा है कि आखिर यह नए प्रकार की चाय होती कैसी है. ऐसे में आपको बता दें कि यह असल में ग्रीन-टी का ही एक खास रूप है, लेकिन इसे बनाने का तरीका अलग होता है. सादी ग्रीन-टी में सिर्फ पानी में पत्तियां उबाली जाती हैं, जबकि माचा में पूरी पत्ती का पाउडर पानी में घोलकर पिया जाता है. यही वजह है कि माचा को ग्रीन-टी के मुकाबले ज्यादा फायदेमंद माना जा रहा है.
सेलिब्रिटीज को माचा इतनी क्यों पसंद आ रही है?
ऐसे ही अचानक से माचा सोशल मीडिया पर ट्रेंड नहीं आ गई है. इसे चर्चा में लाने में सबसे बड़ा हाथ आजकल के सेलिब्रिटीज और कंटेंट क्रिएटर्स का है. वे अपने रोज के रूटीन में माचा को शामिल कर रहे हैं.&amp;nbsp; इसके पीछे की वजह है कि माचा में कैटेचिन नाम का एक एंटीऑक्सीडेंट पाया जाता है, खासकर EGCG नाम का तत्व, जो शरीर की चर्बी घटाने में मदद करता है.&amp;nbsp; कई रिपोर्ट्स के मुताबिक माचा हमारे शरीर की कैलोरी बर्न करने की क्षमता को भी बढ़ाता है. इसके अलावा माचा में कैफीन और एल-थियेनिन के तत्व भी पाए जाते हैं, जो दिमाग को शांत रखते हैं और ऊर्जा देते हैं. यही कारण है कि अब चाय और कॉफी की जगह कई लोग सुबह माचा पीना पसंद कर रहे हैं.
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क्या सच में माचा से वजन कम होता है?
इस जानकारी के बाद अक्सर हर किसी के दिमाग में यही सवाल आता है कि क्या किया जा रहा दावा वाकई में उतना सच्चा है? क्या सच में माचा वजन कम करने में मदद करता है? तो इसके जवाब में बता दें कि माचा कोई जादुई या चमत्कारी ड्रिंक नहीं है, जो अचानक से अकेले ही वजन घटा देगा. विशेषज्ञों के अनुसार, चाहे वे माचा पिएं या फिर कोई भी वजन कम करने वाली अद्भुत ड्रिंक, ये सभी केवल वजन कम करने में मदद कर सकती हैं.&amp;nbsp; इनका असर इतना नहीं होता कि केवल इन्हें पीने से वजन कम हो जाए.&amp;nbsp; यानी बिना खान-पान पर ध्यान दिए, बिना एक्सरसाइज किए केवल इन ड्रिंक्स के भरोसे बैठने से वजन पर कोई असर नहीं पड़ता.&amp;nbsp;
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
यह भी पढ़ेंः&amp;nbsp; Pregnancy Test Kit: प्रेग्नेंसी किट कैसे पता कर लेती है आप प्रेग्नेंट हैं या नहीं? समझिए इसके पीछे का साइंस ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 09 Jul 2026 10:30:17 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Benefits, Matcha, Tea:, ग्रीन-टी, का, जमाना, गया, अब, वजन, घटाने, के, लिए, सेलिब्रिटीज, क्यों, पी, रहे, हैं, हरी, माचा, चाय</media:keywords>
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        <title>Pregnancy Test Kit: प्रेग्नेंसी किट कैसे पता कर लेती है आप प्रेग्नेंट हैं या नहीं? समझिए इसके पीछे का साइंस</title>
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        <description><![CDATA[ Pregnancy Test Kit:&amp;nbsp;प्रेग्नेंसी का समय हर महिला के लिए एक बहुत खास समय होता है. एक महिला प्रेग्नेंट है या नहीं, यह पता करने के लिए हर महिला प्रेग्नेंसी किट पर भरोसा करती है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा जिस प्रेग्नेंसी किट पर महिला आंख बंद करके भरोसा कर लेती हैं, वह किट यह चीज तय कैसे करती है कि महिला प्रेग्नेंट है.
इसके जवाब में बता दें कि जब कोई महिला प्रेग्नेंट होती है, तो उसके शरीर में एक खास हार्मोन बनना शुरू हो जाता है, जिसका नाम &amp;nbsp;hCG&amp;nbsp;होता है, यानी ह्यूमन कोरियोनिक गोनाडोट्रोपिन (Human Chorionic Gonadotropin). यह हार्मोन आमतौर पर मां बनने के 8 से 12 दिन में बनना शुरू हो जाता है. जैसे-जैसे प्रेग्नेंसी आगे बढ़ती है, यह हार्मोन शरीर में बढ़ता जाता है. यही एचसीजी हार्मोन प्रेग्नेंसी किट की पूरी टेस्टिंग के लिए काम आता है. यह हार्मोन खून के साथ-साथ पेशाब में भी पहुंच जाता है, और इसी वजह से पेशाब से टेस्ट करना मुमकिन हो पाता है.
किट के अंदर क्या होता है?
प्रेग्नेंसी किट के अंदर एक खास तरह की पट्टी लगी होती है, जिस पर एंटीबॉडी नाम के छोटे-छोटे कण चिपके होते हैं. ये एंटीबॉडी सिर्फ एचसीजी हार्मोन को ही पहचानते हैं, बाकी किसी चीज को नहीं. जब पेशाब को किट पर डाला जाता है, तो अगर पेशाब में एचसीजी हार्मोन मौजूद है, तो यह एंटीबॉडी से जुड़ जाता है. यह जुड़ाव एक केमिकल रिएक्शन शुरू करता है, जिससे रंग बदलने लगता है. यही वजह है कि किट में सिर्फ पेशाब का इस्तेमाल होता है, खून का नहीं.
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दो लाइन का मतलब क्या होता है?
ज्यादातर प्रेग्नेंसी किट में दो जगह लाइन दिखाने का इंतजाम होता है. एक लाइन कंट्रोल लाइन कहलाती है, जो यह बताती है कि किट सही तरीके से काम कर रही है. दूसरी लाइन टेस्ट लाइन होती है, जो सिर्फ तभी दिखती है जब पेशाब में एचसीजी हार्मोन मौजूद होता है. अगर दोनों लाइन दिखें, तो इसका मतलब है कि महिला प्रेग्नेंट है. अगर सिर्फ एक लाइन दिखे तो इसका मतलब है कि प्रेग्नेंसी नहीं है.
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        <pubDate>Wed, 08 Jul 2026 18:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Pregnancy, Test, Kit:, प्रेग्नेंसी, किट, कैसे, पता, कर, लेती, है, आप, प्रेग्नेंट, हैं, या, नहीं, समझिए, इसके, पीछे, का, साइंस</media:keywords>
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        <title>Causes Of Swollen Feet: पैर में बार&amp;बार आ रही सूजन कर ही इस गंभीर बीमारी का इशारा, तुरंत भागें डॉक्टर के पास</title>
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        <description><![CDATA[ Causes Of Swollen Feet: पैर में बार-बार आ रही सूजन कर ही इस गंभीर बीमारी का इशारा, तुरंत भागें डॉक्टर के पास ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 08 Jul 2026 18:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Causes, Swollen, Feet:, पैर, में, बार-बार, आ, रही, सूजन, कर, ही, इस, गंभीर, बीमारी, का, इशारा, तुरंत, भागें, डॉक्टर, के, पास</media:keywords>
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        <title>Oxytocin Health Risks: RML में सब&amp;स्टैंडर्ड ऑक्सीटोसिन की 2700 वायल फेल, जानें क्यों है यह दवा आपके लिए जानलेवा?</title>
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        <description><![CDATA[ Postpartum Hemorrhage Treatment: ऑक्सीटोसिन की 2700 वायल गुणवत्ता जांच में फेल होने के बाद इस दवा की सुरक्षा को लेकर कई सवाल उठने लगे हैं, ऑक्सीटोसिन का इस्तेमाल प्रसव के दौरान लेबर शुरू कराने और डिलीवरी के बाद ज्यादा ब्लीडिंग को रोकने के लिए किया जाता है, ऐसे में जब इसकी गुणवत्ता पर सवाल खड़े हों, तो यह जानना जरूरी हो जाता है कि खराब या मानक के अनुरूप न होने वाली ऑक्सीटोसिन मरीजों की सेहत पर कितना असर डाल सकती है. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर एक्सपर्ट क्या कहते हैं.&amp;nbsp;
क्यों जरूरी है यह दवा?
हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली वेबसाइट Medicinenet ऑक्सीटोसिन शरीर में बनने वाला एक प्राकृतिक हार्मोन है, जिसे दवा के रूप में भी तैयार किया जाता है. अस्पतालों में इसका उपयोग गर्भाशय के संकुचन बढ़ाने, प्रसव को आगे बढ़ाने और डिलीवरी के बाद अत्यधिक रक्तस्राव को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है. औषधि एक्सपर्ट और फार्माकोलॉजिस्ट डॉ. वी. उदय किरण के अनुसार, के अनुसार यह एक महत्वपूर्ण और जीवनरक्षक दवा है, लेकिन इसकी क्वालिटी और सही मात्रा दोनों का सुरक्षित होना बेहद जरूरी है.&amp;nbsp;
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महिलाओं की मौत के बाद सवाल
राजस्थान के कोटा में सी-सेक्शन के बाद पांच महिलाओं की मौत के मामले में भी ऑक्सीटोसिन को लेकर सवाल उठे थे. जांच के दौरान जिस बैच की जांच की गई, उसमें ऑक्सीटोसिन का एक्टिव इंग्रीडिएंट नहीं मिला,. इसके बाद दवा निर्माता और वितरक के खिलाफ नियामक एजेंसियों ने कार्रवाई की और विश्व स्वास्थ्य संगठन &amp;nbsp;ने भी इस मामले में भारत सरकार से जानकारी मांगी. हालांकि, बाद में राजस्थान सरकार की आठ सदस्यीय एक्सपर्ट समिति और एम्स, नई दिल्ली की छह सदस्यीय टीम की रिपोर्ट में कहा गया कि इन मौतों का सीधा कारण केवल खराब ऑक्सीटोसिन को नहीं माना जा सकता. समिति के अनुसार सभी महिलाओं की चिकित्सीय स्थिति अलग-अलग थी और किसी एक वजह को जिम्मेदार ठहराने के पर्याप्त प्रमाण नहीं मिले.&amp;nbsp;
जांच में यह जरूर सामने आया कि अस्पतालों में कई स्तर पर गंभीर कमियां थीं। हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी वाली महिलाओं की पर्याप्त निगरानी नहीं की गई। कई मरीजों के ब्लड प्रेशर, पल्स रेट, यूरिन आउटपुट, लिवर फंक्शन टेस्ट और दवाओं से जुड़े रिकॉर्ड अधूरे पाए गए। कुछ मामलों में पोस्टमार्टम भी नहीं कराया गया, जिससे मौत के वास्तविक कारण की पुष्टि करना मुश्किल हो गया।
इससे क्या होती है दिक्कत?
Medicinenet के अनुसार, ऑक्सीटोसिन के दुष्प्रभाव की बात है, तो इसके इस्तेमाल के दौरान कुछ मरीजों में मतली, उल्टी, एलर्जी, असामान्य हार्ट रेट,ब्लड प्रेशर में बदलाव और दुर्लभ मामलों में गर्भाशय फटने जैसी गंभीर जटिलताएं भी हो सकती हैं. इसलिए यह दवा केवल डॉक्टर की निगरानी में ही दी जाती है. इसकी मात्रा मरीज की स्थिति के अनुसार तय की जाती है और इसे स्वयं इस्तेमाल करना या बिना मेडिकल सलाह के लेना खतरनाक हो सकता है. एक्सपर्ट का कहना है कि किसी भी दवा की गुणवत्ता में कमी चिंता का विषय है, लेकिन हर गंभीर घटना का कारण केवल दवा नहीं होती. सुरक्षित इलाज के लिए अच्छी गुणवत्ता वाली दवा, सही चिकित्सकीय निगरानी, समय पर इलाज और अस्पतालों में तय प्रोटोकॉल का पालन, सभी समान रूप से जरूरी हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 08 Jul 2026 18:30:05 +0530</pubDate>
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        <title>Egg Vs Dal: दाल&amp;सब्जी के मुकाबले एक अंडे से कितना मिलता है प्रोटीन, बच्चों के पोषण पर कितना पड़ेगा असर?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/egg-vs-dal-दाल-सब्जी-के-मुकाबले-एक-अंडे-से-कितना-मिलता-है-प्रोटीन-बच्चों-के-पोषण-पर-कितना-पड़ेगा-असर</link>
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        <description><![CDATA[ Kolkata Mid Day Meal Egg Removed: कोलकाता के सरकारी स्कूलों में मिड-डे मील से अंडे हटाकर उनकी जगह शाकाहारी विकल्प देने के फैसले के बाद बच्चों के पोषण को लेकर बहस तेज हो गई है. सवाल यह उठ रहा है कि क्या दाल और सब्जी अंडे जितना प्रोटीन दे सकती हैं और इसका बच्चों की सेहत पर क्या असर पड़ सकता है. चलिए आपको इसके बारे में बताते हैं कि आखिर इसका क्या असर होगा.&amp;nbsp;
अंडे क्यों होते हैं बेहतर विकल्प?
अंडे को लंबे समय से उच्च गुणवत्ता वाले प्रोटीन का सस्ता और आसान सोर्स माना जाता है. एक सामान्य अंडे में करीब 6 से 7 ग्राम प्रोटीन होता है. इसमें शरीर के लिए जरूरी सभी आवश्यक अमीनो एसिड पाए जाते हैं, इसलिए इसे कम्प्लीट प्रोटीन भी कहा जाता है. यही वजह है कि बढ़ते बच्चों के खानपान में अंडे को अहम माना जाता है.&amp;nbsp;
दाल और सब्जी का विकल्प?
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि दाल प्रोटीन का अच्छा स्रोत नहीं है. जानी-मानी पोषण सलाहकार और &#039;गोल्ज-पोषण एवं आहार समाधान&#039; की संस्थापक डॉ. सुषमा अप्पैया के अनुसार, लगभग 50 ग्राम कच्ची दाल पकने के बाद करीब 12 ग्राम प्रोटीन देती है. यानी एक कटोरी दाल से दो अंडों के बराबर के आसपास प्रोटीन मिल सकता है. &amp;nbsp;इसके अलावा दाल में फाइबर, आयरन और कई जरूरी पोषक तत्व भी मौजूद होते हैं, जो शरीर के लिए फायदेमंद हैं.&amp;nbsp;
क्या है दोनों में अंतर?
अंडे और दाल में एक बड़ा अंतर है. अंडे का प्रोटीन शरीर आसानी से अवशोषित कर लेता है, जबकि दाल में मौजूद प्रोटीन के साथ कार्बोहाइड्रेट भी अधिक मात्रा में होता है. इसलिए न्यूट्रिशन एक्सपर्ट अक्सर संतुलित आहार में दोनों को शामिल करने की सलाह देते हैं. अगर किसी कारण से अंडा नहीं दिया जा रहा है, तो दाल के साथ दूध, दही, पनीर, सोया या दूसरी प्रोटीन युक्त चीजें शामिल करना जरूरी माना जाता है, ताकि बच्चों की दैनिक प्रोटीन जरूरत पूरी हो सके. &amp;nbsp;भारत के अलग-अलग राज्यों में मिड-डे मील का मेन्यू अलग है. कई राज्यों में बच्चों को सप्ताह में कुछ दिन अंडा दिया जाता है, जबकि कुछ राज्यों में दाल, चना, पनीर, दूध और दूसरी शाकाहारी चीजों के जरिए पोषण देने की व्यवस्था की जाती है.&amp;nbsp;
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बच्चों के लिए क्या जरूरी?
एक्सपर्ट का कहना है कि बच्चों के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि उन्हें रोजाना पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन, विटामिन और मिनरल्स मिलें. अगर अंडे की जगह ऐसा शाकाहारी विकल्प दिया जाता है जो समान पोषण उपलब्ध कराए, तो बच्चों के विकास पर असर कम पड़ सकता है. लेकिन केवल अंडा हटाकर पोषण की भरपाई न की जाए, तो इससे बढ़ते बच्चों की सेहत और शारीरिक विकास प्रभावित होने का खतरा बढ़ सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 08 Jul 2026 06:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Calories Burned: स्वीमिंग, रनिंग या रस्सी कूद... 1 घंटे में किसमें खर्च होती है सबसे ज्यादा कैलोरी, क्या बेहतर?</title>
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        <description><![CDATA[ Which Exercise Burns Most Calories: अगर आपका लक्ष्य वजन कम करना या ज्यादा कैलोरी बर्न करना है, तो अक्सर मन में सवाल आता है कि आखिर स्वीमिंग, रनिंग और रस्सी कूद में सबसे ज्यादा कैलोरी किस एक्सरसाइज से खर्च होती है. तीनों ही बेहतरीन कार्डियो वर्कआउट हैं, लेकिन कैलोरी बर्न करने की क्षमता इनकी तीव्रता, आपकी स्पीड और शरीर के वजन पर भी निर्भर करती है. चलिए आपको इसके बारे में बताते हैं.&amp;nbsp;
किसमें सबसे ज्यादा कैलोरी बर्न होती है?
हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली वेबसाइट healthline के अनुसार रनिंग एक घंटे में सबसे ज्यादा कैलोरी बर्न करने वाली एक्सरसाइज में शामिल है. करीब 70 किलोग्राम वजन वाला व्यक्ति एक घंटे की तेज दौड़ में लगभग 800 कैलोरी तक खर्च कर सकता है. &amp;nbsp;अगर दौड़ने की रफ्तार ज्यादा हो, तो यह आंकड़ा और बढ़ सकता है. यही वजह है कि वजन घटाने की कोशिश कर रहे लोगों के लिए रनिंग को सबसे असरदार कार्डियो एक्सरसाइज माना जाता है.&amp;nbsp;
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रस्सी कूद कितना फायदेमंद?
वहीं रस्सी कूद भी कैलोरी बर्न करने का बेहद प्रभावी तरीका है। एक घंटे तक लगातार मध्यम गति से रस्सी कूदने पर करीब 550 से 700 कैलोरी तक बर्न हो सकती हैं. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके लिए किसी जिम या बड़े उपकरण की जरूरत नहीं होती. घर की थोड़ी-सी जगह में भी यह एक्सरसाइज आसानी से की जा सकती है. इसके साथ ही, इससे पैरों की ताकत, स्टैमिना और हार्ट हेल्थ को भी फायदा मिलता है.&amp;nbsp;
स्वीमिंग हेल्थ के लिए कितना कारगर
अगर बात स्वीमिंग की करें, तो यह पूरे शरीर की एक्सरसाइज मानी जाती है. सामान्य गति से एक घंटे तक तैरने पर लगभग 500 कैलोरी तक खर्च हो सकती हैं. हालांकि अलग-अलग स्टाइल और स्पीड में स्वीमिंग करने पर कैलोरी बर्न का आंकड़ा बढ़ भी सकता है. खास बात यह है कि स्वीमिंग में शरीर के लगभग सभी प्रमुख मसल्स एक साथ काम करते हैं और जोड़ों पर दबाव भी कम पड़ता है. &amp;nbsp;इसलिए जिन लोगों को घुटनों या जोड़ों में दर्द रहता है, उनके लिए यह बेहतर विकल्प माना जाता है.
कैलोरी बर्न ही फिटनेस का पैमाना नहीं&amp;nbsp;
अगर केवल सबसे ज्यादा कैलोरी बर्न करने की बात करें, तो रनिंग पहले स्थान पर रहती है. इसके बाद रस्सी कूद और फिर सामान्य गति से की जाने वाली स्वीमिंग आती है. हालांकि सिर्फ कैलोरी बर्न ही फिटनेस का पैमाना नहीं है. अगर आपको जोड़ों की समस्या है, तो स्वीमिंग ज्यादा सुरक्षित हो सकती है. वहीं कम समय में असरदार वर्कआउट चाहिए, तो रस्सी कूद एक अच्छा विकल्प है. &amp;nbsp;फिटनेस एक्सपर्ट्स का मानना है कि किसी भी एक्सरसाइज से बेहतर परिणाम पाने के लिए उसे नियमित रूप से करना जरूरी है., शुरुआत हमेशा अपनी क्षमता के अनुसार करें, वर्कआउट से पहले वार्म-अप करें और बाद में कूल-डाउन करना न भूलें.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 08 Jul 2026 06:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>AIIMS Study: बिना मिर्गी के पड़ने वाले दौरों पर योग निद्रा कितनी असरदार? एम्स की नई रिसर्च ने चौंकाया</title>
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        <description><![CDATA[ योग निद्रा को तनाव कम करने, अच्छी नींद लाने और मन को शांत रखने के लिए फायदेमंद माना जाता है, लेकिन क्या इससे उन लोगों को भी फायदा मिलता है, जिन्हें मिर्गी जैसे दौरे पड़ते हैं, जबकि उन्हें असल में मिर्गी नहीं होती?
इसी सवाल का जवाब जानने के लिए एम्स (AIIMS) दिल्ली के न्यूरोलॉजी विभाग की प्रोफेसर डॉ. मंजरी त्रिपाठी और उनकी टीम ने एक रिसर्च की. इस स्टडी की मुख्य लेखक डॉ. सारन्या बी. गोमाथी हैं. 50 मरीजों पर हुई इस स्टडी में पाया गया कि मरीजों की हालत में सुधार जरूर हुआ, लेकिन इलाज के साथ योग निद्रा कराने से कोई अलग फायदा नहीं मिला. यह रिसर्च अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल एपिलेप्सी एंड बिहेवियर(Epilepsy &amp;amp; Behavior) में प्रकाशित हुई है.
योग निद्रा क्या है?
योग निद्रा योग की एक ऐसी तकनीक है, जिसमें व्यक्ति आराम से लेटकर आंखें बंद करता है और प्रशिक्षक या ऑडियो के बताए निर्देशों का पालन करता है. इसमें सांस पर ध्यान दिया जाता है, शरीर को पूरी तरह आराम दिया जाता है और मन को शांत करने की कोशिश की जाती है. इसे तनाव, चिंता और नींद की समस्या कम करने में मददगार माना जाता है.
किस बीमारी पर हुई रिसर्च?
यह रिसर्च फंक्शनल डिसोसिएटिव सीजर्स (FDS) नाम की बीमारी पर की गई. इस बीमारी में मरीज को मिर्गी जैसे दौरे पड़ते हैं, लेकिन जांच में पता चलता है कि उसे मिर्गी नहीं है. यानी दौरे तो मिर्गी जैसे दिखते हैं, लेकिन उनकी वजह कुछ और होती है. इसी कारण कई बार मरीजों का लंबे समय तक मिर्गी समझकर इलाज चलता रहता है. इस बीमारी की सही पहचान वीडियो-ईईजी नाम की एक खास जांच से होती है.
कैसे हुई स्टडी?
जनवरी 2021 से फरवरी 2022 के बीच डॉक्टरों ने 72 मरीजों की जांच की. इनमें से 50 मरीजों को रिसर्च में शामिल किया गया. सबसे पहले सभी मरीजों को उनकी बीमारी के बारे में आसान भाषा में समझाया गया और काउंसलिंग दी गई. इसके बाद 25 मरीजों को योग निद्रा कराई गई, जबकि बाकी 25 मरीजों को उसी समय का एक सामान्य ऑडियो सुनाया गया, जिसमें योग निद्रा की मुख्य तकनीकें शामिल नहीं थीं. इसके बाद सभी मरीजों की छह महीने तक निगरानी की गई.
रिसर्च में क्या पता चला?
छह महीने बाद दोनों समूहों के मरीजों में अच्छा सुधार देखने को मिला. मरीजों को पहले के मुकाबले कम दौरे पड़े. उनकी चिंता और अवसाद भी कम हुआ और रोजमर्रा की जिंदगी पहले से बेहतर हुईए लेकिन जिन मरीजों ने योग निद्रा की, उन्हें दूसरे समूह की तुलना में कोई अलग फायदा नहीं मिला. यानी इलाज के साथ योग निद्रा जोड़ने से इस स्टडी में बेहतर नतीजे नहीं मिले.
किन लोगों पर हुई स्टडी?
स्टडी में शामिल ज्यादातर मरीज युवा महिलाएं थीं. करीब 66 फीसदी मरीजों का पहले मिर्गी समझकर इलाज किया जा चुका था. वहीं, ज्यादातर मरीजों ने पढ़ाई का दबाव, घरेलू तनाव या पारिवारिक समस्याओं जैसी बातों का जिक्र किया. आधे से ज्यादा मरीज चिंता और अवसाद जैसी मानसिक समस्याओं से भी जूझ रहे थे.
डॉक्टरों ने क्या कहा?
रिसर्च करने वाले डॉक्टरों का कहना है कि इस स्टडी में योग निद्रा से कोई नुकसान या दुष्प्रभाव नहीं देखा गया. हालांकि, यह साबित नहीं हो सका कि इस बीमारी के इलाज में योग निद्रा जोड़ने से मरीजों को अलग से ज्यादा फायदा मिलता है. इसलिए इस विषय पर बड़े स्तर पर और लंबे समय तक रिसर्च किए जाने की जरूरत है.
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        <pubDate>Tue, 07 Jul 2026 01:30:14 +0530</pubDate>
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        <title>Monsoon Diseases: बारिश के मौसम में सबसे ज्यादा फैलने वाली 7 बीमारियां कौन&amp;सी, इनसे बचने के आसान उपाय क्या?</title>
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        <description><![CDATA[ Common Monsoon Diseases And Prevention: मानसून की बारिश जहां गर्मी से राहत दिलाती है, वहीं अपने साथ कई तरह की बीमारियों का खतरा भी लेकर आती है. हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली वेबसाइट Healthline के अनुसार, बारिश के दौरान जगह-जगह पानी जमा हो जाता है, जिससे मच्छरों का प्रजनन तेजी से बढ़ता है. वहीं दूषित पानी और गंदगी के कारण बैक्टीरिया और वायरस भी तेजी से फैलते हैं. ऐसे में थोड़ी-सी लापरवाही आपकी सेहत पर भारी पड़ सकती है. चलिए आपको बताते हैं बारिश के मौसम में सबसे ज्यादा होने वाली 7 बीमारियों और उनसे बचने के आसान उपायों के बारे में.&amp;nbsp;
डेंगू
बारिश के मौसम में डेंगू के मामले तेजी से बढ़ते हैं. यह एडीज मच्छर के काटने से फैलता है. तेज बुखार, सिरदर्द, आंखों के पीछे दर्द, शरीर और जोड़ों में तेज दर्द इसके प्रमुख लक्षण हैं. इससे बचने के लिए घर के आसपास पानी जमा न होने दें, मच्छरदानी का इस्तेमाल करें और पूरे शरीर को ढकने वाले कपड़े पहनें.
इसे भी पढ़ेंः सुबह सिर्फ 10 मिनट का ये योगा बदल देगा आपका दिन, एनर्जी, फोकस और फिटनेस तीनों में होगा फायदा&amp;nbsp;
मलेरिया
मलेरिया इंफेक्टेड मच्छर के काटने से होता है. इसमें ठंड लगकर बुखार आना, पसीना आना, कमजोरी और सिरदर्द जैसे लक्षण दिखाई देते हैं. मच्छरों से बचाव के लिए रिपेलेंट का इस्तेमाल करें और शाम के समय विशेष सावधानी बरतें.
चिकनगुनिया
यह भी मच्छरों के जरिए फैलने वाली बीमारी है. इसमें अचानक तेज बुखार के साथ जोड़ों में इतना दर्द हो सकता है कि चलना-फिरना मुश्किल हो जाए. घर और आसपास साफ-सफाई रखने तथा मच्छरों की रोकथाम करने से इसका खतरा काफी कम किया जा सकता है.
टाइफाइड
दूषित भोजन और पानी के कारण टाइफाइड होने का खतरा मानसून में बढ़ जाता है. लगातार बुखार, पेट दर्द, कमजोरी और पाचन संबंधी समस्याएं इसके सामान्य लक्षण हैं. हमेशा उबला या साफ पानी पिएं और खुले में बिकने वाले खाने से परहेज करें.
हेपेटाइटिस ए
यह इंपेक्शन भी गंदे पानी और दूषित भोजन के जरिए फैलता है. इसमें आंखों और त्वचा का पीला पड़ना, भूख कम लगना, थकान और पेट दर्द जैसी समस्याएं हो सकती हैं. भोजन और पानी की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखना इसका सबसे अच्छा बचाव है.
गैस्ट्रोएंटेराइटिस
बारिश के मौसम में पेट से जुड़ी समस्याएं भी काफी बढ़ जाती हैं. दूषित खाना या पानी खाने से दस्त, उल्टी, पेट दर्द और डिहाइड्रेशन की शिकायत हो सकती है. हमेशा ताजा और अच्छी तरह पका हुआ भोजन खाएं और पर्याप्त मात्रा में पानी पीते रहें.
सर्दी-जुकाम और फ्लू
मौसम में अचानक बदलाव और बढ़ी हुई नमी के कारण वायरल इंफेक्शन तेजी से फैलते हैं. नाक बहना, गले में खराश, खांसी और हल्का बुखार इसके आम लक्षण हैं. हाथों की नियमित सफाई करें, पर्याप्त नींद लें और पौष्टिक भोजन खाकर अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत रखें.
बारिश के मौसम में छोटी-सी सावधानी कई गंभीर बीमारियों से बचा सकती है. साफ पानी पीना, घर के आसपास पानी जमा न होने देना, संतुलित आहार लेना और जरूरत पड़ने पर समय रहते डॉक्टर से सलाह लेना आपकी और पूरे परिवार की सेहत को सुरक्षित रखने में मदद कर सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 07 Jul 2026 01:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>Checking Phone After Waking Up: सुबह उठते ही देखते हैं फोन? ये आदत बना देगी इस गंभीर बीमारी का मरीज, आज ही संभलें</title>
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        <description><![CDATA[ Checking Phone After Waking Up:&amp;nbsp;सुबह-सुबह उठते ही कई लोगों की आदत होती है कि वे गर्म पानी पीते हैं, एक्सरसाइज करने जाते हैं, ये सारी बातें तो अच्छी आदतों में गिनी जाती हैं, पर एक ओर आदत होती है जिसे अक्सर हर कोई नजरअंदाज कर देता है, वह है सुबह की शुरुआत फोन देखकर करना. आज के समय में नींद खुलते ही सबसे पहला काम मैसेज, सोशल मीडिया और खबरें चेक करना बन गया है.
कई रिपोर्ट्स में यह बात सामने आई है कि करीब 70 से 80 प्रतिशत लोग जागने के 10 से 15 मिनट के अंदर ही अपना फोन उठा लेते हैं. यह आदत देखने में बहुत छोटी लगती है, लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि यह आदत धीरे-धीरे शरीर और दिमाग दोनों पर नुकसान पहुंचाती है. वे यह भी बताते हैं कि समय रहते इस आदत को नहीं सुधारा गया, तो यह आगे चलकर एक बड़ी परेशानी का रूप ले सकती है.
सुबह-सुबह मोबाइल चलाने से दिमाग पर क्या पड़ता है असर
यह बात जानकर कई लोगों के दिमाग में आता है कि आखिर सुबह-सुबह फोन चलाने से क्या होता है. ऐसे में बता दें कि असल में जब हम सोकर उठते हैं, तो हमारा दिमाग एक हल्की सी नींद और जागने के बीच की अवस्था में होता है, जिसे विशेषज्ञ &quot;स्लीप इनर्शिया&quot; कहते हैं. इस समय दिमाग को धीरे-धीरे जागने और शांत तरीके से एक्टिव होने की जरूरत होती है. लेकिन जैसे ही हम फोन उठाकर मैसेज, ईमेल या सोशल मीडिया देखना शुरू करते हैं, तब दिमाग पर अचानक से बहुत सारी जानकारी का बोझ पड़ जाता है.
हालांकि ये प्रतिक्रियाएं जरूरत पड़ने पर की जाएं तो उसका असर उतना नहीं होता है, जैसे सोते वक्त किसी की कॉल आ जाए या फिर कोई जरूरी मैसेज आ जाए, लेकिन वहीं अगर यह प्रक्रिया रोज दोहराई जाए, तो धीरे-धीरे शरीर हमेशा हल्के तनाव की स्थिति में रहने लगता है.
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फोन की स्क्रीन कैसे बिगाड़ती है नींद और मानसिक सेहत
सिर्फ मानसिक सेहत ही नहीं, बल्कि यह आदत नींद के पूरे पैटर्न को भी बिगाड़ देती है. सुबह फोन की स्क्रीन से निकलने वाली तेज रोशनी शरीर की प्राकृतिक घड़ी यानी बॉडी क्लॉक को गड़बड़ कर देती है, जिससे रात में नींद ठीक से नहीं आती. नींद पूरी न होने का असर पूरे दिन की एनर्जी, याददाश्त और काम करने की क्षमता पर पड़ता है. इसके अलावा जो लोग सुबह उठते ही नकारात्मक खबरें या तनाव भरी जानकारी देखने लगते हैं, उनका पूरा दिन ही चिड़चिड़ापन और बेचैनी में गुजरता है.
सुबह मोबाइल की आदत छोड़ने के आसान और असरदार तरीके
इस परेशानी के साथ-साथ विशेषज्ञ इससे बचने के तरीके भी बताते हुए कहते हैं कि, जिन लोगों को सुबह उठते ही फोन चलाने की आदत होती है उन्हें सबसे पहले फोन को बेडरूम से बाहर या बिस्तर से दूर चार्जिंग पर रखना चाहिए, ताकि उठते ही हाथ फोन की तरफ न बढ़े. इसके अलावा अलार्म के लिए फोन की जगह अलार्म घड़ी का इस्तेमाल करना चाहिए.&amp;nbsp;
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
यह भी पढ़ेंः&amp;nbsp; 20-20-20 Rule: दिनभर स्क्रीन देखने वालों के लिए 20-20-20 का वह नियम, जो चश्मे का नंबर बढ़ने से रोक देगा ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 06 Jul 2026 09:30:06 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Checking, Phone, After, Waking, Up:, सुबह, उठते, ही, देखते, हैं, फोन, ये, आदत, बना, देगी, इस, गंभीर, बीमारी, का, मरीज, आज, ही, संभलें</media:keywords>
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        <title>Benefits of Figs:  अंजीर खाने के पांच अनोखे तरीके, बचपन से लेकर प्रेग्नेंसी और बुढ़ापे तक होगा चमत्कार</title>
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        <pubDate>Mon, 06 Jul 2026 09:30:05 +0530</pubDate>
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        <title>Brain Cancer: ब्रेन कैंसर के इलाज में नई उम्मीद, Vitamin B12 थैरेपी ने दिखाया कमाल</title>
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        <description><![CDATA[ Brain Cancer:&amp;nbsp;वाशिंगटन डीसी से एक बड़ी खबर सामने आई है. ऑन्कोसाइंस नाम की एक साइंस पत्रिका में छपी नई स्टडी में ग्लियोब्लास्टोमा नाम के दिमाग के सबसे खतरनाक कैंसर के इलाज को लेकर एक नया तरीका खोजा गया है. यह कैंसर इतना जानलेवा है कि सर्जरी, रेडिएशन और कीमोथेरेपी के बावजूद मरीज आमतौर पर 1 महीने से ज्यादा जीवित नहीं रह पाते हैं. इसकी एक बड़ी वजह है ब्लड-ब्रेन बैरियर, यानी दिमाग के चारों तरफ मौजूद एक सुरक्षा दीवार, जो ज्यादातर दवाओं को दिमाग के अंदर ट्यूमर तक पहुंचने ही नहीं देती. इस रिसर्च की अगुवाई नाइट्रिक ऑक्साइड सर्विसेज कंपनी के जोसेफ ए. बावर और क्लीवलैंड क्लिनिक फाउंडेशन टॉसिग कैंसर सेंटर के वैज्ञानिकों ने मिलकर की है.&amp;nbsp;
विटामिन बी12 से बनी खास दवा
वैज्ञानिकों ने नाइट्रोसिलकोबालामिन नाम का एक कंपाउंड तैयार किया है, जिसे संक्षेप में एनओ-सीबीएल कहा जाता है. यह असल में विटामिन बी12 का ही एक बदला हुआ रूप है, जो शरीर में नाइट्रिक ऑक्साइड छोड़ता है. इस दवा को टेस्ट करने के लिए वैज्ञानिकों ने कई तरीके अपनाए, जैसे कैंसर सेल्स के एक बड़े पैनल पर इसका असर देखना, चूहों में ग्लियोब्लास्टोमा ट्यूमर पर इसकी जांच करना, और इंसानी कैंसर सेल्स पर इसे दूसरी दवाओं के साथ मिलाकर टेस्ट करना.&amp;nbsp; नतीजों में पाया गया कि यह दवा कई तरह के कैंसर पर असर दिखाती है, और दिमाग से जुड़े ट्यूमर पर भी इसका मध्यम असर देखा गया. सबसे बड़ी बात यह रही कि जानवरों पर हुए प्रयोग में यह दवा शरीर में देने के बाद सफलतापूर्वक ब्लड-ब्रेन बैरियर को पार करके सीधे ट्यूमर तक जा पहुंची.&amp;nbsp;
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ट्यूमर में टिककर करती है असर
रिसर्च में एक और खास बात सामने आई कि यह दवा ट्यूमर में जाकर लंबे समय तक टिकी रहती है. ट्यूमर के अंदर नाइट्रेट का स्तर इलाज के बाद कम से कम चौबीस घंटे तक ऊंचा बना रहा, जबकि शरीर के बाकी सामान्य हिस्सों में यह स्तर जल्दी घट गया. इससे पता चलता है कि यह दवा खासतौर पर ट्यूमर में ही रुककर सीधे वहीं नाइट्रिक ऑक्साइड छोड़ती है. इसके अलावा जब लैब में इस दवा को मौजूदा कैंसर इलाज जैसे ट्रेल और टेमोजोलोमाइड के साथ मिलाकर टेस्ट किया गया, तो कैंसर सेल्स की बढ़त पहले से कहीं ज्यादा रुक गई.
यानी यह दवा अकेले काम करने के साथ-साथ मौजूदा इलाज को भी ज्यादा असरदार बना सकती है, यहां तक कि उन ट्यूमर पर भी जो टेमोजोलोमाइड जैसी दवा के खिलाफ प्रतिरोधी हो चुके हैं.&amp;nbsp;हालांकि यह नतीजे उम्मीद जगाने वाले जरूर हैं, लेकिन वैज्ञानिकों ने साफ कहा है कि यह अभी एक शुरुआती पायलट स्टडी है और इसे असली इलाज में इस्तेमाल करने से पहले और गहरी रिसर्च की जरूरत होगी.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Sun, 05 Jul 2026 21:30:14 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>20&amp;20&amp;20 Rule: दिनभर स्क्रीन देखने वालों के लिए 20&amp;20&amp;20 का वह नियम, जो चश्मे का नंबर बढ़ने से रोक देगा</title>
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        <description><![CDATA[ Screen Time Eye Care: आज के समय में मोबाइल, लैपटॉप और कंप्यूटर के बिना दिन की कल्पना करना मुश्किल है. ऑफिस का काम हो, ऑनलाइन पढ़ाई या फिर सोशल मीडिया, ज्यादातर लोगों की नजर घंटों तक स्क्रीन पर टिकी रहती है. इसका असर सबसे पहले आंखों पर पड़ता है. लंबे समय तक स्क्रीन देखने से आंखों में जलन, सूखापन, धुंधला दिखाई देना, सिरदर्द और आंखों का थक जाना जैसी समस्याएं होने लगती हैं. ऐसे में आंखों को राहत देने के लिए विशेषज्ञ 20-20-20 नियम अपनाने की सलाह देते हैं.&amp;nbsp;
क्या है 20-20-20 नियम?
20-20-20 नियम बेहद आसान है. इसका मतलब है कि हर 20 मिनट तक स्क्रीन देखने के बाद 20 सेकंड का ब्रेक लें और लगभग 20 फीट दूर रखी किसी चीज को देखें. इसके लिए आपको दूरी बिल्कुल नापने की जरूरत नहीं है. आप खिड़की से बाहर किसी पेड़, इमारत या दूर मौजूद किसी भी वस्तु पर नजर टिकाकर अपनी आंखों को आराम दे सकते हैं. इससे आंखों की मांसपेशियों को लगातार एक ही दूरी पर फोकस करने से राहत मिलती है. कई लोग काम में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि उन्हें ब्रेक लेने का ध्यान ही नहीं रहता. ऐसी स्थिति में मोबाइल या कंप्यूटर पर 20 मिनट का रिमाइंडर सेट किया जा सकता है. आज कई ऐसे ऐप भी उपलब्ध हैं जो समय-समय पर स्क्रीन से नजर हटाने की याद दिलाते हैं.&amp;nbsp;
क्या होती है दिक्कत?
हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली वेबसाइट healthlineके अनुसार, लगातार स्क्रीन देखने पर हमारी पलकें सामान्य से काफी कम झपकती हैं. आमतौर पर एक व्यक्ति एक मिनट में करीब 15 बार पलकें झपकाता है, लेकिन स्क्रीन पर काम करते समय यह संख्या काफी कम हो सकती है. इसकी वजह से आंखों में सूखापन, जलन और थकान महसूस होने लगती है. इसी स्थिति को डिजिटल आई स्ट्रेन या कंप्यूटर विजन सिंड्रोम भी कहा जाता है.&amp;nbsp;
क्या इससे फायदा होता है?
कुछ स्टडी में पाया गया है कि 20-20-20 नियम अपनाने से आंखों के सूखेपन और स्क्रीन की वजह से होने वाली असहजता में कमी आ सकती है. हालांकि यह कहना सही नहीं होगा कि इससे चश्मे का नंबर बढ़ना पूरी तरह रुक जाता है. एक्सपर्ट मानते हैं कि यह नियम आंखों पर पड़ने वाले दबाव को कम करने और लंबे समय तक स्क्रीन इस्तेमाल करने के दौरान आराम देने में मददगार हो सकता है.
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 लुब्रिकेटिंग आई ड्रॉप्स का इस्तेमाल किया जा सकता है
अगर आप रोजाना कई घंटे स्क्रीन पर काम करते हैं, तो कुछ और बातों का भी ध्यान रखें. कंप्यूटर स्क्रीन आंखों से लगभग एक हाथ की दूरी पर रखें और स्क्रीन का ऊपरी हिस्सा आंखों के स्तर से थोड़ा नीचे हो. बहुत तेज या बहुत कम रोशनी में काम करने से बचें और स्क्रीन की ब्राइटनेस आसपास की रोशनी के अनुसार रखें. समय-समय पर पलकें झपकाते रहें और जरूरत महसूस होने पर डॉक्टर की सलाह से लुब्रिकेटिंग आई ड्रॉप्स का इस्तेमाल किया जा सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 05 Jul 2026 21:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Processed Food Health Risks: पैकेट बंद खाने में छिपे वो 3 सीक्रेट केमिकल, जो बिना वजन बढ़ाए अंदर ही अंदर सड़ा रहे आपका लिवर</title>
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        <description><![CDATA[ Hidden Chemicals In Packaged Foods: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में पैकेट बंद और प्रोसेस्ड फूड का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है. चिप्स, बिस्किट, रेडी-टू-ईट मील, डिब्बाबंद सूप, फास्ट फूड और पैक्ड स्नैक्स जैसी चीजें लोगों की रोजमर्रा की डाइट का हिस्सा बन चुकी हैं. लेकिन एक्सपर्ट का कहना है कि कई बार सिर्फ खाना ही नहीं, बल्कि उसकी पैकेजिंग भी सेहत के लिए चिंता का कारण बन सकती है.
रिसर्च के मुताबिक, कुछ पैकेजिंग मटेरियल में मौजूद रसायन धीरे-धीरे खाने में मिल सकते हैंय लंबे समय तक इनके संपर्क में रहने से शरीर के कई अंगों पर असर पड़ सकता है, जिनमें लिवर भी शामिल है, यूरोपियन यूनियन की संस्था interreg-baltic.eu के अनुसार, कुछ पैकेजिंग मटेरियल में मौजूद केमिकल समय के साथ खाने में मिल सकते हैं और लंबे समय तक इनके संपर्क में रहने से शरीर पर निगेटिव असर पड़ सकता है. चलिए आपको इसके बारे में बताते हैं.&amp;nbsp;
फॉरएवर केमिकल्स
फॉरएवर केमिकल्स ऐसे केमिकल्स हैं जिनका इस्तेमाल तेल और पानी को रोकने वाली पैकेजिंग बनाने में किया जाता है. फास्ट फूड रैपर, पिज्जा बॉक्स और माइक्रोवेव पॉपकॉर्न बैग जैसी चीजों में इनका उपयोग किया जाता रहा है. इन्हें फॉरएवर केमिकल्स इसलिए कहा जाता है क्योंकि ये शरीर और वातावरण में लंबे समय तक बने रह सकते हैं. कुछ स्टडी में इनका संबंध लिवर, थायरॉयड और इम्यून सिस्टम पर पड़ने वाले प्रभावों से जोड़ा गया है.
बिस्फेनॉल-ए
बिस्फेनॉल-ए और इससे जुड़े अन्य बिसफेनॉल्स प्लास्टिक कंटेनर और डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों की अंदरूनी परत में इस्तेमाल किए जाते हैं. समय के साथ ये खाने में मिल सकते हैं. रिसर्च बताती है कि ये हार्मोन के सामान्य कामकाज को प्रभावित कर सकते हैं और लंबे समय तक अधिक संपर्क स्वास्थ्य के लिए चिंता का कारण बन सकता है.
इसे भी पढ़ें -&amp;nbsp;Heart Fights Cancer: दिल धड़क रहा है यानी कैंसर से लड़ रहा है, नई स्टडी से जागी उम्मीद
फ्थैलेट्स
फ्थैलेट्स का इस्तेमाल प्लास्टिक को मुलायम और लचीला बनाने के लिए किया जाता है. ये फूड प्रोसेसिंग उपकरणों और कुछ प्लास्टिक पैकेजिंग के जरिए भोजन तक पहुंच सकते हैं. एक्सपर्ट के मुताबिक, ये हार्मोनल संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं और लंबे समय तक इनके संपर्क में रहना स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं माना जाता.&amp;nbsp;
क्या है इनका विकल्प
अगर इन केमिकल्स के संपर्क को कम करना चाहते हैं, तो प्लास्टिक की जगह कांच, स्टेनलेस स्टील या सिरेमिक के बर्तनों का इस्तेमाल करें. प्लास्टिक कंटेनर में खाना गर्म करने से बचें, क्योंकि गर्मी के कारण केमिकल्स तेजी से भोजन में मिल सकते हैं. इसके साथ ही, इस बात का ध्यान रखें कि जितना संभव हो ताजा और कम प्रोसेस्ड भोजन चुनें.
इसे भी पढ़ें-&amp;nbsp;एक फैसला और युवक को मिली नई जिंदगी, AIIMS में 18 साल बाद हुआ ड्यूल ऑर्गन ट्रांसप्लांट
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 05 Jul 2026 21:30:11 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Male Fertility: सिर्फ सिगरेट या तंबाकू नहीं, इन वजहों से भी जीरो हो जाता है स्पर्म काउंट; नहीं बन पाएंगे पापा</title>
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        <description><![CDATA[ Causes Of Low Sperm Count In Men: आजकल पुरुषों में कम स्पर्म काउंट की समस्या तेजी से बढ़ रही है. ज्यादातर लोग मानते हैं कि इसका कारण सिर्फ सिगरेट या तंबाकू है, लेकिन हकीकत इससे कहीं अलग है. कई स्वास्थ्य समस्याएं और रोजमर्रा की कुछ आदतें भी स्पर्म काउंट को बुरी तरह प्रभावित कर सकती हैं. अगर समय रहते इस पर ध्यान न दिया जाए, तो पिता बनने में परेशानी आ सकती है. चलिए आपको इसके पीछे का कारण बताते हैं.&amp;nbsp;
कब होता है स्पर्म काउंट कम?
जब वीर्य में मौजूद स्पर्म की संख्या सामान्य से कम हो जाती है, तो इसे लो स्पर्म काउंट या ओलिगोस्पर्मिया कहा जाता है. हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली वेबसाइट mayoclinic की रिपोर्ट के अनुसार, यदि एक मिलीलीटर वीर्य में 1.5 करोड़ से कम स्पर्म हों, तो इसे सामान्य से कम माना जाता है. वहीं अगर वीर्य में स्पर्म बिल्कुल न हों, तो इस स्थिति को एजूस्पर्मिया कहा जाता है. ऐसी स्थिति में प्राकृतिक रूप से गर्भधारण की संभावना काफी कम हो जाती है.
क्या होते हैं इसके संकेत?
कम स्पर्म काउंट का सबसे बड़ा संकेत यह है कि लंबे समय तक कोशिश करने के बाद भी गर्भधारण नहीं हो पाता. कई मामलों में इसके अलावा कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते. हालांकि कुछ पुरुषों में हार्मोन संबंधी गड़बड़ी या दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं की वजह से यौन इच्छा में कमी, इरेक्शन की दिक्कत, टेस्टिकल में दर्द, सूजन या गांठ जैसे लक्षण भी नजर आ सकते हैं.
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क्या होते हैं इसके कारण?
सिर्फ धूम्रपान और तंबाकू ही नहीं, बल्कि मोटापा, लगातार तनाव, जरूरत से ज्यादा शराब पीना, नशीले पदार्थों का सेवन और हार्मोन असंतुलन भी स्पर्म काउंट को प्रभावित कर सकते हैं. इसके अलावा कुछ इंफेक्शन, वैरिकोसील जैसी बीमारी, थायरॉयड की समस्या और कुछ दवाओं का लंबे समय तक इस्तेमाल भी पुरुषों की प्रजनन क्षमता पर असर डाल सकता है. एक्सपर्ट का कहना है कि अगर एक साल तक बिना किसी गर्भनिरोधक के नियमित संबंध बनाने के बाद भी गर्भधारण न हो, तो डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए. जिन लोगों को पहले से टेस्टिकल, प्रोस्टेट या यौन स्वास्थ्य से जुड़ी कोई समस्या रही है, उन्हें जांच कराने में देरी नहीं करनी चाहिए. समय पर जांच होने से कारण का पता लगाकर सही इलाज शुरू किया जा सकता है.
क्या इसको ठीक किया जा सकता है?
अच्छी बात यह है कि हर मामले में लो स्पर्म काउंट का मतलब हमेशा बांझपन नहीं होता. आज कई तरह की दवाएं, लाइफस्टाइल में बदलाव और आधुनिक फर्टिलिटी ट्रीटमेंट की मदद से गर्भधारण की संभावना बढ़ाई जा सकती है. संतुलित आहार लेना, नियमित व्यायाम करना, वजन नियंत्रित रखना, तनाव कम करना और धूम्रपान व तंबाकू से दूरी बनाना स्पर्म की गुणवत्ता और संख्या दोनों को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है.&amp;nbsp;
इसे भी पढ़ें-&amp;nbsp;एक फैसला और युवक को मिली नई जिंदगी, AIIMS में 18 साल बाद हुआ ड्यूल ऑर्गन ट्रांसप्लांट
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 04 Jul 2026 00:30:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Male, Fertility:, सिर्फ, सिगरेट, या, तंबाकू, नहीं, इन, वजहों, से, भी, जीरो, हो, जाता, है, स्पर्म, काउंट, नहीं, बन, पाएंगे, पापा</media:keywords>
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        <title>क्या सेहत के लिए सच में खतरनाक है अजीनो मोटो? कितने सेवन से शरीर को होता है नुकसान</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/क्या-सेहत-के-लिए-सच-में-खतरनाक-है-अजीनो-मोटो-कितने-सेवन-से-शरीर-को-होता-है-नुकसान</link>
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        <description><![CDATA[ आजकल लोग जंक फूड खाना काफी पसंद करते हैं, वहीं चाइनीज फूड, पैकेज्ड स्नेक्स और कई प्रोसेस्ड फूड में अजीनो मोटो का इस्तेमाल होता है. इसी अजीनो मोटो को लेकर कई बार यह भी दावा किया जाता है कि इससे हार्ट अटैक, ब्लड प्रेशर, मोटापा या दिमाग से जुड़ी कई गंभीर समस्याएं हो सकती है. वहीं दूसरी और एक्सपर्ट्स मानते हैं कि सीमित मात्रा में इसका सेवन ज्यादातर लोगों के लिए सुरक्षित है, लेकिन कई बार यह हमारी सेहत के लिए खतरनाक भी हो सकता है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि क्या सच में अजीनो मोटो सेहत के लिए खतरनाक होता है और इसके सेवन से शरीर को कितना नुकसान होता है.&amp;nbsp;
क्या है अजीनो मोटो?
अजीनो मोटो दरअसल मोनोसोडियम ग्लूटामेट का एक ब्रांड नाम है. इसका उपयोग खाने का स्वाद बढ़ाने के लिए किया जाता है. यह खाने में उमामी स्वाद जोड़ता है, जिसे मीठा, खट्टा, नमकीन और कड़वे के बाद पांचवा स्वाद माना जाता है. एमएसजी को गन्ना, चुकंदर, मक्का या कसावा जैसे पौधों से फर्मेंटेशन प्रक्रिया के जरिए तैयार किया जाता है. इसका सबसे ज्यादा इस्तेमाल नूडल्स, फ्राइड राइस, सूप, मंचूरियन, प्रोसेस्ड फूड, स्नैक्स, सॉस और कई फास्ट फूड आइटम में किया जाता है. वहीं कई लोग यह भी मान लेते हैं कि एमएसजी और अजीनो मोटो अलग है. लेकिन एमएसजी प्रोडक्ट का नाम है, जबकि अजीनो मोटो जापान की वह कंपनी है, जिसने इसका उत्पादन शुरू किया. समय के साथ यह ब्रांड इतना लोकप्रिय हो गया कि लोग एमएसजी को ही अजीनो मोटो कहने लगे.&amp;nbsp;
क्या अजीनो मोटो सच में पहुंचाता है नुकसान?&amp;nbsp;
एक्सपर्ट्स के अनुसार सीमित मात्रा में एमएसजी का सेवन ज्यादातर हेल्दी लोगों के लिए सुरक्षित माना जाता है. यूएस फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन भी इसे जनरली रिकॉग्नाइज्ड एज सेफ यानी सुरक्षित खाद्य सामग्री की कैटेगरी में रखता है. हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि इसका ज्यादा मात्रा में सेवन पूरी तरह सुरक्षित है. किसी भी खाद्य पदार्थ की तरह इसका जरूरत से ज्यादा उपयोग हेल्थ पर असर डाल सकता है.&amp;nbsp;
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ज्यादा सेवन से बढ़ सकती है दिक्कत&amp;nbsp;
कई लोगों को एमएसजी वाला खाना खाने के बाद सिर दर्द, पसीना आना, चेहरे पर गर्माहट महसूस होना, सीने में भारीपन या कमजोरी जैसी शिकायत हो सकती है. इसे पहले चाइनीज रेस्टोरेंट सिंड्रोम के नाम से भी जाना जाता था. हालांकि यह समस्या हर व्यक्ति में नहीं होती. वहीं एक्सपर्ट्स का भी कहना है कि एमएसजी में सोडियम होता है, इसलिए अगर कोई व्यक्ति पहले से हाई ब्लड प्रेशर का मरीज है या उसे हार्ट प्रॉब्लम का खतरा है तो उसे ज्यादा मात्रा में एमएसजी वाले खाने से बचना चाहिए. इसके अलावा इससे ज्यादा टेस्टी खाना बार-बार खाने की आदत भी बढ़ सकती है, जिससे जरूरत से ज्यादा कैलोरीज का सेवन होने लगता है. लंबे समय में यह वजन बढ़ने और मोटापे का कारण बन सकता है.
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
ये भी पढ़ें-Childhood Trauma: माइग्रेन से लेकर गंभीर बीमारियों तक... जानें बचपन की तकलीफें आपको कैसे कर सकती हैं परेशान? ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 03 Jul 2026 23:30:06 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>क्या, सेहत, के, लिए, सच, में, खतरनाक, है, अजीनो, मोटो, कितने, सेवन, से, शरीर, को, होता, है, नुकसान</media:keywords>
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        <title>Childhood Trauma: माइग्रेन से लेकर गंभीर बीमारियों तक... जानें बचपन की तकलीफें आपको कैसे कर सकती हैं परेशान?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/childhood-trauma-माइग्रेन-से-लेकर-गंभीर-बीमारियों-तक-जानें-बचपन-की-तकलीफें-आपको-कैसे-कर-सकती-हैं-परेशान</link>
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        <description><![CDATA[ How Childhood Trauma Affects Adult Health: बचपन की तकलीफें हमेशा सिर्फ यादों तक सीमित नहीं रहतीं. कई बार उनका असर इंसान के शरीर और दिमाग पर इतने लंबे समय तक बना रहता है कि सालों बाद भी लोग समझ नहीं पाते कि उनकी परेशानी की शुरुआत आखिर कहां से हुई थी. अब नई रिसर्च यह बताने लगी हैं कि बचपन में झेला गया डर, हिंसा, उपेक्षा या इमोशनल अस्थिरता बड़े होने के बाद शारीरिक और मेंटल हेल्थ पर गहरा असर डाल सकती है.&amp;nbsp;
तमाम बीमारियों का जड़ है पुराना अनुभव
कई लोग सालों तक माइग्रेन, पेट की परेशानी, नींद न आना, लगातार थकान, एंग्जायटी या शरीर में दर्द जैसी समस्याओं का इलाज करवाते रहते हैं, लेकिन असली वजह उनके बचपन के अनुभव हो सकते हैं. आधुनिक साइंस &amp;nbsp;अब यह मानने लगा है कि बचपन का ट्रॉमा सिर्फ इमोशनल समस्या नहीं है, बल्कि यह शरीर के नर्वस सिस्टम, हार्मोन, इम्यूनिटी और लंबे समय तक बीमारी के खतरे को भी प्रभावित कर सकता है.&amp;nbsp;
बचपन में हुई हिंसा के शिकार का क्या होता है असर?
एक्सपर्ट डॉ. प्रितिका सिंह ने TOI को बताया &amp;nbsp;कि कई मरीज ऐसे होते हैं जिनकी रिपोर्ट सामान्य आती है, लेकिन उनकी जिंदगी की कहानी कुछ और कहती है. उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि एक 40 साल की महिला लगातार पीठ दर्द, पेट की समस्या और एंग्जायटी से जूझ रही थी. कई डॉक्टरों को दिखाने के बाद भी उसकी परेशानी की वजह समझ नहीं आई, जबकि उसके बचपन में घरेलू हिंसा और इमोशनल उपेक्षा जैसी घटनाएं जुड़ी थीं.&amp;nbsp;
हमारे शरीर पर क्या होता है असर?
एक्सपर्ट के मुताबिक, जब कोई बच्चा लंबे समय तक डर या असुरक्षा वाले माहौल में रहता है तो उसका शरीर लगातार फाइट या फ्लाइट मोड में रहने लगता है. इससे स्ट्रेस हार्मोन लंबे समय तक बढ़े रहते हैं, जो धीरे-धीरे शरीर के कई अंगों पर असर डालते हैं. यही वजह है कि कई लोगों में आगे चलकर हाई ब्लड प्रेशर, ऑटोइम्यून बीमारियां, डिप्रेशन, मोटापा और नींद से जुड़ी समस्याएं देखने को मिलती हैं.&amp;nbsp;
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बचपन की हिंसा के शिकार लोगों के हेल्थ पर क्या होता है असर?
इस विषय पर सबसे चर्चित रिसर्च अमेरिका में हुई एसीई मानी जाती है, जिसे सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन और कैसर परमानेंटे ने किया था. इस स्टडी में 17 हजार से ज्यादा लोगों को शामिल किया गया था. रिसर्च में सामने आया कि जिन लोगों ने बचपन में हिंसा, उपेक्षा, घरेलू तनाव या नशे जैसी परिस्थितियां झेली थीं, उनमें बड़े होने के बाद गंभीर बीमारियों का खतरा ज्यादा पाया गया.
जेएएमए पीडियाट्रिक्स में प्रकाशित एक अन्य रिसर्च में भी बचपन के ट्रॉमा और ऑटोइम्यून बीमारियों के बीच संबंध देखा गया. इन स्टडी ने डॉक्टरों के सोचने का तरीका बदल दिया. अब ट्रॉमा को सिर्फ मानसिक याद नहीं बल्कि शरीर पर असर डालने वाली बॉयोलॉजिकल स्थिति माना जा रहा है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 02 Jul 2026 19:30:11 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Foods That Can Shorten Lifespan: किन चीजों का सेवन करने पर सबसे ज्यादा रहता है उम्र घटने का खतरा? जान लीजिए काम की बात</title>
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        <description><![CDATA[ Foods That Can Shorten Lifespan : आजकल की खराब लाइफस्टाइल और गलत खान-पान की वजह से कम उम्र में ही कई स्वास्थ्य समस्याएं होने लगी हैं. समय के साथ शरीर के सेल्स और टिशू में बदलाव आते हैं, जिससे शरीर की ताकत धीरे-धीरे कम होने लगती है और कई बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है. हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि रोजाना की खान-पान की आदतें इस प्रक्रिया को काफी हद तक प्रभावित करती हैं. बैलेंस और हेल्दी डाइट जहां लंबे समय तक स्वस्थ रहने में मदद करता है, वहीं कुछ फूड प्रोडक्ट्स ऐसे भी हैं जिनका नियमित सेवन शरीर में सूजन बढ़ा सकता है, स्किन को समय से पहले बूढ़ा दिखा सकता है और लंबे समय में कई गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ा सकता है. ऐसे में आइए जानते हैं कि किन चीजों का सेवन करने पर उम्र घटने का खतरा सबसे ज्यादा रहता है.&amp;nbsp;
किन चीजों का सेवन करने पर उम्र घटने का खतरा सबसे ज्यादा रहता है
1. तली हुई चीजें - बहुत ज्यादा टेंपरेचर पर तली हुई चीजों का नियमित सेवन शरीर में फ्री रेडिकल्स बनने का कारण बन सकता है. ये फ्री रेडिकल्स सेल्स को नुकसान पहुंचाते हैं और स्किन की इलास्टिसिटी कम कर सकते हैं. इससे झुर्रियां, सूजन और मुंहासों जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं.&amp;nbsp;
2. सफेद ब्रेड - सफेद ब्रेड जैसे रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट शरीर में ऐसे तत्व बनाते हैं जिन्हें एडवांस्ड ग्लाइकेशन एंड प्रोडक्ट्स (AGEs) कहा जाता है. ये शरीर में सूजन बढ़ा सकते हैं और लंबे समय में उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को तेज कर सकते हैं.&amp;nbsp;
3. प्रोसेस्ड मीट - सॉसेज, बेकन, सलामी, पेपरोनी और हॉट डॉग जैसे प्रोसेस्ड मीट में सोडियम, फैट और प्रिजर्वेटिव ज्यादा मात्रा में होते हैं. शोध के अनुसार, इनका ज्यादा सेवन स्किन को डिहाइड्रेट कर सकता है और कोलेजन को नुकसान पहुंचा सकता है, जिससे स्किन जल्दी ढीली पड़ सकती है.&amp;nbsp;
4. ज्यादा नमक वाला खाना - शरीर के लिए नमक जरूरी है, लेकिन इसकी ज्यादा मात्रा नुकसान पहुंचा सकती है. ज्यादा नमक खाने से शरीर में पानी की कमी और वॉटर रिटेंशन की समस्या हो सकती है. इससे स्किन रूखी दिखने लगती है और समय से पहले उम्र बढ़ने के संकेत नजर आ सकते हैं.&amp;nbsp;
5. बहुत ज्यादा मसालेदार खाना &amp;nbsp;- बहुत ज्यादा तीखा और मसालेदार खाना शरीर में सूजन बढ़ा सकता है.इससे स्किन लाल पड़ सकती है और मुंहासों की समस्या बढ़ सकती है. लगातार ऐसा खाना खाने से स्किन पर उम्र का असर जल्दी दिखाई दे सकता है.&amp;nbsp;
6. ज्यादा चीनी वाली चीजें - रिफाइंड चीनी शरीर में सूजन बढ़ाती है और कोलेजन साथ ही इलास्टिन को नुकसान पहुंचाती है. यही दोनों तत्व स्किन को मुलायम और लचीला बनाए रखने में मदद करते हैं. ज्यादा चीनी खाने से वजन बढ़ने और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा भी बढ़ सकता है.&amp;nbsp;
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7. ट्रांस फैट वाले फास्ट फूड - फास्ट फूड और जंक फूड में अक्सर ट्रांस फैट ज्यादा होता है. इससे धमनियां और ब्लड वेसल्स सख्त हो सकती हैं, जिससे स्किन तक बल्ड का फ्लो कम हो जाता है. इसका असर समय से पहले झुर्रियां आने और उम्र बढ़ने के रूप में दिखाई दे सकता है.&amp;nbsp;
8. जला हुआ मांस - बहुत ज्यादा जला हुआ मांस ऐसे तत्व पैदा कर सकता है जो शरीर में सूजन बढ़ाते हैं. शोध के अनुसार, इससे कोलेजन टूट सकता है और स्किन पर समय से पहले उम्र बढ़ने के लक्षण दिखाई दे सकते हैं.&amp;nbsp;
9. जरूरत से ज्यादा कैफीन - कैफीन शरीर से पानी बाहर निकालने का काम करती है. बहुत ज्यादा कॉफी पीने से शरीर में पानी की कमी हो सकती है, जिससे स्किन रूखी और बेजान दिखाई दे सकती है. विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि कॉफी पीने के साथ पर्याप्त मात्रा में पानी भी पीना चाहिए.&amp;nbsp;
10. शराब - शराब का नियमित सेवन शरीर में विषैले पदार्थों के जमा होने का कारण बन सकता है. इससे लिवर पर असर पड़ता है और शरीर की विषैले तत्वों को बाहर निकालने की क्षमता कमजोर हो सकती है. इसके कारण स्किन में रूखापन, कोलेजन की कमी और इलास्टिसिटी कम होने जैसी समस्याएं हो सकती हैं.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 01 Jul 2026 15:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Mini Stroke: मौत के करीब ले जाएगी रातभर जागने की आदत, बढ़ रहा मिनी स्ट्रोक का खतरा, एक्सपर्ट ने दी चेतावनी</title>
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        <description><![CDATA[ How Sleep Deprivation Increases Mini Stroke Risk: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में रात का समय भी पहले जैसा नहीं रहा. आधी रात के बाद तक मोबाइल की स्क्रीन चमकती रहती है, बिस्तर पर लेटे-लेटे लोग ऑफिस के ईमेल चेक करते हैं और सोशल मीडिया स्क्रॉल करते-करते पता ही नहीं चलता कि कब रात बीत गई. खासकर युवा प्रोफेशनल्स के लिए यह अब सामान्य लाइफस्टाइल बन चुकी है. लेकिन न्यूरोलॉजिस्ट्स चेतावनी दे रहे हैं कि यह आदत सिर्फ थकान ही नहीं, बल्कि मिनी स्ट्रोक जैसे गंभीर खतरे को भी बढ़ा सकती है.
क्या होता है मिनी स्ट्रोक?
मिनी स्ट्रोक, जिसे मेडिकल भाषा में ट्रांजिएंट इस्केमिक अटैक कहा जाता है, तब होता है जब कुछ समय के लिए ब्रेन के किसी हिस्से में ब्लड फ्लो रुक जाता है. इसके लक्षण कुछ मिनटों में खत्म हो सकते हैं, लेकिन इसे हल्के में लेना बड़ी गलती साबित हो सकता है. अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ &amp;nbsp;के अनुसार, जिन लोगों को ट्रांजिएंट इस्केमिक होता है, उनमें से लगभग हर तीन में एक व्यक्ति को आगे चलकर स्ट्रोक हो सकता है और इनमें से करीब आधे मामले एक साल के भीतर सामने आते हैं.&amp;nbsp;
नींद से क्यों होती है ये दिक्कत?
&amp;nbsp;डॉ. चंदना आर गौड़ा ने TOI को बताया कि नींद की कमी तेजी से न्यूरोलॉजिकल और हार्ट संबंधी समस्याओं का बड़ा कारण बनती जा रही है. उनका कहना है कि लगातार कम नींद लेने से शरीर में तनाव बढ़ाने वाले हार्मोन का स्तर ऊंचा रहता है, ब्लड प्रेशर प्रभावित होता है, सूजन बढ़ती है और मेटाबॉलिज्म बिगड़ता है. ये सभी कारक मिलकर मिनी स्ट्रोक और बाद में स्ट्रोक का खतरा बढ़ा सकते हैं.
अच्छी नींद क्यों है जरूरी?
एक्सपर्ट के अनुसार, अच्छी नींद सिर्फ शरीर को आराम नहीं देती बल्कि ब्लड वेसल्स की मरम्मत, ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने और सूजन कम करने में भी मदद करती है. जब लगातार नींद पूरी नहीं होती, तो शरीर के ये जरूरी सिस्टम प्रभावित होने लगते हैं. नेशनल हार्ट, लंग एंड ब्लड इंस्टीट्यूट की रिसर्च भी बता चुकी है कि लंबे समय तक नींद की कमी हाई ब्लड प्रेशर, मोटापा, डायबिटीज और हृदय रोगों का जोखिम बढ़ाती है, जो स्ट्रोक के प्रमुख कारण माने जाते हैं.
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रिवेंज बेडटाइम प्रॉक्रैस्टिनेशन &amp;nbsp;क्या होता है?
हाल के वर्षों में एक नया शब्द भी चर्चा में आया है, जिसे रिवेंज बेडटाइम प्रॉक्रैस्टिनेशन कहा जाता है। इसका मतलब है काम के लंबे दिन के बाद अपने लिए समय निकालने के चक्कर में जानबूझकर देर तक जागना, जबकि शरीर को आराम की जरूरत होती है. डॉ. गौड़ा के मुताबिक, देर रात तक फोन चलाना, लगातार स्क्रीन देखना और सिर्फ कुछ घंटे की नींद लेना आज कई युवाओं की आदत बन चुकी है, जो भविष्य में गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं की वजह बन सकती है.
क्या होते हैं इसके लक्षण?
मिनी स्ट्रोक की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसके संकेत अक्सर नजरअंदाज कर दिए जाते हैं. शरीर के एक हिस्से में अचानक कमजोरी या सुन्नपन, बोलने में दिक्कत, चक्कर आना, धुंधला दिखाई देना, चेहरे का एक तरफ झुक जाना या कुछ मिनटों तक भ्रम की स्थिति बने रहना इसके शुरुआती लक्षण हो सकते हैं. एक्सपर्ट का कहना है कि ऐसे किसी भी संकेत को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 01 Jul 2026 15:30:06 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Mini, Stroke:, मौत, के, करीब, ले, जाएगी, रातभर, जागने, की, आदत, बढ़, रहा, मिनी, स्ट्रोक, का, खतरा, एक्सपर्ट, ने, दी, चेतावनी</media:keywords>
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        <title>Ginger Tea Health Risks: फायदेमंद समझकर ज्यादा अदरक की चाय पीना पड़ न जाए भारी! आज ही जान लें ये जरूरी बातें</title>
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        <description><![CDATA[ Who Should Avoid Ginger Tea: तरुणा मिश्रा का एक शेर है कि, &#039;आज फिर चाय बनाते हुए वो याद आया, आज फिर चाय में पत्ती नहीं डाली मैंने.&#039; ये हो गई शायर की पंक्तियां, लेकिन अगर आप चाय में पत्तियों के साथ-साथ अदरक कूट-कूटकर डाल रहे हैं या फिर ठेले पर बन रही अदरक की चाय की सुगंध से खींचे चले जा रहे हैं, तो अब सावधान होने की जरूरत है. दरअसल, अदरक की चाय आपकी तलब को शांत तो कर देती है, लेकिन आपको अस्पताल भी पहुंचा सकती है. चलिए आपको बताते हैं कि कब इससे दिक्कत होने लगती है और किन लोगों को इससे बचकर रहना चाहिए.
क्या अदरक की चाय नुकसानदायक?
कई लोगों का तो दिन ही इसकी एक कप चाय के बिना शुरू नहीं होता. इतना ही नहीं, कुछ लोग इसे सेहत के लिए इतना फायदेमंद मानते हैं कि दिन में कई बार अदरक की चाय पी जाते हैं. Healthline की रिपोर्ट के अनुसार, हेल्थ एक्सपर्ट्स के मुताबिक, एक दिन में करीब 4 ग्राम से ज्यादा अदरक का सेवन नहीं करना चाहिए. सामान्य तौर पर चाय के जरिए इतनी मात्रा तक पहुंचना आसान नहीं होता, लेकिन अगर आप दिनभर अदरक वाली चाय, काढ़ा और अदरक से बनी दूसरी चीजें लेते रहते हैं, तो कुल मात्रा बढ़ सकती है.
क्या होती है इससे दिक्कत?
कुछ लोगों को अदरक की चाय पीने के बाद सीने में जलन, एसिडिटी या पेट में हल्की जलन महसूस हो सकती है. कई बार लोग इसे अदरक से एलर्जी समझ लेते हैं, जबकि यह सिर्फ मसालेदार चीजों की तरह होने वाली सामान्य जलन भी हो सकती है. हालांकि अगर चाय पीने के बाद मुंह या शरीर पर चकत्ते पड़ने लगें, खुजली हो या पेट में तेज परेशानी महसूस हो, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए.
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किन लोगों को होती है इससे दिक्कत?
अगर आपको पहले से पित्त की थैली यानी गॉलब्लैडर से जुड़ी कोई समस्या है, तो अदरक की चाय को नियमित रूप से पीने से पहले डॉक्टर से राय लेना बेहतर माना जाता है. वहीं अदरक ब्लड प्रेशर को थोड़ा कम करने में भी मदद कर सकता है. ऐसे में जिन लोगों का ब्लड प्रेशर पहले से कम रहता है या जो ब्लड प्रेशर की दवा ले रहे हैं, उन्हें सावधानी बरतनी चाहिए. अदरक में ऐसे प्राकृतिक तत्व भी पाए जाते हैं, जो खून को थोड़ा पतला करने का असर दिखा सकते हैं. इसलिए जिन लोगों को ब्लीडिंग डिसऑर्डर है या जो ब्लड थिनर दवाएं लेते हैं, उन्हें भी बिना डॉक्टर की सलाह के जरूरत से ज्यादा अदरक का सेवन नहीं करना चाहिए.
सिर्फ नुकसानदायक नहीं फायदेमंद भी
हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि अदरक की चाय नुकसान ही करती है. सही मात्रा में इसका सेवन कई लोगों के लिए फायदेमंद भी हो सकता है. रिसर्च बताती हैं कि यह मतली, उल्टी, अपच और पेट खराब होने जैसी समस्याओं में राहत पहुंचाने में मदद कर सकती है. कुछ लोगों को सर्जरी या कीमोथेरेपी के बाद होने वाली मतली में भी इससे फायदा मिलता है. इसके अलावा अदरक में मौजूद जिंजरोल नाम का तत्व शरीर में सूजन कम करने में मदद कर सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 30 Jun 2026 23:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Diabetes Diet: डायबिटीज में फल खाना जहर नहीं, एक्सपर्ट से जानें कौन से फल हैं फायदेमंद और किनसे करें परहेज?</title>
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        <description><![CDATA[ Which Fruits Are Best For Diabetes Patients: भारत इस समय तेजी से बढ़ती डायबिटीज की चुनौती का सामना कर रहा है. साल 2023 में पब्लिश इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च- इंडिया डायबिटीज स्टडी के अनुसार देश में करीब 10.1 करोड़ लोग डायबिटीज से पीड़ित हैं, जबकि लगभग 13.6 करोड़ लोग प्रीडायबिटिक कैटेगरी में आते हैं. यानी ये लोग आने वाले वर्षों में डायबिटीज के शिकार हो सकते हैं. शहरी क्षेत्रों के साथ-साथ ग्रामीण इलाकों में भी इस बीमारी के बढ़ते मामलों ने खानपान और लाइफस्टाइल को लेकर नई चिंताएं खड़ी कर दी हैं.
क्या डायबिटीज में फलों को खाना बंद कर देना चाहिए?
डायबिटीज से जुड़े सबसे आम भ्रमों में से एक यह है कि मरीजों को फल खाना पूरी तरह बंद कर देना चाहिए, क्योंकि फलों में प्राकृतिक शर्करा होती है. हालांकि एक्सपर्ट का कहना है कि यह धारणा पूरी तरह सही नहीं है. किसी फल का असर केवल उसकी मिठास से तय नहीं होता, बल्कि उसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स, ग्लाइसेमिक लोड , फाइबर की मात्रा, फ्रुक्टोज का स्तर और सेवन की मात्रा भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.&amp;nbsp;
किन फलों को ज्यादा खाने से बचना चाहिए?
कुछ फल ऐसे होते हैं जिनमें कार्बोहाइड्रेट की मात्रा अपेक्षाकृत अधिक होती है. इनमें आम, चीकू, अंगूर, पका हुआ केला, सीताफल और कटहल शामिल हैं. इनका सेवन यदि अधिक मात्रा में किया जाए तो भोजन के बाद ब्लड शुगर तेजी से बढ़ सकता है. इसलिए इन फलों को सीमित मात्रा में खाने की सलाह दी जाती है.
कौन से फल डायबिटीज मरीजों के लिए बेहतर विकल्प?
वहीं कुछ फल डायबिटीज मरीजों के लिए बेहतर विकल्प माने जाते हैं. अमरूद, सेब, नाशपाती, संतरा, पपीता, कीवी और बेरीज जैसे फल फाइबर से भरपूर होते हैं और शरीर में ग्लूकोज को धीरे-धीरे रिलीज करते हैं. इससे ब्लड शुगर अचानक बढ़ने की संभावना कम हो जाती है. एक्सपर्ट के अनुसार अमरूद डायबिटीज मरीजों के लिए काफी फायदेमंद हो सकता है. इसमें प्रति 100 ग्राम लगभग 5 ग्राम फाइबर पाया जाता है, जो लंबे समय तक पेट भरा रखने में मदद करता है और भोजन के बाद ब्लड शुगर में आने वाले उतार-चढ़ाव को कंट्रोल करने में सहायक होता है.
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सीमित मात्रा में खाना फायदेमंद
फरीदाबाद स्थित अमृता अस्पताल के एंडोक्रिनोलॉजी एवं डायबिटीज विभाग के प्रमुख डॉ. निशांत रायजादा ने TOI को बताया कि अधिकांश मरीज फलों को केवल उनकी मिठास के आधार पर देखते हैं, जबकि शरीर की प्रतिक्रिया फाइबर, कार्बोहाइड्रेट की मात्रा और हिस्से के आकार पर ज्यादा निर्भर करती है. सीमित मात्रा में खाए गए साबुत फल डायबिटीज डाइट का सुरक्षित हिस्सा हो सकते हैं. &amp;nbsp;एक्सपर्ट फलों के रस को लेकर भी सावधानी बरतने की सलाह देते हैं. जूस बनाने की प्रक्रिया में फलों का अधिकांश फाइबर निकल जाता है, जिससे ग्लूकोज तेजी से रक्त में पहुंचता है. एक गिलास जूस में कई फलों के बराबर शर्करा हो सकती है, लेकिन उससे पेट भरने का एहसास नहीं होता.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 30 Jun 2026 23:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>Organ Meat Health Risks: मटन खाते हैं? कलेजी, दिमाग और गुर्दा हर किसी के लिए नहीं, डॉक्टर भी देते हैं वार्निंग</title>
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        <description><![CDATA[ Health Benefits And Risks Of Organ Meat: मटन खाने के शौकीन लोगों की थाली में अक्सर कलेजी, दिमाग, गुर्दा और दिल जैसी चीजें भी शामिल होती हैं. इन्हें ऑर्गन मीट या ऑफल कहा जाता है. कई लोग इन्हें स्वाद के लिए खाते हैं, तो कुछ इन्हें पोषण का खजाना मानते हैं. सच भी यही है कि इन अंगों में कई जरूरी विटामिन और मिनरल्स भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं. लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि ये हर किसी के लिए सुरक्षित नहीं हैं. कुछ लोगों के लिए इनका ज्यादा सेवन फायदे की जगह नुकसान पहुंचा सकता है.
किन लोगों को इससे बचकर रहना चाहिए?
हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली वेबसाइट webmd के अनुसार, &amp;nbsp;फायदों के बावजूद कलेजी, दिमाग और गुर्दा रोजाना या जरूरत से ज्यादा नहीं खाना चाहिए. खासकर कलेजी और दिल में कोलेस्ट्रॉल काफी अधिक होता है. अगर किसी व्यक्ति का कोलेस्ट्रॉल पहले से बढ़ा हुआ है या उसे दिल की बीमारी का खतरा है, तो ज्यादा मात्रा में ऑर्गन मीट खाना हार्ट अटैक और स्ट्रोक का जोखिम बढ़ा सकता है. इसके अलावा, जिन लोगों को गाउट &amp;nbsp;की समस्या है, उन्हें भी कलेजी, गुर्दा और दूसरे ऑर्गन मीट से दूरी बनाने की सलाह दी जाती है. इनमें प्यूरिन की मात्रा ज्यादा होती है, जो शरीर में यूरिक एसिड बढ़ाकर जोड़ों के दर्द और सूजन की समस्या को और गंभीर बना सकती है.
डॉक्टर यह भी बताते हैं कि हीमोक्रोमैटोसिस जैसी बीमारी से पीड़ित लोगों को भी ऑर्गन मीट सीमित मात्रा में ही खाना चाहिए. इस बीमारी में शरीर में पहले से ही आयरन अधिक होता है, इसलिए आयरन से भरपूर कलेजी जैसी चीजें नुकसान पहुंचा सकती हैं.
पूरी तरह फिट लोगों को क्या ध्यान रखना चाहिए?
एक्सपर्ट की सलाह है कि अगर आप पूरी तरह स्वस्थ हैं, तब भी ऑर्गन मीट को रोज की डाइट का हिस्सा बनाने के बजाय कभी-कभार और सीमित मात्रा में ही खाएं. वहीं अगर आपको दिल की बीमारी, हाई कोलेस्ट्रॉल, गाउट या आयरन ओवरलोड जैसी कोई समस्या है, तो इन्हें खाने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लें. स्वाद के साथ सेहत का संतुलन बनाए रखना ही सबसे बेहतर विकल्प माना जाता है.
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एक्सपर्ट के अनुसार, कलेजी, गुर्दा और दिल में विटामिन बी12, आयरन, जिंक और कई बी-विटामिन अच्छी मात्रा में मौजूद होते हैं. यही वजह है कि जिन लोगों में आयरन की कमी होती है, उनके लिए सीमित मात्रा में कलेजी फायदेमंद मानी जाती है. इससे शरीर में आयरन का स्तर बढ़ सकता है और कमजोरी या थकान जैसी समस्याओं में भी राहत मिल सकती है.
फायदेमंद भी होता है
कलेजी में मौजूद विटामिन बी1 और अन्य पोषक तत्व दिमाग की काम करने की क्षमता को बेहतर बनाए रखने में मदद कर सकते हैं. वहीं विटामिन बी2 शरीर के सेल्स को स्वस्थ रखने के साथ कुछ तरह के कैंसर के खतरे को कम करने में भी भूमिका निभा सकता है. इसके अलावा दिल, कलेजी और गुर्दे में पाया जाने वाला विटामिन बी12 और फोलेट ब्लड में होमोसिस्टीन के स्तर को नियंत्रित रखने में मदद करता है, जिससे हार्ट संबंधी बीमारियों का जोखिम कम हो सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 30 Jun 2026 23:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>देश में तीन में से एक व्यक्ति है लिवर से जुड़ी बीमारियों का शिकार, नड्डा बोले&amp; जगरूकता है जरूरी</title>
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        <description><![CDATA[ केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने आईएलबीएस (ILBS) के दसवें दीक्षांत समारोह में संस्थान की कामयाबियों की सराहना करते हुए कहा कि यह संस्थान न केवल देश में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत का नाम रोशन कर रहा है. उन्होंने बताया कि ILBS केवल लिवर रोगों के उपचार तक सीमित नहीं है, बल्कि बीमारी की रोकथाम और जनजागरण के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है. नड्डा ने कहा कि आजकल घर-घर फैटी लिवर की चर्चा हो रही है और इस बीमारी के प्रति जागरूकता फैलाने में ILBS ने बड़ा रोल निभाया है.
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे अपनी शिक्षा और ज्ञान को समाज तक पहुंचाएं और स्वस्थ भारत के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाएं. अपने संबोधन में स्वास्थ्य मंत्री ने देश के स्वास्थ्य ढांचे के विस्तार का भी उल्लेख किया और बताया कि 20वीं सदी के अंत तक देश में केवल एक एम्स था, जबकि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में 6 नए एम्स स्थापित किए गए. उन्होंने कहा कि आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एम्स की संख्या बढ़कर 23 हो चुकी है और मोदी सरकार के आने के बाद मेडिकल कॉलेजों की संख्या में भी काफी वृद्धि हुई है.
देश में 186000 आयुष्मान आरोग्य मंदिर
केंद्रीय मंत्री नड्डा ने यह भी बताया कि देशभर में 1,86,000 आयुष्मान आरोग्य मंदिर कार्यरत हैं, जहां प्राथमिक स्तर पर बीमारियों की जांच होती है. उन्होंने कहा कि स्वस्थ भारत के लक्ष्य को हासिल करने के लिए समय पर जांच और बीमारी की शीघ्र पहचान अत्यंत आवश्यक है. इस अवसर पर स्वास्थ्य मंत्री ने मेडिकल छात्रों को उनकी उपाधियां भी प्रदान कीं और उनके उज्जवल भविष्य की कामना की.
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हर तीन में एक व्यक्ति फैटी लिवर का शिकार&amp;nbsp;
कार्यक्रम में ILBS के वाइस चांसलर डॉ. एस.के. सरीन ने बताया कि ILBS दुनिया की एकमात्र लिवर यूनिवर्सिटी है और साल 2025 में यहां 1,60,000 मरीजों को देखा गया, जो कि कई यूरोपीय देशों में देखे जाने वाले मरीजों की संख्या से भी अधिक है. डॉ. सरीन ने कहा कि अब तक संस्थान में 1,392 लिवर ट्रांसप्लांट सफलतापूर्वक किए गए हैं और 69 ईडब्ल्यूएस कैटेगरी के मरीजों का भी ट्रांसप्लांट हुआ है. डॉ. सरीन ने यह भी कहा कि देश में हर तीन में से एक व्यक्ति फैटी लिवर से ग्रस्त है और इसलिए आयुष्मान भारत योजना में किडनी की तरह लिवर ट्रांसप्लांट की भी मांग की जानी चाहिए. उन्होंने गुणवत्ता चिकित्सा सेवाओं, अनुसंधान और प्रशिक्षण को आगे बढ़ाने पर जोर देते हुए कहा कि ILBS का यह दसवाँ दीक्षांत समारोह उनके समर्पण और प्रयासों का प्रतीक है.
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        <pubDate>Tue, 30 Jun 2026 23:30:05 +0530</pubDate>
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        <title>Milky Urine: सुबह&amp;सुबह होता है एकदम दूधिया पेशाब? लापरवाही न करें तुरंत डॉक्टर से मिलें</title>
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        <description><![CDATA[ Causes of Milky Urine: हेल्थ एक्सपर्ट्स अक्सर कहते हैं कि इंसान के यूरिन से शरीर में होने वाली कई बीमारियों के संकेत मिल सकते हैं. पेशाब का रंग यह बता सकता है कि आपका शरीर पूरी तरह स्वस्थ है या किसी बीमारी से लड़ रहा है. ऐसे में अगर आपके पेशाब का रंग अचानक एकदम दूधिया या सफेद दिखाई देने लगे, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. आइए जानते हैं कि ऐसा क्यों होता है और यह किन बीमारियों का संकेत हो सकता है.
क्या होती है दिक्कत?
अगर सुबह उठते ही पेशाब का रंग सामान्य पीले की बजाय एकदम सफेद या दूधिया नजर आए, तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए. कई लोग इसे मामूली बदलाव समझकर अनदेखा कर देते हैं, लेकिन कुछ मामलों में यह शरीर के अंदर होने वाली गंभीर समस्या का संकेत हो सकता है. डॉक्टर इस स्थिति को काइल्यूरिया कहते हैं, जिसमें पेशाब के साथ एक खास तरह का दूधिया तरल पदार्थ मिलने लगता है.
क्या होता है ऐसा?
Fortis Healthcare की एक रिपोर्ट के अनुसार, हमारा शरीर भोजन में मौजूद वसा को पचाने के बाद एक सफेद रंग का तरल पदार्थ बनाता है, जिसे काइल ( कहा जाता है. यह सामान्य रूप से लसीका सिस्टम के जरिए ब्लड तक पहुंचता है. लेकिन जब किसी कारण से लसीका वेसल्स में रुकावट या क्षति आ जाती है, तो यह लिक्विड पेशाब की नली में मिल सकता है. इसी वजह से पेशाब का रंग दूध जैसा सफेद दिखाई देने लगता है.
दूधिया यूरिन का सबसे बड़ा संकेत इसका असामान्य सफेद रंग होता है. कई लोगों में यह समस्या ज्यादा तैलीय या वसा वाले भोजन के बाद अधिक दिखाई देती है. कुछ मरीजों को कमर के निचले हिस्से में हल्का दर्द भी महसूस हो सकता है. अगर पेशाब के साथ खून आए, पेशाब करने में परेशानी हो या बार-बार ऐसा हो रहा हो, तो बिना देर किए डॉक्टर से जांच करानी चाहिए.
क्या होता है इसके पीछे कारण?
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, भारत समेत कई उष्णकटिबंधीय देशों में इसका एक प्रमुख कारण फाइलेरिया इंफेक्शन हो सकता है. मच्छर के काटने से शरीर में पहुंचने वाले परजीवी लसीका वेसल्स को नुकसान पहुंचाते हैं. इसके कारण उनमें रुकावट पैदा होती है और दबाव बढ़ने पर काइल पेशाब में मिलने लगता है. हालांकि, हर मामले में इसकी वजह इंफेक्शन ही नहीं होती.
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इन कारणों की वजह से भी हो सकती है दिक्कत
कुछ लोगों में पेट या पेल्विक हिस्से में चोट लगने, ट्यूमर, जन्मजात लसीका सिस्टम की गड़बड़ी या अन्य बीमारियों के कारण भी यह समस्या हो सकती है. इसलिए केवल लक्षण देखकर कारण तय नहीं किया जा सकता. सही वजह जानने के लिए डॉक्टर की जांच जरूरी होती है. इस समस्या की पुष्टि के लिए डॉक्टर सबसे पहले यूरिन टेस्ट कराने की सलाह देते हैं. जरूरत पड़ने पर अल्ट्रासाउंड, सीटी स्कैन, एमआरआई या अन्य जांच भी कराई जा सकती हैं, ताकि यह पता चल सके कि लसीका द्रव कहां से लीक हो रहा है. जांच की रिपोर्ट के आधार पर ही आगे का इलाज तय किया जाता है.
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        <pubDate>Mon, 29 Jun 2026 22:30:14 +0530</pubDate>
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        <title>Brain Tumor Symptoms: मामूली सिरदर्द कब बन जाता है गंभीर खतरा? डॉक्टर से जानें ब्रेन ट्यूमर के छिपे हुए लक्षण</title>
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        <description><![CDATA[ Early Warning Signs Of Brain Tumor: सिरदर्द एक ऐसी समस्या है जिससे लगभग हर व्यक्ति कभी न कभी परेशान होता है. ज्यादातर मामलों में इसकी वजह तनाव, नींद की कमी, डिहाइड्रेशन, लंबे समय तक स्क्रीन देखने या थकान जैसी सामान्य स्थितियां होती हैं. थोड़ा आराम, पर्याप्त पानी और जरूरत पड़ने पर दवा लेने से यह ठीक भी हो जाता है. लेकिन जब सिरदर्द बार-बार लौटने लगे, पहले से अलग महसूस हो या इसके साथ कुछ असामान्य लक्षण दिखाई दें, तब इसे नजरअंदाज करना सही नहीं है.&amp;nbsp;
इस गंभीर बीमारी के हो सकते हैं लक्षण
अक्सर लोग मानते हैं कि ब्रेन ट्यूमर का पहला संकेत असहनीय सिरदर्द होता है, लेकिन हकीकत इससे अलग है. कई बार शुरुआती लक्षण इतने सामान्य होते हैं कि लोग उन्हें तनाव, बढ़ती उम्र या काम के दबाव का असर समझ लेते हैं. यही वजह है कि बीमारी का पता लगने में देरी हो जाती है. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर्स एंड स्ट्रोक के अनुसार, ब्रेन ट्यूमर के लक्षण उसके आकार, स्थान और बढ़ने की गति पर निर्भर करते हैं. सिरदर्द के अलावा याददाश्त में बदलाव, नजर कमजोर होना, व्यवहार में परिवर्तन, दौरे पड़ना और संतुलन बिगड़ना भी इसके संकेत हो सकते हैं.&amp;nbsp;
कैसे होती है ब्रेन ट्यूमर की शुरुआत?
डॉ. उज्ज्वल येओले ने TOI को बताया कि यह एक बड़ा भ्रम है कि ब्रेन ट्यूमर हमेशा सिरदर्द से ही शुरू होता है. कई मरीजों में शुरुआत में याददाश्त कमजोर होने लगती है, ध्यान केंद्रित करने में परेशानी होती है या व्यवहार में बदलाव दिखाई देता है. कुछ लोगों को बोलने में कठिनाई होने लगती है, जबकि कुछ की नजर धुंधली होने लगती है. चूंकि दिमाग का हर हिस्सा अलग-अलग कार्यों को कंट्रोल करता है, इसलिए ट्यूमर का असर भी उसी के अनुसार दिखाई देता है.
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कब आपको डॉक्टर के पास जाना चाहिए?
डॉ. उज्ज्वल येओले के मुताबिक, हर सिरदर्द चिंता की बात नहीं है, लेकिन अगर दर्द लगातार बढ़ रहा हो, बार-बार हो रहा हो, नींद से जगा दे या पहले के मुकाबले अलग महसूस हो तो डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए. खासतौर पर अगर इसके साथ उल्टी, धुंधला दिखना, कमजोरी, भ्रम या अन्य न्यूरोलॉजिकल लक्षण भी मौजूद हों तो जांच करवाना जरूरी हो जाता है. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर्स एंड स्ट्रोक की रिसर्च भी बताती है कि गंभीर न्यूरोलॉजिकल समस्याओं से जुड़े सिरदर्द समय के साथ बढ़ सकते हैं और उनके साथ अन्य लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं.
क्या होते हैं इसके लक्षण?
ब्रेन ट्यूमर के कुछ संकेत ऐसे होते हैं जिन्हें परिवार के लोग मरीज से पहले पहचान लेते हैं. अचानक चिड़चिड़ापन बढ़ना, बात करने के तरीके में बदलाव, सामाजिक गतिविधियों से दूरी बनाना या बार-बार चीजें भूलना ऐसे संकेत हो सकते हैं जिन्हें अक्सर लोग मानसिक तनाव समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. इसी तरह धुंधला या डबल दिखना, चलते समय संतुलन बिगड़ना, हाथ-पैरों में कमजोरी महसूस होना या सही शब्द खोजने में परेशानी होना भी चेतावनी के संकेत हो सकते हैं. ब्रेन ट्यूमर को पूरी तरह रोकने का कोई निश्चित तरीका फिलहाल मौजूद नहीं है. हालांकि समय रहते लक्षणों को पहचानना और जांच करवाना सबसे अहम कदम है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 29 Jun 2026 22:30:13 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Brain, Tumor, Symptoms:, मामूली, सिरदर्द, कब, बन, जाता, है, गंभीर, खतरा, डॉक्टर, से, जानें, ब्रेन, ट्यूमर, के, छिपे, हुए, लक्षण</media:keywords>
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        <title>Anemia Mukt Bharat Abhiyan: एनीमिया मुक्त कैसे होगा भारत? सरकार ने बदला पूरा मॉडल, अब डिजिटल ट्रैकिंग से होगा इलाज</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/anemia-mukt-bharat-abhiyan-एनीमिया-मुक्त-कैसे-होगा-भारत-सरकार-ने-बदला-पूरा-मॉडल-अब-डिजिटल-ट्रैकिंग-से-होगा-इलाज</link>
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        <description><![CDATA[ How India Plans to Become Anemia Free: भारत में एनीमिया आज भी सबसे बड़ी स्वास्थ्य चुनौतियों में से एक है. इसका असर सिर्फ महिलाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि गर्भवती महिलाओं, बच्चों और नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य पर भी पड़ता है. यही वजह है कि अब केंद्र सरकार ने देश को एनीमिया मुक्त बनाने के लिए अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है. सरकार का मानना है कि सिर्फ आयरन की गोलियां बांटने से इस समस्या पर पूरी तरह काबू नहीं पाया जा सकता. इसलिए अब जांच, इलाज, सही खानपान और डिजिटल निगरानी को भी अभियान का अहम हिस्सा बनाया गया है.
नई गाइडलाइन जारी किया गया
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा ने एनीमिया मुक्त भारत अभियान के संशोधित दिशा-निर्देश जारी किए हैं. नई गाइडलाइन के तहत अब पुराने 6x6x6 मॉडल की जगह 7x7x7 रणनीति लागू की जाएगी. इसका उद्देश्य एनीमिया की समय रहते पहचान करना, इलाज सुनिश्चित करना और मरीजों की लगातार निगरानी करना है. इस नई रणनीति की सबसे बड़ी खासियत यह है कि पहली बार कम वजन वाले नवजात शिशुओं (0 से 6 महीने) को भी अभियान में शामिल किया गया है. सरकार का मानना है कि अगर जीवन की शुरुआत से ही एनीमिया की रोकथाम पर काम किया जाए, तो आगे चलकर बच्चों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले गंभीर असर को काफी हद तक कम किया जा सकता है.
इन चीजों को जोड़ा गया
सरकार ने अभियान में &#039;ईटिंग राइट&#039; पहल को भी जोड़ा है. इसके तहत लोगों को आयरन से भरपूर और संतुलित भोजन को अपनी रोजमर्रा की आदत बनाने के लिए जागरूक किया जाएगा. सिर्फ दवाओं पर निर्भर रहने के बजाय पोषण के जरिए एनीमिया को रोकने पर भी बराबर जोर दिया जाएगा. नई गाइडलाइन में पहले अपनाए जा रहे टी3 मॉडल टेस्ट, ट्रीट और टॉक को अब टी4 मॉडल में बदल दिया गया है. इसमें &#039;ट्रैक&#039; को भी शामिल किया गया है. यानी किसी व्यक्ति में एनीमिया मिलने के बाद सिर्फ इलाज ही नहीं होगा, बल्कि यह भी देखा जाएगा कि इलाज का असर हो रहा है या नहीं और जरूरत पड़ने पर आगे की चिकित्सा समय पर मिल रही है या नहीं.
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जिन पर दवाओं का असर नहीं होता उनके लिए क्या?
गर्भवती और स्तनपान कराने वाली उन महिलाओं के लिए, जिन्हें गंभीर एनीमिया है या जिन पर आयरन की गोलियों का असर नहीं होता, अब नस के जरिए आयरन देने की व्यवस्था भी राष्ट्रीय उपचार प्रोटोकॉल का हिस्सा होगी. इसके लिए फेरिक कार्बोक्सीमाल्टोज और आयरन सुक्रोज जैसी दवाओं का इस्तेमाल किया जाएगा. अभियान को ज्यादा प्रभावी बनाने के लिए डिजिटल सिस्टम भी तैयार किया गया है. गर्भवती महिलाओं की हीमोग्लोबिन जांच का रिकॉर्ड जननी पोर्टल पर दर्ज होगा, जबकि बच्चों की जानकारी राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम औरयू-विन पोर्टल पर अपलोड की जाएगी. बाद में इन सभी प्लेटफॉर्म को एकीकृत एनीमिया मुक्त भारत पोर्टल से जोड़ा जाएगा. इससे सरकार को यह पता लगाने में आसानी होगी कि किस क्षेत्र में एनीमिया की स्थिति कैसी है और किन लोगों तक इलाज या पोषण सेवाएं अभी भी नहीं पहुंच पाई हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 29 Jun 2026 22:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>Best Time To Eat Dessert: मीठा खाने की आदत बदल सकती है सेहत, डॉक्टर ने बताया मिठाई खाने का सही समय</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/best-time-to-eat-dessert-मीठा-खाने-की-आदत-बदल-सकती-है-सेहत-डॉक्टर-ने-बताया-मिठाई-खाने-का-सही-समय</link>
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        <description><![CDATA[ Best Time To Eat Dessert:&amp;nbsp;मीठा खाना लगभग हर किसी को पसंद होता है, और खाना खाने के बाद कुछ मीठा खाने की आदत हर किसी कि होती है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जो मीठा आप खा रहे हैं वो आप सही समय पर खा रहे हैं या नही क्या ये आपके शरीर पर असर डाल सकता है?&amp;nbsp; ऐसे में डॉक्टरों का कहना है कि सिर्फ यह मायने नहीं रखता कि आप कितना मीठा खा रहे हैं, बल्कि यह भी बात मायने रखती है कि आप उसे किस समय खा रहे हैं. अगर मीठा खाने का तरीका और समय सही हो, तो इससे शरीर पर नुकसान कम होता है, जबकि गलत समय पर मीठा खाना ब्लड शुगर और वजन दोनों को बिगाड़ सकता है.
खाली पेट नहीं, खाना खाने के बाद खाएं मिठाई
रिसर्च बताती है कि मीठा हमेशा खाना खाने के बाद खाना चाहिए, खाली पेट या भूखे रहते हुए नहीं.&amp;nbsp; जब हम खाली पेट सीधे मीठा खा लेते हैं, तो शरीर में शुगर बहुत तेजी से बढ़ती है, जिससे ब्लड शुगर का स्तर अचानक ऊपर चला जाता है और फिर तेजी से नीचे भी आ जाता है.&amp;nbsp; लेकिन अगर वही मीठा सब्जी, दाल, रोटी जैसी चीजें खाने के बाद खाई जाए, तो शरीर में पहले से मौजूद प्रोटीन, फाइबर और दूसरे पोषक तत्व शुगर को धीरे-धीरे अब्जॉर्ब&amp;nbsp; करने में मदद करते हैं.&amp;nbsp; इससे शुगर का स्तर नॉर्मल भी रहता है.
इसके अलावा वैज्ञानिक रिसर्च यह भी कहती है कि रात के खाने के बाद मीठा खाना सबसे ज्यादा नुकसानदायक होता है.&amp;nbsp; एक स्टडी में पाया गया कि रात के खाने के बाद मीठा खाने से ब्लड शुगर का स्तर बिगड़ता है, और इसका असर अगले दिन की सुबह तक भी बना रह सकता है.&amp;nbsp; &amp;nbsp;इसके मुकाबले दिन में, खास तौर पर दोपहर के खाने के बाद मीठा खाना ज्यादा बेहतर माना जाता है, क्योंकि उस समय शरीर एक्टिव रहता है.&amp;nbsp;
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रात में मीठा खाने से बढ़ सकता है ब्लड शुगर
इसी कड़ी में डॉक्टरों की एक और सलाह यह भी है कि मीठे को कभी असली खाने की जगह नहीं लेना चाहिए, बल्कि इसे एक छोटे और सीमित हिस्से के तौर पर ही खाना चाहिए.&amp;nbsp; साथ ही जिन लोगों को डायबिटीज या शुगर से जुड़ी कोई परेशानी है, उन्हें मीठा खाने से पहले हमेशा अपने डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए.&amp;nbsp;डॉक्टर ने यह चेतावनी भी दी कि खाली पेट मीठा खाने से ब्लड शुगर बहुत तेजी से बढ़ सकता है, और यह खास तौर पर डायबिटीज, प्रीडायबिटीज, इंसुलिन रेजिस्टेंस, मोटापे या मेटाबॉलिक सिंड्रोम जैसी समस्याओं से जूझ रहे लोगों के लिए यह नुकसानदायक हो सकता है.&amp;nbsp;कुल मिलाकर, मीठा पूरी तरह छोड़ने की जरूरत नहीं होती है, बस उसके खाने के समय पर ध्यान देना चाहिए.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Sun, 28 Jun 2026 17:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>सभी वैक्सीन और कैंसर की दवाओं पर भी अब QR कोड जरूरी, सरकार ने बदले नियम</title>
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        <description><![CDATA[ QR Codes Mandatory for Vaccines: केंद्र सरकार ने दवाओं को लेकर एक बड़ा फैसला लिया है. अब वैक्सीन, एंटीबायोटिक दवाएं, कैंसर की दवाएं और नशीली दवाओं पर भी QR कोड लगाना जरूरी होगा. स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने इसके लिए ड्रग्स रूल्स 1945 में बदलाव किया है. अभी तक यह नियम सिर्फ देश की टॉप 300 दवा ब्रांड्स पर लागू था. अब इसका दायरा बढ़ाकर इसमें सभी वैक्सीन, एंटीबायोटिक दवाएं, NDPS एक्ट के तहत आने वाली नशीली और साइकोट्रॉपिक दवाएं और कैंसर की सभी दवाएं भी शामिल कर दी गई हैं.
प्रोडक्ट की पैकेजिंग पर जरूरी होगा QR कोड
नए नियम के मुताबिक दवा बनाने वाली कंपनियों को अपने प्रोडक्ट की पैकेजिंग पर बार कोड या QR कोड लगाना होगा. अगर पैकेजिंग पर जगह कम होगी तो यह कोड सेकेंडरी पैकेजिंग पर लगाया जा सकेगा. इस कोड को स्कैन करने पर लोग दवा की पूरी जानकारी देख सकेंगे. QR कोड में दवा का यूनिक कोड, उसका जेनेरिक और ब्रांड नाम, कंपनी का नाम और पता, बैच नंबर, बनने और एक्सपायरी की तारीख, मैन्युफैक्चरिंग लाइसेंस नंबर और जरूरत पड़ने पर दवा में मिले तत्वों की जानकारी होगी.
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नकली और घटिया दवाओं की आसान होगी पहचान
सरकार का कहना है कि इस फैसले से नकली और घटिया दवाओं पर रोक लगाने में मदद मिलेगी. सप्लाई चेन में दवा की हर स्टेज पर पहचान और जांच आसान हो जाएगी. इससे एंटीबायोटिक दवाओं के गलत असर से जुड़ी समस्या यानी एंटी माइक्रोबियल रेजिस्टेंस से लड़ने में भी मदद मिलेगी क्योंकि नकली और कमजोर एंटीबायोटिक दवाओं की पहचान करना आसान होगा.
1 जुलाई 2027 से लागू हो जाएगा नियम&amp;nbsp;
कंपनियों को नए नियम लागू करने के लिए पूरा समय दिया गया है. वैक्सीन, नशीली दवाओं और कैंसर की दवाओं पर यह नियम 1 जुलाई 2027 से लागू होगा. वहीं एंटीबायोटिक दवाओं पर यह नियम 1 जुलाई 2028 से लागू किया जाएगा.
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        <pubDate>Fri, 26 Jun 2026 04:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>Childhood Obesity Causes: इन 5 फूड हैबिट्स से बच्चों को जल्दी घेर लेता है मोटापा, जानिए कैसे छुड़ाएं इससे पीछा?</title>
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        <description><![CDATA[ Food Habits That Cause Obesity In Children: बदलती लाइफस्टाइल का असर सिर्फ बड़े और बुजुर्गों पर ही नहीं हो रहा है, बल्कि बच्चे भी इसकी चपेट में आ रहे हैं. आजकल के बच्चों में मोटापा एक बड़ी दिक्कत बनता जा रहा है. और इसकी सबसे बड़ी वजह सिर्फ बाहर का खाना या जंक फूड नहीं है, बल्कि घर के भीतर बनी कुछ ऐसी फूड हैबिट्स भी हैं, जो धीरे-धीरे बच्चों का वजन बढ़ाने लगती हैं. कई बार मां-बाप को लगता है कि वे बच्चे की हर जरूरत पूरी कर रहे हैं, लेकिन अनजाने में वही आदतें आगे चलकर मोटापे की वजह बन जाती हैं. अगर समय रहते इन पर ध्यान न दिया जाए, तो बच्चा कम उम्र में ही मोटापे की चपेट में आ सकता है.
बच्चों को तुरंत खाना क्यों नहीं देना चाहिए?
सबसे पहली आदत है, बच्चे के हर बार भूख लगने की बात पर तुरंत कुछ खाने को दे देना. कई बार बच्चे सच में भूखे नहीं होते, बल्कि बोरियत, आदत या किसी चीज की क्रेविंग की वजह से खाने की मांग करते हैं. ऐसे में अगर हर बार उन्हें कुछ न कुछ दे दिया जाए, तो ओवरईटिंग की आदत बन सकती है. इससे बचने के लिए बच्चों का फिक्स मील टाइम और स्नैक टाइम तय करना जरूरी है.
बात-बात पर स्नैक्स पकड़ाने की आदत
दूसरी आदत है, हर समय साथ में स्नैक्स लेकर चलना और मौका मिलते ही बच्चे को पकड़ा देना. आजकल कार, स्कूल बैग या बाहर जाते समय बच्चों के लिए स्नैक्स रखना आम बात हो गई है. लेकिन बार-बार स्नैकिंग से बच्चा यह समझ ही नहीं पाता कि असली भूख क्या होती है. ऐसे में जरूरत से ज्यादा कैलोरी शरीर में जाने लगती है. बेहतर होगा कि बच्चे को हर बार चिप्स, कुकीज या मीठी चीजें देने के बजाय फल, सब्जियां या हल्के हेल्दी स्नैक्स दिए जाएं.
बच्चों के लिए अलग से खाना बनाना
तीसरी आदत है, बच्चों के लिए अलग से उनकी पसंद का खाना बनाना. कई घरों में ऐसा होता है कि अगर बच्चा घर का सामान्य खाना नहीं खा रहा, तो उसके लिए अलग से मैगी, फ्रेंच फ्राइज, नगेट्स या दूसरी पसंदीदा चीजें बना दी जाती हैं. इससे बच्चा हेल्दी खाने से दूर होने लगता है और उसे लगता है कि हर बार उसकी पसंद का ही खाना मिलेगा. इससे बचने के लिए जरूरी है कि बच्चे को धीरे-धीरे वही संतुलित खाना खाने की आदत डाली जाए, जो घर में बाकी लोग खा रहे हैं.
इन चीजों से भी करना चाहिए परहेज
चौथी आदत है, पानी और दूध की जगह मीठे ड्रिंक्स देना. सॉफ्ट ड्रिंक, पैकेज्ड जूस, फ्लेवर्ड ड्रिंक या मीठे शरबत बच्चों के शरीर में बहुत तेजी से अतिरिक्त शुगर पहुंचाते हैं. यही शुगर आगे चलकर वजन बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाती है. इसलिए बच्चों को पानी पीने की आदत डालना और मीठे पेय से दूरी बनाना जरूरी है.
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बच्चों के वजन को लेकर ये गलतियां न करें
पांचवीं और सबसे जरूरी बात यह है कि बच्चों के वजन को लेकर या तो बहुत निगेटिव रवैया अपनाया जाता है या फिर इस पर बिल्कुल बात ही नहीं की जाती. दोनों ही तरीके गलत हैं. बच्चे को शर्मिंदा करने के बजाय परिवार में हेल्दी खाने और एक्टिव रहने की आदत पर जोर देना चाहिए. अगर शुरुआत से ये पांच फूड हैबिट्स सुधर जाएं, तो बच्चों को मोटापे से काफी हद तक बचाया जा सकता है.
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        <pubDate>Fri, 26 Jun 2026 04:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>Alka Yagnik health: किन लोगों को होती है अलका याज्ञनिक वाली बीमारी? जानें इसके लक्षण और बचाव के तरीके</title>
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        <description><![CDATA[ Alka Yagnik viral video Padma Bhushan: रोडवेज का सफर हो या फिर अकेले में कुछ गुनगुनाने का मन हो, तो हमारे जेहन में एक नाम आता है अलका याज्ञनिक का, जिन्होंने हमें तमाम कल्ट सॉन्ग्स दिए हैं. फिर चाहे वह ताल से ताल मिला हो या फिर दिल ने ये कहा है दिल से, ऐसे तमाम गाने हैं, जो आज भी लोगों के दिलों और दिमाग में छाए रहते हैं. लेकिन क्या आपको पता है कि आपके दिलों पर राज करने वाली यह सिंगर एक गंभीर बीमारी से गुजर रही है.
दरअसल 23 जून को भारत सरकार की तरफ से दिए जाने वाले तीसरे सबसे बड़े पुरस्कार पद्म भूषण से उनको नवाजा गया. इसको लेकर उन्होंने एक भावुक नोट शेयर किया. इसमें उन्होंने अपनी हेल्थ के बारे में भी बताया.
किस बीमारी से गुजर रही हैं अलका याज्ञनिक
सिंगर ने म्यूजिक में योगदान के लिए आभार जताने के साथ-साथ हेल्थ को लेकर ऐसा अपडेट दिया, जिसने उनके फैंस को दुखी कर दिया. साल 2024 में उन्होंने अपनी इस रेयर बीमारी के बारे में लोगों को जानकारी दी थी, जिसका नाम सेंसोरिन्यूरल नर्व हियरिंग लॉस है. वह अभी तक इस बीमारी से उबर नहीं पाई हैं. पिछले कुछ समय से वह लाइमलाइट से दूर ही रहती हैं. जब उनको पद्म भूषण से नवाजा जा रहा था, तो 60 वर्षीय सिंगर एक वायरल वीडियो में अटेंडेंट की मदद लेती दिखीं, जिसने सभी को भावुक कर दिया. चलिए आपको बताते हैं कि यह बीमारी कितनी खतरनाक है और इसके लक्षण और इलाज क्या हैं.&amp;nbsp;
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कितना खतरनाक है सेंसोरिन्यूरल नर्व हियरिंग लॉस
सेंसोरिन्यूरल नर्व हियरिंग लॉस एक रेयर हियरिंग डिसऑर्डर होता है, जिसमें इंसान की सुनने की क्षमता काफी प्रभावित हो जाती है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अलका को यह बीमारी अचानक एक वायरल अटैक की वजह से हुई थी, जिसे सिंगर ने अपनी जिंदगी का एक झटका बताया था और फैंस से दुआ करने की अपील की थी. हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली संस्था clevelandclinic के अनुसार, यह तब किसी को होता है, जब ध्वनि आपके भीतरी कान तक नहीं पहुंच पाती. यह स्थिति अचानक भी हो सकती है या फिर इंसान इसकी चपेट में धीरे-धीरे भी आ सकता है. यह इंसान में जन्म के साथ मौजूद हो सकता है और बाद में भी इस तरह की दिक्कत हो सकती है.
क्या इसका इलाज संभव है
clevelandclinic की रिपोर्ट के अनुसार, अभी तक इस रेयर बीमारी का इलाज संभव नहीं है. हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि आप सुन नहीं सकते. इसके लिए हियरिंग एड, कॉक्लियर इम्प्लांट या अन्य उपकरण आपको फिर से सुनने में मदद कर सकते हैं. अगर इसके होने के कारणों की बात करें, तो इसमें इंफेक्शन, चोट और तेज ध्वनि के संपर्क शामिल होते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 25 Jun 2026 00:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Pushups Benefits: रोज 100 पुशअप्स मारने पर कितने दिन में बन जाएगी बॉडी, क्या कहते हैं जिम एक्सपर्ट?</title>
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        <description><![CDATA[ How Long Does It Take To Build Muscle With Pushups:&amp;nbsp; आजकल हर कोई फिट दिखना चाहता है. इसके लिए कई लोग जिम जा रहे हैं, कई लोग घर पर तरह-तरह की एक्सरसाइज कर रहे हैं और कई लोग कई-कई किलोमीटर की दौड़ लगा रहे हैं, ताकि खुद को इस बदलती लाइफस्टाइल में भी फिट रख सकें. ऐसे में सवाल आता है कि आखिर जो लोग रोज पुशअप्स मारते हैं, उनको अपनी बॉडी बनाने में कितना समय लगता है. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर एक्सपर्ट क्या कहते हैं और कैसे आप अपनी बॉडी पुशअप्स मारकर बना सकते हैं.
क्या पुशअप्स बॉडी बनाने के लिए बेहतर विकल्प है?
रोज 100 पुशअप्स मारने से बॉडी कितने दिनों में बनेगी, यह जानने से पहले यह जान लेते हैं कि आखिर पुशअप्स मारने से बॉडी बनती है या फिर नहीं बनती है. हेल्थ और फिटनेस पर जानकारी देने वाली वेबसाइट vinmec के अनुसार, यह आसान लेकिन काफी असरदार एक्सरसाइज है. इसको करने के लिए आपको किसी जिम या फिर किसी खास जगह की जरूरत नहीं होती है, आप इसको आसानी से कहीं भी कर सकते हैं. इसको कई फिटनेस रूटीन में शामिल किया जाता है और इसे अलग-अलग लक्ष्यों के लिए अनुकूलित किया जा सकता है. यह उन लोगों के लिए काफी फायदेमंद हो सकता है, जो नियमित रूप से खेलकूद या फिटनेस गतिविधियों में भाग लेते हैं. इससे कंधों, छाती और बाहों की ताकत बढ़ाने में मदद मिल सकती है.
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रोज 100 पुशअप्स मारने से बॉडी कितने दिनों में बनेगी?
रिपोर्ट के अनुसार, अगर आप शुरुआती हैं, तो दूसरे हफ्ते तक आपको अपनी बाहों, छाती और शरीर के दूसरे बड़े हिस्सों में बदलाव महसूस होने लग सकता है. हालांकि, अगर 100 पुशअप्स आपके लिए पहले से ही आसान हैं, तो इससे ज्यादा फायदा नहीं मिलेगा और यह एक्सरसाइज ताकत बढ़ाने के बजाय एंड्योरेंस ट्रेनिंग जैसी हो सकती है.
क्या होते हैं इसके फायदे?
अगर आप इसको डेली करते हैं, तो इससे आपके वर्कआउट रूटीन में काफी सुधार होता है और ट्राइसेप्स, पेक्स और कंधे की मांसपेशियों के विकास में मदद मिलती है. हार्ट हेल्थ और बॉडी की स्टैमिना बेहतर हो सकती है. हालांकि, यह ध्यान रखें कि अगर आपसे एक बार में 100 नहीं लगते, तो आप इन्हें चार या फिर पांच सेट में कर सकते हैं.
क्या होती है दिक्कत?
कई रिपोर्ट्स में इस बात का जिक्र किया गया है कि इससे शरीर के आगे के हिस्से यानी छाती और ट्राइसेप्स की मांसपेशियां ज्यादा मजबूत हो जाती हैं, लेकिन पीठ के हिस्से में इसका ज्यादा असर नहीं दिखता है, जिसके कारण शरीर का संतुलन बिगड़ सकता है. यही कारण है कि एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि आप पुश-अप्स के साथ पुल-अप्स, डिप्स और स्क्वैट्स को भी जोड़ सकते हैं, जिससे शरीर को संतुलन मिलता है. अगर 100 पुश-अप्स करना आपके लिए मुश्किल है, तो आपकी मांसपेशियों को ज्यादा आराम की जरूरत हो सकती है. ताकत बढ़ाने के लिए, आमतौर पर मांसपेशियों को कम से कम 48 घंटे आराम देने की सलाह दी जाती है. पर्याप्त आराम के बिना इन मांसपेशियों पर लगातार जोर डालने से चोट लगने का खतरा बढ़ सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 25 Jun 2026 00:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>Air In Injection Side Effects: क्या सच में इंजेक्शन में एयर बाकी रह जाने से हो जाती है मौत, क्या है इसके पीछे का सच?</title>
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        <description><![CDATA[ Injection Air Bubble Myth Or Fact: इंजेक्शन लगने से पहले डॉक्टर या नर्स अक्सर सिरिंज में मौजूद हवा को बाहर निकालते दिखते हैं. ऐसे में कई लोगों के मन में सवाल उठता है कि अगर इंजेक्शन में थोड़ी-सी हवा रह जाए, तो क्या इससे मौत हो सकती है? फिल्मों और सोशल मीडिया में भी इस बात को लेकर तरह-तरह की बातें कही जाती हैं. लेकिन सच यह है कि हर बार सिरिंज में हवा का छोटा-सा बुलबुला दिखना जानलेवा नहीं होता. मामला इस बात पर निर्भर करता है कि हवा कितनी मात्रा में शरीर में गई है और वह शरीर के किस हिस्से तक पहुंची है.
क्या सच में वह जानलेवा होता है?
दरअसल, जब हवा का बुलबुला नस या आर्टरीज में पहुंचकर खून के बहाव में रुकावट पैदा करता है, तो इस स्थिति को एयर एम्बोलिज्म कहा जाता है. यह तब खतरनाक हो सकता है, जब हवा की मात्रा ज्यादा हो या वह शरीर के किसी संवेदनशील हिस्से, जैसे ब्रेन, हार्ट या लंग्स तक पहुंच जाए. यही वजह है कि डॉक्टर इंजेक्शन या ड्रिप लगाते समय इस बात का ध्यान रखते हैं कि हवा शरीर में न जाए.
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कब होती है इंसान को दिक्कत?
हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली वेबसाइट Medicalnewstoday की रिपोर्ट्स के मुताबिक, नसों में बहुत कम मात्रा में पहुंची हवा कई बार शरीर खुद ही संभाल लेता है और उससे कोई गंभीर नुकसान नहीं होता. हालांकि, अगर हवा सीधे ब्लड सर्कुलेशन में ज्यादा मात्रा में चली जाए, तो दिक्कत बढ़ सकती है. यही स्थिति एयर एम्बोलिज्म का रूप ले सकती है. रिपोर्ट्स में यह भी बताया गया है कि अगर हवा दिमाग तक पहुंच जाए, तो यह जानलेवा हो सकती है. कुछ मामलों में बहुत कम मात्रा में हवा भी गंभीर स्थिति पैदा कर सकती है, लेकिन ऐसा आमतौर पर सामान्य इंजेक्शन लगने के दौरान नहीं होता.
किन मेडिकल प्रक्रियाओं में यह खतरनाक?
असल में, एयर एम्बोलिज्म का खतरा ज्यादा उन मेडिकल प्रक्रियाओं में माना जाता है, जहां हवा के सीधे खून की नसों तक पहुंचने की संभावना होती है. जैसे कुछ तरह की सर्जरी, सेंट्रल लाइन, डायलिसिस या बड़े मेडिकल प्रोसीजर. यही वजह है कि सामान्य मसल इंजेक्शन और नस में लगने वाले कुछ इंजेक्शन के बीच फर्क समझना जरूरी है. हर इंजेक्शन में हवा का छोटा बुलबुला दिखना मौत का संकेत नहीं होता. इंजेक्शन में थोड़ी हवा दिखने भर से घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन यह भी सही है कि शरीर में हवा जाने को पूरी तरह हल्के में नहीं लिया जाता. डॉक्टर और नर्स इसी वजह से सावधानी बरतते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 25 Jun 2026 00:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>Early Pregnancy Diet: Early pregnancy में क्यों नहीं खाना चाहिए पपीता&amp;पाइनएप्पल, कैसे बनते हैं अनचाहे गर्भपात की वजह?</title>
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        <description><![CDATA[ Foods To Avoid In Early Pregnancy: प्रेग्नेंसी की शुरुआत होते ही महिलाओं को खानपान को लेकर तमाम तरह की सलाह दी जाती है. इनमें सबसे ज्यादा जिस बात को लेकर सावधानी बरतने को कहा जाता है, वह है पपीता और पाइनएप्पल. अक्सर घर के बड़े-बुजुर्ग से लेकर कई डॉक्टर तक शुरुआती गर्भावस्था में इन दोनों फलों से दूरी बनाने की सलाह देते हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्यों कहा जाता है और क्या सच में ये फल अनचाहे गर्भपात की वजह बन सकते हैं.
किन पपीते को नहीं खाना चाहिए?
सबसे पहले बात पपीते की करें, तो इसे लेकर सबसे ज्यादा चिंता कच्चे या अधपके पपीते को लेकर होती है. दरअसल, कच्चे पपीते में लेटेक्स और पपेन जैसे तत्व ज्यादा मात्रा में पाए जाते हैं. इन्हें गर्भावस्था में जोखिम भरा माना जाता है, क्योंकि कुछ रिसर्च और लैब स्टडी में इन तत्वों का असर गर्भाशय को उत्तेजित करने वाला पाया गया है. माना जाता है कि ये गर्भाशय में कंस्ट्रक्शन बढ़ा सकते हैं और इसी वजह से शुरुआती प्रेग्नेंसी में कच्चे पपीते से दूरी बनाने की सलाह दी जाती है. यही कारण है कि अधपका या हरा पपीता गर्भवती महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं माना जाता.
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क्या पका पपीता खा सकते हैं?
&amp;nbsp;हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली वेबसाइट healthline के अनुसार, पूरी तरह पका हुआ पपीता इससे अलग होता है. पके पपीते में लेटेक्स की मात्रा काफी कम हो जाती है और इसमें विटामिन C, फोलेट, फाइबर और दूसरे पोषक तत्व भी होते हैं. इसलिए कुछ एक्सपर्ट मानते हैं कि कम मात्रा में पका पपीता हर गर्भवती महिला के लिए खतरनाक नहीं होता. फिर भी, क्योंकि इस पर इंसानों में बहुत ठोस रिसर्च मौजूद नहीं है, इसलिए ज्यादातर मामलों में डॉक्टर सावधानी बरतने की सलाह देते हैं.
&amp;nbsp;पाइनएप्पल कितना नुकसानदायक?
अब बात पाइनएप्पल की करें, तो इसे लेकर भी गर्भपात का डर अक्सर सुनने को मिलता है. इसकी वजह ब्रोमेलिन नाम का एंजाइम है, जो पाइनएप्पल में पाया जाता है. माना जाता है कि यह सर्विक्स को नरम करने और गर्भाशय पर असर डालने का काम कर सकता है. हालांकि, सामान्य मात्रा में पाइनएप्पल खाने से गर्भपात हो जाएगा, ऐसा कोई मजबूत वैज्ञानिक सबूत नहीं है. दिक्कत तब मानी जाती है, जब इसे बहुत ज्यादा मात्रा में लिया जाए या शरीर किसी वजह से पहले से संवेदनशील स्थिति में हो.
यही वजह है कि शुरुआती प्रेग्नेंसी में पपीता और पाइनएप्पल को लेकर पूरी तरह लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए. खासकर अगर महिला की प्रेग्नेंसी हाई रिस्क है, पहले गर्भपात हो चुका है, ब्लीडिंग की दिक्कत है या डॉक्टर ने खानपान में खास सावधानी बरतने को कहा है, तो इन फलों को खाने से पहले सलाह जरूर लेनी चाहिए.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 25 Jun 2026 00:30:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Paratha Side Effects: सुबह के नाश्ते में पराठा खाना पड़ सकता है महंगा, एक्सपर्ट्स के मुताबिक होते हैं ये पांच बड़े नुकसान</title>
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        <description><![CDATA[ Paratha Side Effects: सुबह के नाश्ते में पराठा खाना पड़ सकता है महंगा, एक्सपर्ट्स के मुताबिक होते हैं ये पांच बड़े नुकसान ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 24 Jun 2026 08:30:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Best Time To Eat Watermelon: कहीं आप भी तो गलत समय पर नहीं खा रहे तरबूज? पेट की बीमारियों का बढ़ सकता है खतरा!</title>
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        <description><![CDATA[ What Is The Best Time To Eat Watermelon For Digestion: गर्मी और तरबूज का रिश्ता ऐसा है जैसे धूप और पसीना, एक-दूसरे के बिना अधूरा. &amp;nbsp;बाजार में कटा हुआ, रस टपकाता तरबूज देखते ही मन ललचा जाता है. लेकिन एक बात ज्यादातर लोग नजरअंदाज कर देते हैं कि इसे खाने का सही समय. यह सिर्फ स्वाद की बात नहीं है, बल्कि इस बात से भी जुड़ा है कि आपका शरीर इसे कैसे पचाता है. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर एक्सपर्ट क्या कहते हैं.&amp;nbsp;
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
मेदांता अस्पताल की निधि सहाई ने TOI को बताया कि तरबूज खाने का सबसे सही समय सुबह के नाश्ते और दोपहर के खाने के बीच का होता है. इस दौरान डाइजेशन सिस्टम सबसे ज्यादा सक्रिय रहता है. यह कोई यूं ही दी गई सलाह नहीं है, बल्कि शरीर की अपनी लय होती है, जिसके अनुसार अलग-अलग समय पर पाचन क्षमता बदलती रहती है. तरबूज में लगभग 90 प्रतिशत पानी होता है और इसमें प्राकृतिक शर्करा भी होती है. ऐसे में शरीर को इसे सही तरीके से पचाने के लिए तैयार रहना जरूरी होता है. सुबह नाश्ते के बाद जब डाइजेशन सिस्टम सक्रिय हो चुका होता है, तब इसे खाना सबसे फायदेमंद रहता है.&amp;nbsp;
क्या होती है इससे दिक्कत?
निधि सहाई के अनुसार, हल्के भरे पेट में तरबूज खाने से पेट फूलने की समस्या कम होती है और पाचन भी बेहतर रहता है. कई लोग सोचते हैं कि खाली पेट फल खाना ठीक होता है, लेकिन तरबूज के मामले में पेट का थोड़ा सक्रिय होना जरूरी है. यही कारण है कि सुबह का मध्य समय सबसे सही माना जाता है. एक दिलचस्प बात यह भी है कि तरबूज व्यायाम से पहले ऊर्जा देने वाला अच्छा विकल्प हो सकता है. कसरत से लगभग आधा घंटा पहले इसे खाने से शरीर को तुरंत एनर्जी मिलती है और पानी की कमी भी नहीं होती। यही वजह है कि कई खिलाड़ी इसे अपनी दिनचर्या में शामिल करते हैं.
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कब नहीं खाना चाहिए?
लेकिन रात में तरबूज खाना ठीक नहीं माना जाता. उस समय शरीर आराम की स्थिति में जाने लगता है और पाचन प्रक्रिया धीमी हो जाती है. ऐसे में तरबूज की शर्करा और पानी शरीर को असहज कर सकते हैं, जिससे गैस या भारीपन महसूस हो सकता है. हर व्यक्ति के लिए यह सलाह एक जैसी नहीं होती. जिन लोगों का डाइजेशन सिस्टम सेंसिटिव होता है या जिन्हें आंत से जुड़ी समस्या रहती है, उन्हें खास सावधानी बरतनी चाहिए. ऐसे लोगों को तरबूज खाने के बाद पेट दर्द या सूजन जैसी दिक्कत हो सकती है.
मात्रा का ध्यान रखना भी जरूरी
मात्रा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितना समय. अक्सर लोग इसे हल्का समझकर ज्यादा खा लेते हैं, लेकिन जरूरत से ज्यादा तरबूज खाने से पेट पर दबाव पड़ता है. निधि सहाई सलाह देती हैं कि एक से दो कटोरी मात्रा पर्याप्त होती है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 23 Jun 2026 20:30:13 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Gym Workout Death: वर्कआउट में पुलिस अफसर की अचानक मौत, जिम जाने वाले नोट कर लें ये बात, वरना हो सकती है दिक्कत</title>
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        <description><![CDATA[ Why Healthy People Die During Exercise: जिम में वर्कआउट के दौरान उत्तराखंड पुलिस के 38 वर्षीय स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप अधिकारी गिरीश भट्ट की अचानक मौत ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सिर्फ फिट दिखना ही स्वस्थ होने की गारंटी है? एक्सपर्ट का कहना है कि रेगुलर एक्सरसाइज करने वाला व्यक्ति भी कई बार ऐसी छिपी हुई स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहा होता है, जिनका पता समय रहते नहीं चल पाता.
दरअसल, चंपावत जिले में तैनात गिरीश भट्ट जिम में अभ्यास कर रहे थे, तभी उनकी तबीयत बिगड़ गई और वे अचानक गिर पड़े. उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया. उनकी मौत की वास्तविक वजह की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है. परिवार और सहकर्मियों के लिए यह घटना गहरे सदमे की तरह है।. गिरीश भट्ट अपने पीछे पत्नी और दो बेटों को छोड़ गए हैं.
हेल्दी दिखने वाले लोगों में क्यों हो रही है दिक्कत?
इस घटना के बाद एक बार फिर यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर स्वस्थ दिखने वाले लोग भी अचानक गंभीर मेडिकल इमरजेंसी का शिकार कैसे हो जाते हैं.डॉ. रचित गुलाटी ने TOI को बताया कि कि फिटनेस और स्वास्थ्य को एक जैसा मान लेना बड़ी भूल है. कई बार व्यक्ति बाहर से पूरी तरह फिट नजर आता है, लेकिन उसके शरीर में हाई ब्लड प्रेशर, अनियमित हार्ट रिद्म, आर्टरीज में रुकावट या जेनेटिक हार्ट रोग जैसी समस्याएं चुपचाप मौजूद रहती हैं.&amp;nbsp;
क्या शरीर पहले से देता है संकेत?
डॉ. रचित गुलाटी के अनुसार, शरीर अक्सर किसी बड़ी समस्या से पहले संकेत देता है, लेकिन लोग उन्हें सामान्य थकान या मेहनत का असर समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. वर्कआउट के दौरान या बाद में असामान्य सांस फूलना, सीने में भारीपन, चक्कर आना, दिल की धड़कन तेज महसूस होना या जरूरत से ज्यादा थकान जैसे लक्षण गंभीर चेतावनी हो सकते हैं.
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क्या है इसके पीछे कारण?
एक्सपर्ट का मानना है कि लंबे अंतराल के बाद अचानक भारी व्यायाम शुरू करना, दूसरों से प्रतिस्पर्धा में जरूरत से ज्यादा मेहनत करना या बिना स्वास्थ्य जांच के हाई-इंटेंसिटी वर्कआउट करना जोखिम बढ़ा सकता है. खासतौर पर 35 वर्ष से अधिक उम्र के लोग, जिनके परिवार में हार्ट रोग का इतिहास रहा हो या जो डायबिटीज, मोटापा, धूम्रपान और हाई बीपी जैसी समस्याओं से जुड़े हों, उन्हें नियमित स्वास्थ्य जांच करानी चाहिए.
किन चीजों का रखना चाहिए ध्यान?
डॉ. रचित गुलाटी यह भी बताते हैं कि सुरक्षित फिटनेस के लिए सिर्फ व्यायाम ही नहीं, बल्कि पर्याप्त नींद, सही मात्रा में पानी पीना, वॉर्म-अप, कूल-डाउन और वर्कआउट के बीच उचित रिकवरी भी उतनी ही जरूरी है. सोशल मीडिया पर दिखने वाली अत्यधिक मेहनत वाली फिटनेस संस्कृति हर किसी के लिए सही नहीं होती.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 23 Jun 2026 04:30:04 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Prenatal Yoga Benefits: प्रेग्नेंसी में कमर दर्द और खराब नींद से मिलेगा छुटकारा, बस रोज करें ये एक काम</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/prenatal-yoga-benefits-प्रेग्नेंसी-में-कमर-दर्द-और-खराब-नींद-से-मिलेगा-छुटकारा-बस-रोज-करें-ये-एक-काम</link>
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        <description><![CDATA[ Benefits Of Prenatal Yoga During Pregnancy:&amp;nbsp;गर्भावस्था के दौरान अच्छी नींद लेना कई महिलाओं के लिए बड़ी चुनौती बन जाता है. बढ़ता वजन, शरीर में दर्द, बार-बार करवट बदलना और हार्मोनल बदलाव अक्सर रात की नींद खराब कर देते हैं. ऐसे में कई एक्सपर्ट प्रीनेटल योग को एक असरदार विकल्प मानते हैं. नियमित रूप से किए जाने वाले हल्के योग अभ्यास न केवल शरीर को आराम पहुंचाते हैं, बल्कि मानसिक तनाव को कम करने में भी मदद कर सकते हैं.&amp;nbsp;
योग से कैसे होता है फायदा?
डॉ. नेहा शुक्ला ने TOI को बताया कि प्रेग्नेंसी में एक्टिव लाइफस्टाइल बनाए रखना बेहद जरूरी है. उनके अनुसार, प्रीनेटल योग महिलाओं को शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रखने का एक सुरक्षित तरीका हो सकता है. इसमें नियंत्रित श्वास, हल्की स्ट्रेचिंग और रिलैक्सेशन तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है. गर्भावस्था के दौरान सिर्फ शरीर ही नहीं, मन भी कई बदलावों से गुजरता है. प्रसव को लेकर चिंता, भविष्य की जिम्मेदारियां और हार्मोनल उतार-चढ़ाव कई महिलाओं में तनाव और बेचैनी बढ़ा सकते हैं. ऐसे समय में योग और ध्यान मन को शांत करने का काम करते हैं. डॉ. नेहा शुक्ला के मुताबिक, नियमित योग अभ्यास से महिलाओं में आत्मविश्वास बढ़ सकता है और भावनात्मक संतुलन बनाए रखने में मदद मिल सकती है.&amp;nbsp;
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कैसे होता है यह फायदेमंद?
प्रीनेटल योग का एक महत्वपूर्ण हिस्सा प्राणायाम भी है. गहरी और नियंत्रित सांस लेने की तकनीकें शरीर में ऑक्सीजन के प्रवाह को बेहतर बनाती हैं. यही तकनीकें प्रसव के समय भी महिलाओं के लिए फायदेमंद साबित हो सकती हैं. एक्सपर्ट का मानना है कि सही तरीके से की गई ब्रीदिंग एक्सरसाइज महिलाओं को प्रसव के दौरान अधिक शांत और केंद्रित रहने में मदद कर सकती है.
आम परेशानियों को भी कम करने में भी मददगार
मेंटल हेल्थ के अलावा प्रीनेटल योग शरीर की कई आम परेशानियों को भी कम करने में मदद कर सकता है. प्रेग्नेंसी बढ़ने के साथ पीठ, कमर और कूल्हों पर दबाव बढ़ने लगता है. कुछ विशेष योगासन मांसपेशियों को मजबूत बनाने, शरीर की लचक बढ़ाने और सही पोस्चर बनाए रखने में मदद करते हैं. इससे कमर दर्द, जकड़न और सूजन जैसी समस्याओं से राहत मिल सकती है. बेहतर ब्लड फ्लो भी इसका एक अहम लाभ माना जाता है.&amp;nbsp;
इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए
एक्सपर्ट के अनुसार प्रेग्नेंसी में हर योगासन सुरक्षित नहीं होता. डॉ. नेहा शुक्ला के अनुसार, गहरे ट्विस्ट, कठिन बैकबेंड और ज्यादा तीव्र व्यायाम से बचना चाहिए. जिन महिलाओं को सर्वाइकल इनसफिशिएंसी, अनियंत्रित हाई बीपी, गंभीर एनीमिया, प्लेसेंटा प्रिविया या समय से पहले प्रसव का खतरा हो, उन्हें विशेष सावधानी बरतनी चाहिए. यही कारण है कि प्रीनेटल योग शुरू करने से पहले डॉक्टर और प्रशिक्षित योग एक्सपर्ट की सलाह लेना जरूरी माना जाता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 16:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>Yoga And Alzheimer&amp;apos;s Disease: भूलने की आदत होगी दूर, योग से याददाश्त रहेगी एकदम लोहे जैसी मजबूत, एम्स स्टडी में खुलासा</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/yoga-and-alzheimers-disease-भूलने-की-आदत-होगी-दूर-योग-से-याददाश्त-रहेगी-एकदम-लोहे-जैसी-मजबूत-एम्स-स्टडी-में-खुलासा</link>
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        <description><![CDATA[ Yoga Benefits For Brain Health: हर साल 21 जून को पूरी दुनिया अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाती है. संयुक्त राष्ट्र ने भारत के प्रस्ताव पर दिसंबर 2014 में इसे आधिकारिक अंतरराष्ट्रीय दिवस के रूप में मान्यता दी थी. इस वर्ष योग दिवस की थीम स्वस्थ उम्र बढ़ने के लिए योग रखी गई है. दिलचस्प बात यह है कि इस बार यह थीम सिर्फ एक संदेश नहीं, बल्कि साइंटफिक रिसर्च के जरिए भी मजबूती पाती नजर आ रही है.
किन बीमारियों में फायदेमंद है योग?
दिल्ली स्थित एम्स के रिसर्चर ने हाल ही में एक स्टडी में पाया है कि नियमित योग अभ्यास अल्जाइमर रोग के शुरुआती चरण के मरीजों के लिए फायदेमंद हो सकता है. अल्जाइमर रोग जर्नल में प्रकाशित इस रिसर्च को एम्स के शरीर रचना साइंस और न्यूरोलॉजी विभाग ने मिलकर किया है. अध्ययन में हल्के अल्जाइमर से पीड़ित मरीजों को शामिल किया गया. इन प्रतिभागियों ने 12 सप्ताह तक रोजाना 60 मिनट की निगरानी में योग सत्र किए. रिसर्च के शुरुआत और अंत में उनकी मानसिक क्षमता, डिप्रेशन के लक्षणों और आंतों में मौजूद बैक्टीरिया की संरचना का इवोल्यूशन किया गया.&amp;nbsp;
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क्या हुआ योग करने से बदलाव?
परिणामों में तीनों स्तरों पर पॉजिटिव बदलाव देखने को मिले. मॉन्ट्रियल कॉग्निटिव असेसमेंट के आधार पर मरीजों की कॉग्निटिव क्षमता में सुधार दर्ज किया गया. वहीं पीएचक्यू-9 &amp;nbsp;स्केल से मापे गए डिप्रेशन के लक्षणों में भी उल्लेखनीय कमी आई. सबसे दिलचस्प बदलाव आंतों के माइक्रोबायोम में देखने को मिला. योग कार्यक्रम के बाद फैसालिबैक्टेरियम प्राउसनिट्जी, रोज़बुरिया इंटेस्टिनालिस, बिफिडोबैक्टीरियम और अक्करमैन्सिया जैसे लाभकारी बैक्टीरिया की संख्या बढ़ी. ये बैक्टीरिया शॉर्ट-चेन फैटी एसिड बनाते हैं, जिन्हें सूजन कम करने और ब्रेन व आंतों के बेहतर स्वास्थ्य से जोड़ा जाता है. दूसरी ओर कॉलिन्सेला एरोफैसिएन्स और क्लेब्सिएला जैसे सूजन बढ़ाने वाले माइक्रोबायोम में कमी दर्ज की गई.
इसके पीछे किसका है रोल?
एक्सपर्ट का मानना है कि इसके पीछे गट-ब्रेन एक्सिस महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. पिछले कुछ वर्षों में हुए कई स्टडी में यह सामने आया है कि आंतों में मौजूद बैक्टीरिया न केवल प्रतिरक्षा प्रणाली और सूजन को प्रभावित करते हैं, बल्कि ब्रेन के कामकाज पर भी असर डाल सकते हैं. एम्स के डिपार्टमेंट ऑफ एनाटॉमी की प्रोफेसर और स्टडी की प्रमुख रिसर्चर डॉ. रीमा दादा का कहना है कि यह अध्ययन शुरुआती संकेत देता है कि योग जैसी लाइफस्टाइल आधारित गतिविधियां आंतों में स्वस्थ माइक्रोबायोम वातावरण बनाने में मदद कर सकती हैं. उनके अनुसार लाभकारी बैक्टीरिया में वृद्धि और हानिकारक माइक्रोबायोम में कमी ब्रेन हेल्थ को बेहतर बनाने वाली जैविक प्रक्रियाओं से जुड़ी हो सकती है.
क्या योग अल्जाइमर का इलाज है?
वहीं एम्स दिल्ली के न्यूरोलॉजी विभाग की प्रमुख डॉ. मंजरी त्रिपाठी ने स्पष्ट किया कि योग को अल्जाइमर का इलाज नहीं माना जा सकता. हालांकि शुरुआती चरण के मरीजों और हल्की कॉग्निटिव कमजोरी वाले लोगों के लिए यह एक सहायक चिकित्सा पद्धति के रूप में उपयोगी साबित हो सकती है. उन्होंने कहा कि अध्ययन में मानसिक क्षमता, मनोदशा और आंतों के माइक्रोबियल कम्युनिटी &amp;nbsp;में पॉजिटिव बदलाव दर्ज किए गए हैं. हालांकि रिसर्चर ने यह भी स्वीकार किया है कि अध्ययन का नमूना छोटा था और इसे अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 04:30:06 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Yoga, And, Alzheimers, Disease:, भूलने, की, आदत, होगी, दूर, योग, से, याददाश्त, रहेगी, एकदम, लोहे, जैसी, मजबूत, एम्स, स्टडी, में, खुलासा</media:keywords>
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        <title>FSSAI New Rules: जंग लगे चाकू से खाना बनाकर आपकी सेहत से खिलवाड़ कर रहे रेस्तरां, FSSAI ने जारी की एडवायजरी</title>
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        <description><![CDATA[ आजकल बाहर खाना खाना हमारी जिंदगी का एक अहम हिस्सा बन गया है. वीकेंड हो, कोई छुट्टी हो या फिर ऑफिस के बाद की थकान, हम अक्सर अपने परिवार या दोस्तों के साथ किसी होटल, रेस्टोरेंट या ढाबे पर खाना खाने निकल जाते हैं. जब हम किसी रेस्टोरेंट में जाते हैं तो वहां की सजावट, एसी की हवा और साफ-सुथरी टेबल देखकर खुश हो जाते हैं. क्या आपने कभी सोचा है कि जिस किचन में आपका खाना बन रहा है, वहां कितनी साफ-सफाई है?
हाल ही में भारत की खाद्य सुरक्षा एजेंसी FSSAI (फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया) ने ऐसा खुलासा किया है, जिसे जानकर आप हैरान रह जाएंगे. यह खबर उन सभी लोगों के लिए बहुत जरूरी है, जो अक्सर बाहर का खाना खाते हैं.
किचन के अंदर का छिपा हुआ सच
FSSAI की टीम ने देश के कई होटलों, ढाबों और फूड स्टॉल्स की जांच की. इस जांच में डराने वाली बात सामने आई. अधिकारियों ने पाया कि कई जगहों पर खाना बनाने और सब्जियां काटने के लिए ऐसे चाकू और ब्लेड का इस्तेमाल किया जा रहा था, जो पूरी तरह से खराब हो चुके थे. किचन में ऐसे चाकू मिले, जिनमें जंग लगा था. कई चाकू बीच से टूटे हुए थे, उनके किनारे घिस चुके थे और कुछ चाकू के हैंडल का पेंट निकलकर खाने में गिर रहा था. बाहर से चमचमाते होटलों के किचन में जब यह हाल देखा गया तो खाद्य विभाग तुरंत हरकत में आ गया.
15 जून 2026 को जारी हुई सख्त एडवाइजरी
इस गंभीर लापरवाही को देखते हुए FSSAI ने 15 जून 2026 को पूरे देश के सभी फूड बिजनेस के लिए बेहद सख्त एडवाइजरी जारी कर दी. विभाग ने साफ कर दिया है कि लोगों की सेहत के साथ किसी भी तरह का खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.
जंग लगे और टूटे चाकू से क्या है खतरा?
शायद आप सोचें कि चाकू में थोड़ी सी जंग लगने या उसके टूटे होने से क्या फर्क पड़ता है? साइंस और डॉक्टरों के मुताबिक, यह आपकी सेहत के लिए बहुत बड़ा खतरा है.

जंग का पेट में जाना: जब जंग लगे चाकू से सब्जियां या मीट काटा जाता है तो लोहे के जंग के छोटे-छोटे कण कटकर खाने में मिल जाते हैं. यह खाना जब हमारे पेट में जाता है तो इससे पेट में इंफेक्शन, दर्द और कई गंभीर बीमारियां हो सकती हैं.
बैक्टीरिया का घर: जो चाकू टूटे हुए होते हैं या जिनमें दरारें आ जाती हैं. उन दरारों के अंदर खाने के छोटे टुकड़े फंस जाते हैं. इन्हें चाहे जितना धो लिया जाए, ये पूरी तरह साफ नहीं होते. इन दरारों में खतरनाक बैक्टीरिया पनपने लगते हैं, जो हर बार कटने वाले नए खाने में मिल जाते हैं. इससे आपको फूड पॉइजनिंग हो सकती है.
केमिकल का खतरा: जिन चाकू पर घटिया पेंट या कोटिंग होती है, वह पेंट समय के साथ उखड़ने लगता है. यह पेंट केमिकल से बना होता है, जो सीधे आपके सलाद या सब्जी के जरिए आपके शरीर में पहुंच जाता है.

FSSAI के नए और सख्त नियम
इस खतरे को हमेशा के लिए खत्म करने के लिए FSSAI ने सभी ढाबा और रेस्टोरेंट मालिकों को कुछ कड़े निर्देश दिए हैं, जिनका पालन करना अब अनिवार्य हो गया है.

सिर्फ फूड-ग्रेड चाकू का इस्तेमाल: अब किचन में केवल हाई क्वालिटी वाले (फूड-ग्रेड) और जंग-रोधी स्टेनलेस स्टील के चाकू ही इस्तेमाल किए जा सकेंगे.
खराब चाकू को तुरंत फेंकना: अगर किसी भी चाकू में थोड़ा-सा भी जंग लगा है, उसका हैंडल टूटा है या उसकी धार कटी-फटी है तो उसे तुरंत किचन से बाहर करना होगा.
नियमित सफाई जरूरी: सभी कटिंग उपकरणों और चाकू को हर इस्तेमाल के बाद अच्छे से धोना और साफ रखना होगा. उन्हें ऐसी जगह रखना होगा, जहां उन पर नमी न आए.

नियम तोड़ा तो होगी कड़ी कार्रवाई
FSSAI ने सभी राज्यों के फूड सेफ्टी अफसरों को आदेश दिया है कि वे अपनी नियमित चेकिंग के दौरान अब सिर्फ बर्तन और एक्सपायरी डेट ही नहीं देखेंगे, बल्कि किचन में इस्तेमाल हो रहे चाकू की भी बारीकी से जांच करेंगे. अगर किसी भी होटल, रेस्टोरेंट या सड़क किनारे लगे ठेले पर खराब या जंग लगा चाकू मिला तो उस पर फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स एक्ट के तहत भारी जुर्माना लगाया जा सकता है. बार-बार गलती दोहराने पर रेस्टोरेंट का लाइसेंस भी रद्द किया जा सकता है.
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        <pubDate>Sat, 20 Jun 2026 12:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Men Health After 40: 40 पार पुरुषों के शरीर में एक्टिव होते हैं साइलेंट किलर, जान बचानी है तो जरूर कराएं ये 4 टेस्ट</title>
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        <description><![CDATA[ Essential Health Tests Every Man: 40 की उम्र को अक्सर लोग सिर्फ एक संख्या मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन हेल्थ एक्सपर्ट के मुताबिक यही वह दौर है जब शरीर धीरे-धीरे बदलावों का संकेत देना शुरू कर देता है. पहले जहां देर रात तक जागना, अनियमित खानपान और तनाव का असर जल्दी नहीं दिखता था, वहीं 40 के बाद शरीर इन आदतों का हिसाब मांगने लगता है. ऐसे में नियमित स्वास्थ्य जांच कई गंभीर बीमारियों को शुरुआती चरण में पकड़ने का सबसे प्रभावी तरीका बन सकती है.
40 के बाद शरीर में कई बदलाव होने लगते हैं
&amp;nbsp;डॉ. शेली महाजन ने TOI को बताया कि 40 की उम्र के बाद पुरुषों के शरीर में कई जैविक बदलाव शुरू हो जाते हैं. मेटाबॉलिज्म की गति कम होने लगती है, हार्मोनल परिवर्तन होते हैं और वर्षों से चली आ रही लाइफस्टाइल का असर स्वास्थ्य पर दिखने लगता है. भारतीयों में जैनेटिक जोखिम और शहरी जीवन से जुड़ा तनाव इन चुनौतियों को और बढ़ा देता है.&amp;nbsp;
किन चीजों पर ध्यान देने की जरूरत होती है
डायबिटीज की समस्या&amp;nbsp;
डायबिटीज भी ऐसी ही एक बीमारी है जो लंबे समय तक बिना लक्षण के शरीर को नुकसान पहुंचाती रहती है. बढ़ता वजन, फिजिकल एक्टिविटी की कमी और तनाव इसके प्रमुख कारण माने जाते हैं. डॉ. महाजन बताती हैं कि केवल फास्टिंग ब्लड शुगर टेस्ट पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है. एचबीए1सी जांच पिछले दो से तीन महीनों के औसत ब्लड शुगर स्तर की जानकारी देती है, जिससे प्रीडायबिटीज और डायबिटीज के जोखिम को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है.
हार्ट हेल्थ पर ध्यान देने की जरूरत
हार्ट हेल्थ पर ध्यान देना जरूरी है. कई बार दिल से जुड़ी समस्याएं बिना किसी स्पष्ट लक्षण के वर्षों तक विकसित होती रहती हैं. नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन में पब्लिश रिसर्च के अनुसार भारत में हार्ट रोग वयस्कों की मृत्यु के प्रमुख कारणों में शामिल हैं. डॉ. शेली महाजन के अनुसार भारतीयों में पश्चिमी देशों के लोगों की तुलना में कम उम्र में हार्ट संबंधी समस्याएं देखने को मिलती हैं. इसलिए लिपिड प्रोफाइल और ब्लड प्रेशर की नियमित जांच भविष्य के जोखिमों का समय रहते पता लगाने में मदद कर सकती है.&amp;nbsp;
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विटामिन की कमी भी कारण
इसके अलावा विटामिन डी और विटामिन बी12 की कमी भी भारतीय पुरुषों में आम समस्या बन चुकी है. लगातार थकान, मसल्स में कमजोरी और ध्यान केंद्रित करने में परेशानी जैसे लक्षण अक्सर उम्र या तनाव का असर समझ लिए जाते हैं, जबकि इनके पीछे पोषक तत्वों की कमी भी हो सकती है. डॉ. शेली महाजन के अनुसार विटामिन डी की कमी हड्डियों को कमजोर कर सकती है और कैल्शियम के ऑब्जर्व को प्रभावित करती है.
किन जांचों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए
40 की उम्र के बाद प्रोस्टेट, लिवर और किडनी की नियमित जांच भी नजरअंदाज नहीं करनी चाहिए. प्रोस्टेट से जुड़ी कई समस्याएं शुरुआती चरण में कोई लक्षण नहीं दिखातीं. वहीं नॉन-अल्कोहोलिक फैटी लिवर डिजीज और किडनी से जुड़ी बीमारियां भी लंबे समय तक चुपचाप बढ़ती रहती हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 20 Jun 2026 12:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>Silent Tuberculosis: नॉर्थ ईस्ट में बिना लक्षण फैल रही यह खतरनाक बीमारी, हर 3 में से 1 शख्स चपेट में</title>
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        <description><![CDATA[ One In Three TB Cases In Northeast India Are Asymptomatic: देश के सबसे खूबसूरत हिस्से नार्थ- ईस्ट से डराने वाली तस्वीर निकल कर सामने आई है. पूर्वोत्तर में टीबी को लेकर किए गए एक बड़े स्क्रीनिंग अभियान ने चिंता बढ़ा दी है. जांच में पाया गया कि टीबी से इंफेक्टेड पाए गए लोगों में बड़ी संख्या ऐसे मरीजों की थी, जिनमें बीमारी के कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं दे रहे थे. यानी ये लोग सामान्य रूप से अपनी दिनचर्या में व्यस्त थे और उन्हें खुद भी इस इंफेक्शन का अंदाजा नहीं था.
34 प्रतिशत बिना लक्षण वाले मामले मिले
स्वास्थ्य मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट 2025-26 के अनुसार, नेशनल ट्यूबरक्लोसिस एलिमिनेशन प्रोग्राम के तहत जनवरी से अक्टूबर 2025 के बीच पूर्वोत्तर राज्यों में कमजोर और जोखिम वाले वर्गों के लोगों की विशेष जांच की गई. इस दौरान कुल 41,727 टीबी मरीजों की पहचान हुई, जिनमें से 14,356 मरीज ऐसे थे जिन्हें कोई लक्षण नहीं था. यह संख्या कुल मामलों का करीब 34 प्रतिशत है.
39 लाख लोगों की जांच की गई
टीबी उन्मूलन अभियान के तहत पूर्वोत्तर के आठ राज्यों में लगभग 39 लाख लोगों की स्क्रीनिंग की गई. इनमें से करीब 6 लाख लोगों का चेस्ट एक्स-रे भी किया गया. स्वास्थ्य एक्सपर्ट का मानना है कि सक्रिय जांच अभियान के कारण ऐसे मरीजों की पहचान संभव हो सकी, जो सामान्य परिस्थितियों में अस्पताल तक नहीं पहुंचते. &amp;nbsp;आंकड़ों के अनुसार असम में सबसे अधिक 10,362 एसिम्प्टोमैटिक टीबी मरीज मिले. इसके बाद मेघालय में 1,055, नागालैंड में 857 और त्रिपुरा में 510 मामले दर्ज किए गए. अरुणाचल प्रदेश में 479, मणिपुर में 465, सिक्किम में 380 और मिजोरम में 248 ऐसे मरीज पाए गए, जिनमें टीबी के सामान्य लक्षण मौजूद नहीं थे.
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टीबी नियंत्रण अभियान के लिए बड़ी चुनौती
एक्सपर्ट का कहना है कि ऐसे मरीज टीबी नियंत्रण अभियान के लिए बड़ी चुनौती साबित होते हैं. चूंकि इनमें बीमारी के लक्षण नहीं होते, इसलिए वे लंबे समय तक बिना इलाज के रह सकते हैं. इससे इंफेक्शन के फैलने का खतरा भी बना रहता है. यही वजह है कि अब स्वास्थ्य विभाग केवल अस्पतालों में आने वाले मरीजों पर निर्भर रहने के बजाय घर-घर और समुदाय स्तर पर जांच अभियान चला रहा है.&amp;nbsp;
एआई तकनीक का उपयोग
टीबी की जल्द पहचान के लिए कई राज्यों ने आधुनिक तकनीक का भी सहारा लेना शुरू कर दिया है. मेघालय में कफ अगेंस्ट टीबी ऐप और एआई आधारित पोर्टेबल एक्स-रे यूनिट का इस्तेमाल किया जा रहा है. इसके अलावा भी कई राज्यों में इस तरह की सुविधा है. सबसे हैरानी वाली बात यह है कि &amp;nbsp;रिपोर्ट के मुताबिक सितंबर 2025 तक पूर्वोत्तर क्षेत्र में 10.7 लाख से अधिक संभावित टीबी मरीजों की जांच की गई. इस दौरान संभावित टीबी जांच दर में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई. वर्ष 2024 में यह दर प्रति लाख आबादी पर 2,062 थी, जो 2025 में बढ़कर 2,645 हो गई.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 20 Jun 2026 12:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>Red Chilli Benefits: क्या डायबिटिक नर्व पेन में आराम दिलाती है लाल मिर्च, जानें क्या कहते हैं एक्सपर्ट?</title>
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        <description><![CDATA[ Can Red Chilli Relieve Diabetic Nerve Pain: डायबिटीज के मरीजों में नर्व पेन यानी नसों से जुड़ा दर्द एक आम लेकिन बेहद परेशान करने वाली समस्या है. कई लोगों को पैरों और हाथों में जलन, झनझनाहट, सुन्नपन या बिजली के झटके जैसा दर्द महसूस होता है. अब एक नई रिव्यू में सामने आया है कि लाल मिर्च में पाया जाने वाला एक खास तत्व ऐसे दर्द से राहत दिलाने में मदद कर सकता है. चलिए आपको इसके बारे में विस्तार से बताते हैं .&amp;nbsp;
क्या सच में लाल मिर्च फायदेमंद है?
हाल ही में जर्नल ऑफ द एसोसिएशन ऑफ फिजिशियंस ऑफ इंडिया में प्रकाशित एक रिव्यू में 1,800 से अधिक मरीजों पर किए गए 22 क्लीनिकल अध्ययनों का एनालिसिस किया गया. इसमें पाया गया कि लाल मिर्च से प्राप्त होने वाला कैप्साइसिननसों से जुड़े दर्द, खासकर डायबिटिक पेरिफेरल न्यूरोपैथी और पोस्टहर्पेटिक न्यूराल्जिया में राहत पहुंचा सकता है.&amp;nbsp;
इस रिव्यू का नेतृत्व चेन्नई स्थित डॉ. मोहन डायबिटीज स्पेशियलिटी सेंटर के चेयरमैन और डायबिटीज एक्सपर्ट डॉ. वी. मोहन, मुंबई के शिल्पा मेडिकल रिसर्च सेंटर के डायबिटोलॉजिस्ट डॉ. मंगेश तिवास्कर, लीलावती अस्पताल के ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. अभय नेने और चिकित्सा मामलों की एक्सपर्ट डॉ. सोनाली गोखले समेत अन्य एक्सपर्ट ने किया.
कितना असरदार है लाल मिर्च?
एक्सपर्ट के अनुसार, 0.075 प्रतिशत कैप्साइसिन क्रीम सबसे प्रभावी पाई गई. यह एक ऐसी टॉपिकल क्रीम है जिसे त्वचा पर लगाया जाता है. इसमें लाल मिर्च के सक्रिय तत्व की नियंत्रित मात्रा मौजूद होती है, जो दर्द पैदा करने वाली नसों पर काम करती है. डॉ. वी मोहन का कहना है कि कैप्साइसिन को केवल दर्द निवारक बाम का हिस्सा समझना सही नहीं होगा. उनके मुताबिक यह नसों में दर्द के संकेत पहुंचाने वाले तंतुओं पर सीधे असर करता है. यही वजह है कि यह सामान्य दर्द निवारक उपायों से अलग माना जाता है. उन्होंने यह भी बताया कि कम मात्रा वाले उत्पादों की तुलना में 0.075 प्रतिशत कैप्साइसिन फॉर्मूलेशन अधिक असरदार साबित हो सकता है.&amp;nbsp;
किन दिक्कतों में यह असरदार?
डॉ. मंगेश तिवास्कर के अनुसार, फिलहाल सबसे मजबूत साइंटफिक प्रमाण डायबिटिक पेरिफेरल न्यूरोपैथी और पोस्टहर्पेटिक न्यूराल्जिया के लिए उपलब्ध हैं. हालांकि नसों से जुड़ा दर्द विटामिन बी की कमी, थायरॉइड की समस्या, अत्यधिक शराब के सेवन, कीमोथेरेपी या अन्य न्यूरोलॉजिकल बीमारियों के कारण भी हो सकता है. ऐसे मामलों में भी स्थानीय स्तर पर राहत मिलने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. एक्सपर्ट बताते हैं कि न्यूरोपैथिक पेन को अक्सर सामान्य दर्द समझ लिया जाता है, जिससे सही उपचार नहीं मिल पाता. कई लोग साधारण दर्द निवारक दवाओं या बाम का उपयोग करते हैं, जबकि वे नसों से जुड़े दर्द की मूल वजह पर असर नहीं डालते.
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किस बात का हमें रखना चाहिए ध्यान?
डॉ. सोनाली गोखले के अनुसार, यह रिव्यू बताती है कि 0.075 प्रतिशत कैप्साइसिन क्रीम को ऐसे मरीजों के लिए बेहतर विकल्प माना जा सकता है, जिन्हें लंबे समय तक दवाएं लेने में परेशानी होती है या जो स्थानीय स्तर पर उपचार चाहते हैं. हालांकि एक्सपर्ट यह भी सलाह देते हैं कि किसी भी प्रकार के नर्व पेन में खुद से इलाज शुरू करने के बजाय पहले डॉक्टर से सही जांच और सलाह जरूर लेनी चाहिए.
इसे भी पढ़ें-&amp;nbsp;जंग लगे चाकू से खाना बनाकर आपकी सेहत से खिलवाड़ कर रहे रेस्तरां, FSSAI ने जारी की एडवायजरी
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <title>एक साथ कितने हार्ट अटैक झेल सकता है हमारा दिल, कब मुश्किल हो जाता है जान बचाना?</title>
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        <description><![CDATA[ एक साथ कितने हार्ट अटैक झेल सकता है हमारा दिल, कब मुश्किल हो जाता है जान बचाना? ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 17 Jun 2026 23:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>Microplastics vs Fertility: इस वजह से आपके घर में पैदा नहीं हो रहे बच्चे, पुरुषों और महिलाओं में लगातार बढ़ रहा बांझपन</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/microplastics-vs-fertility-इस-वजह-से-आपके-घर-में-पैदा-नहीं-हो-रहे-बच्चे-पुरुषों-और-महिलाओं-में-लगातार-बढ़-रहा-बांझपन</link>
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        <description><![CDATA[ How Microplastics Affect Fertility: प्लास्टिक आज हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है. पीने के पानी से लेकर खाने की पैकेजिंग, घर की धूल और यहां तक कि हवा में भी प्लास्टिक के बेहद छोटे कण मौजूद हैं. इन्हें माइक्रोप्लास्टिक कहा जाता है. पहले इन्हें केवल पर्यावरण की समस्या माना जाता था, लेकिन अब साइंटिस्ट की चिंता इस बात को लेकर बढ़ रही है कि ये कण इंसानी शरीर के अंदर भी पहुंच चुके हैं और स्वास्थ्य पर असर डाल सकते हैं.&amp;nbsp;
मनुष्य तक बढ़ी इनकी पहुंच
माइक्रोप्लास्टिक ऐसे छोटे प्लास्टिक कण होते हैं जिनका आकार पांच मिलीमीटर से भी कम होता है. &amp;nbsp;समय के साथ बड़े प्लास्टिक उत्पाद टूटकर इन सूक्ष्म कणों में बदल जाते हैं. हाल के वर्षों में वैज्ञानिकों ने इन्हें ह्यूमन ब्लड, फेफड़ों, प्लेसेंटा, स्पर्म और यहां तक कि महिलाओं के ओवरी में मौजूद फॉलिक्युलर फ्लूइड में भी पाया है. यही वजह है कि अब इनके फर्टिलिटी पर प्रभाव को लेकर रिसर्च तेज हो गए हैं.&amp;nbsp;
क्या यह बांझपन का कारण बन सकता है?
साल 2024 में यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू मैक्सिको के रिसर्चर की तरफ से पब्लिश एक स्टडी में मानव टेस्टिकुलर टिश्यू में माइक्रोप्लास्टिक कण पाए गए. वहीं कुछ अन्य स्टजी में महिलाओं के फॉलिक्युलर फ्लूइड में भी इनकी मौजूदगी दर्ज की गई है. हालांकि साइंटिस्ट अभी सीधे तौर पर यह नहीं कह रहे कि माइक्रोप्लास्टिक ही बांझपन का कारण है, लेकिन इसके संभावित प्रभावों को लेकर चिंता जरूर बढ़ी है.&amp;nbsp;
इंसानों को क्या हो रही है दिक्कत?
कोलकाता स्थित नोवा आईवीएफ की फर्टिलिटी विशेषज्ञ डॉ. अनिंदिता सिंह के अनुसार, रिसर्च बताते हैं कि माइक्रोप्लास्टिक शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ा सकते हैं. इस स्थिति में शरीर में रिएक्टिव ऑक्सीजन स्पीशीजनामक हानिकारक अणु तेजी से बढ़ने लगते हैं, जो सेल्स को नुकसान पहुंचा सकते हैं. डॉ. अनिंदिता सिंह बताती हैं कि माइक्रोप्लास्टिक माइटोकॉन्ड्रिया की कार्यप्रणाली को प्रभावित कर सकते हैं और एस्ट्रोजन व टेस्टोस्टेरोन जैसे हार्मोन के संतुलन में भी हस्तक्षेप कर सकते हैं.
एक्सपर्ट का मानना है कि लंबे समय तक माइक्रोप्लास्टिक के संपर्क में रहने से पुरुषों में स्पर्म की गतिशीलता कम हो सकती है, डीएनए को नुकसान पहुंच सकता है और फर्टिलिटी प्रभावित हो सकती है. वहीं महिलाओं में ओवरी की क्षमता, अंडों की गुणवत्ता और फर्टिलाइजेशन की प्रक्रिया पर नकारात्मक असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है.
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फर्टिलिटी के अलावा बाकी क्या दिक्कत?
फर्टिलिटी के अलावा माइक्रोप्लास्टिक को इम्यून सिस्टम, हार्ट स्वास्थ्य, मेटाबॉलिज्म और एंडोक्राइन सिस्टम के लिए भी संभावित खतरा माना जा रहा है. हालांकि साइंटिस्ट अभी इस विषय पर और रिसर्च कर रहे हैं, लेकिनएक्सपर्ट एहतियात बरतने की सलाह दे रहे हैं. डॉ. अनिंदिता सिंह के मुताबिक, प्लास्टिक की बोतलों की जगह कांच या स्टील का इस्तेमाल करना, प्लास्टिक कंटेनर में खाना गर्म करने से बचना, कम पैकेज्ड खाद्य पदार्थों का सेवन करना, फिल्टर किया हुआ पानी पीना और फल, सब्जियां व साबुत अनाज से भरपूर एंटी-इन्फ्लेमेटरी डाइट अपनाना माइक्रोप्लास्टिक के संपर्क को कम करने में मदद कर सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 16 Jun 2026 14:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Signs Of Hearing Loss: बहरा होने से पहले कानों में दिखते हैं ये कई शुरुआती लक्षण, डॉक्टरों ने दी बड़ी चेतावनी</title>
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        <description><![CDATA[ Early Signs Of Hearing Loss You Should Not Ignore: अक्सर लोग मानते हैं कि सुनने की क्षमता कम होने का मतलब है कि व्यक्ति अचानक आवाजें सुनना बंद कर दे. लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल अलग है. ज्यादातर मामलों में सुनने की समस्या धीरे-धीरे शुरू होती है और शुरुआती संकेत इतने सामान्य लगते हैं कि लोग उन्हें उम्र, थकान या आसपास के शोर का असर समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. यही वजह है कि कई लोगों को तब तक अपनी समस्या का एहसास नहीं होता, जब तक बातचीत करना मुश्किल न होने लगे.&amp;nbsp;
क्यों जरूरी है इसको शुरू से पहचानना?
यूएस नेशनल इंस्टीट्यूट ऑन डेफनेस एंड अदर कम्युनिकेशन डिसऑर्डर्स के अनुसार, उम्र बढ़ने के साथ होने वाली सुनने की क्षमता में कमी धीरे-धीरे विकसित होती है और दुनिया भर में लाखों लोगों को प्रभावित करती है. फोर्टिस हॉस्पिटल, मुलुंड, मुंबई में सीनियर कंसल्टेंट ईएनटी डॉ. संजय भाटिया का कहना है कि अगर शुरुआती संकेतों को समय रहते पहचान लिया जाए तो लंबे समय तक सुनने की क्षमता और लाइफ की क्वालिटी को बेहतर बनाए रखा जा सकता है.
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क्या होते हैं इसके लक्षण?
सुनने की समस्या का पहला संकेत हमेशा आवाज का कम सुनाई देना नहीं होता. कई बार लोग सुन तो लेते हैं कि कोई बात कर रहा है, लेकिन शब्द साफ समझ नहीं आते. खासकर भीड़भाड़ वाली जगहों, पारिवारिक समारोहों या रेस्तरां जैसे माहौल में बातचीत समझना मुश्किल हो जाता है. डॉ. संजय भाटिया के अनुसार, यह शुरुआती सुनने की समस्या का एक सामान्य संकेत हो सकता है.
अपनी ही बात दोहरानी पड़े, तो दिक्कत
यदि आपको बार-बार लोगों से अपनी बात दोहराने के लिए कहना पड़ता है, तो यह भी चेतावनी का संकेत हो सकता है. शुरुआत में यह सामान्य लग सकता है, लेकिन जब यह आदत रोजमर्रा की बातचीत का हिस्सा बन जाए तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. कई बार परिवार के सदस्य या दोस्त सबसे पहले इस बदलाव को नोटिस करते हैं.
लगातार आवाज बढ़ाना भी संकेत
एक और आम संकेत है टीवी, मोबाइल या रेडियो की आवाज लगातार बढ़ाना. अक्सर घर के दूसरे लोगों को आवाज बहुत तेज लगती है, जबकि सुनने में परेशानी महसूस कर रहा व्यक्ति उसे सामान्य मानता है. यह बदलाव धीरे-धीरे होता है, इसलिए कई लोग इसे गंभीरता से नहीं लेते.
फोन पर बातचीत में दिक्कत महसूस होना?
फोन पर बातचीत करने में कठिनाई भी सुनने की क्षमता कम होने का संकेत हो सकती है. &amp;nbsp;आमने-सामने की बातचीत में चेहरे के हावभाव और होंठों की गतिविधि समझने में मदद करती है, लेकिन फोन पर केवल आवाज के आधार पर बात समझनी होती है. ऐसे में सुनने में हल्की कमी भी साफ नजर आने लगती है.
घंटी बजने, भिनभिनाहट या सीटी जैसी आवाज
इसके अलावा कानों में लगातार घंटी बजने, भिनभिनाहट या सीटी जैसी आवाज सुनाई देना भी चिंता का विषय हो सकता है. इस स्थिति को टिनिटस कहा जाता है, जो कई बार किसी इम्प्लिसिट लिसनिंग &amp;nbsp;समस्या का संकेत होता है. डॉ. संजय भाटिया चेतावनी देते हैं कि सुनने की समस्या को नजरअंदाज करना केवल कानों तक सीमित नहीं रहता. समय के साथ यह सामाजिक दूरी, निराशा, तनाव और अवसाद का कारण भी बन सकता है. इसलिए यदि ये लक्षण लगातार दिखाई दें तो एक्सपर्ट से सलाह लेना जरूरी है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 16 Jun 2026 14:30:06 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Diabetes Shoulder: कंधे के दर्द से लेकर जकड़न तक, ये लक्षण न करें इग्नोर, डॉक्टर ने डायबिटीज को लेकर दी चेतावनी</title>
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        <description><![CDATA[ Why Diabetes Increases The Risk Of Frozen Shoulder: अगर आपको डायबिटीज है और पिछले कुछ समय से कंधे में दर्द, जकड़न या हाथ घुमाने में परेशानी महसूस हो रही है, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. डायबिटीज से जुड़ी एक ऐसी समस्या भी है जिसके बारे में कम लोग जानते हैं, लेकिन यह काफी आम है. इसे आम बोलचाल में डायबिटीज शोल्डर कहा जाता है, जबकि मेडिकल टर्म में इसे फ्रोजन शोल्डर कहा जाता है. यह स्थिति धीरे-धीरे कंधे की गतिविधियों को सीमित कर सकती है और रोजमर्रा के कामों को मुश्किल बना सकती है.
इस संबंध में जर्नल ऑफ डायबिटीज इन्वेस्टिगेशन में पब्लिश एक स्टडी में पाया गया कि डायबिटीज से पीड़ित लोगों में कंधे संबंधी समस्याओं की दर लगभग 27.5 प्रतिशत थी, जबकि सामान्य मरीजों में यह आंकड़ा केवल 5 प्रतिशत के आसपास देखा गया. यह अंतर बताता है कि डायबिटीज और फ्रोजन शोल्डर के बीच गहरा संबंध है.
क्या है फ्रोजन शोल्डर?
फ्रोजन शोल्डर एक ऐसी स्थिति है जिसमें कंधे के जोड़ के आसपास मौजूद कनेक्टिव टिश्यू मोटे और कड़े हो जाते हैं. इसके कारण कंधे को हिलाना-डुलाना मुश्किल होने लगता है. शुरुआत में दर्द महसूस होता है और समय के साथ कंधे की मूवमेंट काफी सीमित हो सकती है.
डायबिटीज में क्यों बढ़ जाता है इसका खतरा?
एक्सपर्ट के अनुसार लंबे समय तक ब्लड शुगर का स्तर अधिक रहने से शरीर के टिश्यू में बदलाव आने लगते हैं. अतिरिक्त ग्लूकोज कोलेजन नामक प्रोटीन को प्रभावित कर सकता है, जिससे टिश्यू अपनी लचक खोने लगते हैं. यही प्रक्रिया कंधे के जोड़ को भी प्रभावित कर सकती है. इसके अलावा लगातार रहने वाली सूजन और टिश्यू तक कम ब्लड फ्लो भी इस समस्या को बढ़ाने में भूमिका निभा सकते हैं.
फ्रोजन शोल्डर के तीन चरण
यह समस्या आमतौर पर तीन चरणों में विकसित होती है. पहला चरण फ्रीजिंग स्टेज कहलाता है, जिसमें दर्द धीरे-धीरे बढ़ता है और कंधे की मूवमेंट कम होने लगती है. इसके बाद फ्रोजन स्टेज आता है, जहां दर्द कुछ हद तक कम हो सकता है, लेकिन जकड़न बनी रहती है. अंतिम चरण थॉइंग स्टेज होता है, जिसमें धीरे-धीरे कंधे की गतिशीलता वापस आने लगती है. पूरी प्रक्रिया कई महीनों से लेकर दो साल तक चल सकती है.
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कैसे होती है पहचान?
डॉक्टर आमतौर पर मरीज की मेडिकल हिस्ट्री, खासकर डायबिटीज की जानकारी, शारीरिक जांच और जरूरत पड़ने पर एक्स-रे या एमआरआई जैसे इमेजिंग टेस्ट की मदद से इस समस्या का निदान करते हैं. समय पर पहचान होने से स्थिति को बिगड़ने से रोका जा सकता है.
क्या है इसका इलाज?
फ्रोजन शोल्डर के इलाज का मुख्य उद्देश्य दर्द कम करना और कंधे की सामान्य गतिविधि को वापस लाना होता है. इसके लिए दर्द और सूजन कम करने वाली दवाएं दी जा सकती हैं. फिजियोथेरेपी और नियमित स्ट्रेचिंग एक्सरसाइज रिकवरी में सबसे अहम भूमिका निभाती हैं. इसके साथ ही ब्लड शुगर को नियंत्रित रखना भी बेहद जरूरी है. गंभीर मामलों में डॉक्टर इंजेक्शन या अन्य चिकित्सा प्रक्रियाओं की सलाह दे सकते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 16 Jun 2026 02:30:11 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Alcohol In Plastic Bottles: क्या आप भी प्लास्टिक की बोतल में रखकर पीते हैं शराब, जानें यह सेहत के लिए कितना खराब?</title>
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        <description><![CDATA[ Health Risks Of Drinking Alcohol Stored In Plastic Bottles: कई लोग शराब खरीदने के बाद उसे छोटी बोतल में भरकर रखने के लिए प्लास्टिक की बोतलों का इस्तेमाल करते हैं. यात्रा के दौरान या सुविधा के लिए भी शराब को प्लास्टिक कंटेनर में ट्रांसफर कर दिया जाता है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यह आदत आपकी सेहत और शराब की गुणवत्ता दोनों पर असर डाल सकती है? एक्सपर्ट का मानना है कि अगर शराब को लंबे समय तक प्लास्टिक की बोतल में रखा जाए तो इससे कुछ समस्याएं पैदा हो सकती हैं. हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि प्लास्टिक की बोतल तुरंत खराब हो जाएगी या शराब उसमें छेद कर देगी, लेकिन लंबे समय तक स्टोर करने पर इसके कुछ निगेटिव प्रभाव देखने को मिल सकते हैं.
क्यों चिंता की बात मानी जाती है?
शराब में मौजूद अल्कोहल एक तरह का सॉल्वेंट होता है, यानी यह कुछ पदार्थों के साथ केमिकल प्रतिक्रिया कर सकता है. यही वजह है कि एक्सपर्ट आमतौर पर सलाह देते हैं कि शराब को लंबे समय तक प्लास्टिक की बोतलों में स्टोर करने से बचना चाहिए. खासकर अगर आप उसे कई महीनों या सालभर तक रखने की योजना बना रहे हैंय प्लास्टिक कोई एक सामग्री नहीं है। बाजार में कई तरह के प्लास्टिक इस्तेमाल किए जाते हैं और कुछ प्लास्टिक अल्कोहल को दूसरों की तुलना में बेहतर तरीके से संभाल सकते हैं. फिर भी अधिकांश एक्सपर्ट मानते हैं कि लंबे समय के लिए कांच की बोतल सबसे सुरक्षित विकल्प होती है.
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स्वाद पर भी पड़ सकता है असर
व्हिस्की और अन्य प्रीमियम शराब पसंद करने वाले लोगों की सबसे बड़ी चिंता स्वाद को लेकर होती है. माना जाता है कि लंबे समय तक प्लास्टिक में रखने से शराब के मूल स्वाद और खुशबू में बदलाव आ सकता है. यही कारण है कि महंगी और उच्च क्वालिटी वाली शराब लगभग हमेशा कांच की बोतलों में ही बेची जाती है. कांच का कंटेनर शराब के स्वाद को लंबे समय तक सुरक्षित रखने में मदद करता है, जबकि प्लास्टिक में स्टोर की गई शराब धीरे-धीरे अपना असली फ्लेवर खो सकती है. यदि कोई व्यक्ति शराब के स्वाद और गुणवत्ता को महत्व देता है, तो उसे प्लास्टिक की बजाय कांच की बोतल का उपयोग करना चाहिए.
क्या सेहत पर भी असर पड़ सकता है?
एक चिंता यह भी रहती है कि प्लास्टिक से कुछ रसायन शराब में मिल सकते हैं. हालांकि इस विषय पर अभी सीमित शोध उपलब्ध हैं, लेकिन एक्सपर्ट मानते हैं कि लंबे समय तक प्लास्टिक में रखे पेय पदार्थों में रासायनिक लीचिंग का जोखिम बढ़ सकता है. चाइना पैकेजिंग रिसर्च एंड टेस्ट सेंटर की रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्लास्टिक से निकलने वाले कुछ रसायन शरीर में पहुंचकर चक्कर आना, सिरदर्द, पेट में असहजता और अन्य शारीरिक समस्याओं का कारण बन सकते हैं. हालांकि इसका असर हर व्यक्ति में अलग-अलग हो सकता है, लेकिन लंबे समय तक ऐसी शराब का सेवन करने से स्वास्थ्य संबंधी जोखिम बढ़ सकते हैं. यही वजह है कि शराब उद्योग में प्रीमियम उत्पादों को लगभग हमेशा कांच की बोतलों में पैक किया जाता है. कांच केमिकल रूप से काफी स्थिर होता है और शराब के साथ प्रतिक्रिया नहीं करता.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 15 Jun 2026 09:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>LDL&amp;C vs ApoB: कोलेस्ट्रॉल नॉर्मल होने के बाद भी हार्ट अटैक का खतरा, जानिए LDL&amp;C और ApoB का फर्क?</title>
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        <pubDate>Sun, 14 Jun 2026 21:30:17 +0530</pubDate>
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        <title>Sudden hearing loss Causes : अचानक एक कान से सुनाई देना पड़ गया बंद, तुरंत कराएं इलाज नहीं तो हो जाएगा परमानेंट बहरापन</title>
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        <description><![CDATA[ Sudden hearing loss Causes : हम अक्सर कान में हल्का भारीपन या कम सुनाई देने जैसी समस्याओं को मामूली समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. कई लोग सोचते हैं कि कान में मैल जम गया होगा या सर्दी-जुकाम की वजह से ऐसा हो रहा होगा और कुछ दिनों में अपने आप ठीक हो जाएगा, लेकिन अगर अचानक एक कान से सुनाई देना कम हो जाए या पूरी तरह बंद हो जाए, तो इसे बिल्कुल भी हल्के में नहीं लेना चाहिए.
विशेषज्ञों के अनुसार, कई बार यह समस्या नॉर्मल कारणों से होती है, लेकिन कुछ मामलों में यह एसएसएचएल (Sudden Sensorineural Hearing Loss) का संकेत हो सकती है. यह एक मेडिकल इमरजेंसी मानी जाती है. अगर इसका इलाज समय रहते शुरू न किया जाए, तो सुनने की क्षमता हमेशा के लिए प्रभावित हो सकती है. लेकिन समय पर पहचान और सही इलाज से कई मरीजों की सुनने की क्षमता दोबारा वापस आ सकती है. इसलिए जरूरी है कि इसके कारणों, लक्षणों और इलाज के बारे में सही जानकारी हो.&amp;nbsp;
अचानक एक कान से कम सुनाई देने के क्या हो सकते हैं कारण?
1. कान में मैल जम जाना - कई बार कान में जरूरत से ज्यादा वैक्स जमा हो जाता है, जिससे आवाजा का रास्ता बंद हो जाता है और सुनने में परेशानी होने लगती है. इसके लक्षण कान में भारीपन महसूस होना, खुजली होना,आवाज का दबा-दबा सुनाई देना हो सकते हैं.ऐसी स्थिति में डॉक्टर ड्रॉप्स या सुरक्षित तरीके से मैल निकाल देते हैं और सुनने की क्षमता सामान्य हो सकती है.&amp;nbsp;
2. कान में संक्रमण या तरल पदार्थ जमा होना - सर्दी, फ्लू, एलर्जी या गले के संक्रमण के बाद कान के पर्दे के पीछे तरल पदार्थ जमा हो सकता है. इससे आवाज का कंपन ठीक तरह से अंदर नहीं पहुंच पाता है. इसके लक्षण कान में दर्द, बुखार, कान बंद होने जैसा एहसास, सुनाई कम देना है. वायरल संक्रमण अक्सर कुछ दिनों में ठीक हो जाते हैं, जबकि बैक्टीरियल संक्रमण में एंटीबायोटिक की जरूरत पड़ सकती है.&amp;nbsp;
3. &amp;nbsp;यूस्टेशियन ट्यूब में रुकावट - यह ट्यूब कान के अंदर और गले के बीच दबाव को संतुलित करने का काम करती है. एलर्जी, साइनस या जुकाम की वजह से इसमें सूजन आ सकती है.&amp;nbsp;
4. बैरोट्रॉमा यानी दबाव की वजह से चोट - हवाई यात्रा, पहाड़ों की यात्रा या स्कूबा डाइविंग के दौरान वातावरण का दबाव तेजी से बदलता है. इससे कान में पॉप जैसी आवाज आ सकती है और सुनाई देना प्रभावित हो सकता है. इस स्थिति में अक्सर बार-बार निगलना, जम्हाई लेना, च्युइंग गम चबाना मददगार हो सकता है,&amp;nbsp;
5. तेज आवाज का असर - लंबे समय तक तेज संगीत, मशीनों या पटाखों जैसी तेज आवाजों के संपर्क में रहने से कान के अंदर मौजूद सेंसिटिव सेल्स पर असर पड़ सकता है.&amp;nbsp;
6. एसएसएचएल &amp;nbsp;- यह सबसे खतरनाक स्थिति है, जिसमें कुछ घंटों या अधिकतम तीन दिनों के अंदर अचानक सुनने की क्षमता कम हो जाती है. कई बार मरीज सुबह उठता है और उसे एक कान से आवाज बहुत कम सुनाई देती है. इसके साथ कान में बजने की आवाज, चक्कर आना, संतुलन बिगड़ना, कान में पॉप या क्लिक महसूस होना, बिना दर्द के सुनाई देना कम हो जाना जैसे लक्षण भी हो सकते हैं. डॉक्टरों के अनुसार, यह मेडिकल इमरजेंसी है और इसका इलाज 72 घंटे के अंदर शुरू हो जाना चाहिए.&amp;nbsp;
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कैसे होता है इसका इलाज?
1. अगर कान में वैक्स जमा होने की वजह से सुनाई कम दे रहा है, तो डॉक्टर वैक्स को नरम करने वाली ड्रॉप्स देते हैं. इसके बाद सुरक्षित तरीके से सफाई या माइक्रोसक्शन तकनीक से मैल निकालकर सुनने की क्षमता होती है.&amp;nbsp;
2. कान में संक्रमण होने पर दर्द और बुखार कम करने की दवाएं दी जाती हैं. अगर संक्रमण बैक्टीरिया की वजह से हो या लंबे समय तक बना रहे, तो एंटीबायोटिक और डॉक्टर की निगरानी जरूरी होती है.&amp;nbsp;
3. सर्दी, एलर्जी या साइनस के कारण कान का दबाव बिगड़ने पर नाक के स्टेरॉयड स्प्रे और डिकंजेस्टेंट दवाएं दी जा सकती हैं. वाल्साल्वा तकनीक की मदद से कान के अंदर का दबाव संतुलित करने की कोशिश की जाती है.&amp;nbsp;
4, तेज आवाज के कारण सुनाई देने में दिक्कत होने पर कुछ दिनों तक शोर से दूर रहने और आराम की सलाह दी जाती है. नुकसान से बचने के लिए ईयरप्लग का इस्तेमाल और टिनिटस होने पर साउंड थेरेपी मददगार हो सकती है.&amp;nbsp;
5. एसएसएचएल में डॉक्टर तुरंत स्टेरॉयड थेरेपी शुरू कर सकते हैं. स्टेरॉयड गोलियों या कान के अंदर इंजेक्शन के रूप में दिए जाते हैं जिससे सुनने की क्षमता वापस आने की संभावना बढ़ सके.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 14 Jun 2026 21:30:16 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Heat Rash And Prickly Heat Home Remedies: चुभती&amp;जलती गर्मी में शुरू हो गया घमौरियों मौसम, ऐसे करें अपनी देखभाल</title>
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        <description><![CDATA[ Heat Rash And Prickly Heat Home Remedies : गर्मी के मौसम में तापमान बढ़ते ही पसीना, चिपचिपाहट और स्किन से जुड़ी समस्याएं लोगों को परेशान करने लगती हैं. इन्हीं समस्याओं में से एक घमौरियां है, जिन्हें मेडिकल भाषा में हीट रैश या मिलिरिया कहा जाता है. यह समस्या बच्चों से लेकर बड़ों तक किसी को भी हो सकती है, लेकिन छोटे बच्चों और सेंसिटिव स्किन वाले लोगों में इसका खतरा ज्यादा होता है. इससे स्किन में सूजन आने लगती है और लाल दाने, जलन, चुभन साथ ही तेज खुजली जैसी समस्याएं शुरू हो जाती हैं.&amp;nbsp;
अक्सर लोग घमौरियों से राहत पाने के लिए प्रिकली हीट पाउडर का इस्तेमाल करने लगते हैं, लेकिन कई मामलों में यह पाउडर पोर्स को और ज्यादा बंद कर सकता है, जिससे परेशानी बढ़ सकती है. विशेषज्ञों का मानना है कि घमौरियों को ठीक करने का सबसे अच्छा तरीका स्किन को ठंडा और सूखा रखना है. इसके अलावा कुछ आसान घरेलू उपाय भी राहत दिलाने में मदद कर सकते हैं. तो आइए जानते हैं कि चुभती-जलती गर्मी में घमौरियां होने पर अपनी देखभाल कैसे करें.&amp;nbsp;
कब होती हैं घमौरियां?
घमौरियां तब होती हैं जब शरीर का पसीना स्किन के नीचे फंस जाता है. पसीने को बाहर निकालने वाली छोटी-छोटी नलिकाएं बंद हो जाती हैं और पसीना स्किन के अंदर जमा होने लगता है. इससे लाल दाने निकल आते हैं और प्रभावित हिस्से में खुजली साथ ही जलन महसूस होती है. यह समस्या खासतौर पर गर्म और नमी वाले मौसम में ज्यादा देखने को मिलती है. गर्दन, छाती, पीठ, जांघों और स्किन की सिलवटों वाले हिस्सों में घमौरियां अधिक होती हैं.&amp;nbsp;
घमौरियों के क्या लक्षण होते हैं?
घमौरियों के लक्षण शुरुआत में मामूली लग सकते हैं, लेकिन समय के साथ ये काफी परेशान करने वाले हो जाते हैं. इसमें स्किन पर छोटे-छोटे लाल दाने निकल आते हैं, जिनमें तेज खुजली, जलन और चुभन महसूस हो सकती है. साथ ही प्रभावित हिस्से की स्किन में हल्की सूजन भी दिखाई दे सकती है और पसीना आने पर ये परेशानी और बढ़ जाती है. खासकर गर्मी और उमस वाले माहौल में दाने ज्यादा चुभने लगते हैं. बच्चों में घमौरियों की वजह से बेचैनी बढ़ सकती है और बार-बार उस जगह को खुजलाने लगते हैं, जिससे स्किन में संक्रमण का खतरा भी बढ़ सकता है.&amp;nbsp;
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चुभती-जलती गर्मी में घमौरियां होने पर अपनी देखभाल कैसे करें?
1. कोल्ड कंप्रेस - अगर घमौरियों वाली जगह पर ठंडी सिकाई की जाए तो जलन और सूजन में जल्दी आराम मिल सकता है. इसके लिए बर्फ को सीधे स्किन पर लगाने के बजाय किसी साफ कपड़े में लपेटकर इस्तेमाल करें. ठंडे पानी में कपड़ा भिगोकर भी सिकाई की जा सकती है.&amp;nbsp;
2. ठंडे पानी से नहाने की आदत डालें - दिन में एक या दो बार ठंडे पानी से नहाने से स्किन का तापमान कम होता है. इससे खुजली और जलन में राहत मिलती है. साथ ही स्किन पर जमा पसीना और गंदगी साफ होकर पोर्स खुलने में मदद मिलती है.&amp;nbsp;
3. कैलामाइन लोशन और एलोवेरा जेल का करें इस्तेमाल - कैलामाइन लोशन स्किन को ठंडक पहुंचा कर खुजली कम करने में मदद करता है. वहीं एलोवेरा जेल में एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं, जो लालिमा और सूजन को शांत कर सकते हैं. ताजा एलोवेरा जेल प्रभावित हिस्से पर लगाकर कुछ देर बाद धो लें.&amp;nbsp;
4. ओटमील और बेकिंग सोडा भी हैं फायदेमंद - ओटमील में एंटीऑक्सीडेंट और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण पाए जाते हैं, जो स्किन को आराम पहुंचाने में मदद कर सकते हैं. ओट्स को पीसकर पेस्ट बनाकर लगाया जा सकता है. इसके अलावा पानी में बेकिंग सोडा मिलाकर तैयार पेस्ट भी खुजली और जलन कम करने में मदद कर सकता है.&amp;nbsp;
5. सूती कपड़े पहनें और शरीर को ठंडा रखें - घमौरियों से बचाव के लिए ढीले और सूती कपड़े पहनना सबसे अच्छा माना जाता है. सिंथेटिक कपड़े पसीना रोक सकते हैं और परेशानी बढ़ा सकते हैं. घर के अंदर पंखे या एसी का इस्तेमाल करें और शरीर को ज्यादा गर्म होने से बचाएं.&amp;nbsp;
इन बातों का भी रखें खास ध्यान
1. ज्यादा पानी और लिक्विड ड्रिंक्स पीकर शरीर को हाइड्रेट रखें.
2. नारियल पानी, नींबू पानी, सत्तू और लस्सी का सेवन करें.
3. बच्चों के डायपर समय-समय पर बदलते रहें.
4. हैवी मॉइस्चराइजर और ऐसे प्रोडक्ट्स से बचें जो पोर्स बंद कर सकते हैं.
5. अगर घमौरियां कई दिनों तक ठीक न हों, पस बनने लगे या बुखार के साथ दिखाई दें तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लें.
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        <pubDate>Sun, 14 Jun 2026 21:30:14 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Brain Tumor: मोबाइल फोन से लेकर सिरदर्द का असली सच, कैसे फैलता है ब्रेन ट्यूमर? डॉक्टरों ने खोला बड़ा राज</title>
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        <description><![CDATA[ Common Brain Tumour Myths And Facts: ब्रेन ट्यूमर का नाम सुनते ही ज्यादातर लोगों के मन में डर बैठ जाता है. फिल्मों, सोशल मीडिया और अधूरी जानकारियों की वजह से इसके बारे में कई ऐसी धारणाएं बन गई हैं जो पूरी तरह सही नहीं हैं. हकीकत यह है कि ब्रेन ट्यूमर एक मुश्किल बीमारी है और इसके बारे में फैली गलतफहमियां कई बार मरीजों और उनके परिवारों को जरूरत से ज्यादा डराने का काम करती हैं. यही कारण है कि विशेषज्ञ समय-समय पर इन मिथकों को दूर करने की सलाह देते हैं. एस्टर इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोसाइंसेज एंड स्पाइन केयर के ग्रुप डायरेक्टर प्रोफेसर डॉ. सतीश रुद्रप्पा के अनुसार, कई बार बीमारी से ज्यादा नुकसान उसके बारे में फैली गलत जानकारी पहुंचाती है.&amp;nbsp;
क्या ब्रेन ट्यूमर कैंसर होता है?
सबसे बड़ी गलतफहमी यह है कि हर ब्रेन ट्यूमर कैंसर होता है. डॉ. सतीश रुद्रप्पा बताते हैं कि सभी ब्रेन ट्यूमर कैंसरयुक्त नहीं होते. कई ट्यूमर ऐसे होते हैं, जो शरीर के दूसरे हिस्सों में नहीं फैलते. हालांकि, ब्रेन के भीतर जगह सीमित होने के कारण ऐसे ट्यूमर भी दबाव बनाकर बोलने, चलने, याददाश्त, देखने या संतुलन जैसी महत्वपूर्ण क्षमताओं को प्रभावित कर सकते हैं. इसलिए किसी ट्यूमर की गंभीरता केवल उसके कैंसर होने या न होने से तय नहीं होती, बल्कि उसकी स्थिति, आकार और बढ़ने की गति भी महत्वपूर्ण होती है.&amp;nbsp;
क्या सिरदर्द ब्रेन ट्यूमर का लक्षण है?
एक और आम धारणा है कि ब्रेन ट्यूमर का पहला लक्षण हमेशा सिरदर्द होता है. लेकिन एक्सपर्ट का कहना है कि ऐसा जरूरी नहीं है. डॉ. रुद्रप्पा के मुताबिक, हर मरीज में लक्षण अलग-अलग हो सकते हैं. कुछ लोगों में दौरे पड़ना, नजर कमजोर होना, बोलने में परेशानी, हाथ-पैरों में कमजोरी, संतुलन बिगड़ना या व्यवहार में बदलाव जैसे संकेत सिरदर्द से पहले भी दिखाई दे सकते हैं. यही वजह है कि लगातार बने रहने वाले न्यूरोलॉजिकल लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.
किन लोगों को होता है ब्रेन ट्यूमर?
कई लोग यह भी मानते हैं कि ब्रेन ट्यूमर सिर्फ बुजुर्गों को होता है. जबकि सच्चाई यह है कि यह किसी भी उम्र में हो सकता है. बच्चों, युवाओं और मध्यम आयु वर्ग के लोगों में भी विभिन्न प्रकार के ब्रेन ट्यूमर देखे जाते हैं. इसलिए उम्र कम होने के कारण लक्षणों को हल्के में लेना सही नहीं है.
मोबाइल फोन और ब्रेन ट्यूमर का संबंध क्या है?
मोबाइल फोन के इस्तेमाल और ब्रेन ट्यूमर के बीच संबंध को लेकर भी लंबे समय से बहस चल रही है. डॉ. सतीश रुद्रप्पा का कहना है कि दुनिया भर में कई दशकों से इस विषय पर रिसर्च किए जा रहे हैं, लेकिन अब तक ऐसा कोई ठोस साइंटफिक प्रमाण नहीं मिला है जो यह साबित करे कि सामान्य रूप से मोबाइल फोन का इस्तेमाल सीधे ब्रेन ट्यूमर का कारण बनता है. यूएस नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट भी बताती है कि बड़े स्टडी में मोबाइल फोन के नियमित उपयोग और ब्रेन ट्यूमर के जोखिम के बीच स्पष्ट संबंध नहीं पाया गया है.
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क्या ब्रेन ट्यूमर के बाद लाइफ खत्म हो जाती है?
सबसे नुकसानदायक मिथक यह है कि ब्रेन ट्यूमर का मतलब जीवन का अंत है. एक्सपर्ट का कहना है कि आधुनिक चिकित्सा ने इस क्षेत्र में बड़ी प्रगति की है. बेहतर ब्रेन इमेजिंग, अत्याधुनिक सर्जरी, सटीक रेडिएशन थेरेपी और नई दवाओं की मदद से आज कई मरीज इलाज के बाद सामान्य और संतोषजनक जीवन जी रहे हैं. इसलिए समय पर जांच, सही इलाज और एक्सपर्ट की सलाह इस बीमारी से लड़ने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 14 Jun 2026 21:30:13 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Eye Care Tips: आंखों के नीचे सूजन और डार्क सर्कल बढ़ गए हैं? जानें इसकी वजह और बचाव</title>
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        <description><![CDATA[ Eye Care Tips: गर्मियों का मौसम आते ही लोग स्किन पर टैनिंग, पिंपल्स, पसीना और डिहाइड्रेशन जैसी समस्याओं की शिकायत करने लगते हैं, साथ ही तेज गर्मी का असर आपकी आंखों के आसपास की स्किन पर भी पड़ता है. कई लोगों की आंखों के नीचे सूजन आने लगती है, डार्क सर्कल गहरे दिखाई देने लगते हैं और चेहरा हमेशा थका-थका नजर आने लगता है.&amp;nbsp;अक्सर लोग इसे सिर्फ नींद की कमी समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन एक्सपर्ट्स का कहना है कि गर्मियों में बढ़ी हुई गर्मी, डिहाइड्रेशन, तेज धूप और लाइफस्टाइल की कुछ गलत आदतें भी इसके पीछे बड़ी वजह हो सकती हैं.
विशेषज्ञों के अनुसार, अगर समय रहते सही कदम उठाए जाएं तो आंखों के नीचे की सूजन और डार्क सर्कल की समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है. तो आइए जानते हैं कि गर्मियों में ऐसा क्यों होता है और इससे बचने के लिए आपको क्या करना चाहिए.&amp;nbsp;
गर्मियों में आंखों के नीचे सूजन क्यों आ जाती है?
आंखों के आसपास की स्किन बहुत पतली होती है. गर्म मौसम में शरीर ज्यादा पसीना छोड़ता है, जिससे डिहाइड्रेशन होने लगता है. इसके अलावा तेज धूप, प्रदूषण, ज्यादा नमक वाला खाना, पूरी नींद न लेना और लंबे समय तक मोबाइल या लैपटॉप स्क्रीन के सामने बैठे रहना भी आंखों के नीचे सूजन की वजह बन सकता है. डॉक्टरों के मुताबिक, इस स्थिति को पेरिऑर्बिटल पफीनेस (Periorbital Puffiness) कहा जाता है. इसमें आंखों के आसपास के ढीले टिशूज में पानी जमा होने लगता है, जिससे सूजन दिखाई देने लगती है.&amp;nbsp;
गर्मियों में डार्क सर्कल क्यों बढ़ जाते हैं?
डार्क सर्कल कई कारणों से हो सकते हैं. कुछ लोगों में यह स्किन के नीचे मौजूद ब्लड वेसल्स के ज्यादा दिखाई देने की वजह से होते हैं, जबकि कुछ में थकान, नींद की कमी और डिहाइड्रेशन इसकी वजह बनते हैं. कई बार धूप के ज्यादा संपर्क में रहने से आंखों के नीचे पिगमेंटेशन बढ़ जाता है, जिससे काले घेरे और ज्यादा गहरे दिखाई देने लगते हैं. शरीर में पानी की कमी होने पर आंखों के नीचे की स्किन बेजान और धंसी हुई भी नजर आ सकती है.&amp;nbsp;
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इससे बचने के लिए आपको क्या करना चाहिए
1. ठंडी सिकाई से मिलेगी राहत - अगर आंखों के नीचे सूजन है, तो ठंडी सिकाई काफी फायदेमंद हो सकती है. आप खीरे के ठंडे स्लाइस, फ्रिज में रखे हुए जेल आई मास्क, ठंडे चम्मच या ठंडी की हुई टी बैग्स को 10 से 15 मिनट तक बंद आंखों पर रख सकते हैं. इससे ब्लड वेसल्स सिकुड़ती हैं और सूजन कम होने में मदद मिलती है.&amp;nbsp;
2.टी बैग्स का इस्तेमाल भी कर सकते हैं - ग्रीन टी और ब्लैक टी बैग्स में कैफीन और एंटीऑक्सीडेंट्स पाए जाते हैं, जो आंखों के आसपास की सूजन को कुछ समय के लिए कम करने में मदद कर सकते हैं. हालांकि टी बैग्स को अच्छी तरह ठंडा करने के बाद ही इस्तेमाल करें. गर्म टी बैग्स आंखों की नाजुक स्किन को नुकसान पहुंचा सकते हैं.
3. शरीर को हाइड्रेट रखें - गर्मियों में ज्यादा पसीना निकलने से शरीर में पानी की कमी हो जाती है. इसका असर सबसे पहले चेहरे और आंखों के आसपास दिख सकता है. दिनभर पूरी मात्रा में पानी पिएं और खीरा, तरबूज, संतरा जैसे पानी से भरपूर फलों को अपनी डाइट में शामिल करें. इससे स्किन की नमी बनी रहती है और आंखों के नीचे की थकान कम नजर आती है.&amp;nbsp;
4. नमक का सेवन कम करें - बहुत ज्यादा नमक खाने से शरीर में पानी रुकने लगता है, जिससे आंखों की सूजन बढ़ सकती है. प्रोसेस्ड फूड, पैकेट वाले स्नैक्स और ज्यादा नमकीन चीजों का सेवन कम करें. इससे शरीर में फ्लूइड रिटेंशन कम होगा और आंखों की सूजन में राहत मिल सकती है.&amp;nbsp;
5. भरपूर नींद लेना जरूरी है - अगर आप रोजाना पूरी नींद नहीं लेते, तो डार्क सर्कल और पफीनेस दोनों ज्यादा नजर आने लगते हैं. रोजाना 7 से 8 घंटे की अच्छी नींद लेने की कोशिश करें. इससे स्किन और ब्लड वेसल्स को रिकवर होने का समय मिलता है और चेहरा ज्यादा फ्रेश दिखाई देता है.&amp;nbsp;
6. धूप से आंखों की सुरक्षा करें - तेज धूप आंखों के नीचे पिगमेंटेशन बढ़ा सकती है और &amp;nbsp;स्किन की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को तेज कर सकती है. घर से बाहर निकलते समय UV प्रोटेक्शन वाले सनग्लासेस पहनें और चेहरे के लिए परफेक्ट सनस्क्रीन का इस्तेमाल करें. इससे आंखों के आसपास की नाजुक स्किन सुरक्षित रहती है.&amp;nbsp;
कब डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है?
ज्यादातर मामलों में आंखों के नीचे हल्की सूजन और डार्क सर्कल अस्थायी होते हैं और सही देखभाल से ठीक हो जाते हैं, लेकिन अगर सूजन लगातार बनी रहे, आंखों में लालिमा, खुजली, दर्द हो या एक आंख में अचानक ज्यादा सूजन आ जाए, तो इसे नजरअंदाज न करें. ऐसे लक्षण एलर्जी, संक्रमण, थायराइड की समस्या या किसी अन्य स्वास्थ्य समस्या का संकेत हो सकते हैं. ऐसी स्थिति में तुरंत डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ें - एक कटोरी भीगे चने खाने से कितना प्रोटीन मिलता है, जिम वालों के लिए कितनी बेस्ट ये डाइट?
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 14 Jun 2026 05:30:16 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>एक कटोरी भीगे चने खाने से कितना प्रोटीन मिलता है, जिम वालों के लिए कितनी बेस्ट ये डाइट?</title>
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        <description><![CDATA[ आमतौर पर जिन लोगों को अपनी स्ट्रेंथ बढ़ानी होती है या जो लोग जिम जा रहे होते हैं, वे अधिकतर महंगे-महंगे प्रोटीन शेक, कैप्सूल और पाउडर के भरोसे रहते हैं. मन में यही लगा रहता है कि जितना महंगा सप्लीमेंट, उतना जल्दी रिजल्ट. ऐसे में कई लोगों को यह पता नहीं होता कि प्रोटीन के लिए जिस चीज पर वे इतने पैसे खर्च कर रहे हैं, उसका एक बड़ा हिस्सा वे सिर्फ एक छोटी सी आदत अपनाकर भी हासिल कर सकते हैं.
एक्सपर्ट्स बताते हैं कि ऐसे लोगों को हर रोज एक कटोरा चना खाना चाहिए. यह कोई पुरानी दादी-नानी की बात नहीं है या फिर यूं ही नहीं कही जाती, बल्कि इसके पीछे वैज्ञानिक कारण भी मौजूद हैं. अगर आप भी अपनी ताकत बढ़ाना चाहते हैं या मसल्स बनाना चाहते हैं तो यह जानकारी आपके लिए फायदेमंद साबित हो सकती है. &amp;nbsp;आइए आपको बताते हैं कि चने से कितना प्रोटीन मिलता है और इसे खाने के क्या-क्या फायदे हैं.
यह भी पढ़ेंः Nipah Outbreak in Kerala: केरल में निपाह वायरस की दस्तक, जानें यह कैसे फैलता है और कितना खतरनाक?
एक कटोरी चने में कितना प्रोटीन होता है
एक्सपर्ट्स बताते हैं कि चना प्रोटीन का सबसे बेहतरीन स्रोत माना जाता है. साथ ही इसमें मौजूद प्रोटीन आसानी से पच भी जाता है. वहीं जो लोग वजन बढ़ाना चाहते हैं, वे चने को गुड़ के साथ भी खा सकते हैं. बता दें कि 100 ग्राम भीगे हुए चने में करीब 15 से 17 ग्राम प्रोटीन होता है. अगर आप एक अच्छी कटोरी भरकर चने खाते हैं यानी करीब 150 से 200 ग्राम तो आपको एक बार में ही 20 से 25 ग्राम तक प्रोटीन मिल जाता है.यह उतना ही प्रोटीन है जितना कई महंगे प्रोटीन शेक में होता है. कई लोग वेट गेन करने, मसल्स को बेहतर बनाने और अपनी शारीरिक ताकत बढ़ाने के लिए चना, गुड़ और दूध का सेवन करते हैं. इसका एक कारण यह भी है कि इनमें कैल्शियम अच्छी मात्रा में मौजूद होता है. लेकिन चने की खासियत सिर्फ प्रोटीन की मात्रा नहीं है, एक्सपर्ट्स कहते हैं कि चने का प्रोटीन आसानी से पच जाता है यानी शरीर इसे जल्दी और अच्छे से सोख लेता है. यही वजह है कि जिम जाने वालों के लिए यह सबसे बेस्ट और सस्ती डाइट मानी जाती है.&amp;nbsp;
इसके अलावा चने का एक और फायदा यह बताया जाता है कि यह शरीर में जमा अतिरिक्त पानी को कम करने में मदद कर सकता है, जिससे शरीर टाइट और फिट दिखता है. कैल्शियम के साथ-साथ चने में आयरन भी अच्छी मात्रा में पाया जाता है. वहीं जब चने को गुड़ के साथ खाया जाता है तो चने में मौजूद आयरन की &amp;nbsp;absorption और भी ज्यादा बढ़ जाती है, जिससे शरीर को इसका बेहतर लाभ मिलता है.&amp;nbsp;
सिर्फ जिम वाले नहीं, हर किसी के लिए फायदेमंद है चना
चने के फायदे सिर्फ जिम जाने वालों तक सीमित नहीं हैं. जिन लोगों को अस्थमा की परेशानी है उनके लिए भी भीगे चने बहुत फायदेमंद होते हैं क्योंकि यह फेफड़ों को मजबूत बनाने में मदद करते हैं. कैल्शियम और आयरन दोनों एक साथ मिलने की वजह से यह खून की कमी यानी एनीमिया में भी काम आता है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Sat, 13 Jun 2026 13:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>Walking Benefits: रोजाना 10 हजार कदम चलने का भ्रम खत्म, सिर्फ 4000 कदम चलकर भी पूरी तरह फिट रहेगा दिल</title>
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        <description><![CDATA[ Walking 4000 Steps A Day May Reduce Early Death Risk: स्वस्थ रहने के लिए रोजाना 10 हजार कदम चलने की सलाह अक्सर दी जाती है, लेकिन एक नए स्टडी ने इस धारणा पर सवाल खड़े किए हैं. रिसर्च के मुताबिक, उम्रदराज महिलाएं यदि प्रतिदिन 4,000 कदम चलती हैं, तो इससे समय से पहले मृत्यु और हार्ट रोगों का खतरा काफी हद तक कम किया जा सकता है. &amp;nbsp;खास बात यह है कि इसके लिए हर दिन लंबी वॉक करना भी जरूरी नहीं है.&amp;nbsp;
कितना चलना सही रहता है?
स्टडी में सामने आया कि यदि महिलाएं सप्ताह में केवल एक या दो दिन भी 4,000 कदम चलने का लक्ष्य हासिल कर लेती हैं, तब भी उन्हें महत्वपूर्ण स्वास्थ्य लाभ मिल सकते हैं. रिसर्चर का कहना है कि हेल्थ पर पॉजिटिव असर डालने में यह ज्यादा मायने रखता है कि कुल कितने कदम चले गए, न कि सप्ताह में कितने दिन गतिविधि की गई. यह निष्कर्ष लंबे समय से लोकप्रिय 10,000 कदम प्रतिदिन वाले मानक को चुनौती देता है. एक्सपर्ट का मानना है कि स्वास्थ्य लाभ पाने के लिए कोई एक निश्चित या सर्वश्रेष्ठ पैटर्न नहीं है. सबसे जरूरी बात शरीर को सक्रिय रखना है और लोग अपनी सुविधा के अनुसार किसी भी तरीके से शारीरिक गतिविधि कर सकते हैं.
महिलाओं के लिए क्या है खास?
स्टडी में पाया गया कि अपेक्षाकृत कम सक्रिय महिलाओं की तुलना में वे महिलाएं, जिन्होंने सप्ताह में एक या दो दिन 4,000 कदम प्रतिदिन पूरे किए, उनमें किसी भी कारण से मृत्यु का जोखिम 26 प्रतिशत कम था. वहीं हार्ट रोग से जुड़ी मौत का खतरा 27 प्रतिशत तक घटा हुआ पाया गया. रिसर्च के अनुसार, यदि यही लक्ष्य सप्ताह में तीन दिन पूरा किया जाए तो फायदे और बढ़ सकते हैं. ऐसी महिलाओं में समय से पहले मृत्यु का जोखिम 40 प्रतिशत तक कम देखा गया. इसके अलावा हृदय रोग का खतरा भी 27 प्रतिशत तक कम पाया गया.&amp;nbsp;
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हालांकि 5,000 से 7,000 कदम प्रतिदिन चलने वाली महिलाओं को भी अतिरिक्त लाभ मिला, लेकिन इसमें बढ़ोतरी अपेक्षाकृत सीमित रही. इस समूह में मृत्यु का जोखिम 32 प्रतिशत कम था, जबकि हार्ट रोग से मृत्यु के खतरे में लगभग 16 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई. रिसर्चर का कहना है कि एक स्तर के बाद लाभ की गति धीमी पड़ने लगती है.
किन लोगों को रिसर्च में किया गया था शामिल?
अमेरिका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी सहित कई संस्थानों के रिसर्चर की तरफ से किए गए इस स्टडी को ब्रिटिश जर्नल ऑफ स्पोर्ट्स मेडिसिन में प्रकाशित किया गया है. स्टडी में 13,547 महिलाओं को शामिल किया गया, जिनकी औसत आयु करीब 72 वर्ष थी. स्टडी की शुरुआत में इनमें से किसी को भी हार्ट रोग या कैंसर नहीं था. रिसर्च के दौरान प्रतिभागियों को सात दिनों तक स्टेप काउंट मापने वाले उपकरण पहनाए गए और करीब 11 वर्षों तक उनकी स्वास्थ्य स्थिति पर नजर रखी गई. इस अवधि में 1,765 महिलाओं की मृत्यु हुई, जबकि 781 महिलाओं में हार्ट रोग विकसित हुआ.
स्टडी के अंत में रिसर्चर ने निष्कर्ष निकाला कि रोजाना अधिक कदम चलना बेहतर स्वास्थ्य परिणामों से जुड़ा है. उनके अनुसार, उम्रदराज महिलाओं के लिए सप्ताह में एक या दो दिन भी 4,000 कदम चलना समय से पहले मृत्यु और हृदय रोग के खतरे को कम करने की दिशा में एक प्रभावी कदम साबित हो सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 11 Jun 2026 21:30:15 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Daily Walking Distance: एक दिन में कितने किलोमीटर चलना होता है ठीक, इससे ज्यादा चले तो कितना खतरा?</title>
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        <description><![CDATA[ How Many Kilometers Should You Walk In A Day: चलना सबसे आसान और असरदार एक्सरसाइज में से एक माना जाता है. यह न सिर्फ हार्ट को स्वस्थ रखने में मदद करता है, बल्कि वजन कंट्रोल करने, मूड बेहतर बनाने और शरीर को सक्रिय रखने में भी अहम भूमिका निभाता है. लेकिन अक्सर लोगों के मन में सवाल उठता है कि आखिर एक दिन में कितनी वॉक करना सही है और क्या जरूरत से ज्यादा चलना नुकसान भी पहुंचा सकता है?. हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली बेवसाइट goodrx के एक्सपर्ट के अनुसार हर व्यक्ति के लिए चलने की आदर्श दूरी अलग-अलग हो सकती है. &amp;nbsp;यह उसकी फिटनेस, उम्र, स्वास्थ्य स्थिति और चलने की गति पर निर्भर करता है. जो व्यक्ति नियमित रूप से व्यायाम करता है, वह नए व्यक्ति की तुलना में अधिक दूरी आराम से तय कर सकता है.
कितना चलना माना जाता है सही?
एक्सपर्ट्स सप्ताह में कम से कम 150 मिनट की मध्यम तीव्रता वाली शारीरिक गतिविधि करने की सलाह देते हैं. इसका मतलब है कि आप हफ्ते में छह दिन करीब 25 मिनट तेज चाल से चल सकते हैं. आमतौर पर यह दूरी 2 से 3 किलोमीटर के आसपास हो सकती है, हालांकि यह व्यक्ति की गति पर निर्भर करती है. 10,000 कदम प्रतिदिन चलने का लक्ष्य काफी लोकप्रिय है, लेकिन एक्सपर्ट का कहना है कि यह कोई जादुई संख्या नहीं है. एक रिसर्च में पाया गया कि रोजाना लगभग 7,000 कदम चलने वाले लोगों में समय से पहले मृत्यु का जोखिम कम देखा गया. हालांकि 7,000 और 10,000 से अधिक कदम चलने वालों के बीच स्वास्थ्य लाभ में बहुत बड़ा अंतर नहीं पाया गया. अब 4000 स्टेप को लेकर भी क्लेम क्या जा रहा है.
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कब बढ़ सकता है खतरा?
ज्यादा चलना हर किसी के लिए फायदेमंद नहीं होता. यदि शरीर को पर्याप्त आराम न मिले और लगातार जरूरत से ज्यादा वॉक की जाए, तो ओवरट्रेनिंग जैसी स्थिति पैदा हो सकती है. ऐसे में शरीर कुछ संकेत देने लगता है जिन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. अगर वॉक के बाद लंबे समय तक मांसपेशियों में दर्द बना रहे, शरीर भारी महसूस हो, लगातार थकान रहे या पहले की तुलना में आपकी परफॉर्मेंस कम हो जाए, तो यह संकेत हो सकता है कि आप जरूरत से ज्यादा चल रहे हैं. इसके अलावा बार-बार मोच आना, चोट लगना, चलने की इच्छा कम होना, चिड़चिड़ापन बढ़ना, भूख कम लगना और बार-बार सर्दी-जुकाम होना भी ओवरएक्सर्शन के संकेत माने जाते हैं.
अपने शरीर की सुनें
एक्सपर्ट का मानना है कि किसी तय संख्या के पीछे भागने से ज्यादा जरूरी है कि आप अपनी क्षमता के अनुसार सक्रिय रहें. अगर आप वॉकिंग की शुरुआत कर रहे हैं, तो धीरे-धीरे दूरी और समय बढ़ाएं. वहीं फिट लोग अपनी क्षमता के अनुसार गति, दूरी या वॉक की फ्रीक्वेंसी बढ़ा सकते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 11 Jun 2026 21:30:14 +0530</pubDate>
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        <title>क्या सच में आलू खाने से एसिडिटी की दिक्कत होती है? जानें इसको खाने के सही तरीके</title>
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        <description><![CDATA[ Does Eating Potatoes Really Cause Acidity: आलू भारतीय रसोई का ऐसा हिस्सा है जो लगभग हर घर में किसी न किसी रूप में खाया जाता है. लेकिन कई लोग आलू खाने के बाद पेट में जलन, गैस, भारीपन या एसिडिटी की शिकायत करते हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सच में आलू एसिडिटी बढ़ाता है या इसके पीछे कोई और वजह होती है? एक्सपर्ट के अनुसार ज्यादातर मामलों में समस्या आलू से नहीं, बल्कि उसे खाने के तरीके और व्यक्ति की पाचन क्षमता से जुड़ी होती है.&amp;nbsp;
क्या सच में इससे गैस बनती है?
Ubiehealth की रिपोर्ट के अनुसार, आलू में रेजिस्टेंट स्टार्च पाया जाता है. यह एक प्रकार का स्टार्च है जो पूरी तरह पच नहीं पाता और बड़ी आंत तक पहुंच जाता है. वहां मौजूद बैक्टीरिया इसे फर्मेंट करते हैं, जिससे गैस बनने लगती है, कुछ लोगों में यही गैस पेट फूलने, भारीपन और एसिडिटी जैसे लक्षण पैदा कर सकती है खासकर जिन लोगों का डाइजेशन सिस्टम सेंसिटिवहोता है, उन्हें यह समस्या ज्यादा महसूस हो सकती है.
किन लोगों को हो सकती है दिक्कत?
यदि आप इरिटेबल बाउल सिंड्रोम या बार-बार होने वाली डाइजेशन संबंधी परेशानियों से जूझ रहे हैं, तो ज्यादा मात्रा में आलू खाने से भी असहजता बढ़ सकती है. हालांकि आलू को सामान्य तौर पर पाचन के लिए सुरक्षित माना जाता है, लेकिन बड़ी मात्रा में इसका सेवन कुछ लोगों में गैस और पेट दर्द का कारण बन सकता है.&amp;nbsp;
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कैसे सही तरीके से कर सकते हैं यूज?
आलू खाने का तरीका भी काफी मायने रखता है. उबले या बेक किए गए आलू आमतौर पर आसानी से पच जाते हैं, जबकि फ्रेंच फ्राइज, चिप्स या ज्यादा तेल-मसाले में बने आलू पेट पर अतिरिक्त दबाव डाल सकते हैं. तैलीय भोजन पाचन प्रक्रिया को धीमा कर देता है, जिससे एसिडिटी और गैस की समस्या बढ़ सकती है. इसलिए यदि आलू खाने के बाद जलन महसूस होती है, तो सबसे पहले उसकी तैयारी के तरीके पर ध्यान देना चाहिए. एक्सपर्ट यह भी सलाह देते हैं कि हरे रंग के या अंकुरित आलू खाने से बचना चाहिए. ऐसे आलू में सोलनाइन नामक नेचुरल टॉक्सिक तत्व की मात्रा बढ़ सकती है, जो पेट दर्द, मतली और पाचन संबंधी परेशानियों का कारण बन सकता है.
अगर आपको लगता है कि आलू खाने के बाद बार-बार एसिडिटी हो रही है, तो कुछ दिनों तक अपने खानपान का रिकॉर्ड रखें. ध्यान दें कि आपने आलू किस रूप में खाया, कितनी मात्रा में खाया और उसके बाद कौन से लक्षण दिखाई दिए. &amp;nbsp;इससे सही कारण समझने में मदद मिल सकती है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 13:30:17 +0530</pubDate>
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        <title>Diabetes Care Tips: शुगर पेशेंट हैं तो आज से गांठ बांध लें ये 5 बातें, वरना वक्त से पहले आ जाएगी मौत</title>
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        <description><![CDATA[ Diabetes Care Tips: शुगर पेशेंट हैं तो आज से गांठ बांध लें ये 5 बातें, वरना वक्त से पहले आ जाएगी मौत ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 13:30:15 +0530</pubDate>
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        <title>Monsoon Health Tips: मॉनसून में इन बीमारियों का खतरा सबसे ज्यादा, इन 5 बातों का ख्याल रख अपनों को बचा सकते हैं आप</title>
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        <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 13:30:14 +0530</pubDate>
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        <title>Mental Health Crisis: हर दिन 42 मौतें, डिप्रेशन और तनाव बना बड़ी चुनौती, एक्सपर्ट ने बताए ये शुरुआती लक्षण</title>
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        <description><![CDATA[ Warning Signs Of Mental Health Problems: मेंटल हेल्थ आज भारत के सामने उभरती हुई सबसे बड़ी हेल्थ चुनौतियों में से एक बनता जा रहा है. इसका गंभीर संकेत &amp;nbsp;2024 के नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो &amp;nbsp;के आंकड़ों में भी देखने को मिला है. रिपोर्ट के अनुसार, मध्य प्रदेश में वर्ष 2024 के दौरान 15,491 लोगों ने आत्महत्या की, यानी औसतन हर दिन 42 लोगों ने अपनी जान गंवाई. यह आंकड़ा सिर्फ एक अपराध या सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि गहराते मेंटल हेल्थ संकट की ओर भी इशारा करता है.
मेंटल हेल्थ क्यों चुनौती की तरह उभर रहा?
एक्सपर्ट का मानना है कि छात्रों और युवाओं में बढ़ता तनाव इस संकट का एक बड़ा कारण बनकर उभरा है. प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव, करियर को लेकर अनिश्चितता और लगातार बढ़ती अपेक्षाएं युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही हैं. आंकड़ों के मुताबिक मध्य प्रदेश छात्र आत्महत्या के मामलों में देश में तीसरे स्थान पर है और राष्ट्रीय स्तर पर होने वाली छात्र आत्महत्याओं में लगभग 10 प्रतिशत हिस्सेदारी अकेले इसी राज्य की है.
लड़कियों के मामले हैरान कर देने वाले
चिंताजनक बात यह है कि छात्राओं पर मानसिक दबाव का असर अधिक दिखाई दे रहा है. वर्ष 2024 में राज्य में 731 छात्राओं और 716 छात्रों ने आत्महत्या की. इसे बढ़ते शैक्षणिक दबाव, सामाजिक अपेक्षाओं और भावनात्मक तनाव से जोड़कर देखते हैं. हेल्थ एक्सपर्ट का कहना है कि आत्महत्या कभी भी अचानक लिया गया फैसला नहीं होता. इसके पीछे लंबे समय से चल रही मानसिक परेशानियां, डिप्रेशन, चिंता और इमोशनल संघर्ष छिपे हो सकते हैं. इसलिए शुरुआती संकेतों को पहचानना बेहद जरूरी है.
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क्या होते हैं इसके लक्षण?
अहमदाबाद स्थित एक निजी मनोचिकित्सा केंद्र की कंसलटेंट और &#039;हैप्पीनेस फर्स्ट&#039; की एक्सपर्ट डॉ. विधि पटेल वैष्णव के अनुसार यदि कोई व्यक्ति बार-बार मौत या आत्महत्या की बातें करने लगे, अत्यधिक चिंता और बेचैनी महसूस करे, खुद को निरर्थक समझने लगे, अचानक लोगों से दूरी बनाने लगे या अपनी प्रिय चीजें दूसरों को देने लगे, तो इसे गंभीर चेतावनी संकेत माना जाना चाहिए. ऐसे मामलों में तुरंत एक्सपर्ट की मदद लेना जरूरी है. डॉ का कहना है कि समय पर मेडिकल सहायता और इमोशनल सहयोग कई जिंदगियां बचा सकता है. अच्छी नींद, नियमित व्यायाम, परिवार और दोस्तों से खुलकर बात करना, स्क्रीन टाइम कम करना और जीवन में संतोष की भावना विकसित करना मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मददगार हो सकता है.
मेंटल हेल्थ पर ध्यान देने की जरूरत
एक्सपर्ट यह भी मानते हैं कि मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को गांव और छोटे शहरों तक पहुंचाना समय की जरूरत है. स्कूलों और कॉलेजों में काउंसलिंग सुविधाएं, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर प्रशिक्षित मानसिक स्वास्थ्य एक्सपर्ट और जागरूकता अभियान इस दिशा में अहम भूमिका निभा सकते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <title>Weight Loss Drug: मोटापा कम करने का नया कमाल, 52 नहीं अब सिर्फ 12 इंजेक्शन में चलेगा काम, जानें कैसे?</title>
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        <description><![CDATA[ Pfizer&amp;rsquo;s Berobenatide Weight Loss Drug: मोटापे और डायबिटीज के इलाज में एक बड़ा बदलाव आने की संभावना दिखाई दे रही है. दवा कंपनी फाइजर ने अपनी नई प्रायोगिक दवा बेरोबेनेटाइड के मिड-स्टेज ट्रायल के नतीजे जारी किए हैं. &amp;nbsp;खास बात यह है कि यदि यह दवा भविष्य में मंजूरी हासिल कर लेती है, तो यह दुनिया की पहली ऐसी जीएलपी-1 आधारित वेट लॉस थेरेपी हो सकती है जिसे हर हफ्ते नहीं, बल्कि महीने में सिर्फ एक बार इंजेक्शन के रूप में लेना होगा.&amp;nbsp;
इस तरह कैसे दी जाती है दवा?
मौजूदा समय में वेगोवी और जेडबाउंड जैसी लोकप्रिय वेट लॉस दवाएं साप्ताहिक इंजेक्शन के रूप में दी जाती हैं. इसके विपरीत ब्राबांटिया का उद्देश्य मरीजों के लिए इलाज को अधिक सुविधाजनक बनाना है. शुरुआती चरण में मरीजों को साप्ताहिक डोज दी जाएगी, जिसके बाद उन्हें महीने में केवल एक इंजेक्शन लेना होगा. इसका मतलब है कि सालभर में 52 इंजेक्शन की जगह केवल 12 इंजेक्शन की जरूरत पड़ेगी.&amp;nbsp;
वेस्पर-3 नामक क्लिनिकल ट्रायल में डायबिटीज से पीड़ित न होने वाले प्रतिभागियों का वजन 12.3 प्रतिशत तक कम हुआ. &amp;nbsp;दिलचस्प बात यह रही कि जो मरीज बाद में मासिक डोज पर गए, उनका वजन कम होना जारी रहा और वजन घटने की प्रक्रिया किसी ठहराव पर नहीं पहुंची.&amp;nbsp;
इसे भी पढ़ें -&amp;nbsp;Summer Fatigue: गर्मियों में बार-बार महसूस हो रही थकान, जान लें यह किस बीमारी का संकेत?
क्या इनके असर दिखते हैं?
हालांकि वेगोवी और जेडबाउंड जैसी दवाओं ने बड़े और लंबे स्टडी में लगभग 15 प्रतिशत और 20 प्रतिशत से अधिक वजन घटाने के परिणाम दिखाए हैं, &amp;nbsp;लेकिनफोर्टिस सीडीओसी हॉस्पिटल फॉर डायबिटीज एंड एलाइड साइंसेज के चेयरमैन और एम्स दिल्ली के पूर्व प्रोफेसर डॉ. अनूप मिश्रा का कहना है कि अलग-अलग ट्रायल्स के परिणामों की सीधी तुलना नहीं की जानी चाहिए.
क्या है इसकी खासियत?
डॉ. अनूप मिश्रा के अनुसार बेरोबेनेटाइड की सबसे बड़ी खासियत वजन घटाने का प्रतिशत नहीं, बल्कि इसकी मासिक डोजिंग है. उनका मानना है कि भारत जैसे देश में लंबे समय तक इलाज जारी रखना बड़ी चुनौती होता है. ऐसे में महीने में केवल एक बार इंजेक्शन लेने की सुविधा मरीजों की उपचार के प्रति प्रतिबद्धता बढ़ा सकती है और इलाज छोड़ने की संभावना कम कर सकती है. एक्सपर्ट के मुताबिक अब इस दवा के फेज-3 ट्रायल्स पर नजर रहेगी. इसमें लंबे समय तक वजन कम रहने की क्षमता, सुरक्षा, गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल साइड इफेक्ट्स, हार्ट और किडनी पर प्रभाव जैसे पहलुओं का मूल्यांकन किया जाएगा. यह भी देखा जाएगा कि शरीर में पूरे महीने तक सक्रिय रहने वाली यह दवा किसी नए जोखिम को तो जन्म नहीं देती.
कब तक मार्केट में आ सकती है?
डॉ. मिश्रा का मानना है कि भविष्य में मोटापे के इलाज का फोकस केवल वजन घटाने तक सीमित नहीं रहेगा. हार्ट रोग, किडनी स्वास्थ्य, ब्लड शुगर कंट्रोल, दवा की कीमत और मरीज की व्यक्तिगत स्वास्थ्य स्थिति जैसे कारक भी इलाज तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे. उनके अनुसार आने वाले वर्षों में लंबे समय तक असर करने वाली दवाएं, कॉम्बिनेशन थेरेपी और पर्सनलाइज्ड ट्रीटमेंट मोटापे के इलाज की दिशा तय करेंगे. यदि यह अपने अंतिम ट्रायल्स में सफल रहती है, तो इसके 2028 के अंत या 2029 के मध्य तक मरीजों के लिए उपलब्ध होने की संभावना है. एक्सपर्ट मानते हैं कि यह दवा मोटापे को एक लंबे समय तक चलने वाली बीमारी के रूप में प्रबंधित करने के तरीके को बदल सकती है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 13:30:11 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>भारत में ज्यादा चीनी, विदेश में बिना शुगर, बेबी फूड को लेकर नेस्ले की रिपोर्ट पर फिर बहस तेज</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/भारत-में-ज्यादा-चीनी-विदेश-में-बिना-शुगर-बेबी-फूड-को-लेकर-नेस्ले-की-रिपोर्ट-पर-फिर-बहस-तेज</link>
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        <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 01:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>Fatty Liver Disease: शहरी भारत में हर तीसरा व्यक्ति फैटी लिवर का शिकार, नजरअंदाज किया तो हो सकता है कैंसर</title>
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        <description><![CDATA[ Can Weight Loss Reverse Fatty Liver Disease: फैटी लिवर को लंबे समय तक एक मामूली समस्या माना जाता रहा. कई लोगों को अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट में इसका जिक्र मिलता था, लेकिन क्योंकि कोई खास लक्षण नहीं दिखते थे, इसलिए इसे नजरअंदाज कर दिया जाता था. &amp;nbsp;हालांकि अब डॉक्टरों का कहना है कि यह गलती भविष्य में गंभीर परेशानी का कारण बन सकती है. भारत में फैटी लिवर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. मोटापा, टाइप-2 डायबिटीज, अनहेल्दी खानपान, कम शारीरिक गतिविधि, खराब नींद और तनावपूर्ण लाइफस्टाइल इसके प्रमुख कारण माने जा रहे हैं. सबसे चिंता की बात यह है कि यह बीमारी कई सालों तक बिना किसी स्पष्ट लक्षण के शरीर में बढ़ती रहती है.&amp;nbsp;
क्यों जल्दी पहचान करना जरूरी?
&amp;nbsp;डॉ. शलीन अग्रवाल ने TOI को बताया कि &amp;nbsp;फैटी लिवर उन गिनी-चुनी लिवर बीमारियों में शामिल है जिन्हें शुरुआती चरण में काफी हद तक ठीक किया जा सकता है. लेकिन इसके लिए समय रहते कदम उठाना बेहद जरूरी है. दरअसल, जब लिवर की सेल्स में जरूरत से ज्यादा फैट जमा होने लगता है, तो लिवर के सामान्य कामकाज पर असर पड़ना शुरू हो जाता है. लिवर शरीर में पोषक तत्वों को प्रोसेस करने, विषैले पदार्थों को बाहर निकालने और मेटाबॉलिज्म को नियंत्रित करने जैसे कई महत्वपूर्ण काम करता है. इसलिए इसकी सेहत बिगड़ने का असर पूरे शरीर पर पड़ सकता है.
भारत में क्या है स्थिति?
जर्नल ऑफ क्लिनिकल एंड एक्सपेरिमेंटल हेपेटोलॉजी में प्रकाशित एक रिसर्च के अनुसार, शहरी भारत में हर तीन में से एक व्यक्ति किसी न किसी स्तर के फैटी लिवर से प्रभावित हो सकता है. एक्सपर्ट का मानना है कि मोटापा और डायबिटीज बढ़ने के साथ यह आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है.&amp;nbsp;
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क्या आप इसको घर पर ठीक कर सकते हैं?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वजन घटाकर फैटी लिवर को ठीक किया जा सकता है? इस पर डॉ. शलीन अग्रवाल कहते हैं कि शुरुआती अवस्था में इसका जवाब हां है. उनका कहना है कि लिवर में खुद को रिपेयर करने की अद्भुत क्षमता होती है, बशर्ते नुकसान स्थायी न हुआ हो. नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ हेल्थ के नेतृत्व में हुए कई स्टडी में पाया गया है कि शरीर के कुल वजन का केवल 5 प्रतिशत कम करने से लिवर में जमा फैट घट सकता है. वहीं 7 से 10 प्रतिशत वजन कम करने पर लिवर की सूजन में भी सुधार देखा गया है. कुछ मामलों में शुरुआती फाइब्रोसिस यानी लिवर पर बनने वाले निशानों को भी कम किया जा सकता है.&amp;nbsp;
किन बातों का रखना चाहिए ध्यान?
एक्सपर्ट क्रैश डाइट या तेजी से वजन घटाने की सलाह नहीं देते. उनका कहना है कि संतुलित भोजन, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद, ब्लड शुगर कंट्रोल और लंबे समय तक स्वस्थ आदतें अपनाना ही सबसे प्रभावी उपाय है. डॉ. शलीन अग्रवाल चेतावनी देते हैं कि अगर फैटी लिवर को नजरअंदाज किया जाए तो यह आगे चलकर लिवर में सूजन, फाइब्रोसिस, सिरोसिस, लिवर फेलियर और यहां तक कि लिवर कैंसर का कारण भी बन सकता है. &amp;nbsp;कई बार मरीज तब अस्पताल पहुंचते हैं जब स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी होती है कि लिवर ट्रांसप्लांट ही एकमात्र विकल्प बचता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 01:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Heart Health: कलाई पर रखें उंगली और 10 सेकंड में जानें दिल का हाल, एक्सपर्ट ने बताया बीमारी पकड़ने का तरीका</title>
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        <description><![CDATA[ How To Check Your Pulse For Heart Problems: आज के दौर में लोग अपनी सेहत को लेकर पहले से कहीं ज्यादा जागरूक हो गए हैं. कोई स्मार्टवॉच से कदम गिन रहा है तो कोई ब्लड प्रेशर और नींद पर नजर रख रहा है. लेकिन दिल की सेहत से जुड़ा एक बेहद आसान और पुराना तरीका आज भी ज्यादातर लोग नजरअंदाज कर देते हैं कि अपनी नाड़ी यानी पल्स चेक करना. चलिए आपको बताते हैं कि क्यों यह आपके लिए जरूरी है.&amp;nbsp;
पल्स जांचकर हार्ट के बारे में पता करना
एक्सपर्ट का कहना है कि केवल 10 सेकंड में अपनी पल्स जांचकर दिल की एक ऐसी समस्या का शुरुआती संकेत पाया जा सकता है, जो लंबे समय तक बिना किसी लक्षण के शरीर में मौजूद रह सकती है. यह जानकारी खास तौर पर वर्ल्ड हार्ट रिदम वीक के दौरान महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जिसका उद्देश्य लोगों को दिल की धड़कन से जुड़ी बीमारियों के प्रति जागरूक करना है.&amp;nbsp;
कैसे काम करता है यह?
हार्ट की सबसे आम रिदम संबंधी समस्याओं में से एक है एट्रियल फिब्रिलेशन . &amp;nbsp;इस स्थिति में दिल के ऊपरी चैम्बर अनियमित तरीके से धड़कने लगते हैं और दिल की सामान्य लय बिगड़ जाती है. समस्या यह है कि कई लोगों को इसके कोई स्पष्ट लक्षण महसूस नहीं होते. कुछ मरीजों को धड़कन तेज महसूस होना, सांस फूलना, चक्कर आना या थकान हो सकती है, लेकिन कई लोग पूरी तरह सामान्य महसूस करते हैं.&amp;nbsp;
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कई बार बिना किसी लक्षण के मौजूद
अमेरिका के नेशनल हार्ट, लंग एंड ब्लड इंस्टीट्यूट के अनुसार, एट्रियल फिब्रिलेशन कई बार बिना किसी लक्षण के मौजूद रह सकता है और इसका पता केवल नियमित जांच के दौरान चलता है. &amp;nbsp;यदि इसका समय पर इलाज न किया जाए तो स्ट्रोक और अन्य हार्ट संबंधी दिक्कतों का खतरा बढ़ सकता है. डॉ. प्रदीप जैन ने TOI को बताया कि एक साधारण पल्स चेक कई बार दिल की अनियमित धड़कन का शुरुआती संकेत दे सकता है.&amp;nbsp;
10 सेकंड में कैसे पता कर सकते हैं?
उनके अनुसार, अपनी तर्जनी और मध्यमा उंगली को अंगूठे के नीचे कलाई के अंदरूनी हिस्से पर रखें और करीब 10 सेकंड तक धड़कन महसूस करें. यदि धड़कन नियमित और समान अंतराल पर महसूस हो रही है तो आमतौर पर चिंता की बात नहीं होती. लेकिन अगर धड़कन कभी तेज, कभी धीमी या अनियमित महसूस हो, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी हो सकता है. हालांकि एक्सपर्ट यह भी स्पष्ट करते हैं कि केवल पल्स चेक करके एट्रियल फिब्रिलेशन या किसी अन्य बीमारी की पुष्टि नहीं की जा सकती. यह सिर्फ एक शुरुआती चेतावनी संकेत की तरह काम करता है, जिससे समय रहते मेडिकल जांच कराई जा सके. डॉ. प्रदीप जैन के मुताबिक, बढ़ती उम्र, हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, मोटापा, हार्ट रोग और शारीरिक गतिविधि की कमी जैसी स्थितियां अनियमित दिल की धड़कन का जोखिम बढ़ा सकती हैं. भारत में इन समस्याओं के तेजी से बढ़ते मामलों को देखते हुए लोगों को अपने दिल की लय पर ध्यान देना चाहिए.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 09 Jun 2026 09:30:06 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Cardio Vs Strength Training: लंबी उम्र के लिए कार्डियो या स्ट्रेंथ ट्रेनिंग में क्या सही? 58% घटता है समय से पहले मौत का खतरा</title>
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        <description><![CDATA[ Is Strength Training Better Than Cardio For Longevity: फिटनेस की दुनिया में लंबे समय से एक बहस चलती आ रही है कि बेहतर स्वास्थ्य और लंबी उम्र के लिए कार्डियो ज्यादा जरूरी है या फिर स्ट्रेंथ ट्रेनिंग? एक तरफ दौड़ना, साइकिल चलाना और तेज चाल से चलने जैसी गतिविधियों के समर्थक हैं, तो दूसरी ओर वजन उठाने और मांसपेशियों को मजबूत बनाने वाली एक्सरसाइज को सबसे प्रभावी मानने वाले लोग हैं. लेकिन अब हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के रिसर्चर की एक बड़ी स्टडी ने इस बहस को नई दिशा दे दी है.
अलग-अलग एक्सरसाइज से क्या होता है असर?
ब्रिटिश जर्नल ऑफ स्पोर्ट्स मेडिसिन में पब्लिश इस रिसर्च में 1 लाख 47 हजार 374 एडल्ट के स्वास्थ्य और व्यायाम की आदतों का करीब 30 वर्षों तक एनालिसिस किया गया. रिसर्चर ने यह जानने की कोशिश की कि अलग-अलग प्रकार की एक्सरसाइज का मृत्यु दर, हृदय रोग, कैंसर और ब्रेन संबंधी बीमारियों पर क्या असर पड़ता है. रिसर्चर का सबसे दिलचस्प निष्कर्ष यह रहा कि ज्यादा व्यायाम हमेशा ज्यादा फायदा नहीं देता. खासतौर पर स्ट्रेंथ ट्रेनिंग के मामले में एक तय सीमा के बाद लाभ बढ़ना लगभग रुक जाता है. रिसर्च के अनुसार, सप्ताह में 90 से 120 मिनट तक मांसपेशियों को मजबूत बनाने वाली एक्सरसाइज करना सबसे फायदेमंद साबित हुआ.&amp;nbsp;
कितने घंटे स्ट्रेंथ ट्रेनिंग फायदेमंद?
जो लोग हर सप्ताह लगभग डेढ़ से दो घंटे स्ट्रेंथ ट्रेनिंग करते थे, उनमें किसी भी कारण से मृत्यु का खतरा 13 प्रतिशत कम पाया गया. वहीं हार्ट संबंधी बीमारियों से मौत का जोखिम 19 प्रतिशत और अल्जाइमर जैसी ब्रेन संबंधी बीमारियों से मृत्यु का खतरा 27 प्रतिशत तक कम देखा गया. &amp;nbsp;रिसर्चर का कहना है कि दो घंटे से अधिक स्ट्रेंथ ट्रेनिंग करने पर अतिरिक्त लाभ बहुत सीमित हो जाते हैं. &amp;nbsp;हालांकि इस स्टडी का निष्कर्ष यह नहीं है कि स्ट्रेंथ ट्रेनिंग कार्डियो से बेहतर है. असल में सबसे ज्यादा फायदे उन लोगों को मिले जिन्होंने दोनों तरह की एक्सरसाइज को अपनी रूटीन का हिस्सा बनाया. कार्डियो और स्ट्रेंथ ट्रेनिंग का संतुलित कम्बिनेशन समय से पहले मृत्यु के जोखिम को 58 प्रतिशत तक कम करने से जुड़ा पाया गया.
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स्ट्रेंथ ट्रेनिंग करने से क्या होता है फायदा?
एक्सपर्ट का मानना है कि उम्र बढ़ने के साथ शरीर में मांसपेशियां कम होने लगती हैं, जिसे सारकोपेनिया कहा जाता है. इसके कारण कमजोरी, गिरने का खतरा, धीमा मेटाबॉलिज्म और रोजमर्रा के काम करने में परेशानी जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं. स्ट्रेंथ ट्रेनिंग इन दिक्कतों को कम करने में मदद करती है. इसके अलावा यह हड्डियों को मजबूत बनाती है, इंसुलिन सेंसिटिविटी में सुधार करती है, ब्लड शुगर को कंट्रोल रखने में मदद करती है और ऑस्टियोपोरोसिस के खतरे को भी कम कर सकती है. डंबल, रेजिस्टेंस बैंड, बॉडीवेट एक्सरसाइज, योग, पिलाटीज और यहां तक कि कुछ कठिन बागवानी गतिविधियां भी इसमें शामिल मानी जाती हैं. एक्सपर्ट के अनुसार, तीव्रता से ज्यादा महत्वपूर्ण नियमितता है.
किसको चुनना बेहतर?
हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की इस स्टडी का संदेश साफ है. यदि आप लंबा और स्वस्थ जीवन जीना चाहते हैं तो कार्डियो और स्ट्रेंथ ट्रेनिंग में से किसी एक को चुनने की जरूरत नहीं है. सप्ताह में लगभग दो घंटे स्ट्रेंथ ट्रेनिंग और नियमित कार्डियो एक्सरसाइज का कम्बिनेशन आपके स्वास्थ्य को बेहतर बनाने और कई गंभीर बीमारियों के दिक्कतों को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 08 Jun 2026 21:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Causes of Frequent Urination: पेट खराब होने पर बार बार क्यों आता है पेशाब, जानिए किन चीजों को करना चाहिए अवॉइड?</title>
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        <description><![CDATA[ Causes of Frequent Urination: पेट खराब होने पर बार बार क्यों आता है पेशाब, जानिए किन चीजों को करना चाहिए अवॉइड? ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 08 Jun 2026 21:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>Cancer Drug Shortage: कैंसर मरीजों के लिए बढ़ी चिंता, जरूरी कीमो दवाओं की कमी से इलाज पर मंडराया संकट</title>
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        <description><![CDATA[ Cancer Drug Shortage:&amp;nbsp; कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों और उनके परिवारों के लिए इन दिनों एक नई चिंता सामने आ गई है. देश के कई अस्पतालों में कीमोथेरेपी में इस्तेमाल होने वाली कुछ जरूरी दवाओं की कमी की खबरें सामने आ रही हैं. डॉक्टरों का कहना है कि Cisplatin और Carboplatin जैसी दवाएं कई तरह के कैंसर के इलाज में अहम भूमिका निभाती हैं. इस कमी के कारण देश भर में कैंसर के मरीजों के इलाज में रुकावटें आ रही हैं. बता दें कि ये दोनों दवाएं फेफड़े, Cervix, Ovary, और सिर-गर्दन &amp;nbsp;के कैंसर के इलाज के लिए बहुत जरूरी मानी जाती हैं. &amp;nbsp;कई जगह मरीज और उनके परिजन दवा की तलाश में एक मेडिकल स्टोर से दूसरे मेडिकल स्टोर तक भटक रहे हैं. &amp;nbsp;डॉक्टरों की चिंता यह है कि अगर समय पर दवा नहीं मिली मरीजों के कीमोथेरेपी सेशन को टालना पड़ रहा है या फिर इलाज का कोई दूसरा तरीका ढूंढना पड़ रहा है.&amp;nbsp;
आखिर क्यों खास हैं ये दवाएं?
Cisplatin और Carboplatin जैसी प्लैटिनम आधारित दवाएं कैंसर के इलाज में रीढ़ की हड्डी मानी जाती हैं. &amp;nbsp;इनका इस्तेमाल फेफड़ों, स्तन, सर्वाइकल, ओवेरियन, मुंह और कई अन्य प्रकार के कैंसर के इलाज में किया जाता है. कई मामलों में ये दवाएं मरीज के इलाज का मुख्य हिस्सा होती हैं. लेकिन इस समय देश में इनकी भारी कमी हो गई है. माना जा रहा है कि इस संकट की मुख्य वजह कच्चे माल (API) की कमी, कंपनियों की बढ़ती मैन्युफैक्चरिंग लागत और दुनिया भर में सप्लाई चेन का प्रभावित होना है. साथ ही जानकारों के मुताबिक, पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव और प्लैटिनम की कीमतों में आई भारी तेजी ने इस समस्या को और बढ़ा दिया है. शुरुआत में अस्पतालों ने अपने पुराने स्टॉक से काम चलाया, लेकिन अब वह भी खत्म हो चुका है. डॉक्टरों को मजबूरी में मरीजों के कीमोथेरेपी शेड्यूल और इलाज के तरीकों में बदलाव करना पड़ रहा है, जो मरीजों के ठीक होने की संभावनाओं के लिहाज से बेहद चिंताजनक है.&amp;nbsp;
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डॉक्टरों और विशेषज्ञों के बयानों पर केंद्रित पैराग्राफ फॉर्मेट
दवाओं की इस कमी से देश के बड़े अस्पतालों में स्थिति बेहद गंभीर हो चुकी है. दिल्ली के एम्स (AIIMS) के सर्जिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. एमडी रे ने बताया कि इन जरूरी दवाओं के न मिलने से कैंसर रोगियों का पूरा ट्रीटमेंट प्लान बिगड़ सकता है, जिससे मरीजों का सर्वाइवल रेट पर बुरा असर पड़ सकता है और बीमारी दोबारा लौटने का खतरा बढ़ जाता है. &amp;nbsp;वहीं, सर गंगा राम अस्पताल के मेडिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के अध्यक्ष डॉ. श्याम गर्ग ने चेतावनी देते हुए कहा है कि स्थिति इतनी गंभीर है कि अस्पताल में मुश्किल से केवल एक या दो दिन का ही स्टॉक बचा है. &amp;nbsp;
मरीजों और परिवारों के लिए सबसे जरूरी बात
डॉक्टरों का कहना है कि मरीजों को घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन सतर्क रहना जरूरी है. &amp;nbsp;यदि किसी मरीज का इलाज इन दवाओं से चल रहा है तो उसे अपने डॉक्टर के संपर्क में रहना चाहिए और दवा की उपलब्धता को लेकर समय-समय पर जानकारी लेते रहना चाहिए. किसी भी स्थिति में बिना डॉक्टर की सलाह के इलाज में बदलाव नहीं करना चाहिए.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Sun, 07 Jun 2026 13:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>Food Safety: खाने की थाली बन रही मौत की वजह! खराब फूड से हर साल 15 लाख बच्चों की मौत, WHO ने जारी की रिपोर्ट</title>
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        <description><![CDATA[ Food Safety : विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की एक नई रिपोर्ट ने फूड सेफ्टी को लेकर चौंकाने वाले आंकड़े सामने रखे हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, गंदे और खराब खाने की वजह से हर साल लाखों लोग बीमार पड़ रहे हैं, जबकि बड़ी संख्या में लोगों की जान भी जा रही है. वहीं सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि छोटे बच्चे इस खतरे का सबसे बड़ा शिकार बन रहे हैं. पांच साल से कम उम्र के बच्चों में खराब खाने से होने वाली बीमारियों का खतरा बड़े बच्चों और एडल्ट्स की तुलना में लगभग तीन गुना ज्यादा है. दुनिया की कुल आबादी में इन बच्चों की हिस्सेदारी केवल 9 प्रतिशत है, लेकिन फूड बोर्न डिजीज के करीब एक-तिहाई मामले इन्हीं से जुड़े हैं.&amp;nbsp;
छोटे बच्चों पर सबसे ज्यादा खतरा क्यों है?
WHO की रिपोर्ट के अनुसार, छोटे बच्चों का इम्यून सिस्टम पूरी तरह ग्रो नहीं होता है. यही वजह है कि खराब खाने में मौजूद बैक्टीरिया, वायरस और परजीवियों से जल्दी प्रभावित हो जाते हैं. खराब खाने की वजह से होने वाली कई बीमारियां डायरिया से जुड़ी होती हैं. छोटे बच्चों के लिए डायरिया जानलेवा साबित हो सकता है, क्योंकि इससे शरीर में पानी और जरूरी पोषक तत्वों की कमी हो जाती है.&amp;nbsp;
2021 में करोड़ों लोग हुए बीमार
रिपोर्ट के अनुसार, सिर्फ साल 2021 में खराब खाने की वजह से दुनिया भर में करीब 86.6 करोड़ लोग बीमार पड़े. वहीं लगभग 15 लाख लोगों की मौत हो गई. विशेषज्ञों का मानना है कि इनमें से बड़ी संख्या में मौतों और बीमारियों को रोका जा सकता था. अगर साफ पानी उपलब्ध हो, खाने को सही तरीके से तैयार और स्टोर किया जाए, साफ-सफाई का ध्यान रखा जाए और समय पर इलाज मिल जाए तो इस खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है.&amp;nbsp;
खाने में मौजूद केमिकल हैं इतने खतरनाक&amp;nbsp;
अक्सर लोग सोचते हैं कि खराब खाने का मतलब सिर्फ बैक्टीरिया या वायरस से संक्रमण है, लेकिन WHO ने चेतावनी दी है कि खाने में मौजूद कुछ केमिकल भी बेहद खतरनाक हो सकते हैं, सीसा (Lead) और मिथाइलमरकरी जैसे केमिकल बच्चों के ग्रो हो रहे दिमाग को नुकसान पहुंचा सकते हैं. इससे बच्चों के मानसिक विकास, सीखने की क्षमता और तंत्रिका तंत्र पर लंबे समय तक असर पड़ सकता है. विशेषज्ञों का कहना है कि केमिकल प्रदूषण को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है, जबकि इसके प्रभाव कई बार लाइफटाइम बने रह सकते हैं.&amp;nbsp;
फूड बोर्न डिजीज हुई मौतों में केमिकल सबसे बड़ा कारण कैसे है?
रिपोर्ट में बताया गया है कि खाने से जुड़ी बीमारियों के ज्यादातर मामले बैक्टीरिया, वायरस और परजीवियों की वजह से होते हैं, लेकिन मौतों के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार केमिकल प्रदूषण है. 2021 में खराब खाने से जुड़ी कुल मौतों में लगभग 73 प्रतिशत हिस्सेदारी केमिकल खतरों की रही. इनमें अकार्बनिक आर्सेनिक (Inorganic Arsenic) और सीसा सबसे बड़े कारण रहे. ये दोनों तत्व हार्ट डिजीज स्ट्रोक और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ाते हैं. WHO के अनुसार, फूड बोर्न डिजीज हुई मौतों में करीब 42 प्रतिशत मामलों का संबंध अकार्बनिक आर्सेनिक से था, जबकि 31 प्रतिशत मौतें सीसे के संपर्क से जुड़ी थीं.&amp;nbsp;
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WHO ने क्या कहा?
WHO &amp;nbsp;ने कहा कि फूड सेफ्टी कोई सामान्य मुद्दा नहीं है. यह हर फैमिली और हर दिन के खाने से जुड़ा हुआ विषय है. उन्होंने कहा कि खराब खाना लंबे समय से पब्लिक हेल्थ के लिए बड़ी चुनौती रहा है, लेकिन अब सामने आए नए आंकड़े यह दिखाते हैं कि इसका इंसानों और अर्थव्यवस्था पर कितना बड़ा असर पड़ रहा है. रिपोर्ट में दुनिया के कई क्षेत्रों के बीच बड़ी असमानता भी सामने आई है, हालांकि साल 2000 के बाद से फूड बोर्न डिजीज का कुल बोझ कुछ कम हुआ है, लेकिन अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया आज भी सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्रों में शामिल हैं. दुनिया भर में होने वाली लगभग 75 प्रतिशत फूड बोर्न डिजीज और करीब 60 प्रतिशत मौतें इन्हीं क्षेत्रों में दर्ज की गई हैं. खराब खाने असर सिर्फ स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है. WHO के अनुसार, 2021 में खराब खाने की वजह से वैश्विक अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान हुआ. बीमारी के कारण लोगों के काम न कर पाने से दुनिया को लगभग 310 अरब अमेरिकी डॉलर की प्रोडक्टिवीटी का नुकसान हुआ.&amp;nbsp;
आगे और बढ़ सकती है चुनौती
WHO का कहना है कि जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण प्रदूषण और एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति बढ़ता Antimicrobial Resistance आगे फूड सेफ्टी की चुनौती को और मुश्किल बना सकता है. रिपोर्ट में 2000 से 2021 के बीच 194 देशों में 42 प्रमुख फूड खतरों का अध्ययन किया गया. इसमें बैक्टीरिया, वायरस, परजीवी और रासायनिक प्रदूषकों को शामिल किया गया था. विशेषज्ञों का मानना है कि बेहतर आंकड़ों और निगरानी व्यवस्था की मदद से देश फूड सेफ्टी से जुड़े सबसे बड़े खतरों की पहचान कर सकते हैं और समय रहते जरूरी कदम उठा सकते हैं.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 07 Jun 2026 13:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Hidden Cholesterol Marker: क्या कोलेस्ट्रॉल नॉर्मल होने पर भी आ सकता है हार्ट अटैक? एक्सपर्ट से जानें</title>
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        <description><![CDATA[ Hidden Cholesterol Marker: बदलती लाइफस्टाइल के चलते हमें हार्ट से जुड़ी तमाम तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. ऐसे में &amp;nbsp;हार्ट की सेहत की बात होती है तो आमतौर पर लोग एलडीएल, एचडीएल और ट्राइग्लिसराइड जैसे कोलेस्ट्रॉल के आंकड़ों पर ध्यान देते हैं. ज्यादातर लोग मानते हैं कि अगर उनकी कोलेस्ट्रॉल रिपोर्ट नॉर्मल है तो उनका दिल पूरी तरह सुरक्षित है. लेकिन हाल के वर्षों में कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां लोगों को कम उम्र में हार्ट अटैक आया, जबकि उनकी सामान्य कोलेस्ट्रॉल रिपोर्ट में कोई बड़ी गड़बड़ी नहीं थी. यही वजह है कि अब डॉक्टर केवल LDL, HDL और ट्राइग्लिसराइड्स पर ही ध्यान नहीं दे रहे हैं, बल्कि कुछ ऐसे छिपे हुए जोखिमों की भी जांच करने की सलाह दे रहे हैं जो सामान्य टेस्ट में नजर नहीं आते. एक्सपर्ट्स का कहना है कि कई बार शरीर के अंदर ऐसी समस्याएं मौजूद होती हैं जो रिपोर्ट में नहीं दिखतीं, लेकिन दिल की सेहत पर गंभीर असर डाल सकती हैं.&amp;nbsp;
क्या है Lp(a), जिसे बताया जा रहा है छिपा हुआ खतरा?
डॉक्टरों के अनुसार Lipoprotein(a) या Lp(a) एक खास तरह का कोलेस्ट्रॉल कण होता है, जो दिखने में LDL यानी बैड कोलेस्ट्रॉल जैसा होता है, लेकिन इसमें एक अतिरिक्त प्रोटीन जुड़ा होता है. यही वजह है कि यह रक्त नलिकाओं में चर्बी जमा होने की प्रक्रिया को तेज कर सकता है. सबसे बड़ी बात यह है कि सामान्य लिपिड प्रोफाइल टेस्ट में Lp(a) की जांच नहीं की जाती. ऐसे में किसी व्यक्ति की कोलेस्ट्रॉल रिपोर्ट सामान्य आ सकती है, लेकिन फिर भी उसके दिल को खतरा बना रह सकता है.&amp;nbsp;
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बढ़ रहे हैं हार्ट अटैक के मामले
भारत में डॉक्टरों को एक चिंताजनक ट्रेंड दिखाई दे रहा है. कई लोग जिनकी कोलेस्ट्रॉल रिपोर्ट सामान्य होती है, वे भी 30 से 40 की उम्र में हार्ट अटैक का शिकार हो रहे हैं. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ का मानना है कि इसके पीछे जेनेटिक कारणों से बढ़ा हुआ Lp(a) लेवल एक अहम वजह हो सकता है. यह फैक्टर ज्यादातर जेनेटिक्स से प्रभावित होता है, इसलिए डाइट या एक्सरसाइज का इस पर सीमित असर पड़ता है.
भारत में तेजी से बढ़ रहे हैं मामले
एक्सपर्ट के अनुसार भारत में समय से पहले दिल की बीमारी के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. कई रिपोर्टों में बताया गया है कि देश में होने वाली कुल मौतों का बड़ा हिस्सा हार्ट रोगों से जुड़ा है. चिंता की बात यह है कि कई मरीजों में हार्ट अटैक पश्चिमी देशों की तुलना में 10 से 15 साल पहले हो रहा है. जेनेटिक प्रवृत्ति, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, अनएक्टिव लाइफस्टाइल और छिपे हुए लिपिड मार्कर जैसे Lp(a) इस जोखिम को बढ़ा सकते हैं.
डॉक्टरों का कहना है कि जिन लोगों के परिवार में कम उम्र में हार्ट अटैक, स्ट्रोक या दिल की बीमारी के मामले रहे हों, उन्हें कम से कम एक बार Lp(a) टेस्ट जरूर करवाना चाहिए. इसके अलावा हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, मोटापा और खराब लाइफस्टाइल वाले लोगों को भी दिल की जांच को गंभीरता से लेना चाहिए. हालांकि Lp(a) को सीधे कम करना आसान नहीं माना जाता, लेकिन इसकी जानकारी होने पर दूसरे जोखिमों जैसे LDL कोलेस्ट्रॉल, ब्लड प्रेशर और ब्लड शुगर को बेहतर तरीके से कंट्रोल किया जा सकता है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Sun, 07 Jun 2026 13:30:06 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Home Remedies for Phlegm: इन तीन घरेलू नुस्खों से एक बार में निकल जाएगा फेफड़ों में जमा कफ, यहां जानिए</title>
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        <description><![CDATA[ Home Remedies for Phlegm: इन तीन घरेलू नुस्खों से एक बार में निकल जाएगा फेफड़ों में जमा कफ, यहां जानिए ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 07 Jun 2026 01:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Pneumonia Vaccine: उम्र 50 पार और बार&amp;बार रहता है खांसी&amp;जुकाम? जान लें कब है निमोनिया वैक्सीन की जरूरत</title>
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        <description><![CDATA[ Who Should Get The Pneumonia Vaccine: निमोनिया एक गंभीर इंफेक्शन है, जो लंग्स को प्रभावित करता है और कई बार जानलेवा भी साबित हो सकता है. इससे बचाव के लिए डॉक्टर निमोनिया वैक्सीन, जिसे न्यूमोकोकल वैक्सीन भी कहा जाता है, लगवाने की सलाह देते हैं. यह वैक्सीन स्ट्रेप्टोकोकस न्यूमोनिए नामक बैक्टीरिया से होने वाले इंफेक्शन से सुरक्षा प्रदान करती है. यही बैक्टीरिया निमोनिया के अलावा कान, साइनस और खून से जुड़े गंभीर इंफेक्शन का कारण भी बन सकता है.
दो तरह के वैक्सीन उपलब्ध
वर्तमान में न्यूमोकोकल वैक्सीन के दो प्रमुख प्रकार उपलब्ध हैं. पहला है न्यूमोकोकल कंजुगेट वैक्सीन, जिसमें PCV15, PCV20 और PCV21 शामिल हैं. दूसरा है न्यूमोकोकल पॉलीसैकराइड वैक्सीन. इनका उपयोग व्यक्ति की उम्र और स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार किया जाता है. हालांकि यह वैक्सीन हर प्रकार के निमोनिया को पूरी तरह नहीं रोक सकती, लेकिन इंफेक्सन का खतरा काफी हद तक कम कर देती है. यदि वैक्सीन लगवाने के बाद भी किसी व्यक्ति को निमोनिया हो जाए, तो बीमारी आमतौर पर कम गंभीर होती है.
किन लोगों को लगवानी चाहिए वैक्सीन?
अमेरिका के सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन &amp;nbsp;की सलाह के अनुसार 50 वर्ष या उससे अधिक उम्र के लोगों को यह वैक्सीन जरूर लगवानी चाहिए. इसके अलावा 5 साल से कम उम्र के बच्चों, कमजोर इम्यून सिस्टम वाले लोगों और कुछ पुरानी बीमारियों से जूझ रहे मरीजों को भी इसकी आवश्यकता हो सकती है.&amp;nbsp;
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किन लोगों को होता है इसका सबसे ज्यादा खतरा?
एक्सपर्ट के मुताबिक, हार्ट रोग, सिकल सेल डिजीज, क्रोनिक लिवर डिजीज, डायबिटीज, अस्थमा, एम्फायसीमा और क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज जैसी बीमारियों से पीड़ित लोगों में निमोनिया का खतरा अधिक होता है. इसी तरह कीमोथेरेपी कराने वाले मरीज, अंग प्रत्यारोपण करा चुके लोग और एचआईवी/एड्स से इंफेक्टेड व्यक्ति भी उच्च जोखिम वाली कैटेगरी में आते हैं. स्मोकिंग करने वालों और अत्यधिक शराब का सेवन करने वालों में भी इंफेक्शन का खतरा बढ़ जाता है, क्योंकि इन आदतों का असर शरीर की इम्यून सिस्टम पर असर पर पड़ता है.
क्या हर साल लगती है वैक्सीन?
निमोनिया वैक्सीन की सबसे अच्छी बात यह है कि इसे फ्लू वैक्सीन की तरह हर साल नहीं लगवाना पड़ता. अधिकांश लोगों के लिए एक बार लगवाई गई वैक्सीन लंबे समय तक सुरक्षा प्रदान करती है. हालांकि 65 वर्ष से अधिक उम्र के कुछ लोगों और विशेष स्वास्थ्य स्थितियों वाले मरीजों को अतिरिक्त डोज की जरूरत पड़ सकती है. इस बारे में डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है. बच्चों के लिए यह वैक्सीन चार डोज में दी जाती है. आमतौर पर 2, 4, 6 और 12 से 15 महीने की उम्र में इसके डोज लगाए जाते हैं. यदि किसी बच्चे का टीकाकरण समय पर पूरा नहीं हुआ है, तो डॉक्टर की सलाह के अनुसार बाद में भी इसे पूरा किया जा सकता है.
क्या होते हैं इसके साइड इफेक्ट्स?
जहां तक साइड इफेक्ट्स की बात है, वे आमतौर पर हल्के होते हैं. इंजेक्शन वाली जगह पर दर्द, सूजन या लालिमा, हल्का बुखार, भूख कम लगना और मांसपेशियों में दर्द जैसी शिकायतें हो सकती हैं. गंभीर एलर्जी की प्रतिक्रिया बहुत रेयर होती है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 06 Jun 2026 09:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>Rotten Mangoes: सावधान! मार्केट में बिक रहा सड़े और कीड़ों वाले आम का जूस, हो सकती है ये गंभीर बीमारी</title>
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        <description><![CDATA[ Rotten Mangoes: सावधान! मार्केट में बिक रहा सड़े और कीड़ों वाले आम का जूस, हो सकती है ये गंभीर बीमारी ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 05 Jun 2026 20:30:14 +0530</pubDate>
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        <title>Frozen Dessert Health Risks: जानें सेहत के लिए कैसे नुकसानदेह है फ्रोजन डेजर्ट, न्यूट्रिशनिस्ट ने दी बड़ी चेतावनी</title>
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        <description><![CDATA[ Why Frozen Desserts Are Harmful To Health: गर्मी के मौसम में आइसक्रीम और फ्रोजन डेजर्ट की मांग तेजी से बढ़ जाती है. लेकिन हाल ही में क्वालिटी वॉल्स ने अपने उत्पादों में पाम ऑयल की जगह डेयरी आधारित सामग्री इस्तेमाल करने की घोषणा ने एक बार फिर इस बहस को तेज कर दिया है कि आखिर फ्रोजन डेजर्ट और असली आइसक्रीम में क्या अंतर है और क्या फ्रोजन डेजर्ट वास्तव में सेहत के लिए नुकसानदेह हो सकते हैं.
क्या है मामला?
क्वालिटी वॉल्स ने घोषणा की है कि वह 2027 तक अपने पूरे पोर्टफोलियो को पाम ऑयल आधारित फॉर्मूले से हटाकर दूध आधारित उत्पादों में बदलने की योजना बना रही है. कंपनी का यह कदम ऐसे समय में आया है जब उपभोक्ताओं के बीच खाद्य उत्पादों की क्वालिटी और सामग्री को लेकर जागरूकता बढ़ रही है. एक्सपर्ट का मानना है कि इस फैसले से पूरे फ्रोजन डेजर्ट उद्योग पर असर पड़ सकता है.
क्यों यह हमारे लिए नुकसानदायक?
एक रिपोर्ट के अनुसार, न्यूट्रिशनिस्ट मैक सिंह के अनुसार, आज की पीढ़ी पारंपरिक कुल्फी और घर में बनने वाली ठंडी मिठाइयों से दूर होकर फ्रोजन डेजर्ट की ओर बढ़ रही है. हालांकि, उनके मुताबिक इन उत्पादों में इस्तेमाल होने वाली कई सामग्रियां स्वास्थ्य के लिए चिंता का कारण बन सकती हैं. रिपोर्ट के अनुसार, मैक सिंह बताते हैं कि फ्रोजन डेजर्ट में अक्सर पाम ऑयल का इस्तेमाल किया जाता है, जिसमें सैचुरेटेड फैट की मात्रा अधिक होती है. ज्यादा मात्रा में इसका सेवन हृदय स्वास्थ्य पर निगेटिव प्रभाव डाल सकता है और खराब कोलेस्ट्रॉल के स्तर को बढ़ा सकता है. इससे धमनियों में रुकावट का खतरा भी बढ़ सकता है.
मैक सिंह यह भी बताते हैं कि कई फ्रोजन डेजर्ट में असली दूध की जगह मिल्क सॉलिड्स या होल मिल्क पाउडर का उपयोग किया जाता है. उनका कहना है कि इनमें ऑक्सीडाइज्ड कोलेस्ट्रॉल मौजूद हो सकता है, जो ब्लड बेसल्स को नुकसान पहुंचाने और हृदय रोगों का जोखिम बढ़ाने से जुड़ा माना जाता है. यही वजह है कि ऐसे उत्पादों का नियमित सेवन स्वास्थ्य एक्सपर्ट की तरफ से उचित नहीं माना जाता.&amp;nbsp;
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फ्रोजन डेजर्ट में लिक्विड ग्लूकोज का भी इस्तेमाल
इसके अलावा फ्रोजन डेजर्ट में लिक्विड ग्लूकोज का भी इस्तेमाल किया जाता है, जो चीनी का एक प्रोसेस्ड रूप है. स्वाद और रंग को आकर्षक बनाने के लिए इनमें सिंथेटिक फ्लेवर और आर्टिफिशियल रंग भी मिलाए जाते हैं. कई उत्पादों में वेजिटेबल सोया प्रोटीन, स्टेबलाइजर्स, इमल्सीफायर्स और अन्य एडिटिव्स भी शामिल होते हैं. यही कारण है कि इन्हें अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड की श्रेणी में रखा जाता है.
कई शो में यह भी सामने आया है कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों का अधिक सेवन मोटापा, डायबिटीज, हार्ट रोग और खराब आंत हेल्थ जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ा सकता है. &amp;nbsp;एक्सपर्ट का कहना है कि जब लोग ऐसे उत्पादों पर अधिक निर्भर हो जाते हैं, तो वे पोषक तत्वों से भरपूर नेचुरल खाद्य पदार्थों का सेवन कम कर देते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 05 Jun 2026 20:30:13 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Frozen, Dessert, Health, Risks:, जानें, सेहत, के, लिए, कैसे, नुकसानदेह, है, फ्रोजन, डेजर्ट, न्यूट्रिशनिस्ट, ने, दी, बड़ी, चेतावनी</media:keywords>
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        <title>Exercise And Fertility: ज्यादा एक्सरसाइज से महिला&amp;पुरुषों में घट सकती है फर्टिलिटी, डॉक्टर ने दी बड़ी चेतावनी</title>
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        <description><![CDATA[ Can Excessive Exercise Affect Fertility: आजकल फिटनेस सिर्फ सेहत तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह एक लाइफस्टाइल और सोशल मीडिया ट्रेंड बन चुकी है. सिक्स-पैक एब्स, तेजी से वजन घटाने की चुनौतियां, मैराथन ट्रेनिंग और सख्त डाइट प्लान्स लोगों को आकर्षित कर रहे हैं. हालांकि रेगुलर एक्सरसाइज शरीर के लिए बेहद फायदेमंद है, लेकिन एक्सपर्ट का कहना है कि जब फिटनेस जुनून में बदल जाती है, तब इसका असर शरीर के कई महत्वपूर्ण कार्यों पर पड़ सकता है, जिसमें रिप्रोडक्टिवन क्षमता भी शामिल है.&amp;nbsp;
रिप्रोडक्टिव सिस्टम पर क्यों पड़ता है असर?
एक्सपर्ट के मुताबिक हमारा शरीर बेहद समझदार तरीके से काम करता है. जब उसे लगता है कि शरीर पर जरूरत से ज्यादा शारीरिक दबाव पड़ रहा है या ऊर्जा की कमी हो रही है, तो वह सबसे पहले उन प्रक्रियाओं को धीमा करना शुरू कर देता है जो जीवित रहने के लिए तुरंत जरूरी नहीं हैं. ऐसे में रिप्रोडक्टिव सिस्टम सबसे पहले प्रभावित होने वाले हिस्सों में से एक हो सकती है.
सही तरीके से किए गए एक्सरसाइज के क्या होते हैं फायदे?
डॉ. क्षितिज मुर्दिया ने TOI को बताया कि कि नियमित और संतुलित एक्सरसाइज कई तरह से फायदेमंद होता है. इससे मेटाबॉलिज्म बेहतर होता है, हार्मोन संतुलित रहते हैं और संपूर्ण स्वास्थ्य में सुधार आता है. खासकर मोटापा, डायबिटीज और अन्य लाइफस्टाइल समस्याओं से जूझ रहे लोगों में मध्यम स्तर का व्यायाम प्रजनन क्षमता को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है.
कब होने लगती है लोगों को दिक्कत?
समस्या तब शुरू होती है जब लोग ज्यादा एक्सरसाइज, सख्त डाइटिंग और फिटनेस लक्ष्यों का पीछा करने लगते हैं. डॉ. क्षितिज मुर्दिया के अनुसार, जरूरत से ज्यादा एक्सरसाइज और पर्याप्त आराम की कमी शरीर को लगातार तनाव की स्थिति में रखती है. लंबे समय तक ऐसा होने पर हार्मोनल संतुलन बिगड़ सकता है और प्रजनन क्षमता प्रभावित हो सकती है.
महिलाओं में क्या होता है असर?
अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ &amp;nbsp;से जुड़े रिसर्च भी बताते हैं कि अत्यधिक व्यायाम और कम ऊर्जा उपलब्धता &amp;nbsp;रिप्रोडक्टिव में प्रजनन हार्मोन और पीरियड्स को प्रभावित कर सकती है. जब शरीर को पर्याप्त कैलोरी नहीं मिलती, तो ब्रेन यह संकेत मान लेता है कि संसाधनों की कमी है। इसके बाद वह &amp;nbsp;रिप्रोडक्टिव से जुड़े हार्मोनों का उत्पादन कम कर सकता है.
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महिलाओं में इसका सबसे पहला संकेत अनियमित पीरियड्स या पीरियड्स का पूरी तरह बंद हो जाना हो सकता है. कई महिलाएं इसे फिटनेस की उपलब्धि समझ लेती हैं, जबकि यह शरीर के लिए चेतावनी का संकेत हो सकता है. डॉ. क्षितिज मुर्दिया बताते हैं कि ऐसी स्थिति में शरीर गर्भधारण के लिए खुद को तैयार नहीं मानता और ओव्यूलेशन की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है.&amp;nbsp;
पुरुषों में क्या होती है दिक्कत?
यह समस्या केवल महिलाओं तक सीमित नहीं है. पुरुषों में भी जरूरत से ज्यादा व्यायाम टेस्टोस्टेरोन के स्तर को कम कर सकता है. इसके अलावा ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और सूजन बढ़ने से स्पर्म की गुणवत्ता पर असर पड़ सकता है, जिससे प्रजनन क्षमता कमजोर हो सकती है. एक्सपर्ट का मानना है कि फिटनेस और फर्टिलिटी एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं. जरूरी है कि एक्सरसाइज संतुलित हो, पर्याप्त पोषण लिया जाए, नींद पूरी हो और शरीर को रिकवरी का समय मिले.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 05 Jun 2026 04:30:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Exercise, And, Fertility:, ज्यादा, एक्सरसाइज, से, महिला-पुरुषों, में, घट, सकती, है, फर्टिलिटी, डॉक्टर, ने, दी, बड़ी, चेतावनी</media:keywords>
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        <title>Financial Education For Children: बच्चों को बचपन से सिखाएं बचत का ये फॉर्मूला, कभी नहीं करेंगे फालतू फिजूलखर्ची</title>
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        <description><![CDATA[ How To Teach Children The Value Of Money: आज के दौर में पैसा खर्च करने के बहाने पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गए हैं. ऑनलाइन शॉपिंग, इंस्टेंट डिलीवरी और एक क्लिक पर मिलने वाली सुविधाओं ने खरीदारी को बेहद आसान बना दिया है. हालांकि यह सुविधा लोगों की जिंदगी को आसान बनाती है, लेकिन इसके कारण इंतजार करने और किसी लक्ष्य के लिए मेहनत करने की आदत भी कम होती जा रही है. बच्चों के लिए यह चुनौती और भी बड़ी है, क्योंकि वे अक्सर तुरंत मिलने वाली चीजों को ही प्राथमिकता देते हैं. एक्सपर्ट का मानना है कि ऐसी आदतें आगे चलकर आवेग में खरीदारी करने और फाइनेंशियल रूप से कमजोर बनने का कारण बन सकती हैं.
यही वजह है कि माता-पिता के लिए बच्चों को कम उम्र से ही पैसों की समझ देना और लक्ष्य तय करना सिखाना बेहद जरूरी हो जाता है. यह सीख केवल आर्थिक मामलों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि भविष्य में रिश्तों, करियर और जीवन के अन्य महत्वपूर्ण निर्णयों में भी मददगार साबित होती है.&amp;nbsp;
बच्चों को सीखाने का सबसे आसान तरीका
बच्चों को बचत के लिए प्रेरित करने का सबसे आसान तरीका है उन्हें कोई सार्थक लक्ष्य देना. जब बच्चे के मन में कोई खास खिलौना, साइकिल या पसंदीदा वस्तु होती है, तो वह उसे पाने के लिए बचत करने के लिए अधिक प्रेरित होता है. माता-पिता बच्चों को यह समझा सकते हैं कि हर इच्छा तुरंत पूरी नहीं होती और कुछ चीजों के लिए इंतजार करना पड़ता है. इससे बच्चों में धैर्य और जिम्मेदारी की भावना विकसित होती है.
जरूरत और इच्छा के बीच का अंतर
इसके साथ ही बच्चों को जरूरत और इच्छा के बीच का अंतर समझाना भी बेहद जरूरी है. जरूरतें वे चीजें होती हैं जो रोजमर्रा की जिंदगी के लिए आवश्यक हैं, जबकि इच्छाएं वे होती हैं जो खुशी तो देती हैं लेकिन उनके बिना भी काम चल सकता है. उदाहरण के तौर पर किराने की खरीदारी के दौरान माता-पिता बच्चों से पूछ सकते हैं कि कौन-सी चीज जरूरी है और कौन-सी बाद में भी खरीदी जा सकती है. इससे बच्चों में पैसों की सही कीमत समझने की आदत विकसित होती है.&amp;nbsp;
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पॉकेट मनी को लेकर क्या करें
पॉकेट मनी भी बच्चों को आर्थिक जिम्मेदारी सिखाने का एक प्रभावी माध्यम बन सकती है. यदि सही तरीके से उपयोग किया जाए तो यह केवल खर्च करने के लिए दिया गया पैसा नहीं, बल्कि एक सीखने का अवसर बन जाता है. पॉकेट मनी के जरिए बच्चे अपने फैसले खुद लेना सीखते हैं और उनके परिणाम भी समझते हैं. माता-पिता उन्हें बचत और खर्च के लिए अलग-अलग राशि रखने की आदत डाल सकते हैं.
&amp;nbsp;बचत करना सिखाना सबसे महत्वपूर्ण
एक्सपर्ट के अनुसार, बच्चों को खर्च करने से पहले बचत करना सिखाना सबसे महत्वपूर्ण फाइनेंशियल आदतों में से एक है. जब बच्चे उपहार, इनाम या पॉकेट मनी से मिलने वाले पैसों का कुछ हिस्सा बचाने लगते हैं, तो वे धीरे-धीरे समझते हैं कि छोटी-छोटी बचत भविष्य में बड़े फायदे दे सकती है. यही आदत उन्हें लक्ष्य तय करने, धैर्य रखने और समझदारी से आर्थिक निर्णय लेने में मदद करती है.
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        <pubDate>Wed, 03 Jun 2026 23:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Financial, Education, For, Children:, बच्चों, को, बचपन, से, सिखाएं, बचत, का, ये, फॉर्मूला, कभी, नहीं, करेंगे, फालतू, फिजूलखर्ची</media:keywords>
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        <title>Blue Bruises On Body: कोई चोट नहीं लगी फिर भी शरीर पर दिख रहे नीले निशान, क्या ये किसी बीमारी का संकेत?</title>
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        <description><![CDATA[ Causes Of Random Bruises On The Body: कई बार ऐसा होता है कि शरीर पर अचानक नीले या बैंगनी रंग के निशान दिखाई देने लगते हैं और व्यक्ति को याद भी नहीं रहता कि उसे कहीं चोट लगी हो. अक्सर लोग इसे सामान्य बात समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन कुछ मामलों में यह शरीर की किसी अंदरूनी समस्या का संकेत भी हो सकता है. इसलिए बार-बार बिना कारण पड़ने वाले निशानों को हल्के में लेना सही नहीं है. चलिए आपको इसके बारे में बताते हैं.&amp;nbsp;
क्यों पड़ते हैं निशान?
हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली बेवसाइट healthline की रिपोर्ट के अनुसार, &amp;nbsp;एक्सपर्ट के अनुसार, कभी-कभी बहुत ज्यादा शारीरिक मेहनत या भारी एक्सरसाइज करने से भी त्वचा के नीचे मौजूद छोटी- छोटी ब्लड वेसल्स प्रभावित हो सकती हैं. मसल्स पर अधिक दबाव पड़ने से ये नसें फट जाती हैं और त्वचा के नीचे खून जमा होने लगता है, जिससे नीले निशान बन जाते हैं. ऐसे मामलों में व्यक्ति को चोट का एहसास नहीं होता, लेकिन निशान दिखाई दे सकते हैं.&amp;nbsp;
दवा भी हो सकता है कारण
कुछ दवाएं भी इसकी वजह बन सकती हैं. खासतौर पर ब्लड थिनर, एस्पिरिन, इबुप्रोफेन और नेप्रोक्सेन जैसी दवाएं खून को जमने में अधिक समय लगाती हैं. जब खून सामान्य गति से नहीं जमता तो त्वचा के नीचे उसका रिसाव बढ़ जाता है और आसानी से नीले निशान बनने लगते हैं. अगर किसी नई दवा के बाद यह समस्या शुरू हुई है तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है.&amp;nbsp;
जरूरी पोषक तत्वों की कमी की तरफ इशारा
शरीर में कुछ जरूरी पोषक तत्वों की कमी भी इस समस्या को बढ़ा सकती है. विटामिन C की कमी से त्वचा और ब्लड वेसल्स कमजोर हो सकती हैं, जिससे मामूली दबाव पर भी निशान पड़ जाते हैं. वहीं आयरन की कमी खून की वेसल्स को प्रभावित करती है और विटामिन K की कमी खून के थक्के बनने की प्रक्रिया को धीमा कर सकती है. ऐसे में बिना वजह बार-बार नीले निशान दिखना पोषण संबंधी कमी का संकेत हो सकता है.&amp;nbsp;
ये भी होते हैं जिम्मेदार
इसके अलावा इम्यून थ्रोम्बोसाइटोपेनिया जैसी रेयर बीमारी में शरीर में प्लेटलेट्स की संख्या कम हो जाती है. प्लेटलेट्स खून को जमाने में अहम भूमिका निभाते हैं. इनकी कमी होने पर त्वचा पर अचानक नीले या बैंगनी निशान उभर सकते हैं. कुछ मामलों में बार-बार पड़ने वाले नीले निशान गंभीर बीमारियों जैसे नॉन-हॉजकिन लिम्फोमा या अन्य ब्लड संबंधी दिक्कतों का संकेत भी हो सकते हैं. हालांकि ऐसा कम होता है, लेकिन अगर इसके साथ अत्यधिक थकान, वजन घटना या बार-बार खून बहने जैसी समस्याएं भी हों तो जांच कराना जरूरी हो जाता है.
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कब डॉक्टर को दिखाना चाहिए?
अगर शरीर पर बिना चोट के बार-बार नीले निशान दिखाई दें, निशान का आकार लगातार बढ़ रहा हो, नाक से बार-बार खून आता हो या खून बहना आसानी से बंद न हो रहा हो, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए. सही समय पर जांच कराने से किसी गंभीर बीमारी का पता शुरुआती चरण में लगाया जा सकता है और समय रहते इलाज शुरू किया जा सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 03 Jun 2026 23:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>Heart Disease: इरेक्टाइल डिस्फंक्शन हो सकता है दिल की बीमारी का संकेत, कभी नजरअंदाज न करें ये साइन</title>
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        <description><![CDATA[ Can Erectile Dysfunction Be A Sign Of Heart Disease: उम्र बढ़ने के साथ शरीर कई तरह के संकेत देने लगता है. अक्सर पुरुष थकान, खराब नींद, खर्राटे या यौन स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानियों को सामान्य उम्र बढ़ने का हिस्सा मानकर नजरअंदाज कर देते हैं. लेकिन एक्सपर्ट का कहना है कि ये समस्याएं सिर्फ रोजमर्रा की दिक्कतें नहीं हैं, बल्कि कई बार हार्ट और ब्लड वेसल्स से जुड़ी गंभीर बीमारियों की शुरुआती चेतावनी भी हो सकती हैं.&amp;nbsp;
25 वर्षों का अनुभव रखने वाले कार्डियोथोरेसिक सर्जन डॉ. जेरेमी लंदन ने हाल ही में एक इंस्टाग्राम वीडियो में ऐसे चार संकेतों के बारे में बताया, जिन्हें पुरुष अक्सर हल्के में लेते हैं. उनके मुताबिक, ये लक्षण भविष्य में होने वाली हार्ट संबंधी समस्याओं का संकेत हो सकते हैं.&amp;nbsp;
इरेक्टाइल डिस्फंक्शन को क्यों नहीं लेना चाहिए हल्के में?
सबसे महत्वपूर्ण संकेतों में से एक है इरेक्टाइल डिस्फंक्शन . डॉ. लंदन के अनुसार, इसे केवल यौन हेल्थ की समस्या समझना बड़ी गलती हो सकती है. दरअसल, इरेक्शन से जुड़ी आर्टरीज शरीर की सबसे पतली ब्लड वेसल्स में शामिल होती हैं. जब इनमें ब्लॉकेज या ब्लड फ्लो में कमी आने लगती है, तो इसका असर सबसे पहले यौन स्वास्थ्य पर दिखाई दे सकता है. यही वजह है कि कई बार इरेक्टाइल डिस्फंक्शन, सीने में दर्द या हार्ट अटैक जैसे लक्षण आने से कई साल पहले ही दिल की बीमारी का संकेत दे देता है. एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि यदि अचानक इरेक्टाइल डिस्फंक्शन की समस्या शुरू हो जाए तो केवल दवा लेने के बजाय हार्ट की जांच भी करानी चाहिए.&amp;nbsp;
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लो टेस्टोस्टेरोन भी एक वजह
डॉ. लंदन ने दूसरा महत्वपूर्ण संकेत लो टेस्टोस्टेरोन बताया. बहुत से पुरुष इसे बढ़ती उम्र का सामान्य असर मान लेते हैं, लेकिन उनके अनुसार इसके पीछे पेट के आसपास बढ़ती चर्बी, खराब नींद और फिजिकल एक्टिविटी की कमी जैसी वजहें हो सकती हैं. यदि इन कारणों को समय रहते नियंत्रित कर लिया जाए तो हार्मोनल स्वास्थ्य में सुधार संभव है. इसलिए किसी भी दवा या सप्लीमेंट की ओर बढ़ने से पहले लाइफस्टाइल में बदलाव करना जरूरी है.
कब शुरू करना चाहिए हार्ट का ध्यान रखना?
तीसरा संकेत है दिल की बीमारी का पुरुषों में जल्दी दिखाई देना. डॉ. लंदन बताते हैं कि महिलाओं को मेनोपॉज तक एस्ट्रोजन हार्मोन से हार्ट सुरक्षा मिलती रहती है, जबकि पुरुषों में यह सुरक्षा नहीं होती. यही कारण है कि पुरुषों में हार्ट रोग महिलाओं की तुलना में लगभग एक दशक पहले विकसित हो सकता है. इसलिए हार्ट की सेहत का ध्यान 60 साल की उम्र में नहीं, बल्कि 30 और 40 की उम्र से ही शुरू कर देना चाहिए.&amp;nbsp;
तेज खर्राटे भी एक तरह के सिग्नल
चौथा संकेत है स्लीप एपनिया. अगर किसी व्यक्ति को तेज खर्राटे आते हैं, रात में बार-बार नींद टूटती है या पर्याप्त नींद लेने के बाद भी थकान महसूस होती है, तो यह स्लीप एपनिया का संकेत हो सकता है. डॉ. लंदन चेतावनी देते हैं कि यह स्थिति हाई ब्लड प्रेशर, हार्ट रिद्म की गड़बड़ी और हार्ट पर अतिरिक्त दबाव बढ़ा सकती है. चिंता की बात यह है कि बड़ी संख्या में पुरुष इस समस्या से पीड़ित होते हैं, लेकिन उन्हें इसका पता ही नहीं होता.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 03 Jun 2026 23:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Tea And Health: किस उम्र के लोगों को कितनी पीनी चाहिए चाय? बीमार होने से पहले जानें हिसाब&amp;किताब</title>
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        <description><![CDATA[ How Much Tea Should Different Age Groups Drink: भारत में सुबह की शुरुआत अक्सर चाय के बिना अधूरी मानी जाती है. किसी को बेड टी पसंद होती है, तो कोई दिनभर में कई कप चाय पी जाता है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आपकी उम्र के हिसाब से कितनी चाय पीना सही है? क्योंकि जरूरत से ज्यादा चाय पीने की आदत धीरे-धीरे शरीर पर बुरा असर डाल सकती है.
चाय में हेल्दी विकल्प
हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली वेबसाइट healthline के अनुसार, चाय में मौजूद कैफीन और दूसरे कंपाउंड्स शरीर को एनर्जी देने के साथ-साथ नुकसान भी पहुंचा सकते हैं, खासकर तब जब इसकी मात्रा जरूरत से ज्यादा हो जाए. हाल के वर्षों में ग्रीन टी को हेल्दी ड्रिंक के तौर पर काफी लोकप्रियता मिली है, क्योंकि इसमें कैटेचिन नाम के एंटीऑक्सीडेंट्स पाए जाते हैं. रिसर्च में इन्हें हार्ट डिजीज, टाइप-2 डायबिटीज और कुछ तरह के कैंसर के खतरे को कम करने से जोड़ा गया है.&amp;nbsp;
स्टडीज के मुताबिक, ग्रीन टी मेटाबॉलिज्म बढ़ाने और फैट बर्निंग में भी मदद कर सकती है. रिसर्च में पाया गया कि नियमित रूप से ग्रीन टी पीने वाले लोगों में वजन कंट्रोल और ओवरऑल हेल्थ बेहतर देखी गई.&amp;nbsp;
एक दिन में कितना चाय पीना चाहिए?
लेकिन सवाल यह है कि कितनी चाय सही मानी जाती है? एक्सपर्ट्स के अनुसार, यह उम्र, हेल्थ कंडीशन और लाइफस्टाइल पर निर्भर करता है. आमतौर पर किशोरों और युवाओं को दिनभर में 1 से 2 कप से ज्यादा कैफीन वाली चाय नहीं पीनी चाहिए. वहीं स्वस्थ वयस्कों के लिए 3 से 5 कप ग्रीन टी तक फायदेमंद मानी गई है. कई स्टडीज में यह मात्रा हेल्थ बेनिफिट्स के लिए बेहतर बताई गई है.
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हमें क्या हो सकता है नुकसान?
हालांकि डॉक्टर चेतावनी देते हैं कि जरूरत से ज्यादा चाय पीना शरीर के लिए नुकसानदायक हो सकता है. बहुत अधिक कैफीन लेने से बेचैनी, नींद की कमी, सिरदर्द, पेट में गड़बड़ी और एंग्जायटी जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं. &amp;nbsp;प्रेग्नेंट महिलाओं को खासतौर पर कैफीन की मात्रा पर ध्यान देने की सलाह दी जाती है. रिसर्च के मुताबिक, जरूरत से ज्यादा कैफीन गर्भावस्था के दौरान जोखिम बढ़ा सकती है. एक्सपर्ट्स मानते हैं कि पूरे दिन में 300 मिलीग्राम से ज्यादा कैफीन नहीं लेना चाहिए.&amp;nbsp;
किन बातों का रखना चाहिए ध्यान?
हेल्थ एक्सपर्ट्स यह भी कहते हैं कि चाय पीने का समय भी मायने रखता है. खाली पेट ज्यादा चाय पीने से एसिडिटी और डइजेशन संबंधी समस्याएं हो सकती हैं. वहीं खाने के तुरंत बाद चाय पीने से शरीर में आयरन का अब्जार्व कम हो सकता है. डॉक्टर्स के मुताबिक, चाय पूरी तरह छोड़ने की जरूरत नहीं है, लेकिन इसकी मात्रा और समय का ध्यान रखना बेहद जरूरी है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 02 Jun 2026 19:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Diabetes Problems: यूपी में शुगर का कहर, हर 5वां पुरुष और 6ठी महिला चपेट में, सर्वे में हुआ चौंकाने वाला खुलासा</title>
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        <description><![CDATA[ Obesity And Diabetes Rising Across India: भारत इस समय एक ऐसे हेल्थ संकट का सामना कर रहा है, जहां एक तरफ मोटापा और डायबिटीड तेजी से बढ़ रहे हैं, तो दूसरी ओर कुपोषण अब भी बड़ी चुनौती बना हुआ है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण- एनएफएचएस-6, 2023-24 के ताजा आंकड़े बताते हैं कि देश में पोषण से जुड़ी दो विपरीत समस्याएं एक साथ मौजूद हैं. कई राज्यों में लोग अधिक वजन और मोटापे से जूझ रहे हैं, जबकि उसी आबादी का एक बड़ा हिस्सा अब भी कुपोषण का शिकार है.
मोटापा के मामले में बढोतरी
सर्वे के अनुसार, 15 से 49 वर्ष की आयु वर्ग की 30.7 प्रतिशत महिलाएं और 27.3 प्रतिशत पुरुष अब अधिक वजन या मोटापे की कैटेगरी में आते हैं. एनएफएचएस-5 की तुलना में यह वृद्धि काफी तेज है. खासतौर पर शहरी क्षेत्रों में स्थिति ज्यादा गंभीर दिखाई दे रही है, जहां लगभग 43 प्रतिशत महिलाएं और 36.3 प्रतिशत पुरुष मोटापे या अधिक वजन से प्रभावित हैं.&amp;nbsp;
मैलोन्यूट्रिशन की समस्या भी बढ़ी
दूसरी तरफ, कुपोषण की समस्या खत्म होने के बजाय और बढ़ती दिखाई दे रही है. रिपोर्ट के मुताबिक, देश में लगभग हर पांचवां एडल्ट अब भी कम वजन की श्रेणी में आता है. पुरुषों में कम वजन की दर 16.2 प्रतिशत से बढ़कर 19.7 प्रतिशत हो गई है, जबकि महिलाओं में यह 18.7 प्रतिशत से बढ़कर 19.7 प्रतिशत तक पहुंच गई है. यह स्थिति बताती है कि पोषण संबंधी असमानताएं अभी भी बरकरार हैं.&amp;nbsp;
डायबिटीज के मामले भी बढ़े
एनएफएचएस-6 ने डायबिटीज को लेकर भी चिंता बढ़ा दी है. 15 वर्ष से अधिक उम्र की 17.8 प्रतिशत महिलाओं में ब्लड शुगर का स्तर सामान्य से अधिक पाया गया या वे डायबिटीज की दवा ले रही थीं. पुरुषों में यह आंकड़ा 20.9 प्रतिशत दर्ज किया गया, यानी हर पांचवां पुरुष डायबिटीज या उससे जुड़ी दवाओं पर निर्भर है. यह संख्या पिछले सर्वेक्षण की तुलना में काफी बढ़ी है. रिपोर्ट में कई राज्यों में स्थिति और अधिक चिंताजनक दिखाई दी. पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और तमिलनाडु में मोटापे के मामलों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है. वहीं बिहार, झारखंड, राजस्थान, असम, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में कुपोषण की समस्या बढ़ती हुई दिखाई दी. उत्तर प्रदेश में भी मोटापा, कुपोषण और डायबिटीज तीनों के मामलों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है.&amp;nbsp;
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उत्तर प्रदेश की क्या स्थिति
राज्य में डायबिटीज की रफ्तार राष्ट्रीय औसत से कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ रही है. हालात ऐसे हैं कि अब प्रदेश का लगभग हर पांचवां पुरुष और हर छठी महिला डायबिटीज से प्रभावित है. सर्वे के मुताबिक, पूरे देश में महिलाओं के बीच मधुमेह बढ़ने की दर 4.3 प्रतिशत दर्ज की गई है, लेकिन उत्तर प्रदेश में यह आंकड़ा 5.5 प्रतिशत तक पहुंच चुका है. पुरुषों में भी स्थिति चिंताजनक है. जहां राष्ट्रीय स्तर पर वृद्धि दर 5.3 प्रतिशत है, वहीं उत्तर प्रदेश में यह करीब 8 प्रतिशत दर्ज की गई है.&amp;nbsp;
हाई बीपी के मामलों में गिरावट
बीपी के मामलों में कुछ राहत जरूर देखने को मिली है. महिलाओं और पुरुषों दोनों में हाई बीपी की समस्या की दर में हल्की गिरावट दर्ज की गई है, लेकिन इसके बावजूद देश का लगभग हर पांचवा एडल्ट अब भी हाई ब्लड प्रेशर से प्रभावित है. एक्सपर्ट के अनुसार यह हार्ट रोग, स्ट्रोक और किडनी से जुड़ी गंभीर बीमारियों का बड़ा जोखिम कारक बना हुआ है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 02 Jun 2026 19:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>Obesity Myths: कम खाने से नहीं घटता वजन, मोटापे से जुड़े इन बड़े मिथकों का एक्सपर्ट ने बताया पूरा सच</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/obesity-myths-कम-खाने-से-नहीं-घटता-वजन-मोटापे-से-जुड़े-इन-बड़े-मिथकों-का-एक्सपर्ट-ने-बताया-पूरा-सच</link>
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        <description><![CDATA[ Common Obesity Myths Explained By Experts: मोटापा दुनिया की सबसे गलत समझी जाने वाली हेल्थ समस्याओं में से एक है. इसकी वजह यह नहीं है कि साइंस के पास जवाब नहीं हैं, बल्कि समस्या यह है कि वर्षों से चली आ रही गलत धारणाओं, भ्रामक डाइट सलाह और सामाजिक पूर्वाग्रहों ने सही जानकारी को पीछे धकेल दिया है. वॉय इंडिया (पूर्व में अर्लीफिट) की सह-संस्थापक और सीओओ सलोनी पालीवाल के अनुसार, मोटापे को लेकर कई ऐसे मिथक हैं जो न केवल गलत हैं, बल्कि लोगों के स्वास्थ्य को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं.
क्या लाइफस्टाइल की वजह से ऐसा होता है?
सबसे बड़ा भ्रम यह है कि मोटापा केवल व्यक्ति की लाइफस्टाइल का परिणाम होता है. जबकि रिसर्च बताते हैं कि इसके पीछे जैनेटिक, हार्मोन, नींद, तनाव, आंतों के माइक्रोबायोम और पर्यावरण जैसे कई कारक मिलकर काम करते हैं. &amp;nbsp;यही कारण है कि एक जैसी डाइट और समान शारीरिक गतिविधि के बावजूद दो लोगों का वजन अलग-अलग हो सकता है.&amp;nbsp;
क्या कम खाने से यह ठीक हो जाता है?
दूसरा आम मिथक है कि &quot;कम खाओ और ज्यादा चलो-फिरो&quot; ही इसका समाधान है. सलोनी पालीवाल बताती हैं कि यह सलाह पूरी तरह गलत नहीं है, लेकिन मोटापे जैसी जटिल और लंबे समय तक चलने वाली बीमारी के इलाज के लिए पर्याप्त भी नहीं है. भूख को नियंत्रित करने वाले हार्मोन और शरीर की मेटाबॉलिज्म इस प्रक्रिया को कहीं अधिक मुश्किल बनाते हैं.
क्या वजन कम न होना आपकी जिम्मेदारी है?
इसी तरह कई लोग मानते हैं कि वजन कम न कर पाने के पीछे इच्छाशक्ति की कमी जिम्मेदार होती है. जबकि घ्रेलिन, लेप्टिन, इंसुलिन और कॉर्टिसोल जैसे हार्मोन भूख और खाने की इच्छा को प्रभावित करते हैं. ऐसे में केवल और मेहनत करो कहना समस्या का समाधान नहीं है. एक्सपर्ट का कहना है कि हर मोटापा बाहर से दिखाई नहीं देताच कई लोगों में शरीर के अंदर अंगों के आसपास चर्बी जमा होती है, जिसे विसरल ओबेसिटी कहा जाता है. दक्षिण एशियाई आबादी में यह जोखिम विशेष रूप से अधिक देखा जाता है. इसलिए केवल वजन या बीएमआई के आधार पर स्वास्थ्य का आकलन करना पर्याप्त नहीं माना जाता.&amp;nbsp;
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क्या एक बार वजन घटने के बाद दोबारा बढ़ सकता है?
एक और बड़ी गलतफहमी यह है कि एक बार वजन घट जाने के बाद वह हमेशा कम बना रहता है. रिसर्च बताते हैं कि शरीर अपने पुराने वजन को बनाए रखने की कोशिश करता है, जिससे समय के साथ वजन दोबारा बढ़ने की संभावना रहती है. इसी वजह से मोटापे के लिए लंबे समय तक मेडिकल सहायता की जरूरत पड़ सकती है. जीएलपी-1 दवाओं जैसे सेमाग्लूटाइड और टिरजेपाटाइड को लेकर भी कई मिसकनसेप्शन हैं. हालांकि क्लीनिकल ट्रायल्स में इन दवाओं ने अच्छे परिणाम दिखाए हैं और ये भूख तथा मेटाबॉलिज्म को नियंत्रित करने में मदद करती हैं. एक्सपर्ट के अनुसार, इनका उपयोग आसान रास्ता चुनना नहीं, बल्कि सही तरीके से इलाज करवाना होता है.&amp;nbsp;
क्या मोटापा कोई बीमारी है?
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन, अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन और दुनिया की प्रमुख एंडोक्राइनोलॉजी संस्थाएं मोटापे को एक क्रॉनिक बीमारी मानती हैं. यह टाइप-2 डायबिटीज, हृदय रोग, स्लीप एपनिया और कई प्रकार के कैंसर जैसी 200 से अधिक बीमारियों से जुड़ी हुई है. इसलिए मोटापे को केवल वजन बढ़ने की समस्या मानना सही नहीं है, बल्कि इसे एक गंभीर स्वास्थ्य स्थिति के रूप में समझना और समय रहते उपचार लेना जरूरी है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 02 Jun 2026 03:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>Late Night Eating Heart Health Side Effects: रात 9 बजे के बाद खाते हैं खाना, दिल को हो सकता है बड़ा नुकसान</title>
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        <description><![CDATA[ Late Night Eating Heart Health Side Effects : आज की बिजी और खराब लाइफस्टाइल में देर रात खाना खाना आम बात बन गई है. ऑफिस का काम, ट्रैफिक, मोबाइल और टीवी के बढ़ते यूज के कारण कई लोग रात 9 बजे के बाद ही डिनर कर पाते हैं. कुछ लोगों के लिए तो 10 से 11 बजे खाना खाना रोजमर्रा की आदत बन चुकी है.
यह आदत मामूली लग सकती है, लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि देर रात खाना खाने का असर सिर्फ पाचन तंत्र पर ही नहीं बल्कि दिल की सेहत पर भी पड़ सकता है. ऐसे में बहुत देर से खाना खाने पर शरीर की प्राकृतिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है, जिससे लंबे समय में कई स्वास्थ्य समस्याएं पैदा होने का खतरा बढ़ जाता है. ऐसे में आइए जानते हैं कि रात 9 बजे के बाद खाना खाने से दिल को क्या नुकसान हो सकता है.&amp;nbsp;
शरीर की बॉडी क्लॉक कैसे करती है काम?
हमारे शरीर में एक नेचुरल 24 घंटे की बॉडी क्लॉक होती है, जिसे सर्कैडियन रिदम कहा जाता है. यही क्लॉक यह तय करती है कि शरीर कब जागेगा, कब सोएगा, कब हार्मोन रिलीज होंगे और भोजन को कैसे पचाया जाएगा. रात होने पर शरीर की एक्टिविटी धीरे-धीरे कम होने लगती हैं. ब्लड प्रेशर नीचे आने लगता है और शरीर खुद को अगले दिन के लिए तैयार करता है, लेकिन अगर इस दौरान भारी खाना खा कर लिया जाए तो शरीर को आराम मिलने के बजाय अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती है.&amp;nbsp;&amp;nbsp;देर रात खाना खाने से दिल को क्या नुकसान हो सकता है?&amp;nbsp;विशेषज्ञों का कहना है कि देर रात खाना खाने से पाचन तंत्र उस समय भी एक्टिव रहता है जब शरीर आराम की तैयारी कर रहा होता है. इससे शरीर का सामान्य संतुलन बिगड़ सकता है. रात में देर से खाना खाने से ब्लड प्रेशर लंबे समय तक ऊंचा रह सकता है. इसके अलावा शरीर में शुगर को कंट्रोल करने की क्षमता भी प्रभावित हो सकती है. समय के साथ यह आदत हाई ब्लड प्रेशर, टाइप-2 डायबिटीज और हार्ट की बीमारियों के खतरे को बढ़ा सकती है.&amp;nbsp;&amp;nbsp;देर रात खाने और स्ट्रोक का क्या है संबंध?
कुछ अध्ययनों में यह पाया गया है कि जो लोग रोजाना देर रात खाना खाते हैं, उनमें स्ट्रोक का खतरा ज्यादा हो सकता है. इसका एक कारण यह माना जाता है कि देर रात खाने से शरीर की बॉडी क्लॉक के काम करने में रुकावट आ सकती है और हार्ट से जुड़ी कई प्रक्रियाओं पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, हालांकि सिर्फ एक-दो बार देर से खाना खाने से कोई बड़ा नुकसान नहीं होता है, लेकिन अगर यह रोज की आदत बन जाए तो जोखिम बढ़ सकता है.&amp;nbsp;
नींद की क्वालिटी भी हो सकती है खराब
देर रात खाना खाने का असर नींद पर भी पड़ता है. खाना खाने के तुरंत बाद सोने से एसिडिटी और एसिड रिफ्लक्स की समस्या हो सकती है. इसमें पेट का एसिड खाने की नली की तरफ आने लगता है, जिससे सीने में जलन और बेचैनी महसूस होती है, जब नींद बार-बार टूटती है या अच्छी नींद नहीं आती तो इसका सीधा असर दिल की सेहत पर पड़ सकता है. खराब नींद शरीर में सूजन बढ़ा सकती है और तनाव वाले हार्मोन्स का स्तर भी बढ़ा सकती है.&amp;nbsp;
रात में शरीर को क्यों चाहिए आराम?
दिनभर काम करने के बाद रात का समय शरीर की मरम्मत और रिकवरी के लिए बेहद जरूरी होता है. इसी दौरान शरीर के कई जरूरी अंग खुद को रिचार्ज करते हैं. सोते समय ब्लड प्रेशर सामान्य रूप से कम हो जाता है, तनाव हार्मोन घटने लगते हैं और शरीर को आराम मिलता है, लेकिन अगर रात में भारी खाना खाया जाए तो शरीर को खाना पचाने के लिए अतिरिक्त एनर्जी लगानी पड़ती है, जिससे रिकवरी प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है.&amp;nbsp;
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किन लोगों को ज्यादा सावधान रहने की जरूरत है?
कुछ लोगों के लिए देर रात खाना खाना ज्यादा नुकसानदायक साबित हो सकता है. &amp;nbsp;इनमें हाई ब्लड प्रेशर के मरीज, डायबिटीज से पीड़ित लोग. मोटापे से जूझ रहे लोग, हार्ट हेल्थ के जोखिम वाले व्यक्ति और कोलेस्ट्रॉल की समस्या वाले लोग शामिल हैं. इन लोगों को अपने डिनर के समय और खाने की मात्रा पर विशेष ध्यान देना चाहिए.&amp;nbsp;
रात का खाना किस समय खाना सबसे बेहतर माना जाता है?
स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह है कि रात का खाना शाम 7 से 8 बजे के बीच कर लेना चाहिए. इसके अलावा डिनर और सोने के समय के बीच कम से कम 2 से 3 घंटे का अंतर होना चाहिए. इससे खाने को पचने के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है और नींद भी बेहतर आती है. रात का खाना हल्का और संतुलित रखना बेहतर माना जाता है. डिनर में ज्यादा तला-भुना, ज्यादा तेल वाला या बहुत ज्यादा मीठा खाना खाने से बचना चाहिए.रात के खाने में दाल और सब्जियां, सलाद, मल्टीग्रेन रोटी, हल्की खिचड़ी, सूप और दही शामिल कर सकते हैं.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 02 Jun 2026 03:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Pankaj Bhadouria Breast Cancer: मास्टरशेफ विनर पंकज भदौरिया को ब्रेस्ट कैंसर, 50 के पार महिलाओं में क्यों बढ़ जाता है खतरा?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/pankaj-bhadouria-breast-cancer-मास्टरशेफ-विनर-पंकज-भदौरिया-को-ब्रेस्ट-कैंसर-50-के-पार-महिलाओं-में-क्यों-बढ़-जाता-है-खतरा</link>
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        <description><![CDATA[ MasterChef Winner Pankaj Bhadouria Breast Cancer : मास्टरशेफ इंडिया सीजन 1 की विजेता और मशहूर सेलिब्रिटी शेफ पंकज भदौरिया ने हाल ही में सोशल मीडिया पर एक इमोशनल पोस्ट शेयर कर बताया कि उन्हें ब्रेस्ट कैंसर का पता चला है. इस पोस्ट के सामने आने के बाद उनके फैंस में चिंता बढ़ गई है. पंकज भदौरिया ने लोगों से अपनी सेहत के लिए स्पोर्ट की अपील भी की है.&amp;nbsp;
ब्रेस्ट कैंसर दुनिया भर में महिलाओं में पाए जाने वाले सबसे आम कैंसरों में से एक है. हर साल लाखों महिलाएं इस बीमारी की चपेट में आती हैं, हालांकि यह बीमारी किसी भी उम्र में हो सकती है, लेकिन 50 साल की उम्र के बाद इसका खतरा काफी बढ़ जाता है. डॉक्टरों के अनुसार, उम्र बढ़ने के साथ शरीर में होने वाले हार्मोनल और जैविक बदलाव इसकी बड़ी वजह बनते हैं. ऐसे में आइए जानते हैं कि आखिर ब्रेस्ट कैंसर क्या है, 50 साल के बाद महिलाओं में इसका खतरा ज्यादा क्यों हो जाता है और इसके शुरुआती लक्षण क्या हैं.&amp;nbsp;
क्या होता है ब्रेस्ट कैंसर?
ब्रेस्ट कैंसर एक ऐसी बीमारी है, जिसमें ब्रेस्ट की कुछ कोशिकाएं असामान्य तरीके से बढ़ने लगती हैं. समय के साथ ये कोशिकाएं एक गांठ या ट्यूमर का रूप ले सकती हैं. अगर समय रहते इसका इलाज न कराया जाए तो कैंसर कोशिकाएं शरीर के दूसरे हिस्सों तक भी फैल सकती हैं. यही वजह है कि डॉक्टर शुरुआती पहचान और समय पर इलाज को बेहद जरूरी मानते हैं.&amp;nbsp;
50 &amp;nbsp;के बाद महिलाओं में इसका खतरा ज्यादा क्यों हो जाता है?
1. विशेषज्ञों के मुताबिक उम्र बढ़ने के साथ ब्रेस्ट कैंसर का जोखिम भी बढ़ता जाता है. खासतौर पर 50 वर्ष की उम्र के बाद महिलाओं के शरीर में कई ऐसे बदलाव होते हैं जो कैंसर के खतरे को बढ़ा सकते हैं.&amp;nbsp;
2.महिलाओं में एक उम्र के बाद पीरियड्स बंद हो जाते हैं, जिसे मेनोपॉज कहा जाता है. इस दौरान शरीर में हार्मोन का संतुलन बदलने लगता है. हार्मोन में होने वाले अंतर ब्रेस्ट के टिशू को प्रभावित कर सकते हैं और असामान्य कोशिकाओं के विकसित होने का खतरा बढ़ा सकते हैं. यही कारण है कि मेनोपॉज के बाद ब्रेस्ट कैंसर के मामले ज्यादा देखने को मिलते हैं.
3. हमारे शरीर की कोशिकाएं लगातार काम करती रहती हैं.बढ़ती उम्र के साथ डीएनए में छोटी-छोटी परेशानियां जमा होने लगती हैं.सामान्य परिस्थितियों में शरीर इनकी मरम्मत कर लेता है, लेकिन उम्र बढ़ने पर यह क्षमता कमजोर होने लगती है. इससे खराब कोशिकाओं के तेजी से बढ़ने और कैंसर में बदलने का खतरा बढ़ जाता है.&amp;nbsp;
4. 50 वर्ष के बाद महिलाओं में वजन बढ़ने की समस्या आम हो जाती है.विशेषज्ञों के अनुसार शरीर में अतिरिक्त चर्बी एस्ट्रोजन हार्मोन के स्तर को बढ़ा सकती है. जब शरीर में फैट ज्यादा होता है तो सूजन की स्थिति भी बनी रहती है, जो कैंसर कोशिकाओं के बढ़ने के लिए तैयार कर सकती है.&amp;nbsp;
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किन महिलाओं को ज्यादा सावधान रहने की जरूरत है?
कुछ महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर का खतरा सामान्य से ज्यादा हो सकता है. जैसे परिवार में किसी को पहले ब्रेस्ट कैंसर रहा हो, &amp;nbsp;ज्यादा वजन या मोटापे की समस्या, फिजिकल एक्टिविटी की कमी, देर से मेनोपॉज होना, अस्वस्थ खानपान और लाइफस्टाइल, धूम्रपान और शराब का सेवन इन स्थितियों में नियमित जांच कराना और स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देना जरूरी हो जाता है.&amp;nbsp;
ब्रेस्ट कैंसर के शुरुआती लक्षण क्या हैं?
ब्रेस्ट कैंसर के शुरुआती चरण में अक्सर दर्द नहीं होता, इसलिए कई महिलाएं इसके संकेतों को नजरअंदाज कर देती हैं. हालांकि कुछ लक्षण ऐसे हैं जिन्हें बिल्कुल भी हल्के में नहीं लेना चाहिए. &amp;nbsp;जैसे स्तन या बगल में गांठ, स्तन के आकार में बदलाव, स्किन में बदलाव, निप्पल में बदलाव, निप्पल से असामान्य डिसचार्ज. डॉक्टरों का कहना है कि ब्रेस्ट कैंसर का जितना जल्दी पता चल जाता है, उसका इलाज उतना ही आसान और सफल होता है. शुरुआती अवस्था में कैंसर आमतौर पर ब्रेस्ट तक ही सीमित रहता है. ऐसे में सर्जरी, दवाओं और अन्य ट्रीटमेंट से बचाव किया जा सकता है.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 02 Jun 2026 03:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>Best Time To Drink Tea: सुबह की चाय या शाम की चाय? जानिए आपकी सेहत के लिए कौन&amp;सा समय है सबसे बेहतर</title>
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        <description><![CDATA[ Best Time To Drink Tea: कई लोगों का दिन चाय के बिना शुरू ही नहीं होता. सुबह आंख खुलते ही सबसे पहले चाय की याद आती है, तो कुछ लोग शाम की थकान दूर करने के लिए चाय का सहारा लेते हैं. भारत में चाय सिर्फ एक पेय नहीं, बल्कि लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा माना जाता है. घर की बातचीत हो, ऑफिस का ब्रेक हो या दोस्तों की मुलाकात, चाय हर मौके पर साथ नजर आती है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि चाय पीने का सही समय कौन-सा है? सुबह की चाय ज्यादा फायदेमंद होती है या शाम की? बता दें कि इस सवाल का जवाब आपकी जरूरत और शरीर की स्थिति पर निर्भर करता है.&amp;nbsp;
सुबह की चाय देती है एनर्जी
विशेषज्ञों के मुताबिक सुबह की चाय शरीर को जगाने और दिमाग को सक्रिय करने में मदद करती है. चाय में मौजूद कैफीन आपको तरोताजा महसूस करा सकती है और काम पर ध्यान लगाने में मदद कर सकती है. वहीं ग्रीन टी में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स शरीर के लिए फायदेमंद माने जाते हैं और यह मेटाबॉलिज्म को बेहतर बनाने में भी मदद कर सकते हैं. साथ ही काली चाय और मसाला चाय भी सुबह ऊर्जा देने का काम करती हैं.&amp;nbsp;
लेकिन सिर्फ चाय पीना ही नहीं, उसे सही तरीके से पीना भी जरूरी है. डाइटिशियन के अनुसार, सुबह खाली पेट बहुत कड़क या तेज चाय नहीं पीनी चाहिए. ऐसा करने से कुछ लोगों को पेट में जलन, गैस या बेचैनी महसूस हो सकती है. इसलिए चाय को नाश्ते या किसी हल्के स्नैक के साथ लेना ही बेहतर माना जाता है. सुबह के समय अदरक वाली चाय, नींबू वाली चाय या दूसरी हर्बल चाय भी अच्छी मानी जाती हैं. ये शरीर को हाइड्रेट रखने के साथ-साथ पाचन को भी बेहतर बनाने में मदद कर सकती हैं. इस तरह अगर चाय सही समय और सही तरीके से पी जाए तो यह दिन की अच्छी शुरुआत का हिस्सा बन सकती है.&amp;nbsp;
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शाम की चाय सुकून देती है
दिनभर की भागदौड़ के बाद शाम की चाय कई लोगों के लिए आराम का जरिया होती है. लेकिन विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि शाम के समय ज्यादा कैफीन वाली चाय पीने से बचना चाहिए. साथ ही देर शाम कड़क चाय पीने से नींद पर असर पड़ सकता है और कुछ लोगों को बेचैनी भी महसूस हो सकती है. &amp;nbsp;ऐसे में हर्बल चाय बेहतर विकल्प मानी जाती है. वहीं कैमोमाइल टी, पेपरमिंट टी, लैवेंडर टी और तुलसी की चाय शाम के समय पी जा सकती है. इसके अलावा कैमोमाइल टी शरीर को आराम देने और अच्छी नींद में मदद कर सकती है. साथ ही पेपरमिंट टी पाचन को बेहतर बनाने और पेट फूलने जैसी समस्या को कम करने में मददगार मानी जाती है. तुलसी की चाय तनाव कम करने और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाने में सहायक हो सकती है.&amp;nbsp;
आखिर चाय पीने का सबसे अच्छा समय कौन-सा है?
विशेषज्ञों का कहना है कि इसका कोई एक जवाब नहीं है. अगर आपको सुबह काम के लिए ऊर्जा और फोकस चाहिए तो सुबह की चाय आपके लिए बेहतर हो सकती है. वहीं अगर आप दिनभर की थकान के बाद आराम चाहते हैं तो शाम की हर्बल चाय अच्छा विकल्प हो सकती है. &amp;nbsp;बस सबसे जरूरी बात यह है कि चाय को सीमित मात्रा में ही पी जाए. बहुत ज्यादा चाय पीने से शरीर में पानी की कमी, एसिडिटी और नींद की परेशानी हो सकती है. इसलिए सही समय और सही मात्रा में पी गई चाय न सिर्फ स्वाद देती है, बल्कि आपकी दिनचर्या को भी बेहतर बना सकती है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Tue, 02 Jun 2026 03:30:06 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Doing Shampoo Everyday In Summer: गर्मियों में क्या रोज शैंपू करना सही है, क्या इससे ठीक रहते हैं बाल?</title>
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        <description><![CDATA[ Doing Shampoo Everyday In Summer: गर्मियों के मौसम में तेज धूप, धूल-मिट्टी और पसीने के कारण बालों का रुखा और चिपचिपा होना एक आम दिक्कत है. बहुत से लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि क्या गर्मियों में रोज शैंपू करना सही है? क्या रोज बाल धोने से बाल सही रहते हैं? आइए इस लेख में जानते हैं कि बालों की सेहत के लिए क्या सही है और क्या गलत.
क्या रोज शैंपू करना फायदेमंद है?
गर्मियों में पसीना अधिक आने से सिर की त्वचा पर गंदगी जमा हो जाती है. इस गंदगी को साफ करने के लिए बाल धोना जरूरी है. लेकिन रोजाना शैंपू करना बालों के लिए बिल्कुल भी सही नहीं है. हमारे सिर की त्वचा में प्राकृतिक तेल होता है, जो बालों को नमी प्रदान करता है. जब आप रोज केमिकल वाले शैंपू का इस्तेमाल करते हैं, तो यह प्राकृतिक तेल पूरी तरह खत्म हो जाता है. इससे बाल रूखे, बेजान और कमजोर होकर टूटने लगते हैं.
रोज शैंपू करने के नुकसान
अगर आप रोजाना शैंपू करते हैं, तो सिर की त्वचा बहुत सूखी हो जाती है. इस सूखेपन को कम करने के लिए त्वचा और अधिक तेल बनाने लगती है. इसके कारण बाल और ज्यादा चिपचिपे दिखने लगते हैं. इसके अलावा, रोजाना बाल धोने से बालों की जड़ें कमजोर होती हैं और बाल झड़ने की समस्या तेजी से बढ़ सकती है.
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गर्मियों में बाल धोने का सही तरीका
गर्मियों में बालों को साफ रखना जरूरी है, लेकिन इसके लिए रोज शैंपू करने की जरूरत नहीं है. आप हफ्ते में केवल दो या तीन बार ही शैंपू का इस्तेमाल करें. अगर किसी दिन बाल ज्यादा चिपचिपे लगें, तो आप शैंपू के बिना केवल साफ पानी से भी बालों को धो सकते हैं. हमेशा हल्के या नेचुरल तत्वों से बने शैंपू का ही प्रयोग करें.
बालों को स्वस्थ रखने के आसान उपाय
शैंपू करने के बाद बालों में कंडीशनर लगाना कभी न भूलें. कंडीशनर बालों की नमी को बनाए रखता है. तेज धूप में बाहर निकलते समय बालों को सूती कपड़े या स्कार्फ से ढक कर रखें. इसके साथ ही, शरीर में पानी की कमी न होने दें और अच्छा खान-पान रखें.
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        <pubDate>Tue, 02 Jun 2026 03:30:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Detox Your Body Tips: क्या आपका शरीर Detox मांग रहा है? पहचानें संकेत और जानें उपाय</title>
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        <description><![CDATA[ Detox Your Body Tips:&amp;nbsp;क्या आपका शरीर टॉक्सिन्स से भर गया है? हमारा शरीर खुद को साफ करता है, लेकिन खराब खानपान और प्रदूषण के कारण कभी-कभी इसे बाहर से भी मदद की जरूरत होती है. आइए जानते हैं वे संकेत जो बताते हैं कि आपके शरीर को डिटॉक्स की जरूरत है.
इन लक्षणों को न करें नजरअंदाज
सुबह उठते ही थकावट महसूस करना
क्या आप 8 घंटे की नींद के बाद भी थका हुआ महसूस करते हैं? बिना काम किए कमजोरी लगना शरीर में जमी गंदगी का बड़ा संकेत है. जब लिवर और पेट पर टॉक्सिन्स का दबाव बढ़ता है, तो शरीर की एनर्जी खत्म होने लगती है.
पेट का फूलना और लगातार गैस बनना
अगर आपका पेट हमेशा भारी रहता है, गैस बनती है या कब्ज की समस्या है, तो समझ लें कि आपका पाचन तंत्र खराब हो रहा है. लिवर में गंदगी जमा होने से खाना ठीक से नहीं पचता.
चेहरे पर अचानक दाने होना
महंगे फेस वॉश लगाने के बाद भी पिंपल्स, मुंहासे या डल स्किन की समस्या अगर दूर नहीं हो रही है तो यह संकेत है कि आपका &amp;nbsp;लिवर खून को साफ नहीं कर पा रहा है, और शरीर त्वचा के रास्ते गंदगी बाहर निकाल रहा है. चमकदार त्वचा के लिए पेट की सफाई जरूरी है.
डाइटिंग के बाद भी अगर वजन नहीं घट रहा 
अगर आप कम खा रहे हैं और वर्कआउट भी कर रहे हैं, फिर भी वजन कम नहीं हो रहा, तो इसका कारण टॉक्सिन्स हो सकते हैं. ये शरीर के मेटाबॉलिज्म को धीमा कर देते हैं, जिससे फैट बर्न होना बंद हो जाता है.
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ये आसान घरेलू उपाय जो कर देंगे शरीर को साफ
शरीर को डिटॉक्स करना बहुत आसान है:

रोज सुबह खाली पेट गुनगुने पानी में नींबू का रस और शहद मिलाकर पिएं. यह लिवर को तुरंत साफ करता है.
खीरा, पुदीना, धनिया और पालक का जूस हफ्ते में तीन बार पिएं. यह खून को साफ करता है.
कुछ दिनों के लिए पैकेट बंद खाना, ज्यादा मीठा और तली-भुनी चीजों से पूरी तरह दूरी बना लें.
दिन में कम से कम 3 से 4 लीटर पानी पिएं ताकि गंदगी यूरिन के रास्ते बाहर निकल जाए.

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        <pubDate>Mon, 01 Jun 2026 15:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Kidney Health Tips: किडनी खराब होने से पहले शरीर नहीं देता बड़ा संकेत, डॉक्टर की चेतावनी&amp; देर होने का न करें इंतजार</title>
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        <description><![CDATA[ Kidney Health Tips:&amp;nbsp;हम में से ज्यादातर लोग मानते हैं कि कोई भी गंभीर बीमारी आने से पहले शरीर कुछ न कुछ संकेत जरूर देता है. लेकिन किडनी की बीमारी के मामले में अक्सर ऐसा नहीं होता. यही वजह है कि डॉक्टर इसे &quot;साइलेंट डिजीज&quot; यानी चुपचाप बढ़ने वाली बीमारी कहते हैं. वहीं किडनी हमारे शरीर के सबसे जरूरी अंगों में से एक है. यह खून को साफ करती है, शरीर से गंदगी बाहर निकालती है, पानी का संतुलन बनाए रखती है और तो ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने में भी मदद करती है. लेकिन किडनी की सबसे बड़ी खासियत ही कई बार सबसे बड़ा खतरा बन जाती है.
&amp;nbsp;डॉक्टरों के मुताबिक किडनी इतनी मजबूत होती है कि नुकसान होने के बाद भी लंबे समय तक अपना काम करती रहती है. इसी कारण कई लोगों को तब तक पता नहीं चलता कि उनकी किडनी खराब हो रही है, जब तक बीमारी काफी आगे नहीं बढ़ जाती.&amp;nbsp;
किडनी की बीमारी को क्यों कहा जाता है &#039;साइलेंट किलर&#039;?
विशेषज्ञों का कहना है कि किडनी की बीमारी धीरे-धीरे बढ़ती है और शुरुआती दौर में कोई साफ लक्षण नहीं दिखते. वहीं कई लोग पूरी तरह सामान्य जीवन जीते रहते हैं और उन्हें लगता है कि वे पूरी तरह स्वस्थ हैं. &amp;nbsp;लेकिन अंदर ही अंदर किडनी लगातार कमजोर होती रहती है. &amp;nbsp;डॉक्टर के अनुसार, जब लोगों को पहली बार बीमारी का पता चलता है, तब तक कई मामलों में किडनी अपनी 85 से 90 प्रतिशत तक क्षमता खो चुकी होती है. यही वजह है कि केवल लक्षणों का इंतजार करना खतरनाक हो सकता है. वहीं कई मरीजों को बीमारी का पता तब चलता है जब किसी सामान्य हेल्थ चेकअप में रिपोर्ट खराब आती है या फिर अचानक ऐसी स्थिति बन जाती है कि डायलिसिस की जरूरत पड़ने लगती है. इसलिए डॉक्टर बार-बार लोगों को नियमित जांच कराने की सलाह देते हैं.&amp;nbsp;
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देर से पता चलने पर मरीज और परिवार दोनों पर पड़ता है असर
किडनी की बीमारी का देर से पता चलना सिर्फ शरीर के लिए ही नहीं, बल्कि मानसिक रूप से भी बड़ा झटका साबित हो सकता है. डॉक्टर बताते हैं कि कई मामलों में ऐसा होता है कि मरीज अस्पताल पहुंचते समय खुद को पूरी तरह स्वस्थ मानते हैं, लेकिन जांच के बाद उन्हें पता चलता है कि उनकी किडनी गंभीर रूप से खराब हो चुकी होती है. ऐसे में मरीज और उनके परिवार दोनों के लिए इस सच्चाई को स्वीकार करना आसान नहीं होता. वहीं अचानक डायलिसिस, लंबे इलाज और भविष्य की चिंता लोगों को परेशान कर देती है. &amp;nbsp;इलाज का खर्च, जीवनशैली में बदलाव और आगे की योजना जैसी कई बातें एक साथ सामने आ जाती हैं. यही कारण है कि डॉक्टर कहते हैं कि बीमारी को शुरुआती दौर में पकड़ लेना सबसे बेहतर रास्ता है.&amp;nbsp;
किन लोगों को ज्यादा खतरा और कैसे बचाएं अपनी किडनी?
डॉक्टरों के अनुसार कुछ लोगों में किडनी की बीमारी का खतरा ज्यादा होता है. इनमें डायबिटीज के मरीज, हाई ब्लड प्रेशर से पीड़ित लोग, किडनी की बीमारी का पारिवारिक इतिहास रखने वाले लोग, मोटापे से जूझ रहे व्यक्ति, धूम्रपान करने वाले, दिल के मरीज और 60 साल से अधिक उम्र के लोग शामिल होते हैं. &amp;nbsp; इसलिए ऐसे लोगों को नियमित रूप से किडनी की जांच कराने कि सलाह दी जाती है.&amp;nbsp;
वहीं अच्छी बात यह है कि किडनी को सुरक्षित रखने के लिए बहुत मुश्किल कदम उठाने की जरूरत नहीं होती. इसके लिए ब्लड प्रेशर और शुगर को नियंत्रण में रखना, पर्याप्त पानी पीना, कम नमक वाला संतुलित भोजन खाना, नियमित व्यायाम करना, धूम्रपान और ज्यादा शराब से बचना तथा बिना डॉक्टर की सलाह के दर्द की दवाओं का अधिक इस्तेमाल न करना किडनी को स्वस्थ रखने में मदद कर सकता है. डॉक्टरों का साफ कहना है कि किडनी की बीमारी का इंतजार लक्षणों से नहीं, बल्कि समय पर जांच से करना चाहिए. क्योंकि सही समय पर पता चल जाए तो किडनी को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Mon, 01 Jun 2026 15:30:09 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Weight Loss Drug: वजन तो घटेगा, लेकिन मांसपेशियां हो सकती हैं कमजोर! Ozempic लेने वालों के लिए चेतावनी</title>
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        <description><![CDATA[ Weight Loss Drug:&amp;nbsp;आजकल वजन कम करने के लिए लोग कई तरह के तरीके अपना रहे हैं. जिसमें Ozempic नाम की दवा काफी चर्चा में चल रही है. वहीं दुनिया भर में लाखों लोग इस दवा का इस्तेमाल डायबिटीज कंट्रोल करने और वजन घटाने के लिए कर रहे हैं. इस दवा में मौजूद Semaglutide भूख को कम करने में मदद करता है, जिससे व्यक्ति कम खाना खाता है और उसका वजन तेजी से घटने लगता है. लेकिन अब विशेषज्ञों ने एक ऐसी बात बताई है, जिस पर ध्यान देना बहुत जरूरी है. इससे वजन घटाने के दौरान सिर्फ चर्बी ही नहीं, बल्कि शरीर की मांसपेशियां भी कमजोर हो सकती हैं. यही वजह है कि डॉक्टर अब लोगों को सिर्फ दवा पर भरोसा करने के बजाय व्यायाम को भी अपनी दिनचर्या में शामिल करने की सलाह दे रहे हैं.&amp;nbsp;
सिर्फ वजन कम होना ही काफी नहीं
जब कोई व्यक्ति वजन कम करना चाहता है, तो उसका मकसद शरीर की अतिरिक्त चर्बी घटाना होता है. लेकिन कई बार वजन कम होने के साथ-साथ मांसपेशियों का भी नुकसान होने लगता है जो की शरीर के लिए अच्छी बात नहीं मानी जाती है, क्योंकि मांसपेशियां हमारे शरीर को ताकत देती हैं, चलने-फिरने में मदद करती हैं और शरीर की ऊर्जा को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती हैं. वहीं अगर मांसपेशियां ज्यादा कमजोर हो जाएं, तो व्यक्ति जल्दी थक सकता है और लंबे समय तक अपना वजन कंट्रोल रखना भी मुश्किल हो सकता है. &amp;nbsp;खासकर बढ़ती उम्र के लोगों के लिए यह समस्या और ज्यादा चिंता की बात बन सकती है.&amp;nbsp;
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रिसर्च में क्या सामने आया?
यूरोपियन एथेरोस्क्लेरोसिस सोसायटी (EAS) कांग्रेस 2026 में पेश की गई एक नई स्टडी में इस मुद्दे पर खास ध्यान दिया गया. &amp;nbsp;शोधकर्ताओं ने मोटापे और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं से ग्रस्त चूहों पर अध्ययन किया. कुछ चूहों को केवल Semaglutide दिया गया, कुछ को सिर्फ एक्सरसाइज कराई गई और कुछ को दोनों चीजें साथ में दी गईं. 14 हफ्तों बाद जो नतीजे सामने आए, वे काफी दिलचस्प थे. &amp;nbsp;सिर्फ Semaglutide लेने वाले समूह में शरीर की चर्बी 31 प्रतिशत तक कम हुई, लेकिन उनकी लीन मास यानी मांसपेशियों में 11 प्रतिशत की कमी भी देखी गई. &amp;nbsp;वहीं जिन चूहों को दवा के साथ नियमित व्यायाम भी कराया गया, उनमें चर्बी 45 प्रतिशत तक घटी और मांसपेशियों का नुकसान केवल 8 प्रतिशत तक सीमित रहा.&amp;nbsp;
एक्सरसाइज ने दिया बड़ा फायदा
शोध में यह भी देखा गया कि दवा और एक्सरसाइज का मेल सिर्फ वजन कम करने तक सीमित नहीं रहा. इससे इंसुलिन की कार्यक्षमता बेहतर हुई, खून में फैट का स्तर सुधरा और शरीर में सूजन भी कम हुई है. इतना ही नहीं, लिवर में जमा अतिरिक्त चर्बी भी कम देखने को मिला है. सबसे खास बात यह रही कि जिन चूहों ने दवा के साथ एक्सरसाइज की, उनकी मांसपेशियों की ताकत और पकड़ने की क्षमता में भी सुधार हुआ. यानी शरीर सिर्फ पतला नहीं हुआ, बल्कि ज्यादा मजबूत भी बना.
हालांकि यह अध्ययन अभी जानवरों पर किया गया है और इंसानों पर और रिसर्च की जरूरत है, लेकिन इसके नतीजे एक साफ संदेश देते हैं कि अगर आप Ozempic जैसी दवाओं से वजन कम कर रहे हैं, तो नियमित एक्सरसाइज को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है. &amp;nbsp;सही मायनों में स्वस्थ वजन घटाने का रास्ता दवा और व्यायाम, दोनों के संतुलित मेल से होकर गुजरता है.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ेंः Oral Health: बार-बार सूज रहे मसूड़े या खराब रहती है ओरल हेल्थ तो न करें नजरअंदाज, हो सकती हैं बांझपन की शिकार ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 01 Jun 2026 15:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>Oral Health: बार&amp;बार सूज रहे मसूड़े या खराब रहती है ओरल हेल्थ तो न करें नजरअंदाज, हो सकती हैं बांझपन की शिकार</title>
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        <description><![CDATA[ Poor Oral Health May Increase Infertility Risk: महिलाओं की फर्टिलिटी को प्रभावित करने वाले कारणों की बात होती है तो आमतौर पर हार्मोन, उम्र, लाइफस्टाइल या किसी बीमारी का जिक्र किया जाता है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आपके मसूड़ों की सेहत भी मां बनने की क्षमता पर असर डाल सकती है? हाल ही में सामने आए एक रिसर्च ने चौंकाने वाला खुलासा किया है. रिसर्चर का कहना है कि मुंह में लंबे समय तक रहने वाली सूजन महिलाओं की फर्टिलिटी को प्रभावित कर सकती है और कुछ मामलों में बांझपन का खतरा भी बढ़ा सकती है.&amp;nbsp;
कैसे यह फर्टिलिटी को प्रभावित करता है?
हिब्रू यूनिवर्सिटी ऑफ जेरूसलम के रिसर्चर ने अपने इस स्टडी में पाया गया कि मुंह में लगातार बनी रहने वाली सूजन केवल दांतों और मसूड़ों तक सीमित नहीं रहती. यह शरीर में इम्यून सिस्टम की प्रतिक्रिया को बढ़ाकर दूसरे अंगों को भी प्रभावित कर सकती है, जिनमें ओवरी भी शामिल हैं. स्टडी के एनालिसिस जर्नल ऑफ डेंटल रिसर्च में पब्लिश किए गए हैं.&amp;nbsp;
किस चीज पर किया गया रिसर्च?
रिसर्च के दौरान साइंटिस्ट ने चूहों पर स्टडी किया और दांतों से जुड़ी सूजन की स्थिति का एनालिसिस किया. जांच में सामने आया कि मुंह में होने वाली सूजन से निकलने वाले संकेत पूरे शरीर में फैल जाते हैं और ओवरी तक पहुंच सकते हैं. इसका रिजल्ट ओवरी में सूजन बढ़ाने वाले केमिकल का स्तर अधिक पाया गया. इसके साथ ही इम्यून सिस्टम में बदलाव, टिश्यू को नुकसान और एग्स की क्वालिटी में गिरावट भी देखी गई.
जानवरों पर किए गए रिसर्च का किया निकला रिजल्ट?
रिसर्चर ने यह भी पाया कि जिन एग्स पर सूजन का असर पड़ा, वहां एग्स के विकास की प्रक्रिया प्रभावित हो गई. ओवरी में मौजूद छोटी थैलियां, जिनमें एग्स विकसित होते हैं, उनकी वृद्धि सामान्य नहीं रही. इसके कारण एग्स की क्वालिटी कमजोर हुई और सफल प्रेग्नेंसी की संभावना कम होती दिखाई दी. स्टडी में शामिल जानवरों में जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या भी कम दर्ज की गई.
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लंबे समय तक रहने वाले सूजन का क्या होता है असर?
सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि एग्स में डीएनए को नुकसान पहुंचने और जीन के काम करने के तरीके में बदलाव के संकेत भी मिले. रिसर्चर के अनुसार ये बदलाव काफी हद तक वैसे ही थे जैसे बढ़ती उम्र के साथ प्रजनन क्षमता में गिरावट के दौरान देखे जाते हैं. इससे संकेत मिलता है कि लंबे समय तक बनी रहने वाली सूजन महिलाओं की फर्टिलिटी क्षमता को समय से पहले प्रभावित कर सकती है. स्टडी &amp;nbsp;का नेतृत्व करने वाले माइकल क्लटस्टाइन ने कहा कि अक्सर सूजन को केवल स्थानीय समस्या माना जाता है, लेकिन हमारे एनालिसिस बताते हैं कि इसका असर पूरे शरीर पर पड़ सकता है. उन्होंने कहा कि मुंह में लगातार बनी रहने वाली सूजन महिलाओं में बांझपन का एक ऐसा कारण हो सकती है, जिस पर अभी तक पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 01 Jun 2026 02:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>Morning Phone Habit Harm: सुबह आंख खुलते ही उठा लेते हैं फोन, सुबह की यह आदत खराब कर देती है पूरा दिन </title>
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        <description><![CDATA[ Morning Phone Habit Harm: आज की डिजिटल लाइफस्टाइल में सुबह की शुरुआत अक्सर मोबाइल फोन के साथ होती है. अलार्म बंद करते ही लोग बिस्तर से उठने के बजाय सबसे पहले फोन की स्क्रीन देखते हैं. मैसेज, सोशल मीडिया नोटिफिकेशन, ईमेल और न्यूज स्क्रोल करना एक आम आदत बन चुकी है. लेकिन एक्सपर्ट के अनुसार यह छोटी सी आदत धीरे-धीरे शरीर, दिमाग और मेंटल हेल्थ पर बड़ा असर डाल सकती है. डॉक्टर और रिसर्च दोनों इस बात की चेतावनी देते हैं कि सुबह उठते हैं ही मोबाइल देखना पूरे दिन की मानसिक स्थिति और प्रोडक्टिविटी को प्रभावित कर सकता है.
सुबह मोबाइल देखते ही दिमाग पर पड़ता है असर&amp;nbsp;
सुबह नींद से जागते ही दिमाग को धीरे-धीरे एक्टिव होने की जरूरत होती है. लेकिन मोबाइल की तेज रोशनी और लगातार आने वाले नोटिफिकेशन उसे अचानक स्ट्रेस मोड में डाल देते हैं. इससे दिमाग पर एक तरह का डिजिटल प्रेशर बनता है, जिससे ध्यान केंद्रित करने की क्षमता घट सकती है और बेचैनी बढ़ सकती है.&amp;nbsp;
स्ट्रेस हार्मोन और हार्ट रेट पर असर &amp;nbsp;
एक्सपर्ट्स के अनुसार सुबह मोबाइल देखने से शरीर में स्ट्रेस हार्मोन का स्तर बढ़ सकता है. इससे हार्ट रेट और ब्लड प्रेशर अचानक ऊपर जा सकता है. खासकर उन लोगों के लिए यह स्थिति ज्यादा खतरनाक होती है जो पहले से डायबिटीज, हाई बीपी या मोटापे की समस्या से जूझ रहे हैं.&amp;nbsp;
मानसिक स्वास्थ्य पर सीधा असर&amp;nbsp;
सुबह-सुबह सोशल मीडिया या न्यूज देखने से दिमाग पर एक साथ बहुत सारी जानकारी का दबाव पड़ता है. कई बार नेगेटिव खबरें मूड को प्रभावित करती है, जिससे पूरा दिन तनाव, चिड़चिड़ापन और बेचैनी रहती है. लंबे समय तक यह आदत एंग्जायटी और मेंटल स्ट्रेस को बढ़ा सकती है.&amp;nbsp;
प्रोडक्टिविटी और फोकस हो जाता है कम&amp;nbsp;
सुबह का समय ज्यादा फोकस और प्लानिंग के लिए अच्छा माना जाता है, लेकिन मोबाइल स्क्रोल करने से ध्यान भटक जाता है और कई बार अनावश्यक समय बर्बाद हो जाता है. इसका पूरा असर पूरे दिन की प्रोडक्टिविटी पर पड़ता है और काम में मन लगाने में दिक्कत आती है.&amp;nbsp;
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आंखों की सेहत पर भी खतरा&amp;nbsp;
मोबाइल स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट आंखों पर असर डालते हैं. सुबह-सुबह इसका इस्तेमाल करने से आंखों में जलन, थकान, सूखापन और भारीपन जैसे समस्या हो सकती है. लगातार यह आदत आंखों की रोशनी पर भी नेगेटिव इफेक्ट डाल सकती है.
सही तरीके से कैसे करें सुबह की शुरुआत?&amp;nbsp;
एक्सपर्ट्स के अनुसार सुबह उठते ही मोबाइल देखने की आदत से बचना चाहिए और दिन की शुरुआत उठते ही 15 से 30 मिनट तक स्क्रीन से दूरी बनाने, गुनगुना पानी पीने, हल्की स्ट्रेचिंग या योग करने, गहरी सांस लेने की एक्सरसाइज करने और कुछ देर प्राकृतिक रोशनी में समय बिताने से करें.
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        <pubDate>Sun, 31 May 2026 09:30:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Cancer Risk: सही लाइफस्टाइल से टल सकता है 40% कैंसर का खतरा, एक्सपर्ट से जानें बचाव का तरीका</title>
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        <description><![CDATA[ Daily Habits That Increase Cancer Risk: कैंसर को लेकर लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि यह बीमारी केवल बढ़ती उम्र, खराब किस्मत या जेनेटिक कारणों से होती है. लेकिन अब नई रिसर्च इस सोच को बदल रही है. जर्नल नेचर मेडिसिन में प्रकाशित एक स्टडी के अनुसार, करीब 40 प्रतिशत कैंसर के मामले और लगभग आधी कैंसर से होने वाली मौतें ऐसे जोखिमों से जुड़ी हैं जिन्हें सही लाइफस्टाइल अपनाकर काफी हद तक टाला जा सकता है.
हमारी कौन सी आदतें कर रही हैं हमें बीमार
एक्सपर्ट के मुताबिक समस्या यह है कि कैंसर का खतरा बढ़ाने वाली कई आदतें हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुकी हैं. देर रात तक जागना, घंटों एक ही जगह बैठे रहना, बाहर का प्रोसेस्ड खाना खाना, तनाव को नजरअंदाज करना और फिजिकल एक्टिविटी की कमी धीरे-धीरे शरीर पर असर डालती है. शुरुआत में इनका नुकसान दिखाई नहीं देता, लेकिन सालों तक यही आदतें गंभीर बीमारियों की वजह बन सकती हैं. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन की रिपोर्ट बताती है कि तंबाकू, मोटापा, शराब का सेवन, अनहेल्दी खानपान, फिजिकल एक्टिविटी की कमा और वायु प्रदूषण कैंसर के सबसे बड़े रोके जा सकने वाले कारणों में शामिल हैं. भारत में भी लाइफस्टाइल से जुड़े कैंसर के मामलों में लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है.
कम उम्र के लोग क्यों आ रहे हैं इसकी चपेट में?
&amp;nbsp;डॉ. अनिंद्य मुखर्जी ने TOI को बताया कि अब कैंसर सिर्फ बुजुर्गों की बीमारी नहीं रह गया है. कम उम्र के लोगों में भी ऐसे कैंसर तेजी से सामने आ रहे हैं जो पहले 50 साल की उम्र के बाद अधिक देखे जाते थे. उनका कहना है कि धूम्रपान, शराब, मोटापा, खराब खानपान, एक्सरसाइज की कमी, प्रदूषण और लगातार तनाव जैसे कारणों ने हर उम्र के लोगों में कैंसर का जोखिम बढ़ा दिया है.&amp;nbsp;
जरूरत से ज्यादा फैट से कौन से कैंसर का खतरा रहता है?
अमेरिका के नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट की रिसर्च के अनुसार शरीर में जरूरत से ज्यादा फैट कई तरह के कैंसर से जुड़ी हुई है. इनमें स्तन, कोलोरेक्टल, यूट्रस, किडनी, लिवर और पैंक्रियाज कैंसर शामिल हैं. एक्सपर्ट बताते हैं कि जब शरीर लंबे समय तक खराब लाइफस्टाइल का सामना करता है तो अंदरूनी सूजन बढ़ने लगती है. यह सूजन हेल्दी सेल्स &amp;nbsp;को नुकसान पहुंचाती है और कैंसर के लिए अनुकूल माहौल तैयार कर सकती है.
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तंबाकी और पैसिव स्मोकिंग से खतरा
डॉ. मुखर्जी के अनुसार तंबाकू आज भी कैंसर का सबसे बड़ा रोके जा सकने वाला कारण है. इसका असर सिर्फ लंग्स पर नहीं बल्कि मुंह, गले, पेट, किडनी, ब्लैडर और कई अन्य अंगों पर भी पड़ता है वहीं पैसिव स्मोकिंग भी उतनी ही खतरनाक है. इसके अलावा वायु प्रदूषण तेजी से उभरता खतरा बन रहा है, खासकर शहरों में रहने वाले लोगों के लिए.
कैसे कर सकते हैं खुद का बचाव?
डॉ. मुखर्जी के मुताबिक कैंसर से बचाव के लिए स्वस्थ वजन बनाए रखना, नियमित एक्सरसाइज करना, ताजे फल और सब्जियां खाना, तंबाकू से दूर रहना, शराब का सेवन सीमित करना, तनाव को नियंत्रित रखना और पर्याप्त नींद लेना बेहद जरूरी है.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 30 May 2026 21:30:13 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Ebola Virus Outbreak: कितना खतरनाक है इबोला का नया स्ट्रेन, अब तक मिले 900 से ज्यादा संक्रमित; 223 की हुई मौत</title>
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        <description><![CDATA[ Ebola Virus Outbreak : दुनिया में कोरोना के बाद अब एक और खतरनाक वायरस ने चिंता बढ़ा दी है. अफ्रीकी देशों डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो और युगांडा में इबोला वायरस का संक्रमण तेजी से फैल रहा है. हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (WHO) ने इसे अंतरराष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित कर दिया है. इस बार इबोला का जो नया स्ट्रेन सामने आया है, उसे बुंडीबुग्यो स्ट्रेन कहा जा रहा है.
विशेषज्ञों के मुताबिक, यह वायरस तेजी से संक्रमण फैलाने वाला है और फिलहाल इसके लिए कोई पूरी तरह मंजूर वैक्सीन या खास इलाज मौजूद नहीं है. इसी वजह से दुनियाभर की हेल्थ एजेंसियां अलर्ट मोड पर आ गई हैं. ऐसे में आइए जानते हैं कि इबोला का नया स्ट्रेन कितना खतरनाक है, इससे अब तक 900 से ज्यादा संक्रमित मिले और 223 की मौत हुई.&amp;nbsp;
इबोला का नया स्ट्रेन कितना खतरनाक है?
डॉक्टरों के मुताबिक, इबोला वायरस कोरोना से ज्यादा जानलेवा है. कोरोना में जहां मृत्यु दर काफी कम थी, वहीं इबोला से संक्रमित होने वाले लगभग आधे मरीजों की मौत हो सकती है. मेडिकल रिपोर्ट्स के अनुसार, इबोला का फेटैलिटी रेट करीब 50 प्रतिशत तक पहुंच सकता है. हालांकि यह वायरस कोरोना की तरह हवा में तेजी से नहीं फैलता है.&amp;nbsp;
कैसे फैलता है इबोला वायरस?
विशेषज्ञों के अनुसार, इबोला वायरस संक्रमित व्यक्ति के खून, पसीने, लार या शरीर के अन्य तरल पदार्थों के सीधे संपर्क में आने से फैलता है. यह वायरस हवा के जरिए नहीं फैलता, इसलिए इसका ट्रांसमिशन कोरोना की तुलना में काफी धीमा माना जाता है. यही वजह है कि इसके वैश्विक महामारी बनने का खतरा कम बताया जा रहा है.
अब तक कितने मामले सामने आए?
WHO और अमेरिकी स्वास्थ्य एजेंसियों की रिपोर्ट के अनुसार अब तक 900 से ज्यादा संदिग्ध मामले सामने आ चुके हैं. इनमें 100 से ज्यादा मामलों की कन्फर्मेशन हो चुकी है. कई लोगों की मौत भी दर्ज की गई है. कांगो के इटुरी, नॉर्थ किवु और साउथ किवु इलाके इस समय सबसे ज्यादा प्रभावित बताए जा रहे हैं. वहीं युगांडा में भी संक्रमण के कई मामले सामने आए हैं.
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भारत में कितना खतरा है?
भारत में इबोला का कोई मामला सामने नहीं आया है, लेकिन केंद्र सरकार ने सावधानी बढ़ा दी हैं. स्वास्थ्य मंत्रालय ने कांगो, युगांडा और दक्षिण सूडान से आने वाले यात्रियों के लिए हेल्थ एडवाइजरी जारी की है. एयरपोर्ट्स पर स्क्रीनिंग बढ़ा दी गई है और क्वारंटाइन व्यवस्था को भी मजबूत किया गया है. साथ ही भारत की वैज्ञानिक और फार्मा कंपनियां इबोला से बचाव के लिए वैक्सीन और एंटीबॉडी डेवलपमेंट में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के पास मजबूत फार्मास्यूटिकल क्षमता और रिसर्च नेटवर्क है, जिसकी मदद से इबोला जैसी बीमारियों से लड़ने के लिए बेहतर तैयारी की जा सकती है.
इबोला से बचने के लिए क्या सावधानी रखें?
इबोला से बचने के लिए संक्रमित व्यक्ति के सीधे संपर्क में आने से बचना बेहद जरूरी है. अफ्रीकी देशों की गैर जरूरी यात्रा से बचें. नियमित रूप से हाथ साफ करें और किसी भी तरह के बुखार, उल्टी, कमजोरी या ब्लीडिंग जैसे लक्षण दिखने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें. अगर कोई व्यक्ति हाल ही में प्रभावित देशों से लौटा है, तो उसकी स्वास्थ्य जांच जरूर करानी चाहिए.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 30 May 2026 21:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Tobacco Side Effects On Bones: क्या तंबाकू आपकी हड्डियों और रीढ़ को भी पहुंचा रहा नुकसान? एक्सपर्ट ने बताया डराने वाला सच</title>
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        <description><![CDATA[ Tobacco Side Effects On Bones: क्या तंबाकू आपकी हड्डियों और रीढ़ को भी पहुंचा रहा नुकसान? एक्सपर्ट ने बताया डराने वाला सच ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 30 May 2026 21:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>Physical Relationship Health: बिस्तर पर वक्त बढ़ाने के लिए आप भी लेते हैं टॉनिक? इन गंभीर बीमारियों को मिल रहा न्यौता</title>
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        <description><![CDATA[ Health Risks Of Sexual Performance Tonics: आजकल बाजार में पुरुषों की ताकत बढ़ाने और शारीरिक संबंध के दौरान ज्यादा देर तक टिके रहने का दावा करने वाले टॉनिक और सप्लीमेंट्स की भरमार है. सोशल मीडिया से लेकर मेडिकल स्टोर तक, हर जगह ऐसे प्रोडक्ट्स आसानी से मिल जाते हैं. कई लोग बिना डॉक्टर की सलाह के इनका इस्तेमाल भी शुरू कर देते हैं. लेकिन एक्सपर्ट्स चेतावनी दे रहे हैं कि ये आदत शरीर को फायदा पहुंचाने के बजाय गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ा सकती है.
क्या सच में ये फिजिकल एक्टिविटी को मजबूत करते हैं?
स्क्रिप्स क्लिनिक के प्राइमरी केयर फिजिशियन डॉ लुइगी सिमोन के मुताबिक, शारीरिक क्षमता बढ़ाने का दावा करने वाले ज्यादातर सप्लीमेंट्स पर वैज्ञानिक तरीके से पर्याप्त रिसर्च नहीं हुई है. उनका कहना है कि कई बार लोगों को सिर्फ मेंटल तौर पर फर्क महसूस होता है, लेकिन इन प्रोडक्ट्स के असर को लेकर ठोस सबूत मौजूद नहीं हैं. डॉ सिमोन ने साफ कहा कि ताकत बढ़ाने या लंबे समय तक बेहतर प्रदर्शन करने जैसे दावे अभी तक पूरी तरह साबित नहीं हो पाए हैं.
क्या हो सकती है इनसे दिक्कत?
एक्सपर्ट के अनुसार, ऐसे सप्लीमेंट्स हर व्यक्ति के लिए सुरक्षित नहीं होते. कई बार इनमें ऐसे तत्व पाए जाते हैं जो एलर्जी, ब्लड प्रेशर की समस्या या दूसरी दवाओं के साथ खतरनाक रिएक्शन पैदा कर सकते हैं. कुछ प्रोडक्ट्स में छिपे हुए केमिकल या दवाइयां भी मिल सकती हैं, जो शरीर को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती हैं. यही वजह है कि बिना जांचे-परखे किसी भी टॉनिक का इस्तेमाल करना जोखिम भरा माना जा रहा है.
अगर यूज करने के बाद कोई दिक्कत हो तो क्या करें?
डॉक्टर्स का कहना है कि अगर किसी व्यक्ति को शारीरिक संबंध से जुड़ी कोई समस्या महसूस हो रही है, तो उसे खुद इलाज करने के बजाय डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए. कई बार हाई ब्लड प्रेशर, दिल की बीमारी, डायबिटीज या तनाव जैसी समस्याएं भी इसका कारण बन सकती हैं. ऐसे मामलों में असली बीमारी का इलाज ज्यादा जरूरी होता है, न कि सिर्फ ताकत बढ़ाने वाले टॉनिक का सहारा लेना.
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इस बात का जरूर रखें ध्यान
डॉ लुइगी सिमोन बताते हैं कि कई लोग शर्म या झिझक की वजह से डॉक्टर से खुलकर बात नहीं करते और सीधे सप्लीमेंट्स लेना शुरू कर देते हैं. लेकिन ऐसा करना खतरनाक साबित हो सकता है। उनका कहना है कि डॉक्टर आपकी समस्या की असली वजह समझकर सही इलाज बता सकते हैं. अगर किसी दवा की वजह से दिक्कत हो रही हो, तो डॉक्टर दवा बदलने की सलाह भी दे सकते हैं. एक्सपर्ट्स यह भी बताते हैं कि बाजार में मिलने वाले सप्लीमेंट्स दवाइयों की तरह सख्त जांच प्रक्रिया से नहीं गुजरते फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन यानी एफडीए इन प्रोडक्ट्स को बाजार में आने से पहले पूरी तरह मंजूरी नहीं देता ऐसे में कई बार इनके अंदर मौजूद चीजें शरीर के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 29 May 2026 13:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>Basic Life Support: CPR क्यों है बेहद जरूरी, हर इंसान को क्यों सीखनी चाहिए जिंदगी बचाने वाली यह तकनीक?</title>
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        <pubDate>Fri, 29 May 2026 13:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>Brain Health: दिमाग को खोखला कर रही मोबाइल की लत, डॉक्टरों ने बताया नींद और थकान का खौफनाक सच</title>
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        <description><![CDATA[ How Screen Time Affects Brain Health: आज की जिंदगी में इंसान शायद ही कभी सच में शांत बैठ पाता है. पहले लंबा सफर खिड़की के बाहर देखते हुए कट जाता था, लाइन में इंतजार करते समय लोग आसपास की चीजों को महसूस करते थे और रात को सोने से पहले दिमाग खुद-ब-खुद धीमा पड़ जाता था. लेकिन अब हर खाली पल किसी न किसी स्क्रीन से भर चुका है. कभी मोबाइल नोटिफिकेशन, कभी छोटी वीडियो, कभी पॉडकास्ट, तो कभी लगातार आने वाले मैसेज. ऐसे में दिमाग को असली आराम मिल ही नहीं पा रहा.&amp;nbsp;
क्या इससे हमारे ऊपर असर पड़ रहा है?
न्यूरोलॉजिस्ट्स का कहना है कि लगातार मिलने वाला यह बैकग्राउंड स्टिमुलेशन इंसान के दिमाग के काम करने के तरीके को बदल रहा है. बाहर से देखने पर भले कोई इंसान आराम करता दिखाई दे, लेकिन दिमाग लगातार एक्टिव रहता है. यही वजह है कि आजकल लोग बिना ज्यादा शारीरिक मेहनत किए भी मानसिक रूप से थका हुआ महसूस करते हैं.&amp;nbsp;
क्या हमारा ब्रेन हमेशा एक्टिव रहने के लिए बना है?
होसमैट हॉस्पिटल्स के न्यूरोलॉजिस्ट डॉ प्रभु ने TOI को बताया कि, इंसानी दिमाग को कभी भी इस तरह लगातार एक्टिव रहने के लिए नहीं बनाया गया था. पहले दिनभर में छोटे-छोटे ऐसे पल मिल जाते थे, जब दिमाग खुद शांत हो जाता था. लेकिन अब हर खाली जगह डिजिटल चीजों से भर चुकी है. डॉ प्रभु कहते हैं कि स्मार्टफोन, सोशल मीडिया, लगातार आने वाले नोटिफिकेशन और हर समय जुड़े रहने का दबाव इंसानी दिमाग को लगातार एक्टिव रखता है.&amp;nbsp;
हमेशा एक्टिव कहने का क्या होता है असर?
एक्सपर्ट बताते हैं कि समस्या यह है कि यह थकान तुरंत महसूस नहीं होती. लोगों को लगता है कि मोबाइल स्क्रॉल करना या देर रात तक वीडियो देखना आराम देने वाला काम है, लेकिन असल में दिमाग लगातार नई जानकारी को प्रोसेस करता रहता है. यही कारण है कि नर्वस सिस्टम हमेशा हल्की सतर्क अवस्था में बना रहता है. धीरे-धीरे यह आदत मानसिक थकान, ध्यान की कमी और इमोशनल बर्नआउट में बदल सकती है. नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ हेल्थ की रिसर्च में भी सामने आया है कि जरूरत से ज्यादा स्क्रीन देखने और देर रात तक डिजिटल चीजों में लगे रहने से नींद की क्वालिटी, इमोशनल संतुलन और ध्यान लगाने की क्षमता पर असर पड़ता है. खासतौर पर देर रात की लगातार स्क्रॉलिंग दिमाग को अलर्ट मोड में बनाए रखती है.&amp;nbsp;
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क्यों हमारे लिए सही नींद जरूरी है?
अरेटे हॉस्पिटल्स के न्यूरोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ सुरेश बाबू पी बताते हैं कि दिमाग के अंदर एक खास सफाई सिस्टम होता है, जिसे ग्लिम्फैटिक सिस्टम कहा जाता है. यह सिस्टम गहरी नींद के दौरान सबसे ज्यादा सक्रिय होता है और दिनभर जमा होने वाले जहरीले मेटाबॉलिक पदार्थों को बाहर निकालने का काम करता है. डॉ सुरेश बाबू पी के अनुसार, अगर लगातार नींद की कमी रहे या रात में ज्यादा स्क्रीन इस्तेमाल की जाए, तो लंबे समय में दिमाग की काम करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है. उन्होंने कम से कम 6 से 8 घंटे की बिना रुकावट नींद लेने और रात में स्क्रीन टाइम घटाने की सलाह दी है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 29 May 2026 13:30:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Digital Detox: क्या है डिजिटल डिटॉक्स? जल्द नहीं समझे तो घेर लेंगी बीमारियां, नर्क बन जाएगा घर</title>
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        <description><![CDATA[ Side Effects Of Excessive Screen Time: आज की दुनिया में मोबाइल, लैपटॉप और सोशल मीडिया हमारी जिंदगी का ऐसा हिस्सा बन चुके हैं कि बिना स्क्रीन के कुछ घंटे बिताना भी मुश्किल लगने लगा है. सुबह आंख खुलते ही फोन और रात को सोने से पहले आखिरी नजर भी स्क्रीन पर ही जाती है. लेकिन डॉक्टरों और रिसर्च में अब लगातार यह चेतावनी दी जा रही है कि अगर समय रहते &quot;डिजिटल डिटॉक्स&quot; नहीं समझा गया, तो यह आदत धीरे-धीरे शरीर और दिमाग दोनों को बीमार बना सकती है.&amp;nbsp;
क्या होता है डिजिटल डिटॉक्स का मतलब?
डिजिटल डिटॉक्स का मतलब है कुछ समय के लिए मोबाइल, सोशल मीडिया, लैपटॉप और बाकी डिजिटल उपकरणों से दूरी बनाना, ताकि दिमाग और शरीर को लगातार मिलने वाले डिजिटल दबाव से राहत मिल सके. Aspenvalleyhealth के एक्सपर्ट मानते हैं कि इसे सिर्फ नया ट्रेंड नहीं, बल्कि मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य से जुड़ा जरूरी कदम मान है.&amp;nbsp;
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बढ़ रही है इससे दिक्कत?
डॉक्टरों के मुताबिक, लगातार स्क्रीन पर समय बिताने से लोगों में नींद की समस्या, तनाव, सिरदर्द, आंखों में जलन और चिड़चिड़ापन तेजी से बढ़ रहा है. देर रात तक फोन चलाने की आदत दिमाग को आराम नहीं करने देती. सोशल मीडिया पर लगातार दूसरों की &quot;परफेक्ट जिंदगी&quot; देखने से तुलना की भावना बढ़ती है, जिससे आत्मविश्वास और मानसिक शांति दोनों प्रभावित होते हैं. रिसर्च में यह भी पाया गया है कि लगातार फोन चेक करने की आदत दिमाग की ध्यान केंद्रित करने की क्षमता को कमजोर करती है. कई लोग बिना वजह बार-बार मोबाइल देखने लगते हैं. यहां तक कि फोन पास न होने पर बेचैनी, घबराहट और तनाव महसूस होने लगता है. एक्सपर्ट इसे डिजिटल निर्भरता का शुरुआती संकेत मानते हैं.&amp;nbsp;
लगातार स्कीन देखने के क्या होते हैं नुकसान?
लंबे समय तक स्क्रीन देखने का असर सिर्फ दिमाग पर नहीं, शरीर पर भी पड़ता है. &quot;टेक नेक&quot; यानी लगातार झुककर मोबाइल देखने की वजह से गर्दन दर्द, पीठ दर्द और सिरदर्द की समस्या बढ़ रही है. आंखों में सूखापन, धुंधला दिखना और रोशनी से परेशानी भी अब आम हो चुकी है. डॉक्टरों का कहना है कि कम उम्र के लोग भी अब ऐसी समस्याओं के साथ अस्पताल पहुंच रहे हैं, जो पहले ज्यादा उम्र में दिखाई देती थीं. सबसे बड़ा असर रिश्तों पर पड़ रहा है. एक ही घर में रहने वाले लोग घंटों मोबाइल में व्यस्त रहते हैं, लेकिन आपस में बातचीत कम होती जा रही है. परिवार के साथ समय बिताने के बजाय लोग सोशल मीडिया पर ज्यादा सक्रिय रहते हैं. &amp;nbsp;धीरे-धीरे घर में चुप्पी, दूरी और तनाव बढ़ने लगता है. यही वजह है कि एक्सपर्ट चेतावनी दे रहे हैं कि अगर डिजिटल आदतों पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो घर का माहौल भी मानसिक तनाव का कारण बन सकता है.&amp;nbsp;
कैसे कर सकते हैं इसको ठीक?
हालांकि राहत की बात यह है कि छोटी-छोटी आदतें बड़ा बदलाव ला सकती हैं. एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि सुबह उठने के बाद कम से कम एक घंटा फोन से दूरी रखें. खाने के समय मोबाइल इस्तेमाल न करें और सोने से दो घंटे पहले स्क्रीन बंद कर दें. सप्ताह में एक दिन डिजिटल ब्रेक लेना भी दिमाग को राहत दे सकता है. रिसर्च में यह भी सामने आया है कि जब लोग कुछ समय के लिए प्रकृति, परिवार और वास्तविक बातचीत के साथ समय बिताते हैं, तो तनाव कम होता है, नींद बेहतर होती है और दिमाग ज्यादा शांत महसूस करता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 29 May 2026 01:30:18 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Tips for Comfortable Sleep: रात को नहीं आ रही नींद, करें ये काम और चैन से सो जाएं</title>
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        <description><![CDATA[ Tips for Comfortable Sleep:&amp;nbsp;आजकल बड़ी संख्या में लोग रात में नींद न आने की समस्या से परेशान हैं। देर रात तक जागना, बार-बार आंख खुलना और सुबह थकान महसूस होना अब आम बात बन चुकी है. हेल्थ एक्सपर्ट्स का कहना है कि खराब लाइफस्टाइल और मोबाइल की आदत इसके पीछे सबसे बड़ी वजह है. हालांकि कुछ आसान बदलाव करके इस परेशानी से राहत पाई जा सकती है.
नींद से जुड़े विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर रात में जल्दी और गहरी नींद चाहिए तो सोने से पहले दिमाग को शांत करना बेहद जरूरी है. एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि बिस्तर पर जाने से कम से कम आधा घंटा पहले मोबाइल और लैपटॉप का इस्तेमाल बंद कर देना चाहिए. स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट दिमाग को एक्टिव रखती है, जिससे नींद आने में देरी होती है.
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एक्सपर्ट ने बताया सबसे आसान तरीका
विशेषज्ञों के अनुसार, सोने से पहले 5 से 10 मिनट तक गहरी सांस लेने की एक्सरसाइज करना काफी फायदेमंद हो सकता है.इससे दिमाग शांत होता है और शरीर रिलैक्स महसूस करता है.कई डॉक्टर इसे नेचुरल स्लीप थेरेपी भी मानते हैं.
रात में चाय-कॉफी पीना पड़ सकता है भारी
हेल्थ एक्सपर्ट्स चेतावनी देते हैं कि शाम के बाद ज्यादा चाय या कॉफी पीने से भी नींद खराब हो सकती है। इनमें मौजूद कैफीन कई घंटों तक दिमाग को सक्रिय रखता है.ऐसे में रात के समय हल्का खाना खाने की सलाह दी जाती है.
कमरे का माहौल भी करता है असर
विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर कमरे में ज्यादा रोशनी या शोर होगा तो दिमाग पूरी तरह आराम नहीं कर पाता. इसलिए सोते समय कमरे की लाइट धीमी रखें और शांत माहौल बनाने की कोशिश करें. इससे शरीर जल्दी स्लीप मोड में चला जाता है.
हर दिन एक जैसा रखें सोने का समय
डॉक्टरों का कहना है कि शरीर की बॉडी क्लॉक को सही रखना बेहद जरूरी है.अगर रोज अलग-अलग समय पर सोया जाए तो नींद का पैटर्न बिगड़ सकता है. इसलिए रोज लगभग एक ही समय पर सोने और सुबह उठने की आदत डालनी चाहिए.इसके साथ ही एक्सपर्ट्स यह भी मानते हैं कि अच्छी नींद सिर्फ थकान दूर नहीं करती बल्कि मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को भी बेहतर बनाती है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Fri, 29 May 2026 01:30:16 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Brain Health: B12 नॉर्मल होने पर भी सुन्न हो रहे हाथ&amp;पैर और घट रही याददाश्त, रिसर्च में सामने आया सच</title>
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        <description><![CDATA[ Can Normal Vitamin B12 Levels Still Affect Brain Health: विटामिन बी12 को लंबे समय से शरीर और दिमाग के लिए बेहद जरूरी न्यूट्रिएंट माना जाता रहा है. डॉक्टर आमतौर पर ब्लड टेस्ट के जरिए यह जांचते हैं कि शरीर में इसकी मात्रा सही है या नहीं. अगर रिपोर्ट तय सीमा से ऊपर होती है, तो इंसान को पूरी तरह नॉर्मल माना जाता है. लेकिन अब एक नई रिसर्च ने इस सोच पर सवाल खड़े कर दिए हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि कई बुजुर्गों में बी12 लेवल नॉर्मल होने के बावजूद दिमाग और नसों से जुड़ी दिक्कतें शुरू हो सकती हैं.&amp;nbsp;
&amp;nbsp;बी12 लेवल नॉर्मल होने के बावजूद दिक्कत क्यों?
यह रिसर्च कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के साइंटिस्ट ने की है, जिसके नतीजे एक मेडिकल जर्नल में प्रकाशित हुए हैं. स्टडी में पाया गया कि कुछ बुजुर्गों में सामान्य बी12 लेवल होने के बावजूद ब्रेन फंक्शन और नर्वस सिस्टम पर असर दिखाई देने लगा था. विटामिन बी12 शरीर में रेड ब्लड सेल्स बनाने, नसों को हेल्दी रखने और डीएनए बनाने में अहम रोल निभाता है. इसकी कमी से एनीमिया, कमजोरी, हाथ-पैर सुन्न होना, याददाश्त कमजोर होना और बैलेंस बिगड़ने जैसी समस्याएं हो सकती हैं. अब तक डॉक्टर मुख्य रूप से गंभीर कमी वाले मामलों पर ध्यान देते रहे हैं, लेकिन नई रिसर्च कहती है कि दिक्कतें इससे काफी पहले शुरू हो सकती हैं.
रिसर्च में हुआ चौंकाने वाला खुलासा
रिसर्च टीम ने करीब 71 साल औसत उम्र वाले 231 हेल्दी बुजुर्गों पर स्टडी किया. इनमें किसी को डिमेंशिया या हल्की मेंटल कमजोरी की समस्या नहीं थी. साइंटिस्ट ने सिर्फ कुल बी12 लेवल ही नहीं, बल्कि एक्टिव बी12 की भी जांच की. यह वही रूप है, जिसे शरीर वास्तव में इस्तेमाल कर पाता है. दिलचस्प बात यह रही कि ज्यादातर लोगों का बी12 लेवल मेडिकल मानकों के हिसाब से सामान्य था. इसके बावजूद जिन लोगों में एक्टिव बी12 कम था, उनमें सोचने की स्पीड और विजुअल प्रोसेसिंग धीमी पाई गई. रिसर्च में यह भी सामने आया कि उनके दिमाग की नसें संकेतों पर धीमी प्रतिक्रिया दे रही थीं.
जांच में निकल रही है खामियां
ब्रेन स्कैन में साइंटिस्ट ने एक और अहम बात देखी. जिन लोगों में एक्टिव बी12 कम था, उनके दिमाग में व्हाइट मैटर लीजन ज्यादा पाए गए. व्हाइट मैटर दिमाग के अलग-अलग हिस्सों के बीच संदेश पहुंचाने का काम करता है. इन हिस्सों को नुकसान पहुंचने का संबंध स्ट्रोक, डिमेंशिया और मानसिक गिरावट से जोड़ा जाता है. न्यूरोलॉजिस्ट एक्सपर्ट ने कहा कि यह स्टडी दिखाती है कि मौजूदा मेडिकल मानक बी12 की शुरुआती ब्रेन और न्यूरोलॉजिकल समस्याओं को पूरी तरह पकड़ नहीं पा रहे हैं. उनके मुताबिक, कई लोगों में साफ लक्षण दिखने से पहले ही नसों और दिमाग पर असर शुरू हो सकता है.
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क्या होता है विटामिन बी12 &amp;nbsp;का असर?
वैज्ञानिकों का कहना है कि उम्र बढ़ने के साथ शरीर में बी12 को एब्जार्व करने की क्षमता कम हो जाती है. कुछ दवाइयां, पाचन से जुड़ी समस्याएं और पूरी तरह शाकाहारी डाइट भी बी12 की कमी का खतरा बढ़ा सकती है. हालांकि रिसर्चर्स ने साफ किया है कि यह स्टडी सीधे तौर पर यह साबित नहीं करती कि कम एक्टिव बी12 ही मेंटल गिरावट की वजह है. लेकिन यह जरूर दिखाती है कि सामान्य रिपोर्ट आने के बावजूद ब्रेन में बदलाव शुरू हो सकते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 29 May 2026 01:30:15 +0530</pubDate>
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        <title>Wegovy Side Effects: स्लिम होने के लिए दवा लेने वाले हो जाएं सावधान, हमेशा के लिए जा सकती है आंखों की रोशनी</title>
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        <description><![CDATA[ Eye Problems Linked To Weight Loss Drugs: वजन कम करने के लिए इस्तेमाल होने वाली मशहूर दवा वेगोवी को लेकर एक नई मेडिकल स्टडी ने चिंता बढ़ा दी है. रिसर्च में दावा किया गया है कि यह दवा आंखों से जुड़ी एक दुर्लभ लेकिन गंभीर समस्या का खतरा बढ़ा सकती है, जिससे अचानक नजर जाने की नौबत तक आ सकती है. &amp;nbsp;चलिए आपको बताते हैं कि आखिर इसको लेकर रिसर्च में निकला क्या है.&amp;nbsp;
क्यों आंखों को है इससे खतरा?
यह स्टडी एक मेडिकल जर्नल में प्रकाशित हुई है, जिसमें साइंटिस्ट ने पाया कि सेमाग्लूटाइड बेस्ड दवाओं में वेगोवी का कनेक्शन इस्केमिक ऑप्टिक न्यूरोपैथी नाम की आंखों की बीमारी से सबसे ज्यादा जुड़ा दिखाई दिया. यह ऐसी स्थिति होती है, जब आंखों की नस तक ब्लड सप्लाई कम हो जाती है या रुक जाती है. इससे अचानक नजर धुंधली हो सकती है और कुछ मामलों में आंखों की रोशनी हमेशा के लिए भी जा सकती है.
डायबिटीज के लिए बनी थी दवा
दरअसल, जीएलपी-1 दवाएं पहले टाइप-2 डायबिटीज के इलाज के लिए बनाई गई थीं, लेकिन अब इन्हें तेजी से मोटापा कम करने के लिए भी इस्तेमाल किया जा रहा है. &amp;nbsp;वेगोवी और ओजेम्पिक दोनों में सेमाग्लूटाइड नाम का एक्टिव कंपाउंड होता है. फर्क सिर्फ इतना है कि वेगोवी खास तौर पर मोटापा कम करने के लिए मंजूर की गई है, जबकि ओजेम्पिक मुख्य रूप से डायबिटीज मरीजों को दी जाती है.&amp;nbsp;
रिसर्चर्स ने 2017 से 2024 के बीच अमेरिकी दवा निगरानी सिस्टम में दर्ज साइड इफेक्ट रिपोर्ट्स का विश्लेषण किया. वैज्ञानिकों ने करीब 3 करोड़ रिपोर्ट्स को जांचा, जिनमें 31 हजार से ज्यादा केस सेमाग्लूटाइड दवाओं से जुड़े थे. स्टडी में वेगोवी, ओजेम्पिक, रायबेल्सस, माउंजारो और जैपबाउंड जैसी दवाओं की तुलना की गई.
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कम मरीज के बावजूद इसका रिस्क क्यों ज्यादा?
हालांकि ओजेम्पिक के कुल मामले ज्यादा सामने आए, क्योंकि यह दवा लंबे समय से इस्तेमाल हो रही है, लेकिन आंकड़ों में वेगोवी का रिस्क सबसे ज्यादा दिखाई दिया. रिसर्च में वेगोवी से जुड़े 28 और ओजेम्पिक से जुड़े 47 मामले सामने आए. इसके बावजूद वेगोवी में इस आंखों की बीमारी का खतरा सामान्य से लगभग 75 गुना ज्यादा पाया गया, जबकि ओजेम्पिक में यह करीब 19 गुना था. साइंटिस्ट का मानना है कि इसके पीछे कई वजहें हो सकती हैं. वेगोवी आमतौर पर ज्यादा डोज में दी जाती है. इसके अलावा इंजेक्शन वाली दवाएं शरीर में तेजी से असर करती हैं. रिसर्चर्स का कहना है कि तेजी से वजन घटना, शरीर में पानी की कमी, ब्लड प्रेशर में बदलाव या नसों के रेगुलेशन में बदलाव आंखों की नस तक ब्लड सप्लाई कम कर सकते हैं.&amp;nbsp;
क्या सच में यह दवा है जिम्मेदार?
हालांकि एक्सपर्ट ने साफ कहा है कि यह स्टडी सीधे तौर पर यह साबित नहीं करती कि वेगोवी ही इस बीमारी की वजह है. रिसर्च में इस्तेमाल किए गए डेटा सिस्टम की अपनी सीमाएं भी हैं. कई मामलों में पूरी मेडिकल हिस्ट्री उपलब्ध नहीं थी और कुछ रिपोर्ट्स मीडिया कवरेज की वजह से ज्यादा दर्ज हो सकती हैं. फिर भी एक्सपर्ट्स का कहना है कि इस रिसर्च को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, क्योंकि दुनिया भर में मोटापा और डायबिटीज के इलाज में इन दवाओं का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है. &amp;nbsp;साइंटिस्ट अब इन दवाओं पर आगे और गहरी रिसर्च करने की तैयारी कर रहे हैं.
इसे भी पढ़ें-Stress And Heart Health: लगातार तनाव से 20-30 की उम्र में हाई हो रहा बीपी, जानें ऑफिस स्ट्रेस क्यों बन रहा साइलेंट किलर?
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 29 May 2026 01:30:13 +0530</pubDate>
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        <description><![CDATA[ अक्सर देखने में आता है कि लोग हद से ज्यादा एक्सरसाइज करते हैं, इसके बावजूद उनका वजन कम नहीं होता.इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं क्या आप भी इस समस्या से परेशान हैं? तो जानिए कैसे आप पा सकते हैं इस समस्या से निजात &amp;nbsp;
कई लोग वजन घटाने के लिए सालों तक जिम में पसीना बहाते हैं. लेकिन रोज भारी कसरत करने के बाद भी जब वजन का कांटा टस से मस नहीं होता, तो निराशा होना लाजमी है. &amp;nbsp;दरअसल, वजन कम करना सिर्फ कसरत पर निर्भर नहीं करता. इसके पीछे शरीर का मेटाबॉलिज्म,खान-पान और जीवनशैली जैसे कई महत्वपूर्ण कारक काम करते हैं.
अगर आप भी इस समस्या से जूझ रहे हैं, तो आइए आपको बताते हैं इसके लिए कुछ आसान और वैज्ञानिक तरीके जिनको अपनाकर आप अपने फिटनेस गोल को हासिल कर सकते हैं
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फैट से झट से फिट होने के रामबाण उपाय
1. खान-पान में सुधार और कैलोरी मैनेजमेंट- वजन घटाने का सबसे पहला और बुनियादी नियम है कैलोरी डेफिसिट. इसका मतलब है कि आप दिनभर में जितनी कैलोरी कसरत के जरिए बर्न करते हैं, उससे कम कैलोरी भोजन के माध्यम से ग्रहण करें. लोग अक्सर सोचते हैं कि कसरत करने के बाद वे कुछ भी खा सकते हैं. लेकिन यह एक बड़ी भूल है. एक हैवी वर्कआउट के बाद खाया गया एक समोसा या कोल्ड ड्रिंक आपकी पूरी मेहनत पर पानी फेर सकता है. इसलिए अपनी डाइट में प्रोटीन, फाइबर और हरी सब्जियों को शामिल करें और मीठे, मैदा व जंक फूड से पूरी तरह दूरी बना लें.&amp;nbsp;
&amp;nbsp;2.तनाव से दूरी और पर्याप्त आराम- कम नींद और अत्यधिक मानसिक तनाव वजन न घटने के दो सबसे बड़े और छुपे हुए कारण हैं. जैसे जब आप 7-8 घंटे की गहरी नींद नहीं लेते हैं, तो शरीर का मेटाबॉलिज्म धीमा हो जाता है. इसके अलावा, तनाव के दौरान शरीर में कोर्टिसोल नामक हार्मोन का लेवल बढ़ जाता है. यह हार्मोन शरीर में विशेषकर पेट के आसपास जिद्दी चर्बी जिसे बैली फैट भी कहा जाता है को जमा करने का काम करता है.इसके साथ ही कसरत का पूरा फायदा उठाने के लिए समय पर सोएं, योग करें और खुद को तनावमुक्त रखें.&amp;nbsp;
3. कसरत के तरीकों में बदलाव- अगर आप रोज एक ही तरह की कसरत जैसे &amp;nbsp;कार्डियो या सिर्फ रनिंग महीनों से कर रहे हैं, तो आपका शरीर उसका आदी हो जाता है. इसे वेट लॉस प्लेटो कहते हैं. इस स्थिति को तोड़ने के लिए अपने रूटीन में बदलाव करें. जैसे कार्डियो के साथ स्ट्रेंथ ट्रेनिंग (वजन उठाना) और हाई-इंटेनसिटी इंटरवल ट्रेनिंग को शामिल करें. इसके अलावा, हफ्ते में मिलने वाले चीट डे पर जरूरत से ज्यादा खाने की आदत से बचें.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Wed, 27 May 2026 21:30:14 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Foods To Avoid During Nautapa: बर्गर&amp;पिज्जा से लेकर कोल्ड ड्रिंक तक.. नौतपा में भूलकर भी न खाएं ये चीजें, हो सकता है उल्टा असर</title>
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        <description><![CDATA[ Foods You Should Avoid During Nautapa Heatwave: नौतपा की शुरुआत होते ही गर्मी अपने सबसे खतरनाक रूप में पहुंच जाती है. तेज धूप, गर्म हवाएं और लगातार बढ़ता तापमान शरीर को तेजी से थका देता है. ऐसे मौसम में सिर्फ बाहर की गर्मी ही नहीं, बल्कि खानपान भी आपकी सेहत पर बड़ा असर डालता है. Sahyadrihospital की रिपोर्ट के अनुसार, गर्मी में कुछ चीजें खाने से शरीर का तापमान और बढ़ सकता है, जिससे डिहाइड्रेशन, हीट स्ट्रोक, उल्टी, दस्त और कमजोरी जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है. इसलिए नौतपा में खानपान को लेकर ज्यादा सावधानी बरतने की जरूरत होती है।.&amp;nbsp;
&amp;nbsp;तली-भुनी चीजों से दूरी
एक्सपर्ट के मुताबिक, तली-भुनी चीजें जैसे बर्गर, पिज्जा, फ्रेंच फ्राइज और दूसरी ऑयली फूड्स गर्मियों में शरीर पर अतिरिक्त दबाव डालती हैं. इन्हें पचाने में शरीर को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है, जिससे अंदरूनी गर्मी बढ़ सकती है. इसके अलावा ज्यादा मसालेदार खाना भी नौतपा में परेशानी बढ़ा सकता है. मिर्च में मौजूद तत्व शरीर का तापमान बढ़ा सकते हैं, खासकर उन लोगों में जो ज्यादा मसालेदार भोजन खाने के आदी नहीं हैं. &amp;nbsp;इसके साथ एक्सपर्ट रेड मीट से भी दूरी बनाने की सलाह देते हैं. रेड मीट को पचाने में शरीर ज्यादा ऊर्जा खर्च करता है, जिससे शरीर का तापमान बढ़ सकता है.&amp;nbsp;
पीने वाली इन चीजों से दूरी
कोल्ड ड्रिंक और सोडा गर्मी में राहत जरूर देते हैं, लेकिन एक्सपर्ट्स मानते हैं कि इनमें मौजूद ज्यादा शुगर शरीर में पानी की कमी बढ़ा सकती है. यही वजह है कि इन्हें ज्यादा मात्रा में पीना नुकसानदायक हो सकता है. &amp;nbsp;इसी तरह चाय, कॉफी और एनर्जी ड्रिंक्स में मौजूद कैफीन शरीर को डिहाइड्रेट कर सकता है और शरीर का तापमान बढ़ा सकता है.&amp;nbsp;
पैकेज्ड स्नैक्स से भी दूरी
हेल्थ रिपोर्ट्स के अनुसार, ज्यादा नमक वाले पैकेज्ड स्नैक्स जैसे चिप्स और नमकीन भी शरीर का फ्लूइड बैलेंस बिगाड़ सकते हैं. अधिक सोडियम शरीर की सेल्स से पानी खींचता है, जिससे डिहाइड्रेशन का खतरा बढ़ जाता है. वहीं रेड मीट और भारी भोजन को पचाने में शरीर ज्यादा ऊर्जा खर्च करता है, जिससे गर्मी और सुस्ती महसूस हो सकती है.&amp;nbsp;
बासी खाने से बचने की सलाह
नौतपा के दौरान बासी खाना और खुले में रखा भोजन खाने से भी बचने की सलाह दी जाती है. तेज गर्मी में भोजन जल्दी खराब हो सकता है, जिससे फूड पॉइजनिंग, दस्त और टायफाइड जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है. बहुत ज्यादा बर्फ वाली चीजें भी शरीर को अचानक तापमान का झटका दे सकती हैं. वहीं शराब शरीर से तेजी से पानी बाहर निकालती है, जिससे गंभीर डिहाइड्रेशन हो सकता है.&amp;nbsp;
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किन चीजों का करना चाहिए सेवन
नौतपा में शरीर को ठंडा और हाइड्रेट रखना सबसे जरूरी है. इसके लिए नारियल पानी, छाछ, लस्सी, सत्तू, बेल का शरबत और ताजे फलों का सेवन फायदेमंद माना जाता है. दिनभर पर्याप्त मात्रा में पानी पीना चाहिए और खाली पेट घर से बाहर निकलने से बचना चाहिए. सही खानपान अपनाकर नौतपा की भीषण गर्मी के असर से काफी हद तक बचा जा सकता है.
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        <pubDate>Wed, 27 May 2026 21:30:13 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Heatwave Health Risks: हीटवेव से ब्रेन और किडनी पर हो रहा असर, गर्मी के इन खतरनाक लक्षणों को कतई न करें इग्नोर</title>
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        <description><![CDATA[ Doctors Explain Dangerous Effects Of Heatwave On Body: देश के कई हिस्सों में बढ़ती गर्मी और हीटवेव अब लोगों की सेहत पर गंभीर असर डालने लगी है. अस्पतालों में ऐसे मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है जिन्हें तेज धूप, डिहाइड्रेशन और अत्यधिक गर्मी की वजह से सिरदर्द, चक्कर, आंखों में जलन और न्यूरोलॉजिकल समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. डॉक्टरों का कहना है कि लंबे समय तक गर्मी में रहने से शरीर का संतुलन बिगड़ सकता है और यह स्थिति कई बार जानलेवा भी साबित हो सकती है.
ज्यादा गर्मी से क्या होती है दिक्कत?
दिल्ली-एनसीआर के अस्पतालों में इन दिनों डिहाइड्रेशन से जुड़ी परेशानियों के मामले लगातार सामने आ रहे हैं. खासतौर पर बच्चों, बुजुर्गों और पहले से किसी बीमारी से जूझ रहे लोगों में इसका खतरा ज्यादा देखा जा रहा है. गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में इंटरनल मेडिसिन विभाग की वाइस चेयरमैन डॉ. सुशीला कटारिया के मुताबिक, शरीर की तापमान कंट्रोल करने की क्षमता की भी एक सीमा होती है. जब गर्मी उस सीमा से आगे बढ़ जाती है तो शरीर में पानी और नमक की कमी होने लगती है. उन्होंने बताया कि हीट एग्जॉशन के शुरुआती लक्षणों में सिरदर्द, मांसपेशियों में ऐंठन, मतली और कमजोरी शामिल हैं. अगर समय रहते इलाज न मिले तो यह हीट स्ट्रोक में बदल सकता है, जो दिमाग और किडनी को प्रभावित कर सकता है.
&amp;nbsp;

#WATCH | Gurugram, Haryana: On heat wave, Vice Chairman of internal medicine, Medanta Gurugram, Dr Sushila Kataria says, &amp;ldquo;&amp;hellip;there&amp;rsquo;s a limit of the body&amp;rsquo;s thermostat regulation, beyond which, exposure to heat causes loss of water and salt. The initial symptoms of heat exhaustion&amp;hellip; pic.twitter.com/78EP1nLENL
&amp;mdash; ANI (@ANI) May 25, 2026



इससे बचने के लिए क्या कर सकते हैं आप?
डॉ. कटारिया ने कहा कि सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे के बीच जरूरत न हो तो बाहर निकलने से बचना चाहिए. शरीर को हाइड्रेट रखने के लिए पानी, नारियल पानी और ओआरएस सबसे बेहतर विकल्प हैं. वहीं चाय और कॉफी जैसे पेय शरीर में पानी की कमी और बढ़ा सकते हैं. उन्होंने लोगों को ढीले, सूती और हल्के रंग के कपड़े पहनने की सलाह भी दी. इसके &amp;nbsp;साथ ही फेफड़े, दिल और किडनी की बीमारी से जूझ रहे लोगों को मौसम बदलने के दौरान नियमित रूप से डॉक्टर से सलाह लेने को कहा.
इसे भी पढ़ें-Stress And Heart Health: लगातार तनाव से 20-30 की उम्र में हाई हो रहा बीपी, जानें ऑफिस स्ट्रेस क्यों बन रहा साइलेंट किलर?
इन दिक्कतों को कतई न करें इग्नोर
एक्सपर्ट के मुताबिक, अगर किसी व्यक्ति को लगातार भ्रम होना, बोलने में परेशानी, अत्यधिक सुस्ती, बेहोशी या दौरे जैसी समस्याएं महसूस हों तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. ये गंभीर न्यूरोलॉजिकल इमरजेंसी के संकेत हो सकते हैं और तुरंत मेडिकल सहायता की जरूरत पड़ सकती है. डॉक्टरों का यह भी कहना है कि गर्मियों में आंखों की सेहत को लोग अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि तेज गर्मी और धूप आंखों में जलन और इंफेक्शन का खतरा बढ़ा सकती है. इसके अलावा चक्कर आना, तेज थकान, उल्टी, शरीर में अत्यधिक गर्मी महसूस होना, तेज धड़कन और मांसपेशियों में ऐंठन जैसे लक्षण भी हीट स्ट्रोक के संकेत हो सकते हैं.
इसे भी पढ़ें-Heart Health: सुबह का सिरदर्द-थकान है साइलेंट किलर का अलर्ट, न करें इग्नोर वरना होंगे खतरनाक बीमारी के शिकार
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 27 May 2026 21:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>Bad Cholesterol: दवाइयों का झंझट होगा खत्म, सिर्फ जीन थैरेपी से होगा बैड कोलेस्ट्रॉल का वन टाइम इलाज</title>
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        <description><![CDATA[ How Gene Therapy Reduces LDL Cholesterol: हार्ट की बीमारियों और बैड कोलेस्ट्रॉल से परेशान करोड़ों लोगों के लिए साइंटिस्ट ने एक बड़ी उम्मीद जगाई है. साइंटिस्ट का दावा है कि अब ऐसा इलाज विकसित किया जा रहा है, जिसमें सिर्फ एक बार जीन थैरेपी लेने से बैड कोलेस्ट्रॉल लंबे समय तक कंट्रोल में रह सकता है. अगर आने वाले बड़े ट्रायल्स में भी इसके नतीजे सफल रहे, तो भविष्य में कई मरीजों को जिंदगीभर कोलेस्ट्रॉल की दवाएं खाने की जरूरत शायद न पड़े.&amp;nbsp;
क्या सच में यह काम करता है?
साइंटिस्ट ने एक नई जीन थैरेपी वर्व-102 पर रिसर्च की है, जिसके नतीजे प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल में प्रकाशित हुए हैं. इस स्टडी में पाया गया कि यह थैरेपी शरीर में मौजूद बैड एलडीएल कोलेस्ट्रॉल को 62 प्रतिशत तक कम करने में सफल रही. यह रिसर्च उन मरीजों पर की गई, जिन्हें जन्म से ही हाई कोलेस्ट्रॉल की समस्या थी या कम उम्र में हार्ट की बीमारी का खतरा बढ़ चुका था. शुरुआती ट्रायल में कुल 35 मरीज शामिल किए गए थे. साइंटिस्ट ने देखा कि जिन मरीजों को ज्यादा डोज दी गई, उनमें एलडीएल कोलेस्ट्रॉल का स्तर औसतन 78 एमजी/डीएल तक घट गया. सबसे खास बात यह रही कि कई मरीजों में इसका असर एक साल तक बना रहा.&amp;nbsp;
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हार्ट के बीमारियों के लिए काफी अहम
ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज दिल्ली के कार्डियोलॉजी प्रोफेसर डॉ अम्बुज रॉय ने इस स्टडी को हार्ट की बीमारियों के इलाज के क्षेत्र में बेहद महत्वपूर्ण बताया है. उनका कहना है कि यह रिसर्च साबित करती है कि पीसीएसके9 जीन की इन-विवो बेस एडिटिंग के जरिए शरीर में लंबे समय तक एलडीएल कोलेस्ट्रॉल को कम किया जा सकता है. अगर भविष्य में इसकी लॉन्ग टर्म सेफ्टी पूरी तरह सुरक्षित साबित हो जाती है, तो यह हार्ट की बीमारियों के इलाज में बड़ा बदलाव ला सकती है.
&amp;nbsp;जीन थैरेपी शरीर में कैसे काम करती है?
साइंटिस्ट के मुताबिक, यह थैरेपी लिवर में मौजूद पीसीएसके9 नाम के जीन को स्थायी रूप से बंद कर देती है. यही जीन शरीर में कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कंट्रोल करने में अहम भूमिका निभाता है, इसके लिए एडवांस बेस एडिटिंग तकनीक का इस्तेमाल किया गया है, जिसे जीन एडिटिंग का ज्यादा सटीक और आधुनिक तरीका माना जाता है.
खराब कोलेस्ट्रॉल किस तरह हमारे लिए खतरनाक?
दुनियाभर में हाई एलडीएल कोलेस्ट्रॉल को हार्ट अटैक, स्ट्रोक और ब्लॉकेज की सबसे बड़ी वजहों में गिना जाता है. कई मरीज दवाइयां लेने के बावजूद पूरी तरह सुरक्षित नहीं हो पाते. ऐसे में साइंटिस्ट को उम्मीद है कि यह नई थैरेपी भविष्य में वन टाइम ट्रीटमेंट का रास्ता खोल सकती है. राहत की बात यह है कि शुरुआती ट्रायल में कोई बड़ा सुरक्षा खतरा सामने नहीं आया. &amp;nbsp;रिसर्च से जुड़ी दवा कंपनी ने कहा है कि वह इस साल वर्व-102 के दूसरे चरण के क्लिनिकल ट्रायल शुरू करेगी.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 27 May 2026 21:30:11 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Fertility Tips: मां&amp;बाप बनने में आ रही दिक्कत? रोज की ये छोटी&amp;छोटी आदतें बन सकती हैं बड़ी वजह</title>
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        <description><![CDATA[ Fertility Tips: मां-बाप बनने में आ रही दिक्कत? रोज की ये छोटी-छोटी आदतें बन सकती हैं बड़ी वजह ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 26 May 2026 13:30:11 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Nautapa Care Guide Kids And Seniors: नौतपा का सबसे ज्यादा खतरा बच्चों और बुजुर्गों को, ऐसे रखें उनका ख्याल</title>
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        <description><![CDATA[ गर्मियों के सबसे गर्म 9 दिनों को नौतपा कहा जाता है.इस साल नौतपा 25 मई से शुरू होकर 2 जून तक रहेगा. इस दौरान सूर्य की किरणें सीधे धरती पर पड़ती हैं जिससे तापमान तेजी से बढ़ जाता है.उत्तर भारत के कई शहरों में तापमान 45 डिग्री के पार पहुंच जाता है.तेज धूप, लू और डिहाइड्रेशन के कारण इस समय बीमार होने का खतरा काफी बढ़ जाता है.खासकर बच्चे और बुजुर्गों को अधिक सावधानी रखने की जरूरत होती है.
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, नौतपा के दौरान शरीर जल्दी डिहाइड्रेट होता है और हीट स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है. बच्चे, बुजुर्ग, गर्भवती महिलाएं और हार्ट या डायबिटीज के मरीज इस मौसम में जल्दी बीमार पड़ सकते हैं. शरीर का तापमान ज्यादा बढ़ने पर चक्कर, उल्टी, बुखार और कमजोरी जैसी समस्याएं हो सकती हैं. इसलिए इस मौसम में खानपान और दिनचर्या का खास ध्यान रखना जरूरी है.
बच्चों को क्यों है ज्यादा खतरा?
बच्चों को नौतपा में सबसे ज्यादा खतरा रहता है,क्योंकि उनकी इम्यूनिटी कमजोर होती है.ज्यादा खेलने और धूप में रहने से उनके शरीर में पानी की कमी जल्दी हो जाती है. छोटे बच्चों को लू लगने का खतरा भी ज्यादा रहता है. ऐसे में बच्चों को समय-समय पर ORS, नींबू पानी और नारियल पानी देते रहें.दोपहर 12 बजे से 4 बजे तक उन्हें बाहर खेलने न भेजें और हल्के सूती कपड़े पहनाएं.
बुजुर्ग लोग क्यों होते हैं ज्यादा खतरे में?
बुजुर्गों के लिए भी नौतपा काफी मुश्किल भरा समय होता है. बढ़ती उम्र के साथ शरीर की गर्मी सहने की क्षमता कम होने लगती है. शरीर में पानी की कमी जल्दी होने लगती है और हीट स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है.इसलिए बुजुर्गों को ठंडे कमरे में रखें और उन्हें बार-बार पानी पिलाते रहें.
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क्या करें और क्या न करें?
नौतपा के दौरान ज्यादा पानी पिएं और तरबूज, खीरा, खरबूजा जैसे मौसमी फलों का सेवन करें. खाली पेट धूप में बाहर न निकलें और बाहर जाते समय छाता या टोपी का इस्तेमाल करें.अगर तेज बुखार,चक्कर,उल्टी या सांस लेने में परेशानी हो तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें. थोड़ी सी सावधानी और सही देखभाल से बच्चों और बुजुर्गों को नौतपा की तेज गर्मी से सुरक्षित रखा जा सकता है.
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        <pubDate>Tue, 26 May 2026 13:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>Green Chili Side Effects: एक दिन में कितनी हरी मिर्च खानी चाहिए? जरूरत से ज्यादा खाने में हो सकता है यह नुकसान</title>
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        <description><![CDATA[ Green Chili Side Effects:&amp;nbsp;अक्सर लोग अपने खाने के साथ सलाद में हरी मिर्च खाना बहुत पसंद करते हैं. कुछ लोग तो बिना हरी मिर्च के खाना अधूरा ही मानते हैं. इसकी तीखी स्वाद वजह से खाना और भी टेस्टी लगने लगता है, इसलिए ज्यादातर घरों में रोजाना हरी मिर्च जरूर खाई जाती है.&amp;nbsp; वही हरी मिर्च खाने के फायदे तो आपने जरूर सुने होंगे, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसे जरूरत से ज्यादा खाना नुकसान भी कर सकता है? खाने के स्वाद को बढ़ाने वाली ये छोटी सी मिर्च शरीर के लिए तब तक फायदेमंद है जब तक इसे सही मात्रा में खाया जाए.&amp;nbsp; बिना सोचे समझे ज्यादा मात्र में हरी मिर्च खाने से पेट में जलन, एसिडिटी और दूसरी दिक्कतें शुरू हो सकती हैं. इसलिए यह समझना बहुत जरूरी है कि एक दिन में कितनी हरी मिर्च खाना सही रहता है और कब यह नुकसान देने लगती है?
एक दिन में कितनी हरी मिर्च खाना सही है?
अगर सामान्य तौर पर बात करें तो एक स्वस्थ व्यक्ति के लिए एक दिन में करीब 1 से 2 हरी मिर्च खाना ठीक माना जाता है.&amp;nbsp; कुछ लोग अपनी सहनशक्ति के हिसाब से 3 से 4 मिर्च भी खा लेते हैं, लेकिन यह हर किसी के लिए सही नहीं होता बीबी है. खासकर अगर आपका पेट थोड़ा कमजोर है या आपको पहले से ही गैस, एसिडिटी या जलन की समस्या रहती है तो आपको बहुत कम मात्रा में ही हरी मिर्च खानी चाहिए. साथ&amp;nbsp; ही ध्यान रहे कि हरी मिर्च को हमेशा खाने के साथ ही लेना बेहतर होता है, खाली पेट इसे खाने से पेट में जलन और असहजता बढ़ सकती है. सही मात्रा में ली गई हरी मिर्च खाने का स्वाद भी बढ़ाती है और शरीर को नुकसान भी नहीं पहुंचाती.
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हरी मिर्च खाने के फायदे
हरी मिर्च सिर्फ स्वाद ही नहीं बढ़ाती, बल्कि इसके कई फायदे भी हैं. इसमें विटामिन C, एंटीऑक्सीडेंट और कुछ ऐसे तत्व होते हैं जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने में मदद करते हैं. साथ ही यह मेटाबॉलिज्म को भी तेज करती है, जिससे खाना जल्दी पचता है. कुछ लोग इसे वजन कम करने में भी मददगार मानते हैं क्योंकि यह शरीर में गर्मी पैदा करके कैलोरी बर्न करने की प्रक्रिया को थोड़ा बढ़ा देती है. इसके अलावा हरी मिर्च खाने से शरीर में एंडोर्फिन हार्मोन रिलीज होता है, जिससे मूड अच्छा महसूस होता है और हल्की खुशी भी मिलती है.
ज्यादा हरी मिर्च खाने से होने वाले नुकसान
लेकिन अगर आप हरी मिर्च जरूरत से ज्यादा खाने लगते हैं तो यह फायदे की जगह नुकसान करने लगती है. ज्यादा मिर्च खाने से पेट में जलन, एसिडिटी, गैस और सीने में जलन जैसी समस्याएं हो सकती हैं. साथ ही कुछ लोगों को मुंह में छाले या गले में जलन भी हो जाती है. जिन लोगों को पहले से पेट का अल्सर या पाइल्स की समस्या होती है, उनके लिए ज्यादा हरी मिर्च खाना और भी नुकसानदायक हो सकता है. इसलिए हमेशा संतुलन बनाए रखना बहुत जरूरी है .&amp;nbsp; सही मात्रा में खाई गई हरी मिर्च जहां स्वाद और सेहत दोनों देती है, वहीं ज्यादा मात्रा में यह शरीर को परेशान कर सकती है.
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        <pubDate>Tue, 26 May 2026 13:30:09 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Body Parts In Danger From Heat: ज्यादा गर्मी से जल्दी बीमार होते हैं शरीर के ये अंग, इतनी बुरी हो जाती है हालत</title>
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        <description><![CDATA[ Body Parts In Danger From Heat: हर साल बढ़ती गर्मी शहर से लेकर गांवों में रहने वाले लोगों को परेशान करती रही है. कहीं न कहीं से खबर आ ही जाती है कि गर्मी की वजह से मौतें हो रही हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ज्यादा गर्मी से शरीर के कौन से अंग खराब होने लगते हैं, आइए इनके बारे में जानते हैं.
भयंकर गर्मी से जोखिम में हैं ये शरीर के अंग
इतनी गर्मी में शरीर के कई अंगों पर बहुत खराब असर पड़ता है. जिससे उनके खराब होने का डर बना रहता है. यह हैं शरीर के कुछ अंग जिनपर ज्यादा होता है खतरा.

गर्मी पर सबसे पहले अटैक करती है. शरीर का तापमान बढ़ने पर उसे ठंडा करने के लिए खून दिमाग से त्वचा की तरफ जाने लगता है, जिससे चक्कर आना, बेहोशी और भ्रम की स्थिति पैदा होने लगती है.
दिल पर भी मंडराता है बढ़ती गर्मी का खतरा. शरीर को ठंडा रखने के लिए दिल को तेज पंप करना पड़ता है. इससे हृदय पर गंभीर तनाव बढ़ता है, जो हार्ट अटैक या अन्य हृदय संबंधी समस्याओं का कारण बन सकता है.
किडनी पर भी दबाव बढ़ता है. तेज गर्मी और Dehydration के कारण गुर्दे काम करना बंद कर सकते हैं. पसीने के रूप में बहुत अधिक पानी निकलने से गुर्दे पर अधिक दबाव पड़ता हैं और इनके खराब होने का भी डर बना रहता है.

मानव शरीर केवल एक हद तक ही गर्मी झेल सकता है. मगर इस समय पड़ रही गर्मी आपकी तबीयत को बहुत खराब कर सकती है, जिस वजह से सबको गर्मी से बचाव के बारे में जानना ही चाहिए.
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क्या है खुद को और अंगों को बचाने के उपाय?
बढ़ती गर्मी में कुछ सावधानियां आपकी जान बचा सकते हैं, जैसे.

दोपहर में बाहर निकलने से बचना चाहिए और ठंडी जगह पर रहने की कोशिश करनी चाहिए.
शरीर को ठंडा रखने के लिए पानी, छाछ, शरबत आदि पीते रहना होगा.
कपड़ों का भी ध्यान से चयन करना होगा हल्के रंग के कपड़े पहनने से शरीर कम गर्म होता है.
कोई भी दिक्कत होने पर डॉक्टर से तुरंत संपर्क करें किसी भी लक्षण को हल्के में न आंकें.

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        <pubDate>Tue, 26 May 2026 13:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>Ebola Virus: अफ्रीका में तेजी से फैल रहा इबोला वायरल, जानिए क्या हैं इससे बचाव के उपाय?</title>
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        <description><![CDATA[ Why Ebola Virus Is Spreading Rapidly In Africa: अफ्रीका के कई हिस्सों में इबोला वायरस एक बार फिर तेजी से फैल रहा है और इसे लेकर दुनियाभर की स्वास्थ्य एजेंसियों की चिंता बढ़ गई है. खासतौर पर कांगो और युगांडा में सामने आए मामलों ने हेल्थ एक्सपर्ट्स को अलर्ट कर दिया है. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन और इम्पीरियल कॉलेज लंदन के रिसर्चर्स की एक नई एनालिसिस में दावा किया गया है कि कांगो में इबोला इंफेक्शन के वास्तविक मामले आधिकारिक आंकड़ों से कहीं ज्यादा हो सकते हैं.&amp;nbsp;
रिपोर्ट के मुताबिक, मई के मध्य तक इबोला के 400 से 800 मामले सामने आ चुके हो सकते हैं, जबकि कुछ एक्सपर्ट्स ने यह संख्या 1000 से ज्यादा होने की आशंका भी जताई है। सबसे ज्यादा मामले कांगो के इटुरी प्रांत में मिले हैं, जहां अप्रैल के आखिर से लगातार संक्रमण फैल रहा है.&amp;nbsp;
कैसे फैलता है इसका खतरा?
सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के अनुसार, इबोला एक बेहद खतरनाक वायरल बीमारी है, जो इंफेक्टेड व्यक्ति के खून, पसीने, उल्टी, लार या दूसरे बॉडी फ्लूइड्स के संपर्क में आने से फैलती है. हेल्थ एक्सपर्ट्स के अनुसार, यह वायरस हवा या पानी से नहीं फैलता, लेकिन इंफेक्टेड व्यक्ति के बहुत करीब आने पर खतरा बढ़ जाता है. खासकर डॉक्टर, नर्स और मरीज की देखभाल करने वाले लोग सबसे ज्यादा जोखिम में रहते हैं.
क्या होते हैं इसके शुरुआती लक्षण?
इबोला के शुरुआती लक्षण अक्सर सामान्य वायरल बुखार जैसे दिखाई देते हैं, इसलिए शुरुआत में इसकी पहचान करना मुश्किल हो सकता है. इंफेक्टेड व्यक्ति को तेज बुखार, सिरदर्द, बदन दर्द, कमजोरी और गले में दर्द महसूस हो सकता है. बीमारी बढ़ने पर उल्टी, दस्त, स्किन रैश और कई मामलों में अंदरूनी या बाहरी ब्लीडिंग भी शुरू हो सकती है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि इंफेक्शन के बाद लक्षण दिखने में 2 से 21 दिन तक लग सकते हैं. हालांकि, औसतन 8 से 10 दिन के भीतर मरीज में बीमारी के संकेत दिखने लगते हैं. राहत की बात यह है कि लक्षण शुरू होने से पहले इंफेक्टेड व्यक्ति वायरस नहीं फैलाता.
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कैसे कर सकते हैं इससे बचाव?
अपोलो हॉस्पिटल के डॉक्टर्स के मुताबिक, इबोला से बचाव के लिए सावधानी सबसे जरूरी हथियार है. इंफेक्टेड मरीज के संपर्क में आने से बचें, हाथों को बार-बार साबुन से धोएं और किसी भी बीमार व्यक्ति के खून या बॉडी फ्लूइड्स को छूने से बचें. अगर कोई व्यक्ति हाल ही में इबोला प्रभावित इलाके से लौटा हो और उसे तेज बुखार या कमजोरी महसूस हो रही हो, तो तुरंत मेडिकल जांच करवानी चाहिए. हेल्थ एजेंसियां यह भी मानती हैं कि वैक्सीनेशन और कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग इबोला को रोकने में सबसे प्रभावी हथियार साबित हो रहे हैं. &amp;nbsp;वहीं, हेल्थ वर्कर्स के लिए पीपीई किट, मास्क, ग्लव्स और सख्त संक्रमण नियंत्रण उपायों को बेहद जरूरी बताया गया है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 26 May 2026 13:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>Explained: आंत&amp;पेट में ऑक्सीजन पहुंचना बंद, शरीर में खून के थक्के और किस्सा खत्म! कितनी गर्मी झेलने के बाद कैसे हो जाती मौत?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/explained-आंत-पेट-में-ऑक्सीजन-पहुंचना-बंद-शरीर-में-खून-के-थक्के-और-किस्सा-खत्म-कितनी-गर्मी-झेलने-के-बाद-कैसे-हो-जाती-मौत</link>
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        <description><![CDATA[ दुनिया के 100 सबसे गर्म शहरों की लिस्ट में सूडान, चाड, ईरान या मिडिल ईस्ट के रेगिस्तानी इलाकों का नाम होना चाहिए. लेकिन हैरान करने वाली सच्चाई ये है कि इस पूरी लिस्ट में से 97 शहर अकेले भारत के हैं. ये कोई मजाक नहीं, बल्कि मई 2026 की वो भयानक सच्चाई है जिसने पूरे देश को झुलसा कर रख दिया है. बालंगीर, सासाराम, बांदा और वाराणसी जैसे शहरों में पारा 48 डिग्री सेल्सियस के पार जा चुका है. हालात इतने बदतर हैं कि तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में अब तक 37 से ज्यादा लोग हीटवेव की वजह से अपनी जान गंवा चुके हैं.
ये कहानी सिर्फ आसमान से बरसती आग की नहीं है, ये कहानी है हमारे शरीर की उस आखिरी लड़ाई की, जो ये भीषण गर्मी से लड़ रहा है. आइए समझते हैं कि ये रिकॉर्डतोड़ गर्मी में हमारा शरीर कितना तापमान झेल सकता है, गर्मी आखिर जान कैसे ले लेती है और हम इस आफत से खुद को और अपनों को कैसे बचा सकते हैं...
दुनिया की सबसे गर्म लिस्ट पर भारत का कब्जा: 97 शहर, एक कहानी
22 मई 2026 की दोपहर AQI.in के लाइव डेटा ने जो तस्वीर पेश की, वो डराने वाली थी. दुनिया के 100 सबसे गर्म शहरों में से 97 भारत में थे. बालंगीर (ओडिशा) और सासाराम (बिहार) में तापमान 48 डिग्री सेल्सियस रिकॉर्ड हुआ, जबकि वाराणसी (उत्तर प्रदेश) 47 डिग्री सेल्सियस के साथ तीसरे नंबर पर रहा। इन शहरों में नमी का स्तर 6 से 8 प्रतिशत के बीच था, जो स्थितियों को &#039;बेहद गर्म&#039; (एक्सट्रीम हॉट) कैटेगरी में डाल रहा था.
गौर करने वाली बात ये है कि इस लिस्ट में बाकी तीन शहर भी भारत के पड़ोसी देश नेपाल के थे- धनगढ़ी, नेपालगंज और लुम्बिनी संस्कृतिक. मतलब पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा गर्मी भारतीय उपमहाद्वीप में पड़ रही थी. ये कोई पहली बार नहीं है. इससे पिछले हफ्ते 19 मई को तो हालात और भी गंभीर थे, जब दुनिया के सभी 100 सबसे गर्म शहर भारत में ही थे. औरैया, बांदा और इटावा (तीनों उत्तर प्रदेश) 46 डिग्री सेल्सियस के साथ टॉप पर थे.
आखिर इंसानी शरीर कितनी गर्मी झेल सकता है?
ये सवाल शायद आपके मन में भी आया होगा. इसका जवाब सिर्फ थर्मामीटर पर लिखे नंबर में नहीं, बल्कि एक खास टर्म में छिपा है- &#039;वेट-बल्ब टेम्परेचर&#039;
वेट-बल्ब टेम्परेचर दरअसल तापमान और नमी का वो खतरनाक कॉम्बिनेशन है जो हमारे शरीर की ठंडा होने की क्षमता को पूरी तरह बंद कर देता है. आमतौर पर हमारा शरीर पसीने को भाप बनाकर खुद को ठंडा रखता है. लेकिन जब हवा में बहुत ज्यादा नमी हो, तो पसीना सूखता नहीं, शरीर की गर्मी बाहर नहीं निकल पाती और शरीर का तापमान लगातार बढ़ता जाता है.
लंबे समय तक ये माना जाता रहा कि 35 डिग्री सेल्सियस का वेट-बल्ब तापमान (जो 100% नमी पर 35 डिग्री सेल्सियस या 50% नमी पर 46 डिग्री सेल्सियस के बराबर होता है) वो आखिरी हद है, जिसके बाद इंसानी शरीर खुद को ठंडा नहीं रख सकता. लेकिन पेन स्टेट यूनिवर्सिटी की एक चौंकाने वाली रिसर्च ने इस मिथक को तोड़ दिया. उनके PSU H.E.A.T. प्रोजेक्ट में जब युवा और स्वस्थ लोगों को अलग-अलग तापमान और नमी में रखा गया, तो पता चला कि शरीर की ठंडा रहने की क्षमता 35 डिग्री सेल्सियस से काफी पहले ही खत्म होने लगती है.
नई रिसर्च के मुताबिक, ये खतरनाक हद सिर्फ 31 डिग्री सेल्सियस वेट-बल्ब तापमान पर ही शुरू हो जाती है.
इसे ऐसे समझिए- अगर नमी 100% हो तो 31 डिग्री सेल्सियस और अगर नमी 60% हो तो 38 डिग्री सेल्सियस का सामान्य तापमान भी जानलेवा हो सकता है. &#039;हमारी रिसर्च बताती है कि गर्मी और नमी का खतरनाक कॉम्बिनेशन, वैज्ञानिकों के पिछले अनुमान से कहीं ज्यादा तेजी से जानलेवा बन सकता है.&#039;
कैसे होती है गर्मी से मौत?
गर्मी से मौत का सबसे बड़ा कारण है हीटस्ट्रोक, यानी शरीर का तापमान इतना बढ़ जाना कि अंग काम करना बंद कर दें. लेकिन क्या आप जानते हैं कि गर्मी तीन अलग-अलग तरीकों से जान लेती है?

हीटस्ट्रोक: जब दिमाग और अंग सब फेल हो जाएं. जब शरीर का अंदरूनी तापमान 40 डिग्री सेल्सियस पार कर जाता है, तब हीटस्ट्रोक होता है. यूनिवर्सिटी ऑफ सिडनी के प्रोफेसर ओली जे बताते हैं कि इस दौरान शरीर ठंडा होने के लिए खून की धारा को त्वचा की तरफ मोड़ देता है. इसका नतीजा ये होता है कि आंतों और पेट तक खून और ऑक्सीजन पहुंचना बंद हो जाता है. नतीजा? आंतों में मौजूद टॉक्सिन्स खून में लीक होने लगते हैं. &#039;ये एक चेन रिएक्शन शुरू करता है. पूरे शरीर में खून के थक्के बनने लगते हैं, एक के बाद एक अंग फेल होने लगते हैं और आखिर में मौत हो जाती है.&#039;
दिल पर जानलेवा दबाव: ह्यूस्टन मेथोडिस्ट हॉस्पिटल के इमरजेंसी मेडिसिन डायरेक्टर नील गांधी बताते हैं कि गर्मी के दौरान वो अक्सर ऐसे मरीज देखते हैं जिनके शरीर का तापमान 104 या 105 डिग्री फॉरेनहाइट से भी ऊपर पहुंच जाता है. &#039;बस कुछ डिग्री और बढ़ने पर ऐसे मरीज की जान जाने का बहुत ज्यादा खतरा हो जाता है.&#039; गर्मी में शरीर ठंडा रहने के लिए दिल को सामान्य से कई गुना ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है. प्रोफेसर जे के के मुताबिक, &#039;आप अपने दिल से सामान्य से बहुत ज्यादा काम करवा रहे होते हैं. जिसे पहले से दिल की बीमारी है, उसके लिए तो ये ऐसा है जैसे खराब हैमस्ट्रिंग (जांघ की मांसपेशी) के साथ बस दौड़ने की कोशिश करना. कुछ न कुछ तो टूटेगा ही.&#039;
डिहाइड्रेशन: पसीने के जरिए शरीर से इतना पानी निकल जाता है कि किडनी पर जबरदस्त दबाव पड़ता है. हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर रेनी सालास बताती हैं, &#039;डिहाइड्रेशन शॉक में बदल सकता है, जिससे अंगों तक खून, ऑक्सीजन और पोषक तत्व पहुंचना बंद हो जाते हैं. इससे दौरे पड़ सकते हैं और मौत हो सकती है.&#039; इसके अलावा, गर्मी दिमाग पर भी सीधा असर करती है. इससे इंसान कन्फ्यूज हो जाता है, सोचने-समझने की शक्ति खो देता है और बेहोश हो सकता है.

अभी तक सरकारी रिकॉर्ड में पूरे भारत में हीटवेव से करीब 37-40 मौतें दर्ज की गई हैं. लेकिन ये आंकड़ा असलियत से बहुत कम है. टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, बहुत सारी म ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 26 May 2026 01:30:16 +0530</pubDate>
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        <title>Nail Polish Cancer Risk: नेल पॉलिश से भी हो सकता है कैंसर, आप भी रोज लगाती हैं तो हो जाएं सावधान</title>
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        <description><![CDATA[ Side Effects Of Wearing Nail Polish Daily: खूबसूरत और स्टाइलिश नाखूनों का ट्रेंड पिछले कुछ सालों में तेजी से बढ़ा है. लंबे, डिजाइनर और रंग-बिरंगे नेल्स अब फैशन का अहम हिस्सा बन चुके हैं. सोशल मीडिया पर सेलिब्रिटीज और इंफ्लुएंसर्स हर हफ्ते नए नेल आर्ट और नेल पॉलिश लुक्स दिखाते नजर आते हैं. एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2023 में ग्लोबल नेल सैलून मार्केट की वैल्यू करीब 11.96 बिलियन डॉलर थी, जो 2030 तक 20.30 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकती है.&amp;nbsp;
क्या चमकदार नाखून आपके लिए हानिकारक हैं?
&amp;nbsp;इन चमकदार नाखूनों के पीछे एक ऐसा खतरा भी छिपा हो सकता है, जिसे ज्यादातर लोग नजरअंदाज कर देते हैं. हाल के दिनों में यह चर्चा तेजी से बढ़ी है कि नेल पॉलिश में मौजूद कुछ केमिकल्स कैंसर का खतरा बढ़ा सकते हैं. गुरुग्राम की सर्जिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. वर्तिका विशवानी के मुताबिक, पारंपरिक नेल पॉलिश में फॉर्मल्डिहाइड, टोल्यून और डीबीपी जैसे कई हानिकारक केमिकल्स पाए जाते हैं. उन्होंने बताया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने फॉर्मल्डिहाइड को कैंसर पैदा करने वाले पदार्थों की सूची में शामिल किया है.&amp;nbsp;
क्या नेल पॉलिश लगाना ही नहीं चाहिए?
हालांकि डॉक्टर का कहना है कि कभी-कभार नेल पॉलिश लगाने वालों में कैंसर का खतरा काफी कम होता है. लेकिन जो लोग रोजाना इन केमिकल्स के संपर्क में रहते हैं, जैसे नेल सैलून में काम करने वाले कर्मचारी, उनमें खतरा बढ़ सकता है. लगातार केमिकल्स की गंध और धुएं के संपर्क में रहने से नाक और गले से जुड़े कैंसर का जोखिम बढ़ने की आशंका रहती है.
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किस कैंसर का रहता है खतरा?
एक्सपर्ट का कहना है कि सिर्फ नेल पॉलिश ही नहीं, बल्कि उसे जल्दी सुखाने के लिए इस्तेमाल होने वाली यूवी लाइट्स भी चिंता का कारण बन सकती हैं. साल 2023 की एक स्टडी में दावा किया गया था कि यूवी लैंप डीएनए को नुकसान पहुंचा सकते हैं, जिससे स्किन कैंसर का खतरा बढ़ सकता है. हालांकि यह रिसर्च अभी लैब स्तर तक सीमित है और इंसानों पर इसके असर को लेकर स्टडी जारी है.&amp;nbsp;
किन बातों का रखना चाहिए ध्यान?
डॉक्टरों के मुताबिक अगर सही सावधानी बरती जाए तो नेल पॉलिश का इस्तेमाल अपेक्षाकृत सुरक्षित हो सकता है. इसके लिए फ्री लेबल वाली ऐसी नेल पॉलिश चुनने की सलाह दी जाती है जिनमें खतरनाक केमिकल्स कम हों. इसके अलावा नेल पॉलिश खरीदते समय उसमें मौजूद केमिकल्स की जानकारी जरूर पढ़नी चाहिए और फॉर्मल्डिहाइड, टोल्यून, कैम्फर और डीबीपी जैसे तत्वों से बचना चाहिए. अगर यूवी लैंप का इस्तेमाल किया जा रहा है, तो हाथों पर सनस्क्रीन लगाना भी जरूरी माना जाता है. दिलचस्प बात यह है कि साल 2026 में नेचुरल और सिंपल नेल्स का ट्रेंड तेजी से लोकप्रिय हो रहा है. फैशन इंडस्ट्री में अब कम मेकअप और बिना ज्यादा नेल पॉलिश वाले साफ-सुथरे नाखूनों को क्वाइट लग्जरी स्टाइल का हिस्सा माना जा रहा है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 26 May 2026 01:30:15 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Eating 2 Eggs Daily: अंडे से कोलेस्ट्रॉल बढ़ने का डर छोड़ें, रोज 2 अंडे खाने से शरीर में दिखेंगे ये बड़े बदलाव</title>
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        <description><![CDATA[ What Happens If You Eat 2 Eggs Every Day: कई सालों तक अंडों को लेकर लोगों के मन में उलझन बनी रही. कभी इन्हें हेल्दी प्रोटीन का सबसे आसान सोर्स बताया गया, तो कभी कोलेस्ट्रॉल बढ़ाने वाला खाद्य पदार्थ. लेकिन अब रिसर्च और एक्सपर्ट्स की राय पहले से कहीं ज्यादा साफ है. ज्यादातर स्वस्थ लोगों के लिए रोज दो अंडे खाना नुकसानदायक नहीं, बल्कि फायदेमंद आदत हो सकती है, अगर बाकी डाइट भी संतुलित हो.
एक अंडे से आपके शरीर को क्या- क्या मिलता है?
एक बड़े अंडे में करीब 70 से 72 कैलोरी और लगभग 6 ग्राम प्रोटीन होता है. इसके अलावा इसमें कोलीन, बी-विटामिन्स, ल्यूटिन और जीएक्सैंथिन जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो दिमाग, आंखों और नर्व सिस्टम के लिए जरूरी माने जाते हैं. यही वजह है कि अंडे खाने के बाद पेट लंबे समय तक भरा हुआ महसूस होता है. हावर्ड हेल्थ के मुताबिक, प्रोटीन से भरपूर अंडे भूख को कंट्रोल करने और बार-बार खाने की इच्छा कम करने में मदद कर सकते हैं.
रोज अंडे खाने से क्या होगा इफेक्ट?
अगर कोई व्यक्ति रोज सुबह दो अंडे खाना शुरू करता है, तो शुरुआती एक हफ्ते में सबसे बड़ा बदलाव उसकी भूख और एनर्जी में दिखाई दे सकता है. अंडे धीरे पचते हैं, इसलिए बार-बार स्नैकिंग की जरूरत कम महसूस होती है. खासतौर पर अगर उनकी जगह मीठा सीरियल, पेस्ट्री या सफेद ब्रेड वाला नाश्ता हटाया जाए, तो सुबह की क्रेविंग्स भी कम हो सकती हैं.
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क्या डेली अंडे खाने से हमें कोई दिक्कत होती है?
दूसरे और तीसरे हफ्ते तक असर थोड़ा और स्थिर दिखाई देने लगता है।.प्रोसेस्ड ब्रेकफास्ट की जगह अंडे लेने से कई लोगों को एनर्जी ज्यादा स्थिर महसूस होती है और भारीपन या सुस्ती कम लगती है. हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली संस्था मायो क्लिनिक के अनुसार अंडों में मौजूद कोलेस्ट्रॉल, ट्रांस फैट और ज्यादा सैचुरेटेड फैट जितना नुकसान नहीं पहुंचाता. एक्सपर्ट्स का कहना है कि अंडों से ज्यादा फर्क इस बात से पड़ता है कि उन्हें किस चीज के साथ खाया जा रहा है.
अंडे के साथ क्या कॉम्बिनेशन
असल चिंता का विषय अक्सर अंडा नहीं, बल्कि उसके साथ खाया जाने वाला बेकन, सॉसेज, ज्यादा मक्खन, चीज और रिफाइंड ब्रेड होते हैं। अगर अंडों को सब्जियों, ओट्स, होल ग्रेन टोस्ट, बीन्स या एवोकाडो जैसी चीजों के साथ खाया जाए, तो यह एक संतुलित और हेल्दी मील बन सकता है. मायो क्लिनिक के अनुसार अंडों के साथ खाए जाने वाले कई खाद्य पदार्थ हार्ट रिस्क बढ़ाने में ज्यादा भूमिका निभाते हैं.
इन लोगों को रखना चाहिए ध्यान
हालांकि हर किसी के लिए रोज दो अंडे सही हों, ऐसा जरूरी नहीं. जिन लोगों को डायबिटीज, हाई एलडीएल कोलेस्ट्रॉल या फैमिली हिस्ट्री में हार्ट डिजीज की समस्या है, उन्हें अपनी पूरी डाइट और ब्लड रिपोर्ट पर ध्यान देने की जरूरत होती है. कुछ रिसर्च में डायबिटीज वाले लोगों में ज्यादा अंडे खाने और हार्ट डिजीज रिस्क के बीच संबंध भी देखा गया है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 26 May 2026 01:30:14 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Tulsi Gabbard Bone Cancer: तुलसी गबार्ड के पति को हुआ बोन कैंसर, जानें यह कितना खतरनाक और इसके लक्षण?</title>
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        <description><![CDATA[ Tulsi Gabbard Bone Cancer:&amp;nbsp;अमेरिका में खुफिया विभाग की प्रमुख (DNI) तुलसी गबार्ड ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, तुलसी ने अपने पति की खराब सेहत के कारण यह फैसला लिया है. दरअसल, उनके पति अब्राहम विलियम्स हड्डियों के कैंसर यानी बोन कैंसर से जूझ रहे हैं. तुलसी गबार्ड ने प्रेस से बातचीत में बताया कि वह इस मुश्किल समय में अपने पति के साथ हर पल रहना चाहती हैं और कैंसर के खिलाफ इस लड़ाई में उनका पूरा साथ देना चाहती हैं. इस खबर के सामने आने के बाद लोग बोन कैंसर के बारे में ज्यादा जानना चाहते हैं कि आखिर यह बीमारी कितनी खतरनाक होती है और इसके लक्षण क्या हैं.
क्या होता है बोन कैंसर?
बोन कैंसर एक ऐसी बीमारी है जिसमें हड्डियों की कोशिकाएं असामान्य तरीके से बढ़ने लगती हैं. यह कैंसर सीधे हड्डियों में शुरू हो सकता है या फिर शरीर के किसी दूसरे हिस्से से हड्डियों तक फैल सकता है. डॉक्टरों के मुताबिक यह बीमारी काफी दुर्लभ मानी जाती है, लेकिन अगर समय पर इलाज न मिले तो यह गंभीर रूप ले सकती है. कई बार शुरुआत में इसके लक्षण सामान्य दर्द जैसे लगते हैं, इसलिए लोग इसे नजरअंदाज कर देते हैं. यही लापरवाही बाद में बड़ी परेशानी बन सकती है.
बोन कैंसर के लक्षण क्या हैं?
बोन कैंसर का सबसे आम लक्षण हड्डियों में लगातार दर्द होना है. यह दर्द रात के समय ज्यादा बढ़ सकता है. इसके अलावा शरीर के किसी हिस्से में सूजन, गांठ या कमजोरी महसूस हो सकती है. कई लोगों को चलने-फिरने में परेशानी होने लगती है और छोटी चोट में भी हड्डी टूट सकती है. कुछ मरीजों को थकान, बुखार और वजन कम होने जैसी दिक्कतें भी होती हैं. डॉक्टरों का कहना है कि अगर लंबे समय तक हड्डियों में दर्द बना रहे तो तुरंत जांच करवानी चाहिए ताकि बीमारी का समय पर पता चल सके.
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कितना खतरनाक है यह कैंसर और क्या है इलाज?
बोन कैंसर एक गंभीर बीमारी है, लेकिन सही समय पर इलाज शुरू हो जाए तो मरीज ठीक भी हो सकते हैं. इसका इलाज कैंसर की स्थिति और प्रकार पर निर्भर करता है. डॉक्टर सर्जरी, रेडिएशन और दवाइयों की मदद से इसका इलाज करते हैं. कई मामलों में कैंसर वाली हड्डी के हिस्से को हटाना भी पड़ सकता है. डॉक्टर सलाह देते हैं कि शरीर में लंबे समय तक रहने वाले दर्द या सूजन को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. तुलसी गबार्ड के पति की बीमारी ने एक बार फिर लोगों का ध्यान इस खतरनाक बीमारी की तरफ खींचा है और यह याद दिलाया है कि समय पर जांच और इलाज बहुत जरूरी है.
बोन कैंसर से बचाव के लिए क्या करें?
डॉक्टरों के अनुसार हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाकर बोन कैंसर के खतरे को कम किया जा सकता है. इसके लिए संतुलित और पौष्टिक आहार लेना बहुत जरूरी है. डाइट में ऐसी चीजें शामिल करनी चाहिए जो हड्डियों को मजबूत बनाए रखें. नियमित व्यायाम करने से शरीर एक्टिव रहता है और कई गंभीर बीमारियों का खतरा कम होता है. इसके अलावा धूम्रपान और शराब से दूरी बनाकर रखना चाहिए. अगर शरीर में लगातार दर्द हो, खासकर हड्डियों में दर्द महसूस हो, तो तुरंत डॉक्टर से जांच करवानी चाहिए. समय-समय पर हेल्थ चेकअप कराते रहना भी बेहद जरूरी माना जाता है. तुलसी गबार्ड के पति की बीमारी ने एक बार फिर लोगों को यह समझाया है कि समय पर जांच और सही इलाज कितनी बड़ी भूमिका निभाते हैं.
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        <pubDate>Sun, 24 May 2026 21:30:13 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Sattu Benefits In Summer: गर्मियों में वरदान है बिहार का सत्तू, इस तरह पिएंगे तो शरीर के पास आने से भी डरेगी लू</title>
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        <description><![CDATA[ How Sattu Helps Protect The Body From Heatwave: गर्मियों की शुरुआत होते ही लोग शरीर को ठंडा रखने के लिए तरह-तरह के ड्रिंक्स पीना शुरू कर देते हैं. कोई कोल्ड ड्रिंक का सहारा लेता है तो कोई पैकेट वाले जूस का. लेकिन बिहार का पारंपरिक सत्तू आज भी गर्मी से राहत देने वाले सबसे असरदार देसी सुपरफूड्स में गिना जाता है. खास बात यह है कि यह सिर्फ शरीर को ठंडक ही नहीं देता, बल्कि लू, डिहाइड्रेशन और कमजोरी जैसी समस्याओं से बचाने में भी मदद करता है.&amp;nbsp;
क्यों है सत्तू का ड्रिंक खास?
सत्तू भुने हुए चने से तैयार किया जाता है और लंबे समय से बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में गर्मियों के सबसे भरोसेमंद पेय के रूप में इस्तेमाल होता आया है. अब हेल्थ एक्सपर्ट्स भी इसे नेचुरल एनर्जी ड्रिंक मान रहे हैं. क्योंकि इसमें प्रोटीन, फाइबर, आयरन, मैग्नीशियम और पोटैशियम जैसे जरूरी पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो शरीर को अंदर से मजबूत बनाए रखते हैं.&amp;nbsp;
गर्मी के मौसम में क्यों है फायदेमंद?
गर्मी में शरीर से पसीने के जरिए तेजी से पानी और मिनरल्स निकलने लगते हैं. यही वजह है कि कई लोगों को थकान, चक्कर, डिहाइड्रेशन और लू जैसी समस्याएं होने लगती हैं. सत्तू इन समस्याओं से बचाने में मदद कर सकता है. इसमें मौजूद इलेक्ट्रोलाइट्स शरीर में पानी का संतुलन बनाए रखते हैं और शरीर को लंबे समय तक हाइड्रेटेड रखने में मदद करते हैं. Artemishospitals के हेल्थ एक्सपर्ट्स के मुताबिक, सत्तू की तासीर ठंडी मानी जाती है. जब इसे ठंडे पानी, नींबू या छाछ के साथ मिलाकर पिया जाता है, तो यह शरीर की अंदरूनी गर्मी को कम करने में मदद करता है। यही कारण है कि गांवों में खेतों में काम करने वाले लोग आज भी तेज धूप में निकलने से पहले सत्तू पीना पसंद करते हैं.
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सत्तू पीने के क्या होते हैं फायदे?
सिर्फ ठंडक ही नहीं, सत्तू पेट के लिए भी काफी फायदेमंद माना जाता है. इसमें भरपूर फाइबर होता है, जो पाचन को बेहतर बनाता है और कब्ज, गैस व एसिडिटी जैसी समस्याओं को कम करने में मदद करता है. यही वजह है कि गर्मियों में भारी और तली-भुनी चीजों की जगह लोग सत्तू का सेवन ज्यादा करते हैं. डॉक्टरों का कहना है कि सत्तू ब्लड शुगर को तेजी से बढ़ने नहीं देता. इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम होता है, इसलिए डायबिटीज मरीज भी सीमित मात्रा में इसका सेवन कर सकते हैं. इसके साथ ही इसमें मौजूद प्रोटीन लंबे समय तक पेट भरा रखने में मदद करता है, जिससे बार-बार भूख नहीं लगती और वजन कंट्रोल करने में भी मदद मिल सकती है.
इस बात का जरूर रखें ध्यान
हालांकि एक्सपर्ट्स सलाह देते हैं कि सत्तू हमेशा सही मात्रा में ही पीना चाहिए. जरूरत से ज्यादा सेवन करने पर कुछ लोगों को पेट फूलना या गैस जैसी दिक्कत हो सकती है.
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        <pubDate>Sun, 24 May 2026 21:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>Summer Heat And Lungs: बढ़ती गर्मी में खराब हो सकते हैं आपके फेफड़े, सांस के मरीज बढ़ने की आशंका</title>
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        <description><![CDATA[ How Summer Heat Affects Lung Health: देश का एक हिस्सा इस समय गर्मी से बेहाल है. कई जिलों में पारा 46- 47 डिग्री तक पहुंच गया है, लोग घर से निकलने से परहेज करने लगे हैं. ऐसे में बढ़ती गर्मी सिर्फ असहजता ही नहीं बढ़ा रही, बल्कि फेफड़ों की सेहत के लिए भी बड़ा खतरा बनती जा रही है. डॉक्टरों के मुताबिक अस्थमा, क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज , एलर्जी और अन्य सांस संबंधी बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए तेज गर्मी और उमस गंभीर परेशानी पैदा कर सकती है. &amp;nbsp;बढ़ता तापमान, हवा में नमी, प्रदूषण, धूल, छोटे कण और स्मॉग मिलकर फेफड़ों पर अतिरिक्त दबाव डालते हैं, जिससे सांस लेने में दिक्कत बढ़ सकती है और रेस्पिरेटरी अटैक का खतरा भी बढ़ जाता है.&amp;nbsp;
तापमान से कैसे पड़ता है फेफडों पर असर
पटना स्थित ऑरो सुपरस्पेशलिटी हॉस्पिटल की विशेषज्ञ डॉ. अंजली सौरभ बताती हैं कि अत्यधिक गर्मी केवल शरीर का तापमान ही नहीं बढ़ाती, बल्कि यह सीधे फेफड़ों की काम करने की क्षमता, ऑक्सीजन लेवल और एयरवे इंफ्लेमेशन को भी प्रभावित करती है. शरीर खुद को ठंडा रखने के लिए ज्यादा मेहनत करता है, जिससे हार्ट रेट और सांस लेने की गति बढ़ जाती है. स्वस्थ लोगों को यह केवल बेचैनी जैसा महसूस हो सकता है, लेकिन अस्थमा औरक्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज के मरीजों में यह स्थिति सांस फूलने और थकान को गंभीर बना सकती है.&amp;nbsp;
क्यों बढ़ जाती है जलन?
डॉक्टरों के अनुसार उमस यानी ह्यूमिडिटी समस्या को और बढ़ा देती है. नमी वाली भारी हवा में सांस लेना मुश्किल महसूस होता है क्योंकि इससे पसीना जल्दी नहीं सूखता और शरीर को ठंडा होने में परेशानी होती है. यही नहीं, ज्यादा नमी प्रदूषण, धुएं और एलर्जी पैदा करने वाले कणों को जमीन के करीब रोककर रखती है, जिससे सांस की नलियों में जलन बढ़ सकती है.
एक्सपर्ट बताते हैं कि गर्मियों में खासतौर पर भीड़भाड़ वाले शहरों में ग्राउंड लेवल ओजोन और स्मॉग तेजी से बनता है. यह स्थिति खांसी, घरघराहट, सीने में जकड़न और अस्थमा अटैक का कारण बन सकती है. अस्थमा के मरीजों में गर्म और उमस भरा मौसम एयरवे को ज्यादा संवेदनशील बना देता है. वहीं क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज मरीजों में सांस फूलना, ज्यादा खांसी, थकान और बलगम बनने जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं.
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किन लोगों को होती है सबसे ज्यादा दिक्कत?
डॉक्टरों के मुताबिक बुजुर्ग, छोटे बच्चे, धूम्रपान करने वाले लोग, हार्ट डिजीज से पीड़ित मरीज, बाहर काम करने वाले कर्मचारी और प्रदूषित शहरों में रहने वाले लोग सबसे ज्यादा जोखिम में हैं. जिन लोगों की लंग्स की क्षमता पहले से कमजोर होती है, उन्हें थोड़ी देर की गर्मी भी गंभीर परेशानी में डाल सकती है. एक्सपर्ट ने चेतावनी दी है कि अगर तेज सांस फूलना, लगातार घरघराहट, सीने में जकड़न, बात करने में दिक्कत, होंठ नीले पड़ना, चक्कर आना या लगातार खांसी जैसे लक्षण दिखाई दें तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए. समय रहते इलाज मिलने से गंभीर स्थिति से बचा जा सकता है.&amp;nbsp;
क्या कर सकते हैं बचाव
डॉक्टरों की सलाह है कि दोपहर 11 बजे से शाम 4 बजे तक घर के अंदर रहें, एयर क्वालिटी इंडेक्स पर नजर रखें और ज्यादा प्रदूषण वाले दिनों में बाहर निकलने से बचें. घर के अंदर की हवा को साफ और ठंडा रखने के लिए खिड़कियां बंद रखें, पर्दों का इस्तेमाल करें और धूम्रपान से दूरी बनाए रखें. एक्सपर्ट का कहना है कि छोटी-छोटी सावधानियां गर्मियों में फेफड़ों को सुरक्षित रखने में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 24 May 2026 21:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>Mouth Cancer In Young Adults: नॉन&amp;स्मोकर्स युवाओं में तेजी से फैल रहा ओरल कैंसर, इन लक्षणों को कतई न करें इग्नोर</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/mouth-cancer-in-young-adults-नॉन-स्मोकर्स-युवाओं-में-तेजी-से-फैल-रहा-ओरल-कैंसर-इन-लक्षणों-को-कतई-न-करें-इग्नोर</link>
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        <description><![CDATA[ Why Are Non Smokers Getting Mouth Cancer: कई सालों तक मुंह के कैंसर को एक ऐसी बीमारी माना जाता रहा, जो ज्यादातर उम्रदराज पुरुषों में होती है. खासकर उन लोगों में, जो लंबे समय से सिगरेट या तंबाकू का सेवन करते रहे हों. लेकिन अब भारत के डॉक्टर एक बेहद चिंताजनक बदलाव देख रहे हैं. 20 और 30 की उम्र के युवा, जिनमें कई लोग कभी स्मोकिंग तक नहीं करते, एडवांस स्टेज ओरल कैंसर के साथ अस्पताल पहुंच रहे हैं.
क्या सिगरेट नहीं पीने वाले भी हो रहे हैं शिकार?
इनमें कुछ फिटनेस को लेकर बेहद सजग होते हैं, कुछ ने कभी सिगरेट को हाथ तक नहीं लगाया होता. कई लोग अपने करियर की शुरुआत कर रहे होते हैं या नई शादीशुदा जिंदगी जी रहे होते हैं. इसके बावजूद डॉक्टरों के पास ऐसे मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है. भारत पहले से ही दुनिया में ओरल कैंसर के सबसे ज्यादा मामलों वाले देशों में शामिल है. इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के मुताबिक, देश में तंबाकू और सुपारी आधारित उत्पादों के व्यापक इस्तेमाल की वजह से मुंह का कैंसर सबसे आम कैंसरों में से एक बना हुआ है. हालांकि अब डॉक्टरों का कहना है कि खतरा सिर्फ स्मोकिंग तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका रूप बदल चुका है.&amp;nbsp;
लोगों के बीच इसको लेकर गलतफहमी
अपोलो हॉस्पिटल्स के सीनियर कंसलटेंट और हेड एंड नेक ऑन्कोलॉजी एक्सपर्ट डॉ. अक्षत मलिक ने TOI को बताया कि युवाओं के बीच सबसे बड़ी गलतफहमी यही है कि सिर्फ सिगरेट पीने से ही मुंह का कैंसर होता है. उनके मुताबिक &quot;पहले मुंह के कैंसर को उम्रदराज पुरुषों की बीमारी माना जाता था, जो लंबे समय से स्मोकिंग करते हों. लेकिन अब 40 साल से कम उम्र के लोगों में तेजी से केस बढ़ रहे हैं, जिनमें बड़ी संख्या नॉन-स्मोकर्स की भी है.&quot;
किन चीजों का सेवन खतरनाक है?
डॉक्टर बताते हैं कि आज कई युवा सिगरेट की जगह गुटखा, खैनी, पान मसाला, सुपारी और पान जैसे उत्पादों का सेवन करते हैं. ये चीजें सामाजिक और कल्चरल रूप से सामान्य मानी जाती हैं, इसलिए लोग इन्हें नुकसानदेह नहीं समझते. लेकिन मेडिकल एक्सपर्ट्स के मुताबिक, ये आदतें बेहद खतरनाक साबित हो सकती हैं. डॉ मलिक बताते हैं कि ज्यादातर ओरल कैंसर मरीज सिगरेट नहीं पीते, बल्कि तंबाकू के दूसरे रूपों का इस्तेमाल करते हैं, जैसे गुटखा, खैनी, पान मसाला, सुपारी या पान.&quot;
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कैसे हो सकता है नुकसान?
ये पदार्थ लंबे समय तक मसूड़ों और गालों के अंदरूनी हिस्सों के संपर्क में रहते हैं, जिससे सेल्स को लगातार नुकसान पहुंचता रहता है. सबसे बड़ी समस्या यह है कि कई लोग खुद को तंबाकू यूजर मानते ही नहीं, इसलिए उन्हें अपने जोखिम का अंदाजा तक नहीं होता. इसके अलावा मुंह के अंदर लगातार होने वाली छोटी-छोटी समस्याएं भी बड़ा खतरा बन सकती हैं. जैसे टूटा हुआ दांत, जो जीभ को बार-बार चोट पहुंचाता हो, खराब फिटिंग वाले डेंचर, लंबे समय तक रहने वाले इंफेक्शन या खराब ओरल हाइजीन. लोग अक्सर इन चीजों को नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन लगातार होने वाली सूजन और घाव धीरे-धीरे कैंसर का कारण बन सकते हैं.
युवाओं में तेजी से फैल रहा खतरा?
सबसे चिंता की बात यह है कि युवाओं में होने वाला ओरल कैंसर ज्यादा तेजी से फैल सकता है. डॉ. मलिक के अनुसार, &quot;हम मानते हैं कि युवाओं में होने वाला ओरल कैंसर अधिक आक्रामक होता है और तेजी से फैल सकता है.&quot; डॉक्टरों का कहना है कि इस बीमारी में सबसे बड़ा खतरा देर से पहचान होना है. शुरुआती लक्षण अक्सर मामूली लगते हैं, जैसे मुंह में लंबे समय तक रहने वाला छाला, सफेद या लाल धब्बे, खाना खाते समय जलन, निगलने में दिक्कत या गर्दन में गांठ. लोग इन्हें सामान्य समझकर नजरअंदाज कर देते हैं.
इसे भी पढ़ें-&amp;nbsp;दिन में आसमान से बरस रही आग, रातों की भी उड़ी नींद, डॉक्टर से जानें यह कितना खतरनाक?
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 23 May 2026 13:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>Heat Stroke: कितनी लू लगने पर आ जाती है जान पर आफत, क्या हैं इससे बचने के आसान तरीके?</title>
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        <description><![CDATA[ Heat Stroke: कितनी लू लगने पर आ जाती है जान पर आफत, क्या हैं इससे बचने के आसान तरीके? ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 23 May 2026 13:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>Right Way to Eat Mango: आम खाने के बाद खराब हो जाता है पेट? गर्मी में ऐसे ले सकते हैं फलों के राजा का मजा</title>
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        <description><![CDATA[ Right Way to Eat Mango:&amp;nbsp;अगर आप भी मैंगों लवर हैं और सालभर बेसब्री से आम का इंतजार करते हैं तो फलों के राजा आम का सीजन अब शुरु हो चुका है. ऐसे में आम के दीवानों ने अपने-अपने घरों को आम से भरना भी शुरु कर दिया होगा. हालांकि, कई बार देखने में आता है कि ज्यादा आम खाने से पेट खराब हो जाता है. ऐसे में यह सवाल उठता है कि आखिर ऐसी परेशानी क्यों होती है और इससे कैसे बचा जा सकता है?&amp;nbsp;
अगर आप भी आम खाने के बाद पेट खराब होने की समस्या से परेशान हैं तो इसका मतलब खराबी आम में नहीं है, बल्कि आपके खाने के तरीके में है. आइए जानते हैं कि गर्मी में पेट खराब किए बिना आम का मजा कैसे लिया जा सकता है.
आम खाने से क्यों खराब होता है पेट?
आम की तासीर गर्म होती है. इसमें फाइबर और नेचुरल शुगर की मात्रा बहुत अधिक होती है. जब हम एक साथ बहुत सारे आम खा लेते हैं तो पाचन तंत्र पर दबाव पड़ता है. इसके अलावा, आजकल आमों को पकाने के लिए कैल्शियम कार्बाइड जैसे केमिकल्स का इस्तेमाल किया जाता है जो पेट में इन्फेक्शन और मरोड़ का कारण बन सकते हैं.
यह भी पढ़ें: AC And Heatwave Health Risks: AC से निकलते ही धूप में जाना पड़ सकता है भारी, अचानक तापमान बदलने से पड़ सकते हैं बीमार
पानी में भिगोकर रखें- आम खाने से कम से कम 1 से 2 घंटे पहले उसे ठंडे पानी में भिगोकर छोड़ दें. इससे आम की अतिरिक्त गर्मी कम हो जाती है. साथ ही छिलके पर लगे हानिकारक केमिकल भी साफ हो जाते हैं.&amp;nbsp;
सीमित मात्रा में खाएं- स्वाद के चक्कर में एक बार में ज्यादा आम न खाएं. दिनभर में एक या दो आम खाना ही काफी है.
खाने का सही समय- आम को सुबह के नाश्ते में या दोपहर के लंच के बीच खाएं. रात को सोने से ठीक पहले आम खाने से बचें, क्योंकि इससे पाचन बिगड़ सकता है और वजन भी बढ़ सकता है.
दूध या दही के साथ कॉम्बिनेशन- आयुर्वेद के अनुसार, खट्टे आम को दूध के साथ नहीं मिलाना चाहिए. हालांकि, पूरी तरह पके और मीठे आम का शेक बनाकर लिया जा सकता है, जो शरीर को ठंडक देता है.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ें: Dengue Recovery Diet: अभी-अभी डेंगू से ठीक हुए हैं तो ऐसी रखें डाइट, फटाफट होगी रिकवरी ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 23 May 2026 13:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Uric Acid Myth Dal: दाल बनाते समय झाग हटाना सही या गलत, क्या इसमें सच में होता है यूरिक एसिड?</title>
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        <description><![CDATA[ Uric Acid Myth Dal: दाल बनाते समय झाग हटाना सही या गलत, क्या इसमें सच में होता है यूरिक एसिड? ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 23 May 2026 13:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>Nautapa 2026: नौतपा में भूलकर भी न पहन लेना 100 रुपये वाला चश्मा, खराब हो सकती हैं आंखें </title>
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        <description><![CDATA[ Nautapa 2026: हर साल गर्मियों में एक ऐसा समय आता है जब सूरज की गर्मी सबसे ज्यादा तेज हो जाती है. इस समय को &amp;ldquo;नौतपा&amp;rdquo; कहा जाता है. नौतपा का मतलब होता है लगातार 9 दिनों तक पड़ने वाली भीषण गर्मी. इस साल 25 मई से लेकर 2 जून तक नौतपा का असर रहने वाला है. इन दिनों में तापमान काफी बढ़ जाता है, गर्म हवाएं चलती हैं और दोपहर में बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है.
मौसम विशेषज्ञ भी इस दौरान लोगों को ज्यादा सावधानी बरतने की सलाह देते हैं. ऐसे में कई लोग गर्मी से आंखो को बचाने के लिए सड़क के किनारे से चश्मा खरीद लेते हैं, जिसका खामियाजा उनकी आंखों को उठाना पड़ता है.
सस्ता चश्मा आंखों के लिए क्यों है खतरनाक?
गर्मी बढ़ते ही लोग धूप से बचने के लिए सड़क किनारे मिलने वाले 100 या 150 रुपये के सस्ते काले चश्मे खरीद लेते हैं. देखने में ये चश्मे स्टाइलिश लगते हैं, लेकिन आंखों को नुकसान पहुंचा सकते हैं. ऐसे चश्मों में सही UV Protection नहीं होता, जिससे सूरज की हानिकारक किरणें सीधे आंखों तक पहुंच जाती हैं. इससे आंखों में जलन, पानी आना, सिर दर्द और धुंधला दिखने जैसी समस्याएं हो सकती हैं.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ेंः Uric Acid Myth Dal: दाल बनाते समय झाग हटाना सही या गलत, क्या इसमें सच में होता है यूरिक एसिड?
नौतपा में आंखों का ऐसे रखें ध्यान
डॉक्टरों का कहना है कि नौतपा के दौरान अच्छी क्वालिटी का सनग्लास ही पहनना चाहिए. चश्मा खरीदते समय यह जरूर देखें कि उसमें UV Protection मौजूद हो. इसके अलावा तेज धूप में बाहर निकलते समय छाता, टोपी या गमछे का इस्तेमाल करना भी फायदेमंद होता है. कोशिश करें कि दोपहर 12 बजे से 4 बजे के बीच कम बाहर निकलें क्योंकि इसी समय धूप सबसे ज्यादा खतरनाक होती है.&amp;nbsp;
छोटी सी लापरवाही पड़ सकती है भारी
नौतपा के दिनों में शरीर के साथ-साथ आंखों की देखभाल करना भी बेहद जरूरी है. केवल फैशन के लिए सस्ता चश्मा पहनना भविष्य में परेशानी का कारण बन सकता है. गर्मी के इस मौसम में खूब पानी पिएं, आंखों को बार-बार ठंडे पानी से धोएं और अगर आंखों में ज्यादा जलन हो तो डॉक्टर से सलाह लें. साथ ही सही सावधानी अपनाकर आप नौतपा की तेज गर्मी में भी अपनी आंखों को सुरक्षित रख सकते हैं.
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        <pubDate>Sat, 23 May 2026 13:30:05 +0530</pubDate>
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        <title>Vanessa Trump: डोनाल्ड ट्रंप की इस रिश्तेदार को हुआ इतना खतरनाक कैंसर, जानें इसके लक्षण और बचाव के तरीके</title>
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        <description><![CDATA[ Vanessa Trump Reveals Breast Cancer Diagnosis: अमेरिका की पूर्व मॉडल और सोशलाइट वैनेसा ट्रंप ने हाल ही में अपनी सेहत को लेकर एक बेहद भावुक जानकारी साझा की. 20 मई 2026 को उन्होंने सोशल मीडिया पर बताया कि उन्हें ब्रेस्ट कैंसर हो गया है. 48 वर्षीय वैनेसा ने कहा कि हाल ही में उनका एक मेडिकल प्रोसीजर हुआ है और अब वह अपनी ऑन्कोलॉजी टीम के साथ मिलकर लंबे इलाज की तैयारी कर रही हैं. इस खबर के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने उनके जल्द ठीक होने की दुआ की. उनकी बेटी काई ट्रंप ने भी उन्हें सबसे मजबूत इंसान बताया.
कितना खतरनाक है ब्रेस्ट कैंसर?
हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली संस्था clevelandclinic के अनुसार, ब्रेस्ट कैंसर महिलाओं में होने वाले सबसे आम कैंर्स में से एक माना जाता है. यह बीमारी तब शुरू होती है, जब ब्रेस्ट की सेल्स असामान्य तरीके से तेजी से बढ़ने लगती हैं और धीरे-धीरे ट्यूमर का रूप ले लेती हैं. कई मामलों में यह कैंसर शरीर के दूसरे हिस्सों तक भी फैल सकता है, इसलिए समय रहते इसकी पहचान बेहद जरूरी मानी जाती है. हाल ही में अमेरिका की पूर्व मॉडल और सोशलाइट वैनेसा ट्रंप ने खुलासा किया कि उन्हें ब्रेस्ट कैंसर हो गया है. इस खबर के बाद दुनियाभर में लोग उनकी सेहत को लेकर चिंता जता रहे हैं. 48 वर्षीय वैनेसा ने बताया कि उनका मेडिकल प्रोसीजर हो चुका है और अब वह अपनी ऑन्कोलॉजी टीम के साथ इलाज पर काम कर रही हैं.
किनको रहता है इसका खतरा?
हेल्थ एक्सपर्ट्स के मुताबिक, ब्रेस्ट कैंसर सिर्फ बड़ी उम्र की महिलाओं को ही नहीं, बल्कि कम उम्र की महिलाओं को भी प्रभावित कर सकता है. हालांकि 50 साल की उम्र के बाद इसका खतरा ज्यादा बढ़ जाता है. कुछ मामलों में पुरुषों में भी यह बीमारी देखी जाती है. डॉक्टरों का कहना है कि ब्रेस्ट में गांठ महसूस होना इसका सबसे सामान्य लक्षण है, लेकिन इसके अलावा भी कई संकेत हो सकते हैं. जैसे ब्रेस्ट के आकार में बदलाव, त्वचा का लाल या मोटा होना, निप्पल से खून या तरल पदार्थ निकलना, अंडरआर्म में गांठ या लगातार दर्द महसूस होना. कई बार शुरुआती स्टेज में कोई बड़ा लक्षण नजर नहीं आता, इसलिए नियमित जांच बेहद जरूरी मानी जाती है.
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क्या होते हैं इसके कारण?
एक्सपर्ट के अनुसार, बढ़ती उम्र, फैमिली हिस्ट्री, मोटापा, स्मोकिंग, शराब का सेवन, हार्मोनल बदलाव और खराब लाइफस्टाइल इसके बड़े रिस्क फैक्टर्स हो सकते हैं. वहीं BRCA1 और BRCA2 जैसे जेनेटिक म्यूटेशन भी कई महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर का खतरा बढ़ा सकते हैं. डॉक्टर बताते हैं कि समय पर जांच होने पर इस बीमारी का इलाज संभव है. इसके लिए मैमोग्राफी, ब्रेस्ट अल्ट्रासाउंड, एमआरआई और बायोप्सी जैसी जांच की जाती हैं. वहीं इलाज में सर्जरी, कीमोथेरेपी, रेडिएशन, इम्यूनोथेरेपी और हार्मोन थेरेपी शामिल हो सकती हैं. एक्सपर्ट का कहना है कि हेल्दी डाइट, नियमित एक्सरसाइज, वजन कंट्रोल में रखना और समय-समय पर स्क्रीनिंग करवाना ब्रेस्ट कैंसर के खतरे को कम करने में मदद कर सकता है.
पब्लिक लाइफ से दूर नजर आती हैं वैनेस ट्रंप
वैनेसा ट्रंप पिछले कई सालों से सार्वजनिक जीवन का हिस्सा रही हैं. डोनाल्ड ट्रंप जूनियर से शादी के बाद वह अक्सर चर्चाओं में रहीं. दोनों ने 13 साल साथ बिताए और उनके पांच बच्चे हैं. हालांकि 2018 में दोनों का तलाक हो गया था, लेकिन बच्चों की परवरिश को लेकर दोनों ने हमेशा पॉजिटिव रिश्ता बनाए रखा.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 23 May 2026 01:30:37 +0530</pubDate>
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        <title>दिन में आसमान से बरस रही आग, रातों की भी उड़ी नींद, डॉक्टर से जानें यह कितना खतरनाक?</title>
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        <description><![CDATA[ राजधानी दिल्ली समेत पूरा उत्तर भारत इन दिनों भीषण गर्मी और लू (Heatwave) की भयानक चपेट में है. मई के इस महीने में हालात ऐसे हो गए हैं कि मानो आसमान से धूप नहीं, बल्कि आग बरस रही हो. आमतौर पर गर्मियों में दिन के वक्त तेज धूप होती है, लेकिन शाम ढलने के बाद मौसम थोड़ा ठंडा हो जाता है. हालांकि, इस बार मौसम का मिजाज बिल्कुल अलग है. दिल्ली और उत्तर भारत के लोगों को इस बार गर्मी की &#039;डबल मार&#039; झेलनी पड़ रही है, क्योंकि सूरज ढलने के बाद भी तपिश कम नहीं हो रही है. आइए डॉक्टर से जानते हैं कि यह आपकी सेहत के लिए कितना खतरनाक है?
रात में भी 40 डिग्री तक पहुंच रहा तापमान
इस बार की गर्मी ने पिछले कई रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं. परेशानी सिर्फ तेज धूप की नहीं है, बल्कि &#039;गर्म रातों&#039; की है. रात के समय भी दिल्ली समेत उत्तर भारत के कई प्रमुख शहरों का तापमान 35 से 40 डिग्री सेल्सियस के बीच पहुंच रहा है. जब रात में तापमान कम नहीं होता तो इंसानी शरीर को खुद को ठंडा करने और रिकवर करने का समय नहीं मिल पाता, जिससे बीमार पड़ने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है.
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आंकड़ों के मुताबिक, पहाड़ों पर भी गर्मी का कहर है. जम्मू-कश्मीर में रात का न्यूनतम तापमान सामान्य से 3 से 5 डिग्री सेल्सियस तक ज्यादा दर्ज किया जा रहा है. वहीं, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, बिहार, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में भी रात का तापमान सामान्य से 1.6 डिग्री से लेकर 3 डिग्री तक ज्यादा बना हुआ है. कंक्रीट के जंगलों की वजह से रात के समय इमारतें और सड़कें दिन भर सोखी गई गर्मी को बाहर फेंकते हैं, जिससे रातें और ज्यादा दमघोंटू हो गई हैं.
कई राज्यों में रेड और येलो अलर्ट जारी
हालात की गंभीरता को देखते हुए मौसम विभाग ने कई राज्यों के लिए सख्त चेतावनियां जारी की हैं.&amp;nbsp;

रेड अलर्ट (Red Alert): उत्तर प्रदेश, दिल्ली, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के विदर्भ इलाके में भीषण हीटवेव का &#039;रेड अलर्ट&#039; जारी किया गया है. इसका मतलब है कि इन राज्यों में गर्मी जानलेवा स्तर तक पहुंच चुकी है और लोगों को बिना बहुत जरूरी काम के बाहर नहीं निकलना चाहिए.
येलो अलर्ट (Yellow Alert): जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों के साथ-साथ उत्तर भारत के कई अन्य इलाकों में &#039;येलो अलर्ट&#039; है, जहां आमतौर पर मौसम ठंडा रहता था.

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. नरेश कुमार ने मौजूदा हालात पर चिंता जताते हुए बताया है कि मौसम के पैटर्न में फिलहाल बड़े बदलाव के संकेत नहीं हैं. दिन और रात में गर्मी का यह जानलेवा सिलसिला कम से कम अगले 7 दिन तक इसी तरह जारी रहने की आशंका है.
डॉक्टरों की चेतावनी: सेहत के लिए है गंभीर खतरा
गर्मी का यह रूप सेहत के लिए मेडिकल इमरजेंसी जैसा है. नोएडा स्थित कैलाश अस्पताल के इंटरनल मेडिसिन विभाग के एचओडी (HOD) डॉ. एके शुक्ला के मुताबिक, इस बार की गर्मी सिर्फ दिन में नहीं, बल्कि रात में भी सेहत के लिए बड़ा और गंभीर खतरा बन गई है. जब रात में शरीर का तापमान सामान्य नहीं हो पाता तो डिहाइड्रेशन और हीट स्ट्रोक (लू लगना) का खतरा बढ़ जाता है. डॉक्टरों ने विशेष रूप से उन लोगों को ज्यादा सावधान रहने की सलाह दी है, जो पहले से किसी बीमारी से जूझ रहे हैं. अगर आपको हाइपरटेंशन (High Blood Pressure), डायबिटीज (Sugar), या दिल से जुड़ी कोई बीमारी है तो यह मौसम आपके लिए बेहद खतरनाक है.&amp;nbsp;
हीटवेव से खुद को और परिवार को कैसे बचाएं?
अगले एक हफ्ते तक राहत की कोई उम्मीद नहीं है, इसलिए बचाव ही सबसे बड़ी दवा है. स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने कुछ आसान, लेकिन बेहद जरूरी उपाय बताए हैं.

हाइड्रेशन है सबसे जरूरी: प्यास न लगने पर भी थोड़ी-थोड़ी देर में पानी पीते रहें. शरीर में पानी की कमी न होने दें. पानी के अलावा ओआरएस (ORS) का घोल, नींबू पानी, छाछ, लस्सी और नारियल पानी का सेवन लगातार करें.
सिर और शरीर को ढंकें: अगर दिन के समय घर से बाहर निकलना मजबूरी है तो सीधे धूप के संपर्क में आने से बचें. सिर को टोपी, गमछे या छाते से अच्छी तरह ढक कर रखें. हमेशा सूती (Cotton), हल्के रंग और ढीले कपड़े पहनें.
खान-पान का रखें ध्यान: ज्यादा तला-भुना और मसालेदार खाना खाने से बचें. तरबूज, खरबूजा, खीरा और ककड़ी जैसे पानी वाले फलों को अपनी डाइट में शामिल करें.
लक्षणों को न करें नजरअंदाज: अगर अचानक तेज सिरदर्द, चक्कर आना, उल्टी महसूस होना, अत्यधिक पसीना आना या पसीना एकदम से बंद हो जाना और धड़कन तेज होने जैसे लक्षण दिखें तो इसे हल्के में न लें. यह हीट स्ट्रोक (Heatstroke) हो सकता है. ऐसे में तुरंत किसी ठंडी जगह पर जाएं और मेडिकल मदद लें.

ये भी पढ़ें: खांसी, जुकाम, खराश और थकान? मौसम का बदलाव नहीं, शरीर में है ये कमी, पढ़ें डॉक्टर की चेतावनी ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 21 May 2026 21:30:09 +0530</pubDate>
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        <media:keywords>दिन, में, आसमान, से, बरस, रही, आग, रातों, की, भी, उड़ी, नींद, डॉक्टर, से, जानें, यह, कितना, खतरनाक</media:keywords>
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        <title>Night Heatwave: दिन में ही नहीं, रात में भी चल रही लू! बच्चों और महिलाओं के लिए क्यों बढ़ रहा खतरा?</title>
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        <description><![CDATA[ Night Heatwave: दिन में ही नहीं, रात में भी चल रही लू! बच्चों और महिलाओं के लिए क्यों बढ़ रहा खतरा? ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 21 May 2026 21:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>Ebola Virus: कितना खतरनाक है अफ्रीका में फैला इबोला वायरस? जानें इस बीमारी के लक्षण और इलाज का तरीका</title>
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        <description><![CDATA[ How Ebola Virus Spreads Among Humans: अफ्रीका के कुछ हिस्सों में फैले इबोला वायरस ने एक बार फिर दुनिया की चिंता बढ़ा दी है. हाल ही में वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन ने कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य और युगांडा में फैल रहे इबोला इंफेक्शन &amp;nbsp;को इंटरनेशनल लेवल पर सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित किया है. रिपोर्ट के मुताबिक, 16 मई तक डीआरसी के इटुरी प्रांत में 246 संदिग्ध मामले और 80 संदिग्ध मौतें दर्ज की गईं, जबकि कुछ मामलों की लैब में पुष्टि भी हो चुकी है.&amp;nbsp;
क्या एक नई महामारी की हो चुकी शुरुआत?
&amp;nbsp;डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक डॉ. टेड्रोस अधानोम घेब्रेयसस ने कहा है कि मौजूदा स्थिति अभी महामारी के स्तर तक नहीं पहुंची है, लेकिन इंफेक्शन की गंभीरता को देखते हुए अंतरराष्ट्रीय सहयोग बेहद जरूरी है. डीआरसी के स्वास्थ्य मंत्री सैमुअल-रोजर काम्बा ने बताया कि इस बार जो स्ट्रेन सामने आया है, उसका फिलहाल कोई प्रभावी वैक्सीन या विशेष इलाज उपलब्ध नहीं है और इसकी मृत्यु दर 50 प्रतिशत तक पहुंच सकती है.&amp;nbsp;
क्या है इबोला बीमारी?
इबोला एक बेहद खतरनाक और जानलेवा बीमारी है, जो ऑर्थोइबोलावायरस परिवार के वायरस से होती है. अब तक इसके छह अलग-अलग प्रकार पहचाने जा चुके हैं, लेकिन इनमें से तीन स्ट्रेन बड़े प्रकोप की वजह बने हैं, जो इंसानों में गंभीर इंफेक्शन फैलाती है। यह वायरस आमतौर पर जानवरों से इंसानों में पहुंचता है. एक्सपर्ट के मुताबिक, फल खाने वाले चमगादड़ों को इसका नेचुरल फैलने का तरीका माना जाता है. इंफेक्शन जानवरों के खून, शरीर के तरल पदार्थ या इंफेक्टेड व्यक्ति के सीधे संपर्क में आने से यह वायरस तेजी से फैल सकता है. यही वजह है कि अस्पतालों में इलाज के दौरान स्वास्थ्यकर्मियों के इंफेक्टेड होने का खतरा भी काफी अधिक रहता है. यहां तक कि इंफेक्टेड व्यक्ति के अंतिम संस्कार के दौरान सीधे संपर्क में आने से भी वायरस फैलने का खतरा रहता है.
कैसे होते हैं इसके लक्षण?&amp;nbsp;
&amp;nbsp;वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के मुताबिक, इबोला के शुरुआती लक्षण सामान्य वायरल बुखार जैसे लगते हैं, जिससे इसकी पहचान मुश्किल हो जाती है. इंफेक्शन के दो से 21 दिनों के भीतर अचानक तेज बुखार, अत्यधिक थकान, शरीर दर्द, सिरदर्द और गले में खराश शुरू हो सकती है. इसके बाद मरीज को उल्टी, दस्त, पेट दर्द, त्वचा पर चकत्ते और किडनी-लिवर से जुड़ी समस्याएं होने लगती हैं. कई मामलों में मरीज मानसिक भ्रम, चिड़चिड़ापन और आक्रामक व्यवहार भी दिखाने लगता है. हालांकि आम लोगों के बीच यह धारणा है कि इबोला में हमेशा खून बहता है, लेकिन एक्सपर्ट का कहना है कि ब्लीडिंग हर मरीज में नहीं होती और यह बीमारी के बाद के चरणों में दिखाई देती है.
इसके अलावा इबोला की पहचान करना भी आसान नहीं होता, क्योंकि इसके शुरुआती लक्षण कई दूसरी इंफेक्शन बीमारियों जैसे मलेरिया, टाइफाइड, मेनिनजाइटिस और सामान्य वायरल बुखार से काफी मिलते-जुलते हैं. यही वजह है कि कई बार शुरुआती चरण में मरीज की बीमारी पकड़ में नहीं आ पाती. डॉक्टरों के मुताबिक, अगर समय रहते सही जांच और पहचान न हो, तो इंफेक्शन तेजी से गंभीर रूप ले सकता है.
कब-कब दिखा इसका प्रकोप?
इबोला का इतिहास भी बेहद डरावना रहा है. इसका पहला बड़ा प्रकोप साल 1976 में सामने आया था, जब सूडान और कांगो में लगातार दो बड़े इंफेक्शन दर्ज किए गए. इसके बाद 2000-01 में युगांडा में वायरस तेजी से फैला. लेकिन सबसे भयावह प्रकोप 2013 से 2016 के बीच पश्चिम अफ्रीका में देखने को मिला. उस दौरान गिनी, लाइबेरिया और सिएरा लियोन जैसे देशों में 28 हजार से ज्यादा मामले सामने आए और 11 हजार से अधिक लोगों की मौत हो गई. यह अब तक का सबसे घातक इबोला प्रकोप माना जाता है. इंफेक्शन बाद में अमेरिका और यूरोप तक भी पहुंचा, जहां कुछ मामले अफ्रीका से लौटे यात्रियों और स्वास्थ्यकर्मियों में पाए गए. इसके बाद 2018 से 2020 के बीच डीआरसी और युगांडा में फिर बड़े स्तर पर इंफेक्शन फैला और हाल ही में 2025 में युगांडा में नए मामले सामने आए.
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क्या है इसका इलाज?
रिसर्चर्स का कहना है कि इबोला का इलाज अब भी बड़ी चुनौती बना हुआ है. लंदन के इम्पीरियल कॉलेज के मेडिकल एक्सपर्ट के मुताबिक, फिलहाल जो इलाज उपलब्ध हैं, वे केवल जायर स्ट्रेन पर असर करते हैं. वहीं मौजूदा बंडीबुग्यो स्ट्रेन के लिए न तो कोई स्वीकृत वैक्सीन है और न ही प्रभावी एंटीवायरल दवा. ऐसे में इलाज मुख्य रूप से शरीर में पानी और इलेक्ट्रोलाइट संतुलन बनाए रखने, ऑक्सीजन स्तर स्थिर रखने और मरीज की हालत संभालने पर आधारित है.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 21 May 2026 21:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Heatwave Alert: भीषण गर्मी&amp;लू का अलर्ट जारी, हीट स्ट्रोक से बचने के लिए अपनाएं ये उपाय, वरना जा सकती है जान</title>
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        <description><![CDATA[ How To Protect Yourself From Heatwave: गर्मी का कहर लगातार बढ़ता जा रहा है और इसी को देखते हुए आयुष मंत्रालय ने 18 मई को भीषण गर्मी और लू से बचाव को लेकर एक पब्लिक हेल्थ एडवाइजरी जारी की है. मंत्रालय ने लोगों को ज्यादा से ज्यादा पानी पीने, दोपहर की तेज धूप से बचने, हल्के सूती कपड़े पहनने और शरीर में पानी की कमी ना होने देने की सलाह दी है. एडवाइजरी में कहा गया है कि अगर चक्कर आना, सिरदर्द, मतली, शरीर का तापमान बहुत बढ़ना, बेहोशी, दौरे पड़ना या मानसिक स्थिति में बदलाव जैसे लक्षण दिखें तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह हीट स्ट्रोक के संकेत हो सकते हैं.&amp;nbsp;
किन लोगों को सबसे ज्यादा सावधान रहना चाहिए?
आयुष मंत्रालय के मुताबिक यह एडवाइजरी आम लोगों के साथ-साथ बच्चों, गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों, बाहर काम करने वाले मजदूरों और दिल की बीमारी या हाई ब्लड प्रेशर जैसी पुरानी बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए खास तौर पर जरूरी है. काम करने वाली जगहों और सार्वजनिक आयोजनों में छाया वाली जगह, आराम के लिए ब्रेक और लगातार पानी उपलब्ध कराने पर भी जोर दिया है.
शरीर को ठंडा रखने के लिए क्या करना चाहिए?
एडवाइजरी में आयुर्वेद, योग, यूनानी और होम्योपैथी से जुड़े पारंपरिक उपायों का भी जिक्र किया गया है. शरीर को ठंडा रखने के लिए छाछ, नारियल पानी, नींबू पानी और इलेक्ट्रोलाइट वाले पेय पदार्थ पीने की सलाह दी गई है. साथ ही निम्बूकफल पानक, आम्र प्रपानक और चिंचा पानक जैसे पारंपरिक पेय पदार्थों को भी गर्मी में फायदेमंद बताया गया है. मंत्रालय ने खीरा, तरबूज, खरबूजा, पेठा, टमाटर और नींबू जैसी ठंडी तासीर वाली चीजों को रोजाना खाने में शामिल करने की सलाह दी है.
कब जा सकती है जान?
अमेरिका के सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के अनुसार, अत्यधिक गर्मी शरीर को ठीक से ठंडा होने नहीं देती, जिससे गंभीर बीमारियां और मौत तक हो सकती है. संस्था के मुताबिक छोटे बच्चे, बुजुर्ग और पुरानी बीमारियों से पीड़ित लोग सबसे ज्यादा जोखिम में होते हैं.
शरीर को हाइड्रेट रखने का क्या है तरीका?
एक्सपर्ट्स के अनुसार लू से बचने के लिए सबसे जरूरी है शरीर को हाइड्रेट रखना. दिनभर खूब पानी पीना चाहिए, भले ही प्यास ना लगे. कैफीन और ज्यादा मीठे पेय पदार्थों से बचना चाहिए, क्योंकि ये शरीर में पानी की कमी बढ़ा सकते हैं. नारियल पानी, नींबू पानी और इलेक्ट्रोलाइट ड्रिंक्स शरीर में जरूरी मिनरल्स बनाए रखने में मदद करते हैं.
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इतने घंटे तक घर से बाहर न निकलें
दोपहर 12 बजे से शाम 4 बजे तक धूप सबसे ज्यादा खतरनाक मानी जाती है. इस दौरान घर के अंदर रहने की कोशिश करनी चाहिए. अगर बाहर निकलना जरूरी हो तो छाता, टोपी और धूप का चश्मा इस्तेमाल करना बेहतर माना जाता है. हल्के रंग के ढीले और सूती कपड़े शरीर को ठंडा रखने में मदद करते हैं.&amp;nbsp;
खाने की चीजों पर रखें ध्यान
एक्सपर्ट्स यह भी सलाह देते हैं कि ज्यादा तला-भुना और मसालेदार खाना खाने से बचें, क्योंकि इससे शरीर में गर्मी बढ़ती है. अगर किसी को ज्यादा पसीना आना, चक्कर, कमजोरी या मांसपेशियों में ऐंठन महसूस हो तो तुरंत ठंडी जगह पर ले जाकर पानी पिलाना चाहिए. जरूरत पड़ने पर तुरंत डॉक्टर की मदद लेना जरूरी है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 21 May 2026 21:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Blood Cancer Symptoms: स्किन पर लगातार दिख रहे लाल चकत्ते तो तुरंत कराएं सीबीसी, हो सकता है ब्लड कैंसर</title>
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        <description><![CDATA[ Persistent Red Rashes Could Be A Sign Of Blood Cancer: स्किन पर बार-बार लाल चकत्ते दिखना या छोटे-छोटे लाल धब्बे उभरना कई लोग सामान्य एलर्जी या मौसम का असर समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. लेकिन डॉक्टरों के मुताबिक, अगर ये निशान लंबे समय तक बने रहें और इलाज के बाद भी ठीक न हों, तो इन्हें हल्के में लेना खतरनाक हो सकता है. कई मामलों में यह ब्लड कैंसर यानी ल्यूकेमिया का शुरुआती संकेत भी हो सकता है. ऐसे में समय रहते सीबीसी यानी कम्प्लीट ब्लड काउंट टेस्ट कराना बेहद जरूरी माना जाता है.&amp;nbsp;
कैसे होती है ब्लड कैंसर की शुरुआत?
यूके ब्लड कैंसर संस्थान की रिपोर्ट के अनुसार, &amp;nbsp;ब्लड कैंसर हड्डियों के भीतर मौजूद बोन मैरो में शुरू होता है, जहां खून की सेल्स बनती हैं. जब खून बनाने वाली सेल्स के डीएनए में बदलाव होने लगते हैं, तो असामान्य व्हाइट ब्लड सेल्स तेजी से बढ़ने लगती हैं. धीरे-धीरे ये स्वस्थ रक्त कोशिकाओं की जगह लेने लगती हैं, जिससे शरीर की सामान्य काम करने की क्षमता प्रभावित होने लगती है.
क्या होते हैं इसके लक्षण?
एक्सपर्ट के अनुसार, ब्लड कैंसर के लक्षण हर व्यक्ति में अलग हो सकते हैं. लेकिन त्वचा पर दिखाई देने वाले लाल चकत्ते, बैंगनी धब्बे या बिना चोट के नीले निशान इसके अहम संकेतों में शामिल हैं. कई बार ये छोटे-छोटे लाल बिंदुओं की तरह नजर आते हैं, जिन्हें पेटीकीए कहा जाता है. कुछ लोगों में बड़े लाल या बैंगनी पैच भी दिखाई दे सकते हैं. खास बात यह है कि इन निशानों पर दबाव डालने के बाद भी इनका रंग फीका नहीं पड़ता.
स्किन पर क्यों पड़ने लगते हैं चकत्ते?
डॉक्टरों का कहना है कि ब्लड कैंसर में शरीर में प्लेटलेट्स की संख्या कम होने लगती है, जिससे खून का थक्का बनने की प्रक्रिया प्रभावित होती है. यही वजह है कि त्वचा पर अचानक लाल या बैंगनी निशान उभरने लगते हैं. इसके अलावा बार-बार बुखार आना, अत्यधिक थकान, सांस फूलना, बिना वजह वजन घटना, रात में ज्यादा पसीना आना और शरीर में गांठ महसूस होना भी गंभीर संकेत हो सकते हैं.
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कब डॉक्टर को दिखाना चाहिए?
विशेषज्ञ मानते हैं कि कई लोग इन लक्षणों को सामान्य कमजोरी, एलर्जी या संक्रमण समझकर महीनों तक नजरअंदाज करते रहते हैं. जबकि शुरुआती जांच बीमारी को जल्दी पकड़ने में मदद कर सकती है. सीबीसी टेस्ट के जरिए शरीर में लाल और व्हाइट ब्लड सेल्स तथा प्लेटलेट्स की स्थिति का पता लगाया जाता है.अगर रिपोर्ट में असामान्य बदलाव दिखाई दें, तो डॉक्टर आगे की जांच की सलाह देते हैं.
इस बात का रखें ध्यान
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि हर लाल चकत्ता ब्लड कैंसर का संकेत नहीं होता, लेकिन अगर त्वचा पर बार-बार निशान दिखें, लगातार खुजली रहे या शरीर में असामान्य बदलाव महसूस हों, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए. एक्सपर्ट का कहना है कि समय पर जांच और सही इलाज से ब्लड कैंसर के इलाज की संभावना काफी बेहतर हो सकती है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 21 May 2026 21:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>High Blood Pressure: हाई बीपी और स्ट्रेस का अचूक उपाय है प्राणिक हीलिंग, शरीर को छुए बिना ऐसे होता है इलाज</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/high-blood-pressure-हाई-बीपी-और-स्ट्रेस-का-अचूक-उपाय-है-प्राणिक-हीलिंग-शरीर-को-छुए-बिना-ऐसे-होता-है-इलाज</link>
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        <description><![CDATA[ How Stress Increases High Blood Pressure: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हाई ब्लड प्रेशर की समस्या तेजी से बढ़ रही है और इसके पीछे तनाव यानी स्ट्रेस को सबसे बड़ा लेकिन सबसे ज्यादा नजरअंदाज किया जाने वाला कारण माना जा रहा है. देर रात तक काम करना, नींद पूरी न होना, हर समय चिंता में रहना, मानसिक थकान और घंटों मोबाइल-लैपटॉप जैसी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस के सामने बिताना आज के युवाओं की लाइफस्टाइल का हिस्सा बन चुका है. यही कारण है कि कम उम्र में भी लोग हाई बीपी जैसी गंभीर समस्या का सामना कर रहे हैं.
डॉक्टर लंबे समय से इस बात पर जोर देते आए हैं कि लगातार तनाव शरीर में एड्रेनालिन और कोर्टिसोल जैसे हार्मोन बढ़ा देता है. इससे दिल की धड़कन तेज होती है और ब्लड प्रेशर लगातार ऊंचा रहने लगता है. अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहे, तो दिल से जुड़ी गंभीर बीमारियों का खतरा भी बढ़ सकता है.&amp;nbsp;
दवाई या थैरेपी क्या है बढ़िया विकल्प?
हालांकि दवाइयां और बेहतर लाइफस्टाइल अब भी हाई ब्लड प्रेशर कंट्रोल करने के सबसे जरूरी तरीके हैं, लेकिन हाल के वर्षों में लोग ऐसी थेरेपी की ओर भी ध्यान देने लगे हैं जो मानसिक शांति देने में मदद करती हैं. इन्हीं में से एक है प्राणिक हीलिंग. &amp;nbsp;वर्ल्ड प्राणिक हीलिंग के डायरेक्टर श्रीराम राजगोपाल के अनुसार, प्राणिक हीलिंग एक एनर्जी बेस्ड हीलिंग तकनीक है, जो प्राण यानी लाइफ एनर्जी के सिद्धांत पर आधारित मानी जाती है, इस पद्धति में बिना शरीर को छुए व्यक्ति के एनर्जी फील्ड, ऑरा और चक्रों को संतुलित करने की कोशिश की जाती है. माना जाता है कि इससे शरीर और मन दोनों को आराम मिलता है और व्यक्ति इमोशनल रूप से ज्यादा संतुलित महसूस करता है.
तनाव से जुड़े हाई बीपी का शरीर पर क्या असर होता है?
तनाव से जुड़ा हाई ब्लड प्रेशर अक्सर अनियमित खानपान, फिजिकल एक्टिविटी की कमी, ज्यादा स्क्रीन टाइम और काम-आराम के बीच संतुलन न होने से भी जुड़ा होता है. इसका असर सिर्फ शरीर पर ही नहीं, बल्कि इमोशनल और भावनात्मक स्थिति पर भी पड़ता है। ऐसे में प्राणिक हीलिंग जैसी तकनीकें लोगों को रिलैक्स करने और अपनी भावनाओं को बेहतर तरीके से समझने में मदद कर सकती हैं.
प्राणिक हीलिंग थैरेपी से क्या होता है फायदा?
इस थैरेपी में ट्विन हार्ट्स मेडिटेशन को काफी अहम माना जाता है. माना जाता है कि यह मेडिटेशन तनाव कम करने और मन को शांत रखने में मदद करता है. वहीं प्राणिक साइकोथेरेपी का उद्देश्य डर, गुस्सा, चिंता और निराशा जैसी निगेटिव भावनाओं को कम करना है. इसके अलावा प्राणिक ब्रीदिंग यानी नियंत्रित सांस लेने की तकनीक नर्वस सिस्टम को शांत करने और मानसिक सुकून देने में सहायक मानी जाती है.
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इन लोगों को ज्यादा ध्यान देने की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि जब तनाव कम होता है, मन शांत रहता है और भावनाओं पर बेहतर नियंत्रण होता है, तो ब्लड प्रेशर भी संतुलित रहने लगता है. हालांकि यह समझना जरूरी है कि प्राणिक हीलिंग को दवाइयों का विकल्प नहीं माना जाता. हाई ब्लड प्रेशर से पीड़ित लोगों को डॉक्टर की सलाह और नियमित दवाइयों के साथ ही मेडिटेशन और प्राणिक हीलिंग जैसी तकनीकों को अपनाना चाहिए.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 20 May 2026 16:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>Sour Burps Causes: सुबह उठते ही आ रही है खट्टी डकार? एसिडिटी नहीं कुछ और है समस्या, लिवर दे रहा संकेत</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/sour-burps-causes-सुबह-उठते-ही-आ-रही-है-खट्टी-डकार-एसिडिटी-नहीं-कुछ-और-है-समस्या-लिवर-दे-रहा-संकेत</link>
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        <pubDate>Wed, 20 May 2026 16:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>Bael Fruit Benefits: गर्मियों में पेट की समस्याओं से हैं परेशान? बेल दिलाएगा राहत, ऐसे करें सेवन</title>
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        <description><![CDATA[ Bael Fruit Benefits:&amp;nbsp;गर्मी का मौसम आते ही कई लोगों को पेट से जुड़ी दिक्कतें शुरू हो जाती हैं. किसी को पेट दर्द, किसी को गैस, तो किसी को बार-बार दस्त और अपच की समस्या परेशान करने लगती है. ऐसे समय में बाजारों में तरह- तरह के पेय पदार्थ मिलते है. जैसे गन्ने का जूस, मौसमी का जूस, नारियल पानी इत्यादि, वैसे तो ये सारे ही पेय गर्मी के मौसम में बेहद फायदे माने जाते हैं, लेकिन आयुर्वेद में एक ऐसे फल का जिक्र किया है जो पेट का सबसे अच्छा दोस्त माना जाता है, जिसका नाम है बेल. स्वामी रामदेव के मुताबिक बेल फल भगवान शिव को बेहद प्रिय माना जाता है. यह स्वादिष्ट होने के साथ सेहत के लिए भी बहुत फायदेमंद है. साथ ही कब्ज, कोलाइटिस और पेट से जुड़ी कई परेशानियों में बेल असरदार घरेलू उपाय माना जाता है. &amp;nbsp;माना जाता है कि बेल शरीर को अंदर से ठंडक के साथ हाइड्रेट भी रखता है और यही वजह है कि पुराने समय से लोग बेल का शरबत और इसका गूदा गर्मी में इस्तेमाल करते आ रहे हैं.&amp;nbsp;
पेट को राहत देने में क्यों खास है बेल?
आयुर्वेद के मुताबिक बेल फल पाचन को मजबूत करने में मदद करता है. &amp;nbsp;अगर किसी को कब्ज, गैस, एसिडिटी या पेट फूलने जैसी परेशानी रहती है तो बेल काफी फायदेमंद माना जाता है. स्वामी रामदेव स्वाद और सेहत से भरपूर पतंजलि बेल कैंडी और बेल मुरब्बा खाने की सलाह देते हैं. बेल कैंडी यानी बेल फल से बनी मीठी टॉफी या छोटे-छोटे टुकड़े होते हैं, जिन्हें सुखाकर और मिठास मिलाकर तैयार किया जाता है. ये पाचन को बेहतर बनाने के साथ एसिडिटी, अपच और पेट की जलन में मदद करती है, जबकि बेल मुरब्बा पाचन सुधारने और पेट की दिक्कतों को कम करने में असरदार माना जाता है.&amp;nbsp;
साथ ही खास बात यह है कि बेल का कच्चा फल दस्त और पेट खराब होने में भी इस्तेमाल किया जाता है. कच्चे बेल का पाउडर बनाया जा सकता है और पके हुए बेल को सीधे फल की तरह खाया जाता है. &amp;nbsp;कई रिसर्च में भी बताया गया है कि बेल में ऐसे गुण पाए जाते हैं जो पेट को शांत रखने और आंतों को मजबूत बनाने में मदद करते हैं. &amp;nbsp;यही कारण है कि गांवों में आज भी पेट खराब होने पर बेल का सेवन घरेलू इलाज की तरह किया जाता है. &amp;nbsp; &amp;nbsp;
यह भी पढ़ेंः Weak Immunity: खांसी, जुकाम, खराश और थकान? मौसम का बदलाव नहीं, शरीर में है ये कमी, पढ़ें डॉक्टर की चेतावनी
गर्मी में शरीर को अंदर से ठंडा रखता है बेल
बेल सिर्फ पेट ही नहीं संभालता, बल्कि गर्मी से होने वाली दिक्कतों से भी बचाने में मदद करता है. &amp;nbsp;साथ ही इसमें विटामिन A, B और C के साथ आयरन और पोटैशियम जैसे जरूरी पोषक तत्व भी पाए जाते हैं. &amp;nbsp;ये शरीर की कमजोरी दूर इम्यूनिटी बढ़ाने और थकान कम करने में भी मदद करते हैं. इसके अलावा बेल की तरह ही जीरा, अजवाइन और सौंफ भी पेट की गैस, सूजन, कब्ज और IBS जैसी समस्याओं में मदद करते हैं.&amp;nbsp;
कैसे करें बेल का सेवन?
गर्मियों में बेल का शरबत सबसे ज्यादा पसंद किया जाता है. इसके लिए पके हुए बेल का गूदा निकालकर पानी में मिलाया जाता है. फिर इसमें थोड़ा गुड़ या शहद डालकर पिया जाता है. आयुर्वेद के जानकार बताते हैं कि इसे सुबह या दोपहर में पीना ज्यादा फायदेमंद रहता है. हालांकि जरूरत से ज्यादा सेवन करने से बचना चाहिए. अगर किसी को पहले से कोई गंभीर बीमारी है, तो डॉक्टर की सलाह लेकर ही इसे अपनी डाइट में शामिल करना बेहतर होता है. लेकिन इतना जरूर है कि बेल आज भी गर्मियों में पेट और शरीर दोनों को राहत देने वाला एक भरोसेमंद देसी फल माना जाता है.
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        <pubDate>Wed, 20 May 2026 16:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>Weak Immunity: खांसी, जुकाम, खराश और थकान? मौसम का बदलाव नहीं, शरीर में है ये कमी, पढ़ें डॉक्टर की चेतावनी</title>
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        <description><![CDATA[ Why Do People Fall Sick Frequently: मौसम बदलते ही लोग अक्सर बार-बार होने वाली खांसी, जुकाम, गले में खराश और थकान का जिम्मेदार ठंडी हवा, बारिश, गर्मी या प्रदूषण को मान लेते हैं. लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि हर बार मौसम ही बीमारी की असली वजह नहीं होता. कई बार समस्या हमारी रोजमर्रा की उन आदतों में छिपी होती है, जो धीरे-धीरे शरीर को अंदर से कमजोर कर देती हैं. आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग देर रात तक जागना, खाना स्किप करना, लगातार स्क्रीन के सामने बैठना और तनाव में रहना सामान्य बात मान चुके हैं. शरीर कुछ समय तक इन आदतों को झेल लेता है, लेकिन धीरे-धीरे इसका असर इम्यूनिटी पर दिखने लगता है. यही वजह है कि कई लोग बार-बार बीमार पड़ने लगते हैं.
कैसे कमजोर होता है आपकी इम्यून सिस्टम?
डॉ रशीका, कंसल्टेंट पल्मोनोलॉजिस्ट, अपोलो हॉस्पिटल्स के मुताबिक अच्छी नींद सिर्फ घंटों की नहीं, बल्कि क्वालिटी की भी होती है. उनका कहना है कि लगातार कम और खराब नींद लेने से शरीर की इम्यून सिस्टम कमजोर होने लगती है. ऐसे लोग बार-बार सर्दी, खांसी और अस्थमा जैसी समस्याओं का शिकार हो सकते हैं. अगर कोई व्यक्ति रात में बार-बार उठता है, खर्राटे लेता है या सोने से पहले देर तक मोबाइल चलाता है, तो शरीर को सही तरह से रिकवरी का मौका नहीं मिल पाता.
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इम्यून सिस्टम कमजोर होने से क्या होती है दिक्कत?
अमेरिका के CDC की रिसर्च भी बताती है कि नींद की कमी इम्यूनिटी को कमजोर करने के साथ-साथ दिल की बीमारी, मोटापा और मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर डाल सकती है. गहरी नींद के दौरान शरीर खुद को रिपेयर करता है और इंफेक्शन से लड़ने वाले प्रोटीन बनाता है.
क्या इसमें हमारी लाइफस्टाइल का भी रोल है?
एक्सपर्ट का कहना है कि खराब खानपान भी लोगों को जल्दी बीमार बना रहा है. डॉ रशीका के अनुसार, लोग अक्सर खाना छोड़ देते हैं या प्रोसेस्ड और बाहर के खाने पर ज्यादा निर्भर हो जाते हैं. इससे शरीर को जरूरी पोषक तत्व नहीं मिल पाते. शरीर को मजबूत इम्यूनिटी के लिए प्रोटीन, आयरन, जिंक, विटामिन, फाइबर और पर्याप्त पानी की जरूरत होती है, लेकिन आजकल लोग पैकेज्ड फूड, मीठे स्नैक्स और इंस्टेंट मील्स ज्यादा खा रहे हैं.
पानी कम पीने और घर में बैठे रहने के नुकसान
नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ हेल्थ &amp;nbsp;की एक स्टडी में भी बताया गया है कि पोषण सीधे इम्यून सिस्टम और शरीर में सूजन के स्तर को प्रभावित करता है. वहीं पानी कम पीना भी बड़ी समस्या बन चुका है. डॉक्टरों के मुताबिक पर्याप्त पानी न पीने से शरीर में म्यूकस गाढ़ा हो जाता है, जिससे इंफेक्शन का खतरा बढ़ सकता है. डॉक्टर यह भी मानते हैं कि लंबे समय तक घर या ऑफिस के बंद कमरों में रहना भी सेहत को नुकसान पहुंचा सकता है. एयर कंडीशनर वाले कमरे, धूल, खराब वेंटिलेशन और भीड़भाड़ वाले इनडोर स्पेस में वायरस और एलर्जी फैलाने वाले तत्व ज्यादा समय तक बने रह सकते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 20 May 2026 00:30:16 +0530</pubDate>
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        <title>Global Health Crisis: Covid&amp;19 से नहीं लिया सबक! अगली महामारी के लिए कितनी तैयार दुनिया, WHO की रिपोर्ट ने मचाई खलबली</title>
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        <description><![CDATA[ Is The World Ready For The Next Pandemic: कोविड-19 के बाद दुनिया ने सोचा था कि अब अगली महामारी से निपटने की तैयारी पहले से बेहतर होगी, लेकिन नई रिपोर्ट ने एक बार फिर चिंता बढ़ा दी है. मिडिल अफ्रीका के कई हिस्सों में इबोला के नए प्रकोप, साथ ही हंतावायरस, मंकीपॉक्स और बर्ड फ्लू जैसी बीमारियों के बढ़ते खतरे के बीच एक ग्लोबल रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि दुनिया भविष्य की महामारियों के लिए पहले से ज्यादा कमजोर होती जा रही है.&amp;nbsp;
दुनियाभर में तेजी से बढ़ रहा है इंफेक्शन का खतरा
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन और वर्ल्ड बैंक के समर्थन से बने स्वतंत्र संगठन ग्लोबल प्रिपेयर्डनेस मॉनिटरिंग बोर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक इंफेक्शन बीमारियों का खतरा अब पहले से ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है. रिपोर्ट में कहा गया कि पिछले दस सालों की तुलना में अब देश और स्वास्थ्य व्यवस्था महामारी से उबरने में कम सक्षम हो गए हैं. यह चेतावनी ऐसे समय में आई है जब वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन ने कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य और युगांडा में फैले इबोला के नए प्रकोप को अंतरराष्ट्रीय सार्वजनिक हेल्थ इमरजेंसी घोषित किया है. इस बार इबोला का कम समझा जाने वाला बुंडिबुग्यो स्ट्रेन सामने आया है, जिसने चिंता और बढ़ा दी है.
क्यों तेजी से फैल रहा है इंफेक्शन का खतरा?
79वीं वर्ल्ड हेल्थ असेंबली के दौरान जारी रिपोर्ट ए वर्ल्ड ऑन द एज: प्रायोरिटीज फॉर ए पैंडेमिक-रेजिलिएंट फ्यूचर &amp;nbsp;में कहा गया कि महामारी से निपटने की तैयारियों पर हुए निवेश तेजी से बढ़ते खतरों के मुकाबले काफी कम साबित हो रहे हैं. रिपोर्ट के अनुसार बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव, जलवायु परिवर्तन से जुड़ी पर्यावरणीय गड़बड़ी, बढ़ती वैश्विक आवाजाही और अंतरराष्ट्रीय विकास फंडिंग में कमी वर्ल्ड हेल्थ सिक्योरिटी को कमजोर कर रही है.
रिपोर्ट में किन बातों को लेकर की गई चर्चा?
रिपोर्ट में 2014-16 और 2019-20 के इबोला प्रकोप, कोविड-19 और मंकीपॉक्स जैसी बड़ी स्वास्थ्य आपात स्थितियों की समीक्षा की गई. इसमें पाया गया कि कोविड के बाद नई स्वास्थ्य व्यवस्थाएं और योजनाएं तो बनाई गईं, लेकिन महामारी से निपटने की वैश्विक क्षमता अब भी बेहद असमान बनी हुई है. सबसे चिंताजनक बात वैक्सीन और दवाओं की पहुंच को लेकर सामने आई. रिपोर्ट के मुताबिक मंकीपॉक्स वैक्सीन गरीब देशों तक पहुंचने में करीब दो साल लग गए, जो कोविड वैक्सीन से भी ज्यादा देरी थी. बोर्ड ने चेतावनी दी कि दुनिया वैक्सीन, जांच और इलाज की समान पहुंच के मामले में पीछे की तरफ बढ़ रही है.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि महामारी अब सिर्फ स्वास्थ्य संकट नहीं रह गई, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं और लोगों के भरोसे पर भी असर डाल रही है. कोविड और इबोला दोनों के दौरान राजनीतिक ध्रुवीकरण, साइंटफिक संस्थाओं पर हमले और गलत सूचनाओं का तेज प्रसार देखने को मिला. इसके प्रभाव महामारी खत्म होने के बाद भी लंबे समय तक बने रहते है.&amp;nbsp;
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भारत के लिए रिपोर्ट क्यों अहम?
भारत के लिए भी यह रिपोर्ट बेहद अहम मानी जा रही है. दुनिया के सबसे बड़े कोविड प्रकोपों में से एक झेल चुके भारत में घनी आबादी, तेजी से बढ़ते शहर और बड़े पैमाने पर होने वाला आंतरिक पलायन भविष्य की महामारियों का खतरा बढ़ाते हैं. पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट्स पहले भी चेतावनी दे चुके हैं कि देश में बीमारी निगरानी व्यवस्था, ग्रामीण स्वास्थ्य ढांचा और इमरजेंसी फंडिंग सिस्टम को और मजबूत करने की जरूरत है.
इसे भी पढ़ें -&amp;nbsp;Heart Fights Cancer: दिल धड़क रहा है यानी कैंसर से लड़ रहा है, नई स्टडी से जागी उम्मीद
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 20 May 2026 00:30:15 +0530</pubDate>
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        <title>Male Fertility: सिर्फ मां नहीं, पिता की उम्र और आदतें भी तय करती हैं बच्चे की सेहत, भूलकर भी न करें ये गलती</title>
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        <description><![CDATA[ How Father&amp;rsquo;s Health Affects Child Development: शहर हो या फिर गांव सालों तक प्रेग्नेंसी से जुड़ी ज्यादातर चर्चाएं सिर्फ मां की सेहत के इर्द-गिर्द ही घूमती रहीं. डॉक्टर प्रेग्नेंसी के दौरान पोषण, हार्मोन, स्कैन, विटामिन और एंटीनटल केयर पर जोर देते थे, जबकि पिता की भूमिका को केवल इमोशनल सहारे तक सीमित माना जाता था. लेकिन अब साइंटिफिक रिसर्च इस सोच को बदल रही है. एक्सपर्ट का कहना है कि बच्चे की सेहत सिर्फ मां ही नहीं, बल्कि पिता की हेल्थ पर भी काफी हद तक निर्भर कर सकती है.
बच्चों की सेहत पर पिता का क्या होता है असर?
दुनियाभर में हो रही नई रिसर्च में यह समझने की कोशिश की जा रही है कि गर्भधारण से पहले पिता की उम्र, तनाव, स्मोकिंग, शराब की आदत, नींद की कमी और यहां तक कि प्रदूषण के संपर्क का भी बच्चे की सेहत पर असर पड़ सकता है. इसका मतलब यह नहीं कि ज्यादा उम्र में पिता बनने वाले लोगों के बच्चों को जरूर कोई समस्या होगी, लेकिन रिसर्च यह जरूर दिखा रही है कि पिता की हेल्थ भी उतनी ही अहम है जितनी मां की.
देर से पिता बनने पर क्या होती है दिक्कत?
हाल के वर्षों में एडवांस्ड पैटरनल एज यानी ज्यादा उम्र में पिता बनने को लेकर काफी चर्चा हुई है. कई स्टडी में पाया गया कि 45 साल से ज्यादा उम्र के पुरुषों के बच्चों में ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर और कुछ न्यूरोडेवलपमेंटल समस्याओं का जोखिम थोड़ा बढ़ सकता है. रिसर्चर्स मानते हैं कि इसका संबंध स्पर्म में समय के साथ होने वाले छोटे-छोटे डीएनए बदलावों से हो सकता है. जामा साइकियाट्री में पब्लिश एक बड़ी स्टडी ने पिता की उम्र और बच्चों में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं के बीच संबंध पर चर्चा की थी. वहीं नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ की एक समीक्षा में यह पाया गया कि अधिक उम्र के पुरुषों में स्पॉन्टेनियस जेनेटिक म्यूटेशन का खतरा बढ़ सकता है। हालांकि डॉक्टर साफ कहते हैं कि यह सिर्फ रिस्क पैटर्न हैं, कोई निश्चित भविष्यवाणी नहीं.
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क्या लाइफस्टाइल का भी होता है कोई असर?
एक्सपर्ट के मुताबिक सिर्फ उम्र ही नहीं, बल्कि लाइफस्टाइल भी बेहद अहम भूमिका निभाती है, &amp;nbsp;स्मोकिंग स्पर्म की क्वालिटी को प्रभावित कर सकती है और डीएनए को नुकसान पहुंचा सकती है. इसके अलावा तनाव, मोटापा, शराब, खराब नींद और प्रदूषण जैसी चीजें भी एपिजेनेटिक्स को प्रभावित कर सकती हैं, जो यह तय करता है कि जीन शरीर में कैसे काम करेंगे. रिप्रोडक्टिव बायोलॉजी एंड एंडोक्रिनोलॉजी में प्रकाशित एक विस्तृत समीक्षा में भी पिता की उम्र और लाइफस्टाइल का प्रजनन स्वास्थ्य पर असर बताया गया है. वहीं नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ हेल्थ ने भी हाल के वर्षों में पिता की प्रीकॉन्सेप्शन हेल्थ यानी प्रेग्नेंसी से पहले की सेहत को महत्वपूर्ण माना है.
हेल्दी पीढ़ी के लिए ये चीजें हैं बहुत जरूरी
डॉ मीनू हांडा, डायरेक्टर, फर्टिलिटी एंड हेड एकेडमिक-रिप्रोडक्टिव मेडिसिन, मदरहुड हॉस्पिटल गुरुग्राम के अनुसार, अब एक्सपर्ट इस बात पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं कि गर्भधारण से पहले दोनों माता-पिता कितने स्वस्थ हैं. उनका कहना है कि पुरुषों की प्रजनन क्षमता और उनकी लाइफस्टाइल को लंबे समय तक नजरअंदाज किया गया, जबकि अच्छी नींद, संतुलित खानपान, कम तनाव, स्मोकिंग और शराब से दूरी जैसी आदतें आने वाली पीढ़ी की सेहत के लिए भी अहम हो सकती हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <title>Heart Health: सुबह का सिरदर्द&amp;थकान है साइलेंट किलर का अलर्ट, न करें इग्नोर वरना होंगे खतरनाक बीमारी के शिकार</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/heart-health-सुबह-का-सिरदर्द-थकान-है-साइलेंट-किलर-का-अलर्ट-न-करें-इग्नोर-वरना-होंगे-खतरनाक-बीमारी-के-शिकार</link>
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        <description><![CDATA[ Early Symptoms Of Hypertension People Ignore: हाई ब्लड प्रेशर को अक्सर साइलेंट किलर कहा जाता है, क्योंकि इसके शुरुआती लक्षण इतने हल्के होते हैं कि लोग उन्हें सामान्य थकान या तनाव समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. लेकिन हार्ट एक्सपर्ट्स चेतावनी देते हैं कि लंबे समय तक बढ़ा हुआ ब्लड प्रेशर धीरे-धीरे दिल, दिमाग, किडनी और ब्लड वेसल्स को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर एकस्पर्ट क्या कहते हैं.&amp;nbsp;
ब्लड प्रेशर बढ़ने के नुकसान क्या होते हैं?
TOI में डॉ. रमाकांत पांडा की एक रिपोर्ट के अनुसार, &amp;nbsp;उन्होंने ऑपरेशन थिएटर और मरीजों के बीच चार दशक बिताए हैं और इस दौरान देखा है कि कैसे हाई ब्लड प्रेशर बिना शोर किए शरीर को अंदर ही अंदर कमजोर करता रहता है. डॉक्टर के मुताबिक, लगातार बढ़ा हुआ ब्लड प्रेशर दिल को ज्यादा मेहनत करने पर मजबूर करता है. इससे हार्ट की मांसपेशियां मोटी होने लगती हैं और धमनियां धीरे-धीरे सख्त पड़ जाती हैं. यही स्थिति आगे चलकर हार्ट फेलियर, स्ट्रोक और किडनी डैमेज जैसी गंभीर बीमारियों की वजह बन सकती है.
क्या होते हैं इसके शुरुआती लक्षण?
एक्सपर्ट्स के अनुसार, सुबह उठते ही सिर के पीछे हल्का लेकिन लगातार दर्द महसूस होना हाई ब्लड प्रेशर का शुरुआती संकेत हो सकता है. कारियो एट अल. (2003) की स्टडी में पाया गया कि सुबह के समय अचानक बढ़ने वाला ब्लड प्रेशर स्ट्रोक और दूसरी कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों का खतरा बढ़ा सकता है. इसके अलावा मामूली काम करने पर ज्यादा थकान महसूस होना या जल्दी सांस फूलना भी खतरे की घंटी हो सकती है. फ्रेमिंघम हार्ट स्टडी में लेवी एट अल. (1990) ने बताया था कि लंबे समय तक हाई ब्लड प्रेशर रहने से हार्ट की दीवारें मोटी हो जाती हैं, जिससे हार्ट फेलियर और अचानक मौत का खतरा बढ़ जाता है.&amp;nbsp;
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हाई बीपी के क्या होते हैं नुकसान?
डॉक्टरों का कहना है कि गर्दन की नसों में तेज धड़कन महसूस होना, ध्यान लगाने में परेशानी, सोचने की क्षमता धीमी पड़ना या बार-बार नकसीर आना भी शरीर के अंदर बढ़ते दबाव का संकेत हो सकता है. 2020 लैंसेट कमीशन ऑन डिमेंशिया की रिपोर्ट में हाई ब्लड प्रेशर को डिमेंशिया और याददाश्त कमजोर होने का बड़ा कारण माना गया है. &amp;nbsp;रात में बार-बार पेशाब आने की समस्या को लोग अक्सर सामान्य मान लेते हैं, लेकिन एक्सपर्ट्स के मुताबिक यह किडनी पर बढ़ते दबाव का संकेत हो सकता है. 2020 लैंसेट कमीशन ऑन डिमेंशिया की रिपोर्ट में की रिसर्च में बताया गया कि हाई ब्लड प्रेशर क्रॉनिक किडनी डिजीज की बड़ी वजह है.
महिलाओं और पुरुषों में क्या होता है अंतर?
महिलाओं और पुरुषों में इसके लक्षण अलग-अलग तरीके से नजर आ सकते हैं. जी एट अल. (2020) की जामा कार्डियोलॉजी में प्रकाशित स्टडी के अनुसार, मेनोपॉज के बाद महिलाओं में ब्लड प्रेशर तेजी से बढ़ सकता है और उनमें स्ट्रोक व हार्ट फेलियर का खतरा ज्यादा रहता है. वहीं पुरुषों में हाई ब्लड प्रेशर अक्सर कम उम्र में शुरू होता है और हार्ट अटैक जैसी गंभीर समस्याओं के रूप में सामने आता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 19 May 2026 08:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Heart, Health:, सुबह, का, सिरदर्द-थकान, है, साइलेंट, किलर, का, अलर्ट, न, करें, इग्नोर, वरना, होंगे, खतरनाक, बीमारी, के, शिकार</media:keywords>
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        <title>Physical Activity And Mood: नई रिसर्च में सामने आया मूड और फिजिकल एक्टिविटी का सीधा संबंध, जानें क्या हुआ खुलासा?</title>
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        <description><![CDATA[ Physical Activity And Mood: नई रिसर्च में सामने आया मूड और फिजिकल एक्टिविटी का सीधा संबंध, जानें क्या हुआ खुलासा? ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 19 May 2026 08:30:11 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Cancer And Sugar: कैंसर की जगह शरीर को भूखा मार रही शुगर&amp;फ्री डाइट, जानें एक्सट्रीम कैंसर डाइट का छिपा खतरा</title>
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        <description><![CDATA[ Can Stopping Sugar Cure Cancer: कैंसर को लेकर सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा फैलने वाली बातों में से एक ये है कि &quot;शुगर कैंसर को बढ़ाती है&quot; और अगर इंसान पूरी तरह शुगर या कार्बोहाइड्रेट खाना बंद कर दे, तो ट्यूमर भूखा मर जाएगा. इसी वजह से कई फैमिली मरीज की डाइट से चावल, रोटी, फल और दूसरी कार्ब वाली चीजें हटाने लगती हैं. पहली नजर में ये बात सही लगती है, क्योंकि कैंसर सेल्स ग्लूकोज का ज्यादा इस्तेमाल करती हैं. लेकिन असली साइंस इससे कहीं ज्यादा कॉम्प्लिकेटेड है.&amp;nbsp;
क्या यह सच है या नहीं?
सीके बिरला हॉस्पिटल, नई दिल्ली के डायरेक्टर सर्जिकल ऑन्कोलॉजी एंड रोबोटिक सर्जरी डॉ. मनदीप सिंह मल्होत्रा इस सोच को डेंजरस हाफ ट्रुथ बताते हैं. उनका कहना है कि साइंस का एक हिस्सा सही है, लेकिन लोग उससे गलत निष्कर्ष निकाल लेते हैं. कैंसर में सही न्यूट्रिशन का मतलब बॉडी को भूखा रखना नहीं, बल्कि उसे इतना मजबूत रखना है कि वह इलाज झेल सके और इम्यूनिटी बनी रहे.
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क्या है शुगर और कैंसर वाली थ्योरी?
असल में शुगर और कैंसर वाली थ्योरी की शुरुआत 1924 में हुई थी, जब जर्मन साइंटिस्ट ओटो वारबर्ग ने खोजा कि कैंसर सेल्स सामान्य सेल्स के मुकाबले ज्यादा तेजी से ग्लूकोज इस्तेमाल करती हैं. इसे वारबर्ग इफेक्ट कहा गया. आज भी &amp;nbsp;पॉजिट्रॉन एमिशन टोमोग्राफी - कंप्यूटेड टोमोग्राफी स्कैन इसी सिद्धांत पर काम करता है, क्योंकि ट्यूमर ग्लूकोज को तेजी से खींचते हैं और स्कैन में चमकने लगते हैं. यूएस नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट की रिसर्च भी बताती है कि कैंसर सेल्स एनर्जी इस्तेमाल करने का तरीका बदल देती हैं.
कार्बोहाइड्रेट बंद करने से क्या है नुकसान?
लेकिन सोशल मीडिया पर अक्सर एक जरूरी बात नहीं बताई जाती कि सिर्फ कैंसर सेल्स ही नहीं, बल्कि दिमाग, हार्ट, मसल्स, ब्लड सेल्स और इम्यून सिस्टम को भी ग्लूकोज की जरूरत होती है. अगर इंसान पूरी तरह कार्बोहाइड्रेट बंद कर देता है, तो बॉडी खुद ग्लूकोज बनाना शुरू कर देती है. इस प्रोसेस को ग्लूकोनियोजेनेसिस कहा जाता है. इसके लिए शरीर मसल्स और प्रोटीन तोड़ता है. यानी कैंसर को तो एनर्जी मिलती रहती है, लेकिन मरीज कमजोर होने लगता है.&amp;nbsp;
इलाज के दौरान किन चीजों का रखें ध्यान?
डॉक्टर ये नहीं कहते कि अनलिमिटेड शुगर खाना सही है. रिफाइंड शुगर, कोल्ड ड्रिंक्स, कैंडी, पेस्ट्री और ज्यादा प्रोसेस्ड फूड हेल्थ के लिए नुकसानदायक होते हैं. लेकिन इलाज के दौरान बॉडी को बैलेंस्ड डाइट की जरूरत होती है. एक्सपर्ट्स होल ग्रेन्स, दालें, सब्जियां, नट्स, हेल्दी फैट और प्रोटीन वाली चीजें खाने की सलाह देते हैं, ताकि बॉडी को धीरे-धीरे एनर्जी मिलती रहे और ताकत बनी रहे.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 18 May 2026 20:30:15 +0530</pubDate>
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        <title>High Blood Pressure: हाई बीपी और डायबिटीज बन रहे साइलेंट किलर, शरीर के इन 5 लक्षणों को भूलकर भी न करें इग्नोर</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/high-blood-pressure-हाई-बीपी-और-डायबिटीज-बन-रहे-साइलेंट-किलर-शरीर-के-इन-5-लक्षणों-को-भूलकर-भी-न-करें-इग्नोर</link>
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        <description><![CDATA[ Early Signs Of High Blood Pressure And Diabetes: हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज आज के समय की सबसे तेजी से बढ़ती बीमारियों में शामिल हैं. डॉक्टरों का कहना है कि ये दोनों बीमारियां अक्सर साथ-साथ शरीर में असर डालती हैं और शुरुआत में इनके लक्षण इतने हल्के होते हैं कि लोग उन्हें सामान्य थकान या स्ट्रेस समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. लेकिन समय के साथ यही समस्याएं हार्ट, किडनी, आंखों, दिमाग और ब्लड वेसल्स को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती हैं.&amp;nbsp;
भारत में डायबिटीज की दिक्कत क्यों बढ़ रही है?
इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च-INDIAB स्टडी के मुताबिक, भारत में हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज का सीधा संबंध मोटापे, कम फिजिकल एक्टिविटी और खराब लाइफस्टाइल से जुड़ा हुआ है. स्टडी में यह भी सामने आया कि शहरों के साथ-साथ गांवों में भी बड़ी संख्या में लोग इन बीमारियों से अनजान हैं.&amp;nbsp;
किन लक्षणों को नहीं करना चाहिए इग्नोर?
कोरोना रेमेडीज लिमिटेड के एसोसिएट वाइस प्रेसिडेंट और हेड ऑफ मेडिकल अफेयर्स डॉ. अमीत सोनी कहते हैं कि हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज आपस में जुड़ी मेटाबॉलिक कंडीशंस हैं. कई बार एक बीमारी दूसरी की स्थिति को तेजी से खराब कर देती है. लगातार सिर दर्द, धुंधला दिखना, असामान्य थकान, पैरों में सूजन और बार-बार यूरिन आना जैसे संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, क्योंकि ये ब्लड शुगर और ब्लड प्रेशर दोनों के बिगड़ने का संकेत हो सकते हैं.&amp;nbsp;
डायबिटीज से आर्टरीज को क्या नुकसान होता है?
डॉक्टरों के मुताबिक, बार-बार होने वाला सिर दर्द खासतौर पर सुबह के समय या थोड़ी मेहनत के बाद महसूस होना हाई ब्लड प्रेशर का संकेत हो सकता है. वहीं अगर इसके साथ डायबिटीज भी हो, तो ब्लड वेसल्स को नुकसान पहुंचने का खतरा और बढ़ जाता है. डायबिटीज आर्टरीज को सख्त बना देती है, जिससे हार्ट को खून पंप करने में ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है.&amp;nbsp;
सह्याद्री सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, पुणे के एंडोक्रिनोलॉजी और डायबिटीज डायरेक्टर डॉ. उदय फड़के ने TOI को बताया कि डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर बिना किसी बड़े लक्षण के एक ही व्यक्ति में मौजूद हो सकते हैं. दोनों मिलकर हार्ट डिजीज, स्ट्रोक, किडनी प्रॉब्लम और आंखों की रोशनी जाने का खतरा बढ़ा देते हैं.&amp;nbsp;
आंखों के नसों के नुकसान का क्या होता है लक्षण?
डॉक्टरों का कहना है कि धुंधला दिखना, आंखों के सामने काले धब्बे नजर आना या अचानक फोकस करने में परेशानी होना सिर्फ आंखों की थकान नहीं हो सकती. यह डायबिटिक रेटिनोपैथी या हाई ब्लड प्रेशर से आंखों की नसों को हुए नुकसान का संकेत भी हो सकता है.&amp;nbsp;
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क्या होते हैं इसके लक्षण?
इसके अलावा पैरों में सूजन, लगातार थकान, रात में बार-बार पेशाब आना और बहुत ज्यादा प्यास लगना भी शरीर के अंदर चल रही गंभीर समस्या की चेतावनी हो सकते हैं. डॉक्टरों के अनुसार, जब किडनी ब्लड से अतिरिक्त शुगर और फ्लूइड को ठीक से फिल्टर नहीं कर पाती, तब ये लक्षण दिखने लगते हैं.
क्यों बढ़ रहा है इसका खतरा?
एक्सपर्ट्स मानते हैं कि खराब नींद, घंटों बैठकर काम करना, ज्यादा नमक और पैकेज्ड फूड खाना, स्मोकिंग, शराब और कम एक्सरसाइज की आदत युवाओं में इन बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ा रही है. डॉक्टर सलाह देते हैं कि 30 साल की उम्र के बाद नियमित ब्लड प्रेशर और ब्लड शुगर चेक करवाना बेहद जरूरी है. इसे साथ ही रोजाना वॉक, हेल्दी डाइट, बेहतर नींद और वजन कंट्रोल जैसी छोटी आदतें भविष्य में बड़ी बीमारियों से बचाने में मदद कर सकती हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 18 May 2026 20:30:14 +0530</pubDate>
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        <title>Natural remedies for acid reflux: पेट की जलन से छुटकारा पाने के लिए आजमाएं ये 5 भारतीय हर्ब्स, एसिड रिफ्लक्स को कर सकती हैं कम</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/natural-remedies-for-acid-reflux-पेट-की-जलन-से-छुटकारा-पाने-के-लिए-आजमाएं-ये-5-भारतीय-हर्ब्स-एसिड-रिफ्लक्स-को-कर-सकती-हैं-कम</link>
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        <description><![CDATA[ Natural remedies for acid reflux: पेट की जलन से छुटकारा पाने के लिए आजमाएं ये 5 भारतीय हर्ब्स, एसिड रिफ्लक्स को कर सकती हैं कम ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 18 May 2026 20:30:14 +0530</pubDate>
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        <title>Sleep And Ageing: 6 घंटे से कम और 8 घंटे से ज्यादा सोते हो तो जल्दी हो जाओगे बूढ़े, स्टडी में खुलासा</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/sleep-and-ageing-6-घंटे-से-कम-और-8-घंटे-से-ज्यादा-सोते-हो-तो-जल्दी-हो-जाओगे-बूढ़े-स्टडी-में-खुलासा</link>
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        <description><![CDATA[ Risks Of Sleeping Too Much Or Too Little: रात में बहुत कम या जरूरत से ज्यादा सोना सिर्फ थकान ही नहीं बढ़ाता, बल्कि ये बॉडी के कई जरूरी अंगों की उम्र भी तेजी से बढ़ा सकता है. नेचर जर्नल में 13 मई को पब्लिश हुई एक नई स्टडी में दावा किया गया है कि कम और ज्यादा दोनों तरह की नींद ब्रेन, हार्ट, फेफड़ों और इम्यून सिस्टम पर बुरा असर डाल सकती है. रिसर्च के मुताबिक सबसे कम खतरा उन लोगों में देखा गया जो रोज करीब 6.4 से 7.8 घंटे की नींद लेते हैं.&amp;nbsp;
नींद क्यों है हमारे लिए जरूरी?
इस स्टडी को कोलंबिया यूनिवर्सिटी के असिस्टेंट प्रोफेसर ऑफ रेडियोलॉजी जुनहाओ वेन ने लीड किया. उन्होंने कहा कि हमारी रिसर्च दिखाती है कि बहुत कम और बहुत ज्यादा दोनों तरह की नींद शरीर के लगभग हर अंग की उम्र बढ़ने की रफ्तार तेज कर सकती है. इससे ये साफ होता है कि अच्छी नींद ब्रेन और पूरी बॉडी को हेल्दी रखने में बेहद जरूरी है.&amp;nbsp;
रिसर्च में क्या पता लगाया गया?
रिसर्चर्स ने एजिंग को मापने के लिए मशीन लर्निंग टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया. टीम ने 17 अलग-अलग ऑर्गन सिस्टम्स के लिए 23 बायोलॉजिकल क्लॉक्स तैयार किए. इन क्लॉक्स में मेडिकल स्कैन, ब्लड टेस्ट और बॉडी प्रोटीन से जुड़ी जानकारी शामिल की गई, जिससे पता लगाया गया कि किसी इंसान के अंग उसकी असली उम्र के मुकाबले कितनी तेजी से बूढ़े हो रहे हैं.
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किन लोगों की उम्र तेजी से बढ़ती है?
इस स्टडी में यूके बायोबैंक के करीब पांच लाख लोगों के हेल्थ डेटा का एनालिसिस किया गया. रिसर्च में एक यू-शेप पैटर्न सामने आया. यानी जो लोग रोज 6 घंटे से कम सोते थे और जो 8 घंटे से ज्यादा सोते थे, दोनों में एजिंग की स्पीड ज्यादा पाई गई. सबसे हेल्दी स्लीप रेंज करीब 7 घंटे मानी गई. कम नींद लेने वाले लोगों में डिप्रेशन, एंग्जायटी, मोटापा, टाइप 2 डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और हार्ट डिजीज का खतरा ज्यादा देखा गया. वहीं कम और ज्यादा दोनों तरह की नींद फेफड़ों की बीमारियों जैसे क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज और अस्थमा से भी जुड़ी मिली. इसके अलावा एसिड रिफ्लक्स जैसी पेट की समस्याओं का रिस्क भी बढ़ता पाया गया.
कम नींद लेने के क्या होते हैं नुकसान?
जुनहाओ वेन के मुताबिक नींद सिर्फ दिमाग से जुड़ी चीज नहीं है, बल्कि इसका असर पूरी बॉडी पर पड़ता है. उन्होंने कहा कि स्लीप ड्यूरेशन हमारी पूरी फिजियोलॉजी से जुड़ी होती है और इसका असर शरीर के लगभग हर हिस्से पर दिखाई देता है. रिसर्च टीम ने बुजुर्ग लोगों में डिप्रेशन पर भी असर देखा. एनालिसिस में सामने आया कि कम नींद सीधे तौर पर डिप्रेशन को बढ़ा सकती है, जबकि ज्यादा नींद ब्रेन और बॉडी फैट में होने वाले बदलावों के जरिए इसका असर डाल सकती है. रिसर्चर्स का मानना है कि कम और ज्यादा सोने वाले लोगों के लिए अलग-अलग तरह की हेल्थ केयर की जरूरत पड़ सकती है.
हालांकि स्टडी ये साबित नहीं करती कि सिर्फ नींद ही तेजी से बूढ़ा होने की वजह है, लेकिन रिसर्चर्स का कहना है कि सही स्लीप हैबिट्स बढ़ती उम्र में हेल्थ को बेहतर बनाए रखने का अहम हिस्सा हो सकती हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 18 May 2026 04:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>Watermelon Eating Tips :कटे हुए तरबूज को खाएं या न खाएं?  हेल्थ एक्सपर्ट्स से जानें गर्मियों में सही स्टोरेज नियम</title>
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        <description><![CDATA[ Watermelon Eating Tips : गर्मियों में तरबूज हर किसी का फेवरेट है. यह रस भरा और ठंडक देने वाला फल है. भारत में लोग अक्सर मार्केट से पहले से कटे हुए तरबूज खरीद लेते हैं या घर पर तरबूज काटकर फ्रिज में रख लेते हैं, जिससे दिन भर कभी भी खा सकें, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि कटे हुए तरबूज को सही तरीके से नहीं रखने पर यह जल्दी खराब हो सकता है और सेहत के लिए अनहेल्दी हो सकता है. डाइटिशियन और हेल्थ एक्सपर्ट्स बताते हैं कि कटे हुए तरबूज को संभालने और स्टोर करने में थोड़ी लापरवाही बड़ी परेशानी का कारण बन सकती है. खासकर गर्मियों में जब तापमान और नमी ज्यादा होती है, बैक्टीरिया तेजी से बढ़ सकते हैं. ऐसे में आइए जानते हैं कटे हुए तरबूज को खाएं या न खाएं, इसे सुरक्षित कैसे स्टोर करें और किन बातों का ध्यान रखना जरूरी है.&amp;nbsp;
कटे हुए तरबूज को खाएं या न खाएं?
पूरा तरबूज अपने मोटे छिलके के कारण लंबे समय तक सुरक्षित रहता है, लेकिन जब इसे काटा जाता है, तो इसका मुलायम और रस भरा हिस्सा हवा, हाथों, चाकू और अन्य सतहों से बैक्टीरिया के संपर्क में आ जाता है. तरबूज में बहुत ज्यादा पानी और प्राकृतिक शुगर होती है. यह बैक्टीरिया के लिए एक उपयुक्त वातावरण तैयार कर देता है. अगर इसे तुरंत फ्रिज में नहीं रखा गया, तो बैक्टीरिया जल्दी बढ़ सकते हैं और फल खराब हो सकता है. वहीं गर्मियों में कई घंटे कटे हुए तरबूज को बाहर छोड़ना खतरनाक हो सकता है. यह समय सल्मोनेला (Salmonella) और लिस्टेरिया (Listeria) जैसे खराब बैक्टीरिया के लिए सही होता है. ये बैक्टीरिया पेट दर्द, उल्टी, दस्त, बुखार और डिहाइड्रेशन जैसी बीमारियों का कारण बन सकते हैं.&amp;nbsp;
कटे हुए तरबूज को सुरक्षित कैसे स्टोर करें?
डाइटिशियन के अनुसार, कटे हुए तरबूज को हमेशा एयरटाइट कंटेनर में रखें या अच्छी तरह ढक कर फ्रिज में स्टोर करें. इसे 4&amp;deg;C या उससे कम तापमान में रखना चाहिए. कटे हुए तरबूज को 1 या 2 दिन के अंदर खाना सबसे अच्छा है. फ्रेशनेस, टेस्ट और पोषण बनाए रखने के लिए हमेशा ताजा कटे हुए फल को प्राथमिकता दें.&amp;nbsp;
तरबूज काटने से पहले क्या करें?
कई लोग तरबूज काटने से पहले उसके छिलके को नहीं धोते, यह एक आम गलती है. बैक्टीरिया छिलके पर हो सकते हैं, और चाकू के जरिए यह फल के अंदर पहुंच सकते हैं. कटने से पहले तरबूज को साफ पानी से धोएं. साफ चाकू, कटिंग बोर्ड और कंटेनर का इस्तेमाल करें.
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गर्मियों में सही स्टोरेज क्यों जरूरी है?
गर्मी और नमी की वजह से फूड पॉइजनिंग के मामले बढ़ जाते हैं. खासकर बच्चों, बुजुर्गों, प्रेग्नेंट महिलाओं और कमजोर इम्यूनिटी वाले लोगों के लिए यह ज्यादा जोखिम भरा हो सकता है. ऐसे में फूड हाइजीन प्रैक्टिस अपनाने से बीमारियों से बचा जा सकता है. जैसे फ्रिज में सही तरीके से स्टोर करें. कटने से पहले फलों को धोएं. पुराना या स्टेल खाना न खाएं. ताजे फल समय पर खाएं.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 17 May 2026 16:30:13 +0530</pubDate>
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        <title>Sitting Too Long On Toilet: क्या आप भी टॉयलेट में 15 मिनट से ज्यादा बैठते हैं? डॉक्टर ने बताया कितनी खतरनाक है ये आदत</title>
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        <description><![CDATA[ Sitting Too Long On Toilet: आजकल ज्यादातर लोग वॉशरूम में मोबाइल फोन लेकर जाते हैं. सोशल मीडिया स्क्रोल करते-करते या वीडियो देखते हुए कई बार लोग जरूरत से ज्यादा समय टॉयलेट सीट पर बिताने लगते हैं. देखने में यह आदत भले ही नॉर्मल लगे, लेकिन डॉक्टरों के अनुसार, इसका सीधा असर पाचन तंत्र और रेक्टल हेल्थ पर पड़ सकता है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि रोजाना 10 से 15 मिनट से ज्यादा समय टॉयलेट में बिताना कई स्वास्थ्य समस्याओं को बढ़ा सकता है.&amp;nbsp;
क्यों खतरनाक हो सकती है यह आदत?
गैस्ट्रो और जीआई सर्जनों के अनुसार लंबे समय तक टॉयलेट सीट पर बैठे रहने से रेक्टम और एनस के आसपास की नसों पर ज्यादा दबाव पड़ता है. लगातार ऐसा होने पर नसों में सूजन आ सकती है, जिससे बवासीर यानी पाइल्स की समस्या शुरू हो सकती है. इसके कारण दर्द, खुजली और मल त्याग के दौरान ब्लीडिंग जैसी परेशानी भी हो सकती है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि वेस्टर्न स्टाइल कमोड पर बैठने की पोजीशन भी कई बार समस्या बढ़ा सकती है. सामान्य स्क्वाटिंग पोजीशन की तुलना में कमोड पर बैठने से रेक्टल एरिया पर ज्यादा प्रभाव दबाव पड़ सकता है. ऐसे में अगर कोई व्यक्ति फोन इस्तेमाल करते हुए ज्यादा देर तक बैठा रहे तो स्थिति और गंभीर हो सकती है.&amp;nbsp;
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क्या ज्यादा देर बैठने से बढ़ सकती है कब्ज?&amp;nbsp;
कई लोग कब्ज होने पर लंबे समय तक टॉयलेट में बैठे रहते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे पेट पूरी तरह साफ हो जाएगा. लेकिन डॉक्टरों के अनुसार यह आदत कब्ज को और बढ़ा सकती है. ज्यादा देर तक जोर लगाने से पेल्विक फ्लोर की मांसपेशियां पर असर पड़ता है और बॉवेल मूवमेंट भी प्रभावित होता है. इससे एनल फिशर और रेक्टल प्रोलैप्स जैसे समस्याओं का खतरा भी बढ़ सकता है.&amp;nbsp;
इन तरीकों से बच सकते हैं समस्या से&amp;nbsp;
डॉक्टरों का कहना है कि टॉयलेट में मोबाइल फोन का इस्तेमाल कम करना सबसे जरूरी है. इसके अलावा खाने में फाइबर की मात्रा बढ़ाना, पर्याप्त पानी पीना और नियमित एक्सरसाइज करना जरूरी माना जाता है. इससे पाचन तंत्र बेहतर रहता है और मल त्याग में ज्यादा समय नहीं लगता. वहीं अगर किसी व्यक्ति को रोजाना 10 मिनट से ज्यादा समय टॉयलेट में लग रहा है, मल त्याग के दौरान दर्द हो रहा है या ब्लीडिंग दिखाई दे रही है तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. डॉक्टर के अनुसार ऐसे लक्षण किसी गंभीर समस्या के संकेत हो सकते हैं और समय रहते जांच करना जरूरी है.
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        <pubDate>Sun, 17 May 2026 00:30:11 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Dual Organ Transplant: एक फैसला और युवक को मिली नई जिंदगी, AIIMS में 18 साल बाद हुआ ड्यूल ऑर्गन ट्रांसप्लांट</title>
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        <description><![CDATA[ AIIMS Dual Organ Transplant After 18 Years: ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज दिल्ली में 18 साल बाद एक ऐसी सर्जरी हुई, जिसने 30 साल के युवक को नई जिंदगी दे दी. लंबे समय से टाइप-1 डायबिटीज से जूझ रहे इस मरीज की हालत इतनी गंभीर हो चुकी थी कि पिछले दो साल से उसे डायलिसिस के सहारे जिंदगी बितानी पड़ रही थी. लेकिन एक ब्रेन डेड डोनर के परिवार के फैसले ने उसकी जिंदगी पूरी तरह बदल दी. एम्स में डॉक्टरों ने पहली बार एक साथ पैंक्रियाज और किडनी ट्रांसप्लांट कर मरीज को नया जीवन दिया.&amp;nbsp;
18 साल बाद हुआ इस तरह का काम
यह ड्यूल ऑर्गन ट्रांसप्लांट एम्स में 18 साल बाद किया गया. मरीज एंड-स्टेज रीनल डिजीज से पीड़ित था, जो लंबे समय से चली आ रही टाइप-1 डायबिटीज की वजह से हुई थी. इस बीमारी में किडनी धीरे-धीरे काम करना बंद कर देती है और मरीज को इंसुलिन के साथ डायलिसिस का सहारा लेना पड़ता है. मरीज को दोनों अंग एक 50 वर्षीय ब्रेन डेड डोनर से मिले, जिनका अंगदान पीजीआई रोहतक में किया गया था.
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ट्रांसप्लांट मरीज के लिए जीवन बदल देने वाला साबित हुआ
एम्स दिल्ली के सर्जरी विभाग के प्रोफेसर डॉ. असुरी कृष्णा ने बताया कि यह ट्रांसप्लांट मरीज के लिए जीवन बदल देने वाला साबित हुआ. सर्जरी के बाद अब मरीज को बहुत कम मात्रा में इंसुलिन की जरूरत पड़ रही है. पहले वह ठीक से चल भी नहीं पाता था, लेकिन अब उसकी स्थिति काफी बेहतर है और वह सामान्य जीवन की ओर लौट रहा है.
किन मरीजों का होता है सिमल्टेनियस पैंक्रियास-किडनी?
डॉक्टरों के मुताबिक, सिमल्टेनियस पैंक्रियास-किडनी यानी एसपीरे उन मरीजों के लिए किया जाता है, जो टाइप-1 डायबिटीज के साथ गंभीर किडनी फेलियर का सामना कर रहे होते हैं. इस प्रक्रिया में एक साथ स्वस्थ पैंक्रियाज और किडनी ट्रांसप्लांट की जाती है. इसका सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि मरीज को डायलिसिस से छुटकारा मिल जाता है और कई मामलों में इंसुलिन इंजेक्शन की जरूरत भी लगभग खत्म हो जाती है.
डॉ. असुरी कृष्णा ने बताया कि एम्स में इस तरह की सर्जरी पिछले 18 सालों से नहीं हुई थी. इसकी बड़ी वजह उत्तर भारत में बेहद कम ऑर्गन डोनेशन और प्रशिक्षित ट्रांसप्लांट सर्जनों की कमी रही. &amp;nbsp;2008 में पहली सर्जरी के बाद कुछ एक्सपर्ट संस्थान छोड़कर चले गए थे, जिसके बाद नए डॉक्टरों को ट्रेनिंग देने और सही मरीज की पहचान करने में समय लगा.
टाइप-1 डायबिटीज के मरीजों की संख्या में इजाफा
एक्सपर्ट का कहना है कि टाइप-1 डायबिटीज के मरीजों की उम्र अब पहले से ज्यादा बढ़ रही है, जिसकी वजह से ऐसे मरीजों की संख्या भी बढ़ रही है जिन्हें आगे चलकर किडनी और पैंक्रियाज दोनों के ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ती है. ऐसे में यह सफल सर्जरी सिर्फ एक मेडिकल उपलब्धि नहीं, बल्कि ऑर्गन डोनेशन की अहमियत का बड़ा उदाहरण भी मानी जा रही है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 15 May 2026 20:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Health Tips: बारिश आने से पहले क्यों बढ़ने लगती हैं वायरल बीमारियां? खबर पढ़ टाल लें जान का खतरा</title>
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        <description><![CDATA[ Monsoon Health Tips: गर्मी की तपती दोपहर के बाद जब आसमान में अचानक काले बादल छाने लगते हैं और ठंडी हवाएं चलती हैं तो हर किसी को सुकून महसूस होती है. यह मौसमी बदलाव और बारिश का संकेत होता है. हालांकि, यही बदलता मौसम गर्मी से राहत के साथ-साथ कई वायरल बीमारियों का खतरा भी लेकर आता है.
बारिश से पहले अक्सर लोग अचानक बुखार, खांसी, जुकाम, गले में दर्द और पेट से जुड़ी परेशानियों का शिकार होने लगते हैं. इसका कारण है बारिश आने से पहले मौसम में नमी का बढ़ना है. तापमान ऊपर-नीचे होता रहता है और हवा में बैक्टीरिया व वायरस तेजी से फैलने लगते हैं. यही वजह है कि डॉक्टर इस मौसम को सबसे संवेदनशील समय बताते हैं. अगर थोड़ी भी लापरवाही हो जाए तो छोटी बीमारी भी बड़ी परेशानी बन सकती है.
बदलते मौसम में क्या-क्या बदलाव आते हैं?
बारिश शुरू होने से पहले वातावरण तेजी से बदलता है. तेज गर्मी के बाद अचानक हवा में नमी बढ़ जाती है, जिससे पसीना ज्यादा आता है और शरीर जल्दी थकने लगता है. कई जगहों पर धूल-मिट्टी उड़ती है तो कहीं गंदा पानी जमा होने लगता है. यही गंदगी मच्छरों और कीटाणुओं को बढ़ने का मौका देती है. साथ ही मौसम का यह उतार-चढ़ाव शरीर की रोगों से लड़ने की ताकत को भी कमजोर कर देता है. दिन में गर्मी और रात में ठंडक होने से लोग समझ नहीं पाते कि क्या पहनें और क्या खाएं. कई बार लोग ठंडी चीजें ज्यादा खाने लगते हैं या बारिश की पहली फुहार में भीग जाते हैं, जिससे वायरल संक्रमण का खतरा और बढ़ जाता है. यही समय होता है जब डेंगू, मलेरिया, वायरल फीवर, टाइफाइड और पेट के इंफेक्शन जैसी बीमारियां तेजी से फैलने लगती हैं.&amp;nbsp;
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कौन-कौन सी बीमारियां सबसे ज्यादा फैलती हैं?
बारिश से पहले और बारिश के शुरुआती दिनों में सबसे ज्यादा वायरल फीवर और फ्लू के मामले सामने आते हैं. &amp;nbsp;इसके अलावा गले में संक्रमण, खांसी-जुकाम और सांस से जुड़ी परेशानियां भी तेजी से बढ़ने लगती है. वहीं जिन लोगों की इम्यूनिटी कमजोर होती है, उन्हें यह मौसम ज्यादा प्रभावित कर सकता है. साथ ही छोटे बच्चे और बुजुर्ग भी इसके प्रभाव में आकर जल्दी बीमार पड़ सकते हैं. गंदा पानी और बाहर का खाना खाने से पेट दर्द, उल्टी, दस्त और फूड पॉइजनिंग जैसी समस्याएं भी होने लगती हैं. इसके अलावा अचानक बारिश के वजह से कई जगहों पर पानी जमा होने लगता है, जिससे मच्छर बढ़ जाते हैं जो डेंगू और मलेरिया जैसी खतरनाक बीमारियों को जन्म देते हैं. शुरुआत में लोग इन लक्षणों को मामूली समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन यही गलती बाद में बड़ी परेशानी बन सकती है. &amp;nbsp;इसलिए शरीर में कमजोरी, तेज बुखार या लगातार खांसी दिखे तो तुरंत सावधानी बरतनी चाहिए.&amp;nbsp;
कैसे करें बचाव&amp;nbsp;
इस मौसम में थोड़ी सी समझदारी आपकी और आपके परिवार की सेहत बचा सकती है. इसके लिए सबसे जरूरी है साफ-सफाई का ध्यान रखना. इसमें घर के आसपास पानी जमा न होने दें ताकि मच्छर न पनपें. साथ ही बाहर का खुला या बासी खाना खाने से बचें और ज्यादा से ज्यादा ताजा व हल्का भोजन करें. शरीर को मजबूत रखने के लिए पानी पीते रहें और कोशिश करें फल-सब्जियां अच्छी मात्रा में खाएं. इसके अलावा &amp;nbsp;बारिश के मौसम में भीगने के बाद तुरंत कपड़े बदल लेना चाहिए ताकि शरीर में ठंड न लगे. वहीं छोटे बच्चों और बुजुर्गों का खास ध्यान रखना जरूरी है क्योंकि उनकी रोगों से लड़ने की ताकत कम होती है. अगर बुखार या कमजोरी लगातार बनी रहे तो घरेलू इलाज के भरोसे बैठने के बजाय डॉक्टर से सलाह जरूर लें.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Fri, 15 May 2026 04:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Sleep Cycle: कैसे लगातार स्क्रीन टाइम से बिगड़ती है स्लीप साइकिल? आज ही कर लें सुधार वरना हो जाएगा नुकसान </title>
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        <description><![CDATA[ Sleep Problems: आज के समय में ज्यादातर लोगों की जिंदगी मोबाइल, लैपटॉप और टीवी के आसपास ही घूमती है. खासकर ऑफिस में काम करने वाले लोग सुबह से शाम तक कंप्यूटर स्क्रीन के सामने बैठे रहते हैं. काम खत्म होने के बाद भी दिमाग को आराम नहीं मिलता, क्योंकि घर पहुंचकर हाथ में फिर मोबाइल आ जाता है. कोई सोशल मीडिया देखता है, कोई वीडियो देखता है तो कोई देर रात तक चैट करता रहता है.
धीरे-धीरे यही आदत शरीर को अंदर से थकाने लगती है. इंसान को लगता है कि वह बस फोन चला रहा है, लेकिन उसकी आंखें और दिमाग लगातार काम कर रहे होते हैं. यही वजह है कि रात को जल्दी नींद नहीं आती और सुबह उठते ही शरीर टूटा-टूटा सा महसूस होता है. कई लोग इसे छोटी बात समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन यही खराब आदत आगे चलकर बड़ी परेशानी बन जाती है.
स्क्रीन की रोशनी नींद की दुश्मन कैसे बनती है
मोबाइल और लैपटॉप से निकलने वाली नीली रोशनी यानी ब्लू लाइट हमारे दिमाग को यह एहसास कराती है कि अभी दिन है. ऐसे में शरीर ठीक से &amp;ldquo;स्लीप मोड&amp;rdquo; में नहीं जा पाता. आमतौर पर रात के समय शरीर मेलाटोनिन नाम का हार्मोन बनाता है, जो नींद लाने में मदद करता है. हालांकि, जब सोने से पहले लंबे समय तक स्क्रीन देखी जाती है तो यह हार्मोन कम बनने लगता है. यही कारण है कि इंसान बिस्तर पर लेट तो जाता है, लेकिन देर तक करवटें बदलता रहता है. लगातार ऐसा होता रहता है तो इससे शरीर को पूरा आराम नहीं मिल पाता, जिससे अगले दिन सिर भारी लगना, आंखों में जलन होना और छोटी-छोटी बातों पर चिड़चिड़ापन महसूस होना आम बात बन जाती है.&amp;nbsp;
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खराब स्लीप साइकिल से शरीर और दिमाग दोनों होते हैं कमजोर
जब नींद पूरी नहीं होती, तो उसका असर सिर्फ चेहरे की थकान तक सीमित नहीं रहता. इससे धीरे-धीरे शरीर की ताकत भी कम होने लगती है, जिस कारण दिनभर सुस्ती रहना, काम में मन न लगना और ध्यान बार-बार भटकना शुरुआती संकेत सामने आने लगते हैं. रात को नींद अच्छी तरह पूरी ना होने पर कई लोग ऑफिस में बैठे-बैठे जम्हाई लेते रहते हैं, क्योंकि उनका दिमाग ठीक से आराम नहीं कर पाया होता है. साथ ही लगातार खराब नींद की वजह से आंखों के नीचे काले घेरे भी आने लगते हैं. इतना ही नहीं, कई रिसर्च में यह भी सामने आया है कि लंबे समय तक खराब स्लीप साइकिल दिल, दिमाग और मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर डाल सकती है. कुछ लोग रात को देर तक फोन चलाने के बाद सुबह उठ ही नहीं पाते, जिससे उनका पूरा रूटीन बिगड़ जाता है. यही वजह है कि डॉक्टर भी सोने से पहले स्क्रीन टाइम कम करने की सलाह देते हैं,&amp;nbsp;
आज से बदल लें ये छोटी आदतें
अगर आप भी देर रात तक मोबाइल चलाने की आदत से परेशान हैं, तो कुछ आसान बदलाव से आप अपने आप की मदद कर सकते है, जैसे कोशिश करें कि सोने से कम से कम एक घंटा पहले फोन और लैपटॉप से दूरी बना लें. रात में हल्की रोशनी रखें और बेवजह सोशल मीडिया स्क्रॉल करने से बचें. इसके अलावा अगर काम की वजह से पूरा दिन स्क्रीन पर बिताना पड़ता है, तो बीच-बीच में आंखों को आराम देना बहुत जरूरी होता है. हर 20 से 30 मिनट बाद कुछ सेकंड के लिए स्क्रीन से नजर हटाएं. साथ ही सोने से पहले किताब पढ़ना, हल्का संगीत सुनना या परिवार के साथ थोड़ा समय बिताना भी दिमाग को शांत करता है. याद रखिए, अच्छी नींद सिर्फ आराम नहीं देती, बल्कि पूरे शरीर को नई ताकत भी देती है. इसलिए हर डॉक्टर यही सलाह देता है कि हर आदमी को एक दिन में 7 से 8 घंटे कि निंद लेनी ही चाहिए. &amp;nbsp;ऐसे में आज ही अपनी स्लीप साइकिल को सुधारना शुरू करें, वरना छोटी सी लापरवाही धीरे-धीरे आपकी सेहत पर भारी पड़ सकती है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Fri, 15 May 2026 04:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>Bluetooth Earbuds: क्या आपका ब्लूटूथ ईयरबड्स बन सकता है ब्रेन कैंसर का कारण, जानें एक्सपर्ट ने क्या दी चेतावनी?</title>
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        <description><![CDATA[ Can Bluetooth Earbuds Cause Brain Cancer: आजकल ब्लूटूथ ईयरबड्स और वायरलेस हेडफोन्स लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं. ऑफिस कॉल से लेकर जिम, ट्रैवल और यहां तक कि सोते समय पॉडकास्ट सुनने तक, लोग घंटों इन्हें इस्तेमाल करते हैं. लेकिन इनके बढ़ते इस्तेमाल के साथ एक सवाल भी तेजी से चर्चा में है, क्या लंबे समय तक ब्लूटूथ ईयरबड्स इस्तेमाल करने से ब्रेन कैंसर का खतरा बढ़ सकता है?
कैसे काम करता है ब्लूटूथ टेक्नोलॉजी?
दरअसल ब्लूटूथ टेक्नोलॉजी रेडियो फ्रीक्वेंसी यानी RF रेडिएशन के जरिए काम करती है. यही वजह है कि कई लोग इसे लेकर डर जाते हैं, क्योंकि रेडिएशन शब्द सुनते ही कैंसर जैसी बीमारियों का ख्याल आने लगता है. हालांकि एक्सपर्ट्स का कहना है कि ब्लूटूथ डिवाइस से निकलने वाला रेडिएशन &quot;नॉन-आयोनाइजिंग रेडिएशन&quot; की कैटेगरी में आता है, जो एक्स-रे जैसे खतरनाक आयोनाइजिंग रेडिएशन से काफी अलग होता है.
क्या घंटों इस्तेमाल करने से इसका कोई असर होता है?
यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिल्वेनिया के बायोइंजीनियरिंग प्रोफेसर एमेरिटस डॉ. केन फोस्टर के मुताबिक ब्लूटूथ डिवाइस से निकलने वाला रेडिएशन मोबाइल फोन की तुलना में काफी कम होता है. उन्होंने Health को बताया कि अगर कोई व्यक्ति घंटों वायरलेस ईयरबड्स इस्तेमाल करता है, तब भी उसका रेडिएशन एक्सपोजर फोन को कान से लगाकर बात करने से कम माना जाता है.&amp;nbsp;
क्या ब्लूटूथ हमारे डीएनए को नुकसान पहुंचा सकते हैं?
एक्सपर्ट बताते हैं कि आयोनाइजिंग रेडिएशन शरीर के डीएनए को नुकसान पहुंचा सकता है और कैंसर का खतरा बढ़ा सकता है. लेकिन ब्लूटूथ डिवाइस नॉन-आयोनाइजिंग रेडिएशन इस्तेमाल करते हैं, जिसमें इतनी ऊर्जा नहीं होती कि वह सेल्स को उसी तरह नुकसान पहुंचा सके. यही वजह है कि अभी तक किसी रिसर्च में ब्लूटूथ ईयरबड्स और ब्रेन कैंसर के बीच सीधा संबंध साबित नहीं हुआ है. हालांकि साइंटिस्ट यह भी मानते हैं कि वायरलेस डिवाइस और RF रेडिएशन पर अभी और रिसर्च की जरूरत है. फिलहाल उपलब्ध स्टडीज में ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं मिला है जो यह बताए कि ब्लूटूथ ईयरबड्स ब्रेन ट्यूमर या कैंसर का कारण बनते हैं.&amp;nbsp;
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इस्तेमाल करते समय क्या रखना चाहिए सावधानी?
डॉ. केन फोस्टर का कहना है कि अगर कोई व्यक्ति अतिरिक्त सावधानी बरतना चाहता है तो वह जरूरत न होने पर ईयरबड्स निकाल सकता है या वायर्ड हेडफोन का इस्तेमाल कर सकता है. लेकिन उनके मुताबिक लोगों को ज्यादा चिंता उस खतरे की करनी चाहिए जो तुरंत नुकसान पहुंचा सकता है, जैसे तेज आवाज में लंबे समय तक गाने सुनना. एक्सपर्ट के अनुसार जरूरत से ज्यादा तेज आवाज में ईयरबड्स इस्तेमाल करने से सुनने की क्षमता पर असर पड़ सकता है. इसलिए सलाह दी जाती है कि हेडफोन का इस्तेमाल 60 से 90 मिनट तक सीमित रखें, बीच-बीच में ब्रेक लें और वॉल्यूम 60 से 80 प्रतिशत से ज्यादा न रखें.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 15 May 2026 04:30:06 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Oily Food Side Effects: खाने में ज्यादा तेल मतलब बीमारियां, जानें कम इस्तेमाल से कितनी सुधर सकती है सेहत?</title>
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        <description><![CDATA[ What Happens When You Eat Too Much Oily Food: भारतीय किचन में तेल का इस्तेमाल लगभग हर खाने का हिस्सा माना जाता है. तड़का लगाने से लेकर डीप फ्राई तक, कई डिशेज बिना तेल के अधूरी लगती हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जरूरत से ज्यादा तेल आपकी सेहत पर कितना भारी पड़ सकता है? आजकल एक्सपर्ट्स लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि ज्यादा ऑयली खाना धीरे-धीरे शरीर को कई बीमारियों की तरफ धकेल सकता है.&amp;nbsp;
भारत में कितने प्रतिशत लोग ऑयली फूड खाना पसंद करते हैं?
Redcliffelabs की रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत में करीब 38 प्रतिशत लोग नियमित रूप से तले हुए स्नैक्स और प्रोसेस्ड फूड खाते हैं, जबकि सिर्फ 28 प्रतिशत लोग ही संतुलित डाइट लेते हैं, जिसमें फल, सब्जियां और पोषक तत्वों से भरपूर चीजें शामिल होती हैं. स्टडीज में यह भी सामने आया है कि हाई-कैलोरी और ऑयली फूड का सेवन लगातार बढ़ रहा है.
क्यों तला हुआ खाना पसंद करते हैं लोग?&amp;nbsp;
एक्सपर्ट्स का कहना है कि लोग अक्सर तला हुआ खाना इसलिए ज्यादा खाते हैं, क्योंकि इसका स्वाद उन्हें पसंद आता है और यह तुरंत क्रेविंग को शांत करता है. लेकिन यही आदत आगे चलकर कई हेल्थ समस्याओं की वजह बन सकती है.&amp;nbsp;
ज्यादा ऑयली खाने से क्या होता है नुकसान
हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली बेवसाइट Redcliffelabs के अनुसार, बहुत ज्यादा ऑयली खाना सबसे पहले डाइजेशन पर असर डालता है. कई लोगों को तला हुआ खाना खाने के बाद पेट भारी लगना, ब्लोटिंग, एसिडिटी और अपच जैसी दिक्कतें महसूस होती हैं. दरअसल, ज्यादा फैट वाले खाने को पचाने में शरीर को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है, जिससे डाइजेशन स्लो हो जाता है.&amp;nbsp;
आपके मूड पर भी होता है असर
सिर्फ पेट ही नहीं, ज्यादा ऑयली खाना मूड पर भी असर डाल सकता है. रिपोर्ट्स में बताया गया है कि प्रोसेस्ड और फ्राइड फूड में मौजूद अनहेल्दी ट्रांस फैट्स शरीर में सूजन बढ़ा सकते हैं, जो दिमाग के काम करने के तरीके को प्रभावित कर सकते हैं. कुछ स्टडीज में ज्यादा फ्राइड फूड खाने वालों में डिप्रेशन और एंग्जायटी के लक्षण भी ज्यादा पाए गए हैं.&amp;nbsp;
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वजन और हार्ट हेल्थ पर भी होता है नुकसान&amp;nbsp;
लंबे समय तक ज्यादा तेल वाला खाना खाने से वजन तेजी से बढ़ सकता है. फ्राइड फूड में कैलोरी बहुत ज्यादा होती है, लेकिन जरूरी पोषक तत्व कम होते हैं. यही वजह है कि लगातार ऑयली खाना मोटापे और उससे जुड़ी कई बीमारियों का खतरा बढ़ा देता है. &amp;nbsp;ज्यादा तेल हार्ट हेल्थ के लिए भी नुकसानदायक माना जाता है. एक्सपर्ट्स के मुताबिक, इससे एलडीएल यानी बैड कोलेस्ट्रॉल बढ़ सकता है और गुड कोलेस्ट्रॉल कम हो सकता है. समय के साथ यह धमनियों में प्लाक जमा कर सकता है, जिससे हार्ट अटैक, स्ट्रोक और हाई ब्लड प्रेशर का खतरा बढ़ जाता है.&amp;nbsp;
फैटी लिवर का भी शिकार हो सकते हैं आप
रिपोर्ट्स यह भी बताती हैं कि जरूरत से ज्यादा तला हुआ खाना टाइप-2 डायबिटीज के जोखिम को बढ़ा सकता है. फ्राइड फूड इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ाने में भूमिका निभाता है, जो डायबिटीज की बड़ी वजह मानी जाती है. इसके अलावा फैटी लिवर जैसी समस्याएं भी ज्यादा ऑयली डाइट से जुड़ी हुई हैं.&amp;nbsp;
&amp;nbsp;हालांकि अच्छी बात यह है कि छोटे-छोटे बदलाव करके सेहत में बड़ा सुधार लाया जा सकता है. एक्सपर्ट्स सलाह देते हैं कि डीप फ्राई चीजों की जगह बेक्ड या ग्रिल्ड फूड चुनें. इसके साथ ही खाने में हरी सब्जियां, फल, साबुत अनाज और हेल्दी फैट्स को शामिल करना शरीर के लिए फायदेमंद हो सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 14 May 2026 00:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Cesarean delivery risk: सीजेरियन डिलीवरी के दौरान क्या सच में होता है किडनी फेल होने का खतरा?</title>
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        <description><![CDATA[ Cesarean Delivery Risk: राजस्थान के कोटा मेडिकल कॉलेज से सामने आए लगातार मौतों और किडनी फेल होने के मामलों ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है. सिजेरियन डिलीवरी के बाद महिलाओं की तबीयत बिगड़ने और कई मरीजों के डायलिसिस तक पहुंचने की खबरों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या सी सेक्शन के दौरान सच में किडनी फेल होने का खतरा होता है. इसे लेकर डॉक्टरों का कहना है कि सिजेरियन डिलीवरी सामान्य प्रक्रिया नहीं बल्कि एक बड़ी सर्जरी होती है और अगर ऑपरेशन के बाद इंफेक्शन फैल जाए तो स्थिति तेजी से गंभीर हो सकती है. ऐसे में चलिए अब आपको बताते हैं कि सीजेरियन डिलीवरी के दौरान क्या सच में किडनी फेल होने का खतरा होता है.&amp;nbsp;
कोटा में लगातार बढ़ रहे मामले&amp;nbsp;
कोटा के न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल और जेके लोन अस्पताल में पिछले कुछ दिनों में कई प्रसूताओं महिलाओं की तबीयत बिगड़ी है. वहीं अब तक चार महिलाओं की मौत हो चुकी है, जबकि कई महिलाओं में किडनी फेल होने और ब्लड प्रेशर गिरने जैसी समस्याएं सामने आई है. कुछ मरीजों का डायलिसिस और आईसीयू में इलाज चल रहा है. मामले की जांच के लिए जयपुर से एक्सपर्ट डॉक्टरों की टीम भी कोटा पहुंची है.&amp;nbsp;
कैसे बढ़ता है संक्रमण का खतरा?&amp;nbsp;
डॉक्टरों के अनुसार सिजेरियन डिलीवरी के बाद इन्फेक्शन सबसे बड़ा खतरा होता है. अगर बैक्टीरिया शरीर में फैल जाए तो यह खून तक पहुंच सकते हैं और फिर शरीर में सेप्सिस की स्थिति पैदा हो सकती है. सेप्सिस होने पर शरीर के कई अंग प्रभावित होने लगते हैं और सबसे पहले असर किडनी पर दिखाई देता है. यही वजह है कि कुछ मामलों में मरीजों की किडनी काम करना बंद कर देती है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि प्रेगनेंसी और ऑपरेशन के दौरान शरीर की प्रतिरोधक क्षमता पहले से कमजोर होती है. इससे इंफेक्शन तेजी से फैल सकता है. अगर समय पर इलाज और निगरानी न हो तो संक्रमण ब्लड प्रेशर को अचानक गिरा देता है. जिससे किडनी तक पर्याप्त ब्लड नहीं पहुंच पाता और किडनी फेल होने का खतरा बढ़ जाता है.&amp;nbsp;
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नॉर्मल डिलीवरी से ज्यादा संवेदनशील क्यों है सी सेक्शन?&amp;nbsp;
डॉक्टरों के अनुसार सी सेक्शन में पेट और गर्भाशय की कई परतों को काटकर बच्चे को बाहर निकाला जाता है. यही कारण है कि सामान्य डिलीवरी की तुलना में इसमें संक्रमण, ज्यादा ब्लीडिंग, ब्लड क्लॉट और पोस्ट ऑपरेटिव समस्याओं का खतरा ज्यादा रहता है. खासतौर पर जिन महिलाओं को एनीमिया, डायबिटीज, मोटापा या लंबे समय तक लेबर पेन जैसे समस्याएं होती है, उनमें खतरा और बढ़ जाता है. इमरजेंसी सिजेरियन के मामलों में खतरा और ज्यादा माना जाता है.
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        <pubDate>Thu, 14 May 2026 00:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>Kidney Stone: क्या किडनी स्टोन निकालने के लिए गटक जाते हैं बीयर? हो सकते हैं इस बीमारी के शिकार</title>
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        <description><![CDATA[ Why Beer Can Increase Kidney Stone Risk: किडनी स्टोन को लेकर सोशल मीडिया पर कई तरह के दावे किए जाते हैं. इन्हीं में से एक दावा यह भी है कि बीयर पीने से पथरी जल्दी निकल जाती है. कई लोग दोस्तों या रिश्तेदारों के अनुभव सुनकर इस बात को सच मान लेते हैं. लेकिन एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह सिर्फ एक मिथक है और इस पर भरोसा करना नुकसानदायक साबित हो सकता है.&amp;nbsp;
फायदे की जगह हो सकता है नुकसान
पुणे के सह्याद्री सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल में कंसल्टेंट नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. अतुल डी. सजगुरे साफ कहते हैं कि बीयर किडनी स्टोन के खतरे को कम नहीं करती. उनके मुताबिक, शराब शरीर में डिहाइड्रेशन बढ़ा सकती है, जिससे लंबे समय में पथरी बनने का जोखिम और ज्यादा बढ़ जाता है. मुंबई के पी.डी. हिंदुजा हॉस्पिटल एंड मेडिकल रिसर्च सेंटर में कंसल्टेंट नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. जतिन कोठारी ने TOI को बताया &amp;nbsp;कि लोगों को लगता है कि बीयर एक लिक्विड है, इसलिए यह शरीर को हाइड्रेट रखेगी. लेकिन असल में शराब का असर बिल्कुल उल्टा होता है. अल्कोहल शरीर में डाइयूरेटिक की तरह काम करता है, यानी यह बार-बार पेशाब के जरिए शरीर से ज्यादा पानी बाहर निकालता है. ऐसे में अगर कोई व्यक्ति पर्याप्त पानी नहीं पी रहा और सिर्फ बीयर पर भरोसा कर रहा है, तो शरीर में पानी की कमी हो सकती है.&amp;nbsp;
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बढ़ जाता है वजन बढ़ने और मेटाबॉलिक सिंड्रोम का खतरा 
डॉ. कोठारी के अनुसार, डिहाइड्रेशन की वजह से पेशाब में मौजूद मिनरल्स ज्यादा कंसंट्रेट हो जाते हैं, जिससे पथरी बनने की संभावना बढ़ जाती है. यानी जिस चीज को लोग इलाज समझ रहे होते हैं, वही कई बार समस्या को और बढ़ा सकती है. एक्सपर्ट्स का यह भी कहना है कि बीयर सिर्फ डिहाइड्रेशन ही नहीं बढ़ाती, बल्कि शरीर में यूरिक एसिड का स्तर भी बढ़ा सकती है. हाई यूरिक एसिड यूरिक एसिड स्टोन बनने की बड़ी वजह माना जाता है. इसके अलावा ज्यादा मात्रा में बीयर पीने से वजन बढ़ने और मेटाबॉलिक सिंड्रोम का खतरा भी बढ़ सकता है, जो आगे चलकर किडनी स्टोन की समस्या को और गंभीर बना सकता है.&amp;nbsp;
डॉ. कोठारी बताते हैं कि कई लोग पानी की जगह बीयर पीने लगते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे किडनी फ्लश हो जाएगी. लेकिन पानी की कमी और अल्कोहल का असर मिलकर स्थिति को और खराब कर सकता है.&amp;nbsp;
क्या है सबसे आसान तरीका?
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, किडनी स्टोन से बचाव का सबसे आसान और असरदार तरीका पर्याप्त मात्रा में पानी पीना है. डॉ. सजगुरे सलाह देते हैं कि दिनभर में 8 से 12 गिलास पानी जरूर पीना चाहिए, ताकि यूरिन पतला रहे और मिनरल्स जमा न हों. वहीं डॉ. कोठारी के अनुसार, नींबू पानी भी फायदेमंद हो सकता है, क्योंकि इसमें मौजूद साइट्रेट पथरी बनने की प्रक्रिया को रोकने में मदद करता है.&amp;nbsp;
डॉक्टर्स का कहना है कि किडनी स्टोन सिर्फ एक कारण से नहीं बनता. खानपान, कम पानी पीना, ज्यादा नमक, मेटाबॉलिक समस्याएं और जेनेटिक कारण भी इसके पीछे जिम्मेदार हो सकते हैं. इसलिए सोशल मीडिया पर फैल रहे मिथकों पर भरोसा करने के बजाय सही मेडिकल सलाह लेना ज्यादा जरूरी है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 14 May 2026 00:30:11 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Prateek Yadav Death: क्या फिटनेस फ्रीक होने से गई प्रतीक की जान, जानें एक्सरसाइज को लेकर क्या कहते हैं एक्सपर्ट?</title>
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        <description><![CDATA[ What Happened To Prateek Yadav: समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के छोटे बेटे प्रतीक यादव का 38 साल की उम्र में निधन हो गया. अचानक तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टर उन्हें बचा नहीं सके. शुरुआती जानकारी के मुताबिक वह लंबे समय से फेफड़ों से जुड़ी बीमारी और लंग्स में खून के थक्के की समस्या से जूझ रहे थे. हालांकि उनकी मौत के बाद एक और सवाल तेजी से चर्चा में है क्या जरूरत से ज्यादा फिटनेस भी शरीर के लिए खतरा बन सकती है?.
फिटनेस को लेकर थे काफी एक्टिव 
प्रतीक यादव फिटनेस को लेकर काफी गंभीर माने जाते थे. &amp;nbsp;उनके सोशल मीडिया अकाउंट पर जिम वर्कआउट, हैवी डेडलिफ्ट और एक्सट्रीम ट्रेनिंग की कई तस्वीरें और वीडियो मौजूद हैं. वह कार ड्राइविंग और जानवरों के भी शौकीन थे। राजनीति से दूरी रखने वाले प्रतीक अक्सर अपनी फिटनेस लाइफस्टाइल की वजह से चर्चा में रहते थे.&amp;nbsp;
क्या ज्यादा एक्सरसाइज हेल्थ के लिए नुकसानदायक?
हम सभी जानते हैं कि एक्सरसाइज शरीर के लिए जरूरी है. यह दिल को मजबूत बनाती है, वजन कंट्रोल रखने में मदद करती है और मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर करती है. लेकिन एक्सपर्ट मानते हैं कि जरूरत से ज्यादा या गलत तरीके से की गई एक्सरसाइज शरीर को नुकसान भी पहुंचा सकती है.&amp;nbsp;
ओवर एक्सरसाइजिंग शरीर के लिए कितनी खतरनाक?
लुइसियाना स्थित Excel Rehabilitation Services के फिजिकल थेरेपिस्ट डेविड मिरांडा कहते हैं कि ओवर एक्सरसाइजिंग शरीर के लिए नुकसानदायक हो सकती है और कई बार यह स्वास्थ्य के लिए खतरनाक भी बन जाती है. &amp;nbsp;वहीं Mercy Medical Center के ऑर्थोपेडिक स्पोर्ट्स मेडिसिन सर्जन डॉ. मार्क स्लाबॉ बताते हैं कि बहुत तेजी से शरीर पर ज्यादा दबाव डालना ओवरट्रेनिंग की स्थिति पैदा कर सकता है.&amp;nbsp;
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कितनी एक्सरसाइज शरीर के लिए सही?
अमेरिकी हेल्थ विभाग के अनुसार वयस्कों को हर हफ्ते 150 से 300 मिनट तक मॉडरेट फिजिकल एक्टिविटी या 75 से 150 मिनट तक इंटेंस एक्सरसाइज करनी चाहिए. इसके साथ हफ्ते में कम से कम दो दिन स्ट्रेंथ ट्रेनिंग की सलाह दी जाती है. हालांकि एक्सपर्ट यह भी मानते हैं कि हर व्यक्ति की बॉडी अलग होती है और अपनी क्षमता से ज्यादा ट्रेनिंग करना खतरनाक हो सकता है.
क्या प्रतीक की मौत फिटनेस फ्रीक होने से हुई?
डॉक्टरों के मुताबिक ओवरट्रेनिंग तब होती है जब शरीर को रिकवरी का पर्याप्त समय नहीं मिलता. लगातार हैवी वर्कआउट, कम नींद, खराब डाइट और जरूरत से ज्यादा एक्सरसाइज शरीर पर दबाव बढ़ा सकते हैं. Emory School of Medicine के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. ओलुसेउन ओलुफाडे कहते हैं कि अगर कोई शुरुआती व्यक्ति लगातार कई दिनों तक भारी ट्रेनिंग करता है तो इससे गंभीर इंजरी का खतरा बढ़ सकता है. हालांकि अभी तक यह कहना जल्दबाजी होगी कि प्रतीक यादव की मौत का सीधा संबंध उनकी फिटनेस लाइफस्टाइल से था. डॉक्टरों का कहना है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद ही उनकी मौत की असली वजह साफ हो पाएगी.&amp;nbsp;
इसे भी पढ़ें-&amp;nbsp;Vitamin D Deficiency: क्या बिना बात रहता है बदन दर्द और खराब मूड, कहीं इस विटामिन की कमी से तो नहीं हो रहा ऐसा?
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 14 May 2026 00:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>A1 vs A1 Milk: A1 और A2 दूध में क्या होता है अंतर, आपकी सेहत के लिए कौन&amp;सा ज्यादा पौष्टिक? </title>
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        <description><![CDATA[ A1 vs A1 Milk: दूध भारतीय खानपान का एक अहम हिस्सा माना जाता है. सुबह की चाय से लेकर बच्चों के नाश्ते और रात के हल्के भोजन तक लगभग हर घर में दूध का इस्तेमाल होता है. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में A1 और A2 दूध को लेकर बहस काफी तेज हुई है. बाजार में A2 दूध को ज्यादा हेल्दी और आसानी से पचने वाला बताकर बेचा जा रहा है. जबकि कई लोग इसे सिर्फ एक मार्केटिंग ट्रेंड मानते हैं. ऐसे में लोगों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही रहता है कि आखिर A1 और A2 में अंतर क्या है और सेहत के लिए कौन सा दूध बेहतर माना जाता है.&amp;nbsp;
क्या होता है A1 और A2 दूध?
दूध में मौजूद कुल प्रोटीन का लगभग 80 फीसदी हिस्सा केसीन प्रोटीन का होता है. इसमें बीटा केसीन प्रमुख रूप से पाया जाता है. इसी बेटा केसीन के अलग-अलग प्रकारों में A1 और A2 सबसे ज्यादा चर्चा में रहते हैं. A1 दूध में A1 प्रकार का बीटा केसीन पाया जाता है. जबकि A2 दूध में A2 प्रकार का बीटा केसीन मौजूद होता है. वैज्ञानिकों का मानना है कि इन दोनों प्रोटीन में केवल एक अमीनो एसिड का अंतर होता है, लेकिन शरीर पर इनका प्रभाव अलग-अलग पड़ता है.&amp;nbsp;
किस गाय से मिलता है A1 और A2?
दूध का प्रकार काफी हद तक गाय की नस्ल पर निर्भर करता है. भारतीय देसी गायों जैसे गिर, साहिवाल, रेड सिंधी और थारपारकर नस्ल की गाय का दूध आमतौर पर &amp;nbsp;A2 माना जाता है. वहीं होल्स्टीन, फ्रीजियन और कुछ यूरोपीय नस्ल को गायों में A1 दूध पाया जाता है. आम बाजार में मिलने वाले कई पैकेट वाले दूध में A1 और A2 प्रकार के प्रोटीन हो सकते हैं, जबकि A2 में सिर्फ A2 बीटा केसीन होता है.&amp;nbsp;
पाचन पर कैसे पड़ता है असर?&amp;nbsp;
A1 और A2 दूध को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा पाचन को लेकर होती है. रिसर्च में यह बात सामने आई है कि जब A1 दूध पचता है तो शरीर में बीसीएम-7 यानी बीटा कैसे मॉर्फिन-7 नाम का एक पेप्टाइड बनता है. कुछ वैज्ञानिक इसे पेट संबंधी बीमारी से जोड़कर देखते हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ लोगों को A1 दूध पीने के बाद गैस, ब्लोटिंग और पेट की बीमारी हो सकती है. वहीं A2 दूध के पाचन के दौरान बीसीएम-7 बहुत कम या नहीं बनता है. इसलिए इसे पेट के लिए हल्का माना जाता है.&amp;nbsp;
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क्या A2 दूध ज्यादा हेल्दी है?
A2 ग्रुप को लेकर यह दावा किया जा रहा है कि यह शरीर के लिए ज्यादा अनुकूल हो सकता है. कुछ रिसर्च में से बेहतर डाइजेशन, पेट की कम परेशानी और ओवरऑल गट हेल्थ से जोड़ा गया है. हालांकि एक्सपर्ट्स यह भी साफ करते हैं कि अभी तक ऐसे ठोस वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिले हैं, जिनसे यह पूरी तरह साबित हो सके कि कि A2 दूध हर व्यक्ति के लिए A1 दूध से बेहतर ही है.
ये भी पढ़ें-&amp;nbsp;Women Health Issues: गर्मी में क्यों बढ़ जाता है पीरियड्स का दर्द, क्या है इससे बचने के तरीके? ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 14 May 2026 00:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>Overhydration Risk: क्या गर्मी में सिर्फ पानी पीना है खतरनाक? डॉक्टर से जानें चौंकाने वाला सच</title>
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        <description><![CDATA[ Can Drinking Too Much Water Be Dangerous: गर्मी के दिनों में अक्सर हम यही मानते हैं कि ज्यादा से ज्यादा पानी पीना ही शरीर को स्वस्थ रखने का सबसे आसान तरीका है. लेकिन क्या सिर्फ पानी पीना ही काफी है? एक हालिया मामला इस सोच को पूरी तरह बदल देता है. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर एक्सपर्ट क्या कहते हैं.&amp;nbsp;
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
डॉ. रोमेल टिक्कू ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि &amp;nbsp;एक 25 साल का युवक पूरे दिन धूप में बाइक से इधर-उधर घूमता रहा. उसने खुद को हाइड्रेट रखने के लिए करीब 5 लीटर पानी पिया, लेकिन दिनभर कुछ खाया नहीं. न फल, न कोई नमक वाला पेय सिर्फ सादा पानी, शुरुआत में उसे हल्का चक्कर और मतली महसूस हुई, जिसे उसने थकान समझकर नजरअंदाज कर दिया. &amp;nbsp;लेकिन कुछ ही घंटों में हालत बिगड़ गई, बोलने में दिक्कत, ज्यादा नींद और उलझन जैसी परेशानी शुरू हो गई. जांच में पता चला कि उसके शरीर में सोडियम का स्तर खतरनाक रूप से गिर चुका था. इसे तीव्र हाइपोनेट्रेमिया कहा जाता है.&amp;nbsp;
क्यों होता है ऐसा?
यह कोई एक मामला नहीं है. देशभर में बढ़ती गर्मी के साथ ऐसे केस तेजी से सामने आ रहे हैं, जहां लोग पानी तो खूब पीते हैं, लेकिन जरूरी खनिजों की कमी से बीमार पड़ जाते हैं. असल में पसीना सिर्फ पानी नहीं होता, उसमें सोडियम, पोटैशियम और दूसरे जरूरी तत्व भी निकल जाते हैं. &amp;nbsp;जब शरीर से ये तत्व लगातार कम होते रहते हैं और हम सिर्फ पानी पीते रहते हैं, तो खून में उनका संतुलन बिगड़ जाता है. यही स्थिति खतरनाक बन जाती है.
सोडियम की कमी से क्या दिक्कत होती है?
सोडियम की कमी खास तौर पर ब्रेन के लिए खतरनाक होती है. जब इसका स्तर गिरता है, तो शरीर की सेल्स में पानी भरने लगता है, जिससे सूजन बढ़ती है. शुरुआत में सिरदर्द, थकान, चक्कर और उलझन जैसे लक्षण दिखते हैं, लेकिन अगर ध्यान न दिया जाए तो यह स्थिति दौरे या बेहोशी तक पहुंच सकती है. वहीं दूसरी तरफ, अगर कोई व्यक्ति पर्याप्त पानी नहीं पीता, तो शरीर में सोडियम का स्तर बढ़ सकता है. इसे हाइपरनेट्रेमिया कहा जाता है, जिसमें शरीर की सेल्स सिकुड़ने लगती हैं. इसके लक्षण प्यास, मुंह सूखना, चिड़चिड़ापन और गंभीर मामलों में दौरे तक हो सकते हैं.&amp;nbsp;
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पोटैशियम भी जरूरी
पोटैशियम भी उतना ही जरूरी है, लेकिन इसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है. इसकी कमी से मांसपेशियों में कमजोरी, ऐंठन और दिल की धड़कन में गड़बड़ी हो सकती है. इसलिए गर्मियों में सिर्फ पानी पीना ही काफी नहीं है, बल्कि शरीर में जरूरी तत्वों का संतुलन बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है. छाछ, नींबू पानी में नमक-शक्कर, नारियल पानी और संतुलित भोजन इस कमी को पूरा करने में मदद करते हैं.&amp;nbsp;
इन चीजों का रखें ध्यान
डॉ. डॉ. रोमेल टिक्कू का कहना है कि सही तरीके से पानी पीना ही असली बचाव है. समय-समय पर ब्रेक लेना, तेज धूप से बचना और शरीर के संकेतों को नजरअंदाज न करना जरूरी है. &amp;nbsp;यह समझना जरूरी है कि शरीर को सिर्फ पानी नहीं, बल्कि संतुलित पोषण चाहिए. अगर हम इस छोटी सी बात को नजरअंदाज करते हैं, तो यह बड़ी समस्या में बदल सकती है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 12 May 2026 04:30:16 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Stroke Recovery: दोबारा स्ट्रोक पड़ने का खतरा 40 पर्सेंट तक हो जाएगा कम, आज ही रोजाना खाना शुरू कर दें यह दवा</title>
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        <description><![CDATA[ Risk Of Brain Stroke Due To High Blood Pressure: स्ट्रोक से बच जाना किसी भी मरीज के लिए बड़ी राहत की बात होती है, लेकिन असली चुनौती उसके बाद शुरू होती है. बहुत से लोग जो स्ट्रोक से उबर जाते हैं, उनमें दोबारा स्ट्रोक होने का खतरा बना रहता है. &amp;nbsp;खासतौर पर उन मरीजों में यह जोखिम ज्यादा होता है जिन्हें दिमाग में खून बहने वाला स्ट्रोक यानी इंट्रासेरेब्रल हेमरेज हुआ हो. चलिए आपको बताते हैं कि इसका कारण क्या है.&amp;nbsp;
क्यों होते हैं दोबारा स्ट्रोक?
इस तरह के स्ट्रोक का सबसे बड़ा कारण हाई ब्लड प्रेशर होता है. जब लंबे समय तक हाई बीपी ज्यादा रहता है, तो खून की नसों की दीवारें कमजोर पड़ने लगती हैं. धीरे-धीरे यह स्थिति इतनी गंभीर हो सकती है कि नस फट जाए और दिमाग में खून बहने लगे. इसलिए दोबारा स्ट्रोक से बचने का सबसे असरदार तरीका है ब्लड प्रेशर को कंट्रोल में रखना. हालांकि, यह काम उतना आसान नहीं होता जितना सुनने में लगता है. कई मरीजों को दिन में अलग-अलग समय पर कई तरह की दवाइयां लेनी पड़ती हैं. खासकर बुजुर्गों या दूसरी बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए यह रूटीन निभाना मुश्किल हो जाता है. कभी दवा छूट जाती है, तो कभी सही समय पर नहीं ली जाती, जिससे इलाज का असर कम हो जाता है.&amp;nbsp;
क्या निकला स्टडी में?
न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में पब्लिश रिपोर्ट के अनुसार, &amp;nbsp;इसी परेशानी को ध्यान में रखते हुए एक नई स्टडी की गई, जिसमें इलाज को आसान बनाने का तरीका खोजा गया. रिसर्चर ने एक ऐसी गोली पर काम किया जिसमें ब्लड प्रेशर की तीन आम दवाइयों को कम मात्रा में मिलाया गया है. इस गोली का नाम GMRx2 रखा गया है. यह स्टडी TRIDENT ट्रायल के तहत की गई, जिसमें अलग-अलग देशों के 1600 से ज्यादा मरीज शामिल हुए. &amp;nbsp;ये सभी मरीज पहले दिमाग में खून बहने वाले स्ट्रोक का सामना कर चुके थे और उनका ब्लड प्रेशर अभी भी सामान्य स्तर से ऊपर था.&amp;nbsp;
क्या निकला रिजल्ट?
मरीजों को दो समूहों में बांटा गया. एक समूह को यह नई कॉम्बिनेशन गोली दी गई, जबकि दूसरे समूह को सामान्य इलाज के साथ प्लेसीबो दिया गया. इसके बाद दोनों समूहों के परिणामों की तुलना की गई. नतीजे काफी चौंकाने वाले रहे. &amp;nbsp;जिन मरीजों ने यह कॉम्बिनेशन गोली ली, उनमें दोबारा स्ट्रोक का खतरा करीब 40 प्रतिशत तक कम हो गया. यह एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है, क्योंकि दोबारा स्ट्रोक अक्सर ज्यादा गंभीर साबित होता है.
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इन चीजों के लिए भी कारगर
इसके अलावा, इस गोली को लेने वाले मरीजों में ब्लड प्रेशर भी बेहतर तरीके से कंट्रोल में पाया गया. रिसर्चर का कहना है कि ब्लड प्रेशर में थोड़ा सा भी सुधार लंबे समय में बड़े फायदे दे सकता है. स्टडी में यह भी सामने आया कि इस गोली से दिल से जुड़ी गंभीर समस्याओं, जैसे हार्ट अटैक और दिल की बीमारी से होने वाली मौत का खतरा भी कम हुआ. यानी यह इलाज सिर्फ स्ट्रोक ही नहीं, बल्कि दिल की सेहत के लिए भी फायदेमंद हो सकता है.
हालांकि, अभी कुछ सीमाएं भी हैं. इस स्टडी को कुछ सालों तक ही फॉलो किया गया है, इसलिए लंबे समय के असर को समझना बाकी है. इसके साथ ही, यह इलाज हर मरीज के लिए उपयुक्त हो, ऐसा जरूरी नहीं है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 12 May 2026 04:30:15 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Coconut Water Benefits: क्या खाली पेट नारियल पानी पी सकते हैं, जान लें इसके चौंकाने वाले फायदे</title>
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        <description><![CDATA[ Coconut Water Benefits: गर्मियों के मौसम में नारियल पानी सबसे ज्यादा पसंद किए जाने वाले हेल्दी ड्रिंक्स में से एक माना जाता है. यह शरीर को तुरंत हाइड्रेट करने के साथ-साथ ठंडक भी पहुंच जाता है. यही वजह है कि फिटनेस और हेल्थ एक्सपर्ट्स भी सुबह खाली पेट नारियल पानी पीने की सलाह देते हैं. इसमें मौजूद पोटैशियम, मैग्निशियम, कैल्शियम, इलेक्ट्रोलाइट्स और एंटीऑक्सीडेंट्स शरीर को कई तरह से फायदा पहुंचा सकते हैं. हालांकि हर चीज की तरह इसका सेवन भी सही मात्रा और सही तरीके से करना जरूरी माना जाता है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि क्या खाली पेट नारियल पानी पी सकते हैं और इसके फायदे क्या-क्या होते हैं.&amp;nbsp;
शरीर को हाइड्रेट रखने में मददगार नारियल पानी
नारियल पानी को नेचुरल इलेक्ट्रोलाइट ड्रिंक कहा जाता है. इसमें मौजूद पोटैशियम, सोडियम और मैग्नीशियम शरीर में पानी का संतुलन बनाए रखने में मदद करता है. गर्मी, ज्यादा पसीना आने या वर्कआउट के बाद इसका सेवन कर शरीर को एनर्जी देने में मदद कर सकता है. रातभर की नींद के बाद सुबह खाली पेट इसे पीने से शरीर को जल्दी हाइड्रेशन मिलता है.&amp;nbsp;
पाचन को बेहतर बनाने में भी सहायक&amp;nbsp;
खाली पेट नारियल पानी पीने से पाचन प्रक्रिया बेहतर हो सकती है. इसमें मौजूद एंजाइम और फाइबर पेट को हल्का रखने में मदद करते हैं. नियमित सेवन से कब्ज, ब्लोटिंग और एसिडिटी जैसी समस्याओं से राहत मिल सकती है. कई हेल्थ एक्सपर्ट्स इसे नेचुरल डिटॉक्स ड्रिंक भी मानते हैं, क्योंकि यह शरीर से टॉक्सिन बाहर निकालने में मदद करता है.&amp;nbsp;
वजन घटाने में भी मिल सकती है मदद&amp;nbsp;
जो लोग वजन कम करना चाहते हैं, उनके लिए भी नारियल पानी फायदेमंद माना जाता है. इसमें कैलोरी काफी कम होती है और यह लंबे समय तक पेट भरा होने का एहसास दिला सकता है. इससे बार-बार भूख लगने और अनहेल्दी स्नैकिंग की आदत कम हो सकती है. साथ ही यह मेटाबॉलिज्म को बेहतर करने में भी मददगार माना जाता है.
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स्किन और बालों के लिए भी फायदेमंद&amp;nbsp;
नारियल पानी में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट और विटामिन स्किन को अंदर से हाइड्रेट रखने में मदद करते हैं. नियमित सेवन से स्किन में निखार आ सकता है और स्किन फ्रेश दिख सकती है. कई लोगों का मानना है कि इससे बालों की मजबूती और चमक बनाए रखने में भी मदद मिलती है.&amp;nbsp;
किन लोगों को नारियल पानी से बरतनी चाहिए सावधानी?
नारियल पानी काफी फायदेमंद माना जाता है, लेकिन हर व्यक्ति के लिए यह समान रूप से सही नहीं हो सकता है. जिन लोगों को लो-ब्लड प्रेशर की समस्या रहती हैं, उन्हें खाली पेट इसका सेवन करने से चक्कर या कमजोरी महसूस हो सकती है. क्योंकि यह ब्लड प्रेशर को कम करने में असर दिखा सकता है. डायबिटीज के मरीजों को भी सीमित मात्रा में ही नारियल पानी पीने की सलाह दी जाती है. इसमें नेचुरल शुगर होती है, इसलिए ज्यादा मात्रा में सेवन ब्लड शुगर लेवल को प्रभावित कर सकता है. वहीं किडनी से जुड़ी समस्या वाले लोगों को भी डॉक्टर की सलाह के बिना इसका ज्यादा सेवन नहीं करना चाहिए, क्योंकि इसमें पोटेशियम की मात्रा ज्यादा होती है. कुछ लोगों को खाली पेट नारियल पानी पीने से भी पेट में गड़बड़ी, गैस या हल्की दस्त हो सकती है. ऐसे में खाली पेट नारियल पानी पीने की शुरुआत कम मात्रा में करना बेहतर होता है.
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        <pubDate>Tue, 12 May 2026 04:30:14 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Eye Cancer Risk Factors: आंखों में रहता है दर्द या दिखाई देने लगा है धुंधला तो हल्के में न लें, हो सकता है EYE कैंसर</title>
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        <description><![CDATA[ Can Blurry Vision Be A Sign Of Eye Cancer: आंखों में लगातार दर्द रहना, धुंधला दिखाई देना या नजर कमजोर लगना कई लोग सामान्य थकान समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. लेकिन एक्सपर्ट्स मानते हैं कि कुछ मामलों में ये लक्षण आंखों के कैंसर यानी आई कैंसर का संकेत भी हो सकते हैं. हालांकि यह बीमारी बहुत आम नहीं है, लेकिन समय पर पहचान न होने पर यह आंखों की रोशनी ही नहीं, जान के लिए भी खतरा बन सकती है.&amp;nbsp;
क्या आंखों की रोशनी बचाई जा सकती है?
&amp;nbsp;आंखों के बारे में जानकारी देने वाली संस्था Centreforsight के अनुसार, आई कैंसर तब होता है जब आंख के अंदर मौजूद सेल्स अनकंट्रोल तरीके से बढ़ने लगती हैं. यह समस्या आंख के अलग-अलग हिस्सों जैसे रेटिना, आइरिस या यूविया में हो सकती है. रिसर्च बताती है कि अगर बीमारी शुरुआती चरण में पकड़ में आ जाए तो इलाज ज्यादा असरदार होता है और आंखों की रोशनी बचाने की संभावना भी बढ़ जाती है.&amp;nbsp;
कितने तरह के होते हैं आई कैंसर?
आई कैंसर के कई प्रकार होते हैं. इनमें इंट्राऑक्यूलर मेलानोमा वयस्कों में सबसे ज्यादा देखा जाता है. इसके लक्षणों में धुंधला दिखाई देना, आंख की पुतली पर काले धब्बे पड़ना या पुतली के आकार में बदलाव शामिल हो सकते हैं. वहीं रेटिनोब्लास्टोमा नाम का कैंसर छोटे बच्चों में ज्यादा पाया जाता है.&amp;nbsp;
क्या होते हैं इसके लक्षण?
एक्सपर्ट्स कहते हैं कि आंखों में होने वाले कुछ बदलावों को कभी हल्के में नहीं लेना चाहिए. अगर लगातार धुंधलापन महसूस हो, सीधी लाइनें टेढ़ी दिखने लगें, आंख की पुतली का आकार बदल जाए या देखने का दायरा कम होने लगे तो तुरंत जांच करवानी चाहिए. कई मामलों में आंख के आसपास सूजन, गांठ या लगातार लालिमा भी गंभीर संकेत हो सकते हैं.
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क्या आई कैंसर से आंखों में दर्द होता है?
खास बात यह है कि आई कैंसर शुरुआती स्टेज में हमेशा दर्द नहीं देता. यही वजह है कि कई लोग देर से डॉक्टर के पास पहुंचते हैं. एक्सपर्ट का मानना है कि नियमित आई चेकअप इस बीमारी को समय रहते पकड़ने का सबसे अच्छा तरीका है. खासकर उन लोगों को ज्यादा सावधान रहने की जरूरत होती है जिनकी आंखें हल्के रंग की हों या परिवार में कैंसर की हिस्ट्री रही हो. &amp;nbsp;रिसर्च में यह भी सामने आया है कि लंबे समय तक तेज अल्ट्रावायलेट किरणों के संपर्क में रहना, स्मोकिंग, ज्यादा शराब और हानिकारक केमिकल्स वाले वातावरण में काम करना आई कैंसर का खतरा बढ़ा सकते हैं. बढ़ती उम्र के साथ भी इसका जोखिम बढ़ने लगता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 12 May 2026 04:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>Summer Care Tips: खून सूखना&amp;जलन या सूजन... ज्यादा गर्मी से हमारे शरीर पर क्या पड़ता है असर, यह कितनी खतरनाक?</title>
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        <description><![CDATA[ Summer Care Tips: खून सूखना-जलन या सूजन... ज्यादा गर्मी से हमारे शरीर पर क्या पड़ता है असर, यह कितनी खतरनाक? ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 12 May 2026 04:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>Bird Flu alert in Maharashtra: महाराष्ट्र में बर्ड फ्लू का खतरा, इंसानों तक कैसे पहुंच सकता है संक्रमण? जानें लक्षण और बचाव</title>
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        <description><![CDATA[ Bird Flu alert in Maharashtra : महाराष्ट्र के कुछ इलाकों में हाल ही में म बर्ड फ्लू (Avian Influenza) के मामलों की खबरों ने स्वास्थ्य अधिकारियों और आम लोगों में चिंता बढ़ा दी है. संक्रमित पक्षियों की पहचान होने के बाद राज्य में निगरानी और रोकथाम के उपाय बढ़ा दिए गए हैं. देश के अन्य राज्यों में भी पिछले कुछ महीनों में H5N1 वायरस के संक्रमण की पुष्टि होने के बाद हजारों प क्षियों को मार दिया गया. कई लोगों के लिए बर्ड फ्लू अभी भी एक दूर की बीमारी लगती है, जो सिर्फ मुर्गियों और पोल्ट्री फार्मों तक सीमित है, लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि असली चिंता तब है जब इंसान भी इससे संक्रमित पक्षियों या उनके आसपास के वातावरण के संपर्क में आते हैं.&amp;nbsp;
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, बर्ड फ्लू के वायरस मुख्य रूप से पक्षियों में फैलते हैं, लेकिन कुछ प्रकार जैसे H5N1 इंसानों में भी जा सकते हैं. हालांकि इस समय एक इंसान से दूसरे इंसान में संक्रमण का कोई बड़ा प्रमाण नहीं मिला है.विशेषज्ञों का कहना है कि अभी घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन चेतावनी को नजरअंदाज करना भी खतरनाक हो सकता है. तो आइए जानते हैं कि &amp;nbsp;बर्ड फ्लू का संक्रमण इंसानों तक कैसे पहुंच सकता है. इसके शुरुआती लक्षण और बचाव क्या है.&amp;nbsp;
बर्ड फ्लू का संक्रमण इंसानों तक कैसे पहुंच सकता है?
कई लोग सोचते हैं कि बर्ड फ्लू इंसानों में आसानी से फैल सकता है, लेकिन यह एक मिथक है. अब तक कोई प्रमाण नहीं मिला है कि H5N1 इंसानों के बीच लगातार फैल रहा है. विशेषज्ञों के अनुसार, बर्ड फ्लू या एवियन इन्फ्लूएंजा मुख्य रूप से मुर्गियों, बत्तख और अन्य पोल्ट्री में फैलने वाला वायरस है. H5N1 जैसे कुछ प्रकार इंसानों को संक्रमित कर सकते हैं. यह मुख्य रूप से संक्रमित पक्षियों के संपर्क में आने, संक्रमित सतहों को छूने या पक्षियों के मारे जाने के दौरान फैलता है. वायरस इंसान के शरीर में आंख, नाक या मुंह के रास्ते प्रवेश कर सकता है. पोल्ट्री फार्मों में मौजूद संक्रमित बूंदें या धूल के कण सांस के जरिए भी संक्रमण फैला सकते हैं.
क्यों विशेषज्ञ इस आउटब्रेक पर नजर बनाए हुए हैं?
बर्ड फ्लू नई बीमारी नहीं है, लेकिन चिंता इस वजह से बढ़ रही है कि H5N1 अब पक्षियों और कुछ जानवरों में तेजी से फैल रहा है. पिछले कुछ वर्षों में यह वायरस एशिया, यूरोप, अफ्रीका और अमेरिका में फैल चुका है. 2024 में अमेरिका में डेयरी गायों में भी बर्ड फ्लू पाया गया था और कुछ फार्म वर्कर्स संक्रमित हुए थे. वायरस लगातार बदलता रहता है. हर बार जब यह जानवरों में फैलता है, तो इसके जीन में बदलाव होने की संभावना बढ़ जाती है. इसका मतलब यह नहीं कि तुरंत महामारी आएगी, लेकिन यही वजह है कि सरकारें और स्वास्थ्य संगठन हर मामले को गंभीरता से ले रहे हैं. WHO के अनुसार वर्तमान में जनस्वास्थ्य का जोखिम कम है, लेकिन निगरानी और तेजी से पहचान बेहद जरूरी है.
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बर्ड फ्लू के लक्षण
बर्ड फ्लू के शुरुआती लक्षण सामान्य वायरल संक्रमण जैसे दिखते हैं. जैसे बुखार,खांसी, गले में खराश, शरीर में दर्द, थकान, सांस लेने में दिक्कत. विशेषज्ञों का कहना है कि लक्षण कोविड-19 या सामान्य फ्लू जैसे लग सकते हैं. इसलिए अगर आपने पोल्ट्री या मृत पक्षियों के संपर्क में आने के बाद फ्लू जैसे लक्षण महसूस किए तो उन्हें नजरअंदाज न करें. गंभीर मामलों में बर्ड फ्लू तेजी से बढ़ सकता है और निमोनिया, सांस संबंधी परेशानी और अस्पताल में भर्ती की जरूरत पैदा कर सकता है. बिना जांच किए एंटीबायोटिक दवा लेना खतरनाक हो सकता है.&amp;nbsp;
बर्ड फ्लू के बचाव
1. चिकन और अंडे अच्छी तरह से पकाएं. WHO के अनुसार सही तरीके से पकाई गई पोल्ट्री से H5N1 वायरस नहीं फैलता है.&amp;nbsp;
2. मास्क पहनें, खासकर भीड़-भाड़ वाली जगहों पर, हाथों को नियमित रूप से धोएं और साफ रखें.&amp;nbsp;
3. पोल्ट्री फार्म में काम करते समय सतर्क रहें. पक्षियों को संभालते समय सुरक्षा उपकरण (ग्लव्स, मास्क) का इस्तेमाल करें.&amp;nbsp;
4. बुखार, खांसी या सांस लेने में दिक्कत जैसी कोई भी परेशानी महसूस होने पर देर न करें.
5. बीमार या मृत पक्षियों को न छुएं. असामान्य पक्षी मौत की सूचना तुरंत स्थानीय अधिकारियों को दें.&amp;nbsp;
6. कच्ची पोल्ट्री छूने के बाद हाथ धोएं, सोशल मीडिया पर बिना पुष्टि की अफवाहें फैलाने से बचें. &amp;nbsp;
यह भी पढ़ें - &amp;nbsp;Fitness Supplements Side Effects : फिटनेस सप्लीमेंट लेते हुए ये गलतियां तो नहीं करते आप, लिवर को हो सकता है नुकसान&amp;nbsp;Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 11 May 2026 00:30:18 +0530</pubDate>
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        <media:keywords>Bird, Flu, alert, Maharashtra:, महाराष्ट्र, में, बर्ड, फ्लू, का, खतरा, इंसानों, तक, कैसे, पहुंच, सकता, है, संक्रमण, जानें, लक्षण, और, बचाव</media:keywords>
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        <title>Kidney Care Tips: 40 के बाद क्यों बढ़ जाता है किडनी रोग का खतरा, कैसे रखें अपनी किडनी को हमेशा हेल्दी और मजबूत?</title>
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        <description><![CDATA[ Kidney Care Tips:&amp;nbsp;उम्र बढ़ने के साथ शरीर धीरे-धीरे बदलने लगता है, लेकिन कई बार हम इन बदलावों को नजरअंदाज कर देते हैं. खासकर 40 की उम्र के बाद किडनी की सेहत पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत होती है. डॉक्टरों के मुताबिक, इस उम्र के बाद किडनी की काम करने की क्षमता धीरे-धीरे कम होने लगती है. ऐसे में परेशानी की बात यह है कि किडनी से जुड़ी बीमारियां शुरुआत में ज्यादा लक्षण नहीं दिखातीं, और जब तक यह समझ आती है, तब तक काफी नुकसान हो चुका होता है. यही वजह है कि विशेषज्ञ अब लोगों को 40 के बाद अपनी किडनी का खास ध्यान रखने की सलाह दे रहे हैं. &amp;nbsp;
एक स्टडी के अनुसार, क्रॉनिक किडनी डिजीज (CKD) समय से पहले मौत की तेजी से बढ़ती वजहों में से एक बन चुकी है. यह कोई बहुत कम लोगों में होने वाली बीमारी नहीं है, बल्कि अब तेजी से बढ़ रही समस्या है, जिस पर दुनियाभर के डॉक्टर चिंता जता रहे हैं.
क्यों बढ़ जाता है किडनी पर खतरा?
डॉक्टरों का कहना है कि बढ़ती उम्र के साथ ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और मोटापे जैसी समस्याएं बढ़ने लगती हैं, जो एक समय के बाद किडनी पर बुरा असर डालती हैं. इसके अलावा कम पानी पीना, ज्यादा नमक खाना, फास्ट फूड और दर्द की दवाइयों का ज्यादा इस्तेमाल भी किडनी को नुकसान पहुंचा सकता है. कई लोग बार-बार पेशाब रोकने की आदत भी रखते हैं, जिससे संक्रमण और दूसरी दिक्कतों का खतरा बढ़ जाता है. वही &amp;nbsp;विशेषज्ञ मानते हैं कि ये छोटी-छोटी आदतें धीरे-धीरे किडनी को कमजोर कर सकती हैं.&amp;nbsp;
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किन संकेतों को भूलकर भी नजरअंदाज न करें?
किडनी खराब होने के शुरुआती संकेत अक्सर बहुत सामान्य होते हैं. जैसे जल्दी थकान महसूस होना, पैरों या चेहरे पर सूजन आना, बार-बार पेशाब लगना या पेशाब के रंग में बदलाव होना. वही कई लोगों को रात में बार-बार पेशाब के लिए उठना पड़ता है, लेकिन वे इसे उम्र का असर मानकर नजरअंदाज कर देते हैं. डॉक्टरों के अनुसार, अगर शरीर लगातार ऐसे संकेत दे रहा हो तो तुरंत जांच करवानी चाहिए. साथ ही समय पर इलाज शुरू हो जाए तो बड़ी बीमारी से बचा जा सकता है.
किडनी को स्वस्थ रखने के लिए क्या करें?
विशेषज्ञों का कहना है कि किडनी को स्वस्थ रखने के लिए सबसे जरूरी है सही लाइफस्टाइल अपनाना. इसके लिए रोज पर्याप्त मात्रा में पानी पीना चाहिए ताकि शरीर से गंदगी बाहर निकलती रहे. खाने में नमक और ज्यादा प्रोसेस्ड फूड कम करना चाहिए. साथ ही रोज हल्की एक्सरसाइज या वॉक करने की आदत डालनी चाहिए. डॉक्टर यह भी सलाह देते हैं कि बिना जरूरत दर्द की दवाइयां बार-बार नहीं लेनी चाहिए, क्योंकि इससे किडनी पर बुरा असर पड़ सकता है.
समय पर जांच कराना है सबसे जरूरी
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक, 40 की उम्र पार करने के बाद साल में कम से कम एक बार किडनी की जांच जरूर करवानी चाहिए. खासकर जिन लोगों को डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर या परिवार में किडनी की बीमारी का इतिहास हो, उन्हें ज्यादा सावधान रहने की जरूरत है. वही &amp;nbsp;साधारण ब्लड और यूरिन टेस्ट से किडनी की स्थिति का पता लगाया जा सकता है. डॉक्टरों का कहना है कि अगर समय रहते ध्यान दिया जाए तो किडनी से जुड़ी कई गंभीर बीमारियों से बचा जा सकता है. छोटी-सी सावधानी भविष्य में बड़ी परेशानी से बचाने में मदद कर सकती है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Mon, 11 May 2026 00:30:17 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Vaccines After 18: 18 के बाद कहीं आप भी तो नहीं भूल गए ये जरूरी टीके? जानिए क्यों आज भी हैं बेहद जरूरी</title>
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        <description><![CDATA[ Vaccines After 18: 18 के बाद कहीं आप भी तो नहीं भूल गए ये जरूरी टीके? जानिए क्यों आज भी हैं बेहद जरूरी ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 10 May 2026 08:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>Delhi TB Screening: राजधानी में टीबी के खिलाफ बड़ी कार्रवाई, स्लम और हाई रिस्क इलाकों से सामने आए 12000 मरीज</title>
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        <description><![CDATA[ Delhi Detects 12000 TB Cases In Six Weeks: दिल्ली में टीबी के खिलाफ चलाए जा रहे बड़े अभियान के दौरान महज छह हफ्तों में 12 हजार से ज्यादा मरीजों की पहचान हुई है. स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के मुताबिक 24 मार्च से 4 मई के बीच चलाए गए &#039;टीबी मुक्त भारत अभियान 2.0&#039; के तहत राजधानी के स्लम इलाकों, भीड़भाड़ वाली बस्तियों और हाई रिस्क क्षेत्रों में बड़े स्तर पर स्क्रीनिंग की गई, जिससे हजारों ऐसे मरीज सामने आए जिनमें पहले टीबी की पहचान नहीं हो पाई थी. यह अभियान अभी भी जारी है.&amp;nbsp;
12 हजार मरीज मिले
दिल्ली में राष्ट्रीय टीबी मुक्त कार्यक्रम के तहत चल रहे इस अभियान में कुल 12 हजार से ज्यादा मरीजों की पुष्टि हुई. इनमें 1,323 बच्चे शामिल हैं, जबकि 10,755 वयस्क मरीज पाए गए. आंकड़ों के अनुसार 6,360 पुरुष, 5,715 महिलाएं और तीन ट्रांसजेंडर व्यक्ति टीबी संक्रमित मिले हैं.&amp;nbsp;
हेल्थ अधिकारियों का क्या है कहना?
राज्य स्वास्थ्य विभाग के एक सीनियर अधिकारी ने बताया कि दिल्ली की 24 चेस्ट क्लीनिकों में हर महीने औसतन करीब 6 हजार टीबी मरीज सामने आते हैं, लेकिन 24 मार्च से शुरू हुए 100 दिवसीय अभियान के बाद मरीजों की पहचान में तेजी आई है. अधिकारी के मुताबिक बड़े पैमाने पर पोर्टेबल एक्स-रे मशीनें लगाई गई हैं, जिसकी वजह से ज्यादा स्क्रीनिंग हो रही है और अधिक मरीजों की पहचान संभव हो पाई है.&amp;nbsp;
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, &amp;nbsp;एक अन्य वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि अब तक सबसे बड़ी चुनौती उन मरीजों की पहचान करना था जिनमें कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते थे. उन्होंने बताया कि इस विशेष अभियान का मकसद ऐसे लोगों को शुरुआती चरण में पकड़ना है, जो इंफेक्टेड तो हैं लेकिन अभी बीमारी के लक्षण सामने नहीं आए हैं. अधिकारी ने कहा कि जिन मरीजों की पहचान बाद में होनी थी, वे अब पहले ही सामने आ गए हैं.
इसे भी पढ़ें-&amp;nbsp;क्या कमजोरी दूर करने के लिए कलेजी खाना है सही? खाने से पहले जान लें ये सच
इन इलाकों पर फोकस
अभियान के दौरान खास तौर पर स्लम इलाकों, रैन बसेरों, जे.जे. कॉलोनियों, नशा मुक्ति केंद्रों, वृद्धाश्रमों और घनी आबादी वाले क्षेत्रों पर फोकस किया गया. 24 मार्च से 4 मई के बीच 984 आयुष्मान आरोग्य शिविर आयोजित किए गए, &amp;nbsp;हाई रिस्क वार्डों और इलाकों में 224 शिविर लगाए गए, जबकि जेलों, वृद्धाश्रमों और अन्य सामुदायिक स्थानों पर 79 विशेष शिविर आयोजित किए गए. जिसमें कुल 71,603 लोगों की स्क्रीनिंग की गई.&amp;nbsp;
जारी रहेगा अभियान
स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक अब इस अभियान को नियमित सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था का हिस्सा बना दिया गया है और 100 दिन का अभियान खत्म होने के बाद भी स्क्रीनिंग जारी रहेगी. अधिकारियों ने बताया कि हैंडहेल्ड एक्स-रे मशीनें इस अभियान की सबसे बड़ी ताकत बनकर सामने आई हैं. हालांकि टीबी की पुष्टि अब भी माइक्रोबायोलॉजिकल जांच से ही की जाती है, लेकिन पोर्टेबल एक्स-रे की मदद से संदिग्ध मरीजों को तेजी से चिन्हित किया जा रहा है. इसमें धूम्रपान करने वाले लोग, शराब पीने वाले, एचआईवी और डायबिटीज मरीज, जेलों और वृद्धाश्रमों में रहने वाले लोग, स्लम निवासी, भिखारी, निर्माण मजदूर, रिक्शा चालक और गिग वर्कर्स को प्राथमिकता के आधार पर स्क्रीनिंग में शामिल किया गया.
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        <pubDate>Sat, 09 May 2026 20:30:25 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Weight Loss Drugs Health Risk: GLP&amp;1 ड्रग्स से घट रहा वजन, लेकिन आंखों पर पड़ सकता है असर; विशेषज्ञों ने किया अलर्ट</title>
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        <description><![CDATA[ Weight Loss Drugs Health Risk: GLP-1 ड्रग्स से घट रहा वजन, लेकिन आंखों पर पड़ सकता है असर; विशेषज्ञों ने किया अलर्ट ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 09 May 2026 20:30:24 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>जन्म के बाद नवजात में इस वजह से होने लगती है इंटर्नल ब्लीडिंग, Vitamin K इंजेक्शन से बच सकती है जान</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/जन्म-के-बाद-नवजात-में-इस-वजह-से-होने-लगती-है-इंटर्नल-ब्लीडिंग-vitamin-k-इंजेक्शन-से-बच-सकती-है-जान</link>
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        <description><![CDATA[ जन्म के बाद नवजात में इस वजह से होने लगती है इंटर्नल ब्लीडिंग, Vitamin K इंजेक्शन से बच सकती है जान ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 09 May 2026 20:30:22 +0530</pubDate>
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        <title>Hantavirus Outbreak: क्या कोरोना की तरह फैलेगा हंतावायरस, जानिए WHO प्रमुख ने क्या दी चेतावनी?</title>
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        <description><![CDATA[ Can Hantavirus Spread Like Covid-19: दुनियाभर में इस समय हंतावायरस को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है. लोगों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह इंफेक्शन भी कोरोना की तरह फैल सकता है? क्या फिर से लॉकडाउन लग सकता है, मास्क पहनना जरूरी होगा और दुनिया एक नई महामारी की तरफ बढ़ रही है? इन तमाम सवालों पर विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी WHO ने स्थिति साफ कर दी है.&amp;nbsp;
&amp;nbsp;वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन की तरफ से जानकारी
गुरुवार शाम हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन की महामारी प्रबंधन निदेशक डॉ. मारिया वान केरखोव ने साफ कहा कि &quot;यह कोविड नहीं है और न ही फ्लू जैसा वायरस है. इसका फैलने का तरीका पूरी तरह अलग है.&quot; उन्होंने बताया कि अभी जहाज पर मौजूद किसी यात्री या क्रू में नए लक्षण नहीं मिले हैं. पहले भी एंडीज वायरस के मामलों में इंसान से इंसान में इंफेक्शन केवल बेहद करीबी संपर्क में ही देखा गया था.&amp;nbsp;
पहले भी देखे गए हैं मामले
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के अलर्ट एंड रिस्पॉन्स कोऑर्डिनेशन विभाग के निदेशक ने बताया कि साल 2018-19 में अर्जेंटीना में भी ऐसा ही मामला सामने आया था, जहां एक इंफेक्टेड व्यक्ति पब्लिक प्रोग्राम में शामिल हुआ और कई लोग इंफेक्टेड हो गए थे. उन्होंने कहा कि अभी भी स्थिति सीमित दायरे में है और अगर संपर्क में आए लोगों की पहचान और आइसोलेशन जैसे कदम ठीक से अपनाए जाएं तो इंफेक्शन को रोका जा सकता है. &amp;nbsp;
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डब्ल्यूएचओ के प्रमुख का बयान
डब्ल्यूएचओ प्रमुख &amp;nbsp;टेड्रोस अदनोम घेब्रेयसस ने बताया कि हंतावायरस चूहों और दूसरे कृंतकों से फैलने वाला वायरस है, जो इंसानों में गंभीर बीमारी पैदा कर सकता है. लोग आमतौर पर इंफेक्टेड चूहों के यूरिन, लार या मल के संपर्क में आने से इंफेक्टेड होते हैं. उन्होंने कहा कि इस मामले में एंडीज स्ट्रेन मिला है, जो लैटिन अमेरिका में पाया जाता है और इंसानों के बीच सीमित स्तर पर फैलने की क्षमता रखता है. उन्होंने बताया कि जहाज पर पहला मामला 6 अप्रैल को सामने आया था. एक व्यक्ति में लक्षण दिखे और 11 अप्रैल को उसकी मौत हो गई. शुरुआत में उसके सैंपल नहीं लिए गए क्योंकि लक्षण दूसरे सांस से जुड़े इंफेक्शन जैसे लग रहे थे. बाद में उसकी पत्नी भी इंफेक्टेड हुई और सेंट हेलेना से जोहान्सबर्ग जाते समय उसकी हालत बिगड़ गई. 26 अप्रैल को उसकी मौत हो गई. &amp;nbsp;वहीं कुछ और मरीजों का इलाज अलग-अलग देशों में चल रहा है.&amp;nbsp;
&amp;nbsp;

&amp;ldquo;Last Saturday, the United Kingdom notified @WHO under the International Health Regulations of a cluster of passengers with severe respiratory illness on a Dutch-flagged cruise ship, the MV Hondius, which had travelled from Argentina to Cabo Verde.So far, eight cases have been&amp;hellip;
&amp;mdash; World Health Organization (WHO) (@WHO) May 7, 2026



किन देशों में इस वायरस का असर?
फिलहाल जहाज पर करीब 150 यात्री और क्रू सदस्य मौजूद हैं, जो 23 देशों से जुड़े हैं. कई देशों ने निगरानी बढ़ा दी है. अर्जेंटीना, दक्षिण अफ्रीका, नीदरलैंड, जर्मनी, ब्रिटेन, सिंगापुर और अमेरिका समेत कई देशों में संपर्क में आए लोगों की जांच और निगरानी की जा रही है. &amp;nbsp;हालांकि अभी तक अधिकतर लोग बिना लक्षण के हैं. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन ने उन 12 देशों को जानकारी दी है, जिनके नागरिक सेंट हेलेना में जहाज से उतरे थे. इनमें ब्रिटेन, कनाडा, डेनमार्क, जर्मनी, नीदरलैंड, न्यूजीलैंड, सेंट किट्स एंड नेविस, सिंगापुर, स्वीडन, स्विट्जरलैंड, तुर्किये और अमेरिका के नागरिक शामिल हैं.
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        <pubDate>Sat, 09 May 2026 04:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>Supplements Side Effects: रोज सप्लीमेंट्स खाने वाले तुरंत हो जाएं अलर्ट, डॉक्टर ने बताई नुकसान की पूरी सच्चाई</title>
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        <description><![CDATA[ Are Daily Supplements Really Necessary: आजकल सुबह उठते ही सप्लीमेंट्स की बोतल खोलना कई लोगों की रोज की आदत बन चुकी है. किसी को लगता है इससे शरीर की रोग इम्यून क्षमता बढ़ेगी, कोई ज्यादा एनर्जी के लिए विटामिन खा रहा है, तो कोई बेहतर सेहत की उम्मीद में हर दिन अलग-अलग कैप्सूल ले रहा है. सोशल मीडिया, जिम ट्रेनर और विज्ञापन भी यही भरोसा दिलाते हैं कि अच्छी सेहत का रास्ता सप्लीमेंट्स से होकर गुजरता है. लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि शरीर किसी गोदाम की तरह काम नहीं करता, जहां अतिरिक्त विटामिन जमा होते ही सेहत अपने आप बेहतर हो जाए.&amp;nbsp;
क्या कहते हैं एक्सपर्ट
दिल्ली के सीके बिरला अस्पताल में इंटरनल मेडिसिन एक्सपर्ट अमित प्रकाश सिंह ने &amp;nbsp;TOI को बताया कि लोग अक्सर यह मान लेते हैं कि अगर कोई विटामिन शरीर के लिए अच्छा है, तो उसकी ज्यादा मात्रा और भी ज्यादा फायदा देगी. जबकि हकीकत इससे अलग है. शरीर केवल उतनी ही मात्रा में पोषक तत्वों को इस्तेमाल करता है, जितनी उसे जरूरत होती है. अगर शरीर को पहले से पर्याप्त पोषण मिल रहा है, तो अतिरिक्त सप्लीमेंट्स कई बार बिना फायदा दिए शरीर से बाहर निकल जाते हैं.&amp;nbsp;
&amp;nbsp;ज्यादा सेवन कई बार नुकसानदायक
उन्होंने बताया कि कुछ विटामिन जैसे विटामिन सी पानी में घुल जाते हैं और शरीर से बाहर निकल जाते हैं, लेकिन विटामिन ए और डी जैसे तत्व शरीर में जमा हो सकते हैं. यही वजह है कि जरूरत से ज्यादा सेवन कई बार नुकसानदायक बन जाता है. अमेरिका की यूएस प्रिवेंटिव सर्विसेज टास्क फोर्स की एक बड़ी रिसर्च में भी यह साफ हुआ कि स्वस्थ लोगों में रोजाना विटामिन लेने से दिल की बीमारी या कैंसर से बचाव का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला.&amp;nbsp;
&amp;nbsp;शरीर के अंगों पर असर&amp;nbsp;
डॉक्टरों के मुताबिक सबसे बड़ी गलतफहमी यह है कि लोग नेचुरल चीजों को पूरी तरह सुरक्षित मान लेते हैं. जबकि कई हर्बल और नेचुरल सप्लीमेंट भी शरीर पर बुरा असर डाल सकते हैं. डॉ. कहते हैं कि जरूरत से ज्यादा विटामिन ए और डी शरीर में जमा होकर लिवर, किडनी और हड्डियों को नुकसान पहुंचा सकते हैं. बिना जरूरत आयरन की गोलियां लेने से पेट खराब हो सकता है और लंबे समय में शरीर के अंगों पर असर पड़ सकता है.
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विशेषज्ञों का कहना है कि असली भोजन का मुकाबला कोई सप्लीमेंट नहीं कर सकता. फल, सब्जियां, दालें, मेवे और साबुत अनाज सिर्फ विटामिन ही नहीं देते, बल्कि फाइबर, एंटीऑक्सीडेंट और कई जरूरी पोषक तत्व भी साथ लाते हैं. यही वजह है कि डॉक्टर अक्सर सप्लीमेंट्स से पहले खानपान सुधारने की सलाह देते हैं. एक संतरा सिर्फ विटामिन सी नहीं देता, बल्कि शरीर को पानी, फाइबर और दूसरे जरूरी तत्व भी पहुंचाता है.&amp;nbsp;
क्या नहीं लेना चाहिए सप्लीमेंट
हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि सप्लीमेंट्स बेकार हैं. कुछ परिस्थितियों में ये बेहद जरूरी साबित होते हैं. जैसे विटामिन डी की कमी, खून की कमी, गर्भावस्था के दौरान फोलिक एसिड या ऐसे मरीज जिनके शरीर में पोषक तत्व सही तरह एब्जार्व नहीं हो पाते. लेकिन ऐसी स्थिति में भी सही मात्रा और डॉक्टर की निगरानी जरूरी मानी जाती है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 09 May 2026 04:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>World Ovarian Cancer Day: क्या आपको भी रहती है पेट फूलने की दिक्कत? इसे हल्के में न लें, वरना हो जाएगा यह कैंसर</title>
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        <description><![CDATA[ World Ovarian Cancer Day: हममें से कई महिलाएं अक्सर सुबह उठते ही पेट में भारीपन या सूजन महसूस करती हैं. जीन्स थोड़ी टाइट लगने लगती है और मन में पहला ख्याल आता है कि शायद कल ज्यादा नमक खा लिया होगा या आज बस पेट ठीक नहीं है. कुछ लोग इसे गैस, अपच या तनाव समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. पानी ज्यादा पी लेते हैं, हल्का खाना खाते हैं, या थोड़ा टहल लेते हैं, लेकिन जब यही समस्या बार-बार होने लगे और हफ्तों तक ठीक न हो, तो इसे नजरअंदाज करना खतरे से खाली नहीं है. डॉक्टरों के अनुसार, लगातार बना रहने वाला पेट फूलना कभी-कभी अंडाशय (Ovary) के कैंसर का शुरुआती संकेत हो सकता है, जिसे महिलाएं अक्सर साधारण पाचन समस्या समझ लेती हैं.
ऐसे में हर साल 8 मई को विश्व ओवेरियन कैंसर डे (World Ovarian Cancer Day) मनाया जाता है. इस दिन का उद्देश्य महिलाओं में होने वाले अंडाशय (Ovary) के कैंसर के बारे में जागरूकता बढ़ाना है. यह कैंसर अक्सर शुरुआत में साफ लक्षण नहीं दिखाता, इसलिए इसे देर से पहचाना जाता है. तो आइए आज जानते हैं कि कैसे पेट फूलने की दिक्कत कैंसर का शुरुआती संकेत हो सकता है.&amp;nbsp;
ओवरी कैंसर कब संकेत देता है?
विशेषज्ञ बताते हैं कि ओवरी कैंसर कोई ऐसा रोग नहीं है जो अचानक तेज लक्षणों के साथ सामने आए. यह धीरे-धीरे शरीर में संकेत देता है और अक्सर सामान्य समस्याओं जैसा ही लगता है. डॉक्टरों के अनुसार, यही कारण है कि इसे अक्सर साइलेंट डिजीज कहा जाता है. कई महिलाएं इसे समझ ही नहीं पातीं और सोचती हैं कि यह हार्मोन बदलाव, तनाव या पेट की गड़बड़ी है.&amp;nbsp;
लगातार पेट फूलना क्यों है गंभीर संकेत?
अगर पेट फूलने की समस्या &amp;nbsp;कई दिनों या हफ्तों तक लगातार बनी रहे. किसी दवा या घरेलू उपाय से ठीक न हो, बार-बार दोहराए तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए. डॉक्टर बताते हैं कि ओवरी कैंसर से जुड़ा पेट फूलना आम गैस या अपच जैसा नहीं होता है. यह लगातार बना रहता है और कम नहीं होता है. कई महिलाएं महसूस करती हैं कि पेट हमेशा भरा-भरा लगता है. बिना ज्यादा खाए ही पेट भर जाता है. कपड़े टाइट होने लगते हैं. शरीर फूला हुआ सा लगता है.&amp;nbsp;
कैसे पेट फूलने की दिक्कत कैंसर का शुरुआती संकेत हो सकता है?
ओवरी कैंसर अक्सर सिर्फ एक लक्षण से नहीं पहचान में आता है. इसके साथ कई छोटे-छोटे संकेत भी दिखाई दे सकते हैं. जैसे हल्का या लगातार दर्द महसूस हो सकता है. थोड़ा सा खाने पर ही भूख खत्म हो जाना. अचानक खाने की इच्छा कम हो जाना. बिना वजह बार-बार यूरिन जाना. पूरी नींद के बाद भी शरीर में कमजोरी और थकावट रहना. बिना कारण वजन कम या बढ़ जाना, डॉक्टरों का कहना है कि अगर ये लक्षण 2 हफ्ते से ज्यादा बने रहें, तो कैंसर का शुरुआती संकेत हो सकता है. ऐसे में जांच जरूर करानी चाहिए.&amp;nbsp;
&amp;nbsp;किन महिलाओं को ज्यादा सावधान रहना चाहिए?
हर महिला को यह बीमारी हो सकती है, लेकिन कुछ लोगों में खतरा ज्यादा होता है. जैसे 50 साल से ज्यादा उम्र की महिलाएं, परिवार में ओवरी या ब्रेस्ट कैंसर का इतिहास, BRCA1 या BRCA2 जैसे जीन म्यूटेशन, एंडोमेट्रियोसिस की समस्या, मोटापा या खराब लाइफस्टाइल.&amp;nbsp;
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जल्दी पहचान क्यों है जरूरी?
डॉक्टरों का कहना है कि अगर ओवरी कैंसर शुरुआती स्टेज में पकड़ में आ जाए, तो इलाज के सफल होने की संभावना काफी बढ़ जाती है. आजकल कई आधुनिक इलाज उपलब्ध हैं, जैसे सर्जरी के नए तरीके, कीमोथेरेपी, टारगेटेड थेरेपी, लेकिन ये सभी तभी ज्यादा असरदार होते हैं जब बीमारी जल्दी पकड़ में आए.&amp;nbsp;
बचाव के लिए क्या करें?
ओवेरियन कैंसर से बचाव के लिए महिलाओं को नियमित रूप से गाइनेकोलॉजिकल जांच करवानी चाहिए. स्वस्थ वजन बनाए रखना भी जरूरी है, क्योंकि मोटापा कई तरह की बीमारियों का खतरा बढ़ा सकता है. रोजाना हरी सब्जियां और फल खाने से शरीर को जरूरी पोषण मिलता है और इम्यून सिस्टम मजबूत रहता है. नियमित एक्सरसाइज करने से शरीर सक्रिय रहता है और हार्मोन संतुलन बेहतर होता है. इसके साथ ही धूम्रपान और शराब से दूरी बनाना चाहिए. अपनी परिवार की मेडिकल हिस्ट्री के बारे में जानकारी रखें, जिससे अगर किसी तरह का जोखिम हो तो समय रहते सावधानी और जांच की जा सके.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 09 May 2026 04:30:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Does Rice Cause Weight Gain: क्या चावल खाने से सच में बढ़ता है मोटापा, जानिए क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?</title>
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        <description><![CDATA[ Does Eating Rice Every Day Cause Weight Gain: भारत में चावल करोड़ों लोगों की थाली का अहम हिस्सा है. लेकिन जब भी वजन बढ़ने या मोटापे की बात होती है, तो सबसे पहले लोग चावल को दोष देने लगते हैं. कई लोग डाइट शुरू करते ही चावल खाना बंद कर देते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे तेजी से मोटापा बढ़ता है. हालांकि एक्सपर्ट का कहना है कि सिर्फ चावल खाने से वजन नहीं बढ़ता, बल्कि यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस तरह का चावल, कितनी मात्रा में और किस तरीके से खा रहे हैं.&amp;nbsp;
क्या सच में वजन बढ़ता है?
हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली बेवसाइट healthline के मुताबिक भूरा और जंगली चावल साबुत अनाज की कैटेगरी में आते हैं. इनमें रेशा, विटामिन और खनिज भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं. यही वजह है कि इन्हें सेहत के लिए ज्यादा फायदेमंद माना जाता है. दूसरी ओर सफेद चावल को साफ करने की प्रक्रिया में उसका ऊपरी हिस्सा और कई जरूरी पोषक तत्व निकल जाते हैं, जिससे उसमें रेशे की मात्रा काफी कम हो जाती है.
अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के अनुसार साबुत अनाज वाले चावल पाचन को बेहतर बनाने में मदद करते हैं और लंबे समय तक पेट भरा हुआ महसूस कराते हैं. इससे बार-बार भूख नहीं लगती और कुल भोजन की मात्रा कम हो सकती है, जो वजन कंट्रोल रखने में मददगार माना जाता है.
क्या कहती है रिसर्च?
रिसर्च में यह भी पाया गया कि जो लोग साबुत अनाज ज्यादा खाते हैं, उनमें मोटापा और वजन बढ़ने का खतरा अपेक्षाकृत कम देखा गया. ऐसे लोगों में दिल की बीमारी और डायबिटीज का खतरा भी कम पाया गया. वहीं सफेद चावल में पोषक तत्व कम होने के कारण इसे अक्सर खाली ऊर्जा देने वाला भोजन माना जाता है. हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि सफेद चावल सीधे शरीर को नुकसान पहुंचाता है.&amp;nbsp;
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सफेद चावल&amp;nbsp;
एक्सपर्ट बताते हैं कि सफेद चावल में स्टार्च और शर्करा की मात्रा ज्यादा होती है. यही कारण है कि इसे खाने के बाद कई बार रक्त में शर्करा तेजी से बढ़ सकती है. अगर कोई व्यक्ति बहुत ज्यादा मात्रा में सफेद चावल खाता है और फिजिकल &amp;nbsp;करता है, तो वजन बढ़ने की संभावना बढ़ सकती है. हालांकि हर प्रकार का चावल एक जैसा असर नहीं दिखाता. कुछ चावल जल्दी पच जाते हैं, जबकि कुछ धीरे-धीरे एनर्जी देते हैं. धीरे पचने वाले चावल लंबे समय तक पेट भरा रखने में मदद कर सकते हैं. यही वजह है कि एक्सपर्ट संतुलित मात्रा में चावल खाने की सलाह देते हैं, न कि पूरी तरह छोड़ने की.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 08 May 2026 16:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>किन देशों के लोगों में थैलसीमिया होने का खतरा ज्यादा, जानें क्या है इसकी वजह?</title>
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        <description><![CDATA[ किन देशों के लोगों में थैलसीमिया होने का खतरा ज्यादा, जानें क्या है इसकी वजह? ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 08 May 2026 16:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>Office Dehydration: ऑफिस की चाय&amp;कॉफी और AC की हवा आपको कर रही बीमार, बढ़ रहा किडनी खराब होने का खतरा</title>
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        <description><![CDATA[ Why Office Workers Get Dehydrated In AC Rooms: पहली नजर में यही लगता है कि तेज धूप में काम करने वाले लोग ही सबसे ज्यादा डिहाइड्रेशन का शिकार होते होंगे. लेकिन असल तस्वीर कुछ अलग है. कई बार पूरे दिन एसी में बैठे ऑफिस जाने वाले लोग दिन के अंत तक ज्यादा डिहाइड्रेटेड मिलते हैं, बस फर्क इतना है कि यह समस्या धीरे-धीरे और चुपचाप बढ़ती है. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर एक्सपर्ट क्या कहते हैं.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
केयर हॉस्पिटल्स, हैदराबाद के नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. पी. विक्रांत रेड्डी ने TOI को बताया कि यह अब उनके लिए नई बात नहीं रही. उनके अनुसार, ऐसा लगता है कि बाहर काम करने वाले लोग ज्यादा डिहाइड्रेट होंगे, लेकिन व्यवहार में अक्सर ऑफिस में बैठे लोग ही कम पानी पीते हैं.&quot; इसकी वजह आलस नहीं, बल्कि हमारा काम करने का तरीका और माहौल है.
एयर कंडीशनर का क्या होता है असर?
एयर कंडीशनर में बैठने से शरीर के संकेत कमजोर पड़ जाते हैं. आमतौर पर प्यास हमें पानी पीने का संकेत देती है, लेकिन जब न पसीना आता है, न गर्मी लगती है, तो यह संकेत धीरे-धीरे नजरअंदाज हो जाता है. ऐसे में घंटों निकल जाते हैं और हमें एहसास भी नहीं होता कि शरीर पानी खो रहा है. डॉ. रेड्डी बताते हैं कि ठंडी हवा आराम जरूर देती है, लेकिन वह सूखापन भी बढ़ाती है. शरीर त्वचा और सांस के जरिए लगातार पानी खोता रहता है, बस यह नजर नहीं आता. यही कारण है कि एसी में बैठने वाले लोग बिना महसूस किए डिहाइड्रेशन की तरफ बढ़ जाते हैं.
चाय और कॉफी भी नुकसानदायक
ऑफिस में चाय और कॉफी का चलन भी इस समस्या को बढ़ाता है. दिनभर लोग कई कप चाय या कॉफी पीते रहते हैं और मान लेते हैं कि उन्होंने पर्याप्त तरल ले लिया है. लेकिन हकीकत यह है कि ये ड्रिंक्स पानी की जगह ले लेती हैं, उसे बढ़ाती नहीं हैं. डॉ. रेड्डी के मुताबिक, लोगों को लगता है कि वे दिनभर कुछ न कुछ पीते रहे हैं, लेकिन असल में उनका शरीर उतना हाइड्रेट नहीं होता जितना होना चाहिए. यही वजह है कि दिन के अंत तक थकान और भारीपन महसूस होता है.
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क्या होते हैं इसके लक्षण?
डिहाइड्रेशन के लक्षण भी बहुत सामान्य लगते हैं कि जैसे हल्का सिरदर्द, ध्यान में कमी या शाम तक थकावट. लोग इन्हें काम का दबाव या नींद की कमी समझ लेते हैं, जबकि कई बार असली कारण पानी की कमी होता है. लंबे समय तक बैठे रहने से यह समस्या और बढ़ जाती है. जब हम घंटों एक जगह बैठकर काम करते हैं, तो शरीर के संकेतों पर ध्यान ही नहीं जाता. न उठने का मौका मिलता है, न पानी पीने का ध्यान आता है.
क्या हो सकती है दिक्कत?
डॉक्टर चेतावनी देते हैं कि अगर लंबे समय तक पानी की कमी बनी रहे, तो इससे किडनी स्टोन या यूरिन इंफेक्शन का खतरा बढ़ सकता है. ये असर तुरंत नहीं दिखते, लेकिन धीरे-धीरे गंभीर हो सकते हैं. अच्छी बात यह है कि इसका समाधान बहुत मुश्किल नहीं है. बस दिनभर थोड़ा-थोड़ा पानी पीने की आदत डालनी होगी, चाय-कॉफी पर निर्भरता कम करनी होगी और बीच-बीच में उठकर ब्रेक लेना होगा.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 08 May 2026 00:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>20 मई को बंद रहेंगी दवा की दुकानें! ऑनलाइन फॉर्मेसी के खिलाफ 12 लाख केमिस्टों का &amp;apos;भारत बंद&amp;apos;</title>
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        <description><![CDATA[ अगर आप या आपके परिवार का कोई भी सदस्य नियमित रूप से किसी बीमारी की दवा लेता है तो यह खबर आपके लिए बेहद अहम है. दरअसल, 20 मई 2026 (बुधवार) को देशभर में दवाइयों की किल्लत हो सकती है, क्योंकि ऑल इंडिया ऑर्गनाइजेशन ऑफ केमिस्ट्स एंड ड्रगिस्ट्स (AIOCD) के नेतृत्व में देश भर के 12.40 लाख से भी ज्यादा केमिस्ट &#039;भारत बंद&#039; की तैयारी कर रहे हैं. ऐसे में देश के ज्यादातर शहरों, कस्बों और गांवों में दवा की दुकानें पूरी तरह से बंद रहने की आशंका है.&amp;nbsp;
हड़ताल पर क्यों जा रहे हैं केमिस्ट?
दवा विक्रेताओं के इस बड़े विरोध प्रदर्शन की मुख्य वजह इंटरनेट पर बिकने वाली दवाएं यानी &#039;ई-फार्मेसी&#039; और बड़ी कॉरपोरेट कंपनियों द्वारा दिया जाने वाला भारी डिस्काउंट है. केमिस्टों का साफ तौर पर कहना है कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर दवाओं की बिक्री बिना किसी सख्त नियम-कानून के हो रही है. इससे उनके व्यापार पर तो ताला लगने की नौबत आ ही गई है, लेकिन यह मरीजों की जान के लिए भी बड़ा खतरा बनता जा रहा है.
केमिस्टों ने बताईं अपनी 3 सबसे बड़ी चिंताएं
बिना सही जांच के मिल रहीं दवाएं: केमिस्टों का सबसे बड़ा आरोप यह है कि ऑनलाइन वेबसाइट्स और ऐप्स पर बिना किसी डॉक्टर की सही पर्ची के धड़ल्ले से दवाएं बेची जा रही हैं. इंटरनेट पर लोग एक ही पर्चे को बार-बार अपलोड करके दवाएं मंगा रहे हैं. कई मामलों में तो फर्जी पर्चों के जरिए नशीली दवाएं और हैवी एंटीबायोटिक्स आसानी से घर पहुंच रही हैं. इससे आम लोगों की सेहत को नुकसान पहुंच रहा है.
बड़ी कंपनियों की भारी छूट से छोटे दुकानदार बर्बाद: बड़े कॉरपोरेट घराने ऑनलाइन प्लेटफार्म्स पर दवाइयों पर इतनी भारी छूट दे रहे हैं कि उनके सामने मोहल्ले, गांव-कस्बों और छोटे शहरों के साधारण केमिस्ट टिक ही नहीं पा रहे हैं. लगातार हो रहे भारी घाटे की वजह से छोटे दुकानदारों का व्यापार ठप होने लगा है और दुकानें बंद हो रही हैं.
कोरोना काल के ढीले नियमों का गलत इस्तेमाल: कोरोना महामारी (Covid-19) के दौरान जब घर से निकलना मुश्किल था, तब सरकार ने दवाओं की बिक्री से जुड़े कुछ नियमों में अस्थायी तौर पर ढील दी थी. केमिस्टों का कहना है कि महामारी खत्म होने के बाद भी वे नियम आज तक लागू हैं और ई-फार्मेसी कंपनियां इसका जमकर गलत फायदा उठा रही हैं.
क्या हैं संगठन की मुख्य मांगें?

कोरोना काल में जारी किए गए अस्थायी नियम (G.S.R. 220(E)) को तुरंत प्रभाव से रद्द किया जाए.
ऑनलाइन फॉर्मेसी को छूट देने वाली अधिसूचना (G.S.R. 817(E)) को पूरी तरह वापस लिया जाए.
बड़ी कंपनियों द्वारा बाजार के नियम तोड़कर दी जाने वाली भारी छूट पर पाबंदी लगे.

मरीजों की जान और 5 करोड़ लोगों के रोजगार का सवाल
AIOCD के अध्यक्ष जे. एस. शिंदे और महासचिव राजीव सिंघल ने चेतावनी दी है कि यह लड़ाई सिर्फ केमिस्टों का धंधा बचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर मरीजों की सुरक्षा से जुड़ा हुआ गंभीर मामला है. इन अवैध ई-फॉर्मेसी और भारी छूट के कारण दवा व्यापार से जुड़े करीब 5 करोड़ लोगों की रोजी-रोटी पर बड़ा संकट आ गया है. संगठन ने अल्टीमेटम दिया है कि अगर 20 मई तक उनकी समस्याओं पर ध्यान देकर कोई ठोस समाधान नहीं निकाला गया तो यह हड़ताल सिर्फ एक दिन की नहीं रहेगी. इसके बाद देशभर के केमिस्ट लंबे समय तक आंदोलन करने को मजबूर होंगे, जिससे पूरे देश की स्वास्थ्य व्यवस्था प्रभावित हो सकती है.
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        <pubDate>Thu, 07 May 2026 08:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>Healthy foods for Bones: आपकी हड्डियों को मजबूत कर देंगे ये देसी फूड, 40 के बाद भी बोल्ट की तरह दौड़ेंगे आप</title>
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        <description><![CDATA[ Healthy foods for Bones: आपकी हड्डियों को मजबूत कर देंगे ये देसी फूड, 40 के बाद भी बोल्ट की तरह दौड़ेंगे आप ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 07 May 2026 08:30:06 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Watermelon Health Tips: क्या आप भी गलत तरीके से खा रहे तरबूज? रात में भूलकर भी न करें ये काम, जानें इसे खाने का सही समय</title>
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        <description><![CDATA[ Watermelon Health Tips: क्या आप भी गलत तरीके से खा रहे तरबूज? रात में भूलकर भी न करें ये काम, जानें इसे खाने का सही समय ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 06 May 2026 20:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>White Fat Vs Brown Fat: क्या हर तरह का फैट होता है बुरा? जानें मोटापा और बीमारियों का असली कनेक्शन</title>
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        <description><![CDATA[ Difference Between White Fat And Brown Fat: जब भी हम शरीर में जमा फैट की बात करते हैं, तो अक्सर उसे सिर्फ अच्छा या बुरा मान लेते हैं. लेकिन सच्चाई इससे कहीं ज्यादा जटिल है. फैट सिर्फ वजन बढ़ाने वाला तत्व नहीं, बल्कि शरीर के अंदर एक एक्टिव सिस्टम की तरह काम करता है, जो हमारी सेहत को गहराई से प्रभावित करता है. हाल के वर्षों में हुई रिसर्च ने यह साफ कर दिया है कि सिर्फ फैट की मात्रा नहीं, बल्कि यह शरीर में कहां जमा हो रहा है, यही असली फर्क पैदा करता है.
क्या निकला रिसर्च में?
यूनिवर्सिटी ऑफ ग्लासगो की एक स्टडी में यह सामने आया कि एक ही तरह की डाइट लेने के बावजूद अलग-अलग लोगों में फैट अलग तरीके से जमा होता है. यूरोपियन लोगों में यह फैट ज्यादा तर त्वचा के नीचे जमा होता है, जबकि दक्षिण एशियाई लोगों खासकर भारतीयों में यह फैट शरीर के अंदर अंगों के आसपास जमा होता है, जिसे विसरल फैट कहा जाता है. यही वजह है कि भारतीयों में डायबिटीज और दिल की बीमारियां जल्दी देखने को मिलती हैं.&amp;nbsp;
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
&amp;nbsp;न्यूट्रिशनिस्ट रयान फर्नांडो ने बताया कि फैट एक एंडोक्राइन ऑर्गन की तरह काम करता है, जो हार्मोन बनाता है और मेटाबॉलिज्म को प्रभावित करता है. इसलिए एक जैसे वजन वाले दो लोगों की सेहत एक जैसी नहीं होती. वहीं, डॉ. वी मोहन के अनुसार, भारतीयों में त्वचा के नीचे फैट स्टोर करने की क्षमता कम होती है, जिससे अतिरिक्त फैट सीधे शरीर के अंदर जमा होने लगता है.&amp;nbsp;
व्हाइट और ब्राउन फैट में अंतर
फैट के भी अलग-अलग प्रकार होते हैं व्हाइट फैट और ब्राउन फैट. व्हाइट फैट वही होता है, जो शरीर में जमा होकर मोटापा बढ़ाता है और बीमारियों का कारण बनता है. दूसरी तरफ ब्राउन फैट शरीर के लिए फायदेमंद होता है. यह कैलोरी जलाने में मदद करता है, ब्लड शुगर कंट्रोल करता है और दिल की सेहत को बेहतर बनाता है. डॉ. मोहन बताते हैं कि ज्यादा व्हाइट फैट शरीर में सूजन बढ़ाता है और इससे डायबिटीज, हार्ट डिजीज और कुछ कैंसर का खतरा बढ़ सकता है. वहीं ब्राउन फैट शरीर में अच्छे हार्मोन जैसे एडिपोनेक्टिन को बढ़ाता है, जो मेटाबॉलिज्म के लिए फायदेमंद होता है.&amp;nbsp;
साइंटिस्ट इसपर कर रहे हैं काम
वैज्ञानिक अब इस बात पर भी काम कर रहे हैं कि कैसे व्हाइट फैट को ब्राउन फैट में बदला जा सके. हालांकि, यह प्रक्रिया अभी पूरी तरह इंसानों में साबित नहीं हुई है, लेकिन इस दिशा में रिसर्च जारी है. कीट यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर नरेश बाल बताते हैं कि कुछ नेचुरल तत्व जैसे काली मिर्च और मिर्च में पाए जाने वाले कंपाउंड ब्राउन फैट को सक्रिय करने में मदद कर सकते हैं.
डॉ. नटराजन गणेशन के अनुसार शरीर फैट को यूं ही नहीं जलाता, बल्कि फैट की क्वालिटी भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है जितनी मात्रा. &amp;nbsp;यानी हेल्दी फैट जैसे नट्स और ऑलिव ऑयल शरीर के लिए ज्यादा फायदेमंद होते हैं.
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लाइफस्टाइल की अहम भूमिका
इसके अलावा, हमारी लाइफस्टाइल भी बड़ी भूमिका निभाती है. ज्यादा प्रोसेस्ड फूड, चीनी और कम एक्टिव लाइफस्टाइल शरीर में व्हाइट फैट बढ़ाते हैं. वहीं पारंपरिक भारतीय आहार, जिसमें हल्दी, अदरक, हरी चाय और मसाले शामिल होते हैं ब्राउन फैट को सक्रिय करने में मदद कर सकते हैं.

भारत में क्या है इसका असर
भारत में इसके असर अब साफ दिखाई देने लगे हैं. यूनिसेफ की चाइल्ड न्यूट्रिशन रिपोर्ट 2025 के अनुसार, 2030 तक भारत में 2.7 करोड़ से अधिक बच्चे और किशोर मोटापे का शिकार हो सकते हैं, जो वैश्विक बोझ का लगभग 11 प्रतिशत होगा. वहीं, नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि पिछले कुछ दशकों में एडल्ट में मोटापा तेजी से बढ़ा है, महिलाओं में करीब 91 प्रतिशत और पुरुषों में 146 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 06 May 2026 20:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Women Health Summer: क्या गर्मी से बिगड़ रहे हैं पीरियड्स? डॉक्टर से जानें क्या है इसका सच</title>
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        <description><![CDATA[ Impact Of High Temperature On Hormones In Women: गर्मियों का मौसम सिर्फ पसीना और थकान ही नहीं लाता, बल्कि कई महिलाओं के लिए शरीर की अंदरूनी लय को भी बदल देता है. आमतौर पर मासिक धर्म को एक नियमित और तय चक्र माना जाता है, लेकिन तेज गर्मी के दौरान यह संतुलन बिगड़ सकता है. कभी पीरियड्स जल्दी आ जाते हैं, कभी देर से, तो कभी फ्लो सामान्य से अलग महसूस होता है. यह कोई संयोग नहीं है, बल्कि शरीर की नेचुरल प्रतिक्रिया है, जो तापमान, पानी की कमी और तनाव के असर से जुड़ी होती है.&amp;nbsp;
क्या कहते हैं एक्सपर्ट
डॉ. श्रुति कोटांगले, कंसल्टेंट गायनेकोलॉजिस्ट ने TOI को बताया कि गर्मी का असर सिर्फ सांस या यूरिन से जुड़ी समस्याओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह पीरियड को भी प्रभावित कर सकता है. शरीर में पानी की कमी और बढ़ता तापमान हार्मोनल बदलाव ला सकता है. दरअसल, जब तापमान बढ़ता है तो शरीर खुद को ठंडा रखने के लिए ज्यादा मेहनत करता है. इस प्रक्रिया में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन जैसे हार्मोन प्रभावित हो सकते हैं, जो पीरियड्स को नियंत्रित करते हैं.&amp;nbsp;
फ्लो में भी बदलाव
गर्मी के दिनों में कई महिलाओं को फ्लो में बदलाव महसूस होता है. किसी महीने ब्लीडिंग ज्यादा हो सकती है, तो कभी बहुत हल्की. इसका कारण शरीर में पानी की कमी और ब्लड सर्कुलेशन में बदलाव होता है. डिहाइड्रेशन के कारण खून गाढ़ा हो सकता है, जबकि हीट स्ट्रेस गर्भाशय के संकुचन को प्रभावित करता है. डॉ. कोटांगले कहती हैं कि हर महिला में इसका असर अलग होता है, इसलिए फ्लो में बदलाव सामान्य है.&amp;nbsp;
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पानी की कमी और डिप्रेशन
पानी की कमी और तनाव भी इस पूरी प्रक्रिया में बड़ी भूमिका निभाते हैं. गर्मियों में शरीर जल्दी डिहाइड्रेट होता है, जिससे क्रैम्प्स बढ़ सकती है.ल &amp;nbsp;इसके साथ ही, गर्मी के कारण कॉर्टिसोल यानी स्ट्रेस हार्मोन भी बढ़ जाता है, जो मूड स्विंग्स, थकान और चिड़चिड़ापन बढ़ा सकता है. यही वजह है कि इस मौसम में कई महिलाओं को पीरियड्स के दौरान ज्यादा थकावट और भावनात्मक उतार-चढ़ाव महसूस होता है.
नींद का भी असर
गर्मी का असर नींद पर भी पड़ता है. नींद ठीक न हो तो हार्मोनल संतुलन और बिगड़ जाता है. यह एक चक्र की तरह काम करता है कि गर्मी नींद को प्रभावित करती है, नींद हार्मोन को और हार्मोन पीरियड्स को. अत्यधिक गर्मी पीएमएस के लक्षणों को भी बढ़ा सकती है, जैसे सिरदर्द, उल्टी, शरीर दर्द और बेचैनी. हालांकि, यह जरूरी नहीं कि हर महिला को ये बदलाव महसूस हों.&amp;nbsp;
किन बातों का ध्यान रखना चाहिए
इस दौरान सबसे जरूरी है सही दिनचर्या अपनाना। पर्याप्त पानी पीना बेहद जरूरी है कि दिनभर में कम से कम 3-4 लीटर. तरबूज, खीरा जैसे फल और नारियल पानी, छाछ जैसे पारंपरिक पेय शरीर को हाइड्रेट रखने में मदद करते हैं. हल्का भोजन, कम कैफीन और नियमित नींद भी शरीर को संतुलित रखते हैं. हल्की एक्सरसाइज या योग से भी आराम मिल सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 06 May 2026 20:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Handwashing Benefits: क्या सिर्फ पानी से हाथ धोना है काफी? डॉक्टर से जानें बीमारियों का बड़ा सच</title>
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        <description><![CDATA[ Why Handwashing Is Important For Health: हाथ धोना एक बहुत साधारण सी आदत लगती है. इसमें न ज्यादा समय लगता है, न किसी खास साधन की जरूरत होती है. फिर भी यही छोटी-सी आदत हमें कई तरह के इंफेक्शन से बचा सकती है. यही वजह है कि आधुनिक चिकित्सा के इस दौर में भी डॉक्टर बार-बार हाथ धोने की सलाह देते हैं. यह सिर्फ व्यक्तिगत सफाई का मामला नहीं है, बल्कि पूरे समाज के स्वास्थ्य से जुड़ा एक महत्वपूर्ण कदम है.&amp;nbsp;
टीकों और एंटीबायोटिक्स के आने से बहुत पहले भी हाथों की सफाई ने लोगों की जान बचाने में बड़ी भूमिका निभाई थी. कोविड-19 महामारी के दौरान भी यही बात फिर से सामने आई कि साफ हाथ इंफेक्शन की चेन को तोड़ने का सबसे आसान तरीका हैं.&amp;nbsp;
क्यों हाथ धोना जरूरी
हम रोजमर्रा की जिंदगी में कई चीजों को छूते हैं, जैसे दरवाजे के हैंडल, मोबाइल फोन, पैसे, रेलिंग या फिर किसी से हाथ मिलाना. इन सब पर सूक्ष्म जीव मौजूद हो सकते हैं. डॉ. प्रतीक गोपानी &amp;nbsp;ने TOI को बताया कि बहुत से लोग हाथ धोने को गंभीरता से नहीं लेते, जबकि यह आदत कई गंभीर इंफेक्शन से बचाती है और समग्र स्वास्थ्य को बेहतर बनाती है. जब गंदे हाथ चेहरे, आंख, नाक या मुंह तक पहुंचते हैं, तो यही जीव शरीर में प्रवेश कर जाते हैं और बीमारियों की शुरुआत होती है.&amp;nbsp;
इससे कौन सी बीमारियां फैलती हैं
इसी तरह हैजा, टाइफाइड, डायरिया और इन्फ्लुएंजा जैसी बीमारियां फैलती हैं. खास बात यह है कि इंफेक्शन सिर्फ गंदे माहौल में ही नहीं, बल्कि साफ दिखने वाली जगहों पर भी हो सकता है. इसलिए सतर्क रहना जरूरी है.&amp;nbsp;
रिसर्च में क्या निकला
साइंटिस्ट रिसर्च भी इस बात की पुष्टि करते हैं. सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के अनुसार, सही तरीके से हाथ धोने से इंफेक्शन का खतरा करीब 20 प्रतिशत तक कम हो सकता है. जिन देशों में साफ पानी और स्वच्छता की बेहतर सुविधा होती है, वहां इंफेक्शन के मामलों में स्पष्ट गिरावट देखी गई है.&amp;nbsp;
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इन चीजों को नहीं करना चाहिए इग्नोर
अक्सर लोग रोजमर्रा के छोटे-छोटे मौकों को नजरअंदाज कर देते हैं, जहां हाथ धोना जरूरी होता है. जैसे कि शौचालय इस्तेमाल करने के बाद, खाना बनाने या खाने से पहले, कच्चे भोजन को छूने के बाद, खांसने या छींकने के बाद, पालतू जानवरों या कचरे को छूने के बाद, और बाहर से घर आने पर. बच्चों और बुजुर्गों के लिए यह आदत और भी ज्यादा जरूरी है, क्योंकि उनकी रोग इम्यून सिस्टम अपेक्षाकृत कमजोर होती है.
हाथ धोने का सही तरीका
हाथ धोने का तरीका भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि उसे करना. लगभग 20 सेकंड तक साबुन और पानी से हाथ धोना चाहिए. हथेलियों, हाथों के पीछे, उंगलियों के बीच और नाखूनों के नीचे अच्छी तरह सफाई करनी चाहिए. साबुन गंदगी और कीटाणुओं को हटाने में मदद करता है, जबकि केवल पानी से धोना पर्याप्त नहीं होता. अगर साबुन उपलब्ध न हो, तो अल्कोहल-आधारित सैनिटाइजर इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन यह पूरी तरह विकल्प नहीं है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 06 May 2026 20:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>8 Hours Sleep But Still Tired: 8 घंटे सोकर भी नहीं मिट रही थकान, इस गंभीर बीमारी की ओर इशारा कर रहा शरीर</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/8-hours-sleep-but-still-tired-8-घंटे-सोकर-भी-नहीं-मिट-रही-थकान-इस-गंभीर-बीमारी-की-ओर-इशारा-कर-रहा-शरीर</link>
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        <description><![CDATA[ Why Body Feels Exhausted Even After Good Sleep: रात को समय पर सोना, देर रात तक मोबाइल न चलाना और पूरे आठ घंटे की नींद लेना, इसके बावजूद अगर सुबह उठते ही शरीर टूटा हुआ महसूस हो, आंखों में भारीपन रहे और दिनभर थकान पीछा न छोड़े, तो इसे सामान्य मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. कई बार शरीर इस तरह किसी गंभीर समस्या का संकेत देता है. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर एक्सपर्ट क्या कहते हैं.&amp;nbsp;
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
Hartford HealthCare Medical Group के स्लीप स्पेशलिस्ट Dr. Steven Thau के मुताबिक, सिर्फ नींद के घंटे पूरे होना काफी नहीं है, बल्कि यह भी जरूरी है कि नींद कितनी गहरी और आरामदायक रहे. कई लोग बिस्तर पर तो आठ घंटे बिताते हैं, लेकिन उनका शरीर असली आराम तक पहुंच ही नहीं पाता.
किस वजह से सुबह रहती है थकान?
नींद के दौरान शरीर अलग-अलग चरणों से गुजरता है. इनमें हल्की नींद, गहरी नींद और आरईएम स्लीप शामिल होती है. अगर किसी वजह से बार-बार नींद टूटती रहे, तो शरीर गहरी नींद तक नहीं पहुंच पाता. यही कारण है कि सुबह उठने पर थकान बनी रहती है. तनाव, कमरे में शोर, देर रात तक स्क्रीन देखने की आदत और ज्यादा कैफीन लेने जैसी चीजें गहरी नींद को प्रभावित कर सकती हैं.&amp;nbsp;
लगातार थकान बीमारी का संकेत
इस लगातार बनी रहने वाली थकान के पीछे एक गंभीर बीमारी भी हो सकती है, जिसे स्लीप एपनिया कहा जाता है. यह ऐसी स्थिति है जिसमें सोते समय व्यक्ति की सांस कुछ सेकंड के लिए रुक जाती है. &amp;nbsp;डॉ &amp;nbsp;बताते हैं कि कई लोगों को इसका पता तक नहीं चलता, लेकिन दिमाग बार-बार शरीर को सांस लेने के लिए जगाता रहता है. इससे नींद पूरी होने के बावजूद शरीर को आराम नहीं मिल पाता. जोर से खर्राटे आना, नींद में घुटन महसूस होना या दिनभर अत्यधिक सुस्ती रहना इसके संकेत हो सकते हैं.
इसके अलावा, रोज अलग-अलग समय पर सोना और उठना भी शरीर कीसर्कैडियन रिदम को बिगाड़ देता है. यही वजह है कि छुट्टियों में ज्यादा देर तक सोने के बाद भी कई लोग और ज्यादा थका हुआ महसूस करते हैं.
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लाइफस्टाइल का भी प्रभाव
खानपान की आदतें भी नींद की क्वालिटी पर असर डालती हैं. देर रात भारी खाना, मसालेदार भोजन या शराब लेने से नींद बार-बार टूट सकती है. वहीं शरीर में पानी की कमी होने पर भी बेचैनी और थकान महसूस होती है. मेंटल तनाव और चिंता भी बड़ी वजह बनते हैं. जब दिमाग लगातार सक्रिय रहता है, तो शरीर आराम की स्थिति में नहीं पहुंच पाता. ऐसे में ध्यान, गहरी सांस लेने की आदत और सोने से पहले शांत माहौल बनाने से फायदा मिल सकता है.
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        <pubDate>Wed, 06 May 2026 20:30:06 +0530</pubDate>
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        <media:keywords>Hours, Sleep, But, Still, Tired:, घंटे, सोकर, भी, नहीं, मिट, रही, थकान, इस, गंभीर, बीमारी, की, ओर, इशारा, कर, रहा, शरीर</media:keywords>
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        <title>Hantavirus Outbreak: कितना खतरनाक है लग्जरी क्रूज पर फैला हंता वायरस, जिसने ले ली तीन लोगों की जान?</title>
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        <description><![CDATA[ How Dangerous Is Hantavirus Infection: अटलांटिक महासागर में सफर कर रहे एक लग्जरी क्रूज पर संदिग्ध हंता वायरस इंफेक्शन ने चिंता बढ़ा दी है. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के अनुसार, इस घटना में तीन लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि एक मामले की पुष्टि हुई है और पांच अन्य संदिग्ध मामलों की जांच जारी है. एमवी होंडियस नाम के इस क्रूज पर फैले इस &amp;nbsp;ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर यह वायरस कितना खतरनाक है और इससे बचाव कैसे संभव है.&amp;nbsp;
क्या है हंता वायरस?
हंता वायरस कोई एक वायरस नहीं, बल्कि वायरस के एक समूह का नाम है, जो मुख्य रूप से चूहों जैसे ऐसे स्तनधारी जीवों में पाया जाता है जो भोजन को कुतरकर खाते हैं. यह इंसानों में सीधे नहीं फैलता, बल्कि इंफेक्टेड चूहों के मल, यूरिन या लार के सूखे कण जब हवा में मिल जाते हैं और सांस के जरिए शरीर में प्रवेश करते हैं, तब इंफेक्शन होता है. सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के मुताबिक, यही इसका सबसे सामान्य फैलने का तरीका है.&amp;nbsp;
हजारों लोग होते हैं प्रभावित
दुनियाभर में हर साल इस वायरस से हजारों लोग प्रभावित होते हैं. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ के आंकड़ों के अनुसार, हेमोरेजिक फीवर विथ रीनल सिंड्रोम के करीब 1.5 लाख मामले हर साल सामने आते हैं, जिनमें से आधे से ज्यादा चीन में दर्ज होते हैं. वहीं अमेरिका में 1993 से 2023 के बीच करीब 890 मामलों की पुष्टि हुई है. हालांकि, इसका एक स्ट्रेन सियोल वायरस दुनिया के कई हिस्सों में पाया जाता है.&amp;nbsp;
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इस वायरस की सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
इस वायरस की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इसका कोई निश्चित इलाज नहीं है. डॉक्टर आमतौर पर मरीज के लक्षणों के आधार पर इलाज करते हैं, जिसमें ऑक्सीजन थेरेपी, वेंटिलेशन सपोर्ट और गंभीर मामलों में डायलिसिस तक की जरूरत पड़ सकती है. कई मरीजों को आईसीयू में भर्ती करना पड़ता है, खासकर जब इंफेक्शन तेजी से लंग्स को प्रभावित करता है.&amp;nbsp;
कब आया था यह चर्चा में?
बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, हाल ही में फरवरी 2025 में एक मामला चर्चा में आया था, जब ऑस्कर विजेता अभिनेता जीन हैकमैन की पत्नी बेट्सी अराकावा की मौत भी हंता वायरस से जुड़ी सांस की बीमारी के कारण हुई थी. जांच में पाया गया कि उनके घर के आसपास चूहों के घोंसले मौजूद थे, जिससे इंफेक्शन की आशंका बढ़ी. एक्सपर्ट के अनुसार, इस वायरस से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका है चूहों जैसे जानवरों से दूरी बनाना. घर या काम करने की जगह पर चूहों के आने-जाने के रास्तों को बंद करना, सफाई के दौरान मास्क और दस्ताने पहनना, और गंदगी को सीधे हाथ से न छूना बेहद जरूरी है.&amp;nbsp;
क्रूज में क्यों होती है दिक्कत?
क्रूज जैसी बंद जगहों पर इस तरह के इंफेक्शन का खतरा इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि यहां सीमित स्थान में कई लोग एक साथ रहते हैं. ऐसे में अगर इंफेक्शन फैलता है, तो उसे नियंत्रित करना मुश्किल हो जाता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 06 May 2026 04:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>kidney Disease Early Symptoms: शरीर में दिखें ये लक्षण तो हो जाएं सावधान, धीरे&amp;धीरे खत्म हो जाएगी आपकी किडनी</title>
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        <description><![CDATA[ kidney Disease Early Symptoms : हमारे शरीर में किडनी दो बहुत ही जरूरी अंग होते हैं, जो लगातार बिना रुके काम करते रहते हैं. इनका मुख्य काम खून को साफ करना, शरीर से टॉक्सिन्स को बाहर निकालना, पानी और मिनरल्स का संतुलन बनाए रखना और ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करना होता है, लेकिन समस्या यह है कि किडनी की बीमारी धीरे-धीरे बढ़ती है और शुरुआत में इसके लक्षण बहुत हल्के होते हैं या बिल्कुल समझ नहीं आते हैं. अक्सर लोग इन संकेतों को सामान्य कमजोरी या दूसरी छोटी समस्याएं समझकर नजरअंदाज कर देते हैं.जब तक बीमारी का पता चलता है, तब तक किडनी काफी हद तक प्रभावित हो चुकी होती है. इसलिए जरूरी है कि शरीर में दिखने वाले शुरुआती संकेतों को समय रहते पहचान लिया जाए. तो आइए जानते हैं कि शरीर में कौन से लक्षण दिखें तो सावधान हो जाएं. &amp;nbsp;
किडनी बीमारी क्या होती है?
क्रॉनिक किडनी डिजीज (CKD) एक ऐसी स्थिति है जिसमें किडनी धीरे-धीरे अपनी काम करने की क्षमता खोने लगती है. यह अचानक नहीं होती, बल्कि महीनों या सालों में धीरे-धीरे बढ़ती है. जब किडनी सही से काम नहीं करती, तो शरीर में गंदगी और टॉक्सिन्स जमा होने लगते हैं, जिससे कई तरह की समस्याएं पैदा होती हैं.&amp;nbsp;
शरीर में कौन से लक्षण दिखें तो सावधान हो जाएं?
1. लगातार थकान और कमजोरी - अगर आपको बिना ज्यादा काम किए भी लगातार थकान महसूस होती है, तो यह किडनी की समस्या का संकेत हो सकता है. किडनी जब सही से काम नहीं करती, तो शरीर में खून की कमी (एनीमिया) हो जाती है. इससे शरीर में ऑक्सीजन कम पहुंचती है और व्यक्ति हमेशा थका-थका महसूस करता है.&amp;nbsp;
2. नींद न आना या नींद में परेशानी - किडनी खराब होने पर शरीर में टॉक्सिन्स जमा होने लगते हैं, जिससे नींद प्रभावित होती है. कई लोगों को रात में बार-बार नींद टूटने या बेचैनी की समस्या होती है.&amp;nbsp;
3. स्किन का रूखा और खुजलीदार होना - जब किडनी शरीर से गंदगी को सही से बाहर नहीं निकाल पाती, तो खून में मिनरल्स का संतुलन बिगड़ जाता है. इससे स्किन ड्राई हो जाती है और लगातार खुजली होती है.&amp;nbsp;
4.बार-बार पेशाब आना या पेशाब में बदलाव - अगर आपको बार-बार पेशाब आने लगे, खासकर रात में, तो यह किडनी की खराबी का संकेत हो सकता है. इसके अलावा झागदार पेशाब, बहुत कम या ज्यादा पेशाब, रंग में बदलाव भी हो सकते हैं
5. पेशाब में खून आना - अगर पेशाब में खून दिखे या उसका रंग गुलाबी/भूरा हो जाए, तो यह गंभीर संकेत हो सकता है. यह किडनी की फिल्टरिंग सिस्टम के खराब होने का संकेत है.&amp;nbsp;
6. झागदार पेशाब (Foamy Urine) - अगर पेशाब में बहुत ज्यादा झाग बने, तो इसका मतलब हो सकता है कि पेशाब में प्रोटीन जा रहा है, जो किडनी डैमेज का संकेत है.
7.आंखों के आसपास सूजन - किडनी जब प्रोटीन को रोक नहीं पाती, तो शरीर से प्रोटीन बाहर निकलने लगता है, जिससे आंखों के नीचे सूजन आ जाती है.&amp;nbsp;
8. पैरों और टखनों में सूजन - अगर पैरों, टखनों या शरीर के निचले हिस्से में सूजन रहती है, तो इसका कारण शरीर में पानी और नमक का जमा होना हो सकता है, जो किडनी की खराबी से जुड़ा होता है.&amp;nbsp;
9. भूख कम लगना - किडनी ठीक से काम न करे तो शरीर में टॉक्सिन्स बढ़ जाते हैं, जिससे भूख कम लगती है और व्यक्ति भूख खो देता है.&amp;nbsp;
10 मांसपेशियों में दर्द और ऐंठन - किडनी शरीर में कैल्शियम और फास्फोरस का संतुलन बनाए रखती है. जब यह बिगड़ता है, तो मांसपेशियों में दर्द और ऐंठन होने लगती है.&amp;nbsp;
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किडनी को नुकसान पहुंचाने वाले कारण
लंबे समय तक हाई ब्लड शुगर किडनी की ब्लड वेसल्स को नुकसान पहुंचाता है. इसके अलावा हाई ब्लड प्रेशर किडनी पर दबाव डालता है और धीरे-धीरे उसे कमजोर करता है. कुछ दर्द निवारक दवाइयों का ज्यादा इस्तेमाल किडनी को नुकसान पहुंचा सकता है. लंबे समय तक शरीर में पानी की कमी किडनी पर बुरा असर डालती है. गलत खान-पान और एक्सरसाइज की कमी भी किडनी बिमारी का कारण बन सकती है.&amp;nbsp;
किडनी को स्वस्थ कैसे रखें?
1. &amp;nbsp;शुगर और ब्लड प्रेशर को कंट्रोल रखें - ये दोनों किडनी खराब होने के सबसे बड़े कारण हैं.&amp;nbsp;
2. बैलेंस डाइट लें - हरी सब्जियां, फल और कम नमक वाला खाना खाएं.&amp;nbsp;
3. ज्यादा पानी पिएं - शरीर को हाइड्रेट रखना बहुत जरूरी है.&amp;nbsp;
4. धूम्रपान और शराब से बचें - ये दोनों किडनी और पूरे शरीर को नुकसान पहुंचाते हैं.&amp;nbsp;
5. नियमित जांच कराएं - अगर आपको डायबिटीज, BP या फैमिली हिस्ट्री है, तो समय-समय पर किडनी टेस्ट कराना जरूरी है.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 06 May 2026 04:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>Spine Surgery Technique: AIIMS की अनोखी स्पाइन सर्जरी तकनीक बनी दुनिया की पसंद, गंभीर मरीजों को मिल रही नई जिंदगी</title>
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        <description><![CDATA[ Spine Surgery Technique: आज के समय में चिकित्सा क्षेत्र तेजी से आगे बढ़ रहा है और इसी कड़ी में एक बड़ी सफलता सामने आई है. दिल्ली के All India Institute of Medical Sciences में विकसित एक खास सर्जरी तकनीक ने उन मरीजों के लिए नई उम्मीद पैदा कर दी है जो गंभीर रीढ़ की विकृति से परेशान थे. पहले ऐसे मरीजों के लिए इलाज बहुत मुश्किल और जोखिम भरा माना जाता था, लेकिन अब यह नई तकनीक उनकी जिंदगी बदल रही है. इस नवाचार ने न केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी डॉक्टरों का ध्यान अपनी ओर खींचा है. &amp;nbsp;
सात साल की मेहनत से तैयार हुई तकनीक
यह नई सर्जरी तकनीक पिछले लगभग सात सालों में विकसित की गई है और इसे डॉक्टरों की एक टीम ने तैयार किया है. यह तकनीक असल में पोस्टेरियर वर्टिब्रल कॉलम रिसेक्शन (PVCR)&amp;rdquo;का एक बदला हुआ रूप है, &amp;nbsp;PVCR एक जटिल ऑपरेशन होता है, जिसका इस्तेमाल उन मरीजों के इलाज में किया जाता है जिनकी रीढ़ की हड्डी बहुत ज्यादा टेढ़ी या कठोर हो जाती है और इससे उनकी जिंदगी पर बुरा असर पड़ता है. इस नई तकनीक को वरिष्ठ हड्डी रोग विशेषज्ञ Dr Bhavuk Garg ने विकसित किया है. इस नई विधि में ऑपरेशन के दौरान रीढ़ के कुछ हिस्सों को अंत तक सुरक्षित रखा जाता है, जिससे सर्जरी के दौरान शरीर की स्थिरता बनी रहती है. इस वजह से पहले की तुलना में जटिलताओं का खतरा काफी कम हो जाता है और मरीज के ठीक होने की संभावना बढ़ जाती है. &amp;nbsp; All India Institute of Medical Sciences के डॉक्टरों का कहना है कि पिछले सात सालों में इस प्रक्रिया ने उन मरीजों के लिए नई उम्मीद जगाई है, जिन्हें पहले सर्जरी में बहुत ज्यादा जोखिम का सामना करना पड़ता था और जिनके पास इलाज के विकल्प भी सीमित थे.&amp;nbsp;
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मरीजों को मिल रहा बड़ा फायदा
गंभीर रीढ़ विकृति से पीड़ित मरीजों को कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है जैसे रीढ़ का टेढ़ा होना, लगातार दर्द, सांस लेने में परेशानी और सीधे खड़े न हो पाना. कई बार इसका असर उनके मानसिक और सामाजिक जीवन पर भी पड़ता है. लेकिन इस नई तकनीक के जरिए सर्जरी कराने के बाद मरीजों की हालत में काफी सुधार देखा गया है. जो लोग पहले चलने फिरने या सामान्य काम करने में असमर्थ थे, वे अब फिर से स्कूल, काम और सामान्य जीवन में लौट पा रहे हैं. परिवार के लोगों के अनुसार यह बदलाव उनके लिए जिंदगी बदल देने वाला साबित हुआ है. &amp;nbsp;एक वरिष्ठ हड्डी रोग विशेषज्ञ ने बताया, &amp;ldquo;पहले इन सर्जरी से लोग डरते थे, क्योंकि इसमें बड़े न्यूरोलॉजिकल या जानलेवा जोखिम हो सकते थे. लेकिन अब बेहतर तकनीक और अनुभव की वजह से इसके नतीजे काफी अच्छे हो गए हैं.&amp;rdquo;&amp;nbsp;
विदेशों में भी बढ़ी मांग और पहचान
एम्स द्वारा विकसित इस तकनीक को अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिल रही है. विदेशों के स्पाइन सर्जन भी इस विधि में रुचि दिखा रहे हैं और इसे अपनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक जटिल स्पाइन बीमारियों के इलाज में एक बड़ी उपलब्धि साबित हो रही है. इससे भारत की चिकित्सा क्षमता को वैश्विक स्तर पर नई पहचान मिली है और देश उन्नत स्पाइन सर्जरी के क्षेत्र में मजबूत स्थिति बना रहा है.
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        <pubDate>Tue, 05 May 2026 15:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>रामपुर जिला अस्पताल में बढ़े आंखों के मरीज, जानें गर्मी के मौसम में क्यों होती है दिक्कत?</title>
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        <description><![CDATA[ भीषण गर्मी की वजह से आंखों से संबंधित बीमारियों के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं. इस बीच रामपुर के जिला अस्पताल की ओपीडी में रोजाना 40-50 मरीज आंखों की शिकायत लेकर पहुंच रहे हैं. बढ़ते तापमान को देखते हुए हेल्थ डिपार्टमेंट अलर्ट मोड पर आ गया है और लोगों से सावधानी बरतने की अपील की जा रही है.
कैसे नजर आ रहे लक्षण?
मौसम में बढ़ती गर्मी का असर अब लोगों की आंखों पर साफ दिखाई देने लगा है. रामपुर जिला अस्पताल और ग्रामीण क्षेत्रों के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर आंखों के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. मरीजों में आंखों से पानी आना, खुजली, सूजन, लालिमा और दर्द जैसी समस्याएं आम हो गई हैं.
डॉक्टर ने बताई वजह
डॉ. संजय कपूर का कहना है कि तेज धूप, धूल और गर्म हवाओं की वजह से आंखों में संक्रमण और एलर्जी के मामले बढ़ रहे हैं. अस्पताल प्रशासन ने इन मरीजों के इलाज के लिए विशेष इंतजाम किए हैं और दवाइयों की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित की गई है.
गलती से भी न बरतें लापरवाही
मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. दीपा सिंह ने बताया कि गर्मियों में आंखों की समस्याएं बढ़ना आम बात है, लेकिन लापरवाही खतरनाक हो सकती है. उन्होंने लोगों से अपील की है कि बिना डॉक्टर की सलाह के मेडिकल स्टोर से दवा न लें और किसी भी तरह की परेशानी होने पर तुरंत नजदीकी अस्पताल या सीएचसी/पीएचसी में जाकर जांच कराएं. उन्होंने बताया कि फिलहाल स्वास्थ्य विभाग पूरी तरह सतर्क है, लेकिन बढ़ती गर्मी के बीच लोगों को भी अपनी सेहत को लेकर जागरूक रहने की जरूरत है, ताकि आंखों की इन समस्याओं से बचा जा सके.
गर्मियों में तेजी से होती हैं आंखों की ये बीमारियां
कंजंक्टिवाइटिस: यह गर्मियों में होने वाली सबसे कॉमन प्रॉब्लम है. यह बैक्टीरियल, वायरल या एलर्जी के कारण हो सकती है. पसीना, धूल और एक-दूसरे के संपर्क में आने से यह तेजी से फैलती है. इसमें आंखें लाल होना, सूजन आना, पानी गिरना, खुजली होना, दर्द, आंखों में पीला या सफेद कीचड़ आना जैसे लक्षण नजर आते हैं.
आंखों में एलर्जी: गर्मियों में लू, धूल के कण, प्रदूषण और परागकण आंखों में एलर्जी पैदा करते हैं. इसकी वजह से आंखों में तेज खुजली, लालिमा, जलन और बार-बार पानी आने की दिक्कत होती है.
ड्राई आई सिंड्रोम: चिलचिलाती धूप, लू और लंबे समय तक एसी बैठने के कारण आंखों की नमी कम हो जाती है और आंसू जल्दी सूख जाते हैं. इस दिक्कत में आंखों में सूखापन महसूस होने, जलन, आंखों में रेत या किरकिरी पड़ने और थकान जैसे लक्षण होते हैं.&amp;nbsp;
स्टाई या गुहेरी: गर्मियों में पसीने और गंदगी के कारण पलकों की ग्रंथियों में बैक्टीरिया का इंफेक्शन हो जाता है, जिससे पलक के किनारे पर छोटी फुंसी निकल आती है. पलक के किनारे पर लाल सूजन, दर्द, चुभन और छूने पर तकलीफ होना इसके लक्षण हैं.
यूवी किरणों से नुकसान: सूरज की अल्ट्रावायलेट (UV) किरणें सीधे आंखों पर पड़ने से कॉर्निया को नुकसान पहुंच सकता है. इसे &#039;आंखों का सनबर्न&#039; भी कह सकते हैं. तेज रोशनी से परेशानी, आंखों में लालिमा, तेज दर्द और पानी आना इसके लक्षण हैं.
कॉर्नियल अल्सर: अगर एलर्जी या ड्राई आई के कारण आंखों को बहुत ज्यादा रगड़ा जाए या कॉन्टैक्ट लेंस साफ न रखे जाएं तो कॉर्निया पर घाव हो सकता है. यह गर्मियों में बैक्टीरिया पनपने के कारण बढ़ सकता है.
गर्मियों में आंखों को बचाने के तरीके

बाहर निकलते समय हमेशा अच्छी क्वालिटी के UV-प्रोटेक्टेड सनग्लासेस पहनें.
आंखों को दिन में 2-3 बार ठंडे और साफ पानी से धोएं.
गंदे हाथों से आंखों को छूने या रगड़ने से बचें.
अगर आप एसी में ज्यादा रहते हैं या कंप्यूटर पर काम करते हैं तो डॉक्टर की सलाह से लुब्रिकेटिंग आई ड्रॉप्स का इस्तेमाल करें.
आई फ्लू या इंफेक्शन होने पर तुरंत डॉक्टर को दिखाएं. खुद से कोई दवा न डालें.
पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं, ताकि शरीर और आंखों में नमी बनी रहे.

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        <pubDate>Mon, 04 May 2026 08:30:11 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Rectal Cancer: रेक्टल कैंसर से ज्यादा क्यों हो रही युवाओं की मौत, लाइफस्टाइल में क्या बदलाव करने की जरूरत?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/rectal-cancer-रेक्टल-कैंसर-से-ज्यादा-क्यों-हो-रही-युवाओं-की-मौत-लाइफस्टाइल-में-क्या-बदलाव-करने-की-जरूरत</link>
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        <description><![CDATA[ Why Rectal Cancer Is Increasing In Young Adults: कई सालों तक कोलोरेक्टल कैंसर को बुजुर्गों की बीमारी माना जाता रहा. हेल्थ सलाह भी ज्यादातर उम्रदराज लोगों की जांच पर ही केंद्रित रही, जबकि युवाओं को कम जोखिम वाला समझा गया. लेकिन अब तस्वीर बदलती नजर आ रही है, और यह बदलाव चिंता बढ़ाने वाला है. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर क्या नया निकला है.&amp;nbsp;
स्टडी में चौंकाने वाले खुलासे
स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ न्यूयॉर्क अपस्टेट मेडिकल यूनिवर्सिटी की मिथिली मेनन पथियिल के नेतृत्व में हुई एक स्टडी, जो Digestive Disease Week (DDW 2026) में पेश की गई, रिपोर्ट में बताया गया कि कम उम्र के लोगों में रेक्टल कैंसर से मौत के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. खासकर 30 के मध्य से 40 की शुरुआत तक की उम्र वाले लोगों में यह बढ़ोतरी ज्यादा देखी गई है.&amp;nbsp;
किस तरह से बदल रहे हैं मौत के आंकड़े?
रिसर्चर ने 1999 से 2023 तक के आंकड़ों का एनालिसिस किया. इसमें 20 से 44 साल के लोगों के रिकॉर्ड को शामिल किया गया। इतने लंबे समय के डेटा से यह समझने में मदद मिली कि मौत के आंकड़े किस तरह बदलते गए. नतीजे काफी चिंताजनक रहे. कुल मिलाकर कोलोरेक्टल कैंसर से मौत के मामले बढ़े हैं, लेकिन रेक्टल कैंसर की वजह से मौत की दर कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ रही है. कई समूहों में यह बढ़ोतरी कोलन कैंसर के मुकाबले दो से तीन गुना ज्यादा पाई गई.&amp;nbsp;
अलग- अलग समुदायों पर स्टडी
स्टडी में यह भी सामने आया कि अलग-अलग समुदायों में असर अलग है. हिस्पैनिक लोगों में रेक्टल कैंसर से मौत के मामले सबसे तेजी से बढ़े, जबकि अमेरिका के पश्चिमी हिस्सों में रहने वाले लोगों में भी यह वृद्धि ज्यादा देखी गई. &amp;nbsp;इससे संकेत मिलता है कि सामाजिक, पर्यावरण या लाइफस्टाइल से जुड़े कारण इसमें भूमिका निभा सकते हैं. भविष्य को समझने के लिए रिसर्चर ने 2035 तक का अनुमान भी लगाया. इसके अनुसार अगर हालात नहीं बदले, तो आने वाले वर्षों में रेक्टल कैंसर से मौत के मामले और बढ़ सकते हैं. खासकर 35 से 44 साल के लोगों में जोखिम सबसे ज्यादा बना रहेगा.
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क्या है सबसे बड़ी वजह?
इस स्टडी में एक अहम वजह देरी से पहचान को माना गया है. कम उम्र के लोग अक्सर कैंसर के लक्षणों को नजरअंदाज कर देते हैं. डॉक्टर भी कई बार युवाओं में कैंसर की संभावना कम मानते हैं. जैसे मलद्वार से खून आना या पेट साफ करने की आदत में बदलाव, इन्हें अक्सर छोटी समस्या समझ लिया जाता है. इसी कारण युवा मरीजों में बीमारी का पता देर से चलता है. जहां बुजुर्गों में लक्षण दिखने के एक महीने के भीतर इलाज शुरू हो जाता है, वहीं युवा कई महीनों तक इंतजार करते रहते हैं. यह देरी स्थिति को ज्यादा गंभीर बना सकती है.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 03 May 2026 20:30:12 +0530</pubDate>
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        <media:keywords>Rectal, Cancer:, रेक्टल, कैंसर, से, ज्यादा, क्यों, हो, रही, युवाओं, की, मौत, लाइफस्टाइल, में, क्या, बदलाव, करने, की, जरूरत</media:keywords>
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        <title>Heart Attack Recovery: रोज नहीं करते ब्रश तो आपके हार्ट पर लगातार बढ़ रहा खतरा, इस स्टडी में हुआ डराने वाला खुलासा</title>
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        <description><![CDATA[ How To Improve Heart Recovery After Heart Attack: ज्यादातर लोग मानते हैं कि ब्रश और फ्लॉस करना सिर्फ दांत साफ रखने और बदबू से बचने के लिए जरूरी है. लेकिन नई स्टडी बताती है कि मुंह की सेहत का दिल पर भी गहरा असर पड़ सकता है, खासकर हार्ट अटैक के बाद. चलिए आपको बताते हैं कि स्टडी में क्या निकला.&amp;nbsp;&amp;nbsp;हार्ट अटैक के बाद रिकवरी मुश्किल
जापान की टोक्यो मेडिकल एंड डेंटल यूनिवर्सिटी की एक स्टडी, जो इंटरनेशनल जर्नल ऑफ ओरल साइंस में प्रकाशित हुई है, उसमें एक चौंकाने वाला संबंध सामने रखा है. इसमें बताया गया है कि मुंह में पाई जाने वाली एक आम बैक्टीरिया हार्ट के ठीक होने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है. यानी अगर मुंह की सेहत खराब है, तो हार्ट अटैक के बाद रिकवरी मुश्किल हो सकती है.
रिकवरी की कोशिश करता है हार्ट 
हार्ट अटैक के बाद शरीर खुद को ठीक करने की कोशिश करता है. इसमें एक अहम प्रक्रिया होती है, जिसे ऑटोफैगी कहा जाता है. इसमें सेल्स अपने अंदर जमा खराब हिस्सों को साफ करके दोबारा इस्तेमाल करती हैं, जिससे दिल को ठीक होने में मदद मिलती है. रिसर्चर ने खास तौर पर पोर्फाइरोमोनस जिंजिवालिस नाम की बैक्टीरिया पर ध्यान दिया. यह बैक्टीरिया मुंह में पाया जाता है और मसूड़ों की बीमारी का कारण बनता है. अगर समय पर इलाज न हो, तो मसूड़े सूज जाते हैं, खून आने लगता है और दांत भी गिर सकते हैं.&amp;nbsp;
क्या है जिंजिपेन?
साइंटिस्ट को पहले से पता था कि यह बैक्टीरिया शरीर के दूसरे हिस्सों में भी पहुंच सकता है, लेकिन यह दिल को कैसे प्रभावित करता है, यह साफ नहीं था. इसे समझने के लिए उन्होंने जिंजिपेन नाम के एक पदार्थ का अध्ययन किया, जो यह बैक्टीरिया बनाता है. &amp;nbsp;जिंजिपेन एक तरह का प्रोटीन होता है, जो शरीर के टिश्यू को नुकसान पहुंचाने में मदद करता है और शरीर की इम्यून सिस्टम से बच निकलता है. रिसर्चर ने यह जानने की कोशिश की कि यह हार्ट के सेल्स पर क्या असर डालता है.
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क्या निकला नतीजा?
इसके लिए उन्होंने बैक्टीरिया का एक ऐसा रूप तैयार किया, जिसमें जिंजिपेन नहीं बनता था. फिर इसकी तुलना सामान्य बैक्टीरिया से की गई. &amp;nbsp;नतीजे साफ थे कि जिन सेल्स पर बिना जिंजिपेन वाला बैक्टीरिया असर कर रहा था, वे ज्यादा स्वस्थ रहीं. जबकि सामान्य बैक्टीरिया के संपर्क में आई सेल्स को ज्यादा नुकसान हुआ. चूहों पर किए गए प्रयोग में भी यही बात सामने आई। जिन चूहों में सामान्य बैक्टीरिया था, उनमें हार्ट अटैक के बाद दिल को ज्यादा नुकसान हुआ. रिसर्च में पाया गया कि जिंजिपेन ऑटोफैगी की प्रक्रिया को बाधित करता है. इससे सेल्स के अंदर खराब पदार्थ जमा होने लगते हैं, जो दिल की मरम्मत को धीमा कर देते हैं. यही वजह है कि दिल को ठीक होने में ज्यादा समय लगता है और नुकसान बढ़ जाता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 03 May 2026 20:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Can Diabetics Eat Watermelon: क्या शुगर के मरीज तरबूज खा सकते हैं, क्या कहते हैं एक्सपर्ट‌?</title>
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        <description><![CDATA[ Does Watermelon Raise Blood Sugar Levels: तरबूज गर्मियों का सबसे पसंदीदा फल है, लेकिन जब बात डायबिटीज की आती है तो लोग अक्सर कंफ्यूज हो जाते हैं कि क्या इसे खाना सुरक्षित है या नहीं? एक्सपर्ट्स का कहना है कि तरबूज पूरी तरह से मना नहीं है, लेकिन मात्रा और तरीके का ध्यान रखना बेहद जरूरी है. चलिए आपको बताते हैं कि इसको खाने के दौरान किन बातों का ध्यान रखना चाहिए.
क्यों शुगर के मरीजों के लिए नुकसानदायक हो सकता है?
हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली बेवसाइट healthline की रिपोर्ट के अनुसार, &amp;nbsp;तरबूज में प्राकृतिक शर्करा होती है, जो ब्लड शुगर को प्रभावित कर सकती है. लेकिन इसका असर इस बात पर निर्भर करता है कि आप कितना खा रहे हैं. उदाहरण के तौर पर, एक कप कटे हुए तरबूज करीब 152 ग्राम &amp;nbsp;में लगभग 9.42 ग्राम शुगर और 11.5 ग्राम कार्बोहाइड्रेट होता है, वहीं, एक बड़ा स्लाइस करीब 286 ग्राम में यह मात्रा और ज्यादा हो जाती है। इसलिए हिस्से पर कंट्रोल रखना जरूरी है.
क्या डायबिटीज के मरीज इसको खा सकते हैं?
अच्छी बात यह है कि सीमित मात्रा में तरबूज संतुलित डाइट का हिस्सा बन सकता है. अमेरिकन डायबिटीज एसोसिएशन भी सलाह देता है कि डायबिटीज के मरीज ताजे फल खा सकते हैं, बशर्ते उनमें अतिरिक्त शुगर न हो. तरबूज में फाइबर के साथ-साथ विटामिन ए, सी, पोटैशियम, मैग्नीशियम, विटामिन बी6, आयरन और कैल्शियम जैसे पोषक तत्व होते हैं, जो शरीर के लिए फायदेमंद हैं.&amp;nbsp;
इसे भी पढ़ें -&amp;nbsp;Watermelon Safety Tips: तरबूज को इंजेक्शन लगाकर तो नहीं किया गया है लाल, खाने से पहले ऐसे करें चेक
आपके लिए हेल्दी&amp;nbsp;
विटामिन ए आंखों की सेहत के लिए अच्छा है, जबकि विटामिन सी इम्यूनिटी बढ़ाने और दिल को स्वस्थ रखने में मदद करता है. तरबूज में मौजूद एंटीऑक्सिडेंट्स शरीर को फ्री रेडिकल्स से बचाने में भी सहायक होते हैं. इसमें लाइकोपीन नाम का तत्व भी होता है, जो दिल से जुड़ी बीमारियों के खतरे को कम करने में मदद कर सकता है और डायबिटीज के मरीजों में हार्ट की बीमारी का खतरा वैसे भी ज्यादा होता है.&amp;nbsp;
हाइड्रेटेड रखता है शरीर 
तरबूज का एक और फायदा इसकी हाई वॉटर कंटेंट है. यह 90 प्रतिशत से ज्यादा पानी से भरपूर होता है, जिससे शरीर हाइड्रेटेड रहता है और पेट भरा हुआ महसूस होता है. इसके साथ ही, इसमें मौजूद फाइबर पाचन को बेहतर बनाने में मदद करता है.&amp;nbsp;
संतुलन में खाने की सलाह
अगर ग्लाइसेमिक इंडेक्स की बात करें, तो तरबूज का जीआई लगभग 72 होता है, जो थोड़ा ज्यादा माना जाता है. लेकिन इसका ग्लाइसेमिक लोड कम होता है, यानी सही मात्रा में खाने पर यह ब्लड शुगर को बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं करता. यही वजह है कि एक्सपर्ट्स इसे पूरी तरह से मना नहीं करते, बल्कि संतुलन में खाने की सलाह देते हैं. डायबिटीज के मरीजों के लिए यह भी जरूरी है कि वे तरबूज को अकेले ज्यादा मात्रा में खाने के बजाय संतुलित भोजन के साथ लें. इसके साथ ही, सूखे फल या जूस की बजाय ताजे फल को ज्यादा प्रिफर करना बेहतर होता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 03 May 2026 08:30:11 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>GLP 1 Drugs Reduce Alcohol Addiction: सिर्फ मोटापा नहीं, शराब की लत भी कम कर सकती हैं GLP&amp;1 दवाएं, रिसर्च में किया गया दावा</title>
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        <description><![CDATA[ 
GLP 1 Drugs Reduce Alcohol Addiction:&amp;nbsp; मोटापा कम करने के लिए इस्तेमाल होने वाली जीएलपी-1 आधारित दवाएं अब एक नए कारण से चर्चा में है. हाल ही में प्रकाशित एक रिसर्च में सामने आया कि यह दवाएं शराब की लत को कम करने में भी मदद कर सकती है. मेडिकल जर्नल द लैंसेट छपी रिसर्च ने मोटापा और शराब की लत दोनों से जूझ रहे लोगों के इलाज को लेकर नई उम्मीद पैदा की है. हालांकि एक्सपर्ट्स का कहना है कि अभी इस दिशा में और बड़े स्तर पर रिसर्च की जरूरत है. ऐसे में चलिए अब आपको बताते हैं कि जीएलपी दवाएं मोटापे के साथ शराब की लत को कैसे कम कर सकती है और रिसर्च में क्या-क्या दावा किया गया है?
क्या कहती है नई रिसर्च?
यह रिसर्च 108 ऐसे लोगों पर की गई जो मोटापे के साथ-साथ अल्कोहल यूज डिसऑर्डर से जूझ रहे थे. इस दौरान सभी लोगों को काउंसलिंग कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी दी गई और उन्हें दो कैटेगरी में बांटा गया. एक कैटेगरी को हफ्ते में एक बार सेमाग्लूटाइड का इंजेक्शन दिया गया, जबकि दूसरे को प्लेसीबो दिया गया. स्टडी की शुरुआत में रिसर्च में शामिल लोगों पिछले 30 दिनों में औसतन 17 दिन भारी शराब पीने के थे. 6 महीने बाद सेमाग्लूटाइड लेने वाले लोगों में यह संख्या घटकर 5 दिन रह गई. जबकि प्लेसीबो समूह में या आंकड़ा करीब 9 दिन रहा. यानी भारी शराब पीने के दिनों में औसतन 12 दिन की कमी दर्ज की गई, जो प्लेसीबो कैटेगरी के मुकाबले लगभग 50 प्रतिशत ज्यादा है. इसके अलावा कुल शराब सेवन की मात्रा में भी गिरावट देखी गई, जहां शुरुआत में लोग औसतन 2200 ग्राम शराब का सेवन कर रहे थे. वहीं 6 महीने बाद यह घटकर सेमाग्लूटाइड समूह में 650 ग्राम और प्लेसीबो समूह में 1175 ग्राम रह गया.
कैसे काम करती है यह दवाएं?
सेमाग्लूटाइड और टिर्जेपाटाइड जैसी GLP-1 दवाएं शरीर में बनने वाले हार्मोन की तरह काम करती है. यह भूख को कम करती है, पेट भरा होने का एहसास बढ़ाती है और पाचन की गति धीमी कर देती है. रिसर्च के अनुसार इन दवाओं का असर दिमाग के उन हिस्सों पर भी पड़ता है, जो भूख और रिवॉर्ड सिस्टम को कंट्रोल करते हैं, जिससे शराब की लत पर भी असर पड़ सकता है.
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शराब की लत वैश्विक स्तर पर भी बड़ी समस्या
अल्कोहल यूज डिसऑर्डर एक गंभीर स्थिति है, जिसमें व्यक्ति चाहकर भी शराब पीना बंद नहीं कर पाता है. वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाईजेशन के अनुसार दुनियाभर में करीब 40 करोड़ लोग इस समस्या से जूझ रहे हैं, जो वैश्विक आबादी का लगभग 7 प्रतिशत है. साल 2019 में शराब के कारण करीब 26 लाख लोगों की मौत हुई. इनमें से 16 लाख मौतें गैर-संचारी बीमारियों, 7 लाख चोटों और तीन लाख संक्रामक बीमारियों से जुड़ी थी. वहीं शराब का सेवन 200 से ज्यादा बीमारियों और स्वास्थ्य स्थितियों से जुड़ा पाया गया. जिनमें लिवर, दिल और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियां शामिल है. वहीं रिपोर्ट के अनुसार अब तक अल्कोहल यूज डिसऑर्डर के इलाज के लिए बहुत कम दवाएं उपलब्ध है. यूएस फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने अब तक सिर्फ तीन दवाओं डिसल्फिराम, ऐकेम्प्रोसेट और नालट्रेक्सोन को मंजूरी दी है. ऐसे में नए और प्रभावी इलाज की जरूरत भी लंबे समय से महसूस की जा रही है. वहीं भारत में भी जीएलपी-1 आधारित दवाएं तेजी से लोकप्रिय हो रही है.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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        <pubDate>Sat, 02 May 2026 16:30:25 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Vitamin Deficiency For Mental Health : डिप्रेशन और एंग्जायटी का छिपा कारण हो सकती है शरीर में इन विटामिन्स की कमी, ऐसे पहचानें संकेत</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/vitamin-deficiency-for-mental-health-डिप्रेशन-और-एंग्जायटी-का-छिपा-कारण-हो-सकती-है-शरीर-में-इन-विटामिन्स-की-कमी-ऐसे-पहचानें-संकेत</link>
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        <description><![CDATA[ Vitamin Deficiency For Mental Health : डिप्रेशन और एंग्जायटी का छिपा कारण हो सकती है शरीर में इन विटामिन्स की कमी, ऐसे पहचानें संकेत ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 02 May 2026 16:30:23 +0530</pubDate>
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        <title>Painkillers In Summer: क्या गर्मियों में आप भी बार&amp;बार ले रहे पेनकिलर, जानें किडनी के लिए यह कितने खतरनाक?</title>
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        <pubDate>Sat, 02 May 2026 00:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>Smoking Side Effects: सालों स्मोकिंग के बाद भी आप क्यों हैं &amp;apos;ठीक&amp;apos;? डॉक्टरों का ये जवाब कर देगा हैरान</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/smoking-side-effects-सालों-स्मोकिंग-के-बाद-भी-आप-क्यों-हैं-ठीक-डॉक्टरों-का-ये-जवाब-कर-देगा-हैरान</link>
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        <description><![CDATA[ Does Smoking Cause Damage Without Symptoms: &quot;मैं सालों से धूम्रपान कर रहा हूं और मुझे कुछ नहीं हुआ&quot;,&amp;nbsp; यह बात सुनने में भले ही सुकून देने वाली लगे, लेकिन डॉक्टर इसे कभी भरोसेमंद संकेत नहीं मानते. शरीर का चुप रहना हमेशा सुरक्षित होने का संकेत नहीं होता. कई बार यह सिर्फ उस समय की शांति होती है, जब अंदर ही अंदर नुकसान धीरे-धीरे बढ़ रहा होता है. चलिए आपको बताते हैं कि एक्सपर्ट क्या कहते हैं.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट
डॉ हरीश भाटिया, जो श्वसन रोग एक्सपर्ट हैं, उन्होंने TOI को बताया कि उनके पास रोज ऐसे लोग आते हैं जो खुद को बिल्कुल ठीक बताते हैं. उन्हें लगता है कि सब सामान्य है, जबकि असल में शरीर के भीतर बदलाव शुरू हो चुके होते हैं. &amp;nbsp;उनका कहना है कि फेफड़े शुरुआती दौर में शिकायत नहीं करते. वे हवा को साफ करते हैं, छोटे-छोटे नुकसान की मरम्मत करते हैं और लंबे समय तक दबाव झेलते रहते हैं. &amp;nbsp;लेकिन रोज-रोज धूम्रपान से जो जहरीले तत्व शरीर में जाते हैं, उनका असर धीरे-धीरे जमा होता रहता है.&amp;nbsp;
समस्या यह है कि जब शरीर किसी स्थिति के साथ तालमेल बैठा लेता है, तो हमें लगता है सब ठीक है. &amp;nbsp;जैसे किसी शोर के साथ धीरे-धीरे आदत हो जाती है, वैसे ही शरीर भी इस नुकसान को सहन करने लगता है, &amp;nbsp;लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि नुकसान रुक गया है.&amp;nbsp;
क्या ठीक लगने से सबकुछ ठीक होता है
डॉ भाटिया के अनुसार, ठीक महसूस करना इस बात का संकेत नहीं है कि आप सुरक्षित हैं, बल्कि यह दिखाता है कि शरीर अभी तक खुद को संभाल रहा है. अंदर ही अंदर कई बदलाव होते रहते हैं, सांस की नलियां धीरे-धीरे संकरी होने लगती हैं, लंग्स की लचक कम हो जाती है, ब्लड वेसल्स सख्त होने लगती हैं और शरीर में ऑक्सीजन का फ्लो प्रभावित होता है. यह सब बिना किसी दर्द या स्पष्ट संकेत के सालों तक चलता रहता है.
धीरे- धीरे विकसित होती है दिक्कत
डॉ पंकज खटाना, जो सामान्य रोग एक्सपर्ट हैं, बताते हैं कि धूम्रपान से जुड़ी बीमारियां अचानक नहीं आतीं, बल्कि धीरे-धीरे विकसित होती हैं. इसमें सांस से जुड़ी पुरानी बीमारी, लंग्स का कैंसर और दिल की बीमारी शामिल हैं. अक्सर इनका पता तब चलता है जब शरीर पहले ही काफी नुकसान झेल चुका होता है. &amp;nbsp;वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन और भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट्स भी बताती हैं कि तंबाकू से जुड़ी बीमारियां रोकी जा सकने वाली मौतों का बड़ा कारण हैं.
इसे भी पढ़ें -&amp;nbsp;Heart Fights Cancer: दिल धड़क रहा है यानी कैंसर से लड़ रहा है, नई स्टडी से जागी उम्मीद
सबसे खतरनाक बात यह है कि कई बार पहला संकेत ही गंभीर होता है, जैसे दिल का दौरा या लकवा. डॉ खटाना कहते हैं कि जब तक लक्षण सामने आते हैं, तब तक शरीर काफी नुकसान झेल चुका होता है. यही वजह है कि मैं ठीक हूं वाली सोच जोखिम भरी हो सकती है.&amp;nbsp;
किन चीजों से मिलता है फायदा
अच्छी बात यह है कि धूम्रपान छोड़ने से किसी भी उम्र में फायदा मिलता है. &amp;nbsp;कुछ ही दिनों में दिल की धड़कन और रक्तचाप सामान्य होने लगते हैं, महीनों में लंग्स की काम करने की क्षमता सुधरती है और समय के साथ गंभीर बीमारियों का खतरा भी कम होता है.
इसे भी पढ़ें -Pregnancy Care in Summer: बढ़ती गर्मी में प्रेग्नेंट महिलाओं को हो सकती हैं कई दिक्कतें, ऐसें रखें अपना ख्याल
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 02 May 2026 00:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>Healthy Diet After 60 : 60 साल के बाद कैसे रखें दिल&amp;किडनी और लिवर का ख्याल? इस डाइट से 100 साल होगी उम्र</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/healthy-diet-after-60-60-साल-के-बाद-कैसे-रखें-दिल-किडनी-और-लिवर-का-ख्याल-इस-डाइट-से-100-साल-होगी-उम्र</link>
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        <description><![CDATA[ Healthy Diet After 60: जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, शरीर की जरूरतें बदलने लगती हैं. 60 साल के बाद शरीर पहले जितनी तेजी से काम नहीं करता, पाचन धीमा हो जाता है, मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं और दिल, किडनी और लिवर पर ज्यादा दबाव पड़ने लगता है. इस उम्र में सही खानपान और अच्छी लाइफस्टाइल अपनाना बहुत जरूरी हो जाता है. अगर आप बैलेंस डाइट लेते हैं और थोड़ी-बहुत नियमित एक्सरसाइज करते हैं, तो न सिर्फ बीमारियों से बच सकते हैं बल्कि लंबी और हेल्दी लाइफ भी जी सकते हैं. यहां तक कि 90 या 100 साल तक भी, तो आइए जानते हैं कि 60 साल के बाद दिल-किडनी और लिवर का ख्याल कैसे रखें और कौन सी डाइट सबसे बेहतर होती है?
60 के बाद शरीर में क्या बदलाव आते हैं
उम्र बढ़ने के साथ शरीर में कई बदलाव होते हैं. जैसे मेटाबॉलिज्म धीमी हो जाती है. भूख कम लग सकती है. मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं. शरीर में पानी की कमी जल्दी हो सकती है. दिल और ब्लड प्रेशर की समस्याएं बढ़ सकती हैं. कोलेस्ट्रॉल और शुगर बढ़ने का खतरा रहता है. इसी वजह से बुजुर्गों को कम लेकिन पोषण से भरपूर खाना खाने की सलाह दी जाती है.&amp;nbsp;
60 साल के बाद दिल का ख्याल कैसे रखें?
दिल को स्वस्थ रखने के लिए सबसे जरूरी सही खानपान और नियमित एक्टिविटी है.वहीं दिल को हेल्दी रखने के लिए तला-भुना और बाहर का खाना कम करें. नमक कम खाएं. एक्सट्रा फैट जैसे घी, बटर, फास्ट फूड कम करें. साथ ही ओमेगा-3 फैटी एसिड वाला खाना खाएं. जैसे मछली, अखरोट, अलसी के बीज, ओलिव ऑयल, फल और सब्जियां, साबुत अनाज. इसके अलावा रोज 20-30 मिनट टहलना दिल के लिए बहुत फायदेमंद है और धूम्रपान पूरी तरह छोड़ दें.&amp;nbsp;
60 साल के बाद किडनी को कैसे सुरक्षित रखें?
&amp;nbsp;किडनी को स्वस्थ रखने के लिए सबसे जरूरी है कि आप अपने खानपान और लाइफस्टाइल का ध्यान रखें. किडनी शरीर से गंदगी और अतिरिक्त पानी को बाहर निकालने का काम करती है. ऐसे में ज्यादा नमक और प्रोसेस्ड फूड जैसे पैकेट वाले या बाहर के खाने से बचना चाहिए. रोजाना पर्याप्त मात्रा में पानी पीना जरूरी है, लगभग 7-10 गिलास. साथ ही बिना डॉक्टर की सलाह के कोई भी दवा नहीं लेनी चाहिए, क्योंकि कुछ दवाएं किडनी को नुकसान पहुंचा सकती हैं. साथ ही डायबिटीज और ब्लड प्रेशर को कंट्रोल में रखना बहुत जरूरी. इसके अलावा अच्छी डाइट में ताजे फल जैसे सेब और नाशपाती, हरी सब्जियां, हल्का और घर का बना खाना शामिल करना चाहिए.&amp;nbsp;
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लिवर को कैसे स्वस्थ रखें?
लिवर शरीर का फिल्टर है, जो टॉक्सिन्स को साफ करता है. लिवर को हेल्दी रखने के लिए शराब से पूरी तरह दूरी रखें. बहुत ज्यादा मीठा और फैटी खाना कम करें और वजन कंट्रोल में रखें. लिवर के लिए अच्छे फूड्स जैसे हरी सब्जियां (पालक, मेथी), हल्दी वाला दूध, नींबू पानी, दालें और बीन्स, पर्याप्त पानी अपने रूटीन में शामिल करें.&amp;nbsp;
60 के बाद कैसा होना चाहिए डेली डाइट प्लान?
1. 60 साल के बाद डेली डाइट प्लान में सुबह की शुरुआत गुनगुने पानी या नींबू पानी से करनी चाहिए, इसके बाद हल्का नाश्ता जैसे दलिया, ओट्स या ताजे फल लेना अच्छा रहता है जिससे दिन की एनर्जी सही तरीके से मिल सके.
2. दोपहर के खाने में 2-3 रोटी , दाल या पनीर, हरी सब्जियां और सलाद शामिल करना चाहिए. जिससे प्रोटीन, फाइबर और विटामिन का संतुलन बना रहे.
3. शाम के समय हल्का नाश्ता जैसे फल, भुना चना या थोड़े नट्स लेना बेहतर होता है जिससे भूख भी कंट्रोल रहे और तला-भुना खाने का मन कम हो.
4. रात का खाना हल्का रखना चाहिए, जिसमें कम तेल और कम मसाले वाला खाना हो, जिससे पाचन आसानी से हो सके और नींद भी अच्छी आए.&amp;nbsp;
ये भी पढ़ें- Sugarcane Juice Risk: गर्मी में गन्ने का जूस पीना आपके लिए कितना सुरक्षित? डॉक्टर ने बताएं इसके छिपे खतरे
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 01 May 2026 08:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Healthy, Diet, After, साल, के, बाद, कैसे, रखें, दिल-किडनी, और, लिवर, का, ख्याल, इस, डाइट, से, 100, साल, होगी, उम्र</media:keywords>
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        <title>Summer Health Tips:  क्या गर्मियों में आपको भी कम लगती है भूख, जानें ऐसा होना कब सही और कब खतरनाक?</title>
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        <description><![CDATA[ Summer Health Tips:&amp;nbsp; गर्मियों का मौसम आते ही कई लोगों को यह महसूस होता है कि उनकी भूख पहले की तुलना में कम हो गई है. यह बदलाव अक्सर चिंता का कारण बनता है, लेकिन हर बार ऐसा होना गलत नहीं होता. &amp;nbsp;दरअसल, एक्सपर्ट्स के अनुसार, तेज गर्मी में शरीर खुद को ठंडा रखने के लिए अपने काम करने के तरीके में बदलाव करता है. इसी वजह से भूख कम लगना एक सामान्य प्रक्रिया हो सकती है. शरीर का मेटाबॉलिज्म थोड़ा धीमा हो जाता है ताकि ज्यादा गर्मी पैदा न हो, जिससे खाने की इच्छा भी कम हो जाती है.&amp;nbsp;
&amp;ldquo;गर्मी से निपटने के लिए शरीर भूख को धीमा कर देता है&amp;rdquo;: एक्सपर्ट की राय
डॉक्टर के अनुसार, &amp;ldquo;the body slows hunger to beat the heat&amp;rdquo; यानी शरीर गर्मी से बचने के लिए भूख को खुद ही कम कर देता है. जब बाहर का तापमान ज्यादा होता है, तो शरीर पाचन प्रक्रिया को धीमा कर देता है क्योंकि खाना पचाने में ऊर्जा लगती है और इससे शरीर में गर्मी बढ़ती है. यही कारण है कि गर्मियों में हल्का और कम खाना खाने का मन करता है. यह शरीर का एक तरह का एडजस्टमेंट है, जिससे वह खुद को ओवरहीट होने से बचाता है.&amp;nbsp;
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कब भूख कम लगना सामान्य माना जाता है?
अगर आपको गर्मियों में हल्की भूख लग रही है लेकिन आप सामान्य रूप से पानी पी रहे हैं, एक्टिव हैं और कोई कमजोरी महसूस नहीं हो रही, तो यह स्थिति सामान्य मानी जाती है. ऐसे समय में लोग अक्सर फल, सलाद, दही और लिक्विड चीजें ज्यादा पसंद करते हैं. साथ ही शरीर खुद ही ऐसे फूड की मांग करता है जो हल्के हों और आसानी से पच जाएं. यह संकेत है कि शरीर मौसम के हिसाब से खुद को ढाल लेता है और इसमें घबराने की जरूरत नहीं होती.&amp;nbsp;
कब बन सकता है यह खतरे का संकेत?
हालांकि हर बार भूख कम लगना सही नहीं होता. अगर लंबे समय तक भूख न लगे, तेजी से वजन घटने लगे, कमजोरी, चक्कर या डिहाइड्रेशन महसूस हो, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. साथ ही यह किसी अंदरूनी समस्या या बीमारी का संकेत हो सकता है. खासकर अगर भूख में कमी के साथ उल्टी, बुखार या लगातार थकान भी हो रही हो, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी है. यह स्थिति सिर्फ मौसम का असर नहीं बल्कि स्वास्थ्य से जुड़ी गंभीर समस्या भी हो सकती है.
खुद को कैसे रखें सुरक्षित और हेल्दी?
गर्मियों में भूख कम लगने पर जबरदस्ती ज्यादा खाने के बजाय संतुलित और हल्का आहार लेना बेहतर होता है. शरीर को हाइड्रेट रखना सबसे जरूरी है, इसलिए पानी, नारियल पानी और जूस का सेवन बढ़ाना चाहिए. साथ ही, छोटे-छोटे मील्स लेना फायदेमंद होता है. वही अगर आपको अपनी स्थिति सामान्य से अलग लग रही है, तो लापरवाही न करें और समय रहते मेडिकल सलाह लें. सही खानपान और सावधानी से आप गर्मियों में भी अपनी सेहत को बेहतर बनाए रख सकते हैं.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Fri, 01 May 2026 08:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Pesticides Exposure Cancer Risk : पेस्टिसाइड्स के लगातार संपर्क से बढ़ सकता है 150% तक कैंसर का खतरा, नई स्टडी का दावा, जानें क्या है वजह</title>
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        <description><![CDATA[ Pesticides Exposure Cancer Risk : हम अपनी डेली लाइफ में जो खाना खाते हैं, जो पानी पीते हैं और जिस हवा में सांस लेते हैं, उसमें कई तरह के केमिकल मौजूद हो सकते हैं, इन्हीं में से एक जरूरी केमिकल समूह कीटनाशक यानी पेस्टिसाइड्स है, जिनका यूज खेती में फसलों को कीड़ों और बीमारियों से बचाने के लिए किया जाता है.&amp;nbsp;
हाल ही में एक नई अंतरराष्ट्रीय रिसर्च ने चिंता बढ़ा दी है. इस अध्ययन के अनुसार, जिन इलाकों में पेस्टिसाइड्स का ज्यादा यूज होता है, वहां रहने वाले लोगों में कुछ प्रकार के कैंसर होने का खतरा 150 प्रतिशत तक बढ़ सकता है. यह रिपोर्ट पर्यावरणीय स्वास्थ्य और रसायनों के प्रभाव को लेकर एक गंभीर चेतावनी मानी जा रही है.&amp;nbsp;
नई स्टडी क्या कहती है?
यह रिसर्च जर्नल Nature Health में प्रकाशित हुई है. इसमें बताया गया है कि लोग एक साथ सिर्फ एक नहीं कई पेस्टिसाइड्स के संपर्क में रहते हैं. पहले के अध्ययन सिर्फ एक-एक केमिकल को अलग-अलग देखकर किए जाते थे, लेकिन असली लाइफ में हम मिक्सचर एक्सपोजर यानी कई रसायनों के संयुक्त प्रभाव में रहते हैं. इस अध्ययन ने इस स्थिति को ध्यान में रखकर विश्लेषण किया है, जो इसे पहले की रिसर्च से ज्यादा जरूरी बनाता है. इस अध्ययन के लिए दक्षिण अमेरिकी देश पेरू को चुना गया.&amp;nbsp;
पेरू को क्यों चुना गया?
दक्षिण अमेरिकी देश पेरू में कृषि बड़े पैमाने पर होती है. अलग-अलग तरह के पर्यावरणीय क्षेत्र मौजूद हैं. सामाजिक और आर्थिक असमानताएं ज्यादा हैं. इसलिए इस अध्ययन के लिए &amp;nbsp;पेरू को चुना गया. ऐसे में यहां रिसर्च में पाया गया कि ग्रामीण और आदिवासी समुदाय सबसे ज्यादा प्रभावित हैं. कई लोगों पर एक साथ लगभग 12 अलग-अलग पेस्टिसाइड्स का असर पाया गया. ये स्तर कई जगहों पर काफी ज्यादा था.&amp;nbsp;
रिसर्च में कैसे किया गया विश्लेषण?
वैज्ञानिकों ने 31 सामान्य रूप से इस्तेमाल होने वाले पेस्टिसाइड्स का अध्ययन किया. 2014 से 2019 तक उनके फैलाव को ट्रैक किया और 2007 से 2020 तक 1.5 लाख से ज्यादा कैंसर मरीजों के स्वास्थ्य डेटा से तुलना की, रिसर्च में पाया गया कि जिन क्षेत्रों में पेस्टिसाइड्स का स्तर ज्यादा था, वहां कैंसर के मामले भी ज्यादा थे. खास बात यह है कि जिन पेस्टिसाइड्स का अध्ययन किया गया, वे अभी तक WHO के तहत कैंसर पैदा करने वाले (carcinogenic) नहीं माने गए हैं. इसके बावजूद उनके संयुक्त प्रभाव से स्वास्थ्य पर गंभीर असर देखा गया.&amp;nbsp;
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शरीर पर क्या असर होता है?
रिसर्च के अनुसार, पेस्टिसाइड्स शरीर में धीरे-धीरे असर डालते हैं. यह कोशिकाओं (cells) के सामान्य कामों में बाधा डालते हैं. लंबे समय में शरीर की इम्यूनिटी कमजोर कर सकते हैं. इससे लिवर सबसे ज्यादा प्रभावित होता है. यह बदलाव तुरंत दिखाई नहीं देते, लेकिन समय के साथ गंभीर बीमारियों का कारण बन सकते हैं. आज के समय में रसायनों की सुरक्षा जांच आमतौर पर एक-एक केमिकल को अलग-अलग जांचती है और उसके लिए सुरक्षित सीमा तय करती है, लेकिन समस्या यह है कि असली जिंदगी में लोग एक साथ कई रसायनों के संपर्क में रहते हैं.&amp;nbsp;
रिसर्च में और क्या-क्या बताया गया?
रिसर्च यह भी बताती है कि एल नीनो (El Ni&amp;ntilde;o) जैसे जलवायु बदलाव पेस्टिसाइड्स के उपयोग और उनके फैलाव को प्रभावित कर सकते हैं. इससे पर्यावरण में इन रसायनों की मात्रा और बढ़ सकती है. हालांकि यह अध्ययन पेरू पर आधारित है, लेकिन इसके निष्कर्ष दुनिया भर पर लागू हो सकते हैं क्योंकि कई देशों में बड़े पैमाने पर खेती होती है, पेस्टिसाइड्स का उपयोग सामान्य है. नियम और निगरानी हर जगह एक जैसी नहीं है. इसलिए यह एक वैश्विक स्वास्थ्य चिंता बन सकती है.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 30 Apr 2026 20:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Summer Migraine Problem: गर्मियों में क्यों बढ़ जाते हैं माइग्रेन के मामले, इससे बचने के लिए क्या करें?</title>
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        <description><![CDATA[ 
Summer Migraine Problem: जैसे-जैसे तापमान बढ़ता है और लाइफस्टाइल बदलता है, वैसे-वैसे माइग्रेन से जूझ रहे लोगों की परेशानी भी बढ़ने लगती है. डॉक्टर के अनुसार माइग्रेन साल भर रहने वाली न्यूरोलॉजिकल समस्या है. लेकिन गर्मियों में इसके अटैक की संख्या और तीव्रता दोनों बढ़ जाती है. इसका सीधा कारण गर्मी नहीं, बल्कि इस मौसम में बढ़ने वाले ट्रिगर्स होते हैं. न्यूरोलॉजिस्ट के अनुसार जिन लोगों को पहले से माइग्रेन की समस्या है, उनमें गर्मियों के दौरान अटैक ज्यादा बार आते हैं. इसकी वजह पर्यावरण और लाइफस्टाइल से जुड़े ऐसे कारक हैं, जिन्हें इस मौसम में कंट्रोल करना मुश्किल हो जाता है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि गर्मियों में माइग्रेन के मामले क्यों बढ़ जाते हैं और इससे बचने के लिए आप क्या कर सकते हैं?
डिहाइड्रेशन बनता है बड़ा कारण
गर्मी के मौसम में पसीने के जरिए ज्यादा पानी निकलता है, जिससे डिहाइड्रेशन होता है जो माइग्रेन ट्रिगर करने का सबसे बड़ा कारण माना जाता है. शरीर में पानी की कमी से ब्लड फ्लो और ब्रेन फंक्शन प्रभावित होते हैं, जिससे सिर दर्द शुरू हो सकता है. हल्की पानी की कमी भी संवेदनशील लोगों में अटैक का कारण बन सकती है.
तेज धूप और रोशनी बढ़ाती है परेशानी
तेज धूप और उसकी चमक माइग्रेन के मरीजों के लिए परेशानी बढ़ा सकती है. लंबे समय तक धूप में रहने से आंखों और दिमाग पर दबाव पड़ता है, जिससे सिर दर्द शुरू हो सकता है. खासकर दोपहर के समय बाहर रहना खतरे को और बढ़ा देता है.
बदलती लाइफस्टाइल भी है जिम्मेदार
गर्मियों में लोगों की दिनचर्या अक्सर बदल जाती है. देर रात तक जागना, समय पर खाना न खाना, यात्रा और थकान यह सब माइग्रेन को ट्रिगर करते हैं. नींद की कमी, खाली पेट रहना और ज्यादा थकावट अटैक को और गंभीर बना सकते हैं.
शहरों में रहने वाले लोगों में खतरा ज्यादा
शहरी इलाकों में रहने वाले लोगों को माइग्रेन का खतरा और ज्यादा हो सकता है. कंक्रीट और प्रदूषण के कारण शहरों में तापमान ज्यादा रहता है, जिससे शरीर पर एक्स्ट्रा दबाव पड़ता है और ट्रिगर्स तेज हो जाते हैं. वहीं माइग्रेन केवल साधारण सिर दर्द नहीं होता है, इसमें सिर के एक तरफ तेज धड़कता हुआ दर्द, मतली, उल्टी, तेज रोशनी और आवाज से परेशानी, चक्कर और थकान जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं. कई मामलों में यह दर्द कई घंटे से लेकर 2 से 3 दिन तक रह सकता है.
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बचाव के लिए क्या करें?
गर्मियों में माइग्रेन से बचाव के लिए आप कोशिश करें कि दिनभर पर्याप्त मात्रा में पानी पिए. धूप में निकलने से बचें, खासकर दोपहर के समय में. वहीं बाहर जाते समय चश्मा या सिर ढक कर रखें. समय पर संतुलित भोजन करें, रोजाना 7 से 8 घंटे की नींद लें और ज्यादा थकान और शरीर को ओवरहीट होने से बचाएं. इसके अलावा अगर माइग्रेन के अटैक पहले से ज्यादा बार आने लगे, दर्द ज्यादा तेज हो जाए या रोजमर्रा की जिंदगी पर असर डालने लगे तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है.
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        <pubDate>Thu, 30 Apr 2026 04:30:11 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Biryani and Watermelon Myth: क्या बिरयानी के बाद तरबूज खाना जानलेवा है? जानिए&amp; क्या कहते हैं डॉक्टर्स</title>
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        <description><![CDATA[ Biryani and Watermelon Myth: मुंबई से सामने आई एक दर्दनाक घटना ने लोगों के मन में कई सवाल खड़े कर दिए हैं. दरअसल एक ही परिवार के चार लोगों की बिरयानी खाने से अचानक तबीयत बिगड़ी जिसके बाद उनकी मौत हो गई. बताया जा रहा है कि परिवार के सदस्यों ने बिरयानी खाने के बाद तरबूज खाया था, जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था. लेकिन इस घटना के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या बिरयानी खाने के बाद तरबूज खाना जानलेवा हो सकता है. हालांकि कई डॉक्टर भी इसे लेकर अपनी-अपनी राय बता रहे हैं. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि क्या बिरयानी खाने के बाद तरबूज जानलेवा है, इसे लेकर डॉक्टर क्या कहते हैं. क्या बिरयानी और तरबूज साथ खाने से हो सकती है मौत?मेडिकल एक्सपर्ट्स के अनुसार बिरयानी और तरबूज जैसे फूड आइटम्स को साथ या थोड़े अंतराल में खाने से सीधे मौत होना संभव नहीं है. डॉक्टर Ishwar gilada का कहना है कि यह दोनों अलग-अलग तरह के फूड है, जिनका पाचन समय अलग-अलग हो सकता है. लेकिन इसे तुरंत जानलेवा स्थिति बनना सामान्य नहीं है. डॉक्टर के अनुसार इस तरह के मामलों में सबसे पहले शक फूड प्वाइजनिंग पर जाता है. अगर खाना या फल लंबे समय तक खुले में रखा हो या बासी हो जाए तो उसमें खतरनाक बैक्टीरिया हो सकते हैं. स्टैफिलोकोकस, साल्मोनेला और ई. कोलाई जैसे बैक्टीरिया खाने के जरिए शरीर में पहुंचकर उल्टी, दस्त और गंभीर संक्रमण का कारण बनते हैं. कुछ मामलों में यह स्थिति से सेप्सिस तक पहुंच सकती है जो जानलेवा हो सकती है. क्या फूड प्वाइजनिंग से तुरंत हो सकती है मौत?डॉक्टर बताते हैं कि फूड प्वाइजनिंग के बाद शरीर में लक्षण विकसित होने और स्थिति गंभीर होने में आमतौर पर कुछ समय लगता है. अगर व्यक्ति पहले से हेल्दी हो तो इंफेक्शन से लड़ने की कोशिश करता है. हालांकि लगातार उल्टी-दस्त होने पर शरीर में पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी हो जाती है, जिससे ब्लड प्रेशर अचानक गिर सकता है और शॉक की स्थिति बन सकती है. यही स्थिति कुछ मामले में खतरनाक साबित हो सकती है. खाने के कांबिनेशन को लेकर क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि नॉनवेज और पानी से भरपूर फलों का पाचन समय अलग होता है. तरबूज जल्दी पचता है, जबकि मांस को पचाने में ज्यादा समय लगता है. ऐसे में दोनों साथ खाने पर पाचन संबंधी दिक्कतें हो सकती है, लेकिन इसे सीधे मौत की वजह नहीं माना जा सकता है. ये भी पढ़ें-प्रेग्नेंसी के टाइम मलेरिया तो हो जाएं सावधान, बन सकता है प्रीमैच्योर डिलीवरी की वजह&amp;nbsp;
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एक्सपर्ट्स ने कहा जांच के बाद ही साफ होगी तस्वीर इंफेक्शन स्पेशलिस्ट डॉ. ईश्वर गिलाडा के अनुसार इस तरह की घटना में असली कारण जानना आसान नहीं होता है. उन्होंने कहा कि अगर एक ही खाना कई लोगों ने खाया और सभी प्रभावित नहीं हुए तो यह देखना जरूरी है कि पीड़ितों ने अलग से क्या खाया या कोई अन्य वजह तो नहीं थी. उनके अनुसार सड़ा हुआ खाना बैक्टीरियल इन्फेक्शन का कारण बन सकता है, लेकिन कुछ मामलों में बाहरी कारण जैसे किसी केमिकल या टॉक्सिन की मिलावट की आशंकाओं से भी इनकार नहीं किया जा सकता है. उन्होंने साफ कहा की मौत की असली वजह पोस्टमार्टम और फोरेंसिक जांच के बाद ही सामने आएगी. डॉक्टर बताते हैं कि कई बार तरबूज में कलर लाने के लिए कोई केमिकल इंजेक्ट किया जाता है. अगर वह केमिकल कॉन्टैमिनेटेड है या फिर किसी ने फौल प्ले करके उसमें टॉक्सिन डाला है या कुछ जहर डाला है तो इससे तरबूज खाने वालों के शरीर में जहर फैल सकता है. लेकिन चारों लोगों की मौत कैसे हुई यह जानकारी पोस्टमार्टम के बाद ही पूरी तरह स्पष्ट हो पाएगी.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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        <pubDate>Tue, 28 Apr 2026 08:30:04 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Breast Cancer: जांच में देरी बन रही खतरा! देश में तेजी से बढ़ रहे ब्रेस्ट कैंसर के मामले, स्टडी में अहम खुलासा</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/breast-cancer-जांच-में-देरी-बन-रही-खतरा-देश-में-तेजी-से-बढ़-रहे-ब्रेस्ट-कैंसर-के-मामले-स्टडी-में-अहम-खुलासा</link>
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        <description><![CDATA[ Breast Cancer:&amp;nbsp;ब्रेस्ट कैंसर आज के समय में महिलाओं में होने वाली सबसे आम बीमारियों में से एक है. यह तब शुरू होता है जब स्तन की कुछ कोशिकाएं जरूरत से ज्यादा तेजी से बढ़ने लग जाती हैं और एक गांठ बना लेती हैं. अगर इसे शुरुआती समय में पहचान लिया जाए, तो इसका इलाज काफी हद तक संभव होता है. लेकिन समस्या तब गंभीर हो जाती है, जब यह कैंसर शरीर के दूसरे हिस्सों में फैलने लगता है. इस प्रक्रिया को मेटास्टेसिस (Metastasis) कहा जाता है. इसमें कैंसर की कोशिकाएं खून के जरिए शरीर के अन्य अंगों जैसे हड्डियों, फेफड़ों या लिवर तक पहुंच सकती हैं.
जब तक महिलाएं इसे दिखाने अस्पताल तक पहुंचती हैं, तब तक यह उनके पूरे शरीर में फैल चुका होता है, जिसे डॉक्टर&#039;डी नोवो मेटास्टेटिक डिजीज&#039; (De Novo Metastatic Disease) कहते हैं. एक बड़ी हॉस्पिटल आधारित स्टडी में यह बात सामने आई है, जो न केवल हमें कैंसर के बारे में बल्कि पूरे भारतीय हेल्थकेयर सिस्टम की स्थिति के बारे में भी बताती है.
क्या है स्टडी?
नेशनल कैंसर रजिस्ट्री के हॉस्पिटल बेस्ड कैंसर रजिस्ट्री के 76 हजार ब्रेस्ट कैंसर मरीजों के डेटा के आधार पर इस रिसर्च को किया गया है. इसमें यह सामने आया कि लगभग 13 प्रतिशत महिलाएं मेटास्टेटिक ब्रेस्ट कैंसर का शिकार हैं, जबकि अमेरिका में यह आंकड़ा करीब 6 प्रतिशत है. इसके अलावा, स्टडी में यह भी पाया गया कि भारत में कई महिलाएं स्टेज 3 या स्टेज 4 पर जाकर ही इलाज करवाती हैं, जिससे इलाज जटिल और महंगा हो जाता है. देर से जांच, जागरूकता की कमी और नियमित स्क्रीनिंग का अभाव इसके बड़े कारण माने गए हैं.
क्या होता है कारण?
इस स्टडी से यह बात स्पष्ट हुई है कि उम्र का मेटास्टेटिक बीमारी से सीधा संबंध नहीं होता और न ही पहले से मौजूद बीमारियां जैसे डायबिटीज या हाइपरटेंशन इसके मुख्य कारण हैं. असली कारण ट्यूमर की प्रकृति होती है. ट्यूमर कितना बड़ा है, कितना आक्रामक है और शरीर में कितनी दूर तक फैल चुका है, यही सब बातें बीमारी की गंभीरता तय करती हैं.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?
अपोलो एथेना वुमन कैंसर सेंटर की लीड डॉ. गीता कडायप्रथ बताती हैं कि ब्रेस्ट कैंसर मुख्य रूप से दो तरीकों से फैलता है. पहला, लिम्फ नोड्स के जरिए, जो ब्रेस्ट से होते हुए बगल, गर्दन और छाती तक संक्रमण फैलाते हैं. दूसरा, ब्लडस्ट्रीम के जरिए. ब्रेस्ट में ब्लड वेसल्स का बड़ा नेटवर्क होता है, जो कैंसर कोशिकाओं को हड्डियों, स्पाइन और पेल्विस तक पहुंचा देता है. उन्होंने आगे बताया कि कैंसर का फैलाव उसके प्रकार पर भी निर्भर करता है. हार्मोन सेंसिटिव कैंसर आमतौर पर हड्डियों में तेजी से फैलता है, जबकि ट्रिपल नेगेटिव ब्रेस्ट कैंसर ज्यादा आक्रामक होता है और अक्सर दिमाग और फेफड़ों तक फैल सकता है, साथ ही लीवर को भी प्रभावित कर सकता है.
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अस्पताल का चुनाव
स्टडी के इस पहलू ने एक गंभीर तस्वीर सामने रखी है. जिन महिलाओं का इलाज प्राइवेट NGO द्वारा संचालित अस्पतालों में हुआ, उनमें मेटास्टेसिस का खतरा अपेक्षाकृत कम पाया गया. वहीं, सरकारी या पब्लिक कैंसर सेंटर में इलाज कराने वाली महिलाओं में यह खतरा ज्यादा देखा गया. यह अंतर कई कारणों से हो सकता है, जैसे जांच में देरी, सुविधाओं की कमी, लंबी कतारें और विशेषज्ञ डॉक्टरों तक समय पर पहुंच न होना. यह भारत के हेल्थकेयर सिस्टम की एक कड़वी सच्चाई को उजागर करता है, जहां समय पर इलाज और जागरूकता की कमी अब भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है.
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        <pubDate>Sun, 26 Apr 2026 12:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>Healthy Diet Tips: कमजोर पेट के लिए बेहतरीन हैं आसानी से पचने वाली ये 5 दालें, नहीं होगी गैस और भारीपन की समस्या</title>
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        <description><![CDATA[ Healthy Diet Tips: कमजोर पेट के लिए बेहतरीन हैं आसानी से पचने वाली ये 5 दालें, नहीं होगी गैस और भारीपन की समस्या ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 26 Apr 2026 12:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>IVF Success Factors: मां बनने की राह में &amp;apos;स्ट्रेस&amp;apos; बड़ा रोड़ा... तनाव&amp;एंग्जायटी से घट रहा IVF का सक्सेस रेट</title>
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        <description><![CDATA[ IVF Success Factors: मां बनने का सपना हर महिला के लिए खास होता है, लेकिन जब यह सपना आसानी से पूरा नहीं होता तो IVF जैसे इलाज उम्मीद की एक नई किरण बनकर सामने आती है. इसी बीच एक नई स्टडी ने इस सफर से जुड़ी एक अहम सच्चाई को सामने लाया है. रिपोर्ट के अनुसार IVF ट्रीटमेंट के दौरान महिलाओं का मानसिक स्वास्थ्य और भावनात्मक स्वास्थ्य यानी उनका स्ट्रेस और एंग्जायटी लेवल, इसके परिणामों को प्रभावित कर सकता है. वही जिन महिलाओं में तनाव कम पाया गया, उनमें IVF के सफल होने की संभावना अधिक देखी गई है. इससे साफ होता है कि इलाज के साथ-साथ मानसिक संतुलन भी बेहद जरूरी है.
स्टडी में क्या सामने आया?
पुणे के एक IVF सेंटर में की गई इस स्टडी में लगभग 120 महिलाओं को शामिल किया गया. इस दौरान उनके स्ट्रेस और एंग्जायटी लेवल को मापा गया और फिर IVF के नतीजों से तुलना किया गया. आंकड़ों के अनुसार करीब 40 प्रतिशत महिलाओं का IVF सफल रहा. इन महिलाओं का एंग्जायटी स्कोर औसतन 5.5 था, जबकि जिनका IVF सफल नहीं हुआ उनका स्कोर 6.7 तक पाया गया. इसी तरह स्ट्रेस स्कोर में भी अंतर देखा गया, जहां सफल मामलों में यह 7.4 था और असफल मामलों में 8.7 तक पहुंच गया. यह साफ संकेत देता है कि ज्यादा तनाव ट्रीटमेंट के नतीजों को प्रभावित कर सकता है.
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एक्सपर्ट्स की क्या है राय?
फर्टिलिटी एक्सपर्ट्स का कहना है कि स्ट्रेस केवल मानसिक समस्या नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर शरीर पर भी पड़ता है. डॉक्टरों के अनुसार लंबे समय तक रहने वाला तनाव शरीर में कोर्टिसोल हार्मोन को बढ़ा देता है, जिससे हार्मोनल बैलेंस बिगड़ सकता है. इंडिया आईवीएफ फर्टिलिटी की डॉक्टर ऋचिका सहाय शुक्ला के अनुसार, आईवीएफ कराने वाली बहुत सी महिलाएं सिर्फ शारीरिक रूप से ही नहीं, बल्कि सालों की चिंता और बार-बार नाकामयाब होने की वजह से मन से भी बहुत थक चुकी होती हैं. इसका असर एग क्वालिटी पर पड़ता है और IVF के रिजल्ट को भी प्रभावित कर सकता है. एक्सपर्ट्स यह भी बताते हैं कि IVF की प्रक्रिया भावनात्मक रूप से काफी चुनौतीपूर्ण होती है, क्योंकि इसमें महिलाओं को अनिश्चितता और कई बार असफलता का सामना करना पड़ता है. भारत में करीब 2.8 करोड़ लोग बांझपन की समस्या से जूझ रहे हैं, और हर साल लगभग 3 से 3.5 लाख आईवीएफ उपचार किए जाते हैं.
इन्फर्टिलिटी और स्ट्रेस का संबंध
इन्फर्टिलिटी को मेडिकल तौर पर तब माना जाता है जब 12 महीने तक नियमित और असुरक्षित संबंध के बाद भी गर्भधारण न हो. स्टडी के अनुसार लगभग 9 प्रतिशत कपल्स इस समस्या से जूझ रहे हैं. इसे जिंदगी के सबसे बड़े तनावों में से एक माना जाता है, जो लोगों को मानसिक रूप से काफी परेशान कर सकता है. इससे प्रभावित लोगों में चिंता, उदासी और ज्यादा तनाव जैसी समस्याएं अक्सर देखने को मिलती हैं. रिसर्च में यह भी सामने आया है कि IVF ट्रीटमेंट के दौरान मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना उतना ही जरूरी है जितना मेडिकल इलाज, क्योंकि दोनों मिलकर ही बेहतर परिणाम देने में मदद करते हैं. डॉ. शुक्ला के मुताबिक, जिन महिलाओं को सही जानकारी दी जाती है, उन्हें भरोसा दिलाया जाता है और भावनात्मक सहारा मिलता है, वे अक्सर इलाज में बेहतर परिणाम दिखाती हैं.
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        <pubDate>Sun, 26 Apr 2026 12:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Summer Heatwave Tips: हीटवेव से बेहाल! तेज गर्मी में क्या करें और क्या न करें? डॉक्टर से जानें बचाव के 6 आसान उपाय</title>
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        <description><![CDATA[ Summer Heatwave Tips: हीटवेव से बेहाल! तेज गर्मी में क्या करें और क्या न करें? डॉक्टर से जानें बचाव के 6 आसान उपाय ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 26 Apr 2026 12:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>Scalp Sunburn: सिर्फ त्वचा ही नहीं, स्कैल्प भी हो सकता है सनबर्न का शिकार, एक्सपर्ट बोले&amp; इसे न करें नजरअंदाज</title>
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        <description><![CDATA[ Scalp Sunburn: सिर्फ त्वचा ही नहीं, स्कैल्प भी हो सकता है सनबर्न का शिकार, एक्सपर्ट बोले- इसे न करें नजरअंदाज ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 26 Apr 2026 12:30:06 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Endless Scrolling: बिना वजह मोबाइल फोन स्क्रॉल करने की पड़ गई आदत, जानिए इसका दिमाग पर क्या पड़ता है असर?</title>
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        <description><![CDATA[ Endless scrolling: इंटरनेट पर शॉर्ट वीडियो की स्क्रॉलिंग आप भी करते होंगे, स्क्रॉलिंग करते समय बस दिमाग में यह चल रहा होता है कि बस कुछ वीडियो और, 2-4 वीडियो और, और यही थोड़ा-थोड़ा कब घंटों में बदल जाता है पता ही नहीं चलता. अंत में बस यह सोचते हैं कि आज काफी समय बर्बाद हो गया. बात सही है, समय तो बर्बाद होता है, लेकिन आपको पता है इससे आपके मस्तिष्क पर क्या प्रभाव पड़ता है? यह आपके ध्यान केंद्रित करने की क्षमता और आपके आवेगों पर नियंत्रण करने की क्षमता को काफी ज्यादा प्रभावित करता है.
लगातार स्क्रॉलिंग की आदत...
शॉर्ट वीडियो को इस तरह से बनाया जाता है कि कम समय में ज्यादा बात या जानकारी दी जा सके. इनमें फास्ट जंप कट्स और अचानक ध्यान खींचने वाले विजुअल्स का इस्तेमाल होता है, जो तुरंत ही लोगों का ध्यान खींचकर उन्हें व्यस्त रखते हैं. इसमें शुरुआत में कोई समस्या नहीं दिखती, लेकिन लंबे समय के साथ यह आपके मस्तिष्क को प्रभावित करता है. Frontiers in Human Neuroscience द्वारा जारी की गई रिपोर्ट के मुताबिक, जिन लोगों को शॉर्ट वीडियो की लत होती है उनमें आत्म-नियंत्रण और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता कमजोर हो सकती है.
आपके मस्तिष्क पर इसका असर
शोधकर्ताओं ने एक रिसर्च की, जिसमें उन्होंने कुछ लोगों का EEG स्कैन किया जब वे ध्यान लगाने वाला काम कर रहे थे. उन्होंने पाया कि जो लोग ज्यादा स्क्रॉलिंग वाला कंटेंट देखते हैं, उनका दिमाग बाकी लोगों की तुलना में कम ध्यान केंद्रित कर पा रहा था.
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शॉर्ट वीडियो की आदत कैसे लग जाती है?
शॉर्ट वीडियो की आदत धीरे-धीरे लगती है क्योंकि ये बहुत जल्दी-जल्दी नया और मजेदार कंटेंट दिखाती हैं. जब आप एक वीडियो देखते हैं तो वह आपको कोई भावनात्मक प्रतिक्रिया महसूस कराती है, जिससे आगे और वीडियो देखने का मन करने लगता है. लंबे समय तक आपका मस्तिष्क छोटे और तेज कंटेंट का आदी हो जाता है, जिसके बाद लंबी वीडियो देखने और समझने की इच्छा कम होने लगती है और आप धीरे-धीरे शॉर्ट वीडियो की लत में फंस जाते हैं.
यह सिर्फ ध्यान केंद्रित करने की बात नहीं है...
यह आपके दिमाग की काम करने की पूरी प्रक्रिया को प्रभावित करती है. लगातार छोटे-छोटे और तेज कंटेंट देखने की आदत से दिमाग तुरंत मिलने वाले इनाम का आदी हो जाता है, जिससे धैर्य कम होने लगता है और लंबे समय तक किसी एक काम पर फोकस करना मुश्किल हो जाता है. धीरे-धीरे सोचने-समझने की क्षमता और निर्णय लेने की क्षमता पर भी असर पड़ सकता है, क्योंकि दिमाग गहराई से सोचने की बजाय जल्दी-जल्दी बदलते कंटेंट के हिसाब से ढलने लग जाता है.
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&amp;nbsp; ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 26 Apr 2026 00:30:11 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>AC Side Effects:  गर्मियों में AC का ज्यादा उपयोग सेहत के लिए खतरनाक, जानिए डॉक्टरों ने क्या दी चेतावनी?</title>
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        <description><![CDATA[ AC Side Effects:  गर्मियों में AC का ज्यादा उपयोग सेहत के लिए खतरनाक, जानिए डॉक्टरों ने क्या दी चेतावनी? ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 24 Apr 2026 20:30:16 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Yawning Effect On Ears : जम्हाई लेते ही सुनाई क्यों देने लगता है साफ? जानिए इसके पीछे का कारण और एक्सपर्ट की राय</title>
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        <description><![CDATA[ Yawning Effect On Ears : हम सभी दिन में कई बार जम्हाई लेते हैं. कभी नींद आने पर, कभी थकान में, या कभी बिना किसी खास वजह के, आमतौर पर हम इसे सिर्फ नींद या बोरियत से जोड़कर देखते हैं, लेकिन शरीर में होने वाली यह साधारण सी क्रिया असल में कई काम करती है. आपने कई बार देखा होगा कि जम्हाई लेने के तुरंत बाद आसपास की आवाजें थोड़ी ज्यादा साफ और तेज सुनाई देने लगती हैं. यह कोई भ्रम नहीं है, बल्कि इसके पीछे वैज्ञानिक कारण मौजूद हैं. तो आइए आज हम आपको बताते हैं कि जम्हाई लेते ही साफ सुनाई क्यों देने लगता है और इसके पीछे का कारण और एक्सपर्ट की राय क्या है.&amp;nbsp;
जम्हाई का कानों पर क्या असर होता है?
हमारे कान के अंदर एक छोटी सी नली होती है जिसे Eustachian tube (यूस्टेशियन ट्यूब) कहा जाता है. यह नली हमारे मिडिल ईयर को गले से जोड़ती है. आमतौर पर यह बंद रहती है. जब हम जम्हाई लेते हैं, तो मुंह और जबड़े के खिंचाव की वजह से यह नली खुल जाती है. इससे कान के अंदर और बाहर के हवा के प्रेशर में संतुलन बन जाता है. ईयरड्रम &amp;nbsp;सही तरीके से हिलने लगता है. आवाजें ज्यादा साफ सुनाई देने लगती हैं. जम्हाई एक तरह से आपके कानों का रीसेट बटन दबा देती है.&amp;nbsp;
जम्हाई लेते ही साफ सुनाई क्यों देने लगता है?
जम्हाई लेते समय कान के अंदर मौजूद दो छोटे मांसपेशियां Tensor tympani muscle और Stapedius muscle, कुछ समय के लिए सक्रिय हो जाती हैं. ये कान की हड्डियों को थोड़ी देर के लिए टाइट कर देती हैं. इससे आवाज थोड़ी देर के लिए कम सुनाई देती है. जैसे ही ये मांसपेशियां रिलैक्स होती हैं, सुनने की क्षमता बेहतर महसूस होती है. इसलिए जम्हाई के बाद आपको आवाजें क्लियर लगती हैं.&amp;nbsp;
प्लेन में कान क्यों बंद हो जाते हैं और जम्हाई क्यों मदद करती है?
आपने महसूस किया होगा कि हवाई जहाज में सफर करते समय कान बंद हो जाते हैं और पॉप की आवाज आती है. इसका कारण भी वही प्रेशर का असंतुलन है. ऐसे में जम्हाई लेने से यूस्टेशियन ट्यूब खुलती है, दबाव बराबर होता है. साथ ही कान तुरंत हल्के और साफ महसूस होते हैं.
इसके पीछे का कारण
जम्हाई लेने से शरीर में ब्लड फ्लो थोड़ा बढ़ जाता है. इससे दिमाग ज्यादा एक्टिव महसूस करता है, सुनने की प्रक्रिया थोड़ी बेहतर हो सकती है और आप आसपास की आवाजों को ज्यादा ध्यान से पकड़ पाते हैं.&amp;nbsp;
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एक्सपर्ट की राय क्या है?
कुछ एक्सपर्ट मानते हैं कि जम्हाई हमारे शरीर का एक प्राकृतिक सुरक्षा तंत्र (defence mechanism) भी हो सकती है. यह कान के अंदर की मांसपेशियों को एक्टिव करती है. ये मांसपेशियां तेज या अंदरूनी आवाजों जैसे अपनी आवाज, दांत पीसना से कान को बचाती हैं. यह अंदरूनी शोर को कम करके बाहरी आवाजों को बेहतर सुनने में मदद करती है.&amp;nbsp;
कब हो सकती है समस्या?
अगर आपको बार-बार जम्हाई लेकर ही कान खोलने पड़ते हैं, या एक कान खुलता है, दूसरा नहीं, कान में भारीपन बना रहता है, बार-बार पॉप की जरूरत महसूस होती है तो यह यूस्टेशियन ट्यूब में दिक्कत का संकेत हो सकता है. इसके कारण एलर्जी, साइनस की समस्या या एसिड रिफ्लक्स हो सकते हैं. ऐसे में डॉक्टर, ENT स्पेशलिस्ट से सलाह लेना जरूरी है. &amp;nbsp;
यह भी पढ़ें - Oral Cancer Causes: क्या तंबाकू और शराब न पीने वालों को भी हो सकता है मुंह का कैंसर, जवाब सुन नहीं होगा यकीन&amp;nbsp;Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 24 Apr 2026 20:30:16 +0530</pubDate>
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        <title>Lung Detox Tips: सिगरेट पीते&amp;पीते कमजोर हो गए हैं लंग्स, ऐसे कर सकते हैं डिटॉक्स</title>
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        <description><![CDATA[ Lung Detox Tips: सिगरेट पीते-पीते कमजोर हो गए हैं लंग्स, ऐसे कर सकते हैं डिटॉक्स ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 24 Apr 2026 20:30:15 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Fake Weight Loss Injection: मोटापा कम करने वाला ये इंजेक्शन बाजार में मिल रहा नकली, जानें पहचानने का तरीका</title>
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        <description><![CDATA[ Fake Weight Loss Injection: देशभर में तेजी से पॉपुलर हो रहे वेट लॉस इंजेक्शन खासकर डायबिटीज और वजन घटाने के लिए इस्तेमाल होने वाले इंजेक्शन अब एक बड़े खतरे के रूप में सामने आ रहे हैं. दरअसल, गुरुग्राम में ड्रग कंट्रोल डिपार्टमेंट की कार्रवाई में नकली इंजेक्शन बनाने और बेचने वाले रैकेट का खुलासा हुआ है. करीब 70 लाख रुपये के फर्जी इंजेक्शन बरामद किए है. पुलिस की जांच में सामने आया है कि आरोपी किराए के फ्लैट में ही नकली इंजेक्शन तैयार कर रहे थे. चीन से मंगाए गए सस्ते केमिकल सिरिंज और पैकेजिंग की मदद से इन्हें बिल्कुल असली जैसा बनाया जा रहा था.
हैरानी के बात यह है कि आम लोगों के लिए ही नहीं बल्कि मेडिकल प्रोफेशनल्स के लिए भी असली और नकली दवा में फर्क करना मुश्किल हो रहा था. शुरुआती जानकारी के अनुसार, इन नकली इंजेक्शनों की सप्लाई ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए भी की जा रही थी. ऐसे में चलिए अब आपको बताते हैं कि मोटापा कम करने वाले कौन से नकली इंजेक्शन बाजार में मिल रहे हैं और इन्हें पहचानने का तरीका क्या है.
क्या है मौनजारो इंजेक्शन और क्यों बढ़ रही मांग?
ड्रग कंट्रोलर के अनुसार, मौनजारो एक एंटी-डायबिटिक दवा है, जिसे डॉक्टर की सलाह पर वजन घटाने के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है. सोशल मीडिया, सेलिब्रिटी ट्रेंड और तेजी से वजन कम करने की चाहत के कारण इसकी मांग तेजी से बढ़ी है. इसी बढ़ती डिमांड का फायदा उठाकर नकली दवाओं का कारोबार फैल रहा है और कई लोग वजन घटाने के लिए इस्तेमाल होने वाले नकली मौनजारो इंजेक्शन को बाजार में बेच रहे हैं.
नकली इंजेक्शन से क्या हो सकते हैं खतरे?
एक्सपर्ट के अनुसार, नकली वेट लॉस इंजेक्शन शरीर के लिए बहुत खतरनाक साबित हो सकता है. इनमें या तो असली दवा का एक्टिव तत्व नहीं होता या फिर जहरीले केमिकल मिलाए जाते हैं. इसे लेने से इलाज का असर नहीं होता, जिससे बीमारी बनी रहती है. वहीं शरीर में टॉक्सिक रिएक्शन हो सकते हैं. गंभीर स्थिति में अस्पताल में भर्ती तक की नौबत आ सकती है और लंबे समय में शरीर के अंगों को नुकसान पहुंच सकता है. डॉक्टरों का कहना है कि मरीज को सही दवा नहीं मिलती तो पूरा इलाज फेल हो सकता है. इसके अलावा गलत या अधूरी दवा एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस का खतरा बढ़ जाता है, जिससे फ्यूचर में इलाज और मुश्किल हो सकता है.
भारत में क्यों बढ़ रहा है नकली दवाओं का खतरा?
एक्सपर्ट्स बताते हैं कि भारत में नकली दवाओं की समस्या नई नहीं है, लेकिन अब इसका दायरा बहुत बढ़ गया है. नियम मौजूद होने के बावजूद हर जगह उनका सख्ती से पालन नहीं हो पाता, जिससे सप्लाई चैन में खामियां रह जाती है और नकली दवाएं आसानी से बाजार में पहुंच जाती है.
ये भी पढ़ें-Oral Cancer Causes: क्या तंबाकू और शराब न पीने वालों को भी हो सकता है मुंह का कैंसर, जवाब सुन नहीं होगा यकीन
कैसे करें नकली इंजेक्शन की पहचान?

डॉक्टर के अनुसार नकली इंजेक्शन की पहचान करने के लिए कुछ जरूरी सावधानियां बरतनी चाहिए. जैसे हमेशा लाइसेंस वाली मेडिकल शॉप से ही दवा खरीदें.
बिना डॉक्टर की प्रिस्क्रिप्शन के इंजेक्शन न लें.
पैकेजिंग को ध्यान से जांचे, स्पेलिंग मिस्टेक टूटी सील या अजीब लेबल से सावधान रहें.
अगर बॉक्स पर क्यूआर कोड हो तो उसे जरूर वेरीफाई करें.
सोशल मीडिया या ऑनलाइन अनजान प्लेटफाॅर्म से दवा खरीदने से बचना चाहिए.

ये भी पढ़ें-Aspirin Cancer Prevention: क्या कैंसर के खतरे को कम कर सकती है एस्पिरिन? जान लें इसके पीछे की वजह
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 24 Apr 2026 20:30:14 +0530</pubDate>
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        <title>Heart Attack Risk In Healthy People: एकदम फिट दिखने वालों को क्यों आ रहा हार्ट अटैक? डॉक्टर से जानें असली वजह</title>
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        <description><![CDATA[ Hidden Causes Of Heart Disease In Young Adults: क्या आप पूरी तरह फिट और हेल्दी दिखते हैं, फिर भी दिल की बीमारी का खतरा हो सकता है? यह सवाल सुनने में अजीब लग सकता है, लेकिन सच्चाई कुछ और ही है. अक्सर हम मान लेते हैं कि अगर हम अच्छा खाते हैं, थोड़ा-बहुत व्यायाम करते हैं और सक्रिय रहते हैं, तो हार्ट पूरी तरह सुरक्षित है. लेकिन असलियत यह है कि दिल की सेहत सिर्फ बाहरी फिटनेस से तय नहीं होती. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर एकस्पर्ट क्या कहते हैं.&amp;nbsp;
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
डॉ. समनजॉय मुखर्जी , जो मणिपाल हॉस्पिटल, द्वारका में इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी विभाग के प्रमुख हैं, उन्होंने TOI को बताया कि &quot;हम में से ज्यादातर लोग सोचते हैं कि सही खानपान और थोड़ा व्यायाम हमें हार्ट अटैक से बचा लेगा, लेकिन यह पूरी तस्वीर नहीं है.&quot; दरअसल, फिटनेस जो हमें दिखाई देती है कि जैसे सही वजन, अच्छी स्टैमिना या साफ त्वचा, वह सिर्फ सतही संकेत हैं. शरीर के अंदर चल रही प्रक्रियाएं, जैसे इन्फ्लेमेशन, आर्टरीज को होने वाला नुकसान या हार्मोनल असंतुलन, बाहर से नजर नहीं आते. यही छिपे हुए कारक धीरे-धीरे दिल की बीमारी का खतरा बढ़ाते हैं.&amp;nbsp;
भारत में हार्ट रोग के मामला
इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के अनुसार, भारत में 70 साल से कम उम्र के लोगों में आधे से ज्यादा हार्ट रोग के मामले सामने आते हैं. इसका मतलब यह है कि उम्र या बाहरी फिटनेस भी पूरी सुरक्षा की गारंटी नहीं देती. तनाव भी एक बड़ा लेकिन अनदेखा कारण है. यह हमेशा स्पष्ट नहीं दिखता, बल्कि डेडलाइन, नींद की कमी और मानसिक दबाव के रूप में धीरे-धीरे शरीर को प्रभावित करता है. इससे ब्लड प्रेशर बढ़ता है और शरीर में सूजन बढ़ती है, जो दिल पर सीधा असर डालती है. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन की रिपोर्ट भी बताती है कि लगातार तनाव हाई ब्लड प्रेशर और हार्ट संबंधी समस्याओं का खतरा बढ़ाता है.
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काफी लोगों को इसके बारे में पता नहीं होता
इसके अलावा, जेनेटिक्स भी अहम भूमिका निभाता है. अगर परिवार में कम उम्र में दिल की बीमारी के मामले रहे हैं, तो जोखिम अपने आप बढ़ जाता है, चाहे आपकी लाइफस्टाइल कितनी भी अच्छी क्यों न हो. कई ऐसी साइलेंट बीमारियां भी हैं, जो बिना लक्षण के शरीर को नुकसान पहुंचाती रहती हैं. जैसे हाई ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल और डायबिटीज. &amp;nbsp;नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ से जुड़े स्टडी में पाया गया है कि बड़ी संख्या में लोगों को अपने हाई ब्लड प्रेशर के बारे में पता ही नहीं होता.
नींद भी जरूरी
नींद भी दिल की सेहत के लिए बेहद जरूरी है. कम या खराब नींद दिल की धड़कन को प्रभावित कर सकती है, तनाव बढ़ा सकती है और मेटाबॉलिज्म को बिगाड़ सकती है। इसलिए सिर्फ बाहर से फिट दिखना काफी नहीं है. नियमित जांच, जैसे ब्लड प्रेशर, शुगर, कोलेस्ट्रॉल और ईसीजी कराना जरूरी है. सही समय पर जोखिम की पहचान ही हार्ट को सुरक्षित रखने का सबसे बड़ा तरीका है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 24 Apr 2026 20:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>Aspirin Cancer Prevention: क्या कैंसर के खतरे को कम कर सकती है एस्पिरिन? जान लें इसके पीछे की वजह</title>
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        <description><![CDATA[ Can Daily Aspirin Prevent Cancer Risk: क्या एक साधारण दर्द की गोली कैंसर के खतरे को कम कर सकती है? यह सवाल सुनने में थोड़ा अजीब लग सकता है, लेकिन हाल के रिसर्च इस ओर इशारा कर रहे हैं कि एस्पिरिन सिर्फ दर्द से राहत देने तक सीमित नहीं है. कुछ मामलों में यह कैंसर के खतरे को कम करने में भी भूमिका निभा सकती है. चलिए आपको बताते हैं कि रिसर्च में क्या निकला.
क्या निकला रिसर्च में&amp;nbsp;
इस दिशा में सबसे अहम रिसर्च जॉन बर्न्स &amp;nbsp;के नेतृत्व में हुई, जिन्होंने लिंच सिंड्रोम वाले मरीजों पर एक बड़ा क्लिनिकल ट्रायल किया. यह एक जेनेटिक स्थिति है, जिसमें लोगों में कोलोरेक्टल कैंसर का खतरा काफी ज्यादा होता है. इस स्टडी में पाया गया कि जो लोग रोज़ाना एस्पिरिन लेते रहे, उनमें कैंसर का खतरा लगभग आधा हो गया. करीब 10 साल तक चले इस ट्रायल में 600 मिलीग्राम एस्पिरिन की डोज़ दी गई और नतीजे इतने मजबूत थे कि कई देशों में हेल्थ गाइडलाइंस तक बदल दी गईं. इसके बाद कम डोज यानी 75 से 100 मिलीग्राम पर भी स्टडी हुआ, जिसमें शुरुआती संकेत मिले कि कम मात्रा भी उतनी ही असरदार हो सकती है.
मरीजों पर किया गया ट्रायल
इसी तरह स्वीडन के करोलिंस्का इंस्टीट्यूट में एना मार्टलिंग के नेतृत्व में 2,980 मरीजों पर एक और बड़ा रैंडमाइज्ड कंट्रोल्ड ट्रायल किया गया. इसमें पाया गया कि जिन लोगों ने सर्जरी के बाद रोजाना एस्पिरिन ली, उनमें कैंसर के दोबारा होने का खतरा आधे से भी कम हो गया. यह स्टडी 2025 में पब्लिश हुई और इसके बाद वहां की मेडिकल प्रैक्टिस में भी बदलाव देखने को मिला.&amp;nbsp;
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एस्पिरिन कैसे काम करती है
अब सवाल यह उठता है कि आखिर एस्पिरिन ऐसा कैसे करती है. बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन की ऑन्कोलॉजी एक्सपर्ट रुथ लैंगली के अनुसार, यह दवा शरीर में उन प्रक्रियाओं को प्रभावित करती है जो कैंसर सेल्स के फैलाव से जुड़ी होती हैं. वहीं, केम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की रिसर्च बताती है कि एस्पिरिन खून के थक्के बनने से जुड़े तत्वों को कम करके कैंसर सेल्स को इम्यून सिस्टम के सामने उजागर कर सकती है, जिससे शरीर उन्हें पहचानकर नष्ट कर सके.&amp;nbsp;
आपको किस बात का ध्यान रखना चाहिए
हालांकि, यह समझना जरूरी है कि एस्पिरिन कोई जादुई इलाज नहीं है. इसके साइड इफेक्ट भी हो सकते हैं, जैसे पेट में जलन, अल्सर या इंटरनल ब्लीडिंग इसलिए डॉक्टर की सलाह के बिना इसे लेना खतरनाक हो सकता है. &amp;nbsp;रिसर्च यह जरूर दिखाती है कि एस्पिरिन कैंसर के खतरे को कम करने में मदद कर सकती है, लेकिन यह हर व्यक्ति के लिए एक जैसा असर नहीं दिखाती. इसलिए इसे अपनाने से पहले विशेषज्ञ की सलाह लेना ही सबसे सुरक्षित तरीका है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 24 Apr 2026 04:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>Oral Cancer Causes: क्या तंबाकू और शराब न पीने वालों को भी हो सकता है मुंह का कैंसर, जवाब सुन नहीं होगा यकीन</title>
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        <description><![CDATA[ Can Non Smokers Get Oral Cancer: क्या तंबाकू और शराब नहीं पीते हैं तो क्या आप पूरी तरह सुरक्षित हैं? ज्यादातर लोग यही मानते हैं, लेकिन सच्चाई इससे थोड़ी अलग है. मुंह का कैंसर सिर्फ उन लोगों तक सीमित नहीं है जो तंबाकू या शराब का सेवन करते हैं. कई मामलों में यह बीमारी बिना किसी स्पष्ट वजह के भी विकसित हो सकती है, जो इसे और ज्यादा खतरनाक बनाता है. &amp;nbsp;हर साल बड़ी संख्या में लोग इस बीमारी की चपेट में आते हैं, लेकिन शुरुआती लक्षण इतने हल्के होते हैं कि अक्सर नजरअंदाज हो जाते हैं. यही वजह है कि ज्यादातर केस तब सामने आते हैं जब बीमारी काफी आगे बढ़ चुकी होती है और इलाज मुश्किल हो जाता है.
कैसे होते हैं
ओरल कैंसर &amp;nbsp;दरअसल मुंह के सेल्स में होने वाले बदलाव से शुरू होता है, जो धीरे-धीरे अनकंट्रोल रूप से बढ़ने लगती हैं, तंबाकू और शराब इसके सबसे बड़े कारण जरूर हैं, लेकिन यही पूरी कहानी नहीं है, UThealth Houston की रिपोर्ट के अनुसार, अब एक्सपर्ट मानते हैं कि इसके पीछे कई और फैक्टर भी जिम्मेदार हो सकते हैं. डॉ. साइमन यंग प्रोफेसर व एक्टिंग चेयर, कैट्ज डिपार्टमेंट ऑफ ओरल एंड मैक्सिलोफेशियल सर्जरी के अनुसार, इनमें एक बड़ा कारण एचपीवी इंफेक्शन भी है, जो खासतौर पर गले से जुड़े कैंसर में भूमिका निभाता है. इसके अलावा लंबे समय तक सूजन रहना, धूप का असर, उम्र बढ़ना और शरीर की अपनी संवेदनशीलता भी जोखिम को बढ़ा सकती है. यही कारण है कि कुछ लोगों में बिना किसी स्पष्ट कारण के भी यह बीमारी हो जाती है.&amp;nbsp;
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क्या है इसका सबसे बड़ी दिक्कत
सबसे बड़ी समस्या यह है कि मुंह का कैंसर शुरुआत में दर्द नहीं देता. यही वजह है कि लोग इसे गंभीरता से नहीं लेते. अगर मुंह में घाव लंबे समय तक ठीक नहीं हो रहा, लाल या सफेद धब्बे दिखाई दे रहे हैं, या निगलने और बोलने में दिक्कत हो रही है, तो यह संकेत हो सकते हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. एक्सपर्ट के अनुसार, किसी भी तरह का लक्षण अगर दो हफ्तों से ज्यादा समय तक बना रहे, तो तुरंत जांच करानी चाहिए. समय पर पहचान ही इस बीमारी से बचने का सबसे बड़ा तरीका है, क्योंकि शुरुआती स्टेज में इलाज ज्यादा असरदार होता है.
क्या निकला रिसर्च में
UThealth Houston की रिपोर्ट के अनुसार रिसर्च में यह भी सामने आया है कि नियमित जांच और जागरूकता से इस बीमारी के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है. यही वजह है कि अब डॉक्टर सिर्फ तंबाकू और शराब से दूर रहने की सलाह ही नहीं देते, बल्कि नियमित ओरल चेकअप को भी उतना ही जरूरी मानते हैं.
इसे भी पढ़ें-&amp;nbsp;Metabolic Diseases In India: भारत में तेजी से फैल रही हैं मेटाबॉलिक बीमारियां, कहीं आप भी तो नहीं इसके शिकार?
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 24 Apr 2026 04:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>Heat stroke: सूरज की तपिश से बढ़ने लगे हीट स्ट्रोक के मामले, डॉक्टर से जानें बचने के तरीके</title>
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        <description><![CDATA[ Heat stroke:&amp;nbsp; अप्रैल जैसे-जैसे खत्म हो रहा है, गर्मी बढ़ती जा रही है. घर से बाहर निकलते ही धूप लोगों की परेशानी कर देती है. इस तेज धूप और लगातार हर दिन बढ़ता तापमान इन दिनों हीट स्ट्रोक के मामले तेजी से बढ़ा रहा है. ऐसे में लंबे समय तक धूप में घूमना या भारी शारीरिक गतिविधि करने से शरीर का तापमान सामान्य से काफी ज्यादा बढ़ जाता है, जिससे हीट स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है. ऐसे में आइए जानते हैं गर्मी के दिनों में हीट स्ट्रोक से कैसे बचा जाए.&amp;nbsp;
हीट स्ट्रोक क्या है?
डॉ. राहुल चिराग (कंसल्टेंट फिजिशियन, Care Hospitals) के अनुसार, हीट स्ट्रोक एक ऐसी स्थिति है जिसमें शरीर का तापमान अत्यधिक गर्मी या लंबे समय तक तेज गर्मी में रहने के कारण बहुत बढ़ जाता है. यह तब होता है जब शरीर का तापमान 104&amp;deg;F या उससे अधिक हो जाता है. यह समस्या भीषण गर्मी में अधिक देखने को मिलती है. डॉक्टर के मुताबिक, हीट स्ट्रोक दो प्रकार का होता है-एक्सर्शनल और नॉन-एक्सर्शनल. एक्सर्शनल हीट स्ट्रोक अधिकतर खिलाड़ियों और मजदूरों में होता है क्योंकि वे तेज धूप में भारी शारीरिक काम या एक्सरसाइज करते हैं, जबकि नॉन-एक्सर्शनल हीट स्ट्रोक बुजुर्गों और छोटे बच्चों में अधिक देखा जाता है क्योंकि इनके शरीर की तापमान नियंत्रित करने की क्षमता कमजोर होती है.
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हीट स्ट्रोक के लक्षण और खतरे
हीट स्ट्रोक के लक्षणों की बात की जाए तो इसमें बुखार, सिरदर्द, भ्रम की स्थिति, चिड़चिड़ापन, बेहोशी या दौरे पड़ना शामिल है. इसके अलावा स्किन का ड्राई और गर्म होना, दिल की धड़कन तेज हो जाना और सांस का तेज चलना भी हीट स्ट्रोक के संकेत हो सकते हैं. समय पर इलाज न मिलने पर यह स्थिति जानलेवा भी साबित हो सकती है, इसलिए लक्षण दिखते ही तुरंत ध्यान देते हुए डॉक्टर से मिलना जरूरी है.
हीट स्ट्रोक से बचाव और उपचार के तरीके
हीट स्ट्रोक से बचाव के लिए दोपहर की तेज धूप में बाहर निकलने से बचना चाहिए. हल्के और ढीले कपड़े पहनने चाहिए. अधिक से अधिक पानी और तरल पदार्थों का सेवन करना चाहिए&amp;nbsp; और धूप में छाता या टोपी का उपयोग करना चाहिए. इसके उपचार के लिए व्यक्ति को तुरंत ठंडी या छायादार जगह पर ले जाकर शरीर को ठंडा करना चाहिए. ढीले कपड़े कर देने चाहिए और ठंडे पानी की पट्टियां लगानी चाहिए. अगर स्थिति गंभीर हो जैसे बेहोशी या तेज बुखार हो तो तुरंत अस्पताल ले जाना चाहिए.
यह भी पढ़ेंः पेन किलर लेने के तुरंत बाद कैसे खत्म हो जाता है शरीर का दर्द, कैसे काम करती है दवा?
&amp;nbsp; ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 24 Apr 2026 04:30:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>5 Food Items for Summer: आज से ही खाना शुरू कर दें ये 5 चीजें, आसपास भी नहीं फटकेगी लू</title>
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        <description><![CDATA[ 5 Food Items for Summer: आज से ही खाना शुरू कर दें ये 5 चीजें, आसपास भी नहीं फटकेगी लू ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 23 Apr 2026 12:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Diabetes Eye Problems: शुगर के मरीज हो जाएं अलर्ट! जानिए कैसे आपकी आंखों को अंदर से अंधा बना रही है डायबिटीज?</title>
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        <description><![CDATA[ How Diabetes Affects Eyes And Vision: डायबिटीज को अक्सर दिल, किडनी और नसों से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन आंखें भी इससे बुरी तरह प्रभावित हो सकती हैं. यह नुकसान अचानक नहीं होता, बल्कि धीरे-धीरे बिना दर्द के बढ़ता है और तब सामने आता है जब स्थिति संभालना मुश्किल हो जाता है. यही वजह है कि इसे समझना और समय रहते सावधानी बरतना बेहद जरूरी है. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर डॉक्टर का क्या कहना है.&amp;nbsp;
क्या कहते हैं एक्सपर्ट
डॉ. नुसरत बुखारी ने TOI को बताया कि &quot;डायबिटीज सिर्फ दिल, किडनी, लीवर और नसों को ही नहीं, बल्कि आंखों को भी प्रभावित करती है.&quot; यह बात कई लोग तब समझते हैं जब समस्या बढ़ चुकी होती है. आंख एक कैमरे की तरह काम करती है, जिसमें पीछे की परत यानी रेटिना तस्वीरों को कैद करके दिमाग तक भेजती है. इस रेटिना में बहुत ही महीन ब्लड वेसल्स होती हैं. जब लंबे समय तक ब्लड शुगर का स्तर ज्यादा रहता है, तो ये नसें कमजोर होने लगती हैं. इनमें सूजन आ सकती है, रिसाव हो सकता है या ये बंद भी हो सकती हैं. कुछ मामलों में शरीर नई ब्लड वेसल्स बनाता है, लेकिन ये बेहद नाजुक होती हैं और ज्यादा नुकसान पहुंचा सकती हैं.
क्या होती है इससे दिक्कत
इस स्थिति को डायबिटिक रेटिनोपैथी कहा जाता है. यह बिना किसी शुरुआती लक्षण के धीरे-धीरे गंभीर रूप ले सकती है और दुनिया भर में नजर कमजोर होने के बड़े कारणों में से एक है. इसके अलावा, डायबिटीज आंखों से जुड़ी अन्य समस्याओं का भी कारण बन सकती है. डायबिटीज के कारण होने वाली आंखों की समस्याओं में डायबिटिक रेटिनोपैथी, डायबिटिक मैक्युलर एडीमा, मोतियाबिंद और ग्लूकोमा शामिल हैं. डॉ. नुसरत बुखारी के अनुसार &quot;अनकंट्रोल डायबिटीज वाले लोगों में इन समस्याओं का खतरा काफी ज्यादा होता है.&quot; खास बात यह है कि इन बीमारियों के शुरुआती संकेत अक्सर नजर नहीं आते.
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क्या होती है दिक्कत
यही वजह है कि कई लोग तब तक सामान्य महसूस करते रहते हैं जब तक समस्या गंभीर नहीं हो जाती. जब लक्षण दिखते हैं, तो उनमें धुंधला दिखना, आंखों के सामने काले धब्बे नजर आना, रात में देखने में दिक्कत और अचानक नजर में बदलाव शामिल हो सकते हैं. डॉ. बुखारी चेतावनी देती हैं कि आंखों की समस्याएं बिना किसी स्पष्ट संकेत के बढ़ सकती हैं और बाद में तनाव और चिंता का कारण बनती हैं. डायबिटीज शरीर में एक तरह की चेन रिएक्शन भी पैदा करती है. हाई ब्लड शुगर के साथ हाई ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल की समस्या जुड़ जाए, तो स्थिति और खराब हो जाती है. धूम्रपान करने से ऑक्सीजन की आपूर्ति भी कम हो जाती है, जिससे आंखों को और नुकसान पहुंचता है. इसी कारण हर व्यक्ति में इसके असर अलग-अलग हो सकते हैं.&amp;nbsp;
कैसे कर सकते हैं इस दिक्कत को ठीक
हालांकि, राहत की बात यह है कि सही देखभाल से इस नुकसान को रोका या कम किया जा सकता है. ब्लड शुगर को कंट्रोल रखना, नियमित जांच कराना, संतुलित और फाइबर युक्त आहार लेना, रोजाना फिजिकल एक्टिविटी करना और तनाव को कम करना बेहद जरूरी है. इसके साथ ही, साल में कम से कम एक बार आंखों की जांच जरूर करानी चाहिए, भले ही नजर सामान्य लग रही हो.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 23 Apr 2026 12:30:06 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Fitness Routine Tips : उम्र सिर्फ एक नंबर! 80 साल की दादी रोज 90 मिनट करती हैं वर्कआउट, यहां जानिए उनका फिटनेस रूटीन</title>
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        <description><![CDATA[ Fitness Routine Tips : आज के समय में जहां लोग 40-50 की उम्र के बाद ही अपने शरीर को कमजोर मानने लगते हैं, वहीं एक 80 साल की दादी ने पूरी दुनिया को दिखा दिया है कि अगर इरादा मजबूत हो तो उम्र कोई मायने नहीं रखती है. यह कहानी एक ऐसी महिला की है , जिन्होंने अपने जीवन के 70वें साल में खुद को पूरी तरह बदलने का फैसला किया. कभी दवाइयों और बीमारियों पर निर्भर रहने वाली यह महिला आज जिम में घंटों पसीना बहाती हैं, भारी वजन उठाती हैं और हजारों लोगों के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं. उनका मानना है कि हमारा शरीर किसी भी उम्र में बदल सकता है. इसके लिए सिर्फ सही दिशा और डेली रूटीन की जरूरत है. तो आइए आज हम आपको बताते हैं कि 80 साल की दादी का फिटनेस रूटीन क्या है.&amp;nbsp;
कौन हैं 80 साल की यह दादी?
ये 80 साल की दादी कनाडा की रहने वाली जोन मैकडॉनल्ड है, जो आज के समय में फिटनेस की एक बड़ी मिसाल बन चुकी हैं. उन्होंने साबित कर दिया है कि अगर इंसान के अंदर मजबूत इरादा हो, तो वह किसी भी उम्र में अपने शरीर को बदल सकता है.जोन पहले कई बीमारियों से जूझ रही थीं. उन्हें हाई ब्लड प्रेशर, एसिडिटी, चक्कर आना और गठिया जैसी समस्याएं थीं. लेकिन आज वही महिला जिम में भारी वजन उठाती हैं, रोजाना कसरत करती हैं और लाखों लोगों के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं. उनकी कहानी बताती है कि फिटनेस का कोई एक्सपायरी डेट नहीं होता है.
दवाइयों से फिटनेस तक का सफर कैसे शुरू हुआ?
70 साल की उम्र में उनका वजन करीब 90 किलो था. &amp;nbsp;उन्हें कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएं थीं जैसे हाई ब्लड प्रेशर, एसिडिटी (acid reflux), चक्कर आना (vertigo), जोड़ों में दर्द (arthritis), डॉक्टर उनकी दवाइयों की मात्रा बढ़ा रहे थे, लेकिन उन्होंने हार मानने की जगह खुद को बदलने का फैसला लिया. इस बदलाव में उनकी बेटी ने उनका साथ दिया, जो फिटनेस एक्सपर्ट थीं. धीरे-धीरे उन्होंने एक्सरसाइज और सही खान-पान शुरू किया और लगभग 3 साल में 29 किलो वजन कम कर लिया.&amp;nbsp;
80 साल की दादी का फिटनेस रूटीन क्या है?
1. वॉर्म-अप से शुरुआत - हर वर्कआउट से पहले जोन अच्छे से वॉर्म-अप करती हैं. जिससे मांसपेशियां और जोड़ों को चोट से बचाया जा सके.
2. हफ्ते में 5 दिन स्ट्रेंथ ट्रेनिंग - &amp;nbsp;वह हफ्ते में पांच दिन स्ट्रेंथ ट्रेनिंग करती हैं. वह भारी वजन उठाने से नहीं डरतीं और अपने वर्कआउट में बेंच प्रेस, स्क्वाट्स, लैट पुल डाउन और मशीन एक्सरसाइज शामिल करती हैं. शुरुआत में उन्होंने मशीनों का ज्यादा इस्तेमाल किया. जिससे शरीर पर ज्यादा दबाव न पड़े, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने खुद को मजबूत बनाकर फ्री वेट्स की तरफ कदम बढ़ाया.
3. कार्डियो - स्ट्रेंथ ट्रेनिंग के साथ-साथ वह कार्डियो पर भी पूरा ध्यान देती हैं. वह हफ्ते में तीन से सात दिन तक कार्डियो करती हैं और हर बार 15 से 45 मिनट तक एक्सरसाइज करती हैं. इससे उनका दिल स्वस्थ रहता है और उनकी स्टैमिना भी बढ़ता है.&amp;nbsp;
4. स्ट्रेचिंग - जोन हर वर्कआउट के बाद 15 मिनट तक स्ट्रेचिंग करती हैं. इससे मांसपेशियों को आराम मिलता है, शरीर में लचीलापन बना रहता है और रिकवरी जल्दी होती है. यही वजह है कि वह लगातार एक्टिव और फिट बनी रहती हैं.
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जोन की डाइट और लाइफस्टाइल
फिटनेस सिर्फ जिम तक सीमित नहीं है, बल्कि खान-पान और सोच भी उतनी ही जरूरी है. ऐसे में जोन रोज करीब 150 ग्राम प्रोटीन लेती हैं, भरपूर 3 लीटर पानी पीती हैं और सिर्फ कैलोरी गिनने की जगह प्रोटीन, कार्ब्स और फैट यानी मैक्रो प्लानिंग पर फोकस करती हैं. खास बात यह है कि वह पूरी तरह नेचुरल तरीके से फिट बनी हैं और किसी भी तरह के स्टेरॉयड या दवाओं का सहारा नहीं लेतीं, इसके साथ ही वह अपने दिमाग को एक्टिव रखने के लिए मेडिटेशन ऐप्स का इस्तेमाल करती हैं, ब्रेन गेम्स खेलती हैं और नई भाषा सीखती रहती हैं. जोड़ों की देखभाल के लिए वह घुटनों पर सपोर्ट पहनती हैं और जरूरत पड़ने पर बैक सपोर्ट भी लेती हैं, जिससे वह बिना चोट के लगातार एक्टिव रह पाती हैं.&amp;nbsp;
WHO के नियमों से भी आगे
जोन का रूटीन विश्व स्वास्थ्य संगठन के फिटनेस नियमों से भी ज्यादा प्रभावी है. जहां 65 &amp;nbsp;से ज्यादा उम्र के लोगों के लिए 150 से 300 मिनट एक्टिविटी की सलाह दी जाती है, वहीं जोन इससे ज्यादा करती हैं. वह हफ्ते में 2 दिन स्ट्रेंथ ट्रेनिंग की सलाह है, लेकिन वह 5 दिन करती हैं. बैलेंस और स्ट्रेंथ पर भी पूरा ध्यान देती हैं.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 23 Apr 2026 00:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>Ashwagandha Leaves Ban: अब दवाओं में इस्तेमाल नहीं होंगी अश्वगंधा की पत्तियां, जानें FSSAI ने इस पर क्यों लगाई रोक?</title>
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        <description><![CDATA[ FSSAI New Health Supplement Rules: अश्वगंधा को लंबे समय से एक ऐसे प्राकृतिक उपाय के रूप में पेश किया जाता रहा है, जो तनाव कम करने से लेकर नींद सुधारने तक हर समस्या में मददगार माना जाता है. आयुर्वेद की यह पुरानी जड़ी-बूटी आज के दौर में वेलनेस इंडस्ट्री का बड़ा हिस्सा बन चुकी है. लेकिन अब इसी अश्वगंधा को लेकर एक बड़ा फैसला सामने आया है, जिसने उपभोक्ताओं और सप्लीमेंट बनाने वाली कंपनियों दोनों को चौंका दिया है.&amp;nbsp;
क्या है मामला?
FSSAI और आयुष मंत्रालय ने अश्वगंधा की पत्तियों के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है. हालांकि यह पूरी तरह से बैन नहीं है, बल्कि एक सीमित प्रतिबंध है. यानी अश्वगंधा के पूरे पौधे पर नहीं, सिर्फ उसकी पत्तियों के उपयोग पर रोक लगाई गई है. वहीं, इसकी जड़ का इस्तेमाल पहले की तरह जारी रहेगा. 16 अप्रैल को जारी आदेश में FSSAI ने राज्यों को सख्त निगरानी रखने के निर्देश दिए हैं. इसके साथ ही यह भी कहा गया है कि अगर कोई कंपनी अश्वगंधा की पत्तियों या उनके एक्सट्रैक्ट का इस्तेमाल करती पाई जाती है, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाए. इसके अलावा कंपनियों को अब यह भी स्पष्ट रूप से बताना होगा कि उनके प्रोडक्ट में पौधे का कौन-सा हिस्सा इस्तेमाल किया गया है.
क्यों लिया गया यह फैसला?
दरअसल, यह फैसला साइंटफिक रिसर्च के आधार पर लिया गया है. रिसर्च में पाया गया है कि अश्वगंधा की पत्तियों में विदेनोलाइड्स नाम के तत्व ज्यादा मात्रा में होते हैं, खासकर विदाफेरिन-ए, जो शरीर पर काफी असर डाल सकते हैं. एक्सपर्ट के मुताबिक, इन तत्वों की अधिकता से लिवर को नुकसान, पेट से जुड़ी समस्याएं और यहां तक कि नर्वस सिस्टम पर भी असर पड़ सकता है.
तेजी से बढ़ रहा अश्वगंधा का इस्तेमाल 
इसी संभावित खतरे को देखते हुए सरकार ने एहतियात के तौर पर यह कदम उठाया है. खासतौर पर ऐसे समय में जब अश्वगंधा का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है और यह कैप्सूल, पाउडर और ड्रिंक्स के रूप में बाजार में आसानी से उपलब्ध है. दूसरी तरफ, अश्वगंधा की जड़ को सुरक्षित माना गया है. आयुर्वेद में सदियों से इसी हिस्से का इस्तेमाल होता आया है और आधुनिक रिसर्च भी इसे सही मात्रा में लेने पर सुरक्षित बताती है. &amp;nbsp;इसलिए नियामक संस्थाओं ने जड़ आधारित उत्पादों को अनुमति दी हुई है.
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क्या मानते हैं एक्सपर्ट?
विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला प्रिकॉशनरी एप्रोच का हिस्सा है, यानी जब तक पूरी तरह से सुरक्षित साबित न हो, तब तक संभावित जोखिम वाले तत्वों से दूरी रखना बेहतर है. डाइटिशियन कनिका मल्होत्रा ने indian express को बताया कि अश्वगंधा शरीर को तनाव से निपटने में मदद करता है, नींद सुधारता है और ऊर्जा बढ़ाने में सहायक होता है, लेकिन पारंपरिक रूप से इसका इस्तेमाल सिर्फ जड़ के रूप में ही किया जाता रहा है.
वहीं, डाइटिशियन गरिमा गोयल कहती हैं कि यह प्रतिबंध उपभोक्ताओं के लिए फायदेमंद है, क्योंकि अब कंपनियों को साफ-साफ बताना होगा कि वे किस हिस्से का उपयोग कर रही हैं. इससे लोगों को यह समझने में आसानी होगी कि वे क्या खा रहे हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 23 Apr 2026 00:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>Explained: भारत में दिन से ज्यादा गर्म क्यों हो गईं रातें? कम नींद, चिड़चिड़ापन और हाई ब्लड प्रेशर से कब मिलेगा सुकून</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/explained-भारत-में-दिन-से-ज्यादा-गर्म-क्यों-हो-गईं-रातें-कम-नींद-चिड़चिड़ापन-और-हाई-ब्लड-प्रेशर-से-कब-मिलेगा-सुकून</link>
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        <description><![CDATA[ भारत में दिन की गर्मी तो सबको पता है, लेकिन अब सूरज ढलने के बाद भी राहत नहीं मिल रही है. रातें पहले से कहीं ज्यादा गर्म हो गई हैं और यह ट्रेंड तेजी से बढ़ रहा है. भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने चेतावनी दी है कि महाराष्ट्र और तेलंगाना के कुछ हिस्सों को छोड़कर पूरे देश में न्यूनतम तापमान सामान्य से ऊपर रहने वाला है. कई जगहों पर न्यूनतम तापमान सामान्य से 6.4 डिग्री सेल्सियस तक ज्यादा हो गया है. IMD के अनुसार, जब न्यूनतम तापमान सामान्य से 4.5 से 6.4 डिग्री ज्यादा होता है तो उसे &#039;वार्म नाइट&#039; कहते हैं और 6.4 डिग्री से ज्यादा को &#039;सीवियर वार्म नाइट&#039;. ये गर्म रातें अब आम हो गई हैं, लेकिन क्यों और कैसे? एक्सप्लेनर में समझते हैं...&amp;nbsp;
सवाल 1: भारत में रात में गर्मी क्यों बढ़ती जा रही है? &amp;nbsp;
जवाब: रातें अब देश की हीट क्राइसिस का बड़ा हिस्सा बन गई हैं. इसके दो बड़े कारण हैं. एक वैश्विक जलवायु परिवर्तन और दूसरा शहरों में बढ़ता शहरीकरण. कंक्रीट, एस्फॉल्ट और शीशे दिन भर सूरज की गर्मी सोख लेते हैं और रात में धीरे-धीरे गर्मी छोड़ते हैं. ऊंची-ऊंची इमारतें हवा का रुख रोक लेती हैं, जिससे गर्मी जमीन के पास ही फंस जाती है.
गर्मी पर रिसर्च रिपोर्ट्स के मुताबिक, शहरों में रात के तापमान में होने वाले 60 प्रतिशत बढ़ोतरी का कारण यही स्थानीय गर्मी रोकना है, जबकि 40 प्रतिशत ग्रीनहाउस गैसों के कारण है. इसके साथ नमी भी बढ़ रही है. उत्तर भारत में 2012-2022 के बीच शहरों में नमी 30-40 प्रतिशत से बढ़कर 40-50 प्रतिशत हो गई.
दिल्ली, चंडीगढ़, जयपुर और लखनऊ में यह बढ़ोतरी 6-9 प्रतिशत तक रही. ज्यादा नमी से पसीना सूखता नहीं और शरीर ठंडा नहीं हो पाता. एयर कंडीशनर चलाने से बाहर और गर्मी निकलती है, जो एक फीडबैक लूप बना रही है. एलनीनो के दौरान यह समस्या और बढ़ जाती है. इस साल एलनीनो विकसित हो रहा है, इसलिए 2026 की सर्दियां और 2027 की गर्मियां खासतौर पर नजर रखने वाली हैं.
&amp;nbsp;

दिल्ली में रात का न्यूनतम तापमान 40 डिग्री सेल्सियस तक रहता है

सवाल 2: कितनी तेजी से बढ़ रही हैं गर्म रातें?
जवाब: 2025 में ScienceDirect ने 1980-2020 के बीच यानी 40 सालों की एक स्टडी की. इसके मुताबिक, गर्म रातें हर दशक में 2 से 8 दिन बढ़ गई हैं, खासकर पूर्वोत्तर, उत्तर-पश्चिम और प्रायद्वीपीय भारत में. काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (CEEW) की 2025 जिला-स्तरीय रिपोर्ट कहती है कि 734 जिलों में से 417 जिले यानी आधे से ज्यादा हाई या वेरी हाई हीट रिस्क जोन में हैं. इनमें दिल्ली, महाराष्ट्र, गोवा, केरल, गुजरात, राजस्थान, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश शामिल हैं.
पूरे देश की 76 प्रतिशत आबादी इन हाई रिस्क जोनों में रहती है. 2012-2022 के बीच बड़े शहरों में गर्म रातों की संख्या बढ़ी है. मुंबई में हर गर्मी में 15 अतिरिक्त बहुत गर्म रातें, बेंगलुरु में 11, भोपाल और जयपुर में 7-7 और दिल्ली में 6 हो गई हैं. CEEW रिपोर्ट के मुताबिक, गर्म रातें गर्म दिनों से भी तेजी से बढ़ रही हैं.
शहर अब रात में &#039;ओवन&#039; जैसा महसूस होता है. खराब शहरी प्लानिंग, कम हरियाली, सूखते जल स्रोत, कंक्रीट बढ़ना और तीन लैंडफिल ने गर्मी बढ़ा दी है. मुंबई, बेंगलुरु, भोपाल, जयपुर, चेन्नई और दिल्ली जैसे बड़े शहरों में गर्म रातें सबसे ज्यादा बढ़ी हैं. स्मार्ट सिटी स्टडी (2001-2024) में श्रीनगर में दिन और कंपाउंड हीटवेव सबसे ज्यादा, गुजरात के दाहोद में सबसे तीव्र कंपाउंड हीटवेव और वाराणसी में सबसे तीव्र नाइट-टाइम हीटवेव दर्ज हुई.
सवाल 3: क्यों कहते हैं कि गर्म रातें दिन से भी ज्यादा खतरनाक हैं? &amp;nbsp;
जवाब: मेडिकल एक्सपर्ट्स कहते हैं कि दिन में गर्मी पड़ती है तो रात में शरीर ठंडा होकर रिकवर करता है, लेकिन गर्म रातों में यह राहत नहीं मिलती. इससे डिहाइड्रेशन, नींद खराब होना, हाई ब्लड प्रेशर, थकान, चिड़चिड़ापन और हीट-स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है. बुजुर्ग, बच्चे और दिल-फेफड़ों के मरीज सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं.
मुंबई के ग्लेनीगल्स हॉस्पिटल की डॉ. मंजुषा अग्रवाल कहती हैं, &#039;यह डिहाइड्रेशन, नींद की समस्या, हाई ब्लड प्रेशर और हीट संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ाता है. बार-बार गर्म रातें थकान, चिड़चिड़ापन और लगातार हीट स्ट्रेस बढ़ाती हैं.&#039;
गर्म रातों की वजह से सिरदर्द, चक्कर, थकान, मांसपेशियों में ऐंठन, डिहाइड्रेशन और नींद की कमी आम हो गई है. इससे याददाश्त कम होना, एकाग्रता की समस्या, चिंता और डिप्रेशन भी हो सकता है. 1998-2017 के बीच दुनिया में 1.66 लाख लोगों की मौत हीटवेव से हुई थी. भारत में 2023 में 48,000 हीटस्ट्रोक केस और 159 मौतें दर्ज हुईं, लेकिन असली संख्या ज्यादा है.
&amp;nbsp;

गर्म रातों में सबसे बड़ी बीमारी नींद की समस्या बन जाती है

सवाल 4: रोजमर्रा की जिंदगी और अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ रहा है? &amp;nbsp;
जवाब: गर्म रातों से काम की क्षमता घट रही है. CSE रिपोर्ट के मुताबिक, 2030 तक भारत में ग्लोबल वार्मिंग से 5.8 प्रतिशत वर्किंग ऑवर्स (करीब 3.4 करोड़ फुल-टाइम जॉब्स) गंवाने का अनुमान है. रात में AC चलाने से बिजली की मांग बढ़ती है और बाहर गर्मी निकलने से समस्या और बढ़ती है. मजदूरों और आउटडोर वर्कर्स को दिन-रात दोनों समय गर्मी झेलनी पड़ रही है.
सवाल 5: तो क्या वो चांदनी में ठंडी रातें कभी लौट कर नहीं आएंगी?
जवाब: 2015-2100 के बीच एक 2025 मॉडलिंग स्टडी के अनुसार, गर्म रातें हर दशक में 10 से 13 दिन बढ़ सकती हैं. कंपाउंड हीटवेव और आम होंगे. बचाव के लिए शहरों में कूल रूफ, रिफ्लेक्टिव पेवमेंट, ज्यादा पेड़, बेहतर हवा के रास्ते और कम कंक्रीट जरूरी है. सरकार और शहरों को शहरी प्लानिंग सुधारनी होगी. IMD अब रात के तापमान की भी चेतावनी दे रहा है. कुल मिलाकर अगर इंसान अपने दिनचर्या के तरीके सुधार ले, तो पर्यावरण सुधरेगा जिससे ठंडी चांदनी रातें लौट सकती हैं. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 22 Apr 2026 08:30:06 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Explained:, भारत, में, दिन, से, ज्यादा, गर्म, क्यों, हो, गईं, रातें, कम, नींद, चिड़चिड़ापन, और, हाई, ब्लड, प्रेशर, से, कब, मिलेगा, सुकून</media:keywords>
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        <title>Right Time For Exercise: क्या है एक्सरसाइज करने का सही वक्त, जानिए अचानक हार्ट अटैक के शिकार क्यों हो रहे युवा?</title>
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        <description><![CDATA[ Right Time For Exercise: आज के समय में फिट शरीर को लेकर युवाओं में काफी जागरूकता बढ़ गई है. हर कोई चाहता है कि उसका शरीर मजबूत, फिट और मस्कुलर दिखे. इसी वजह से जिम जाना और एक्सरसाइज करना अब एक आम आदत बन गई है, लेकिन चिंता की बात यह है कि पिछले कुछ सालों में युवाओं में हार्ट अटैक और अचानक कार्डियक अरेस्ट के मामले तेजी से बढ़े हैं. खासकर वे लोग जो नियमित रूप से जिम जाते हैं या भारी वर्कआउट करते हैं, उनमें भी ऐसे मामले सामने आ रहे हैं. ऐसे में आइए आज हम आपको बताते हैं कि एक्सरसाइज का सही समय क्या है, और क्यों कुछ गलत आदतें या लापरवाही हार्ट अटैक का कारण बन सकती हैं.&amp;nbsp;
एक्सरसाइज करना हार्ट के लिए कितना फायदेमंद होती है?
आमतौर पर एक्सरसाइज को सेहत के लिए बहुत अच्छा माना जाता है. यह वजन कम करने, मसल्स मजबूत करने और दिल को स्वस्थ रखने में मदद करती है, लेकिन अगर एक्सरसाइज गलत तरीके से या जरूरत से ज्यादा की जाए, तो यह शरीर और दिल पर उल्टा असर भी डाल सकती है.&amp;nbsp;
क्यों बढ़ रहा है युवाओं में हार्ट अटैक का खतरा?
1. अचानक बहुत ज्यादा हार्ड वर्कआउट करना -&amp;nbsp;कई लोग बिना तैयारी के सीधे भारी वजन उठाना, तेज दौड़ना या हाई-इंटेंसिटी एक्सरसाइज शुरू कर देते हैं. इससे दिल पर अचानक दबाव पड़ता है, जो खतरनाक हो सकता है.&amp;nbsp;
2. पहले से मौजूद दिल की बीमारी का पता न होना -&amp;nbsp;बहुत से लोगों को पता ही नहीं होता कि उन्हें ब्लॉकेज, हाई बीपी या दिल की कोई समस्या है. ऐसे में ज्यादा मेहनत वाली एक्सरसाइज दिल के लिए जोखिम बढ़ा सकती है.&amp;nbsp;
3.शरीर में पानी की कमी (डिहाइड्रेशन) -वर्कआउट के दौरान पसीना निकलता है. अगर पानी या इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी हो जाए तो दिल की धड़कन और ब्लड प्रेशर प्रभावित हो सकते हैं.&amp;nbsp;
4. गलत डाइट और सप्लीमेंट का इस्तेमाल - कुछ लोग एनर्जी ड्रिंक, स्टेरॉयड या बिना सलाह के सप्लीमेंट लेते हैं. ये चीजें दिल की धड़कन को तेज कर सकती हैं और खतरा बढ़ा सकती हैं.&amp;nbsp;
5. बहुत ज्यादा गर्मी या ठंड में एक्सरसाइज - बहुत ज्यादा गर्मी या ठंड के मौसम में एक्सरसाइज करने से शरीर पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है, जिससे हार्ट पर असर हो सकता है.
यह भी पढ़ें - Height Increase Tips: किन तरीकों से उम्र निकलने के बाद भी बढ़ा सकते हैं लंबाई? जानिए ये आसान तरीके
क्या है एक्सरसाइज करने का सही वक्त?
एक्सरसाइज का सही समय हर व्यक्ति के रूटीन और शरीर की जरूरत पर निर्भर करता है. सुबह एक्सरसाइज करने से मेटाबॉलिज्म तेज होता है, शरीर दिनभर एक्टिव रहता है, मानसिक तनाव कम होता है और मूड बेहतर रहता है, हालांकि सुबह शरीर थोड़ा जकड़ा हुआ होता है इसलिए वार्म-अप जरूरी है. वहीं शाम के समय एक्सरसाइज करने से शरीर ज्यादा लचीला होता है, ताकत बेहतर महसूस होती है, चोट लगने का खतरा कम होता है और तनाव भी कम होता है, लेकिन कुछ लोगों में देर शाम की एक्सरसाइज नींद को प्रभावित कर सकती है.&amp;nbsp;
किन लोगों को ज्यादा सावधानी रखनी चाहिए?
जिनको पहले से हार्ट प्रॉब्लम है, हाई बीपी या डायबिटीज वाले लोग, बहुत ज्यादा मोटापे से परेशान लोग, लंबे समय से एक्सरसाइज न करने वाले लोगों को ज्यादा सावधानी रखनी चाहिए. साथ ही एकदम से भारी वर्कआउट शुरू करना गलत है. शरीर को समय देना जरूरी है. एक्सरसाइज से पहले और बाद में हल्की स्ट्रेचिंग करनी चाहिए. वर्कआउट के दौरान सांस रोकना दिल पर दबाव डाल सकता है. अगर चक्कर, सीने में दर्द या घबराहट महसूस हो तो तुरंत एक्सरसाइज रोक दें.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ें - Morning Heel Pain: सुबह उठते ही एड़ियों में होता है दर्द, जानें यह किस बीमारी का है संकेत?
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 22 Apr 2026 08:30:04 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Height Increase Tips: किन तरीकों से उम्र निकलने के बाद भी बढ़ा सकते हैं लंबाई? जानिए ये आसान तरीके</title>
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        <description><![CDATA[ Height Increase Tips: आखिर लंबी हाईट कौन नहीं चाहता, हर किसी की यही ख्वाहिश होती है कि उसकी हाईट परफेक्ट हो. लेकिन कई लोगों का मानना है कि एक उम्र के बाद लंबाई नहीं बढ़ती. हालांकि हमारे शरीर में हड्डियों की ग्रोथ एक तय उम्र तक ही होती है. साथ ही ऐसा माना जाता है कि लंबाई का 60 से 80 प्रतिशत हिस्सा आपके जेनेटिक्स से आता है जिसे आप कंट्रोल नहीं कर सकते. लेकिन बाकी का 40 से 20 प्रतिशत हिस्सा आप कंट्रोल कर सकते हैं, ऐसे में आपको बता दें कि सही जानकारी होने से आप आसानी से अपने शरीर की पोस्टर और पर्सनैलिटी को बेहतर बना सकते हैं. अगर आप भी अपनी हाईट को लेकर परेशान हैं तो घबराने की जरूरत नहीं है. सही लाइफस्टाइल, डाइट और कुछ एक्सरसाइज से आप अच्छा फर्क महसूस कर सकते हैं.
अच्छी नींद और सही लाइफस्टाइल अपनाएं
लंबाई और शरीर के विकास में अच्छी नींद का भी अहम योगदान होता है. रोजाना 6 से 8 घंटे की गहरी नींद लेने से शरीर को आराम मिलता है और ग्रोथ हार्मोन बेहतर तरीके से काम करता है, इसलिए पर्याप्त नींद लेना भी लंबाई बढ़ाने का तरीका हो सकता है. साथ ही सही तरीके से बैठना और चलना भी जरूरी है, क्योंकि गलत पोस्टर आपकी लंबाई को कम दिखा सकता है. जैसे झुक कर खड़ा होना, कमर सीधी करके न बैठना. ऐसे में अगर आप अपनी रोजमर्रा की आदतों में सुधार करते हैं, तो आप न केवल लंबा दिख सकते हैं बल्कि खुद को ज्यादा कॉन्फिडेंट भी महसूस करा सकते हैं.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ेंः पेन किलर लेने के तुरंत बाद कैसे खत्म हो जाता है शरीर का दर्द, कैसे काम करती है दवा?
बैलेंस डाइट और सही पोषण जरूरी
बैलेंस डाइट लेने से शरीर की ओवरऑल ग्रोथ में मदद मिलती है, जिससे हाईट बढ़ने के चांस काफीहद तक बढ़ जाते हैं. इसलिए एक्सपर्ट का मानना है कि अगर आप अपनी लंबाई और बॉडी ग्रोथ को बेहतर करना चाहते हैं, तो सही डाइट लेना बहुत जरूरी है. ऐसे में अगर आप कम उम्र से ही अच्छी डाइट लेते है तो जाहिर सी बात है आपको हाईट बढ़ाने के लिए उतनी मेहनत नहीं करनी पड़ेगी. अच्छी डाइट में &amp;nbsp;प्रोटीन, कैल्शियम और विटामिन से भरपूर भोजन जैसे दूध, दही, हरी सब्जियां और फल लें जो आपके शरीर को मजबूती देगा . साथ ही पानी ज्यादा पीना भी जरूरी है, ताकि शरीर हाइड्रेट रहे. इसके अलावा जंक फूड और ज्यादा तेल वाली चीजों से दूरी बनाकर आप अपनी सेहत को बेहतर रख सकते हैं, जिससे आपकी ओवरऑल ग्रोथ पर अच्छा असर पड़ता है.
सही एक्सरसाइज और स्ट्रेचिंग का महत्व
लंबाई को बेहतर दिखाने में एक्सरसाइज और स्ट्रेचिंग का बहुत बड़ा रोल होता है. रोजाना स्ट्रेचिंग करने से शरीर की मसल्स लचीली बनती हैं और रीढ़ की हड्डी सीधी रहती है.बच्चों, युवाओं और हाइट बढ़ाने वाले लोगों को दिन में कम से कम 20 से 30 मिनट एक्सरसाइज जरूर करनी चाहिए. &amp;nbsp;जैसे कि हैंगिंग, टो टच और योगासन करना काफी फायदेमंद होता है. &amp;nbsp;इससे आपकी बॉडी की पोस्टर सुधरती है और आप पहले से ज्यादा लंबे नजर आते हैं. &amp;nbsp;
यह भी पढ़ेंः &amp;nbsp;शरीर में आयरन कम है तो हल्के में न लें, हो सकता है अल्जाइमर; इस देश में 1 करोड़ लोगों पर खतरा ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 21 Apr 2026 20:30:14 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Height, Increase, Tips:, किन, तरीकों, से, उम्र, निकलने, के, बाद, भी, बढ़ा, सकते, हैं, लंबाई, जानिए, ये, आसान, तरीके</media:keywords>
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        <title>Microplastics Health Risk: दिनभर च्विंगम चबाते हैं तो हो जाएं सावधान, पापा बनने में आ सकती है दिक्कत</title>
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        <description><![CDATA[ Does Chewing Gum Affect Male Fertility: ऑफिस जाते समय कॉफी लेना, दिनभर च्युइंग गम चबाना या जिम वियर पहनना, ये सब हमारी रोजमर्रा की आदतें हैं. लेकिन अब एक्सपर्ट चेतावनी दे रहे हैं कि ये छोटी-छोटी चीजें आपकी फर्टिलिटी पर असर डाल सकती हैं. खासकर च्युइंग गम, जो देखने में बिल्कुल सामान्य लगता है, अंदर ही अंदर बड़ा खतरा बन सकता है. चलिए आपको बताते हैं कि ये कैसे आपके फर्टिलिटी को प्रभावित करते हैं.&amp;nbsp;
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
फर्टिलिटी एक्सपर्ट Dr Phoebe Howells के मुताबिक, इसके पीछे वजह है माइक्रोप्लास्टिक्स. ये बेहद छोटे प्लास्टिक कण होते हैं, जो हमारे आसपास की चीजों, जैसे पैकेजिंग, कपड़े, और यहां तक कि च्युइंग गम से निकलकर शरीर में पहुंच जाते हैं. हालिया रिसर्च में यह सामने आया है कि एक च्युइंग गम चबाने से सैकड़ों माइक्रोप्लास्टिक कण शरीर में जा सकते हैं, जिनमें से ज्यादातर पहले कुछ मिनटों में ही रिलीज हो जाते हैं. यही कण धीरे-धीरे शरीर में जमा होकर हार्मोनल सिस्टम को प्रभावित करते हैं.&amp;nbsp;
पुरुषों और महिलाओं पर क्या होता है प्रभाव?
डॉ. हॉवेल्स बताती हैं कि माइक्रोप्लास्टिक्स में मौजूद केमिकल्सस जैसे BPA, फ्थेलेट्स और PFAS शरीर के हार्मोन को डिस्टर्ब कर सकते हैं. पुरुषों में यह स्पर्म काउंट, क्वालिटी और मूवमेंट पर असर डाल सकते हैं, जबकि महिलाओं में ओव्यूलेशन और पीरियड साइकल पर असर पड़ सकता है.
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क्या निकला रिसर्च में
यूरोपियन सोसाइटी ऑफ ह्यूमन रिप्रोडक्शन एंड एम्ब्रियोलॉजी में पेश एक 2025 की स्टडी में पाया गया कि फर्टिलिटी ट्रीटमेंट करा रही महिलाओं के 69 प्रतिशत सैंपल और पुरुषों के 55 प्रतिशत सैंपल में माइक्रोप्लास्टिक्स मौजूद थे. &amp;nbsp;वहीं यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू मेक्सिको की 2024 की रिसर्च में मानव टेस्टिकल टिशू में भी माइक्रोप्लास्टिक्स पाए गए.&amp;nbsp;
किन चीजों से होती है दिक्कत?
समस्या सिर्फ च्युइंग गम तक सीमित नहीं है। चाय के टी-बैग, टेकअवे कॉफी कप, प्लास्टिक कंटेनर और सिंथेटिक कपड़े, ये सभी माइक्रोप्लास्टिक्स के बड़े सोर्स हैं. खासकर गर्म चीजों के संपर्क में आने पर इनसे ज्यादा कण निकलते हैं, जो सीधे शरीर में पहुंच जाते हैं. डॉक्टरों का कहना है कि प्लास्टिक को पूरी तरह से जीवन से हटाना संभव नहीं है, क्योंकि यह हर जगह मौजूद है. लेकिन छोटे-छोटे बदलाव करके इसके असर को कम किया जा सकता है. जैसे प्लास्टिक की जगह ग्लास या सिरेमिक का इस्तेमाल करना, ढीले-ढाले और नेचुरल फैब्रिक पहनना और च्युइंग गम की जगह नेचुरल विकल्प चुनना.
फर्टिलिटी सिर्फ उम्र या खानपान पर निर्भर नहीं करती, बल्कि हमारे आसपास का माहौल भी इसमें बड़ी भूमिका निभाता है. अगर आप भविष्य में पैरेंट बनने की योजना बना रहे हैं, तो इन छोटी आदतों पर ध्यान देना जरूरी है. क्योंकि कई बार जो चीजें हमें सबसे सामान्य लगती हैं, वही लंबे समय में सबसे ज्यादा असर डालती हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 20 Apr 2026 12:30:05 +0530</pubDate>
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        <title>Alzheimer Risk Factors: शरीर में आयरन कम है तो हल्के में न लें, हो सकता है अल्जाइमर; इस देश में 1 करोड़ लोगों पर खतरा</title>
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        <description><![CDATA[ Can Iron Deficiency Increase Alzheimer Risk: आयरन की कमी को अक्सर लोग सिर्फ कमजोरी या थकान से जोड़कर देखते हैं. लेकिन अब नई रिसर्च इस धारणा को बदल रही है. साइंटिस्ट का कहना है कि शरीर में कम हीमोग्लोबिन सिर्फ ऊर्जा ही नहीं, बल्कि दिमाग पर भी असर डाल सकता है और यह असर धीरे-धीरे डिमेंशिया जैसी गंभीर बीमारी की ओर ले जा सकता है. 17 अप्रैल 2026 को जामा नेटवर्क ओपन में प्रकाशित एक स्टडी ने इस कड़ी को और मजबूत किया है. इसमें कैरोलिंस्का इंस्टीट्यूट &amp;nbsp;और स्टॉकहोम विश्वविद्यालय के रिसर्चर ने 2200 से ज्यादा बुजुर्गों पर लंबे समय तक स्टडी किया.
क्या निकला रिसर्च में?
इस रिसर्च में देखा गया कि जिन लोगों में एनीमिया था, उनके खून में अल्जाइमर से जुड़े बायोमार्कर पहले से ही ज्यादा थे. इसके साथ ही, फॉलो-अप के दौरान उनमें डिमेंशिया विकसित होने का खतरा भी ज्यादा पाया गया. यानी आयरन की कमी सिर्फ एक साधारण समस्या नहीं, बल्कि दिमागी बीमारियों का संकेत भी हो सकती है. स्टडी के मुताबिक, जिन लोगों में कम हीमोग्लोबिन और अल्जाइमर से जुड़े प्रोटीन जैसे p-tau217 दोनों मौजूद थे, उनमें डिमेंशिया का जोखिम सबसे ज्यादा था. यह संकेत देता है कि शरीर में खून की कमी और दिमागी बदलाव एक-दूसरे से जुड़े हो सकते हैं.&amp;nbsp;
आयरन की कमी से क्या होती है दिक्कत?
आयरन की कमी से शरीर में ऑक्सीजन की सप्लाई भी प्रभावित होती है. जब ब्रेन को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलती, तो उसकी कार्यक्षमता धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगती है. यही कारण है कि एनीमिया को अब केवल शारीरिक नहीं, बल्कि न्यूरोलॉजिकल समस्या के तौर पर भी देखा जा रहा है. एक और दिलचस्प बात यह सामने आई कि पुरुषों में एनीमिया होने पर डिमेंशिया का खतरा महिलाओं के मुकाबले ज्यादा देखा गया, जबकि महिलाओं में यह समस्या ज्यादा आम होती है. रिसर्चर का मानना है कि इसके पीछे शरीर की अलग-अलग जैविक प्रतिक्रिया जिम्मेदार हो सकती है.&amp;nbsp;
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कितने लोग इससे प्रभावित?
आंकड़ों के अनुसार, दुनियाभर में करीब 1.2 अरब लोग आयरन की कमी से होने वाले एनीमिया से प्रभावित हैं. वहीं यूके में ही लगभग 1 करोड़ लोग इस समस्या से जूझ रहे हैं, जो इसे एक बड़ी पब्लिक हेल्थ चिंता बना देता है.
क्या इसका कोई इलाज है?
अच्छी बात यह है कि आयरन की कमी को काफी हद तक रोका जा सकता है. संतुलित आहार, आयरन से भरपूर फूड, जैसे हरी पत्तेदार सब्जियां, अनाज और रेड मीट और जरूरत पड़ने पर सप्लीमेंट लेने से इसे कंट्रोल किया जा सकता है. एक्सपर्ट का मानना है कि अगर समय रहते एनीमिया की पहचान और इलाज किया जाए, तो डिमेंशिया के खतरे को कम किया जा सकता है. क्योंकि लगभग 45 प्रतिशत मामलों में सही लाइफस्टाइल और समय पर जांच से इस बीमारी को टाला या धीमा किया जा सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 20 Apr 2026 12:30:04 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Pain killers: पेन किलर लेने के तुरंत बाद कैसे खत्म हो जाता है शरीर का दर्द, कैसे काम करती है दवा?</title>
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        <description><![CDATA[ Pain killers: जब शरीर में किसी प्रकार का दर्द होता है, तो लोग अक्सर पेन किलर का रुख करते हैं. खास बात यह है कि दवा लेने के कुछ ही समय बाद दर्द कम होना शुरू हो जाता है. आखिर यह कैसे संभव हो पाता है? शरीर में दर्द उठते ही यह एक प्रकार का संकेत होता है कि कहीं न कहीं कोई समस्या, चोट या सूजन हुई है. जब भी यह दर्द होता है, तो शरीर में Prostaglandius नामक केमिकल बनते हैं, जो नसों के जरिए दिमाग को संकेत देते हैं कि कहां दर्द हो रहा है.
कैसे काम करती है पेन किलर?
अधिकांश पेन किलर जैसे paracetamol और ibuprofen, शरीर में इन दर्द पैदा करने वाले केमिकल्स के निर्माण को कम करने में सहायक होती हैं. ये दवाइयां Prostaglandius के बनने की प्रक्रिया को रोकने में मदद करती हैं. जब ये केमिकल कम बनते हैं, तो नसों तक दर्द का संकेत कम पहुंचता है. परिणामस्वरूप, हमें दर्द में राहत महसूस होने लगती है.
क्यों दिखता है इतनी जल्दी असर?
ये दवाइयां पेट में जाते ही जल्दी से खून में जाकर घुल जाती हैं. खून के जरिए ये फिर तेजी से पूरे शरीर में पहुंचती हैं. ये खास रूप से दिमाग और दर्द वाले हिस्से पर अपना असर दिखाती हैं. आमतौर पर, अधिकांश पेन किलर 20 से 30 मिनट के भीतर ही असर दिखाना शुरू कर देती हैं.
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कितने प्रकार के होते हैं पेन किलर?
पेन किलर अलग-अलग प्रकार के होते हैं और उनका काम करने का तरीका भी अलग-अलग होता है.

Analgesics - आम पेन किलर जैसे paracetamol, दर्द और बुखार को कम करती हैं, लेकिन सूजन पर ज्यादा असर नहीं डाल पातीं.
NSAIDs - ibuprofen जैसी दवाइयां, जो दर्द के साथ-साथ सूजन पर भी असर दिखाती हैं.
Opioids - ये तब दिए जाते हैं जब दर्द नियंत्रित नहीं हो पा रहा हो, क्योंकि ये सीधे दिमाग पर असर डालती हैं. लेकिन इन्हें बिना डॉक्टर की सलाह के लेना हानिकारक हो सकता है.

पेन किलर को सही मात्रा और जरूरत के हिसाब से ही इस्तेमाल करना चाहिए. ज्यादा या बार-बार लेने से पेट में जलन या अल्सर, किडनी या लिवर पर असर और ब्लड प्रेशर बढ़ने जैसे साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं.
सावधानियां बरतनी हैं जरूरी

हमेशा निर्धारित मात्रा में ही दवा लें.
खाली पेट पेन किलर लेने से बचें.
अगर दर्द लंबे समय तक रहे, तो तुरंत डॉक्टर से मिलें.
बच्चों और बुजुर्गों को दवा देते समय विशेष सावधानी बरतें.

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        <pubDate>Mon, 20 Apr 2026 12:30:03 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Pain, killers:, पेन, किलर, लेने, के, तुरंत, बाद, कैसे, खत्म, हो, जाता, है, शरीर, का, दर्द, कैसे, काम, करती, है, दवा</media:keywords>
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        <title>Sleep Apnea Risk: स्लीप एपनिया कर रहा परेशान तो हो जाएं अलर्ट, वरना चुपके&amp;चुपके दबोच लेगी मौत</title>
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        <description><![CDATA[ How Sleep Apnea Increases Heart Disease Risk: नींद को अक्सर हम शरीर के आराम और रिकवरी का समय मानते हैं. लेकिन दुनिया भर में लाखों लोग ऐसे हैं जिनके लिए नींद उतनी सुकूनभरी नहीं होती जितनी होनी चाहिए. एक आम लेकिन नजरअंदाज की जाने वाली समस्या है ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया, जो सोते समय सांस लेने की प्रक्रिया को बार-बार बाधित करती है. चलिए आपको बताते हैं कि यह कितना खतरनाक साबित हो सकता है आपके लिए और इसको लेकर रिसर्च में क्या निकला है.&amp;nbsp;
क्या निकला रिसर्च में?
हाल ही में यूरोपियन कांग्रेस ऑन ओबेसिटी 2026 में पेश की जाने वाली एक बड़ी स्टडी ने इस समस्या को लेकर गंभीर संकेत दिए हैं. इसमें पाया गया कि स्लीप एपनिया से जूझ रहे लोगों में दिल से जुड़ी बीमारियों या मौत का खतरा 71 प्रतिशत तक ज्यादा हो सकता है. यह रिसर्च लंदन के इंपीरियल कॉलेज हेल्थ पार्टनर्स और इम्पीरियल कॉलेज हेल्थकेयर एनएचएस ट्रस्ट के साइंटिस्ट ने की, जिसे एली-लिली एंड कंपनी का भी सपोर्ट मिला.
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स्लीप एपनिया क्या होता है?
स्लीप एपनिया तब होता है जब सोते समय बार-बार एयरवे ब्लॉक हो जाता है, जिससे सांस कुछ समय के लिए रुक जाती है. शरीर तुरंत प्रतिक्रिया देता है और व्यक्ति हल्के से जागता है, ताकि सांस दोबारा शुरू हो सके. यह प्रक्रिया रात में कई बार दोहराई जाती है, जिससे नींद की क्वालिटी खराब होती है और शरीर में ऑक्सीजन का स्तर गिरता है. लंबे समय तक ऐसा होने से दिल और ब्लड वेसल्स पर दबाव बढ़ता है. इससे ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है, हार्ट रिदम बिगड़ सकती है और शरीर में सूजन बढ़ सकती है. यही वजह है कि स्लीप एपनिया को दिल की बीमारियों से जोड़कर देखा जाता है.&amp;nbsp;
मोटापे से क्या है कनेक्शन?
इस समस्या का मोटापे से भी गहरा संबंध है। लगभग 40 से 70 प्रतिशत स्लीप एपनिया के मरीज ओवरवेट या मोटापे से ग्रस्त होते हैं. गर्दन के आसपास जमा फैट एयरवे को संकरा कर देता है, जिससे सांस लेने में रुकावट बढ़ती है. वहीं स्लीप एपनिया खुद वजन कम करना मुश्किल बना देता है, जिससे एक खतरनाक चक्र बन जाता है. इस स्टडी में करीब 29 लाख लोगों के हेल्थ रिकॉर्ड का एनालिसिस किया गया. इनमें 20,000 से ज्यादा स्लीप एपनिया के मरीजों की तुलना लगभग 1 लाख ऐसे लोगों से की गई, जिन्हें यह समस्या नहीं थी. चार साल तक इन लोगों की निगरानी की गई.&amp;nbsp;
क्या निकला रिजल्ट?
नतीजे काफी चिंताजनक रहे. स्लीप एपनिया वाले लगभग 26 प्रतिशत लोगों को हार्ट अटैक, स्ट्रोक या मौत जैसी गंभीर स्थिति का सामना करना पड़ा, जबकि बिना एपनिया वाले लोगों में यह आंकड़ा करीब 17 प्रतिशत था. सिर्फ हार्ट की बीमारी ही नहीं, बल्कि स्लीप एपनिया से जुड़े लोगों में डायबिटीज, मोटापा, जोड़ों की समस्याएं और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी दिक्कतें भी ज्यादा देखी गईं. इसके साथ ही, ऐसे लोग हेल्थकेयर सेवाओं का ज्यादा उपयोग करते हैं.
हालांकि इसके इलाज मौजूद हैं, जैसे CPAP मशीन, जो सोते समय एयरवे को खुला रखती है. लेकिन कई लोग या तो इस बीमारी से अनजान रहते हैं या सही इलाज नहीं ले पाते, जिससे खतरा और बढ़ जाता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 20 Apr 2026 00:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Heart attack in women: 30 की उम्र में ही दिल पर मंडराने लगता है खतरा, महिलाओं को जरूर रहना चाहिए अलर्ट</title>
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        <description><![CDATA[ हार्ट अटैक दिन-प्रतिदिन सामान्य होते जा रहे हैं. यह सुनने में अजीब तो लग रहा होगा, लेकिन यह डरावना सत्य हमें सतर्क करने के लिए काफी है. फिर भी लोग इस बात को काफी नजरअंदाज कर रहे हैं, जैसे कि यह कोई समस्या ही नहीं है. अगर बात करें महिलाओं की, तो 30 से 40 साल की उम्र के बीच की महिलाओं को यह खतरा कुछ ज्यादा ही तेजी से घेरता जा रहा है. महिलाएं ज्यादातर शुरुआती चेतावनी संकेतों को नजरअंदाज कर देती हैं, जिससे सही समय पर जांच नहीं हो पाती और जब होती है, तब तक काफी देर हो जाती है.
हाल की कहानी
साउथ मुंबई में रहने वाली 35 साल की वर्किंग प्रोफेशनल ऋचा कुमार दो बच्चों की मां हैं. उन्होंने हमेशा अपने आप को फिट समझा. वह हमेशा थोड़ी सी थकान और छाती में हल्के दर्द जैसे इशारों को काम के लोड के कारण होने वाली तकलीफ समझकर नजरअंदाज करती रहीं. जनवरी 2026 में अचानक सीने में तेज दर्द होने के कारण उन्हें हार्ट अटैक आया. आगे जांच करने पर पता चला कि यह जेनेटिकली जुड़ा हुआ है, क्योंकि उनके पापा को भी उनकी 35 की उम्र में यह दिक्कतें आई थीं. ऋचा ने समय रहते एंजियोप्लास्टी करवाई और चौथे दिन ही 80 प्रतिशत ब्लॉकेज से राहत पा ली.
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एक्सपर्ट की राय
Dr. Bipeenchandra Bhaame के अनुसार, &quot;ऐसे बहुत मरीज हैं जो कम उम्र में ही दिल से जुड़ी बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं.&quot; आगे बताते हुए उन्होंने कहा, &quot;हम युवा महिलाओं, खासकर 30 से 40 के बीच की महिलाओं में ये लक्षण ज्यादा देख रहे हैं. जेनेटिक्स इसमें एक अहम भूमिका निभाता है. बहुत से लोगों को मोटापे की दिक्कत या तंबाकू की लत नहीं होती, फिर भी वे अपने पारिवारिक इतिहास के कारण इसका शिकार बन जाते हैं. महिलाएं समय के अभाव के कारण हल्के सीने के दर्द और सांस फूलने जैसी परेशानियों को नजरअंदाज कर देती हैं. इन सब से लड़ने के लिए संतुलित आहार, रोजाना व्यायाम, तनाव प्रबंधन और ध्यान काफी मददगार साबित होते हैं.&quot;
Dr. Sonamm Tiwari के अनुसार, &quot;महिलाओं की हृदय से जुड़ी सेहत उनकी जिम्मेदारियों के कारण नजरअंदाज कर दी जाती है, क्योंकि महिलाओं में पुरुषों जैसे लक्षण नहीं दिखते. हार्मोनल बदलाव और गर्भावस्था से जुड़ी समस्याएं उनके दिल पर असर डाल सकती हैं. महिलाओं में थकावट, पीठ का दर्द, जबड़े का दर्द जैसे संकेत देखने को मिलते हैं. समय पर जांच एक अहम भूमिका निभाती है, इसलिए इसे नजरअंदाज न करें.&quot;
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        <pubDate>Mon, 20 Apr 2026 00:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Mouth Breathing Effects: क्या सुबह उठकर आपको भी लगती है थकान? मुंह से सांस लेने की आदत हो सकती है वजह</title>
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        <description><![CDATA[ How Mouth Breathing Affects Sleep Quality: सांस लेना एक ऐसी प्रक्रिया है, जिस पर हम शायद ही कभी ध्यान देते हैं. लेकिन यही साधारण-सी लगने वाली आदत हमारे शरीर की ऊर्जा, नींद और लंबी अवधि की सेहत को गहराई से प्रभावित कर सकती है. खासकर तब, जब सांस नाक की बजाय मुंह से ली जा रही हो और वो भी बिना हमें पता चले. अक्सर लोग मानते हैं कि मुंह से सांस लेना सिर्फ तब होता है जब नाक बंद हो या भारी एक्सरसाइज चल रही हो. लेकिन कई मामलों में यह एक आदत बन जाती है, खासकर नींद के दौरान. सुबह उठते समय सूखे होंठ, बार-बार प्यास लगना या हल्की थकान ये सब संकेत हो सकते हैं कि सांस लेने का तरीका बदल गया है.&amp;nbsp;
क्या कहते हैं एक्सपर्ट
बेंगलुरु के SDMIAH में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. सम्हिता उल्लोड बताती हैं कि &quot;मुंह से सांस लेना यानी नाक की जगह मुंह से सांस लेना एक असामान्य स्थिति मानी जाती है, खासकर अगर यह नींद के दौरान लगातार हो। ऐसे मामलों में सही जांच और इलाज जरूरी होता है.&quot; असल में हमारा शरीर नाक से सांस लेने के लिए ही बना है. नाक सिर्फ हवा का रास्ता नहीं, बल्कि एक प्राकृतिक फिल्टर की तरह काम करती है. यह हवा को साफ करती है, उसमें नमी जोड़ती है और धूल व बैक्टीरिया को रोकती है. जब हम मुंह से सांस लेते हैं, तो ये पूरी प्रक्रिया छूट जाती है.
क्या होती है दिक्कत
डॉ. उल्लोड के मुताबिक &quot;नाक से सांस लेने पर हवा फिल्टर होती है, ह्यूमिडिफाई होती है और हानिकारक कणों को शरीर में जाने से रोका जाता है.&quot; लेकिन मुंह से सांस लेने पर ठंडी, सूखी और बिना फिल्टर की हवा सीधे फेफड़ों तक पहुंचती है, जिससे समय के साथ सांस लेने पर असर पड़ सकता है. इसका एक और बड़ा असर एनर्जी स्तर पर पड़ता है. कई बार लोग पूरी नींद लेने के बाद भी थकान महसूस करते हैं. इसकी एक वजह मुंह से सांस लेना भी हो सकता है. इससे शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती और ऊर्जा उत्पादन प्रभावित होता है.
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डॉ. उल्लोड बताती हैं कि इससे थकान, ध्यान में कमी और धीरे-धीरे श्वसन संबंधी समस्याएं हो सकती हैं. इसके अलावा, नींद की गुणवत्ता भी खराब होती है. मुंह से सांस लेने की वजह से नींद बार-बार टूट सकती है, भले ही हमें इसका एहसास न हो. नींद से जुड़ी यह समस्या आगे चलकर स्लीप एपनिया जैसी गंभीर स्थिति को भी बढ़ा सकती है. डॉ. उल्लोड कहती हैं कि यह आदत स्लीप एपनिया को और खराब कर सकती है और नींद को टुकड़ों में बांट देती है.
बच्चों पर क्या होता है असर
बच्चों में इसका असर और भी गहरा हो सकता है। लंबे समय तक मुंह से सांस लेने से चेहरे की बनावट, दांतों की स्थिति और यहां तक कि पोस्टर पर भी असर पड़ सकता है. अच्छी बात यह है कि इस आदत को बदला जा सकता है. लेकिन इसके लिए सबसे जरूरी है कारण को पहचानना. अगर नाक बंद रहती है, एलर्जी है या साइनस की समस्या है, तो पहले उसका इलाज जरूरी है. इसके साथ ही प्राणायाम जैसी ब्रीदिंग एक्सरसाइज, &amp;nbsp;रेगुलर फिजिकल एक्टिविटी और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह लेना मददगार साबित हो सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 18 Apr 2026 20:30:15 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Summer Health Tips: गर्मी में धूप में घूमते&amp;घूमते गायब हो जाती है एनर्जी, ये काम करेंगे तो दिनभर रहेंगे एक्टिव</title>
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        <description><![CDATA[ Summer Health Tips: गर्मी का मौसम शुरू होते ही तेज धूप और बढ़ता तापमान हमारे डेली रूटीन और सेहत पर असर डालने लगता है. आजकल इतनी ज्यादा गर्मी पड़ रही है कि थोड़ी देर बाहर रहने पर ही शरीर थक जाता है. कई लोगों को चक्कर आना, सिर दर्द, कमजोरी या बेहोशी जैसी दिक्कतें भी होने लगती हैं, जिसका बड़ा कारण शरीर में पानी की कमी यानी डिहाइड्रेशन और तेज गर्मी होता है. लेकिन अगर आप अपने रूटीन और खानपान में थोड़े बदलाव कर लें, तो इस समस्या से बचा जा सकता है.
सही मात्रा में पानी पीना, हल्का और ठंडक देने वाला खाना खाना, और धूप से बचाव करना आपको दिनभर एनर्जेटिक और एक्टिव बनाए रख सकता है. तो आइए जानते हैं कि &amp;nbsp;गर्मी में धूप में घूमते-घूमते एनर्जी कैसे गायब हो जाती है और एनर्जी को दिनभर एक्टिव रखने के लिए क्या करें.&amp;nbsp;
गर्मी में धूप में घूमते-घूमते एनर्जी कैसे गायब हो जाती है
गर्मी में धूप में घूमते-घूमते तेज तापमान का सीधा असर शरीर पर पड़ता है. जब आप धूप में रहते हैं, तो शरीर खुद को ठंडा रखने के लिए ज्यादा पसीना निकालता है. इस प्रक्रिया में शरीर से पानी और जरूरी इलेक्ट्रोलाइट्स बाहर निकल जाते हैं, जिससे डिहाइड्रेशन हो जाता है. वहीं पानी की कमी होने पर ब्लड सर्कुलेशन धीमा पड़ता है और शरीर को सही मात्रा में ऑक्सीजन और पोषण नहीं मिल पाता, जिससे थकान, कमजोरी और चक्कर आने लगते हैं. इसके अलावा तेज धूप में शरीर का तापमान बढ़ जाता है, जिससे दिल को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है और एनर्जी तेजी से खर्च होती है. यही कारण है कि गर्मी में थोड़ी देर धूप में रहने पर भी शरीर जल्दी थका हुआ और सुस्त महसूस करता है.&amp;nbsp;
एनर्जी को दिनभर एक्टिव रखने के लिए क्या करें
1. शरीर को हाइड्रेट रखें - &amp;nbsp;गर्मी में सबसे जरूरी है शरीर में पानी की कमी न होने देना. दिनभर थोड़ा-थोड़ा पानी पीते रहें. प्यास लगने का इंतजार न करें. इसके अलावा आप नारियल पानी, नींबू पानी, छाछ और ओआरएस जैसे पेय भी ले सकते हैं. ये शरीर में जरूरी मिनरल्स और नमक की कमी को पूरा करते हैं. साथ ही तरबूज, खरबूजा, खीरा और संतरा जैसे फल भी खाएं क्योंकि इनमें पानी भरपूर होता है.&amp;nbsp;
2. खानपान में बदलाव करें - गर्मी के मौसम में हल्का और पाचन के लिए सही खाना खाएं. तला-भुना, मसालेदार और ज्यादा ऑयली खाना शरीर में गर्मी बढ़ाता है. &amp;nbsp;आप अपनी डाइट में दही, सलाद, मूंग दाल और हरी सब्जियां शामिल करें. साथ ही सुबह भीगे हुए बादाम और केला खाने से शरीर को तुरंत एनर्जी मिलती है और कमजोरी दूर होती है.&amp;nbsp;
&amp;nbsp;3. धूप से बचाव - कोशिश करें कि दोपहर 12 बजे से 4 बजे के बीच बाहर न निकलें, क्योंकि इस समय धूप सबसे ज्यादा तेज होती है. अगर बाहर जाना जरूरी हो, तो सिर को टोपी, दुपट्टे या छाते से ढकें. हल्के रंग के ढीले और सूती कपड़े पहनें, जिससे शरीर को ठंडक मिलती है.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ें - Drinking Risks: सावधान! हफ्ते में एक दिन भी ज्यादा शराब पीना लिवर के लिए घातक, नई स्टडी में हुआ बड़ा खुलासा
4. घर लौटने के बाद ये गलतियां न करें - धूप से आने के तुरंत बाद ठंडा पानी न पिएं. पहले थोड़ा आराम करें और फिर सामान्य तापमान का पानी पिएं. घर आते ही तुरंत नहाने या कपड़े बदलने से बचें. 5 से 10 मिनट आराम करने के बाद ही ऐसा करें. इसके अलावा प से आने के तुरंत बाद सीधे एसी में जाने के बजाय पहले पंखे के नीचे बैठें, ताकि शरीर का तापमान सामान्य हो जाए.&amp;nbsp;
5. ठंडी चीजों से भी रखें दूरी - धूप से आने के तुरंत बाद आइसक्रीम, ठंडे फल या फ्रिज का पानी लेने से बचें. इससे गले में खराश या कफ की समस्या हो सकती है.&amp;nbsp;
6. शरीर को आराम और नींद दें - &amp;nbsp;गर्मी में शरीर जल्दी थक जाता है, इसलिए पूरी नींद लेना बहुत जरूरी है. दिनभर एक्टिव रहने के लिए रात में कम से कम 7 से 8 घंटे की नींद जरूर लें.&amp;nbsp;
7. हल्की एक्सरसाइज और योग करें - &amp;nbsp;सुबह या शाम के समय हल्की एक्सरसाइज, योग या मेडिटेशन करने से शरीर फिट रहता है और तनाव भी कम होता है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Sat, 18 Apr 2026 20:30:14 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Bone Broth Soup Benefits : बोन ब्रोथ सूप से बढ़ाएं प्रोटीन और पाएं मजबूत गट हेल्थ, जानें इसके फायदे</title>
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        <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 12:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>Drinking Risks: सावधान! हफ्ते में एक दिन भी ज्यादा शराब पीना लिवर के लिए घातक, नई स्टडी में हुआ बड़ा खुलासा</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/drinking-risks-सावधान-हफ्ते-में-एक-दिन-भी-ज्यादा-शराब-पीना-लिवर-के-लिए-घातक-नई-स्टडी-में-हुआ-बड़ा-खुलासा</link>
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        <description><![CDATA[ Is Occasional Binge Drinking Dangerous: अक्सर लोग ऐसा ही सोचते हैं कि कभी-कभार ज्यादा शराब पी लेना कोई बड़ी बात नहीं है. खासकर तब, जब वे पूरे हफ्ते बहुत कम या बिल्कुल नहीं पीते. लेकिन अब एक नई स्टडी इस धारणा को चुनौती दे रही है और बता रही है कि ऐसी आदतें लिवर के लिए खतरनाक साबित हो सकती हैं. अमेरिका के केक मेडिसिन और निवर्सिटी ऑफ साउथ कैलिफोर्निया के रिसर्चर के तरफ से की गई यह स्टडी प्रतिष्ठित जर्नल क्लिनिकल गैस्ट्रोएंटरोलॉजी और हेपेटोलॉजी में पब्लिश हुई है. इसमें सामने आया है कि कभी-कभार भी ज्यादा मात्रा में शराब पीना लिवर डैमेज के खतरे को काफी बढ़ा सकता है.
क्या निकला रिसर्च में?&amp;nbsp;&amp;nbsp;
यह रिसर्च खास तौर पर एक बीमारी मेटाबोलिक डिसफंक्शन-एसोसिएटेड स्टीटोटिक लिवर डिजीज (MASLD) पर केंद्रित थी, जो आज दुनिया में तेजी से बढ़ती लिवर से जुड़ी समस्याओं में से एक है. इस बीमारी में लिवर में फैट जमा हो जाता है, जो आगे चलकर सूजन और स्कारिंग जैसी गंभीर स्थितियों का कारण बन सकता है. आमतौर पर यह समस्या मोटापा, डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर से जूझ रहे लोगों में ज्यादा देखी जाती है.&amp;nbsp;
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&amp;nbsp;शराब पीने पर कितना असर?
रिसर्चर ने सिर्फ यह नहीं देखा कि लोग कितनी शराब पीते हैं, बल्कि यह भी समझने की कोशिश की कि पीने का तरीका कितना असर डालता है. उन्होंने एपिसोडिक हेवी ड्रिंकिंग यानी एक ही दिन में ज्यादा शराब पीने की आदत पर फोकस किया. इसमें महिलाओं के लिए एक दिन में चार या उससे ज्यादा ड्रिंक और पुरुषों के लिए पांच या उससे ज्यादा ड्रिंक शामिल किए गए, वह भी महीने में कम से कम एक बार. यह भी सामने आया कि युवा और पुरुष इस तरह की ड्रिंकिंग के प्रति ज्यादा झुकाव रखते हैं. इसके साथ ही, एक बार में ज्यादा शराब पीने वालों में लिवर को होने वाला नुकसान भी ज्यादा गंभीर पाया गया. एक्सपर्ट का मानना है कि एक साथ ज्यादा शराब पीने से लिवर पर अचानक दबाव पड़ता है, जिससे सूजन और नुकसान का खतरा बढ़ जाता है.&amp;nbsp;
रिजल्ट चौंकाने वाले
2017 से 2023 के बीच 8,000 से ज्यादा एडल्ट के डेटा का एनालिसि करने पर चौंकाने वाले नतीजे सामने आए. जिन लोगों को MASLD था और जो इस तरह की हेवी ड्रिंकिंग करते थे, उनमें एडवांस्ड लिवर फाइब्रोसिस का खतरा लगभग तीन गुना ज्यादा पाया गया. यह वह स्थिति है, जब लिवर में स्कार टिश्यू बन जाता है और उसकी काम करने की क्षमता प्रभावित होने लगती है. स्टडी की एक अहम बात यह रही कि कुल शराब की मात्रा से ज्यादा मायने उसका सेवन करने का तरीका रखता है. यानी दो लोग अगर हफ्ते में बराबर मात्रा में शराब पीते हैं, तो जो व्यक्ति उसे एक ही दिन में खत्म करता है, उसके लिवर पर ज्यादा खतरा मंडराता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 12:30:06 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Therapy For Hearing Loss: जन्म से बहरेपन का इलाज अब मुमकिन! इस इंजेक्शन से लौटेगी बच्चों की सुनने की शक्ति</title>
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        <description><![CDATA[ Can Gene Therapy Cure Congenital Deafness: जन्म से सुनने की समस्या झेल रहे लोगों के लिए दुनिया हमेशा से कुछ हद तक खामोश रही है. इस स्थिति को कंजेनिटल डेफनेस कहा जाता है, जो जन्म के साथ ही शुरू हो जाती है और व्यक्ति के बातचीत, पढ़ाई और रोजमर्रा की जिंदगी पर गहरा असर डालती है. अक्सर इसके पीछे जेनेटिक कारण होते हैं, यानी कुछ खास जीन में बदलाव, जो पीढ़ियों के जरिए आगे बढ़ते हैं. अब तक ऐसे मामलों में हियरिंग एड या कॉक्लियर इम्प्लांट जैसे विकल्प ही उपलब्ध थे, जो मदद तो करते हैं, लेकिन पूरी तरह से प्राकृतिक सुनने की क्षमता वापस नहीं ला पाते.&amp;nbsp;
नई उम्मीद
इसी बीच स्वीडन के करोलिंस्का इंस्टिट्यूट &amp;nbsp;से आई एक नई स्टडी ने उम्मीद की नई किरण जगाई है. यह रिसर्च प्रतिष्ठित जर्नल नेचर में प्रकाशित हुआ है. इसमें बताया गया है कि जीन थेरेपी के जरिए एक खास तरह की जेनेटिक बहरापन को काफी हद तक ठीक किया जा सकता है, वह भी बच्चों और युवाओं दोनों में.&amp;nbsp;
कहां हुई है खोज?
इस रिसर्च में साइंटिस्ट ने चीन के अस्पतालों और विश्वविद्यालयों के साथ मिलकर 1 से 24 साल की उम्र के 10 मरीजों पर काम किया. इन सभी में सुनने की समस्या OTOF जीन में बदलाव के कारण थी. यह जीन ओटोफरलिन नाम के एक प्रोटीन को बनाने में अहम भूमिका निभाता है, जो कान से दिमाग तक ध्वनि संकेत पहुंचाने में मदद करता है. जब यह प्रोटीन ठीक से काम नहीं करता, तो कान आवाज को महसूस तो कर लेता है, लेकिन दिमाग तक सही तरीके से सिग्नल नहीं पहुंच पाता.
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ऐसे निकला समस्या का हल
इस समस्या के समाधान के लिए रिसर्चर ने जीन थेरेपी का इस्तेमाल किया. इसमें एक स्वस्थ जीन को शरीर में पहुंचाया जाता है. इसके लिए एक सुरक्षित वायरस एडेनो-असोसिएटेड वायरस का इस्तेमाल किया गया, जिसके जरिए काम करने वाला OTOF जीन सीधे कान के अंदर पहुंचाया गया. यह प्रक्रिया कॉक्लिया के निचले हिस्से में मौजूद राउंड विंडो नाम की जगह पर एक छोटे इंजेक्शन के जरिए की गई. नतीजे काफी उत्साहजनक रहे. कई मरीजों ने सिर्फ एक महीने के भीतर ही सुनने में सुधार महसूस करना शुरू कर दिया. छह महीने बाद सभी प्रतिभागियों में स्पष्ट रूप से फायदा देखा गया. वे पहले की तुलना में काफी धीमी आवाजें भी सुनने लगे, जो पहले उनके लिए असंभव था.
बच्चों में सुधार
खास बात यह रही कि बच्चों में सुधार सबसे ज्यादा देखा गया, खासकर 5 से 8 साल की उम्र के बीच. एक छोटी बच्ची ने तो इलाज के कुछ महीनों के भीतर लगभग सामान्य सुनने की क्षमता हासिल कर ली और अपनी मां से आसानी से बातचीत करने लगी. इससे यह भी संकेत मिलता है कि समय रहते इलाज शुरू किया जाए तो परिणाम और बेहतर हो सकते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 12:30:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Weight Loss Tips: क्रैश डाइट नहीं, बैलेंस्ड लाइफस्टाइल से घटेगा वजन, चेन्नई की इंफ्लुएंसर ने बताया फिटनेस सीक्रेट</title>
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        <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 00:30:09 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Health Warning Signs: शरीर के इन छोटे संकेतों को न करें इग्नोर, वरना डैमेज हो सकते हैं लिवर और किडनी</title>
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        <description><![CDATA[ Early Signs Your Body Is In Trouble: हमारा शरीर कभी अचानक से बीमार नहीं पड़ता, बल्कि वह पहले छोटे-छोटे संकेत देता है. थकान, दिमाग का भारी लगना, त्वचा में बदलाव या हल्की-फुल्की असहजता, ये सब यूं ही नहीं होते. ये संकेत बताते हैं कि शरीर के अंदर कहीं न कहीं दबाव बन रहा है. समस्या यह है कि ज्यादातर लोग इन संकेतों को नजरअंदाज कर देते हैं और तब ध्यान देते हैं जब दर्द शुरू हो जाता है.&amp;nbsp;
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
डॉ. भानु मिश्रा ने TOI को बताया कि &quot;ज्यादातर अंगों को होने वाला नुकसान बिना किसी स्पष्ट लक्षण के ही होता है. लोग इन संकेतों को इसलिए नजरअंदाज कर देते हैं क्योंकि ये साफ नजर नहीं आते.&quot; यही सबसे बड़ा खतरा है कि जब तक लक्षण गंभीर बनते हैं, तब तक नुकसान गहरा हो चुका होता है.&amp;nbsp;
थकान सबसे आम समस्या
थकान एक आम समस्या है, लेकिन अगर सही नींद लेने के बाद भी थकावट बनी रहती है, तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए. यह सिर्फ व्यस्त दिनचर्या की वजह से नहीं होता, बल्कि यह लिवर या किडनी पर बढ़ते दबाव का संकेत हो सकता है. &amp;nbsp;डॉ. भानु &amp;nbsp;के अनुसार, &quot;क्रॉनिक थकान का मतलब सिर्फ नींद की कमी नहीं, बल्कि लिवर या किडनी में समस्या भी हो सकती है.&quot; ऐसी थकान धीरे-धीरे आपकी सोच और ऊर्जा दोनों को प्रभावित करती है.&amp;nbsp;
ब्रेन के इन सिग्नल को न करें नजरअंदाज
दिमाग भी अपने तरीके से संकेत देता है। बार-बार सिरदर्द होना, ध्यान लगाने में दिक्कत या दिमाग का धुंधला लगना अक्सर लोग तनाव या स्क्रीन टाइम का असर मान लेते हैं. लेकिन &amp;nbsp;एक्सपर्ट बताते हैं कि यह डिहाइड्रेशन, हाई ब्लड प्रेशर या शरीर में टॉक्सिन्स बढ़ने का संकेत हो सकता है. याददाश्त में कमी या फोकस में गिरावट दिमाग पर पड़ रहे दबाव का संकेत है.
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इन संकेतों को भी न करें नजरअंदाज
शरीर के कुछ और संकेत भी बहुत कुछ बताते हैं. जैसे पेशाब का रंग बदलना, पैरों में सूजन या आंखों के आसपास फुलाव, ये सब किडनी स्ट्रेस की ओर इशारा कर सकते हैं. इसी तरह बार-बार पेट फूलना, भूख कम लगना या खाने के बाद असहजता महसूस होना लिवर या पैंक्रियाज की परेशानी का संकेत हो सकता है. त्वचा, बाल और नाखून भी शरीर के अंदर की स्थिति को दिखाते हैं. एक्सपर्ट के अनुसार, त्वचा का फीका पड़ना, खुजली या हल्का पीलापन इस बात का संकेत हो सकता है कि शरीर के अंदर कुछ ठीक नहीं है. इसके अलावा बालों का पतला होना या नाखूनों का कमजोर होना भी पोषण की कमी या आंतरिक असंतुलन दर्शाता है. कई बार हल्की-फुल्की समस्याएं जैसे पीठ में जकड़न, पैरों में सुन्नता या खड़े होने पर चक्कर आना भी नजरअंदाज कर दिए जाते हैं.
इससे बचने के लिए क्या कर सकते हैं?
इन सभी संकेतों से बचाव का सबसे अच्छा तरीका है कि रोजमर्रा की अच्छी आदतें अपनाना. पर्याप्त पानी पीना, संतुलित आहार लेना, प्रोसेस्ड फूड और ज्यादा नमक-चीनी से दूरी बनाना, नियमित व्यायाम और पूरी नींद, ये सब शरीर को स्वस्थ रखने में मदद करते हैं. इसके साथ ही, बिना लक्षण के भी समय-समय पर हेल्थ चेकअप कराना जरूरी है. यही नहीं, एक अहम स्टडी जो इंटरनेशनल जर्नल ऑफ फैमिली मेडिसिन एंड प्राइमरी केयर में पब्लिश हुई है, बताती है कि आजकल लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियां चुपचाप बढ़ रही हैं और अक्सर इनका पता तब चलता है जब लोग रूटीन चेकअप करवाते हैं. यानी शरीर पहले संकेत देता है, लेकिन हम उन्हें समझ नहीं पाते. इसलिए समय से चेकअप करवाना जरूरी है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 00:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Blood Kick Trend: भोपाल में फैला &amp;apos;ब्लड किक&amp;apos; का जानलेवा नशा, सुकून के लिए अपना ही खून निकाल रहे युवा</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/blood-kick-trend-भोपाल-में-फैला-ब्लड-किक-का-जानलेवा-नशा-सुकून-के-लिए-अपना-ही-खून-निकाल-रहे-युवा</link>
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        <description><![CDATA[ Is Injecting Your Own Blood Dangerous: भोपाल में एक बेहद खतरनाक और चिंताजनक ट्रेंड सामने आ रहा है, जिसे डॉक्टर ब्लड किक के नाम से पहचान रहे हैं. यह कोई सामान्य नशा नहीं है, न इसमें शराब है, न ड्रग्स. लेकिन इसके स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर उतने ही गंभीर और जानलेवा हो सकते हैं. इस अजीब आदत में कुछ युवा अपने ही शरीर से खून निकालकर उसे दोबारा इंजेक्ट करते हैं, ताकि उन्हें कुछ पलों के लिए ऊर्जा, सुकून या कंट्रोल का एहसास हो सके.
जनवरी 2026 से अब तक गांधी मेडिकल कॉलेज में ऐसे कम से कम पांच मामले सामने आ चुके हैं. सभी मरीज 18 से 25 साल के हैं. शुरुआत में परिवार को सिर्फ व्यवहार में बदलाव दिखता है, चिड़चिड़ापन, गुस्सा, अकेले रहना. लेकिन धीरे-धीरे यह स्थिति इतनी गंभीर हो जाती है कि उन्हें साइकेट्रिक के पास ले जाना पड़ता है.
&amp;nbsp;पारंपरिक नशे से बिल्कुल अलग
हमीदिया अस्पताल के डॉक्टरों का कहना है कि यह पारंपरिक नशे से बिल्कुल अलग मामला है. इन युवाओं में न शराब के लक्षण मिलते हैं, न ड्रग्स के. लेकिन शरीर पर सुई के निशान साफ दिखाई देते हैं. उनका मानना होता है कि अपने ही खून को दोबारा शरीर में डालने से उन्हें तुरंत राहत मिलती है, जबकि असल में यह एक खतरनाक मानसिक और शारीरिक जाल है.
एक्सपर्ट क्या कहते हैं?
एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार, साइकेट्रिस्ट डॉ जेपी अग्रवाल के अनुसार, यह व्यवहारिक लत है, कोई इलाज नहीं. दिमाग इस प्रक्रिया को एक इनाम की तरह लेने लगता है. खून निकालने का दर्द और उसके बाद मिलने वाला एहसास धीरे-धीरे आदत बन जाता है. वे बताते हैं यह खून के बारे में नहीं, बल्कि उस झूठे सुकून के बारे में है, जिसे व्यक्ति महसूस करता है.
बेहद गंभीर मामले
एक्सपर्ट के अनुसार, इसके खतरे बेहद गंभीर हैं. बार-बार खुद को इंजेक्शन लगाने से शरीर में इंफेक्शन फैल सकता है. सेप्सिस, एचआईवी, हेपेटाइटिस जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है. इसके अलावा नसों को नुकसान, खून के थक्के, एनीमिया और यहां तक कि अंग फेल होने का जोखिम भी रहता है. शरीर की प्राकृतिक प्रक्रिया इस तरह के दबाव को झेल नहीं पाती और कुछ मामलों में यह अचानक मौत का कारण बन सकता है.
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मेंटल हेल्थ पर असर
डॉक्टर यह भी बताते हैं कि यह समस्या सिर्फ शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य से भी गहराई से जुड़ी है. इसके पीछे अक्सर डिप्रेशन, आत्म-नुकसान की प्रवृत्ति या ध्यान पाने की इच्छा छिपी होती है. यानी यह एक तरह से अंदर के दर्द का संकेत है, जो बाहर सुकून के रूप में दिखाई देता है. सोशल मीडिया भी इस खतरनाक ट्रेंड को बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभा रहा है. अजीब और जोखिम भरे कंटेंट युवाओं को एक्सपेरिमेंट करने के लिए उकसाते हैं, जो धीरे-धीरे लत में बदल जाता है.
डॉ. जेपी अग्रवाल साफ चेतावनी देते हैं, जो खून आपको जिंदा रखता है, वही गलत तरीके से इस्तेमाल होने पर जान भी ले सकता है. यह कोई थ्रिल नहीं, बल्कि क्लिनिकल डेथ की ओर बढ़ता कदम है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 16 Apr 2026 08:30:03 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Milk And Parkinson Disease:सेहतमंद समझकर रोज पी रहे हैं दूध? इस लाइलाज बीमारी का बढ़ सकता है खतरा</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/milk-and-parkinson-diseaseसेहतमंद-समझकर-रोज-पी-रहे-हैं-दूध-इस-लाइलाज-बीमारी-का-बढ़-सकता-है-खतरा</link>
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        <description><![CDATA[ Does Drinking Milk Increase Parkinson Disease Risk: आपने शायद कहीं न कहीं यह जरूर सुना होगा या देखा होगा कि दूध और पार्किंसन बीमारी के बीच कोई संबंध हो सकता है. यह सुनकर कई लोग चौंक जाते हैं और सोचने लगते हैं कि क्या अब दूध पीना भी नुकसानदायक है. सच यह है कि इस विषय पर जो रिसर्च हुई है, वह पूरी तरह बेबुनियाद नहीं है, लेकिन कहानी इतनी सीधी भी नहीं है कि दूध पीना बंद कर दें, वरना बीमारी हो जाएगी.&amp;nbsp;
क्या कहते हैं एक्सपर्ट
डॉ. सादिक पठान ने TOI को बताया कि कई स्टडीज में यह देखा गया है कि डेयरी प्रोडक्ट्स, खासकर ज्यादा मात्रा में दूध पीने वाले लोगों में पार्किंसन का खतरा थोड़ा बढ़ सकता है. खासतौर पर पुरुषों में यह जोखिम 20 से 40 प्रतिशत तक ज्यादा पाया गया है. हालांकि, यह सीधा कारण नहीं बल्कि एक संबंध है, जिसे अभी पूरी तरह समझा जाना बाकी है.
क्या निकला रिसर्च में?
इस विषय पर सबसे लंबी और बड़ी रिसर्च हार्वर्ड यूनिवर्सिटीसे जुड़ी स्टडीज में नर्सेस हेल्थ स्टडी और हेल्थ प्रोफेशनल्स फॉलो-अप स्टडी में सामने आई. करीब 25 साल तक लोगों की डाइट को ट्रैक करने के बाद पाया गया कि जो लोग रोजाना लो-फैट डेयरी के तीन या उससे ज्यादा सर्विंग लेते थे, उनमें पार्किंसन का खतरा 34 प्रतिशत ज्यादा था, तुलना में उन लोगों के जो बहुत कम डेयरी लेते थे.
इसी तरह अमेरिकन कैंसर सोसाइटी की कैंसर प्रिवेंशन स्टडी में भी एक दिलचस्प पैटर्न सामने आया. इसमें हजारों पुरुष और महिलाओं को शामिल किया गया और पाया गया कि डेयरी का सेवन करने वालों में यह जोखिम पुरुषों में 1.8 गुना और महिलाओं में 1.3 गुना तक बढ़ा हुआ था.
क्या दूध से ऐसा होता है?
अब सवाल यह है कि आखिर दूध में ऐसा क्या हो सकता है? कुछ रिसर्च में यह संभावना जताई गई है कि दूध में मौजूद पेस्टिसाइड के अवशेष, जैसे हेप्टाक्लोर एपॉक्साइड, दिमाग के लिए नुकसानदेह हो सकते हैं. इसके अलावा दूध में मौजूद गैलेक्टोज भी एक फैक्टर माना जा रहा है, जो ज्यादा मात्रा में लेने पर दिमाग पर असर डाल सकता है. एक और दिलचस्प थ्योरी गट-ब्रेन कनेक्शन से जुड़ी है. माना जाता है कि डेयरी हमारे गट माइक्रोबायोम को प्रभावित कर सकती है, जिससे कुछ ऐसे प्रोटीन बनते हैं जो आगे चलकर दिमाग तक पहुंच सकते हैं और बीमारी के जोखिम को बढ़ा सकते हैं.
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हालांकि, इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आपको तुरंत दूध या डेयरी प्रोडक्ट्स छोड़ देने चाहिए. रिसर्च का संकेत सिर्फ इतना है कि संतुलन जरूरी है. अगर आप बहुत ज्यादा मात्रा में खासकर लो-फैट या स्किम मिल्क लेते हैं, तो उसे थोड़ा कम करना बेहतर हो सकता है.
क्या होता है पार्किंसन के लक्षण?
भारत में पार्किंसन के मामले भी धीरे-धीरे बढ़ रहे हैं. इसके लक्षणों में हाथ कांपना, शरीर में जकड़न, धीमी मूवमेंट और पोस्टर का बिगड़ना शामिल हैं. वहीं शुरुआती संकेतों में कब्ज, सूंघने की क्षमता कम होना, नींद की समस्या और मूड स्विंग भी देखे जा सकते हैं. डॉक्टरों का मानना है कि इस बीमारी से पूरी तरह बचाव संभव नहीं है, लेकिन हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाकर जोखिम को कम जरूर किया जा सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <title>बिना डायबिटीज वाले और युवा लोगों का तेजी से घटता है वजन, चौंका देगी GLP&amp;1 दवाओं पर नई स्टडी</title>
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        <description><![CDATA[ हमारे देश में नई पीढ़ी की वजन घटाने वाली दवाओं पर हुई एक स्टडी में सामने आया है कि बिना डायबिटीज वाले लोग को और कम उम्र के मरीजों में वजन तेजी से कम होता है. यह स्टडी देश में पहली बार वास्तविक परिस्थितियों में की गई है, जिसमें ओवरवेट और मोटापे से जूझ रहे लोगों पर इन दवाओं के असर को देखा गया है. यह रिसर्च 150 ऐसे लोगों पर आधारित है, जिन्हें 6 महीने तक इंजेक्शन के जरिए सेमाग्लूटाइड और टिरजेपेटाइड जैसी दवाएं दी गई. यह दोनों दवाएं जीएलपी-1 थेरेपी से जुड़ी है, जो पहले टाइप-2 डायबिटीज के इलाज के लिए विकसित की गई थी. लेकिन अब मोटापे के इलाज में भी इस्तेमाल हो रही है. इस स्टडी के नतीजे इंडियन जर्नल ऑफ एंडोक्रिनोलॉजी एंड मेटाबॉलिज्म में प्रकाशित हुए हैं.कितने लोगों का वजन कितना घटा?स्टडी के अनुसार करीब 41 प्रतिशत प्रतिभागियों का वजन 10 प्रतिशत से ज्यादा काम हुआ. कुल मिलाकर औसत वजन घटने की दर 8.2 प्रतिशत रही. इस स्टडी में डायबिटीज से ग्रस्त और बिना डायबिटीज वाले लोगों के बीच अंतर भी साफ दिखा. जिन लोगों को डायबिटीज नहीं थी, उनका वजन औसतन 11.21 प्रतिशत तक घटा, जबकि डायबिटीज वाले मरीजों में यह कमी करीब 5.48 प्रतिशत रही.कौन सी दवाएं रही ज्यादा असरदार?इस स्टडी में यह भी पाया गया है कि टिरजेपेटाइड लेने वाले मरीजों में वजन घटने की दर ज्यादा रही. इस दवा के साथ औसत वजन में 8.60 प्रतिशत की कमी देखी गई. जबकि सेमाग्लूटाइड लेने वालों में यह 5.62 प्रतिशत रही. इसके अलावा जो मरीज पहले कभी जीएलपी-1 थेरेपी नहीं ले चुके थे उनमें वजन तेजी से घटता देखा गया.स्टडी में उम्र का भी दिखा असररिसर्च में यह सामने आया कि युवाओं में वजन कम होने की प्रक्रिया तेज होती है. खासतौर पर 10 प्रतिशत से ज्यादा वजन घटाने का लक्ष्य युवा और नए मरीजों में जल्दी हासिल हुआ. हालांकि 10 प्रतिशत से कम वजन घटाने की रफ्तार पर डायबिटीज का असर खास असर नहीं देखा गया है. इसके अलावा स्टडी के अनुसार 10 प्रतिशत से ज्यादा वजन घटाने में औसतन 9.5 महीने का समय लगा. एक्सपर्ट्स का कहना है कि इन दवाओं का पूरा असर आमतौर पर 12 से 18 महीना के बीच दिखाई देता है.ये भी पढ़ें-Roti or Rice Health Benefits: उत्तर भारत के लोग ज्यादातर रोटी खाते हैं लेकिन दक्षिण के चावल, जानें सेहत के लिए क्या है बेस्ट?
डायबिटीज और मोटापे के बीच का कनेक्शनस्टडी में यह भी सामने आया है कि जिन मरीजों को डायबिटीज के साथ मोटापा भी है, उनमें वजन कम होना अपेक्षाकृत मुश्किल होता है. एक्सपर्ट के अनुसार भारतीय मरीजों में मेटाबॉलिज्म से जुड़ी समस्या ज्यादा खतरनाक होती है और इन्सुलिन रेजिस्टेंस भी ज्यादा पाया जाता है. इसके अलावा डायबिटीज के मरीज अक्सर पहले से कई दवाएं ले रहे होते हैं, जिनमें इंसुलिन भी शामिल हो सकता है. इससे वजन घटाने की प्रक्रिया धीमी में हो जाती है. वहीं बताया जा रहा है कि यह नतीजा ऐसे समय सामने आए हैं, जब सेमाग्लूटाइड का पेटेंट खत्म हो गया है, जिससे भारत के तेजी से बढ़ते एंटी ओबेसिटी मार्केट में कई जेनेरिक वर्शन का रास्ता साफ हो गया है. जिससे देश में हिंदी दवाओं की बिक्री और बढ़ गई है. वहीं एक अनुमान के अनुसार भारत में लगभग 10.1 करोड़ लोग डायबिटीज पीड़ित है. 25.4 करोड़ लोग जनरलाइज्ड ओबेसिटी से पीड़ित है और 35.1 प्रतिशत लोग पेट के मोटापे से पीड़ित है. डॉक्टरों के अनुसार यह सब बदलते खान-पान और बढ़ती हुई सेडेंटरी लाइफस्टाइल की वजह से हो रहा है.
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        <pubDate>Wed, 15 Apr 2026 20:30:11 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Omega&amp;3 Deficiency: बाल झड़ने और रूखी त्वचा से परेशान? ये हैं ओमेगा&amp;3 की कमी के सिग्नल, आज ही खाएं ये चीजें</title>
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        <description><![CDATA[ Symptoms Of Omega-3 Deficiency: दुनिया की लगभग तीन-चौथाई आबादी यानी करीब 76 &amp;nbsp;प्रतिशत लोग ओमेगा-3 की पर्याप्त मात्रा नहीं ले रहे हैं. यह वही पोषक तत्व है जिसे हमारा शरीर खुद नहीं बना सकता. हैरानी की बात यह है कि अगर आप ज्यादातर लोगों से पूछें कि वे ओमेगा-3 कितना लेते हैं, तो या तो उन्हें इसके बारे में जानकारी नहीं होगी या फिर वे कभी-कभार लिए गए फिश ऑयल सप्लीमेंट का जिक्र करेंगे.
क्या निकला रिसर्च में
यह कोई मामूली कमी नहीं है. साल 2025 में यूनिवर्सिटी ऑफ ईस्ट एंग्लिया, यूनिवर्सिटी ऑफ साउथैम्पटन और हॉलैंड एंड बैरेट के रिसर्च के एक बड़े स्टडी में सामने आया कि दुनिया की 76 प्रतिशत आबादी EPA और DHA के रिकमंड स्तर तक नहीं पहुंच पा रही है. &amp;nbsp;ये दोनों ओमेगा-3 के महत्वपूर्ण रूप हैं, जो दिल की सेहत, दिमाग के विकास, सूजन को कंट्रोल करने और मानसिक स्वास्थ्य के लिए बेहद जरूरी होते हैं.&amp;nbsp;
क्या कहते हैं एक्सपर्ट
किम्स हॉस्पिटल्स, बेंगलुरु की चीफ ऑफ डाइटेटिक्स Ms. Chitra BK ने TOI Health को बताया कि ओमेगा-3 फैटी एसिड्स ऐसे जरूरी पोषक तत्व हैं, जो आधुनिक डाइट में अक्सर कम पाए जाते हैं. आजकल लोग प्रोटीन, विटामिन D और आयरन की बात तो करते हैं, लेकिन ओमेगा-3 की कमी को नजरअंदाज कर देते हैं. जबकि शरीर इन्हें खुद नहीं बना सकता, इसलिए इन्हें नियमित रूप से आहार में शामिल करना जरूरी है.&amp;nbsp;
लाइफस्टाइल में बदलाव आया
उन्होंने आगे बताया कि पिछले कुछ दशकों में खानपान के तरीके में बड़ा बदलाव आया है. &amp;nbsp;पहले लोग ज्यादा मछली, मेवे और बीज खाते थे, लेकिन अब प्रोसेस्ड फूड और रिफाइंड वेजिटेबल ऑयल का इस्तेमाल बढ़ गया है. इससे शरीर में ओमेगा-6 की मात्रा ज्यादा हो गई है, जो सूजन को बढ़ावा देती है और कई क्रॉनिक बीमारियों का कारण बन सकती है. इसके अलावा, खासकर शहरी युवाओं 18-25 साल और शाकाहारी लोगों में मछली का सेवन काफी कम हुआ है, जिससे DHA और EPA की कमी और बढ़ गई है.
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इसकी कमी से क्या दिक्कत होती है
अगर शरीर में ओमेगा-3 की कमी हो जाए, तो इसके संकेत धीरे-धीरे नजर आते हैं. जैसे त्वचा का रूखा होना, बालों का कमजोर होना, ध्यान केंद्रित करने में दिक्कत, मूड में बदलाव, थकान महसूस होना और जोड़ों में दर्द. अक्सर लोग इन लक्षणों को सामान्य समझकर नजरअंदाज कर देते हैं.
इसकी कमी को कैसे दूर करें
इस कमी को दूर करने के लिए रोजाना के खानपान में कुछ बदलाव करना जरूरी है. हफ्ते में कम से कम दो बार फैटी फिश जैसे सैल्मन, सार्डिन, मैकेरल या टूना शामिल करें. इसके अलावा अलसी के बीज, चिया सीड्स, अखरोट, ब्राजील नट्स, एवोकाडो, सोया प्रोडक्ट्स और कैनोला ऑयल भी अच्छे सोर्स हैं. जरूरत पड़ने पर ओमेगा-3 से भरपूर फोर्टिफाइड फूड या सप्लीमेंट भी लिए जा सकते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 15 Apr 2026 08:30:23 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Drinking Water Before Meals: खाना खाने से पहले पानी पीने के लिए क्यों कहते हैं डॉक्टर्स, इस आदत से शरीर को कितना फायदा?</title>
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        <description><![CDATA[ Why Doctors Recommend Drinking Water Before Meals: अक्सर आपने सुना होगा कि खाना खाने से पहले पानी पीना चाहिए. डॉक्टर भी इस आदत को अपनाने की सलाह देते हैं. लेकिन क्या यह सच में फायदेमंद है या सिर्फ एक आम धारणा? इस सवाल का जवाब समझना जरूरी है, क्योंकि यह हमारी रोजमर्रा की हेल्थ से जुड़ा हुआ है. चलिए आपको बताते हैं कि आखिर डॉक्टर ऐसा क्यों कहते हैं.
क्यों खाने से पहले पानी पीना चाहिए?
Harvard Health की एक रिपोर्ट के अनुसार, &amp;nbsp;असल में, खाना खाने से पहले पानी पीने के पीछे सबसे बड़ा तर्क यह दिया जाता है कि इससे पेट पहले से थोड़ा भर जाता है, जिससे आप कम खाना खाते हैं. हमारे पेट में कुछ ऐसे नर्व्स होते हैं जो फैलाव को महसूस करके दिमाग को संकेत भेजते हैं कि अब खाना पर्याप्त है. माना जाता है कि अगर आप पहले पानी पी लेते हैं, तो यही सिग्नल जल्दी मिलने लगता है और ओवरईटिंग से बचाव होता है.
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क्या होता है इसका असर?
कुछ छोटे और सीमित समय वाली स्टडी में यह देखा भी गया है कि जो लोग खाने से पहले एक गिलास पानी पीते हैं, वे दूसरों के मुकाबले थोड़ा कम खाना खाते हैं. खासकर जो लोग वजन घटाने की कोशिश कर रहे होते हैं, उनमें यह आदत हल्का फायदा दे सकती है. हालांकि, लंबे समय में इसका असर कितना होता है, इस पर अभी भी पुख्ता सबूत नहीं हैं.
एक और कारण यह बताया जाता है कि कई बार हमें भूख नहीं बल्कि प्यास लगती है, लेकिन हम इसे समझ नहीं पाते और कुछ खा लेते हैं. ऐसे में अगर पहले पानी पी लिया जाए, तो अनावश्यक कैलोरी लेने से बचा जा सकता है. लेकिन इस थ्योरी को लेकर भी साइंटफिक प्रमाण बहुत मजबूत नहीं हैं.
वजन कम करने में मददगार
कुछ लोग यह भी मानते हैं कि पानी पीने से शरीर कैलोरी बर्न करता है, क्योंकि शरीर को पानी को अपने तापमान तक गर्म करना पड़ता है. लेकिन हाल के रिसर्च बताते हैं कि इस प्रक्रिया से बहुत कम कैलोरी खर्च होती है, इसलिए इसे वजन घटाने का बड़ा कारण नहीं माना जा सकता. हालांकि, एक बात साफ है कि अगर आप मीठे पेय या हाई-कैलोरी ड्रिंक्स की जगह पानी पीते हैं, तो यह आपकी सेहत के लिए काफी फायदेमंद हो सकता है और वजन कम करने में मदद कर सकता है. &amp;nbsp;तो क्या खाना खाने से पहले पानी पीना चाहिए? इसका जवाब पूरी तरह &amp;nbsp;हां या नहीं में नहीं है. कुछ लोगों के लिए यह आदत फायदेमंद हो सकती है, खासकर अगर इससे वे कम खाते हैं या ओवरईटिंग से बचते हैं. लेकिन इसे कोई जादुई उपाय भी नहीं माना जा सकता.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 15 Apr 2026 08:30:22 +0530</pubDate>
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        <title>Fake Cancer Drug Racket India: 1.5 लाख का &amp;apos;जादुई&amp;apos; कैंसर इंजेक्शन निकला नकली, ऐसे चल रहा था खौफनाक खेल</title>
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        <description><![CDATA[ How Fake Keytruda Reached Cancer Patients In India: पंजाब के एक साधारण घर से शुरू हुई यह कहानी भारत में कैंसर इलाज की एक खतरनाक सच्चाई को उजागर करती है. साल 2022 की शुरुआत में चंडीगढ़ के पास रहने वाली 56 वर्षीय महिला का लिवर कैंसर का इलाज PGIMER में चल रहा था. डॉक्टरों ने उन्हें एक महंगी इम्यूनोथेरेपी दवा कीट्रूडा &amp;nbsp;लेने की सलाह दी, जिसकी कीमत 100 mg की एक वायल के लिए 1.5 लाख रुपये से ज्यादा है. इतनी बड़ी रकम जुटाना आसान नहीं था, इसलिए परिवार ने सितंबर से दिसंबर के बीच 12 वायल डिस्काउंट पर करीब 16 लाख रुपये में खरीदीं। लेकिन कुछ समय बाद दिल्ली पुलिस का फोन आया और पता चला कि ये दवाएं नकली थीं, जिनमें एंटीफंगल दवा भरी गई थी.
जांच में खुलासा
यह मामला अकेला नहीं है. इंडियन एक्सप्रेस औरइंटरनेशनल कंसोर्टियम ऑफ इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट्स की संयुक्त जांच में सामने आया है कि भारत में महंगी कैंसर दवाओं, खासकर कीट्रूडा, का एक बड़ा नकली बाजार सक्रिय है. इस जांच में 12,500 से ज्यादा पन्नों के रिकॉर्ड, अस्पताल डेटा और डॉक्टरों से बातचीत शामिल रही.
बेहद संगठित तरीके से काम करता है नेटवर्क 
जांच में पता चला कि यह पूरा नेटवर्क बेहद संगठित तरीके से काम करता है. खाली वायल इकट्ठा की जाती हैं, उनमें दूसरी दवाएं भरकर दोबारा सील किया जाता है और फिर बाजार में सस्ती कीमत पर बेचा जाता है. कई बार यह कीमत असली से 40 प्रतिशत तक कम होती है, जिससे मरीजों को यह राहत लगती है, लेकिन यही उनकी सबसे बड़ी गलती बन जाती है.
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस नेटवर्क में अस्पतालों के अंदर के लोग भी शामिल पाए गए. दिल्ली के राजीव गांधी कैंसर इंस्टीट्यूट एंड रिसर्च सेंटर में काम करने वाले कुछ फार्मासिस्ट कथित तौर पर इस्तेमाल किए गए या आधे भरे वायल बाहर ले जाते थे और उन्हें इस रैकेट को बेचते थे. पुलिस ने छापेमारी में कई वायल, खाली बॉक्स और संदिग्ध बैच नंबर बरामद किए, जो सीधे मरीजों को दी गई दवाओं से मेल खाते थे. जांच में जब पुलिस ने इस पूरे नेटवर्क की परतें खोलनी शुरू कीं, तो एक अहम नाम सामने आया, परवेज. वह पहले एक अस्पताल में फार्मासिस्ट के तौर पर काम कर चुका था और बाद में इस रैकेट का अहम हिस्सा बन गया. पुलिस के मुताबिक, परवेज ही वह कड़ी था जो अस्पताल के अंदर से दवाओं को बाहर लाने और उन्हें आगे सप्लाई करने का काम संभाल रहा था.
अस्पताल में काम करने वाले लोग शामिल
परवेज ने यह भी बताया कि उसने अस्पताल में काम करने वाले कोमल और अभय से संपर्क किया, जो उसे खाली और भरी हुई वायल उपलब्ध कराते थे. उसने बताया कि मैं खाली &amp;nbsp;वायल के 3000 दूंगा और अगर अगर वो इंजेक्शन भरा उपलब्ध करवाते हैं, तो उसके बदले में 40 हजार से 50 हजार दिया जाएगा. इस तरह 8 से 9 महीने में 10- 12 भरा वायल और 120 वायर कोमल से उसे मिला और अभय ने उसे 10 खाली और 10-12 भरा वायर दिया. जो बाद में इस अवैध नेटवर्क के जरिए बेची गईं.
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मरीज की हो गई मौत
जांच में यह भी सामने आया कि अस्पतालों में सख्त प्रोटोकॉल होने के बावजूद एक बड़ी कमी थी कि खाली वायल की गिनती का कोई ठोस सिस्टम नहीं था. इसी खामी का फायदा उठाकर यह पूरा खेल चलाया गया. बाद में अस्पतालों ने निगरानी बढ़ाई, CCTV सिस्टम मजबूत किया और दवा निपटान की प्रक्रिया को और सख्त बनाया. इस रैकेट का सबसे दर्दनाक असर मरीजों पर पड़ता है. बिहार की एक महिला, जो सस्ती दवा की तलाश में ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से इंजेक्शन खरीद रही थीं, इलाज के दौरान ही हालत बिगड़ने के बाद दम तोड़ गईं. बाद में परिवार को पता चला कि दवा नकली हो सकती थी. पुलिस अधिकारियों का कहना है कि यह मामला सिर्फ एक गैंग तक सीमित नहीं है. यह एक बड़े सिस्टम की कमजोरी को दिखाता है, जहां महंगे इलाज और आर्थिक दबाव के बीच मरीज आसानी से ठगी का शिकार बन जाते हैं.
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        <pubDate>Wed, 15 Apr 2026 08:30:21 +0530</pubDate>
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        <title>Roti or Rice Health Benefits: उत्तर भारत के लोग ज्यादातर रोटी खाते हैं लेकिन दक्षिण के चावल, जानें सेहत के लिए क्या है बेस्ट?</title>
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        <description><![CDATA[ Roti or Rice Health Benefits : भारत में खाने की परंपरा बहुत अलग है. उत्तर भारत में जहां रोटी मुख्य खाना है, वहीं दक्षिण और पूर्व भारत में खाने में चावल का ज्यादा यूज होता है. अक्सर लोग इस बात पर बहस करते हैं कि रोटी ज्यादा हेल्दी है या चावल? कुछ लोग कहते हैं कि चावल खाने से वजन बढ़ता है, जबकि कई लोग मानते हैं कि चावल तो सदियों से हमारा मुख्य खाना रहा है और इसे खाने से लोग हेल्दी रहते हैं. ऐसे में आइए जानते हैं कि रोटी और चावल सेहत के लिए क्या बेस्ट है.&amp;nbsp;
रोटी और चावल सेहत के लिए क्या बेस्ट है
असल में रोटी और चावल के बीच कौन बेहतर है, इसका कोई एक सीधा जवाब नहीं है, क्योंकि यह पूरी तरह व्यक्ति के शरीर, उसकी पाचन शक्ति, लाइफस्टाइल और खाने की आदतों पर निर्भर करता है. आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान दोनों ही इस बात को मानते हैं कि हर इंसान के लिए एक जैसी डाइट सही नहीं होती है. जिन लोगों की पाचन शक्ति कमजोर होती है, उनके लिए चावल हल्का और आसानी से पचने वाला ऑप्शन होता है, जबकि जिनका शरीर ज्यादा एक्टिव है और जो शारीरिक मेहनत करते हैं, उनके लिए रोटी ज्यादा एनर्जी और लंबे समय तक पेट भरा रखने वाली होती है.&amp;nbsp;
चावल और गेहूं के फायदे&amp;nbsp;
1. चावल और गेहूं दोनों को ही जरूरी अनाज माना गया है, लेकिन इनके गुण और प्रभाव अलग-अलग बताए गए हैं. आयुर्वेद के अनुसार हर खाने का असर शरीर की प्रकृति (प्रकृति), पाचन शक्ति (अग्नि) और दोषों (वात, पित्त, कफ) पर पड़ता है.
&amp;nbsp;2. चावल को आयुर्वेद में मीठे टेस्ट वाला, शरीर को ठंडक देने वाला और हल्का अनाज माना गया है, जो आसानी से पच जाता है.&amp;nbsp;3. इसे त्रिदोष यानी वात, पित्त और कफ तीनों को संतुलित करने में मददगार बताया गया है. इसी कारण चावल को रोज खाने योग्य खाना माना गया है, खासकर जब इसे सही तरीके से पकाया जाए और बैलेंस डाइट के साथ लिया जाए.&amp;nbsp;&amp;nbsp;4. वहीं रोटी को भारी, ज्यादा पोषण देने वाला और शरीर को शक्ति प्रदान करने वाला अनाज कहा गया है.&amp;nbsp;5. यह शरीर में ताकत और एनर्जी बढ़ाने में मदद करता है और वात- पित्त दोष को शांत करता है. इसलिए गेहूं को विशेष रूप से उन लोगों के लिए अच्छा माना गया है जो शारीरिक रूप से ज्यादा एक्टिव रहते हैं या जिन्हें ज्यादा एनर्जी और ताकत की जरूरत होती है.&amp;nbsp;
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किन लोगों के लिए क्या बेहतर है?
चावल और रोटी दोनों ही अलग-अलग लोगों के लिए अलग तरह से फायदेमंद होते हैं. चावल को हल्का और आसानी से पचने वाला माना जाता है, इसलिए यह बीमार लोगों, बुजुर्गों, छोटे बच्चों और कमजोर पाचन शक्ति वाले व्यक्तियों के लिए बेहतर ऑप्शन है. ऐसे लोगों के लिए खिचड़ी या दाल-चावल जैसा हल्का खाना ज्यादा यूजफुल होता है क्योंकि ये पेट पर ज्यादा बोझ नहीं डालते और आसानी से पच जाते हैं. वहीं दूसरी ओर रोटी, यानी गेहूं से बना खाना, ज्यादा एनर्जी और ताकत देने वाला माना जाता है, इसलिए यह उन लोगों के लिए बेहतर है जो शारीरिक मेहनत करते हैं, जैसे किसान या भारी काम करने वाले लोग, या जिनकी पाचन शक्ति मजबूत होती है.&amp;nbsp;
विज्ञान क्या कहता है?
विज्ञान के अनुसार, रोटी और चावल दोनों के अपने अलग-अलग पोषण गुण हैं, ऐसे में यह तय करना कि कौन बेहतर है, इसके लिए पूरा डाइट पैटर्न ज्यादा जरूरी होता है. गेहूं में चावल की तुलना में ज्यादा प्रोटीन और फाइबर पाया जाता है, जिससे यह पेट को लंबे समय तक भरा हुआ महसूस कराता है और एनर्जी धीरे-धीरे रिलीज करता है. वहीं चावल हल्का होता है और जल्दी पच जाता है. लेकिन जब इन्हें दाल, सब्जी और घी जैसे संतुलित आहार के साथ खाया जाता है, तो दोनों का ग्लाइसेमिक इंडेक्स (GI) लगभग समान हो जाता है, यानी ब्लड शुगर पर इनका असर काफी हद तक संतुलित हो जाता है. इसलिए विज्ञान यह बताता है कि सिर्फ रोटी या चावल पर ध्यान देने की जगह पूरे खाने की क्वालिटी और बैलेंस ज्यादा फायदेमंद रखता है.&amp;nbsp;
किस अनाज से होता है शरीर को नुकसान&amp;nbsp;
आजकल हम जो अनाज खाते हैं वह बहुत ज्यादा प्रोसेस्ड और रिफाइंड हो चुका है. पॉलिश किया हुआ सफेद चावल अपने छिलके और जर्म को खो देता है, जिससे उसमें फाइबर और जरूरी पोषक तत्व कम हो जाते हैं और उसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स बढ़ जाता है, जिसके कारण यह ब्लड शुगर को तेजी से बढ़ा सकता है. इसी तरह मैदा, जो गेहूं को बहुत ज्यादा रिफाइन करके बनाया जाता है, उसमें भी फाइबर और पोषण लगभग खत्म हो जाते हैं, जिससे यह पाचन के लिए भारी और शरीर के लिए कम फायदेमंद हो जाता है.&amp;nbsp;
क्या है सही और बेस्ट ऑप्शन&amp;nbsp;
सही और बेस्ट ऑप्शन के लिए आप प्राकृतिक और कम प्रोसेस किए हुए अनाज चुनें, जैसे ब्राउन राइस या अनपॉलिश चावल, और होल व्हीट यानी साबुत गेहूं का आटा, क्योंकि इनमें फाइबर और पोषक तत्व अधिक मात्रा में सुरक्षित रहते हैं. इसके साथ ही खाने को हमेशा बैलेंस में लेना जरूरी है, जिसमें दाल, सब्जी और थोड़ी मात्रा में घी शामिल हो, ताकि शरीर को सभी जरूरी पोषक तत्व मिल सकें.
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        <pubDate>Wed, 15 Apr 2026 08:30:21 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Roti, Rice, Health, Benefits:, उत्तर, भारत, के, लोग, ज्यादातर, रोटी, खाते, हैं, लेकिन, दक्षिण, के, चावल, जानें, सेहत, के, लिए, क्या, है, बेस्ट</media:keywords>
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        <title>Salt to Newborn Baby: यहां बच्चा पैदा होते ही चटा दिया जाता है नमक, जानें इसका सेहत पर क्या पड़ता है असर?</title>
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        <description><![CDATA[ 
Salt to Newborn Baby: हमारे देश के अलग-अलग हिस्सों में परंपराएं और रीति रिवाज जीवन के हर पड़ाव से जुड़े होते हैं. ऐसा ही एक रिवाज एक समुदाय में भी खूब प्रचलित हैं. जहां जन्म से लेकर मृत्यु तक कई खास परंपराएं निभाई जाती है, जिनमें नमक का भी विशेष महत्व माना जाता है.
हमारे देश में एक जगह पर नवजात बच्चे को जन्म के तुरंत बाद नमक चाटने की परंपरा है, जो इस समुदाय की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा मानी जाती है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि कौन सी जगह पर बच्चा पैदा होते ही नमक चटाया जाता है और इसका सेहत पर क्या असर पड़ता है.&amp;nbsp;
यहां बच्चा पैदा होते ही चटाया जाता है नमक&amp;nbsp;
मणिपुर के मैतेई समुदाय में बच्चा पैदा होते ही नमक चाटने की परंपरा है. मैतेई समुदाय में नमक सिर्फ खाने की चीज नहीं, बल्कि जीवन से जुड़े हर महत्वपूर्ण अवसर का हिस्सा माना जाता है. स्थानीय स्तर पर तैयार किया जाने वाला नमक जिसे थुम भी कहा जाता है, इसे प्राकृतिक खारे पानी के सोर्स से तैयार किया जाता है. गांव में लोग इन सोर्स से पानी इकट्ठा कर उसे उबालते हैं, जिससे नमक तैयार होता है. यही नमक बाद में घरों में उपयोग किया जाता है और बाजार में भी बेचा जाता है. वहीं इस समुदाय में मान्यता है कि बच्चों के जन्म के बाद उसे नमक चाटना जरूरी होता है. इस तरह यहां किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद भी उसके मुंह में नमक रखा जाता है. शादी, त्योहार और दूसरे पारिवारिक आयोजन में भी नमक का इस्तेमाल अनिवार्य माना जाता है. इस तरह से यहां नमक को जीवन चक्र का अहम हिस्सा माना जाता है.&amp;nbsp;
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सेहत के नजरिए से क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?
हेल्थ एक्सपर्ट्स बताते हैं कि नवजात बच्चे को जन्म के बाद शुरुआती महीनों में नमक देना ठीक नहीं होता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन और डॉक्टराें के अनुसार, बच्चों को जन्म से लेकर 6 महीने तक सिर्फ मां का दूध ही देना चाहिए. इसके बाद ठोस आहार शुरू किया जाता है, तब भी शुरुआत में नमक और चीनी से परहेज करने की सलाह दी जाती है. डॉक्टरों का कहना है कि छोटे बच्चों की किडनी पूरी तरह विकसित नहीं होती है. इसलिए ज्यादा नमक उनके लिए नुकसानदायक हो सकता है. इससे किडनी पर दबाव पड़ता है और भविष्य में हाई ब्लड प्रेशर जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है.&amp;nbsp;
कब देना चाहिए बच्चों को नमक?
हेल्थ एक्सपर्ट्स के अनुसार बच्चों को 1 साल की उम्र के बाद ही सीमित मात्रा में नमक देना शुरू करना चाहिए. 1 से 3 साल के बच्चों के लिए रोजाना नमक की मात्रा बहुत कम रखनी चाहिए, ताकि उनके शरीर पर इसका नकारात्मक असर न पड़े.
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        <pubDate>Wed, 15 Apr 2026 08:30:20 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Annual Body Checkup : हर साल कराएंगे ये 5 बॉडी टेस्ट तो वक्त रहते बड़ी मुसीबत से बच जाएंगे आप, देख लें पूरी लिस्ट</title>
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        <description><![CDATA[ Annual Body Checkup : हर साल कराएंगे ये 5 बॉडी टेस्ट तो वक्त रहते बड़ी मुसीबत से बच जाएंगे आप, देख लें पूरी लिस्ट ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 12 Apr 2026 18:30:31 +0530</pubDate>
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        <title>Effects of quitting gym suddenly: अचानक जिम छोड़ने से शरीर पर क्या पड़ता है असर? जान लीजिए नुकसान</title>
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        <description><![CDATA[ Effects of quitting gym suddenly: आजकल फिट रहने के लिए जिम जाना लोगों की लाइफस्टाइल का बहुत जरूरी हिस्सा बन चुका है. नियमित वर्कआउट न सिर्फ शरीर को मजबूत बनाता है, बल्कि मेंटल रूप से भी व्यक्ति को एक्टिव और रिलैक्स रखता है. जिम में एक्सरसाइज करने से मांसपेशियां मजबूत होती है, स्टेमिना बढ़ता है और शरीर में एनर्जी बनी रहती है. यही वजह है की बड़ी संख्या में लोग उत्साह के साथ जिम ज्वाइन करते हैं. लेकिन समय की कमी, आलस या मोटिवेशन की कमी के कारण कई लोग बीच में ही छोड़ देते हैं. ऐसे में शरीर पर इसके कई नेगेटिव असर देखने को मिल सकते हैं. तो चलिए आज हम आपको बताते हैं कि अचानक जिम छोड़ने से शरीर पर क्या असर पड़ता है और इसके नुकसान क्या-क्या होते हैं?
वजन बढ़ने लगता है
जिम छोड़ने के बाद सबसे पहले असर वजन पर पड़ता है. नियमित एक्सरसाइज के दौरान कैलोरीज बर्न होती है या अचानक रुक जाती है. ऐसे में शरीर में एक्स्ट्रा कैलोरी जमा होने लगती है और वजन तेजी से बढ़ सकता है. खासकर पेट की चर्बी बढ़ने का खतरा ज्यादा रहता है.
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मांसपेशियां कमजोर होने लगती है
वर्कआउट के दौरान मांसपेशियां मजबूत और एक्टिव रहती है. लेकिन जिम छोड़ने के बाद धीरे-धीरे उनकी ताकत कम होने लगती है. कुछ हफ्तों में ही मसल्स सिकुड़ने लगती है और शरीर में कमजोरी व थकान महसूस होने लगती है. छोटी-छोटी एक्टिविटी में भी पहले के मुकाबले ज्यादा थकावट महसूस हो सकती है.
सहनशक्ति और स्टैमिना में गिरावट
जिम करने से शरीर की सहनशक्ति बढ़ती है, लेकिन एक्सरसाइज बंद करते ही यह धीरे-धीरे कम होने लगती है. करीब एक दो हफ्ते में ही शरीर की कार्डियो फिटनेस पर असर दिखने लगता है. वीओ2 मैक्स में गिरावट आने से शरीर की ऑक्सीजन उपयोग करने की क्षमता घटती है और थोड़ी सी मेहनत में भी सांस फूलने लगती है.
मेटाबॉलिज्म धीमा पड़ता है
नियमित वर्कआउट से मेटाबॉलिज्म तेज रहता है, जिससे शरीर कैलोरी जल्दी बर्न करता है. लेकिन जिम छोड़ने के बाद मेटाबॉलिज्म धीमा हो जाता है. इसका सीधा असर वजन और बॉडी फैट पर पड़ता है, जिससे शरीर में चर्बी बढ़ने लगती है.
मानसिक तनाव और मूड पर असर
एक्सरसाइज करने से शरीर में हैप्पी हार्मोन रिलीज होते हैं, जिससे मूड अच्छा रहता है. लेकिन वर्कआउट बंद करने के कुछ ही दिनों में मूड स्विंग्स, चिड़चिड़ापन और तनाव बढ़ सकता है. कई लोगों को थकान, उदासी और मोटिवेशन की कमी महसूस होने लगती है.
ब्लड शुगर और बीमारियों का खतरा
एक्सरसाइज बंद करने से ब्लड शुगर लेवल बढ़ सकता है. क्योंकि शरीर ग्लूकोज का उपयोग कम करने लगता है. लंबे समय तक एक्टिविटी कम करने से इंसुलिन संवेदनशीलता भी प्रभावित हो सकती है, जिससे डायबिटीज का खतरा बढ़ता है. इसके अलावा हाई ब्लड प्रेशर और हार्ट प्रॉब्लम जैसी समस्याओं का खतरा भी बढ़ सकता है.
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        <pubDate>Sun, 12 Apr 2026 18:30:30 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>क्या फ्रूट जूस पीने से बढ़ सकता है ब्लड शुगर? जानिए सच्चाई</title>
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        <description><![CDATA[ आजकल इंटरनेट पर हर जगह यह कहा जा रहा है कि फ्रूट जूस पीने से डायबिटीज होती है और ब्लड शुगर तेजी से बढ़ता है. लेकिन क्या सच में ऐसा है? इसका जवाब आपकी सोच से थोड़ा पेचीदा है. यह समझना बहुत ज़रूरी है कि बोली हुई बातों और असल बातों के बीच क्या फर्क है?
एक्सपर्ट की क्या है राय?
BDR Pharmaceuticals के टेक्निकल डायरेक्टर डॉ. अरविंद बडिगेर &amp;nbsp;के अनुसार फ्रूट जूस को अच्छी सेहत बनाए रखने के लिए एक अच्छा विकल्प माना जा सकता है, क्योंकि इसमें कई तरह के पोषक तत्व होते हैं. लेकिन इसका ब्लड शुगर को कंट्रोल करने पर असर थोड़ा चिंता का विषय हो सकता है. हालांकि इसे पीना नुकसानदायक नहीं है, लेकिन यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप इसे कितनी मात्रा में और कब पीते हैं.
एक रिसर्च से पता चलता है कि फ्रूट जूस में ग्लाइसेमिक इंडेक्स मध्यम से थोड़ा ज्यादा होता है, यानी यह जल्दी पचता है और खाने के बाद कुछ समय के लिए ब्लड शुगर बढ़ा सकता है. साथ ही यह एक सामान्य प्रक्रिया है, क्योंकि आप जूस के रूप में ज्यादा मात्रा में शुगर ले रहे होते हैं.
फ्रूट जूस और साबुत फल में फर्क
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि फ्रूट जूस और साबुत फल दोनों में काफी फर्क होता है. साबुत फल में फाइबर भरपूर मात्रा में होता है, जो शरीर में शुगर के अवशोषण को धीमा करता है. वहीं, जब हम फल का जूस बनाते हैं, तो उसमें से ज्यादातर फाइबर निकल जाता है और केवल शुगर वाला लिक्विड बच जाता है. यही कारण है कि जूस पीने से ब्लड शुगर तेजी से बढ़ सकता है.
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क्या फ्रूट जूस नुकसानदायक है?
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि फ्रूट जूस पूरी तरह से नुकसानदायक है. कई स्टडी और मेटा-एनालिसिस में यह पाया गया है कि अगर जूस को सीमित मात्रा में पी लिया जाए तो यह सीधे तौर पर डायबिटीज का कारण नहीं बनता. यानी समस्या जूस में नहीं, बल्कि उसकी मात्रा और सेवन के तरीके में होती है. विशेषज्ञों का कहना है कि जूस पीने के बाद ब्लड शुगर का स्तर जल्दी बढ़ सकता है, क्योंकि इसमें मौजूद प्राकृतिक शुगर बिना फाइबर के सीधे खून में पहुंच जाती है. यही कारण है कि डायबिटीज या प्रीडायबिटीज वाले लोगों को जूस का सेवन सोच-समझकर करना चाहिए.
फ्रूट जूस में शुगर कैसे काम करती है?
फ्रूट जूस में मौजूद नैचुरल शुगर दो तरह की होती है फ्रक्टोज और ग्लूकोज. यह प्रोसेस्ड ड्रिंक्स से अलग होती है, क्योंकि यह सीधे फलों से आती है. लेकिन फ्रूट जूस पीने के तरीके में एक बड़ा फर्क होता है. जूस बनाने के दौरान फल का ज्यादातर फाइबर निकल जाता है, जबकि फाइबर बहुत जरूरी होता है, क्योंकि यह शरीर में शुगर के अवशोषण को धीमा करता है. जब फाइबर नहीं होता, तो जूस में मौजूद शुगर जल्दी शरीर में अवशोषित हो जाती है और ब्लड शुगर तेजी से बढ़ सकता है.
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        <pubDate>Sun, 12 Apr 2026 18:30:29 +0530</pubDate>
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        <title>Asha Bhosle: सीने में इंफेक्शन से कब हो जाती है इंसान की मौत, आशा भोसले का इसी बीमारी से हुआ निधन?</title>
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        <description><![CDATA[ Asha Bhosle Death Reason: भारतीय संगीत की सबसे महान गायिकाओं में से एक आशा भोसले का 92 वर्ष की उम्र में निधन हो गया है. उन्हें शनिवार को &amp;nbsp;ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जब उन्हें दिल और सांस से जुड़ी दिक्कतें हुईं. रिपोर्ट के अनुसार, पिछले कुछ महीनों से उनकी तबीयत ठीक नहीं चल रही थी. हालत बिगड़ने पर उन्हें गंभीर अवस्था में अस्पताल लाया गया, जहां शनिवार रात उन्हें आईसीयू में भर्ती किया गया था. चलिए आपको बताते हैं कि कैसे सीने में इंफेक्शन से इंसान की मौत हो जाती है.&amp;nbsp;
सीने का इंफेक्शन कई बार मामूली सर्दी-खांसी जैसा लगता है, लेकिन कुछ मामलों में यही समस्या तेजी से गंभीर रूप ले सकती है. प्न्यूमोनिया एक ऐसी ही स्थिति है, जिसमें फेफड़ों में इंफेक्शन हो जाता है. यह बैक्टीरिया, वायरस या फंगस के कारण होता है और फेफड़ों के टिश्यू में सूजन के साथ उनमें पानी या पस भर सकता है. यही वजह है कि सांस लेना मुश्किल होने लगता है और ऑक्सीजन का स्तर गिर सकता है.&amp;nbsp;
लंग्स होते हैं प्रभावित
हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली संस्था clevelandclinic के अनुसार, &amp;nbsp;प्न्यूमोनिया एक या दोनों फेफड़ों को प्रभावित कर सकता है। जब दोनों फेफड़े इंफेक्टेड होते हैं, तो इसे डबल या बाइलेटरल प्न्यूमोनिया कहा जाता है, जो ज्यादा खतरनाक हो सकता है. खासकर बैक्टीरियल प्न्यूमोनिया वायरल की तुलना में ज्यादा गंभीर माना जाता है और कई बार अस्पताल में भर्ती की जरूरत पड़ सकती है. &amp;nbsp;रिपोर्ट में बताया गया है कि सीने का इंफेक्शन तब जानलेवा बनता है, जब यह तेजी से बढ़कर शरीर में ऑक्सीजन की सप्लाई को प्रभावित करने लगता है. अगर समय पर इलाज न मिले, तो फेफड़ों में सूजन बढ़ती जाती है और सांस लेने में दिक्कत गंभीर रूप ले लेती है. ऐसी स्थिति में मरीज को वेंटिलेटर सपोर्ट तक की जरूरत पड़ सकती है.
अलग- अलग तरह के इंफेक्शन
प्न्यूमोनिया के अलग-अलग प्रकार भी होते हैं, जो इसकी गंभीरता तय करते हैं. कम्युनिटी-एक्वायर्ड प्न्यूमोनिया आमतौर पर बाहर से होने वाला इंफेक्शन है, जबकि हॉस्पिटल-एक्वायर्ड प्न्यूमोनिया ज्यादा खतरनाक होता है क्योंकि यह एंटीबायोटिक-रेजिस्टेंट बैक्टीरिया से होता है और इलाज मुश्किल हो सकता है। इसी तरह वेंटिलेटर पर रहने वाले मरीजों में होने वाला इंफेक्शन भी जानलेवा साबित हो सकता है.
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65 साल से ऊपर के लोगों को ज्यादा खतरा
सबसे ज्यादा खतरा उन लोगों को होता है जिनकी इम्यूनिटी कमजोर होती है. 65 साल से ज्यादा उम्र के बुजुर्ग, छोटे बच्चे, पहले से दिल या फेफड़ों की बीमारी से जूझ रहे लोग, स्मोकिंग करने वाले या कीमोथेरेपी जैसी ट्रीटमेंट ले रहे मरीज इस जोखिम में ज्यादा आते हैं. ऐसे लोगों में इंफेक्शन तेजी से बढ़ सकता है और हालत जल्दी बिगड़ सकती है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 12 Apr 2026 18:30:27 +0530</pubDate>
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        <title>Esophageal Cancer: बार&amp;बार आ रही है खांसी तो हो जाएं सावधान, हो सकता है खाने की नली में कैंसर</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/esophageal-cancer-बार-बार-आ-रही-है-खांसी-तो-हो-जाएं-सावधान-हो-सकता-है-खाने-की-नली-में-कैंसर</link>
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        <description><![CDATA[ Esophageal Cancer : आजकल की बिजी लाइफस्टाइल में हम अक्सर छोटी-छोटी स्वास्थ्य समस्याओं को नजरअंदाज कर देते हैं. जैसे बार-बार खांसी, सीने में जलन या निगलने में हल्की परेशानी, कई बार ये सामान्य लगने वाले लक्षण गंभीर बीमारी की शुरुआत भी हो सकते हैं. ऐसी ही एक गंभीर बीमारी खाने की नली का कैंसर है.&amp;nbsp;
खाने की नली का कैंसर (Esophageal Cancer) एक तेजी से बढ़ने वाला कैंसर है. अगर इसे शुरुआती अवस्था में पहचान लिया जाए, तो इलाज के अच्छे परिणाम मिल सकते हैं, लेकिन समस्या यह है कि इसके शुरुआती लक्षण अक्सर हल्के होते हैं और लोग इन्हें अनदेखा कर देते हैं. तो आइए जानते हैं कि खाने की नली का कैंसर क्या होता है, इसके शुरुआती संकेत क्या हैं और किन लोगों को ज्यादा खतरा है.&amp;nbsp;
खाने की नली का कैंसर क्या होता है
खाने की नली एक लंबी नली होती है जो हमारे गले को पेट से जोड़ती है. जब हम खाना खाते हैं, तो यही नली खाने को पेट तक पहुंचाती है. जब इस नली की अंदरूनी परत की कोशिकाएं असामान्य तरीके से बढ़ने लगती हैं और कंट्रोल से बाहर हो जाती हैं, तो कैंसर बनता है. यह कैंसर धीरे-धीरे आसपास के पार्टस में भी फैल सकता है.&amp;nbsp;
किन लोगों को ज्यादा खतरा होता है?
कुछ आदतें और स्थितियां इस कैंसर का खतरा बढ़ा देती हैं. जिसमें बढ़ती उम्र में इसका खतरा ज्यादा होता है, इसके अलावा पुरुषों में ज्यादा देखा जाता है. वहीं धूम्रपान और शराब का सेवन करने वाले लोगों में ज्यादा खतरा होता है. साथ ही लगातार एसिडिटी या GERD, मोटापा, फल और सब्जियां कम खाना, बहुत ज्यादा गर्म ड्रिंक्स पीने वाले लोगों &amp;nbsp;को भी ज्यादा खतरा होता है.&amp;nbsp;
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शुरुआती संकेत जिन्हें नजरअंदाज न करें
1. निगलने में दिक्कत (डिस्फेजिया) - शुरुआत में ठोस चीजें निगलने में परेशानी होती है, बाद में पानी पीने में भी दिक्कत हो सकती है.&amp;nbsp;
2. बिना कारण वजन घटना - अगर बिना डाइटिंग या एक्सरसाइज के वजन तेजी से कम हो रहा है, तो खाने की नली में कैंसर हो सकता है.&amp;nbsp;
3. सीने में दर्द या जलन - सीने में जलन, दबाव या दर्द महसूस होना, जिसे लोग अक्सर गैस समझ लेते हैं. ये भी खाने की नली में कैंसर का संकेत हो सकता है
4. बार-बार खांसी या आवाज बैठना - अगर खांसी लंबे समय तक ठीक नहीं हो रही या आवाज भारी हो गई है, तो सावधान हो जाएं. ये खाने की नली में कैंसर का शुरुआती संकेत हो सकता है.&amp;nbsp;
5. खाना खाते समय बार-बार रुकावट - खाना गले में अटकना या बार-बार खांसी आना भी &amp;nbsp;खाने की नली में कैंसर का संकेत हो सकता है.&amp;nbsp;
कैसे करें बचाव?
खाने की नली के कैंसर से पूरी तरह बचाव करना संभव नहीं है, लेकिन कुछ आदतें अपनाकर इसका खतरा काफी हद तक कम किया जा सकता है. जिसमें &amp;nbsp;धूम्रपान और शराब का सेवन न करें. अपनी डाइट में ताजे फल और हरी सब्जियों को शामिल करें. साथ ही अपने वजन का बैलेंस बनाए रखना और रोजाना एक्सरसाइज करना भी जरूरी है. अगर आपको बार-बार खांसी, एसिडिटी या जलन की समस्या होती है, तो उसे नजरअंदाज न करें और समय पर डॉक्टर से सलाह लें.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ें - &amp;nbsp;ग्रेड-1 फैटी लिवर में फायदेमंद हो सकता है मेथी का पानी, जानिए इसके चौंकाने वाले फायदे
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 12 Apr 2026 05:30:14 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Headaches Causes: सारी मेडिकल रिपोर्ट नॉर्मल फिर भी बना रहता है सिरदर्द, जानें कहां है दिक्कत?</title>
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        <description><![CDATA[ Headaches Causes : आजकल बहुत से लोग एक अजीब समस्या से गुजर रहे हैं. इस समस्या में लोग बार-बार सिरदर्द से परेशान रहते हैं, लेकिन जब डॉक्टर के पास जाते हैं तो उनकी MRI, ब्लड टेस्ट और बाकी जांचें बिल्कुल सामान्य आती हैं. ऐसे में मन में सवाल उठता है कि जब सब कुछ ठीक है, तो दर्द क्यों हो रहा है. यह समस्या न सिर्फ शारीरिक रूप से परेशान करती है, बल्कि मानसिक रूप से भी कंफ्यूजन पैदा करती है. व्यक्ति सोचने लगता है कि शायद समस्या गंभीर नहीं है, लेकिन बार-बार होने वाला सिरदर्द रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करने लगता है. विशेषज्ञों का कहना है कि यह दर्द शरीर का एक संकेत होता है, जिसे हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं. तो आइए जानते हैं कि सारी मेडिकल रिपोर्ट नॉर्मल फिर भी बना सिरदर्द रहता है तो कहां दिक्कत है.&amp;nbsp;
रिपोर्ट नॉर्मल फिर भी बना सिरदर्द रहता है तो कहां दिक्कत है
डॉक्टरों के अनुसार, ऐसे सिरदर्द का कारण कोई बड़ी बीमारी नहीं, बल्कि हमारी रोजमर्रा की आदतें होती हैं. इसे फंक्शनल समस्या कहा जाता है, इसका मतलब शरीर के काम करने के तरीके में गड़बड़ी है, न कि किसी स्ट्रक्चरल बीमारी में, इस समस्या का कारण दिमाग में कोई चोट या ट्यूमर नहीं है, बल्कि हमारी लाइफस्टाइल धीरे-धीरे शरीर पर असर डाल रही है.
सिरदर्द के छिपे कारण क्या है
1. तनाव - आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में तनाव बहुत आम हो गया है. जब हम लगातार तनाव में रहते हैं, तो सिर और गर्दन की मांसपेशियां सख्त हो जाती हैं. ससे हल्का लेकिन लगातार रहने वाला सिरदर्द होता है, जिसे टेंशन हेडेक कहा जाता है.&amp;nbsp;
2. गलत बैठने का तरीका &amp;nbsp;- लंबे समय तक मोबाइल या लैपटॉप पर झुककर बैठना गर्दन और कंधों पर दबाव डालता है. यह दबाव धीरे-धीरे सिर तक पहुंचता है और दर्द का कारण बनता है.&amp;nbsp;
3. ज्यादा स्क्रीन देखना - घंटों स्क्रीन देखने से आंखों पर जोर पड़ता है. कम पलक झपकाना और लगातार फोकस करने से आंखों में थकान होती है, जो सिरदर्द में बदल जाती है.&amp;nbsp;
4. समय पर खाना न खाना - अगर आप अक्सर खाना छोड़ देते हैं या देर से खाते हैं, तो ब्लड शुगर कम हो जाती है. इससे कमजोरी, चिड़चिड़ापन और सिरदर्द शुरू हो सकता है.&amp;nbsp;
5. नींद की कमी या ज्यादा नींद - नींद का सीधा संबंध हमारे दिमाग से होता है. कम सोना, बार-बार नींद टूटना या बहुत ज्यादा सोना,ये सभी सिरदर्द को बढ़ा सकते हैं.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ें - Hot Water Benefits: वजन कम करने के लिए सुबह-सुबह आप भी पीते हैं गर्म पानी, क्या सच में काम करता है यह हैक?
रिपोर्ट नॉर्मल होने का मतलब क्या है
ज्यादातर मेडिकल टेस्ट सिर्फ बड़ी बीमारियों का पता लगाने के लिए होते हैं, जैसे ट्यूमर, इंफेक्शन, न्यूरोलॉजिकल बीमारी. लेकिन ये टेस्ट यह नहीं बता सकते कि आप कितनी देर तक एक ही जगह बैठे रहते हैं, कितना पानी पीते हैं, कितना तनाव लेते हैं, आपकी नींद और खाने का पैटर्न कैसा है. यही वजह है कि रिपोर्ट नॉर्मल आने के बाद भी समस्या बनी रहती है.
सिरदर्द कम करने के लिए क्या करें&amp;nbsp;
ऐसे सिरदर्द को बिना भारी दवाइयों के भी काफी हद तक ठीक किया जा सकता है. इसके लिए ज्यादा से ज्यादा पानी पिएं, हल्की डिहाइड्रेशन भी सिरदर्द का कारण बन सकती है. इसके अलावा सही पोस्चर रखें. सीधे बैठें, स्क्रीन आंखों के स्तर पर रखें और हर 30 से 40 मिनट में ब्रेक लें. दिन में 3 से 4 बार बैलेंस डाइट लें, खाना स्किप न करें. हर दिन एक ही समय पर सोने और उठने की आदत डालें.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ें - &amp;nbsp;ग्रेड-1 फैटी लिवर में फायदेमंद हो सकता है मेथी का पानी, जानिए इसके चौंकाने वाले फायदे
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 12 Apr 2026 05:30:14 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Hot Water Benefits: वजन कम करने के लिए सुबह&amp;सुबह आप भी पीते हैं गर्म पानी, क्या सच में काम करता है यह हैक?</title>
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        <description><![CDATA[ Does Drinking Hot Water Help With Weight Loss: आजकल सोशल मीडिया पर एक नया वेलनेस ट्रेंड तेजी से वायरल हो रहा है. लोग दावा कर रहे हैं कि रोज सुबह सिर्फ एक कप गर्म पानी पीने से वजन कम होता है, स्किन साफ होती है और यहां तक कि पीरियड्स के दर्द व गले की खराश में भी राहत मिलती है. सुनने में यह तरीका काफी आसान और नेचुरल लगता है, इसलिए लोग इसे जल्दी अपनाने लगते हैं.
लेकिन असली सवाल यह है कि क्या सच में गर्म पानी पीने से इतने फायदे मिलते हैं, या फिर यह सिर्फ एक और वायरल ट्रेंड है? सच थोड़ा अलग है. गर्म पानी पीना सुरक्षित तो है और कई लोगों को इससे अच्छा महसूस भी होता है, लेकिन इसके पीछे ठोस वैज्ञानिक कारण साफ तौर पर साबित नहीं हुए हैं.&amp;nbsp;
क्या इससे होता है फायदा
दरअसल, इसके फायदे पानी के तापमान से ज्यादा उस आदत से जुड़े हो सकते हैं कि आप नियमित रूप से पानी पी रहे हैं. कई बार गर्माहट से मिलने वाला आराम और रिलैक्सेशन ही शरीर को बेहतर महसूस कराता है. यानी असली फायदा पानी पीने का है, न कि उसका गर्म होना. पानी हमारे शरीर के लिए बेहद जरूरी है, चाहे वह ठंडा हो, सामान्य हो या गर्म. पर्याप्त मात्रा में पानी पीने से पाचन, ब्लड सर्कुलेशन, किडनी फंक्शन और ब्लड प्रेशर जैसी कई जरूरी प्रक्रियाएं सही रहती हैं. हाल की एक स्टडी में यह भी सामने आया है कि कम पानी पीने से रोजमर्रा के तनाव को संभालना भी मुश्किल हो सकता है.&amp;nbsp;
क्या इससे वजन कम होता है
अब बात करते हैं सबसे आम दावे की कि क्या गर्म पानी वजन घटाने में मदद करता है? obesity जर्नल &amp;nbsp;में पब्लिस रिसर्च के अनुसार, अभी तक ऐसा कोई ठोस साइंटफिक प्रमाण नहीं है जो यह दिखाए कि सिर्फ गर्म पानी पीने से वजन कम होता है. हां, अगर आप मीठे या हाई-कैलोरी ड्रिंक्स की जगह पानी पीने लगते हैं, तो इससे वजन कंट्रोल में मदद मिल सकती है. कुछ रिसर्च में यह जरूर बताया गया है कि गर्म पानी आंतों की हलचल को थोड़ा बढ़ा सकता है, जिससे पाचन बेहतर होता है. लेकिन यह असर बहुत मामूली होता है और इसका सीधा संबंध फैट कम होने से नहीं है.
इसे भी पढ़ें-&amp;nbsp;Cervical Cancer In India: हर 8 मिनट में एक जान! साइलेंट किलर है सर्वाइकल कैंसर, डॉक्टर से जानें इसे रोकने के 5 कारगर तरीके
गले की खराश में फायदेमंद
अब आते हैं गले की खराश पर. यहां गर्म पानी थोड़ा ज्यादा असरदार साबित होता है. गर्म तरल पदार्थ गले को आराम देते हैं, म्यूकस को ढीला करते हैं और सांस की नलियों में जलन को कम करते हैं. यही वजह है कि सर्दी-खांसी में गर्म चाय या काढ़ा पीने की सलाह दी जाती है.
इसे भी पढ़ें-&amp;nbsp;पीरियड्स पेन का पैटर्न: पहले दिन ज्यादा, बाद में कम क्या है वजह? डॉक्टर ने बताया असली कारण
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 11 Apr 2026 13:30:13 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>ग्रेड&amp;1 फैटी लिवर में फायदेमंद हो सकता है मेथी का पानी, जानिए इसके चौंकाने वाले फायदे</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/ग्रेड-1-फैटी-लिवर-में-फायदेमंद-हो-सकता-है-मेथी-का-पानी-जानिए-इसके-चौंकाने-वाले-फायदे</link>
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        <description><![CDATA[ Fenugreek Water Benefits : आजकल फैटी लिवर की समस्या तेजी से बढ़ रही है. खासकर ग्रेड-1 फैटी लिवर, जिसे शुरुआती अवस्था माना जाता है, यह बहुत से लोगों में बिना किसी साफ लक्षण के पाया जाता है. यह स्थिति धीरे-धीरे गलत खानपान, मोटापा, तनाव और कम फिजिकल एक्टिविटी के कारण विकसित हो सकती है. ऐसे में लोग नेचुरल और घरेलू उपायों की ओर भी ध्यान दे रहे हैं. इन्हीं में से एक उपाय &amp;nbsp;मेथी के दानों का पानी (Methi Water) है, जिसे रात भर भिगोकर सुबह खाली पेट पिया जाता है. कुछ शोध और विशेषज्ञों के अनुसार यह लिवर की सेहत को सपोर्ट करने में मदद कर सकता है, लेकिन इसे अकेला इलाज नहीं माना जाता है. तो आइए जानते हैं कि मेथी का पानी ग्रेड-1 फैटी लिवर में कैसे फायदेमंद हो सकता है.&amp;nbsp;
ग्रेड-1 फैटी लिवर क्या होता है?
ग्रेड-1 फैटी लिवर फैटी लिवर की शुरुआती अवस्था होती है. इसमें लिवर में थोड़ी मात्रा में चर्बी जमा होने लगती है. इस स्टेज में आमतौर पर कोई गंभीर लक्षण नहीं दिखते, इसलिए कई लोग इसे पहचान नहीं पाते हैं. इसके मुख्य कारण इंसुलिन रेजिस्टेंस, मोटापा, एक्सरसाइज की कमी और गलत खानपान जैसे ज्यादा तला-भुना और कार्बोहाइड्रेट वाली डाइट हो सकते हैं. वहीं अगर शुरुआती चरण में ध्यान दिया जाए तो इसे ठीक किया जा सकता है.&amp;nbsp;
मेथी का पानी फैटी लिवर में कैसे फायदेमंद हो सकता है
मेथी शरीर में इंसुलिन की कार्यक्षमता को बेहतर बनाने में मदद कर सकती है, जिससे ब्लड शुगर लेवल संतुलित रहने में मदद मिलती है. कुछ रिसर्च के अनुसार यह शरीर में फैट और कोलेस्ट्रॉल के स्तर को संतुलित करने में सहायक हो सकती है. यह पाचन और शरीर की एनर्जी प्रक्रिया को बेहतर बनाने में मदद कर सकती है, जिससे फैट जमा होने की प्रक्रिया पर अप्रत्यक्ष असर पड़ सकता है. लेकिन अभी तक ऐसा कोई मजबूत प्रमाण नहीं है जो यह साबित करे कि सिर्फ मेथी का पानी फैटी लिवर को पूरी तरह ठीक कर देता है.&amp;nbsp;
मेथी का पानी कैसे बनाएं
मेथी का पानी बनाने के लिए मेथी दानों को रातभर पानी में भिगोकर रखा जाता है. सुबह उस पानी को छानकर खाली पेट पिया जाता है. मेथी के बीजों में कुछ ऐसे प्राकृतिक तत्व पाए जाते हैं जो पाचन को बेहतर बना सकते हैं, शुगर कंट्रोल में मदद कर सकते हैं और मेटाबॉलिज्म को सपोर्ट कर सकते हैं.&amp;nbsp;
मेथी का पानी कैसे पीना चाहिए?
अगर आप इसे अपने रूटीन में शामिल करना चाहते हैं, तो ध्यान रखें 1 से 2 चम्मच मेथी दाने रातभर पानी में भिगोएं. सुबह खाली पेट उस पानी को पी लें. लेकिन जरूरत से ज्यादा सेवन न करें. साथ ही प्रेग्नेंट महिलाओं को डॉक्टर की सलाह के बिना इसका सेवन नहीं करना चाहिए. डायबिटीज की दवा लेने वाले लोग पहले डॉक्टर से सलाह लें. ज्यादा मात्रा में लेने से गैस या पेट में परेशानी हो सकती है.&amp;nbsp;
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क्या मेथी का पानी फैटी लिवर को पूरी तरह ठीक कर सकता है?
विशेषज्ञों के अनुसार मेथी का पानी सहायक उपाय हो सकता है, लेकिन यह अकेले इलाज नहीं है. फैटी लिवर को सुधारने के लिए सबसे जरूरी वजन कम करना, बैलेंस डाइट लेना, नियमित एक्सरसाइज करना और लाइफस्टाइल में सुधार करना है. डॉक्टरों के अनुसार अगर कोई व्यक्ति अपने शरीर का लगभग 5 प्रतिशत से 10 प्रतिशत वजन धीरे-धीरे कम करता है, तो शुरुआती फैटी लिवर में सुधार देखा जा सकता है.&amp;nbsp;
&amp;nbsp;फैटी लिवर को ठीक करने के लिए जरूरी टिप्स&amp;nbsp;
अगर आप ग्रेड-1 फैटी लिवर से जूझ रहे हैं, तो कम तेल और कम तला-भुना खाना, रिफाइंड शुगर और मैदा कम करना, ज्यादा सब्जियां और फाइबर लेना, कम से कम 30 से 40 मिनट तेज चलना या हल्की कसरत, हफ्ते में 5 दिन नियमित एक्सरसाइज और शरीर के अनुसार सही BMI बनाए रखना बहुत जरूरी है.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ें - Smoking kills: सिगरेट और गांजा पीने वालों का सिकुड़ रहा दिमाग, नई स्टडी में चौंकाने वाला खुलासा
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 11 Apr 2026 13:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Fatal love bite: कब जानलेवा हो जाती है &amp;apos;लव बाइट&amp;apos;, जानें कब पार्टनर को रोकना होता है जरूरी?</title>
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        <pubDate>Sat, 11 Apr 2026 01:30:18 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Married People Cancer Risk: क्या शादी करने से घट जाता है कैंसर होने का खतरा? कुंवारों को जरूर पढ़नी चाहिए यह रिसर्च</title>
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        <pubDate>Sat, 11 Apr 2026 01:30:17 +0530</pubDate>
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        <title>Fatty Liver Disease: क्या बिना शराब पिए डैमेज हो सकता है लिवर, जानें आपकी रोजाना की कौन&amp;सी गलतियां पड़ रहीं भारी?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/fatty-liver-disease-क्या-बिना-शराब-पिए-डैमेज-हो-सकता-है-लिवर-जानें-आपकी-रोजाना-की-कौन-सी-गलतियां-पड़-रहीं-भारी</link>
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        <description><![CDATA[ Can Liver Cirrhosis Happen Without Alcohol: आजकल डॉक्टर एक ऐसे ट्रेंड को लेकर चिंता जता रहे हैं, जो चौंकाने वाला है. लीवर सिरोसिस, जिसे आमतौर पर शराब से जुड़ी बीमारी माना जाता था, अब उन लोगों में भी तेजी से सामने आ रहा है जो बहुत कम या बिल्कुल शराब नहीं पीते. इसकी असली वजह हमारी रोजमर्रा की आदतें हैं, खराब खानपान, बढ़ता वजन, डायबिटीज और लंबे समय तक बैठे रहने वाली लाइफस्टाइल.
साइलेंट किलर होता है यह
इस बीमारी को अक्सर साइलेंट किलर कहा जाता है, क्योंकि यह बिना किसी बड़े लक्षण के धीरे-धीरे शरीर को नुकसान पहुंचाती रहती है. जब तक इसके संकेत साफ दिखाई देते हैं, तब तक लीवर काफी हद तक डैमेज हो चुका होता है. डॉ. वसीम रमज़ान डार ने TOI को बताया कि पहले सिरोसिस को सिर्फ शराब से जोड़कर देखा जाता था, लेकिन अब यह मोटापा, खराब डाइट, डायबिटीज और फैटी लीवर जैसी लाइफस्टाइल बीमारियों से भी जुड़ा हुआ है.
कैसे होती है लिवर सिरोसिस की दिक्कत?
दरअसल, लीवर शरीर का एक बेहद अहम अंग है, जो खाने को पचाने, टॉक्सिन्स को फिल्टर करने और मेटाबॉलिज्म को संतुलित रखने का काम करता है. लेकिन जब इस पर बार-बार दबाव पड़ता है, चाहे वह फैट जमा होने से हो, इंफेक्शन से या किसी और कारण से, तो इसमें धीरे-धीरे स्कार टिश्यू बनने लगता है. यही स्थिति आगे चलकर सिरोसिस बन जाती है. शुरुआती लक्षण इतने हल्के होते हैं कि लोग अक्सर इन्हें नजरअंदाज कर देते हैं. जैसे लगातार थकान रहना, भूख कम लगना, पेट में हल्की परेशानी या बिना वजह वजन कम होना. कई लोग इसे स्ट्रेस या नींद की कमी समझकर छोड़ देते हैं. लेकिन जैसे-जैसे बीमारी बढ़ती है, लक्षण भी गंभीर हो जाते हैं. पेट में सूजन, त्वचा या आंखों का पीला पड़ना, बार-बार इंफेक्शन होना और कमजोरी महसूस होना इसके संकेत हो सकते हैं.&amp;nbsp;
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
डॉ. शंकर कुमार गुप्ता के मुताबिक, लीवर सिरोसिस सिर्फ एक अंग की बीमारी नहीं है, बल्कि यह पूरे शरीर को प्रभावित करता है. डाइजेशन, इम्युनिटी और ब्लड सर्कुलेशन सभी पर इसका असर पड़ता है. सबसे अहम बात यह है कि अगर समय रहते इसकी पहचान हो जाए, तो स्थिति को काफी हद तक संभाला जा सकता है. इसके लिए लीवर फंक्शन टेस्ट, अल्ट्रासाउंड और फाइब्रोसिस जांच जैसे टेस्ट किए जाते हैं. शुरुआती स्टेज में लाइफस्टाइल में बदलाव करके डैमेज को धीमा या आंशिक रूप से ठीक भी किया जा सकता है.
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भारत में बढ़ रहे हैं मामले
भारत में नॉन-अल्कोहोलिक फैटी लीवर डिजीज के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक, शहरी इलाकों में हर तीन में से एक व्यक्ति इस समस्या से जूझ सकता है. यही वजह है कि इसे हल्के में लेना खतरनाक हो सकता है. बचाव के लिए बहुत मुश्किल उपायों की जरूरत नहीं है, बल्कि छोटी-छोटी आदतों को सुधारना ही काफी है. हेल्दी घर का खाना खाना, रोजाना थोड़ी एक्सरसाइज करना, वजन और डायबिटीज को कंट्रोल में रखना, बिना डॉक्टर की सलाह के दवाइयां न लेना और समय-समय पर जांच कराना, ये सभी कदम लीवर को लंबे समय तक स्वस्थ रखने में मदद करते हैं. &amp;nbsp;डॉक्टरों का कहना है कि अगर बीमारी एडवांस स्टेज में पहुंच जाए, तो इलाज काफी मुश्किल और महंगा हो जाता है. कई मामलों में लीवर ट्रांसप्लांट ही आखिरी विकल्प बचता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 11 Apr 2026 01:30:16 +0530</pubDate>
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        <media:keywords>Fatty, Liver, Disease:, क्या, बिना, शराब, पिए, डैमेज, हो, सकता, है, लिवर, जानें, आपकी, रोजाना, की, कौन-सी, गलतियां, पड़, रहीं, भारी</media:keywords>
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        <title>Obesity Hypoventilation Syndrome: क्या मोटापा ले सकता है जान? 160 किलो की महिला का सांस लेना हुआ मुश्किल, डॉक्टरों ने ऐसे बचाया</title>
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        <description><![CDATA[ Obesity Related Breathing Disorder: कभी- कभी कुछ मामले ऐसे आते हैं अस्पतालों में, &amp;nbsp;जिनमें अगर मरीज जिंदा बच जाए, तो वह किसी चमत्कार से कम नहीं माना जाता है. ऐसा ही कुछ गुरुग्राम के सीके बिड़ला अस्पताल में हुआ, जहां डॉक्टरों की टीम ने एक बेहद मुश्किल और जोखिम भरे केस में 75 वर्षीय महिला की जान बचाकर उसे सुरक्षित डिस्चार्ज कर दिया. चलिए आपको बताते हैं कि आखिर मामला क्या है.&amp;nbsp;
किस बीमारी से जूझ रही थी महिला?
&amp;nbsp;160 किलो वजन की उस महिला कोओबेसिटी हाइपोवेंटिलेशन सिंड्रोम नाम की गंभीर बीमारी थी, जिसमें शरीर पर्याप्त रूप से सांस नहीं ले पाता और खून में ऑक्सीजन का स्तर गिरने लगता है, जबकि कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ जाती है. महिला को कई अन्य बीमारियां भी थीं, जैसे डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, एंग्जायटी और लंबे समय तक बिस्तर पर रहने की वजह से बेडसोर की समस्या थी. &amp;nbsp;वह अस्पताल के इमरजेंसी विभाग में गंभीर हालत में लाई गई थीं, जहां उन्हें दोनों फेफड़ों में निमोनिया और हार्ट की गंभीर समस्या का सामना करना पड़ रहा था. हालत इतनी नाजुक थी कि तुरंत वेंटिलेटर सपोर्ट देना पड़ा.&amp;nbsp;
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धीरे- धीरे हुआ सुधार
ICU में पहले 24 घंटों के इलाज के दौरान उनकी स्थिति में कुछ सुधार दिखा. बुखार और इंफेक्शन कम होने लगे, छाती के एक्स-रे में भी सुधार नजर आया और दिल से जुड़े संकेतक भी बेहतर होने लगे. &amp;nbsp;इन पॉजिटिव संकेतों के आधार पर डॉक्टरों ने करीब 36 घंटे बाद वेंटिलेटर हटाने का फैसला लिया. लेकिन जैसे ही वेंटिलेटर हटाया गया, मरीज की हालत अचानक बिगड़ गई. उनके शरीर में ऑक्सीजन का स्तर तेजी से गिरा और उन्हें फिर से तुरंत वेंटिलेटर पर रखना पड़ा.
डॉक्टरों ने क्या कहा?
इस पूरे मामले में अस्पताल में पल्मोनोलॉजी और क्रिटिकल केयर के एसोसिएट डायरेक्टर डॉ. कुलदीप कुमार ग्रोवर ने बताया कि यह समस्या मोटापे से जुड़ी सांस लेने की गंभीर बाधा की वजह से हुई. उन्होंने कहा कि ऐसे मरीजों में लंग्स की क्षमता कम हो जाती है और शरीर खुद से पर्याप्त सांस नहीं ले पाता. डॉ. ग्रोवर ने आगे बताया कि इस केस में मरीज के इंफेक्शन और दिल से जुड़े पैरामीटर तो सुधर रहे थे, लेकिन मोटापे के कारण उनकी सांस लेने की क्षमता बहुत कमजोर थी. यही वजह रही कि पहली बार वेंटिलेटर हटाने की कोशिश असफल रही.
ऐसे बची जान
इसके बाद डॉक्टरों की टीम ने अपनी रणनीति बदली. मरीज को लंबे समय तक धीरे-धीरे खुद सांस लेने की ट्रेनिंग दी गई, प्रेशर सपोर्ट को धीरे-धीरे कम किया गया और ब्रोंकोस्कोपी की मदद से एयरवे को पूरी तरह तैयार किया गया. इस सावधानी और प्लानिंग के बाद दूसरी बार वेंटिलेटर हटाने की प्रक्रिया सफल रही. भारत में मोटापे के बढ़ते मामलों के साथ OHS जैसी बीमारियां भी तेजी से सामने आ रही हैं. कई स्टडीज के मुताबिक, स्लीप से जुड़ी सांस की समस्याओं वाले मरीजों में इसका प्रतिशत 5 से 16 फीसदी तक पाया गया है, लेकिन अक्सर यह बीमारी तब तक पहचान में नहीं आती जब तक स्थिति गंभीर न हो जाए. डॉक्टरों का कहना है कि समय रहते जांच, वजन नियंत्रित रखना और नियमित मेडिकल चेकअप ही ऐसी गंभीर स्थितियों से बचने का सबसे अच्छा तरीका है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 11 Apr 2026 01:30:15 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Heart Ultrasound Test: हार्ट फेल्योर को पहले ही डिटेक्ट कर लेगी यह तकनीक, जानें मेडिकल फील्ड में कैसे आ रही क्रांति?</title>
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        <description><![CDATA[ Can AI Detect Heart Failure Early:&amp;nbsp;हार्ट फेल्योर एक गंभीर बीमारी है, जो दुनिया भर में लाखों लोगों को प्रभावित करती है. यह तब होती है, जब दिल शरीर में खून को ठीक से पंप नहीं कर पाता. बीमारी के बढ़े हुए चरण में यह जानलेवा भी बन सकती है, लेकिन सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इसे समय रहते पहचान पाना आसान नहीं होता. डॉक्टरों के सामने यही सबसे बड़ी समस्या है कि कई मरीजों में एडवांस्ड हार्ट फेल्योर का पता देर से चलता है, जिससे उन्हें सही समय पर इलाज नहीं मिल पाता. &amp;nbsp;अब एक नई रिसर्च से उम्मीद जगी है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI इस स्थिति को बदल सकता है.&amp;nbsp;
अभी किस तकनीक का यूज होता है
यह स्टडी वील कॉर्नेल मेडिसिन, कॉर्नेल टेक,कोलंबिया विश्वविद्यालय और न्यूयॉर्क-प्रेस्बिटेरियन के साइंटिस्ट ने किया गया है, जो जर्नल एनपीजे डिजिटल मेडिसिन में प्रकाशित हुआ. फिलहाल एडवांस्ड हार्ट फेल्योर की पहचान के लिए डॉक्टर एक खास टेस्ट कार्डियोपल्मोनरी एक्सरसाइज टेस्टिंग का सहारा लेते हैं. यह टेस्ट दिल और फेफड़ों की काम करने की क्षमता को मापता है, लेकिन इसके लिए विशेष उपकरण और ट्रेंड स्टाफ की जरूरत होती है, जो केवल बड़े अस्पतालों में ही उपलब्ध होता है. इसी वजह से कई मरीज इस जांच से वंचित रह जाते हैं.
रिसर्च में क्या निकला
नई रिसर्च में साइंटिस्ट ने एक ऐसा एआई सिस्टम तैयार किया है, जो दिल की अल्ट्रासाउंड जांच इकोकार्डियोग्राफी और मरीज के सामान्य मेडिकल रिकॉर्ड का एनालिसिस करके बीमारी की गंभीरता का अंदाजा लगा सकता है. खास बात यह है कि यह तकनीक पीक VO2 जैसे महत्वपूर्ण पैरामीटर का अनुमान लगा सकती है, जो आमतौर पर केवल CPET के जरिए ही मापा जाता है.
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1,000 हार्ट फेल्योर मरीजों के डेटा का इस्तेमाल&amp;nbsp;
इस सिस्टम को तैयार करने के लिए करीब 1,000 हार्ट फेल्योर मरीजों के डेटा का इस्तेमाल किया गया, जिसमें अल्ट्रासाउंड वीडियो, ब्लड फ्लो और हार्ट वॉल्व की गतिविधियों से जुड़ी जानकारी शामिल थी. इसके बाद 127 नए मरीजों पर इसका परीक्षण किया गया, जहां इस एआई मॉडल ने करीब 85 प्रतिशत सटीकता के साथ हाई-रिस्क मरीजों की पहचान की. रिसर्चर का कहना है कि यह तकनीक रोजमर्रा की मेडिकल जरूरतों में आसानी से इस्तेमाल की जा सकती है, क्योंकि इसमें वही डेटा उपयोग होता है जो पहले से उपलब्ध होता है. इससे उन मरीजों की पहचान संभव हो सकेगी, जो अभी तक नजरअंदाज हो रहे थे.
हालांकि, साइंटिस्ट ने यह भी माना है कि इस तकनीक को बड़े स्तर पर लागू करने से पहले और बड़े स्तर पर टेस्ट जरूरी है. एआई सिस्टम की विश्वसनीयता और सुरक्षा सुनिश्चित करना भी उतना ही अहम है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 09 Apr 2026 17:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>Eye Discharge Causes: सावधान! नॉर्मल नहीं होता सुबह आंखों में जमने वाला मैल,  पीला या हरा रंग इस बीमारी का संकेत</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/eye-discharge-causes-सावधान-नॉर्मल-नहीं-होता-सुबह-आंखों-में-जमने-वाला-मैल-पीला-या-हरा-रंग-इस-बीमारी-का-संकेत</link>
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        <description><![CDATA[ Why Do I Wake Up With Crusty Eyes: सुबह उठते ही अगर आंखों के कोनों में चिपचिपा या सूखा जमा हुआ पदार्थ नजर आए, तो इसे आमतौर पर आई क्रस्ट या आंखों की मैल कहा जाता है. यह कई बार सामान्य होता है, लेकिन कुछ मामलों में यह किसी समस्या का संकेत भी हो सकता है. चलिए आपको बताते हैं कि कब आपको सावधान होने की जरूरत होती है और कब यह नॉर्मल होता है.&amp;nbsp;
क्यों निकलता है यह?
&amp;nbsp;हेल्थ जानकारी देने वाली वेबसाइट MedlinePlus के अनुसार, आंखों में बनने वाला यह क्रस्ट असल में डिस्चार्ज होता है, जो सूखकर सख्त या चिपचिपा रूप ले लेता है. कुछ लोगों में यह पीले रंग का और कठोर होता है, जबकि कुछ में यह साफ, पतला या पानी जैसा भी हो सकता है. इसकी एक सामान्य वजह नींद भी होती है। जब हम सोते हैं, तो आंखें बंद रहती हैं और पलकें झपकती नहीं हैं. ऐसे में आंखों का प्राकृतिक डिस्चार्ज कोनों में जमा हो जाता है, जो सुबह उठने पर क्रस्ट के रूप में दिखाई देता है.
इसके अलावा, आंसू की नली में ब्लॉकेज भी इसका कारण बन सकता है. इस स्थिति को नासोलैक्रिमल डक्ट ऑब्स्ट्रक्शन कहा जाता है, जिसमें आंसू सही तरीके से निकल नहीं पाते. इससे आंखों में पानी आना, लालिमा और पीले-हरे रंग का चिपचिपा डिस्चार्ज देखने को मिल सकता है.
एलर्जिक कंजंक्टिवाइटिस भी वजह
एलर्जिक कंजंक्टिवाइटिस भी एक बड़ी वजह है. &amp;nbsp;धूल, पालतू जानवरों के बाल या फफूंद जैसे एलर्जन के संपर्क में आने से आंखों में खुजली, पानी आना और सूजन हो सकती है. कई मामलों में इसके साथ हल्का क्रस्ट भी बनता है. ड्राई आई की समस्या में भी आंखों के आसपास म्यूकस जैसा जमा दिखाई दे सकता है. इसमें आंखों में जलन, चुभन, लालिमा और धुंधला दिखाई देना जैसे लक्षण शामिल होते हैं.
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वहीं, बैक्टीरियल कंजंक्टिवाइटिस में आंखों से ज्यादा मात्रा में डिस्चार्ज निकलता है, जो गाढ़ा और पीले या हरे रंग का हो सकता है. इसके साथ दर्द, खुजली और रोशनी से परेशानी भी हो सकती है. एक और स्थिति ब्लेफराइटिस है, जिसमें पलकों के किनारों पर सूजन और जलन होती है। इससे पलकें चिपचिपी हो जाती हैं और उन पर पपड़ी जमने लगती है.&amp;nbsp;
कब डॉक्टर से मिलना चाहिए?
कुछ कम मामलों में केराटाइटिस या आंख की कॉर्निया से जुड़ी समस्या और स्टाई (फुंसी) भी इसकी वजह हो सकती है. इन स्थितियों में दर्द, सूजन और पस जैसा डिस्चार्ज देखने को मिल सकता है. डॉक्टर से कब मिलें, यह समझना जरूरी है. अगर आंखों में दर्द, ज्यादा सूजन, धुंधली नजर, रोशनी से परेशानी या गाढ़ा पीला-हरा डिस्चार्ज हो, तो आंखों के एक्सपर्ट से जांच करानी चाहिए. इलाज के तौर पर हल्के मामलों में घर पर ही देखभाल की जा सकती है, जैसे गुनगुने पानी से आंखों की सफाई करना या साफ कपड़े से पपड़ी हटाना, लेकिन अगर समस्या एलर्जी या इंफेक्शन से जुड़ी हो, तो डॉक्टर दवा या आई ड्रॉप्स भी दे सकते हैं.&amp;nbsp;
साफ- सफाई के दौरान क्या ध्यान रखना जरूरी?
साफ-सफाई का ध्यान रखना सबसे जरूरी है. नियमित रूप से हाथ धोना, आंखों को साफ रखना और जरूरत पड़ने पर लुब्रिकेटिंग आई ड्रॉप्स का इस्तेमाल करना इस समस्या को कम करने में मदद कर सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 09 Apr 2026 17:30:11 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Eye, Discharge, Causes:, सावधान, नॉर्मल, नहीं, होता, सुबह, आंखों, में, जमने, वाला, मैल, पीला, या, हरा, रंग, इस, बीमारी, का, संकेत</media:keywords>
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        <title>Good vs Bad Cholestrol: गुड और बैड कोलेस्ट्रॉल का खेल, क्या आप जानते हैं असली जोखिम कहां है?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/good-vs-bad-cholestrol-गुड-और-बैड-कोलेस्ट्रॉल-का-खेल-क्या-आप-जानते-हैं-असली-जोखिम-कहां-है</link>
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        <description><![CDATA[ Good vs Bad Cholestrol: खाने के शौकीन लोगों में अक्सर कोलेस्ट्रॉल की शिकायत देखी जाती है, जो उनकी अनहेल्दी फूड और अनियमित डाइट का नतीजा होती है. इन सब के बीच लोगों ने एक आसान सा निष्कर्ष निकाल लिया है, जिसमे कोलेस्ट्रॉल को दो हिस्सों में बांट दिया गया है- गुड और बैड. इसमें LDL को बैड और HDL को गुड कोलेस्ट्रॉल कहा जाता है. अपनी रिपोर्ट में HDL का नंबर देखकर लोग खुश हो जाते हैं, लेकिन क्या यह धारणा सच है या इसके पीछे की सच्चाई कुछ और है? आइए जानते हैं.
कोलेस्ट्रॉल क्या है?
कोलेस्ट्रॉल एक वैक्स जैसा फैट होता है, जो हमारे शरीर में सेल, विटामिन D और हार्मोन बनाने में मदद करता है. हमारा लिवर शरीर की जरूरत के अनुसार कोलेस्ट्रॉल बनाता है, लेकिन हम खाने-पीने की चीजों के द्वारा भी इसे काफी मात्रा में लेते हैं. वैसे तो यह जरूरी होता है, लेकिन जब इसका स्तर बढ़ जाता है तो यह धमनियों (आर्टरी) की दीवारों में प्लाक जमा कर देता है, जिससे दिल की बीमारी और स्ट्रोक का खतरा बढ़ सकता है.
क्या LDL वाकई बैड कोलेस्ट्रॉल है?
LDL को अक्सर दिल की बीमारियों के लिए जिम्मेदार माना जाता है, लेकिन हर LDL एक जैसा नहीं होता, कुछ LDL कण बड़े और हल्के होते हैं, जबकि कुछ छोटे और घने होते हैं. छोटे और घने कण ही धमनियों में जाकर प्लाक बनने में ज्यादा भूमिका निभाते हैं. एशियन हॉस्पिटल के डॉ. दिवाकर कुमार के अनुसार, &amp;ldquo;हर LDL नुकसानदायक नहीं होता, सिर्फ LDL का एक नंबर पूरी तस्वीर नहीं बताता. दो लोगों में LDL का स्तर समान होकर भी उसका असर अलग-अलग हो सकता है.&amp;rdquo;
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क्या HDL सच में गुड कोलेस्ट्रॉल है?
HDL को आमतौर पर गुड कोलेस्ट्रॉल कहा जाता है क्योंकि यह खून से अतिरिक्त कोलेस्ट्रॉल को हटाने में मदद करता है, लेकिन इसका ज्यादा होना हमेशा सुरक्षित होने की गारंटी नहीं देता. डॉ. कुमार के अनुसार, &amp;ldquo;अगर HDL का स्तर बहुत ज्यादा है तो यह भी चिंता का कारण हो सकता है, खासकर जब लाइफस्टाइल सही न हो. डॉ. नेहा शाह के अनुसार, &amp;ldquo;यह सही है कि HDL शरीर की रक्षा करता है और LDL जोखिम बढ़ाता है, लेकिन सिर्फ इन नंबरों से पूरी सच्चाई नहीं पता चलती. जैसे- 44 HDL वाले दो लोगों में फर्क हो सकता है अगर उनके ट्राइग्लिसराइड्स अलग हों, एक में 90 और दूसरे में 210, नंबर वही है, लेकिन शरीर की स्थिति पे इसका प्रभाव अलग होता है. LDL में भी यही बात लागू होती है. रिपोर्ट में सिर्फ नंबर दिखता है, लेकिन असली फर्क इसके छोटे और घने कणों से पड़ता है, जो नसों को नुकसान पहुंचाते हैं.
कैसे बचें कोलेस्ट्रॉल के खतरे से?
कोलेस्ट्रॉल आपकी रोजमर्रा की आदतों से प्रभावित होता है. कम नींद, ज्यादा तनाव, स्मोकिंग और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड आपको कोलेस्ट्रॉल के खतरे के करीब ला सकते हैं. इससे बचने के लिए नियमित एक्सरसाइज करना फायदेमंद होता है. इसके अलावा रोजाना संतुलित भोजन और हेल्दी डाइट लेना जरूरी है और तनाव कम करने के लिए योग या मेडिटेशन करना भी मददगार हो सकता है.
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&amp;nbsp; ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 09 Apr 2026 17:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Dehydration Risks: प्यास लगने पर ही पीते हैं पानी? यह आदत आपकी किडनी को कर रही बीमार, जानें यूरोलॉजिस्ट की राय</title>
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        <description><![CDATA[ What Happens If You Don&amp;rsquo;t Drink Enough Water: हममें से ज्यादातर लोग पानी पीने को बहुत साधारण बात मानते हैं. प्यास लगी तो गिलास उठा लिया, नहीं लगी तो छोड़ दिया. लेकिन किडनी इतनी लापरवाही बर्दाश्त नहीं करती. यही छोटे-से अंग खून को साफ करते हैं, शरीर से टॉक्सिन बाहर निकालते हैं, इलेक्ट्रोलाइट संतुलित रखते हैं और तरल पदार्थों का स्तर कंट्रोल करते हैं. जब शरीर को पर्याप्त पानी नहीं मिलता, तो किडनी को ज़्यादा मेहनत करनी पड़ती है. यह सिर्फ थकान की बात नहीं, बल्कि लंबे समय में पथरी, यूरिन इन्फेक्शन और क्रॉनिक किडनी डिजीज का खतरा बढ़ सकता है. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर एक्सपर्ट क्या कहते हैं और हमें किस तरह की सावधानी रखने की जरूरत होती है.&amp;nbsp;
पानी को लेकर लोगों में क्या है गलतफहमी?
कई लोग मानते हैं कि दिनभर चाय, कॉफी या जूस पी लेना काफी है. जबकि कैफीन और शुगर वाले पेय शरीर से पानी तेजी से बाहर निकाल सकते हैं. एक और गलतफहमी है कि प्यास लगे तभी पानी पिएं. सच यह है कि जब प्यास लगती है, तब तक शरीर हल्का-सा डिहाइड्रेट हो चुका होता है और किडनी पर दबाव बढ़ चुका होता है. दूसरी तरफ कुछ लोग जरूरत से ज्यादा पानी पी लेते हैं, यह सोचकर कि ज्यादा पानी हमेशा फायदेमंद है. लेकिन बहुत कम समय में तीन से चार लीटर या उससे अधिक पानी पी लेना खतरनाक हो सकता है. इससे खून में सोडियम का स्तर गिर सकता है, जिसे हाइपोनेट्रेमिया कहा जाता है. गंभीर मामलों में यह दिमाग में सूजन, दौरे या कोमा तक की स्थिति पैदा कर सकता है.
क्या कहते हैं डॉक्टर?
यूरोलॉजिस्ट डॉ. अजय अग्रवाल ने TOI को बताया कि, किडनी को संतुलित मात्रा में पानी की जरूरत होती है. बहुत कम या बहुत ज्यादा, दोनों ही नुकसानदेह हैं. लगातार कम पानी पीने से पेशाब गाढ़ा हो जाता है, जिससे पथरी और इंफेक्शन का खतरा बढ़ता है. वहीं डायबिटीज या हार्ट रोग से जूझ रहे लोगों में जरूरत से ज्यादा तरल लेने से शरीर पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है.
कितना पानी किसको पीना चाहिए?
एक्सपर्ट &amp;nbsp;का कहना है कि 8 गिलास पानी वाला नियम हर किसी पर लागू नहीं होता. आम तौर पर महिलाओं को करीब 2.2 लीटर और पुरुषों को 3 लीटर तरल की जरूरत होती है, लेकिन यह मौसम, पसीना, व्यायाम और स्वास्थ्य स्थिति पर निर्भर करता है। पेशाब का रंग अच्छा संकेत देता है, हल्का पीला रंग सही हाइड्रेशन दिखाता है, बहुत गहरा रंग पानी की कमी और बिल्कुल साफ रंग अधिक सेवन का संकेत हो सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 09 Apr 2026 17:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>Silent Heart Attack Risk: 80% मरीज &amp;apos;लो&amp;रिस्क&amp;apos; थे, फिर भी आया हार्ट अटैक! जानें क्यों फेल हो रहे विदेशी मेडिकल फॉर्मूले?</title>
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        <description><![CDATA[ Why Heart Attacks Are Rising In Indians: दिल का दौरा हमेशा उन लोगों को ही आए, जिनमें पहले से साफ चेतावनी संकेत हों कि यह धारणा अब बदलती नजर आ रही है. हाल ही में एक भारतीय अध्ययन ने दिखाया है कि कई ऐसे मरीज भी हार्ट अटैक का शिकार हो रहे हैं, जिन्हें पहले लो-रिस्क माना गया था. दिल्ली के जीबी पंत &amp;nbsp;में डॉ. मोहित दयाल गुप्ता के नेतृत्व में किए गए इस अध्ययन में 5,000 से अधिक मरीजों के डेटा का एनालिसिस किया गया. इसमें पाया गया कि जिन लोगों को पहली बार हार्ट अटैक आया, उनमें से करीब 80 प्रतिशत को पहले से हाई-रिस्क कैटेगरी में नहीं रखा गया था.&amp;nbsp;
भारतीय में जोखिम की पहचान नहीं हुई
आमतौर पर डॉक्टर जिन ग्लोबल रिस्क कैलकुलेटर्स का इस्तेमाल करते हैं, वे यह तय करने में मदद करते हैं कि किसे इलाज या दवा की जरूरत है. लेकिन इस स्टडी में सामने आया कि ये मॉडल भारतीय मरीजों के जोखिम को सही तरीके से नहीं पहचान पा रहे हैं. अलग-अलग मॉडल्स के अनुसार सिर्फ 11 प्रतिशत से 20 प्रतिशत मरीजों को ही हाई-रिस्क बताया गया, जबकि सभी को बाद में हार्ट अटैक हुआ.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
डॉ. गुप्ता के मुताबिक, भारतीय मरीजों का पैटर्न पश्चिमी देशों से अलग है. वहां दिल की बीमारी आमतौर पर ज्यादा उम्र में होती है, जबकि भारत में यह कम उम्र में ही देखने को मिल रही है. स्टडी में मरीजों की औसत उम्र सिर्फ 54 साल पाई गई, जो इस बात का संकेत है कि हार्ट डिजीज अब पहले से ज्यादा जल्दी असर डाल रही है. रिसर्च में यह भी सामने आया कि भारतीयों में एक खास साउथ एशियन फेनोटाइप देखा जाता है. इसमें सामान्य वजन होने के बावजूद डायबिटीज और इंसुलिन रेसिस्टेंस का खतरा रहता है. इसके अलावा कोलेस्ट्रॉल का पैटर्न भी अलग होता है HDL कम और ट्राइग्लिसराइड्स ज्यादा, जबकि LDL हमेशा ज्यादा नहीं होता.
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इन चीजों से भी बढ़ता है खतरा
कई लोगों में पेट के आसपास छिपी हुई चर्बी होती है, जो BMI से पकड़ में नहीं आती. इसके साथ ही स्मोकिंग, मानसिक तनाव और अन्य पारंपरिक जोखिम कारक भी मिलकर खतरे को बढ़ाते हैं. समस्या यह है कि ज्यादातर ग्लोबल मॉडल उम्र और LDL को ज्यादा महत्व देते हैं, जिससे युवा भारतीयों का जोखिम कम आंका जाता है. कई मरीज &amp;ldquo;इंटरमीडिएट रिस्क&amp;rdquo; कैटेगरी में चले जाते हैं, जहां इलाज अक्सर टल जाता है.
इसके अलावा, ये मॉडल कुछ अहम फैक्टर्स को शामिल ही नहीं करते, जैसे इंसुलिन रेसिस्टेंस, लिपोप्रोटीन(a), ApoB, सेंट्रल ओबेसिटी और क्रॉनिक किडनी डिजीज. यही वजह है कि असली खतरा छिपा रह जाता है और इलाज तब शुरू होता है, जब स्थिति गंभीर हो चुकी होती है. &amp;nbsp;इस स्टडी के बाद एक्सपर्ट्स &amp;nbsp;ने भारत के लिए अलग रिस्क कैलकुलेटर विकसित करने की जरूरत पर जोर दिया है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 09 Apr 2026 17:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>AIIMS Dry Eye Treatment: गाय के दूध से दूर होगी ड्राई आइज की दिक्कत, दिल्ली एम्स के ट्रायल में हुआ साबित</title>
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        <description><![CDATA[ How Lactoferrin Tablets Help Treat Dry Eyes: आजकल कम उम्र मे ही लोग आंखों की दिक्कत का सामना कर रहे हैं. मोबाइल, लैपटॉप, टीवी आदि के यूज के चलते इसकी समस्या बढ़ती जा रही है. &amp;nbsp;दिल्ली के ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में किए गए एक ट्रायल के उत्साहजनक नतीजों के बाद वैज्ञानिक अब ड्राई आई &amp;nbsp;की समस्या के इलाज के लिए एक नई दवा को बाजार में लाने की तैयारी में है. यह दवा दूध से मिलने वाले प्रोटीन लैक्टोफेरिन पर आधारित है, जिसे खासतौर पर आंखों की नमी बनाए रखने और सूजन कम करने के लिए विकसित किया गया है.
कैसे किया गया है इसे तैयार?
दरअसल, यह टैबलेट गाय के कोलोस्ट्रम जिसे पहला दूध कहा जाता है, उससे प्राप्त लैक्टोफेरिन प्रोटीन से तैयार की गई है. कोलोस्ट्रम को पोषक तत्वों और बायोएक्टिव कंपाउंड्स का खजाना माना जाता है, जो शरीर की मरम्मत और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मदद करता है. इस रिसर्च से जुड़ी वैज्ञानिक डॉ सुजाता शर्मा के मुताबिक, इस दवा को विकसित करने के लिए एक जापानी कंपनी के साथ साझेदारी की गई है. इस ट्रायल पर आधारित रिसर्च पेपर फिलहाल एक साइंटिस्ट जर्नल में प्रकाशन के लिए समीक्षा के दौर में है.
ड्राई आई की दिक्कत
ड्राई आई एक आम लेकिन परेशान करने वाली समस्या है, जो तब होती है जब आंखों में आंसू पर्याप्त मात्रा में नहीं बनते या उनकी गुणवत्ता ठीक नहीं होती. इससे आंखों में जलन, लालपन और भारीपन महसूस होता है. आजकल लंबे समय तक स्क्रीन देखने की आदत इस समस्या को और बढ़ा रही है, क्योंकि इससे पलक झपकने की दर काफी कम हो जाती है. एम्स के आरपी सेंटर में करीब 200 मरीजों पर किए गए इस ट्रायल में, सीनियर आई एक्सपर्ट डॉ नम्रता शर्मा की अगुवाई में मरीजों को तीन महीने तक रोजाना 250 एमजी लैक्टोफेरिन दिया गया..&amp;nbsp;
इससे क्या हुआ सुधार?
&amp;nbsp;इसमें मरीजों की आंखों में आंसू बनने की क्षमता और उनकी गुणवत्ता दोनों में सुधार हुआ. मौजूदा समय में ड्राई आई के इलाज के लिए ज्यादातर लोग आई ड्रॉप्स या कभी-कभी स्टेरॉयड का सहारा लेते हैं, लेकिन ये केवल अस्थायी राहत देते हैं और इनके साइड इफेक्ट्स भी हो सकते हैं. इसके मुकाबले लैक्टोफेरिन आधारित यह नई थेरेपी सुरक्षित, असरदार और किफायती विकल्प के रूप में सामने आई है.&amp;nbsp;
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क्या होता है लैक्टोफेरिन?
लैक्टोफेरिन एक प्राकृतिक प्रोटीन है, जो शरीर में इम्यूनिटी बढ़ाने, सूजन कम करने और सेल्स की मरम्मत में मदद करता है. यही कारण है कि साइंटिस्ट अब इसके अन्य उपयोगों, जैसे एनीमिया के इलाज, पर भी रिसर्च कर रहे हैं. शुरुआत में इस प्रोटीन को मानव दूध से निकालने की कोशिश की गई थी, लेकिन सीमित उपलब्धता और नैतिक कारणों की वजह से यह संभव नहीं हो पाया. इसके बाद गाय के कोलोस्ट्रम को एक प्रभावी और सुलभ विकल्प के रूप में अपनाया गया. फिलहाल, रिसर्चर को उम्मीद है कि जरूरी मंजूरी मिलने के बाद यह दवा जल्द ही बाजार में उपलब्ध हो सकती है, जिससे लाखों लोगों को ड्राई आई की समस्या से राहत मिल सकेगी.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 09 Apr 2026 05:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Moringa Leaves Benefits: मोरिंगा के पत्ते खाने से दूर हो जाती हैं ये बीमारियां, आज से ही शुरू कर दें इस्तेमाल</title>
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        <description><![CDATA[ What Happens If You Eat Moringa Leaves Daily: मोरिंगा के पत्ते, जिन्हें आम भाषा में सहजन या ड्रमस्टिक लीव्स कहा जाता है, अब धीरे-धीरे एक सुपरफूड के रूप में लोगों के बीच लोकप्रिय हो रहे हैं. &amp;nbsp;एक्सपर्ट का मानना है कि रोजमर्रा की डाइट में इन पत्तों को शामिल करने से कई तरह की बीमारियों से बचाव संभव है. यही वजह है कि स्वास्थ्य से जुड़े जानकार अब इसे नियमित खाने की सलाह दे रहे हैं. चलिए आपको बताते हैं कि सेहत के लिए यह कितना फायदेमंद होता है.&amp;nbsp;
सेहत के लिए कितना फायदेमंद?
&amp;nbsp;medanta की रिपोर्ट के अनुसार, &amp;nbsp;मोरिंगा के पत्ते पोषक तत्वों का खजाना माने जाते हैं. इनमें प्रोटीन, विटामिन A, C और E, आयरन, कैल्शियम, पोटैशियम और मैग्नीशियम भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं. &amp;nbsp;साथ ही इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट और एंटी-इन्फ्लेमेटरी गुण शरीर को कई गंभीर बीमारियों से लड़ने में मदद करते हैं. रिपोर्ट के अनुसार, मोरिंगा के पत्ते इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाते हैं, जिससे शरीर इंफेक्शन और मौसमी बीमारियों से बेहतर तरीके से लड़ पाता है. इसके अलावा यह शरीर में ऊर्जा बढ़ाने और थकान कम करने में भी मददगार साबित होता है.&amp;nbsp;
हार्ट की सेहत के लिए फायदेमंद
&amp;nbsp;हार्ट की सेहत के लिए भी मोरिंगा बेहद फायदेमंद माना जाता है. यह ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल को संतुलित रखने में मदद करता है, जिससे हार्ट रोगों का खतरा कम हो सकता है. वहीं, जिन लोगों को ब्लड शुगर की समस्या है, उनके लिए भी यह उपयोगी साबित हो सकता है, क्योंकि यह शुगर लेवल को नियंत्रित रखने में सहायक होता है. डाइजेशन को बेहतर बनाए रखने में भी मोरिंगा अहम भूमिका निभाता है. इसमें मौजूद फाइबर पेट को स्वस्थ रखने, कब्ज से राहत देने और आंतों के संतुलन को बनाए रखने में मदद करता है. इसके साथ ही यह शरीर से टॉक्सिन्स निकालने में भी सहायक माना जाता है.
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कैसे कर सकते हैं सेवन?
मोरिंगा के पत्तों का सेवन कई तरीकों से किया जा सकता है. इन्हें दाल, सब्जी या सूप में डालकर खाया जा सकता है, वहीं इसका जूस या पाउडर भी इस्तेमाल किया जा सकता है. हालांकि, एस्पर्ट सलाह देते हैं कि इसकी शुरुआत कम मात्रा से करनी चाहिए और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए. अगर आप अपनी डाइट में एक आसान और असरदार बदलाव करना चाहते हैं, तो मोरिंगा के पत्ते एक अच्छा विकल्प हो सकते हैं, जो आपको लंबे समय तक स्वस्थ रखने में मदद कर सकते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 09 Apr 2026 05:30:11 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>क्लाइमेट चेंज से डायबिटीज पर असर, जानें मौसम कैसे बदल रहा आपका ब्लड शुगर? पढ़ें सेफ्टी टिप्स</title>
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        <description><![CDATA[ Climate change impacts diabetes : आज का मौसम और बढ़ती गर्मी सिर्फ हमारी लाइफस्टाइल ही नहीं बदल रही, बल्कि हमारी सेहत पर भी गहरा असर डाल रही है. खासकर डायबिटीज के मरीजों के लिए गर्म मौसम एक बड़ी चुनौती बन सकता है. अगर हम अपने शरीर की जरूरतों का ध्यान न रखें, तो ब्लड शुगर को &amp;nbsp;कंट्रोल करना मुश्किल हो सकता है. हाल ही में डॉक्टर ने बताया है कि जलवायु परिवर्तन सीधे हमारे शरीर के काम करने के तरीके को बदल देता है. जब तापमान बढ़ता है, तो शरीर को अपना संतुलन बनाए रखने के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है. इसका सीधा असर इंसुलिन और शुगर कंट्रोल पर पड़ता है. ऐसे में गर्म मौसम डायबिटीज पर कैसे असर डालता है और इसके लिए सुरक्षा टिप्स क्या हैं.
क्लाइमेट चेंज से डायबिटीज पर असर
हमारा शरीर प्राकृतिक रूप से शुगर को कंट्रोल करने के तरीके रखता है. &amp;nbsp;ठंडे मौसम में शरीर एक खास प्रकार की फैट का इस्तेमाल करता है, जो कैलोरी जलाकर शरीर को गर्म रखता है और इंसुलिन सेंसिटिविटी बढ़ाता है, लेकिन जब लंबे समय तक गर्मी रहती है, तो यह प्रक्रिया कम होती है. इसका मतलब है कि शरीर के लिए ब्लड शुगर को संतुलित रखना मुश्किल हो जाता है.साथ ही, ज्यादा गर्मी के कारण लोग बाहर जाने और एक्सरसाइज करने से बचते हैं. कम फिजिकल एक्टिविटी डायबिटीज और वजन बढ़ने का बड़ा कारण बन सकती है.&amp;nbsp;
मौसम कैसे बदल रहा है आपका ब्लड शुगर?
1. पानी की कमी और डिहाइड्रेशन - गर्मी में पसीना ज्यादा आता है, जिससे शरीर में पानी की कमी हो जाती है. इससे ब्लड शुगर का स्तर बढ़ सकता है.&amp;nbsp;
2. शरीर को ठंडा करने में मुश्किल - डायबिटीज नसों और ब्लड वेसल्स को प्रभावित करता है, जो पसीने की ग्रंथियों को कंट्रोल करती हैं. इसके कारण शरीर ठंडा होने में असमर्थ होता है, जिससे हीट एक्सॉर्शन या गर्मी से थकान का खतरा बढ़ जाता है.&amp;nbsp;
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3. दवाओं और इंसुलिन का असर - हाई टेंपरेचर इंसुलिन और अन्य दवाओं को प्रभावित कर सकता है. गर्मी और बिजली कटौती के समय, अगर दवाओं को ठीक से स्टोर न किया जाए, तो उनका असर कम हो सकता है.
इसके लिए सुरक्षा टिप्स क्या हैं?
1. हाइड्रेशन और निगरानी - लगातार पानी पीते रहें. पानी किडनी को शरीर से अतिरिक्त शुगर निकालने में मदद करता है. &amp;nbsp;ब्लड शुगर की जांच ज्यादा बार करें क्योंकि गर्मी में ब्लड शुगर अस्थिर हो सकता है. शराब और कैफीन से बचें, क्योंकि ये शरीर को और ज्यादा डिहाइड्रेट कर सकते हैं.&amp;nbsp;
2. शरीर को ठंडा रखें - अगर शरीर पसीना नहीं निकाल पाता, तो ठंडा रहने के लिए फैंस, गीले तौलिये और ढीले कपड़े पहनें. एक्सरसाइज या चलने-फिरने का समय सुबह जल्दी या शाम को रखें, जब तापमान कम हो.&amp;nbsp;
3. दवाओं और मेडिकल सप्लाइज की सुरक्षा - इंसुलिन और डायबिटीज टेस्ट किट्स गर्मी में खराब हो सकती हैं. इन्हें कार में या धूप में न रखें. यात्रा करते समय इंसुलिन और टेस्ट किट्स को इंसुलेटेड कूलिंग पाउच में रखें. दवाओं और किट्स को ठंडी और सूखी जगह पर स्टोर करें.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 08 Apr 2026 13:30:13 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Vaccination: इन बीमारियों की वैक्सीन एकदम फ्री लगाती है सरकार, एक क्लिक में देख लें पूरी लिस्ट</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/vaccination-इन-बीमारियों-की-वैक्सीन-एकदम-फ्री-लगाती-है-सरकार-एक-क्लिक-में-देख-लें-पूरी-लिस्ट</link>
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        <description><![CDATA[ Vaccination: दुनिया भर में हर दिन तरह- तरह की बीमारियां फैलती है, ऐसे में इससे बचाव के समय पर टीकाकरण बहुत जरूरी हो जाता है. ऐसे में अच्छी बात यह है कि भारत सरकार ने लोगों की सेहत का ध्यान रखते हुए, जानलेवा और गंभीर बीमारियों से बचाव के लिए मुफ्त टीकाकरण की सुविधा दी है. ताकि हर नागरिक खासकर बच्चों और गर्भवती महिलाओं को सुरक्षित रखा जा सके. यह सुविधा मुख्य रूप से राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) और स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के तहत चलाई जाती है. ऐसे में कई लोगों को इसकी जानकारी नहीं होती है, आइए जानते है किन-किन बीमारियों की वैक्सीन मुफ्त में लगती है?
मुफ्त टीकाकरण कार्यक्रम क्या है?
भारत में मुफ्त टीकाकरण मुख्य रूप से सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम (Universal Immunization Programme - UIP) के अंतर्गत होता है. यह कार्यक्रम राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन का हिस्सा है और 100% केंद्र सरकार द्वारा वित्त पोषित है, जिसके तहत सरकारी अस्पतालों, PHC और आंगनवाड़ी केंद्रों में टीके मुफ्त लगते हैं.
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किन बीमारियों की वैक्सीन मिलती है फ्री?
भारत में &amp;nbsp;UIP के तहत सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर 12 से अधिक गंभीर बीमारियों के लिए मुफ्त टीकाकरण &amp;nbsp;उपलब्ध होते है जैसेः&amp;nbsp;

तपेदिक (TB) के लिए बीसीजी वैक्सीन
डिप्थीरिया, काली खांसी (Pertussis), टिटनेस के लिए &amp;nbsp;डीपीटी और टीडी (Td) टीके
पोलियो के लिए ओरल पोलियो वैक्सीन (bOPV)खसरा और रूबेला (Measles-Rubella) के लिए एमआर (MR) टीका
हेपेटाइटिस B के लिए &amp;nbsp;हेपेटाइटिस बी का टीका
मेनिनजाइटिस और निमोनिया के लिए &amp;nbsp;हिब (Hib) और पीसीवी (PCV) टीके
रोटावायरस डायरिया के लिए रोटावायरस वैक्सीन (RVV)
जापानी इंसेफलाइटिस के लिए जेई (JE) टीका
गर्भाशय ग्रीवा कैंसर (Cervical Cancer) 9 से 14 वर्ष की लड़कियों के लिए HPV वैक्सीन&amp;nbsp;

इसके बाद तय समय पर अन्य टीके लगाए जाते हैं ताकि उनकी इम्युनिटी मजबूत बनी रहे.
सरकारी अभियान और पहल&amp;nbsp;
सरकार समय-समय पर विशेष अभियान भी चलाती है, जैसे Mission Indradhanush (IMI), पल्स पोलियो कार्यक्रम, और एचपीवी (HPV) टीकाकरण अभियान जिसका उद्देश्य उन बच्चों, किशोरियों और गर्भवती महिलाओं तक टीकाकरण पहुंचाना है जो नियमित कार्यक्रम से छूट गए हैं. इस अभियान के जरिए देश के दूर-दराज और ग्रामीण क्षेत्रों में भी टीकाकरण की पहुंच सुनिश्चित की जाती है.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ेंः लंग कैंसर के मरीजों के लिए नई उम्मीद, AI टूल पहले ही भांप लेगा इलाज का असर ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 08 Apr 2026 13:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Small Cell Lung Cancer: लंग कैंसर के मरीजों के लिए नई उम्मीद, AI टूल पहले ही भांप लेगा इलाज का असर</title>
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        <description><![CDATA[ How AI predicts chemotherapy response in lung cancer: स्मॉल सेल लंग कैंसर दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ने और खतरनाक कैंसर में से एक माना जाता है. अक्सर जब तक इसका पता चलता है, तब तक यह शरीर के अन्य हिस्सों में फैल चुका होता है, जिसे डॉक्टर एक्सटेंसिव-स्टेज कहते हैं. इस स्थिति में इलाज मुश्किल हो जाता है और मरीज की औसत जीवित रहने की अवधि करीब एक साल तक सीमित रह जाती है. अब तक ऐसे मरीजों के इलाज के लिए प्लैटिनम-बेस्ड कीमोथेरेपी के साथ इम्यूनोथेरेपी का इस्तेमाल किया जाता रहा है. हालांकि, यह हर मरीज पर समान रूप से असरदार नहीं होता. &amp;nbsp;सबसे बड़ी समस्या यह रही है कि डॉक्टर पहले से यह तय नहीं कर पाते कि किस मरीज को इस इलाज से फायदा होगा और किसे नहीं.&amp;nbsp;
नई तकनीक विकसित हुई
इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए रोसवेल पार्क कॉम्प्रिहेंसिव कैंसर सेंटर (बफेलो, न्यूयॉर्क), &amp;nbsp;एमोरी यूनिवर्सिटी का विनशिप कैंसर इंस्टीट्यूट (अटलांटा, जॉर्जिया) &amp;nbsp;और यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल्स क्लीवलैंड मेडिकल सेंटर के शोधकर्ताओं ने एक नई तकनीक विकसित की है. यह स्टडी प्रतिष्ठित जर्नल एनपीजे प्रेसिजन ऑन्कोलॉजी में प्रकाशित हुई है, जिसमें फेनोपाईसेल &amp;nbsp;नाम के एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल का जिक्र किया गया है.&amp;nbsp;
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कैसे करता है काम
यह टूल उन टिश्यू इमेजेस का एनालिसिस करता है, जो पहले से ही मरीज के डायग्नोसिस के दौरान ली जाती हैं. आमतौर पर इन्हें माइक्रोस्कोप से देखा जाता है, लेकिन यह AI सिस्टम इन इमेजेस में ऐसे पैटर्न पहचान सकता है, जो इंसानी आंख से छूट जाते हैं. रिसर्च में 281 मरीजों के डेटा का इस्तेमाल किया गया, जिसमें पहले से मौजूद बायोप्सी सैंपल्स को एनालाइज किया गया. इस दौरान एआई ने ट्यूमर के आसपास मौजूद इम्यून सेल्स की बनावट और उनकी व्यवस्था का स्टडी किया. ये इम्यून सेल्स शरीर की इम्यून सिस्टम का हिस्सा होते हैं और कैंसर से लड़ने में अहम भूमिका निभाते हैं.
कैसे रहा इसका रिजल्ट
नतीजे काफी उत्साहजनक रहे. यह टूल इलाज शुरू होने से पहले ही यह अनुमान लगाने में सक्षम रहा कि कौन सा मरीज कीमोथेरेपी पर बेहतर प्रतिक्रिया देगा. जब इन अनुमानों की तुलना वास्तविक परिणामों से की गई, तो पाया गया कि यह तकनीक पारंपरिक तरीकों से ज्यादा सटीक साबित हुई. एक अहम खोज यह रही कि जिन मरीजों में इलाज का असर अच्छा रहा, उनके ट्यूमर के आसपास इम्यून सेल्स ज्यादा और व्यवस्थित रूप में मौजूद था. &amp;nbsp;वहीं, जिन मरीजों में असर कम था, उनमें ये सेल्स कम और बिखरे हुए पाए गए.&amp;nbsp;
रिसर्च का क्या है महत्व
यह खोज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे यह संकेत मिलता है कि शरीर की इम्यून प्रतिक्रिया इलाज के असर को प्रभावित कर सकती है. अब तक इस बीमारी में ऐसे स्पष्ट बायोलॉजिकल संकेत उपलब्ध नहीं थे, जो इलाज के निर्णय को दिशा दे सकें. फेनोपाईसेल की खास बात यह है कि यह पहले से मौजूद डेटा का उपयोग करता है, जिससे अतिरिक्त जांच या खर्च की जरूरत नहीं पड़ती. इससे मरीजों को अनावश्यक इलाज से बचाया जा सकता है और उन्हें समय रहते बेहतर विकल्पों की ओर ले जाया जा सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 08 Apr 2026 01:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Fruits To Avoid During Periods: पीरियड्स के दौरान महिलाओं का भूलकर भी नहीं खाने चाहिए ये फल, हो सकती है बड़ी दिक्कत</title>
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        <description><![CDATA[ Which Fruits Should Be Avoided During Menstruation: पीरियड्स के दौरान महिलाओं को खानपान का खास ध्यान रखना पड़ता है, क्योंकि इस समय शरीर में कई तरह के हार्मोनल बदलाव होते हैं. यही बदलाव मूड से लेकर पाचन तक सब कुछ प्रभावित करते हैं. ऐसे में जहां कुछ फल शरीर को राहत देने में मदद करते हैं, वहीं कुछ फल ऐसे भी होते हैं जिन्हें इस दौरान खाने से परेशानी बढ़ सकती है. चलिए आपको हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली बेवसाइट healthfab की रिपोर्ट के अनुसार बताते हैं कि इस दौरान किन फलों को नहीं खाना चाहिए.&amp;nbsp;
अनानास
सबसे पहले बात करें अनानास की, तो यह फल आमतौर पर सेहत के लिए अच्छा माना जाता है, लेकिन पीरियड्स के दौरान इसे सीमित मात्रा में ही खाना बेहतर होता है. इसमें मौजूद एंजाइम शरीर में ब्लड फ्लो को बढ़ा सकता है, जिससे जिन महिलाओं को ज्यादा ब्लीडिंग होती है, उनकी समस्या और बढ़ सकती है.&amp;nbsp;
तरबूज
तरबूज भी एक ऐसा फल है जिसे गर्मियों में खूब खाया जाता है, लेकिन पीरियड्स के दौरान यह दिक्कत बढ़ा सकता है. इसमें पानी की मात्रा बहुत ज्यादा होती है, जो शरीर में ब्लोटिंग और पानी रुकने की समस्या को बढ़ा सकती है. पहले से ही इस समय पेट फूलने की समस्या रहती है, ऐसे में तरबूज इसे और बढ़ा सकता है.
खट्टे फल
खट्टे फल जैसे संतरा, नींबू और ग्रेपफ्रूट भी इस दौरान सावधानी से खाने चाहिए. इनमें एसिड की मात्रा ज्यादा होती है, जो डाइजेशन सिस्टम को प्रभावित कर सकती है. कई महिलाओं को पीरियड्स के दौरान पहले से ही एसिडिटी या मतली की समस्या होती है और ऐसे फल इन लक्षणों को और बढ़ा सकते हैं.
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कच्चा केला
इसके अलावा कच्चा केला भी इस समय परेशानी का कारण बन सकता है. इसमें मौजूद रेजिस्टेंट स्टार्च पचने में कठिन होता है, जिससे कब्ज और पेट भारी होने की समस्या हो सकती है. पीरियड्स के दौरान जब शरीर पहले ही संवेदनशील होता है, तब ऐसी चीजें स्थिति को और असहज बना सकती हैं.
ड्राई फ्रूट्स
ड्राई फ्रूट्स भी आमतौर पर हेल्दी माने जाते हैं, लेकिन जिनमें अतिरिक्त चीनी मिली होती है, उनसे दूरी बनाना बेहतर है. ज्यादा शुगर शरीर में सूजन और मूड स्विंग्स को बढ़ा सकती है, जिससे पीरियड्स के दौरान परेशानी और ज्यादा महसूस हो सकती है.
कौन से फल फायदेमंद?
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि सभी फल नुकसानदायक होते हैं. पके केले, सेब, बेरीज और कीवी जैसे फल इस समय शरीर को राहत देने में मदद करते हैं. ये पाचन को बेहतर रखते हैं, सूजन कम करते हैं और शरीर को जरूरी पोषक तत्व भी देते हैं. &amp;nbsp;सबसे जरूरी बात यह है कि हर महिला का शरीर अलग होता है. जो चीज एक व्यक्ति को नुकसान पहुंचा सकती है, वही दूसरे के लिए फायदेमंद भी हो सकती है. इसलिए अपने शरीर के संकेतों को समझना और उसी के अनुसार डाइट चुनना सबसे सही तरीका है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 08 Apr 2026 01:30:11 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Health Tests In 30s: 30 की उम्र पार करते ही शरीर में पनप सकती हैं ये बीमारियां, भूलकर भी न टालें ये टेस्ट</title>
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        <description><![CDATA[ Why Routine Health Tests Are Important In Your 30s: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में 30 की उम्र आते-आते लोग अपने करियर और जिम्मेदारियों में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि सेहत को अक्सर पीछे छोड़ देते हैं. बाहर से सब कुछ सामान्य लगता है, लेकिन यही वह उम्र होती है जब कई गंभीर बीमारियां चुपचाप शरीर में विकसित होने लगती हैं. एक्सपर्ट का मानना है कि अगर समय रहते नियमित जांच शुरू कर दी जाए, तो इन समस्याओं को शुरुआती चरण में ही पकड़ा जा सकता है.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
&amp;nbsp;30 के बाद शरीर में तमाम तरह की दिक्कतें होने लगती हैं. &amp;nbsp;भारत सरकार के एक सर्वे में पाया गया कि इस उम्र से कई बीमारियां जैसे प्रीडायबिटीज, फैटी लिवर और थायरॉयड असंतुलन बिना किसी स्पष्ट लक्षण के धीरे-धीरे बढ़ती हैं. जब तक इनके संकेत दिखते हैं, तब तक इलाज लंबा और जटिल हो सकता है. इसलिए 30 की उम्र को स्वास्थ्य के लिहाज से बेहद अहम माना जाता है, क्योंकि इसी समय से प्रिवेंशन यानी रोकथाम की शुरुआत सबसे ज्यादा असरदार होती है.&amp;nbsp;
ब्लड टेस्ट को नहीं करना चाहिए नजरअंदाज 
डॉ. अश्वनी कंसल ने TOI को बताया कि खासतौर पर ब्लड टेस्ट को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. फास्टिंग ब्लड शुगर और HbA1c जैसे टेस्ट यह बता सकते हैं कि शरीर में शुगर का स्तर किस दिशा में जा रहा है. HbA1c टेस्ट पिछले तीन महीनों का औसत शुगर लेवल दिखाता है, जिससे डायबिटीज के शुरुआती संकेत आसानी से पकड़े जा सकते हैं. इसी तरह लिपिड प्रोफाइल भी बेहद जरूरी है. यह सिर्फ कोलेस्ट्रॉल नहीं, बल्कि दिल की सेहत से जुड़े कई संकेत देता है. कई बार कुल कोलेस्ट्रॉल सामान्य होने के बावजूद ट्राइग्लिसराइड्स या HDL के असंतुलन से दिल का खतरा बढ़ सकता है.
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फैटी लिवर की दिक्कत
फैटी लिवर एक ऐसी समस्या है जो अब तेजी से बढ़ रही है, यहां तक कि उन लोगों में भी जो शराब नहीं पीते। शुरुआती चरण में इसके कोई खास लक्षण नहीं होते, लेकिन समय के साथ यह गंभीर रूप ले सकता है. एक साधारण अल्ट्रासाउंड से इसका पता लगाया जा सकता है, लेकिन लोग अक्सर इसे नजरअंदाज कर देते हैं. वजन को सिर्फ एक नंबर मानना भी सही नहीं है. BMI के साथ-साथ शरीर में फैट और मसल्स का अनुपात जानना भी जरूरी है. कई बार व्यक्ति बाहर से फिट दिखता है, लेकिन शरीर के अंदर छिपी चर्बी भविष्य में बड़ी बीमारियों का कारण बन सकती है.&amp;nbsp;
इन चीजों की जांच जरूरी
दिल और थायरॉयड से जुड़ी जांच भी समय पर करानी चाहिए. कई बार सूजन या थायरॉयड की समस्या शुरुआती स्तर पर बिना लक्षण के रहती है, लेकिन आगे चलकर यह एनर्जी , मूड और मेटाबॉलिज्म को प्रभावित कर सकती है. इसके अलावा विटामिन डी, बी12 और आयरन की कमी भी आम होती जा रही है, जिसे लोग अक्सर थकान या तनाव समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. नियमित जांच से इन कमियों का समय पर पता लगाया जा सकता है और उन्हें ठीक किया जा सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 08 Apr 2026 01:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>Kidney Health Problems: किडनी पर तनाव के शुरुआती लक्षण जिन्हें लोग अक्सर कर देते हैं नजरअंदाज; समय रहते पहचानें</title>
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        <description><![CDATA[ किडनी हमारे शरीर का वह जरूरी अंग है जो खून को साफ करती है, विषैले पदार्थों को बाहर निकालती है और शरीर में पानी व मिनरल्स का सही संतुलन बनाती है. इतना खास होते हुए भी अगर किडनी में कोई गंभीर समस्या की शुरुआत होती है तो अधिकांश लोगों को शुरुआत में पता ही नहीं चलता. किडनी की समस्या कभी एक रात में अचानक नहीं होती, बल्कि यह धीरे-धीरे बढ़ती है और काफी खतरनाक हो जाती है, जिसे बाद में नजरअंदाज करना भी मुश्किल हो जाता है.
आखिर क्यों किडनी की समस्या समय पर पता नहीं चलती?
किडनी की कार्य क्षमता इस प्रकार की होती है कि वह शरीर की स्थिति के अनुसार खुद को ढाल लेती है. अगर किडनी का थोड़ा हिस्सा काम न भी करे, तो बाकी हिस्सा अपना काम जारी रखता है. इसी वजह से, इसमें थोड़ी समस्या होने पर भी किडनी काम करती रहती है और हमें इन समस्याओं का पता तक नहीं चल पाता. डॉ. श्रीकांत अतलूरी के अनुसार, किडनी की बीमारी कभी अचानक नहीं होती, बल्कि यह धीरे-धीरे नुकसान पहुंचाती है और गंभीर रूप ले लेती है. इसी कारण किडनी की बीमारी को काफी खतरनाक माना जाता है.
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शुरुआती संकेत जिन्हें अक्सर लोग अनदेखा कर देते हैं
जब किडनी की समस्या होती है तो हमारा शरीर हमें संकेत जरूर देता है, लेकिन हम उन्हें पहचान नहीं पाते. डॉ. अतलूरी बताते हैं कि आंखों के नीचे सूजन रहना, रात को बार-बार पेशाब आना, पेशाब में झाग आना या पीला पेशाब होना- ये कुछ ऐसे लक्षण हैं जिन्हें हम अनजाने में अपने दैनिक जीवन में अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं.
लक्षण जब स्पष्ट रूप से दिखने लगते हैं
जब छोटे-छोटे लक्षण गंभीर रूप लेने लगते हैं, तो उन्हें नजरअंदाज करना मुश्किल हो जाता है- जैसे पैरों में सूजन, चेहरे पर सूजन, लगातार उल्टी जैसा महसूस होना, थोड़ी-थोड़ी सांस लेने में तकलीफ होना और लगातार ब्लड प्रेशर बढ़ना, यह वह स्थिति है जिसमें किडनी की कार्य क्षमता काफी प्रभावित हो चुकी होती है. &amp;nbsp;ऐसे में इस समस्या को बिल्कुल भी नजरअंदाज न करें और तुरंत डॉक्टर से मिलें.
किडनी की शुरुआती जांच
किडनी की समस्या अब काफी आम हो गई है और यह बहुत से लोगों के लिए चिंता का कारण बन गई है. इसकी जांच कराना भी बहुत आसान है- जैसे ब्लड टेस्ट से क्रिएटिनिन की जांच और यूरिन टेस्ट से प्रोटीन की जांच कर, हम किडनी में हुए नुकसान का समय रहते पता लगा सकते हैं. इस पर डॉ. अतलूरी कहते हैं कि यह काफी जरूरी है कि हम किडनी की जांच कराएं, क्योंकि समय रहते जांच से हम बीमारी का पता लगा सकते हैं और इसे जल्द से जल्द ठीक कर सकते हैं
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        <pubDate>Mon, 06 Apr 2026 17:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>शराब नहीं पीते फिर भी फैटी लिवर के शिकार, जानें कितनी आम हो गई है यह बीमारी?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/शराब-नहीं-पीते-फिर-भी-फैटी-लिवर-के-शिकार-जानें-कितनी-आम-हो-गई-है-यह-बीमारी</link>
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        <description><![CDATA[ आज के समय में फैटी लिवर की समस्या काफी आम हो गई है. पहले इसे केवल उन लोगों में देखा जाता था, जो शराब का अधिक सेवन किया करते थे. हालांकि, आज के समय यह बीमारी उन लोगों में भी देखी जा रही है, जो शराब को हाथ तक नहीं लगाते. आइए इसके बारे में जानते हैं.
क्या होता है फैटी लिवर?
फैटी लिवर एक ऐसी स्थिति है जिसमें लिवर में जरूरत से ज्यादा चर्बी जमा होने लगती है, जब यह चर्बी काफी अधिक मात्रा में बढ़ जाती है, तो इसे फैटी लिवर कहा जाता है. आमतौर पर फैटी लिवर 2 प्रकार का होता है - अल्कोहलिक फैटी लिवर और नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर. जो लोग शराब नहीं पीते, उनको होने वाली इस बीमारी को नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज (NAFLD) कहा जाता है.&amp;nbsp;
डॉक्टरों की मानें तो आज के समय में नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर तेजी से बढ़ रहा है. शहरों में यह समस्या अधिक है. गलत खान-पान, ज्यादा ऑयली खाना, सही से आराम न करना, ज्यादा समय तक एक ही जगह बैठकर काम करना, व्यायाम न करना और खून में ज्यादा फैट होना इसके कुछ प्रमुख कारण हैं. इसके अलावा, अगर आपको डायबिटीज, हाई कोलेस्ट्रॉल या हाई ब्लड प्रेशर जैसी समस्या है, तो इसका जोखिम और भी बढ़ जाता है.
फैटी लिवर की सबसे बड़ी समस्या तो यह है कि शुरुआत में इसके लक्षण इतने दिखाई नहीं देते, कई बार लोगों को काफी लंबे समय तक पता ही नहीं चलता कि उन्हें यह बीमारी है. कई बार इसके लक्षणों में थकान, पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द होना, पेट फूलना, पैरों में सूजन और सांस लेने में तकलीफ जैसी समस्यॉए इसके मुख्य संकेत होते हैं.
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विशेषज्ञों के अनुसार, अगर समय रहते इस समस्या पर ध्यान दिया जाए तो इसे जल्द से जल्द ठीक किया जा सकता है. इसके लिए जरूरी है कि आप अपनी जीवनशैली बदलें, नियमित रूप से एक्सरसाइज (Exercise) करें, संतुलित भोजन लें और जंक फूड से दूरी बनाए रखें. डॉक्टरों की सलाह के अनुसार, रोजाना कम से कम 30 मिनट पैदल चलना बहुत फायदेमंद हो सकता है. इसके अलावा वजन को नियंत्रित रखना और समय- समय पर हेल्थ चेकअप कराना भी जरूरी है, जिससे समस्या बढ़ने से पहले ही आपको बीमारी का पता चल जाए.
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डॉक्टरों &amp;nbsp;का कहना है कि फैटी लिवर को नजरअंदाज करना खतरनाक साबित हो सकता है. अगर यह लंबे समय तक बना रहे, तो यह लिवर सिरोसिस (liver cirrhosis) या लिवर फेलियर (liver failure) जैसी गंभीर बीमारी में भी बदल सकता है,इसलिए अपने शरीर का ध्यान रखें, सही खान-पान, नियमित व्यायाम और स्वस्थ आदतों को अपनाएं और अपने लीवर को स्वस्थ रखें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 06 Apr 2026 17:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>बच्चे के दांत निकल रहे हैं और वह हो गया है चिड़चिड़ा? इन 5 तरीकों से कम करें उसका दर्द</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/बच्चे-के-दांत-निकल-रहे-हैं-और-वह-हो-गया-है-चिड़चिड़ा-इन-5-तरीकों-से-कम-करें-उसका-दर्द</link>
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        <description><![CDATA[  When Do Babies Start Teething: दांत निकलने के दौरान बच्चे अचानक खाने के समय चिड़चिड़े हो जाते हैं. &amp;nbsp;जैसे ही यह बदलाव आता है, माता-पिता घबरा जाते हैं. लेकिन यह समझना जरूरी है कि दांत निकलना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है. लगभग 6 महीने की उम्र से लेकर 3 साल तक के बीच बच्चों के 20 दूध के दांत मसूड़ों से बाहर आते हैं. हर दांत निकलने में करीब डेढ़ हफ्ते का समय लग सकता है. इस दौरान हम प्रक्रिया को रोक नहीं सकते, लेकिन बच्चे की तकलीफ जरूर कम कर सकते हैं.
क्या होता है दांत निकलने का लक्षण?
दांत निकलने के सामान्य लक्षणों में मसूड़ों की सूजन, बार-बार रोना, चिड़चिड़ापन, हर चीज मुंह में डालने की कोशिश, ज्यादा लार आना, चेहरे पर रैश, नींद के पैटर्न में बदलाव और भूख कम होना शामिल हैं. हल्का बुखार हो सकता है, लेकिन तेज बुखार दांत निकलने का संकेत नहीं होता. अगर दिन में तीन-चार बार पतले दस्त हो रहे हैं, तो यह अक्सर मुंह में चीजें डालने से हुए इंफेक्शन का परिणाम हो सकता है.
ऐसे में क्या करें?
अब सवाल आता है कि ऐसे में क्या करें, तो सबसे पहले बच्चे को ठंडी और सुरक्षित चीजें चबाने के लिए दें. ठंडे टीथर, फ्रूट निबलर या घर पर बनाए गए हल्के फ्रूट पॉप्सिकल मसूड़ों को राहत देते हैं. टीथर को 10-15 मिनट फ्रीजर में ठंडा करके दें. ठंडा गीला कपड़ा उंगली पर लपेटकर बच्चे को चबाने दें या साफ गॉज से हल्की मसाज करें. हर चीज को अच्छी तरह साफ और स्टेरिलाइज करना जरूरी है. खाने के समय ठंडी दही-चावल, नरम फल या ऐसे खाद्य पदार्थ दे सकते हैं जिन्हें बच्चा हल्के से चबा सके. इस दौरान भूख कम होना सामान्य है, इसलिए जबरदस्ती खिलाने से बचें. दो हफ्तों से ज्यादा भूख में कमी रहे तो डॉक्टर से सलाह लें. नियमित समय पर उम्र के अनुसार भोजन देते रहें और जरूरत हो तो थोड़ा अतिरिक्त दूध और तरल दें.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स में पब्लिश एक रिसर्च स्टडी जिसमें 19,422 दिनों तक बच्चों के लक्षणों को दर्ज किया गया और 475 बार दांत निकलने की घटनाओं का एनालिसिस किया गया. इसमें पाया गया कि दांत निकलने से जुड़े लक्षण केवल एक सीमित 8 दिनों की अवधि में ज्यादा दिखते हैं, चार दिन पहले, जिस दिन दांत निकलता है और उसके तीन दिन बाद तक. दिलचस्प बात यह रही कि कोई भी एक लक्षण इतना आम नहीं था कि उससे पक्का कहा जा सके कि दांत निकलने वाला है. रिसर्चर ने साफ कहा कि हल्के लक्षण दांत निकलने के दौरान हो सकते हैं, लेकिन अगर बच्चा तेज बुखार या गंभीर परेशानी में है, तो उसे सिर्फ टीथिंग मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 06 Apr 2026 17:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Protein Rich Rice: क्या चावल खाने से डरते हैं? CSIR की नई खोज से बदलेगी आपकी थाली, आयरन&amp;विटामिन की नहीं होगी कमी</title>
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        <description><![CDATA[ Benefits Of Protein And Micronutrient Rich Rice: सफेद पॉलिश्ड चावल, जो लगभग हर भारतीय घर की थाली का हिस्सा है, अब हेल्थ के लिहाज से एक नया रूप लेने जा रहा है. साइंटिस्ट ने ऐसा डिजाइनर राइस तैयार किया है, जो न केवल ज्यादा प्रोटीन और जरूरी सूक्ष्म पोषक तत्वों से भरपूर है, बल्कि इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स भी कम है. यानी यह सामान्य चावल की तुलना में ब्लड शुगर को धीरे बढ़ाएगा, जो डायबिटीज के मरीजों और वजन कंट्रोल रखने वालों के लिए फायदेमंद हो सकता है.
बीमारियों को कम करने की दिशा में कदम
यह खास चावल काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च के तहत काम करने वाले नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर इंटरडिसिप्लिनरी साइंस एंड टेक्नोलॉजी ने विकसित किया है. संस्थान के मुताबिक, इस चावल में आयरन, फोलिक एसिड और विटामिन B12 जैसे जरूरी पोषक तत्व भी मिलाए गए हैं. भारत में एनीमिया और विटामिन की कमी एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या है, ऐसे में यह पहल पोषण सुरक्षा की दिशा में अहम कदम मानी जा रही है.
किन लोगों के लिए उपयोगी है चावल?
कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाला यह चावल खास तौर पर उन लोगों के लिए उपयोगी हो सकता है, जिन्हें बार-बार भूख लगती है या जिनका ब्लड शुगर तेजी से बढ़ता-घटता है. हाई प्रोटीन सामग्री मांसपेशियों की मजबूती, ऊर्जा और लंबे समय तक पेट भरे रहने की भावना में मदद कर सकती है, एक्सपर्ट का मानना है कि अगर रोजमर्रा के मुख्य खाद्य पदार्थ को ही पोषक बना दिया जाए, तो कुपोषण और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों से लड़ाई आसान हो सकती है.
क्या है लक्ष्य?
पीटीआई की रिपोर्ट में बताया गया है कि इस तकनीक को टाटा कंज्यूमर प्रोडक्ट्स लिमिटेड और तमिलनाडु की एसएस सोल फूड्स को लाइसेंस किया जाएगा. CSIR&amp;ndash;NIIST के निदेशक डॉ. सी. आनंदहरामकृष्णन को इस नए खोज के लिए टाटा ट्रांसफॉर्मेशन प्राइज 2024 भी मिला है. उनका कहना है कि लक्ष्य ऐसा मुख्य खाद्य विकसित करना है, जो स्वाद और परंपरा से समझौता किए बिना पोषण स्तर को बेहतर बनाए.
संस्थान ने इस तकनीक को उद्योग जगत को सौंपने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है, ताकि यह उत्पाद आम उपभोक्ताओं तक पहुंच सके. इसके अलावा, पोषण और स्वास्थ्य से जुड़े अन्य नए खोज भी सामने आए हैं. इनमें कम सोडियम वाला नमक शामिल है, जो स्वाद बनाए रखते हुए सोडियम की मात्रा 86 प्रतिशत तक घटाने में सक्षम है. यह हाई ब्लड प्रेशर और हृदय रोग के जोखिम को कम करने में मददगार हो सकता है. फल और सब्जियों को पोषक तत्वों सहित लंबे समय तक सुरक्षित रखने वाली तकनीकें भी विकसित की गई हैं, जिससे उनकी शेल्फ लाइफ बढ़े और पोषण बना रहे.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 06 Apr 2026 17:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>First Time Intimacy Mistakes: पहली बार बनाने जा रहे फिजिकल रिलेशन तो न करें ये गलतियां, वरना तबाह हो जाएगी जिंदगी</title>
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        <description><![CDATA[ Common Mistakes During First Intimacy: पहली बार फिजिकल रिलेशन बनाने का अनुभव फिल्मों और सोशल मीडिया की तरह हमेशा परफेक्ट या बेहद रोमांटिक नहीं होता. असल जिंदगी में यह पल कई तरह की भावनाओं के साथ आता है जिसमें उत्साह, घबराहट, दबाव और अनिश्चितता शामिल होती है. इसलिए जरूरी है कि इस फैसले से पहले दोनों लोग मानसिक रूप से तैयार हों और सही जानकारी रखें. Psychologytoday&amp;nbsp; की रिपोर्ट के अनुसार, समझदारी और खुली बातचीत इस अनुभव को बेहतर बना सकती है. चलिए आपको वे आम गलतियां बताते हैं, जो अक्सर लोग पहली बार फिजिकल रिलेशन बनाते समय कर बैठते हैं.
बातचीत न करना&amp;nbsp;
सबसे बड़ी गलती है पहले से बातचीत न करना. अगर आप किसी के साथ रिश्ते में हैं और आगे बढ़ने के बारे में सोच रहे हैं, तो इस विषय पर खुलकर बात करना जरूरी है. एक-दूसरे की उम्मीदें, डर, सीमाएं और पसंद-नापसंद जानना बेहद अहम है. जब दोनों को पता होता है कि सामने वाला क्या सोचता है, तो भरोसा मजबूत होता है और गलतफहमियां कम होती हैं.&amp;nbsp;
सुरक्षा के उपाय
दूसरी बड़ी गलती है सुरक्षा को नजरअंदाज करना. कई लोग उस पल के उत्साह में सुरक्षा उपायों की अहमियत को कम आंकते हैं. लेकिन अनचाही गर्भावस्था और यौन संचारित इंफेक्शन से बचाव के लिए सुरक्षा बेहद जरूरी है. पहली बार लापरवाही आगे भी आदत बन सकती है, जिसका नतीजा गंभीर हो सकता है. इसलिए यह जरूरी है कि फिजिकल रिलेशन बनाने से पहले आप चीजों को ध्यान से समझ लें.
इन चीजों की भी न करें गलती
अहम बात है सहमति को सही तरह से समझना. सहमति का मतलब सिर्फ हां कहना नहीं, बल्कि दोनों का सहज और सुरक्षित महसूस करना है. अगर किसी एक को भी डर, दबाव या असहजता महसूस हो रही है, तो यह सही स्थिति नहीं है. बिना स्पष्ट और स्वेच्छा से दी गई सहमति के कोई भी कदम आगे नहीं बढ़ाना चाहिए. अगर इसको सरल शब्दों में कहें, तो बिना अपने पार्टनर के मेंटल सहमित के उसके साथ जबरदस्ती न करें और न ही ऐसा दिखाएं कि आप उससे इस फैसले के लिए नाराज हैं. &amp;nbsp;फिजिकल रिलेशन बेहद निजी और भावनात्मक अनुभव होता है, जिसे कोई भी तभी अपनाए जब वह पूरी तरह तैयार हो. किसी को मनाने, मजबूर करने या भावनात्मक दबाव डालने से स्थिति बिगड़ सकती है और रिश्ते में दरार आ सकती है
इस बात का रखें ध्यान
इसके बाद जो सबसे बड़ी गलती है वह है फिजिकल रिलेशन बनाने के बाद &amp;nbsp;शेखी बघारना या दूसरों को बताना. यह अनुभव आप दोनों के बीच का निजी पल है. बिना साथी की अनुमति इसके बारे में चर्चा करना भरोसे को तोड़ सकता है. इसलिए जरूरी है कि आपसी सहमति से ही तय करें कि इस बारे में किसे बताना है और किसे नहीं. क्योंकि कभी-कभी आपकी एक बात आपके रिश्ते पर भारी पड़ सकती है.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Mon, 06 Apr 2026 17:30:05 +0530</pubDate>
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        <title>Menopause Bloating Causes: पानी नहीं, ये है मेनोपॉज में ब्लोटिंग की असली वजह; गाइनेकोलॉजिस्ट से जानें आसान उपाय</title>
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        <description><![CDATA[ Menopause bloating causes : मेनोपॉज के दौरान कई महिलाओं को शरीर में सूजन, फूला हुआ महसूस होना और भारीपन जैसी समस्याएं होने लगती हैं. अक्सर महिलाएं सोचती हैं कि यह बहुत पानी पीने की वजह से हो रहा है, लेकिन विशेषज्ञों की मानें तो यह गलत है. असल में मेनोपॉज के समय शरीर में पानी रोकने की समस्या हार्मोनल और मिनरल बदलावों की वजह से होती है, पानी ज्यादा पीने की वजह से नहीं, डाइटिशियन के अनुसार, मेनोपॉज में पानी रोकना बहुत पानी पीने की समस्या नहीं है, बल्कि यह शरीर के संतुलन का मामला है. तो आइए जानते हैं कि मेनोपॉज में ब्लोटिंग की असली वजह क्या है और इसे कम करने के आसान उपाय क्या है.&amp;nbsp;
मेनोपॉज में ब्लोटिंग की असली वजह क्या है?
मेनोपॉज में ब्लोटिंग मुख्य रूप से हार्मोन और मिनरल संतुलन में बदलाव की वजह से होती है. जैसे-जैसे ईस्ट्रोजन घटता है, यह किडनी और रीनिन-एंजियोटेंसिन सिस्टम को प्रभावित करता है, जिससे शरीर अस्थायी रूप से पानी रोक सकता है. वहीं, प्रोजेस्टेरोन, जिसका हल्का डाइयूरेटिक प्रभाव होता है, कम होने पर सूजन और भारीपन बढ़ा सकता है. इसके अलावा, सोडियम की अधिकता शरीर को पानी रोकने के लिए मजबूर करती है, जबकि पोटैशियम और मैग्नीशियम का सही संतुलन कोशिकाओं में पानी बनाए रखने, किडनी को मदद देने और मांसपेशियों को आराम देने में सहायक होता है. मेनोपॉज के दौरान डाइट, तनाव और मेटाबॉलिक बदलाव इन मिनरल्स के संतुलन को बिगाड़ सकते हैं, जिससे ब्लोटिंग और फूलेपन की समस्या और बढ़ जाती है.&amp;nbsp;
इसे भी पढ़ें- Old Antibiotics : दोबारा काम करने लायक कैसे बनती हैं पुरानी एंटीबायोटिक्स, क्या है इसका तरीका?
ब्लोटिंग कम करने के आसान &amp;nbsp;उपाय&amp;nbsp;
1. हाइड्रेशन - पर्याप्त पानी पीना शरीर को बताता है कि इसे पानी रोकने की जरूरत नहीं है. दिनभर नियमित रूप से पानी पीना, कम पानी पीने से बेहतर है.&amp;nbsp;
2. पोटैशियम से भरपूर डाइट - केले, नारियल पानी, पालक, और दालें खाने से सोडियम के कारण पानी रोकने की समस्या कम होती है.&amp;nbsp;
3. मैग्नीशियम से भरपूर डाइट - नट्स, बीज, साबुत अनाज और हरी पत्तेदार सब्जियां मांसपेशियों को आराम देती हैं, सूजन घटाती हैं और इलेक्ट्रोलाइट संतुलन बनाए रखती हैं.&amp;nbsp;
4. सोडियम कम करना, पूरी तरह नहीं - घर में बना हुआ खाना पूरी तरह बिना नमक का करना जरूरी नहीं है. प्रोसेस्ड और पैक्ड फूड्स जो सोडियम से भरपूर होते हैं, उन्हें कम करना ज्यादा असरदार होता है.&amp;nbsp;
5. फिजिकल एक्टिविटी - नियमित वॉकिंग और स्ट्रेंथ ट्रेनिंग से ब्लोटिंग कम होती है और शरीर में सर्कुलेशन बेहतर होता है.&amp;nbsp;
6. स्ट्रेस और नींद - अच्छी नींद और तनाव प्रबंधन भी पानी रोकने की समस्या को कम करने में मदद करता है.
कब लेनी चाहिए डॉक्टर की सलाह?
&amp;nbsp;माइल्ड ब्लोटिंग या हल्की सूजन आम है, लेकिन अगर यह लगातार बनी रहे या बढ़ जाए, तो डॉक्टर से मिलना जरूरी है. जैसे अचानक या दर्द वाली सूजन, सिर्फ एक अंग में सूजन या सांस लेने में दिक्कत, तेज वजन बढ़ना या थकान &amp;nbsp;ऐसी स्थिति में पानी रोकना किसी अन्य समस्या जैसे थायरॉइड, किडनी, दिल की बीमारी या दवा के साइड इफेक्ट का संकेत हो सकता है. अगर सूजन लगातार बनी रहे या अन्य लक्षणों के साथ हो, तो ब्लड टेस्ट और हार्ट या किडनी की जांच जरूर कराएं.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 05 Apr 2026 13:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Menopause, Bloating, Causes:, पानी, नहीं, ये, है, मेनोपॉज, में, ब्लोटिंग, की, असली, वजह, गाइनेकोलॉजिस्ट, से, जानें, आसान, उपाय</media:keywords>
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        <title>Insulin Resistance Liver Damage: आपके लिवर को भी &amp;apos;पत्थर&amp;apos; बना रही डायबिटीज, हर 4 में से एक मरीज को है फाइब्रोसिस का खतरा</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/insulin-resistance-liver-damage-आपके-लिवर-को-भी-पत्थर-बना-रही-डायबिटीज-हर-4-में-से-एक-मरीज-को-है-फाइब्रोसिस-का-खतरा</link>
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        <description><![CDATA[ One In Four Diabetics Have Liver Fibrosis Study: भारत में डायबिटीज को अब सिर्फ ब्लड शुगर तक सीमित बीमारी मानना गलत साबित हो रहा है. 2026 की एक मल्टीसेंटर स्टडी, DiaFib-Liver Study ने इस धारणा को चुनौती दी है. स्टडी में सामने आया कि देश में टाइप-2 डायबिटीज से जूझ रहे हर चार में से एक एडल्ट में लीवर फाइब्रोसिस यानी लीवर पर गंभीर स्कारिंग मौजूद है. इतना ही नहीं, हर 20 में से एक मरीज में सिरोसिस का खतरा भी पाया गया है.
क्या निकला स्टडी में?
यह स्टडी बताती है कि डायबिटीज अब सिर्फ आंख, किडनी और नसों तक सीमित नहीं रही, बल्कि लीवर की बीमारी को भी इसकी चौथी बड़ी दिक्कत के रूप में देखा जाना चाहिए. रिसर्च में खासतौर पर मेटाबोलिक डिसफंक्शन-एसोसिएटेड स्टीटोटिक लिवर डिजीज पर फोकस किया गया है, जिसे पहले फैटी लिवर के नाम से जाना जाता था. MASLD की समस्या तब शुरू होती है जब शरीर में इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ता है और अतिरिक्त फैट लीवर में जमा होने लगता है. धीरे-धीरे यही फैट सूजन पैदा करता है और आगे चलकर फाइब्रोसिस का रूप ले लेता है, जिसमें लीवर के स्वस्थ टिश्यू की जगह स्कार टिश्यू बनने लगता है.&amp;nbsp;
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
डॉ. कपिल शर्मा ने TOI को बताया कि टाइप-2 डायबिटीज में शरीर में फैट और ग्लूकोज का असंतुलन लीवर को भी प्रभावित करता है. आंकड़ों के अनुसार, करीब 70 प्रतिशत डायबिटीज मरीजों के लीवर में फैट जमा हो जाता है, जो समय के साथ सूजन और फाइब्रोसिस में बदल सकता है. डॉक्टर बताते हैं कि इस बीमारी के कई रिस्क फैक्टर हैं, जैसे मोटापा, खराब शुगर कंट्रोल, हाई ट्राइग्लिसराइड्स और मेटाबोलिक सिंड्रोम. खास बात यह है कि कई मामलों में लीवर की बीमारी बिना किसी स्पष्ट लक्षण के बढ़ती रहती है, जिससे खतरा और बढ़ जाता है.
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सिर्फ फैट जमा होना उतना खतरनाक नहीं
रिसर्च में यह भी जोर दिया गया है कि सिर्फ फैट जमा होना उतना खतरनाक नहीं होता, जितना कि फाइब्रोसिस. क्योंकि फाइब्रोसिस यह संकेत देता है कि बीमारी गंभीर स्तर पर पहुंच चुकी है और आगे चलकर सिरोसिस, लीवर फेलियर और यहां तक कि मौत का जोखिम भी बढ़ सकता है. इसीलिए एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि डायबिटीज मरीजों में सिर्फ फैटी लिवर की जांच ही नहीं, बल्कि फाइब्रोसिस की पहचान पर ज्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए. इसके लिए नियमित जांच जैसे लिवर एंजाइम टेस्ट और फाइब्रोस्कैन कराना जरूरी है, ताकि बीमारी को शुरुआती चरण में ही पकड़ा जा सके.
क्या है बचाव का तरीका?
बचाव के लिए डॉक्टर वजन नियंत्रित रखने, संतुलित आहार लेने, नियमित एक्सरसाइज करने और रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट व शराब से दूरी बनाने की सलाह देते हैं. इसके साथ ही, ब्लड शुगर, कोलेस्ट्रॉल और ब्लड प्रेशर को कंट्रोल में रखना भी जरूरी है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 05 Apr 2026 13:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>Health Checkup Routine : कितने समय में कराना चाहिए हेल्थ चेक&amp;अप? डॉक्टरों ने उम्र के हिसाब से बताया पूरा प्लान</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/health-checkup-routine-कितने-समय-में-कराना-चाहिए-हेल्थ-चेक-अप-डॉक्टरों-ने-उम्र-के-हिसाब-से-बताया-पूरा-प्लान</link>
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        <description><![CDATA[ Health Checkup Routine : आज के समय में लोग अपनी सेहत को लेकर पहले से ज्यादा जागरूक हो गए हैं. जिम जाना, हेल्दी खाना, योग करना ये सब अब आम बात हो गई है, लेकिन एक जरूरी सवाल अब भी लोगों के मन में रहता है कि हेल्थ चेक-अप कितनी बार कराना चाहिए. कई लोग सोचते हैं कि साल में एक बार ब्लड टेस्ट करा लेना ही काफी है, लेकिन सच्चाई इससे कहीं ज्यादा अलग है. डॉक्टरों के अनुसार, हेल्थ चेक-अप हर व्यक्ति के लिए अलग होता है. यह आपकी उम्र, लाइफस्टाइल, बीमारी का इतिहास और परिवार की मेडिकल हिस्ट्री पर निर्भर करता है. इसलिए जरूरी है कि हम अपनी जरूरत के हिसाब से हेल्थ चेक-अप का सही समय और तरीका समझें. ऐसे में आइए जानते हैं कि हेल्थ चेक-अप कितने समय में कराना चाहिए.&amp;nbsp;
हेल्थ चेक-अप क्यों जरूरी है?
अक्सर लोग तभी डॉक्टर के पास जाते हैं जब उन्हें कोई समस्या होती है, लेकिन कई बीमारियां ऐसी होती हैं जो शुरू में कोई लक्षण नहीं दिखातीं है. रेगुलर चेक-अप से आप बीमारी को शुरुआत में ही पकड़ सकते हैं. गंभीर समस्याओं से बच सकते हैं. अपने शरीर की सही स्थिति जान सकते हैं और भविष्य के जोखिम को कम कर सकते हैं.&amp;nbsp;
क्या सिर्फ ब्लड टेस्ट ही काफी है?
बहुत से लोग मानते हैं कि ब्लड टेस्ट ही पूरा हेल्थ चेक-अप है, लेकिन यह पूरी तरह सही नहीं है. एक कंप्लीट हेल्थ चेक-अप में ब्लड टेस्ट, एक्स-रे और अल्ट्रासाउंड, ECG, इको, कैंसर स्क्रीनिंग, महिलाओं के लिए मैमोग्राम, हड्डियों की जांच शामिल हो सकते हैं. ये सभी टेस्ट शरीर के अंदर छिपी समस्याओं को समय रहते पकड़ने में मदद करते हैं.&amp;nbsp;
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हेल्थ चेक-अप कितने समय में कराना चाहिए
अगर आप फिट हैं, कोई बीमारी नहीं है और अच्छी लाइफस्टाइल फॉलो करते हैं, तो &amp;nbsp;साल में 1 बार पूरा हेल्थ चेक-अप काफी होता है. वहीं अगर आपके परिवार में दिल की बीमारी, डायबिटीज या अन्य गंभीर बीमारी हैं, तो साल में 2 बार चेक-अप कराना बेहतर है, साथ में खास टेस्ट भी कराए जाते हैं. &amp;nbsp;इसके अलावा अगर आपको पहले से डायबिटीज या कोई पुरानी बीमारी है, तो &amp;nbsp;साल में 2 बार पूरा चेक-अप जरूर कराना चाहिए, साथ ही हर 3 महीने में HbA1c टेस्ट कराएं. वहीं अगर आपका वजन ज्यादा है या लाइफस्टाइल ठीक नहीं है, तो आपको अतिरिक्त जांच की जरूरत हो सकती है. जैसे लिवर टेस्ट या फैटी लिवर की जांच. बुजुर्गों के लिए ज्यादा सावधानी जरूरी है. इसके लिए साल में कम से कम 2 बार हेल्थ चेक-अप कराना चाहिए.&amp;nbsp;
बच्चों के लिए हेल्थ चेक-अप प्लान
बच्चों के लिए हेल्थ चेक-अप का प्लान उनकी उम्र के हिसाब से अलग होता है. जैसे छोटे बेबी को हर 1 से 3 महीने में डॉक्टर के पास दिखाना चाहिए. &amp;nbsp;ताकि &amp;nbsp;वेकसीनेशन समय पर हो और उनकी ग्रोथ सही हो रही है या नहीं, यह देखा जा सके. वहीं 1 से 5 साल के बच्चों यानी टॉडलर्स को हर 3 से 6 महीने में चेक-अप कराने की जरूरत होती है, जिससे उनकी लंबाई-ऊंचाई, वजन, पोषण और सामान्य ग्रोथ की निगरानी की जा सके, इसके अलावा 6 से 12 साल के स्कूल जाने वाले बच्चों के लिए अगर बच्चा हेल्दी है तो साल में एक बार चेक-अप काफी होता है. वहीं टीनेज के लिए भी साल में एक बार चेक-अप जरूरी है, जिसमें उनकी खान-पान की आदतें, मानसिक स्वास्थ्य और लाइफस्टाइल पर ध्यान दिया जाता है जिससे हेल्दी लाइफस्टाइल बनी रहे और किसी भी समस्या को समय रहते पहचाना जा सके.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 05 Apr 2026 01:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Varun Dhawan Daughter DDH Disease: किस बीमारी से जूझ रही है वरुण धवन की बेटी, जानें इसके लक्षण और यह कितनी खतरनाक?</title>
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        <description><![CDATA[ Varun Dhawan Daughter DDH Disease: बॉलीवुड के फेमस एक्टर वरुण धवन ने हाल ही में अपनी बेटी की एक स्वास्थ्य समस्या के बारे में जानकारी दी. उन्होंने बताया कि उनकी बेटी को हिप डिस्प्लेसिया यानी डिवेलपमेंटल डिस्प्लेसिया ऑफ द हिप (DDH) है. यह खबर सुनते ही लोगों में इस बीमारी के बारे में जानने की इच्छा बढ़ गई.
यह समस्या बहुत आम नहीं मानी जाती, लेकिन यह बच्चों में होने वाली हिप जॉइंट (hip joint) की एक गंभीर समस्या है. अगर समय पर इसका इलाज नहीं किया गया, तो यह बच्चे की चलने-फिरने की क्षमता पर असर डाल सकती है और भविष्य में दर्द, चलने में परेशानी या जल्दी गठिया (arthritis) जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं. ऐसे में आइए जानते हैं कि DDH क्या है, इसके लक्षण, कारण और इलाज कैसे किया जाता है. यह कितनी खतरनाक है.&amp;nbsp;
DDH क्या है?
डिवेलपमेंटल डिस्प्लेसिया ऑफ द हिप (DDH) एक ऐसी स्थिति है जिसमें बच्चे की हिप जॉइंट सही तरीके से विकसित नहीं होती है. सामान्य स्थिति में, जांघ की हड्डी का ऊपर वाला हिस्सा हिप सॉकेट में मजबूती से फिट होता है. DDH में यह फिटिंग ढीली, अस्थिर या कभी-कभी पूरी तरह से डिस्लोकेट (dislocated) हो जाती है. यह समस्या जन्म के समय हमेशा दिखती नहीं है, इसलिए बेबी की समय पर स्क्रीनिंग बहुत जरूरी है. अगर समय पर इलाज किया जाए तो बच्चे नॉर्मल लाइफ जी सकते हैं और चलने-फिरने में कोई दिक्कत नहीं होती है.&amp;nbsp;
यह बीमारी कितनी आम है?
दुनियाभर में करीब 0.5 प्रतिशत से 1.5 प्रतिशत बच्चों को यह समस्या होती है. कुछ मामलों में हल्की अस्थिरता अपने आप ठीक हो जाती है, जबकि कुछ बच्चों को इलाज की जरूरत पड़ती है. भारत में हर 1000 बच्चों में 0 से 2.6 मामलों की संभावना होती है. यह आंकड़ा सही से पता नहीं होता, क्योंकि हल्के मामलों में यह अनदेखी हो जाती है. इस बीमारी से लड़कियां, पहली बार जन्मे बच्चे, ब्रीच पोजीशन में जन्मे बच्चे या परिवार में किसी को DDH का इतिहास वाले लोग ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं. भारत में ज्यादातर बच्चे 1 या 2 साल की उम्र में ही डायग्नोस होते हैं, जो सही उम्र से काफी लेट है. इसलिए न्यू बोर्न बेबी की समय पर स्क्रीनिंग बहुत जरूरी है ताकि समस्या का सही समय पर पता चल सके और इलाज शुरू हो सके.&amp;nbsp;
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इसके लक्षण और यह कितनी खतरनाक?
न्यू बोर्न बेबी में अक्सर नियमित चेकअप के दौरान डॉक्टर इस समस्या को पहचान लेते हैं. बच्चे के पेरेंट्स अक्सर शुरू में कोई संकेत नहीं देखते है. थोड़े बड़े बच्चों में पैरों की लंबाई असमान होना, एक पैर का सीमित हिलना या घुटनों के मुड़ने में दिक्कत और जांघ के झुर्री (thigh folds) में असमानता दिखाई दे सकते हैं. देर से पता चलने वाले मामलों में बच्चे देर से चलना शुरू करते हैं, लंपिंग करते हैं, असामान्य चाल रखते हैं या एक पैर छोटा दिख सकता है.&amp;nbsp;
DDH का इलाज
DDH का इलाज संभव है और यह अक्सर पूरी तरह ठीक हो जाता है, खासकर अगर समय पर पहचान हो. न्यू बोर्न बेबी का इलाज सॉफ्ट ब्रेस का यूज करके हिप को सही जगह पर रखा जाता है ताकि हिप सामान्य रूप से विकसित हो. वहीं 6 महीने से 2 साल के बच्चे का इलाज क्लोज्ड रिडक्शन (closed reduction) से किया जाता है, यानी बिना ऑपरेशन के हिप को सही जगह पर लाया जाता है. इसके बाद कास्ट में रखा जाता है. 2 साल से बड़े बच्चों में सर्जरी की जरूरत हो सकती है, जिसमें हिप को सही स्थिति में लाया जाता है. अगर समय पर इलाज किया जाए तो ज्यादातर बच्चों को सर्जरी की जरूरत नहीं पड़ती है.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 05 Apr 2026 01:30:09 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Weight Loss Tips : क्या आप पर भी सवार है वजन घटाने की धुन, जानें किन चीजों की हो जाती है कमी?</title>
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        <description><![CDATA[ Weight Loss Tips : क्या आप पर भी सवार है वजन घटाने की धुन, जानें किन चीजों की हो जाती है कमी? ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 05 Apr 2026 01:30:09 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Nose Bleeding: गर्मियां शुरू होते ही नाक से निकलने लगता है खून, जानें कब नॉर्मल और कब है टेंशन लेने की जरूरत?</title>
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        <description><![CDATA[ Nose Bleeding: मार्च और अप्रैल का सुहाना समय खत्म होते ही तेज गर्मी कभी भी दस्तक दे सकती है. ऐसे में यह बात अभी से लोगों को परेशान करने लगी है. इस मौसम के आते ही सेहत को कई तरह की समस्याएं होने लगती हैं. कई लोगों को नाक से खून आने की भी परेशानी होती है. यह समस्या खासकर तब बढ़ जाती है, जब तापमान तेजी से बढ़ने लगता है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि नाक से खून आना सिर्फ गर्मी का असर नहीं, बल्कि गंभीर बीमारी का संकेत भी हो सकता है?
इसके पीछे क्या कारण है?
नाक के अंदर की त्वचा बहुत पतली और संवेदनशील (Sensitive) होती है. इसमें छोटे-छोटे रक्त वाहिकाएं (vessels) होती हैं, जो सूखने पर कभी भी फट सकती हैं. इसके सूखने के पीछे गर्म हवाएं और कम नमी को कारण माना जाता है, जो त्वचा को बहुत खुष्क बना देता है. जोर से खांसने या छींकने पर ये नसें फट सकती हैं, जिससे खून आ सकता है. इसके अलावा एलर्जी, साइनस या अंदर लगी चोट भी इसका कारण हो सकती है. कुछ लोगों में हाई ब्लड प्रेशर या बिना डॉक्टर की सलाह के ली गई दवाएं भी नाक से खून आने की वजह बन सकती हैं
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नाक से खून आने पर क्या करें

सिर को थोड़ा ऊपर की ओर रखें, ताकि खून गले में न जाए.
नाक को हल्के से दबाकर रखें, इससे खून रुकने में मदद मिलती है.
नाक या गर्दन पर ठंडा पानी या कपड़ा रखें, इससे खून धीरे-धीरे रुक सकता है.
कमरे की हवा में नमी बनाए रखें, ताकि नाक अंदर से ज्यादा न सूखे.
अगर यह समस्या बार-बार हो या ज्यादा खून आए, तो डॉक्टर को जरूर दिखाएं.

नाक से खून आने पर &amp;nbsp;डॉक्टर को कब दिखाएं

अगर खून 30 मिनट से ज्यादा समय तक बंद न हो या बहुत ज्यादा बह रहा हो.
अगर खून गले तक आने लगे या निगलने जैसा लगे.
अगर नाक या सिर में चोट लगने के बाद खून आ रहा हो.
अगर बार-बार नाक से खून आता हो (हफ्ते में दो बार से ज्यादा).
अगर आप कोई दवा ले रहे हों या परिवार में पहले भी यह समस्या रही हो.

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&amp;nbsp; ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 05 Apr 2026 01:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>Harish Rana Organ Donation: इच्छामृत्यु से पहले हरीश राणा ने दान किए हार्ट वॉल्व और कॉर्निया, इन्हें कैसे किया गया ट्रांसप्लांट?</title>
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        <description><![CDATA[ 
Harish Rana Organ Donation: 31 वर्षीय हरीश राणा की इच्छा मृत्यु के बाद एक ऐसी खबर सामने आई है, जिसने अंगदान के महत्व को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है. दरअसल, एम्स दिल्ली के डॉक्टरों ने पुष्टि की है कि उनके कॉर्निया और हार्ट वॉल्व सफलतापूर्वक निकालकर ट्रांसप्लांट के लिए सुरक्षित कर लिए गए हैं. यह फैसला उनके माता-पिता की इच्छा के अनुसार लिया गया था कि उनकी बेटे की जिंदगी दूसरों के लिए उम्मीद बन सके.
डॉक्टरों के अनुसार, कॉर्निया ट्रांसप्लांट से जहां किसी व्यक्ति की रोशनी लौटाई जा सकेगी. वहीं हार्ट वॉल्व से उन मरीजों को नया जीवन दे सकता है, जिन्हें हार्ट सर्जरी की जरूरत है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि कई बार पूरा अंग उपयोग में नहीं आ पाता, लेकिन उसके हिस्से भी दूसरों के जीवन को बचाने में बहुत जरूरी भूमिका निभाते हैं. ये भी पढ़ें-40 की उम्र में डाइट बदलना क्यों जरूरी है? जानिए दिमाग को हेल्दी रखने का राज
क्या होता है हार्ट वॉल्व रिट्रीवल?डॉक्टरों के अनुसार, हार्ड वॉल्व रिट्रीवल एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें ब्रेन डेड घोषित व्यक्ति के दिल से वॉल्व निकाले जाते हैं. यह प्रक्रिया तभी संभव होती है, जब दिल पूरी तरह ट्रांसप्लांट के लिए उपयुक्त न हो. उन्होंने बताया कि डोनर को ऑपरेशन थिएटर में ले जाकर दिल या उसके जरूरी हिस्से को सावधानी से निकाला जाता है. दिल की पंपिंग क्षमता भले ही पूरी तरह उपयोगी न हो, लेकिन उसके वाॅल्व को सुरक्षित करके दूसरे मरीजों के इलाज में इस्तेमाल किया जा सकता है. कैसे सुरक्षित रखे जाते हैं हार्ट वॉल्व?एक्सपर्ट्स के अनुसार, अगर तुरंत ट्रांसप्लांट संभव न हो तो वॉल्व को -180 डिग्री सेल्सियस तापमान पर क्रायोप्रिजर्वेशन तकनीक के जरिए सुरक्षित रखा जाता है. इस तरह यह वॉल्व करीब 5 साल तक उपयोग के लिए सुरक्षित रह सकते हैं. कैसी होती है ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया?दिल से निकाले गए वॉल्व को संस्थान के वाॅल्व बैंक में ले जाया जाता है. जहां एक्सपर्ट्स 10 से 15 मिनट में एओर्टिक और पल्मोनरी वाॅल्व को अलग करते हैं. इसके बाद उन्हें विशेष तरीके से तैयार किया जाता है, ताकि दूसरे मरीज में ट्रांसप्लांट किया जा सके. इन वॉल्व का इस्तेमाल खासतौर पर गंभीर सर्जरी, संक्रमण वाले मामलों और बच्चों के इलाज में किया जाता है. खास बात यह है कि बड़े व्यक्ति के वाॅल्व को छोटा करके बच्चों के शरीर के अनुसार ढाला जा सकता है. कॉर्निया ट्रांसप्लांट कैसे करता है मदद?डॉक्टरों का कहना है की ब्रेन डेड व्यक्ति आंख दान करने के लिए उपयुक्त होते हैं. क्योंकि कॉर्निया कुछ समय तक बिना ब्लड सर्कुलेशन के भी सुरक्षित रहता है. ऐसे में समय रहते इसे निकाल कर दूसरे मरीज में ट्रांसप्लांट किया जा सकता है. जिससे उसकी आंखों की रोशनी वापस लाई जा सकती है. एम्स के डॉक्टरों के अनुसार हर महीने तीन से चार ऐसे केस सामने आते हैं जहां हार्ट वाॅल्व रिट्रीवल और ट्रांसप्लांट किया जाता है. यह संख्या भले ही कम हो, लेकिन इससे यह साफ होता है कि अंगदान कितनी बड़ी संख्या में लोगों को नया जीवन दे सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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        <pubDate>Sun, 05 Apr 2026 01:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Harish, Rana, Organ, Donation:, इच्छामृत्यु, से, पहले, हरीश, राणा, ने, दान, किए, हार्ट, वॉल्व, और, कॉर्निया, इन्हें, कैसे, किया, गया, ट्रांसप्लांट</media:keywords>
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        <title>Thymus Gland Health: इस छोटे&amp;से अंग की वजह से लंबी होती है आपकी उम्र, यह खुलासा उड़ा देगा आपके होश</title>
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        <description><![CDATA[ How Thymus Health Affects Lifespan: क्या आपके सीने का एक छोटा सा अंग आपकी लंबी उम्र और गंभीर बीमारियों के खतरे का संकेत दे सकता है? हाल ही में सामने आई एक नई स्टडी ने इसी ओर इशारा किया है. साइंस जर्नल नेचर में प्रकाशित इस शोध के मुताबिक, थाइमस &amp;nbsp;नाम का अंग हमारे इम्यून सिस्टम और लंबे समय तक स्वस्थ रहने में अहम भूमिका निभाता है. रिसर्च में बताया गया है कि थाइमस की सेहत सीधे तौर पर हार्ट डिजीज और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के खतरे से जुड़ी हो सकती है. साइंटिस्ट का कहना है कि यह अंग अब सिर्फ एक सामान्य ग्लैंड्स नहीं, बल्कि उम्र बढ़ने और बीमारियों की संभावना को कंट्रोल करने वाला एक महत्वपूर्ण कारक बनकर उभर रहा है.
क्या है थाइमस?
थाइमस एक छोटी, दो भागों वाली ग्रंथि होती है, जो फेफड़ों के बीच ऊपरी छाती में स्थित होती है. इसका मुख्य काम टी-लिम्फोसाइट्स नामक व्हाइट ब्लड सेल्स का निर्माण करना है, जो शरीर को इंफेक्शन और बीमारियों से बचाती हैं. इस स्टडी में वैज्ञानिकों ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से 27,000 से ज्यादा मरीजों के स्कैन और मेडिकल रिकॉर्ड का एनालिसिस किया. इसके जरिए उन्होंने थाइमस की सेहत और मरीजों की बीमारी के जोखिम के बीच संबंध को समझने की कोशिश की.
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क्या निकला नतीजा?
नतीजों में पाया गया कि जिन लोगों का थाइमस हेल्दी था, उनमें मृत्यु दर करीब 13.4 प्रतिशत रही, जबकि जिनका थाइमस कमजोर था, उनमें यह आंकड़ा 25.5 प्रतिशत तक पहुंच गया. इसके अलावा, कमजोर थाइमस वाले लोगों में 5.3 प्रतिशत को फेफड़ों का कैंसर और 16.7 प्रतिशत को हार्ट संबंधी बीमारियां होने का खतरा ज्यादा पाया गया. रिसर्च यह भी बताता है कि उम्र बढ़ने के साथ थाइमस धीरे-धीरे सिकुड़ता जाता है और उसकी जगह फैटी टिश्यू ले लेते हैं. यही बदलाव शरीर की रोग इम्यून क्षमता को कमजोर कर सकता है.
रिसर्च के लिए इसका यूज
साइंटिस्ट ने आगे इस शोध को और मजबूत करने के लिए दो बड़े अध्ययन फ्रेमिंगहैम हार्ट स्टडी और नेशनल लंग स्क्रीनिंग ट्रायल के डेटा का भी उपयोग किया. इसमें AI आधारित डीप लर्निंग सिस्टम के जरिए थाइमस की स्थिति का ज्यादा सटीक आकलन किया गया. रिसर्चर का कहना है कि पारंपरिक तरीके से थाइमस की जांच उतनी सटीक नहीं होती, इसलिए AI तकनीक ने इस क्षेत्र में बड़ी भूमिका निभाई है. इस मॉडल ने अलग-अलग डेटा सेट पर भी लगातार सटीक परिणाम दिए. रिपोर्ट में यह भी सुझाव दिया गया है कि लाइफस्टाइल में बदलाव, जैसे नियमित एक्सरसाइज, अच्छी नींद और संतुलित आहार थाइमस की सेहत पर पॉजिटिव असर डाल सकते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 04 Apr 2026 09:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>Laughing Epilepsy Symptoms: आपकी हंसी भी हो सकती है खतरनाक बीमारी, जानें इसके लक्षण और इलाज का तरीका</title>
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        <guid>https://hindi.attentionindia.com/laughing-epilepsy-symptoms-आपकी-हंसी-भी-हो-सकती-है-खतरनाक-बीमारी-जानें-इसके-लक्षण-और-इलाज-का-तरीका</guid>
        <description><![CDATA[ अब हंसी भी बीमारी का संकेत बन सकती है, लेकिन अच्छी बात यह है कि अब इसका इलाज भी भारत में उपलब्ध है. दरअसल, जोधपुर के एम्स अस्पताल में डॉक्टरों ने दुर्लभ बीमारी &#039;लाफिंग एपिलेप्सी&#039; (हंसने वाली मिर्गी) के चार मरीजों का सफल इलाज किया. आइए इसके बारे में जानते हैं.
क्या है यह बीमारी?
यह बीमारी ऐसी है, जिसमें मरीज को बिना किसी वजह बार-बार हंसी के दौरे पड़ते हैं. यह सामान्य हंसी नहीं होती. यह मिर्गी का एक खास प्रकार है, जो दवाओं से कंट्रोल नहीं होता. सुनने में अजीब लग सकता है, लेकिन यह मरीज के लिए बहुत परेशानी भरा होता है.
क्या है लाफिंग एपिलेप्सी?
लाफिंग एपिलेप्सी को गेलास्टिक सीजर्स भी कहते हैं. इसमें मरीज अचानक हंसने लगता है, जैसे कोई मजाक सुन लिया हो. असल में यह दिमाग के किसी खास हिस्से से शुरू होने वाले दौरे होते हैं. कई बार हंसी के साथ अन्य लक्षण भी दिखते हैं, जैसे शरीर में अकड़न या बेहोशी. अगर समय पर सही इलाज न हो तो यह समस्या बढ़ सकती है. इस बीमारी के मरीजों को आमतौर पर दवाओं से आराम नहीं मिलता है. ऐसे में सर्जरी की जरूरत पड़ती है. जोधपुर एम्स के डॉक्टरों ने ऐसे ही चार मरीजों की सर्जरी नई तकनीक से की.
कैसे की गई मरीजों की सर्जरी?
डॉक्टरों ने मिनिमली इनवेसिव स्टीरियोटैक्टिक रेडियोफ्रीक्वेंसी एब्लेशन नाम की तकनीक का इस्तेमाल किया. इसमें दिमाग के उस छोटे से हिस्से को टारगेट किया जाता है, जहां से दौरे शुरू होते हैं. यह सर्जरी बड़े चीरे के बिना की गई. सिर्फ छोटे से चीरे से काम चलाया गया. इससे मरीज को कम दर्द होता है और जल्दी रिकवर भी हो जाता है.&amp;nbsp;
इन डॉक्टरों ने की सफल सर्जरी
इस सर्जरी के लिए न्यूरोलॉजी विभाग से डॉ. सम्हिता पांडा और डॉ. लोकेश सैनी ने मरीजों की जांच की. वहीं, डॉ. सरबेश तिवारी ने एमआरआई से सही जगह का पता लगाया. एनेस्थीसिया की टीम में डॉ. स्वाति छाबड़ा और डॉ. मनबीर कौर शामिल थीं तो डॉ. मोहित अग्रवाल ने सर्जरी की. वहीं, डॉ. दीपक के झा और डॉ. सूर्यनारायणन भास्कर भी इसमें शामिल रहे.&amp;nbsp;
एम्स जोधपुर का मिर्गी सर्जरी कार्यक्रम
एम्स जोधपुर में साल 2019 से मिर्गी की सर्जरी का कार्यक्रम चल रहा है. अब तक यहां 100 से ज्यादा ऐसी सर्जरी हो चुकी हैं. इनमें कई मरीज ऐसे थे, जिन पर दवाएं काम नहीं कर रही थीं. इन सर्जरी में कई मरीजों का इलाज आयुष्मान भारत योजना के तहत मुफ्त में किया गया.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Fri, 03 Apr 2026 17:30:14 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Right Age for Pregnancy: कितनी उम्र के बाद प्रेग्नेंसी हो सकती है जोखिम भरी? जानें बच्चे को जन्म देने की सही उम्र</title>
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        <description><![CDATA[ Right Age for Pregnancy : आज के समय में महिलाओं की जिंदगी पहले से काफी बदल चुकी है. पढ़ाई, करियर, आर्थिक स्वतंत्रता और अपने फैसले खुद लेने की आजादी, इन सब वजहों से कई महिलाएं मां बनने का फैसला पहले की तुलना में देर से ले रही हैं, जहां पहले कम उम्र में शादी और जल्दी प्रेग्नेंसी आम बात थी, वहीं अब महिलाएं 30 या 35 की उम्र के बाद भी मां बनने का सोचती हैं. ऐसे में कई महिलाओं के मन में यह सवाल उठता है कि क्या ज्यादा उम्र में प्रेग्नेंसी सुरक्षित होती है, क्या इसके कुछ जोखिम भी हैं और आखिर मां बनने के लिए सही उम्र क्या मानी जाती है. तो आइए जानते हैं कि कितनी उम्र के बाद प्रेग्नेंसी जोखिम भरी हो सकती है.&amp;nbsp;
प्रेग्नेंसी के लिए सही उम्र क्या है?
महिलाओं में प्रेग्नेंसी की फर्टिलिटी टीनेज में पीरियड्स शुरू होने के साथ ही शुरू हो जाती है और मेनोपॉज तक रहती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हर उम्र प्रेग्नेंसी के लिए समान रूप से सुरक्षित होती है. 20 से 30 साल की उम्र को प्रेग्नेंसी के लिए सबसे बेहतर माना जाता है. 30 के बाद धीरे-धीरे प्रेग्नेंसी की क्षमता कम होने लगती है और 35 के बाद जोखिम बढ़ने लगते हैं, इसलिए इस उम्र को एडवांस्ड मैटरनल एज कहा जाता है.&amp;nbsp;
30 के बाद क्यों घटती है फर्टिलिटी?
महिलाओं के शरीर में एग्स की संख्या जन्म से ही तय होती है. उम्र बढ़ने के साथ ये संख्या और उनकी क्वालिटी दोनों कम होती जाती हैं. 30 के बाद कंसीव करने में समय ज्यादा लग सकता है. 35 के बाद कई महिलाओं को मेडिकल सहायता की जरूरत पड़ सकती है और एग्स की क्वालिटी घटने से प्रेग्नेंसी की संभावना कम हो जाती है.&amp;nbsp;
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कितनी उम्र के बाद प्रेग्नेंसी जोखिम भरी हो सकती है
35 साल के बाद प्रेग्नेंट होने पर कुछ समस्याएं बढ़ सकती हैं. जिसमें मां के लिए हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, ज्यादा ब्लीडिंग (डिलीवरी के समय या बाद में) या सी-सेक्शन (ऑपरेशन से डिलीवरी) की संभावना ज्यादा होती है. वहीं प्रेग्नेंसी से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं. जैसे समय से पहले डिलीवरी (प्रीमेच्योर बर्थ), जुड़वां बच्चों की संभावना बढ़ना, प्लेसेंटा से जुड़ी दिक्कतें और ICU में भर्ती होने की जरूरत हो सकती है. ज्यादा उम्र में मां बनने से बच्चे पर भी कुछ प्रभाव पड़ सकते हैं. जिसमें कम वजन के साथ जन्म, समय से पहले जन्म, NICU में भर्ती होने की जरूरत और कुछ जेनेटिक बीमारियों का खतरा भी होता है.&amp;nbsp;
सही देखभाल कैसे करें?
आपकी उम्र कोई भी हो, प्रेग्नेंसी के दौरान सही देखभाल बहुत जरूरी है. जिसमें नियमित चेकअप, समय पर टेस्ट, किसी भी समस्या का जल्दी पता लगाना और डॉक्टर की सलाह का पालन करना जरूरी है. इससे मां और बच्चे दोनों को सुरक्षित रखा जा सकता है. &amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 03 Apr 2026 17:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>Tingling In Hands Causes: क्या आपके हाथ में भी होती है झुनझुनी और सुन्नपन, जानें किस वजह से होता है ऐसा?</title>
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        <description><![CDATA[ Why Do My Hands Tingle Frequently: क्या आपके हाथों में बार-बार झुनझुनी या सुन्नपन महसूस होता है? कई लोग इसे मामूली समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन एक्सपर्ट्स मानते हैं कि यह शरीर का एक संकेत भी हो सकता है, जिसे समझना जरूरी है. &amp;nbsp;अक्सर यह समस्या तब महसूस होती है जब हम गलत पोजीशन में सो जाते हैं या लंबे समय तक एक ही स्थिति में हाथ रखते हैं. ऐसे में नसों पर दबाव पड़ता है या खून का प्रवाह कुछ समय के लिए कम हो जाता है, जिससे झुनझुनी होने लगती है.
कब होती है दिक्कत?
लेकिन अगर यह परेशानी बार-बार होने लगे या लंबे समय तक बनी रहे, तो इसके पीछे कोई खास कारण भी हो सकता है. theheartysoul की रिपोर्ट के अनुसार, सबसे आम वजहों में से एक है कार्पल टनल सिंड्रोम, जिसमें कलाई की नस दब जाती है और अंगूठे, उंगलियों में झुनझुनी या दर्द होने लगता है. कभी-कभी समस्या कलाई में नहीं, बल्कि कोहनी या गर्दन से भी जुड़ी हो सकती है. नसों में कहीं भी दबाव आने से हाथ तक इसका असर पहुंच सकता है, जिससे झुनझुनी और कमजोरी महसूस होती है.
ब्लड सर्कुलेशन और डायबिटीड भी कारण
खराब ब्लड सर्कुलेशन भी इसका एक कारण हो सकता है. &amp;nbsp;ठंड में या अचानक तापमान बदलने पर उंगलियां सुन्न पड़ सकती हैं और रंग भी बदल सकता है, जिसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. इसके अलावा, डायबिटीज जैसी बीमारियां भी नसों को प्रभावित कर सकती हैं. जब नसें कमजोर होने लगती हैं, तो हाथ-पैरों में झुनझुनी, जलन या सुन्नपन महसूस होने लगता है.
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विटामिन B12 की कमी&amp;nbsp;
विटामिन B12 की कमी भी एक अहम कारण है, जो धीरे-धीरे नसों को नुकसान पहुंचा सकती है. कई बार लोग थकान या कमजोरी को नजरअंदाज करते रहते हैं, लेकिन यह संकेत हो सकता है कि शरीर में जरूरी पोषक तत्वों की कमी है. कुछ मामलों में थायरॉयड की समस्या भी हाथों में झुनझुनी का कारण बन सकती है. शरीर का मेटाबॉलिज्म बिगड़ने से नसों पर असर पड़ता है और यह समस्या बढ़ सकती है.&amp;nbsp;
ये भी होता है कारण
कंधे और गर्दन के बीच नसों या ब्लड वेसल्स पर दबाव पड़ने से भी हाथों में झुनझुनी हो सकती है. खासतौर पर जब हाथ लंबे समय तक ऊपर रखा जाए या भारी वजन उठाया जाए. &amp;nbsp;अगर झुनझुनी के साथ कमजोरी, चीजें गिरना, या दर्द बढ़ने लगे, तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए. यह संकेत हो सकता है कि नसों पर लगातार दबाव पड़ रहा है या कोई गंभीर समस्या विकसित हो रही है. अचानक एक तरफ हाथ सुन्न हो जाना, बोलने में दिक्कत या चक्कर आना जैसी स्थिति स्ट्रोक का संकेत भी हो सकती है. ऐसे में तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 03 Apr 2026 17:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>Child Cancer Deaths Global: भारत जैसे गरीब देशों में कैंसर से जान गंवा रहे 10 में से 9 बच्चे, डरा देगी लैंसेट की रिपोर्ट</title>
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        <description><![CDATA[ Why Childhood Cancer Deaths Are Higher In Poor Countries: दुनिया भर में बच्चों में कैंसर एक गंभीर और बढ़ती हुई चिंता बनता जा रहा है, लेकिन सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि इसके ज्यादातर मामले और मौतें गरीब और मध्यम आय वाले देशों में हो रही हैं. &amp;nbsp;द लैंसेट में पब्लिश ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज 2023 स्टडी ने इस असमानता को लेकर कई चौंकाने वाले आंकड़े सामने रखे हैं.&amp;nbsp; रिपोर्ट के अनुसार, साल 2023 में दुनिया भर में बच्चों में कैंसर के लगभग 3.77 लाख नए मामले सामने आए, जबकि करीब 1.44 लाख बच्चों की मौत हो गई, यह बीमारी बच्चों में मौत के प्रमुख कारणों में शामिल हो चुकी है और खसरा, टीबी और HIV/AIDS जैसी बीमारियों से भी ज्यादा जान ले रही है.&amp;nbsp;
लो और मिडिल इनकम वाले देशों में ज्यादा मौतें
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इन मौतों में से करीब 94 प्रतिशत मामले लो और मिडिल इनकम देशों में दर्ज किए गए. यानी जहां संसाधन कम हैं, वहीं बच्चों के लिए यह बीमारी सबसे ज्यादा घातक साबित हो रही है. भारत की बात करें तो यहां 2023 में करीब 17,000 बच्चों की मौत कैंसर के कारण हुई, जिससे यह बच्चों में मौत का दसवां सबसे बड़ा कारण बन गया. कैंसर केयर अस्पताल, दरभंगा के कर्क रोग एक्सपर्ट डॉक्टर स्वरूप मित्रा के अनुसार,, इसके बावजूद भारत के राष्ट्रीय कैंसर नियंत्रण कार्यक्रम में बचपन के कैंसर को अभी तक प्राथमिकता नहीं दी गई है. &amp;nbsp;इसके लिए जरूरी है कि बचपन के कैंसर को राष्ट्रीय कैंसर नियंत्रण योजनाओं में तुरंत शामिल किया जाए.
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दक्षिण एशिया की स्थिति
दक्षिण एशिया इस संकट का बड़ा केंद्र बना हुआ है, जहां दुनिया के कुल चाइल्डहुड कैंसर से होने वाली मौतों का लगभग 20.5 प्रतिशत हिस्सा दर्ज किया गया. इसके अलावा, 1990 से 2023 के बीच इन मौतों में करीब 16.9 प्रतिशत &amp;nbsp;की बढ़ोतरी भी देखी गई है. हालांकि एक पॉजिटिव पहलू यह भी है कि वैश्विक स्तर पर मौतों में कुछ कमी आई है, लेकिन इसका लाभ सभी देशों तक समान रूप से नहीं पहुंच पाया है. उच्च आय वाले देशों में इलाज बेहतर होने से बच्चों के बचने की संभावना ज्यादा है, जबकि गरीब देशों में समय पर जांच और इलाज की कमी बड़ी बाधा बन रही है.&amp;nbsp;
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
इस स्टडी की प्रमुख लेखक लिसा फोर्स कहती हैं कि स्वास्थ्य सेवाओं की असमानता के कारण ही यह अंतर पैदा हो रहा है. देर से डायग्नोसिस, जरूरी इलाज की कमी और स्वास्थ्य प्रणाली की कमजोरियां बच्चों की जान जोखिम में डाल रही हैं. रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि चाइल्डहुड कैंसर के 85 प्रतिशत नए मामले और 94 प्रतिशत मौतें इन्हीं लो और मिडिल इनकम देशों में होती हैं. इसके अलावा, DALYs यानी &quot;डिसएबिलिटी एडजस्टेड लाइफ ईयर्स&quot; का भी 94 प्रतिशत हिस्सा इन्हीं देशों में दर्ज किया गया, जो यह दिखाता है कि बीमारी का असर सिर्फ मौत तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चों की जिंदगी की क्वालिटी पर भी पड़ता है.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 03 Apr 2026 17:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>Hidden Ingredients In Snacks: चीज़ के नाम पर सिर्फ मैदा और तेल! वायरल वीडियो में देखें चीज़लिंग्स के अंदर का असली सच</title>
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        <description><![CDATA[ How Much Cheese Is In Cheeslings: क्या आप भी चाय के साथ या बच्चों के टिफिन में मोनाको च़ीजलिंग्स देना पसंद करते हैं? अगर हां, तो यह खबर आपको चौंका सकती है. सालों से भारतीय घरों में पसंद किए जाने वाले इस स्नैक को लेकर एक वायरल वीडियो ने बड़ा खुलासा किया है. फूडफार्म के नाम से मशहूर हेल्थ इंफ्लुएंसर रेवंत हिमात्सिंगका ने इस प्रोडक्ट के अंदर की सच्चाई सामने रखी है. चलिए आपको इसके बारे में बताते हैं.&amp;nbsp;
वीडियो में उठाए सवाल
वीडियो में सबसे बड़ा सवाल इस स्नैक के नाम को लेकर उठाया गया है. च़ीजलिंग्स नाम सुनकर लगता है कि इसमें चीज की अच्छी मात्रा होगी, लेकिन पैकेट पर दिए गए इंग्रीडिएंट्स कुछ और ही कहानी बताते हैं. लेबल के मुताबिक, इसमें चीज की मात्रा सिर्फ 1.9 प्रतिशत है. यानी जिस स्वाद के लिए लोग इसे खरीदते हैं, वही इसमें बेहद कम मात्रा में मौजूद है. &amp;nbsp;इस बात को समझाने के लिए वीडियो में एक दिलचस्प तरीका अपनाया गया. एक ट्रांसपेरेंट जार में सभी सामग्री को उनके अनुपात के हिसाब से दिखाया गया, जिसमें मैदा और तेल लगभग पूरा जार भरते नजर आए, जबकि चीज की मात्रा इतनी कम थी कि वह मुश्किल से नजर आ रही थी.
इसे भी पढ़ें-&amp;nbsp;अचानक टूटने लगे जरूरत से ज्यादा बाल, शरीर में छुपी हो सकती है यह बीमारी
क्या होता है इसमें?
अगर इसमें चीज इतनी कम है, तो सवाल उठता है कि आखिर इसमें बाकी क्या है?. वीडियो में रेवंत हिमात्सिंगका बताते हैं कि असल में इस स्नैक का बड़ा हिस्सा रिफाइंड व्हीट फ्लोर यानी मैदा से बना है. chriskresser&amp;nbsp; की रिपोर्ट के अनुसार, मैदा में फाइबर और जरूरी पोषक तत्व नहीं होते, जिससे यह शरीर में तेजी से शुगर लेवल बढ़ा सकता है और वजन बढ़ने का कारण बन सकता है. इसके अलावा, इसमें पाम ऑयल का इस्तेमाल किया जाता है, जो सैचुरेटेड फैट से भरपूर होता है. लंबे समय तक इसका ज्यादा सेवन दिल से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ा सकता है. इतना ही नहीं, इस स्नैक में इनवर्ट शुगर सिरप और ज्यादा मात्रा में नमक भी होता है. यह कॉम्बिनेशन इसे स्वादिष्ट और एडिक्टिव बनाता है, जिससे एक बार खाने के बाद बार-बार खाने की इच्छा होती है.&amp;nbsp;
&amp;nbsp;

इन चीजों का भी होता है इस्तेमाल
वीडियो में इसमें शुगर और हल्दी का क्लेम किया गया है. स्वाद और टेक्सचर को बनाए रखने के लिए इसमें कई तरह के केमिकल्स भी मिलाए जाते हैं. वीडियो में इस प्रोडक्ट को TruthIn रेटिंग में 5 में से सिर्फ 1.8 अंक दिए गए हैं, जो इसे &quot;अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड&quot; की कैटेगरी में रखता है. य &amp;nbsp;खासकर बच्चों के लिए यह चिंता की बात है, क्योंकि इस तरह के प्रोसेस्ड स्नैक्स का ज्यादा सेवन उनकी सेहत पर असर डाल सकता है.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 03 Apr 2026 17:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>Breast Cancer Lung Metastasis: फेफड़ों में क्यों फैलता है ब्रेस्ट कैंसर? रिसर्च में हुआ ट्यूमर के &amp;apos;सपोर्ट सिस्टम&amp;apos; का खुलासा</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/breast-cancer-lung-metastasis-फेफड़ों-में-क्यों-फैलता-है-ब्रेस्ट-कैंसर-रिसर्च-में-हुआ-ट्यूमर-के-सपोर्ट-सिस्टम-का-खुलासा</link>
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        <description><![CDATA[ Why Breast Cancer Spreads To Lungs: महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर भारत और दुनिया भर में कैंसर से होने वाली मौतों और मामलों में टॉप पर है. &amp;nbsp;जब ब्रेस्ट कैंसर शरीर के दूसरे हिस्सों में फैल जाता है, तो यह और ज्यादा खतरनाक हो जाता है. फेफड़े उन अंगों में शामिल हैं, जहां यह कैंसर सबसे ज्यादा फैलता है. लंबे समय से डॉक्टर जानते हैं कि फेफड़ों में पहुंचने के बाद कैंसर का इलाज मुश्किल हो जाता है, लेकिन अब तक यह पूरी तरह साफ नहीं था कि वहां ट्यूमर इतनी तेजी से क्यों बढ़ते हैं.
क्या निकला रिसर्च में?
हाल ही में यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो कैंसर सेंटर के रिसर्च ने इस पर एक अहम खोज की है. कैंसर रिसर्च कम्युनिटी में प्रकाशित इस स्टडी के मुताबिक, ब्रेस्ट कैंसर की सेल्स लंग्स के प्राकृतिक रिपेयर सिस्टम का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए करने लगती हैं. दरअसल, फेफड़ों में एक खास क्षमता होती है कि वे खुद को जल्दी ठीक कर सकें. जब एयर सैक्स यानी एल्वियोलाई को नुकसान पहुंचता है, तो शरीर तुरंत उसे रिपेयर करने की प्रक्रिया शुरू कर देता है. यह प्रक्रिया सांस लेने और लंग्स को स्वस्थ रखने के लिए बेहद जरूरी होती है.
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क्यों आसानी से फैलता है ट्यूमर?
लेकिन जब कैंसर सेल्स लंग्स में पहुंचती हैं, तो वे इस हीलिंग सिस्टम को बाधित कर देती हैं. सामान्य तौर पर जो प्रक्रिया कुछ समय के लिए चलती है, वह कैंसर की मौजूदगी में लगातार सक्रिय रहती है. इससे सूजन बनी रहती है और ऐसा माहौल तैयार होता है, जिसमें ट्यूमर आसानी से बढ़ने लगते हैं. रिसर्च में यह भी सामने आया कि एल्वियोलर टाइप-2 सेल्स इस पूरी प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाती हैं. ये सेल्स आमतौर पर फेफड़ों की मरम्मत में मदद करती हैं, लेकिन कैंसर की मौजूदगी में ये ऐसे सिग्नल छोड़ने लगती हैं, जो ट्यूमर को बढ़ावा देते हैं. वहीं कैंसर सेल्स भी इनसे संपर्क बनाए रखती हैं, जिससे यह चक्र लगातार चलता रहता है.
क्या है बचने का उपाय?
इस समस्या के समाधान के लिए वैज्ञानिकों ने एक दवा रोफ्लुमिलास्ट का परीक्षण किया, जो पहले से ही क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज के इलाज में इस्तेमाल होती है. प्रयोगों में पाया गया कि यह दवा फेफड़ों में ट्यूमर की वृद्धि को धीमा कर सकती है, क्योंकि यह कैंसर के लिए अनुकूल माहौल को बदल देती है. यह तरीका पारंपरिक इलाज से अलग है, जहां सीधे कैंसर सेल्स को खत्म करने की कोशिश की जाती है. यहां फोकस उस सपोर्ट सिस्टम को रोकने पर है, जो कैंसर को बढ़ने में मदद करता है. फिलहाल यह रिसर्च शुरुआती चरण में है और इसे इंसानों पर लागू करने के लिए और टेस्ट जरूरी हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <title>Vitamins For Older Adults: बढ़ती उम्र में विटामिन D और B12 क्यों हैं जरूरी? उम्र को मात देने के लिए अपनाएं ये डाइट टिप्स</title>
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        <description><![CDATA[ Which Vitamins Are Important After 50: उम्र बढ़ने के साथ शरीर में कई तरह के बदलाव आने लगते हैं. इसका असर ऊर्जा, हड्डियों की मजबूती, याददाश्त और इम्यून सिस्टम पर साफ दिखाई देता है. खासकर 50 की उम्र के बाद शरीर पोषक तत्वों को पहले जितनी आसानी से एब्जॉर्ब नहीं कर पाता, इसलिए सही खानपान और विटामिन्स पर ध्यान देना बेहद जरूरी हो जाता है. विटामिन्स भले ही मात्रा में छोटे होते हैं, लेकिन शरीर को सही तरीके से चलाने में इनकी भूमिका बहुत बड़ी होती है. सही विटामिन्स मिलने से न सिर्फ बीमारियों का खतरा कम होता है, बल्कि उम्र बढ़ने के बावजूद शरीर एक्टिव और फिट बना रहता है.
विटामिन D की जरूरत
knowridge की रिपोर्ट के अनुसार, सबसे पहले बात करें विटामिन D की, जिसे सनशाइन विटामिन भी कहा जाता है. यह शरीर में तब बनता है जब त्वचा धूप के संपर्क में आती है. लेकिन उम्र बढ़ने के साथ शरीर की यह क्षमता कम हो जाती है. यही कारण है कि बुजुर्गों में इसकी कमी ज्यादा देखने को मिलती है. विटामिन D का मुख्य काम कैल्शियम को एब्जॉर्ब करना है, जो हड्डियों को मजबूत रखने के लिए जरूरी होता है. इसकी कमी से हड्डियां कमजोर हो सकती हैं और फ्रैक्चर का खतरा बढ़ जाता है. रिसर्च यह भी बताती है कि पर्याप्त विटामिन D लेने से ऑस्टियोपोरोसिस का जोखिम कम हो सकता है.
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कैल्शियम और विटामिन B12 की जरूरत
कैल्शियम भी उतना ही जरूरी है, खासकर 50 के बाद. उम्र के साथ हड्डियों का घनत्व कम होने लगता है, और महिलाओं में मेनोपॉज के बाद यह प्रक्रिया तेज हो जाती है. दूध, दही, पनीर और हरी सब्जियां कैल्शियम के अच्छे सोर्स हैं. इसके अलावा, विटामिन B12 का भी खास महत्व है. यह दिमाग के सही काम करने और रेड ब्लड सेल्स के निर्माण में मदद करता है. उम्र बढ़ने के साथ शरीर में B12 का अवशोषण कम हो जाता है, जिससे थकान, कमजोरी और याददाश्त से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं.
विटामिन &amp;nbsp;C और विटामिन E की जरूरत
विटामिन C इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाता है। यह शरीर की मरम्मत में मदद करता है और त्वचा को स्वस्थ बनाए रखता है. संतरा, स्ट्रॉबेरी, कीवी और ब्रोकोली जैसे खाद्य पदार्थ इसके अच्छे सोर्स हैं. विटामिन E एक शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट है, जो सेल्स को नुकसान से बचाता है. वहीं, विटामिन K खून के थक्के बनने और हड्डियों को मजबूत रखने में मदद करता है. पालक, केल और ब्रोकोली जैसी हरी सब्जियों में यह भरपूर मात्रा में पाया जाता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 03 Apr 2026 05:30:16 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>हार्ट अटैक से पहले शरीर देता है संकेत, क्या आप भी कर रहे हैं नजरअंदाज? </title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/हार्ट-अटैक-से-पहले-शरीर-देता-है-संकेत-क्या-आप-भी-कर-रहे-हैं-नजरअंदाज</link>
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        <description><![CDATA[ आज के समय में हार्ट अटैक एक गंभीर और तेजी से बढ़ती समस्या बन चुका है, वही अक्सर लोग सोचते हैं कि हार्ट अटैक अचानक आता है, लेकिन सच्चाई यह है कि हमारा शरीर कई हफ्तों पहले ही इसके संकेत देने लगता है, अक्सर इन लक्षणों कोहल्केमें लेने या नजरअंदाज करने की वजह से बड़ी समस्या खड़ी हो जाती है. वही वैश्विक अनुमानों को अनुसार&amp;nbsp;हृदय रोग आज भी सबसे बड़ा जानलेवा रोग बना हुआ है,&amp;nbsp;दिल से जुड़ी बीमारियां दुनिया में मौत का सबसे बड़ा कारण हैं, जिससे हर साल लगभग 1.8 करोड़ मौतें होती हैं.&amp;nbsp;
तो क्या आपका शरीर वाकई दिल का दौरा पड़ने से हफ़्तों पहले चेतावनी दे सकता है? कई मामलों में, हां.&amp;nbsp;स्ट्रक्चरल हार्ट प्रोग्राम के प्रमुख डॉ. विवेक कुमार कहते हैं कि लक्षण कई दिन या हफ़्तों पहले भी दिख सकते हैं, लेकिन वे हमेशा गंभीर नहीं होते,&amp;nbsp;यह एक अजीब तरह की थकान हो सकती है जो दूर नहीं होती, या सीने में हल्का दबाव जो आता-जाता रहता है. साथ ही&amp;nbsp; कुछ लोगों को रोज़मर्रा के काम करते समय सांस फूलने लगती है, और कुछ ऐसे भी होते हैं जिन्हें कुछ भी महसूस नहीं होता.&amp;nbsp;
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एक्सपर्ट क्या कहते हैं?
रिपोर्ट में हेल्थ एक्सपर्ट्स के अनुसार, हार्ट अटैक आने से पहले शरीर कुछ चेतावनी संकेत देता है, लेकिन लोग इन्हें सामान्य थकान या गैस समझकर इग्नोर कर देते हैं, जो आगे चल कर खतरनाक हो सकता है इसलिए अगर शरीर बार-बार कोई संकेत दे रहा है, तो उसे हल्के में लेना सही नहीं है तुरंत डॉक्टर से&amp;nbsp;संपर्क करना चाहीए.&amp;nbsp;
शुरुआती लक्षण, जिन्हें लोग कर देते हैं नजरअंदाज
दिल का दौरा पड़ने के कुछ ऐसे लक्षण होते हैं जो वास्तव में दौरा पड़ने से कई दिन या सप्ताह पहले दिखाई दे सकते हैं . इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी निदेशक डॉ. विनीत भाटिया बताते है कि&amp;nbsp; शुरुआती लक्षणों में ज्यादातर हल्के सीने में दर्द या दबाव, असामान्य थकान, सांस लेने में तकलीफ, अपच जैसी बेचैनी और जबड़े, गर्दन या पीठ तक फैलने वाला दर्द शामिल होता है, इसके अलावा सांस लेने में दिक्कत होना, दिल की धड़कन तेज या अनियमित होना और चक्कर आना एक सुरुआती संकेत है , कई मरीज बाद में बताते हैं कि उन्होंने थकान को नजरअंदाज कर दिया या सीने की तकलीफ को गैस समझकर अनदेखा कर दिया था.&amp;nbsp; जो की आगे चल कर एक दर्द नाक हार्ट अटैक का कारण बन जाता है.&amp;nbsp;
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महिलाओं में अलग हो सकते हैं लक्षण
डॉ. विवेक कुमार बताते है की&amp;nbsp; पुरुषों और महिलाओं में लक्षण अलग-अलग हो सकते हैं,&amp;nbsp; जहां पुरुषों में सीने में दर्द एक सबसे आम लक्षण होता है, वहीं महिलाओं में सीने में तेज दर्द के बजाय थकान, मतली, या सांस फूलने जैसी समस्याएं ज्यादा देखने को मिलती हैं , इसी कारण महिलाओं में हार्ट अटैक का खतरा पहचानना थोड़ा ज्यादा मुश्किल हो जाता है.&amp;nbsp;
हमेशा सही नहीं होते टेस्ट
यह संभव है कि सामान्य जांच के नतीजे नेगेटिव आ सकते है, जैसे&amp;nbsp; ईसीजी में हृदय की लय में कोई समस्या न दिखाइ दे, और रक्त परीक्षण के परिणाम सामान्य हों,&amp;nbsp;रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि कई बार सामान्य मेडिकल टेस्ट भी हार्ट अटैक के खतरे को नहीं पहचान पाते,&amp;nbsp; छिपे हुए जोखिम अप्रत्याशित रूप से उत्पन्न हो सकते हैं और&amp;nbsp; तत्काल दिल का दौरा पड़ सकता है, इसलिए शुरुआती जांच के नतीजों की परवाह किए बिना किसी भी लक्षण को कभी भी नज़रअंदाज़ न करे.&amp;nbsp;
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टेक्नोलॉजी भी कर सकती है मदद
पहनने योग्य&amp;nbsp;&amp;nbsp;स्मार्टवॉच और हेल्थ ट्रैकिंग डिवाइस आपकी हृदय गति को ट्रैक करने और उसमें होने वाली अनियमितताओं का पता लगाने में सक्षम होतो है,&amp;nbsp; जिससे आपके हृदय की स्थिति के बारे में,&amp;nbsp;ऑक्सीजन लेवल और अन्य संकेतों को मॉनिटर करने में मदद मिलती है,&amp;nbsp; हालांकि, ये उपकरण दिल के दौरे को रोकने में सक्षम नहीं होते हैं, बल्की&amp;nbsp;&amp;nbsp;शुरुआती बदलावों को पकड़ने में सहायक हो सकते हैं, जिससे समय रहते डॉक्टर से सलाह ली जा सकती है
आपको क्या करना चाहिए?&amp;nbsp;
यदि किसी व्यक्ति को कुछ मिनटों से अधिक समय तक सीने में तकलीफ महसूस हो या सांस लेने में तकलीफ, अत्यधिक पसीना आना, बार-बार यह तकलीफ हो, तो उन्हें तुरंत डॉक्टर से सहायता लेनी चाहिए, मुश्किल बात यह है कि ये लक्षण हमेशा जरूरी नहीं लगते, लेकिन अगर कुछ गड़बड़ लगे और बार-बार हो, तो ध्यान देना जरूरी है, समय पर इलाज से बड़ी समस्या को रोका जा सकता है.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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        <pubDate>Thu, 02 Apr 2026 13:30:15 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>हार्ट, अटैक, से, पहले, शरीर, देता, है, संकेत, क्या, आप, भी, कर, रहे, हैं, नजरअंदाज </media:keywords>
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        <title>Best Time To Take Vitamin D: रात में विटामिन D लेना सही या गलत, जानें आपकी नींद और हार्मोन से इसका कितना गहरा कनेक्शन?</title>
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        <description><![CDATA[ Should You Take Vitamin D At Night: विटामिन D हमारे शरीर के लिए बेहद जरूरी पोषक तत्व है. यह न सिर्फ हड्डियों को मजबूत बनाता है, बल्कि सूजन को कंट्रोल करने और नींद के पैटर्न को संतुलित रखने में भी मदद करता है. हालांकि, कई लोग यह नहीं जानते कि इसे किस समय लेना ज्यादा फायदेमंद होता है और क्या इसका असर नींद पर पड़ सकता है. चलिए आपको बताते हैं इसके बारे में विस्तार से.&amp;nbsp;
विटामिन डी रात में लेने का असर
हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली बेवसाइट health की रिपोर्ट के अनुसार, &amp;nbsp;कुछ रिसर्च यह संकेत देती हैं कि अगर विटामिन D रात में लिया जाए, तो यह शरीर में मेलाटोनिन के बनने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है. मेलाटोनिन वही हार्मोन है जो हमारे शरीर को यह संकेत देता है कि अब सोने का समय है और यह नींद-जागने के साइकिल &amp;nbsp;सर्कैडियन रिदम को नियंत्रित करता है. चूंकि विटामिन D का मुख्य सोर्स सूर्य की रोशनी है, इसलिए माना जाता है कि दिन के समय इसका स्तर ज्यादा और रात में कम होना चाहिए. इसी वजह से कुछ एक्सपर्ट्स मानते हैं कि इसे दिन के समय लेना ज्यादा बेहतर हो सकता है, ताकि शरीर का नेचुरल स्लीप साइकिल प्रभावित न हो.
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क्या होता है इसका असर?
विटामिन D का असर सेरोटोनिन नाम के हार्मोन पर भी पड़ता है, जो मूड और मेलाटोनिन दोनों से जुड़ा होता है. सामान्य मात्रा में विटामिन D सेरोटोनिन के निर्माण में मदद करता है, लेकिन अगर इसकी मात्रा बहुत ज्यादा हो जाए तो यह उल्टा असर भी डाल सकता है और सेरोटोनिन का स्तर कम कर सकता है. हालांकि, दूसरी तरफ कुछ स्टडीज यह भी बताती हैं कि विटामिन D की कमी से नींद की गुणवत्ता खराब हो सकती है. जिन लोगों के शरीर में इसका स्तर कम होता है, उनमें स्लीप डिसऑर्डर और कम नींद की समस्या ज्यादा देखी गई है.
इस बात का रखें ध्यान
इसका एक और पहलू यह है कि विटामिन D एक फैट-सोल्युबल विटामिन है, यानी यह शरीर में बेहतर तरीके से तब एब्जॉर्ब होता है जब इसे फैट वाली चीजों के साथ लिया जाए. इसलिए इसे नाश्ते या ऐसे भोजन के साथ लेना बेहतर माना जाता है, जिसमें हेल्दी फैट मौजूद हो. &amp;nbsp;इसे दिन के किसी भी समय लिया जा सकता है, लेकिन अगर रात में लेने से नींद पर असर महसूस हो, तो इसे दिन में लेना बेहतर रहेगा. सबसे जरूरी बात यह है कि इसे नियमित रूप से लिया जाए, क्योंकि सही स्तर बनाए रखना ही इसके असली फायदे देता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 02 Apr 2026 13:30:14 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>ये पांच आदतें अपना लीं तो पक्का होगी नॉर्मल डिलीवरी, जानिए किस तरह से रखना होगा अपना ख्याल?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/ये-पांच-आदतें-अपना-लीं-तो-पक्का-होगी-नॉर्मल-डिलीवरी-जानिए-किस-तरह-से-रखना-होगा-अपना-ख्याल</link>
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        <description><![CDATA[ प्रेग्नेंसी हर महिला के जीवन का एक खास समय होता है, इस दौरान मां और बच्चे दोनों की सेहत का खास ध्यान रखना बहुत जरूरी होता है, ज्यादातर महिलाएं चाहती हैं कि उनकी डिलीवरी नॉर्मल हो, &amp;nbsp;क्योकि अक्सर महिलाओं का मानना होता है कि सी-सेक्शन के मुकाबले नॉर्मल डिलीवरी के बाद रिकवरी जल्दी होती है, ऐसे मे अगर आप भी गर्भवती हैं और नॉर्मल डिलीवरी की इच्छा रखती हैं, तो इसके लिए सिर्फ किस्मत नहीं बल्कि सही आदतें और देखभाल भी बहुत जरूरी होती है, आपको अपनी डेली रूटीन में कुछ जरूरी आदतों को शामिल करना होगा, क्योंकि इससे आपको नॉर्मल डिलीवरी की संभावना बढ़ाने में मदद मिलेगी. अगर गर्भावस्था के दौरान कुछ अच्छी आदतें अपना ली जाएं, तो नॉर्मल डिलीवरी के चांस काफी बढ़ &amp;nbsp;जाता है, आइए जानते हैं ऐसी 5 जरूरी आदतों के बारे में.&amp;nbsp;
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शुरुआत से करें &amp;nbsp;हल्की एक्सरसाइज
प्रेग्नेंसी में हल्की-फुल्की एक्सरसाइज करना बहुत फायदेमंद होता है, &amp;nbsp;जैसे महिलाओं को दिन की शुरुआत से ही ब्रीदिंग एक्सरसाइज करनी चाहिए, साथ ही वॉक करना, प्रेग्नेंसी योग या स्ट्रेचिंग करना &amp;nbsp;इससे शरीर एक्टिव रहता है और शरीर, मन दोनों को शांत करने में मदद करता है साथ ही डिलीवरी के समय ज्यादा ताकत मिलती है, &amp;nbsp;ध्यान रखें कि कोई भी एक्सरसाइज करने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लें&amp;nbsp;
हेल्दी और संतुलित आहार लें&amp;nbsp;
प्रेग्नेंसी के दौरान महिलाओं को अपनी डाइट का खास ध्यान रखना चाहिए, नॉर्मल डिलीवरी के लिए सही खान-पान बहुत जरूरी है, अपनी डाइट में हल्का और पोषक तत्वों से भरपूर भोजन शामिल करें जैसे हरी सब्जियां, फल, दूध, दाल और प्रोटीन वाली चीजें, इसके अलावा मसालेदार, जंक फूड और तला-भुने खाने से परहेज करना बेहतर होता है. ताकि पाचन सही बना रहे &amp;nbsp;और सही पोषण से मां और बच्चे दोनों स्वस्थ रहते हैं.&amp;nbsp;
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पानी भरपूर मात्रा में पिएं&amp;nbsp;
प्रेग्नेंसी के दौरान शरीर को हाइड्रेट रखना बेहद जरूरी है, ऐसा करने &amp;nbsp;से शरीर में एनर्जी बनी रहती है और कई समस्याओं से बचाव होता है, दिनभर में 8-10 गिलास पानी जरूर पिएं, साथ ही प्रेग्नेंसी के दौरान पेट मे अनपच की समस्या आम होती है, ऐसे मे भरपूर मात्रा मे पानी पिने से गैस कि भारी समस्या से भी राहत मिलती है.&amp;nbsp;
तनाव से दूर रहें
अकसर गर्भावस्था के दौरान &amp;nbsp;मां &amp;nbsp;डिलीवरी &amp;nbsp;के बारे मे सोचती रहती है जिसकी वजह से वो तनाव मे रहती है साथ ही डिलीवरी तनाव का असर सीधे मां और बच्चे दोनों पर पड़ता है, &amp;nbsp;इसलिए कोशिश करना चाहिए कि खुश रहें,हमेशा पॉजिटिव सोच रखें और ज्यादा चिंता न करें, ज्यादा सोचना आपके सेहत पर असर कर सकता है. इससे बचने के लिए &amp;nbsp;म्यूजिक सुनना, मेडिटेशन करना या परिवार के साथ समय बिताना चाहिए जो तनाव कम करने में मदद करता है.&amp;nbsp;
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नियमित डॉक्टर चेकअप कराएं
अक्सर काफी महीलाएं घर के काम काज के वजह से डॉक्टर से चेकअप कराने नही जा पाती ऐसे मे आपको बता दे की &amp;nbsp;प्रेग्नेंसी के दौरान समय-समय पर डॉक्टर से चेकअप कराना बहुत जरूरी है, &amp;nbsp;इससे बच्चे की ग्रोथ और मां की सेहत का पता चलता रहता है, और &amp;nbsp;डिलीवरी का अनुमान भी लगता है, साथ ही अगर कोई समस्या हो तो समय रहते इलाज किया जा सकता है.
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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        <pubDate>Thu, 02 Apr 2026 13:30:14 +0530</pubDate>
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        <title>Laptop On Lap Male Fertility: क्या लैपटॉप गोद में रखकर काम करने से नामर्द हो जाते हैं पुरुष, जानें क्या कहते हैं एक्सपर्ट?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/laptop-on-lap-male-fertility-क्या-लैपटॉप-गोद-में-रखकर-काम-करने-से-नामर्द-हो-जाते-हैं-पुरुष-जानें-क्या-कहते-हैं-एक्सपर्ट</link>
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        <description><![CDATA[ Does Laptop On Lap Reduce Sperm Count: क्या लैपटॉप गोद में रखकर काम करने से पुरुष नामर्द हो सकते हैं? यह सवाल अक्सर लोगों के मन में आता है. &amp;nbsp;एक्सपर्ट के मुताबिक, सीधे तौर पर नामर्द होने जैसी बात कहना सही नहीं है, लेकिन यह आदत पुरुषों की फर्टिलिटी यानी प्रजनन क्षमता पर असर जरूर डाल सकती है. चलिए आपको बताते हैं कि कैसे और क्यों इसका असर होता है.&amp;nbsp;
क्या होता है असर?
verywellhealth की एक रिपोर्ट के अनुसार, जब कोई व्यक्ति लैपटॉप को जांघों या गोद में रखकर लंबे समय तक काम करता है, तो उससे निकलने वाली गर्मी और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड शरीर के संवेदनशील हिस्सों को प्रभावित कर सकती है. साइंटिस्ट ने खासतौर पर दो कारणों पर ध्यान दिया है हीट और रेडिएशन जैसी ऊर्जा तरंगें. इनका असर होता है.&amp;nbsp;
गर्मी का क्या होता है असर?
सबसे पहले बात गर्मी की करें तो टेस्टिकल्स को सही तरीके से काम करने के लिए शरीर के तापमान से थोड़ा ठंडा रहना जरूरी होता है. यही वजह है कि स्क्रोटम उन्हें बाहर की ओर रखकर तापमान संतुलित करता है. लेकिन लैपटॉप की गर्मी इस संतुलन को बिगाड़ देती है. 2005 की एक स्टडी में पाया गया कि लैपटॉप गोद में रखने से स्क्रोटम का तापमान करीब 2.8 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है, जिससे स्पर्म बनने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है और उनकी गुणवत्ता भी गिर सकती है.
इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड का क्या होता है असर?
दूसरी चिंता इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड को लेकर है. ये अदृश्य ऊर्जा तरंगें लैपटॉप, वाई-फाई और मोबाइल जैसे उपकरणों से निकलती हैं. कुछ रिसर्च में पाया गया है कि वाई-फाई के संपर्क में आने से स्पर्म के डीएनए को नुकसान पहुंच सकता है और उनकी गति धीमी हो सकती है. जबकि किसी भी स्पर्म के लिए अंडे तक पहुंचने के लिए तेज और सही दिशा में मूव करना जरूरी होता है.
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कैसे पड़ता है फर्क?&amp;nbsp;
कई स्टडी में यह भी सामने आया है कि लंबे समय तक ऐसे एक्सपोजर से स्पर्म काउंट कम हो सकता है, उनके आकार और बनावट में बदलाव आ सकता है, और जेनेटिक स्तर पर भी असर पड़ सकता है. हालांकि, एक्सपर्ट यह भी कहते हैं कि लैपटॉप के इस्तेमाल और पुरुष बांझपन के बीच सीधा संबंध अभी पूरी तरह साबित नहीं हुआ है और इस पर और रिसर्च की जरूरत है. इसके साथ ही ढीले कपड़े पहनना, बहुत गर्म पानी से नहाने या सॉना से बचना और हेल्दी वेट बनाए रखना भी फर्टिलिटी को सुरक्षित रखने में मदद कर सकता है. छोटे-छोटे ये बदलाव आपकी सेहत पर बड़ा असर डाल सकते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 02 Apr 2026 01:30:19 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Laptop, Lap, Male, Fertility:, क्या, लैपटॉप, गोद, में, रखकर, काम, करने, से, नामर्द, हो, जाते, हैं, पुरुष, जानें, क्या, कहते, हैं, एक्सपर्ट</media:keywords>
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        <title>Blue Light Effects On Sleep: सिर्फ मोबाइल छोड़ना काफी नहीं, आपका लैपटॉप और ऑफिस की &amp;apos;सफेद रोशनी&amp;apos; भी छीन रही है नींद</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/blue-light-effects-on-sleep-सिर्फ-मोबाइल-छोड़ना-काफी-नहीं-आपका-लैपटॉप-और-ऑफिस-की-सफेद-रोशनी-भी-छीन-रही-है-नींद</link>
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        <description><![CDATA[ Why Less Phone Use Doesn&amp;rsquo;t Improve Sleep:&amp;nbsp;आजकल बहुत से लोग यह सोचकर सुकून महसूस करते हैं कि उन्होंने फोन का इस्तेमाल कम कर दिया है, इसलिए उनकी नींद और मेंटल हेल्थ बेहतर हो जाएगी. लेकिन असलियत इससे थोड़ी अलग है. आधुनिक ऑफिस लाइफ में स्क्रीन से दूरी बनाना इतना आसान नहीं है, क्योंकि लैपटॉप, मीटिंग्स और तेज रोशनी लगातार दिमाग को एक्टिव बनाए रखते हैं. चलिए आपको बताते हैं कि मोबाइल के अलावा और क्या है कारण.&amp;nbsp;
ईमेल भी है कारण
सुबह की शुरुआत ईमेल से होती है और दिन भर स्क्रीन के सामने बैठकर काम चलता रहता है. ऊपर से ऑफिस की तेज, सफेद रोशनी भी दिन जैसी ही लगती है. ऐसे में शरीर को यह संकेत ही नहीं मिल पाता कि अब आराम का समय है. नतीजा यह होता है कि रात में नींद हल्की लगती है, दिमाग शांत नहीं होता और सुबह उठना भारी महसूस होता है.
&amp;nbsp;छिपे हुए स्क्रीन एक्सपोजर
यह समस्या सिर्फ ज्यादा फोन चलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि छिपे हुए स्क्रीन एक्सपोजर से जुड़ी है. एक सामान्य ऑफिस जॉब में 6 से 10 घंटे तक स्क्रीन देखना आम बात है. फर्क सिर्फ इतना है कि यह काम का हिस्सा होता है, इसलिए लोग इसे नजरअंदाज कर देते हैं. लेकिन दिमाग के लिए स्क्रीन स्क्रीन ही होती है, चाहे वह काम की हो या मनोरंजन की.&amp;nbsp;
क्या कहते हैं एक्सपर्ट
डॉ. नेहा कपूर बताती हैं कि लोग अक्सर सोचते हैं कि फोन कम इस्तेमाल करने से वे स्क्रीन के नुकसान से बच जाएंगे, जबकि ऑफिस में लैपटॉप और कमरे की रोशनी भी शरीर की जैविक घड़ी को प्रभावित करती है. इससे मेलाटोनिन हार्मोन बनने में रुकावट आती है, जो नींद के लिए बेहद जरूरी है. &amp;nbsp;जब मेलाटोनिन का स्तर प्रभावित होता है, तो सोने का समय आगे खिसक जाता है. भले ही आप समय पर बिस्तर पर चले जाएं, लेकिन दिमाग ऑफ नहीं हो पाता. यही वजह है कि कई लोग थकान के बावजूद देर तक जागते रहते हैं.
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नींद होती है प्रभावित&amp;nbsp;
इस बात को कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं भी मान चुकी हैं. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ की रिपोर्ट के अनुसार, शाम के समय ब्लू लाइट का एक्सपोजर मेलाटोनिन को कम कर देता है और नींद की क्वालिटी खराब करता है. &amp;nbsp;वहीं सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन भी मानता है कि सोने से पहले स्क्रीन का इस्तेमाल नींद को प्रभावित करता है. सिर्फ रोशनी ही नहीं, बल्कि लगातार मानसिक सक्रियता भी एक बड़ी वजह है. दिन भर ईमेल, मैसेज और मीटिंग्स दिमाग को पूरी तरह शांत नहीं होने देते. इसका असर धीरे-धीरे दिखता है, फोकस कम होने लगता है, याददाश्त कमजोर पड़ती है और मूड में बदलाव आने लगता है.
बचने के लिए क्या हैं उपाय
हालांकि इससे बचने के लिए कुछ छोटे बदलाव काफी मदद कर सकते हैं. हर 20 मिनट में कुछ सेकंड के लिए स्क्रीन से नजर हटाना, शाम के समय स्क्रीन की ब्राइटनेस कम करना, सोने से पहले 45-60 मिनट का गैप रखना और कमरे की लाइट हल्की करना, ये सभी आदतें नींद को बेहतर बना सकती हैं. &amp;nbsp;एक्सपर्ट्स यही कहते हैं कि नींद को हल्के में नहीं लेना चाहिए. यह सिर्फ आराम नहीं, बल्कि दिमाग के सही तरीके से काम करने के लिए जरूरी प्रक्रिया है. छोटी-छोटी आदतें बदलकर भी आप अपनी नींद और मेंटल सेहत को बेहतर बना सकते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 02 Apr 2026 01:30:18 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Blue, Light, Effects, Sleep:, सिर्फ, मोबाइल, छोड़ना, काफी, नहीं, आपका, लैपटॉप, और, ऑफिस, की, सफेद, रोशनी, भी, छीन, रही, है, नींद</media:keywords>
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        <title>Why Do I Get Headaches: बार&amp;बार होने वाला सिरदर्द मामूली नहीं, शरीर दे रहा ये 5 बड़े संकेत; आप तो नहीं कर रहे नजरअंदाज</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/why-do-i-get-headaches-बार-बार-होने-वाला-सिरदर्द-मामूली-नहीं-शरीर-दे-रहा-ये-5-बड़े-संकेत-आप-तो-नहीं-कर-रहे-नजरअंदाज</link>
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        <description><![CDATA[ Why Am I Getting Headaches Frequently: अगर आपको बार-बार सिरदर्द होता है, तो हो सकता है आपने इसे कई बार नजरअंदाज किया हो. कभी काम का दबाव, कभी ज्यादा स्क्रीन टाइम, तो कभी नींद की कमी और एक पेनकिलर लेकर बात खत्म लेकिन जब सिरदर्द बार-बार होने लगे, तो यह सिर्फ एक साधारण परेशानी नहीं, बल्कि शरीर का संकेत भी हो सकता है कि कुछ ठीक नहीं चल रहा. चलिए आपको बताते हैं कि सरदर्द की दिक्कत क्यों होती है और इससे शरीर में किस कमी का पता चलता है.&amp;nbsp;
क्या होता है कारण?
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर्स एंड स्ट्रोक की रिपोर्ट के अनुसार, इसके कई कारण हो सकते हैं. कभी यह तनाव से जुड़ा होता है, तो कभी आपकी डेली रूटीन, पानी की कमी, नींद या खानपान से. इसलिए इसे नजरअंदाज करने के बजाय यह समझना जरूरी है कि आखिर इसके पीछे वजह क्या है. इसमें सबसे आम कारणों में से एक है तनाव. यह हमेशा खुलकर महसूस नहीं होता, बल्कि धीरे-धीरे जमा होता रहता है, काम का दबाव, जिम्मेदारियां या दिमाग में चलती चिंताएं. यह तनाव गर्दन, कंधों और जबड़े की मांसपेशियों को टाइट कर देता है, जो धीरे-धीरे सिरदर्द में बदल जाता है. ऐसा दर्द अक्सर सिर के चारों ओर भारीपन या दबाव जैसा महसूस होता है.
पानी की कमी
दूसरा बड़ा कारण है पानी की कमी. दिनभर में कई लोग पर्याप्त पानी नहीं पीते और कॉफी या चाय को ही पर्याप्त समझ लेते हैं. लेकिन शरीर को जब पर्याप्त पानी नहीं मिलता, तो उसका असर सिरदर्द के रूप में दिख सकता है. ऐसे सिरदर्द में भारीपन और सुस्ती महसूस होती है, जो खासकर दोपहर के समय बढ़ जाती है.&amp;nbsp;
स्कीन का ज्यादा यूज
आज के समय में स्क्रीन का ज्यादा इस्तेमाल भी सिरदर्द की बड़ी वजह बन गया है. लंबे समय तक मोबाइल, लैपटॉप या टीवी देखने से आंखों पर दबाव पड़ता है, जिससे आंखों के पीछे या माथे में दर्द होने लगता है. अगर थोड़ी देर आंखें बंद करने या स्क्रीन से दूर रहने पर आराम मिले, तो यह साफ संकेत है कि आंखों को आराम की जरूरत है.&amp;nbsp;
नींद की कमी भी कारण
नींद की कमी या खराब नींद भी सिरदर्द को बढ़ा सकती है. सिर्फ घंटों की नींद ही नहीं, बल्कि उसकी क्वालिटी भी मायने रखती है. अगर आप रात में बार-बार जागते हैं, देर तक मोबाइल चलाते हैं या नींद पूरी नहीं होती, तो सुबह उठते ही सिर भारी लग सकता है.
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खाना भी हो सकता है कारण
इसके अलावा, भोजन छोड़ना या देर से खाना भी सिरदर्द का कारण बन सकता है. जब लंबे समय तक खाना नहीं खाया जाता, तो ब्लड शुगर गिरने लगता है, जिससे सिरदर्द, कमजोरी और चक्कर जैसी समस्या हो सकती है.
कब ज्यादा दिक्कत?
हालांकि ज्यादातर सिरदर्द खतरनाक नहीं होते, लेकिन अगर यह बार-बार होने लगे या पहले से ज्यादा तेज हो जाए, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. बेहतर है कि आप अपनी डेली रूटीन पर ध्यान दें कि कब दर्द होता है, किस वजह से बढ़ता है और क्या करने से कम होता है. छोटे-छोटे बदलाव जैसे पर्याप्त पानी पीना, समय पर सोना, स्क्रीन से ब्रेक लेना और तनाव को संभालना, ये सब मिलकर सिरदर्द की समस्या को काफी हद तक कम कर सकते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 02 Apr 2026 01:30:16 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Why, Get, Headaches:, बार-बार, होने, वाला, सिरदर्द, मामूली, नहीं, शरीर, दे, रहा, ये, बड़े, संकेत, आप, तो, नहीं, कर, रहे, नजरअंदाज</media:keywords>
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        <title>Benefits Of Vigorous Exercise: कसरत ऐसी करो कि फूलने लगे सांस, इससे 60% कम हो जाता है मौत का खतरा!</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/benefits-of-vigorous-exercise-कसरत-ऐसी-करो-कि-फूलने-लगे-सांस-इससे-60-कम-हो-जाता-है-मौत-का-खतरा</link>
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        <description><![CDATA[ Does Intense Exercise Lower Death Risk: अगर आप रोजाना कुछ मिनट भी ऐसी कसरत करते हैं, जिसमें आपकी सांस फूलने लगे, तो यह आपके शरीर के लिए बेहद फायदेमंद साबित हो सकती है. यूरोपियन हार्ट जर्नल में प्रकाशित एक रिसर्च के मुताबिक, ऐसी तेज फिजिकल एक्टिविटी कई गंभीर बीमारियों के खतरे को कम कर सकती है. रिसर्च में पाया गया कि जो लोग रोज कुछ मिनट भी तेज कसरत करते हैं. जैसे तेज चलना, सीढ़ियां चढ़ना या दौड़ना, उनमें आर्थराइटिस, हार्ट डिजीज और डिमेंशिया जैसी बीमारियों का खतरा काफी कम होता है. खास बात यह है कि इसके लिए घंटों जिम में पसीना बहाना जरूरी नहीं, बल्कि छोटे-छोटे एक्टिव मूवमेंट भी असर दिखाते हैं.&amp;nbsp;
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
इस स्टडी के प्रमुख रिसर्चर &amp;nbsp;प्रोफेसर Minxue Shen के अनुसार, ऐसी कसरत शरीर में ऐसे बदलाव लाती है, जो हल्की-फुल्की एक्सरसाइज से नहीं मिलते. जब आप इतनी तेजी से एक्टिव होते हैं कि सांस फूलने लगे, तो दिल ज्यादा प्रभावी तरीके से खून पंप करता है, ब्लड वेसल्स ज्यादा लचीली बनती हैं और शरीर ऑक्सीजन का बेहतर इस्तेमाल करने लगता है.
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इन लोगों को किया गया शामिल&amp;nbsp;
रिसर्च में करीब 96 हजार लोगों के डेटा का एनालिसिस किया गया. इसमें देखा गया कि उनकी रोजमर्रा की एक्टिविटी और खासकर तेज कसरत का उनकी सेहत पर क्या असर पड़ता है. इसके लिए प्रतिभागियों को एक हफ्ते तक खास डिवाइस पहनाई गई, जिससे उनकी गतिविधियों को सटीक तरीके से रिकॉर्ड किया गया. इसके बाद लगभग सात साल तक उनकी हेल्थ को ट्रैक किया गया. इस दौरान शोधकर्ताओं ने पाया कि जो लोग ज्यादा विगोरस एक्टिविटी करते थे, उनमें कई बीमारियों का खतरा कम था. खास तौर पर डिमेंशिया का खतरा 63 प्रतिशत तक कम, टाइप-2 डायबिटीज का खतरा 60 प्रतिशत तक कम और मौत का खतरा 46 प्रतिशत तक कम पाया गया.
इन बीमारियों में मायने रखती है स्पीड
रिसर्च में यह भी सामने आया कि अलग-अलग बीमारियों पर इसका असर अलग तरीके से होता है. जैसे आर्थराइटिस और सोरायसिस जैसी सूजन से जुड़ी बीमारियों में एक्सरसाइज की तीव्रता ज्यादा मायने रखती है, जबकि डायबिटीज और लिवर डिजीज में एक्सरसाइज की मात्रा और तीव्रता दोनों अहम होती हैं. यह रिसर्च बताती है कि दिन में कुछ मिनट की तेज कसरत भी आपकी सेहत में बड़ा बदलाव ला सकती है.&amp;nbsp; हालांकि, एक्सपर्ट ने यह भी चेतावनी दी है कि हर किसी के लिए तेज कसरत सही नहीं होती. खासकर बुजुर्गों या पहले से किसी बीमारी से जूझ रहे लोगों को अपनी क्षमता के अनुसार ही एक्सरसाइज करनी चाहिए और जरूरत पड़े तो डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 01 Apr 2026 09:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Benefits, Vigorous, Exercise:, कसरत, ऐसी, करो, कि, फूलने, लगे, सांस, इससे, 60, कम, हो, जाता, है, मौत, का, खतरा</media:keywords>
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        <title>Kidney Stone Symptoms: सिर्फ दर्दनाक नहीं, जानलेवा भी हो सकता है किडनी स्टोन, जानें सेप्सिस कब बन जाता है असली दुश्मन?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/kidney-stone-symptoms-सिर्फ-दर्दनाक-नहीं-जानलेवा-भी-हो-सकता-है-किडनी-स्टोन-जानें-सेप्सिस-कब-बन-जाता-है-असली-दुश्मन</link>
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        <description><![CDATA[ When Kidney Stones Become Life Threatening: किडनी स्टोन आज के समय में एक आम समस्या बन चुकी है. नेशनल किडनी फाउंडेशन के अनुसार, हर 10 में से 1 व्यक्ति को जीवन में कभी न कभी किडनी स्टोन की समस्या होती है. अधिकतर मामलों में किडनी स्टोन दर्दनाक जरूर होता है, लेकिन जानलेवा नहीं. असली खतरा तब पैदा होता है, जब यह यूरिन के रास्ते को ब्लॉक कर देता है या किडनी में इंफेक्शन फंसा देता है.&amp;nbsp;
क्या होती है दिक्कत?
2024 की एक मेडिकल रिव्यू के मुताबिक, ब्लॉक और इंफेक्शन वाले स्टोन तेजी से सेप्सिस जैसी गंभीर स्थिति पैदा कर सकते हैं, अगर समय पर इलाज न मिले. एक्सपर्ट किडनी स्टोन से मौत बहुत कम मामलों में होती है, लेकिन यह संभव है, खासकर जब दिक्कतें बढ़ जाती हैं. &amp;nbsp;सबसे खतरनाक स्थिति तब होती है जब किडनी में ब्लॉकेज के साथ इंफेक्शन हो जाता है, जिसे ऑब्स्ट्रक्टिव पायलोनेफ्राइटिस या पायोनेफ्रोसिस कहा जाता है.&amp;nbsp;
इसे भी पढ़ें -&amp;nbsp;Panic Attack Treatment: क्या होता है पैनिक अटैक, जानें इससे निपटने के लिए क्या हैं सबसे आसान तरीके?
एक्सपर्ट के मुताबिक, जब स्टोन यूरेटर में फंस जाता है, तो यूरिन का प्रवाह रुक जाता है. इससे किडनी में दबाव बढ़ता है, सूजन आती है और बैक्टीरिया तेजी से बढ़ने लगते हैं. अगर इस स्थिति में इंफेक्शन हो जाए, तो एंटीबायोटिक दवाएं भी ठीक से काम नहीं कर पातीं और सेप्सिस का खतरा बढ़ जाता है.&amp;nbsp;
इ़लाज में देरी से स्थिति गंभीर&amp;nbsp;
रिपोर्ट्स बताती हैं कि अगर ऐसे मामलों में इलाज में देरी हो जाए, तो स्थिति गंभीर हो सकती है. जर्नल ऑफ नेपाल मेडिसिन एसोसिएसन के अनुसार, ऐसी स्थिति में तुरंत ड्रेनेज सर्जरी के जरिए यूरिन निकालना जरूरी होता है, क्योंकि सिर्फ दवाओं से इलाज संभव नहीं होता. किडनी स्टोन कब खतरनाक हो सकता है, इसे पहचानना बेहद जरूरी है. Mayo Clinic के अनुसार, अगर तेज दर्द के साथ बुखार, ठंड लगना, पेशाब में जलन या बदबू, उल्टी या पेशाब कम होना जैसे लक्षण दिखें, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए.
क्या है बचाव का रास्ता?
इसके अलावा, बड़े स्टोन 7 मिमी या उससे ज्यादा यूरिन के रास्ते को ज्यादा आसानी से ब्लॉक कर सकते हैं. यूरोपियन रेडियोलॉजी के अनुसार, छोटे स्टोन खुद निकल सकते हैं, लेकिन बड़े स्टोन के लिए इलाज जरूरी हो सकता है. डॉ. विशाल का कहना है कि समय पर इलाज से किडनी स्टोन की दिक्कतों को लगभग पूरी तरह रोका जा सकता है. ज्यादा पानी पीना, लक्षणों को नजरअंदाज न करना और समय पर जांच कराना सबसे जरूरी कदम हैं. किडनी स्टोन आमतौर पर जानलेवा नहीं होता, लेकिन अगर यह यूरिन के रास्ते को ब्लॉक कर दे और इंफेक्शन हो जाए, तो स्थिति तेजी से गंभीर बन सकती है. ऐसे में समय पर इलाज ही सबसे बड़ा बचाव है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 31 Mar 2026 17:30:44 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Early Signs before Serious Illness: चेकअप में सबकुछ नॉर्मल, फिर भी दिनभर रहती है सुस्ती और थकान? जानें दिक्कत की असली वजह</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/early-signs-before-serious-illness-चेकअप-में-सबकुछ-नॉर्मल-फिर-भी-दिनभर-रहती-है-सुस्ती-और-थकान-जानें-दिक्कत-की-असली-वजह</link>
        <guid>https://hindi.attentionindia.com/early-signs-before-serious-illness-चेकअप-में-सबकुछ-नॉर्मल-फिर-भी-दिनभर-रहती-है-सुस्ती-और-थकान-जानें-दिक्कत-की-असली-वजह</guid>
        <description><![CDATA[ अक्सर कई लोग अलग ही प्रकार की बेचैनी, थकान और सुस्ती से ग्रस्त रहते हैं. ऐसा महसूस होता है मानो शरीर में जान ही नहीं है. पूरी नींद सोने के बाद भी आलस और थकान बनी रहती है, जबकि अगर चेकअप कराओ तो रिपोर्ट्स एकदम नॉर्मल आती हैं.
KIMS अस्पताल के प्रमुख और वरिष्ठ सलाहकार डॉ. एस.एम. फयाज बताते हैं - हमेशा थकान महसूस होना, चक्कर आना, कम नींद आना, बिना किसी समस्या के शरीर में दर्द, सोचने-समझने की शक्ति कम महसूस होना, यह सब कोई सामान्य चीजें नहीं हैं, इन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, बल्कि यह किसी गंभीर समस्या की चेतावनी हो सकती हैं.&amp;nbsp;हमारा शरीर रातोंरात किसी गंभीर समस्या से ग्रस्त नहीं होता, बल्कि यह किसी गंभीर बीमारी के आने से पहले धीरे-धीरे संकेत देता है, ये संकेत ज्यादा गंभीर तो नहीं होते, लेकिन निरंतर जरूर होते हैं.
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जब आप ठीक महसूस नहीं करते, फिर भी रिपोर्ट सामान्य क्यों आती है?
अधिकतर टेस्ट बड़ी या स्पष्ट बीमारियों को पकड़ने के लिए बनाए जाते हैं, न कि शरीर के शुरुआती लक्षणों को पहचानने के लिए. डॉ. फयाज के अनुसार, शरीर की कई समस्याएं जैसे मेटाबॉलिज्म में बदलाव, पाचन की दिक्कत, थायरॉइड की समस्या और इंसुलिन रेजिस्टेंस-ये सब शुरुआती स्तर पर नजर नहीं आतीं. इसका सीधा मतलब यह है कि थायरॉइड और ब्लड शुगर दिनभर घट-बढ़ सकते हैं, लेकिन उनके साफ लक्षण दिखाई नहीं देते. ICMR के अनुसार मेटाबॉलिक समस्याएं धीरे-धीरे और बिना शोर के बढ़ती हैं. वहीं NIH भी मानता है कि कई बार बड़ी बीमारी का पता चलने से पहले ही शरीर के अंदर बदलाव शुरू हो जाते हैं, यही कारण है कि इंसान बीमार महसूस करता है, लेकिन उसकी रिपोर्ट सामान्य आती है.
छिपी हुई वे समस्याएं जिन्हें आसानी से नजरअंदाज कर दिया जाता है
डॉ. फयाज बताते हैं कि कुछ सामान्य समस्याएं, जिन्हें हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं, जैसे विटामिन B12 और विटामिन D की कमी, थायरॉइड में बदलाव और सही से नींद न आना. ये बदलाव छोटे होते हैं, लेकिन शरीर पर काफी असर डालते हैं. जैसे विटामिन की कमी से कमजोरी और मूड पर असर पड़ता है, पानी की कमी से थकान और सिरदर्द हो सकता है, और नींद पूरी न होने से शरीर में ऊर्जा की कमी हो जाती है, जब ये समस्याएं धीरे-धीरे बढ़ती हैं, तब जाकर इनके लक्षण साफ तौर पर महसूस होने लगते हैं.
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बार-बार टेस्ट से बेहतर जीवनशैली सुधारें और स्वस्थ रहें
ऐसे लक्षणों में बार-बार टेस्ट कराने से बेहतर है जीवनशैली पर ध्यान दें. डॉ. फयाज के अनुसार, नींद, खान-पान, पानी, व्यायाम और तनाव का सही संतुलन रखना ज्यादा फायदेमंद होता है. साथ ही, इन लक्षणों को पहचानना भी जरूरी है. कौन से लक्षण कब होते हैं, क्यों होते हैं और कितनी देर तक रहते हैं. छोटे-छोटे सुधार जैसे अच्छी नींद, सही डाइट और नियमित व्यायाम बड़ी समस्याओं को रोक सकते हैं. अगर लक्षण लंबे समय तक बने रहें, तो डॉक्टर से सलाह लें और उन्हें नजरअंदाज ना करें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 31 Mar 2026 17:30:42 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Early, Signs, before, Serious, Illness:, चेकअप, में, सबकुछ, नॉर्मल, फिर, भी, दिनभर, रहती, है, सुस्ती, और, थकान, जानें, दिक्कत, की, असली, वजह</media:keywords>
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        <title>Blood Clots In Legs Causes: पैरों में क्यों जमा हो जाते हैं खून के थक्के? वैज्ञानिकों ने बता दी डराने वाली वजह</title>
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        <description><![CDATA[ Why Do Blood Clots Form In Legs: पैरों में अचानक दर्द, सूजन या भारीपन महसूस होना कई बार साधारण समस्या लग सकता है, लेकिन इसके पीछे खून के थक्के बनने जैसी गंभीर वजह भी हो सकती है. मेडिकल भाषा में इसे वेनस थ्रॉम्बोसिस कहा जाता है, जिसमें खून गाढ़ा होकर नसों में जमने लगता है और ब्लॉकेज पैदा कर देता है. अगर यही थक्का टूटकर फेफड़ों तक पहुंच जाए, तो यह जानलेवा स्थिति यानी पल्मोनरी एम्बोलिज्म का कारण बन सकता है.
क्या निकली है दिक्कत?
हाल ही में लुंड विश्वविद्यालय के साइंटिस्ट की एक रिसर्च में इस समस्या को लेकर चौंकाने वाली बात सामने आई है. इस स्टडी में पाया गया कि सिर्फ लाइफस्टाइल ही नहीं, बल्कि कुछ खास जीन भी खून के थक्के बनने के खतरे को काफी बढ़ा सकते हैं. यह रिसर्च &quot;माल्मो डाइट एंड कैंसर स्टडी&quot; के तहत करीब 30 हजार लोगों के डेटा पर की गई. इसमें वैज्ञानिकों ने 27 ऐसे जीन का अध्ययन किया, जो ब्लड क्लॉटिंग से जुड़े होते हैं. &amp;nbsp;एनालिसिस के बाद तीन प्रमुख जीन ABO, F8 और VWF की पहचान की गई, जो इस खतरे को बढ़ाते हैं.
रिसर्च के अनुसार, इनमें से हर एक जीन अकेले 10 से 30 प्रतिशत तक जोखिम बढ़ा सकता है. लेकिन अगर किसी व्यक्ति में ऐसे कई जेनेटिक फैक्टर एक साथ मौजूद हों, तो खतरा काफी ज्यादा बढ़ जाता है. जिन लोगों में पांच तक ऐसे जोखिम कारक पाए गए, उनमें ब्लड क्लॉट बनने का खतरा 180 प्रतिशत तक ज्यादा देखा गया. यह खोज इस बात को समझने में मदद करती है कि कुछ लोग बिना किसी स्पष्ट वजह के भी इस समस्या का शिकार क्यों हो जाते हैं. साइंटिस्ट ने यह भी बताया कि &quot;फैक्टर V लीडेन&quot; नाम का एक जेनेटिक म्यूटेशन पहले से जाना जाता है, जो खून के थक्के बनने की प्रवृत्ति को बढ़ाता है.
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लाइफस्टाइल की अहम भूमिका
हालांकि, सिर्फ जीन ही नहीं, लाइफस्टाइल भी इसमें अहम भूमिका निभाता है. लंबे समय तक एक ही जगह बैठे रहना, जैसे लंबी फ्लाइट या सर्जरी के बाद बेड रेस्ट, ब्लड फ्लो को धीमा कर देता है और थक्के बनने का खतरा बढ़ा देता है. इसके अलावा मोटापा, बढ़ती उम्र और ज्यादा लंबाई भी इस जोखिम को बढ़ाने वाले कारक माने गए हैं. खानपान भी इसमें भूमिका निभा सकता है. कुछ स्टडीज में यह संकेत मिला है कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड ज्यादा खाने से खतरा बढ़ सकता है, जबकि फलों, सब्जियों और ओमेगा-3 फैटी एसिड से भरपूर डाइट जोखिम को कम करने में मदद कर सकती है.
इलाज को और बेहतर बनाया जा सकता है
एक्सपर्ट का मानना है कि भविष्य में इस तरह की जेनेटिक जानकारी के आधार पर इलाज को और बेहतर बनाया जा सकता है. इससे यह तय करने में मदद मिलेगी कि किस मरीज को कितने समय तक ब्लड थिनर दवाओं की जरूरत है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 31 Mar 2026 02:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Heart Blockage Symptoms: धमनियों में जमा प्लाक बढ़ा सकता है मुसीबत, कार्डियोलॉजिस्ट से जानें हार्ट ब्लॉकेज की वॉर्निंग</title>
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        <description><![CDATA[ Early Symptoms Of Heart Artery Blockage: हार्ट ब्लॉकेज यानी कोरोनरी आर्टरी डिजीज एक ऐसी स्थिति है जिसमें दिल तक खून पहुंचाने वाली आर्टरीज संकरी या ब्लॉक होने लगती हैं. ऐसा आमतौर पर आर्टरीज में प्लाक जमा होने की वजह से होता है, जिससे हार्ट तक ऑक्सीजन युक्त ब्लड फ्लो कम हो जाता है. यह स्थिति आगे चलकर हार्ट अटैक का खतरा भी बढ़ा सकती है. अक्सर लोग दिल की बीमारी को अचानक होने वाले तेज सीने के दर्द से जोड़कर देखते हैं, लेकिन एक्सपर्ट्स के मुताबिक इसके कई शुरुआती संकेत बहुत हल्के होते हैं और लोग उन्हें नजरअंदाज कर देते हैं.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
कार्डियक साइंसेज के एक्सपर्ट डॉक्टर प्रवीण रमण मिश्रा ने &amp;nbsp;TOI को बताया कि हार्ट की धमनियों में ब्लॉकेज होने पर सबसे सामान्य लक्षण सीने में दर्द या दबाव हो सकता है. कई लोग इसे सीने में भारीपन, जकड़न या जलन जैसा महसूस करते हैं. हालांकि यह दर्द हमेशा तेज नहीं होता, बल्कि कई बार आता-जाता रहता है, खासकर जब व्यक्ति फिजिकल एक्टिविटी करता है या तनाव में होता है. इसके अलावा सांस फूलना भी एक अहम संकेत हो सकता है. कुछ लोगों को सीढ़ियां चढ़ते समय, थोड़ी दूरी चलने पर या सामान्य काम करते हुए भी सांस लेने में कठिनाई महसूस होने लगती है.
क्या होते हैं लक्षण?
डॉक्टर बताते हैं कि हार्ट ब्लॉकेज होने पर असामान्य थकान भी महसूस हो सकती है. जब हार्ट तक पर्याप्त ऑक्सीजन वाला खून नहीं पहुंचता, तो शरीर में लगातार कमजोरी और थकान महसूस होती है. कई मामलों में दर्द सिर्फ सीने तक सीमित नहीं रहता बल्कि हाथों, गर्दन, जबड़े या पीठ तक फैल सकता है. लोग अक्सर इसे मसल्स के दर्द या गैस-एसिडिटी समझ लेते हैं. इसके अलावा चक्कर आना, मतली महसूस होना या बिना किसी खास वजह के ज्यादा पसीना आना भी चेतावनी के संकेत हो सकते हैं, खासकर जब ये लक्षण फिजिकल एक्टिविटी के दौरान दिखाई दें.
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कैसे कर सकते हैं कंट्रोल?
एक्सपर्ट के मुताबिक हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, धूम्रपान, हाई कोलेस्ट्रॉल और किसी तरह की शारीरिक एक्टिविटी का न होना हार्ट की आर्टरीज में ब्लॉकेज का खतरा बढ़ा सकती है. इसलिए दिल की सेहत बनाए रखने के लिए रेगुलर व्यायाम, संतुलित आहार और समय-समय पर हेल्थ चेकअप कराना बेहद जरूरी है. अगर इसके लक्षण बार-बार दिखाई दें या बढ़ने लगें, तो तुरंत कार्डियोलॉजिस्ट से सलाह लेना बेहतर माना जाता है, ताकि समय रहते गंभीर दिक्कतों से बचा जा सके. अगर आप इन लक्षणों कोे इग्नोर करेंगे, तो हो सकता है कि आगे चलकर आपको दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 31 Mar 2026 02:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>Causes Of Premature Ageing: 8 घंटे से ज्यादा बैठना स्मोकिंग जितना खतरनाक! जानें वे 8 आदतें, जो समय से पहले बना रहीं बूढ़ा</title>
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        <description><![CDATA[ Everyday Habits That Make You Age Faster: आजकल हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाना ट्रेंड बन गया है. लोग शराब छोड़ रहे हैं, जंक फूड से दूरी बना रहे हैं और फिट रहने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन इसके बावजूद एक सच्चाई ऐसी है जिसे हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं, वह है कि हमारी रोजमर्रा की कुछ आदतें धीरे-धीरे उम्र बढ़ाने का काम कर रही होती हैं. एजिंग सिर्फ झुर्रियों या सफेद बालों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शरीर के अंदर, सेल्स के स्तर पर भी होती है. चलिए इनके बारे में बताते हैं.&amp;nbsp;
लंबे समय तक बैठे रहना
सबसे पहली आदत है लंबे समय तक बैठे रहना. 13 स्टडीज पर आधारित यूएस नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन में पब्लिश एक मेटा-एनालिसिस, जिसमें 10 लाख से ज्यादा लोग शामिल थे, यह दिखाता है कि जो लोग रोज 8 घंटे से ज्यादा बैठते हैं और एक्सरसाइज नहीं करते, उनमें मृत्यु का खतरा मोटापे या स्मोकिंग जितना हो सकता है. हालांकि, रोज 60-75 मिनट की फिजिकल एक्टिविटी इस खतरे को कम कर सकती है। लंबे समय तक बैठे रहने से मेटाबॉलिज्म धीमा होता है और शरीर के डीएनए के टेलोमीयर तेजी से छोटे होते हैं, जो एजिंग को बढ़ाते हैं.&amp;nbsp;
नींद की कमी
दूसरी बड़ी वजह है नींद की कमी. अगर आप सोचते हैं कि 5 घंटे की नींद काफी है, तो यह शरीर के साथ समझौता है. नेशनल हार्ट लंग्स एंड ब्लड इंस्टिट्यूट के अनुसार, उम्र के हिसाब से नींद की जरूरत अलग-अलग होती है और इसकी अनदेखी लंबे समय में स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ा सकती है. &amp;nbsp;नींद के दौरान शरीर खुद को रिपेयर करता है, हार्मोन बैलेंस करता है और एनर्जी को रिस्टोर करता है. &amp;nbsp;लगातार नींद पूरी न होने से स्किन, इम्यूनिटी और याददाश्त पर असर पड़ता है.
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तनाव में रहने की आदत
तीसरी आदत है लगातार तनाव में रहना, जब तनाव लंबे समय तक बना रहता है, तो शरीर में कोर्टिसोल बढ़ता है, जो त्वचा को नुकसान पहुंचाता है और झुर्रियों को जल्दी लाता है। इसके अलावा यह दिल, डाइजेशन और मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर डालता है.&amp;nbsp;
स्क्रीन टाइम और कम पानी पीने की समस्या
चौथी समस्या है जरूरत से ज्यादा स्क्रीन टाइम. मोबाइल और लैपटॉप का अधिक इस्तेमाल नींद के चक्र को बिगाड़ता है और ब्लू लाइट के कारण स्किन पर भी असर डाल सकता है. देर रात तक स्क्रीन देखने की आदत एजिंग को तेज कर सकती है. पांचवीं आदत है पानी कम पीना. डिहाइड्रेशन से त्वचा बेजान दिखती है और शरीर के कई जरूरी फंक्शन धीमे पड़ जाते हैं. पानी शरीर को डिटॉक्स करने और सही तरीके से काम करने में मदद करता है.
ये भी आदतें शामिल
छठी आदत है ज्यादा चीनी और प्रोसेस्ड फूड का सेवन. ज्यादा शुगर शरीर में ग्लाइकेशन प्रक्रिया को बढ़ाती है, जिससे त्वचा की इलास्टिसिटी कम हो जाती है और झुर्रियां जल्दी आती हैं. सातवीं आदत है स्ट्रेंथ ट्रेनिंग को नजरअंदाज करना. उम्र के साथ मसल्स कम होते हैं और अगर एक्सरसाइज न की जाए तो यह प्रक्रिया तेज हो जाती है, जिससे शरीर कमजोर और सुस्त हो सकता है. आठवीं और अहम आदत है सोशल कनेक्शन को नजरअंदाज करना. रिसर्च में पाया गया है कि अकेलापन और सामाजिक दूरी समय से पहले मौत के खतरे को बढ़ा सकते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 31 Mar 2026 02:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>Benefits Of Eating Figs: क्या आप भी अंजीर को समझते हैं मामूली मेवा? हड्डियों से दिल तक इसके फायदे उड़ा देंगे आपके होश!</title>
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        <description><![CDATA[ Benefits Of Soaked Figs In The Morning: आजकल सुपरफूड्स की चर्चा में अक्सर महंगे और विदेशी विकल्प छा जाते हैं, लेकिन एक साधारण सा फल अंजीर भी हमारी सेहत के लिए उतना ही फायदेमंद हो सकता है. डॉ.&amp;nbsp; शुभम वात्स्य ने हाल ही में इस पर ध्यान दिलाते हुए अपने सोशल मीडिया पोस्ट में बताया कि लोग अंजीर के पोषण को अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि यह शरीर के लिए कई तरह से लाभकारी है. चलिए आपको बताते हैं कि उन्होंने इसके बारे में क्या बताया और यह हमारे लिए कैसे फायदेमंद है.&amp;nbsp;
किस तरह हमारे लिए फायदेमंद?
फोर्ट हॉस्पिटल वसंत कुंज के सीनियर गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट और हेपेटोलॉजिस्ट डॉ. वात्स्य के मुताबिक, अंजीर खास तौर पर डाइजेशन के लिए बेहद फायदेमंद है। इसमें घुलनशील और अघुलनशील दोनों तरह का फाइबर पाया जाता है, जो इसे अन्य फलों से अलग बनाता है. यही वजह है कि यह कब्ज की समस्या में राहत देने में मदद करता है और मल को नरम बनाकर पाचन प्रक्रिया को आसान करता है. लेकिन अंजीर के फायदे सिर्फ पाचन तक सीमित नहीं हैं. यह शरीर को कई और जरूरी पोषक तत्व भी देता है. उदाहरण के तौर पर, इसमें कैल्शियम की अच्छी मात्रा होती है, जो हड्डियों को मजबूत बनाने में मदद करती है. जिन लोगों को बोन डेंसिटी की समस्या है, उनके लिए अंजीर एक नेचुरल विकल्प बन सकता है.&amp;nbsp;
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एनर्जी का अच्छा विकल्प
इसके अलावा, अंजीर में मौजूद आयरन शरीर की एनर्जी को बढ़ाने में मदद करता है. यह शरीर के मेटाबॉलिज्म को सपोर्ट करता है, जिससे दिनभर एक्टिव रहने में आसानी होती है. वहीं, इसमें मौजूद पोटैशियम, मैग्नीशियम और एंटीऑक्सीडेंट्स दिल की सेहत के लिए फायदेमंद माने जाते हैं. ये तत्व ब्लड प्रेशर को संतुलित रखने में मदद करते हैं और हार्ट को स्वस्थ बनाए रखते हैं.&amp;nbsp;
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कोलेस्ट्रॉल को करता है कंट्रोल
डॉ. वात्स्य आगे बताते हैं कि अंजीर का फाइबर कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल करने में भी मदद करता है. नियमित सेवन से शरीर में खराब कोलेस्ट्रॉल का स्तर कम हो सकता है, जिससे हार्ट से जुड़ी बीमारियों का खतरा घटता है. अंजीर खाने का सही तरीका भी उतना ही जरूरी है। सूखे अंजीर को सीधे खाने के बजाय रातभर पानी में भिगोकर सुबह खाने की सलाह दी जाती है. इससे यह नरम हो जाता है और पाचन में आसानी होती है। रोजाना 2 से 3 भीगे हुए अंजीर लेना पर्याप्त माना जाता है. अगर अंजीर का सही तरीके से सेवन किया जाए, तो यह रोजमर्रा की डाइट में एक उपयोगी हिस्सा बन सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 31 Mar 2026 02:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>Floaters And Flashes In Eyes: क्या आपकी आंखों में भी नजर आते हैं धब्बे? तुरंत भागें डॉक्टर के पास, वरना...</title>
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        <description><![CDATA[ When Eye Floaters Are Dangerous: क्या आपकी आंखों के सामने छोटे-छोटे धब्बे, लकीरें या तैरती हुई आकृतियां नजर आती हैं? अगर हां, तो इसे हल्के में लेना ठीक नहीं है. आमतौर पर यह समस्या सामान्य मानी जाती है, लेकिन कुछ मामलों में यह गंभीर बीमारी का संकेत भी हो सकती है. आंखों में दिखाई देने वाले इन धब्बों को मेडिकल भाषा में &quot;आई फ्लोटर्स&quot; कहा जाता है. ये अक्सर उम्र बढ़ने या नजर कमजोर होने के साथ दिखाई देते हैं.&amp;nbsp;
छोटी रेखाओं या धुंधले धब्बों की तरह दिखना
कई बार ये छोटी-छोटी रेखाओं या धुंधले धब्बों की तरह नजर आते हैं, जो आंखों के सामने तैरते हुए महसूस होते हैं. आमतौर पर पलक झपकाने पर ये कम हो जाते हैं और दिमाग भी इन्हें नजरअंदाज कर देता है, &amp;nbsp;लेकिन हाल ही में Radboud University Medical Center की एक स्टडी में इन फ्लोटर्स को लेकर चेतावनी दी गई है. मार्च 2026 में सामने आई इस रिसर्च के मुताबिक, अगर ये धब्बे लगातार दिखने लगें या अचानक बढ़ जाएं, तो यह आंखों की गंभीर समस्या का संकेत हो सकता है.&amp;nbsp;
किस दिक्कत की चेतावनी?
यह रिसर्च Annals of Family Medicine में प्रकाशित हुई है, जिसमें करीब 42 हजार मरीजों के डेटा का एनालिसिस किया गया. इसमें पाया गया कि जिन लोगों को बार-बार फ्लोटर्स, रोशनी की फ्लैश या दोनों लक्षण दिखाई दिए, उनमें से कुछ मामलों में रेटिना डिटैचमेंट जैसी गंभीर समस्या सामने आई. रेटिना डिटैचमेंट एक ऐसी स्थिति होती है, जिसमें आंख की अंदरूनी परत अपनी जगह से अलग होने लगती है. यह आंख का बेहद अहम हिस्सा होता है, जो रोशनी को पहचानने का काम करता है. अगर समय पर इसका इलाज न हो, तो यह नजर जाने तक की स्थिति पैदा कर सकता है.
इसे भी पढ़ें -&amp;nbsp;Weekend Warrior Exercise: हफ्ते में सिर्फ 2 दिन एक्सरसाइज करके भी रह सकते हैं हेल्दी, जानें बेहद आसान तरीके
किन लोगों में बढ़ता है जोखिम?
स्टडी में यह भी सामने आया कि जिन लोगों को फ्लोटर्स के साथ-साथ फ्लैश दिखाई देते हैं, उनमें जोखिम और बढ़ जाता है. हालांकि यह खतरा हर किसी में नहीं होता, लेकिन इसे नजरअंदाज करना भी सही नहीं माना जाता. ब्रिटेन की हेल्थ सर्विस NHS के मुताबिक, कई बार यह समस्या &quot;पोस्टीरियर विट्रियस डिटैचमेंट&quot; के कारण होती है, जो आमतौर पर नुकसानदेह नहीं होती. इसमें आंख के अंदर मौजूद जेल जैसी संरचना में बदलाव होता है और कोलेजन के छोटे-छोटे गुच्छे बन जाते हैं. फिर भी, अगर ये धब्बे अचानक ज्यादा दिखने लगें, लगातार बने रहें या इसके साथ रोशनी की चमक, छाया या नजर धुंधली होने जैसी दिक्कतें हों, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 31 Mar 2026 02:30:05 +0530</pubDate>
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        <title>Liver Disease Symptoms: क्या आपकी हथेलियां भी रहती हैं लाल? डॉक्टर ने दी चेतावनी, लिवर की बीमारी का हो सकता है संकेत</title>
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        <description><![CDATA[ How Hands Reveal Liver Damage: लिवर हमारे शरीर में हर दिन चुपचाप सैकड़ों अहम काम करता है. खून को साफ करना, पाचन में मदद करना और हार्मोन को संतुलित रखना, ये सब जिम्मेदारियां इसी अंग पर होती हैं. लेकिन जब लिवर की सेहत बिगड़ने लगती है, तो वह हमेशा तेज लक्षणों के जरिए चेतावनी नहीं देता. कई बार इसके शुरुआती संकेत बहुत साधारण होते हैं और अक्सर लोग उन्हें नजरअंदाज कर देते हैं. हैरानी की बात यह है कि लिवर से जुड़ी कुछ अहम जानकारियां आपके हाथों में भी छिपी हो सकती हैं.
हथेलियों का लाल होना, त्वचा में खुजली, नाखूनों का पीला या कमजोर होना, या उंगलियों में हल्का कंपन, ये सभी फैटी लिवर, हेपेटाइटिस या सिरोसिस जैसी बीमारियों के शुरुआती संकेत हो सकते हैं. अगर इन बदलावों को समय रहते पहचान लिया जाए, तो गंभीर मुश्किलों से बचाव संभव है.
हाथ कैसे बताते हैं लिवर की सेहत का हाल?
डॉक्टरों के अनुसार, हाथ हमारे अंदरूनी स्वास्थ्य का आईना होते हैं. हथेलियों का रंग, नाखूनों की बनावट और उंगलियों की मूवमेंट से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि लिवर सही तरीके से काम कर रहा है या नहीं. Journal of Clinical and Experimental Hepatology में पब्लिश स्टडी के मुताबिक, लाल हथेलियां और नाखूनों में बदलाव, क्रॉनिक लिवर डिजीज की प्रगति से जुड़े हो सकते हैं. &amp;nbsp;इसके लक्षण कुछ इस तरह होते हैं-&amp;nbsp;
उंगलियों का मुड़ना या अकड़ना&amp;nbsp;
अगर आपकी उंगलियां धीरे-धीरे अंदर की ओर मुड़ने लगें या हथेली में खिंचाव महसूस हो, तो यह ड्यूप्यूट्रेन कॉन्ट्रैक्चर हो सकता है. यह समस्या तब होती है, जब हथेली के नीचे की त्वचा मोटी और सख्त होने लगती है. यह सिरोसिस जैसी क्रॉनिक लिवर बीमारियों और ज्यादा शराब पीने वालों में ज्यादा देखी जाती है.
सफेद नाखून और ऊपर गुलाबी लाइन
अगर नाखून ज्यादातर सफेद दिखें और उनके सिरे पर हल्की गुलाबी या लाल पट्टी नजर आए, तो यह टेरीज नेल्स हो सकते हैं. यह बदलाव लिवर सिरोसिस में खून के प्रवाह और प्रोटीन लेवल में गड़बड़ी के कारण होता है.
नाखूनों का उभरा और गोल होना
नाखूनों और उंगलियों का गोल और फूला हुआ दिखना आमतौर पर फेफड़ों या दिल की बीमारी से जुड़ा माना जाता है, लेकिन यह लंबे समय से चली आ रही लिवर बीमारी में भी देखा जा सकता है. लगातार ऐसा दिखे तो मेडिकल जांच जरूरी है.
हाथों में फड़फड़ाहट या कंपन
अगर हाथ फैलाने पर उनमें अनियंत्रित झटके या फड़फड़ाहट हो, तो इसे एस्टेरिक्सिस कहा जाता है. यह एडवांस लिवर डिजीज की गंभीर स्थिति हेपेटिक एन्सेफैलोपैथी का संकेत हो सकता है और तुरंत इलाज की जरूरत होती है.
हथेलियों और तलवों में लगातार खुजली
बिना किसी रैश के हथेलियों और पैरों के तलवों में तेज खुजली होना बाइल के जमाव का संकेत हो सकता है. यह समस्या रात में या गर्म पानी से नहाने के बाद ज्यादा बढ़ सकती है.
कब डॉक्टर से मिलना जरूरी?
अगर हाथों में ऐसे बदलाव दिखें जैसे लाल हथेलियां, नाखूनों का अजीब रंग, कंपन या लगातार खुजली, तो इन्हें नजरअंदाज न करें. समय पर जांच से लिवर को होने वाले गंभीर नुकसान को रोका जा सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 29 Mar 2026 22:30:39 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Knee Clicking Sound Causes: घुटना मोड़ने पर आ रही कट&amp;कट की आवाज, क्या आ गया रिप्लेसमेंट का टाइम?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/knee-clicking-sound-causes-घुटना-मोड़ने-पर-आ-रही-कट-कट-की-आवाज-क्या-आ-गया-रिप्लेसमेंट-का-टाइम</link>
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        <description><![CDATA[ Why Does My Knee Make Clicking Sounds When Bending: घुटना मोड़ते समय अगर कट-कट या चटकने की आवाज आने लगे, तो अक्सर लोग घबरा जाते हैं और सोचते हैं कि कहीं अब घुटना बदलवाने यानी रिप्लेसमेंट का समय तो नहीं आ गया. लेकिन एक्सपर्ट्स के मुताबिक, हर बार ऐसी आवाज किसी गंभीर बीमारी का संकेत नहीं होती. चलिए आपको बताते हैं कि कब यह गंभीर बीमारी का संकेत होता है और कब आपको घबराने की जरूरत नहीं होती है.&amp;nbsp;
क्यों आती है आवाज?
हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली बेवसाइट healthline की रिपोर्ट के अनुसार, डॉक्टर इस तरह की आवाज को &quot;क्रेपिटस&quot; कहते हैं. &amp;nbsp;यह आवाज तब सुनाई देती है जब आप घुटना मोड़ते, सीधा करते या सीढ़ियां चढ़ते-उतरते हैं. &amp;nbsp;इसमें पॉपिंग, क्लिकिंग, ग्राइंडिंग या खड़कने जैसी आवाज शामिल हो सकती है. अच्छी बात यह है कि ज्यादातर मामलों में यह स्थिति सामान्य होती है और किसी बड़े खतरे का संकेत नहीं होती. कई लोगों को बिना किसी दर्द के भी ऐसी आवाजें सुनाई देती हैं. रिसर्च में भी पाया गया है कि केवल आवाज आने से मूवमेंट या लाइफस्टाइल पर ज्यादा असर नहीं पड़ता.
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कब होती है दिक्कत?
हालांकि, कुछ मामलों में यह ऑस्टियोआर्थराइटिस जैसी समस्या से जुड़ा हो सकता है. अगर आवाज के साथ सूजन, दर्द, जकड़न, घुटने को मोड़ने-सीधा करने में दिक्कत, मांसपेशियों की कमजोरी या घुटने का अस्थिर होना जैसे लक्षण भी दिखें, तो यह संकेत हो सकता है कि अंदरूनी समस्या है. एक्सपर्ट्स बताते हैं कि सिर्फ आवाज आने पर आमतौर पर इलाज की जरूरत नहीं होती. लेकिन अगर इसके साथ दर्द भी हो, तो डॉक्टर जांच करके सही कारण पता लगाते हैं और उसी के अनुसार इलाज तय किया जाता है. अगर ऑस्टियोआर्थराइटिस जैसी समस्या सामने आती है, तो इसके लिए कई तरह के इलाज उपलब्ध हैं. इसमें वजन कंट्रोल करना, नियमित एक्सरसाइज करना, दर्द कम करने वाली दवाओं का इस्तेमाल, फिजियोथेरेपी और जरूरत पड़ने पर इंजेक्शन जैसी चीजें शामिल हो सकती हैं.
क्या बदलवाने की जरूरत होती है?
सबसे अहम सवाल यही होता है कि क्या ऐसी आवाज आने का मतलब घुटना बदलवाने की जरूरत है? एक्सपर्ट्स के अनुसार, सिर्फ आवाज के आधार पर ऐसा फैसला नहीं लिया जाता. घुटना रिप्लेसमेंट तब ही जरूरी होता है जब दर्द बहुत ज्यादा हो, चलना-फिरना मुश्किल हो जाए और बाकी इलाज असर न कर रहे हों. इसलिए अगर घुटना मोड़ने पर आवाज आ रही है, लेकिन दर्द नहीं है, तो घबराने की जरूरत नहीं है. वहीं, अगर इसके साथ अन्य लक्षण भी दिखाई दें, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी हो जाता है, ताकि समय रहते सही इलाज किया जा सके.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 29 Mar 2026 22:30:28 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Covid Vaccine Side Effects: अब मेडिकल रिकॉर्ड में दर्ज होंगी कोविड वैक्सीन से होने वाली दिक्कतें? इस देश ने बना लिया प्लान</title>
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        <description><![CDATA[ 
covid vaccine side effects:&amp;nbsp; कोविड-19 महामारी को करीब 6 साल हो चुके हैं. इस महामारी के चलते दुनियाभर में लाखों लोगों ने अपनी जान गवाई थी. हालांकि, इसका असर आज भी पूरी दुनिया में महसूस किया जाता है, क्योंकि इससे जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं और वैक्सीन के साइड इफेक्ट्स को लेकर बहस लगातार जारी है. इस बीच एक देश कोविड वैक्सीन से होने वाली संभावित दिक्कतों को लेकर बड़ा कदम उठाने की तैयारी में है. अमेरिका अब कोविड वैक्सीन से होने वाली दिक्कतें मेडिकल रिकॉर्ड में दर्ज करने का प्लान बना रहा है.
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क्या कोविड वैक्सीन को लेकर क्या है पूरा मामलाअमेरिका से एक खबर सामने आई है, वहां स्वास्थ्य अधिकारी कोविड वैक्सीन से होने वाली संभावित दिक्कतों को लेकर बड़ा कदम उठाने की तैयारी में है. अमेरिका में ट्रंप एडमिनिस्ट्रेशन के हेल्थ अधिकारियों ने एक प्रस्ताव पर विचार शुरू किया है, जिसके तहत कोविड-19 वैक्सीन से जुड़े दुष्प्रभाव को मेडिकल रिकॉर्ड्स में अलग से दर्ज करने के लिए नया कोड बनाया जा सकता है. यह कोड डॉक्टरों की ओर से इस्तेमाल किए जाने वाले आईसीडी-10 सिस्टम में शामिल किया जाएगा. अभी तक इस सिस्टम में आम वैक्सीन से जुड़े रिएक्शन और कुछ खास वैक्सीन के रिएक्शन को कवर करता है, लेकिन इसमें कोविड वैक्सीन के लिए कोई डेजिग्नेशन नहीं है, जिसकी सेफ्टी एडमिनिस्ट्रेशन के अंदर बहस का एक बड़ा मुद्दा बन गई है.इस फैसले से क्या होगा फायदा बताया जा रहा है कि अगर यह प्रस्ताव लागू होता है तो डॉक्टर ऐसे मामलों की बेहतर पहचान कर सकेंगे, जहां कोविड वैक्सीन के बाद कुछ मरीजों को साइड इफेक्ट हुए हैं. CDC की हेल्थ इन्फॉर्मेशन स्पेशलिस्ट मैरी स्टैनफिल इस प्रपोजल को लेकर कहा कि कोड का इस्तेमाल इंश्योरेंस पेमेंट के साथ-साथ रिसर्च और स्टैटिस्टिकल एनालिसिस के लिए भी किया जाता है. इसके अलावा मेडिकल रिकॉर्ड में स्पष्ट जानकारी होने से बीमा दावों और स्वास्थ्य से जुड़े दूसरे पहलुओं पर भी असर पड़ सकता है. बताया जा रहा है कि इस प्रस्ताव पर फिलहाल लोगों से सुझाव मांगे गए हैं, जिनकी अंतिम तारीख मई तय की गई है. इसे मंजूरी मिलती है तो नया कोड 2027 तक लागू किया जा सकता है. एक्सपर्ट्स की क्या है राय कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस तरह का कोड बनने से मरीजों की पहचान और इलाज में मदद मिलेगी. वहीं कई पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट्स का कहना है कि अभी इस विषय पर और गहराई से रिसर्च की जरूरत है. उनका कहना है कि कोविड वैक्सीन से जुड़े लक्षणों और उनके कारणों को पूरी तरह समझे बिना नई मेडिकल कैटिगरी बनाना सही नहीं होगा.&amp;nbsp;
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        <pubDate>Sun, 29 Mar 2026 10:30:09 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Nutrient Deficiency Causes: हेल्दी डाइट लेते हैं, फिर भी क्यों रहती है डेफिशिएंसी? डॉक्टर ने बता दी हकीकत</title>
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        <description><![CDATA[ Nutrient Deficiency Causes: आज के समय में लोग हेल्दी खाने पर काफी ध्यान देने लगे हैं. घर का बना खाना, फल, सब्जियां और संतुलित डाइट लेने के बावजूद कई लोग कमजोरी, थकान या बार-बार बीमार होने की शिकायत करते हैं. जांच करने पर आयरन, विटामिन बी12 या विटामिन डी की कमी सामने आती है. डॉक्टरों का कहना है कि यह समस्या सिर्फ खाने में नहीं बल्कि शरीर की ओर से पोषक तत्वों को सही तरीके से न सोख पाने में भी हो सकती है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि क्या आपको भी हेल्दी डाइट लेने के बाद भी डेफिशिएंसी रहती है और डॉक्टर ने इसके पीछे की हकीकत क्या बताई.
पाचन की गड़बड़ी बन सकती है बड़ी वजह&amp;nbsp;
डॉक्टरों के अनुसार, खाना खाने के बाद उसका सही तरीके से पाचन बहुत जरूरी है. अगर पेट में एसिड कम बनता है या डाइजेस्टिव एंजाइम्स कमजोर होते हैं तो खाना सही तरीके से टूट नहीं पाता है. ऐसी कंडीशन में शरीर जरूरी पोषक तत्व को सूचित नहीं कर पाता और धीरे-धीरे शरीर में पोषक तत्व की कमी होने लगती है.&amp;nbsp;
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आंतों की सेहत भी है जरूरी
छोटी आंत में मौजूद सूक्ष्म संरचनाएं पोषक तत्वों को खून में पहुंचाने का काम करती है. अगर इनमें किसी तरह की सूजन या नुकसान होता है तो आयरन, कैल्शियम और विटामिन बी12 जैसे पोषक तत्व शरीर तक नहीं पहुंच पाते. कई बार सीलिएक डिजीज या आतों से जुड़ी समस्याएं लंबे समय तक बिना लक्षण के बनी रहती है और शरीर में पोषक तत्व की कमी बढ़ती रहती है.&amp;nbsp;
खाने खाने की क्वालिटी भी बदल रही है सेहत&amp;nbsp;
एक्सपर्ट का मानना है की मिट्टी के गुणवत्ता में गिरावट और आधुनिक खेती के तरीकों के कारण फसलों में पोषक तत्व पहले जैसे नहीं रहे. वहीं प्रोसेस्ड फूड पेट तो भर देता है, लेकिन पर्याप्त पोषण नहीं देता. जिससे हमेशा पोषण की कमी की स्थिति बनी रहती है. वहीं डॉक्टर के अनुसार हर शरीर की पोषण संबंधी जरूरत एक जैसी नहीं होती है. तनाव, बीमारी या लाइफस्टाइल के अनुसार बदलती रहती है. वही प्रेग्नेंट महिलाओं, स्पोर्ट्स पर्सन या लंबे समय तक काम करने वालों को सामान्य से ज्यादा पोषक तत्व की जरूरत होती है.&amp;nbsp;
रोजाना की आदतें भी डालती है असर&amp;nbsp;
ज्यादा चाय कॉफी पीने से आयरन का अवशोषण कम हो सकता है. शराब का सेवन विटामिन स्टोरेज और आंतों की सेहत को प्रभावित करता है. वहीं कुछ दवाइयां जैसे एंटासिड, एंटीबायोटिक या मेटफार्मिन के लंबे इस्तेमाल से शरीर में पोषक तत्वों का अवशोषण कम हो सकता है. इसके अलावा पोषक तत्व की कमी अचानक नहीं होती, बल्कि समय के साथ बढ़ती है. लगातार थकान, बाल झड़ना या बार-बार संक्रमण होना या ध्यान केंद्रित करने में दिक्कत जैसे लक्षण इसके संकेत हो सकते हैं.&amp;nbsp;
सिर्फ डाइट नहीं अब्जॉर्प्शन भी जरूर सुधारना भी जरूरी&amp;nbsp;
डॉक्टरों के अनुसार, समस्या को ठीक करने के लिए सिर्फ ज्यादा खाना ही काफी नहीं है. आंतों की सेहत सुधारना जरूरी है. इसके लिए दही या छाछ जैसे फर्मेंटेड फूड, फाइबर से भरपूर आहार और सही फूड कांबिनेशन अपनाना जरूरी है. डॉक्टरों के अनुसार कैफीन और शराब का सेवन भी कम करना चाहिए. अगर पोषक तत्वों की कमी बनी रहती है तो डॉक्टरों से परामर्श भी ले सकते हैं.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 28 Mar 2026 18:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>Weight Loss Drugs In India: बिना जिम&amp;डाइट वजन घटाने वाली दवाओं का काला सच,  एक्सपर्ट्स ने बताया क्यों हैं ये खतरनाक!</title>
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        <description><![CDATA[ Are GLP-1 Weight Loss Drugs Safe Without Prescription: भारत में तेजी से लोकप्रिय हो रही वेट लॉस दवाओं को लेकर अब बड़ा अलर्ट जारी किया गया है. खासतौर पर GLP-1 ग्लूकागन-लाइक पेप्टाइड-1 दवाओं के बढ़ते इस्तेमाल पर एक्सपर्ट ने चिंता जताई है. मेदांता हॉस्पिटल के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर प्रसिद्ध कार्डियोवैस्कुलर सर्जन डॉ. नरेश त्रेहान &amp;nbsp;ने बिना डॉक्टर की सलाह के इन दवाओं के इस्तेमाल को खतरनाक बताया है, उनका कहना है कि ये दवाएं लाइफस्टाइल प्रोडक्ट नहीं हैं, बल्कि गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए बनाई गई हैं.&amp;nbsp;
दरअसल, हाल ही में इन दवाओं का पेटेंट खत्म होने के बाद भारत में इनके सस्ते जेनेरिक वर्जन बड़ी संख्या में उपलब्ध हो गए हैं. इसके चलते ऑनलाइन फार्मेसी और वेलनेस क्लीनिक के जरिए इनकी बिक्री तेजी से बढ़ी है. सोशल मीडिया पर तेजी से वजन घटाने के ट्रेंड ने भी इसकी मांग को और बढ़ा दिया है, जिससे लोग बिना पूरी जानकारी के इनका इस्तेमाल करने लगे हैं.&amp;nbsp;
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सरकार ने सख्ती की
सरकार ने इस बढ़ते चलन को देखते हुए सख्ती शुरू कर दी है. देशभर में 49 जगहों पर छापेमारी की गई, जिसमें वेयरहाउस, मेडिकल स्टोर और वेलनेस सेंटर शामिल थे. जांच में सामने आया कि कई जगहों पर ये दवाएं बिना प्रिस्क्रिप्शन के बेची जा रही थीं या नियमों का सही तरीके से पालन नहीं किया जा रहा था. इसके बाद ड्रग रेगुलेटर ने साफ चेतावनी दी है कि ऐसी गतिविधियों पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी.&amp;nbsp;
एक्सपर्ट का क्या है कहना?
डॉ. नरेश त्रेहान के मुताबिक, ये दवाएं वजन कम करने में असरदार जरूर हैं, लेकिन इनके साइड इफेक्ट्स भी कम नहीं हैं. ऐसे में अगर कोई व्यक्ति खुद से दवा लेना शुरू कर देता है, तो उसके लिए जोखिम काफी बढ़ सकता है.डॉ. त्रेहान ने स्पष्ट कहा कि इस तरह की दवाएं ओवर-द-काउंटर या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर आसानी से उपलब्ध नहीं होनी चाहिए. उनके अनुसार, कई लोग इसे आसान तरीका मानकर बिना एक्सरसाइज या डाइट के वजन कम करने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं, जो बेहद खतरनाक हो सकता है. इन दवाओं के दुष्प्रभावों में पैंक्रियाटाइटिस, मितली, उल्टी और लीवर पर असर जैसी समस्याएं शामिल हैं, जो गंभीर रूप ले सकती हैं.
&amp;nbsp;

#WATCH | Gurugram, Haryana: Chairman &amp;amp; MD, Medanta, Dr Naresh Trehan says, &quot;When patent of GLP-1 drug expired, several pharmaceutical companies introduced its generic version. When these were introduced, it was seen that they were freely accessible to the public. So, the Health&amp;hellip; pic.twitter.com/cK4VHPx2Qt
&amp;mdash; ANI (@ANI) March 26, 2026



लोगों को भी रखना चाहिए ध्यान
डॉ. त्रेहान ने कहा कि मरीजों की जिम्मेदारी है कि वे किसी भी दवा का इस्तेमाल डॉक्टर की सलाह से ही करें. उन्होंने लोगों को चेतावनी दी कि सेल्फ-मेडिकेशन से बचें और किसी भी इलाज के लिए एक्सपर्ट की निगरानी को प्राथमिकता दें, ताकि संभावित खतरों से बचा जा सके. सरकार अब इन दवाओं के प्रचार-प्रसार पर भी लगाम लगाने की तैयारी कर रही है. खासकर सरोगेट एडवरटाइजिंग और गलत तरीके से प्रमोशन करने पर सख्त कदम उठाए जाएंगे. इसके साथ ही यह भी प्रस्ताव है कि इन दवाओं को केवल एक्सपर्ट डॉक्टर ही लिख सकें.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 28 Mar 2026 02:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Isometric Exercise: क्या होती है आइसोमेट्रिक एक्सरसाइज, हाई ब्लड प्रेशर के मरीजों के लिए यह कितनी फायदेमंद?</title>
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        <description><![CDATA[ How Isometric Exercise Helps Lower Blood Pressure: हाई ब्लड प्रेशर यानी हाइपरटेंशन आज के समय की एक आम लेकिन गंभीर समस्या बन चुका है. यह स्थिति तब होती है जब दिल से पंप होने वाला खून धमनियों की दीवारों पर ज्यादा दबाव डालता है. ब्लड प्रेशर को दो हिस्सों में मापा जाता है सिस्टोलि और डायस्टोलिक. आमतौर पर 120/80 को सामान्य माना जाता है, जबकि 130/80 से ऊपर जाने पर इसे हाई ब्लड प्रेशर की श्रेणी में रखा जाता है.
दिनभर में ब्लड प्रेशर का थोड़ा ऊपर-नीचे होना सामान्य है, लेकिन अगर यह लंबे समय तक हाई बना रहे तो खतरा बढ़ जाता है. इससे दिल को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है और धीरे-धीरे आर्टरीज अपनी लचक खोने लगती हैं. अगर समय रहते ध्यान न दिया जाए, तो यह हार्ट, किडनी, आंखों और दिमाग तक को नुकसान पहुंचा सकता है.
एक्सरसाइज असरदार
ऐसे में एक्सरसाइज को ब्लड प्रेशर कंट्रोल करने का सबसे असरदार तरीका माना जाता है। हाल ही में सामने आई एक स्टडी ने इस दिशा में एक नया पहलू जोड़ा है. हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली बेवसाइट uclahealth के अनुसार, &amp;nbsp;इंग्लैंड के रिसर्चर्स ने 13 साल में की गई 270 स्टडीज के डेटा का एनालिसिस किया, जिसमें 15 हजार से ज्यादा लोगों को शामिल किया गया. इसमें पाया गया कि ब्लड प्रेशर कम करने में आइसोमेट्रिक एक्सरसाइज सबसे ज्यादा फायदेमंद साबित हो सकती है.&amp;nbsp;
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आइसोमेट्रिक एक्सरसाइज
आइसोमेट्रिक एक्सरसाइज वह होती है, जिसमें मसल्स तो सिकुड़ती हैं, लेकिन शरीर के जॉइंट्स हिलते नहीं हैं. यानी आप एक ही पोजिशन में रहते हुए मसल्स पर दबाव डालते हैं. उदाहरण के तौर पर दीवार के सहारे बैठकर स्क्वाट करना, हैंडग्रिप को दबाना या पैरों से किसी स्थिर चीज पर दबाव डालना इसमें शामिल है. एक्सपर्ट के अनुसार, जब मसल्स लंबे समय तक सिकुड़ी रहती हैं, तो उस हिस्से में ब्लड फ्लो कुछ समय के लिए कम हो जाता है. लेकिन जैसे ही यह दबाव हटता है, खून तेजी से वापस आता है, जिससे ब्लड वेसल्स रिलैक्स होती हैं. यही प्रक्रिया ब्लड प्रेशर को कम करने में मदद करती है.
इस बात का रखना चाहिए ध्यान&amp;nbsp;
हालांकि, इसे पूरी तरह सुरक्षित मान लेना सही नहीं होगा. एक्सपर्ट्स का कहना है कि लंबे समय तक मसल्स को सिकोड़कर रखने से कुछ समय के लिए ब्लड प्रेशर बढ़ भी सकता है. इसलिए जिन लोगों को पहले से दिल की बीमारी है या जिनका ब्लड प्रेशर कंट्रोल में नहीं है, उन्हें यह एक्सरसाइज शुरू करने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लेनी चाहिए. आइसोमेट्रिक एक्सरसाइज ब्लड प्रेशर कंट्रोल करने का एक प्रभावी तरीका हो सकता है, लेकिन इसे सही तरीके और सावधानी के साथ करना बेहद जरूरी है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 28 Mar 2026 02:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Isometric, Exercise:, क्या, होती, है, आइसोमेट्रिक, एक्सरसाइज, हाई, ब्लड, प्रेशर, के, मरीजों, के, लिए, यह, कितनी, फायदेमंद</media:keywords>
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        <title>Kidney Problems: फूले हुए चेहरे को न करें इग्नोर, हो सकता है गुर्दे की बीमारी का पहला संकेत</title>
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        <description><![CDATA[ सुबह उठते ही अगर आपकी आंखें सूजी हुई लगें, तो इसे अक्सर लोग थकान, देर रात तक जागना या सोने की गलत पोजीशन का परिणाम समझ लेते हैं, लेकिन यह आम भूल कई बार गंभीर स्वास्थ्य समस्या का संकेत हो सकती है. आंखों के चारों ओर सुबह-सुबह पाई जाने वाली सूजन कभी-कभी आपके गुर्दे की कार्यक्षमता में कमी का पहला संकेत हो सकती है. नेफ्रोलॉजी विशेषज्ञ ने बताया कि गुर्दे की समस्या के शुरुआती संकेतों में आंखों की सूजन सबसे जरूरी हो सकती है. तो आइए जानते हैं कि आंखों और चेहरे की सूजन कैसे गुर्दे की बीमारी का पहला संकेत हो सकता है.
आंखों और चेहरे की सूजन कैसे गुर्दे की बीमारी का पहला संकेत&amp;nbsp;&amp;nbsp;सुबह के समय आंखों में सूजन (जिसे पेरिऑर्बिटल पफीनेस कहा जाता है) गुर्दे की बीमारी का पहला संकेत हो सकता है. यह तब होता है जब गुर्दे की फिल्टरिंग यूनिट (नेफ्रॉन) काम करना कम कर देती है और प्रोटीन का रिसाव मूत्र में शुरू हो जाता है. विशेष रूप से एल्ब्यूमिन नामक प्रोटीन प्रभावित होता है. यह प्रोटीन ब्लड में तरल पदार्थ को बनाए रखने में मदद करता है. जब यह प्रोटीन मूत्र में चला जाता है, तो शरीर में तरल पदार्थ टिशूज में जमा होने लगता है, जिससे चेहरे और खासकर आंखों के आसपास सूजन दिखाई देती है.&amp;nbsp;&amp;nbsp;सुबह क्यों ज्यादा सूजन दिखती है?&amp;nbsp;जब आप सोते समय सीधे लेटते हैं, तो ग्रेविटी की वजह से शरीर का तरल पदार्थ टिशूज में जमा हो जाता है, विशेषकर आंखों के नीचे, जैसे-जैसे दिन बढ़ता है, यह तरल पदार्थ पैरों और टखनों में चला जाता है, और आंखों की सूजन कम दिखती है.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ें - Anal Cancer Symptoms: टॉयलेट में आता है खून तो सिर्फ पाइल्स नहीं हो सकता है एनल कैंसर, जानें कितना खतरनाक?&amp;nbsp;आंखों और चेहरे की सूजन के अन्य संकेत और लक्षण&amp;nbsp;किडनी की समस्या के अलावा आंखों में सूजन के कुछ अस्थायी कारण भी हो सकते हैं. जैसे नींद की कमी, एलर्जी, बहुत ज्यादा नमक वाला खाना, डिहाइड्रेशन, लेकिन अगर सूजन लगातार बनी रहती है और इसके साथ अन्य लक्षण दिखाई देते हैं, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. वहीं झागदार या फोम जैसा यूरिन, टखनों में लगातार सूजन, थकान और कमजोरी, बढ़ता हुआ ब्लड शुगर जैसे गंभीर संकेत भी हो सकते हैं.&amp;nbsp;किसे विशेष सावधानी रखनी चाहिए?
डायबिटीज के मरीज, हाई ब्लड शुगर वाले लोग और जिनके परिवार में गुर्दे की बीमारी का इतिहास हो, ये लोग आंखों की सूजन को नजरअंदाज न करें, क्योंकि यह उनके लिए शुरुआती चेतावनी संकेत हो सकता है. गुर्दे के कई कार्य अन्य शरीर प्रणालियों से जुड़े होते हैं, जैसे हार्ट और ब्लड शुगर कंट्रोल, इसलिए शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज करना, विशेषकर आंखों की सूजन, स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा कर सकता है.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 27 Mar 2026 14:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Sporothrix Brasiliensis Fungus: सावधान! बिल्लियों से फैल रहा जानलेवा फंगल इंफेक्शन&amp;apos;, यहां मिला रोंगटे खड़े कर देने वाला मामला</title>
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        <description><![CDATA[ How Does Sporothrix Brasiliensis Spread In Humans: उरुग्वे में सामने आया एक नया मामला एक बड़े खतरे का संकेत बन चुका है. स्पोरोथ्रिक्स ब्रासिलिएन्सिसनाम नाम का यह फंगस, जो स्किन इंफेक्शन का कारण बनता है, अब साउथ अमेरिका में तेजी से फैलता हुआ दिख रहा है. हालिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह सिर्फ एक केस नहीं बल्कि एक ऐसे इंफेक्शन की शुरुआत है जिसे कंट्रोल करना आसान नहीं होगा. चलिए आपको बताते हैं कि यह कैसे फैलता है और इसको रोकने के लिए क्या किया जा सकता है.&amp;nbsp;
कैसे फैल रही है यह बीमारी?
न्यूज बेवसाइट earth की रिपोर्ट के अनुसार, &amp;nbsp;सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि इसका मुख्य सोर्स बिल्लियां बन रही हैं. रिसर्च में पाया गया कि उरुग्वे के कई इलाकों में इंसानों और जानवरों में यह संक्रमण बिल्लियों के जरिए फैला. खास बात यह रही कि कई इंफेक्टेड बिल्लियों का आपस में कोई कनेक्शन नहीं था, जिससे साफ है कि यह फंगस अब लोकल स्तर पर फैल चुका है.
साइंटिस्ट के अनुसार, स्पोरोथ्रिक्स ब्रासिलिएन्सिसनाम एक इमर्जिंग फंगल थ्रेट है, जो पहले ब्राजील तक सीमित था लेकिन अब दूसरे देशों में भी तेजी से फैल रहा है. इसका सबसे बड़ा कारण बिल्लियों के जरिए होने वाला ट्रासमिशन है.&amp;nbsp;
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क्या होते हैं इसके कारण?
इंफेक्टेड बिल्लियों के शरीर पर बने घाव इस फंगस का मुख्य केंद्र होते हैं. खासकर उनके चेहरे, नाक और पंजों के आसपास फंगस की मात्रा ज्यादा होती है. जब ये बिल्लियां किसी इंसान को खरोंचती या काटती हैं, तो फंगस सीधे त्वचा में प्रवेश कर जाता है और इंफेक्शन शुरू हो जाता हैच एक और वजह यह है कि सड़क पर रहने वाली बिल्लियां लगातार घूमती रहती हैं और आपस में लड़ती हैं. इससे संक्रमण एक जगह से दूसरी जगह फैलता रहता है और लोगों को इसकी भनक भी नहीं लगती. यह फंगस अपने रूप को भी बदल सकता है. बाहर यह धागे जैसा होता है, लेकिन शरीर के अंदर जाकर यह यीस्ट जैसे रूप में बदल जाता है, जिससे यह त्वचा के अंदर तेजी से बढ़ने लगता है.
कैसे होते हैं इसके लक्षण?
लक्षणों की बात करें तो यह इंफेक्शन आमतौर पर एक छोटे लाल दाने से शुरू होता है, जो बाद में घाव में बदल जाता है. कई बार ऐसे दाने एक लाइन में फैलते जाते हैं. वहीं बिल्लियों में यह घाव जल्दी ठीक नहीं होते और बाल झड़ने लगते हैं. डॉक्टर इस संक्रमण की पुष्टि लैब टेस्ट के जरिए करते हैं, लेकिन कई बार इसे सामान्य बैक्टीरियल इंफेक्शन समझ लिया जाता है, जिससे इलाज में देरी हो जाती है. हालांकि अच्छी बात यह है कि यह बीमारी ठीक हो सकती है, लेकिन समय पर सही इलाज जरूरी है. &amp;nbsp;खासकर बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर इम्यूनिटी वाले लोगों के लिए यह ज्यादा खतरनाक हो सकती है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 26 Mar 2026 22:30:18 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Sporothrix, Brasiliensis, Fungus:, सावधान, बिल्लियों, से, फैल, रहा, जानलेवा, फंगल, इंफेक्शन, यहां, मिला, रोंगटे, खड़े, कर, देने, वाला, मामला</media:keywords>
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        <title>Tuberculosis In Women: महिलाओं में साइलेंट किलर क्यों बन रहा टीबी, जानें यह बीमारी कितनी खतरनाक?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/tuberculosis-in-women-महिलाओं-में-साइलेंट-किलर-क्यों-बन-रहा-टीबी-जानें-यह-बीमारी-कितनी-खतरनाक</link>
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        <description><![CDATA[ Why TB Is Becoming A Silent Killer In Women: टीबी अक्सर फेफड़ों की बीमारी माना जाता है, लेकिन यह सिर्फ वहीं तक सीमित नहीं है. खासकर महिलाओं में यह अब एक साइलेंट किलर के रूप में उभर रहा है, क्योंकि इसके लक्षण अक्सर साफ नजर नहीं आते और बीमारी लंबे समय तक छिपी रह जाती है. टीबी एक बैक्टीरियल इंफेक्शन है, जो हवा के जरिए फैलता है. &amp;nbsp;जब इंफेक्टेड व्यक्ति खांसता, छींकता या थूकता है, तो इसके बैक्टीरिया दूसरे लोगों तक पहुंच सकते हैं. हालांकि यह बीमारी पूरी तरह से ठीक हो सकती है, लेकिन समय पर पहचान और इलाज न मिलने पर यह जानलेवा भी साबित हो सकती है,&amp;nbsp;
महिलाओं में टीवी की बीमारी
हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली बेवसाइट cloudninecare की रिपोर्ट के अनुसार, महिलाओं में टीबी का एक खास रूप होता है फीमेल जेनिटल टीबी, जो प्रजनन अंगों को प्रभावित करता है. यह बीमारी ज्यादा खतरनाक इसलिए मानी जाती है क्योंकि इसके लक्षण बहुत स्पष्ट नहीं होते, कई बार महिलाओं को पता ही नहीं चलता कि वे इस इंफेक्शन की शिकार हैं, और जब तक पता चलता है, तब तक स्थिति गंभीर हो चुकी होती है.&amp;nbsp;
कौन से अंग होते हैं प्रभावित?
यह इंफेक्शन फेलोपियन ट्यूब, गर्भाशय, ओवरी और सर्विक्स जैसे अंगों को प्रभावित कर सकता है. सबसे ज्यादा असर फेलोपियन ट्यूब पर देखा जाता है, जिससे गर्भधारण में दिक्कतें आने लगती हैं. कई मामलों में यह बीमारी बांझपन का कारण भी बन जाती है, जो इसका सबसे बड़ा असर माना जाता है. इस बीमारी के लक्षण बहुत सामान्य हो सकते हैं, जैसे पेल्विक पेन, पीरियड्स में गड़बड़ी, ज्यादा या कम ब्लीडिंग, या असामान्य डिस्चार्ज, यही वजह है कि इसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है या किसी और समस्या समझ लिया जाता है.&amp;nbsp;
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क्या होते हैं इसके लक्षण?
टीबी के कुछ सामान्य लक्षण भी हो सकते हैं, जैसे बुखार, रात में पसीना आना, वजन कम होना और भूख न लगना. लेकिन क्योंकि ये लक्षण कई अन्य बीमारियों में भी दिखते हैं, इसलिए सही पहचान करना मुश्किल हो जाता है. इसका खतरा उन महिलाओं में ज्यादा होता है जो कमजोर इम्यूनिटी, डायबिटीज, HIV या खराब जीवन स्थितियों में रहती हैं, भीड़भाड़, पोषण की कमी और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी भी इसके फैलने का बड़ा कारण बनते हैं. &amp;nbsp;अगर समय रहते इलाज न मिले, तो यह बीमारी न सिर्फ प्रजनन क्षमता को प्रभावित करती है, बल्कि लाइफ क्वालिटी को भी खराब कर देती है. हालांकि अच्छी बात यह है कि एंटीबायोटिक्स के जरिए इसका इलाज संभव है, लेकिन इसके लिए पूरा कोर्स लेना जरूरी होता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 26 Mar 2026 22:30:17 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Signs Of Nerve Weakness: शरीर में दिख रहे ये संकेत तो समझ लें कमजोर हो रही हैं नसें, लक्षण दिखते ही भागें डॉक्टर के पास</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/signs-of-nerve-weakness-शरीर-में-दिख-रहे-ये-संकेत-तो-समझ-लें-कमजोर-हो-रही-हैं-नसें-लक्षण-दिखते-ही-भागें-डॉक्टर-के-पास</link>
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        <description><![CDATA[ Early Signs Of Weak Nervous System: शरीर को चलाने वाला सबसे अहम सिस्टम हमारा नर्वस सिस्टम होता है. &amp;nbsp;यही सिस्टम हमारे मूड, सोचने की क्षमता, चलने-फिरने और महसूस करने तक सब कुछ कंट्रोल करता है. लेकिन जब यही सिस्टम कमजोर होने लगता है, तो शरीर अलग-अलग तरह के संकेत देने लगता है, जिन्हें अक्सर लोग नजरअंदाज कर देते हैं. &amp;nbsp;एक्सपर्ट के अनुसार, नसों से जुड़ी समस्याएं धीरे-धीरे बढ़ती हैं और कई बार इनके लक्षण समझ पाना आसान नहीं होता.&amp;nbsp;
dpuhospital की एक रिपोर्ट के अनुसार, हर पांच में से एक व्यक्ति किसी न किसी नर्व से जुड़ी समस्या का सामना कर चुका है. ऐसे में अगर शरीर में कुछ असामान्य बदलाव दिखें, तो उन्हें हल्के में लेना भारी पड़ सकता है. चलिए आपको बताते हैं कि इसके लक्षण क्या होते हैं.&amp;nbsp;
मांसपेशियों की ताकत कम होना
सबसे पहला संकेत है मांसपेशियों की ताकत कम होना. अगर आपको बिना ज्यादा मेहनत के ही कमजोरी महसूस होने लगे या शरीर में ताकत घटती दिखे, तो यह नर्वस सिस्टम के कमजोर होने का इशारा हो सकता है.
सिरदर्द होना
बार-बार सिरदर्द होना भी एक आम लक्षण है. अगर सिरदर्द लगातार बना रहता है और सामान्य दवाओं से भी ठीक नहीं होता, तो यह नसों से जुड़ी समस्या की ओर इशारा कर सकता है.
याददाश्त कमजोर होना
याददाश्त कमजोर होना भी एक अहम संकेत है. अगर आपको छोटी-छोटी बातें भूलने की आदत बढ़ती जा रही है, तो इसे उम्र का असर मानकर नजरअंदाज न करें. कई बार यह नर्वस सिस्टम की कमजोरी की वजह से भी हो सकता है.
झुनझुनी या सुन्नपन&amp;nbsp;
शरीर में झुनझुनी या सुन्नपन महसूस होना भी एक बड़ा संकेत है. खासकर हाथ-पैरों में बार-बार ऐसा होना न्यूरोपैथी की ओर इशारा कर सकता है, जिसमें नसें प्रभावित होने लगती हैं.
&amp;nbsp;जकड़न या अकड़न की समस्या
मांसपेशियों में जकड़न या अकड़न भी नजर आ सकती है. लंबे समय तक तनाव या नसों पर दबाव के कारण मांसपेशियां सख्त होने लगती हैं, जिससे चलने-फिरने में दिक्कत हो सकती है.
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पीठ दर्द की समस्या
पीठ दर्द भी कई बार नसों की कमजोरी से जुड़ा होता है. अगर दर्द बार-बार हो रहा है या बिना वजह बढ़ रहा है, तो इसे हल्के में न लें.
कंपन या दौरे पड़ना&amp;nbsp;
कंपन या दौरे पड़ना भी गंभीर संकेत हो सकते हैं. यह स्थिति तब आती है जब नर्वस सिस्टम ठीक से काम नहीं कर रहा होता और समय रहते इलाज न मिले तो यह बड़ी बीमारी का रूप ले सकती है.
ये भी होते हैं लक्षण
इसके अलावा, कुछ मामलों में यह समस्या गंभीर बीमारियों का कारण भी बन सकती है, जैसे पार्किंसन, मल्टीपल स्क्लेरोसिस या स्ट्रोक जैसी स्थितियां.
कब डॉक्टर से मिलना चाहिए?
डॉक्टरों का कहना है कि अगर इनमें से कोई भी लक्षण बार-बार नजर आए, तो तुरंत एक्सपर्ट से संपर्क करना चाहिए. समय पर जांच और इलाज से बड़ी समस्याओं से बचा जा सकता है. नसों की सेहत को नजरअंदाज करना शरीर के लिए खतरनाक साबित हो सकता है, इसलिए सतर्क रहना ही सबसे बेहतर उपाय है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 26 Mar 2026 22:30:16 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Anal Cancer Symptoms: टॉयलेट में आता है खून तो सिर्फ पाइल्स नहीं हो सकता है एनल कैंसर, जानें कितना खतरनाक?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/anal-cancer-symptoms-टॉयलेट-में-आता-है-खून-तो-सिर्फ-पाइल्स-नहीं-हो-सकता-है-एनल-कैंसर-जानें-कितना-खतरनाक</link>
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        <description><![CDATA[ Is Blood In Stool Always Piles Or Cancer: टॉयलेट में खून आना अक्सर लोगों को डरा देता है, और सबसे पहले दिमाग में यही आता है कि कहीं यह कोई गंभीर बीमारी तो नहीं. हालांकि, ज्यादातर मामलों में इसकी वजह पाइल्स यानी बवासीर होती है, जो आम और इलाज से ठीक होने वाली समस्या है. लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि हर बार इसे हल्के में लेना सही नहीं है, क्योंकि कुछ मामलों में यही लक्षण एनल कैंसर जैसे गंभीर रोग का संकेत भी हो सकता है.
क्या होती है पाइल्स की दिक्कत?
पाइल्स की बात करें तो यह एक ऐसी स्थिति होती है, जिसमें मलाशय या गुदा के आसपास की नसें सूज जाती हैं. यह समस्या उम्र बढ़ने के साथ, कब्ज, ज्यादा देर तक बैठने या प्रेग्नेंसी के कारण हो सकती है. पाइल्स में आमतौर पर टॉयलेट के दौरान चमकीला लाल खून दिखाई देता है, इसके साथ ही खुजली, जलन और हल्की सूजन भी महसूस हो सकती है. राहत की बात यह है कि इसके लक्षण अक्सर कुछ समय बाद खुद ही कम हो जाते हैं या साधारण इलाज से ठीक हो जाते हैं.&amp;nbsp;
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कब होना चाहिए सावधान?
कैंसर के बारे में जानकारी देने वाली prolifecancercentre की रिपोर्ट के अनुसार, अगर यही खून बार-बार आने लगे या लंबे समय तक बना रहे, तो सतर्क हो जाना जरूरी है. एनल कैंसर एक रेयर लेकिन गंभीर बीमारी है, जिसमें गुदा के अंदर या आसपास असामान्य सेल्स तेजी से बढ़ने लगती हैं. शुरुआत में इसके लक्षण पाइल्स जैसे ही लग सकते हैं, जिससे कई लोग भ्रमित हो जाते हैं.
क्या होता है फर्क?
दोनों में फर्क समझना बेहद जरूरी है. पाइल्स में खून आमतौर पर टॉयलेट के दौरान ही आता है और कुछ समय बाद बंद हो जाता है, जबकि एनल कैंसर में ब्लीडिंग लगातार हो सकती है और उसका रंग भी थोड़ा गहरा हो सकता है. इसी तरह पाइल्स में दर्द अक्सर टॉयलेट या बैठने के दौरान ज्यादा होता है, लेकिन कैंसर में दर्द लगातार बना रह सकता है और समय के साथ बढ़ता जाता है.
इसके अलावा, अगर आपको मल त्याग की आदतों में बदलाव दिखे, जैसे बार-बार टॉयलेट जाना या मल का आकार बदलना, तो इसे नजरअंदाज न करें. बिना वजह वजन कम होना, थकान महसूस होना या गुदा के आसपास गांठ बनना भी गंभीर संकेत हो सकते हैं. डॉक्टरों का साफ कहना है कि अगर खून एक हफ्ते से ज्यादा समय तक दिखे, दर्द बढ़ता जाए या कोई नया लक्षण जुड़ जाए, तो तुरंत जांच करानी चाहिए. खासतौर पर 50 साल से ऊपर के लोगों को ऐसे संकेतों को बिल्कुल नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 26 Mar 2026 22:30:15 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>क्या होता है क्वाड्रिप्लेजिया, जिसने ले ली हरीश राणा की जान? बाइकर्स को सबसे ज्यादा खतरा</title>
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        <description><![CDATA[ क्या होता है क्वाड्रिप्लेजिया, जिसने ले ली हरीश राणा की जान? बाइकर्स को सबसे ज्यादा खतरा ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 25 Mar 2026 18:30:19 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Walking Speed And Health: आप भी चलते हैं धीमें तो समझ लीजिए आपका दिल दे रहा यह खतरनाक संकेत, तुरंत हो जाएं अलर्ट</title>
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        <description><![CDATA[ How Walking Speed Reflects Heart Health: आप कितनी तेजी से चलते हैं, यह सिर्फ आपकी आदत नहीं, बल्कि आपकी सेहत का एक अहम संकेत भी हो सकता है. आमतौर पर लोग दिल की सेहत को ब्लड प्रेशर या कोलेस्ट्रॉल से जोड़कर देखते हैं, लेकिन अब डॉक्टर एक आसान चीज पर भी ध्यान दे रहे हैं कि आपकी चलने की स्पीड. &amp;nbsp;सुनने में भले साधारण लगे, लेकिन यह बताती है कि हार्ट, लंग्स, मांसपेशियां और ब्रेन कितनी अच्छी तरह साथ काम कर रहे हैं.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
डॉ. सुनील राणा ने TOI को बताया कि वॉकिंग स्पीड को अब एक तरह का &quot;वाइटल साइन&quot; माना जाने लगा है, जैसे पल्स या ब्लड प्रेशर. अगर कोई व्यक्ति लगातार धीमी गति से चलता है, तो यह कमजोर दिल, कम मसल स्ट्रेंथ या शरीर में किसी शुरुआती समस्या का संकेत हो सकता है. क्योंकि चलने के दौरान शरीर के कई सिस्टम एक साथ काम करते हैं जैसे कि ऑक्सीजन की सप्लाई, मांसपेशियों की ताकत और नर्वस सिस्टम का तालमेल.&amp;nbsp;
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स्पीड कम होना क्यों है खतरनाक?
अगर आपकी चलने की रफ्तार पहले के मुकाबले कम हो गई है, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. यह इस बात का संकेत हो सकता है कि शरीर पहले जितनी कुशलता से काम नहीं कर रहा. कई रिसर्च भी बताती हैं कि जिन लोगों की वॉकिंग स्पीड धीमी होती है, उनमें दिल से जुड़ी बीमारियों का खतरा ज्यादा होता है. यह सिर्फ दिल की बात नहीं है. चलने की स्पीड से मांसपेशियों और जोड़ों की स्थिति का भी अंदाजा लगाया जा सकता है. अगर शरीर में दर्द, जकड़न या कमजोरी है, तो व्यक्ति अनजाने में धीमा चलने लगता है. खासकर ऑस्टियोआर्थराइटिस जैसी स्थितियां भी चलने की गति को प्रभावित कर सकती हैं.
कैसे कर सकते हैं पता?
अच्छी बात यह है कि आप घर पर ही अपनी वॉकिंग स्पीड को जांच सकते हैं. इसके लिए 4-6 मीटर की दूरी नापें और सामान्य रफ्तार से चलें. फिर देखें कि इसे तय करने में कितना समय लगता है. आमतौर पर स्वस्थ व्यक्ति की स्पीड 1 से 1.4 मीटर प्रति सेकंड होती है. एक आसान तरीका यह भी है कि चलते समय आप आराम से बातचीत कर पा रहे हैं या नहीं. अगर नहीं, तो यह हार्ट और फेफड़ों पर दबाव का संकेत हो सकता है. अगर आपको अपनी स्पीड बेहतर करनी है, तो जल्दबाजी करने की जरूरत नहीं है. रोज थोड़ा तेज चलने की कोशिश करें, हफ्ते में कुछ दिन हल्की स्ट्रेंथ ट्रेनिंग करें और अपनी बॉडी पोस्चर पर ध्यान दें. धीरे-धीरे यह सुधार आपकी फिटनेस में भी दिखेगा.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 25 Mar 2026 18:30:18 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Weight Gain Despite Healthy Eating: धोखा दे रही आपकी हेल्दी डाइट! सब सही करने के बाद भी क्यों फूल रहा शरीर? जानें चौंकाने वाली वजह</title>
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        <description><![CDATA[ Why Am I Gaining Weight On Healthy Diet: आप हेल्दी खाना खा रहे हैं, जंक फूड से दूर हैं और एक्टिव भी रहते हैं, फिर भी वजन बढ़ रहा है? ऐसे में हमारे मन में सवाल आता है कि ऐसा क्यों होता है? यह सवाल आजकल कई लोगों को परेशान करता है. अक्सर लगता है कि सारी कोशिशों के बावजूद शरीर साथ नहीं दे रह. &amp;nbsp;लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि यह सिर्फ कैलोरी या मेहनत का मामला नहीं है, बल्कि इसके पीछे शरीर की जटिल मेटाबॉलिक प्रक्रिया काम करती है.
एक्सपर्ट बताते हैं कि कई बार शरीर खुद को नई परिस्थितियों के हिसाब से ढाल लेता है. जब लंबे समय तक कम कैलोरी ली जाती है, तो शरीर अपनी ऊर्जा बचाने लगता है. इसे मेटाबॉलिक अडैप्टेशन कहा जाता है. यानी शरीर पहले की तुलना में कम कैलोरी जलाने लगता है. ऐसे में वही डाइट, जो पहले वजन घटाने में मदद करती थी, अब वजन को बढ़ाने या स्थिर रखने लगती है.
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&amp;nbsp;इंसुलिन रेजिस्टेंस भी एक बड़ा कारण
इसके अलावा इंसुलिन रेजिस्टेंस भी एक बड़ा कारण हो सकता है. इंसुलिन सिर्फ ब्लड शुगर को ही नहीं, बल्कि शरीर में फैट स्टोर करने की प्रक्रिया को भी नियंत्रित करता है। जब शरीर इंसुलिन के प्रति संवेदनशील नहीं रहता, तो इंसुलिन का स्तर बढ़ जाता है और शरीर फैट को जलाने के बजाय जमा करने लगता ह. यह स्थिति उन लोगों में भी देखी जा सकती है, जो बाहर से पूरी तरह हेल्दी डाइट ले रहे होते हैं.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
डॉ. मोइनुद्दीन ने TOI को बताया कि एक और अहम भूमिका लेप्टिन हार्मोन की होती है, जो दिमाग को यह संकेत देता है कि पेट भर गया है लेकिन जब शरीर में लेप्टिन रेजिस्टेंस हो जाता है, तो यह संकेत सही तरीके से काम नहीं करता. नतीजा यह होता है कि व्यक्ति बिना महसूस किए जरूरत से थोड़ा ज्यादा खाने लगता है, जो धीरे-धीरे वजन बढ़ाने का कारण बनता है. हार्मोनल असंतुलन भी वजन बढ़ने के पीछे बड़ी वजह हो सकता है. जैसे हाइपोथायरायडिज्म में मेटाबॉलिज्म धीमा हो जाता है, PCOS महिलाओं में फैट स्टोरेज को प्रभावित करता है और कशिंग सिंड्रोम में बढ़ा हुआ कोर्टिसोल शरीर में चर्बी जमा करने लगता है. ये सभी स्थितियां वजन बढ़ने को आसान बना देती हैं.
हेल्दी खाने से भी बढ़ता है वजन
कई बार हम यह भूल जाते हैं कि हेल्दी खाना भी ज्यादा मात्रा में लेने पर वजन बढ़ा सकता है. ड्राई फ्रूट्स, फल, साबुत अनाज और स्मूदी पोषक जरूर होते हैं, लेकिन इनमें कैलोरी भी अधिक होती है. अगर इनका सेवन जरूरत से ज्यादा हो जाए, तो शरीर अतिरिक्त एनर्जी को फैट के रूप में स्टोर करने लगता है. सिर्फ खाना ही नहीं, बल्कि लाइफस्टाइल भी इसमें अहम भूमिका निभाता है. कम नींद, ज्यादा तनाव और शरीर में सूजन जैसी स्थितियां मेटाबॉलिज्म को प्रभावित करती हैं. नींद की कमी से भूख बढ़ाने वाले हार्मोन एक्टिव हो जाते हैं, जबकि तनाव से कोर्टिसोल बढ़ता है, जो वजन बढ़ाने में मदद करता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 25 Mar 2026 18:30:17 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Covid Variant 2026: आ गया कोरोना का &amp;apos;सुपर वेरिएंट&amp;apos;, क्या फेल हो जाएगी आपकी वैक्सीन? वैज्ञानिकों का बड़ा खुलासा</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/covid-variant-2026-आ-गया-कोरोना-का-सुपर-वेरिएंट-क्या-फेल-हो-जाएगी-आपकी-वैक्सीन-वैज्ञानिकों-का-बड़ा-खुलासा</link>
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        <description><![CDATA[ Is BA.3.2 Covid Variant Dangerous: अमेरिका में कोविड-19 का एक नया वेरिएंट तेजी से फैल रहा है, जिसे BA.3.2 नाम दिया गया है. &amp;nbsp;साइंटिस्ट का कहना है कि यह वेरिएंट मौजूदा वैक्सीन से मिलने वाली सुरक्षा को कुछ हद तक कमजोर कर सकता है. । यही वजह है कि इसे लेकर चिंता बढ़ रही है, भले ही अभी तक इसके गंभीर असर पूरी तरह सामने नहीं आए हैं.
यह नया वेरिएंट ओमिक्रॉन का ही एक रूप है, जिसे सबसे पहले 2024 में साउथ अफ्रीका में देखा गया था और बाद में 2025 में अमेरिका में भी इसकी पहचान हुई. इसके बाद यह धीरे-धीरे कई देशों में फैल गया और अब 20 से ज्यादा राज्यों में इसके संकेत मिल चुके हैं. खास बात यह है कि यह सिर्फ मरीजों में ही नहीं, बल्कि एयरपोर्ट के वेस्टवॉटर सैंपल्स में भी पाया गया है, जिससे अंदाजा लगाया जा रहा है कि इसका फैलाव दिखने से ज्यादा व्यापक हो सकता है.
कैसा है नया वायरस?
वैज्ञानिकों के मुताबिक BA.3.2 में स्पाइक प्रोटीन में करीब 70 से 75 बदलाव पाए गए हैं. यही स्पाइक प्रोटीन वायरस को इंसानी सेल्स में घुसने में मदद करता है. इन बदलावों की वजह से यह वेरिएंट ज्यादा तेजी से फैल सकता है और शरीर की इम्यूनिटी को भी चकमा दे सकता है. independent की रिपोर्ट के अनुसार, लैब में किए गए टेस्ट में यह भी सामने आया है कि मौजूदा कोविड वैक्सीन, जो JN.1 जैसे वेरिएंट्स के खिलाफ बनाई गई हैं, BA.3.2 के खिलाफ उतनी प्रभावी नहीं हो सकतीं. यही कारण है कि साइंटिस्ट भविष्य में वैक्सीन अपडेट करने की जरूरत पर जोर दे रहे हैं.&amp;nbsp;
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कितना खतरनाक है नया कोरोना?
हालांकि, राहत की बात यह है कि अभी तक इस वेरिएंट से होने वाले मामलों में गंभीरता ज्यादा नहीं देखी गई है. कुछ मरीज अस्पताल में भर्ती जरूर हुए, लेकिन सभी ठीक हो गए. एक्सपर्ट का कहना है कि सिर्फ अस्पताल में केस मिलने से यह साबित नहीं होता कि यह वेरिएंट ज्यादा खतरनाक है. फिर भी, एक्सपर्ट सतर्क रहने की सलाह दे रहे हैं.कोविड अब एंडेमिक बन चुका है, यानी यह पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है और समय-समय पर नए वेरिएंट सामने आते रहेंगे.
हर बार वायरस में बदलाव होता है, जिससे उसके फैलने या बचने की क्षमता बदल सकती है. हेल्थ एक्सपर्ट का मानना है कि इंफेक्शन को फैलने से रोकना ही सबसे जरूरी है. जितना कम वायरस फैलने का मौका मिलेगा, उतना ही कम वह नए रूप में बदल पाएगा. इस बीच, फ्लू और RSV जैसी अन्य सांस से जुड़ी बीमारियां भी बढ़ रही हैं, लेकिन कोविड का खतरा अभी खत्म नहीं हुआ है.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 25 Mar 2026 18:30:16 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Covid, Variant, 2026:, आ, गया, कोरोना, का, सुपर, वेरिएंट, क्या, फेल, हो, जाएगी, आपकी, वैक्सीन, वैज्ञानिकों, का, बड़ा, खुलासा</media:keywords>
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        <title>Heart Attack Risk Factors: पुरुषों की तुलना में महिलाओं में कम क्यों होते हैं हार्ट अटैक के मामले, क्या है कारण?</title>
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        <description><![CDATA[ Why Women Have Lower Risk Of Heart Attacks Than Men: हार्ट अटैक आज के समय की सबसे खतरनाक और आम बीमारियों में से एक बन चुका है. यह तब होता है जब दिल तक जाने वाला ब्लड का फ्लो रुक जाता है. आमतौर पर यह ब्लॉकेज कोरोनरी आर्टरीज में होता है, जहां कोलेस्ट्रॉल, फैट और अन्य पदार्थ जमा हो जाते हैं. इसी स्थिति को कोरोनरी आर्टरी डिजीज कहा जाता है, जो हार्ट अटैक के बढ़ते मामलों की सबसे बड़ी वजह है.
क्या होता है कारण?
हार्ट अटैक के पीछे कई जोखिम कारक होते हैं, जिन्हें नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है. हाई कोलेस्ट्रॉल, बढ़ती उम्र, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, मोटापा, जेनेटिक कारण, तंबाकू और शराब का सेवन, ज्यादा तनाव और हार्ट से जुड़ी पुरानी समस्याएं ये सभी हार्ट अटैक का खतरा बढ़ाते हैं.&amp;nbsp;
महिलाओं में कम क्यों होता है ज्यादा खतरा?
Dr. KM Cherian Institute Of Medical Sciences की रिपोर्ट के अनुसार, पुरुषों और महिलाओं में हार्ट अटैक के मामलों में अंतर देखा जाता है. दोनों के लिए यह बीमारी खतरनाक है, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि पुरुषों में इसका खतरा ज्यादा होता है. पुरुषों में पहली बार हार्ट अटैक का औसत उम्र करीब 65 साल होती है, जबकि महिलाओं में यह लगभग 72 साल के आसपास देखा जाता है. यानी महिलाओं में यह खतरा पुरुषों के मुकाबले करीब 10 साल देर से बढ़ता है.
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अंतर के पीछे क्या है वजह?
इसके पीछे कई संभावित कारण माने जाते हैं. एक्सपर्ट का मानना है कि महिलाओं में मेनोपॉज से पहले हार्ट अटैक का खतरा कम होता है, जिसका एक कारण एस्ट्रोजन हार्मोन हो सकता है. हालांकि, यह पूरी तरह साबित नहीं हुआ है, लेकिन माना जाता है कि यह हार्मोन दिल की सेहत को कुछ हद तक सुरक्षित रखता है. दूसरी ओर, पुरुषों में तंबाकू और शराब का सेवन ज्यादा होता है, जो दिल की बीमारियों का बड़ा कारण है. इसके अलावा, तनाव को संभालने के मामले में भी पुरुषों की क्षमता महिलाओं की तुलना में कम मानी जाती है. लगातार तनाव और मानसिक दबाव दिल पर बुरा असर डालते हैं, जिससे हार्ट अटैक का खतरा बढ़ सकता है.
कैसे कर सकते हैं बचाव?
यह समझना जरूरी है कि हार्ट अटैक पूरी तरह रोका जा सकता है, अगर समय रहते सावधानी बरती जाए. नियमित हेल्थ चेकअप कराना, ब्लड शुगर, कोलेस्ट्रॉल और ब्लड प्रेशर को कंट्रोल में रखना बेहद जरूरी है. लाइफस्टाइल में छोटे-छोटे बदलाव भी बड़ा फर्क ला सकते हैं. &amp;nbsp;हेल्दी डाइट लेना, जिसमें फल और सब्जियां ज्यादा हों और फैट, नमक व शुगर कम हो, दिल के लिए फायदेमंद होता है.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 25 Mar 2026 02:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>Dementia Risk And Diet: बॉडी में पनप रहा डिमेंशिया का जीन तो तुरंत बढ़ा दें इस चीज की खुराक, स्टडी में हुआ खुलासा</title>
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        <description><![CDATA[ Can Eating Meat Reduce Dementia Risk: अगर आपके शरीर में अल्जाइमर से जुड़ा जीन मौजूद है, तो आपकी डाइट में एक छोटा सा बदलाव डिमेंशिया के खतरे को काफी हद तक कम कर सकता है. एक नई स्टडी में सामने आया है कि जो लोग नियमित रूप से मीट का सेवन करते हैं, उनमें याददाश्त कमजोर होने और डिमेंशिया का खतरा लगभग आधा तक कम हो सकता है. साइंटिस्ट के मुताबिक, APOE नाम का जीन अल्जाइमर से जुड़ा होता है और यह बीमारी के ज्यादातर मामलों में पाया जाता है. &amp;nbsp;खासतौर पर APOE4 वेरिएंट वाले लोगों में डिमेंशिया का जोखिम ज्यादा होता है. लेकिन रिसर्च में पाया गया कि अगर ऐसे लोग अपनी डाइट में मीट की मात्रा बढ़ाते हैं, तो उनके दिमाग पर इसका पॉजिटिव असर पड़ सकता है.&amp;nbsp;
क्या निकला रिसर्च में?
यह स्टडी स्टॉकहोम यूनिवर्सिटी के रिसर्चर ने की, जिसमें 60 साल या उससे ज्यादा उम्र के 2000 से अधिक लोगों को करीब 15 साल तक ट्रैक किया गया, इस दौरान उनकी खाने-पीने की आदतों पर नजर रखी गई और खासतौर पर मीट के सेवन को फोकस में रखा गया. रिसर्च के नतीजे चौंकाने वाले थे. जिन लोगों के शरीर में APOE4 जीन था और जो सबसे ज्यादा मीट खाते थे, उनमें डिमेंशिया का खतरा उन लोगों के मुकाबले करीब 45 प्रतिशत कम पाया गया, जो मीट कम खाते थे, इतना ही नहीं, इन लोगों की सोचने-समझने की क्षमता भी बेहतर बनी रही और मानसिक गिरावट की रफ्तार धीमी देखी गई.&amp;nbsp;
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किस तरह का मीट फायदेमंद?
हालांकि, यहां एक अहम बात भी सामने आई. सभी तरह का मीट फायदेमंद नहीं होता. प्रोसेस्ड मीट जैसे बेकन, सॉसेज या ज्यादा प्रोसेस किया हुआ मांस दिमाग के लिए नुकसानदायक हो सकता है और इससे डिमेंशिया का खतरा बढ़ सकता है. यानी अगर फायदा चाहिए, तो अनप्रोसेस्ड मीट को प्राथमिकता देना जरूरी है. साइंटिस्ट का मानना है कि इस फायदे के पीछे विटामिन B12 की भूमिका हो सकती है. मीट में यह विटामिन अच्छी मात्रा में पाया जाता है, जो दिमाग की सेहत और याददाश्त के लिए बेहद जरूरी होता है. B12 की कमी होने पर याददाश्त कमजोर होना, समझने में दिक्कत और मानसिक समस्याएं तक हो सकती हैं.
ये चीजें हैं फायदेमंद
हालांकि, साइंटिस्ट यह भी मानते हैं कि यह रिसर्च अभी शुरुआती स्तर पर है और इसे पूरी तरह अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता. कुछ एक्सपर्ट का कहना है कि लाइफस्टाइल, आर्थिक स्थिति और अन्य आदतें भी इस पर असर डाल सकती हैं. फिर भी, यह साफ है कि सही खानपान, एक्टिव लाइफस्टाइल और मानसिक रूप से सक्रिय रहना दिमाग को लंबे समय तक स्वस्थ रखने में मदद करता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 25 Mar 2026 02:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Dry Mouth In The Morning: सुबह उठते ही सूख रहा है मुंह और आ रही है बदबू? शरीर के अंदर छिपी है यह बड़ी गड़बड़</title>
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        <description><![CDATA[ Why Do I Wake Up With Dry Mouth And Bad Breath: सुबह उठते ही मुंह सूखा-सूखा लगे और बदबू आए, तो हम अक्सर इसे सामान्य &quot;मॉर्निंग ब्रीथ&quot; मानकर नजरअंदाज कर देते हैं. &amp;nbsp;लेकिन कई बार यह सिर्फ रात भर की नींद का असर नहीं होता, बल्कि शरीर के अंदर चल रही कुछ गड़बड़ियों का संकेत भी हो सकता है. असल में हमारा मुंह शरीर का एक तरह का आईना होता है, जो बताता है कि रात के दौरान शरीर ने पानी, सांस और पाचन को कैसे संभाला. चलिए विस्तार से बताते हैं,&amp;nbsp;
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
डॉ. गर्गी सिंह ठाकुर ने TOI को बताया कि अनुसार सुबह मुंह सूखना या बदबू आना डिहाइड्रेशन, खराब नींद या मेटाबॉलिज्म से जुड़ी समस्याओं का संकेत हो सकता है. दरअसल, जब हम सोते हैं तो शरीर में लार बनना कम हो जाता है. यही लार हमारे मुंह को साफ रखती है, बैक्टीरिया को कंट्रोल करती है और खाने के कणों को हटाती है. जैसे ही इसकी मात्रा घटती है, बैक्टीरिया तेजी से बढ़ने लगते हैं और सुबह बदबू ज्यादा महसूस होती है.
मुंह सूखने की वजह क्या है?
मुंह सूखने की एक बड़ी वजह डिहाइड्रेशन भी है. अगर शरीर में पानी की कमी होती है, तो शरीर जरूरी अंगों को प्राथमिकता देता है और मुंह में लार कम बनने लगती है. एसी में सोना, रात में कैफीन या शराब लेना इस समस्या को और बढ़ा सकता है. एक और कारण है मुंह से सांस लेना. कई लोग नाक बंद होने, एलर्जी या आदत की वजह से मुंह से सांस लेते हैं, जिससे मुंह जल्दी सूख जाता है और बैक्टीरिया बढ़ने लगते हैं. यह खराब नींद का भी संकेत हो सकता है, क्योंकि मुंह से सांस लेना अक्सर खर्राटों और नींद टूटने से जुड़ा होता है.
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नींद की क्वालिटी का असर
नींद की क्वालिटी भी यहां अहम भूमिका निभाती है. अगर नींद बार-बार टूटती है या गहरी नहीं होती, तो नर्वस सिस्टम प्रभावित होता है और लार का बनना और कम हो जाता है. यही वजह है कि जो लोग ठीक से सो नहीं पाते, उन्हें सुबह यह समस्या ज्यादा होती है. कई बार बदबू का कारण पाचन से भी जुड़ा होता है. अगर खाना सही तरीके से नहीं पचता, तो शरीर में कुछ तत्व जमा होने लगते हैं, जो सांस के जरिए बाहर आते हैं और बदबू पैदा करते हैं. एसिड रिफ्लक्स या अनियमित खानपान इस समस्या को और बढ़ा सकते हैं.
तनाव और कुछ दवाइयां भी इस समस्या को बढ़ा सकती हैं. &amp;nbsp;तनाव से सांस लेने का तरीका बदल जाता है और लार कम बनने लगती है. वहीं, कुछ दवाइयां जैसे एंटीहिस्टामिन या ब्लड प्रेशर की दवाएं भी मुंह को सूखा बना सकती हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 25 Mar 2026 02:30:06 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>ज्यादा स्क्रीन टाइम बच्चों की हार्ट हेल्थ के लिए कितनी खतरनाक? चौंका देगी यह स्टडी</title>
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        <description><![CDATA[ आज के डिजिटल दौर में बच्चों की लाइफस्टाइल तेजी से बदल रही है. डिजिटल दौर में बच्चे होमवर्क से ब्रेक के दौरान, सोने से पहले, ऑनलाइन क्लास, गेमिंग और स्ट्रीमिंग के लिए स्मार्टफोन का इस्तेमाल करते हैं. जिससे बच्चों का स्क्रीन टाइम तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन अब एक नई स्टडी में चेतावनी दी है कि जरूरत से ज्यादा स्क्रीन टाइम सिर्फ आंखों या दिमाग पर ही नहीं बल्कि दिल की सेहत पर भी असर डाल सकता है. स्टडी के अनुसार खाली समय में स्क्रीन पर बिताया गया हर एक्स्ट्रा घंटा चाहे वह सोशल मीडिया स्क्रोल करना हो, &amp;nbsp;वेब सीरीज देखना हो या गेम खेलना हो बच्चों में हार्ट से संबंधित बीमारियों का खतरा बढ़ा रहा है. ऐसे में चलिए अब आपको बताते हैं कि ज्यादा स्क्रीन टाइम बच्चों में हार्ट हेल्थ का खतरा कैसे बढ़ा रहा है और स्टडी में क्या सामने आया है?
क्या कहती है स्टडी?&amp;nbsp;
जर्नल ऑफ द अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन में पब्लिश रिसर्च के अनुसार बच्चों और किशोर में हर एक्स्ट्रा घंटे का स्क्रीन टाइम उनके कार्डियो मेटाबोलिक खतरे यानी दिल और मेटाबॉलिज्म से जुड़े खतरे को बढ़ा सकता है. इस रिसर्च में 1000 से ज्यादा बच्चों और युवाओं को शामिल किया गया था. वहीं रिसर्च में पाया गया है कि 6 से 10 साल के बच्चों में हर एक्स्ट्रा घंटे स्क्रीन टाइम से खतरा बढ़ता है. वहीं किशोर में यह असर और ज्यादा देखा गया है. इसके अलावा ज्यादा स्क्रीन टाइम का सीधा &amp;nbsp;संबंध नींद की कमी से भी जुड़ा पाया गया है.&amp;nbsp;
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नींद से जुड़ा बड़ा कनेक्शन&amp;nbsp;
स्टडी में यह भी सामने आया है कि कम नींद लेने वाले बच्चों में यह खतरा ज्यादा बढ़ जाता है. देर रात तक स्क्रीन देखने से नींद प्रभावित होती है, जिससे शरीर के मेटाबॉलिज्म पर असर पड़ता है. रिसर्च के अनुसार स्क्रीन टाइम और हार्ड डिस्क के बीच 12 प्रतिशत संबंध नींद की कमी के जरिए बनता है. यानी अगर बच्चों की नींद बेहतर होती है तो कुछ हद तक खतरा कम किया जा सकता है. वहीं एक्सपर्ट्स के अनुसार लंबे समय तक स्क्रीन के सामने बैठना, बच्चों की फिजिकल एक्टिविटी को कम कर देता है. इससे वजन बढ़ने का खतरा, ब्लड प्रेशर और शुगर लेवल प्रभावित हो सकते हैं और शरीर में फैट और कोलेस्ट्रॉल बढ़ सकता है. यह सभी फैक्टर आगे चलकर दिल की बीमारियों का कारण बन सकते हैं.&amp;nbsp;
भारत में क्यों बढ़ रही चिंता?
भारत में भी बच्चों में स्क्रीन टाइम तेजी से बढ़ा है, खासकर ऑनलाइन पढ़ाई और स्मार्टफोन के इस्तेमाल के बाद में यह टाइम ज्यादा हो गया है. ऐसे में यह स्टडी भारतीय परिवारों के लिए भी बहुत जरूरी मानी जा रही है. क्योंकि यहां भी बच्चों की नींद और एक्टिविटी पर असर देखा गया है. हालांकि इसे लेकर एक्सपर्ट्स का कहना है कि बच्चों की लाइफस्टाइल में छोटे बदलाव करके इस खतरे को कम किया जा सकता है. जैसे रोजाना स्क्रीन टाइम सीमित रखना, सोने से पहले स्क्रीन से दूरी बनाना, बच्चों को खेलकूद और फिजिकल एक्टिविटी के लिए प्रोत्साहित करना और घर में कुछ समय और जगह को नो स्क्रीन बनाना बनाने जैसी चीजों से पेरेंट्स बदलाव कर सकते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 24 Mar 2026 14:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Best Time To Get Pregnant: पीरियड शुरू होने के कितने दिन बाद प्रेग्नेंसी के सबसे ज्यादा चांस, न्यू कपल्स के लिए जरूरी बात</title>
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        <description><![CDATA[ How Many Days After Period Can You Get Pregnant: अगर आप प्रेग्नेंसी प्लान कर रहे हैं, तो सबसे पहले अपने मेंस्ट्रुअल साइकिल को समझना बहुत जरूरी है. आमतौर पर एक महिला का साइकिल करीब 28 दिनों का होता है, लेकिन यह 21 से 35 दिनों के बीच भी हो सकता है. हर साइकिल चार मुख्य चरणों में बंटा होता है और इन्हीं के आधार पर यह तय होता है कि प्रेग्नेंसी के चांसेस कब सबसे ज्यादा होते हैं. चलिए आपको इसके बारे में विस्तार से बताते हैं.&amp;nbsp;
पीरियड्स को समझना सबसे जरूरी
cloudninecare की रिपोर्ट के अनुसार, साइकिल की शुरुआत पीरियड्स से होती है, जो लगभग 4 से 5 दिन तक चलते हैं. इस दौरान शरीर में हार्मोन का स्तर कम रहता है. &amp;nbsp;इसके बाद फॉलिक्युलर फेज आता है, जिसमें शरीर अगली ओव्यूलेशन के लिए तैयार होने लगता है. इस समय ओवरी में एग्स विकसित होते हैं और एस्ट्रोजन बढ़ने लगता है, जिससे गर्भाशय की परत मोटी होने लगती है. साइकिल का सबसे अहम समय ओव्यूलेशन होता है, जो आमतौर पर 28 दिन के साइकिल में 14वें दिन के आसपास होता है.
&amp;nbsp;इसी दौरान ओवरी से एक मैच्योर एग रिलीज होता है, जो लगभग 12 से 24 घंटे तक ही जीवित रहता है. इसके बाद ल्यूटल फेज आता है, जिसमें प्रोजेस्टेरोन हार्मोन बढ़ता है और शरीर प्रेग्नेंसी के लिए तैयार होता है. अगर इस समय फर्टिलाइजेशन नहीं होता, तो हार्मोन गिरने लगते हैं और फिर से पीरियड्स शुरू हो जाते हैं.
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सबसे ज्यादा चांस कब?
अब बात आती है फर्टाइल डेज की, यानी वो दिन जब प्रेग्नेंसी के चांसेस सबसे ज्यादा होते हैं. ओव्यूलेशन इस पूरे प्रोसेस का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन सिर्फ उसी दिन ही नहीं, उससे पहले के कुछ दिन भी उतने ही अहम होते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि स्पर्म महिला के शरीर में 5 दिनों तक जीवित रह सकता है. इसलिए ओव्यूलेशन से करीब 5 से 6 दिन पहले से लेकर ओव्यूलेशन के दिन तक का समय फर्टाइल विंडो माना जाता है. अगर आपका साइकिल 28 दिन का है, तो आमतौर पर 9वें दिन से 14वें दिन के बीच प्रेग्नेंसी के चांसेस सबसे ज्यादा होते हैं. हालांकि, हर महिला का साइकिल अलग होता है, इसलिए अपने शरीर के पैटर्न को समझना जरूरी है.
शरीर भी देता है संकेत
सिर्फ कैलेंडर देखना ही काफी नहीं होता, शरीर खुद भी संकेत देता है कि ओव्यूलेशन का समय नजदीक है. इस दौरान सर्वाइकल म्यूकस में बदलाव आता है, जो ज्यादा चिकना, पारदर्शी और खिंचाव वाला हो जाता है, बिल्कुल अंडे की सफेदी जैसा. कुछ महिलाओं को निचले पेट में हल्का दर्द भी महसूस होता है, जिसे मिडलशमर्ज कहा जाता है. व्यूलेशन के बाद बेसल बॉडी टेम्परेचर में हल्की बढ़ोतरी भी देखी जा सकती है. &amp;nbsp;इसके अलावा इस समय सेक्स ड्राइव भी बढ़ सकती है, जो शरीर का एक प्राकृतिक संकेत है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 24 Mar 2026 14:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>एसी में ज्यादा देर रहने से क्यों भारी हो जाता है सिर, जान लीजिए कारण?</title>
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        <description><![CDATA[ आज के आधुनिक युग में गर्मी से राहत पाने के लिए एयर कंडीशनर (एसी) का उपयोग आम बात हो गई है. घर-ऑफिस और मॉल से लेकर गाड़ियों तक एसी का इस्तेमाल किया जाता है. अगर आप भी गर्मी से बचने के लिए अपना ज्यादातर समय एसी में गुजार रहे हैं तो आपको सावधान हो जाना चाहिए, क्योंकि इसके कई साइड इफेक्ट्स हैं. यह आपको बीमार कर सकती है. हेल्थ वेबसाइट्स के मुताबिक, अगर आप अपना ज्यादा वक्त AC में बिता रहे हैं तो सिक बिल्डिंग सिंड्रोम बढ़ने का खतरा रहता है.
AC बना सकता है बीमार
एसी की ठंडी हवा राहत देने का काम करती है, लेकिन कई बार ये परेशानी का कारण बन जाती है, जिसकी वजह से सिरदर्द, गला बैठना, सर्दी-खांसी और त्वचा का सूखना जैसे लक्षण एयर कंडीशनर में बैठने के बाद अक्सर देखने को मिलते हैं. लगातार शुष्क ठंडी हवा में रहने से सांस लेने में तकलीफ, साइनस में परेशानी और मस्तिष्क में ऑक्सीजन के प्रवाह में बदलाव के कारण भारीपन महसूस होता है. एसी (AC) में ज्यादा देर रहने से सिर भारी होने या दर्द होना एक आम बात है. आइए जानते हैं ऐसा क्यों होता है?&amp;nbsp;
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एसी में रहने से सिर भारी होने के मुख्य कारण

डिहाइड्रेशन: एसी कमरे की नमी सोख लेता है, जिससे हवा बहुत शुष्क हो जाती है. यह शुष्क हवा शरीर से नमी को खींच लेती है, जिससे पानी की कमी यानी डिहाइड्रेशन हो जाता है और सिरदर्द होता है.
खून की नलियों का सिकुड़ना: खून की नलियों का सिकुड़ना, जिसको Vasoconstriction भी बोला जाता है. शरीर बहुत ठंडी हवा के संपर्क में आने पर खुद को गर्म रखने के लिए Blood vessels को सिकोड़ने लगता है, जिससे सिर और मस्तिष्क में तनाव बढ़ता है और सिर दर्द जैसी परेशानी होती है.&amp;nbsp;
साइनस की समस्या: ठंडी और सूखी हवा नाक और गले के म्यूकस मेंब्रेन को सुखा देती है, जिससे साइनस में सूजन या भारीपन हो सकता है. इस कारण से भी सिर दर्द जैसी परेशानी होती है.&amp;nbsp;
ऑक्सीजन का स्तर और ताजगी में कमी: इसके कारण कम तापमान और बंद कमरे में रहने से मांसपेशियों में अकड़न और थकान हो जाती है, जिससे सिर भारी महसूस होने लगता है.&amp;nbsp;

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इससे बचाव के उपाय
एसी का तापमान बहुत कम न रखें. इसका तापमान 24-26&amp;deg;C के आसपास रखें. साथ ही, एसी में रहने के दौरान भी समय-समय पर पानी पीते रहना बहुत जरूरी है. इसके अलावा लगातार कई घंटों तक एसी में न बैठें. बीच-बीच में बाहर निकलते रहें और एसी का एयर फिल्टर नियमित रूप से साफ करते रहना भी जरूरी है.
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        <pubDate>Tue, 24 Mar 2026 14:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>Heatwave And Nervous System: आपके नर्वस सिस्टम के लिए क्यों खतरनाक हैं आने वाली गर्मियां, जानें किन बीमारियों का खतरा?</title>
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        <description><![CDATA[ How Extreme Heat Affects The Nervous System: भारतीय गर्मियों में बाहर निकलते ही फर्क साफ महसूस होने लगता है. यह सिर्फ गर्मी नहीं होती, बल्कि एक तरह का भारीपन होता है, जो शरीर के साथ-साथ दिमाग पर भी असर डालता है. धीरे-धीरे थकान बढ़ती है, ध्यान भटकने लगता है और कई बार स्थिति इससे भी ज्यादा गंभीर हो जाती है. हम अक्सर डिहाइड्रेशन, सनबर्न या थकावट की बात करते हैं, लेकिन असल में गर्मी का सीधा असर दिमाग पर भी पड़ता है. तेज गर्मी में सिरदर्द, चक्कर आना, कन्फ्यूजन और ध्यान लगाने में दिक्कत जैसे लक्षण दिखने लगते हैं.&amp;nbsp;
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
TOI Health से बातचीत में चेन्नई के कावेरी हॉस्पिटल की सीनियर न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. शुभा सुब्रमणियन बताती हैं कि गर्मियों में ज्यादा गर्मी और उमस के कारण शरीर में पानी और सोडियम की कमी हो जाती है, जिससे दौरे तक पड़ सकते हैं. ज्यादा पसीना आने से सोडियम लेवल गिर जाता है और यह स्थिति और खतरनाक हो जाती है. कई मामलों में हीट स्ट्रोक भी हो सकता है, जिससे बेहोशी और सीजर का खतरा बढ़ जाता है. ऐसे में खासकर जिन लोगों को पहले से दौरे की समस्या है, उन्हें खुद को हाइड्रेट रखना चाहिए और हल्के, ढीले व हल्के रंग के कपड़े पहनने चाहिए.
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किन लोगों को होता है असर?
बच्चे, बुजुर्ग और जिन लोगों को पहले से न्यूरोलॉजिकल समस्याएं हैं, वे ज्यादा जोखिम में रहते हैं. इसके अलावा, जो लोग लंबे समय तक बाहर काम करते हैं, जैसे डिलीवरी वर्कर्स, ट्रैफिक पुलिस या रेहड़ी-पटरी वाले, उनके लिए यह समस्या रोज की बन जाती है. वहीं, घर के अंदर भी हमेशा सुरक्षित माहौल नहीं होता. खराब वेंटिलेशन, बिजली कटौती या कूलिंग की कमी से स्थिति और बिगड़ सकती है, जिससे दिमाग का संतुलन प्रभावित होता है.
किन बीमारियों का बढ़ता है खतरा?
डॉ. शुभा सुब्रमणियन के मुताबिक, गर्मी का असर कई ऐसी बीमारियों पर भी पड़ता है, जिनके बारे में हम ज्यादा बात नहीं करते. जैसे बच्चों में ड्रावेट सिंड्रोम जैसी एपिलेप्सी की स्थिति गर्मी में और खराब हो सकती है. इसके अलावा, अत्यधिक गर्मी से याददाश्त कमजोर होना, ब्रेन फॉग और सोचने-समझने की क्षमता पर असर पड़ सकता है. मल्टीपल स्क्लेरोसिस जैसे रोगों में लक्षण बढ़ सकते हैं, जबकि डिहाइड्रेशन के कारण स्ट्रोक का खतरा भी बढ़ जाता है.
पार्किंसन और अल्जाइमर के मरीजों के लिए भी गर्मी खतरनाक हो सकती है, क्योंकि उनके शरीर की तापमान कंट्रोल करने की क्षमता कमजोर होती है. वहीं, माइग्रेन से पीड़ित लोगों में धूप में निकलना सिरदर्द को ट्रिगर कर सकता है. गर्मी थकान को भी बढ़ाती है, जिससे रोजमर्रा की जिंदगी और मुश्किल हो जाती है.
इसे भी पढ़ें-&amp;nbsp;Vitamin Side Effects: सावधान! बिना डॉक्टरी सलाह के यह विटामिन लेना पड़ सकता है भारी, जा सकती है आंखों की रोशनी
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 24 Mar 2026 14:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>Colon Cancer Symptoms: युवा हैं और शरीर में दिख रहे ये 5 साइलेंट लक्षण तो हो जाएं अलर्ट, वरना यह कैंसर बना लेगा शिकार</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/colon-cancer-symptoms-युवा-हैं-और-शरीर-में-दिख-रहे-ये-5-साइलेंट-लक्षण-तो-हो-जाएं-अलर्ट-वरना-यह-कैंसर-बना-लेगा-शिकार</link>
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        <description><![CDATA[ What Are The Early Signs Of Colon Cancer: आजकल युवाओं में कोलन कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, जिसे लेकर डॉक्टरों ने खास चेतावनी दी है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर यह बीमारी शरीर के अन्य हिस्सों में फैल जाती है, तो इसके बाद सर्वाइवल रेट काफी कम होकर लगभग 10 प्रतिशत तक रह जाता है. इसलिए इसके शुरुआती संकेतों को समझना बेहद जरूरी है, ताकि समय रहते इलाज शुरू किया जा सके.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कोलन कैंसर के शुरुआती लक्षण बहुत सामान्य होते हैं, जिन्हें लोग अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं. कई बार ये लक्षण दर्द भी नहीं करते, इसलिए लोग इन्हें गंभीरता से नहीं लेते. ब्रिस्टल के द लैगॉम क्लिनिक के जीपी डॉ. जैक ओग्डेन के अनुसार, ये पांच लक्षण अक्सर इतने हल्के होते हैं कि लोग इन्हें नजरअंदाज कर देते हैं, क्योंकि इनमें ज्यादा दर्द महसूस नहीं होता।, कुछ ऐसे संकेत हैं जिन पर ध्यान देना बेहद जरूरी है.&amp;nbsp;
क्या होते हैं संकेत?
पहला संकेत है आयरन की कमी यानी एनीमिया. अगर बिना किसी वजह के थकान, त्वचा का पीला पड़ना या सांस फूलने जैसी समस्याएं हो रही हैं, तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए. कई बार यह अंदरूनी ब्लीडिंग की वजह से होता है, जो ट्यूमर के कारण हो सकती है. दूसरा लक्षण है मल त्याग से जुड़ी दिक्कतें. जैसे बार-बार कब्ज या दस्त होना, या फिर स्टूल का बहुत पतला हो जाना. यह इस बात का संकेत हो सकता है कि आंत में कोई रुकावट है, जो ट्यूमर की वजह से बन रही हो.
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तीसरा संकेत है बिना कोशिश के अचानक वजन कम होना। अगर आप डाइटिंग या एक्सरसाइज नहीं कर रहे हैं, फिर भी वजन तेजी से घट रहा है, तो यह शरीर के अंदर किसी समस्या का संकेत हो सकता है. कई बार ट्यूमर की वजह से शरीर पोषक तत्वों को सही से अब्जर्व नहीं कर पाता. चौथा लक्षण पेट से जुड़ा होता है, जैसे लगातार दर्द, ऐंठन या थोड़ी सी मात्रा में खाने के बाद ही पेट भरा हुआ महसूस होना. यह संकेत भी आंत से जुड़ी समस्या की ओर इशारा कर सकता है.
मल में खून आना
पांचवां और सबसे अहम संकेत है मल में खून आना. अगर स्टूल में काला या गहरा लाल रंग दिखे, तो यह शरीर के अंदर कहीं ऊपर ब्लीडिंग का संकेत हो सकता है. हालांकि, कई बार यह बवासीर या एनल फिशर की वजह से भी हो सकता है, लेकिन इसे नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है. डॉक्टरों का कहना है कि अगर इन लक्षणों में से कोई भी लंबे समय तक बना रहे, तो तुरंत जांच करानी चाहिए. खासकर स्टूल टेस्ट और अन्य मेडिकल जांच से सही स्थिति का पता लगाया जा सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 23 Mar 2026 22:30:11 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Kidney Stones Prevention: क्या ज्यादा से ज्यादा पानी पीने से नहीं होता किडनी में स्टोर? आपकी गलतफहमी दूर कर देगी यह स्टडी</title>
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        <description><![CDATA[ Does Drinking More Water Prevent Kidney Stones: किडनी स्टोन यानी गुर्दे की पथरी एक आम लेकिन बेहद दर्दनाक समस्या है. जिन लोगों को यह होती है, वे अक्सर बताते हैं कि इसका दर्द सबसे ज्यादा तकलीफ देने वाला होता है. यह न सिर्फ रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करता है, बल्कि कई बार अस्पताल तक जाने की नौबत भी आ जाती है. आंकड़ों के मुताबिक, काफी बड़ी संख्या में लोग जीवन में कभी न कभी इस समस्या का सामना करते हैं और कई मामलों में यह दोबारा भी हो सकती है.&amp;nbsp;
पर्याप्त पानी पीने की सलाह
इसी वजह से डॉक्टर हमेशा ज्यादा पानी पीने की सलाह देते हैं. माना जाता है कि पर्याप्त मात्रा में पानी पीने से यूरिन पतला रहता है, जिससे मिनरल्स आपस में चिपककर पथरी नहीं बना पाते. लेकिन समस्या यह है कि ज्यादातर लोग इस आदत को लंबे समय तक बनाए नहीं रख पाते. इसी बात को समझने के लिए हाल ही में एक बड़ी स्टडी की गई, जिसे Urinary Stone Disease Research Network ने संचालित किया और Duke Clinical Research Institute ने कोऑर्डिनेट किया. यह रिसर्च प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल The Lancet में प्रकाशित हुई, जिससे इसकी विश्वसनीयता और भी बढ़ जाती है.
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किन लोगों को इसमें शामिल किया गया?
इस स्टडी में अमेरिका के छह बड़े मेडिकल सेंटर से कुल 1,658 लोगों को शामिल किया गया, जिनमें किशोर और वयस्क दोनों थे. रिसर्च का मकसद यह जानना था कि क्या लोगों को ज्यादा पानी पीने के लिए खास तरीके से मोटिवेट करने पर किडनी स्टोन को दोबारा बनने से रोका जा सकता है. प्रतिभागियों को दो ग्रुप में बांटा गया. एक ग्रुप को सामान्य सलाह दी गई, जबकि दूसरे ग्रुप को एक खास &quot;हाइड्रेशन प्रोग्राम&quot; में शामिल किया गया. इस प्रोग्राम के तहत स्मार्ट बोतल, रिमाइंडर मैसेज, पर्सनल टारगेट और कोचिंग जैसी सुविधाएं दी गईं, ताकि लोग ज्यादा पानी पी सकें.
क्या निकला रिजल्ट?
करीब दो साल तक चले इस अध्ययन में पाया गया कि जिन लोगों ने इस प्रोग्राम को फॉलो किया, उन्होंने पानी पीने की मात्रा जरूर बढ़ाई. लेकिन यह बढ़ोतरी इतनी नहीं थी कि किडनी स्टोन के दोबारा बनने के खतरे को पूरी तरह कम किया जा सके. रिसर्चर्स का कहना है कि असली चुनौती लोगों का लंबे समय तक इस आदत को बनाए रखना है. भले ही लोग फायदे जानते हों और उन्हें सपोर्ट भी मिले, फिर भी रोजाना ज्यादा पानी पीना आसान नहीं होता. इसके अलावा, यह भी सामने आया कि हर व्यक्ति के लिए एक जैसा टारगेट सही नहीं हो सकता. शरीर की बनावट, लाइफस्टाइल, मौसम और हेल्थ कंडीशन जैसे कई फैक्टर यह तय करते हैं कि किसी को कितनी मात्रा में पानी की जरूरत है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 23 Mar 2026 22:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>FDA Supplement Alert: Amazon पर बिक रहे इन सप्लीमेंट में मिला जहर! इस्तेमाल करते हैं तो तुरंत बना लें दूरी</title>
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        <description><![CDATA[ Which Supplements Contain Toxic Ingredients: अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन के &amp;nbsp;हेल्थ अधिकारियों ने 29 तरह के सप्लीमेंट्स को लेकर चेतावनी जारी की है, क्योंकि इनमें जहरीले तत्व पाए जाने का खतरा है. ये सप्लीमेंट्स खुद को तेजोकोटे रूट या ब्राजील सीड बताकर बेचे जा रहे थे, जिन्हें आम तौर पर वजन घटाने और एंटीऑक्सीडेंट के लिए इस्तेमाल किया जाता है. लेकिन जांच में सामने आया कि इन प्रोडक्ट्स में असल में येलो ओलियंडर नाम का जहरीला पौधा मौजूद है. यह पौधा मेक्सिको और सेंट्रल अमेरिका में पाया जाता है और स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक माना जाता है.
क्या होता है इससे नुकसान?
एफडीए के मुताबिक, येलो ओलियंडर का सेवन करने से शरीर पर गंभीर असर पड़ सकता है. इससे दिल, दिमाग और डाइजेशन से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं. कई मामलों में कार्डियक अरेस्ट, पेट दर्द, उलझन और अन्य गंभीर लक्षण भी सामने आ सकते हैं, जो जानलेवा साबित हो सकते हैं. ये सप्लीमेंट्स अमेजन, ईबे और एट्सी जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स के साथ-साथ कई वेबसाइट्स पर बेचे जा रहे थे. अब एफडीए ने लोगों को सलाह दी है कि वे इन प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल तुरंत बंद कर दें और इन्हें सुरक्षित तरीके से नष्ट कर दें.&amp;nbsp;
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कुछ कंपनियों ने प्रोडक्ट वापस लेने का फैसला लिया
कुछ कंपनियों ने अपने प्रोडक्ट्स को वापस मंगवाने (रिकॉल) का फैसला किया है, जबकि कई कंपनियों से संपर्क भी नहीं हो पाया या उन्होंने रिकॉल से इनकार कर दिया है. एफडीए ने यह भी कहा है कि अगर किसी ने इन सप्लीमेंट्स का सेवन किया है, तो वह तुरंत डॉक्टर से संपर्क करे, भले ही अभी कोई लक्षण न दिख रहे हों. अगर किसी को गंभीर साइड इफेक्ट महसूस हो रहे हैं, तो तुरंत इमरजेंसी मेडिकल मदद लें ..इस मामले की जांच 2023 में शुरू हुई थी, जब सीडीसी की रिपोर्ट में पाया गया था कि तेजोकोटे रूट के नाम पर बेचे जा रहे कुछ प्रोडक्ट्स में येलो ओलियंडर मिला हुआ है.एफडीए को आशंका है कि बाजार में मौजूद ऐसे और भी कई प्रोडक्ट्स हो सकते हैं, जो अलग-अलग नामों से बेचे जा रहे हैं लेकिन उनमें यही जहरीला तत्व हो सकता है.
दरअसल, येलो ओलियंडर का इस्तेमाल इसलिए किया जाता है क्योंकि इसके जहरीले तत्व भूख कम करते हैं और उल्टी-दस्त जैसे लक्षण पैदा करते हैं, जिससे तेजी से वजन कम होता दिखता है. लेकिन यह तरीका बेहद खतरनाक है और गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकता है. इन सप्लीमेंट्स की पहचान करना भी आसान नहीं है, क्योंकि येलो ओलियंडर के बीज दिखने में कुछ नेचुरल प्रोडक्ट्स जैसे कैंडलनट जैसे लगते हैं. यही वजह है कि लोग बिना जाने इन्हें इस्तेमाल कर लेते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 23 Mar 2026 18:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>COVID And Cancer Risk: जिन लोगों को हुआ था सीवियर कोविड, वे तुरंत करा लें यह टेस्ट, वरना यह कैंसर बना लेगा शरीर में घर</title>
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        <description><![CDATA[ Can Severe COVID Increase Cancer Risk: हाल ही में सामने आई एक नई रिसर्च ने एक चौंकाने वाली बात उजागर की है. &amp;nbsp;इसमें बताया गया है कि अगर किसी व्यक्ति को कोविड-19 या फ्लू का गंभीर इंफेक्शन हुआ है, तो भविष्य में उसके कैंसर का खतरा बढ़ सकता है. यह सुनने में थोड़ा डराने वाला जरूर है, लेकिन साइंटिस्ट का मानना है कि इसके पीछे शरीर में होने वाले कुछ लंबे समय तक रहने वाले बदलाव जिम्मेदार हो सकते हैं.
क्या निकला रिसर्च में?
दरअसल, जब शरीर किसी गंभीर वायरल इंफेक्शन से गुजरता है, खासकर जो लंग्स को प्रभावित करता है, तो वह पूरी तरह से पहले जैसा नहीं हो पाता. यूनिवर्सिटी ऑफ वर्जीनिया के कार्टर सेंटर की एक नई रिसर्च में सामने आया है कि कोविड-19 या फ्लू का गंभीर इंफेक्शन भविष्य में कैंसर का खतरा बढ़ा सकता है. &amp;nbsp;वैज्ञानिकों ने पाया कि कुछ खास इम्यून सेल्स, जैसे न्यूट्रोफिल और मैक्रोफेज, जो आमतौर पर शरीर को इंफेक्शन से बचाते हैं, गंभीर बीमारी के बाद सही तरीके से काम नहीं कर पाते. कई मामलों में ये सेल्स असामान्य तरीके से व्यवहार करने लगते हैं और सूजन को कम करने के बजाय बढ़ा देते हैं. यही स्थिति आगे चलकर शरीर में एक ऐसा माहौल बना सकती है, जो ट्यूमर के बनने के लिए अनुकूल होता है.&amp;nbsp;
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किन लोगों को ज्यादा खतरा?
रिसर्च में यह भी सामने आया कि जिन लोगों को कोविड-19, फ्लू या निमोनिया की वजह से अस्पताल में भर्ती होना पड़ा था, उनमें यह खतरा ज्यादा देखा गया, इसका मतलब यह है कि इंफेक्शन की गंभीरता भी एक अहम भूमिका निभाती है. हल्के लक्षणों वाले लोगों में ऐसा जोखिम कम पाया गया. वहीं वैक्सीन लगवाने वाले लोगों पर अलग प्रभाव दिखा.&amp;nbsp;
वैक्सीन लगवाने वाले लोगों की क्या है स्थिति?
हालांकि, इस स्टडी में एक राहत देने वाली बात भी सामने आई है. जिन लोगों ने पहले से वैक्सीन लगवाई हुई थी और उन्हें हल्का इंफेक्शन हुआ, उनमें कैंसर का खतरा नहीं बढ़ा. बल्कि कुछ मामलों में यह जोखिम थोड़ा कम भी पाया गया. इससे यह संकेत मिलता है कि वैक्सीनेशन न सिर्फ गंभीर बीमारी से बचाता है, बल्कि उसके लंबे समय तक रहने वाले दुष्प्रभावों को भी कम कर सकता है. एक्सपर्ट का कहना है कि अगर किसी को गंभीर कोविड या फ्लू हुआ है, तो उसे अपनी सेहत को लेकर थोड़ी ज्यादा सतर्कता बरतनी चाहिए. समय-समय पर हेल्थ चेकअप और जरूरी स्क्रीनिंग करवाना फायदेमंद हो सकता है, खासकर अगर पहले से कोई अन्य जोखिम कारण मौजूद हों.
इसे भी पढ़ें-&amp;nbsp;सोशल मीडिया पर छाया कैस्टर ऑयल बेली पैच ट्रेंड, जानिए क्या सच में देता है फायदा?
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 23 Mar 2026 18:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>High Blood Pressure In Cold Weather: मौसम ठंडा होते ही बढ़ गया हाई बीपी का खतरा? योग गुरु रामदेव के बताए ये 4 आसन दिलाएंगे राहत</title>
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        <description><![CDATA[ Best Yoga Asanas For High BP Patients: आजकल हाई ब्लड प्रेशर यानी हाई बीपी की समस्या तेजी से बढ़ रही है. मौसम में ठंडक आने पर यह परेशानी और भी गंभीर हो जाती है. दरअसल, ठंडे मौसम के कारण रक्त वाहिकाएं सिकुड़ जाती हैं, जिससे ब्लड प्रेशर बढ़ने का खतरा रहता है. अगर लंबे समय तक बीपी कंट्रोल में न रहे, तो इसका असर हार्ट, किडनी और दिमाग पर पड़ सकता है. बुजुर्गों, मोटापे से जूझ रहे लोगों और पहले से बीपी की समस्या वाले मरीजों को इस मौसम में खास सतर्क रहने की जरूरत होती है.
ऐसे में योग को हाई बीपी कंट्रोल करने का एक प्राकृतिक और असरदार तरीका माना जाता है, योग न सिर्फ शरीर को सक्रिय रखता है, बल्कि तनाव कम करने और ब्लड सर्कुलेशन बेहतर बनाने में भी मदद करता है. योग गुरु रामदेव के अनुसार, कुछ खास योगासन सर्दियों में हाई बीपी को संतुलित रखने में मददगार हो सकते हैं.
भुजंगासन
भुजंगासन से छाती खुलती है और फेफड़ों तक ऑक्सीजन का प्रवाह बेहतर होता है. सर्दियों में जब ठंड की वजह से रक्त संचार धीमा हो जाता है, तब यह आसन ब्लड फ्लो सुधारने में मदद करता है. इससे हार्ट पर पड़ने वाला दबाव कम होता है और ब्लड प्रेशर संतुलन में रहता है.
मंडूकासन
मंडूकासन पेट और नर्वस सिस्टम पर सकारात्मक प्रभाव डालता है. यह तनाव और चिंता को कम करने में मदद करता है, जो सर्दियों में बीपी बढ़ने का बड़ा कारण बन सकते हैं. नियमित अभ्यास से शरीर को आराम मिलता है और ब्लड प्रेशर नियंत्रित रहता है.
शशांकासन
शशांकासन को मन को शांत करने वाला योगासन माना जाता है. मानसिक तनाव और दबाव सर्दियों में बीपी बढ़ा सकते हैं. यह आसन दिमाग को शांत करता है, दिल की धड़कन को सामान्य करता है और हाई बीपी कंट्रोल में मदद करता है.
स्थित कोणासन
स्थित कोणासन शरीर का संतुलन और रक्त प्रवाह बेहतर करता है. यह दिल और मांसपेशियों को सक्रिय रखता है, जिससे अचानक बीपी बढ़ने का खतरा कम होता है. नियमित अभ्यास से शरीर गर्म रहता है और ब्लड प्रेशर स्थिर बना रहता है.
हाई बीपी कंट्रोल के लिए ये बातें भी जरूरी


नमक का सेवन सीमित रखें, इससे ब्लड प्रेशर को कंट्रोल रखने में मदद मिलती है.


रोज हल्की एक्सरसाइज या वॉक करें, इससे शरीर फिट रहता है और कई दिक्कतों को कंट्रोल किया जा सकता है.


तनाव और चिंता से दूर रहें. आप जितना ज्यादा तनाव लेंगे, दिक्कत उतना ही ज्यादा बढ़ेगी.


डॉक्टर की बताई दवाएं समय पर लें


पूरी नींद जरूर लें


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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 23 Mar 2026 18:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>Chest Pain At Night: रात के वक्त सीने में तेज दर्द होना कितना खतरनाक, डॉक्टर से जानें ऐसा होने पर क्या करें?</title>
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        <description><![CDATA[ Is Chest Pain At Night Dangerous: अगर आपको सोते समय या रात के बीच अचानक सीने में तेज दर्द महसूस हो, तो इसे हल्के में लेना खतरनाक साबित हो सकता है. कई लोग इसे गैस, एसिडिटी या थकान समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन डॉक्टरों के मुताबिक, रात में बार-बार सीने में दर्द उठना किसी गंभीर बीमारी, यहां तक कि हार्ट अटैक का संकेत भी हो सकता है. चलिए आपको बताते हैं कि कब रात में सीने में तेज दर्द आपके लिए खतरनाक हो सकता है.&amp;nbsp;
दरअसल, सीने में दर्द चाहे दिन में हो या रात में, अगर वह बार-बार हो रहा है या तेज है, तो जांच जरूरी हो जाती है. खासतौर पर नींद के दौरान दर्द से आंख खुलना एक चेतावनी मानी जाती है.
रात में सीने में दर्द क्यों उठता है?
न्यू फोर्टिस अस्पताल के कार्डियोलॉजिस्ट प्रमोद कुमार बताते हैं कि इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं. कुछ मामलों में यह मामूली भी हो सकता है, लेकिन कई बार जानलेवा स्थिति का संकेत देता है.
एंजाइना
यह तब होता है जब दिल तक खून पहुंचाने वालीआर्टरीज संकरी हो जाती हैं. इससे दिल की मांसपेशियों को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती और सीने में दबाव या दर्द महसूस होता है. यह दर्द आराम की स्थिति या नींद में भी हो सकता है और हार्ट अटैक का खतरा बढ़ा देता है.
एसिड रिफ्लक्स
लेटने की स्थिति में पेट का एसिड ऊपर की ओर आ सकता है, जिससे सीने में जलन या दबाव महसूस होता है. अगर यह दर्द दो-तीन दिन से ज्यादा बना रहे, तो डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए.
हाई ब्लड प्रेशर और फेफड़ों से जुड़ीं समस्याएं
ब्लड प्रेशर अचानक बहुत ज्यादा बढ़ने पर सीने में तेज दर्द हो सकता है. वहीं, प्ल्यूरिसी जैसी स्थिति में सांस लेते समय सीने में चुभन महसूस होती है.
कब यह हार्ट अटैक का संकेत हो सकता है?
डॉक्टरों के अनुसार, अगर सीने में दर्द के साथ ये लक्षण दिखें, तो तुरंत इमरजेंसी मदद लें-

बहुत तेज या चुभने वाला सीने का दर्द
अचानक मतली
ठंडा पसीना आना
लेटने पर सांस लेने में तकलीफ
चक्कर आना या बेहोशी
दिल की धड़कन असामान्य होना

ये हार्ट अटैक के लक्षण हो सकते हैं, जो समय पर इलाज न मिलने पर जानलेवा साबित हो सकते हैं. अगर आपको इनमें से कोई भी लक्षण दिखते हैं, तो आपको बिना समय गवाएं डॉक्टर से संपर्क करना है. अगर आपको ज्यादा दिक्कत महसूस हो, तो आप इमरजेंसी हेल्पलाइन की मदद भी ले सकते हैं.&amp;nbsp;
इसे भी पढ़ें:&amp;nbsp;नाखूनों से पहचानें सेहत का हाल, ये संकेत हो सकते हैं खतरनाक, तुरंत लें मेडिकल सलाह
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें&amp;nbsp; ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 23 Mar 2026 18:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Chest, Pain, Night:, रात, के, वक्त, सीने, में, तेज, दर्द, होना, कितना, खतरनाक, डॉक्टर, से, जानें, ऐसा, होने, पर, क्या, करें</media:keywords>
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        <title>फैटी लिवर को जड़ से खत्म कर देगी आपकी ये 5 आदतें! एकदम आसान है इन्हें करना</title>
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        <description><![CDATA[  ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 18 Mar 2026 12:30:44 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Fatty Liver Disease: लिवर में जमा फैट है खतरे की घंटी! क्यों होती है यह समस्या और अपनी &amp;apos;लिवर फैक्ट्री&amp;apos; कैसे दुरुस्त?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/fatty-liver-disease-लिवर-में-जमा-फैट-है-खतरे-की-घंटी-क्यों-होती-है-यह-समस्या-और-अपनी-लिवर-फैक्ट्री-कैसे-दुरुस्त</link>
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        <description><![CDATA[ What To Do If Ultrasound Shows Fatty Liver: अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट में फैटी लिवर शब्द पढ़ना कई लोगों के लिए चिंता की वजह बन जाता है. फैटी लिवर, जिसे मेडिकल भाषा में MASLD कहा जाता है, तब होता है जब लिवर की सेल्स में जरूरत से ज्यादा फैट जमा हो जाती है। यह समस्या किसी को भी हो सकती है, युवा, बुजुर्ग, डायबिटीज के मरीज या सामान्य वजन वाले लोग भी इससे प्रभावित हो सकते हैं. खास बात यह है कि अक्सर इसके कोई क्लियर लक्षण नहीं होते और जांच के दौरान ही इसका पता चलता है. अच्छी खबर यह है कि शुरुआती चरण में फैटी लिवर स्थायी नहीं होता. समय रहते सही कदम उठाए जाएं तो इसे रोका और कई मामलों में ठीक भी किया जा सकता है.
किन वजहों से होती है दिक्कत?
मेडिकल तौर पर फैटी लिवर का मतलब है कि लिवर के टिश्यू में 5 प्रतिशत से ज्यादा फैट जमा हो चुका है. यह आमतौर पर मेटाबॉलिक समस्याओं जैसे मोटापा, इंसुलिन रेजिस्टेंस, खून में ज्यादा फैट या असंतुलित खान-पान की वजह से होता है, न कि हमेशा शराब के कारण, अगर इस स्थिति को नजरअंदाज किया जाए तो समय के साथ यह सूजन, फाइब्रोसिस और लिवर की काम करने की क्षमता में कमी का कारण बन सकता है. लिवर को एक फैक्ट्री की तरह समझा जा सकता है, जब इसमें जरूरत से ज्यादा फैट जमा हो जाती है तो इसकी काम की स्पीड़ धीमी पड़ने लगती है.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
&amp;nbsp;डॉ. अपूर्वा पांडे ने TOI को बताया कि अल्ट्रासाउंड में फैटी लिवर का जिक्र सुनकर घबराने की जरूरत नहीं है, क्योंकि ज्यादातर मामलों में यह स्थिति उलटी भी हो सकती है. उनके अनुसार यह समस्या अक्सर मोटापा, डायबिटीज, ज्यादा कोलेस्ट्रॉल, कम फिजिकल एक्टिविटी या अत्यधिक शराब सेवन से जुड़ी होती है. फैटी लिवर के दो मुख्य प्रकार होते हैं, नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर और अल्कोहलिक फैटी लिवर. डॉक्टरों की सलाह है कि रिपोर्ट मिलने के बाद सबसे पहले घबराने के बजाय सही जानकारी लेना जरूरी है. अपने डॉक्टर से मिलकर लिवर फंक्शन टेस्ट, फाइब्रोसिस स्कोर और अन्य जोखिम कारकों जैसे ब्लड शुगर या कोलेस्ट्रॉल की जांच करानी चाहिए.
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क्या होता है इसका इलाज?
एक्सपर्ट मानते हैं कि फैटी लिवर के शुरुआती चरण में सबसे प्रभावी इलाज लाइफस्टाइल में बदलाव है. जर्नल ऑफ हेपेटोलॉजी में प्रकाशित एक स्टडी बताता है कि संतुलित आहार और नियमित व्यायाम लिवर में जमा फैट और सूजन को कम करने में मदद कर सकते हैं. डॉ. पांडे के अनुसार वजन कम करना सबसे अहम कदमों में से एक है. शरीर के कुल वजन का लगभग 5 प्रतिशत कम होने से लिवर में जमा फैट घट सकता है, जबकि 7 से 10 प्रतिशत वजन कम होने से सूजन और फाइब्रोसिस में भी सुधार देखा गया है. इसके साथ-साथ संतुलित डाइट, नियमित व्यायाम, ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखना तथा शराब से दूरी बनाना भी जरूरी है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 18 Mar 2026 08:30:09 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Fatty, Liver, Disease:, लिवर, में, जमा, फैट, है, खतरे, की, घंटी, क्यों, होती, है, यह, समस्या, और, अपनी, लिवर, फैक्ट्री, कैसे, दुरुस्त</media:keywords>
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        <title>16&amp;18 करोड़ रुपये में आता है ये छोटा सा इंजेक्शन, जानिए किस बीमारी में होता है इस्तेमाल</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/16-18-करोड़-रुपये-में-आता-है-ये-छोटा-सा-इंजेक्शन-जानिए-किस-बीमारी-में-होता-है-इस्तेमाल</link>
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        <description><![CDATA[ आज के समय में ज्यादातर बीमारियों का इलाज दवाइयों, इंजेक्शन या ऑपरेशन से हो जाता है, लेकिन कुछ बीमारियां ऐसी होती हैं, जो हमारे जीन यानी अनुवांशिक कारणों से होती हैं और उनका इलाज इतना आसान नहीं होता, खासकर छोटे बच्चों में होने वाली कुछ दुर्लभ बीमारियां बहुत गंभीर होती हैं, ऐसी ही एक बीमारी स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी (SMA) है, जिसके इलाज के लिए एक खास इंजेक्शन आता है, जिसकी कीमत करीब 16&amp;ndash;18 करोड़ रुपये तक होती है. यह दुनिया की सबसे महंगी दवाओं में से एक मानी जाती है. तो आइए जानते हैं कि 16-18 करोड़ रुपये में कौन सा छोटा सा इंजेक्शन आता है और किस बीमारी में इस्तेमाल होता है.
16-18 करोड़ रुपये में कौन सा छोटा सा इंजेक्शन आता है
16&amp;ndash;18 करोड़ रुपये की कीमत वाला छोटा सा इंजेक्शन Zolgensma होता है. यह दुनिया की सबसे महंगी दवाओं में से एक मानी जाती है और इसका यूज एक गंभीर जेनेटिक बीमारी Spinal Muscular Atrophy (SMA) के इलाज में किया जाता है. यह एक जीन थेरेपी इंजेक्शन है. इसे आमतौर पर 2 साल से कम उम्र के बच्चों को दिया जाता है. यह सिर्फ एक बार दिया जाने वाला इंजेक्शन है.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ें- Sock Marks On Ankles: क्या आपके पैरों पर भी घंटों बने रहते हैं मोजों के निशान, जानें किस दिक्कत का हो सकता है संकेत?
किस बीमारी में इस्तेमाल होता है
16&amp;ndash;18 करोड़ रुपये के इस छोटे इंजेक्शन Zolgensma का इस्तेमाल Spinal Muscular Atrophy (SMA) बीमारी में किया जाता है. &amp;nbsp;SMA एक जेनेटिक न्यूरो-मस्कुलर डिसऑर्डर यानी अनुवांशिक बीमारी है, जो शरीर की नसों और मांसपेशियों को प्रभावित करती है. इसमें शरीर के मोटर न्यूरॉन्स ठीक से काम नहीं करते, जो मांसपेशियों को नियंत्रित करते हैं. इस बीमारी में SMN1 नाम का जीन खराब या गायब होता है, जिसकी वजह से जरूरी प्रोटीन नहीं बन पाता है.
इसके कारण बच्चे की मांसपेशियां धीरे-धीरे कमजोर होने लगती हैं. उसे बैठने, खड़े होने या चलने में परेशानी होती है. गंभीर मामलों में सांस लेने और निगलने में भी दिक्कत हो सकती है. SMA बीमारी में बच्चे के शरीर में एक जरूरी जीन (SMN1) सही से काम नहीं करता है. Zolgensma उस खराब जीन की जगह सही जीन की कॉपी शरीर में पहुंचाता है, जिससे मांसपेशियों की ताकत बेहतर हो सकती है.&amp;nbsp;
इसके लक्षण क्या हैं?
SMA के लक्षण हर बच्चे में अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन कुछ आम संकेत जैसे बच्चा समय पर बैठना या चलना नहीं सीख पाता, हाथ-पैर कमजोर रहते हैं, सिर को संभालने में दिक्कत, जल्दी थकान महसूस होना, सांस लेने या निगलने में परेशानी है. अगर ये लक्षण दिखें, तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लेना बहुत जरूरी है.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ें- High Cholesterol In Young Age: अब छोटी उम्र से ही कोलेस्ट्रॉल का खतरा, हार्ट अटैक से बचना है तो... 11 मेडिकल इंस्टीट्यूट ने जारी की गाइडलाइन
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 18 Mar 2026 00:30:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>16-18, करोड़, रुपये, में, आता, है, ये, छोटा, सा, इंजेक्शन, जानिए, किस, बीमारी, में, होता, है, इस्तेमाल</media:keywords>
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        <title>Sock Marks On Ankles: क्या आपके पैरों पर भी घंटों बने रहते हैं मोजों के निशान, जानें किस दिक्कत का हो सकता है संकेत?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/sock-marks-on-ankles-क्या-आपके-पैरों-पर-भी-घंटों-बने-रहते-हैं-मोजों-के-निशान-जानें-किस-दिक्कत-का-हो-सकता-है-संकेत</link>
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        <description><![CDATA[ Why Do Socks Leave Marks On Your Ankles: दिनभर मोजे पहनने के बाद जब हम उन्हें उतारते हैं तो अक्सर टखनों के आसपास हल्के निशान दिखाई देते हैं. ज्यादातर मामलों में यह बिल्कुल सामान्य होता है. मोजों के इलास्टिक की हल्की दबाव की वजह से त्वचा पर कुछ देर के लिए निशान बन जाते हैं और कुछ मिनटों में अपने-आप गायब भी हो जाते हैं. लेकिन अगर ये निशान ज्यादा गहरे हों, देर तक बने रहें या पैरों में सूजन के साथ दिखाई दें, तो डॉक्टर इसे शरीर के एक संकेत के रूप में देखने की सलाह देते हैं.
कई बार यह शरीर में ब्लड सर्कुलेशन या फ्लूड बैलेंस से जुड़ी किसी समस्या की ओर इशारा कर सकता है. हालांकि सिर्फ मोजों के निशान किसी बीमारी का पक्का संकेत नहीं होते. असली बात यह है कि ये निशान कितनी बार दिखते हैं, कितने गहरे होते हैं और उनके साथ अन्य लक्षण मौजूद हैं या नहीं.
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क्यों होती है दिक्कत?
दरअसल, निचले पैरों की त्वचा नरम होती है और दबाव पड़ने पर जल्दी दब जाती है. जब मोजे कई घंटों तक पैरों पर दबाव डालते हैं तो त्वचा पर हल्की गहराई बन जाती है. आमतौर पर मोजे हटाने के बाद यह निशान जल्दी ही खत्म हो जाता है. लेकिन अगर पैरों में हल्की सूजन हो तो वही दबाव त्वचा के नीचे जमा तरल को दबा देता है, जिससे निशान ज्यादा गहरे और लंबे समय तक दिखाई दे सकते हैं, डॉक्टर इस स्थिति को पेरिफेरल एडिमा कहते हैं, जिसमें पैरों और टखनों के आसपास टिश्यू में तरल जमा होने लगता है.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
वस्कुलर सर्जन डॉ. वरुण बंसल के अनुसार, कई बार मरीज सबसे पहले मोजों के गहरे निशान ही नोटिस करते हैं और बाद में उन्हें पता चलता है कि पैरों में ब्लड सर्कुलेशन से जुड़ी समस्या मौजूद है. उनके मुताबिक अगर मोजों के निशान बार-बार गहरे दिखते हैं, तो यह खराब ब्लड फ्लो, फ्लूड रिटेंशन या वीनस इंसफिशिएंसी जैसी स्थितियों का संकेत हो सकता है. वीनस इंसफिशिएंसी में पैरों की नसें खून को ठीक तरह से हार्ट तक वापस नहीं भेज पातीं, जिससे निचले हिस्से में सूजन आने लगती है.
कुछ लोगों में यह समस्या ज्यादा देखने को मिलती है. जैसे जो लोग लंबे समय तक बैठकर या खड़े होकर काम करते हैं, जिनकी लाइफस्टाइल बहुत कम एक्टिव है, या जिन्हें हार्ट, किडनी या डायबिटीज से जुड़ी समस्याएं हैं.लंबे समय तक पैरों को स्थिर रखने से ब्लड फ्लो धीमा हो जाता है और पैरों में तरल जमा होने लगता है.
इन तरीकों से बच सकते हैं आप
डॉक्टर कहते हैं कि अगर मोजों के निशान के साथ पैरों में भारीपन, सूजन, त्वचा का रंग बदलना या दर्द जैसी समस्या हो तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए. हालांकि अच्छी बात यह है कि कुछ आसान आदतें ब्लड सर्कुलेशन बेहतर रखने में मदद कर सकती हैं। नियमित चलना-फिरना, पैरों को थोड़ा ऊंचा रखकर आराम करना, स्वस्थ वजन बनाए रखना और बहुत टाइट मोजे न पहनना इसमें मददगार हो सकता है.
इसे भी पढ़ें-दूध पीने के बाद बनती है गैस, जानें किन लोगों को नहीं पीना चाहिए?
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 17 Mar 2026 16:30:16 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Sock, Marks, Ankles:, क्या, आपके, पैरों, पर, भी, घंटों, बने, रहते, हैं, मोजों, के, निशान, जानें, किस, दिक्कत, का, हो, सकता, है, संकेत</media:keywords>
    </item>
    <item>
        <title>Ear Infection Symptoms: क्या आपके कान आपको दे रहे हैं चेतावनी? इन संकेतों को पहचानें, वरना हो सकती है गंभीर समस्या</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/ear-infection-symptoms-क्या-आपके-कान-आपको-दे-रहे-हैं-चेतावनी-इन-संकेतों-को-पहचानें-वरना-हो-सकती-है-गंभीर-समस्या</link>
        <guid>https://hindi.attentionindia.com/ear-infection-symptoms-क्या-आपके-कान-आपको-दे-रहे-हैं-चेतावनी-इन-संकेतों-को-पहचानें-वरना-हो-सकती-है-गंभीर-समस्या</guid>
        <description><![CDATA[ When To See A Doctor For Ear Pain: अक्सर देखा जाता है कि लोग कान से जुड़े शुरुआती संकेतों को नजरअंदाज कर देते हैं. कई मरीज तब डॉक्टर के पास पहुंचते हैं जब समस्या काफी बढ़ चुकी होती है और इलाज भी जटिल हो जाता है. दरअसल, कान सिर्फ सुनने का काम नहीं करते, बल्कि शरीर के संतुलन, ब्रेन की काम करने की क्षमता और ओवरऑल हेल्थ से भी जुड़े होते हैं. इसलिए समय रहते लक्षणों को पहचानना और सही इलाज करवाना बहुत जरूरी है.
क्यों नहीं करना चाहिए इग्नोर?
डॉ. दीप्ति सिन्हा ने TOI में अपने लेख में बताया कि कान में लगातार दर्द या असहजता को कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. अगर कान में भारीपन, बंद होने जैसा एहसास या हल्का लेकिन लगातार दर्द महसूस हो रहा है, तो इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं. जैसे कान में मैल जमना, फंगल या बैक्टीरियल संक्रमण, मिडिल ईयर इंफेक्शन या यूस्टेशियन ट्यूब से जुड़ी समस्या. खासतौर पर जिन लोगों को डायबिटीज है, उनके लिए कान का इंफेक्शन ज्यादा खतरनाक हो सकता है. ऐसे मामलों में मैलिग्नेंट ओटिटिस एक्सटर्ना नाम की गंभीर बीमारी का खतरा बढ़ जाता है, जो आगे चलकर हड्डियों तक फैल सकती है.
सुनने की क्षमता भी हो सकती है प्रभावित
सुनने की क्षमता में कमी भी एक अहम चेतावनी संकेत हो सकता है. अगर आपको बार-बार लोगों से बात दोहराने के लिए कहना पड़ता है, टीवी की आवाज ज्यादा करनी पड़ती है या शोर वाली जगह पर बातचीत समझने में दिक्कत होती है, तो तुरंत हियरिंग टेस्ट कराना चाहिए. खासकर बुजुर्गों को हर साल सुनने की जांच करानी चाहिए, क्योंकि हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और किडनी की बीमारी सुनने की क्षमता को तेजी से प्रभावित कर सकती है. कई बार यह समस्या मिडिल ईयर में पानी भरने, कान के पर्दे में छेद या अन्य समस्याओं के कारण भी होती है, जिनका इलाज सर्जरी से संभव है.
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किस तरह की हो सकती है दिक्कत?
कानों में घंटी बजने, भनभनाहट या अजीब आवाज सुनाई देना, जिसे टिनिटस कहा जाता है, भी एक सामान्य लेकिन गंभीर संकेत हो सकता है. यह समस्या इनर ईयर की गड़बड़ी, नसों को नुकसान, ज्यादा शोर के संपर्क या ब्लड सर्कुलेशन से जुड़ी समस्या के कारण हो सकती है. यदि यह समस्या लगातार बनी रहती है, तो डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है. इसके अलावा चक्कर आना, सिर घूमना या संतुलन बिगड़ना भी अक्सर इनर ईयर की समस्या से जुड़ा होता है. कुछ स्थितियों जैसे वेस्टिब्युलर न्यूराइटिस, पोजिशनल वर्टिगो या लैबिरिन्थाइटिस में मरीज को अचानक तेज चक्कर और मतली की शिकायत हो सकती है.
कान से पानी या पस आना, खुजली, बदबू या गंदगी दिखना भी इंफेक्शन या कान के पर्दे में छेद का संकेत हो सकता है. बच्चों में कई बार छोटे-छोटे खिलौने या अन्य वस्तुएं भी कान में फंस जाती हैं, जिन्हें घर पर निकालने की कोशिश करना खतरनाक हो सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 17 Mar 2026 12:30:43 +0530</pubDate>
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    <item>
        <title>Early Signs Of Heart Disease: युवाओं में तेजी से बढ़ रहा आर्टरीज के सख्त होने का खतरा, ये लक्षण न करें नजरअंदाज</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/early-signs-of-heart-disease-युवाओं-में-तेजी-से-बढ़-रहा-आर्टरीज-के-सख्त-होने-का-खतरा-ये-लक्षण-न-करें-नजरअंदाज</link>
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        <description><![CDATA[ Why Arteries Age Faster In Your 30s: पहले हार्ट से जुड़ी बीमारियों को आमतौर पर बढ़ती उम्र की समस्या माना जाता था. माना जाता था कि 50 या 60 की उम्र के बाद ही आर्टरीज में ब्लॉकेज या हार्ट अटैक का खतरा बढ़ता है. लेकिन अब यह तस्वीर धीरे-धीरे बदल रही है. डॉक्टरों के अनुसार आजकल कई लोगों में 30 की उम्र के आसपास ही धमनियों में उम्र बढ़ने के संकेत दिखाई देने लगे हैं. चलिए आपको बताते हैं कि आखिर ऐसा क्यों होता है.&amp;nbsp;
क्यों होती है ऐसी दिक्कत
&amp;nbsp;आर्टरीज शरीर में खून को दिल से बाकी अंगों तक पहुंचाने का काम करती हैं. सामान्य तौर पर ये लचीली और मुलायम होती हैं, जिससे खून आसानी से बहता रहता है. लेकिन जब ये धीरे-धीरे सख्त होने लगती हैं तो ब्लड का फ्लो प्रभावित होने लगता है. इससे हार्ट को खून पंप करने के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है, जो आगे चलकर हार्ट रोग, स्ट्रोक और अन्य कार्डियोवैस्कुलर समस्याओं का खतरा बढ़ा सकता है,
क्या कहते हैं एक्सपर्ट
इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल के कार्डियोथोरेसिक और वैस्कुलर सर्जरी एक्सपर्ट डॉ. मुकेश गोयल के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में कम उम्र में ही आर्टरीज के सख्त होने के मामले बढ़ते देखे जा रहे हैं. उनका कहना है कि पहले इस तरह की समस्याएं आमतौर पर 50 या 60 की उम्र में देखी जाती थीं, लेकिन अब बदलती लाइफस्टाइल के कारण 30 की उम्र में भी इसके संकेत सामने आने लगे हैं.
बदलती लाइफस्टाइल बड़ी वजह
एक्सपर्ट मानते हैं कि इसके पीछे आधुनिक लाइफस्टाइल बड़ी वजह है. लंबे समय तक बैठकर काम करना, तनाव भरा कामकाजी माहौल, अनियमित नींद और प्रोसेस्ड फूड का ज्यादा सेवन धीरे-धीरे ब्लड वेसल्स पर असर डाल सकता है. इसके अलावा धूम्रपान, मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और खराब खान-पान भी आर्टरीज के जल्दी बूढ़ा होने के जोखिम को बढ़ाते हैं. कई बार यह समस्या शुरू में किसी बड़े लक्षण के रूप में सामने नहीं आती. फिर भी कुछ संकेत ऐसे हो सकते हैं जिन पर ध्यान देना जरूरी है. जैसे लगातार बढ़ता कोलेस्ट्रॉल, हल्का-सा भी बढ़ा हुआ ब्लड प्रेशर, जल्दी थकान महसूस होना या थोड़ी मेहनत में सांस फूलना. अगर परिवार में दिल की बीमारी का हिस्ट्री रहा हो तो जोखिम और बढ़ सकता है.
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कैसे कर सकते हैं बचाव
इसी वजह से डॉक्टर अब कम उम्र में ही दिल की सेहत की जांच कराने की सलाह देते हैं. कोलेस्ट्रॉल जांच, ब्लड प्रेशर मॉनिटरिंग, ब्लड शुगर टेस्ट और जरूरत पड़ने पर अन्य जांचों के जरिए आर्टरीज में शुरुआती बदलावों का पता लगाया जा सकता है. अच्छी बात यह है कि शुरुआती चरण में लाइफ में बदलाव करके इस प्रक्रिया को धीमा किया जा सकता है. रोजाना कुछ समय टहलना या व्यायाम करना, फल-सब्जियों और साबुत अनाज से भरपूर आहार लेना, नमक और प्रोसेस्ड फूड कम करना, धूम्रपान से दूरी बनाना और पर्याप्त नींद लेना दिल और आर्टरीज की सेहत के लिए फायदेमंद माना जाता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 16 Mar 2026 20:30:13 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Early, Signs, Heart, Disease:, युवाओं, में, तेजी, से, बढ़, रहा, आर्टरीज, के, सख्त, होने, का, खतरा, ये, लक्षण, न, करें, नजरअंदाज</media:keywords>
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        <title>Vitamin D Deficiency: शरीर में विटामिन &amp;apos;डी&amp;apos; की कमी कितनी खतरनाक, इससे किन बीमारियों का खतरा?</title>
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        <description><![CDATA[ What Happens When Your Body Lacks Vitamin D: विटामिन D को अक्सर सनशाइन विटामिन कहा जाता है, क्योंकि इसका सबसे बड़ा सोर्स सूरज की रोशनी है. हाल के वर्षों में यह सवाल काफी चर्चा में रहा है कि शरीर को स्वस्थ रखने के लिए विटामिन D की कितनी मात्रा जरूरी है और कैसे पता लगाया जाए कि शरीर में इसकी कमी तो नहीं है. हालांकि एक बात पर एक्सपर्ट की सहमति है वह है कि विटामिन D हमारे शरीर के लिए बेहद जरूरी है. अगर शरीर को पर्याप्त धूप नहीं मिलती या भोजन के जरिए इसकी सही मात्रा नहीं मिलती, तो इसकी कमी कई स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म दे सकती है.&amp;nbsp;
किन लोगों को होती है दिक्कत
हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली संस्था yalemedicine के अनुसार, &amp;nbsp;विटामिन D की कमी किसी भी उम्र के लोगों को प्रभावित कर सकती है. छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक यह समस्या देखी जाती है. खासकर जो बच्चे केवल ब्रेस्टफीडिंग पर निर्भर होते हैं, उन्हें मां के दूध से पर्याप्त विटामिन D नहीं मिल पाता, इसलिए कई बार डॉक्टर उन्हें सप्लीमेंट लेने की सलाह देते हैं. वहीं बढ़ती उम्र के साथ त्वचा की क्षमता कम हो जाती है, जिससे शरीर में विटामिन D बनने की प्रक्रिया भी धीमी हो जाती है.
दरअसल, विटामिन D शरीर में कैल्शियम और फॉस्फोरस को अब्जॉर्ब करने में अहम भूमिका निभाता है. ये दोनों तत्व हड्डियों को मजबूत रखने के लिए बेहद जरूरी होते हैं. जब शरीर में विटामिन D की कमी हो जाती है, तो कैल्शियम का सही तरीके से अब्जॉर्ब नहीं हो पाता. इससे हड्डियां कमजोर होने लगती हैं और कई तरह की समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है.
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इसकी कमी के क्या होते हैं लक्षण
विटामिन D की कमी होने पर शरीर में कई लक्षण दिखाई दे सकते हैं. जैसे हड्डियों में दर्द, मांसपेशियों में कमजोरी, शरीर में थकान और मांसपेशियों में ऐंठन. कुछ लोगों को हाथ-पैरों में झुनझुनी जैसा महसूस हो सकता है. गंभीर मामलों में हड्डियां जल्दी टूटने का खतरा भी बढ़ जाता है. बुजुर्गों में इसकी गंभीर कमी गिरने और फ्रैक्चर का जोखिम बढ़ा सकती है.
कमी के क्या होते हैं कारण
इस कमी के पीछे कई कारण हो सकते हैं. धूप में कम समय बिताना, पोषण की कमी, गहरे रंग की त्वचा, कुछ दवाइयों का सेवन या किडनी और लिवर से जुड़ी बीमारियां भी शरीर में विटामिन D के स्तर को प्रभावित कर सकती हैं. कुछ मामलों में यह समस्या जेनेटिक कारणों से भी हो सकती है. एक्सपर्ट के अनुसार अगर शरीर में विटामिन D का स्तर बहुत कम हो जाए, तो हड्डियों से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है. इसलिए संतुलित आहार, नियमित धूप और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह से सप्लीमेंट लेना शरीर में विटामिन D के स्तर को बनाए रखने में मदद कर सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 16 Mar 2026 16:30:35 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>First Aid For Food Choking: रसगुल्ला खाने से हुई मौत, जानें सांस की नली में फंस जाए खाना तो तुरंत क्या करें?</title>
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        <description><![CDATA[ What To Do When Food Blocks The Airway: झारखंड के जमशेदपुर में एक शादी समारोह के दौरान दर्दनाक हादसा सामने आया. 41 वर्षीय ललित सिंह की मौत उस समय हो गई जब रसगुल्ला खाते वक्त वह उनकी सांस की नली में फंस गया. यह घटना सोमवार सुबह मालियंता गांव में एक शादी के दौरान हुई. बताया जा रहा है कि रसगुल्ला खाने के कुछ ही सेकंड बाद ललित सिंह को अचानक सांस लेने में दिक्कत होने लगी. वहां मौजूद लोगों ने उनके गले से रसगुल्ला निकालने की कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली.&amp;nbsp;
परिवार के लोग उन्हें तुरंत एमजीएम अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. डॉक्टरों के अनुसार रसगुल्ला पूरी तरह से उनकी सांस की नली में फंस गया था, जिससे शरीर तक ऑक्सीजन पहुंचना बंद हो गया और कुछ ही मिनटों में उनकी मौत हो गई. चलिए आपको बताते हैं कि सांस की नली में खाना फंसने के बाद क्या करना चाहिए.&amp;nbsp;
क्यों फंस जाता है खाना
दरअसल खाना निगलने की प्रक्रिया काफी जटिल होती है. जब हम भोजन करते हैं तो मुंह, गले और नसों की मदद से खाना पेट तक पहुंचता है. सामान्य स्थिति में जब हम खाना निगलते हैं, तो हमारी सांस की नली कुछ समय के लिए बंद हो जाती है ताकि भोजन गलत दिशा में न जाए. लेकिन कभी-कभी अगर खाना ठीक से चबाया न जाए या जल्दी-जल्दी खाया जाए, तो वह गले या सांस की नली में फंस सकता है.
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&amp;nbsp;हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली बेवसाइट healthline के अनुसार, अगर किसी व्यक्ति की सांस की नली में खाना फंस जाए तो यह स्थिति बेहद खतरनाक हो सकती है. ऐसे समय में कुछ लक्षण तुरंत दिखाई देते हैं, जैसे व्यक्ति का बोलना बंद हो जाना, सांस लेने में परेशानी, तेज या अजीब आवाज के साथ सांस लेना, खांसी आना, चेहरा लाल या नीला पड़ना और गंभीर स्थिति में बेहोशी आ जाना.&amp;nbsp;
क्या करना चाहिए
ऐसी स्थिति में तुरंत मदद करना बहुत जरूरी होता है. सबसे पहले व्यक्ति को जोर से खांसने के लिए कहें, क्योंकि कई बार खांसी से ही फंसा हुआ खाना बाहर निकल सकता है. अगर इससे राहत न मिले तो व्यक्ति को थोड़ा आगे झुकाकर उसकी पीठ पर जोर से लगभग पांच बार थपथपाना चाहिए. इससे कई बार गले में फंसा खाना ढीला होकर बाहर निकल सकता है. अगर इसके बाद भी स्थिति नहीं सुधरती, तो हाइमलिक मैन्युवर नाम की तकनीक अपनाई जाती है. इसमें व्यक्ति के पीछे खड़े होकर उसके पेट के ऊपरी हिस्से पर झटके से दबाव डाला जाता है, जिससे फंसा हुआ खाना बाहर निकल सकता है.
इंसानों के लिए जानलेवा स्थिति
डॉक्टरों के अनुसार चोकिंग यानी सांस की नली में खाना फंसना जानलेवा आपात स्थिति होती है. इसलिए अगर किसी को सांस लेने में गंभीर परेशानी हो या वह बोल भी न पा रहा हो, तो तुरंत मेडिकल सहायता लेना और इमरजेंसी सेवाओं को बुलाना जरूरी है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 16 Mar 2026 16:30:31 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>First, Aid, For, Food, Choking:, रसगुल्ला, खाने, से, हुई, मौत, जानें, सांस, की, नली, में, फंस, जाए, खाना, तो, तुरंत, क्या, करें</media:keywords>
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        <title>बार&amp;बार पेनकिलर खाने से किडनी को हो सकता है नुकसान, जानें डॉक्टरों ने क्या दी चेतावनी?</title>
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        <description><![CDATA[ सिर दर्द, शरीर में दर्द, बुखार पीरियड्स के दौरान होने वाला दर्द या फिर गठिया जैसी समस्याओं में लोग अक्सर तुरंत आराम पाने के लिए पेन किलर दवाइयां ले लेते हैं. क्योंकि इनमें से कई दवाएं बिना डॉक्टर की पर्ची के मेडिकल स्टोर पर आसानी से मिल जाती है. इसलिए लोग इन्हें बिना सोचे समझे ले लेते हैं.
डॉक्टरों का कहना है कि पेन किलर का बार-बार इस्तेमाल करना सेहत के लिए खतरनाक साबित हो सकता है. डॉक्टर के अनुसार किडनी हमारे शरीर का बहुत जरूरी हिस्सा है यह खून से गंदगी और एक्स्ट्रा तरल पदार्थ को फिल्टर करती है, शरीर में इलेक्ट्रोलाइट संतुलन बनाए रखती है और ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने में मदद करती है. वहीं कई दवाएं किडनी के जरिए शरीर से बाहर निकालती है. इसलिए ज्यादा मात्रा में दवाएं लेने पर किडनी पर एक्स्ट्रा दबाव भी पड़ सकता है. ऐसे में चलिए अब आपको बताते हैं कि पेन किलर खाने से किडनी को बार-बार क्या नुकसान हो सकते हैं और डॉक्टरों ने क्या चेतावनी दी है.
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NSAIDs दवाएं बढ़ा सकती है खतरा
एक्सपर्ट के अनुसार किडनी से जुड़ी समस्याओं के साथ सबसे ज्यादा जुड़ा हुआ पेनकिलर का ग्रुप नॉन-स्टेरॉयडल एंटी-इंफ्लेमेटरी ड्रग्स यानी NSAIDs है. इसमें आमतौर पर इस्तेमाल होने वाली दवाएं Ibuprofen, Diclofenac और Naproxen शामिल है. यह दवाई शरीर में दर्द और सूजन पैदा करने वाले केमिकल को कम करके राहत देती है. हालांकि यह दवाएं शरीर में मौजूद प्रोस्टाग्लैंडिन नाम के पदार्थ को कम कर देती है जो किडनी तक खून के प्रवाह को सही बनाए रखने में मदद करता है. जब प्रोस्टाग्लैंडिन का स्तर कम हो जाता है तो किडनी तक खून का प्रवाह भी घट सकता है. जिससे लंबे समय में किडनी की कार्य क्षमता प्रभावित हो सकती है. कुछ डॉक्टरों का कहना है कि किडनी खून से दवाओं और दूसरे अपशिष्ट पदार्थों को फिल्टर करने का काम करती है. ऐसे में जब दवाओं का ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है तो किडनी को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है और इससे दवा से जुड़े नुकसान का खतरा बढ़ जाता है.
किन लोगों काे होता है ज्यादा खतरा?
डॉक्टर के अनुसार कुछ लोगों में पेन किलर से किडनी को नुकसान होने का खतरा ज्यादा होता है. इनमें बुजुर्ग, पहले से किडनी की बीमारी से जूझ रहे मरीज और डायबिटीज या हाई ब्लड प्रेशर वाले लोग शामिल है. इसके अलावा शरीर में पानी की कमी यानी डिहाइड्रेशन भी किडनी के लिए खतरा बढ़ा सकती है. क्योंकि किडनी को सही तरीके से काम करने के लिए पर्याप्त तरल पदार्थ और ब्लड सर्कुलेशन की जरूरत होती है. कुछ मामलों में खतरा तब और बढ़ जाता है, जब पेन किलर दवाओं को ब्लड प्रेशर या दिल से जुड़ी दवाओं के साथ लिया जाता है. जैसे एसीई inhibitors या Diuretics के साथ NSAIDs लेने से किडनी के काम पर एक्स्ट्रा असर पड़ सकता है.
क्या है सुरक्षित ऑप्शन?
डॉक्टर का कहना है कि पेन किलर दवाएं बार-बार लेने से किडनी पर असर पड़ता है, इसका मतलब यह नहीं है कि पेन किलर दवाओं को पूरी तरह छोड़ दी जाए. इसके बजाय सही मात्रा और डॉक्टर की सलाह के साथ उनका इस्तेमाल सुरक्षित माना जाता है. आमतौर पर इस्तेमाल होने वाली दावों में पैरासिटामोल को किडनी के लिए अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जाता है, &amp;nbsp;हालांकि ज्यादा मात्रा में लेने से लिवर को नुकसान पहुंचा सकता है. लंबे समय तक रहने वाले दर्द के मामलों में डॉक्टर Tramadol या Tapentadol जैसी दवाई भी दे सकते है, &amp;nbsp;लेकिन इनका इस्तेमाल आमतौर पर डॉक्टर की निगरानी में ही किया जाता है.
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        <pubDate>Sun, 15 Mar 2026 12:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>सिर्फ मर्दों में होती हैं ये बीमारियां, 40 की उम्र के बाद दोगुना हो जाता है खतरा</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/सिर्फ-मर्दों-में-होती-हैं-ये-बीमारियां-40-की-उम्र-के-बाद-दोगुना-हो-जाता-है-खतरा</link>
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        <description><![CDATA[ आज की तेज रफ्तार जिंदगी में पुरुष अक्सर काम, परिवार और जिम्मेदारियों के बीच अपनी सेहत को नजरअंदाज कर देते हैं. युवा उम्र में शरीर मजबूत महसूस होता है, इसलिए ज्यादातर पुरुष स्वास्थ्य जांच, सही खानपान और व्यायाम पर ज्यादा ध्यान नहीं देते, लेकिन जैसे-जैसे उम्र 40 साल के आसपास पहुंचती है, शरीर में कई तरह के बदलाव होने लगते हैं. इस समय हार्मोन में बदलाव, बढ़ता तनाव, अनियमित दिनचर्या और खराब खानपान कई बीमारियों के खतरे को बढ़ा देते हैं.&amp;nbsp;
डॉक्टरों के अनुसार 40 की उम्र के बाद पुरुषों में कई ऐसी स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है, जो धीरे-धीरे शरीर को कमजोर कर सकती हैं. कई बार ये बीमारियां शुरुआत में ज्यादा लक्षण नहीं दिखातीं, लेकिन समय के साथ गंभीर रूप ले सकती हैं. इसलिए इस उम्र के बाद पुरुषों को अपनी सेहत को लेकर ज्यादा सावधान रहने की जरूरत होती है. &amp;nbsp;तो आइए जानते हैं कि मर्दों में 40 के बाद कौन सी बीमारियों का खतरा दोगुना हो जाता है.&amp;nbsp;
मर्दों में 40 के बाद कौन सी बीमारियों का खतरा दोगुना?
प्रोस्टेट से जुड़ी समस्याएं
प्रोस्टेट पुरुषों के शरीर में मौजूद एक छोटी ग्रंथि होती है, जो वीर्य बनाने में मदद करती है. उम्र बढ़ने के साथ इसका आकार धीरे-धीरे बढ़ने लगता है. कई पुरुषों में प्रोस्टेट के बढ़ने से पेशाब करने में दिक्कत, बार-बार पेशाब आना या पेशाब के दौरान जलन जैसी समस्याएं होने लगती हैं, अगर समय पर इलाज न कराया जाए तो यह समस्या मूत्र संक्रमण या किडनी से जुड़ी परेशानी भी पैदा कर सकती है.&amp;nbsp;
हार्ट डिजीज का खतरा
पुरुषों में दिल से जुड़ी बीमारियां भी काफी आम होती हैं. खासकर 40 साल के बाद हाई ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल बढ़ना, मोटापा और धूम्रपान जैसी आदतें हार्ट अटैक का खतरा बढ़ा देती हैं. छाती में दर्द, सांस फूलना, ज्यादा पसीना आना और थकान इसके सामान्य लक्षण हो सकते हैं. इसलिए नियमित व्यायाम और संतुलित आहार दिल को स्वस्थ रखने में मदद करता है.
डायबिटीज
अनियमित खानपान, ज्यादा मीठा खाना और शारीरिक गतिविधि की कमी के कारण पुरुषों में डायबिटीज का खतरा भी बढ़ जाता है. इस बीमारी में बार-बार पेशाब आना, ज्यादा प्यास लगना, थकान और घाव का देर से भरना जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं. समय पर जांच और सही जीवनशैली अपनाकर इस बीमारी को नियंत्रित किया जा सकता है.
इसे भी पढ़ें - प्रेग्नेंसी डायबिटीज को न करें नजरअंदाज, बच्चे की सेहत पर पड़ सकता है असर
टेस्टोस्टेरोन की कमी
उम्र बढ़ने के साथ पुरुषों के शरीर में टेस्टोस्टेरोन हार्मोन का स्तर भी कम होने लगता है. इससे शरीर में कमजोरी, यौन इच्छा में कमी, मूड स्विंग्स और थकान जैसी समस्याएं हो सकती हैं. पर्याप्त नींद, नियमित व्यायाम और संतुलित भोजन इस समस्या को कम करने में मदद कर सकते हैं.
लिवर और फेफड़ों की समस्या
ज्यादा शराब पीना और धूम्रपान करना पुरुषों में लिवर और फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ा देता है. लिवर की समस्या होने पर भूख कम लगना, पेट फूलना और पीलिया जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं. वहीं धूम्रपान करने वाले पुरुषों में फेफड़ों के कैंसर का खतरा भी बढ़ जाता है.
मानसिक तनाव और डिप्रेशन
अक्सर पुरुष अपनी भावनाओं को खुल कर व्यक्त नहीं करते. काम का दबाव, आर्थिक जिम्मेदारियां और पारिवारिक तनाव धीरे-धीरे मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं. चिड़चिड़ापन, नींद न आना, निराशा और अकेलापन डिप्रेशन के संकेत हो सकते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 15 Mar 2026 12:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>7&amp;8 घंटे की नींद के बाद भी थका&amp;थका रहता है शरीर, जानें कहां गायब हो रही बॉडी की एनर्जी?</title>
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        <description><![CDATA[ हम अक्सर मानते हैं कि अगर हम रात को 7&amp;ndash;8 घंटे की नींद ले लें तो अगला दिन तरोताजा और एनर्जेटिक होगा. एक्सपर्ट्स का भी यही मानना है कि एक व्यक्ति को हर रात कम से कम 7 से 9 घंटे की नींद जरूर लेनी चाहिए, लेकिन कई लोगों की यह शिकायत रहती है कि रात में 8 घंटे सोने के बाद भी सुबह उठाकर वे थका हुआ महसूस करते हैं. आज की तेज रफ्तार जिंदगी में काफी लोग ऐसी समस्या का सामना कर रहे हैं, खासकर युवा प्रोफेशनल्स, जो जॉब करते हैं या किसी एग्जाम की तैयारी की कर रहे हो. अब सवाल यह है कि ऐसा क्यों हो रहा है? चलिए जानते हैं कि किन वजहों से 8 घंटे की नींद के बाद भी बॉडी थकी-थकी सी रहती है?
मोबाइल और लैपटॉप का ज्यादा यूज
कई बार लोग 7&amp;ndash;8 घंटे की नींद तो लेते हैं, लेकिन उनकी नींद गहरी और आरामदायक नहीं होती. ऐसे में शरीर को पूरा आराम नहीं मिल पाता. इसका कारण हो सकता है कि देर रात तक मोबाइल, लैपटॉप या टीवी देखना. दरअसल, स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी शरीर के मेलाटोनिन हार्मोन को दबा देती है, जिसके कारण नींद देर से आती है, बार-बार टूटती है और सुबह उठने पर भी थकान, सिर भारी लगना और सुस्ती महसूस होती है.&amp;nbsp;
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विटामिन की कमी से थकान महसूस होना
कुछ विटामिन की कमी से भी आपको थकान और आलस जैसा महसूस हो सकता है. दरअसल, विटामिन D की कमी से दिनभर थकान और सुस्ती और मांसपेशियों में दर्द हो सकती है. साथ ही, विटामिन B12 की कमी के कारण भी शरीर की बैटरी लो हो जाती है. इससे शरीर में ऑक्सीजन की सप्लाई प्रभावित होती है, जिससे थकान महसूस होती है.
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लेट नाइट कैफीन या मीठा लेना
रात को सोने से पहले चाय, कॉफी, चॉकलेट या मीठी चीजें खाने से नर्वस सिस्टम एक्टिव हो जाता है, जिससे शरीर रिलैक्स नहीं हो पाता और नींद प्रभावित हो जाती है. इसकी वजह से सारा दिन थकान जैसा महसूस होता है और सुबह फ्रेश महसूस नहीं करते हैं.
हार्मोन का असंतुलन होना
हमारे शरीर में कुछ हार्मोन होते हैं, जो नींद, भूख, मूड और एनर्जी के लेवल को कंट्रोल करते हैं. जब स्ट्रेस हार्मोन का लेवल बिगड़ जाता है तो इसका असर नींद पर पड़ता है. इससे नींद पूरी तो लगती है, लेकिन शरीर थका-थका रहता है.
हर दिन अलग-अलग समय पर सोना
हर दिन अलग-अलग समय पर सोना और उठना शरीर की बायोलॉजिकल क्लॉक बिगड़ देता है. फिर चाहे आप 7-8 घंटे भी क्यों न सो लें, शरीर को असली आराम नहीं मिलता और दिनभर थकावट महसूस होती है.
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        <pubDate>Sun, 15 Mar 2026 08:30:15 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>7-8, घंटे, की, नींद, के, बाद, भी, थका-थका, रहता, है, शरीर, जानें, कहां, गायब, हो, रही, बॉडी, की, एनर्जी</media:keywords>
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        <title>दूध पीने के बाद बनती है गैस, जानें किन लोगों को नहीं पीना चाहिए?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/दूध-पीने-के-बाद-बनती-है-गैस-जानें-किन-लोगों-को-नहीं-पीना-चाहिए</link>
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        <description><![CDATA[ 
दूध को हमारी सेहत के लिए बहुत फायदेमंद माना जाता रहा है. बच्चे के जन्म के बाद किसी भी इंसान का पहला भोजन भी दूध ही होता है जो मां के दूध से शुरू होता है. यही वजह है कि दूध को ताकत और पोषण का बड़ा सोर्स भी माना जाता है. हालांकि, कई लोगों को दूध पीने के बाद पेट से जुड़ी समस्या होने लगती है. कुछ लोगों को गैस बनती है, पेट फूलता है, अपच या पेट दर्द की शिकायत हो जाती है. ऐसे में कई बार यह सवाल उठता है कि दूध पीने के बाद ऐसा क्यों होता है और किन लोगों को दूध से दूरी बनाकर रखनी चाहिए. चलिए तो आज हम आपको बताते हैं कि दूध पीने के बाद गैस बनती है और किन लोगों को दूध नहीं पीना चाहिए. दूध पीने से क्यों बनती है गैस?दूध में लैक्टोज नाम की एक नेचुरल शुगर पाई जाती है. इसे पचाने के लिए शरीर को लेक्टस्ट नाम के एंजाइम की जरूरत होती है जो छोटी आंत में बनता है. जब शरीर में इस एंजाइम की मात्रा कम हो जाती है, तो लैक्टोज ठीक तरह से बच नहीं पाता है. ऐसे में दूध पीने के बाद पेट में गैस, पेट फूलना, दर्द या दस्त जैसी समस्याएं हो सकती है. ये भी पढ़ें-Heart Disease Risk: कोलेस्ट्रॉल रिपोर्ट नॉर्मल, फिर भी हार्ट अटैक का खतरा? सावधान! ये कारण हो सकता है असली विलेन
लैक्टोज इंटॉलरेंस के आम लक्षण अगर किसी व्यक्ति को दूध या दूध से बने पदार्थ जैसे पनीर, लस्सी या दूसरे डेयरी प्रोडक्ट लेने के बाद पेट से जुड़ी समस्या होने लगती है, तो यह लैक्टोज इंटॉलरेंस का संकेत हो सकता है. इसके कुछ सामान्य लक्षण जैसे पेट में गैस बनना, पेट फूलना या भारीपन महसूस होना, पेट दर्द या ऐंठन, लूज मोशन या दस्त, मतली या उल्टी जैसा महसूस होना हो सकते हैं. यह लक्षण आमतौर पर दूध पीने के 30 मिनट से 2 घंटे के अंदर दिखाई दे सकते हैं. किन लोगों को दूध से ज्यादा परेशानी हो सकती है?हर व्यक्ति को दूध पीने से समस्या नहीं होती, लेकिन कुछ लोगों में यह परेशानी ज्यादा देखने को मिलती है. जिन लोगों का पाचन तंत्र कमजोर होता है या जिन्हें पहले से गैस, एसिडिटी या पेट से जुड़ी समस्या रहती है. उन्हें दूध पचाने में दिक्कत हो सकती है. इसके अलावा उम्र बढ़ने के साथ भी कई लोगों में दूध पचाने की क्षमता कम हो जाती है. कुछ मामलों में आंत से जुड़ी बीमारियों की वजह से भी दूध पीने के बाद पेट संबंधी परेशानी बढ़ सकती है. क्या दूध पीना जरूरी है?एक्सपर्ट्स का मानना है कि बच्चों के लिए मां का दूध सबसे जरूरी होता है और यह लगभग 6 से 7 महीने तक उसकी जरूरत पूरी करता है. इसके बाद बच्चा धीरे-धीरे ठोस आहार लेना शुरू कर देता है. हालांकि दूध को हमारे खानपान और कल्चर का हिस्सा माना जाता है और कई लोग इसे प्रोटीन के अच्छे सोर्स के रूप में लेते हैं. लेकिन अगर किसी को दूध से समस्या होती है तो प्रोटीन की जरूरत दूसरी चीजों से भी पूरी की जा सकती है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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        <pubDate>Sat, 14 Mar 2026 12:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Endometriosis Symptoms: क्या होती है एंडोमेट्रियोसिस, जिसकी वजह से महिलाओं में हो जाता है बांझपन?</title>
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        <description><![CDATA[ What Is Endometriosis And How It Causes Infertility: एंडोमेट्रियोसिस एक मुश्किल और अक्सर नजरअंदाज की जाने वाली बीमारी है, जो दुनिया भर में बड़ी संख्या में महिलाओं को प्रभावित करती है. यह समस्या आमतौर पर किशोरावस्था में पहले पीरियड से शुरू होने के बाद से लेकर मेनोपॉज तक किसी भी उम्र में हो सकती है. डॉक्टरों के अनुसार कई मामलों में यही बीमारी आगे चलकर महिलाओं में प्रेग्नेंसी में परेशानी या बांझपन का कारण बन जाती है.
क्या होता है एंडोमेट्रियोसिस?
संयुक्त राष्ट्र की स्पेशल हेल्थ एजेंसी वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के अनुसार, एंडोमेट्रियोसिस में यूट्रस की अंदरूनी परत शरीर के अन्य हिस्सों में बढ़ने लगता है. सामान्य स्थिति में यह टिश्यू सिर्फ यूट्रस की लाइनिंग में पाया जाता है, लेकिन इस बीमारी में यह ओवरी, फैलोपियन ट्यूब या पेल्विक क्षेत्र के अन्य हिस्सों में भी फैलाव हो सकता है. इससे शरीर में सूजन, दर्द और स्कार टिश्यू बनने लगते हैं, जो प्रजनन प्रणाली को प्रभावित कर सकते हैं. यही वजह है कि कई महिलाओं को प्रेग्नेंसी में दिक्कत होती है.
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क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के अनुसार, एक्सपर्ट का कहना है कि एंडोमेट्रियोसिस का सटीक कारण अभी तक पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाया है. हालांकि नई रिसर्च में इसे इम्यून सिस्टम से जुड़ी गड़बड़ियों से भी जोड़ा गया है. कई मामलों में यह बीमारी परिवार में पहले से मौजूद रहने पर भी देखने को मिलती है. इसके अलावा जिन महिलाओं को ल्यूपस, मल्टीपल स्क्लेरोसिस या इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज जैसी इम्यून से जुड़ी बीमारियां होती हैं, उनमें इसका खतरा थोड़ा ज्यादा हो सकता है.
कैसे होता है इनकी पहचान?
इस बीमारी की पहचान करना भी आसान नहीं होता. कई बार इसके लक्षण अलग-अलग तरह के होते हैं, इसलिए डॉक्टरों को इसे पहचानने में समय लग जाता है. रिपोर्ट्स के अनुसार कई महिलाओं में सही निदान होने में औसतन 4 से 12 साल तक का समय लग सकता है. आमतौर पर लगातार पेल्विक दर्द, भारी ब्लीडिंग, पीरियड्स के दौरान तेज दर्द या गर्भधारण में दिक्कत जैसे संकेत इसके लक्षण हो सकते हैं. जांच के लिए अल्ट्रासाउंड, एमआरआई जैसे इमेजिंग टेस्ट किए जाते हैं, जबकि कुछ मामलों में लैप्रोस्कोपी सर्जरी के जरिए भी इसकी पुष्टि की जाती है. फिलहाल एंडोमेट्रियोसिस का कोई स्थायी इलाज नहीं है, लेकिन इसके लक्षणों को दवाओं या सर्जरी के जरिए नियंत्रित किया जा सकता है.
इससे बचाव क्या हो सकता है?
अगर एंडोमेट्रियोसिस के कारण गर्भधारण में परेशानी आती है, तो डॉक्टर फर्टिलिटी ट्रीटमेंट की सलाह दे सकते हैं. इसमें ओव्यूलेशन इंडक्शन, इंट्रायूटेरिन इंसैमिनेशन या इन विट्रो फर्टिलाइजेशन जैसे विकल्प शामिल होते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 13 Mar 2026 16:30:13 +0530</pubDate>
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        <title>Stomach Cancer Risk: सिर्फ एक कॉमन वायरस की वजह से होता है पेट का कैंसर, जानें इससे बचने के तरीके</title>
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        <description><![CDATA[ How H Pylori Causes Stomach Cancer: पेट में रहने वाला एक सामान्य बैक्टीरिया हेलिकोबैक्टर पाइलोरी दुनिया भर में होने वाले पेट के कैंसर के बड़े कारणों में से एक माना जाता है. नेचर मेडिसिन में पब्लिश एक स्टडी के अनुसार, गैस्ट्रिक कैंसर के करीब 76 प्रतिशत मामलों का संबंध इसी बैक्टीरिया से हो सकता है. रिसर्चर का अनुमान है कि 2008 से 2017 के बीच जन्मे लोगों में लगभग 1.6 करोड़ लोगों को जीवन में कभी न कभी पेट का कैंसर हो सकता है, जिनमें से करीब 1.2 करोड़ मामले सीधे तौर पर हेलिकोबैक्टर पाइलोरी इंफेक्शन से जुड़े हो सकते हैं. यह बैक्टीरिया पेट की अंदरूनी परत में रहता है और अक्सर लंबे समय तक बिना किसी स्पष्ट लक्षण के मौजूद रह सकता है. हालांकि कई लोगों को इसका पता ही नहीं चलता, लेकिन कुछ मामलों में यह पेट के अल्सर और गंभीर स्थिति में गैस्ट्रिक कैंसर का कारण बन सकता है.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
एक्सपर्ट के अनुसार एशिया में हेलिकोबैक्टर पाइलोरी से जुड़े पेट के कैंसर के सबसे ज्यादा मामले सामने आ सकते हैं, जहां करीब 80 लाख मामलों का अनुमान लगाया गया है, जबकि उत्तर और दक्षिण अमेरिका में मिलाकर करीब 15 लाख मामलों की संभावना जताई गई है. यही वजह है कि डॉक्टर इस इंफेक्शन को पहचानना बेहद जरूरी मानते हैं, क्योंकि यह कैंसर का ऐसा जोखिम कारक है जिसे समय रहते रोका जा सकता है.
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किन लोगों में रहता है इसका खतरा ज्यादा?
कुछ लोगों में हेलिकोबैक्टर पाइलोरी इंफेक्शन का खतरा ज्यादा होता है. खासकर पूर्वी एशिया, पूर्वी यूरोप और दक्षिण अमेरिका जैसे क्षेत्रों में रहने वाले लोगों में इसका जोखिम अधिक देखा गया है. इन इलाकों से आने वाले प्रवासी भी बचपन में हुए इंफेक्शन की वजह से प्रभावित हो सकते हैं. इसके अलावा जिन लोगों के परिवार में पेट के कैंसर का इतिहास रहा हो, धूम्रपान करने वाले, मोटापे से ग्रस्त लोग, अधिक नमक या प्रोसेस्ड फूड खाने वाले और 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोग भी ज्यादा जोखिम में माने जाते हैं.
कैसे होते हैं इसके लक्षण?
हेलिकोबैक्टर पाइलोरी इंफेक्शन कई बार वर्षों तक बिना लक्षण के रह सकता है, लेकिन लगभग 30 प्रतिशत लोगों में इससे जुड़ी समस्याएं सामने आ सकती हैं. इसके संकेतों में पेट में जलन या दर्द, थोड़ी मात्रा में खाने पर ही पेट भरा महसूस होना, मतली, बार-बार डकार आना, अपच, पेट फूलना या बिना कारण वजन कम होना शामिल हैं. अगर ये लक्षण लंबे समय तक बने रहें तो डॉक्टर से जांच कराना जरूरी होता है. पेट के कैंसर के खतरे को कम करने के लिए कुछ लाइफस्टाइल से जुड़े कदम भी मददगार हो सकते हैं. संतुलित आहार लेना, जिसमें फल, सब्जियां और साबुत अनाज शामिल हों, रेगुलर फिजिकल एक्टिविटी करना, स्मोकिंग से दूरी रखना और शराब का सेवन सीमित करना महत्वपूर्ण माना जाता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 12 Mar 2026 20:30:13 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Liver Cancer Symptoms:आंखों में दिखें ये लक्षण तो तुरंत भागें डॉक्टर के पास, वरना लिवर में हो जाएगा कैंसर</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/liver-cancer-symptomsआंखों-में-दिखें-ये-लक्षण-तो-तुरंत-भागें-डॉक्टर-के-पास-वरना-लिवर-में-हो-जाएगा-कैंसर</link>
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        <description><![CDATA[ Eye Symptoms Of Liver Disease: लिवर हमारे शरीर का एक बेहद अहम अंग है, जो शरीर से विषैले पदार्थों को बाहर निकालने, पाचन में मदद करने और पोषक तत्वों को प्रोसेस करने का काम करता है. जब किसी कारण से लिवर ठीक तरह से काम करना बंद कर देता है, तो इस स्थिति को लिवर फेलियर कहा जाता है. यह एक गंभीर और जानलेवा समस्या हो सकती है. चलिए आपको बताते हैं कि आंखों में लिवर कैंसर के कौन से लक्षण दिखाई देते हैं.&amp;nbsp;
क्यों होती है दिक्कत?
लिवर फेलियर अक्सर किसी दूसरी बीमारी के कारण होता है. लंबे समय तक शराब का सेवन, हेपेटाइटिस बी या सी इंफेक्शन, फैटी लिवर, मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर, हाई कोलेस्ट्रॉल और डायबिटीज जैसी स्थितियां लिवर को नुकसान पहुंचा सकती हैं. अगर यह नुकसान लंबे समय तक बना रहे तो लिवर में स्थायी दाग पड़ जाते हैं, जिसे सिरोसिस कहा जाता है. यही स्थिति आगे चलकर लिवर फेलियर में बदल सकती है और कई मामलों में मरीज को लिवर ट्रांसप्लांट तक की जरूरत पड़ सकती है. हालांकि शुरुआती चरण में इलाज और लाइफस्टाइल में बदलाव से लिवर को काफी हद तक सुरक्षित रखा जा सकता है.
आंखों में दिखती है समस्या
आंखों के बारे में जानकारी देने वाली allaboutvision के अनुसार, शुरुआत में लिवर की समस्या के लक्षण बहुत साफ दिखाई नहीं देते. कई लोगों को लंबे समय तक कोई खास परेशानी महसूस नहीं होती. लेकिन जब बीमारी बढ़ने लगती है तो कुछ सामान्य संकेत दिख सकते हैं, जैसे लगातार थकान महसूस होना, मांसपेशियों में कमजोरी या ऐंठन, भूख कम लगना, त्वचा में खुजली, पेट दर्द, मतली या उल्टी जैसी समस्याएं.
जब लिवर की बीमारी ज्यादा गंभीर हो जाती है, तब इसका असर आंखों पर भी दिखाई देने लगता है. सबसे आम लक्षण आंखों का पीला पड़ना है, जिसे पीलिया कहा जाता है. यह तब होता है जब शरीर में बिलीरुबिन नाम का पीला पिगमेंट ज्यादा मात्रा में जमा हो जाता है. सामान्य स्थिति में लिवर पुराने रक्त कोशिकाओं से बनने वाले इस पिगमेंट को शरीर से बाहर निकाल देता है, लेकिन लिवर खराब होने पर यह प्रक्रिया प्रभावित हो जाती है.
कुछ मामलों में लिवर से जुड़ी समस्याएं आंखों में सूखापन भी पैदा कर सकती हैं. इसके अलावा लंबे समय तक लिवर की बीमारी रहने पर शरीर में विटामिन ए की कमी हो सकती है, जिससे रात में देखने में दिक्कत, आंखों में सूखापन या कॉर्निया से जुड़ी समस्याएं भी हो सकती हैं. कुछ लोगों की पलकों के आसपास पीले रंग की छोटी गांठें भी दिखाई दे सकती हैं, जिन्हें जैंथेलाज़्मा कहा जाता है.
आंखों में कब दिखते हैं कैंसर के लक्षण?
vinmec की रिपोर्ट के अनुसार, पीलिया लिवर कैंसर के आखिरी चरण में दिखने वाला एक अहम लक्षण हो सकता है. जब लिवर में ट्यूमर बढ़ने लगते हैं, तो वे बाइल डक्ट पर दबाव डालते हैं, जिससे बिलीरुबिन बढ़ जाता है. इसके कारण आंखें और त्वचा पीली पड़ सकती हैं, इसके साथ ही गहरा यूरिन और खुजली जैसी परेशानी भी हो सकती है.
इसे भी पढ़ें-&amp;nbsp;पीरियड्स पेन का पैटर्न: पहले दिन ज्यादा, बाद में कम क्या है वजह? डॉक्टर ने बताया असली कारण
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 12 Mar 2026 16:30:32 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Are Nail Extensions Safe: आपकी सेहत के लिए कितना खतरनाक है नेल एक्सटेंशन? जानें लंबे नाखूनों के नुकसान</title>
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        <description><![CDATA[ Can Acrylic Nails Cause Skin Damage: आजकल नेल एक्सटेंशन और एक्रिलिक नेल्स का ट्रेंड काफी तेजी से बढ़ रहा है. लंबे, चमकदार और स्टाइलिश नाखून कई लोगों को बेहद सुंदर लगते हैं. लेकिन एक्सपर्ट का मानना है कि इनका बार-बार इस्तेमाल त्वचा और नाखूनों के लिए नुकसानदेह भी हो सकता है. खासकर इन्हें लगाने की प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाली यूवी लाइट और कुछ केमिकल हेल्थ &amp;nbsp;से जुड़ी चिंताओं को बढ़ा सकते हैं.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
&amp;nbsp;ऑन्कोलॉजी सर्जन डॉ. जय आर अनाम ने HT के साथ इंटरव्यू के दौरान बताया कि एक्रिलिक नेल्स भले ही सुंदर और लंबे समय तक टिकने वाले लगते हों, लेकिन इनके इस्तेमाल से जुड़े कुछ छिपे हुए जोखिम भी होते हैं. उनका कहना है कि समस्या सीधे एक्रिलिक नेल्स से नहीं, बल्कि उन्हें लगाने की प्रक्रिया से जुड़ी होती है. इस प्रक्रिया में एक खास पाउडर और लिक्विड पदार्थ को मिलाकर नाखूनों पर लगाया जाता है, जिसे बाद में यूवी लैंप के नीचे सख्त किया जाता है. यही यूवी लाइट चिंता का कारण बन सकती है. एक्सपर्ट के मुताबिक यूवीए किरणें त्वचा की सेल्स के डीएनए को नुकसान पहुंचा सकती हैं. समय के साथ यह नुकसान बढ़ता जाता है और लंबे समय तक बार-बार एक्सपोजर होने पर त्वचा से जुड़ी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है. डॉक्टरों का कहना है कि कभी-कभार नेल एक्सटेंशन करवाना ज्यादा खतरनाक नहीं माना जाता, लेकिन यदि कोई व्यक्ति लगातार लंबे समय तक यह प्रक्रिया करवाता है तो जोखिम धीरे-धीरे बढ़ सकता है.
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स्किन पर भी प्रभाव
कुछ रिसर्च में यह भी बताया गया है कि यूवी लैंप के नीचे सैकड़ों बार हाथ रखने से त्वचा पर निगेटिव प्रभाव पड़ सकता है. इसके अलावा कई एक्रिलिक उत्पादों में फॉर्मल्डिहाइड और टोल्यून जैसे केमिकल भी पाए जाते हैं, जो त्वचा में जलन या एलर्जी पैदा कर सकते हैं. जब ये रसायन और यूवी किरणें एक साथ प्रभाव डालते हैं तो त्वचा पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है.
हालांकि एक्सपर्ट यह भी मानते हैं कि थोड़ी सावधानी बरतकर जोखिम को कम किया जा सकता है. नेल एक्सटेंशन करवाने से पहले उंगलियों पर सनस्क्रीन लगाना एक अच्छा उपाय माना जाता है. इसके अलावा पारंपरिक यूवी लैंप की जगह एलईडी लैंप का इस्तेमाल अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जाता है, क्योंकि इसमें अल्ट्रावायलेट किरणें कम होती हैं.
किन बातों का रखना चाहिए ध्यान?
डॉक्टर यह भी सलाह देते हैं कि नेल एक्सटेंशन को रोजमर्रा की आदत बनाने के बजाय खास मौकों तक ही सीमित रखना बेहतर है. इसके साथ ही हमेशा विश्वसनीय सैलून में ही यह प्रक्रिया करवानी चाहिए. एक और आम गलती जो लोग करते हैं, वह है घर पर ही एक्रिलिक नेल्स हटाने की कोशिश करना. इससे त्वचा और नाखूनों को नुकसान हो सकता है, इसलिए इन्हें हटाने के लिए एक्सपर्ट की मदद लेना ही सुरक्षित तरीका माना जाता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 12 Mar 2026 16:30:31 +0530</pubDate>
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        <title>Radiation Exposure Treatment: क्या परमाणु हमले से होने वाले रेडिएशन से बचा सकती है कोई दवा, जानें यह कितनी कारगर?</title>
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        <description><![CDATA[ Can Medicine Protect From Nuclear Radiation:&amp;nbsp;ईरान पर अमेरिका-इजरायल के हमले के बाद पर्शियन गल्फ के हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं. इस बीच अटकलें लगने लगी हैं कि अगर हालात ऐसे ही बिगड़ते रहे तो वर्ल्ड वॉर 3 भी छिड़ सकता है, जिसके बाद लोगों के मन में परमाणु हमलों का डर बढ़ रहा है. इसके चलते दुनिया के कई देशों में पोटेशियम आयोडाइड की डिमांड काफी तेजी से बढ़ गई है. माना जाता है कि यह परमाणु हमले के बाद होने वाले रेडिएशन से बचा सकती है. आइए जानते हैं कि क्या वाकई ऐसी दवा है? अगर कोई दवा है तो वह कितनी असरदार है?
परमाणु हमले से क्या होता है?
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन की रिपोर्ट के अनुसार, परमाणु दुर्घटना या हमले की स्थिति में वातावरण में रेडियोएक्टिव आयोडीन फैल सकता है. यह हवा के साथ फैलकर मिट्टी, पानी, भोजन और आसपास की चीजों को भी दूषित कर सकता है. कई बार यह त्वचा और कपड़ों पर भी जम सकता है, जिससे शरीर को बाहरी रेडिएशन का खतरा होता है. अगर ऐसा पदार्थ त्वचा पर लग जाए तो उसे गर्म पानी और साबुन से धोकर काफी हद तक हटाया जा सकता है.
लेकिन असली खतरा तब होता है जब यह रेडियोएक्टिव आयोडीन सांस के जरिए शरीर के अंदर चला जाए या दूषित भोजन और पानी के माध्यम से शरीर में पहुंच जाए. शरीर के अंदर जाने के बाद यह थायरॉयड ग्रंथि में जमा होने लगता है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि मानव शरीर आयोडीन को स्वाभाविक रूप से थायरॉयड में ही इकट्ठा करता है, चाहे वह सामान्य आयोडीन हो या रेडियोएक्टिव आयोडीन.
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कौन सी दवा काम आ सकती है?
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन ने रेडियोलॉजिकल और परमाणु आपात स्थितियों के लिए जरूरी दवाओं की एक सूची तैयार की है, जिनमें पोटैशियम आयोडाइड का नाम भी शामिल है. ईरान पर हमलों और खाड़ी देशों पर पलटवार के बाद पोटैशियम आयोडाइड की डिमांड काफी ज्यादा बढ़ गई है और लोग लगातार इसका स्टॉक कर रहे हैं. दरअसल, इन दवाओं का मकसद रेडिएशन के असर को रोकना, कम करना या रेडिएशन से हुई क्षति का इलाज करना होता है. उदाहरण के तौर पर आयोडीन की गोलियां थायरॉयड ग्लैंड को रेडियोएक्टिव आयोडीन को यूज करने से इसको रोकने में मदद कर सकती हैं. इसी तरह कुछ खास दवाएं शरीर से रेडियोएक्टिव तत्वों को बाहर निकालने में मदद करती हैं.
इसके अलावा कुछ दवाएं ऐसी भी होती हैं जो तीव्र रेडिएशन सिंड्रोम की स्थिति में बोन मैरो को होने वाले नुकसान को कम करने में मदद कर सकती हैं. वहीं उल्टी, दस्त और इंफेक्शन जैसे लक्षणों को कंट्रोल करने के लिए भी अलग-अलग दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है. एक्सपर्ट के अनुसार परमाणु या रेडिएशन आपात स्थिति में दवाएं कुछ हद तक सुरक्षा दे सकती हैं, लेकिन यह पूरी तरह से बचाव का उपाय नहीं होतीं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 12 Mar 2026 12:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>Blood Pressure Fluctuations:  सिर्फ एक रीडिंग पर न करें भरोसा, जानें क्यों बदलता रहता है दिनभर आपका ब्लड प्रेशर?</title>
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        <description><![CDATA[ Why Headaches Happen Even With Normal Blood Pressure: अक्सर लोग तब राहत महसूस करते हैं जब हेल्थ चेकअप के दौरान उनका ब्लड प्रेशर सामान्य निकलता है. उन्हें लगता है कि हार्ट पूरी तरह स्वस्थ है और चिंता की कोई बात नहीं है. लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि केवल एक बार की सामान्य रीडिंग हमेशा पूरी सच्चाई नहीं बताती. कई बार ऐसा होता है कि क्लिनिक में बीपी सामान्य दिखता है, जबकि दिनभर के दौरान इसमें उतार-चढ़ाव होता रहता है. यही कारण है कि कुछ लोगों को बार-बार सिरदर्द की शिकायत होती है, जबकि जांच में सब कुछ सामान्य नजर आता है.
क्या होते हैं इसके पीछे कारण?
दरअसल ब्लड प्रेशर एक स्थिर संख्या नहीं है. यह दिनभर में कई कारणों से बदलता रहता है. तनाव, नींद की कमी, खानपान, फिजिकल एक्टिविटी और भावनात्मक स्थिति भी इसे प्रभावित करती हैं. कुछ मामलों में लोगों को मास्क्ड हाइपरटेंशन नाम की स्थिति हो सकती है. इसमें डॉक्टर के पास जांच के समय बीपी सामान्य रहता है, लेकिन रोजमर्रा की जिंदगी में यह काफी बढ़ सकता है. लंबे समय तक ऐसा होने पर दिल और रक्त वाहिकाओं पर दबाव पड़ने लगता है.
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एक्सपर्ट क्या कहते हैं?
कार्डियोलॉजिस्ट बताते हैं कि बिना किसी स्पष्ट कारण के बार-बार होने वाला सिरदर्द कई बार इसी छिपे हुए हाई ब्लड प्रेशर का संकेत हो सकता है. कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. गीतिश गोविल के अनुसार कई लोग यह मान लेते हैं कि सामान्य बीपी का मतलब है कि उन्हें हाइपरटेंशन का खतरा नहीं है. लेकिन कुछ लोगों में दिनभर ब्लड प्रेशर बढ़ने और घटने की समस्या होती रहती है, जो धीरे-धीरे शरीर को नुकसान पहुंचा सकती है.
ये चीजें होती हैं जिम्मेदार
ऐसी स्थिति के पीछे कई रोजमर्रा की आदतें भी जिम्मेदार हो सकती हैं. ज्यादा तनाव, कम नींद, ज्यादा नमक वाला भोजन, मोटापा, धूम्रपान और फिजिकल एक्टिविटी की कमी इसके प्रमुख कारण माने जाते हैं. कई बार देखने में पूरी तरह स्वस्थ लगने वाले लोगों में भी यह समस्या धीरे-धीरे विकसित हो सकती है. ब्लड प्रेशर में अचानक बढ़ोतरी होने पर सिरदर्द का अनुभव थोड़ा अलग हो सकता है. कई लोगों को सुबह उठते ही सिर के पीछे भारीपन महसूस होता है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि बीपी बढ़ने पर दिमाग की ब्लड वेसल्स &amp;nbsp;पर दबाव पड़ता है, जिससे दर्द की अनुभूति हो सकती है.
ब्लड प्रेशर की जांच करते रहना जरूरी
डॉक्टरों के मुताबिक शरीर कई बार छोटे-छोटे संकेत देता है, जिन्हें लोग नजरअंदाज कर देते हैं. सुबह के समय सिरदर्द, धुंधला दिखाई देना, हल्की गतिविधि में सांस फूलना या बिना वजह थकान महसूस होना भी ब्लड प्रेशर में उतार-चढ़ाव के संकेत हो सकते हैं. इसलिए एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि समय-समय पर ब्लड प्रेशर की जांच करते रहना जरूरी है. केवल एक बार की जांच के बजाय नियमित मॉनिटरिंग से सही स्थिति समझ में आती है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 12 Mar 2026 08:30:16 +0530</pubDate>
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        <title>Diseases Caused By Contaminated Water: कैग ने बताया आचमन करने लायक नहीं गंगाजल, जानें खराब पानी से हो सकती हैं कौन&amp;कौन सी बीमारियां?</title>
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        <description><![CDATA[ What Diseases Are Caused By Contaminated Water: उत्तराखंड में नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत किए गए ऑडिट में गंगा नदी की स्थिति को लेकर कई गंभीर चिंताएं सामने आई हैं. &amp;nbsp;सीएजी &amp;nbsp;की रिपोर्ट के अनुसार देवप्रयाग से हरिद्वार के बीच गंगा के पानी में कोलिफॉर्म बैक्टीरिया की मात्रा लगभग 32 गुना तक बढ़ी हुई पाई गई. इसके अलावा कई सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट &amp;nbsp;राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के तय मानकों का पालन नहीं कर रहे हैं. रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि लगभग 32 प्रतिशत एसटीपी बिना शोधन किए हुए सीवेज को सीधे गंगा में छोड़ रहे हैं. यह ऑडिट 2018 से 2023 के बीच उत्तराखंड में नमामि गंगे कार्यक्रम के क्रियान्वयन की समीक्षा के दौरान किया गया था. यह रिपोर्ट बजट सत्र के दौरान गैरसैंण में आयोजित उत्तराखंड विधानसभा में पेश की गई.
क्या बताया गया है रिपोर्ट में?
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि गंगा किनारे बसे शहरों में इस योजना के कई हिस्सों का सही तरीके से लागू नहीं हो पाया. राज्य स्वच्छ गंगा मिशन के तहत बनाए गए कुछ श्मशान घाटों का उपयोग बहुत कम हो रहा है, क्योंकि लोगों के बीच इसके बारे में पर्याप्त अवेयरनेस नहीं फैलाई गई. इसके अलावा परियोजना के तहत वनीकरण से जुड़े कार्यों में भी अपेक्षित प्रगति नहीं हो पाई. रिपोर्ट के अनुसार योजना के लिए जो खर्च निर्धारित किया गया था, उसमें से केवल लगभग 16 प्रतिशत राशि ही प्रभावी रूप से इस्तेमाल की जा सकी.
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क्या होती है इससे बीमारियां?
यूएन की विशेष हेल्थ एजेंसी वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के अनुसार, दूषित पानी और खराब स्वच्छता कई गंभीर बीमारियों के फैलने का कारण बन सकते हैं. इनमें हैजा, दस्त, पेचिश, हेपेटाइटिस ए, टाइफाइड और पोलियो जैसी बीमारियां शामिल हैं. यदि पानी और स्वच्छता से जुड़ी सेवाएं पर्याप्त न हों या उनका सही प्रबंधन न किया जाए, तो लोगों को कई तरह के स्वास्थ्य जोखिमों का सामना करना पड़ सकता है. यह समस्या स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े संस्थानों में और भी गंभीर हो जाती है, क्योंकि वहां मरीजों और स्वास्थ्यकर्मियों दोनों के लिए इंफेक्शन का खतरा बढ़ जाता है.
आंकड़ों के अनुसार हर 100 मरीजों में से लगभग 7 मरीज विकसित देशों के अस्पतालों में और करीब 15 मरीज निम्न व मध्यम आय वाले देशों के अस्पतालों में इलाज के दौरान किसी न किसी संक्रमण का शिकार हो जाते हैं. इसका एक बड़ा कारण पानी और स्वच्छता से जुड़ी सुविधाओं की कमी भी माना जाता है.
पानी क्यों हो रहा है दूषित?
डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट में बताया गया कि शहरी, औद्योगिक और कृषि क्षेत्र से निकलने वाले गंदे पानी का सही प्रबंधन न होने की वजह से करोड़ों लोगों के पीने का पानी प्रदूषित हो रहा है. कई बार भूजल में प्राकृतिक रूप से मौजूद केमिकल भी हेल्थ के लिए खतरनाक साबित हो सकते हैं. उदाहरण के लिए आर्सेनिक और फ्लोराइड जैसे तत्व भूजल में पाए जा सकते हैं. वहीं कुछ रसायन, जैसे सीसा , पानी की सप्लाई व्यवस्था के संपर्क में आने से भी पीने के पानी में मिल सकते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 12 Mar 2026 08:30:15 +0530</pubDate>
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        <title>Burning Eyes Reasons: घंटों नहीं देखते स्क्रीन तो क्यों सूख रही हैं आपकी आंखें? जानिए ड्राई आई के छिपे कारण</title>
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        <description><![CDATA[ Why Do Eyes Feel Dry Without Screen Time: आजकल कई लोग आंखों में जलन, सूखापन या किरकिराहट महसूस करने की शिकायत करते हैं. अक्सर इसका कारण मोबाइल या लैपटॉप की स्क्रीन को माना जाता है. लेकिन आंखों के डॉक्टरों का कहना है कि कई ऐसे मरीज भी क्लिनिक पहुंच रहे हैं जो ज्यादा स्क्रीन का इस्तेमाल नहीं करते, फिर भी उनकी आंखें सूखी और थकी हुई महसूस होती हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर यह समस्या क्यों बढ़ रही है.
क्यों होती है इस तरह की दिक्कत?
दरअसल, हमारी आंखों की सतह पर एक पतली परत होती है जिसे टियर फिल्म कहा जाता है. यही परत आंखों को नम बनाए रखती है और उन्हें आरामदायक महसूस कराती है. जब यह संतुलन बिगड़ जाता है तो आंखों में सूखापन, खुजली या जलन जैसी परेशानी होने लगती है. विशेषज्ञों का कहना है कि आज की लाइफस्टाइल में कई ऐसी आदतें हैं जो धीरे-धीरे इस संतुलन को प्रभावित करती हैं.
भारत में इतने लोगों को होती है दिक्कत
इंडियन जर्नल ऑफ ऑप्थैल्मोलॉजी में पब्लिश एक स्टडी के मुताबिक उत्तर भारत में लगभग 32 प्रतिशत लोगों को ड्राई आई की समस्या का सामना करना पड़ता है. रिसर्चर का मानना है कि इसके पीछे एनवायरमेंट, उम्र और रोजमर्रा की लाइफस्टाइल बड़ी भूमिका निभाते हैं. ड्राई आई सिंड्रोम अब दुनिया भर में आंखों से जुड़ी आम समस्याओं में से एक बन चुका है. यह स्थिति तब पैदा होती है जब आंखों में पर्याप्त आंसू नहीं बनते या बनने वाले आंसू जल्दी सूख जाते हैं. आंसू सिर्फ पानी नहीं होते, बल्कि उनमें तेल, म्यूकस और कुछ प्रोटीन भी होते हैं जो आंखों को इंफेक्शन से बचाते हैं और उन्हें चिकना बनाए रखते हैं. जब यह मिक्स असंतुलित हो जाता है तो आंखों में जलन और असहजता महसूस होने लगती है.
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क्या होते हैं कारण?
शहरों में बढ़ता प्रदूषण और एयर कंडीशनर का ज्यादा इस्तेमाल भी आंखों पर असर डालता है. एयर कंडीशनिंग से हवा में नमी कम हो जाती है, जिससे आंसू जल्दी सूखने लगते हैं. इसके अलावा धूल और प्रदूषण भी आंखों में जलन बढ़ा सकते हैं. एक और अहम कारण है पलक झपकाने की आदत का कम हो जाना. जब हम किसी काम में बहुत ज्यादा ध्यान लगाते हैं, जैसे पढ़ना, लिखना या लंबी ड्राइव करना, तो पलक झपकाने की गति धीमी हो जाती है. इससे आंखों की सतह पर आंसुओं की परत ठीक से नहीं फैल पाती और सूखापन महसूस होने लगता है. एलर्जी भी कई बार आंखों में जलन और खुजली का कारण बन सकती है. पॉलिन, धूल, फफूंदी या पालतू जानवरों के बाल जैसी चीजें आंखों के आसपास की नाजुक त्वचा में सूजन पैदा कर सकती हैं.
कैसे कर सकते हैं बचाव?
इसके अलावा शरीर में पानी की कमी, नींद पूरी न होना या विटामिन A, D और ओमेगा-3 जैसे पोषक तत्वों की कमी भी आंखों के सूखेपन को बढ़ा सकती है. इसलिए एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि पर्याप्त पानी पिएं, आंखों को समय-समय पर आराम दें और जरूरत पड़ने पर आंखों की जांच जरूर कराएं. छोटी-छोटी आदतों में बदलाव करके आंखों को लंबे समय तक स्वस्थ रखा जा सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 11 Mar 2026 16:30:19 +0530</pubDate>
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        <title>Cervical Cancer In India: हर 8 मिनट में एक जान! साइलेंट किलर है सर्वाइकल कैंसर, डॉक्टर से जानें इसे रोकने के 5 कारगर तरीके</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/cervical-cancer-in-india-हर-8-मिनट-में-एक-जान-साइलेंट-किलर-है-सर्वाइकल-कैंसर-डॉक्टर-से-जानें-इसे-रोकने-के-5-कारगर-तरीके</link>
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        <description><![CDATA[ Why Cervical Cancer Is Common In India: भारत में सर्वाइकल कैंसर महिलाओं के बीच सबसे गंभीर हेल्थ समस्याओं में से एक है. इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के आंकड़ों के अनुसार, देश में हर 8 मिनट में एक महिला की मौत इस बीमारी से होती है. सबसे दुखद बात यह है कि यह उन कैंसरों में से है जिन्हें काफी हद तक रोका जा सकता है. डॉ. विश्वनाथ, सीनियर कंसल्टेंट मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट ने TOI को बताया कि सर्वाइकल कैंसर धीरे-धीरे विकसित होता है. कई वर्षों तक सेल्स में बदलाव चुपचाप होता रहता है, जो समय रहते पहचान लिया जाए तो पूरी तरह रोका जा सकता है. &amp;nbsp;यही इसकी चुनौती भी है और अवसर भी. चलिए आपको बताते हैं कि कैसे इसको रोका जा सकता है,
HPV वैक्सीन
अधिकांश सर्वाइकल कैंसर के पीछे हाई-रिस्क ह्यूमन पैपिलोमा वायरस जिम्मेदार होता है. एचपीवी वैक्सीन खतरनाक स्ट्रेन्स से बचाव करती है. यह 9 से 14 वर्ष की उम्र में सबसे प्रभावी मानी जाती है, लेकिन 26 वर्ष तक भी दी जा सकती है. जिन देशों ने बड़े स्तर पर वैक्सीनेशन किया, वहां मामलों में काफी कमी देखी गई है. यह वैक्सीन लाइफस्टाइल नहीं, बल्कि कैंसर से सुरक्षा का कदम है.
रेगुलर स्क्रीनिंग
शुरुआती स्टेप में यह कैंसर कोई स्पष्ट संकेत नहीं देता. पैप स्मीयर, एचपीवी डीएनए टेस्ट या विजुअल इंस्पेक्शन जैसी जांचें सेल्स में होने वाले बदलाव को पहले ही पकड़ सकती हैं. 30 से 65 वर्ष की महिलाओं को डॉक्टर की सलाह के अनुसार नियमित जांच करानी चाहिए. सब ठीक लग रहा है सोचकर जांच टालना दिक्कतों को बढ़ा सकता है.
सुरक्षित फिजिकल रिलेशन
एचवीपी मुख्य रूप से यौन संपर्क से फैलता है. कंडोम का नियमित उपयोग इंफेक्शन के खतरे को कम करता है, हालांकि पूरी तरह खत्म नहीं करता. बहुत कम उम्र में यौन सक्रियता और कई पार्टनर्स भी जोखिम बढ़ाते हैं. जागरूकता और खुली बातचीत ही बचाव का रास्ता है.
स्मोकिंग से दूरी
तंबाकू इम्यून सिस्टम को कमजोर करता है, जिससे शरीर एचपीवी इंफेक्शन को साफ नहीं कर पाता. सिगरेट के हानिकारक रसायन सर्वाइकल म्यूकस में भी पाए गए हैं. स्मोकिंग छोड़ना धीरे-धीरे खतरा कम कर सकता है.
इन संकेतों को नजरअंदाज न करें
पीरियड्स के बीच ब्लीडिंग, संबंध के बाद खून आना, मेनोपॉज के बाद ब्लीडिंग, बदबूभरे डिस्चार्ज या लगातार पेल्विक दर्द जैसे लक्षणों को हल्के में न लें. शुरुआती पहचान होने पर इलाज के परिणाम बेहद बेहतर होते हैं. सर्वाइकल कैंसर की रोकथाम संभव है, बस जरूरत है जागरूकता, समय पर जांच और सामूहिक सहयोग की. सही जानकारी और समय पर कदम उठाने से इस बड़ी बीमारी से बचा जा सकता है.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 11 Mar 2026 12:30:19 +0530</pubDate>
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        <title>Childhood Cancer: लगातार बुखार, थकान और हड्डियों में दर्द... बच्चों में दिखें ये लक्षण तो न करें इग्नोर, वरना हो जाएगा कैंसर</title>
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        <description><![CDATA[ What Are The First Signs Of Cancer In A Child: बचपन में होने वाला कैंसर बाकी कैंसर की तुलना में कम दिखता है, लेकिन यह उतना रेयर भी नहीं है जितना आमतौर पर समझ लिया जाता है. भारत में हर साल लगभग 50,000 से 75,000 नए बच्चों के कैंसर के मामले सामने आते हैं, जिनमें ल्यूकेमिया और लिंफोमा प्रमुख हैं. अच्छी बात यह है कि समय पर पहचान और इलाज से 80 प्रतिशत से अधिक बच्चों के ठीक होने की संभावना रहती है. असली चुनौती शुरुआती संकेतों को समय रहते पहचानने की है. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर डॉ. क्या कहते हैं.&amp;nbsp;
क्या करने की होती है जरूरत?
डॉ. श्रावण कुमार बोडेपुडी, मणिपाल हॉस्पिटल, विजयवाड़ा &amp;nbsp;बचपन के कई कैंसर बहुत हल्के और सामान्य से लगने वाले लक्षणों के साथ शुरू होते हैं. लंबे समय तक रहने वाला बुखार, लगातार थकान या शरीर पर छोटी-सी गांठ, ये सब अक्सर सामान्य बीमारी समझकर टाल दिए जाते हैं. कई बार सही जांच और इलाज में हफ्तों या महीनों की देरी हो जाती है, खासकर उन इलाकों में जहां स्वास्थ्य सुविधाएं सीमित हैं. अगर माता-पिता सतर्क रहें और संकेतों को गंभीरता से लें, तो इलाज जल्दी शुरू किया जा सकता है.
किन लक्षणों पर ध्यान रखने की जरूरत होती है?
डॉ. श्रावण बताते हैं कि अगर कोई लक्षण दो हफ्तों से ज्यादा बना रहे या बार-बार लौटे, तो उसे नजरअंदाज न करें. बिना वजह गर्दन, बगल या पेट में गांठ या सूजन दिखाई देना, बार-बार नाक से खून आना, मसूड़ों से खून आना या त्वचा पर छोटे लाल धब्बे उभरना चेतावनी हो सकते हैं. लगातार बुखार, बार-बार इंफेक्शन, असामान्य थकान, बिना कारण वजन कम होना या भूख न लगना भी संकेत हैं. हड्डियों या जोड़ों में दर्द, जिससे बच्चा लंगड़ाकर चले या रात में दर्द की शिकायत करे, उसे भी गंभीरता से लें. सुबह के समय सिरदर्द के साथ उल्टी, दृष्टि या संतुलन में समस्या, पेट में सूजन या चेहरा पीला पड़ना, ये सब जांच की मांग करते हैं. तस्वीरों में आंखों में सफेद चमक दिखना दुर्लभ आंख के ट्यूमर का संकेत हो सकता है. जरूरी नहीं कि हर लक्षण कैंसर हो, लेकिन इनकी अनदेखी ठीक नहीं.
आपको क्या करना चाहिए?
ल्यूकेमिया में अक्सर बुखार, थकान, पीलापन और आसानी से चोट लगना दिखता है. लिंफोमा में गर्दन या बगल में सख्त और बढ़ती हुई गांठें नजर आती हैं. ब्रेन ट्यूमर सुबह के सिरदर्द और संतुलन की समस्या से जुड़ा हो सकता है, जबकि कुछ ठोस ट्यूमर पेट में सूजन या गांठ के रूप में दिखते हैं. अगर बच्चे के लक्षण बने रहें या बढ़ते जाएं, तो डॉक्टर से तुरंत संपर्क करें. सामान्य खून की जांच और इमेजिंग से शुरुआती संकेत मिल सकते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 11 Mar 2026 12:30:18 +0530</pubDate>
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        <title>Tarn Taran Momo Incident: क्या मोमोज&amp;चाप खाने से हो जाती है मौत, एक्सपर्ट्स से जानें ये कितने खतरनाक?</title>
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        <description><![CDATA[ Can Eating Momos Cause Choking Death:&amp;nbsp;पंजाब के तरनतारन शहर में एक दर्दनाक घटना सामने आई है, जहां संदिग्ध परिस्थितियों में दो सगे भाई-बहनों की मौत हो गई. बताया जा रहा है कि शनिवार शाम सड़क किनारे एक रेहड़ी से खाना खाने के बाद रात में उनकी तबीयत बिगड़ गई थी. रविवार सुबह जब माता-पिता उन्हें अस्पताल लेकर पहुंचे तो डॉक्टरों ने दोनों बच्चों को मृत घोषित कर दिया.
परिवार के अनुसार बच्चों ने शनिवार शाम को एक रेहड़ी वाले से मोमोज और चैंप खाए थे. खाना खाने के कुछ ही समय बाद दोनों को उल्टियां होने लगीं. शुरुआत में घर पर ही उल्टी रोकने की दवा दी गई, जिसके बाद वे सो गए. लेकिन रविवार सुबह जब काफी देर तक बच्चे नहीं जागे तो परिजन घबरा गए और उन्हें तुरंत अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. चलिए आपको बताते हैं कि क्या मोमोज खाने से मौत भी हो सकती है.
क्या इससे मौत भी हो सकती है?
Dr. Chandril Chugh, US Trained Adult &amp;amp; Pediatric Neurologist ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो शेयर करके बताया कि जो लोग मोमोज खाना खूब पसंद करते हैं, उन्हें इससे होने वाली 4 बीमारियों के बारे में पता होना चाहिए. उनके अनुसार इससे फैटी लिवर की दिक्कत होती है, क्योंकि सारा मैदा लिवर में जाता है और बाद में इस तरह की दिक्कत पैदा करता है. दूसरा यह ब्लड प्रेशर और हार्ट डिजीज का भी कारण बनता है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जो स्पाइसी चटनी हम इसके साथ खाते हैं, उसमें सोडियम पाई जाती है. वे आगे बताते हैं कि इसके चलते कैंसर की भी दिक्कत हो सकती है. चौथा सबसे बड़ा कारण हार्ट अटैक से होने वाली मौत का है. डॉ. चंद्रिल बताते हैं कि तेल के चलते हार्ट में ब्लॉकेज की समस्या होती है, जिसके चलते आज यंग लोगों में भी हार्ट अटैक से मौत की समस्या बढ़ रही है.
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मोमोज खाते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
एम्स नई दिल्ली के एक्सपर्ट के अनुसार मोमोज खाते समय सावधानी बेहद जरूरी है. दरअसल, मोमोज की बनावट काफी मुलायम और फिसलन भरी होती है. अगर इन्हें ठीक से चबाए बिना ही निगल लिया जाए तो इनके गले में फंसने की आशंका बढ़ जाती है, जिससे चोकिंग यानी सांस रुकने की स्थिति बन सकती है और गंभीर मामलों में जान का खतरा भी हो सकता है. यह चेतावनी उस घटना के बाद सामने आई थी, जब एक व्यक्ति मोमोज खाते समय अचानक दुकान पर ही गिर पड़ा था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में पाया गया कि उसके विंडपाइप के मुहाने पर एक डंपलिंग यानी मोमो फंसा हुआ था. मेडिकल एक्सपर्ट ने माना कि उसकी मौत मोमो के कारण गला घुटने से हुई थी.
हो सकता है&amp;nbsp;नुकसानदायक 
एक और अहम बात यह है कि ज्यादातर मोमोज मैदा से बनाए जाते हैं. मैदा दरअसल अनाज का वह हिस्सा होता है जिसमें फाइबर नहीं के बराबर होता है. इसे मुलायम और सफेद बनाने के लिए कई बार रासायनिक प्रक्रिया से गुजारा जाता है. कुछ एक्सपर्ट का मानना है कि ऐसे रसायन लंबे समय तक अधिक मात्रा में सेवन करने पर शरीर के लिए नुकसानदेह हो सकते हैं. यह पैंक्रियास पर असर डाल सकते हैं और शरीर में इंसुलिन बनने की प्रक्रिया को भी प्रभावित कर सकते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 10 Mar 2026 12:30:22 +0530</pubDate>
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        <title>तांबे या कांच, कौन&amp;सी पानी की बोतल है आपकी सेहत की असली दोस्त?</title>
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        <description><![CDATA[ आज के समय में लोग अपनी सेहत और पर्यावरण दोनों का ख्याल रखने लगे हैं. ऐसे में प्लास्टिक की बोतलों का यूज धीरे-धीरे कम हो रहा है. लोग अब ऐसे ऑप्शन तलाश रहे हैं जो न सिर्फ सुरक्षित हों बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी फायदेमंद हों. इस दिशा में तांबे और कांच की पानी की बोतलें सबसे फेमस ऑप्शन बन चुके हैं, लेकिन सवाल यह है कि इनमें से कौन सी बोतल आपकी सेहत के लिए बेहतर है. तो आइए जानते हैं कि तांबे या कांच कौन सी पानी की बोतल आपकी सेहत की असली दोस्त है.&amp;nbsp;तांबे की बोतलें प्राचीन परंपरा और आधुनिक स्वास्थ्य
तांबे की बोतलों का यूज भारत में हजारों सालों से होता आया है. पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, तांबे की बोतल में रखा पानी स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होता है. इसे पीने से पाचन बेहतर होता है, इम्यूनिटी बढ़ती है और ऑवर हेल्थ में सुधार होता है. तांबे में प्राकृतिक रूप से एंटीमाइक्रोबियल गुण होते हैं. कई अध्ययन बताते हैं कि तांबे की सतह कुछ हानिकारक बैक्टीरिया और सूक्ष्मजीवों को मार सकती है, जिससे पानी अधिक सुरक्षित बनता है. जब पानी को तांबे की बोतल में कुछ घंटों के लिए रखा जाता है, तो उसमें तांबे की हल्की मात्रा घुल सकती है. तांबा हमारे शरीर के लिए जरूरी मिनरल है, जो रेल ब्लड सेल्स के निर्माण, तंत्रिका तंत्र के स्वास्थ्य और इम्यून सिस्टम के लिए जरूरी है, लेकिन विशेषज्ञ बताते हैं कि संतुलन बनाए रखना बहुत जरूरी है. ज्यादा तांबे युक्त पानी पीने से पेट में तकलीफ, मतली या अन्य स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं.&amp;nbsp;
क्या कांच की बोतलें सुरक्षित ऑप्शन?
कांच की बोतलें पीने के पानी के लिए सबसे सुरक्षित ऑप्शन मानी जाती हैं. यह किसी भी तरह की रासायनिक प्रतिक्रिया नहीं करती और पानी के टेस्ट को प्रभावित नहीं करती हैं. कांच बिना छेद वाला और रासायनिक रूप से स्थिर होता है, इसलिए यह गंध, टेस्ट या दाग को अवशोषित नहीं करती, इसका मतलब है कि पानी हमेशा शुद्ध और ताजगी भरा रहेगा. इसके अलावा, कांच की बोतलें साफ करना आसान होती हैं और पर्यावरण के लिए भी बेहतर हैं, क्योंकि इन्हें कई बार यूज किया जा सकता है.
तांबे की बोतल से जुड़ी आम मिसकंसेप्शन
तांबे की बोतलों को लेकर कई मिथक हैं. जैसे कि यह सोचना कि तांबे में रखा पानी किसी भी बीमारी का इलाज कर सकता है. विशेषज्ञ बताते हैं कि ऐसे दावे का वैज्ञानिक समर्थन सीमित है. एक और गलत धारणा है कि पानी को हमेशा तांबे की बोतल में रखना चाहिए. विशेषज्ञों के अनुसार इसे सिर्फ कुछ घंटों या रात भर के लिए ही रखना चाहिए. इससे शरीर में तांबे की अधिकता नहीं होती और संभावित लाभ सुरक्षित रहते हैं.
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तांबे की बोतल के नुकसान
अगर तांबे की बोतल का सही तरीके से यूज न किया जाए तो स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव हो सकता है. ज्यादा तांबा युक्त पानी पीने से मतली, उल्टी, पेट दर्द या पाचन संबंधी परेशानियां हो सकती हैं. इसके अलावा, अम्लीय पेय जैसे नींबू पानी, फलों का रस या सिरका तांबे की बोतल में नहीं रखना चाहिए. ये पेय तांबे के साथ प्रतिक्रिया कर सकते हैं और पानी में धातु की मात्रा बढ़ा सकते हैं. &amp;nbsp; विशेषज्ञ यह भी सुझाव देते हैं कि तांबे की बोतल को नियमित रूप से साफ करना जरूरी है, ताकि उसमें जमा अवशेष या ऑक्सीकरण से बचा जा सके.&amp;nbsp;
तांबे या कांच कौन सी पानी की बोतल सेहत के लिए सही?
तांबे की बोतल में हल्के एंटीमाइक्रोबियल गुण होते हैं और यह शरीर को जरूरी मिनरल भी देती है. इसका सही यूज और संतुलन के साथ यह फायदेमंद हो सकती है. वहीं कांच की बोतल पूरी तरह सुरक्षित, तटस्थ और पर्यावरण के अनुकूल ऑप्शन है. इसमें पानी का टेस्ट, गंध और क्वालिटी हमेशा बरकरार रहती है.ऐसे में रोजाना यूज के लिए ज्यादातर स्वास्थ्य विशेषज्ञ कांच की बोतलों को ज्यादा भरोसेमंद मानते हैं. तांबे की बोतल का यूज कभी-कभी, कुछ घंटों के लिए किया जा सकता है, बशर्ते इसे सही तरीके से साफ किया जाए और अम्लीय पेय में न यूज किया जाए.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 10 Mar 2026 08:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>Tooth Pain And Cancer: दांतों में बना हुआ है दर्द तो न करें नजरअंदाज, हो सकता है कैंसर</title>
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        <description><![CDATA[ Can Tooth Pain Be A Sign Of Oral Cancer: कई बार दांत में दर्द होना एक सामान्य समस्या लगती है. हमें लगता है कि शायद कुछ ज्यादा ठंडा खा लिया, कुछ सख्त चीज चबा ली या ठीक से ब्रश नहीं किया, इसलिए दर्द हो रहा है. लेकिन अगर यह दर्द लंबे समय तक बना रहे और सामान्य दर्द से थोड़ा अलग महसूस हो, तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए. ज्यादातर मामलों में दांत का दर्द किसी सामान्य दांत की समस्या का संकेत होता है, लेकिन कुछ रेयर मामलों में यह किसी गंभीर बीमारी, जैसे ओरल कैंसर या जबड़े के कैंसर का संकेत भी हो सकता है. इसलिए सामान्य दांत दर्द और कैंसर से जुड़े लक्षणों के बीच फर्क समझना जरूरी है.
दांत या मुंह का कैंसर कब होता है?
कैंसर के बारे में जानकारी देने वाली oncarecancer की रिपोर्ट के अनुसार, &amp;nbsp;दांतों के आसपास होने वाला कैंसर आमतौर पर मसूड़ों, दांतों के आसपास की परत या जबड़े की हड्डी में शुरू हो सकता है. कई लोग यह मानते ही नहीं कि मुंह या दांतों के आसपास भी कैंसर हो सकता है, इसलिए शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज कर देते हैं. यही कारण है कि कई बार मरीज इलाज के लिए देर से पहुंचते हैं. अच्छी बात यह है कि अगर इस बीमारी का पता शुरुआती चरण में चल जाए तो इसका इलाज संभव है. डॉक्टर छोटे प्रभावित हिस्से को हटाकर कैंसर को फैलने से रोक सकते हैं और मरीज पूरी तरह ठीक भी हो सकता है.
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क्यों सामान्य दर्द समझ लेते हैं लोग?
दांत का दर्द बहुत आम है और इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं, जैसे कैविटी, मसूड़ों का इंफेक्शन, दांत पीसने की आदत या साइनस की समस्या. इन स्थितियों में इलाज के बाद दर्द ठीक हो जाता है, लेकिन कैंसर से जुड़ा दर्द अलग तरह का होता है. यह धीरे-धीरे शुरू होकर लगातार बना रह सकता है और समय के साथ बढ़ भी सकता है. कई बार यह दर्द जबड़े, चेहरे या कान तक फैलने लगता है.
क्या होते हैं इसके संकेत?
लगातार बना रहने वाला दर्द: सामान्य दांत दर्द अक्सर कुछ समय बाद कम हो जाता है, लेकिन कैंसर से जुड़ा दर्द लंबे समय तक बना रह सकता है. ब्रश करने, दवा लेने या घरेलू उपाय करने के बाद भी अगर दर्द कई हफ्तों या महीनों तक रहे, तो यह चिंता की बात हो सकती है.
जबड़े या दांतों के आसपास सूजन: इंफेक्शन या चोट की वजह से सूजन होना सामान्य है, लेकिन अगर सूजन धीरे-धीरे बढ़े, कठोर महसूस हो और लंबे समय तक ठीक न हो, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. कई बार इससे चेहरे का आकार भी थोड़ा बदल सकता है या मुंह खोलने में परेशानी हो सकती है.
बिना कारण दांत का हिलना: कभी-कभी दांत मसूड़ों की बीमारी या चोट की वजह से हिलने लगते हैं, लेकिन अगर बिना किसी स्पष्ट कारण के दांत ढीले होने लगें, तो यह जबड़े की हड्डी या आसपास के ऊतकों में बदलाव का संकेत हो सकता है.
सामान्य दर्द से कैसे अलग हैं ये लक्षण?
सामान्य दांत दर्द का कारण स्पष्ट होता है और इलाज के बाद राहत मिल जाती है. लेकिन कैंसर से जुड़े लक्षणों में दर्द लगातार बना रहता है, सूजन खत्म नहीं होती और दांत या जबड़े में बदलाव धीरे-धीरे बढ़ते जाते हैं. इसके साथ मुंह में लंबे समय तक घाव रहना, सुन्नता महसूस होना या बिना कारण दांत ढीले होना भी गंभीर संकेत हो सकते हैं. अगर ऐसे लक्षण लंबे समय तक बने रहें, तो तुरंत डॉक्टर या डेंटिस्ट से जांच कराना जरूरी है. समय रहते जांच और इलाज से गंभीर समस्याओं से बचा जा सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 09 Mar 2026 20:30:15 +0530</pubDate>
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        <title>दिल्ली में पीने के पानी के 40% से ज्यादा सैंपल टेस्ट में फेल, जानें इससे कौन&amp;कौन सी बीमारियां हो सकती हैं?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/दिल्ली-में-पीने-के-पानी-के-40-से-ज्यादा-सैंपल-टेस्ट-में-फेल-जानें-इससे-कौन-कौन-सी-बीमारियां-हो-सकती-हैं</link>
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        <pubDate>Mon, 09 Mar 2026 16:30:22 +0530</pubDate>
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        <title>पैरों में दिखें ये 7 लक्षण तो तुरंत भागें डॉक्टर के पास, वरना डैमेज हो जाएगा लिवर</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/पैरों-में-दिखें-ये-7-लक्षण-तो-तुरंत-भागें-डॉक्टर-के-पास-वरना-डैमेज-हो-जाएगा-लिवर</link>
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        <description><![CDATA[ हमारे शरीर में किसी भी बीमारी की शुरुआत अचानक नहीं होती. बीमारी होने से पहले शरीर बार-बार इसके संकेत देता है. अगर समय रहते इन संकेतों को पहचान लिया जाए तो बीमारी से बचा जा सकता है. ऐसे ही लिवर भी खराब होने से पहले कई तरह के लक्षण दिखाई देते हैं. आज हम आपको आपके पैरों में दिखने वाले वे 7 लक्षण बताएंगे, जो लिवर डैमेज होने का संकेत हो सकते हैं. समय रहते डॉक्टर को दिखाने से बड़ी बीमारी से बचा जा सकता है.&amp;nbsp;
लिवर और पैरों का संबंध&amp;nbsp;
लिवर हमारे शरीर का एक बेहद महत्तवपूर्ण अंग है, लेकिन जब लिवर ठीक तरह से काम नहीं करता तो इसके कुछ संकेत पैरों में दिखाई देते है, जिसे आमतौर पर पैरों में होने वाले बदलावों को मामूली बात मानकर नजरअंदाज करना आसान है. हम सोचते है कि शायद यह खराब जूते पहनने या लंबे समय तक खड़े रहने के कारण हो सकता है, लेकिन कभी-कभी, ये बदलाव आंतरिक समस्या पैदा कर सकते हैं. विशेष रूप से लिवर स्वास्थ्य से संबंधित समस्याओं को, नजरअंदाज नहीं करना चाहिए बल्कि फौरन डॉक्टर के पास जाना चाहिए.
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इन लक्षणों को नजरअंदाज न करेंः-

पैरों में अचानक सूजन आनाः अगर आपके तलवों में अचानक सूजन दिखाई देने लगे तो यह लिवर की समस्या का संकेत हो सकता है. लिवर सही तरीके से काम न करने पर शरीर में तरल पदार्थ जमा होने लगता है जिससे पैरों में सूजन आ जाती है.
तलवों में ज्यादा खुजली होनाः जब लिवर ठीक से काम नहीं करता तो शरीर में कुछ पदार्थ जमा हो जाते हैं, जिससे त्वचा में खुजली होने लगती है.
पैरों का रंग बदलनाः अगर पैरों की त्वचा का रंग पीला, गहरा या असामान्य दिखने लगे तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. कई बार यह शरीर में बिलीरुबिन बढ़ने का संकेत हो सकता है.
नसें ज्यादा उभरनाः कभी कभी पैरों की नसें ज्यादा उभरी हुई दिखाई देने लगती हैं और इसके साथ सूजन और दर्द भी हो तो एक तरह से ये भी लिवर से जुड़ी समस्याओं का एक संकेत हो सकता है.
लगातार दर्द या भारीपन महसूस होनाः यह भी शरीर के अंदर किसी समस्या की ओर इशारा करता है. जब पैरों में लगातार दर्द, भारीपन या थकान महसूस हो रही हो तो यह भी लिवर की बीमारी का एक संकेत हो सकता है.&amp;nbsp;
पैरों में हद से ज्यादा जलन होनाः जब यह समस्या लंबे समय तक बनी रहे तो यह भी लिवर की खराबी का एक संकेत हो सकता है. कई लोगों को पैरों के तलवों में जलन या गर्माहट महसूस होने लगती है.
चमड़ी का बहुत ज्यादा सूखनाः अगर पैरों की चमड़ी बहुत ज्यादा सूखी या फटने लगे तो यह भी किसी गड़बड़ी का संकेत हो सकता है.

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लक्षण दिखाई देने पर ये उपाय करें
अगर आपको इस प्रकार के लक्षण आपको अपने पैरों में लगातार दिखाई दे रहे है या ये परेशानी बढ़ते ही जा रही है तो &amp;nbsp;इसे बिलकुल हलके में ना ले और नजरंदाज ना करें इसकी तुरंत डॉक्टर के पास जाकर अपनी परेशानी बताएं और इसका जांच कराएं, क्योंकि समय पर इलाज न मिलने पर आपके लिवर को गंभीर नुकसान हो सकता हैं. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 07 Mar 2026 16:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>महिलाओं की आंखें मांगती हैं हर उम्र में खास देखभाल, जानें आई केयर टिप्स</title>
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        <description><![CDATA[  ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 07 Mar 2026 16:30:09 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>30 साल हो गई उम्र तो जरूर कराएं ये टेस्ट, विमेंस डे पर खुद को दें ये तोहफा</title>
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        <description><![CDATA[ हर साल 8 मार्च को हम अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाते हैं. यह दिन महिलाओं के अधिकारों, समाज में उनके योगदान और उनके स्वास्थ्य की अहमियत को याद दिलाता है. समाज में महिलाएं परिवार और कामकाज की जिम्मेदारियों को संतुलित करने में जुटी रहती हैं. अक्सर इस भागदौड़ में वे अपनी सेहत पर ध्यान देना भूल जाती हैं. खासकर जब कोई महिला 30 साल की उम्र पार कर लेती है, तो उसके शरीर में हार्मोनल और मेटाबॉलिक बदलाव शुरू हो जाते हैं. इस उम्र में महिलाओं को अपने स्वास्थ्य का ख्याल रखना बेहद जरूरी हो जाता है. समय पर मेडिकल चेकअप कराने से गंभीर बीमारियों का शुरुआती चरण में पता चल जाता है और उनका इलाज आसान हो जाता है. तो आइए आज हम आपको बताते हैं कि 30 साल की उम्र के बाद हर महिला को कौन-कौन से टेस्ट &amp;nbsp;जरूर कराने चाहिए.&amp;nbsp;
30 साल हो गई उम्र तो जरूर कराएं ये टेस्ट
1. सर्वाइकल कैंसर की जांच - सर्वाइकल कैंसर महिलाओं में होने वाले सबसे खतरनाक कैंसर में से एक है. WHO की रिपोर्ट के अनुसार, 2022 में लगभग 6,60,000 नए मामले सामने आए और 3,50,000 महिलाओं की मौत इसी कारण हुई. &amp;nbsp;इसलिए 30 साल की उम्र के बाद हर महिला को तीन साल में एक बार पैप स्मीयर टेस्ट कराना चाहिए. इसके अलावा कई बार HPV टेस्ट की भी सलाह दी जाती है. इन टेस्ट्स से सर्विक्स की कोशिकाओं में बदलाव का पता चलता है और कैंसर का खतरा कम हो जाता है.&amp;nbsp;
2. ब्रेस्ट कैंसर की जांच - दुनियाभर में ब्रेस्ट कैंसर महिलाओं में सबसे ज्यादा पाया जाने वाला कैंसर है. WHO के अनुसार, 2022 में लगभग 6,70,000 महिलाओं की मौत ब्रेस्ट कैंसर के कारण हुई. ब्रेस्ट कैंसर के शुरुआती स्टेज में इलाज करना बहुत आसान होता है. इसलिए, 30 साल की उम्र से ही महिलाओं को खुद से ब्रेस्ट चेक करने की आदत डालनी चाहिए. किसी भी गांठ, सूजन या दर्द का तुरंत पता लग सके. 40 साल की उम्र के बाद नियमित मैमोग्राफी भी जरूरी है, खासकर अगर परिवार में ब्रेस्ट कैंसर का इतिहास हो.&amp;nbsp;
3. ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल टेस्ट - आजकल की तेज-तर्रार जिंदगी में महिलाएं घर और काम दोनों संभाल रही हैं. खराब लाइफस्टाइल, तनाव और खानपान के कारण डायबिटीज और हाई कोलेस्ट्रॉल की समस्या जल्दी होने लगी है. &amp;nbsp;अगर परिवार में डायबिटीज का इतिहास है, तो यह और भी जरूरी हो जाता है. इससे हार्ट डिजीज और स्ट्रोक जैसी गंभीर बीमारियों का समय पर पता चल जाता है.&amp;nbsp;
4. थायराइड टेस्ट - हार्मोनल बदलावों के कारण थायराइड की समस्या महिलाओं में आम है. यह पीरियड्स के चक्र को प्रभावित करता है और समय से पहले मेनोपॉज का खतरा बढ़ा सकता है. अगर वजन अचानक बढ़े या घटे, लगातार थकान महसूस हो, बाल झड़ने लगें या मूड स्विंग्स हों, तो थायराइड फंक्शन टेस्ट कराना बहुत जरूरी है. नियमित चेकअप में थायराइड की जांच से इन समस्याओं को समय रहते रोका जा सकता है.
5. हड्डियों की जांच - 35 साल की उम्र के बाद महिलाओं की हड्डियों की ताकत धीरे-धीरे कम होने लगती है. अगर शरीर में विटामिन D और कैल्शियम की कमी हो, तो हड्डियां कमजोर हो जाती हैं. बोन मिनरल डेंसिटी टेस्ट से ऑस्टियोपोरोसिस के खतरे का पता चलता है. जो महिलाएं लंबे समय तक एक ही पोस्चर में बैठती हैं या बार-बार फ्रैक्चर का सामना करती हैं, उन्हें यह टेस्ट 30 साल से पहले ही करवा लेना चाहिए.&amp;nbsp;
इसे भी पढ़ें- Early Vascular Ageing: क्यों समय से पहले सख्त हो रहीं युवाओं की आर्टरीज, क्या यह हार्ट अटैक का साइलेंट सिग्नल?
महिला दिवस पर खुद को दें यह तोहफा
महिला दिवस सिर्फ सम्मान का दिन नहीं है, बल्कि यह दिन खुद के स्वास्थ्य और खुशहाली पर ध्यान देने का भी है. 30 साल के बाद महिलाओं के शरीर में बदलाव शुरू होते हैं और समय पर चेकअप कराना उनके जीवन को सुरक्षित बनाता है. ऐसे में पैप स्मीयर और HPV टेस्ट , ब्रेस्ट कैंसर स्क्रीनिंग और ब्लड शुगर व कोलेस्ट्रॉल टेस्ट जो हर महिला को 30 साल के बाद जरूर कराना चाहिए. नियमित चेकअप और सावधानी से महिलाएं न सिर्फ अपनी सेहत बेहतर रख सकती हैं, बल्कि अपने परिवार के लिए भी मजबूत और खुशहाल आधार बन सकती हैं. इसलिए इस महिला दिवस पर खुद को स्वास्थ्य का तोहफा दें और अपनी जिंदगी में स्वास्थ्य को प्राथमिकता बनाएं.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 06 Mar 2026 07:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Weight Loss Tips: जिम में मेहनत के बाद भी नहीं घट रहा वजन, कहीं आप भी तो नहीं कर रहे ये बड़ी गलतियां?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/weight-loss-tips-जिम-में-मेहनत-के-बाद-भी-नहीं-घट-रहा-वजन-कहीं-आप-भी-तो-नहीं-कर-रहे-ये-बड़ी-गलतियां</link>
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        <description><![CDATA[ Why Am I Not Losing Weight Despite Working Out: कई लोग जिम या योगा क्लास में पूरी मेहनत और अनुशासन के साथ जाते हैं. वर्कआउट खत्म होने के बाद उन्हें लगता है कि उन्होंने अपनी फिटनेस के लिए सब कुछ सही किया है. लेकिन जैसे ही वे वजन मशीन पर खड़े होते हैं और वही पुराना नंबर दिखाई देता है, तो निराशा होने लगती है. ऐसे में अक्सर सवाल उठता है कि जब हम नियमित एक्सरसाइज कर रहे हैं, तो वजन कम क्यों नहीं हो रहा?.
क्यों नहीं हो रहा है वजन कम?
दरअसल वजन कम होना सिर्फ जिम में पसीना बहाने से तय नहीं होता. हमारी रोजमर्रा की छोटी-छोटी आदतें भी इसमें बड़ी भूमिका निभाती हैं. दिनभर हम क्या खाते हैं, कितनी एक्टिविटी करते हैं, कितनी नींद लेते हैं और तनाव को कैसे संभालते हैं, ये सभी चीजें वजन पर असर डालती हैं. कई बार हम मान लेते हैं कि ज्यादा वर्कआउट करने से बहुत ज्यादा कैलोरी बर्न हो जाती है, जबकि असलियत यह है कि एक्सरसाइज से उतनी कैलोरी खर्च नहीं होती जितनी हम सोचते हैं.
इस पर क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
फिटनेस एक्सपर्ट डॉ. विपुल लुनावत ने India Today को बताया कि फिजिकल एक्टिविटी के दौरान खर्च हुई ऊर्जा की भरपाई दूसरे तरीकों से कर लेता है. इसका मतलब यह नहीं कि वर्कआउट छोड़ देना चाहिए, बल्कि इसे सही तरीके से करना जरूरी है. उदाहरण के लिए, स्ट्रेंथ ट्रेनिंग मसल्स बनाने में मदद करती है और मसल्स बढ़ने से शरीर का मेटाबॉलिज्म तेज होता है, जिससे आराम की स्थिति में भी ज्यादा कैलोरी बर्न होती है.
खानपान और लाइफस्टाइल की अहम भूमिका
वजन कम करने में खानपान भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. कई लोग हेल्दी फूड तो खाते हैं, लेकिन उसकी मात्रा पर ध्यान नहीं देते. न्यूट्रिशन एक्सपर्ट एडविना राज के अनुसार, नट्स, घी, एवोकाडो, स्मूदी और सूखे मेवे जैसे कई हेल्दी फूड्स में कैलोरी ज्यादा होती है. अगर इन्हें अधिक मात्रा में खाया जाए तो वजन कम होने की गति धीमी हो सकती है. इसलिए संतुलित आहार और सही पोर्शन साइज पर ध्यान देना जरूरी है.
इसे भी पढ़ें- CRISPR Blood Test For Cancer: क्या ब्लड टेस्ट से पता लग सकता है कैंसर, ट्यूमर बनने से पहले कैसे पता लगेगी दिक्कत?
इसके अलावा बार-बार स्नैकिंग करना और मीठे या कैलोरी वाले ड्रिंक्स लेना भी वजन घटाने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है. प्रोटीन की कमी भी एक आम समस्या है. पर्याप्त प्रोटीन न मिलने पर शरीर मसल्स को बनाए नहीं रख पाता और मेटाबॉलिज्म धीमा हो सकता है. इसलिए हर भोजन में प्रोटीन के सोर्स जैसे अंडे, दालें, पनीर, टोफू या मछली शामिल करना फायदेमंद होता है.&amp;nbsp;
दिनभर की एक्टिविटी का भी अहम रोल&amp;nbsp;
दिनभर की गतिविधि भी बहुत मायने रखती है. सिर्फ एक घंटे जिम करने से पूरे दिन बैठकर बिताने की भरपाई नहीं हो सकती. ज्यादा चलना, सीढ़ियों का इस्तेमाल करना और बीच-बीच में शरीर को एक्टिव रखना वजन घटाने में मदद करता है. इसके साथ ही पर्याप्त नींद और तनाव को कंट्रोल रखना भी जरूरी है, क्योंकि कम नींद और ज्यादा तनाव हार्मोनल असंतुलन पैदा कर सकते हैं और वजन कम करना मुश्किल बना सकते हैं.
ये भी पढ़ें-3 साल में इस महिला ने घटाया 72 किलो वजन, केवल 7 आसान स्टेप्स फॉलो कर आप भी हो सकती हैं स्लिम
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 05 Mar 2026 19:30:09 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Prediabetes: कितनी खतरनाक कंडीशन है प्री&amp;डायबिटिक होना, इससे बचने के क्या हैं तरीके?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/prediabetes-कितनी-खतरनाक-कंडीशन-है-प्री-डायबिटिक-होना-इससे-बचने-के-क्या-हैं-तरीके</link>
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        <description><![CDATA[ What Is Prediabetes And Why Is It Dangerous: प्रीडायबिटीज वह स्थिति होती है जब किसी व्यक्ति का ब्लड शुगर स्तर सामान्य से ज्यादा होता है, लेकिन इतना अधिक नहीं होता कि उसे टाइप-2 डायबिटीज कहा जाए. कई लोग इसे सिर्फ एक चेतावनी या शुरुआती संकेत मानते हैं, लेकिन डॉक्टर इसे काफी गंभीरता से लेते हैं. दरअसल, यह शरीर का वह चरण है जब मेटाबॉलिज्म में गड़बड़ी शुरू हो चुकी होती है और अगर समय रहते ध्यान न दिया जाए तो आगे चलकर यह डायबिटीज में बदल सकती है.
दुनियाभर में तेजी से बढ़ रहे हैं मामले
दुनियाभर में प्रीडायबिटीज के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। कई रिपोर्टों के अनुसार बड़ी संख्या में लोग इस स्थिति से जूझ रहे हैं, लेकिन उन्हें इसका पता तक नहीं होता. लंबे समय तक ब्लड शुगर सामान्य से ऊपर रहने पर शरीर के अंदर धीरे-धीरे नुकसान शुरू हो सकता है. इससे ब्लड वेसल्स, दिल और मेटाबॉलिक सिस्टम पर असर पड़ता है. यही वजह है कि डॉक्टर इसे एक शुरुआती चेतावनी मानते हैं, ताकि समय रहते स्थिति को संभाला जा सके.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
एंडोक्राइनोलॉजिस्ट डॉ. शिवानी चौहान ने &amp;nbsp;TOI को बताया कि प्रीडायबिटीज उन लोगों में पाई जाती है जिनका ग्लूकोज या HbA1c स्तर डायबिटीज की सीमा तक नहीं पहुंचता, लेकिन कार्बोहाइड्रेट मेटाबॉलिज्म सामान्य नहीं रहता. ऐसे लोगों में फास्टिंग ब्लड शुगर बढ़ा हुआ हो सकता है या फिर ग्लूकोज टॉलरेंस कम हो सकता है. आमतौर पर HbA1c का स्तर 5.7 से 6.4 प्रतिशत के बीच होने पर इसे प्रीडायबिटीज की कैटेगरी में रखा जाता है.&amp;nbsp;
क्यों बढ़ रही है चिंता?
डॉक्टरों की चिंता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि यह स्थिति अक्सर चुपचाप आगे बढ़ती रहती है. कई बार शरीर में छोटे-छोटे बदलाव शुरू हो जाते हैं, जैसे ब्लड वेसल्स और नसों को नुकसान, जो लंबे समय बाद गंभीर बीमारियों का कारण बन सकते हैं. अगर इस चरण में ध्यान न दिया जाए तो आगे चलकर टाइप-2 डायबिटीज, हार्ट डिजीज, स्ट्रोक और अन्य मेटाबॉलिक समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है.
इसे भी पढ़ें- Paint Fumes Health Effects: घर में नया पेंट करवाने के बाद क्यों होने लगती है खांसी और घुटन? जानें कारण और बचाव के टिप्स
आज की लाइफस्टाइल भी इसके पीछे एक बड़ा कारण बन रही है. ज्यादा प्रोसेस्ड फूड, मीठे पेय पदार्थ, रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट, लंबे समय तक बैठकर काम करना और बढ़ता मोटापा इंसुलिन रेजिस्टेंस को बढ़ावा देते हैं. इसके अलावा उम्र बढ़ने के साथ मेटाबॉलिज्म धीमा पड़ जाता है और शारीरिक गतिविधियां कम होने लगती हैं, जिससे जोखिम और बढ़ जाता है.
क्या इसको कंट्रोल किया जा सकता है?
अच्छी बात यह है कि प्रीडायबिटीज को सही समय पर पहचाना जाए तो इसे कंट्रोल किया जा सकता है. डॉक्टर सबसे पहले लाइफस्टाइल में बदलाव की सलाह देते हैं. संतुलित आहार लेना, नियमित एक्सरसाइज करना और वजन को कंट्रोल रखना काफी मददगार साबित होता है. एक्सपर्ट के अनुसार सप्ताह में कम से कम 150 मिनट की मध्यम स्तर की शारीरिक गतिविधि ब्लड शुगर को संतुलित रखने में मदद कर सकती है. कई लोगों में सिर्फ इन बदलावों से ही ब्लड शुगर सामान्य स्तर पर वापस आ जाता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 05 Mar 2026 15:30:20 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Breast Cancer Cases: 2050 तक दुनिया में 3.5 मिलियन होंगे ब्रेस्ट कैंसर के केस, बेहद डरावनी है यह स्टडी</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/breast-cancer-cases-2050-तक-दुनिया-में-35-मिलियन-होंगे-ब्रेस्ट-कैंसर-के-केस-बेहद-डरावनी-है-यह-स्टडी</link>
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        <description><![CDATA[ भारत समेत दुनियाभर में लगातार कैंसर के मामलों में बढ़ोतरी हो रही है. इस सिलसिले में ब्रेस्ट कैंसर को लेकर एक गंभीर चेतावनी भी सामने आई है. दरअसल मेडिकल जर्नल द लैंसेट में प्रकाशित एक नई रिपोर्ट के अनुसार समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले सालों में ब्रेस्ट कैंसर वैश्विक स्तर की व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है. रिपोर्ट में अनुमान जताया गया है कि 2050 तक महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर के नए मामलों की संख्या 3.56 मिलियन तक पहुंच सकती है. वही अनुमानित आंकड़े 2.29 मिलियन से 4.83 मिलियन के बीच बताए गए हैं. सिर्फ मामले ही नहीं बल्कि मौतों के आंकड़े भी चिंताजनक है, रिपोर्ट के अनुसार 2050 तक ब्रेस्ट कैंसर से होने वाली वैश्विक मौतें 1.37 मिलियन तक पहुंच सकती है. यह अनुमान 8.41 लाख से लेकर 20.2 लाख तक के दायरे में है. वहीं मौजूदा समय में हर साल करीब 7.64 लाख मौतें हो रही है जो आने वाले 25 साल में 44 प्रतिशत तक बढ़ सकती है.
अगले 25 साल में 44 प्रतिशत तक बढ़ सकती हैं मौतें
इस रिसर्च में बताया गया है कि अगर ब्रेस्ट कैंसर की रोकथाम, स्क्रीनिंग और इलाज की व्यवस्था मजबूत नहीं की गई तो 2050 तक सालाना मौतों की संख्या लगभग 14 लाख तक पहुंच सकती है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि मेडिकल साइंस में प्रगति के बाद भी कई देश बढ़ते मामलों से निपटने के लिए तैयार नहीं है. वहीं कमजोर स्वास्थ्य ढांचे वाले देशों में स्थिति और खतरनाक हो सकती है.
भारत में 1990 के बाद बढ़े मामले
रिपोर्ट में भारत की स्थिति पर भी चिंता जताई गई है. भारत में पिछले 3 दशकों में देश में ब्रेस्ट कैंसर का बोझ 5 गुना बढ़ा है. बदलती लाइफस्टाइल, शहरीकरण, देश में मातृत्व, ब्रेस्टफीडिंग में कमी, मोटापे और शुरुआती जांच की कमी को इसके प्रमुख कारणों में गिना गया है. वहीं भारत में अब यह कैंसर महिलाओं में सबसे आम कैंसर में से एक बन चुका है, खासकर शहरी इलाकों में. इसे लेकर डॉक्टरों का कहना है कि बड़ी संख्या में महिलाओं की पहचान बीमारी के लास्ट स्टेज में होती है, जिससे इलाज कठिन हो जाता है और मृत्यु दर बढ़ जाती है.
अमीर और गरीब देशों के बीच भी साफ अंतर
वहीं इस रिपोर्ट में यह भी साफ बताया गया है कि हाई आय वाले देशों में नए मामलों की दर स्थिर है और मृत्यु दर में कमी आई है. इसका कारण बेहतर स्क्रीनिंग, समय पर जांच और आधुनिक उपचार व्यवस्थाएं हैं. वहीं कम और मिडिल आय वाले देशों में नए मामलों और मौतों दोनों में बढ़ोतरी देखी जा रही है. इन देशों में रेडियोथेरेपी मशीनों की कमी, कीमोथेरेपी दवाइयों तक सीमित पहुंच और इलाज का ज्यादा खर्च बड़ी समस्या है. वहीं वैश्विक स्तर पर नए मामलों में इन देशों की हिस्सेदारी 27 प्रतिशत है, लेकिन ब्रेस्ट कैंसर से जुड़ी कुल बीमारियों और समय से पहले मौतों में इनकी हिस्सेदारी 45 प्रतिशत से ज्यादा है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 05 Mar 2026 15:30:18 +0530</pubDate>
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        <title>Paint Fumes Health Effects: घर में नया पेंट करवाने के बाद क्यों होने लगती है खांसी और घुटन? जानें कारण और बचाव के टिप्स</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/paint-fumes-health-effects-घर-में-नया-पेंट-करवाने-के-बाद-क्यों-होने-लगती-है-खांसी-और-घुटन-जानें-कारण-और-बचाव-के-टिप्स</link>
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        <description><![CDATA[ Can Fresh Paint Cause Breathing Problems: नया पेंट हुआ कमरा अक्सर ताजगी का एहसास देता है, चमकती दीवारें, साफ माहौल और बदलाव की संतुष्टि. लेकिन जो तेज, केमिकल जैसी गंध कुछ दिनों तक बनी रहती है, वह सिर्फ नएपन की निशानी नहीं है, इसके साथ ही यह वोलेटाइल कार्बनिक यौगिकों यानी वीओसी के हवा में घुलने का संकेत है, जो सांस के जरिए शरीर में जा सकते हैं. पेंट, वार्निश, थिनर और चिपकाने वाले पदार्थों में फॉर्मल्डिहाइड, बेंजीन और टोल्यून जैसे वीओसी पाए जाते हैं. यूनाइटेड स्टेट एनवायरनमेंट प्रोटेक्शन एजेंसी के अनुसार, पेंटिंग जैसी गतिविधियों के दौरान घर के अंदर बीओसी लेवल बाहर की हवा से कई गुना अधिक हो सकता है. ये केमिकल सांस डक्ट्स कोएक्साइटेड करते हैं, जिससे खांसी, गले में खराश और सीने में जकड़न महसूस हो सकती है.
क्या होती हैं दिक्कतें?
डॉ. आकाश शाह, वाइस प्रेसिडेंट टेक्निकल,न्यूबर्ग डायग्नोस्टिक्स बताते हैं कि वीओसी सांस के रास्ते ब्रॉन्कियल ट्यूब्स में सूजन पैदा कर सकते हैं और म्यूकस बढ़ा सकते हैं. इससे सांस की डक्ट्स संकरी हो जाती हैं. अगर इसके लक्षणों की बात करें, तो इसमें लगातार सूखी खांसी, घरघराहट और हल्की सांस फूलना शामिल हो सकता है. हेल्दी एडल्ट में ये लक्षण आमतौर पर एक्सपोजर बंद होने पर कम हो जाते हैं. लेकिन बार-बार संपर्क में आने से एयरवे अधिक संवेदनशील हो सकते हैं. बच्चों, बुजुर्गों, स्मोकिंग करने वालों और अस्थमा मरीजों में जोखिम अधिक होता है. लंबे समय में लगातार सूजन क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस जैसी समस्या की ओर बढ़ सकती है.
कब जांच करवानी चाहिए?
अगर पेंटिंग के बाद 3 से 4 हफ्ते तक खांसी बनी रहे, तो लंग्स की जांच जरूरी हो सकती है. सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन भी बताता है कि लंग फंक्शन टेस्ट शुरुआती सीओपीडी पैटर्न पहचानने में मददगार होते हैं.डॉ. हर्षा जैन ने TOI को बताया कि खराब वेंटिलेशन स्थिति को और गंभीर बना सकता है. बंद खिड़कियां, सिर्फ एसी पर निर्भर रहना और नमी भरे मौसम में पेंटिंग बीओसी को घर के अंदर फंसा देता है. क्रॉस-वेंटिलेशन यानी एक से ज्यादा खिड़कियां खोलना केमिकल को तेजी से बाहर निकालने में मदद करता है.
कैसे कर सकते हैं बचाव?
बचाव के लिए लो-वीओसी या नो वीओसी पेंटचुनना बेहतर है. पेंटिंग के दौरान मास्क पहनें और कम से कम 48 से 72 घंटे तक कमरे को खुला रखें. जहां संभव हो, छोटे बच्चों और बुजुर्गों को कुछ दिन दूसरे कमरे या स्थान पर रखें. इसके अलावा पेंट करते समय मास्क पहनना भी फायदेमंद है और इससे आप इस दिक्कत से बच सकते हैं. घर की सुंदरता जरूरी है, लेकिन सेहत उससे भी ज्यादा जरूरी है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 05 Mar 2026 07:30:06 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Paint, Fumes, Health, Effects:, घर, में, नया, पेंट, करवाने, के, बाद, क्यों, होने, लगती, है, खांसी, और, घुटन, जानें, कारण, और, बचाव, के, टिप्स</media:keywords>
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        <title>Active Lifestyle in Old Age: बुढ़ापा आपसे कोसों दूर रहेगा! बस अपनी रोजमर्रा की आदतों में शामिल करें ये 5 आसान बदलाव</title>
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        <description><![CDATA[ Why Some Seniors Stay Energetic in Their 70s: क्या आपने गौर किया है कि कुछ लोग 60 से 70 की उम्र में भी इतनी फुर्तीले और ऊर्जा से भरे रहते हैं, मानो उम्र ने उन पर असर ही न डाला हो? वे जिम में घंटों पसीना बहाने वाले या मैराथन दौड़ने वाले लोग नहीं होते. वे बस अपनी रोजमर्रा की जिंदगी को थोड़ा अलग ढंग से जीते हैं. लोगों को लगता है कि ऐसे लोग शायद बेहतर जीन के साथ पैदा हुए हैं. हालांकि, &amp;nbsp;साइकोलॉजिस्ट रिसर्च को समझने के बाद पता चलेगा कि राज कुछ और ही है. ये लोग किसी खास डाइट या कठिन एक्सरसाइज पर निर्भर नहीं रहते, बल्कि दिनभर हलचल को अपनी जिंदगी में इस तरह शामिल कर लेते हैं कि शरीर लगातार सक्रिय बना रहता है.
असल फर्क सोच का है. जब चलना-फिरना &quot;वर्कआउट&quot; न लगकर रोजमर्रा का हिस्सा बन जाए, तो दिमाग उसे बोझ नहीं समझता. इसलिए ये आदतें लंबे समय तक बनी रहती हैं. चलिए आपको विस्तार से बताते हैं.&amp;nbsp;
सीढ़ियां इनके लिए बाधा नहीं, अवसर हैं
एशिया के कई शहरों में मैंने देखा कि जो बुजुर्ग लोग बिना लिफ्ट वाले घरों में रहते हैं, वे अक्सर ज्यादा चुस्त दिखते हैं. वे सीढ़ियां चढ़ते वक्त &quot;एक्सरसाइज&quot; नहीं कर रहे होते, वे बस घर जा रहे होते हैं. यही साइकोलॉजिस्ट काम करता है, जब गतिविधि का मकसद फिटनेस से अलग हो, तो हम उसे टालते नहीं.&amp;nbsp;
छोटे कामों को भी सक्रिय बनाना
आजकल हम किराने से लेकर फर्नीचर तक सब कुछ ऑनलाइन मंगवा लेते हैं. लेकिन जो बुजुर्ग ज्यादा फिट रहते हैं, वे अभी भी पैदल बाजार जाते हैं, साइकिल से सब्जी लाते हैं और अपना सामान खुद उठाते हैं. AARP Research भी कहती है, &quot;Walking is good for you, and older Americans generally know it.&quot; यानी पैदल चलना स्वास्थ्य के लिए बेहद फायदेमंद है, और लोग इसे समझते भी हैं. फर्क बस इतना है कि कुछ लोग इसे जीवन का हिस्सा बना लेते हैं.
बागवानी को साधना की तरह करना
बागवानी करते बुजुर्गों को देखें, तो वे झुकते हैं, उठते हैं, मिट्टी खोदते हैं, गमले उठाते हैं। यह अपने आप में एक पूरा वर्कआउट है, लेकिन उन्हें ऐसा नहीं लगताय. Mayo Clinic की रिसर्च बताती है कि&amp;ldquo;The sports most associated with increased longevity were tennis, badminton, soccer and cycling.&amp;rdquo; यानी जो गतिविधियां मजेदार और सामाजिक हों, वे लंबी उम्र से जुड़ी पाई गई हैं।
शौक चुनते हैं, जिम नहीं
फिट रहने वाले सीनियर नागरिक अक्सर डांस क्लास, बैडमिंटन, वॉकिंग ग्रुप या टेबल टेनिस जैसे शौक अपनाते हैं. ये एक्टिविटी एक्सरसाइज कम और मनोरंजन ज्यादा लगती हैं, इसलिए नियमित बनी रहती हैं.
छोटी-छोटी हरकतें भी मायने रखती हैं
साइंटिस्ट इसे NEAT- Non-Exercise Activity Thermogenesis कहते हैं, यानी बिना औपचारिक व्यायाम के दिनभर की छोटी-छोटी एक्टिविटी. जैसे बात करते समय टहलना, टीवी देखते हुए खड़े होना या फोन पर बात करते वक्त इधर-उधर चलना. इसका मतलब साफ है कि लंबी उम्र और बेहतर एनर्जी का रहस्य कठिन एक्सरसाइज नहीं, बल्कि लगातार हल्की-फुल्की सक्रियता है. जब चलना-फिरना जीवन का स्वाभाविक हिस्सा बन जाता है, तब फिटनेस अलग से हासिल करने की जरूरत ही नहीं पड़ती.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 04 Mar 2026 11:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>When To Replace Bath Towels: कितने दिन में बदल देना चाहिए अपना तौलिया, क्या कहते हैं एक्सपर्ट?</title>
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        <description><![CDATA[ How Often Should You Change Your Bath Towel: हममें से ज्यादातर लोग घर के लिनेन जैसे चादर, तकिए के कवर या तौलिये उतनी बार नहीं धोते जितनी बार एक्सपर्ट सलाह देते हैं. अक्सर हम सोच लेते हैं, अभी तो साफ ही है, एक-दो दिन और चल जाएगा. लेकिन खासकर तौलिये के मामले में यह आदत स्वच्छता के लिहाज से सही नहीं है. रिसर्च बताती है कि तौलिये को हमारी सोच से कहीं ज्यादा नियमित रूप से धोना चाहिए. चलिए आपको बताते हैं कि कितने दिनों में तौलिये को बदल &amp;nbsp;लेना चाहिए.&amp;nbsp;
क्या होती है इससे दिक्कत?
Towelsupercenter की रिपोर्ट के अनुसार, कई लोग मानते हैं कि नहाने या हाथ धोने के बाद शरीर तो साफ होता है, इसलिए तौलिया भी साफ ही रहता होगा. हकीकत थोड़ी अलग है. जब आप भीगे शरीर या हाथ तौलिये से पोंछते हैं, तो नमी, मृत त्वचा सेल्स, तेल और गंदगी उसके रेशों में चली जाती हैं. तौलिया पानी सोख तो लेता है, लेकिन सूखने में घंटों लग जाते हैं. यह गीला माहौल बैक्टीरिया, फंगस और यीस्ट जैसे सूक्ष्म जीवों के पनपने के लिए बिल्कुल अनुकूल होता है. ये आंखों से दिखाई नहीं देते, लेकिन समय के साथ इनकी संख्या बढ़ सकती है और त्वचा इंफेक्शन, मुंहासे या एथलीट फुट जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ा सकती है.
कब धो लेना चाहिए तौलिया?
अच्छी बात यह है कि हर इस्तेमाल के बाद तौलिया धोना जरूरी नहीं होता. एक्सपर्ट के अनुसार, सामान्य परिस्थितियों में नहाने वाला तौलिया लगभग 3 से 4 बार इस्तेमाल के बाद धो देना चाहिए. हैंड टॉवल को इससे ज्यादा बार धोना चाहिए, क्योंकि दिनभर में हाथ कई बार पोंछे जाते हैं. लेकिन कुछ स्थितियों में तौलिया एक बार इस्तेमाल के बाद ही धो देना बेहतर है जैसे घर में कोई बीमार हो, जिम में इस्तेमाल किया गया तौलिया हो, तौलिये पर शरीर के तरल पदार्थ लगे हों, या व्यक्ति की त्वचा बहुत संवेदनशील हो.
तौलिया जिस जगह रखा जाता है, वह भी अहम है. अगर बाथरूम नम और हवादार नहीं है और तौलिया ठीक से सूख नहीं पाता, तो उसे जल्दी धोना चाहिए सामग्री भी फर्क डालती है. माइक्रोफाइबर जल्दी सूख जाता है, जबकि कॉटन तौलिया ज्यादा नमी रोकता है और उसे नियमित धुलाई की जरूरत होती है. बांस से बने तौलिये एंटीबैक्टीरियल माने जाते हैं, लेकिन इन्हें भी समय-समय पर धोना जरूरी है.
कितने दिनों में बदल लेना चाहिए?
एक्सपर्ट Jenniferadams के अनुसार, आम तौर पर सलाह दी जाती है कि बाथ टॉवल को हर दो से तीन साल में बदल देना चाहिए. अधिकतम पांच साल तक ही इन्हें इस्तेमाल करना ठीक माना जाता है. लगातार धुलाई और सामान्य इस्तेमाल के कारण तौलिये की पानी सोखने की क्षमता कम होने लगती है. साथ ही वे पहले जैसे मुलायम भी नहीं रहते. अगर आप चाहते हैं कि आपके तौलिये लंबे समय तक अच्छे बने रहें, तो फैब्रिक सॉफ्टनर का इस्तेमाल कम करें. सॉफ्टनर की परत कपड़े पर जम जाती है, जिससे उसकी एब्जॉर्बेंसी घट सकती है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 03 Mar 2026 15:30:20 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Late Night Snack For Diabetics: रात की भूख और ब्लड शुगर का बैलेंस, केफिर क्यों है डायबिटीज मरीजों के लिए बेस्ट स्नैक?</title>
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        <description><![CDATA[ Best Late Night Snacks For Blood Sugar Control: रात को बिस्तर पर लेटे-लेटे अचानक भूख लग जाए, तो मन में सवाल उठता है कि क्या इस वक्त कुछ खाना ठीक रहेगा, खासकर अगर आप डायबिटीज की दिक्कत से जूझ रहे हो. देर रात स्नैकिंग थोड़ा पेचीदा हो सकता है. कई आम विकल्प रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट या ज्यादा सोडियम से भरपूर होते हैं, जो ब्लड शुगर बढ़ा सकते हैं या उस समय मेटाबॉलिक संतुलन बिगाड़ सकते हैं जब शरीर आराम करने की कोशिश कर रहा होता है. चलिए आपको बताते हैं कि आपके पास क्या विकल्प हैं.&amp;nbsp;
आपको क्या करना चाहिए?
डायटीशियन मानते हैं कि रात में पूरी तरह भूखे रहना समाधान नहीं है. असली मकसद है ऐसा विकल्प चुनना जो पेट भरे, न्यूट्रिशन दे और ग्लूकोज लेवल अचानक न बढ़ाए. न्यूट्रिशन एक्सपर्ट के अनुसार, केफिर इस भूमिका को अच्छी तरह निभा सकता है. केफिर फर्मेंटेड डेयरी ड्रिंक है, जिसका स्वाद हल्का खट्टा और बनावट स्मूद, मिल्कशेक जैसी होती है.
डायबिटीज से जूझ रहे लोगों के लिए इसकी खासियत इसका पोषण प्रोफाइल है. इसमें प्रोबायोटिक्स, प्रोटीन, मैग्नीशियम और पोटैशियम जैसे न्यूट्रिशन तत्व होते हैं, जो ब्लड शुगर कंट्रोल, हार्ट हेल्थ और मेटाबॉलिक संतुलन में सहायक माने जाते हैं. प्लेन केफिर में अतिरिक्त चीनी कम होती है और सोडियम भी अपेक्षाकृत कम रहता है, इसलिए यह देर रात के स्नैक के रूप में &amp;nbsp;सुरक्षित विकल्प बन सकता है.
केफिर का सबसे बड़ा फायदा इसमें मौजूद प्रोबायोटिक्स हैं. ये आंतों के माइक्रोबायोम को संतुलित रखने में मदद करते हैं. Tandfonline जर्नल में पब्लिश एक स्टडी के अनुसार यह हेल्दी गट हेल्थ बेहतर इंसुलिन सेंसिटिविटी और ब्लड शुगर कंट्रोल से जुड़ी हो सकती है. कुछ स्टडीज के अनुसार, केफिर में मौजूद खास प्रोबायोटिक स्ट्रेन्स कोलेस्ट्रॉल मेटाबॉलिज्म पर सकारात्मक असर डाल सकते हैं और सूजन घटाने में मदद कर सकते हैं. डायबिटीज से पीड़ित लोगों में हृदय रोग का खतरा ज्यादा होता है, इसलिए यह पहलू अहम है.
रेगुलर सेवन करने से क्या पड़ता है फर्क?
मेटाबॉलिक सिंड्रोम से जुड़े Sciencedirect जर्नल में पब्लिश एक स्टडी में पाया गया कि नियमित केफिर सेवन से फास्टिंग ब्लड शुगर और एलडीएल में कमी आई, जबकि एचडीएल &amp;nbsp;बढ़ा. केफिर में मौजूद पोटैशियम रक्त वाहिकाओं को रिलैक्स करने और हृदय को सपोर्ट करने में मदद करता है, वहीं मैग्नीशियम इंसुलिन क्रिया और मांसपेशियों के आराम में सहायक होता है. इसका प्रोटीन पाचन को धीमा करता है, जिससे रातभर ब्लड शुगर में अचानक गिरावट या उछाल की संभावना कम हो सकती है.
खरीदते समय प्लेन और बिना शक्कर वाला केफिर चुनना बेहतर है, क्योंकि फ्लेवर्ड विकल्पों में अतिरिक्त चीनी हो सकती है। चाहें तो इसमें थोड़े से बेरीज, दालचीनी या एक चम्मच नट बटर मिलाकर स्वाद और न्यूट्रिशन बढ़ाया जा सकता है. सही चुनाव के साथ, केफिर देर रात की भूख को संतुलित तरीके से शांत करने में मददगार हो सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 03 Mar 2026 11:30:13 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Tips For A Healthy Heart: अचानक नहीं होतीं दिल की बीमारियां! इन छोटी और नियमित आदतों से रखें अपने हार्ट का ख्याल</title>
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        <pubDate>Sun, 01 Mar 2026 15:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>Kidney Damage Causes: किडनी का &amp;apos;साइलेंट किलर&amp;apos;, सिर्फ शुगर&amp;बीपी नहीं, ये छिपी हुई आदतें भी कर रहीं किडनी को डैमेज</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/kidney-damage-causes-किडनी-का-साइलेंट-किलर-सिर्फ-शुगर-बीपी-नहीं-ये-छिपी-हुई-आदतें-भी-कर-रहीं-किडनी-को-डैमेज</link>
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        <description><![CDATA[ How Does Obesity Affect Kidney Function: किडनी की बीमारी अब दुनिया की करीब 10 &amp;nbsp;प्रतिशत आबादी को प्रभावित कर रही है. आमतौर पर लोग इसे सिर्फ डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर से जोड़कर देखते हैं, जबकि हकीकत इससे कहीं बड़ी है. मोटापा, स्मोकिं, एनवायरमेंट कारण, बिना सलाह के दर्दनाशक दवाओं का सेवन और यहां तक कि कुछ सप्लीमेंट्स भी चुपचाप किडनी को नुकसान पहुंचा सकते हैं. चलिए आपको बताते हैं कि इसके कारण क्या होते हैं.
क्या होते हैं कारण?
किडनी की बीमारी अक्सर बिना किसी स्पष्ट लक्षण के धीरे-धीरे बढ़ती है. दर्द या तेज संकेत नहीं मिलते, लेकिन अंदर ही अंदर किडनी की फिल्टर करने की क्षमता कम होती जाती है. डॉ. मोहम्मद एस खान ने TOI को बताया कि, क्रॉनिक किडनी डिजीज केवल बिग टू यानी डायबिटीज और ब्लड प्रेशर तक सीमित नहीं है. अब लाइफस्टाइल, एनवायरमेंट और जेनेटिक कारण भी बड़ी भूमिका निभा रहे हैं. मोटापा सिर्फ डायबिटीज का खतरा नहीं बढ़ाता, बल्कि सीधे किडनी पर दबाव डालता है. शरीर का वजन बढ़ने पर किडनी को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है, जिससे समय के सा टिश्यू में स्कारिंग हो सकती है. आजकल कम उम्र के लोगों में भी मोटापे से जुड़ा किडनी स्ट्रेस देखने को मिल रहा है. रेगुलर एक्सरसाइज, संतुलित आहार और वजन कंट्रोल रखना बेहद जरूरी है.
स्मोकिंग एक बड़ा फैक्टर
धूम्रपान भी किडनी के लिए खामोश खतरा है. सिगरेट में मौजूद निकोटिन और विषैले तत्व किडनी की ब्लड़ वेस्ल को नुकसान पहुंचाते हैं. जिन लोगों को पहले से किडनी की समस्या है, उनमें स्मोकिंग बीमारी की रफ्तार और तेज कर देती है. एक और चिंता का विषय है क्रॉनिक किडनी डिजीज ऑफ अननोन एटियोलॉजी की. यह बीमारी बिना डायबिटीज या हाई ब्लड प्रेशर के भी देखी जा रही है, खासकर ग्रामीण इलाकों में काम करने वाले किसानों और मजदूरों में इसकी दिक्कत बार-बार देखने को मिलती है. बार-बार डिहाइड्रेशन, गर्मी में काम, रसायनों का संपर्क और पानी में भारी धातुओं की मौजूदगी इसके संभावित कारण माने जा रहे हैं. ऐसे क्षेत्रों में नियमित जांच बेहद जरूरी है.
किन चीजों को रखना चाहिए ध्यान?
बिना डॉक्टर की सलाह के दर्दनाशक दवाएं, खासकर NSAIDs, लंबे समय तक लेने से किडनी को स्थायी नुकसान हो सकता है. इसी तरह नेचुरल या पारंपरिक दवाओं के नाम पर बिकने वाले कुछ उत्पादों में भारी धातुएं या असुरक्षित मात्रा में तत्व पाए गए हैं. बॉडीबिल्डिंग या वजन घटाने के लिए लिए जाने वाले सप्लीमेंट्स भी जोखिम बढ़ा सकते हैं, खासकर अगर पहले से किडनी कमजोर हो. इसके अलावा बार-बार होने वाले यूरिन इंफेक्शन, किडनी स्टोन, पारिवारिक इतिहास और ऑटोइम्यून बीमारियां भी CKD के खतरे को बढ़ाती हैं. एक्सपर्ट बताते हैं कि रेगुलर ब्लड और यूरिन टेस्ट करवाए, समय रहते पहचान ही किडनी को गंभीर नुकसान से बचाने का सबसे असरदार तरीका है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 01 Mar 2026 15:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>Side Effects Of Eating Fish And Curd: क्या मछली और दही एक साथ खाने से हो जाती है सफेद दाग की समस्या, कितनी सच है ये बात?</title>
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        <description><![CDATA[ Can Eating Fish And Curd Together Cause Skin Problems: बचपन से हममें से कई लोगों ने यह बात सुनी है कि मछली खाने के बाद दूध या कोई भी डेयरी उत्पाद नहीं लेना चाहिए, वरना त्वचा पर सफेद दाग हो सकते हैं. घर के बड़े-बुजुर्ग अक्सर इस कॉम्बिनेशन से बचने की सलाह देते रहे हैंय लेकिन क्या सच में इसका कोई वैज्ञानिक आधार है या यह सिर्फ एक पुरानी मान्यता है?. चलिए आपको बताते हैं कि क्या है इसके पीछे की सच्चाई.&amp;nbsp;
क्या है धारणा?
लोक मान्यता के अनुसार, मछली और दही साथ लेने से त्वचा पर असमान सफेद धब्बे पड़ सकते हैं, जिन्हें विटिलिगो या ल्यूकोडर्मा कहा जाता है. एक और तर्क यह दिया जाता है कि दही की तासीर ठंडी होती है और मछली की गर्म होती है और इन्हें पचाने के लिए अलग-अलग एंजाइम की जरूरत होती है. ऐसे में शरीर पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है, जिससे गैस, ब्लोटिंग या अपच जैसी समस्याएं हो सकती हैं.&amp;nbsp;
आयुर्वेद में भी इसको वर्जित माना गया है. मछली को तामसिक और दूध को सात्विक आहार की कैटेगरी में रखा जाता है. माना जाता है कि दोनों का एक साथ सेवन शरीर में तामस गुण बढ़ाकर असंतुलन पैदा कर सकता है. हालांकि यह दृष्टिकोण पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित है.&amp;nbsp;
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
साइंटफिक नजरिए से देखें तो मछली के साथ दही पीना हानिकारक है, ऐसा साबित करने वाला कोई ठोस प्रमाण मौजूद नहीं है. डॉ. सौरोजीत गुप्ता, बेबी एंड चाइल्ड स्पेशलिस्ट ने अपने वीडियो में बताया कि ऐसा नहीं है. &amp;nbsp;जहां तक सफेद दाग की बात है, विटिलिगो आमतौर पर त्वचा की रंग बनाने वाली सेल्स मेलानोसाइट्स के नष्ट होने या किसी फंगल इंफेक्शन के कारण होता है. केवल मछली और दही का साथ सेवन इस स्थिति का कारण नहीं बनता.
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कब होती है दिक्कत?
आम तौर पर थोड़ी मात्रा में दोनों साथ खाना सुरक्षित माना जाता है, मगर कुछ लोगों को दिक्कत हो सकती है. मछली और दही दोनों ही प्रोटीन से भरपूर होते हैं और इन्हें पचाने की प्रक्रिया अलग-अलग होती है. ऐसे में जिनका डाइजेशन सिस्टम सेंसिटिव &amp;nbsp;है, उन्हें गैस, पेट फूलना या अपच महसूस हो सकती है. लैक्टोज इनटोलरेंस या दूध प्रोटीन से एलर्जी वाले लोगों में त्वचा पर खुजली, रैशेज या एक्जिमा जैसे लक्षण उभर सकते हैं. कुछ मामलों में मछली में मौजूद हिस्टामिन और डेयरी का लैक्टोज सेंसिटिव लोगों में मुंहासों या स्किन फ्लेयर-अप को बढ़ा सकते हैं. हालांकि, हर व्यक्ति की सहनशक्ति अलग होती है. अगर कोई एलर्जी या डाइजेशन समस्या नहीं है, तो सीमित मात्रा में यह कॉम्बिनेशन आमतौर पर सुरक्षित माना जाता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 01 Mar 2026 11:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>इमरजेंसी में ChatGPT कितना सुरक्षित? रिसर्च ने जताई चिंता, जानें AI की सीमाएं</title>
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        <pubDate>Sat, 28 Feb 2026 07:30:05 +0530</pubDate>
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        <title>वजन नहीं घट रहा तो घबराएं नहीं, ये 7 संकेत बताते हैं फैट तेजी से हो रहा है कम</title>
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        <pubDate>Fri, 27 Feb 2026 14:30:30 +0530</pubDate>
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        <title>Drinking Alcohol Once A Week: हफ्ते में एक बार पीना सुरक्षित है या सिर्फ एक भ्रम? जानें एक्सपर्ट्स की असली राय</title>
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        <description><![CDATA[ What Happens If You Drink Once A Week: कई लोग मानते हैं कि हफ्ते में एक बार शराब पीना बिल्कुल सुरक्षित है. लेकिन सच यह है कि कभी-कभार की गई ड्रिंकिंग भी शरीर पर असर डाल सकती है. असर कितना होगा, यह व्यक्ति की उम्र, सेहत, लाइफस्टाइल और पीने की मात्रा पर निर्भर करता है. Healthyy Podcast में बताया गया कि अगर आप दो बियर पीते हैं और साथ में कुछ स्नैक लेते हैं, तो फिर 1200 कैलोरी हो गई, आपको पूरे दिन में 1600 कैलोरी लेनी होती है. ऐसे में आपने जितना पूरे हफ्ते में बचाया होगा, एक दिन में चला जाएगा. चलिए आपको बताते हैं कि एक्सपर्ट क्या कहते हैं इसको लेकर.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
अंबाला स्थित पूजा सुपर स्पेशलिटी क्लिनिक के डॉ. दीपक सहोता के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति सप्ताह में लगभग 60 मिलीलीटर तक सीमित मात्रा में शराब लेता है, तो अधिकांश स्वस्थ लोगों के लिए यह अपेक्षाकृत सुरक्षित मानी जा सकती है. हालांकि वे चेतावनी देते हैं कि &quot;कम मात्रा&quot; का मतलब यह नहीं है कि जोखिम पूरी तरह खत्म हो जाता है. जरूरत से ज्यादा पीना, अगर हफ्ते में सिर्फ एक बार हो, तो भी शरीर के अहम अंगों पर दबाव डाल सकता है.
बिंज ड्रिंकिंग का खतरा
कम समय में ज्यादा मात्रा में शराब पीना, जिसे बिंज ड्रिंकिंग कहा जाता है, सबसे ज्यादा नुकसानदेह है. इससे अचानक लिवर पर असर, हार्ट से जुड़ी दिक्कतों और गंभीर मामलों में जान का खतरा भी हो सकता है. भले ही यह आदत हफ्ते में एक दिन तक सीमित हो, फिर भी शरीर का संतुलन बिगाड़ सकती है.
लिवर और किडनी पर असर
लिवर शराब को तोड़ने का मुख्य काम करता है. नियमित रूप से या पिर सप्ताह में एक बार शराब लेने से लिवर पर दबाव पड़ता है. लंबे समय में फैटी लिवर या अन्य लिवर संबंधी समस्याएं विकसित हो सकती हैं. शराब शरीर को डिहाइड्रेट भी करती है, जिससे किडनी की काम करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है, खासकर अगर पानी कम पिया जाए.
हार्ट और ब्लड प्रेशर
शराब का असर हार्ट सिस्टम पर भी पड़ता है. यह ब्लड प्रेशर बढ़ा सकती है और धड़कन को अनियमित कर सकती है. यदि शराब के साथ धूम्रपान भी हो, तो हार्ट डिजीज का खतरा कई गुना बढ़ जाता है.
नींद पर प्रभाव
हालांकि, शराब पीने के बाद नींद जल्दी आ सकती है, लेकिन यह गहरी और आरामदायक नींद में बाधा डालती है। अगले दिन थकान और चिड़चिड़ापन महसूस हो सकता है। खराब नींद का असर मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य दोनों पर पड़ता है.
डाइजेशन सिस्टम की दिक्कतें
अधिक मात्रा में शराब एसिडिटी, सीने में जलन और गैस्ट्रिक समस्याएं बढ़ा सकती हैं. गंभीर मामलों में आंतों में सूजन या ब्लीडिंग जैसी स्थितियां भी पैदा हो सकती हैं.
किन लोगों को बिल्कुल नहीं पीनी चाहिए?
गर्भवती महिलाओं, लिवर या हार्ट की बीमारी से जूझ रहे लोगों, मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं वाले मरीजों, कुछ खास दवाएं लेने वालों और वाहन चलाने वालों को शराब से पूरी तरह दूरी रखनी चाहिए. जिन लोगों को एसिड रिफ्लक्स या डाइजेशन संबंधी समस्या है, उनके लिए भी शराब नुकसानदेह हो सकती है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 27 Feb 2026 14:30:29 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>&amp;apos;योग सिर्फ व्यायाम नहीं, मन और श्वास का सामंजस्य है&amp;apos;, फेसबुक लाइव में बोले स्वामी रामदेव</title>
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        <description><![CDATA[ Meditation Benefits: योग गुरु बाबा रामदेव ने हाल ही में पतंजलि संन्यास आश्रम से एक फेसबुक लाइव सत्र के माध्यम से देश-दुनिया को स्वास्थ्य और अनुशासन का संदेश दिया. अपनी टीम के साथ योगासन और प्राणायाम करते हुए उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि मानवीय ऊर्जा एक अमूल्य संसाधन है, जिसे बीमारियों से लड़ने में नष्ट करने के बजाय स्वास्थ्य को बनाए रखने और उसे सही दिशा में प्रवाहित करने के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए.
रामदेव बाबा के अनुसार, योग तभी प्रभावी होता है जब मन और श्वास के बीच पूर्ण सामंजस्य हो. सत्र के दौरान उन्होंने प्राणायाम में एकाग्रता के महत्व को रेखांकित किया और बताया कि अनुशासन, जागरूकता और निवारक स्वास्थ्य ही आधुनिक जीवन की शारीरिक और मानसिक समस्याओं का समाधान हैं.
पारंपरिक चिकित्सा और &#039;कायाकल्प&#039;
इस सत्र में पारंपरिक योगिक और उपचारात्मक प्रथाओं पर विशेष चर्चा की गई। बाबा रामदेव ने शंख प्रक्षालन, कोलन थेरेपी, बस्ती और पंचकर्म-षट्कर्म जैसी प्राचीन शोधन विधियों का उल्लेख किया. उन्होंने इन विधियों को आंतरिक शुद्धि और &#039;कायाकल्प&#039; (समग्र कायाकल्प) के लिए समय की कसौटी पर खरा उतरा बताया. उनके अनुसार, ये अभ्यास मार्गदर्शन में किए जाने पर पाचन स्वास्थ्य, चयापचय संतुलन और समग्र जीवन शक्ति को बढ़ाने में मदद करते हैं.

आधुनिक बीमारियों पर योग का प्रभाव
सत्र के दौरान मोटापा, टाइप 1 और टाइप 2 मधुमेह जैसी समकालीन जीवनशैली की चिंताओं को भी संबोधित किया गया. रामदेव ने इंसुलिन पर निर्भर रोगियों से संबंधित ऐतिहासिक और वर्तमान शोध का हवाला देते हुए बताया कि कैसे योग, ध्यान और एक व्यवस्थित दिनचर्या पारंपरिक चिकित्सा उपचार के साथ-साथ सहायक दृष्टिकोण के रूप में काम कर सकती है. उन्होंने स्पष्ट किया कि ये अभ्यास चिकित्सा उपचार का विकल्प नहीं, बल्कि कल्याण के लिए पूरक उपकरण हैं.
वेलनेस क्षेत्र में अवसर और सुलभता
योग गुरु ने ध्यान के माध्यम से मानसिक स्पष्टता, तनाव प्रबंधन और भावनात्मक संतुलन पर भी प्रकाश डाला. इसके अलावा, उन्होंने वेलनेस क्षेत्र में उभरते रोजगार के अवसरों का भी जिक्र किया, जो प्रशिक्षित योग प्रशिक्षकों के लिए नए रास्ते खोल रहे हैं. अंत में, उन्होंने बताया कि पतंजलि के प्लेटफॉर्म के माध्यम से लोग घर बैठे ही इन वेलनेस थेरेपी तक पहुंच प्राप्त कर सकते हैं, जिससे पारंपरिक स्वास्थ्य पद्धतियों को आम जनता के लिए अधिक सुलभ बनाया जा सके.




Disclaimer: This is a sponsored article. ABP Network Pvt. Ltd. and/or ABP Live does not in any manner whatsoever endorse/subscribe to the contents of this article and/or views expressed herein. Reader discretion is advised.

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        <pubDate>Thu, 26 Feb 2026 14:30:15 +0530</pubDate>
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        <title>&amp;apos;सिर्फ कसरत नहीं, दैनिक अनुशासन है प्राणायाम&amp;apos;, पतंजलि वेलनेस सत्र में बोले बाबा रामदेव</title>
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        <description><![CDATA[ Pranayama Benefits: हाल ही में अपने फेसबुक चैनल पर एक लाइव इंटरेक्शन के दौरान, योग गुरु रामदेव बाबा ने शारीरिक संतुलन और मानसिक स्पष्टता बनाए रखने में प्राणायाम और केंद्रित श्वास की भूमिका पर विस्तार से चर्चा की. हिमालय की तलहटी में स्थित &#039;वेद लाइफ पतंजलि वेलनेस&#039; से प्रसारित इस सत्र में उन्होंने न केवल श्वास तकनीकों का प्रदर्शन किया, बल्कि अभ्यास के दौरान एकाग्रता के महत्व को भी रेखांकित किया.
रामदेव बाबा ने इस बात पर जोर दिया कि प्राणायाम केवल एक कभी-कभार की जाने वाली गतिविधि नहीं, बल्कि एक दैनिक अनुशासन होना चाहिए. लाइव प्रसारण के दौरान उन्होंने दर्शकों को मुद्रा (posture), श्वास की लय और जागरूकता के प्रति सचेत रहने के लिए प्रोत्साहित किया. उनके अनुसार, जब प्राणायाम को निरंतरता और फोकस के साथ किया जाता है, तभी यह सबसे प्रभावी होता है.

आधुनिक जीवन के दबावों के बीच, सचेत श्वास (conscious breathing) शरीर और मन को संरेखित करने और शांति बनाए रखने में सहायक होती है. उन्होंने साधकों को सलाह दी कि वे प्राणायाम को धैर्यपूर्वक अपनाएं और शरीर को धीरे-धीरे इसके अनुकूल होने दें. इस दौरान स्थिरता बनाए रखना और विकर्षणों से दूर रहना अनिवार्य है.
हिमालयी परंपरा से जुड़ाव
रामदेव बाबा ने अपनी चर्चा में &#039;देवभूमि&#039; के रूप में विख्यात हिमालयी क्षेत्र से मिलने वाली प्रेरणा का भी जिक्र किया. उन्होंने बताया कि &#039;वेद लाइफ पतंजलि वेलनेस&#039; एक ऐसा स्थान है जहां योग, आयुर्वेद, प्राकृतिक चिकित्सा और सनातन जीवन पद्धति के सिद्धांतों का एक साथ अभ्यास किया जाता है. उनके अनुसार, यह क्षेत्र आत्म-चिंतन और अनुशासित जीवन के लिए एक अनुकूल वातावरण प्रदान करता है, जहां पारंपरिक ज्ञान को केवल वैचारिक रूप से पढ़ने के बजाय व्यावहारिक रूप से अनुभव किया जा सकता है.
परंपरा का दैनिक जीवन में एकीकरण
सत्र के अंत में, रामदेव बाबा ने दर्शकों से आग्रह किया कि वे दुनिया में कहीं भी हों, योगिक प्रथाओं को अपनी दैनिक दिनचर्या का हिस्सा बनाएं. उन्होंने दोहराया कि यदि एकाग्रता के साथ किया जाए, तो प्राणायाम कल्याण बनाए रखने का एक सरल लेकिन प्रभावी साधन है. यह न केवल स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है, बल्कि भारत की प्राचीन कल्याण परंपराओं से जुड़े रहने का एक सशक्त तरीका भी है.




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        <pubDate>Thu, 26 Feb 2026 14:30:15 +0530</pubDate>
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        <title>HIV Cases In Bihar: बिहार के किस जिले में एड्स के सबसे ज्यादा मरीज, जानें यहां क्यों फैल रही यह महामारी?</title>
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        <description><![CDATA[ Which District In Bihar Has The Highest AIDS Cases: बिहार में एचआईवी/एड्स को लेकर सामने आए ताजा आंकड़ों ने चिंता बढ़ा दी है. राज्य में एचआईवी संक्रमित लोगों की संख्या अब एक लाख के पार पहुंच चुकी है.
स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय ने विधान परिषद में जानकारी देते हुए बताया कि अब तक 1,00,044 लोग एचआईवी पॉजिटिव पाए गए हैं. यह खुलासा उस समय हुआ जब डॉ. राजवर्धन आजाद समेत अन्य सदस्यों ने इस मुद्दे पर प्रस्ताव के जरिए सरकार से जवाब मांगा. चलिए आपको बताते हैं कि बिहार में इसके मामले क्यों बढ़ रहे हैं.&amp;nbsp;
किन लोगों में सबसे ज्यादा मामले?
सदन में दी गई जानकारी के अनुसार, बिहार के 13 जिलों को &#039;हाई रिस्क&#039; श्रेणी में रखा गया है, जहां इंफेक्शन की रफ्तार सामान्य से अधिक तेज है. आंकड़ों पर नजर डालें तो राजधानी पटना इस सूची में सबसे ऊपर है. यहां अब तक 8,270 एड्स के मरीजों की पुष्टि हो चुकी है. इसके बाद गया में 5,760, मुजफ्फरपुर में 5,520, सीतामढ़ी में 5,026, बेगूसराय में 4,716 और भागलपुर में 3,078 मामले दर्ज किए गए हैं. ये आंकड़े साफ संकेत देते हैं कि शहरी और घनी आबादी वाले इलाकों में इंफेक्शन का दबाव ज्यादा है.
क्यों बढ़ रहे हैं मामले?
सवाल उठ रहा है कि आखिर कुछ जिलों में यह स्थिति इतनी गंभीर क्यों हो रही है. सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के अनुसार, जागरूकता की कमी, समय पर जांच न कराना, लोगों को एक दूसरे हिस्से में आना जाना और अनसेफ फिजिकल रिलेशन बनाना इस इंफेक्शन के फैलाव में भूमिका निभा सकते हैं. हालांकि सरकार ने जांच और परामर्श की सुविधाओं को मजबूत करने का दावा किया है. फिलहाल राज्य के विभिन्न सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में 196 समेकित परामर्श एवं जांच केंद्र संचालित किए जा रहे हैं, जहां एचआईवी की मुफ्त जांच और काउंसलिंग उपलब्ध है.
पीड़ितों को सरकार की तरफ से सहायता
सरकार की ओर से संक्रमित लोगों के लिए आर्थिक सहायता भी दी जा रही है. &#039;बिहार शताब्दी एड्स पीड़ित कल्याण योजना&#039; के तहत प्रत्येक एचआईवी संक्रमित व्यक्ति को 1,500 रुपये प्रतिमाह की मदद दी जाती है. साथ ही, 18 वर्ष से कम आयु के दो आश्रित बच्चों को 1,000 रुपये प्रतिमाह की सहायता प्रदान की जाती है.
वित्तीय वर्ष 2025-26 में दिसंबर 2025 तक 63.81 करोड़ रुपये सीधे लाभार्थियों के खातों में ट्रांसफर किए जा चुके हैं. सरकार का कहना है कि वह इंफेक्शन की रोकथाम, इलाज और जागरूकता बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है. लेकिन बढ़ते आंकड़े यह संकेत दे रहे हैं कि खासकर पटना समेत हाई रिस्क जिलों में सतर्कता और व्यापक जागरूकता अभियान की और ज्यादा जरूरत है, ताकि इस इंफेक्शन की रफ्तार पर काबू पाया जा सके.
इसे भी पढ़ें-&amp;nbsp;Testicle Pain Causes:हल्की-सी चोट लगते ही होता है तेज दर्द, आखिर शरीर के बाहर ही क्यों लटके रहते हैं टेस्टिकल्स?
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 26 Feb 2026 14:30:14 +0530</pubDate>
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        <title>Rinku Singh Father Illness: किस बीमारी से जूझ रहे रिंकू सिंह के पिता, जिसके लिए छोड़ा टी&amp;20 वर्ल्ड कप, यह कितनी खतरनाक?</title>
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        <description><![CDATA[ What Illness Is Rinku Singh&amp;rsquo;s Father Suffering From: भारतीय क्रिकेटर रिंकू सिंह ने पारिवारिक आपात स्थिति के कारण टीम कैंप छोड़ दिया है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, उनके पिता खचंद्र सिंह गंभीर रूप से बीमार हैं और इसी वजह से रिंकू को अचानक घर लौटना पड़ा. हालांकि बीसीसीआई की ओर से आधिकारिक कारण नहीं बताया गया है, लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स में सामने आया है कि उनके पिता स्टेज-4 लिवर कैंसर से जूझ रहे हैं.
बताया जा रहा है कि पिछले एक साल से उनका इलाज चल रहा था, लेकिन हाल के दिनों में उनकी तबीयत काफी बिगड़ गई. कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार उनकी हालत बेहद नाजुक है और वे ग्रेटर नोएडा के एक अस्पताल में वेंटिलेटर सपोर्ट पर हैं. इसी गंभीर स्थिति को देखते हुए रिंकू सिंह ने टीम से अलग होने का फैसला किया.
कितनी खतरनाक है बीमारी?
लिवर कैंसर को गंभीर बीमारियों में गिना जाता है, खासकर जब यह चौथे चरण में पहुंच जाता है. स्टेज-4 का मतलब होता है कि कैंसर शरीर के अन्य हिस्सों में भी फैल चुका है, जिससे इलाज जटिल हो जाता है और स्थिति बेहद संवेदनशील बन जाती है. ऐसे में मरीज को गहन चिकित्सकीय निगरानी की जरूरत पड़ती है. रिंकू हाल ही में टीम के साथ चेन्नई पहुंचे थे, लेकिन पिता की बिगड़ती हालत की खबर मिलते ही अगली सुबह वापस लौट गए. उनकी उपलब्धता अब जिम्बाब्वे के खिलाफ होने वाले अहम टी-20 मुकाबले के लिए संदिग्ध मानी जा रही है.&amp;nbsp;
कितना खतरनाक है लिवर कैंसर?
हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली मायो क्लिनिक के अनुसार, लिवर कैंसर वह बीमारी है जिसकी शुरुआत लिवर की सेल्स से होती है. लिवर पेट के ऊपरी दाएं हिस्से में, डायफ्राम के नीचे और पेट के ऊपर स्थित एक महत्वपूर्ण अंग है. शरीर में यह कई जरूरी काम करता है, जैसे खून को साफ करना, पाचन में मदद करना और पोषक तत्वों को स्टोर करना. लिवर में कई तरह के कैंसर विकसित हो सकते हैं, लेकिन सबसे आम प्रकार हेपेटोसेलुलर कार्सिनोमा है, जो लिवर की मुख्य सेल्स यानी हेपेटोसाइट्स से शुरू होता है. इसके अलावा इंट्राहेपेटिक कोलैंजियोकार्सिनोमा और हेपेटोब्लास्टोमा जैसे अन्य प्रकार भी होते हैं, हालांकि ये अपेक्षाकृत कम देखे जाते हैं. कई मामलों में कैंसर लिवर से शुरू नहीं होता, बल्कि शरीर के किसी दूसरे हिस्से जैसे कोलन, फेफड़े या ब्रेस्ट से फैलकर लिवर तक पहुंचता है. ऐसे मामलों को मेटास्टेटिक कैंसर कहा जाता है और इसका नाम उस अंग के आधार पर रखा जाता है, जहां से इसकी शुरुआत हुई थी.
क्या होते हैं इसके लक्षण?
प्राथमिक लिवर कैंसर के शुरुआती चरण में अक्सर कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते. जब बीमारी बढ़ने लगती है, तब कुछ संकेत सामने आ सकते हैं. इनमें बिना कोशिश के वजन कम होना, भूख न लगना, पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द, मतली या उल्टी, लगातार कमजोरी और थकान शामिल हैं. कुछ लोगों में पेट में सूजन, त्वचा और आंखों के सफेद हिस्से का पीला पड़ जाना जिसे पीलिया कहा जाता है, और मल का सफेद या फीका दिखना जैसे लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं. यदि ऐसे किसी भी लक्षण का अनुभव हो जो चिंता पैदा करे या लंबे समय तक बना रहे, तो डॉक्टर से परामर्श लेना जरूरी है. शुरुआती जांच और सही इलाज से स्थिति को बेहतर तरीके से संभाला जा सकता है.
इसे भी पढ़ें-&amp;nbsp;Testicle Pain Causes:हल्की-सी चोट लगते ही होता है तेज दर्द, आखिर शरीर के बाहर ही क्यों लटके रहते हैं टेस्टिकल्स?
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 26 Feb 2026 10:30:13 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Testicle Pain Causes:हल्की&amp;सी चोट लगते ही होता है तेज दर्द, आखिर शरीर के बाहर ही क्यों लटके रहते हैं टेस्टिकल्स?</title>
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        <description><![CDATA[ Why Do Testicles Hang Outside The Body: हल्की-सी चोट लगते ही तेज दर्द क्यों होता है और आखिर टेस्टिकल्स शरीर के बाहर ही क्यों रहते हैं, यह सवाल अक्सर लोगों के मन में आता है. दरअसल, मेल रिप्रोडक्टिव सिस्टम का यह हिस्सा बेहद संवेदनशील और खास बनावट वाला होता है. टेस्टिकल्स को घेरने वाली थैली को स्क्रोटम कहा जाता है, जो पीनस के नीचे स्थित स्किन और मांसपेशियों से बनी एक मजबूत लेकिन लचीली स्ट्रक्चर है. इसके अंदर दो अंडाकार ग्लैंड्स होती हैं, जो स्पर्म बनाने और टेस्टोस्टेरोन जैसे हार्मोन रिसाव करने का काम करती हैं.
क्यों होते हैं बाहर?
हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली बेवसाइट clevelandclinic के अनुसार, टेस्टिकल्स शरीर के बाहर इसलिए होते हैं क्योंकि इन्हें सामान्य शरीर के तापमान से थोड़ा कम तापमान की जरूरत होती है. स्पर्म निर्माण सही तरीके से तभी हो पाता है जब तापमान शरीर से कुछ डिग्री कम रहे. स्क्रोटम एक तरह से क्लाइमेट कंट्रोल सिस्टम की तरह काम करता है. इसमें मौजूद क्रीमास्टर मांसपेशी जरूरत के मुताबिक टेस्टिकल्स को शरीर के करीब या दूर ले जाती है, ताकि तापमान संतुलित रहे. इसी कारण प्रकृति ने इन्हें पेट के भीतर नहीं, बल्कि बाहर लटकने की व्यवस्था दी है.
हल्का चोट होने पर दर्द क्यों होता है?
Medicalnewstoday की रिपोर्ट के अनुसार, अब सवाल आता है कि हल्की चोट पर इतना तेज दर्द क्यों होता है. इसका मुख्य कारण है नसों की की अधिकतम. टेस्टिकल्स में बहुत घनी और कोमल नर्व एंडिंग्स होती हैं. शरीर के छोटे से हिस्से में इतनी ज्यादा नसें होने की वजह से हल्का-सा झटका भी तेज दर्द में बदल जाता है. इसके अलावा यह हिस्सा बाहरी है और हड्डियों या मोटी मांसपेशियों से सुरक्षित नहीं है, इसलिए चोट का असर सीधे इन पर पड़ता है.
कैसे होता है बचाव?
हालांकि नेचर ने कुछ सुरक्षा उपाय भी दिए हैं. स्क्रोटम की त्वचा लचीली होती है, अंदर रेशेदार परत ट्यूनिका अल्बुजिनिया मौजूद रहती है और टेस्टिकल्स में हल्की-सी मोशन भी होती है, जिससे वे झटके को कुछ हद तक सह सकें. लेकिन ये सुरक्षा पूरी तरह दर्द से नहीं बचा पाती. कई बार टेस्टिकल्स पर चोट लगने के बाद पेट या निचले हिस्से में भी दर्द महसूस होता है. इसे रेफर्ड पेन कहा जाता है. दरअसल, भ्रूण विकास के दौरान टेस्टिकल्स शुरुआत में पेट के अंदर बनते हैं और बाद में नीचे की ओर उतरते हैं. इसी वजह से इनके कुछ नसों के संबंध पेट के हिस्से से जुड़े रहते हैं. जब चोट लगती है तो दिमाग को संकेत मिलता है, लेकिन वह हमेशा सटीक स्थान पहचान नहीं पाता, जिससे पेट में भी दर्द या मितली महसूस हो सकती है.
इसे भी पढ़ें- Women Health Issues: भारत में 70% महिलाएं चुपचाप सहती हैं ये तकलीफें, डॉक्टर से जानें कब आपको सावधान होने की जरूरत?
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 25 Feb 2026 14:30:14 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>HPV Vaccination: सर्वाइकल कैंसर के खिलाफ सरकार का बड़ा कदम, 14 साल की लड़कियों को मुफ्त में लगेगी HPV वैक्सीन</title>
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        <description><![CDATA[ HPV Vaccination Campaign In India: देशभर में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सरकार लगातार बड़े कदम उठा रही है. सर्वाइकल कैंसर, जिसके मामले भारत में लगातार बढ़ रहे हैं, उसके खिलाफ सरकार वैक्सीनेशन अभियान शुरू करने जा रही है. इस पहल के तहत 14 साल की लड़कियों को मुफ्त में एचपीवी वैक्सीन दी जाएगी. इसे सर्वाइकल कैंसर के खिलाफ एक सुरक्षित विकल्प माना जाता है. रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत में हर साल करीब 1.15 करोड़ लड़कियां 14 वर्ष की उम्र में पहुंचती हैं.
सर्वाइकल कैंसर के मामले
सर्वाइकल कैंसर के मामलों में भारत की हिस्सेदारी करीब 25 प्रतिशत है. आंकड़े बताते हैं कि देश में हर कुछ मिनट में एक महिला इस बीमारी के कारण जान गंवा देती है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि एचपीवी टीकाकरण का विस्तार कैंसर से होने वाली रोकी जा सकने वाली मौतों को कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है. ह्यूमन पैपिलोमा वायरस यानी एचपीवी एक आम इंफेक्शन है, जो स्किन-टू-स्किन संपर्क से फैलता है और अक्सर शुरुआती चरण में कोई लक्षण नहीं दिखाता. यदि उच्च जोखिम वाले स्ट्रेन का इंफेक्शन लंबे समय तक बना रहे, तो यह धीरे-धीरे कैंसर का रूप ले सकता है.
राष्ट्रीय कार्यक्रम में इस्तेमाल की जा रही क्वाड्रिवेलेंट वैक्सीन एचपीवी के टाइप 16 और 18 से सुरक्षा देती है, जो सर्वाइकल कैंसर के अधिकांश मामलों के लिए जिम्मेदार माने जाते हैं. इसके अलावा यह टाइप 6 और 11 से भी बचाव करती है, जो आम तौर पर जननांग मस्सों का कारण बनते हैं. डॉक्टरों के मुताबिक, यह टीका सिर्फ सर्वाइकल कैंसर ही नहीं बल्कि गुदा, योनि, वल्वा, लिंग और गले से जुड़े कुछ प्रकार के कैंसर के खतरे को भी कम करने में मददगार है. यदि वायरस के संपर्क में आने से पहले यह वैक्सीन लगा दी जाए, तो सर्वाइकल कैंसर और उससे जुड़ी प्रारंभिक अवस्थाओं के खिलाफ लगभग 97 प्रतिशत तक सुरक्षा मिल सकती है. रिसर्च बताती हैं कि टीकाकरण के बाद कम से कम 12 से 15 वर्षों तक मजबूत इम्यून बनी रहती है.
9 साल से 14 साल की लड़कियां
यह टीका किशोरावस्था में सबसे अधिक प्रभावी होता है, इसलिए 9 से 14 वर्ष की आयु की लड़कियां प्राथमिक लक्ष्य हैं. 15 से 26 वर्ष की महिलाओं के लिए कैच-अप वैक्सीनेशन की सलाह दी जाती है, जबकि 27 से 45 वर्ष की आयु के पुरुष और महिलाएं डॉक्टर की सलाह के बाद टीका लगवा सकते हैं. 9 से 14 वर्ष के लड़कों को भी शामिल करने पर जोर दिया जा रहा है, ताकि इंफेक्शन के फैलाव को कम किया जा सके. कमजोर इम्यून सिस्टम वाले लोगों, जैसे एचआईवी संक्रमित व्यक्तियों को टीकाकरण से पहले हेल्थ परामर्श लेना चाहिए.
सर्वाइकल कैंसर से मौत
मिंट की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में सर्वाइकल कैंसर महिलाओं में दूसरा सबसे आम कैंसर बना हुआ है. हर साल करीब 80 हजार नए मामले सामने आते हैं और 42 हजार से ज्यादा महिलाओं की मौत इस बीमारी के कारण होती है. साइंटफिक प्रमाण बताते हैं कि सर्वाइकल कैंसर के लगभग सभी मामलों के पीछे ह्यूमन पैपिलोमा वायरस यानी एचपीवी का लगातार बना रहने वाला इंफेक्शन जिम्मेदार होता है. खासतौर पर एचपीवी के टाइप 16 और 18 को उच्च जोखिम वाला माना जाता है, जो भारत में 80 प्रतिशत से अधिक मामलों के लिए जिम्मेदार हैं.
एचपीवी वैक्सीन कितनी प्रभावी है
यूएस &amp;nbsp;की नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन के अनुसार, एचपीवी वैक्सीन दुनिया में सबसे ज्यादा स्टडी की गई वैक्सीन में से एक है. रिसर्च से यह साबित हुआ है कि यह वैक्सीन उन एचपीवी प्रकारों से होने वाले सर्वाइकल कैंसर को रोकने में 90 &amp;nbsp;प्रतिशत से ज्यादा तक प्रभावी है, जिन्हें यह कवर करती है. इस वैक्सीनेशन सेंटरों &amp;nbsp;को 24 घंटे संचालित सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं से जोड़ा जाएगा, ताकि जरूरत पड़ने पर तुरंत हेल्थ सहायता उपलब्ध हो सके. इससे सुरक्षा स्टेंडर्ड को मजबूत करने के साथ-साथ पेरेंट्स का भरोसा भी बढ़ाने में मदद मिलेगी.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 24 Feb 2026 18:30:14 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>HPV, Vaccination:, सर्वाइकल, कैंसर, के, खिलाफ, सरकार, का, बड़ा, कदम, साल, की, लड़कियों, को, मुफ्त, में, लगेगी, HPV, वैक्सीन</media:keywords>
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        <title>European vs Indian Liver Health: शराब पीने वाले विदेशी का लिवर हेल्दी, न पीने वाले भारतीय को &amp;apos;फैटी लिवर&amp;apos;! क्या है इसकी वजह?</title>
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        <description><![CDATA[ Why Europeans Tolerate Alcohol Better Than Indians: इंसानों और शराब के बीच का रिश्ता हमेशा सीधा-सादा नहीं रहा है. इसमें संस्कृति, सामाजिक आदतें और शरीर की बनावट, तीनों की भूमिका होती है. हम में से कई लोग सीमित मात्रा में शराब का सेवन करते हैं, लेकिन देश में बड़ी आबादी फैटी लिवर की समस्या से जूझ रही है. अक्सर यह सवाल उठता है कि यूरोपीय लोग हमसे ज्यादा शराब पीते हैं, फिर भी उन्हें इससे उनको दिक्कत कम क्यों होती है? इसी विषय पर डॉक्टर हर्ष व्यास ने एक दिलचस्प जानकारी शेयर की है.
सोशल मीडिया पर शेयर किया जानकारी&amp;nbsp;
इंस्टाग्राम पर शेय एक वीडियो में उन्होंने 37 साल के एक इटालियन और 37 साल के एक भारतीय व्यक्ति की लिवर अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट की तुलना दिखाई, हैरानी की बात यह थी कि जो यूरोपीय व्यक्ति हफ्ते में दो-तीन बार शराब पीता था, उसका लिवर ज्यादा स्वस्थ दिखा, जबकि भारतीय व्यक्ति शराब नहीं पीता था, फिर भी उसके लिवर में फैटी बदलाव नजर आए, डॉ. व्यास के अनुसार इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं. सबसे पहला कारण जेनेटिक्स है, उन्होंने बताया कि यूरोपीय लोगों में शराब को तोड़ने वाले एंजाइम, अल्कोहल डिहाइड्रोजनेज और एल्डिहाइड डिहाइड्रोजनेज की सक्रियता बेहतर होती है. इसका मतलब यह है कि शराब से बनने वाले जहरीले तत्व उनके शरीर से जल्दी बाहर निकल जाते हैं. जबकि एशियाई आबादी में ये एंजाइम उतने प्रभावी नहीं होते, जिससे ये हानिकारक तत्व शरीर में ज्यादा समय तक बने रह सकते हैं और धीरे-धीरे बाहर निकलते हैं.
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A post shared by Dr Harsh Vyas MBBS , DNB (Radio Diagnosis) (@runningradiologist)





लाइफस्टाइल का भी अहम रोल
दूसरा बड़ा कारण खानपान है. यूरोपियन डाइट में कॉम्प्लेक्स कार्बोहाइड्रेट, मछली और सी-फूड के रूप में हेल्दी फैट, ऑलिव ऑयल और पर्याप्त प्रोटीन शामिल होता है. यानी उनका भोजन संतुलित और पोषण से भरपूर होता है. इसके मुकाबले भारतीय आहार में अक्सर रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट की मात्रा ज्यादा होती है, जबकि हेल्दी फैट और प्रोटीन अपेक्षाकृत कम होते हैं. यह अंतर लिवर की सेहत पर असर डाल सकता है. तीसरा अहम पहलू है फिजिकल एक्टिविटी. डॉक्टर ने बताया कि उनके इटालियन मरीज रोज 5 से 6 किलोमीटर पैदल चलता था और इसके अलावा 30 से 40 मिनट एक्सरसाइज भी करता था. वहीं भारत में बड़ी संख्या में लोग रेगुलर एक्सरसाइज नहीं कर पाते और रोज 5 किलोमीटर चलना भी मुश्किल हो जाता है.
डॉ. व्यास का कहना है कि भले ही यूरोपीय लोग शराब पीते हों, लेकिन उनकी लाइफस्टाइल संतुलित और सक्रिय होती है. बेहतर डाइट, नियमित व्यायाम और अनुकूल जेनेटिक कारक मिलकर शरीर को हुए नुकसान की भरपाई करने में मदद करते हैं. जबकि यदि लाइफस्टाइल असंतुलित हो, तो बिना शराब के भी लिवर से जुड़ी समस्याएं बढ़ सकती हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 22 Feb 2026 18:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>हर बार मेकअप के साथ करा लेती हैं हेयर एक्सटेंशन, हो सकता है कैंसर</title>
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        <description><![CDATA[ 
बालों को लंबा घना और स्टाइलिश दिखाने के लिए आजकल हेयर एक्सटेंशन का ट्रेंड तेजी से बढ़ रहा है. खास मौकों पर मेकअप के साथ एक्सटेंशन लगवाना कई लोगों की पसंद बन चुका है. हाल ही में सामने आई एक स्टडी ने इस ट्रेंड को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. रिसर्च में दावा किया गया है कि बाजार में बिक रहे कई हेयर एक्सटेंशंस में सैकड़ों खतरनाक केमिकल पाए गए हैं जो कैंसर से लेकर हार्मोन गड़बड़ी और बांझपन जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ा सकते हैं. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि अगर आप भी हर बार मेकअप के साथ हेयर एक्सटेंशन करा लेती है, तो सतर्क हो जाए और जाने इससे कैंसर कैसे हो सकता है. स्टडी में क्या आया सामने?Silent Spring Institute की ओर से की गई है, यह स्टडी 11 फरवरी को जर्नल Environment &amp;amp; Health में प्रकाशित पब्लिश हुई थी. रिसर्चर्स ने 43 तरह के हेयर एक्सटेंशन प्रोडक्ट्स की जांच की, जिनमें सिंथेटिक हेयर, ह्यूमन हेयर, ब्रेडिंग हेयर और आईलैश एक्सटेंशन शामिल थे. जांच के दौरान 900 से ज्यादा केमिकल्स का पता चला, लेकिन इनमें केवल 169 की पहचान की जा सकती है. यानी 80 प्रतिशत से ज्यादा केमिकल्स ऐसे थे, जिनकी जानकारी वैज्ञानिक डेटाबेस में उपलब्ध नहीं है. लगभग हर सैंपल में कम से कम एक कैंसर से जुड़ा केमिकल पाया गया है. वहीं करीब 10 प्रतिशत सैंपल में ऑर्गेनोटिन नाम के प्लास्टिक स्टेबलाइजर ऐसे स्तर पर मिले, जिन्हें यूरोप में सुरक्षित सीमा से ज्यादा माना जाता है. किन खतरों से जुड़ा है इस्तेमाल?इस रिसर्च में सामने आया है कि जिन केमिकल्स की पहचान हुई है, वह कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जुड़े हैं. जैसे स्किन और स्कैल्प में जलन, खुजली और रैशेज, हार्मोन में गड़बड़ी, कैंसर का खतरा, &amp;nbsp;प्रजनन क्षमता पर असर और यूटेरिन फाइब्रॉएड, बच्चों में जल्दी प्यूबर्टी, मोटापा और नर्वस सिस्टम पर असर. &amp;nbsp;इसके अलावा ऑर्गेनोटिन, फ्थैलेट्स, स्टाइरीन और एक्रेलोनाइट्राइल जैसे केमिकल्स जैसे केमिकल्स को खासतौर पर चिंताजनक बताया गया है. इनमें कुछ पदार्थ ऐसे भी हैं, जिन्हें दूसरी इंडस्ट्री में बहुत जहरीला माना गया है. ब्लैक महिलाओं पर ज्यादा असर रिपोर्ट के अनुसार हेयर एक्सटेंशन का इस्तेमाल सबसे ज्यादा ब्लैक महिलाओं में होता है. 70 प्रतिशत से ज्यादा ब्लैक महिलाएं साल में कम से कम एक बार हेयर एक्सटेंशन लगाती है. कई लोग इन्हें हफ्तों तक लगाए रखते हैं, जिससे केमिकल्स के लंबे समय तक संपर्क में रहने की आशंकाएं बढ़ जाती है. वहीं एक्सपर्ट्स का कहना है कि एंडोक्राइन डिसरप्टिंग केमिकल्स यूटेरिन फाइब्रॉएड जैसी समस्याओं से जुड़े हो सकते हैं, जो ब्लैक महिलाओं में पहले से अधिक देखी जाती है.हेयर एक्सटेंशन को सेट करने पर निकलती है जहरीली गैसेंहेयर एक्सटेंशन को सेट करने के लिए जब गर्म पानी या हिट स्टाइलिंग टूल का इस्तेमाल किया जाता है तो कुछ हानिकारक गैसें निकल सकती है. इससे आंख, नाक और गले में जलन, सिर दर्द और लंबे समय में गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है. इसके अलावा रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि ब्यूटी इंडस्ट्री में इन प्रोडक्ट को लेकर सख्त सुरक्षा मानक नहीं है. कई कंपनी अपने प्रोडक्ट में इस्तेमाल किए गए केमिकल्स की पूरी जानकारी भी शेयर नहीं करती है. इससे प्रोडक्ट यूज करने पर अनजाने में खतरा उठा सकते हैं.क्या है सेफ ऑप्शन?रिसर्च में दो ऐसे प्रोडक्ट का जिक्र किया गया है, जिनमें खतरनाक केमिकल नहीं मिले. हालांकि सुरक्षित ऑप्शन आमतौर पर महंगे होते हैं. कुछ लोग एक्सटेंशन लगाने से पहले एप्पल साइडर विनेगर से धोने का तरीका अपनाते हैं, जिससे थोड़ी बहुत कमी आ सकती है. लेकिन यह पूरी तरह सुरक्षा की गारंटी नहीं देता है. वहीं एक्सपर्ट का कहना है कि इसके लिए लोगों को जागरूक रहना चाहिए और जरूरत से ज्यादा केमिकल प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करने से बचना चाहिए. साथ ही कंपनियों पर भी दबाव बनाया जाना चाहिए कि वह अपने प्रोडक्ट की पूरी जानकारी दें.
ये भी पढ़ें-Mineral Deficiency Symptoms: आयरन, पोटैशियम से लेकर आयोडीन तक... शरीर में हो जाए इन जरूरी मिनरल्स की कमी तो दिखते हैं ये संकेत, जानें क्या खाएं&amp;nbsp;
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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        <pubDate>Sat, 21 Feb 2026 14:30:38 +0530</pubDate>
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        <title>Mineral Deficiency Symptoms: आयरन, पोटैशियम से लेकर आयोडीन तक... शरीर में हो जाए इन जरूरी मिनरल्स की कमी तो दिखते हैं ये संकेत, जानें क्या खाएं</title>
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        <description><![CDATA[ How to Identify Mineral Deficiency Symptoms: ज्यादातर लोग जानते हैं कि शरीर में विटामिन की कमी हो सकती है, लेकिन कई बार जरूरी मिनरल्स की कमी भी बड़ी समस्या बन जाती है. ये माइक्रो और मैक्रो मिनरल शरीर के सही कामकाज के लिए बेहद जरूरी होते हैं. कई मामलों में एक साधारण ब्लड टेस्ट से पता चल सकता है कि किस तत्व की कमी है, लेकिन कुछ संकेत ऐसे भी होते हैं जो पहले ही शरीर में बदलाव का इशारा दे देते हैं. सही समय पर खानपान में बदलाव करके इन कमियों को दूर किया जा सकता है. StarsInsider की रिपोर्ट के अनुसार, शरीर में कुछ ऐसे लक्षण दिखते हैं, जिनसे हम इनकी कमी को पहचान सकते हैं.&amp;nbsp;
क्रोमियमक्रोमियम की कमी होने पर शरीर में शुगर को संभालने की क्षमता प्रभावित हो सकती है और वजन कम होने लगता है. इसे बढ़ाने के लिए मशरूम, हरी पत्तेदार सब्जियां, सोयाबीन, सूरजमुखी के बीज, चना, काजू और गुड़ जैसे खाद्य पदार्थ फायदेमंद होते हैं.
मैंगनीजमैंगनीज की कमी रेयर है, लेकिन होने पर हड्डियों के विकास में रुकावट, प्रजनन क्षमता में कमी और ग्लूकोज सहनशीलता में गड़बड़ी हो सकती है. इसके लिए हरी सब्जियां, जामुन, ओट्स, ब्राउन राइस, अनानास और चना आहार में शामिल किए जा सकते हैं.
फ्लोराइडफ्लोराइड की कमी दांतों को कमजोर बना सकती है और कैविटी का खतरा बढ़ जाता है.
सोडियम क्लोराइडसोडियम क्लोराइड यानी नमक की कमी अक्सर खाने से नहीं, बल्कि शरीर में तरल असंतुलन के कारण होती है. ऐसे में पानी और नमक के संतुलन पर ध्यान देना जरूरी है.
पोटैशियम&amp;nbsp;पोटैशियम की कमी आमतौर पर उल्टी, दस्त या ज्यादा पेशाब के कारण होती है. इसे पूरा करने के लिए शकरकंद, टमाटर, गाजर, पालक, केला, खरबूजा, आलू, खजूर, किशमिश और मछली जैसे खाद्य पदार्थ मददगार हैं.
आयोडीनआयोडीन की कमी से शरीर का विकास और दिमागी कार्य प्रभावित हो सकते हैं. गले के सामने सूजन इसका सामान्य लक्षण है. इससे बचने के लिए आयोडीन युक्त नमक, समुद्री शैवाल, अंडे और हरी सब्जियां खाना जरूरी है.
मैग्नीशियममैग्नीशियम कई खाद्य पदार्थों में पाया जाता है, फिर भी कमी संभव है. इसके लिए दालें, मेवे, बीज, साबुत अनाज, फल और एवोकाडो फायदेमंद हैं.
जिंक&amp;nbsp;जिंक की कमी से रोग प्रतिरोधक क्षमता घट जाती है. सीप, मांस, बीन्स और मेवे इसके अच्छे सोर्स हैं.
आयरनआयरन रेड ब्लड सेल्स के लिए जरूरी है. इसकी कमी से एनीमिया हो सकता है. बादाम, सूखे मेवे, राजमा, पालक, ब्रोकली, कद्दू के बीज और मांस जैसे खाद्य पदार्थ आयरन से भरपूर होते हैं.
सेलेनियमसेलेनियम की कमी कम देखने को मिलती है, लेकिन होने पर थकान, मांसपेशियों की कमजोरी और प्रतिरोधक क्षमता में कमी हो सकती है. ब्राजील नट्स, मशरूम, साबुत अनाज, सैल्मन और अंडे इसके अच्छे सोर्स हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 20 Feb 2026 14:30:27 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Mineral, Deficiency, Symptoms:, आयरन, पोटैशियम, से, लेकर, आयोडीन, तक..., शरीर, में, हो, जाए, इन, जरूरी, मिनरल्स, की, कमी, तो, दिखते, हैं, ये, संकेत, जानें, क्या, खाएं</media:keywords>
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        <title>Organ Donation: मौत से पहले एक बच्ची ने कैसे बचाई 4 लोगों की जान, मेडिकल फील्ड में कैसे होता है यह कमाल?</title>
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        <description><![CDATA[ How Does Organ Donation and Transplantation Work: केरल में 10 महीने की मासूम आलिन शेरिन अब्राहम ने मिसाल कायम किया है. वे सबसे कम उम्र की डोनर बनी. इस बच्ची का पार्थिव शरीर पहले मल्लप्पल्ली के एक निजी अस्पताल के शवगृह में रखा गया था. बाद में इसे वेस्ट वालुम्मानिल स्थित उनके घर पर अंतिम दर्शन के लिए लाया गया, जहां दूर-दूर से लोग श्रद्धांजलि देने पहुंचे. पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया.
आलिन भले ही इस दुनिया से चली गईं, लेकिन अपने पीछे चार जिंदगियों में नई रोशनी छोड़ गईं. उनके अंगदान ने गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों को जीवनदान दिया. यही अंगदान और ट्रांसप्लांट की असली ताकत है. चलिए आपको बताते हैं कि यह कैसे काम करता है?
क्या होता है ऑर्गन डोनेशन?
हेल्थ विषयों पर जानकारी देने वाली बेवसाइट clevelandclinic के अनुसार,&amp;nbsp;ऑर्गन डोनेशन वह प्रक्रिया है, जिसमें किसी व्यक्ति के स्वस्थ अंग को निकालकर ऐसे मरीज के शरीर में लगाया जाता है, जिसका कोई अंग काम करना बंद कर चुका हो. यह एक बेहद संवेदनशील और समय से जुड़ी मेडिकल प्रक्रिया है. आमतौर पर दो सर्जरी लगभग एक साथ होती हैं, एक में डोनर के शरीर से अंग निकाला जाता है और दूसरी में जरूरतमंद मरीज के शरीर में उसे ट्रांसप्लांट किया जाता है.
कितने तरह के होते हैं ऑर्गन डोनेशन?
ऑर्गन डोनेशन दो प्रकार का होता है, मृत्यु के बाद किया जाने वाला दान और जीवित व्यक्ति द्वारा किया जाने वाला दान. अधिकांश मामलों में ब्रेन मृत्यु की पुष्टि के बाद परिजनों की सहमति से अंगदान किया जाता है. जीवित व्यक्ति भी किडनी जैसे कुछ अंग दान कर सकता है, बशर्ते उसकी सेहत पूरी तरह ठीक हो और उसका अंग जरूरतमंद मरीज के शरीर के अनुकूल हो. मृत्यु के बाद हार्ट, लिवर, किडनी, लंग्स, पैंक्रियास और आंत जैसे अंग दान किए जा सकते हैं. इसके अलावा आंख, स्किन, बोन मैरो और हार्ट &amp;nbsp;भी दान किए जा सकते हैं.
कौन होता है डोनर?
डॉक्टरों के मुताबिक, लगभग हर व्यक्ति संभावित अंगदाता हो सकता है. उम्र से ज्यादा महत्वपूर्ण है अंगों की सेहत और मेडिकल जांच. सही समय पर लिया गया एक निर्णय कई लोगों को दूसरी जिंदगी दे सकता है. अंगदान और ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया आसान नहीं होती. यह कई चरणों से होकर गुजरती है. शुरुआत दान के निर्णय से होती है और अंत उस मेडिकल प्रक्रिया पर होता है, जिसमें एक व्यक्ति का स्वस्थ अंग निकालकर दूसरे व्यक्ति के शरीर में सफलतापूर्वक लगाया जाता है. यह प्रक्रिया इस बात पर निर्भर करती है कि अंगदाता जीवित है या मृत्यु के बाद दान किया गया है.
मृत्यु के बाद होने वाले अंगदान में समय बहुत कम होता है, क्योंकि मौत के कुछ ही घंटों के भीतर अंगों को सुरक्षित निकालना जरूरी होता है. देरी होने पर अंगों की उपयोगिता कम हो सकती है. वहीं, जीवित डोनर के मामले में पूरी तैयारी और योजना के साथ काम किया जाता है। इसमें स्वास्थ्य जांच, आवश्यक सहमति और सुरक्षा उपायों पर विशेष ध्यान दिया जाता है.
इसे भी पढ़ें-&amp;nbsp;Seema Haider: सीमा हैदर को 11 महीने में हुए 2 बच्चे, इतना कम गैप बच्चों के लिए कितना खतरनाक?
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 19 Feb 2026 18:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>What Not To Do Before Dentist Visit: Heavy Makeup से खाली पेट रहने तक, डेंटिस्ट के पास जाने से पहले भूलकर भी न करें ये 5 गलतियां</title>
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        <description><![CDATA[ Things To Avoid Before Dental Treatment: डेंटिस्ट के पास जाने से पहले खुशी से उछल पड़ना शायद ही किसी को पसंद हो. फिर भी दांतों और मुंह की सेहत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, इसलिए हम समय निकालकर क्लिनिक तक पहुंचते ही हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि डेंटिस्ट के पास जाने से पहले कुछ छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखना जरूरी होता है? कई बार अनजाने में की गई गलतियां इलाज को मुश्किल बना सकती हैं. StarsInsider की रिपोर्ट के अनुसार डेंटिस्ट से मिलने से पहले आपको इन बातों का ध्यान रखना चाहिए.&amp;nbsp;
भारी मेकअप से बचना चाहिए
मसलन, अपॉइंटमेंट पर जाते समय भारी मेकअप करना ठीक नहीं माना जाता. हल्का काजल या मस्कारा ठीक है, लेकिन फाउंडेशन और खासकर लिपस्टिक से बचना बेहतर है. इलाज के दौरान मुंह लंबे समय तक खुला रहता है, उपकरणों का इस्तेमाल होता है और कई बार एनेस्थीसिया भी दिया जाता है. इससे चेहरा सुन्न या थोड़ा गंदा हो सकता है, इसलिए सादगी बेहतर विकल्प है.
मुस्कान पर भी ध्यान देना चाहिए
कॉस्मेटिक डेंटिस्ट्री के लिए जाते समय किसी फिल्मी सितारे जैसी परफेक्ट मुस्कान की तस्वीर साथ ले जाना भी हमेशा काम नहीं आता. दांतों का आकार, रंग और बनावट हर व्यक्ति में अलग होती है. जैसे हर किसी पर एक जैसा हेयर कलर सूट नहीं करता, वैसे ही मुस्कान भी हर चेहरे के हिसाब से डिजाइन की जाती है. इसलिए अपने डेंटिस्ट की सलाह पर भरोसा करना ज्यादा समझदारी है.
मेडिकल हिस्ट्री बताना चाहिए
सबसे अहम बात है अपनी मेडिकल हिस्ट्री छिपाना नहीं. अगर आपको कोई पुरानी बीमारी है, हाल ही में सर्जरी हुई है या आप नियमित दवाएं लेते हैं, तो यह जानकारी पहले ही दे दें. कुछ स्थितियों में डेंटल प्रक्रिया से पहले एंटीबायोटिक या खास सावधानियां जरूरी हो सकती हैं. सही जानकारी से ही सुरक्षित इलाज संभव है.
क्या खाना खाया यह मायने रखता है?
अपॉइंटमेंट से पहले क्या खाना है, यह भी मायने रखता है. ऐसा भोजन लें जो ब्लड शुगर अचानक कम न करे और आपको पूरे समय ऊर्जा देता रहे. प्रोटीन और हेल्दी फैट वाला हल्का भोजन बेहतर रहता है. अगर आप खाली पेट जाएंगे या सिर्फ कुछ पीकर चले जाएंगे, तो इलाज के दौरान बेचैनी, चिड़चिड़ापन या हल्का चक्कर आ सकता है.
इन चीजों का भी रखें ध्यान
एक और अहम बात शराब से दूरी रखें. कुछ लोग घबराहट कम करने के लिए पी लेते हैं, लेकिन यह डेंटल दवाइयों के साथ प्रतिक्रिया कर सकती है और इलाज को जटिल बना सकती है. बेहतर है कि साफ दिमाग और सही तैयारी के साथ डेंटिस्ट के पास जाएं, ताकि आपकी मुस्कान भी सुरक्षित रहे और इलाज भी आसान हो. इलाज से पहले दर्द की दवा लेना कई लोगों को समझदारी भरा कदम लगता है, खासकर जब उन्हें लगता है कि प्रक्रिया दर्दनाक हो सकती है. लेकिन इसकी जरूरत अक्सर नहीं पड़ती. डेंटिस्ट इलाज के दौरान एनेस्थीसिया का इस्तेमाल करते हैं, जिससे आपको दर्द महसूस नहीं होता. साथ ही, प्रक्रिया के बाद जरूरत हो तो वही सही दवा भी लिखकर देते हैं. इसलिए पहले से खुद से पेनकिलर लेने की बजाय डॉक्टर की सलाह का इंतजार करना ज्यादा सुरक्षित और बेहतर विकल्प है.
इसे भी पढ़ें-&amp;nbsp;Seema Haider: सीमा हैदर को 11 महीने में हुए 2 बच्चे, इतना कम गैप बच्चों के लिए कितना खतरनाक?
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 19 Feb 2026 14:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>AIIMS दिल्ली में AI से इलाज शुरू, इन बीमारियों की होगी जल्दी पहचान</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/aiims-दिल्ली-में-ai-से-इलाज-शुरू-इन-बीमारियों-की-होगी-जल्दी-पहचान</link>
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        <description><![CDATA[ दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में अब इलाज का अंदाज तेजी से बदल रहा है. यहां ऐसी स्मार्ट तकनीक काम करने लगी है जो मरीज के डॉक्टर तक पहुंचने से पहले ही उसकी जांच रिपोर्ट का विश्लेषण कर देती है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI की मदद से अब बीमारी की पहचान और इलाज की दिशा तय करने की प्रक्रिया पहले से कहीं अधिक तेज और सटीक हो रही है.
एक्स-रे रिपोर्ट पर पहले नजर अब AI की
एम्स में छाती का एक्स-रे होने के बाद उसकी पहली जांच अब एक एडवांस्ड AI सिस्टम करता है. यह तकनीक कुछ ही सेकंड में इमेज को स्कैन कर संभावित संक्रमण, गांठ या अन्य असामान्यताओं की ओर संकेत दे देती है. डॉक्टर के पास रिपोर्ट पहुंचने तक शुरुआती विश्लेषण तैयार रहता है, जिससे निर्णय लेने में समय नहीं लगता. इससे न केवल भीड़भाड़ वाले सरकारी अस्पताल में काम का दबाव घटा है बल्कि मरीजों को रिपोर्ट के लिए लंबा इंतजार भी नहीं करना पड़ता.
शुरुआती चरण में कैंसर पकड़ने की तैयारी
देश में बढ़ते ब्रेस्ट कैंसर के मामलों को देखते हुए एम्स की विशेषज्ञ टीम एक नई AI-आधारित तकनीक विकसित कर रही है. डॉक्टर कृतिका रंगराजन और उनकी टीम ऐसी प्रणाली पर काम कर रही है जो कैंसर के बेहद शुरुआती संकेतों को पहचान सके. अक्सर यह बीमारी तब सामने आती है जब वह शरीर में फैल चुकी होती है. नई तकनीक का उद्देश्य इसी देरी को खत्म करना है.
इस सिस्टम का परीक्षण देश के कई प्रमुख मेडिकल केंद्रों में जारी है. यदि कैंसर शुरुआती अवस्था में पकड़ में आ जाए तो उपचार अधिक प्रभावी और जीवन रक्षा की संभावना कई गुना बढ़ जाती है. AI आधारित विश्लेषण डॉक्टरों को समय रहते इलाज शुरू करने में मदद देगा.
&amp;lsquo;मधुनेत्र&amp;rsquo; से गांव तक पहुंचेगी हाईटेक आंख जांच
एम्स ने सरकार के सहयोग से &amp;lsquo;मधुनेत्र&amp;rsquo; नामक एक विशेष कार्यक्रम शुरू किया है. यह AI आधारित सिस्टम आंखों की अंदरूनी तस्वीरों को स्कैन कर मधुमेह या अन्य कारणों से होने वाली रेटिना संबंधी समस्याओं की पहचान करता है. जांच के तुरंत बाद जोखिम की जानकारी मिल जाती है, जिससे समय पर इलाज संभव हो पाता है.
इस पहल को देशभर में लागू करने की योजना है ताकि ग्रामीण और दूरदराज इलाकों के लोगों को भी बड़े शहरों जैसी उन्नत जांच सुविधा मिल सके. विशेषज्ञों का मानना है कि मशीनें लगातार और बिना थके काम करती हैं, जिससे मानवीय त्रुटि की संभावना कम हो जाती है. हालांकि अंतिम निर्णय डॉक्टर ही लेते हैं, लेकिन AI अब उनके लिए एक मजबूत सहायक की भूमिका निभा रहा है.
इसे भी पढ़ें- क्या रात में बार-बार खुलती है आपकी भी नींद, जानें किन बीमारियों से बढ़ रही परेशानी?
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 19 Feb 2026 14:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>हाइड्रेशन के नाम पर गलती तो नहीं कर रहे आप? गुर्दों को हो सकता है नुकसान, जानें सही तरीका और इसके मिथक</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/हाइड्रेशन-के-नाम-पर-गलती-तो-नहीं-कर-रहे-आप-गुर्दों-को-हो-सकता-है-नुकसान-जानें-सही-तरीका-और-इसके-मिथक</link>
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        <pubDate>Thu, 19 Feb 2026 02:30:05 +0530</pubDate>
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        <title>Seema Haider: सीमा हैदर को 11 महीने में हुए 2 बच्चे, इतना कम गैप बच्चों के लिए कितना खतरनाक?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/seema-haider-सीमा-हैदर-को-11-महीने-में-हुए-2-बच्चे-इतना-कम-गैप-बच्चों-के-लिए-कितना-खतरनाक</link>
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        <description><![CDATA[ Is 2 Babies In 11 Months Dangerous: पाकिस्तान से भारत आई सीमा हैदर सुर्खियों में बनी रहती हैं. इस बार उनके छठे बच्चे के जन्म को लेकर चर्चा हो रही है. दरअसल सीमा ने ग्रेटर नोएडा के एक अस्पताल में बेटे को जन्म दिया है. रिपोर्ट्स के अनुसार मां और बच्चा दोनों पूरी तरह सुरक्षित हैं. बेटे के जन्म के बाद परिवार में खुशियों की लहर है और बधाई देने वालों का तांता लगा हुआ है. आपको बता दें कि सीमा ने 11 महीने पहले एक बेटी को जन्म दिया था,जो सचिन मीणा से सीमा का पहला बच्चा था. चलिए आपको बताते हैं कि दोनों बच्चों के जन्म के बीच इतना कम गैप होने की वजह कितनी खतरनाक है.
कम अंतर पर क्या होता है दिक्कत?
लगातार कम अंतर में दो बच्चों का जन्म होने पर सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि क्या मां और बच्चे की सेहत पर इसका असर पड़ता है. हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली बेवसाइट mayoclinic के अनुसार, मेडिकल रिसर्च बताती है कि अगर पहली डिलीवरी के छह महीने के भीतर दोबारा गर्भ ठहर जाए, तो कुछ स्वास्थ्य जोखिम बढ़ सकते हैं. रिपोर्ट &amp;nbsp;के अनुसार, बहुत कम गैप होने पर समय से पहले डिलीवरी जैसे 37 हफ्तों से पहले जन्म, बच्चे का कम वजन और जन्म से जुड़ी कुछ स्वास्थ्य समस्याओं की आशंका बढ़ जाती है. मां के लिए एनीमिया यानी खून की कमी का खतरा भी ज्यादा हो सकता है. दरअसल, गर्भावस्था और ब्रेस्टफीडिंग के दौरान शरीर में आयरन और फोलेट जैसे जरूरी पोषक तत्व कम हो जाते हैं. अगर शरीर को रिकवरी का पर्याप्त समय न मिले, तो अगली प्रेग्नेंसी में मुश्किल बढ़ सकती हैं.
बहुत कम गैप और बहुत ज्यादा गैप दोनों से दिक्कत
&amp;nbsp;Mayoclinic की रिपोर्ट में बताया गया है कि सिर्फ कम गैप ही नहीं, बहुत ज्यादा अंतर भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जाता. लंबे समय बाद गर्भधारण करने पर गर्भावस्था में हाई बीपी से जुड़ी गंभीर स्थिति या कठिन प्रसव का जोखिम बढ़ सकता है. यही वजह है कि अधिकतर एक्सपर्ट एक जीवित जन्म के बाद अगली प्रेग्नेंसी के लिए 18 से 24 महीने का अंतर रखने की सलाह देते हैं, जबकि पांच साल से ज्यादा का गैप भी उचित नहीं माना जाता.
हालांकि हर महिला की शारीरिक स्थिति अलग होती है. 35 साल से अधिक उम्र, पहले प्रीमैच्योर डिलीवरी, सी-सेक्शन या अन्य मुश्किलें टाइमिंग को प्रभावित कर सकती हैं. &amp;nbsp;इसलिए कम अंतर में दो बच्चों की योजना बनाते समय डॉक्टर से सलाह लेना बेहद जरूरी है, ताकि मां और बच्चे दोनों की सेहत सुरक्षित रह सके.
इसे भी पढ़ें-Hidden Cancer Risks: सिर्फ सिगरेट-शराब से नहीं कैंसर का खतरा, आपकी ये 5 छोटी आदतें भी जिम्मेदार; एक्सपर्ट से जानें
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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        <pubDate>Wed, 18 Feb 2026 14:30:17 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Earphone Side Effects: हेडफोन लगाते हैं तो हो जाइए सावधान, जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल से हो सकती है ये बीमारी</title>
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        <description><![CDATA[ Can Headphones Cause Permanent Hearing Loss: आज के दौर में टेक्नोलॉजी हमारी जरूरत भी है और मजबूरी भी. ईयरफोन या हेडफोन इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं. सुबह की वॉक हो, मेट्रो का सफर, बस में यात्रा, कैफे में बैठना या ऑफिस में कॉल, हर जगह लोग कानों में ईयरफोन लगाए नजर आते हैं. इससे आसपास के लोगों को भले परेशानी न हो, लेकिन लगातार और लापरवाही से इस्तेमाल आपकी सुनने की क्षमता पर गंभीर असर डाल सकता है. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन का अनुमान है कि अनसेफ सुनने की आदतों के कारण दुनिया भर में करीब एक अरब युवा सुनने की क्षमता खोने के जोखिम में हैं.
सबसे बड़ी चिंता आवाज की तीव्रता और इस्तेमाल की अवधि को लेकर है. ईयरफोन बहुत कम दूरी से तेज आवाज सीधे कानों तक पहुंचाते हैं. लगातार ऊंची आवाज़ में संगीत सुनना या लंबे समय तक ईयरफोन लगाए रखना, दोनों ही खतरनाक हैं. इसके अलावा, ईयरफोन अलग-अलग जगहों पर रखे जाते हैं, जिससे उन पर बैक्टीरिया जमा हो जाते हैं. इन्हें शेयर करने से इंफेक्शन का खतरा और बढ़ जाता है.
क्या होती है दिक्कत?
Manipalhospitals की एक रिपोर्ट के अनुसार, जब हम तेज़ आवाज में कुछ सुनते हैं तो ध्वनि तरंगें कान के पर्दे को कंपन करती हैं. यह कंपन अंदरूनी कान के कोक्लिया तक पहुंचता है, जहां हजारों सूक्ष्म हेयर सेल्स होती हैं. तेज आवाज इन कोशिकाओं पर ज्यादा दबाव डालती है. लगातार ऐसा होने पर ये सेल्स अपनी संवेदनशीलता खो सकती हैं या स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त हो सकती हैं. यही स्थिति शोर से होने वाली सुनने की कमी का कारण बनती है.
कई लोगों को कानों में घंटी बजने जैसी आवाज़ सुनाई देने लगती है, जिसे टिनिटस कहा जाता है. कुछ मामलों में सामान्य आवाजें भी असहनीय लगने लगती हैं, जिसे हाइपरएक्यूसिस कहते हैं. लंबे समय तक तेज शोर के संपर्क में रहने से चक्कर आना, कान दर्द, अत्यधिक ईयरवैक्स जमा होना और बार-बार इंफेक्शन की समस्या भी हो सकती है.
इससे बचने के लिए क्या करना चाहिए?
हेल्थ एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि आवाज़ हमेशा मध्यम रखें और लगातार लंबे समय तक न सुनें. नॉइज-कैंसिलिंग या ओवर-द-ईयर हेडफोन बेहतर विकल्प हो सकते हैं क्योंकि ये बाहरी शोर कम कर देते हैं, जिससे वॉल्यूम बढ़ाने की जरूरत नहीं पड़ती. ईयरफोन को रेगुलर रूप से साफ करना भी जरूरी है. सफर के दौरान पहले से शोर भरे माहौल में ईयरफोन लगाने से बचें, क्योंकि इससे कुल डेसिबल स्तर और बढ़ जाता है. छोटी-सी सावधानी आपके कानों को स्थायी नुकसान से बचा सकती है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 17 Feb 2026 14:30:14 +0530</pubDate>
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        <title>Beer And Cough In Winter: क्या सर्दियों में बियर पीने से हो जाती है खांसी, डॉक्टर से जानें यह कितनी नुकसानदायक?</title>
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        <description><![CDATA[ Can Drinking Beer In Winter Trigger Cough: गर्मियों में ठंडी बियर और सर्दियों में गाढ़ी, मजबूत एले बीयर का स्वाद मौसम के साथ बदलता हुआ सा लगता है. कंपनियां भी साल के अलग-अलग मौसम के हिसाब से बीयर तैयार करती हैं. गर्मियों में हल्की पिल्सनर या व्हीट बीयर ज्यादा पसंद की जाती है, जबकि ठंड के दिनों में स्टाउट और पोर्टर जैसे गहरे स्वाद वाली बीयर की मांग बढ़ जाती है. लेकिन सवाल यह है कि क्या सर्दियों में बियर पीने से खांसी हो जाती है? डॉक्टरों के मुताबिक, बियर खुद खांसी पैदा नहीं करती, लेकिन कुछ स्थितियों में यह पहले से मौजूद खांसी को ट्रिगर सकती है. खासकर अगर आपको हाल ही में सर्दी, वायरल या सीने का इंफेक्शन हुआ हो.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
डॉ. फ्रांसिस पिट्सिलिस, हॉलिस्टिक हेल्थ एक्सपर्ट और फिजिशियन, जो पिछले 25 वर्षों से तनाव, थकान और लाइफस्टाइल से जुड़ी मुश्किल बीमारियों के इलाज में एक्सपर्ट हैं, उनके अनुसार, &amp;nbsp;करीब 25 प्रतिशत लोगों को इंफेक्शन के ठीक होने के बाद भी 3 से 8 हफ्तों तक खांसी बनी रह सकती है. इसे पोस्ट-इन्फेक्शियस कफ कहा जाता है. इस दौरान सांस नलियां संवेदनशील रहती हैं और ठंडी हवा, एसी, ज्यादा बोलना, हंसना या ठंडे पेय पदार्थ खांसी को ट्रिगर कर सकते हैं. ऐसे में ठंडी बियर पीने पर खांसी बढ़ सकती है, लेकिन यह हर किसी के साथ जरूरी नहीं है.
खांसी रहने के कारण
&amp;nbsp;फ्रांसिस पिट्सिलिस बताती हैं कि लगातार रहने वाली खांसी के पीछे तीन आम कारण माने जाते हैं, पोस्टनेजल ड्रिप, इंफेक्शन के बाद अस्थमा जैसी स्थिति, या श्वसन मार्ग में बनी रहने वाली सूजन और जलन. इसके अलावा साइनस की समस्या, एसिड रिफ्लक्स, ब्लड प्रेशर की कुछ दवाएं, दिल या लंग्स से जुड़ी बीमारियां भी जिम्मेदार हो सकती हैं. इसलिए अगर खांसी लंबे समय तक रहे, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है.यह भी समझना जरूरी है कि पोस्ट-इन्फेक्शियस कफ में एंटीबायोटिक असरदार नहीं होती, क्योंकि इंफेक्शन पहले ही खत्म हो चुका होता है. इलाज आमतौर पर लक्षणों के आधार पर किया जाता है, जैसे नेजल स्प्रे, एंटीहिस्टामिन, खांसी दबाने वाली दवाएं या जरूरत पड़ने पर स्टेरॉयड इनहेलर.
इन दिक्कतों को बढ़ा सकती हैं
जहां तक शराब की बात है, ज्यादा मात्रा में शराब शरीर में पानी की कमी कर सकती है और कंजेशन या गले की परेशानी बढ़ा सकती है. यह इम्यून सिस्टम को भी अस्थायी रूप से कमजोर कर सकती है और सर्दी की दवाओं के साथ प्रतिक्रिया कर सकती है. इसलिए अगर आप पहले से खांसी या इंफेक्शन से जूझ रहे हैं, तो शराब से परहेज करना बेहतर हो सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 15 Feb 2026 14:30:18 +0530</pubDate>
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        <title>Skin Signs of Diabetes: भारत में 10 करोड़ होने वाले हैं डायबिटीज के मरीज, स्किन पर ये 7 संकेत कभी न करें इग्नोर</title>
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        <description><![CDATA[ What Are the Early Skin Signs of Diabetes: इकोनॉमिक सर्वे 2025-26 ने भारत में डायबिटीज़ को उभरते हुए बड़े स्वास्थ्य जोखिम के रूप में चिन्हित किया है. देश में एनसीडी में डायबिटीज सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी है. लगभग 9 करोड़ वयस्क इससे प्रभावित हैं और अनुमान है कि 2026 तक यह संख्या 10 करोड़ के पार पहुंच सकती है. अक्सर लोग ज्यादा प्यास लगना, बार-बार पेशाब आना, थकान, धुंधला दिखना जैसे लक्षणों को ही डायबिटीज़ का संकेत मानते हैं. लेकिन त्वचा पर दिखने वाले कुछ बदलाव भी ब्लड शुगर असंतुलन के शुरुआती संकेत हो सकते हैं. हालांकि इन लक्षणों के पीछे अन्य कारण भी हो सकते हैं. चलिए आपको इसके 7 लक्षण आपको बताते हैं.&amp;nbsp;
डायबिटीज से जुड़े 7 सामान्य त्वचा संकेत
डायबिटिक डर्मोपैथी
पिंडलियों पर छोटे, गोल, भूरे या लाल धब्बे दिख सकते हैं. ये दर्द या खुजली नहीं करते, लेकिन ब्लड वेसल्स में बदलाव का संकेत हो सकते हैं. Journal of Cardiovascular Disease Research के अनुसार, 25 प्रतिशत से अधिक डायबिटीज मरीजों में त्वचा संबंधी बदलाव छोटे ब्लड वेसल्स और नसों के नुकसान से जुड़े पाए गए.
एकैंथोसिस नाइग्रिकन्स 
गर्दन, बगल, जांघों या उंगलियों के जोड़ पर गहरे, मोटे और मखमली धब्बे दिखना इंसुलिन रेजिस्टेंस का संकेत हो सकता है. Indian Journal of Dermatology, Venereology and Leprology के मुताबिक, यह मोटापे और डायबिटीज से जुड़ा अहम त्वचा संकेत है.
घाव का देर से भरना
अगर चोट या जख्म जल्दी नहीं भरते, तो इसका कारण ब्लड फ्लो और नसों की क्षति हो सकती है.Arteriosclerosis, Thrombosis, and Vascular Biology जर्नल के अनुसार, इम्यून सेल्स की गड़बड़ी और टिश्यू मरम्मत में कमी से क्रॉनिक घाव बन सकते हैं, खासकर डायबिटिक फुट अल्सर में.
बार-बार फंगल या बैक्टीरियल इंफेक्शन
ब्लड शुगर बढ़ने से इम्युनिटी कमजोर होती है, जिससे फंगल और बैक्टीरियल इंफेक्शन बार-बार हो सकते हैं. यह बात Journal of Pure and Applied Microbiology में भी बताई गई है.
खुजली और रूखी स्किन
हाई बीपी शुगर शरीर से तरल पदार्थ खींच लेता है, जिससे त्वचा सूखी और खुजलीदार हो सकती है. छोटे ब्लड वेसल्स की क्षति के कारण पसीना और तेल का रिसाव कम हो जाता है. Frontiers in Medicine (2025) में भी इसे डायबिटीज़ से जुड़ा संकेत बताया गया है.
नेक्रोबायोसिस लिपॉइडिका
यह रेयर लेकिन गंभीर संकेत है, जिसमें पिंडलियों पर चमकदार लाल-भूरे या पीले धब्बे बन सकते हैं. त्वचा पतली होकर नसें दिखाई दे सकती हैं. International Journal of Molecular Sciences के अनुसार, यह लंबे समय से डायबिटीज से जूझ रहे मरीजों में ज्यादा दिखता है.
विटिलिगो
इस स्थिति में त्वचा के कुछ हिस्सों का रंग उड़कर सफेद हो जाता है. टाइप-1 डायबिटीज़ एक ऑटोइम्यून बीमारी है, इसलिए विटिलिगो ऐसे मरीजों में ज्यादा देखा जाता है. टाइप-2 में यह मेटाबॉलिक तनाव और इम्यून गड़बड़ी से जुड़ा हो सकता है. Cutaneous Manifestations in Diabetes और ICMR भी डायबिटीज कंट्रोल में स्किन जांच को जरूरी मानते हैं.
&amp;nbsp;इसे भी पढ़ें: Mobile Radiation Cancer Risk: सिरहाने मोबाइल रखकर सोने से क्या हो जाता है कैंसर, डॉक्टर से जानें कितनी सच है यह बात?
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 15 Feb 2026 14:30:16 +0530</pubDate>
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        <title>When to Replace Underwear: कितने दिन बाद फेंक देना चाहिए पुराना अंडरवियर, कब बन जाता है यह बीमारी की वजह?</title>
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        <description><![CDATA[ How Often Should You Replace Underwear:कुछ चीजें ऐसी होती हैं, जो हमारे शरीर के संपर्क में हमेशा होती हैं, उनमें एक है अंडरगारमेंट्स. बाहरी कपड़ों के उल्टा, इनरवियर सीधे पसीने, बैक्टीरिया, डेड बॉडी सेल्स और शरीर की गंध के संपर्क में रहते हैं. अधिकतर लोग इन्हें नियमित रूप से धोते तो हैं, लेकिन एक्सपर्ट का का कहना है कि सिर्फ धोना ही काफी नहीं है. चलिए आपको बताते हैं कि कितने महीने या साल बाद आपको अपना अंडरवियर बदल लेना चाहिए.&amp;nbsp;
एक्सपर्ट के अनुसार, अंडरगारमेंट्स की भी एक तय उम्र होती है. भले ही वे ऊपर से साफ और ठीक दिखें, लेकिन उन्हें हमेशा के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. आमतौर पर सलाह दी जाती है कि हर 6 से 12 महीने में इनरवियर बदल देना चाहिए. समय के साथ कपड़े के रेशों में ऐसे बदलाव आने लगते हैं जो बैक्टीरिया और फंगस के पनपने के लिए अनुकूल वातावरण बना देते हैं.
क्या होते हैं नुकसान?
पुराने या ठीक से साफ न किए गए अंडरगारमेंट्स पहनने से त्वचा में जलन, खुजली, इंफेक्शन और अन्य हाइजीन संबंधी समस्याएं हो सकती हैं. समय-समय पर बदलना भी काफी अहम है. एम्स , हार्वर्ड और स्टैनफोर्ड से प्रशिक्षित एक प्रसिद्ध गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट और लिवर एक्सपर्ट डॉ. सौरभ सेठी &amp;nbsp;के अनुसार, हर एक इस्तेमाल के बाद इसको साफ करना जरूरी होता है.
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A post shared by Saurabh Sethi MD MPH | Gastroenterologist (@doctor.sethi)





बदलना क्यों जरूरी?
दरअसल, लगातार इस्तेमाल और धुलाई के कारण कपड़े के रेशों में छोटे छेद बनने लगते हैं. इन बेहद छोटे छेदों में बैक्टीरिया, फंगस, डेड स्किन और शारीरिक द्रव फंस सकते हैं, जिन्हें सामान्य धुलाई से पूरी तरह हटाना संभव नहीं होता. यही जमा गंदगी दुर्गंध और त्वचा संक्रमण का कारण बन सकती है. कुछ संकेत ऐसे भी होते हैं जो बताते हैं कि अब अंडरगारमेंट बदलने का समय आ गया है. यदि इलास्टिक ढीली हो जाए, कपड़ा पतला पड़ने लगे या छोटे-छोटे छेद दिखने लगें, तो समझिए उसे बदलना चाहिए. जिद्दी दाग, जो धुलने के बाद भी बने रहें, या धोने के बाद भी आने वाली बदबू भी इस बात का संकेत है कि कपड़ा अपनी क्वालिटी खो चुका है. रंग फीका पड़ना भी फैब्रिक के खराब होने का इशारा है.
एक्सपर्ट क्या कहते हैं?
अमेरिकन एकेडमी ऑफ डर्मेटोलॉजी की सलाह है कि अंडरगारमेंट्स रोज बदले जाएं, खासकर तब जब अधिक पसीना आता हो या मौसम गर्म हो. वहीं मायो क्लीनिक भी कहता है कि गर्म, नम या धूलभरे माहौल में इनरवियर दिन में एक से ज्यादा बार बदलना पड़ सकता है. शरीर की गर्मी, नमी और रगड़ माइक्रोबियल ग्रोथ के लिए अनुकूल माहौल बनाते हैं, जिससे इंफेक्शन का खतरा बढ़ सकता है।
फैब्रिक का चुनाव भी महत्वपूर्ण है. रिसर्च बताते हैं कि कॉटन जैसे प्राकृतिक और सांस लेने वाले कपड़े त्वचा के लिए बेहतर होते हैं. ये नमी को सोखते हैं और हवा का फ्लो बनाए रखते हैं, जिससे यीस्ट और बैक्टीरियल इंफेक्शन का खतरा कम होता है. इसके विपरीत, सिंथेटिक कपड़े नमी को फंसा सकते हैं और जलन या एलर्जी की संभावना बढ़ा सकते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 15 Feb 2026 10:30:16 +0530</pubDate>
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        <title>आयुष्मान कार्ड  से एक साल में कितनी बार करा सकते हैं इलाज, जानें क्या होते हैं नियम?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/आयुष्मान-कार्ड-से-एक-साल-में-कितनी-बार-करा-सकते-हैं-इलाज-जानें-क्या-होते-हैं-नियम</link>
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        <description><![CDATA[ गरीब और जरूरतमंद परिवारों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं देने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना शुरू की है. यह योजना दुनिया की सबसे बड़ी सरकारी स्वास्थ्य बीमा योजना में गिनी जाती है. इसके तहत पात्र परिवारों को सालाना 5 लाख रुपये तक का कैशलेस इलाज मिलता है. जिससे गंभीर बीमारियों के इलाज का आर्थिक बोझ काफी हद तक कम हो जाता है. ऐसे में चलिए अब आपको बताते हैं कि आयुष्मान कार्ड से एक साल में कितनी बार इलाज करा सकते हैं और इसके नियम क्या होते हैं.&amp;nbsp;
1 साल में कितनी बार कर सकते हैं इलाज?
आयुष्मान कार्ड से इलाज कराने की संख्या पर कोई तय सीमा नहीं है. यानी लाभार्थी जरूरत पड़ने पर साल में कई बार हाॅस्पिटल में भर्ती होकर इलाज करा सकता है. हालांकि एक शर्त यह है कि पूरे परिवार का कुल इलाज खर्च 1 साल में 5 लाख रुपये से ज्यादा नहीं होना चाहिए. यह 5 लाख रुपये की राशि परिवार फ्लोटर आधार पर होती है. यानी परिवार के एक या सभी सदस्य मिलकर इस सीमा तक का इलाज करा सकते हैं. अगर किसी 5 साल 5 लाख रुपये की पूरी राशि खर्च हो जाती है, तो उस साल आगे मुफ्त इलाज नहीं मिलेगा. इसके अलावा अगली बार अगली पॉलिसी वर्ष की शुरुआत में लिमिट अपने आप फिर से 5 लाख रुपये हो जाती है.&amp;nbsp;
किन खर्चों का मिलता है फायदा?&amp;nbsp;
योजना के तहत हॉस्पिटल में भर्ती होने से पहले और बाद के कुछ दिनों का खर्च भी कवर होता है. इसमें जांच, दवाइयां, ऑपरेशन, आईसीयू इम्प्लांट, भोजन और 15 दिन तक पोस्ट हॉस्पिटल फॉलोअप शामिल है. वहीं पहले से मौजूद बीमारियां भी पहले दिन से कवर होती है. इस योजना के अंतर्गत सैकड़ों पैकेज और हजारों मेडिकल प्रक्रियाएं शामिल है, जिनका इलाज लिस्ट के अनुसार सरकारी और प्राइवेट हॉस्पिटल में कराया जा सकता है.&amp;nbsp;
कार्ड से कहां मिलेगा इलाज?
आयुष्मान कार्ड से इलाज केवल उन्हीं हॉस्पिटल में संभव है जो योजना के तहत रजिस्टर्ड है. इसमें देशभर के सरकारी हॉस्पिटल &amp;nbsp;के साथ कई प्राइवेट हॉस्पिटल &amp;nbsp;भी शामिल है. वहीं लाभार्थी ऑफिशल वेबसाइट पर जाकर अपने राज्य और जिले के अनुसार पंजीकृत हॉस्पिटल की लिस्ट देख सकते हैं. हॉस्पिटल &amp;nbsp;पहुंचने पर पहचान सत्यापन के बाद मरीज को भर्ती किया जाता है और पूरा इलाज कैशलेस तरीके से किया जाता है.&amp;nbsp;
किन बातों का रखें ध्यान?&amp;nbsp;

आयुष्मान कार्ड से इलाज कराने से पहले ध्यान रखें कि आपका कार्ड सक्रिय होना चाहिए.
इसके अलावा आधार आधारित ई केवाईसी पूरी होनी चाहिए.
वहीं जिस बीमारी का इलाज करना है, वह योजना के पैकेज में शामिल होनी चाहिए. &amp;nbsp;
इस योजना से इलाज के पहले ध्यान रखें कि आप जिस हॉस्पिटल में इलाज कराने जा रहे हैं वह इस योजना की लिस्ट में शामिल हो.&amp;nbsp;

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 14 Feb 2026 22:30:15 +0530</pubDate>
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        <title>मेटाबॉलिज्म के लिए बेस्ट दवा हैं मसल्स, डॉक्टर से समझें क्यों जरूरी होती है स्ट्रेंथ ट्रेनिंग</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/मेटाबॉलिज्म-के-लिए-बेस्ट-दवा-हैं-मसल्स-डॉक्टर-से-समझें-क्यों-जरूरी-होती-है-स्ट्रेंथ-ट्रेनिंग</link>
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        <description><![CDATA[ बहुत से लोग समझते हैं कि मसल्स बनाना सिर्फ बॉडीबिल्डर्स या जिम जाने वालों के लिए जरूरी है, लेकिन सच्चाई यह है कि मजबूत मांसपेशियां हर उम्र के व्यक्ति के लिए सेहत की बुनियाद होती हैं. मसल्स सिर्फ शरीर को आकर्षक नहीं बनातीं, बल्कि यह हमारे शरीर के मेटाबॉलिज्म, ब्लड शुगर कंट्रोल, हड्डियों की मजबूती और बढ़ती उम्र में सक्रिय रहने की क्षमता से भी सीधे जुड़ी होती हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर आप लंबे समय तक स्वस्थ, एक्टिव और आत्मनिर्भर रहना चाहते हैं, तो स्ट्रेंथ ट्रेनिंग को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाना बेहद जरूरी है. AIIMS, Harvard University और Stanford University से प्रशिक्षित गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट Dr. Saurabh Sethi के अनुसार, मांसपेशियां मेटाबॉलिज्म के लिए दवा की तरह काम करती हैं, लेकिन लोग इसकी असली ताकत को समझ नहीं पाते, तो आइए डॉक्टर से समझें क्यों स्ट्रेंथ ट्रेनिंग जरूरी होती है. &amp;nbsp;
क्यों स्ट्रेंथ ट्रेनिंग जरूरी होती है
1. बेहतर इंसुलिन सेंसिटिविटी और ब्लड शुगर कंट्रोल - &amp;nbsp;हम जो भी खाना खाते हैं, वह शरीर में जाकर ग्लूकोज (शुगर) में बदलता है. इस ग्लूकोज को एनर्जी में बदलने के लिए इंसुलिन हार्मोन काम करता है. मांसपेशियां शरीर में ग्लूकोज को स्टोर करने का सबसे बड़ा स्थान होती हैं. जब शरीर में पर्याप्त मसल्स होती हैं, तो वे अतिरिक्त शुगर को अपने अंदर जमा कर लेती हैं. इससे ब्लड शुगर अचानक नहीं बढ़ता और टाइप 2 डायबिटीज का खतरा कम होता है. ज्यादा मसल्स का मतलब बेहतर इंसुलिन संवेदनशीलता और स्वस्थ मेटाबॉलिज्म है.&amp;nbsp;
2. ग्लूकोज स्टोर करने की क्षमता - अनुमान के अनुसार, शरीर की मांसपेशियां लगभग 400 ग्राम तक ग्लूकोज स्टोर कर सकती हैं. अगर मसल्स कम हों, तो यह अतिरिक्त शुगर शरीर में जमा होकर समस्या पैदा कर सकती है. इसलिए जिन लोगों की मसल्स अच्छी होती हैं, उनका ब्लड शुगर ज्यादा स्थिर रहता है.&amp;nbsp;
3. बढ़ती उम्र में सहारा - उम्र बढ़ने के साथ शरीर की मांसपेशियां धीरे-धीरे कम होने लगती हैं. इसे सामान्य उम्र बढ़ने की प्रक्रिया माना जाता है. लेकिन अगर समय रहते स्ट्रेंथ ट्रेनिंग की जाए, तो इस गिरावट को रोका जा सकता है. मजबूत मांसपेशियां चलने-फिरने में मदद करती हैं, संतुलन बनाए रखती हैं, गिरने और चोट लगने का खतरा कम करती हैं, जोड़ों पर दबाव कम करती हैं, इससे व्यक्ति ज्यादा समय तक आत्मनिर्भर और सक्रिय रह सकता है.&amp;nbsp;
4. हड्डियों को बनाती हैं मजबूत - जब आप वेट उठाते हैं या रेजिस्टेंस एक्सरसाइज करते हैं, तो मांसपेशियां हड्डियों पर खिंचाव डालती हैं. यह खिंचाव हड्डियों को मजबूत बनने का संकेत देता है. नियमित स्ट्रेंथ ट्रेनिंग हड्डियों का डेंसिटी बढ़ाती है, ऑस्टियोपोरोसिस का खतरा कम करती है और फ्रैक्चर की संभावना घटाती है.&amp;nbsp;
5. &amp;nbsp;ज्यादा कैलोरी बर्न - फैट शरीर में एनर्जी जमा करती है, जबकि मांसपेशियां एनर्जी का यूज करती हैं. मसल्स आराम की स्थिति में भी कैलोरी जलाती रहती हैं यानी अगर आपके शरीर में मसल्स ज्यादा हैं, तो आप बिना कुछ किए भी ज्यादा कैलोरी बर्न करते हैं. &amp;nbsp;इससे मेटाबॉलिज्म तेज होता है, वजन कंट्रोल में रहता है और फैट बढ़ने की संभावना कम होती है.&amp;nbsp;
मांसपेशियां बढ़ाने के आसान तरीके
1. स्ट्रेंथ ट्रेनिंग को बनाएं आदत - स्ट्रेंथ ट्रेनिंग का मतलब सिर्फ भारी वजन उठाना नहीं है. आप डंबल, मशीन, रेजिस्टेंस बैंड या अपने शरीर के वजन से भी एक्सरसाइज कर सकते हैं. जब आप वेट ट्रेनिंग करते हैं, तो मांसपेशियों में हल्की सूक्ष्म टूट-फूट होती है. शरीर इनको रिपेयर करता है और उन्हें पहले से ज्यादा मजबूत बनाता है. इसी प्रक्रिया से मसल्स का आकार बढ़ता है. सप्ताह में कम से कम 3&amp;ndash;4 दिन स्ट्रेंथ ट्रेनिंग करना फायदेमंद है.&amp;nbsp;
2. सही मात्रा में प्रोटीन लें - मांसपेशियों की मरम्मत और वृद्धि के लिए प्रोटीन जरूरी है. आमतौर पर सलाह दी जाती है कि हर व्यक्ति अपने वजन के प्रति किलोग्राम पर 1.6 से 2.2 ग्राम प्रोटीन ले. अच्छे प्रोटीन स्रोत अंडे, दालें, पनीर और दूध, चिकन और मछली, सोया उत्पाद हैं.
3. कैलोरी थोड़ा ज्यादा लें - अगर आप मसल्स बढ़ाना चाहते हैं, तो आपको जितनी कैलोरी खर्च होती है उससे थोड़ी ज्यादा कैलोरी लेनी होगी. लेकिन ध्यान रखें जंक फूड नहीं, बल्कि पोषक तत्वों से भरपूर डाइट चुनें.&amp;nbsp;
4. पर्याप्त नींद और आराम - मांसपेशियां जिम में नहीं, बल्कि आराम के समय बढ़ती हैं. रोज 7&amp;ndash;9 घंटे की नींद लें और एक ही मांसपेशी समूह को दोबारा ट्रेन करने से पहले 48&amp;ndash;72 घंटे का आराम दें.&amp;nbsp;
ये भी पढ़ें - &amp;nbsp;2050 तक चार में से एक शख्स के कान में होंगी दिक्कतें, डरा देगी WHO की यह रिपोर्ट
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 14 Feb 2026 14:30:19 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>किन 2 मेन फेज में सबसे तेजी से बढ़ती है उम्र? स्टडी में सामने आई चौंकाने वाली बात</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/किन-2-मेन-फेज-में-सबसे-तेजी-से-बढ़ती-है-उम्र-स्टडी-में-सामने-आई-चौंकाने-वाली-बात</link>
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        <description><![CDATA[ हम अक्सर सोचते हैं कि उम्र बढ़ना एक सीधी और धीमी प्रक्रिया है. हर साल थोड़ा-थोड़ा बदलाव, बालों का सफेद होना, स्किन पर झुर्रियां, एनर्जी में कमी, लेकिन क्या हो अगर सच्चाई इससे अलग हो और क्या हो अगर शरीर अचानक कुछ खास उम्र में तेजी से बदलने लगे.&amp;nbsp;2024 में प्रकाशित एक जरूरी शोध ने इसी धारणा को चुनौती दी. यह अध्ययन अमेरिका के प्रसिद्ध शोध संस्थान Stanford University में किया गया था. इस रिसर्च का नेतृत्व आनुवंशिकीविद् Michael Snyder ने किया. उनके अनुसार, इंसान की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया पूरी तरह से सीधी रेखा की तरह नहीं चलती, बल्कि दो खास चरणों में अचानक तेज बदलाव होते हैं. तो आइए जानते हैं कि किन 2 मेन फेज में सबसे तेजी से उम्र बढ़ती है.&amp;nbsp;&amp;nbsp;किन 2 मेन फेज में सबसे तेजी से उम्र बढ़ती है&amp;nbsp;शोध के मुताबिक, इंसान के शरीर में उम्र से जुड़े बड़े और तेज बदलाव मुख्य रूप से दो चरणों में दिखाई देते हैं. &amp;nbsp;जिसमें पहला चरण लगभग 44 वर्ष की उम्र के आसपास और दूसरा चरण लगभग 60 वर्ष की उम्र के आसपास होता है. इन दोनों उम्र के आसपास शरीर में कई जैविक (मॉलिक्यूलर) बदलाव अचानक बढ़ जाते हैं.&amp;nbsp;&amp;nbsp;यह रिसर्च कैसे की गई?
वैज्ञानिकों ने 25 से 70 वर्ष की आयु के 108 वयस्क लोगों का कई वर्षों तक अध्ययन किया. हर कुछ महीनों में उनसे खून, स्किन, आंत, नाक और मुंह से जुड़े जैविक नमूने लिए गए. कुल मिलाकर 1,35,000 से ज्यादा जैविक विशेषताओं (जैसे RNA, प्रोटीन, लिपिड और माइक्रोबायोम) का विश्लेषण किया गया. जिसमें 246 अरब से ज्यादा डेटा बिंदुओं की जांच की गई. इतने बड़े डेटा विश्लेषण के बाद वैज्ञानिकों ने पाया कि लगभग 81 प्रतिशत अणुओं में बदलाव इन दो उम्र चरणों में सबसे ज्यादा दिखाई दिए.&amp;nbsp;
44 साल के आसपास क्या बदलता है?
मध्य 40 की उम्र में शरीर में कई क्षेत्रों में तेज बदलाव देखे गए. जैसे लिपिड (फैट) का मेटाबॉलिज्म, कैफीन और अल्कोहल को पचाने की क्षमता, हार्ट डिजीज का जोखिम बढ़ना, स्किन में ढीलापन और मांसपेशियों की मजबूती कम होना है. दिलचस्प बात यह है कि आमतौर पर महिलाओं में इसी उम्र में मेनोपॉज शुरू होती है. लेकिन शोधकर्ताओं ने पाया कि पुरुषों में भी इसी उम्र में बड़े बदलाव होते हैं.इसका मतलब है कि सिर्फ हार्मोनल बदलाव ही कारण नहीं हैं. इसके पीछे और भी जैविक कारण हो सकते हैं.&amp;nbsp;
60 साल के आसपास क्या होता है?
60 की शुरुआत में शरीर में दूसरा बड़ा बदलाव आता है. इस समय कार्बोहाइड्रेट मेटाबॉलिज्म प्रभावित होता है, कैफीन प्रोसेसिंग में बदलाव, हार्ट डिजीज का खतरा और बढ़ता है, इम्यून सिस्टम कमजोर होता है, किडनी फंक्शन में गिरावट, स्किन और मांसपेशियों में और कमजोरी है. यानी इस उम्र में शरीर की मरम्मत और सुरक्षा क्षमता स्पष्ट रूप से कम होने लगती है. कुछ हद तक शोधकर्ताओं ने पाया कि अल्जाइमर और हार्ट डिजीज जैसी बीमारियों का खतरा धीरे-धीरे नहीं, बल्कि एक निश्चित उम्र के बाद तेजी से बढ़ता है. इससे यह समझ आता है कि शरीर के अंदर जैविक स्तर पर अचानक बदलाव बीमारी के जोखिम को भी अचानक बढ़ा सकते हैं.&amp;nbsp;
ये भी पढ़ें - &amp;nbsp;Heart Disease Warning Signs: बीपी से लेकर सीढ़ियां चढ़ने तक, ये 4 तरीके बताएंगे कैसा है आपके दिल और आर्टरीज का हाल
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 14 Feb 2026 14:30:18 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Bhramari Pranayama: तनाव से चाहिए तुरंत मुक्ति? भ्रामरी प्राणायाम की एक &amp;apos;गुनगुनाहट&amp;apos; शांत कर देगी मन का सारा शोर</title>
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        <description><![CDATA[ भ्रामरी प्राणायाम एक जाना-माना योग अभ्यास है, जिसमें मधुमक्खी जैसी गुनगुनाहट की आवाज़ के जरिये मन को शांत किया जाता है. आमतौर पर लोग इसे सिर्फ सांस लेकर गुनगुनाने और छोड़ने तक सीमित समझते हैं, लेकिन असल में भ्रामरी इससे कहीं ज्यादा व्यापक अभ्यास है. इसमें सही बॉडी पोस्चर, सांस पर नियंत्रण, हाथों की स्थिति और पूरी एकाग्रता का अहम रोल होता है. दुर्भाग्य से, भ्रामरी को अक्सर अधूरे तरीके से सिखाया जाता है, जबकि शरीर की सही मुद्रा सांस को दिशा देने में मदद करती है और हाथों की स्थिति नर्वस सिस्टम पर असर डालती है. ये सभी पहलू मिलकर दिमाग और नर्वस सिस्टम पर इसके प्रभाव को गहराई देते हैं.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
योग और ध्यान का लंबे समय से अभ्यास कर चुके योग एक्सपर्ट हिमालयन सिद्धा अक्षर ने Health Shots से बातचीत में बताया कि भ्रामरी सिर्फ रिलैक्सेशन का तरीका नहीं है, बल्कि यह हमारे मूड और ऊर्जा को भी बदल सकती है. उनका कहना है कि जब उन्होंने पहली बार भ्रामरी की, तो यह बिखरे हुए विचारों को शांत कर वर्तमान क्षण में ले आई. यह अभ्यास अंदरूनी बेचैनी को कम कर मन को स्थिर करता है.
 नर्वस सिस्टम के साथ इंटरैक्ट करती है
भ्रामरी प्राणायाम में ध्वनि को जीवन का मूल तत्व माना गया है. इतिहास गवाह है कि कई संस्कृतियों ने ध्वनि को एक ऐसी शक्ति माना है, जो सूक्ष्म कणों से लेकर पूरे ब्रह्मांड तक को आकार देती है. सिद्ध परंपरा में ब्रह्मांड को अलग-अलग फ्रीक्वेंसीज़ की एक मुश्किल लय माना जाता है, जहां पदार्थ, ऊर्जा और चेतना व्यवस्थित कंपन से जन्म लेते हैं. आधुनिक विज्ञान जहां ध्वनि को सीमित नजरिए से देखता है, वहीं भ्रामरी इसे शरीर पर असर डालने वाला एक वास्तविक और मापने योग्य तत्व मानती है. इस अभ्यास में अपनी ही सांस से पैदा होने वाली कंपन शरीर के भीतर फैलती है और नर्वस सिस्टम के साथ इंटरैक्ट करती है.
सेहत के लिए फायदेमंद
Is Bhramari Pranayama Good For Stress: गुनगुनाने की यह प्रक्रिया सेहत के लिए भी फायदेमंद मानी जाती है. सिद्धों ने यह समझा कि कंपन हमारे टिश्यूज़, शरीर के तरल प्रवाह और नर्वस सिस्टम को प्रभावित करती है. जब आप भ्रामरी करते हैं, तो यह कंपन खोपड़ी और साइनस के जरिये फैलती है, जिससे आसपास के टिश्यूज़ को फायदा मिलता है. हालिया रिसर्च बताती है कि लयबद्ध कंपन दिमाग के रास्तों को सिंक्रोनाइज़ कर सकती है, वेगल टोन को बेहतर बनाती है और पैरासिंपैथेटिक नर्वस सिस्टम को एक्टिव करती है, जिसे शरीर का &quot;रेस्ट एंड डाइजेस्ट&quot; मोड कहा जाता है. इससे हार्ट रेट स्थिर होती है और स्ट्रेस हार्मोन का स्तर घटता है.
भ्रामरी कैसे करें?
किसी शांत जगह पर आराम से बैठें, रीढ़ सीधी रखें और आंखें बंद करें. नाक से गहरी सांस लें और सांस छोड़ते समय होंठ बंद रखते हुए मधुमक्खी जैसी गुनगुनाहट करें. कंपन को सिर और चेहरे में महसूस करें. इसे 6 से 10 बार दोहराएं और अंत में कुछ देर शांत बैठकर अनुभव को महसूस करें. नियमित अभ्यास से तनाव में कमी, मन की स्पष्टता और भावनात्मक संतुलन बेहतर होता है. जैसा कि एक्सपर्ट&amp;nbsp;कहते हैं, भ्रामरी सिर्फ बाहर के शोर को शांत नहीं करती, बल्कि अंदर एक स्थिर और संतुलित अवस्था बनाने में मदद करती है.
ये भी पढ़ें-Blood Cancer: लगातार थकान और बार-बार बुखार आना सामान्य नहीं, हो सकते हैं इस कैंसर के लक्षण
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 13 Feb 2026 18:30:16 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>क्या दवाओं से ज्यादा असरदार होंगे न्यूट्रास्युटिकल्स? प्रिवेंटिव हेल्थकेयर का नया ट्रेंड समझें</title>
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        <description><![CDATA[ आजकल की लाइफस्टाइल में सेहत के प्रति भी लोगों का नजरिया बदल रहा है. अब लोग बीमार होने के बाद अस्पताल जाने की जगह बीमार न पड़ने पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं. इसी सोच ने भारत में न्यूट्रास्युटिकल्स (Nutraceuticals) के बाजार को जन्म दिया है, जो काफी तेजी से बढ़ रहा है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या न्यूट्रास्युटिकल्स दवाओं से ज्यादा कारगर साबित होंगे? आइए आपको प्रिवेंटिव हेल्थकेयर के नए ट्रेंड से रूबरू कराते हैं.&amp;nbsp;
क्या होते हैं न्यूट्रास्युटिकल प्रॉडक्ट्स?
न्यूट्रास्युटिकल ऐसे प्रॉडक्ट्स होते हैं, जो डाइट के साथ-साथ औषधीय लाभ भी देते हैं, जैसे विटामिन सप्लीमेंट्स, प्रोबायोटिक्स और हर्बल प्रॉडक्ट्स आदि. विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का न्यूट्रास्युटिकल उद्योग विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को पूरा करने में अहम भूमिका निभाएगा. मुंबई के जियो वर्ल्ड कन्वेंशन सेंटर में आयोजित वीटाफूड्स इंडिया 2026 के चौथे एडिशन में एफएसएसएआई (FSSAI) की रीजनल डायरेक्टर प्रीति चौधरी ने बताया कि भविष्य में इस क्षेत्र की क्षमता फार्मास्यूटिकल्स (दवा उद्योग) से कम से कम दस गुना ज्याद हो सकती है. इसका कारण यह है कि दवाएं आमतौर पर बीमारी के बाद ली जाती हैं, जबकि न्यूट्रास्युटिकल का इस्तेमाल रोजाना सेहत को बनाए रखने और बीमारियों को रोकने के लिए किया जाता है.
बदलती आबादी और बढ़ती मांग
इंफॉर्मा मार्केट्स इन इंडिया के एमडी योगेश मुद्रास के मुताबिक, भारत में इस ट्रेंड के पीछे दो बड़े कारण हैं. इनमें पहला बुजुर्गों की बढ़ती संख्या और दूसरा युवाओं का बदलता लाइफस्टाइल है. अनुमान है कि 2050 तक भारत में बुजुर्गों की आबादी 347 मिलियन तक पहुंच जाएगी, जिन्हें एनर्जी और बेहतर पाचन के लिए खास पोषण की जरूरत होगी. वहीं, 25 से 45 वर्ष के युवा अब सप्लीमेंट्स को अपने डेली रूटीन का हिस्सा बना रहे हैं. मध्यम वर्ग के लगभग 35% लोग अब अपनी डेली वेलनेस (रोजमर्रा की सेहत) पर खर्च करने को तैयार हैं.
आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान का मेल
हेल्थ फूड्स एंड डायटरी सप्लीमेंट्स असोसिएशन के महासचिव कौशिक देसाई का कहना है कि भारत के लिए सबसे बड़ी ताकत उसकी जैव विविधता और आयुर्वेद की विरासत है. विशेषज्ञों का कहना है कि आयुर्वेदिक उत्पादों का बाजार 18.4% की तेज गति से बढ़ रहा है और 2030 तक यह 22.37 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच सकता है. आजकल के उपभोक्ता अब केवल दवा नहीं चाहते, बल्कि वे क्लीन-लेबल (बिना मिलावट वाले शुद्ध प्रॉडक्ट्स) और पौधों पर आधारित (plant-based) ऑप्शंस तलाश रहे हैं. अब पोषण केवल कड़वी गोलियों तक सीमित नहीं है. बाजार में अब स्वादिष्ट गमीज (Gummies), खास पेय पदार्थ और व्यक्तिगत पोषण (personalized nutrition) जैसे नए ऑप्शंस युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय हो रहे हैं.
सरकार का सहयोग और भविष्य की राह
भारत सरकार भी इस क्षेत्र की गंभीरता को समझते हुए बड़ा निवेश कर रही है. बायोफार्मास्युटिकल उद्योग के लिए 10,000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, जिन्हें अगले पांच वर्षों (2026-2031) में खर्च किया जाएगा. इससे कंपनियों को नए शोध और उत्पादन क्षमता बढ़ाने में मदद मिलेगी. भारत अब न केवल घरेलू मांग पूरी कर रहा है, बल्कि यूके, यूएसए और यूएई जैसे बड़े देशों के साथ व्यापार समझौतों के जरिए वैश्विक स्तर पर भी अपनी धाक जमा रहा है.
ये भी पढ़ें: अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड लोगों को बना रहा शुगर का मरीज, नेपाल में शुरू हुई रिसर्च बनेगी गेम-चेंजर
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 13 Feb 2026 14:30:18 +0530</pubDate>
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        <title>Kiss Day 2026: क्या एक&amp;दूसरे को किस करने से कम हो जाता है स्ट्रेस, जानें कैसे काम करता है यह?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/kiss-day-2026-क्या-एक-दूसरे-को-किस-करने-से-कम-हो-जाता-है-स्ट्रेस-जानें-कैसे-काम-करता-है-यह</link>
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        <description><![CDATA[ फरवरी का महीना आते ही प्यार का मौसम भी शुरू हो जाता है. कपल्स पूरे हफ्ते को बड़े उत्साह के साथ सेलिब्रेट करते हैं, जिसे हम वैलेंटाइन वीक के नाम से जानते हैं. इस हफ्ते का हर दिन अपने आप में खास होता है, लेकिन 13 फरवरी को मनाया जाने वाला Kiss Day सबसे ज्यादा रोमांटिक माना जाता है. &amp;nbsp;इस दिन कपल्स एक-दूसरे को किस करके अपने प्यार का इजहार करते हैं और रिश्ते को और भी गहरा बनाते हैं.
अक्सर लोग किस को सिर्फ प्यार जताने का तरीका मानते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि किस करना स्ट्रेस से लेकर हमारे दिल, दिमाग और शरीर को भी कई तरह के फायदे देता है. &amp;nbsp;यह बात सुनने में थोड़ी अलग लग सकती है, लेकिन कई रिसर्च में पाया गया है कि एक सच्चा और प्यार भरा किस तनाव कम करने से लेकर दिल की सेहत सुधारने तक में मददगार हो सकता है. तो आइए जानते हैं कि क्या एक-दूसरे को किस करने से स्ट्रेस कम हो जाता है और यह कैसे काम करता है?
क्या सच में किस करने से स्ट्रेस कम होता है?
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लगभग हर व्यक्ति किसी न किसी तरह के तनाव से जूझ रहा है. काम का दबाव, जिम्मेदारियां और निजी जीवन की परेशानियां दिमाग पर असर डालती हैं. ऐसे में एक प्यारा सा किस भी तनाव कम करने में मदद कर सकता है. जब हम अपने पार्टनर को किस करते हैं, तो हमारे दिमाग में कुछ खास हार्मोन रिलीज होते हैं. &amp;nbsp;जैसे ऑक्सीटोसिन, इसे लव हार्मोन भी कहा जाता है. यह अपनापन और जुड़ाव बढ़ाता है. दूसरा डोपामाइन, यह खुशी और उत्साह का एहसास कराता है औप तीसरा सेरोटोनिन, यह मूड को बेहतर बनाता है. इन हार्मोन्स के बढ़ने से शरीर में मौजूद स्ट्रेस हार्मोन कोर्टिसोल का स्तर कम होने लगता है यानी अगर आपका दिन थकान और तनाव से भरा रहा हो, तो एक सच्चा और प्यार भरा किस आपके मन को शांत कर सकता है
यह कैसे काम करता है?
कुछ स्टडीज के अनुसार, किस करने से ब्लड वेसल्स थोड़ी फैल जाती हैं, जिससे ब्लड फ्लो बेहतर होता है. इससे ब्लड प्रेशर नियंत्रित रखने में मदद मिलती है, उनमें दिल से जुड़ी समस्याओं का खतरा थोड़ा कम देखा गया है. साथ ही सिरदर्द में भी राहत मिल सकती है. किस करने से दिमाग को सिग्नल मिलते हैं. दिमाग में सिग्नल को पाकर रिवॉर्ड सिस्टम को सक्रिय कर देता है, जिससे हमें अच्छा महसूस होता है. लव और हैप्पी हार्मोन रिलीज होते हैं, साथ ही जब खुशी वाले हार्मोन बढ़ते हैं, तो शरीर में मौजूद तनाव वाला हार्मोन कोर्टिसोल कम होने लगता है. कोर्टिसोल ज्यादा होने पर तनाव, चिड़चिड़ापन और थकान महसूस होती है. लेकिन किस के दौरान इसका स्तर घटता है, जिससे मन हल्का और शांत हो जाता है.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ें: &amp;nbsp;Intuition Thoughts: क्या होता है इनट्यूशन थॉट, हमारी जिंदगी को बदलने में ये कितने मददगार?
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 13 Feb 2026 14:30:16 +0530</pubDate>
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        <title>Empty Stomach Fruit Side Effects: खाली पेट कभी न खाना ये फल, हो सकते हैं खतरनाक</title>
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        <description><![CDATA[ Fruits To Avoid On An Empty Stomach: फल सेहत के लिए बेहद फायदेमंद माने जाते हैं और सुबह के आहार में इन्हें शामिल करना अच्छा माना जाता है. विशेषज्ञ भी कहते हैं कि दिन की शुरुआत फलों से करने पर शरीर को जरूरी पोषण मिलता है और ऊर्जा बनी रहती है. लेकिन हर फल खाली पेट खाना सही नहीं होता. कुछ फल ऐसे हैं जो सुबह-सुबह बिना कुछ खाए खाने पर परेशानी बढ़ा सकते हैं. चलिए आपको बताते हैं कि कौन से फल सर्दियों में खाने से बचने चाहिए.
संतरा, नींबू, ग्रेपफ्रूट
सर्दियों के मौसम में संतरा, नींबू, ग्रेपफ्रूट जैसे खट्टे फल आसानी से मिल जाते हैं. इनमें विटामिन C भरपूर मात्रा में होता है और सीमित मात्रा में खाना फायदेमंद भी है. लेकिन इन्हें सुबह खाली पेट खाने से पेट की अंदरूनी परत में जलन हो सकती है, खासकर उन लोगों को जिन्हें गैस्ट्राइटिस या एसिड रिफ्लक्स की शिकायत रहती है. इसलिए इनका सेवन कर भी रहे हैं, तो कोशिश करना चाहिए कि सीमित मात्रा में इनका सेवन किया जाए.&amp;nbsp;
सेब
सेब हर मौसम में उपलब्ध रहता है और &quot;रोज एक सेब डॉक्टर से दूर रखता है&quot; वाली कहावत भी मशहूर है. हालांकि लंबे समय तक खाली पेट रहने के बाद सेब खाना कुछ लोगों के लिए भारी पड़ सकता है. इसमें फाइबर और फ्रुक्टोज ज्यादा होता है, जिससे पेट फूलना, अपच या शुगर लेवल में अचानक उतार-चढ़ाव हो सकता है. इस लिए इसका सेवन सोच समझकर करन चाहिए.&amp;nbsp;
अंगूर
अंगूर भले ही मीठे लगते हों, लेकिन इनमें हल्की अम्लीयता और पर्याप्त फाइबर होता है. खाली पेट खाने पर ये ब्लड शुगर तेजी से बढ़ा सकते हैं, जिससे थोड़ी देर बाद फिर भूख और चिड़चिड़ापन महसूस हो सकता है. इसलिए अगर इसका सेवन करते समय भी ध्यान रखें.&amp;nbsp;
पपीता
पपीता आमतौर पर पाचन के लिए अच्छा माना जाता है, लेकिन लंबे फास्ट के बाद इसे खाना हर किसी के लिए सही नहीं है. जिन लोगों का पेट संवेदनशील है, उन्हें पपेन एंजाइम की वजह से पेट में असहजता या गैस की शिकायत हो सकती है.
तरबूज, खरबूजा और हनीड्यू
तरबूज, खरबूजा और हनीड्यू जैसे मीठे फल स्वादिष्ट जरूर हैं, लेकिन अधिक मात्रा में खाली पेट खाने से ब्लड शुगर तेजी से बढ़ सकती है. इनमें पानी की मात्रा ज्यादा होती है, जो पेट के एसिड संतुलन को भी प्रभावित कर सकती है.
केला 
केला भी लंबे समय तक खाली पेट रहने के बाद खाना ठीक नहीं माना जाता. इसमें पोटैशियम, मैग्नीशियम और शुगर की मात्रा अधिक होती है. खासकर दिल से जुड़ी समस्याओं वाले लोगों को सावधानी बरतनी चाहिए.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 12 Feb 2026 10:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Blood Pressure Monitoring: आपको पता है अपना बीपी नंबर? जानें घर पर ब्लड प्रेशर चेक करने का सही तरीका और एक्सपर्ट्स की राय</title>
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        <description><![CDATA[ How Often Should You Check Blood Pressure At Home: हाई ब्लड प्रेशर आज की सबसे गंभीर लेकिन रोकी जा सकने वाली स्वास्थ्य समस्याओं में से एक है. यही वजह है कि इसे हार्ट अटैक, स्ट्रोक, हार्ट फेल्योर, किडनी डिजीज और यहां तक कि डिमेंशिया का भी बड़ा कारण माना जाता है. एक्सपर्ट्स इसलिए बार-बार कहते हैं कि हर व्यक्ति को अपने &quot;बीपी नंबर&quot; जरूर पता होने चाहिए&#039;. अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के अनुसार, सामान्य तौर पर 120/80 mmHg को नॉर्मल ब्लड प्रेशर माना जाता है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि लगभग आधे एडल्ट का बीपी इससे ज्यादा रहता है और उन्हें इसका अंदाजा तक नहीं होता. इसी कारण घर पर नियमित ब्लड प्रेशर चेक करना सेहत की देखभाल का अहम हिस्सा बन गया है.
कितनी बार ब्लड प्रेशर चेक करना चाहिए?
Daniel W. Jones,अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के एमडी का कहना है कि जिन लोगों को पहले से हाई बीपी की समस्या है, उन्हें हफ्ते में कम से कम दो से तीन बार ब्लड प्रेशर मापना चाहिए. इसके साथ ही, इन रीडिंग्स को लिखकर या मोबाइल में रिकॉर्ड करना भी जरूरी है, अगर बार-बार रीडिंग 130/80 mmHg से ऊपर आ रही है, तो डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए. कुछ खास स्थितियों में डॉक्टर रोजाना बीपी चेक करने की सलाह भी दे सकते हैं.
घर पर मापा गया बीपी क्यों ज्यादा भरोसेमंद होता है?
डॉक्टरों का कहना है कि घर पर लिया गया ब्लड प्रेशर अक्सर ज्यादा सटीक होता है. कई लोगों का बीपी अस्पताल या क्लिनिक में घबराहट की वजह से बढ़ जाता है, जिसे &quot;व्हाइट कोट इफेक्ट&quot; कहा जाता है. घर पर शांत माहौल में ली गई रीडिंग्स शरीर की असली स्थिति को बेहतर तरीके से दिखाती हैं.
सही मशीन का चुनाव जरूरी
हर ब्लड प्रेशर मशीन भरोसेमंद नहीं होती. इसलिए एक्सपर्ट्स सलाह देते हैं कि मान्यता प्राप्त और जांची हुई मशीन का ही इस्तेमाल करें. नई मशीन लेने के बाद उसे कभी-कभी डॉक्टर के पास ले जाकर ऑफिस की मशीन से तुलना करवाना भी अच्छा होता है, ताकि रीडिंग में फर्क न हो.
कब तुरंत डॉक्टर के पास जाएं?
अगर ब्लड प्रेशर अचानक 180/120 mmHg या उससे ज्यादा पहुंच जाए, तो यह मेडिकल इमरजेंसी मानी जाती है. ऐसी स्थिति में सीने में दर्द, सांस लेने में दिक्कत, चक्कर या घबराहट जैसे लक्षण दिखें तो तुरंत इमरजेंसी सेवाओं से संपर्क करना चाहिए.
छोटे बदलाव भी होते हैं अहम 
अगर बीपी एक-दो दिन के लिए सामान्य से थोड़ा ऊपर या नीचे जाए, तो रोजाना कुछ दिन मापते रहें और फिर डॉक्टर से सलाह लें. समय रहते बदलाव पकड़ में आ जाएं, तो गंभीर परेशानी से बचा जा सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 11 Feb 2026 18:30:14 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Hormonal Health In Women: हर महीने आ रहे पीरियड्स तो क्या सब ठीक है, डॉक्टर्स से समझें आपका शरीर क्या छिपा रहा?</title>
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        <description><![CDATA[ Do Regular Periods Mean Hormones Are Balanced: अक्सर महिलाएं यह मान लेती हैं कि अगर उनके पीरियड्स हर महीने समय पर आ रहे हैं, तो उनके हार्मोन बिल्कुल ठीक होंगे. 28 से 30 दिन के अंतर पर नियमित ब्लीडिंग होना उन्हें राहत देता है और यही मान लिया जाता है कि शरीर के अंदर सब कुछ संतुलित है. लेकिन सच्चाई यह है कि नियमित पीरियड्स सिर्फ एक बाहरी संकेत हैं, पूरी तस्वीर नहीं. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर एक्सपर्ट क्या कहते हैं.&amp;nbsp;
हार्मोनल सिस्टम बेहद जटिल होता है. इसमें ब्रेन ओवरी, थायरॉइड, एड्रिनल ग्लैंड्स और मेटाबॉलिज्म, सभी एक-दूसरे से जुड़े होते हैं. कई बार यह सिस्टम अंदरूनी तनाव और असंतुलन के बावजूद पीरियड्स को नियमित बनाए रखता है. यही वजह है कि कुछ महिलाओं के पीरियड्स तो समय पर आते हैं, लेकिन उन्हें फर्टिलिटी से जुड़ी दिक्कतें, तेज दर्द, मूड स्विंग्स या प्रीमेंस्ट्रुअल समस्याएं झेलनी पड़ती हैं.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
लूमा फर्टिलिटी की मेडिकल डायरेक्टर डॉ. राधिका शेठ ने TOI को बताया कि मेडिकल प्रैक्टिस में यह आम बात है कि नियमित पीरियड्स वाली महिलाओं में भी लंबे समय से हार्मोनल असंतुलन मौजूद रहता है. उनका कहना है कि पीरियड्स केवल एक नतीजा हैं, जबकि इसके पीछे चल रही हार्मोनल प्रक्रिया कहीं ज्यादा गहरी और संवेदनशील होती है. एक आम लेकिन नजरअंदाज की जाने वाली समस्या है प्रोजेस्टेरोन की कमी, जिसे ल्यूटियल फेज इंसफिशिएंसी कहा जाता है. ऐसी स्थिति में महिला समय पर ओवुलेट तो करती है और पीरियड्स भी नियमित रहते हैं, लेकिन प्रोजेस्टेरोन पर्याप्त न होने की वजह से प्रेग्नेंसी टिक नहीं पाती. अगर सही समय पर टेस्ट न किया जाए, तो यह समस्या सालों तक पकड़ में नहीं आती.
रेगुलर पीरियड्स में भी दिक्कत
इसी तरह PCOS को अक्सर अनियमित पीरियड्स से जोड़ा जाता है, लेकिन इसके हल्के या मेटाबॉलिक रूप में कई महिलाओं के पीरियड्स नियमित होते हैं. फिर भी उनमें इंसुलिन रेसिस्टेंस या हल्का हार्मोनल असंतुलन मौजूद हो सकता है, जो एग क्वालिटी और फर्टिलिटी को प्रभावित करता है. थायरॉइड या प्रोलैक्टिन में हल्की गड़बड़ी भी पीरियड्स को प्रभावित किए बिना ओवुलेशन और हार्मोन सपोर्ट को कमजोर कर सकती है. इसके अलावा लगातार तनाव, नींद की कमी और अनियमित खानपान शरीर में कोर्टिसोल बढ़ा देता है, जिससे हार्मोनल बैलेंस धीरे-धीरे बिगड़ता है.
किन चीजों को नहीं करना चाहिए नजरअंदाज?
डॉक्टरों का कहना है कि तेज मूड स्विंग्स, दर्दनाक पीरियड्स, लगातार थकान, सूजन, लो लिबिडो या इमोशनल अस्थिरता जैसे लक्षणों को सामान्य मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. ये संकेत बताते हैं कि भले ही पीरियड्स नियमित हों, लेकिन शरीर अंदर से संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 10 Feb 2026 14:30:18 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Water In Morning: क्या सुबह उठकर खाली पेट पानी पीना सही, इस वक्त ठंडा या गरम कौन&amp;सा पानी पीना ज्यादा अच्छा?</title>
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        <description><![CDATA[ Water In Morning: अपने दिन की शुरुआत एक गिलास पानी से करना शायद आसान लग सकता है. लेकिन यह छोटी सी आदत आपकी पूरी हेल्थ पर काफी ज्यादा असर डाल सकती है. 6 से 8 घंटे की नींद के बाद शरीर थोड़ा डिहाइड्रेटेड हो जाता है. खाली पेट पानी पीने से अंदरूनी सिस्टम फिर से शुरू हो जाते हैं.&amp;nbsp;
सुबह पानी पीना क्यों फायदेमंद&amp;nbsp;
सुबह उठते ही पानी पीने से डाइजेशन एक्टिव हो जाता है. नेचुरल डिटॉक्स प्रक्रिया में मदद मिलती है और शरीर दिन के लिए तैयार होता है. यह डाइजेस्टिव सिस्टम को धीरे-धीरे जगाता है, रेगुलर बॉवेल मूवमेंट में मदद करता है और पूरे दिन एनर्जी लेवल बनाए रखने में मदद करता है.
गुनगुना पानी&amp;nbsp;
खाली पेट गुनगुना पानी सबसे सही ऑप्शन माना जाता है. यह डाइजेस्टिव सिस्टम के लिए काफी हल्का होता है और शरीर इसे आसानी से सोख लेता है. सुबह इसे पीने से आंतों की मांसपेशियां रिलैक्स होती हैं. इससे डाइजेशन आसान होता है और कब्ज कम होता है. यह शरीर को रात भर जमा हुए टॉक्सिन को बाहर निकलने में भी मदद करता है. शरीर का तापमान थोड़ा बढ़ाकर गुनगुना पानी मेटाबॉलिज्म को बढ़ा सकता है. साथ ही यह वेट मैनेजमेंट में भी मदद कर सकता है. इसके अलावा यह ब्लड वेसल्स को नेचुरली फैलाने में मदद करके ब्लड सर्कुलेशन को भी बेहतर बनाता है.&amp;nbsp;
ठंडा पानी&amp;nbsp;
ठंडे पानी के अपने फायदे हैं लेकिन यह उठने के तुरंत बाद सबसे अच्छा ऑप्शन नहीं हो सकता. काफी ठंडा पानी डाइजेस्टिव सिस्टम को शॉक दे सकता है. इससे डाइजेशन धीमा हो सकता है या फिर गले में जलन हो सकती है. हालांकि यह थोड़ी मात्रा में कैलोरी बर्न करने में मदद करता है. क्योंकि शरीर इसे गर्म करने के लिए एनर्जी का इस्तेमाल करता है. सुबह वर्कआउट के बाद ठंडा पानी खासतौर पर काफी फायदेमंद होता है. ऐसा इसलिए क्योंकि यह शरीर को ठंडा करने और जल्दी से रिहाइड्रेट करने में मदद करता है.
पानी का तापमान डाइजेशन को कैसे प्रभावित करता है&amp;nbsp;
पानी का तापमान इस बात में एक बड़ी भूमिका निभाता है कि डाइजेस्टिव सिस्टम कैसे रिस्पॉन्ड करता है. गुनगुना पानी एंजाइम एक्टिविटी और आसान डाइजेशन में मदद करता है. वहीं ठंडा पानी कुछ समय के लिए ब्लड वेसल्स को सिकोड़ सकता है. इससे डाइजेस्टिव प्रोसेस धीमा हो जाता है. यही वजह है कि खाली पेट आमतौर पर गर्म या फिर गुनगुना पानी पसंद किया जाता है.
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        <pubDate>Mon, 09 Feb 2026 18:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title> ये चीजें खाते ही शुरू हो जाती है अपच की समस्या, देख लें पूरी लिस्ट</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/ये-चीजें-खाते-ही-शुरू-हो-जाती-है-अपच-की-समस्या-देख-लें-पूरी-लिस्ट</link>
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        <description><![CDATA[ 
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी और बिगड़ती खानपान की आदतों का असर सीधे पाचन तंत्र पर पड़ रहा है. समय पर खाना न खाना, बाहर का तला-भुना भोजन और जरूरत से ज्यादा मसालेदार चीजें खाने की वजह से अपच की समस्या होती जा रही है. अपच होने पर पेट में भारीपन, गैस डकार, जलन, बेचैनी जैसी दिक्कतें महसूस होती है. कई बार खाना खाने के बाद पेट दर्द, उल्टी जैसा मन और सीने में जलन भी होने लगती है. इसे लेकर डॉक्टर बताते हैं कि अगर आपको अपच की समस्या बार-बार हो रही है, तो उसके पीछे खानपान सबसे बड़ी वजह हो सकती है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि कौन सी चीजें खाते हैं अपच की समस्या शुरू हो सकती है, पूरी लिस्ट देख लीजिए. मसालेदार और तला-भुना भोजन डॉक्टरों के अनुसार, ज्यादा मिर्च मसाले वाला और तला-भुना खाना पचाने में भारी होता है. वहीं फास्ट फूड, जंक फूड और ज्यादा तेल में बनी चीजें पेट में जलन और एसिडिटी बढ़ा सकती है. यह चीज पाचन की प्रक्रिया को धीमा कर देती है, जिससे पेट में भारीपन और सीने में जलन की शिकायत होती है. ज्यादा वसा यानी फैट वाली चीजेंबहुत ज्यादा फैट वाला भोजन पचने में समय लेता है. इससे पेट देर तक भरा-भरा सा लगता है और गैस व सूजन की समस्या हो सकती है. खासतौर पर तली हुई चीजें, प्रोसेस्ड फूड और बाहर का खाना अपच को बढ़ा सकता है. खट्टे फल और ज्यादा एसिड वाली चीजें संतरा, नींबू, मौसमी जैसे खट्टे फल और इनके जूस कुछ लोगों में अपच और एसिडिटी रिफ्लक्स को ट्रिगर कर सकते हैं. &amp;nbsp;इनमें &amp;nbsp;मौजूद ज्यादा अम्लीय तत्व पेट &amp;nbsp;और भोजन नली में जलन पैदा कर सकते हैं, जिससे बेचैनी बढ़ जाती है. कोल्ड ड्रिंक और कार्बोनेटेड ड्रिंक सोडा और अन्य कार्बोनेटेड ड्रिंक से पेट में गैस और डकार की समस्या बढ़ जा सकती है. इनमें मौजूद ज्यादा चीनी और आर्टिफिशियल मिठास भी पाचन को नुकसान पहुंचा सकती है. कैफीन और अल्कोहल कॉफी, चाय, एनर्जी ड्रिंक और शराब का ज्यादा सेवन भी अपच की वजह बन सकता है. यह पेट में एसिड का लेवल बढ़ाते हैं, जिससे सीने में जलन और पेट दर्द जैसी दिक्कतें हो सकती है. खासकर अगर इन्हें रात में लिया जाए तो यह ज्यादा नुकसान करते हैं. प्रोसेस्ड और पैकेट वाला खाना डिब्बाबंद, पैकेट वाले स्नैक्स और ज्यादा प्रोसेस्ड फूड में फाइबर कम और नमक-फैट ज्यादा होता है. इससे पाचन तंत्र पर दबाव पड़ता है और अपच की परेशानी बढ़ सकती है. कैसे कर सकते हैं बचाव?अपच से बचने के लिए हल्का और संतुलित भोजन करें. समय पर खाना खाएं, भोजन को अच्छी तरह से चबाएं और तला-भुना व जंक फूड कम करें. दिन में थोड़ा टहलना और हल्की एक्सरसाइज पाचन के लिए ज्यादा फायदेमंद होते हैं.
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        <pubDate>Mon, 09 Feb 2026 18:30:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Liver Cancer Symptoms: शरीर के इन 4 बदलावों को न करें नजरअंदाज, हो सकते हैं कैंसर के खतरे के संकेत</title>
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        <description><![CDATA[ Early Symptoms Of Liver Cancer You Should Not Ignore: आजकल हमारी डाइट में तले-भुने और प्रोसेस्ड फूड की मात्रा तेजी से बढ़ रही है. इसके साथ ही शारीरिक गतिविधि भी पहले के मुकाबले काफी कम हो गई है, जिसका सीधा असर लिवर पर पड़ता है. अनहेल्दी लाइफस्टाइल, गलत खानपान और हेपेटाइटिस जैसे इंफेक्शन &amp;nbsp;के कारण लिवर कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. &amp;nbsp;सबसे बड़ी परेशानी यह है कि लिवर कैंसर के शुरुआती लक्षण अक्सर लोग सामान्य समस्या समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. जब तक बीमारी गंभीर रूप लेती है, तब तक इसका पता चल पाता है. इसलिए जरूरी है कि लिवर कैंसर के संकेतों को समय रहते पहचाना जाए. चलिए आपको बताते हैं कि इसके प्रमुख लक्षण कौन से हैं.&amp;nbsp;
क्या होते हैं लक्षण?
Mayo Clinic के अनुसार, लिवर कैंसर के कई लक्षण हो सकते हैंय. इनमें से चार संकेतों के बारे में आपको बताते हैं, जिन्हें पहचानना बेहद जरूरी है. ये लक्षण-&amp;nbsp;
दर्द और सूजन
अगर पेट के दाहिने हिस्से में, खासकर पसलियों के नीचे, लगातार हल्का दर्द, खिंचाव, दबाव या सूजन महसूस हो रही है, तो इसे गैस या एसिडिटी समझकर नजरअंदाज न करें. यह दर्द तब होता है जब ट्यूमर के कारण लिवर का आकार बढ़ने लगता है और आसपास के टिश्यू पर दबाव पड़ता है. कई बार पेट में पानी भरने से भी भारीपन और फूला हुआ महसूस हो सकता है.
वजन घटना- भूख न लगना
अगर बिना डाइट या एक्सरसाइज के आपका वजन तेजी से कम हो रहा है और खाने की इच्छा भी घटती जा रही है, तो यह खतरे का संकेत हो सकता है. लिवर कैंसर शरीर के मेटाबॉलिज्म को प्रभावित करता है. लिवर पाचन में अहम भूमिका निभाता है, लेकिन कैंसर की वजह से यह प्रक्रिया बाधित हो जाती है. ऐसे में व्यक्ति जल्दी भरा-भरा महसूस करता है, भूख कम लगती है और शरीर जरूरी पोषक तत्वों को ठीक से अब्जॉर्व नहीं कर पाता, जिससे वजन घटने लगता है.
जॉन्डिस
पीलिया लिवर कैंसर का एक अहम लक्षण माना जाता है. इसमें त्वचा, आंखों का सफेद हिस्सा और नाखून पीले पड़ने लगते हैं. ऐसा तब होता है जब लिवर ठीक से काम नहीं कर पाता और खून में बिलिरुबिन की मात्रा बढ़ जाती है. इसके साथ यूरिन का रंग गहरा पीला या भूरा होना और मल का रंग हल्का पड़ना भी पीलिया से जुड़े अहम संकेत हैं. ऐसे लक्षण दिखें तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए.
लगातार थकान और कमजोरी
अगर हल्का काम करने के बाद भी आपको लगातार थकान और कमजोरी महसूस होती है और आराम करने के बाद भी यह ठीक नहीं होती, तो इसे गंभीरता से लें. लिवर कैंसर शरीर की ऊर्जा बनाने की क्षमता को प्रभावित करता है. इसके अलावा एनीमिया भी इस थकान का एक कारण हो सकता है, क्योंकि लिवर रेड ब्लड सेल्स के निर्माण से जुड़ी प्रक्रिया को प्रभावित करता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 08 Feb 2026 14:30:10 +0530</pubDate>
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        <media:keywords>Liver, Cancer, Symptoms:, शरीर, के, इन, बदलावों, को, न, करें, नजरअंदाज, हो, सकते, हैं, कैंसर, के, खतरे, के, संकेत</media:keywords>
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        <title>Blood Cancer: लगातार थकान और बार&amp;बार बुखार आना सामान्य नहीं, हो सकते हैं इस कैंसर के लक्षण</title>
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        <description><![CDATA[ Early Warning Signs Of Blood Cancer: ब्लड कैंसर अक्सर अचानक या बहुत तेज लक्षणों के साथ सामने नहीं आता. यह धीरे-धीरे शरीर के अंदर असर डालता है और इसके शुरुआती संकेत कई बार मामूली समझकर नजरअंदाज कर दिए जाते हैं. ल्यूकेमिया, लिंफोमा और मल्टीपल मायलोमा जैसे ब्लड कैंसर बोन मैरो में शुरू होते हैं, जहां खून की सेल्स बनती हैं, और समय के साथ शरीर की सामान्य काम करने की क्षमता को प्रभावित करने लगते हैं.
शुरुआती पहचान क्यों है जरूरी?
अंबाला स्थित पूजा सुपरस्पेशलिटी क्लीनिक के विशेषज्ञ डॉ. दीपक सहोता के अनुसार, ब्लड कैंसर की जल्दी पहचान इलाज को काफी हद तक आसान बना सकती है. उनका कहना है कि समय रहते बीमारी पकड़ में आ जाए तो इलाज की सफलता बढ़ जाती है और ब्लड स्टेम सेल ट्रांसप्लांट जैसे अहम विकल्पों की संभावना भी मजबूत होती है.
लगातार थकान को न समझें सामान्य
अगर बिना ज्यादा काम किए भी लगातार कमजोरी, थकान या सांस फूलने की शिकायत रहती है और आराम करने पर भी फर्क नहीं पड़ता, तो यह संकेत हो सकता है. डॉ. दीपक सहोता बताते हैं कि ब्लड कैंसर में शरीर पर्याप्त स्वस्थ रेड ब्लड सेल्स नहीं बना पाता, जिससे एनीमिया हो जाता है और यही थकान की बड़ी वजह बनती है.
बार-बार इंफेक्शन या बुखार आना
कमजोर इम्यून सिस्टम ब्लड कैंसर का अहम संकेत हो सकता है. बार-बार सर्दी, बुखार या छोटे इंफेक्शन का गंभीर रूप लेना इस ओर इशारा करता है कि शरीर की व्हाइट ब्लड सेल्स सही से काम नहीं कर पा रहीं.
बिना वजह खून आना या जल्दी चोट लगना
नाक या मसूड़ों से खून आना, हल्की चोट में भी ज्यादा नीला पड़ जाना या त्वचा पर छोटे-छोटे लाल-बैंगनी दाग दिखना प्लेटलेट्स की कमी का संकेत हो सकता है. ल्यूकेमिया में यह लक्षण आम हैं, लेकिन लोग अक्सर इन्हें मामूली मान लेते हैं.
वजन घटना, रात में पसीना और गांठें
अगर बिना डाइट या एक्सरसाइज के वजन तेजी से घट रहा हो, रात में ज्यादा पसीना आता हो या गर्दन, बगल या जांघ में दर्द रहित गांठ दिखे, तो सतर्क हो जाना चाहिए. ये लक्षण खासतौर पर लिंफोमा से जुड़े हो सकते हैं. वहीं हड्डियों, रीढ़ या पसलियों में लगातार दर्द मल्टीपल मायलोमा का संकेत हो सकता है.
स्टेम सेल ट्रांसप्लांट- इलाज की उम्मीद
ब्लड कैंसर के कई मामलों में ब्लड स्टेम सेल ट्रांसप्लांट बेहद प्रभावी इलाज है. इसमें खराब बोन मैरो की जगह स्वस्थ स्टेम सेल्स दी जाती हैं, जिससे नया ब्लड और इम्यून सिस्टम बनता है. आपको सावधानियों पर ध्यान देना चाहिए और अगर किसी तरह की कोई दिक्कत हो, तो डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 08 Feb 2026 14:30:09 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>हर घूंट पानी के बाद यूरिन क्यों आता है? जानिए क्या है इसका कारण और शरीर का पूरा साइंस</title>
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        <description><![CDATA[ हम सभी को बचपन से यही सिखाया जाता है कि दिन भर में खूब पानी पीना चाहिए. डॉक्टर भी सलाह देते हैं कि शरीर को स्वस्थ रखने के लिए रोजाना 7 से 8 गिलास पानी जरूरी है. पानी पीने से शरीर डिहाइड्रेशन से बचता है, टॉक्सिन बाहर निकलते हैं और किडनी सही से काम करती है, लेकिन कई लोगों की एक आम शिकायत होती है जैसे ही पानी पीते हैं, तुरंत यूरिन लगने लगती है. कुछ लोगों को तो हर 10&amp;ndash;15 मिनट में वॉशरूम जाना पड़ता है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यह सामान्य है या फिर किसी बीमारी का संकेत है. अगर आपके साथ भी ऐसा हो रहा है, तो घबराने की जरूरत नहीं है. आइए आज हम आपको बताते हैं कि हर घूंट पानी के बाद यूरिन क्यों आता है, इसके पीछे शरीर का क्या साइंस है और इससे कैसे बचा जा सकता है.&amp;nbsp;
पानी पीने के बाद बार-बार यूरिन आने का क्या कारण है?
1. ओवर एक्टिव ब्लैडर (Overactive Bladder) - यह बार-बार यूरिन आने की सबसे आम वजह मानी जाती है. इस स्थिति में ब्लैडर की मांसपेशियां जरूरत से ज्यादा एक्टिव हो जाती हैं. ब्लैडर पूरा भरा न होने पर भी दिमाग को बार-बार यूरिन का सिग्नल भेजता है, जिससे अचानक और तेज यूरिन की इच्छा होती है. इसी कारण थोड़ी-सी मात्रा में पानी पीते ही वॉशरूम भागना पड़ता है.&amp;nbsp;
2. मूत्र मार्ग में संक्रमण (UTI) - अगर यूरिन करते समय जलन, दर्द, बदबू या बार-बार यूरिन लगे तो यह यूटीआई का संकेत हो सकता है. इसमें ब्लैडर ज्यादा सेंसिटिव हो जाता है.&amp;nbsp;
3. ज्यादा चाय, कॉफी या शराब का सेवन - चाय, कॉफी और शराब में कैफीन होता है, जो यूरिन बढ़ाने का काम करता है, ब्लैडर में जलन पैदा करता है, जिससे बार-बार यूरिन की इच्छा होती है.&amp;nbsp;
4. &amp;nbsp;शुगर (डायबिटीज) का कंट्रोल में न होना - अगर ब्लड शुगर लेवल ज्यादा रहता है तो शरीर अतिरिक्त शुगर को यूरिन के जरिए बाहर निकालने की कोशिश करता है, जिससे यूरिन ज्यादा आता है साथ में प्यास भी ज्यादा लगती है.&amp;nbsp;
5. तनाव और चिंता - मानसिक तनाव या एंग्जायटी भी इस समस्या को बढ़ा सकती है. नर्वस सिस्टम ब्लैडर को गलत सिग्नल भेजने लगता है, जिससे बार-बार यूरिन लगता है.&amp;nbsp;
बार-बार यूरिन आने से बचने के लिए क्या करें?
1. पानी पीने का सही तरीका अपनाएं - एक साथ बहुत ज्यादा पानी न पिएं, थोड़ी-थोड़ी मात्रा में पूरे दिन पानी पिएं. बहुत तेजी से पानी पीने से बचें.&amp;nbsp;
2. कैफीन और फिजी ड्रिंक्स कम करें - चाय, कॉफी, कोल्ड ड्रिंक, एनर्जी ड्रिंक्स इनका सेवन कम करने से ब्लैडर को राहत मिलती है.&amp;nbsp;
3. बार-बार बाथरूम जाने की आदत न डालें - हर 10&amp;ndash;15 मिनट में वॉशरूम जाने से ब्लैडर कमजोर हो सकता है. यूरिन रोकने की क्षमता कम हो जाती है. कोशिश करें कि तय समय के अंतराल में ही बाथरूम जाएं.&amp;nbsp;
4. पेल्विक फ्लोर एक्सरसाइज करें - पेल्विक फ्लोर एक्सरसाइज (जैसे केगल एक्सरसाइज), ब्लैडर की मांसपेशियों को मजबूत बनाती हैं, यूरिन को कंट्रोल करने में मदद करती हैं.&amp;nbsp;
5. &amp;nbsp;जरूरत पड़े तो डॉक्टर से सलाह लें - अगर समस्या लंबे समय तक बनी रहे. जलन या दर्द हो या नींद में बार-बार यूरिन आए तो डॉक्टर से जांच कराना बेहद जरूरी है.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ें - ये हैं मौत से पहले के 12 संकेत जिन्हें देखकर डॉक्टर भी कर देते हैं हाथ खड़े, जानिए कैसे आखिरी सांसे गिनता है मरीज
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 08 Feb 2026 02:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>ये हैं मौत से पहले के 12 संकेत जिन्हें देखकर डॉक्टर भी कर देते हैं हाथ खड़े, जानिए कैसे आखिरी सांसे गिनता है मरीज</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/ये-हैं-मौत-से-पहले-के-12-संकेत-जिन्हें-देखकर-डॉक्टर-भी-कर-देते-हैं-हाथ-खड़े-जानिए-कैसे-आखिरी-सांसे-गिनता-है-मरीज</link>
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        <description><![CDATA[ मृत्यु जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई है, लेकिन इसके बारे में बात करना आज भी लोगों को असहज कर देता है. &amp;nbsp;जब कोई अपना गंभीर रूप से बीमार होता है और उसका शरीर जवाब देने लगता है, तब परिवार के मन में सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि अब क्या होने वाला है. डॉक्टर, नर्स और हॉस्पिस केयर में काम करने वाले लोग अक्सर कुछ ऐसे शारीरिक और मानसिक बदलाव पहचान लेते हैं, जो बताते हैं कि इंसान अपने जीवन के अंतिम चरण में प्रवेश कर चुका है. ये संकेत डराने के लिए नहीं होते, बल्कि इसलिए जरूरी हैं ताकि मरीज को कम से कम दर्द, ज्यादा से ज्यादा आराम के साथ ध्यान रखा जा सके. तो आइए आज हम आपको वे 12 संकेत बताते हैं, जो आमतौर पर मौत से पहले दिखाई देते हैं.&amp;nbsp;
ये हैं मौत से पहले के 12 संकेत
1. लगातार थकान और कमजोरी - मरीज दिन का ज्यादातर समय सोते हुए बिताने लगता है. थोड़ा सा बोलना या हिलना-डुलना भी उसे थका देता है. यह आलस नहीं, बल्कि शरीर की एनर्जी खत्म होने का संकेत होता है.&amp;nbsp;
2. भूख और प्यास का कम हो जाना - अंतिम समय में शरीर को ज्यादा खाना या पानी की जरूरत नहीं रहती, मरीज खुद खाने-पीने से मना कर सकता है. यह स्वाभाविक प्रक्रिया है.&amp;nbsp;
3. सांस लेने में तकलीफ - सांस फूलना, तेज या बहुत धीमी सांसें चलना आम बात है. कभी-कभी बिना किसी मेहनत के भी सांस लेने में परेशानी होती है. इस समय ऑक्सीजन, दवाइयां और शांत वातावरण मदद करता है.&amp;nbsp;
4. दर्द का बढ़ना या बदलना - हर मरीज को दर्द एक-सा नहीं होता, कुछ को ज्यादा, कुछ को कम, कैंसर, फेफड़ों की बीमारी या मानसिक तनाव दर्द को बढ़ा सकता है. डॉक्टर अक्सर दवाइयां देकर दर्द को काबू में रखते हैं.&amp;nbsp;
5. चिंता और बेचैनी - मरीज बेचैन हो सकता है, बार-बार करवट बदलता है, पसीना आता है. नींद नहीं आती या डर महसूस होता है. यह मौत के डर या मानसिक थकान की वजह से हो सकता है. इस समय प्यार भरी बातों और दवाओं से राहत मिलती है.&amp;nbsp;
6. मतली और उल्टी - अंतिम समय में पेट ठीक से काम नहीं करता, कभी दवाओं से, कभी कब्ज से मतली हो सकती है. हल्का खाना, ताजी हवा और डॉक्टर की दवाइयां मददगार होती हैं.&amp;nbsp;
7. कब्ज &amp;nbsp;- कम खाना, कम पानी पीना और दर्द की दवाइयां कब्ज पैदा करती हैं. यह तकलीफदेह हो सकता है. डॉक्टर दवाएं या इंजेक्शन देकर राहत दिलाते हैं.&amp;nbsp;
8. अकेलापन और लोगों से दूरी - मरीज धीरे-धीरे कम बोलने लगता है, मिलना-जुलना कम कर देता है, यहां तक कि अपनों से भी, यह उदासी नहीं, बल्कि अंदर की तैयारी होती है. ऐसे में बस पास बैठकर हाथ पकड़ना भी बहुत सुकून देता है.&amp;nbsp;
9. पेशाब और मल पर नियंत्रण न रहना - शरीर की मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं. मरीज को पेशाब या शौच पर नियंत्रण नहीं रहता, इस समय साफ-सफाई बहुत जरूरी होती है ताकि संक्रमण न हो.&amp;nbsp;
10. हाथ-पैर ठंडे पड़ना और त्वचा का रंग बदलना - खून का बहाव कम होने लगता है. हाथ-पैर ठंडे, त्वचा पर नीले या बैंगनी धब्बे दिख सकते हैं. होंठ और नाखून नीले पड़ सकते हैं. यह साफ संकेत है कि शरीर धीरे-धीरे बंद हो रहा है.&amp;nbsp;
11. भ्रम और प्रलाप (Delirium) - &amp;nbsp;मरीज ऐसी बातें कर सकता है जो समझ में न आएं. कभी किसी को देखना या सुनना जो मौजूद न हो. यह ऑक्सीजन की कमी, दवाओं या किडनी फेल होने की वजह से होता है.&amp;nbsp;
12. डेथ रेटल यानी मौत की घरघराहट - यह आखिरी और सबसे साफ संकेत होता है. सांस लेते समय घरघराहट या घड़घड़ाहट की आवाज आती है. असल में मरीज को दर्द नहीं होता, लेकिन आवाज सुनकर घबरा जाता है. ऐसे में करवट बदलना और सिर ऊंचा रखना मदद करता है.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ें - Brain Hemorrhage: क्यों होता है ब्रेन हैमरेज? एक्सपर्ट्स से जानें इसके कारण, प्रकार और बचाव के सबसे जरूरी तरीके
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 07 Feb 2026 22:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>ये, हैं, मौत, से, पहले, के, संकेत, जिन्हें, देखकर, डॉक्टर, भी, कर, देते, हैं, हाथ, खड़े, जानिए, कैसे, आखिरी, सांसे, गिनता, है, मरीज</media:keywords>
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        <title>घर में रहने वालों को भी बीमार कर रहा पीएम2.5, जानें इनडोर पॉल्यूशन कितना खतरनाक?</title>
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        <description><![CDATA[ हम अक्सर यह सोचते हैं कि घर हमारे लिए सबसे सुरक्षित जगह है. दरवाजे बंद कर के, खिड़कियां बंद कर के हम यह मान लेते हैं कि हमारे परिवार को कोई नुकसान नहीं होगा. लेकिन सच यह है कि हमारे घर के अंदर हवा कई बार बाहरी हवा से भी ज्यादा दूषित हो सकती है. धूल, धुएं, फर्नीचर से निकलने वाले रसायन, खाना पकाने के दौरान बनने वाले छोटे कण, सफाई से निकलने वाले हानिकारक गैस ये सब धीरे-धीरे हमारी हेल्थ को नुकसान पहुंचाते हैं.&amp;nbsp;
भारत जैसे देश में, जहां अक्सर घरों में वेंटिलेशन यानी हवा का अच्छा प्रवाह नहीं होता, इन प्रदूषकों का असर और भी गंभीर हो जाता है. साथ ही पीएम 2.5 घर में रहने वालों को भी बीमार कर रहा है. लंबे समय तक इनसे संपर्क में रहने से बच्चों में एलर्जी और अस्थमा, वयस्कों में फेफड़ों की बीमारियां और यहां तक कि हार्ट डिजीज और मस्तिष्क संबंधी समस्याएं भी विकसित हो सकती हैं.&amp;nbsp;
घर में रहने वालों को भी बीमार कर रहा पीएम 2.5
1. खाना पकाने से धुएं और कण की वजह से - जब हम तलते या ग्रिल करते हैं, तब छोटे छोटे धूल और धुएं के कण (PM2.5) हवा में फैलते हैं. ये कण इतने छोटे होते हैं कि वे फेफड़ों तक पहुंच जाते हैं और रक्त में भी प्रवेश कर सकते हैं.&amp;nbsp;&amp;nbsp;2. फर्नीचर और निर्माण सामग्री से निकलने वाले रसायन - पार्टिकल बोर्ड, प्लाईवुड और कुछ पेंट्स से फॉर्मेल्डिहाइड जैसी हानिकारक गैसें निकलती रहती हैं. ये रसायन गंधहीन होने के कारण हम अक्सर इसका एहसास नहीं कर पाते है.
3. सफाई उत्पाद और एअर फ्रेशनर - सामान्य घरेलू क्लीनर, एयर फ्रेशनर और सौंदर्य प्रसाधन वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (VOCs) छोड़ते हैं. लंबे समय तक संपर्क में रहने से सिरदर्द, आंखों में जलन, एलर्जी और यहां तक कि कैंसर का खतरा भी बढ़ सकता है.&amp;nbsp;
4. नमी और फफूंद - घर के अंदर ज्यादा नमी होने पर फफूंद पनप जाती है. फफूंद और इसके माइकोटॉक्सिन आपके श्वसन तंत्र और प्रतिरक्षा प्रणाली को कमजोर कर सकते हैं.&amp;nbsp;
5. पालतू जानवर और धूल - पालतू जानवरों के बाल, रूसी और मूत्र में मौजूद प्रोटीन हवा में एलर्जी कारक बन जाते हैं. सूक्ष्म धूल और मृत त्वचा कोशिकाओं से भी एलर्जी और अस्थमा का खतरा बढ़ता है.&amp;nbsp;
6. कार्बन मोनोऑक्साइड और रेडॉन - ये दोनों रंगहीन, गंधहीन और बेहद खतरनाक गैसें हैं. कम मात्रा में भी सिरदर्द, थकान और चक्कर ला सकती हैं. ज्यादा मात्रा में ये जानलेवा हो सकती हैं.&amp;nbsp;
इनडोर पॉल्यूशन कितना खतरनाक?
घर के अंदर की खराब हवा धीरे-धीरे हमारे शरीर पर असर डालती है. इससे लगातार सिरदर्द, थकान और नींद में कमी, आंखों, नाक और गले में जलन, बार-बार खांसी, छींक या एलर्जी, त्वचा पर चकत्ते या जलन, बच्चों में नई एलर्जी या अस्थमा का बढ़ना, मानसिक थकान, याददाश्त में कमी और एकाग्रता में कमी, अगर ये लक्षण केवल घर के अंदर होते हैं और बाहर जाने पर कम हो जाते हैं, तो यह सिक बिल्डिंग सिंड्रोम यानी घर के अंदर की हवा से जुड़ी बीमारी का संकेत हो सकता है.&amp;nbsp;
घर की हवा को सुरक्षित बनाने के उपाय
1. रोजाना 15&amp;ndash;20 मिनट के लिए खिड़कियां खोलें.
2. खाना बनाते समय एग्जॉस्ट फैन का यूज करें.
3. HEPA फिल्टर वाला एयर प्यूरीफायर लगाएं.
4. घर की नमी 50 प्रतिशत से कम रखें.&amp;nbsp;
5. फर्नीचर और पेंट में से निकलने वाले रसायनों से बचें.&amp;nbsp;
6. सुगंधित क्लीनर और एयर फ्रेशनर के बजाय नेचुरल ऑप्शन अपनाएं, पौधों का यूज करें, कुछ पौधे हवा से प्रदूषक सोख सकते हैं.&amp;nbsp;
7. एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग ऐप्स से हवा की क्वालिटी पर नजर रखें.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ें - सिर्फ सुबह-सुबह टहलने से नहीं सुधरेगी हार्ट हेल्थ, जानें क्या-क्या है जरूरी?
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 07 Feb 2026 18:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>सिर्फ सुबह&amp;सुबह टहलने से नहीं सुधरेगी हार्ट हेल्थ, जानें क्या&amp;क्या है जरूरी?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/सिर्फ-सुबह-सुबह-टहलने-से-नहीं-सुधरेगी-हार्ट-हेल्थ-जानें-क्या-क्या-है-जरूरी</link>
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        <description><![CDATA[ आजकल ज्यादातर लोग मानते हैं कि अगर रोज सुबह उठकर 20&amp;ndash;30 मिनट टहल लें, तो उनका दिल हमेशा हेल्दी रहेगा. वॉक करना वाकई फायदेमंद है, लेकिन सिर्फ टहलना ही दिल की सेहत की गारंटी नहीं है. हार्ट को हेल्दी रखने के लिए पूरा लाइफस्टाइल सही होना जरूरी है, जिसमें खान-पान, एक्सरसाइज, नींद, तनाव, आदतें और सोच सब कुछ शामिल है.&amp;nbsp;
दिल की बीमारियां आज लाइफस्टाइल डिजीज बन चुकी हैं.गलत खान-पान, बैठे-बैठे काम करना, तनाव, धूम्रपान, शराब और नींद की कमी &amp;nbsp;ये सभी मिलकर दिल को धीरे-धीरे कमजोर बना देते हैं. अच्छी बात यह है कि अगर समय रहते कुछ सही कदम उठा लिए जाएं, तो हार्ट डिजीज के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है. तो आइए जानते हैं कि दिल को मजबूत और हेल्दी रखने के लिए वॉक के अलावा और क्या-क्या जरूरी है.&amp;nbsp;
दिल को हेल्दी रखने के लिए वॉक के अलावा क्या-क्या जरूरी है
1. दिल की सेहत के लिए सही खानपान सबसे जरूरी - एक्सपर्ट्स के अनुसार, आप क्या खाते हैं, इसका सीधा असर आपके दिल पर पड़ता है. ज्यादा तला-भुना, पैकेट वाला और मीठा खाना दिल की धमनियों में चर्बी जमा कर सकता है. इसलिए हरी सब्जियां जैसे पालक, लौकी, भिंडी, गाजर, ताजे फल जैसे सेब, संतरा, अमरूद, पपीता, साबुत अनाज जैसे दलिया, ओट्स, ब्राउन राइस, दालें, चना, राजमा, मूंग अच्छा फेट जैसे अखरोट, अलसी, जैतून का तेल जैसी चीजें डाइट में शामिल करें.&amp;nbsp;
2. सिर्फ टहलना नहीं, पूरा व्यायाम जरूरी है - सुबह की वॉक अच्छी शुरुआत है, लेकिन दिल को मजबूत रखने के लिए इतना काफी नहीं, दिल के लिए फायदेमंद एक्सरसाइज तेज &amp;nbsp;चलना या हल्की दौड़, साइकिल चलाना, रस्सी कूदना, योग और प्राणायाम, हल्की वेट ट्रेनिंग, हफ्ते में कम से कम 150 मिनट हल्की एक्सरसाइज या 75 मिनट तेज एक्सरसाइज करने की कोशिश करें.
3. वजन कंट्रोल में रखें - एक्सपर्ट्स के अनुसार, बढ़ा हुआ वजन दिल पर अतिरिक्त दबाव डालता है. मोटापा हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाता है, जो सीधे हार्ट डिजीज से जुड़े हैं. इसलिए सही डाइट और नियमित एक्सरसाइज आपके वजन को कंट्रोल में रखती है. छोटे-छोटे बदलाव, जैसे देर रात खाना छोड़ना और मीठा कम करना, बहुत फर्क डाल सकते हैं.
4. नमक और सोडियम कम करें - ज्यादा नमक खाने से ब्लड प्रेशर बढ़ता है, जो दिल के लिए खतरनाक है. पैकेट वाले और डिब्बाबंद खाने से बचें.अचार, नमकीन, सॉस सीमित मात्रा में लें. खाने में स्वाद के लिए नींबू, धनिया, मसाले यूज करें.&amp;nbsp;
5. धूम्रपान और तंबाकू से दूरी बनाएं - धूम्रपान दिल की नसों को सख्त कर देता है और ऑक्सीजन की सप्लाई कम कर देता है. इससे हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा कई गुना बढ़ जाता है.अगर आप सिगरेट या तंबाकू लेते हैं, तो इसे छोड़ना दिल के लिए सबसे बड़ा तोहफा होगा.&amp;nbsp;
6. तनाव को हल्के में न लें - एक्सपर्ट्स के अनुसार, लगातार तनाव में रहने से दिल की धड़कन और ब्लड प्रेशर बढ़ा रहता है. समय के साथ यह हृदय को नुकसान पहुंचा सकता है. तनाव कम करने के आसान तरीके गहरी सांस लेना, ध्यान और योग, प्रकृति के बीच समय बिताना, परिवार और दोस्तों से खुलकर बात करना है.&amp;nbsp;
7. पूरी नींद लें - कम नींद लेने वालों में दिल की बीमारियों का खतरा ज्यादा होता है. हर दिन 7&amp;ndash;8 घंटे की अच्छी नींद दिल को आराम देती है और शरीर को रिपेयर करने का मौका देती है.सोने से पहले मोबाइल और टीवी से दूरी बनाना फायदेमंद होता है.&amp;nbsp;
8. नियमित हेल्थ चेक-अप कराएं - ब्लड प्रेशर, शुगर और कोलेस्ट्रॉल की समय-समय पर जांच बहुत जरूरी है. बीमारी का जल्दी पता लग जाए, तो इलाज आसान हो जाता है.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 07 Feb 2026 14:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Cardamom Benefits: खाने के बाद इलायची खाने से पेट पर क्या पड़ता है असर, जानें क्या कहते हैं डॉक्टर?</title>
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        <description><![CDATA[ Benefits Of Chewing Cardamom After Meals: इलायची अपनी खुशबू और स्वाद की वजह से मसालों की दुनिया में खास जगह रखती है. मीठे से लेकर नमकीन व्यंजनों तक, इलायची हर जगह इस्तेमाल होती है. भारत में खाने के बाद इलायची चबाने की आदत भी काफी आम है. यह छोटी-सी आदत न सिर्फ पाचन में मदद कर सकती है, बल्कि मुंह की सफाई और सांसों की ताजगी बनाए रखने में भी असरदार मानी जाती है. रिसर्च जर्नल ऑफ फार्मेसी एंड टेक्नोलॉजी के अनुसार, इलायची में मौजूद नेचुरल एंटीमाइक्रोबियल गुण मुंह की बदबू को कम करने में मदद करते हैं.
खाने के बाद इलायची चबाने के फायदे
डॉ. मंजूषा अग्रवाल ने HT को बताया कि इलायची में सिनेओल, लिमोनीन, टरपिनीन और फ्लेवोनॉयड्स जैसे सक्रिय तत्व पाए जाते हैं. ये तत्व सूजन को कम करने, पाचन सुधारने, सांसों को ताजा रखने और दिल व मेटाबॉलिक हेल्थ को सपोर्ट करने में सहायक होते हैं. PubMed में प्रकाशित स्टडी के मुताबिक, खाने के बाद इलायची चबाने से पैंक्रियाटिक एंजाइम्स जैसे लाइपेज, एमाइलेज और प्रोटीएज सक्रिय होते हैं. कुछ मामलों में आंतों की परत से जुड़े एंजाइम्स भी उत्तेजित होते हैं, जिससे भोजन को तोड़ने और पचाने की प्रक्रिया बेहतर होती है.
गैस, ब्लोटिंग और अपच से राहत
Science Gate के अनुसार, इलायची कार्मिनेटिव और एंटी-फ्लैटुलेंस गुणों से भरपूर होती है। इसका मतलब है कि यह पेट में गैस, सूजन और असहजता को कम करने में मदद करती है. इलायची में 1,8-सिनेओल, अल्फा-पाइनीन, सैबिनीन, लिमोनीन और टरपिनियोल जैसे तत्व पाए जाते हैं, जिनमें सूजन-रोधी और एंटीऑक्सीडेंट गुण होते हैं। PMC और SAGE Journal के अनुसार, ये तत्व पेट की अंदरूनी परत की सूजन को शांत करने में मदद कर सकते हैं, जिससे एसिड रिफ्लक्स या हार्टबर्न की समस्या कम हो सकती है।
सांसों की बदबू कैसे दूर करती है इलायची?
इलायची में मौजूद बायोएक्टिव कंपाउंड्स इसे खास खुशबू देते हैं. इसके बीज चबाने से मुंह की दुर्गंध कम होती है. PubMed Central के मुताबिक, इलायची चबाने से लार का बहना बढ़ता है, जिससे ड्राई माउथ की समस्या कम होती है और दांतों की प्राकृतिक सफाई भी होती है.
इलायची कैसे और कितनी चबाएं?
खाने के बाद हरी इलायची लें, क्योंकि यह ज्यादा सुगंधित और औषधीय होती हैयच दांतों से हल्का-सा दबाकर फली तोड़ें और अंदर के बीज चबाएं. छिलका निगलना जरूरी नहीं है. इसके अलावा आमतौर पर 1 इलायची काफी होती है,ज्यादा मात्रा में लेने से मुंह में खुजली, खांसी या पेट में परेशानी हो सकती है. डॉ. के अनुसार, पित्त की पथरी वाले लोगों, गर्भवती या ब्रेस्टफीडिंग कराने वाली महिलाओं और कुछ दवाएं लेने वालों को सावधानी बरतनी चाहिए। विशेषज्ञ रोजाना नहीं, बल्कि 15 से 20 दिन में एक बार इलायची चबाने की सलाह देते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 06 Feb 2026 14:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>Paan Benefits: इन चार तरह के लोगों के लिए वरदान होता है पान का पत्ता, जानें इसे खाने का सही तरीका</title>
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        <description><![CDATA[  ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 06 Feb 2026 14:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>Breakfast For High Blood Pressure:  सुबह के नाश्ते में शामिल करें ये 10 देसी चीजें, कंट्रोल में रहेगा ब्लड प्रेशर और हार्ट भी रहेगा हेल्दी</title>
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        <pubDate>Thu, 05 Feb 2026 18:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>गेहूं, बाजरा या रागी? जानिए किस मौसम में कौन&amp;सी रोटी खाना है सेहत के लिए बेहतर</title>
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        <description><![CDATA[ हमारे देश में रोटी सिर्फ खाना नहीं, रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है. सुबह का नाश्ता हो या रात का खाना, थाली में रोटी होना लगभग तय माना जाता है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि हम साल भर एक ही तरह की रोटी क्यों खाते हैं, क्या शरीर को हर मौसम में एक जैसा खाना चाहिए. पहले के जमाने में ऐसा नहीं था. हमारे दादा-दादी मौसम बदलते ही अनाज भी बदल देते थे. सर्दियों में मोटा अनाज, गर्मियों में हल्का भोजन और बरसात में आसानी से पचने वाली चीजें खाई जाती थीं. इसका सीधा कारण शरीर और पाचन शक्ति का मौसम के साथ बदलना था.&amp;nbsp;
आज सुविधा और आदत की वजह से गेहूं की रोटी पूरे साल खाई जाती है. लेकिन पोषण विशेषज्ञ और आयुर्वेद मानते हैं कि हर अनाज की अपनी तासीर होती है और वह किसी खास मौसम में शरीर के लिए ज्यादा फायदेमंद होता है. अगर हम मौसम के अनुसार रोटी चुनें, तो पाचन बेहतर रहता है, पेट की दिक्कतें कम होती हैं और शरीर खुद को हल्का और एनर्जेटिक महसूस करता है. तो आइए जानते हैं कि गेहूं, बाजरा या रागी, किस मौसम में कौन-सी रोटी खाना सेहत के लिए बेहतर है.&amp;nbsp;&amp;nbsp;मौसम के साथ खाना क्यों बदलना चाहिए?&amp;nbsp;हमारा शरीर मौसम के हिसाब से काम करता है. सर्दियों में पाचन शक्ति तेज होती है, इसलिए भारी और देर से पचने वाला खाना भी आसानी से हजम हो जाता है. गर्मियों में पाचन धीमा पड़ जाता है और शरीर को ठंडक देने वाले, हल्के खाने वाली चीजें पसंद आती हैं.मानसून में पाचन सबसे ज्यादा कमजोर होता है, इसलिए साधा और हल्का खाना बेहतर रहता है. इसी वजह से पुराने समय में लोग हर मौसम में अलग-अलग अनाज की रोटी खाते थे.&amp;nbsp;&amp;nbsp;गेहूं की रोटी हर मौसम के लिए कैसी है?&amp;nbsp;गेहूं की रोटी आज सबसे ज्यादा खाई जाती है. यह आसानी से मिल जाती है, बनाना भी आसान है और ज्यादातर लोगों को सूट करती है. गेहूं की रोटी वसंत ऋतु और हल्की सर्दी में सबसे अच्छी मानी जाती है. इस समय पाचन न बहुत तेज होता है, न बहुत कमजोर. गेहूं शरीर को अच्छी एनर्जी देता है और पेट को भरा-भरा रखता है, लेकिन बहुत ज्यादा गर्मी या कड़ाके की ठंड में सिर्फ गेहूं की रोटी खाते रहना हर किसी के लिए सही नहीं होता है. गर्मियों में यह कुछ लोगों को भारी लग सकती है और सर्दियों में शरीर को ज्यादा गर्माहट देने के लिए यह पर्याप्त नहीं होती हैं&amp;nbsp;बाजरे की रोटी में कितनी ताकत होती है?
बाजरे की रोटी खासतौर पर सर्दियों के लिए मानी जाती है. बाजरा गर्म तासीर का अनाज है, यानी यह शरीर में गर्मी पैदा करता है. ठंड के मौसम में जब शरीर को ज्यादा एनर्जी और ताकत की जरूरत होती है, तब बाजरे की रोटी बहुत फायदेमंद होती है. यह गेहूं से भारी होती है और देर से पचती है, लेकिन सर्दियों में यही बात इसे खास बनाती है. बाजरे की रोटी अक्सर घी, मक्खन या गुड़ के साथ खाई जाती है ताकि इसकी सूखी प्रकृति संतुलित हो जाए और पाचन आसान रहे.&amp;nbsp;&amp;nbsp;रागी की रोटी कितनी हेल्दी है?
रागी की रोटी गर्मियों के लिए बेहतर मानी जाती है. यह शरीर को ठंडक देती है और पेट पर भारी नहीं पड़ती है. गर्मी के मौसम में जब भूख कम लगती है और पाचन कमजोर रहता है, तब रागी पेट को शांत रखने में मदद करती है. यही कारण है कि दक्षिण भारत में रागी को गर्मियों में ज्यादा खाया जाता है. हालांकि, सर्दियों में बहुत ज्यादा रागी खाने से कुछ लोगों को शरीर में जकड़न या ठंड महसूस हो सकती है, इसलिए ठंड के मौसम में इसका सीमित सेवन ही अच्छा रहता है.
ज्वार और मक्का की रोटी
ज्वार और मक्का की रोटियां पेट को देर तक भरा रखती हैं, लेकिन ये स्वभाव से सूखी होती हैं. इन्हें पचाने के लिए अच्छी पाचन शक्ति की जरूरत होती है. इसी वजह से ये रोटियां ज्यादातर उन लोगों को सूट करती हैं जो शारीरिक मेहनत ज्यादा करते हैं, जैसे किसान या मजदूर. अगर आप इन्हें खाते हैं, तो साथ में सब्जी, दाल या थोड़ा घी जरूर लें, ताकि पेट पर जोर न पड़े.
यह भी पढ़ें - उंगलियों में महसूस हो रही है झुनझुनी, कहीं इस विटामिन की कमी तो नहीं? ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 05 Feb 2026 10:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>गेहूं, बाजरा, या, रागी, जानिए, किस, मौसम, में, कौन-सी, रोटी, खाना, है, सेहत, के, लिए, बेहतर</media:keywords>
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        <title>बजट का बड़ा हिस्सा हेल्थ सेक्टर पर नहीं हो रहा खर्च, सरकार की स्वास्थ्य नीतियों पर उठे सवाल</title>
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        <description><![CDATA[ स्वास्थ्य हर देश की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक होता है. एक मजबूत और स्वस्थ समाज के बिना देश की प्रगति संभव नहीं है. &amp;nbsp;भारत में पिछले कुछ सालों में स्वास्थ्य सेवाओं और अस्पतालों की स्थिति सुधारने के लिए कई योजनाएं शुरू की गई हैं, लेकिन सरकारी बजट की असल तस्वीर कुछ और ही कहती है. भारत सरकार ने 2018 में स्वास्थ्य और शिक्षा के लिए एक विशेष सेस (कर) लागू किया था. इसे स्वास्थ्य खर्च बढ़ाने और देश की जनता, खासकर बीपीएल (गरीब) और ग्रामीण परिवारों की स्वास्थ्य जरूरतों को पूरा करने के लिए पेश किया गया. आम धारणा यह थी कि इस सेस से स्वास्थ्य क्षेत्र में खर्च बढ़ेगा और सरकार की मौजूदा स्वास्थ्य बजट का समर्थन होगा. लेकिन आंकड़े और बजट के विवरण बताते हैं कि असलियत इसके बिल्कुल उलट है.&amp;nbsp;
स्वास्थ्य पर खर्च घटा, जबकि सेस वसूला जा रहा
स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए सरकार का कुल बजट खर्च अब पहले की तुलना में कम है. 2017-18 में, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण पर खर्च कुल सरकारी खर्च का 2.4 प्रतिशत था. लेकिन 2026-27 के बजट अनुमान में यह घटकर सिर्फ 1.9 प्रतिशत रह गया है. अगर इसे जीडीपी के अनुपात में देखें, तो यह 0.28 प्रतिशत से गिरकर 0.26 प्रतिशत हो गया है. &amp;nbsp;ध्यान देने वाली बात यह है कि 2026-27 में स्वास्थ्य सेस से जो पैसा इकट्ठा &amp;nbsp;किया गया है,
वह स्वास्थ्य बजट के कुल खर्च का लगभग 30 प्रतिशत है यानी अगर इस सेस को निकाल दें, तो स्वास्थ्य पर खर्च कुल बजट का सिर्फ 1.3 प्रतिशत होगा, जो 2017-18 की तुलना में आधा भी नहीं है. इसका मतलब यह है कि सेस सिर्फ खर्च बढ़ाने का दिखावा कर रहा है, लेकिन असल में स्वास्थ्य पर खर्च घट रहा है. अगर सेस नहीं होता, तो स्वास्थ्य क्षेत्र का बजट जीडीपी का सिर्फ 0.18 प्रतिशत होता है.&amp;nbsp;
बजट के आंकड़े क्या बताते हैं?&amp;nbsp;आंकड़े स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि भारत सरकार का स्वास्थ्य पर वास्तविक खर्च लगातार घट रहा है, भले ही बजट में सेस के कारण थोड़ी बढ़ोतरी दिखती हो. कुल सरकारी खर्च में स्वास्थ्य का हिस्सा 2017-18 में 2.4 प्रतिशत था, जो 2026-27 में घटकर 1.9 प्रतिशत रह गया है. अगर सेस को हटाकर देखा जाए, तो यह हिस्सा और भी कम, सिर्फ 1.3 प्रतिशत है. जीडीपी के अनुपात में भी यही गिरावट नजर आती है. 0.28 प्रतिशत से घट कर 0.26 प्रतिशत हो गया है, और सेस को हटाने पर यह केवल 0.18 प्रतिशत रह जाता है. इसका मतलब है कि सेस के बावजूद स्वास्थ्य क्षेत्र को मिलने वाला वास्तविक बजट लगातार कम हो रहा है और यह राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के लक्ष्यों से बहुत पीछे है.&amp;nbsp;&amp;nbsp;राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति का लक्ष्य&amp;nbsp;
राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के अनुसार, 2025 तक स्वास्थ्य पर खर्च को जीडीपी का 2.5 प्रतिशत करना था. इसमें केंद्रीय सरकार का हिस्सा लगभग 0.9 प्रतिशत जीडीपी होना चाहिए था. लेकिन वर्तमान में स्वास्थ्य पर खर्च जीडीपी का सिर्फ 0.26 प्रतिशत है, यानी लक्ष्य से लगभग तीन गुना कम, अगर 2017 के समान कुल बजट का 2.4 प्रतिशत स्वास्थ्य पर खर्च किया जाता, तो 2026-27 में बिना सेस के बजट लगभग 1.2 लाख करोड़ रुपये होना चाहिए था. लेकिन वास्तविक खर्च सेस सहित भी केवल 1 लाख करोड़ रुपये है.&amp;nbsp;
सेस का असली मकसद और कमी
विशेषज्ञों का कहना है कि स्वास्थ्य और शिक्षा सेस सिर्फ खर्च बढ़ाने का भ्रम पैदा करता है. सेस का पैसा मुख्य बजट के बाहर एक रिजर्व फंड में जाता है और इस पर कोई पारदर्शिता या परिणाम मापने की जरूरत नहीं होती है. 2018-19 और 2019-20 में स्वास्थ्य के लिए जो सेस वसूला गया, वह सामान्य राजस्व में चला गया. लगभग 20,600 करोड़ रुपये जो स्वास्थ्य के लिए इकट्ठा किए गए थे, उनका कोई खास इस्तेमाल नहीं हुआ.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 05 Feb 2026 10:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>उंगलियों में महसूस हो रही है झुनझुनी, कहीं इस विटामिन की कमी तो नहीं?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/उंगलियों-में-महसूस-हो-रही-है-झुनझुनी-कहीं-इस-विटामिन-की-कमी-तो-नहीं</link>
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        <description><![CDATA[ कई बार ऐसा लगता है जैसे उंगलियों पर चींटियां चल रही हों. कभी-कभी हल्का सा छूने पर भी अजीब सी तकलीफ महसूस होती है और कुछ देर बाद वह हिस्सा बिल्कुल सुन्न पड़ जाता है. अक्सर लोग इसे थकान, गलत तरीके से बैठने या देर तक एक ही पोजीशन में रहने का असर समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. लेकिन अगर यह समस्या बार-बार होने लगे या बिना किसी खास वजह के महसूस हो, तो यह शरीर के अंदर चल रही किसी कमी की ओर इशारा हो सकती है.
डॉक्टरों के अनुसार, हाथ-पैरों में झुनझुनी या सुन्नपन की सबसे आम वजहों में विटामिन और मिनरल की कमी शामिल है. खासतौर पर कुछ ऐसे विटामिन हैं जिनका सीधा संबंध हमारी नसों से होता है. जब इनकी मात्रा शरीर में कम हो जाती है, तो नसें सही तरीके से काम नहीं कर पातीं और हमें झनझनाहट, जलन या सुन्नपन महसूस होने लगता है. तो आइए जानते हैं कि उंगलियों में झुनझुनी आखिर क्यों होती है और किस विटामिन की कमी इसके पीछे सबसे बड़ी वजह बनती है.&amp;nbsp;
किस विटामिन की कमी से उंगलियों में झुनझुनी होती है?
हाथ-पैरों और उंगलियों में झुनझुनी होने की सबसे आम और गंभीर वजह विटामिन B12 की कमी मानी जाती है. विटामिन B12 हमारे शरीर में नसों को स्वस्थ रखने, नए ब्लड सेल्स बनाने और डीएनए के निर्माण में अहम भूमिका निभाता है. जब शरीर में इस विटामिन की कमी हो जाती है, तो नसें कमजोर होने लगती हैं. इसका असर सबसे पहले हाथों और पैरों की उंगलियों में महसूस होता है.
विटामिन B12 की कमी के लक्षण&amp;nbsp;विटामिन B12 की कमी सिर्फ झुनझुनी तक सीमित नहीं रहती, बल्कि इससे शरीर में कई तरह की समस्याएं दिखने लगती हैं, जैसे हाथों और पैरों में झुनझुनी या सुन्नपन, हर समय थकान और कमजोरी महसूस होना, मांसपेशियों में कमजोरी, त्वचा का पीला पड़ना, भूख कम लगना, बिना वजह वजन कम होना, मुंह में छाले, चिड़चिड़ापन और उदासी महसूस होना, ध्यान लगाने में परेशानी, डिप्रेशन जैसा महसूस होना. अगर लंबे समय तक B12 की कमी बनी रहे, तो नसों को स्थायी नुकसान भी हो सकता है.
विटामिन B12 की कमी कैसे पूरी करें?
विटामिन B12 पाने के लिए आप अपनी डाइट में दूध और दूध से बनी चीजें (दही, पनीर, चीज), अंडे, मछली, चिकन और लाल मांस, विटामिन B12 से फोर्टिफाइड ब्रेकफास्ट सीरियल, फोर्टिफाइड प्लांट मिल्क ये चीजें शामिल कर सकते हैं. अगर कमी ज्यादा हो, तो डॉक्टर की सलाह से विटामिन B12 सप्लीमेंट या इंजेक्शन भी लिया जा सकता है.&amp;nbsp;
हाथ-पैरों में झुनझुनी क्या है?
हाथ-पैरों में होने वाली इस अजीब सी समस्या को मेडिकल भाषा में पैरेस्थेसिया कहा जाता है. यह तब होती है जब नसों पर दबाव पड़ता है या नसें क्षतिग्रस्त होने लगती हैं. कभी-कभी यह समस्या अस्थायी होती है, जैसे देर तक एक ही पोजीशन में बैठने या सोने से, लेकिन अगर यह बार-बार होने लगे, तो यह किसी अंदरूनी बीमारी या पोषण की कमी का संकेत हो सकता है.&amp;nbsp;&amp;nbsp;झुनझुनी के अन्य कारण&amp;nbsp;विटामिन B12 के अलावा भी कुछ कारण हाथ-पैरों में झुनझुनी पैदा कर सकते हैं, जैसे डायबिटीज (जिससे नसों को नुकसान होता है), रीढ़ की हड्डी या नर्व से जुड़ी समस्याएं, किसी प्रकार का संक्रमण, चोट या दुर्घटना और लंबे समय तक शराब का सेवन.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 04 Feb 2026 18:30:11 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Male Ageing Vs Female Ageing: 30 की उम्र में ही दिखने लगते हैं अंकल, औरतों के बजाय पुरुषों में क्यों आता है जल्दी बुढ़ापा?</title>
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        <description><![CDATA[ Why Men Age Faster Than Women: आमतौर पर महिलाएं पुरुषों की तुलना में ज्यादा लंबी उम्र तक जीती हैं. लेकिन सवाल यह है कि उम्र बढ़ने की रफ्तार किसमें तेज होती है? कौन बेहतर तरीके से उम्र के साथ ढलता है? उम्र, सेहत और शरीर के काम करने के तरीके पर कई फैक्टर असर डालते हैं. एक सच्चाई यह भी है कि दुनिया के लगभग हर हिस्से में महिलाएं पुरुषों से ज्यादा जीती हैं. इसके पीछे वैज्ञानिकों ने कई वजहें बताई हैं.
एक थ्योरी यह है कि पुरुष ज्यादा जोखिम वाले काम करते हैं और खतरनाक पेशों में उनकी भागीदारी ज्यादा होती है, जैसे सेना या भारी उद्योग. आंकड़ों के हिसाब से यह अंतर की एक वजह हो सकती है, लेकिन पूरी कहानी सिर्फ इतनी नहीं है. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर रिसर्च क्या कहते हैं.
पुरुषों की उम्र जल्दी क्यों बढ़ती है?
Verywellhealth की रिपोर्ट के अनुसार,उम्र बढ़ने के साथ शरीर में कई तरह के हार्मोनल बदलाव आते हैं, जो यह तय करते हैं कि हम कैसे बूढ़े होते हैं, कितना मजबूत महसूस करते हैं और शरीर कैसे काम करता है. अक्सर हार्मोन को पुरुष या महिला से जोड़ दिया जाता है, जबकि सच्चाई यह है कि हर व्यक्ति में सभी तरह के हार्मोन मौजूद होते हैं, फर्क सिर्फ उनकी मात्रा का होता है. उम्र के साथ ये हार्मोन धीरे-धीरे कम होने लगते हैं और इसका सीधा असर शरीर और दिमाग पर पड़ता है.
पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन नामक हार्मोन मांसपेशियों, हड्डियों और शारीरिक ताकत को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है. जैसे-जैसे इसकी मात्रा घटती है, शरीर कमजोर महसूस करने लगता है. पेट के आसपास चर्बी बढ़ सकती है, संतुलन बिगड़ सकता है और गिरने या चोट लगने का खतरा बढ़ जाता है. लंबे समय तक यह कमी स्लीप एपनिया, डिप्रेशन, मोटापा, डायबिटीज और किडनी या लिवर से जुड़ी समस्याओं से भी जुड़ी पाई गई है. रिसर्च बताते हैं कि पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन जितना तेजी से गिरता है, उम्र उतनी ही कम हो सकती है.
महिलाओं में क्या होता है बदलाव?
महिलाओं में यही हार्मोन एस्ट्रोजन के निर्माण में मदद करता है, जो उनके शरीर के कई जरूरी काम संभालता है. जब यह हार्मोन घटता है, तो वजन बढ़ना, हड्डियों का कमजोर होना, भावनात्मक बदलाव और शारीरिक क्षमता में कमी देखी जा सकती है. एस्ट्रोजन सूजन कम करने, मांसपेशियों की मरम्मत, नसों के स्वास्थ्य और हड्डियों की मजबूती में भी भूमिका निभाता है. पुरुषों में इसका स्तर धीरे-धीरे घटता है, जबकि महिलाओं में मेनोपॉज के दौरान यह अचानक बहुत तेजी से कम हो जाता है.
हार्मोन का असर फिजिकल रिलेशन पर भी पड़ता है. पुरुषों में यह बदलाव धीरे-धीरे आता है, जबकि महिलाओं में मेनोपॉज के बाद इसमें बड़ा बदलाव देखा जाता है. उम्र बढ़ने के साथ दोनों में फिजिकल रिलेशन कम हो सकता है, लेकिन ज्यादातर लोगों में 50 की उम्र तक यह सामान्य बना रहता है.
ब्रेन पर भी होता है असर
दिमाग की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया भी पुरुषों और महिलाओं में अलग-अलग होती है. रिसर्च के मुताबिक औसतन पुरुषों का दिमाग व्यावहारिक रूप से महिलाओं की तुलना में थोड़ा ज्यादा उम्र का हो सकता है. हालांकि, दिमाग के बूढ़े होने की रफ्तार हर व्यक्ति में अलग होती है और यह वजन, डायबिटीज, स्ट्रोक, सामाजिक जुड़ाव और लाइफस्टाइल जैसे कई फैक्टर्स पर निर्भर करती है.
ये भी होते हैं कारण
इन सबके अलावा जेनेटिक्स, खान-पान, नींद, फिजिकल एक्टिविटी और पर्यावरण भी उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं, जेनेटिक्स को बदला नहीं जा सकता, लेकिन बाकी चीजों पर ध्यान देकर उम्र के असर को काफी हद तक धीमा किया जा सकता है.
ये भी पढ़ें-कुछ लोग बिना डाइट और जिम जाए भी क्यों होते हैं पतले? जान लें कारण&amp;nbsp;
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 04 Feb 2026 18:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>LED Light Side Effects: कमरे में लगी हैं LED लाइट्स तो हो जाइए सावधान, जानें कैसे कर रहीं दिमाग को कंफ्यूज</title>
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        <description><![CDATA[ How Blue Light Affects Biological Clock: भले ही LED और दूसरी आर्टिफिशियल लाइट्स को पर्यावरण के अनुकूल माना जाता हो, लेकिन इनसे निकलने वाली ब्लू लाइट नींद पर बुरा असर डाल सकती है और बीमारियों का खतरा बढ़ा सकती है. हॉर्वर्ड मेडिकल स्कूल में पब्लिश एक रिसर्च पेपर के अनुसार, आर्टिफिशियल रोशनी के आने से पहले सूर्य ही रोशनी का मुख्य सोर्स था और लोग शाम के समय काफी हद तक अंधेरे में रहते थे, आज हालात बदल चुके हैं शाम होते ही चारों तरफ रोशनी रहती है और हम इसे सामान्य मान लेते हैं.&amp;nbsp;
लेकिन इस रोशनी की कीमत हमें सेहत के रूप में चुकानी पड़ सकती है. रात के समय रोशनी शरीर की बायोलॉजिकल क्लॉक यानी सर्केडियन रिदम को बिगाड़ देती है. &amp;nbsp;इससे नींद प्रभावित होती है और रिसर्च बताती है कि आगे चलकर यह कैंसर, डायबिटीज़, हार्ट डिजीज और मोटापे जैसी समस्याओं का भी कारण बन सकती है.&amp;nbsp;
ब्लू लाइट क्या है?
हर रंग की रोशनी का असर एक जैसा नहीं होता. ब्लू वेवलेंथ दिन के समय फायदेमंद होती हैं, ये ध्यान, रिएक्शन टाइम और मूड को बेहतर बनाती हैं. लेकिन रात में यही ब्लू लाइट सबसे ज्यादा नुकसानदायक साबित होती है. स्क्रीन वाले इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस और एनर्जी-एफिशिएंट लाइटिंग के बढ़ते इस्तेमाल से सूर्यास्त के बाद ब्लू लाइट के संपर्क में रहने का समय लगातार बढ़ रहा है.
रोशनी और नींद
हर व्यक्ति की सर्केडियन रिदम थोड़ी अलग होती है, लेकिन औसतन यह लगभग 24 घंटे 15 मिनट की होती है. देर रात तक जागने वालों की बायोलॉजिकल क्लॉक थोड़ी लंबी होती है, जबकि जल्दी सोने-जागने वालों की थोड़ी छोटी. हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के डॉ. चार्ल्स जाइस्लर ने 1981 में दिखाया था कि दिन की प्राकृतिक रोशनी शरीर की अंदरूनी घड़ी को वातावरण के साथ तालमेल में रखती है.
क्या रात की रोशनी वाकई नुकसानदायक है?
कुछ स्टडीज में यह संकेत मिला है कि रात में रोशनी के संपर्क में रहना, जैसे नाइट शिफ्ट में काम करना, डायबिटीज, हार्ट रोग और मोटापे से जुड़ा हो सकता है. हालांकि, यह पूरी तरह साबित नहीं हुआ है कि रात की रोशनी ही इन बीमारियों की सीधी वजह है, और इसके पीछे के कारणों पर अभी और शोध की जरूरत है.&amp;nbsp;
एलईडी से क्या होती है दिक्कत
Vision Lighting के अनुसार, LED लाइट्स में बहुत तेजी से ऑन-ऑफ होने वाला फ्लिकर होता है, जिसे आंखें भले न देखें, लेकिन दिमाग महसूस करता है. इससे आंखों में थकान, सिरदर्द, चिड़चिड़ापन और रात में बेचैनी बढ़ सकती है. दूसरी ओर, नीली रोशनी दिमाग को दिन होने का संकेत देती है और मेलाटोनिन हार्मोन को दबा देती है. रिसर्च बताती है कि रात में नीली रोशनी के संपर्क से नींद देर से आती है. यही वजह है कि आधुनिक घरों की तेज LED लाइटें नींद की समस्याओं को बढ़ा रही हैं.
ये भी पढ़ें-कुछ लोग बिना डाइट और जिम जाए भी क्यों होते हैं पतले? जान लें कारण&amp;nbsp;
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 04 Feb 2026 14:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>World Cancer Day 2026: हर साल बढ़ रहा कैंसर का ग्राफ, एक्सपर्ट से जानें वे संकेत, जिन्हें नजरअंदाज करना पड़ता है भारी</title>
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        <description><![CDATA[ Cancers Increasing In Young Adults: दुनियाभर में हर साल 4 फरवरी को वर्ल्ड कैंसर डे मनाया जाता है, लेकिन 2026 में इसकी अहमियत पहले से कहीं ज्यादा महसूस की जा रही है. दुनिया भर में कैंसर लगातार लाखों जिंदगियों को प्रभावित कर रहा है. इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर के अनुसार, साल 2022 में वैश्विक स्तर पर करीब 2 करोड़ नए कैंसर मामले सामने आए और लगभग 97 लाख लोगों की मौत कैंसर से जुड़ी वजहों से हुई.
भारत में स्थिति काफी गंभीर
भारत में भी स्थिति चिंताजनक है. यहां कैंसर के मामलों में लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है. साल 2019 में जहां करीब 13.5 लाख केस दर्ज हुए थे, वहीं 2024 तक यह संख्या बढ़कर 15.3 लाख तक पहुंच गई. 2020 में 13.9 लाख, 2021 में 14.2 लाख, 2022 में 14.6 लाख और 2023 में 14.9 लाख कैंसर के मामले सामने आए. यानी हर साल आंकड़े नई चेतावनी दे रहे हैं.&amp;nbsp;
इस बार क्या है थीम
वर्ल्ड कैंसर डे 2026 की थीम है &#039;United by Unique&#039;. अगर इसके मतलब की बात करें, तो इसका मतलब है कि हर मरीज की कैंसर जर्नी अलग होती है, लेकिन मकसद सबका एक ही है, बेहतर इलाज, बेहतर सपोर्ट और बेहतर नतीजे. यह थीम बीमारी से ज़्यादा इंसान को केंद्र में रखती है और ऐसे हेल्थ सिस्टम की बात करती है जो हर व्यक्ति की ज़रूरत को समझे और उसके मुताबिक देखभाल करे.
वर्ल्ड कैंसर डे सिर्फ सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित नहीं होना चाहिए. यह दिन हमें याद दिलाता है कि कैंसर के खिलाफ व्यक्तिगत और सामूहिक, दोनों स्तरों पर कदम उठाने की जरूरत है. अर्ली डिटेक्शन यानी समय रहते पहचान, जान बचा सकती है, लेकिन आज भी कई जगह स्क्रीनिंग टेस्ट नियमित रूप से नहीं होते. ब्रेस्ट, सर्वाइकल, ओरल और कोलोरेक्टल कैंसर की जांच को लोग टालते रहते हैं.&amp;nbsp;
एक्सपर्ट क्या कहते हैं?
टीओआई हेल्थ से बात करते हुए डॉ. वैशाली जामरे ने बताया &amp;nbsp;कि अगर किसी एक जांच के लिए लोगों को तैयार करना हो, तो वह मैमोग्राफी होगी. शुरुआती स्टेज का ब्रेस्ट कैंसर अक्सर बिना दर्द और लक्षण के होता है, ऐसे में मैमोग्राफी से बीमारी को पहले ही पकड़ लिया जाता है, जिससे इलाज आसान और सर्वाइवल के चांस बेहतर हो जाते हैं. वह यह भी बताती हैं कि लोग कई बार बिना दर्द की गांठ, अचानक वजन घटना, लगातार थकान, लंबी खांसी, ब्लीडिंग, न भरने वाले घाव या त्वचा में बदलाव जैसे संकेतों को गंभीरता से नहीं लेते. वहीं आजकल युवाओं में भी ब्रेस्ट, कोलोरेक्टल, थायरॉइड, एंडोमेट्रियल और स्किन कैंसर के मामले बढ़ रहे हैं, जिन्हें सही समय पर टेस्ट से पकड़ा जा सकता है.
ये भी पढ़ें-कुछ लोग बिना डाइट और जिम जाए भी क्यों होते हैं पतले? जान लें कारण&amp;nbsp;
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 04 Feb 2026 14:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>Signs Of Kidney Disease In Eyes: आपकी आंखें भी दे सकती हैं किडनी की बीमारी का संकेत, डॉक्टर से जानें इन 5 लक्षणों का सच</title>
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        <description><![CDATA[ Eye Symptoms Of Kidney Disease: आमतौर पर आंखों को दिल का आईना कहा जाता है, लेकिन सच यह है कि आंखें आपकी किडनी की सेहत के बारे में भी बहुत कुछ बता सकती हैं. किडनी और आंखों की बनावट व काम करने की क्षमताओं में कई समानताएं होती हैं, इसलिए जब किडनी ठीक से काम नहीं करती, तो उसके संकेत कई बार सबसे पहले आंखों में दिखने लगते हैं.
अधिकतर लोग किडनी की बीमारी को पैरों में सूजन या लगातार थकान से जोड़कर देखते हैं, लेकिन कुछ अहम लक्षण ऐसे भी होते हैं जो आंखों के जरिए सामने आते हैं. नई दिल्ली स्थित विजन आई केयर सेंटर के कंसल्टेंट ऑप्थैल्मोलॉजिस्ट डॉ. प्रणव कृष्ण पटेल के मुताबिक, अगर इन संकेतों को समय रहते पहचान लिया जाए, तो गंभीर जटिलताओं से बचा जा सकता है.
पफी आईलिड्स
सुबह उठते ही आंखों के आसपास सूजन दिखना किडनी की गड़बड़ी का शुरुआती संकेत हो सकता है. जब किडनी प्रोटीन को ठीक से फिल्टर नहीं कर पाती, तो शरीर में फ्लूड जमा होने लगता है, जिसका असर सबसे पहले आंखों के नाजुक हिस्से पर दिखता है. ऐसे में नमक का सेवन कम करना, प्रोटीन लेवल पर नजर रखना और किडनी फंक्शन टेस्ट कराना जरूरी है.
धुंधली नजर
किडनी की बीमारी से जुड़ा हाई ब्लड प्रेशर या बढ़ा हुआ ब्लड शुगर आंखों की रेटिना की महीन नसों को नुकसान पहुंचा सकता है, जिससे नजर धुंधली होने लगती है. यह बदलाव कई बार धीरे-धीरे होता है, इसलिए नियमित आई चेकअप और बीपी व शुगर को कंट्रोल में रखना बेहद जरूरी है.
आंखों में सूखापन
जब किडनी ठीक से काम नहीं करती, तो शरीर में टॉक्सिन जमा होने लगते हैं. इसका असर आंसुओं के निर्माण पर भी पड़ सकता है, जिससे आंखों में सूखापन, जलन या रेत जैसी चुभन महसूस होती है. पर्याप्त पानी पीना, लुब्रिकेटिंग आई ड्रॉप्स का इस्तेमाल और लक्षण बने रहने पर डॉक्टर को बताना जरूरी है, खासकर अगर साथ में थकान या सूजन भी हो.
लाल या ब्लडशॉट आंखें
आंखों में जरूरत से ज्यादा लाल नसें दिखना या आंखों का लगातार लाल रहना हाई ब्लड प्रेशर या शरीर में टॉक्सिन जमा होने का संकेत हो सकता है, जो अक्सर किडनी की गंभीर अवस्था से जुड़ा होता है. ऐसे में शराब, कैफीन और प्रोसेस्ड फूड से दूरी बनाना और अन्य लक्षणों के साथ यह समस्या हो तो मेडिकल जांच कराना जरूरी है.
आंखों का पीला पड़ना
अगर किडनी फेल होने के कारण शरीर में यूरिया जैसे जहरीले तत्व बढ़ जाएं या लिवर पर असर पड़ने लगे, तो आंखों का सफेद हिस्सा पीला दिख सकता है. यह स्थिति मेडिकल इमरजेंसी मानी जाती है और तुरंत विशेषज्ञ से संपर्क करना जरूरी होता है.
आंखें सिर्फ देखने का जरिया नहीं हैं, बल्कि आपकी किडनी की सेहत का भी संकेत देती हैं, इन बदलावों को नजरअंदाज न करें, क्योंकि समय पर पहचान और इलाज आपकी जान बचा सकता है.
इसे भी पढ़ें- Causes Of Body Lumps: शरीर पर बार-बार आ रही है सूजन या बन रही है गांठ, जानिए कब हो जाना चाहिए सावधान?
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 04 Feb 2026 10:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>High Protein Vegetarian Diet: सस्ता भी और दमदार भी! महज इतने रुपये में मिलेगा 100 ग्राम प्रोटीन, जानें पूरे दिन का मील प्लान</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/high-protein-vegetarian-diet-सस्ता-भी-और-दमदार-भी-महज-इतने-रुपये-में-मिलेगा-100-ग्राम-प्रोटीन-जानें-पूरे-दिन-का-मील-प्लान</link>
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        <description><![CDATA[ How To Get 100g Protein On A Vegetarian Diet: शाकाहारी डाइट में पर्याप्त प्रोटीन लेना अक्सर जरूरत से ज्यादा मुश्किल बताकर पेश किया जाता है. फिटनेस कंटेंट देखिए तो ऐसा लगता है जैसे बिना व्हे प्रोटीन, इम्पोर्टेड सुपरफूड्स या सख्त मील प्लान के प्रोटीन टारगेट पूरा ही नहीं हो सकता. लेकिन हकीकत इससे अलग है. भारतीय किचन में पहले से ही ऐसे कई फूड्स मौजूद हैं, जिनसे एक मजबूत हाई-प्रोटीन वेज डाइट बनाई जा सकती है, बस सही चुनाव और बेहतर कॉम्बिनेशन की जरूरत होती है.
यही बात न्यूट्रिशनिस्ट खुशी छाबड़ा &amp;nbsp;ने अपने इंस्टाग्राम पोस्ट में समझाई है. उन्होंने यह मिथक तोड़ा है कि प्रोटीन पूरा करने के लिए मांस या सप्लीमेंट जरूरी हैं. उनका कहना है कि बिना व्हे, पूरी तरह शाकाहारी और बजट-फ्रेंडली डाइट से भी रोज़ाना 100 ग्राम प्रोटीन हासिल किया जा सकता है. उनके अनुसार-
दिन की शुरुआत में इसका रखें ध्यान
खुशी छाबड़ा बताती हैं कि सुबह की शुरुआत भुने हुए अलसी के बीजों से की जा सकती है, जिससे करीब 2 ग्राम प्रोटीन मिलता है. चाहें तो कद्दू के बीज या चिया सीड्स भी शामिल किए जा सकते हैं.&amp;nbsp;
&amp;nbsp;बिना भारी कुकिंग के प्रोटीन वाला नाश्ता
अब बात करते हैं नाश्ते की, तो आप इसमें होल व्हीट वेज पनीर सैंडविच के साथ ग्रीक योगर्ट या स्कायर योगर्ट लिया जा सकता है. इससे करीब 15 ग्राम प्रोटीन मिलता है. जो लोग पनीर नहीं खाते, उनके लिए टोफू एक आसान विकल्प है.
मिड-मॉर्निंग के लिए क्या है विकल्प?
मिड-मॉर्निंग में आपके पास बादाम और अमरूद जैसे फलों का कॉम्बिनेशन है, इसमें करीब 6 ग्राम प्रोटीन आपको मिलता है. यह एनर्जी बनाए रखने में मदद करता है और साथ ही साथ मील्स के बीच लंबा गैप नहीं होने देता.
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लंच में आपके पास क्या होता है विकल्प?
आप बात करते हैं दोपहर के खाने की. लंच में सबसे ज्यादा प्रोटीन मिलता है करीब 41 ग्राम. इसमें होल व्हीट चपाती, मसाला सोया चंक्स, मूंग दाल और सब्जियां शामिल हैं. विकल्प के तौर पर मसूर दाल या टोफू भी लिया जा सकता है.
जंक के बिना शाम का स्नैक
शाम को मखाना वेज चाट, ऊपर से टोफू और बीज डालकर, साथ में अदरक की चाय ली जा सकती है. इससे लगभग 13 ग्राम प्रोटीन मिलता है.
डिनर में क्या खास?
रात के खाने में बेसन चिल्ला, चटनी और रायता शामिल किया गया है, जिससे करीब 26 ग्राम प्रोटीन मिलता है. इसमें आपके पास मूंग दाल चिल्ला या टोफू बेस्ड रायता भी अच्छे विकल्प हैं. पूरे दिन का यह प्लान करीब 103 ग्राम प्रोटीन, 1500 से 1800 कैलोरी देता है और इसकी लागत लगभग 220 रुपये प्रति दिन बताई गई है.
&amp;nbsp;ये भी पढ़ें:&amp;nbsp;Alzheimer Disease: अल्जाइमर ने छीनी याददाश्त, पर नहीं मिटा पाया मुहब्बत, बीमारी से जूझते शख्स ने कैसे जिंदा रखा अपना रिश्ता?
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 03 Feb 2026 14:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>High, Protein, Vegetarian, Diet:, सस्ता, भी, और, दमदार, भी, महज, इतने, रुपये, में, मिलेगा, 100, ग्राम, प्रोटीन, जानें, पूरे, दिन, का, मील, प्लान</media:keywords>
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        <title>AIIMS Stroke Study: भारत में तेजी से बढ़ रहे स्ट्रोक के केस, 30 मिनट की धूप से होगी रिकवरी; सामने आई AIIMS की स्टडी</title>
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        <description><![CDATA[ Can Sunlight Improve Stroke Recovery: एम्स दिल्ली के डॉक्टरों की एक नई स्टडी में सामने आया है कि रोजाना सिर्फ 30 मिनट की धूप, अगर नियमित इलाज के साथ ली जाए, तो स्ट्रोक के मरीजों की रिकवरी बेहतर हो सकती है और उनकी जिंदगी में सुधार आ सकता है. यह स्टडी संस्थान के पांचवें रिसर्च डे के दौरान प्रस्तुत किया गया, जिसमें स्ट्रोक रिहैबिलिटेशन के लिए एक आसान और कम खर्च वाला विकल्प सामने आया है.
कई लोगों के लिए उपलब्ध नहीं होती थेरेपी
दरअसल, स्ट्रोक से उबरने की प्रक्रिया अक्सर लंबी और चुनौतीपूर्ण होती है. मरीजों को लंबे समय तक थेरेपी की जरूरत पड़ती है, जो कई लोगों के लिए महंगी या आसानी से उपलब्ध नहीं होती. देश में स्ट्रोक का बोझ लगातार बढ़ रहा है. ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज से जुड़े आंकड़ों के मुताबिक, साल 2021 में भारत में करीब 12.5 लाख नए स्ट्रोक के मामले सामने आए थे, जबकि लगभग 94 लाख लोग स्ट्रोक के लंबे समय के प्रभावों के साथ जीवन बिता रहे थे.
एम्स के डॉक्टरों ने यह जानने की कोशिश की कि क्या प्राकृतिक धूप, अगर स्टैंडर्ड पोस्ट-स्ट्रोक इलाज के साथ जोड़ी जाए, तो रिकवरी में सुरक्षित रूप से मदद कर सकती है. स्टडी में पाया गया कि जिन मरीजों को नियमित इलाज के साथ धूप दी गई, उनमें केवल सामान्य इलाज लेने वाले मरीजों की तुलना में स्ट्रोक से जुड़ी लाइफ कहीं बेहतर रही. इसके अलावा, नींद और मूड में भी सुधार देखा गया और किसी गंभीर साइड इफेक्ट की जानकारी नहीं मिली.
यह स्टडी नवंबर 2023 से अप्रैल 2025 के बीच किया गया. इसमें 18 से 80 वर्ष की उम्र के ऐसे मरीज शामिल थे, जिन्हें पिछले एक महीने के भीतर मध्यम स्तर का स्ट्रोक हुआ था. 200 से अधिक मरीजों की जांच के बाद 40 मरीजों को चुना गया और उन्हें दो समूहों में बांटा गया.
कैसे निकला रिजल्ट?
एक समूह को सामान्य मेडिकल और रिहैबिलिटेशन देखभाल दी गई, जबकि दूसरे समूह को वही इलाज देने के साथ-साथ 15 दिनों तक एक दिन छोड़कर एक दिन 30 मिनट धूप में बैठाया गया. धूप की तीव्रता को लक्स मीटर से मापा गया और इसे 10,000 से 25,000 लक्स के बीच रखा गया, जो हल्की आउटडोर धूप के बराबर होती है. पूरी प्रक्रिया के दौरान मरीजों की सुरक्षा पर खास नजर रखी गई.
रिसर्चर का क्या है कहना?
रिसर्चर का मानना है कि धूप शरीर की नींद की लय को सुधारने, विटामिन-D के स्तर को बेहतर करने और सूजन कम करने में मदद कर सकती है, जो स्ट्रोक के बाद रिकवरी के लिए अहम माने जाते हैं. यह रिसर्च न्यूरोलॉजी विभाग की टीम ने किया, जिसमें अवध किशोर पंडित, शिवम मिर्ग और अन्य शोधकर्ता शामिल थे. मरीजों को तीन महीने तक फॉलो-अप में रखा गया और उनकी दैनिक गतिविधियों, मूवमेंट, मूड, नींद और समग्र स्वास्थ्य का आकलन किया गया, हालांकि, ध्यान देने की बात यह है कि यह स्टडी सीमित मरीजों और एक ही केंद्र तक सीमित था.
क्या कहते हैं डॉक्टर?
&amp;nbsp;डॉक्टरों का कहना है कि इसके नतीजे अहम हैं, क्योंकि धूप मुफ्त, सुरक्षित और आसानी से उपलब्ध है. अगर बड़े स्तर पर होने वाले अध्ययनों में भी इसके नतीजे सही साबित होते हैं, तो यह घर पर रिकवरी कर रहे मरीजों और उन इलाकों के लिए खासतौर पर फायदेमंद हो सकता है, जहां रिहैबिलिटेशन सुविधाएं सीमित हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 02 Feb 2026 18:30:14 +0530</pubDate>
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        <title>पेट में बार&amp;बार हो रहा है दर्द तो हो जाएं सावधान, हो सकती है ये खतरनाक बीमारी</title>
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        <description><![CDATA[ 
अक्सर लोग पेट में होने वाले दर्द को मामूली गैस, थकान या गलत खानपान का असर मानकर नजरअंदाज कर देते हैं. लेकिन अगर पेट दर्द बार-बार हो रहा है और लंबे समय तक बना रहता है, तो यह किसी गंभीर अंदरूनी बीमारी का संकेत भी हो सकता है. पेट दर्द के साथ जलन, भारीपन, उल्टी जैसा मन होना, भूख कम लगना बार-बार दस्त या कब्ज, पेट फूलना, कमजोरी और थकान जैसे लक्षण दिखाई देना शरीर की चेतावनी हो सकती है.
कुछ मामलों में पेट दर्द के साथ सिर दर्द या चक्कर आने की भी शिकायत होती है. यह दर्द रोजमर्रा के कामों में परेशानी पैदा करने लगे तो इसे हल्के में लेना सही नहीं है. ऐसे में चलिए अब आपको बताते हैं कि अगर आपको बार-बार पेट दर्द हो रहा है तो कौन सी खतरनाक बीमारी हो सकती है. किन बीमारियों का संकेत हो सकता है पेट दर्द?एक्सपर्ट्स के अनुसार पेट में बार-बार दर्द कई तरह की बीमारियों से जुड़ा हो सकता है. इसमें इर्रिटेबल बॉवेल सिंड्रोम, सूजन आंत्र रोग, गैस्ट्रोएसोफेगल रिफ्लक्स डिजीज, सीलिएक रोग और गैस्ट्रोएंटेराइटिस जैसी समस्याएं शामिल है. इसके अलावा बैक्टीरियल संक्रमण, पित्ताशय की पथरी अपेंडिसाइटिस, पैनक्रिएटाइटिस और किडनी स्टोन भी पेट दर्द की वजह बन सकते हैं. कुछ लोगों में यह दर्द अल्सर, हर्निया, फूड एलर्जी फूड एलर्जी या लैक्टोज इनटॉलेरेंस के कारण भी हो सकता है. लंबे समय तक तनाव, गलत लाइफस्टाइल और संतुलित खानपान भी पेट से जुड़ी समस्याओं को बढ़ा सकते हैं. दर्द के साथ दिखें ये लक्षण तो रहे सतर्क अगर पेट दर्द के साथ बार-बार दस्त, खून वाला या कला मल, पेशाब में जलन, बुखार, निगलने में परेशानी, उल्टी में खून या अचानक वजन कम होने जैसे लक्षण दिखें तो यह किसी गंभीर बीमारी की ओर इशारा हो सकता है. ऐसे मामलों में तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी है. पेट दर्द से कैसे करें बचाव?
पेट से जुड़ी समस्याओं से बचने के लिए रोजमर्रा की आदतों में सुधार जरूरी है. समय पर संतुलित भोजन करें, ज्यादा तला-भुना, मसालेदार और गैस बनाने वाला खाना कम करें. पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं और हल्की एक्सरसाइज या टहलने की आदत डालें. खाने के तुरंत बाद लेटने से बचें और रात का खाना जल्दी खाएं. साफ सफाई और हाइजीन का ध्यान रखें. अगर किसी खास फूड से एलर्जी है, तो उसे डाइट से दूर रखें. तनाव कम करने के लिए योग और ध्यान भी फायदेमंद हो सकता है. डॉक्टर को कब दिखाना जरूरी?अगर पेट में दर्द 24 से 48 घंटे तक ठीक न हो, तेज दर्द हो जाए या बार-बार लौटकर आए तो डॉक्टर से जांच करना जरूरी है. उल्टी, दस्त में खून, तेज बुखार, कमजोरी या वजन तेजी से कम होना गंभीर संकेत हो सकते हैं. इसके अलावा बच्चों, बुजुर्ग और गंभीर गर्भवती महिलाओं में पेट दर्द को बिल्कुल भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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        <pubDate>Mon, 02 Feb 2026 18:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>सीने में दर्द ही नहीं, ये भी होते हैं हार्ट अटैक के लक्षण, जान लेंगे तो बच जाएगी जान</title>
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        <description><![CDATA[ आज हम अपने काम, मोबाइल, करियर और जिम्मेदारियों में इतने उलझ गए हैं कि अपनी सेहत पर ध्यान देना लगभग भूल ही गए हैं. खासकर दिल की सेहत को लेकर लापरवाही तेजी से बढ़ रही है. पहले जहां हार्ट अटैक को बुजुर्गों की बीमारी माना जाता था, वहीं अब यह समस्या युवाओं को भी तेजी से अपनी चपेट में ले रही है. गलत खानपान, फास्ट फूड की आदत, घंटों बैठकर काम करना, नींद की कमी और बढ़ता मानसिक तनाव, ये सब मिलकर हमारे दिल को धीरे-धीरे कमजोर बना रहे हैं.
ज्यादातर लोग हार्ट अटैक को सिर्फ सीने में तेज दर्द से जोड़कर देखते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि हार्ट अटैक हमेशा एक जैसे लक्षणों के साथ नहीं आता है. कई बार हमारा शरीर पहले ही हमें चेतावनी देने लगता है, लेकिन जानकारी की कमी के कारण हम उन संकेतों को गैस, थकान या सामान्य कमजोरी समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. यही छोटी-सी लापरवाही आगे चलकर जानलेवा साबित हो सकती है.&amp;nbsp;
हार्ट अटैक सिर्फ अचानक नहीं आता
कार्डियोलॉजी डिपार्टमेंट के एक्सपर्ट्स और डॉक्टर्स बताते हैं कि हार्ट अटैक एकदम से नहीं होता है. कई मामलों में शरीर कुछ दिन या हफ्तों पहले ही संकेत देना शुरू कर देता है. अगर इन संकेतों को समय रहते पहचान लिया जाए, तो बड़ी समस्या को रोका जा सकता है.&amp;nbsp;
सीने में दर्द ही नहीं, ये भी होते हैं हार्ट अटैक के लक्षण
1. सीने में हल्की बेचैनी या दबाव महसूस होना - हर बार हार्ट अटैक में तेज दर्द ही हो, ऐसा जरूरी नहीं, कई लोगों को सीने में भारीपन, जकड़न, जलन या दबाव जैसा एहसास होता है. यह तकलीफ कुछ मिनटों के लिए आती है और फिर चली जाती है, लेकिन बाद में दोबारा लौट सकती है. &amp;nbsp;कभी-कभी यह दर्द सीने से निकलकर बाएं हाथ, कंधे, गर्दन, जबड़े या पीठ तक फैल सकता है. अगर ऐसा बार-बार हो रहा है, तो इसे हल्के में लेना खतरनाक हो सकता है.&amp;nbsp;
2. बिना मेहनत के सांस फूलना - अगर आपको थोड़ा चलने, सीढ़ियां चढ़ने या हल्का काम करने पर भी सांस चढ़ने लगे, तो यह दिल की कमजोरी का संकेत हो सकता है. जब दिल शरीर को सही मात्रा में खून और ऑक्सीजन नहीं पहुंचा पाता, तब ऐसी परेशानी होती है. कई बार यह समस्या बिना सीने के दर्द के भी हो सकती है.&amp;nbsp;
3. जरूरत से ज्यादा थकान महसूस होना - अगर आप रोजमर्रा के छोटे कामों से ही बहुत ज्यादा थकने लगे हैं. जैसे घर के काम, थोड़ी देर चलना, हल्का काम करना और आराम करने के बाद भी थकान दूर न हो, तो यह दिल से जुड़ी समस्या का संकेत हो सकता है. यह लक्षण खासतौर पर महिलाओं में हार्ट अटैक से पहले देखा जाता है.&amp;nbsp;
4. अचानक ठंडा पसीना आना - बिना किसी वजह के अचानक ठंडा पसीना आना या बहुत ज्यादा पसीना आना भी हार्ट अटैक का शुरुआती संकेत हो सकता है. अक्सर लोग इसे गर्मी या कमजोरी समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. अगर यह लक्षण सीने की तकलीफ, थकान या सांस फूलने के साथ हो, तो तुरंत जांच करानी चाहिए.&amp;nbsp;
5. चक्कर आना या बेहोशी जैसा लगना - अगर अचानक चक्कर आने लगे या ऐसा लगे कि आप गिर जाएंगे, तो यह इस बात का संकेत हो सकता है कि दिल और दिमाग तक सही मात्रा में ऑक्सीजन नहीं पहुंच रही. यह स्थिति बहुत गंभीर हो सकती है और इसमें देरी जानलेवा साबित हो सकती है.&amp;nbsp;
6. गैस, अपच या पेट में जलन - कई बार हार्ट अटैक से पहले पेट से जुड़ी समस्याएं होती हैं, जैसे गैस, अपच, पेट में भारीपन, जलन ये लक्षण आम लगते हैं, लेकिन अगर बार-बार हों और दवाओं से भी आराम न मिले, तो यह दिल की समस्या की ओर इशारा कर सकते हैं. महिलाओं में यह लक्षण पुरुषों की तुलना में ज्यादा देखे जाते हैं.&amp;nbsp;
7. नींद में परेशानी और बेचैनी - अगर आपकी नींद बार-बार टूट रही है, रात को घबराहट महसूस होती है या सांस फूलने के कारण नींद खुल जाती है, तो यह भी दिल से जुड़ी समस्या का संकेत हो सकता है.&amp;nbsp;
हार्ट अटैक से बचाव के आसान उपाय
1. संतुलित और हेल्दी खाना खाएं.&amp;nbsp;
2. रोजाना हल्की एक्सरसाइज या वॉक करें.&amp;nbsp;
3. धूम्रपान और शराब से दूरी बनाएं.&amp;nbsp;
4. तनाव कम करने की कोशिश करें.&amp;nbsp;
5. ब्लड प्रेशर, शुगर और कोलेस्ट्रॉल की नियमित जांच कराएं, पूरी नींद लें.&amp;nbsp;
6. अगर लक्षण 5 मिनट से ज्यादा समय तक बने रहें, आराम करने पर भी ठीक न हों, बार-बार लौटकर आएं, दवा लेने से आराम न मिले तो देर न करें और तुरंत अस्पताल जाएं.&amp;nbsp;
ये भी पढ़ें: Secondary Hypertension: क्या होता है सेकेंडरी हाइपरटेंशन, भारत में युवाओं में तेजी से क्यों बढ़ रही यह बीमारी?
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 02 Feb 2026 10:30:20 +0530</pubDate>
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        <title>सर्दी&amp;जुकाम में चिकन सूप क्यों करता है तेजी से रिकवरी? डाइटिशियन ने बताए 4 बड़े फायदे</title>
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        <pubDate>Sun, 01 Feb 2026 13:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>Health Budget 2026: शुगर&amp;कैंसर की सस्ती दवाओं से लेकर बायोफार्मा हब तक, जानें हेल्थ सेक्टर को बजट में क्या मिला?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/health-budget-2026-शुगर-कैंसर-की-सस्ती-दवाओं-से-लेकर-बायोफार्मा-हब-तक-जानें-हेल्थ-सेक्टर-को-बजट-में-क्या-मिला</link>
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        <description><![CDATA[ Health Budget 2026: वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण आज केंद्रीय बजट 2026-27 पेश कर रही हैं. यह उनका लगातार नौंवा बजट है और इतिहास में यह सिर्फ दूसरी बार है जब बजट रविवार को पेश किया जा रहा है. सभी सेक्टरों में स्वास्थ्य सेक्टर पर काफी ज्यादा फोकस किया गया है. आइए जानते हैं कि इस बजट में हेल्थ सेक्टर को क्या-क्या मिलेगा.
भारत बनेगा बायोफॉर्मा हब
इस साल स्वास्थ्य क्षेत्र पर काफी ज्यादा जोर दिया जा रहा है. क्योंकि इसके पीछे एक बड़ा विजन है, भारत को एक वैश्विक बायोफार्मा हब बनाना. स्वास्थ्य सेक्टर के लिए सबसे बड़ी घोषणा बायोफार्मा शक्ति पहल की शुरुआत है. इसे अगले 5 सालों में ₹10,000 करोड़ के आवंटन का समर्थन दिया गया है. इसका लक्ष्य बायोलॉजिक्स और बायोसिमिलर के लिए एक मजबूत घरेलू इकोसिस्टम को बनाना है, आयात पर निर्भरता को कम करना है और साथ ही भारत को दवाओं के ग्लोबल सप्लायर के रूप में स्थापित करना है.
मधुमेह और कैंसर के लिए सस्ती दवाएं
बायोफॉर्मा पर जोर देने का एक बड़ा परिणाम मधुमेह और कैंसर के लिए कम लागत वाली दवाएं भी होंगी. यह भारत की सबसे तेजी से बढ़ती स्वास्थ्य चुनौतियों में से दो हैं. बायोलॉजिक दवाओं के घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहित करके सरकार का लक्ष्य विनिर्माण लागत को कम करना है. इससे सीधे तौर पर मरीजों के लिए कीमतें कम होंगी और सार्वजनिक स्वास्थ्य खर्च पर भी दबाव कम होगा.
इसी के साथ इस इकोसिस्टम का समर्थन करने के लिए बजट में तीन नए राष्ट्रीय फार्मास्युटिकल शिक्षा और अनुसंधान संस्थानों की स्थापना के साथ-साथ सात मौजूदा संस्थानों को अपग्रेड करने का भी प्रस्ताव है. यह संस्थान एडवांस्ड फार्मास्युटिकल शिक्षा, अनुसंधान और नवाचार पर ध्यान केंद्रित करेंगे.&amp;nbsp;
क्लिनिकल ट्रायल साइट्स का नेटवर्क&amp;nbsp;
एक और बड़ा कदम पूरे भारत में 1000 मान्यता प्राप्त क्लिनिकल ट्रायल साइट्स का नेटवर्क बनाना है. इससे दवा परीक्षण, क्लीनिकल अनुसंधान और नई थेरेपी के तेजी से अनुमोदन के लिए भारत की मजबूती में काफी वृद्धि होगी. &amp;nbsp;सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि जिला अस्पतालों को भी अपडेट किया जाएगा. वहां इमरजेंसी वार्ड बढ़ाए जाएंगे ताकि लोगों को फायदा पहुंच पाए.
क्षेत्रीय मेडिकल हब का होगा निर्माण&amp;nbsp;
इसी के साथ बजट में यह ऐलान किया गया है कि पांच क्षेत्रीय मेडिकल हब का निर्माण किया जाएगा. यहां मेडिकल और ट्रेनिंग के साथ-साथ रिसर्च पर काम किया जाएगा. इतना ही नहीं बल्कि देश में तीन नए ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल साइंसेज को भी बनाने का ऐलान किया गया है. इसी के साथ मेंटल हेल्थ का ध्यान रखते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा है की मेंटल इंस्टिट्यूट को भी मजबूत किया जाएगा.
देश में तीन नए आयुर्वेद संस्थान&amp;nbsp;
आपको बता दें कि एलाइड हेल्थ प्रोफेशनल्स के लिए मौजूदा संस्थाओं को अपग्रेड किया जाएगा. इसी के साथ दोनों सेक्टर में एएचपीआई &amp;nbsp;संस्थान स्थापित किए जाएंगे. साथ ही देश में तीन नए आयुर्वेद संस्थान बनाए जाएंगे.
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        <pubDate>Sun, 01 Feb 2026 13:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>हार्ट अटैक पड़े और घर पर अकेले हो तो क्या करें? जानें 25 साल के एक्सपीरियंस सर्जन के टिप्स</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/हार्ट-अटैक-पड़े-और-घर-पर-अकेले-हो-तो-क्या-करें-जानें-25-साल-के-एक्सपीरियंस-सर्जन-के-टिप्स</link>
        <guid>https://hindi.attentionindia.com/हार्ट-अटैक-पड़े-और-घर-पर-अकेले-हो-तो-क्या-करें-जानें-25-साल-के-एक्सपीरियंस-सर्जन-के-टिप्स</guid>
        <description><![CDATA[ हार्ट अटैक किसी के लिए भी बहुत डरावना और खतरनाक अनुभव हो सकता है. यह डर तब और बढ़ जाता है जब आप घर पर अकेले हों और पास में कोई मदद न हो. इस स्थिति में आदमी अक्सर घबराता है, डर जाता है और सोचने में असमर्थ हो जाता है कि अब क्या किया जाए. लेकिन ऐसे समय में अगर आप कुछ जरूरी कदम जान लें और तुरंत सही तरीके से कदम उठाएं, तो आपकी जान बचाई जा सकती है.&amp;nbsp;
25 साल के एक्सपीरियंस वाले बोर्ड-सर्टिफाइड कार्डियोथोरेसिक सर्जन डॉ. जेरेमी लंदन ने हाल ही में एक वीडियो में साफ रूप से बताया कि घर पर अकेले रहते हुए हार्ट अटैक पड़ने पर क्या करना चाहिए. उन्होंने कहा कि ऐसे समय में दिमाग शांत रखना मुश्किल होता है, लेकिन कुछ आसान लेकिन जरूरी कदम याद रखने से आप अपनी स्थिति को नियंत्रित कर सकते हैं और गंभीर स्थिति से बच सकते हैं. डॉ. लंदन की सलाहों को अगर आप अपनाते हैं, तो यह दिल के दौरे के दौरान मददगार साबित हो सकती हैं.
दिल की गंभीर स्थिति में घर पर अकेले होने पर क्या करना चाहिए?
1. तुरंत आपातकालीन सेवाओं को कॉल करें - हार्ट अटैक पड़ने पर सबसे पहला और सबसे जरूरी काम यह है कि आप तुरंत आपातकालीन सेवाओं (EMS/108/112) को कॉल करें. डॉ. लंदन कहते हैं कि चाहे आपके पास कुछ हल्की सी तकलीफ महसूस हो रही हो या ज्यादा गंभीर लक्षण हों, जल्दी से जल्दी मदद बुलाना जीवन रक्षक हो सकता है.&amp;nbsp;
2. एस्पिरिन चबाएं - अगर आपको हार्ट डिजीज विशेषज्ञ ने पहले एस्पिरिन लेने की सलाह दी है और आपको इससे एलर्जी नहीं है, तो दौरे के दौरान एक एस्पिरिन को निगलने के बजाय चबाएं. ऐसा करने से दिल पर पड़ने वाला दबाव कम हो सकता है और दिल के दौरे की गंभीरता कुछ हद तक घट सकती है. ध्यान दें, यह हार्ट अटैक को पूरी तरह से रोक नहीं सकता, लेकिन इससे मदद मिलती है.&amp;nbsp;
3. अपने घर को आपातकालीन सेवाओं के लिए आसान बनाएं - डॉ. लंदन कहते हैं कि घर को ऐसी स्थिति में तैयार रखें कि आपातकालीन सेवाएं आसानी से पहुंच सकें. &amp;nbsp;इसका मतलब है कि रात में लाइटें जलाएं, दरवाजा खुला रखें।, अगर संभव हो तो दरवाजे का ताला पहले से खोल दें. इस तरह, जब मदद आने वाली हो, तो टीम को आपके घर तक पहुंचने में किसी तरह की परेशानी नहीं होगी.
4. बैठ जाएं या लेट जाएं - हार्ट अटैक पड़ने पर अचानक बेहोशी का खतरा होता है. इसलिए डॉ. लंदन की सलाह है कि आप तुरंत बैठ जाएं या लेट जाएं. ऐसा करने से गिरने और सिर या शरीर को चोट लगने का खतरा कम होता है. यह कदम आपके लिए सुरक्षा कवच की तरह काम करता है जब तक कि मदद न पहुंच जाए.&amp;nbsp;
5. किसी भरोसेमंद व्यक्ति को फोन करें - घर पर अकेले होने पर किसी दोस्त, परिवार के सदस्य या करीबी व्यक्ति को तुरंत कॉल करें. उन्हें बताएं कि आपको हार्ट अटैक पड़ रहा है और आप मदद का इंतजार कर रहे हैं. इससे आप मानसिक रूप से भी अकेले नहीं रहेंगे और आपके पास तुरंत कोई होगा जो स्थिति को समझे और मदद के लिए जरूरी कदम उठाए.&amp;nbsp;
इसे भी पढ़ें: &amp;nbsp;क्या होती है हाथी पांव वाली बीमारी, क्या इसमें सच में हाथी जैसा हो जाता है पैर?
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें&amp;nbsp; ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 01 Feb 2026 09:30:09 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>सेहत का सुपरफूड होते हैं घी में भुने ड्राई फ्रूट्स, जानें इनके कमाल के फायदे</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/सेहत-का-सुपरफूड-होते-हैं-घी-में-भुने-ड्राई-फ्रूट्स-जानें-इनके-कमाल-के-फायदे</link>
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        <pubDate>Sun, 01 Feb 2026 09:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>हार्ट अटैक या दिल की गंभीर स्थिति में घर पर अकेले होने पर क्या करना चाहिए? जानिए 25 साल के एक्सपीरियंस सर्जन की टिप्स</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/हार्ट-अटैक-या-दिल-की-गंभीर-स्थिति-में-घर-पर-अकेले-होने-पर-क्या-करना-चाहिए-जानिए-25-साल-के-एक्सपीरियंस-सर्जन-की-टिप्स</link>
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        <description><![CDATA[ हार्ट अटैक किसी के लिए भी बहुत डरावना और खतरनाक अनुभव हो सकता है. यह डर तब और बढ़ जाता है जब आप घर पर अकेले हों और पास में कोई मदद न हो. इस स्थिति में आदमी अक्सर घबराता है, डर जाता है और सोचने में असमर्थ हो जाता है कि अब क्या किया जाए. लेकिन ऐसे समय में अगर आप कुछ जरूरी कदम जान लें और तुरंत सही तरीके से कदम उठाएं, तो आपकी जान बचाई जा सकती है.&amp;nbsp;
25 साल के एक्सपीरियंस वाले बोर्ड-सर्टिफाइड कार्डियोथोरेसिक सर्जन डॉ. जेरेमी लंदन ने हाल ही में एक वीडियो में साफ रूप से बताया कि घर पर अकेले रहते हुए हार्ट अटैक पड़ने पर क्या करना चाहिए. उन्होंने कहा कि ऐसे समय में दिमाग शांत रखना मुश्किल होता है, लेकिन कुछ आसान लेकिन जरूरी कदम याद रखने से आप अपनी स्थिति को नियंत्रित कर सकते हैं और गंभीर स्थिति से बच सकते हैं. डॉ. लंदन की सलाहों को अगर आप अपनाते हैं, तो यह दिल के दौरे के दौरान मददगार साबित हो सकती हैं.
दिल की गंभीर स्थिति में घर पर अकेले होने पर क्या करना चाहिए?
1. तुरंत आपातकालीन सेवाओं को कॉल करें - हार्ट अटैक पड़ने पर सबसे पहला और सबसे जरूरी काम यह है कि आप तुरंत आपातकालीन सेवाओं (EMS/108/112) को कॉल करें. डॉ. लंदन कहते हैं कि चाहे आपके पास कुछ हल्की सी तकलीफ महसूस हो रही हो या ज्यादा गंभीर लक्षण हों, जल्दी से जल्दी मदद बुलाना जीवन रक्षक हो सकता है.&amp;nbsp;
2. एस्पिरिन चबाएं - अगर आपको हार्ट डिजीज विशेषज्ञ ने पहले एस्पिरिन लेने की सलाह दी है और आपको इससे एलर्जी नहीं है, तो दौरे के दौरान एक एस्पिरिन को निगलने के बजाय चबाएं. ऐसा करने से दिल पर पड़ने वाला दबाव कम हो सकता है और दिल के दौरे की गंभीरता कुछ हद तक घट सकती है. ध्यान दें, यह हार्ट अटैक को पूरी तरह से रोक नहीं सकता, लेकिन इससे मदद मिलती है.&amp;nbsp;
3. अपने घर को आपातकालीन सेवाओं के लिए आसान बनाएं - डॉ. लंदन कहते हैं कि घर को ऐसी स्थिति में तैयार रखें कि आपातकालीन सेवाएं आसानी से पहुंच सकें. &amp;nbsp;इसका मतलब है कि रात में लाइटें जलाएं, दरवाजा खुला रखें।, अगर संभव हो तो दरवाजे का ताला पहले से खोल दें. इस तरह, जब मदद आने वाली हो, तो टीम को आपके घर तक पहुंचने में किसी तरह की परेशानी नहीं होगी.
4. बैठ जाएं या लेट जाएं - हार्ट अटैक पड़ने पर अचानक बेहोशी का खतरा होता है. इसलिए डॉ. लंदन की सलाह है कि आप तुरंत बैठ जाएं या लेट जाएं. ऐसा करने से गिरने और सिर या शरीर को चोट लगने का खतरा कम होता है. यह कदम आपके लिए सुरक्षा कवच की तरह काम करता है जब तक कि मदद न पहुंच जाए.&amp;nbsp;
5. किसी भरोसेमंद व्यक्ति को फोन करें - घर पर अकेले होने पर किसी दोस्त, परिवार के सदस्य या करीबी व्यक्ति को तुरंत कॉल करें. उन्हें बताएं कि आपको हार्ट अटैक पड़ रहा है और आप मदद का इंतजार कर रहे हैं. इससे आप मानसिक रूप से भी अकेले नहीं रहेंगे और आपके पास तुरंत कोई होगा जो स्थिति को समझे और मदद के लिए जरूरी कदम उठाए.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें&amp;nbsp; ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 01 Feb 2026 01:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>भारतीय रसोई में सरसों के तेल को क्यों माना जाता है बेस्ट, जानिए इससे दिल की सेहत को कैसे होता है फायदा</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/भारतीय-रसोई-में-सरसों-के-तेल-को-क्यों-माना-जाता-है-बेस्ट-जानिए-इससे-दिल-की-सेहत-को-कैसे-होता-है-फायदा</link>
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        <pubDate>Sat, 31 Jan 2026 17:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>क्या होती है हाथी पांव वाली बीमारी, क्या इसमें सच में हाथी जैसा हो जाता है पैर?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/क्या-होती-है-हाथी-पांव-वाली-बीमारी-क्या-इसमें-सच-में-हाथी-जैसा-हो-जाता-है-पैर</link>
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        <description><![CDATA[ 2024 में उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में हाथी पांव बीमारी ने लोगों की चिंता बढ़ाई थी. मच्छरों के काटने से होने वाली इस बीमारी को मेडिकल भाषा में लिम्फैटिक फाइलेरियासिस या एलिफेंटिएसिस कहा जाता है. इस बीमारी में शरीर के कुछ हिस्सों में इतनी ज्यादा सूजन आ जाती है कि वे हाथी के पैर जैसे बड़े, मोटे और सख्त दिखने लगते हैं. पैरों के अलावा ये सूजन हाथ, चेस्ट और जननांगों में भी हो सकती है. जिससे शरीर के ये हिस्से भारी और गांठदार दिखने लगते हैं. साथ ही सूजन वाले हिस्से में दर्द भी हो सकता है.क्यों कहा जाता है इसे हाथी पांवइस बीमारी में सबसे ज्यादा असर पैरों पर पड़ता है. धीरे-धीरे पैर असामान्य रूप से फूल जाते हैं और उनकी त्वचा मोटी, खुरदरी और सख्त हो जाती है. यही वजह है कि इसे आम भाषा में हाथी पांव कहा जाता है. वहीं हाथी पांव बीमारी संक्रमित मच्छरों के काटने से फैलती है. जब मच्छर किसी संक्रमित व्यक्ति को काटता है और फिर किसी हेल्दी व्यक्ति को काटता है, तो परजीवी कीड़े शरीर में प्रवेश कर जाते हैं. ये कीड़े मानव शरीर की लसीका प्रणाली में जाकर उसे ब्लॉक कर देते हैं, जिससे तरल पदार्थ जमा होने लगता है और सूजन बढ़ती जाती है.शुरुआत में नहीं दिखते लक्षणहाथी पांव की सबसे बड़ी समस्या यह है कि शुरुआत में इसके लक्षण साफ दिखाई नहीं देते हैं. कई मामलों में संक्रमण के बाद सालों तक कोई परेशानी नजर नहीं आती. लेकिन जैसे-जैसे बीमारी बढ़ती है, बुखार, दर्द और सूजन जैसे लक्षण सामने आने लगते हैं. इसके अलावा सूजन वाले हिस्से में दर्द और बेचैनी हो सकती है. वहीं कुछ मामलों में बार-बार बैक्टीरियल संक्रमण भी हो जाता है, जिससे कंडीशन और खतरनाक हो जाती है. इसके अलावा &amp;nbsp;लंबे समय तक इलाज न मिलने पर व्यक्ति की चलने-फिरने और काम करने की क्षमता भी प्रभावित हो सकती है.कितनी खतरनाक है यह बीमारीदुनियाभर में करीब 12 करोड़ लोग इस बीमारी से प्रभावित है. यह बीमारी खासकर उन इलाकों में ज्यादा पाई जाती है, जहां स्वच्छता की स्थिति खराब होती है और मच्छरों का प्रकोप ज्यादा रहता है. भारत के कुछ राज्यों में इसका बोझ अब भी काफी ज्यादा है. वहीं हाथी पांव बीमारी का कोई स्थायी इलाज या टीका फिलहाल मौजूद नहीं है, लेकिन दवाओं से संक्रमण को आगे फैलने से रोका जा सकता है. एंटी-पैरासिटिक दवाएं शरीर में मौजूद कीड़ों को खत्म करने में मदद करती है. कुछ मामलों में सूजन कम करने या हाइड्रोसील जैसी समस्या के लिए सर्जरी भी की जाती है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 31 Jan 2026 17:30:09 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>HIV से बचने के लिए शख्स ने AI से पूछकर खाई दवाई, हो गया जानलेवा स्टीवन्स जॉनसन सिंड्रोम; यह कितना खतरनाक?</title>
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        <description><![CDATA[ 
इंटरनेट और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर आंख बंद कर भरोसा करना कितना खतरनाक हो सकता है, इसका एक डराने वाला मामला दिल्ली से सामने आया है. यहां एक 45 वर्षीय व्यक्ति ने डॉक्टर से सलाह लेने के बजाय एआई से पूछकर एचआईवी से बचाव की दवाएं ले ली. नतीजा यह हुआ कि उसे एक दुर्लभ लेकिन जानलेवा बीमारी स्टीवन्स जॉनसन सिंड्रोम हो गया और उसकी हालत गंभीर बनी हुई है. ऐसे में चलिए अब आपको बताते हैं स्टीवन्स जॉनसन सिंड्रोम कितना खतरनाक है. एचआईवी के डर में डॉक्टर नहीं, एआई से ली सलाह रिपोर्ट के अनुसार, असुरक्षित यौन संबंध के बाद व्यक्ति को एचआईवी संक्रमण का डर लगा. आमतौर पर ऐसे मामलों में डॉक्टर पोस्ट एक्सपोजर प्रोफिलैक्सिस दवाएं देते हैं, जिन्हें संपर्क के 72 घंटे के अंदर और पूरी मेडिकल निगरानी में लिया जाता है. हालांकि, इस व्यक्ति ने डॉक्टर से संपर्क करने के बजाय एआई से जानकारी लेकर स्थानीय मेडिकल स्टोर से बिना पर्ची दवाएं खरीद लीं. डॉक्टरों के अनुसार, मरीज ने एचआईवी की दवाओं का पूरा 28 दिन का कोर्स किया. करीब 7 दिन बाद उसके शरीर पर चकते निकलने लगे. इसके बावजूद उसने दवाएं बंद नहीं की. कुछ ही दिनों में उसकी आंखों और शरीर के अन्य हिस्सों में खतरनाक समस्याएं शुरू हो गई. हालत बिगड़ने पर उसे हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया.जांच में सामने आया स्टीवन्स जोन्स सिंड्रोमडॉक्टरों ने जांच के बाद पुष्टि की कि मरीज स्टीवन्स जॉनसन सिंड्रोम से पीड़ित है. यह एक गंभीर दवा जनित रिएक्शन है. जिसमें स्किन और म्यूकोसा को भारी नुकसान पहुंचता है. मरीज को आईसीयू में रखा गया है और डॉक्टर उसकी स्थिति को गंभीर बता रहे हैं. डॉक्टरों के अनुसार, फिलहाल दवा के रिएक्शन को नियंत्रित करना प्राथमिकता है. वहीं डॉक्टर इस बात से भी हैरान है कि मरीज का ऐसी दवाएं बिना डॉक्टर पर्ची के कैसे मिल गई, जबकि अब ये दवाए आमतौर पर डॉक्टर भी नहीं लिखते हैं. यह मामला न सिर्फ दवाओं की खुलेआम बिक्री पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि एआई और इंटरनेट पर बिना एक्सपर्ट्स सलाह के इलाज करने के खतरे को भी उजागर करता है. क्या और कितना खतरनाक है स्टीवन्स जोन्स सिंड्रोम?स्टीवन्स जॉनसन सिंड्रोम एक दुर्लभ लेकिन जानलेवा कंडीशन है, जिसमें स्किन पर रैश, फफोले और परत उतरने लगती है. आंख, मुंह और प्राइवेट पार्ट की म्यूकोसा भी प्रभावित होती है. वहीं ज्यादातर मामलों में यह दवाओं के गंभीर एलर्जिक रिएक्शन के कारण होता है और समय पर इलाज न मिलने पर जान का खतरा बढ़ जाता है. &amp;nbsp;कुछ लोग स्टीवन्स जॉनसन सिंड्रोम और टीईएन को अलग-अलग बीमारियां मानते हैं, जबकि अन्य इन्हें एक ही बीमारी मानते हैं, लेकिन स्टीवन्स जॉनसन सिंड्रोम टीईएन की तुलना में कम गंभीर होता है. इसे इस तरह से समझ सकते हैं कि स्टीवन्स जॉनसन सिंड्रोम में स्किन का छिलना पूरे शरीर के 10 प्रतिशत से कम हिस्से को प्रभावित कर सकता है, जबकि टीईएन में त्वचा का छिलना शरीर के 30 प्रतिशत से अधिक हिस्से को प्रभावित करता है. हालांकि दोनों स्थितियां जानलेवा हो सकती है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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        <pubDate>Sat, 31 Jan 2026 17:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>घर में रोज इस्तेमाल होने वाली ये 6 चीजें बन जाती हैं जहर, समय पर नहीं बदली तो पहुंचा सकती है नुकसान</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/घर-में-रोज-इस्तेमाल-होने-वाली-ये-6-चीजें-बन-जाती-हैं-जहर-समय-पर-नहीं-बदली-तो-पहुंचा-सकती-है-नुकसान</link>
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        <pubDate>Sat, 31 Jan 2026 13:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>CT Scan Vs X Ray: सीटी स्कैन और एक्सरे में क्या होता है अंतर, किस बीमारी में कौन&amp;सा कराना जरूरी?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/ct-scan-vs-x-ray-सीटी-स्कैन-और-एक्सरे-में-क्या-होता-है-अंतर-किस-बीमारी-में-कौन-सा-कराना-जरूरी</link>
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        <description><![CDATA[ Difference Between CT Scan And X Ray: आधुनिक चिकित्सा में मेडिकल इमेजिंग की भूमिका बेहद अहम हो चुकी है. इसकी मदद से डॉक्टर शरीर के अंदरूनी हिस्सों को साफ तौर पर देख पाते हैं और सही बीमारी की पहचान कर पाते हैं. एक्स-रे और सीटी स्कैन ऐसी दो प्रमुख जांच तकनीकें हैं, जिन्होंने डायग्नोसिस की दुनिया में बड़ा बदलाव किया है. हालांकि दोनों ही जांचों में रेडिएशन का इस्तेमाल होता है, लेकिन इनके उपयोग, फायदे और सीमाएं अलग-अलग हैं. चलिए आपको बताते हैं कि दोनों में क्या अंतर है.&amp;nbsp;
एक्स-रे: सबसे पुरानी और भरोसेमंद जांच
एक्स-रे एक तरह की इलेक्ट्रोमैग्नेटिक किरणें होती हैं, जो शरीर के सॉफ्ट टिश्यू से होकर निकल जाती हैं, लेकिन हड्डियों जैसी सख्त स्ट्रक्चर द्वारा रोक ली जाती हैं. इसी वजह से एक्स-रे में हड्डियां साफ दिखाई देती हैं. यह जांच कम समय में हो जाती है, खर्च भी कम होता है और लगभग हर अस्पताल में उपलब्ध होती है. एक्स-रे का इस्तेमाल हड्डियों के फ्रैक्चर, दांतों की समस्याओं, फेफड़ों और हार्ट से जुड़ी बीमारियों की जांच में किया जाता है. इसके अलावा महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर की शुरुआती जांच के लिए मैमोग्राफी भी एक्स-रे तकनीक पर आधारित होती है.
एक्स-रे का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह जल्दी हो जाता है और रेडिएशन की मात्रा भी अपेक्षाकृत कम होती है. हालांकि इसकी सीमा यह है कि सॉफ्ट टिश्यू जैसे मांसपेशियां, नसें या अंग इसमें स्पष्ट नहीं दिखते. बार-बार एक्स-रे कराना, खासकर बच्चों और गर्भवती महिलाओं के लिए जोखिम भरा हो सकता है.
सीटी स्कैन: ज्यादा जानकारी देने वाली जांच
सीटी स्कैन को एक्स-रे का एडवांस रूप माना जाता है. इसमें घूमने वाली एक्स-रे मशीन शरीर के अलग-अलग एंगल से तस्वीरें लेती है, जिन्हें कंप्यूटर जोड़कर थ्री-डायमेंशनल इमेज बना देता है. इससे शरीर के अंदरूनी अंगों की बेहद स्पष्ट तस्वीर मिलती है.&amp;nbsp;
सीटी स्कैन का इस्तेमाल गंभीर चोट, एक्सीडेंट, ट्यूमर, कैंसर, ब्रेन इंजरी, स्ट्रोक, किडनी स्टोन, अपेंडिसाइटिस और पेट से जुड़ी बीमारियों की जांच में किया जाता है. यह जांच डॉक्टरों को बीमारी की सटीक स्थिति समझने में मदद करती है. हालांकि सीटी स्कैन में रेडिएशन की मात्रा एक्स-रे से ज्यादा होती है और यह जांच महंगी भी होती है. कुछ मामलों में कॉन्ट्रास्ट डाई का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे एलर्जी की समस्या भी हो सकती है.
किस बीमारी में कौन-सी जांच जरूरी?
अगर हड्डी टूटने, दांत या फेफड़ों की सामान्य समस्या हो, तो एक्स-रे पर्याप्त होता है. लेकिन जब बीमारी जटिल हो, अंदरूनी चोट, कैंसर या ब्रेन से जुड़ी समस्या हो, तब सीटी स्कैन जरूरी हो जाता है.
हालांकि, एक्स-रे और सीटी स्कैन दोनों ही अपनी जगह जरूरी जांचें हैं. मरीज की स्थिति, बीमारी की गंभीरता और जोखिम को देखते हुए डॉक्टर तय करते हैं कि कौन-सी जांच सबसे सही रहेगी.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 30 Jan 2026 17:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>देखने में हेल्दी हैं लेकिन बेबी नहीं कर पा रहीं कंसीव, डॉक्टर्स से समझें फर्टिलिटी बैरियर</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/देखने-में-हेल्दी-हैं-लेकिन-बेबी-नहीं-कर-पा-रहीं-कंसीव-डॉक्टर्स-से-समझें-फर्टिलिटी-बैरियर</link>
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        <description><![CDATA[ आज बड़ी संख्या में ऐसी युवा महिलाएं हैं जो फिट हैं, एक्टिव हैं, सही खाना खाती हैं, योग-जिम करती हैं और बाहर से बिल्कुल हेल्दी नजर आती हैं. ऐसे में जब महीनों तक कोशिश करने के बाद भी प्रेगनेंसी नहीं ठहरती, तो सबसे पहला सवाल यही आता है, मैं तो बिल्कुल ठीक दिखती हूं, फिर मेरे साथ ही ऐसा क्यों हो रहा है. यह सवाल सिर्फ उलझन का नहीं, बल्कि मानसिक तनाव, खुद पर शक और कई बार अपराधबोध तक ले जाता है.
कई महिलाएं सोचने लगती हैं कि शायद उनसे ही कोई गलती हो रही है, जबकि सच्चाई यह है कि फर्टिलिटी सिर्फ बाहर से दिखने वाली हेल्थ से तय नहीं होती है. आज के तेज, तनाव भरे और अनियमित जीवन में फर्टिलिटी से जुड़ी कई समस्याएं ऐसी होती हैं, जिनके कोई साफ लक्षण दिखाई नहीं देते. इसी वजह से महिलाएं समय पर जांच नहीं करा पातीं और इलाज में देरी हो जाती है.&amp;nbsp;
हेल्दी दिखना और फर्टाइल होना दोनों अलग कैसे हैं
डॉक्टर्स कहते हैं कि यह एक बहुत आम गलतफहमी है कि जो महिला बाहर से हेल्दी दिखती है, उसे गर्भधारण में कोई दिक्कत नहीं हो सकती, हकीकत यह है कि आज कई ऐसी महिलाएं, जो पूरी तरह सामान्य जीवन जी रही हैं, फिर भी कंसीव नहीं कर पा रही हैं और यह अब असामान्य नहीं रह गया है. &amp;nbsp;मेडिकल भाषा में, 35 साल से कम उम्र की महिला अगर 12 महीने तक बिना किसी सुरक्षा के संबंध बनाने के बाद भी प्रेग्नेंट नहीं होती और 35 साल से अधिक उम्र की महिला अगर 6 महीने में कंसीव नहीं कर पाती, तो इसे बांझपन (Infertility) माना जाता है. &amp;nbsp;दुनियाभर में लगभग हर 6 में से 1 दंपत्ति इस समस्या से जूझ रहा है. &amp;nbsp;समय पर जांच न कराने से न सिर्फ इलाज मुश्किल होता है, बल्कि मानसिक दबाव भी बढ़ता जाता है.&amp;nbsp;
प्रेगनेंसी एक नाजुक और जटिल प्रक्रिया&amp;nbsp;
अक्सर लोग सोचते हैं कि बस संबंध बनाने से प्रेग्नेंट हो जाती है, लेकिन असल में इसके पीछे शरीर के अंदर कई जरूरी प्रक्रियाएं सही तरह से काम करनी होती हैं. प्रेगनेंस के लिए जरूरी है कि हर महीने सही समय पर ओव्यूलेशन होना, फैलोपियन ट्यूब का खुला और हेल्दी होना, शुक्राणुओं की अच्छी क्वालिटी और संख्या, अंडाणु और शुक्राणु का सही तरह से निषेचित होना और निषेचित अंडाणु का गर्भाशय में जाकर सफलतापूर्वक चिपकना (इम्प्लांटेशन) इनमें से किसी भी स्टेज पर अगर छोटी-सी भी गड़बड़ी हो जाए, तो प्रेगनेंसी रुक सकती है और खास बात यह है कि अक्सर इसके कोई स्पष्ट लक्षण नहीं होते हैं.
कौन सी बीमारियां जो दिखती नहीं, लेकिन फर्टिलिटी को प्रभावित करती हैं&amp;nbsp;1. पीसीओएस (PCOS) - यह एक हार्मोनल समस्या है, जो प्रजनन आयु की 6 से 13 प्रतिशत महिलाओं को प्रभावित करती है. इसमें ओव्यूलेशन नियमित नहीं होता, जिससे कंसीव करने में दिक्कत आती है., कई महिलाओं को इसके लक्षण भी साफ महसूस नहीं होते है.&amp;nbsp;
2. एंडोमेट्रियोसिस - इस स्थिति में यूर्टस टिशू यूर्टस के बाहर बनने लगता है. यह अंडाशय और फैलोपियन ट्यूब के काम में रुकावट डाल सकता है. हैरानी की बात यह है कि कई बार इसमें तेज दर्द भी नहीं होता, इसलिए महिला को पता ही नहीं चलता है.&amp;nbsp;
3. फैलोपियन ट्यूब का ब्लॉक होना - पुराने संक्रमण, सर्जरी या गर्भाशय की बनावट से जुड़ी समस्याओं के कारण ट्यूब ब्लॉक हो सकती हैं. यह समस्या अक्सर बिना किसी लक्षण के होती है, लेकिन प्रेगनेंसी की संभावना को काफी कम कर देती है.&amp;nbsp;
जब सभी जांच सामान्य हों, फिर भी प्रेग्नेंसी न हो
कुछ मामलों में सभी टेस्ट नॉर्मल आने के बावजूद प्रेगनेंसी नहीं ठहरती है. इसे डॉक्टर अस्पष्ट बांझपन (Unexplained Infertility) कहते हैं. इसका मतलब यह नहीं कि अब कोई रास्ता नहीं बचा, इसका मतलब सिर्फ इतना है कि ओव्यूलेशन के समय, अंडाणु और शुक्राणु की आपसी प्रक्रिया या इम्प्लांटेशन में कोई बहुत सूक्ष्म समस्या हो सकती है, जिसे आज के टेस्ट पकड़ नहीं पाते, ऐसे मामलों में पर्सनलाइज्ड ट्रीटमेंट और सहायक प्रजनन तकनीकें मददगार साबित होती हैं.&amp;nbsp;
डॉक्टर से जल्दी मिलना क्यों जरूरी है?
डॉक्टर महिलाओं को सलाह देते हैं कि अगर आप 6 से 12 महीने तक कोशिश करने के बाद भी कंसीव नहीं कर पा रही हैं, तो इंतजार न करें. समय पर जांच कराने से समस्या की सही पहचान होती है, लाइफस्टाइल में जरूरी बदलाव किए जा सकते हैं, दवाओं या आईवीएफ जैसी तकनीकों से सही समय पर इलाज संभव होता है. आज जब कई महिलाएं करियर या निजी कारणों से मातृत्व को टाल रही हैं, तब जागरूकता और समय पर कदम उठाना बेहद जरूरी हो गया है.&amp;nbsp;
इसे भी पढ़ें- Morning Water Benefits: सुबह उठने के बाद क्यों पीना चाहिए पानी, इससे सेहत को क्या होता है फायदा?
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 30 Jan 2026 13:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>कितने दिन में बदल देना चाहिए बर्तन धोने वाला झाबा, जानें इससे किन बीमारियों का खतरा?</title>
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        <description><![CDATA[ हम सभी अपने घर की साफ-सफाई को लेकर काफी अलर्ट रहते हैं. खासतौर पर रसोईघर, जहां रोजाना खाना बनता है और पूरा परिवार उसी पर निर्भर करता है. बर्तन साफ करने से लेकर किचन स्लैब, गैस चूल्हा और मसाले रखने के डिब्बों तक हर जगह हम स्पंज या झाबे का यूज करते हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जो चीज बर्तनों को साफ करती है, वही अगर खुद गंदी हो जाए तो क्या होगा. अक्सर लोग महीनों तक एक ही झाबे या स्पंज का इस्तेमाल करते रहते हैं, बिना यह जाने कि यह आदत उनकी सेहत के लिए कितनी खतरनाक हो सकती है. देखने में छोटा-सा स्पंज असल में बैक्टीरिया का घर बन सकता है और अनजाने में कई बीमारियों को न्योता दे सकता है. तो आइए जानते हैं कि बर्तन धोने वाला झाबा कितने दिन में बदल देना चाहिए इससे किन बीमारियों का खतरा होता है.
बर्तन धोने वाला झाबा क्यों बन जाता है बैक्टीरिया का अड्डा?
बर्तन धोने वाला स्पंज या झाबा ज्यादातर समय गीला रहता है. दिन में 2-3 बार इस्तेमाल होने की वजह से उसे सूखने का मौका ही नहीं मिलता, स्पंज के छोटे-छोटे छिद्रों में खाने के कण फंस जाते हैं. नमी और गंदगी बैक्टीरिया के पनपने के लिए सबसे सही माहौल बनाती है.समय के साथ इसमें खतरनाक कीटाणु तेजी से बढ़ने लगते हैं. यही कारण है कि गंदा स्पंज टॉयलेट सीट से भी ज्यादा बैक्टीरिया वाला हो सकता है. शोधों के अनुसार, पुराने और गंदे किचन स्पंज में E. coli और Salmonella जैसे खतरनाक बैक्टीरिया पाए जा सकते हैं.
ये बैक्टीरिया शरीर में फूड पॉइजनिंग, दस्त और उल्टी, पेट में तेज दर्द, आंतों में संक्रमण समस्याएं पैदा कर सकते हैं. जब आप उसी स्पंज से बर्तन धोते हैं, तो बैक्टीरिया बर्तनों के जरिए खाने में पहुंच सकते हैं. अगर स्पंज को लंबे समय तक नहीं बदला जाए, तो उसमें फफूंद लगने लगती है, अजीब और तेज बदबू आने लगती है, बर्तन साफ होने की बजाय और ज्यादा गंदे हो सकते हैं.&amp;nbsp;
कितने दिन में बदल देना चाहिए बर्तन धोने वाला झाबा?
विशेषज्ञों की मानें तो हर 7 से 10 दिन में स्पंज या झाबा बदल देना चाहिए. अगर रोज बहुत ज्यादा बर्तन धोते हैं, तो 7 दिन में जरूर बदलें. कम यूज होने पर भी 2 हफ्ते से ज्यादा न रखें. पुराना स्पंज साफ दिखे, फिर भी उसमें बैक्टीरिया हो सकते हैं, इसलिए सिर्फ देखने पर भरोसा न करें.&amp;nbsp;
गंदे स्पंज से होने वाली बीमारियां
लंबे समय तक एक ही झाबे का इस्तेमाल करने से फूड पॉइजनिंग, पेट का संक्रमण, गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल इंफेक्शन, स्किन एलर्जी और चकत्ते, फंगल इंफेक्शन बीमारियां हो सकती हैं. बैक्टीरिया हाथों के जरिए शरीर में प्रवेश कर जाते हैं, जिससे पूरा परिवार बीमार पड़ सकता है. अगर आपके किचन में स्पंज से बदबू आना, रंग का बदल जाना, झाबे का फट जाना, बहुत ज्यादा नरम या चिपचिपा हो जाना ये लक्षण दिखें, तो तुरंत बदल दें.&amp;nbsp;
स्पंज को साफ रखने के आसान तरीके
अगर आप स्पंज का रोज यूज करते हैं, तो उसे कीटाणुमुक्त करना जरूरी है. इसलिए हर 2-3 दिन में स्पंज को गर्म पानी और सिरके में 5-10 मिनट भिगो दें. गीले स्पंज को 1 मिनट के लिए माइक्रोवेव में रखें, इससे बैक्टीरिया मर जाते हैं. स्पंज को अच्छी तरह निचोड़ कर सूखी जगह पर रखें. वहीं स्पंज से बेहतर ऑप्शन सिलिकॉन ब्रश और स्टील स्क्रब है. ये ज्यादा समय तक चलते हैं और इन्हें साफ करना भी आसान होता है.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ें:&amp;nbsp;Zakir Khan Health: किन लोगों को होती है जाकिर खान वाली बीमारी, कैसे दिखते हैं इसके लक्षण?
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 30 Jan 2026 09:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>बजट 2026 से हेल्थ सेक्टर को बड़ी उम्मीदें, जानें इस बार किन&amp;किन चीजों पर फोकस की उठ रही मांग</title>
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        <description><![CDATA[ Health Budget 2026-27: केंद्रीय वित्त बजट 2026-27 एक फरवरी को पेश किया जाना है. देश के आर्थिक विकास से लेकर विभिन्न क्षेत्रों की मजबूती के लिहाज़ से इस बजट को काफी अहम माना जा रहा है. स्वास्थ्य क्षेत्र की बात करें तो बेहतर और सुलभ स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में इस बार हेल्थ सेक्टर को वित्त मंत्री से कई उम्मीदें हैं.
पिछले चार वर्षों के बजटीय आंकड़ों पर नजर डालें तो स्वास्थ्य क्षेत्र पर सरकारी खर्च में लगातार बढ़ोतरी देखने को मिली है. वित्त वर्ष 2025-26 में स्वास्थ्य पर लगभग 99,858.56 करोड़ रुपये खर्च किए गए. इससे पहले 2024-25 में यह आंकड़ा करीब 90,000 करोड़ रुपये, 2023-24 में 88,956 करोड़ रुपये और 2022-23 में 86,606 करोड़ रुपये रहा.
विकसित देशों की तुलना में भारत का स्वास्थ्य खर्च कम
हालांकि, विकसित देशों की तुलना में भारत में जीडीपी के अनुपात में स्वास्थ्य क्षेत्र पर खर्च अभी भी काफी कम है. विश्व बैंक की 2022 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत अपनी जीडीपी का केवल 3 से 4 प्रतिशत ही स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करता है. वहीं, अमेरिका में यह खर्च लगभग 17 से 18 प्रतिशत है. जापान अपनी जीडीपी का करीब 10 से 11 प्रतिशत, जबकि रूस 5 से 6 प्रतिशत स्वास्थ्य क्षेत्र पर खर्च करता है.
चीन भी तेज़ी से अपने हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार कर रहा है और वह जीडीपी का लगभग 7 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च कर रहा है.
मिड-साइज़ अस्पतालों की स्वास्थ्य क्षेत्र से अपेक्षाएं
इस विषय पर प्रकाश हॉस्पिटल, नोएडा के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. वी. एस. चौहान का कहना है कि जैसे-जैसे स्वास्थ्य सेवाओं की मांग महानगरों से बाहर के क्षेत्रों में बढ़ रही है, केंद्रीय बजट 2026 में अस्पताल-आधारित विकास को प्रोत्साहन देना बेहद जरूरी है. इसके लिए सस्ती पूंजी तक आसान पहुंच, तेज़ नियामक मंजूरियां और यथार्थवादी प्रतिपूर्ति (रीइंबर्समेंट) व्यवस्था की आवश्यकता है.
उन्होंने कहा कि सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के तहत भुगतान में देरी होने से अस्पतालों की पुनर्निवेश क्षमता प्रभावित होती है और नई स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार की गति धीमी पड़ जाती है. बुनियादी ढांचे के विकास, स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या बढ़ाने और डिजिटल हेल्थ को अपनाने के लिए लक्षित प्रोत्साहन नीतियां लागू करने से न केवल कार्यान्वयन मजबूत होगा, बल्कि दक्षता बढ़ेगी और सेवा प्रदाताओं व मरीजों दोनों पर लागत का दबाव भी कम होगा.
हेल्थ सेक्टर की रीढ़ हैं मिड-साइज़ और सेकेंडरी अस्पताल
डॉ. वी. एस. चौहान के अनुसार, मिड-साइज़ और सेकेंडरी अस्पताल भारत की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली की रीढ़ हैं, लेकिन नीतिगत समर्थन अक्सर तृतीयक (टर्शियरी) देखभाल तक सीमित रह जाता है. केंद्रीय बजट 2026 में इस असंतुलन को दूर करने के लिए स्वास्थ्य क्षेत्र के बजट आवंटन में वृद्धि, चिकित्सा उपकरणों और इनपुट्स पर जीएसटी का तर्क&amp;nbsp; संगतीकरण तथा प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PMJAY) के तहत समयबद्ध और पारदर्शी भुगतान व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए.
इसके साथ ही, किफायती वित्तपोषण, भूमि उपलब्धता और नियामक मंजूरियों के लिए स्पष्ट ढांचे से अस्पतालों की संचालन क्षमता बेहतर होगी, संतुलित विस्तार को बढ़ावा मिलेगा और लगातार बढ़ती चिकित्सा महंगाई के बीच मरीजों पर पड़ने वाले खर्च को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी.
ये भी पढ़ें: बजट से पहले निर्मला ने लोकसभा में पेश किया आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26, GDP 6.8% से 7.2% रहने का अनुमान ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 29 Jan 2026 17:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Causes Of Grey Hair: उम्र बढ़ने के साथ क्यों सफेद होते हैं बाल, क्या रोका जा सकता है यह प्रोसेस?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/causes-of-grey-hair-उम्र-बढ़ने-के-साथ-क्यों-सफेद-होते-हैं-बाल-क्या-रोका-जा-सकता-है-यह-प्रोसेस</link>
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        <description><![CDATA[ Why Hair Turns Grey With Age: उम्र बढ़ने के साथ बालों का सफेद होना एक नेचुरल प्रक्रिया है. जैसे-जैसे शरीर के बाकी अंग उम्र के असर में आते हैं, वैसे ही बाल भी एजिंग से गुजरते हैं. स्किन स्पेशलिस्ट्स के मुताबिक, बालों का रंग तय करने वाली सेल्स समय के साथ कमजोर होने लगती हैं, जिससे बाल धीरे-धीरे अपना नेचुरल रंग खो देते हैं. चलिए आपको बताते हैं कि क्या इसको रोका जाता है.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
डर्मेटोलॉजिस्ट्स बताते हैं कि ज्यादातर लोगों में 30 या 40 की उम्र के बाद सफेद बाल दिखने लगते हैं. इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह होती है मेलानोसाइट स्टेम सेल्स का कमजोर पड़ना. ये वही सेल्स होती हैं, जो बालों में मेलानिन पिगमेंट पहुंचाकर उन्हें काला, भूरा या सुनहरा रंग देती हैं. जब ये कोशिकाएं ठीक से काम करना बंद कर देती हैं, तो बाल सफेद या ग्रे होने लगते हैं.
इस पूरी प्रक्रिया को मेडिकल भाषा में सेल्युलर सेंसेंस कहा जाता है. इसमें बाल धीरे-धीरे पिगमेंट बनाना कम कर देते हैं. यही वजह है कि पहले जो बाल काले या भूरे होते थे, वे समय के साथ ग्रे या सफेद नजर आने लगते हैं. कई लोगों को यह भी महसूस होता है कि सफेद बालों की बनावट पहले से ज्यादा रूखी या मोटी हो जाती है. उम्र के अलावा जेनेटिक्स भी इसमें बड़ी भूमिका निभाता है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि अक्सर लोग अपने माता-पिता की तरह ही ग्रे होते हैं. यानी अगर घर में जल्दी सफेद बाल होने का ट्रेंड रहा है, तो अगली पीढ़ी में भी इसकी संभावना ज्यादा होती है. कुछ रिसर्च में यह भी पाया गया है कि अलग-अलग नस्लों में बाल सफेद होने की उम्र अलग हो सकती है.
क्या इसको रोका जा सकता है?
पहले माना जाता था कि बालों का सफेद होना पूरी तरह तय है और इसे बदला नहीं जा सकता. लेकिन रिसर्च बताती है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह &amp;ldquo;फिक्स&amp;rdquo; नहीं होती. कुछ फैक्टर्स इसे तेज या धीमा कर सकते हैं. कुछ स्टडीज में विटामिन B12, आयरन जैसी पोषक तत्वों की कमी को समय से पहले सफेद बालों से जोड़ा गया है. इसके अलावा, लंबे समय तक रहने वाला तनाव भी इस प्रक्रिया को तेज कर सकता है. रिसर्च में पाया गया है कि ज्यादा तनाव बालों के पिगमेंट बनाने वाली सेल्स को नुकसान पहुंचा सकता है. हालांकि, डॉक्टरों का कहना है कि बालों के सफेद होने को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, लेकिन संतुलित डाइट, स्ट्रेस कंट्रोल और हेल्दी लाइफस्टाइल से इस प्रक्रिया को कुछ हद तक धीमा जरूर किया जा सकता है.
इसे भी पढ़ें-&amp;nbsp;Bowel Cancer: क्या होता है बाउल कैंसर? जानिए क्या हैं इसके शुरुआती लक्षण, जिसको लोग कर देते हैं इग्नोर
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 29 Jan 2026 13:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>ब्रेस्ट मिल्क बेस्ट या फॉर्मूला मिल्क... मिशेल ओबामा ने छेड़ी बहस, क्या कहते हैं एक्सपर्ट और WHO?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/ब्रेस्ट-मिल्क-बेस्ट-या-फॉर्मूला-मिल्क-मिशेल-ओबामा-ने-छेड़ी-बहस-क्या-कहते-हैं-एक्सपर्ट-और-who</link>
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        <description><![CDATA[ Michelle Obama On Formula Milk: हर माता-पिता अपने बच्चे के लिए सबसे अच्छा चाहते हैं, खासकर जब बात उसके खान-पान, पोषण और सेहत की हो. नवजात शिशु को मां का दूध देना बेहतर है या फॉर्मूला मिल्क. इस सवाल पर नई मांओं के बीच अक्सर बहस होती रहती है. इसी बीच अमेरिका की पूर्व प्रथम महिला मिशेल ओबामाने हाल ही में एक बातचीत में खुलासा किया कि वह खुद फॉर्मूला मिल्क पर पली-बढ़ी हैं.
पॉडकास्ट कॉल हर डैडी के एक एपिसोड में, जिसे एलेक्स कूपर होस्ट करती हैं, उसमें मिशेल ओबामा ने कहा कि मैं एक फॉर्मूला बेबी हूं,मेरी लंबाई 5 फीट 11 इंच है और दिमाग बिल्कुल ठीक काम करता है.&quot; उनके इस बयान के बाद एक बार फिर फॉर्मूला मिल्क को लेकर चर्चा तेज हो गई.
बेबी फॉर्मूला क्या होता है?
एक्सपर्ट बताते हैं कि बेबी फॉर्मूला मां के दूध का विकल्प होता है, जिसे तब दिया जाता है जब मां किसी कारणवश बच्चे को ब्रेस्टफीडिंग नहीं करा पाती. ये आमतौर पर गाय के दूध से बने होते हैं, लेकिन इन्हें इस तरह से प्रोसेस किया जाता है कि इनकी संरचना काफी हद तक मां के दूध जैसी हो. जब बच्चे को भूख लगती है, तो उबले हुए पानी में तय मात्रा में फॉर्मूला पाउडर मिलाकर उसे दिया जाता है.
&amp;nbsp;हालांकि, डॉक्टर चेतावनी देते हैं कि बोतल से दूध पिलाने पर इंफेक्शन का खतरा बढ़ सकता है, इसलिए कटोरी या चम्मच से दूध पिलाना ज्यादा सुरक्षित माना जाता है. वे यह भी साफ करते हैं कि मां का दूध सबसे बेहतर होता है, लेकिन अगर मां गंभीर रूप से बीमार हो या किसी कारण से दूध न पिला सके, तो फॉर्मूला मिल्क दिया जा सकता है. एक्सपर्ट बताते हैं कि बच्चे को उसकी जरूरत के हिसाब से दूध पिलाना चाहिए. डॉक्टर बताते हैं कि जन्म के पहले दो महीनों में शिशु को सिर्फ मां का दूध या उसका विकल्प ही पर्याप्त होता है. जरूरत पड़ने पर बच्चे को जन्म के दिन से भी फॉर्मूला दिया जा सकता है.
WHO की नई गाइडलाइंस क्या कहती हैं?
वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइजेशन ने दो साल से कम उम्र के बच्चों के लिए अपनी फीडिंग गाइडलाइंस अपडेट की हैं. इसके मुताबिक, जो बच्चे आंशिक या पूरी तरह फॉर्मूला पर निर्भर हैं, उन्हें छह महीने की उम्र के बाद फुल-फैट गाय का दूध दिया जा सकता है. हालांकि WHO यह भी स्पष्ट करता है कि छह महीने के बाद बच्चों को आयरन की जरूरत केवल दूध से पूरी नहीं होती. इसलिए इस उम्र के बाद बच्चों को आयरन से भरपूर ठोस आहार देना जरूरी है. इसमें मांस, अंडे, दालें, हरी पत्तेदार सब्जियां, बीन्स, दालें, पिसे हुए बीज और नट बटर शामिल किए जा सकते हैं, लेकिन बिना नमक और चीनी मिलाए.
इन बातों का रखना चाहिए ध्यान
&amp;nbsp;WHO यह सलाह देता है कि पहले छह महीने तक बच्चे को केवल मां का दूध दिया जाए और इसके बाद दो साल या उससे अधिक समय तक ब्रेस्टफीडिंद जारी रखा जाए. छह महीने से कम उम्र के बच्चों को, अगर मां का दूध न मिल पाए, तो केवल शिशु फॉर्मूला ही देना चाहिए. वहीं, 12 महीने से अधिक उम्र के बच्चों के लिए टॉडलर फॉर्मूला की सिफारिश नहीं की जाती.
Health Myths And Facts: शरीर और सेहत को लेकर भ्रम में तो नहीं रहते आप, जानें किन गलत बातों को इंसान मान बैठा है सही?
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 28 Jan 2026 17:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>ब्रेस्ट, मिल्क, बेस्ट, या, फॉर्मूला, मिल्क..., मिशेल, ओबामा, ने, छेड़ी, बहस, क्या, कहते, हैं, एक्सपर्ट, और, WHO</media:keywords>
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        <title>Fainting On Standing: अचानक खड़े होते ही आने लगता है चक्कर, यह किस बीमारी का संकेत?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/fainting-on-standing-अचानक-खड़े-होते-ही-आने-लगता-है-चक्कर-यह-किस-बीमारी-का-संकेत</link>
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        <description><![CDATA[ Diabetes And Orthostatic Hypotension: अचानक कुर्सी से उठते ही चक्कर आना, आंखों के आगे अंधेरा छा जाना या गिरने जैसा महसूस होना, अगर आपके साथ भी ऐसा होता है, तो इसे हल्के में लेने की गलती न करें. यह एक आम समस्या जरूर है, लेकिन इसके पीछे एक मेडिकल कारण हो सकता है. इस स्थिति को ऑर्थोस्टेटिक हाइपोटेंशन या पोश्चर हाइपोटेंशन कहा जाता है. यह तब होता है, जब बैठी या लेटी हालत से अचानक खड़े होने पर शरीर ब्लड प्रेशर को जल्दी से एडजस्ट नहीं कर पाता और दिमाग तक पर्याप्त खून नहीं पहुंच पाता. इसी वजह से चक्कर, धुंधला दिखना या बेहोशी जैसा अहसास होने लगता है.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
राम मनोहर लोहिया अस्पताल, नई दिल्ली के न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. अभिषेक कुमार के अनुसार, जैसे ही हम खड़े होते हैं, ग्रेविटी की वजह से खून पैरों की ओर चला जाता है. आमतौर पर शरीर की ऑटोनॉमिक नर्वस सिस्टम तुरंत नसों को सिकोड़कर और दिल की धड़कन बढ़ाकर इसकी भरपाई कर लेती है. लेकिन अगर यह प्रतिक्रिया धीमी हो जाए, तो चक्कर आ सकता है. डायटीशियन और वेट मैनेजमेंट एक्सपर्ट के अनुसार, खड़े होते समय पैरों में खून जमा हो जाता है, जिससे ब्रेन तक ऑक्सीजन कम पहुंचती है. पर्याप्त पानी पीना, इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन बनाए रखना और धीरे-धीरे खड़ा होना इस समस्या को कम कर सकता है.
किस कारण से होता है ऐसा?
डिहाइड्रेशन, खून की कमी, लंबे समय तक बिस्तर पर रहना, कुछ दवाएं और उम्र बढ़ने के साथ शरीर की प्रतिक्रिया क्षमता कम होना भी चक्कर की वजह बन सकते हैं. रिसर्च में यह भी सामने आया है कि खड़े होते ही पहले एक मिनट में ब्लड प्रेशर का अचानक गिरना डिमेंशिया के खतरे से जुड़ा हो सकता है. जिन लोगों में खड़े होने के 30 सेकंड के भीतर सिस्टोलिक ब्लड प्रेशर 20 mmHg या उससे ज्यादा गिरा, उनमें भविष्य में डिमेंशिया का जोखिम ज्यादा पाया गया.
कब डॉक्टर से दिखाना होता है जरूरी?
एक्सपर्ट का कहना है कि अगर कोई व्यक्ति बार-बार खड़े होते ही चक्कर महसूस करता है, तो डॉक्टर को जरूर बताना चाहिए और खड़े होकर ब्लड प्रेशर की जांच करानी चाहिए. खासकर बुजुर्गों में यह गिरने, हड्डी टूटने और गंभीर चोट का खतरा बढ़ा सकता है. इससे बचाव के लिए धीरे खड़े होना, पर्याप्त पानी पीना, पैरों की एक्सरसाइज करना, घर में फिसलन से बचाव के इंतजाम करना और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर से दवाओं की समीक्षा कराना जरूरी है. समय रहते ध्यान दिया जाए, तो इस समस्या को काफी हद तक कंट्रोल किया जा सकता है. लाइफस्टाइल में बदलाव के साथ हम इसपर काबू पा सकते हैं.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 28 Jan 2026 13:30:08 +0530</pubDate>
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        <title>सिगरेट से ज्यादा खतरनाक है लंबे समय तक बैठना, जानें किस अंग को पहुंचता है सबसे ज्यादा नुकसान?</title>
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        <description><![CDATA[ आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम खुद को सुरक्षित समझते हैं क्योंकि न तो हम सिगरेट पीते हैं और न ही कोई नशा करते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि बिना धूम्रपान किए भी आप कई गंभीर बीमारियों की चपेट में आ सकते हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह लंबे समय तक लगातार बैठे रहना है.&amp;nbsp;ऑफिस में घंटों कुर्सी पर बैठकर काम करना, सफर के दौरान बैठे रहना, घर आकर टीवी या मोबाइल पर समय बिताना, यह सब हमारी दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है.
पहली नजर में यह बिल्कुल सामान्य लगता है, लेकिन मेडिकल रिसर्च बता रही है कि लगातार बैठे रहना शरीर के लिए उतना ही खतरनाक हो सकता है जितना सिगरेट पीना. इसी वजह से आजकल हेल्थ एक्सपर्ट इसे नया स्मोकिंग कहने लगे हैं. यह आदत धीरे-धीरे शरीर को अंदर से कमजोर करती है और कई गंभीर बीमारियों को जन्म देती है.&amp;nbsp;
क्यों बढ़ रही है सिटिंग लाइफस्टाइल की समस्या?
तकनीक ने हमारी जिंदगी को आसान तो बना दिया है, लेकिन साथ ही हमें आलसी भी बना दिया है. आज ज्यादातर लोग 8 से 10 घंटे कंप्यूटर या लैपटॉप पर काम करते हैं, फोन पर स्क्रॉल करते रहते हैं, टीवी देखते हुए घंटों एक ही जगह बैठे रहते हैं. जब शरीर को लंबे समय तक हिलने-डुलने का मौका नहीं मिलता, तो इसका सीधा असर हमारे दिल, दिमाग, मांसपेशियों और पाचन तंत्र पर पड़ता है.&amp;nbsp;
लंबे समय तक बैठने से शरीर के इन अंग को पहुंचता है सबसे ज्यादा नुकसान?
1. &amp;nbsp;हार्ट और ब्लड सेल्स पर असर - ज्यादा देर तक बैठे रहने से ब्लड फ्लो धीमा हो जाता है. इससे ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है, खराब कोलेस्ट्रॉल (LDL) बढ़ता है, दिल का दौरा और स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है. रिसर्च के अनुसार, दिन में 8 घंटे से ज्यादा बैठने वालों में हृदय रोग से मौत का खतरा काफी बढ़ जाता है.&amp;nbsp;
2. &amp;nbsp;डायबिटीज और इंसुलिन रेजिस्टेंस - जब शरीर एक्टिव नहीं रहता, तो मांसपेशियां शुगर को सही तरह से इस्तेमाल नहीं कर पातीं, इससे इंसुलिन ठीक से काम नहीं करता, टाइप 2 डायबिटीज का खतरा बढ़ जाता है, यह समस्या दुबले-पतले लोगों में भी हो सकती है.&amp;nbsp;
3. मोटापा और धीमा मेटाबॉलिज्म - बैठे रहने पर कैलोरी बहुत कम बर्न होती है. जिसके कारण वजन तेजी से बढ़ता है, पेट और कमर के आसपास चर्बी जमा होती है, शरीर का मेटाबॉलिज्म सुस्त हो जाता है.&amp;nbsp;
4. पीठ, गर्दन और कंधों में दर्द - गलत तरीके से बैठकर काम करने से रीढ़ की हड्डी पर दबाव पड़ता है, गर्दन और कंधों में अकड़न होती है, लंबे समय तक चलने वाला कमर दर्द शुरू हो सकता है.&amp;nbsp;
5. दिमाग और मानसिक स्वास्थ्य पर असर - कम फिजिकल एक्टिविटी से दिमाग तक ऑक्सीजन कम पहुंचती है, तनाव, चिंता और डिप्रेशन बढ़ सकता है, ध्यान केंद्रित करने में परेशानी होती है.&amp;nbsp;
6. पाचन तंत्र कमजोर होता है - खाना खाने के बाद तुरंत बैठ जाने से पाचन धीमा हो जाता है. गैस, कब्ज और एसिडिटी की समस्या होती है.&amp;nbsp;
क्या सच में बैठना सिगरेट जितना खतरनाक है?
डॉक्टरों के अनुसार, बैठने और धूम्रपान से नुकसान अलग-अलग तरीकों से होता है, लेकिन दोनों ही आदतें धीरे-धीरे शरीर को बीमार बनाती हैं. कुछ स्टडीज बताती हैं कि लगातार 8 घंटे बैठना हफ्ते में 10&amp;ndash;15 सिगरेट पीने जितना नुकसानदायक हो सकता है. लंबे समय तक बैठने से असमय मृत्यु का खतरा बढ़ जाता है.&amp;nbsp;
लंबे समय तक बैठने से कैसे बचें?
1. हर 30 मिनट में उठें, काम के बीच 2&amp;ndash;3 मिनट टहलें या स्ट्रेच करें.&amp;nbsp;
2. खड़े होकर काम करने की आदत डालें और अगर संभव हो तो स्टैंडिंग डेस्क का यूज करें.&amp;nbsp;
3. फोन कॉल पर चलते रहें, फोन पर बात करते समय कुर्सी पर न बैठें.&amp;nbsp;
4. रोजाना व्यायाम करें, तेज चलना, योग या साइक्लिंग बहुत फायदेमंद है.&amp;nbsp;
5. सही तरीके से बैठें, सीधी पीठ, ढीले कंधे और स्क्रीन आंखों के स्तर पर रखें.&amp;nbsp;&amp;nbsp;6. घर पर भी एक्टिव रहें, टीवी देखने के बीच उठकर टहलें या हल्के काम करें.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 27 Jan 2026 13:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>30 की उम्र में हाई बीपी की समस्या, क्या यह नॉर्मल है या किसी बड़े खतरे का संकेत?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/30-की-उम्र-में-हाई-बीपी-की-समस्या-क्या-यह-नॉर्मल-है-या-किसी-बड़े-खतरे-का-संकेत</link>
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        <description><![CDATA[ हाई ब्लड प्रेशर यानी हाइपरटेंशन को पहले सिर्फ बुजुर्गों या अधेड़ उम्र के लोगों की बीमारी माना जाता था. लोगों को लगता था कि यह समस्या 50 या 60 की उम्र के बाद ही होती है. लेकिन आज के समय में यह सोच पूरी तरह बदल चुकी है.&amp;nbsp;आज हैरान करने वाली सच्चाई यह है कि 20 से 30 साल की उम्र के युवा भी हाई ब्लड प्रेशर की चपेट में आ रहे हैं और सबसे खतरनाक बात यह है कि उनमें से कई लोगों को यह पता ही नहीं होता कि उनका ब्लड प्रेशर बढ़ चुका है.
हाई बीपी को साइलेंट किलर कहा जाता है, क्योंकि यह बिना किसी खास लक्षण के शरीर के अंदर धीरे-धीरे नुकसान करता रहता है. जब तक इसके संकेत साफ दिखाई देते हैं, तब तक यह दिल, किडनी, दिमाग और आंखों को नुकसान पहुंचा चुका होता है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या 30 की उम्र में हाई बीपी होना नॉर्मल है या यह किसी बड़ी और गंभीर बीमारी का संकेत है.&amp;nbsp;
हाई ब्लड प्रेशर क्या होता है?
जब हमारी धमनियों में बहने वाले खून का दबाव लगातार सामान्य से ज्यादा बना रहता है, तो इसे हाई ब्लड प्रेशर या हाइपरटेंशन कहा जाता है. ब्लड प्रेशर की रीडिंग दो नंबरों में होती है. जिसमें पहली सिस्टोलिक प्रेशर, जब दिल खून पंप करता है और दूसरा डायस्टोलिक प्रेशर, जब दिल आराम की अवस्था में होता है. अगर सिस्टोलिक बीपी 140 mmHg या उससे ज्यादा, या डायस्टोलिक बीपी 90 mmHg या उससे ज्यादा हो तो इसे हाई ब्लड प्रेशर माना जाता है.&amp;nbsp;
क्या 30 की उम्र में हाई बीपी नॉर्मल?
30 की उम्र में हाई बीपी को बिल्कुल भी नॉर्मल नहीं माना जाता है. &amp;nbsp;यह इस बात का संकेत है कि आपकी लाइफस्टाइल गलत दिशा में जा रही है. आपका शरीर अंदर से दबाव झेल रहा है. भविष्य में हार्ट अटैक, स्ट्रोक या किडनी की समस्या का खतरा बढ़ सकता है. ऐसे में 30 साल के बाद हर व्यक्ति को साल में कम से कम 1&amp;ndash;2 बार बीपी जरूर चेक कराना चाहिए. अगर परिवार में हाई बीपी की हिस्ट्री है, तो और भी सतर्क रहना चाहिए. समय पर जांच से हार्ट अटैक, स्ट्रोक, किडनी फेल, आंखों की रोशनी जाने, समय से पहले बुढ़ापा जैसी गंभीर समस्याओं से बचा जा सकता है.&amp;nbsp;
30 की उम्र में क्यों हो रहा हाई बीपी?&amp;nbsp;आज की मॉडर्न लाइफस्टाइल इसकी सबसे बड़ी वजह है. डॉक्टरों और हेल्थ एक्सपर्ट्स के अनुसार, युवाओं में हाई बीपी होने के पीछे कई कारण हैं. आजकल युवा घंटों मोबाइल और लैपटॉप देखते हैं, देर रात तक जागते हैं, पूरी नींद नहीं लेते, शारीरिक मेहनत बहुत कम करते हैं, यह सब चीजें ब्लड प्रेशर को बढ़ाने में मदद करती हैं. करियर का प्रेशर, नौकरी की चिंता, पैसों की टेंशन और रिश्तों की उलझन &amp;ndash; लगातार तनाव में रहने से शरीर में ऐसे हार्मोन निकलते हैं जो बीपी बढ़ा देते हैं.
आज के खानपान में ज्यादा नमक, ज्यादा तेल, फास्ट फूड, पैकेज्ड स्नैक्स, मीठे ड्रिंक्स, इन सबका सेवन ब्लड प्रेशर को धीरे-धीरे बढ़ा देता है. वजन बढ़ने से दिल को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है, जिससे बीपी बढ़ता है. पेट की चर्बी हाई बीपी का बड़ा संकेत मानी जाती है. सिगरेट, तंबाकू और ज्यादा शराब धमनियों को सख्त कर देते हैं, दिल पर दबाव बढ़ाते हैं, इससे कम उम्र में ही बीपी बढ़ने लगता है. रोज 4&amp;ndash;5 घंटे की नींद अब आम बात हो गई है. नींद पूरी न होने से शरीर ठीक से रिपेयर नहीं हो पाता और ब्लड प्रेशर प्रभावित होता है.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 27 Jan 2026 13:30:08 +0530</pubDate>
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        <media:keywords>की, उम्र, में, हाई, बीपी, की, समस्या, क्या, यह, नॉर्मल, है, या, किसी, बड़े, खतरे, का, संकेत</media:keywords>
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        <title>फैट लॉस के दौरान भी खा सकते हैं कार्ब्स, एक्सपर्ट ने बताए 5 ऐसे फूड्स जो भूख करें कंट्रोल</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/फैट-लॉस-के-दौरान-भी-खा-सकते-हैं-कार्ब्स-एक्सपर्ट-ने-बताए-5-ऐसे-फूड्स-जो-भूख-करें-कंट्रोल</link>
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        <description><![CDATA[  ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 27 Jan 2026 09:30:09 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Weight Loss Tips: क्रेविंग कम करने से लेकर प्रोटीन नाश्ते तक, वजन घटाने का वह तरीका, जो आपकी आदतों को बदल देगा</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/weight-loss-tips-क्रेविंग-कम-करने-से-लेकर-प्रोटीन-नाश्ते-तक-वजन-घटाने-का-वह-तरीका-जो-आपकी-आदतों-को-बदल-देगा</link>
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        <pubDate>Mon, 26 Jan 2026 17:30:14 +0530</pubDate>
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        <title>8 घंटे से ज्यादा सोते हैं फिर भी सुबह उठते ही सिर दर्द होता है, जानें क्या है समस्या?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/8-घंटे-से-ज्यादा-सोते-हैं-फिर-भी-सुबह-उठते-ही-सिर-दर्द-होता-है-जानें-क्या-है-समस्या</link>
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        <description><![CDATA[ सुबह का समय दिन की सबसे अच्छी शुरुआत माना जाता है. अच्छी नींद के बाद ताजगी महसूस होनी चाहिए, लेकिन कई लोगों की सुबह सिर दर्द के साथ शुरू होती है. हैरानी की बात यह है कि कुछ लोग पूरी 8&amp;ndash;9 घंटे की नींद लेने के बावजूद जैसे ही बिस्तर से उठते हैं, सिर भारी लगने लगता है या तेज दर्द शुरू हो जाता है.
अक्सर लोग इसे थकान, मौसम या आज कुछ ठीक नहीं है, कहकर नजरअंदाज कर देते हैं. लेकिन अगर यह समस्या बार-बार हो रही है, तो यह आपके शरीर की तरफ से एक संकेत हो सकता है. सुबह होने वाला सिर दर्द कोई छोटी बात नहीं है, इसके पीछे नींद से जुड़ी आदतें, पानी की कमी, तनाव, या कभी-कभी गंभीर स्वास्थ्य कारण भी हो सकते हैं. अच्छी बात यह है कि ज्यादातर मामलों में कारण पहचाने जा सकते हैं और सही कदम उठाकर इस समस्या से राहत पाई जा सकती है.&amp;nbsp;
8 घंटे से ज्यादा सोते हैं फिर भी सुबह उठते ही सिर दर्द क्यों होता है?
1. जरूरत से ज्यादा सोना - बहुत से लोगों को लगता है कि जितना ज्यादा सोएंगे, उतना बेहतर होगा. लेकिन सच्चाई यह है कि जरूरत से ज्यादा नींद भी सिर दर्द का कारण बन सकती है. ज्यादा देर तक सोने से दिमाग के केमिकल (न्यूरोट्रांसमीटर) असंतुलित हो जाते हैं. खासतौर पर वीकेंड पर देर तक सोने से वीकेंड हेडेक हो सकता है. इसके कारण उठते ही सिर भारी लगना, सुस्ती और चिड़चिड़ापन जैसे समस्या हो सकती है.&amp;nbsp;
2. शरीर में पानी की कमी - रात भर सोते समय हम पानी नहीं पीते, अगर दिन में भी पर्याप्त पानी न पिया जाए, तो सुबह शरीर और दिमाग़ दोनों में पानी की कमी हो जाती है. जब शरीर डिहाइड्रेट होता है, तो दिमाग हल्का-सा सिकुड़ता है, जिससे नसों पर दबाव पड़ता है और सिर दर्द होता है. &amp;nbsp;ज्यादा खतरा तब होता है जब रात में शराब पी हो, कमरा बहुत गर्म हो, दिन भर पानी कम पिया गया हो.&amp;nbsp;
3. स्लीप एपनिया (Sleep Apnea) - स्लीप एपनिया एक ऐसी समस्या है जिसमें नींद के दौरान सांस बार-बार रुकती है. इससे दिमाग को पूरी ऑक्सीजन नहीं मिल पाती है. ऐसे लोगों को अक्सर तेज खर्राटे आते हैं, सुबह उठते ही सिर दर्द होता है, दिन में बहुत नींद आती है. यह एक गंभीर स्थिति हो सकती है, जिसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.&amp;nbsp;
4. रात में दांत पीसना (Bruxism) - कई लोग सोते समय अनजाने में दांत पीसते या जबड़ा कस लेते हैं. इससे जबड़े और कनपटी की मांसपेशियों में तनाव आ जाता है, जो सुबह सिर दर्द का कारण बनता है. इसके लक्षण सुबह जबड़े में दर्द, कनपटियों में हल्का या मध्यम दर्द और दांतों का घिस जाना है.&amp;nbsp;
5.गलत तकिया या सोने की गलत पोजिशन - अगर आपका तकिया बहुत ऊंचा, बहुत सख्त या बहुत नरम है, तो गर्दन गलत स्थिति में चली जाती है. इससे गर्दन और सिर की मांसपेशियों पर दबाव पड़ता है. गलत पोजिशन में सोना भी सुबह सिर दर्द और गर्दन अकड़ने का कारण बन सकता है.&amp;nbsp;
6. तनाव, चिंता और अवसाद - मानसिक स्वास्थ्य का सीधा असर नींद और सिर दर्द पर पड़ता है. जिन लोगों को चिंता या अवसाद की समस्या होती है, उनमें सुबह सिर दर्द की शिकायत ज्यादा पाई जाती है. तनाव के कारण नींद गहरी नहीं होती, जिससे शरीर पूरी तरह आराम नहीं कर पाता है.&amp;nbsp;
सुबह के सिर दर्द से बचने के आसान उपाय
1. नियमित नींद का समय रखें - &amp;nbsp;वीकेंड पर भी रोज एक ही समय पर सोएं और उठें.&amp;nbsp;
2. पर्याप्त पानी पिएं - दिन भर पानी पीते रहें, सोने से पहले एक गिलास पानी, सुबह उठते ही पानी पिएं .&amp;nbsp;
3. सही तकिया चुनें - ऐसा तकिया लें जो आपकी गर्दन को सीधी स्थिति में रखे, न ज्यादा सख्त, न ज्यादा नरम.&amp;nbsp;
4. शराब और देर रात स्क्रीन से बचें - मोबाइल, लैपटॉप और टीवी सोने से पहले दिमाग को एक्टिव कर देते हैं.&amp;nbsp;
5. हल्का व्यायाम करें - नियमित व्यायाम माइग्रेन और तनाव दोनों को कम करता है.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 26 Jan 2026 17:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>सुबह उठते ही खट्टा या कड़वा हो जाता है मुंह तो पेट में यह बीमारी बना रही घर, जानें क्या है वजह?</title>
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        <description><![CDATA[ सुबह की शुरुआत ताजगी से भरी होती है, क्योंकि रात भर शरीर खुद की मरम्मत करता है. इसके बावजूद अगर आप सुबह उठते ही मुंह में खट्टा या कड़वा स्वाद महसूस करते हैं तो आपको अलर्ट होने की जरूरत है. आइए जानते हैं कि ऐसा होने की वजह क्या है?
क्या मुंह में लगता है खट्टा या कड़वा स्वाद?
कई बार खट्टा या कड़वा स्वाद अंदरुनी बुखार का संकेत देता है, लेकिन अगर इस स्वाद का अनुभव रोज हो रहा है तो ये संकेत हैं कि पेट में समस्या आ चुकी है. मुंह से जुड़ी हर परेशानी का कनेक्शन पेट से होता है. अगर पेट सही है, तो मुंह से जुड़े विकार कम हो जाते हैं.
पेट में किस दिक्कत की वजह से होता है ऐसा?
मुंह के खट्टे या कड़वा स्वाद को आधुनिक चिकित्सा में पेट से जुड़ी गड़बड़ी से जोड़कर देखा गया है. पेट में बढ़ रहा अम्ल मुंह खट्टा या कड़वा होने के पीछे का मुख्य कारण है. इसे आधुनिक चिकित्सा में &#039;एसिड रिफ्लक्स&#039; कहा जाता है, लेकिन आयुर्वेद इसे पित्त दोष की बीमारी मानता है. आयुर्वेद के अनुसार जब शरीर में पित्त की वृद्धि होती है, तब शरीर में अम्ल बढ़ने लगता है. इससे न सिर्फ पेट से जुड़ी बीमारियां होती है, बल्कि हड्डियों और जोड़ों में भी कमजोरी देखी जाती है.
रात की ये गलतियां भी डालती हैं असर
मुंह के खट्टे या कड़वे स्वाद होने के पीछे कई कारण हैं, जिनमें देर रात खाना खाना, शराब और तंबाकू का सेवन करना, लिवर का सही तरीके से काम न करना, पाचन अग्नि का मंद पड़ जाना और पेट में एसिड का बढ़ जाना शामिल है. पेट में एसिड बढ़ने के पीछे गलत खान-पान और लंबे समय तक भूखा रहना भी शामिल है.
ये आयुर्वेदिक तरीके आते हैं काम
आयुर्वेद में इस परेशानी का भी हल छिपा है. आयुर्वेद में पेट से जुड़ी बीमारियों से निजात पाने के लिए त्रिफला चूर्ण का सेवन सबसे लाभकारी है. रात को गुनगुने पानी के साथ आधा चम्मच त्रिफला चूर्ण लें. यह सुबह पेट साफ रखेगा और पित्त को जड़ से शांत करेगा. रात के भोजन के समय में बदलाव के साथ पेट से अम्ल को कम किया जा सकता है.
सोने का तरीका भी बदलने की जरूरत
देर रात खाना खाने से बचें और सूरज ढलने के समय खाना खा लें. खाने के तुरंत बाद बिस्तर पर न लेटें, कुछ समय घूमें और बाईं करवट लेकर ही सोएं. विज्ञान मानता है कि बाईं करवट सोने से पेट का एसिड ऊपर नली में नहीं चढ़ता और दिल तक रक्त का प्रवाह भी अच्छा बना रहता है.
ये नुस्खे भी करते हैं मदद
तांबे का पानी पेट के अम्ल को शांत करने का बेहतरीन उपाय है. इसकी तासीर ठंडी होती है, जो पेट के अम्ल को शांत करने में मदद करती है. इसके लिए रात को तांबे के बर्तन में पानी भरकर रख दें और सुबह पानी का सेवन करें. तांबे का पानी शरीर को डिटॉक्स करने में मदद करेगा.&amp;nbsp;सौंफ और मिश्री का पानी या खाने के बाद उसका सेवन पाचन को सुधारने में मदद करता है और मुंह से आने वाली दुर्गंध से भी छुटकारा दिलाता है. इसके अलावा, अत्यधिक तनाव और चिंता से दूर रहें. स्ट्रेस में पेट में एसिड का उत्पादन सामान्य से तीन गुना ज्यादा बढ़ जाता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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        <pubDate>Mon, 26 Jan 2026 13:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>क्या आप भी टॉयलेट में यूज करते हैं फोन? तुरंत बदल लें आदत वरना शरीर बन जाएगा बीमारियों का घर</title>
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        <description><![CDATA[ हाई टेक्नोलॉजी की दुनिया में लोगों के लिए मोबाइल से पांच मिनट भी दूर रह पाना मुश्किल होता जा रहा है. रील देखने और सोशल मीडिया पर वक्त बिताने की लत इतनी ज्यादा लग चुकी है कि लोग टॉयलेट में भी मोबाइल अपने साथ लेकर जाते हैं और जरूरत से ज्यादा समय वहीं बिता देते हैं.&amp;nbsp;क्या आप जानते हैं कि टॉयलेट में मोबाइल का इस्तेमाल आपकी सेहत को कितनी बुरी तरह प्रभावित करता है?
रिसर्च में सामने आई यह बात
टॉयलेट में मोबाइल का इस्तेमाल करने की बढ़ती आदत पर कई रिसर्च हो चुकी हैं, जिसमें ये साफ पाया गया कि ऐसा करने वाले लोगों में पाचन की परेशानी और पाइल्स की समस्या ज्यादा देखी गई है.&amp;nbsp;टॉयलेट सीट पर समय से अधिक समय तक बैठे रहने से रेक्टम पर असर पड़ता है, जिसकी वजह से पाइल्स होने की आशंका बाकी लोगों की तुलना में ज्यादा बढ़ जाती है. इसके अलावा पेट पर पड़ने वाले दबाव की वजह से पाचन शक्ति पर असर पड़ता है और इससे कब्ज की समस्या बढ़ सकती है.
मांसपेशियों और हड्डियों पर भी पड़ता है असर
टॉयलेट में मोबाइल का इस्तेमाल करने की आदत से मांसपेशियों और हड्डियों पर भी असहनीय दबाव पड़ता है. मोबाइल को लगातार देखने के लिए गर्दन और कंधों पर बोझ बढ़ता है और मांसपेशियों में दर्द और जकड़न बढ़ जाती है. इससे रीढ़ की हड्डी भी प्रभावित होती है. अगर किसी को पहले से ही स्पाइनल कॉर्ड से जुड़ी परेशानी है तो उन्हें ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए.
सर्वाइकल होने का भी बढ़ता है खतरा
मोबाइल चलाने की खराब आदत की वजह से सर्वाइकल का रिस्क होने का खतरा रहता है. टॉयलेट में लंबे समय तक एक ही पोस्चर में बैठने की वजह से सिर और गर्दन के ऊपरी हिस्से पर सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ता है. कभी-कभी इससे तेज सिरदर्द और गर्दन में दर्द की परेशानी भी हो सकती है.
पेट भी नहीं हो पाता है साफ
इसके अलावा मोबाइल को टॉयलेट में ले जाने से उस पर खतरनाक बैक्टीरिया जमा हो जाते हैं. जितनी बार मोबाइल को पकड़ेंगे, उतनी ही बार हाथ धोना जरूरी होगा. यही वजह है कि टॉयलेट में मोबाइल के इस्तेमाल से परहेज करना चाहिए.&amp;nbsp;टॉयलेट में मोबाइल का इस्तेमाल करने से पेट पूरी तरह साफ भी नहीं होता है और मेंटल प्रेशर बढ़ता है. शरीर जब विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालता है, तब दिमाग का इस क्रिया में बड़ा योगदान होता है. दिमाग से सिग्नल मिलने के बाद ही शरीर के बाकी अंग अपने काम करते हैं. ऐसे में जब दिमाग मोबाइल चलाने में बिजी होगा तो विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने की प्रक्रिया पूरी तरह से नहीं हो पाती है और पेट में बची गंदगी शरीर को धीरे-धीरे बीमार करने लगती है.
ये भी पढ़ें: गर्दन चटकाने की आदत कहीं स्ट्रोक का खतरा तो नहीं, फिजिशियन ने बताया- कब बढ़ जाती है यह परेशानी?
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 25 Jan 2026 17:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>60 के बाद शरीर देता है साफ संकेत, जानें दर्द और असहजता में फर्क समझना क्यों है जरूरी?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/60-के-बाद-शरीर-देता-है-साफ-संकेत-जानें-दर्द-और-असहजता-में-फर्क-समझना-क्यों-है-जरूरी</link>
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        <description><![CDATA[ उम्र बढ़ना जीवन की एक आम प्रक्रिया है और इसके साथ शरीर में बदलाव आना भी तय है. वहीं 60 की उम्र के बाद कई लोगों को सुबह उठते ही पीठ में जकड़न, थोड़ी देर चलने पर घुटनों में दर्द या शरीर में ऐसी तकलीफ महसूस होने लगती है, जो पहले कभी नहीं थी. ऐसे में अक्सर यह समझना मुश्किल हो जाता है कि यह नॉर्मल उम्र के साथ बढ़ने वाली असहजता है या किसी गंभीर बीमारी का संकेत. एक्सपर्ट्स के अनुसार समय रहते इस फर्क को समझना बहुत जरूरी है, ताकि सही इलाज सही समय पर शुरू किया जा सके.
60 के बाद दर्द और असहजता में क्या है फर्क?
एक्सपर्ट्स के अनुसार 60 की उम्र के बाद शरीर में नई तरह की अकड़न, जकड़न और हर तरह की तकलीफ महसूस होना आम बात है. लेकिन यह जानना जरूरी है कि जो महसूस हो रहा है, वह दर्द है या केवल असहजता है, क्योंकि दोनों का इलाज अलग-अलग होता है. एक्सपर्ट्स बताते हैं कि असहजता आमतौर पर हल्की होती है, सुबह उठने पर शरीर में जकड़न, देर तक बैठने के बाद मांसपेशियों का कड़ा लगना या हल्की एक्टिविटी के बाद शरीर में दर्द महसूस होना उम्र बढ़ाने के सामान्य लक्षण है. ऐसी कंडीशन में आराम, हल्की एक्सरसाइज, स्ट्रेचिंग और गर्म पानी की सिकाई से राहत मिल जाती है. यह बदलाव जोड़ों, मांसपेशियों और शरीर की मुद्रा में उम्र के साथ होने वाले नेचुरल बदलावों के कारण होते हैं.
दर्द को नजरअंदाज करना पड़ सकता है भारी
वहीं दर्द की बात करें तो यह ज्यादा गंभीर और लंबे समय तक रहने वाला होता है. एक्सपर्ट्स बताते हैं कि दर्द अक्सर नींद, चलने-फिरने और रोजमर्रा के कामों को प्रभावित करता है. अगर दर्द समय के साथ बढ़ता जाए, अचानक शुरू हो या उसके साथ सूजन, सुन्नता या कमजोरी महसूस हो तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. यह गठिया, नसों से जुड़ी समस्या, फ्रैक्चर या किसी अंदरूनी बीमारी का संकेत हो सकता है.
क्या कहती है इंटरनल मेडिसिन की राय?
डॉक्टरों के अनुसार 60 के बाद शरीर धीरे-धीरे कमजोर होता है. इसलिए पहचानना जरूरी है कि कौन सी परेशानी नॉर्मल है और कौन सी मेडिकल समस्या का संकेत है. उनका कहना है कि असहजता आमतौर पर हल्की, धीमी और थोड़ी-थोड़ी देर में होने वाली होती है, जो आराम हल्की, कसरत या दिनचर्या में छोटे बदलाव से ठीक हो जाती है. वहीं सुबह घुटनों में जकड़न या पूरे दिन के बाद शरीर में भारीपन महसूस होना उम्र का सामान्य असर है. लेकिन अगर दर्द तेज हो लंबे समय तक बना रहे या समय के साथ बढ़ता जाए तो यह चिंता का विषय है. ऐसा दर्द नींद, भूख और &amp;nbsp;रोजाना की एक्टिविटी को प्रभावित करता है और आराम करने से भी ठीक नहीं होता है.
यह लक्षण दिखे तो तुरंत डॉक्टर से मिले
एक्सपर्ट्स के अनुसार अगर दर्द के साथ तेज या चुभने वाला दर्द, सूजन, बुखार, अचानक वजन कम होना, शून्यता या कमजोरी या फिर रात में नींद से जगाने वाला दर्द दिखाई दें तो तुरंत मेडिकल सलाह जरूरी होती है. एक्सपर्ट्स भी बताते हैं कि कई बुजुर्ग दर्द को उम्र का हिस्सा मानकर सहते रहते हैं, जिससे गठिया, नसों का दबना, हड्डियों में फ्रैक्चर या अंगों से जुड़ी बीमारियों की पहचान देर से होती है.
ये भी पढ़ें-आवाज में हो रहा बदलाव तो हल्के में न लें, इन डेंजरस बीमारियों का मिलता है सिग्नल


Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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        <pubDate>Sun, 25 Jan 2026 09:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>रोज ब्रश करने के बाद भी पीले हो रहे दांत, जानें क्या है इस दिक्कत की वजह?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/रोज-ब्रश-करने-के-बाद-भी-पीले-हो-रहे-दांत-जानें-क्या-है-इस-दिक्कत-की-वजह</link>
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        <description><![CDATA[ हम सभी चाहते हैं कि हमारी स्माइल अट्रैक्टिव और कॉन्फिडेंस से भरी हो. एक चमकदार सफेद दांतों वाली स्माइल न सिर्फ खूबसूरती बढ़ाती है, बल्कि लोगों पर पॉजिटिव इंपैक्ट भी डालती है. इसके लिए लोग रोजाना ब्रश करने की आदत रखते हैं, फ्लॉस करते हैं और माउथवॉश का भी यूज करते हैं फिर भी कई लोग इस समस्या से परेशान रहते हैं कि उनके दांत पीले या फीके क्यों दिखते हैं.
यह सवाल बहुत आम है और इसका जवाब जानना जरूरी है. अक्सर लोग समझते हैं कि सिर्फ ब्रश करना ही दांतों को सफेद बनाए रखने के लिए पर्याप्त है, लेकिन असल में स्थिति इससे थोड़ी जटिल है. तो आइए जानते हैं कि &amp;nbsp;रोज ब्रश करने के बाद भी दांत क्यों पीले हो रहे और इस दिक्कत की वजह क्या है.&amp;nbsp;
रोज ब्रश करने के बाद भी दांत क्यों पीले हो रहे
हमारे दांतों की संरचना परतों में होती है. सबसे ऊपर की परत को एनामेल कहते हैं, जो सफेद और थोड़ी पारदर्शी होती है. इसके नीचे की परत डेंटिन होती है, जो प्राकृतिक रूप से पीली होती है. उम्र बढ़ने के साथ, या कभी-कभी जन्मजात रूप से, एनामेल पतली हो जाती है और डेंटिन ज्यादा दिखाई देने लगता है. इसका मतलब यह है कि कुछ लोगों के दांत स्वाभाविक रूप से थोड़े पीले दिखाई देते हैं, भले ही वे कितनी भी अच्छी तरह से ब्रश करें. दांतों का पीला होना हमेशा सिर्फ बाहरी कारणों से नहीं होता है. कई बार यह आंतरिक कारणों से भी हो सकता है.&amp;nbsp;
इस दिक्कत की वजह क्या है
1. खराब ब्रशिंग आदतें - रोजाना ब्रश करना अच्छा है, लेकिन ब्रश करने का सही तरीका और नियमितता भी उतनी ही जरूरी है. अगर दांतों की सफाई अधूरी हो, तो प्लाक जमा हो जाता है. प्लाक धीरे-धीरे टार्टर में बदल जाता है, जिसे केवल ब्रश से हटाना मुश्किल होता है. इसके लिए पेशेवर डेंटल क्लीनिंग करवाना जरूरी है.&amp;nbsp;
2. खाने-पीने की चीजें - कुछ खाद्य पदार्थ और पेय दांतों पर दाग छोड़ सकते हैं. कॉफी, चाय, रेड वाइन, गहरे रंग के सोडा और शराब दांतों को पीला कर सकते हैं. खट्टे फल और अम्लीय चीजें एनामेल को कमजोर कर सकती हैं, जिससे पीला डेंटिन और ज्यादा दिखाई देता है. खाने के बाद नमक वाले पानी से कुल्ला करने से दाग कम हो सकते हैं.&amp;nbsp;
3. धूम्रपान और तंबाकू - तंबाकू और सिगरेट में मौजूद टार और निकोटीन दांतों पर स्थायी दाग छोड़ते हैं. धूम्रपान से न सिर्फ दांत पीले होते हैं, बल्कि मसूड़ों की बीमारी का खतरा भी बढ़ जाता है.&amp;nbsp;
4. उम्र और प्राकृतिक कारण - उम्र बढ़ने के साथ दांतों की ऊपरी परत पतली होती है. कुछ लोगों में एनामेल प्राकृतिक रूप से पतला होता है, जिससे पीला डेंटिन ज्यादा दिखाई देता है. यह कोई बीमारी नहीं है, बल्कि प्राकृतिक संरचना है.&amp;nbsp;
5. दवाइयां और स्वास्थ्य समस्याएं - कुछ एंटीबायोटिक्स, आयरन सप्लीमेंट या मेडिकल ट्रीटमेंट जैसे कीमोथेरेपी दांतों के रंग को प्रभावित कर सकते हैं. अगर दवाइयों से दांत पीले हो रहे हैं, तो डेंटिस्ट से सलाह लेना जरूरी है.&amp;nbsp;
6. चोट और दुर्घटनाएं - दांतों पर चोट लगने से उनका आंतरिक रंग बदल सकता है, जिससे वे पीले या भूरे दिखाई देते हैं. इसके लिए सही ट्रीटमेंट जैसे वेनीर्स या व्हाइटनिंग मदद कर सकते हैं.&amp;nbsp;
दांतों को सफेद और चमकदार कैसे बनाएं?
1. पेशेवर क्लीनिंग - साल में दो बार डेंटिस्ट से स्केलिंग और क्लीनिंग करवाने से प्लाक और टार्टर हट जाते हैं. यह बाहरी दाग कम करने में मदद करता है.&amp;nbsp;
2. व्हाइटनिंग ट्रीटमेंट - अगर दांत प्राकृतिक रूप से पीले हैं या धब्बे लग गए हैं, तो डेंटिस्ट के मार्गदर्शन में व्हाइटनिंग सबसे असरदार तरीका है.&amp;nbsp;
3. सही ब्रशिंग और फ्लॉसिंग - दो बार दिन में ब्रश और रोजाना फ्लॉसिंग जरूरी है. सॉफ्ट ब्रश और फ्लोराइड युक्त टूथपेस्ट यूज करें. ब्रश ज्यादा कड़ा करने से एनामेल घिस सकता है, जिससे पीला डेंटिन और दिख सकता है.
4. लाइफस्टाइल में बदलाव - गहरे रंग के पेय और तंबाकू से बचें. खट्टे फल और अम्लीय चीजें खाने के बाद कुल्ला करें. पर्याप्त पानी पिएं और बैलेंस डाइट लें.&amp;nbsp;
5. . कॉस्मेटिक ट्रीटमेंट - अगर दांत बहुत पीले हैं या एनामेल कमजोर है, तो वेनीर्स, बांडिंग या अन्य डेंटल रिस्टोरेशन के ऑप्शन मददगार हो सकते हैं.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ें - Periods After Delivery: बच्चे की डिलीवरी के कितने दिन तक पीरियड्स न आना नॉर्मल, कब डॉक्टर से मिलना होता है जरूरी?
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 24 Jan 2026 17:30:15 +0530</pubDate>
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        <title>Benefits Of Walking: दिल की सेहत के लिए कितनी तेज चलना है फायदेमंद, क्या कहते हैं डॉक्टर्स?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/benefits-of-walking-दिल-की-सेहत-के-लिए-कितनी-तेज-चलना-है-फायदेमंद-क्या-कहते-हैं-डॉक्टर्स</link>
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        <description><![CDATA[ How Fast Should You Walk For Heart Health: एक स्टडी में सामने आया है कि अगर कोई व्यक्ति एक ही बार में 10 से 15 मिनट लगातार चलता है, तो यह हार्ट की सेहत के लिए छोटे-छोटे अंतराल में चलने की तुलना में कहीं ज्यादा फायदेमंद होता है. खासकर उन लोगों के लिए जो शारीरिक रूप से कम सक्रिय हैं, लगातार थोड़ी देर तक चलना मौत और हार्ट से जुड़ी बीमारियों के खतरे को कम करता है. यानी चलने के तरीके में थोड़ा-सा बदलाव भी हार्ट की सेहत पर बड़ा असर डाल सकता है.&amp;nbsp;
वॉक करना फायदेमंद
हार्ट को स्वस्थ रखने के लिए वॉक करना सबसे आसान और असरदार तरीका माना जाता है. आज के समय में हार्ट हेल्थ का ध्यान रखना पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो गया है. WHO के अनुसार, हर साल दुनिया भर में लगभग 1.79 करोड़ लोगों की मौत हार्ट रोगों के कारण होती है. इन जोखिमों को कम करने का सबसे सरल उपाय है चलना. लेकिन सवाल यह है कि कितनी तेज चलना जरूरी है?
कितनी तेज चलना चाहिए?
2023 में GeroScience में प्रकाशित एक रिसर्च के मुताबिक, जो लोग तेज़ रफ्तार से चलते हैं, लगभग 3 से 4.5 मील प्रति घंटा की गति से उनमें दिल से जुड़ी बीमारियों से मौत का खतरा कम होता है. इतना ही नहीं, इन लोगों में स्ट्रोक और डिमेंशिया का जोखिम भी धीमी चाल से चलने वालों की तुलना में कम पाया गया. आसान शब्दों में कहें तो यह रफ्तार एक मील 20 मिनट से लेकर 13 मिनट में तय करने के बराबर होती है.
रिसर्च यह भी बताती है कि तेज चाल से चलने के छोटे-छोटे सेशन भी बेहद फायदेमंद होते हैं. अगर कोई व्यक्ति रोज सिर्फ 10 मिनट तेज चलता है और ऐसा एक हफ्ते तक करता है, तो इससे फिटनेस में सुधार, मूड बेहतर होने और समय से पहले मौत के खतरे में करीब 15 प्रतिशत तक कमी देखी गई है, वहीं, अगर आप 30 मिनट तक लगातार तेज चाल से चलते हैं, तो यह एक मीडियम-इंटेंसिटी वर्कआउट माना जाता है, जिसकी सिफारिश अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन भी करता है.
कितनी देर चलना चाहिए?
ऑस्ट्रेलिया की यूनिवर्सिटी ऑफ सिडनी और स्पेन की यूनिवर्सिदाद यूरोपीया के एक्सपर्ट के नेतृत्व में किए गए एक अंतरराष्ट्रीय स्टडी में पाया गया कि दिन में कुछ ही मिनट सही तरीके से चलना भी दिल की सेहत में बड़ा फर्क ला सकता है. &amp;nbsp;इस रिसर्च के नतीजे Annals of Internal Medicine में प्रकाशित हुए हैं. रिसर्चर के अनुसार, अगर आप 10 से 15 मिनट तक बिना रुके चलते हैं, तो इसका असर दिल पर ज्यादा पॉजिटिव होता है.
ये भी पढ़ें: गर्दन चटकाने की आदत कहीं स्ट्रोक का खतरा तो नहीं, फिजिशियन ने बताया- कब बढ़ जाती है यह परेशानी?
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 23 Jan 2026 13:30:09 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Benefits, Walking:, दिल, की, सेहत, के, लिए, कितनी, तेज, चलना, है, फायदेमंद, क्या, कहते, हैं, डॉक्टर्स</media:keywords>
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        <title>Guava Health Benefits:  अमरूद खाने से मिलते हैं ये 8 फायदे, साइंस ने भी किया है प्रूफ</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/guava-health-benefits-अमरूद-खाने-से-मिलते-हैं-ये-8-फायदे-साइंस-ने-भी-किया-है-प्रूफ</link>
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        <pubDate>Thu, 22 Jan 2026 17:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Paracetamol During Pregnancy: क्या प्रेग्नेंसी में पैरासिटामोल खाने से बच्चे को हो जाती है दिमागी बीमारी, कितनी सच है ये बात?</title>
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        <description><![CDATA[ Does Paracetamol During Pregnancy Cause Autism: प्रेग्नेंसी के दौरान पैरासिटामोल लेने को लेकर हाल के दिनों में कई दावे सामने आए हैं. यहां तक कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जैसे नेताओं ने भी यह कह दिया कि प्रेग्नेंसी में पैरासिटामोल लेने से बच्चों में ऑटिज़्म जैसी दिमागी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है. लेकिन अब इस दावे पर बड़ा फैक्ट-चेक सामने आया है. चलिए आपको बताते हैं कि क्या सच में यह खतरनाक है या फिर इसको लेकर फेक दावों की बौछार लगा दी गई थी.&amp;nbsp;
रिसर्च में निकला कोई खतरा नहीं
मेडिकल जर्नल The Lancet में प्रकाशित एक रिव्यू में साफ कहा गया है कि गर्भावस्था के दौरान पैरासिटामोल लेने से बच्चों में ऑटिज्म, एडीएचडी या आर्टिफिशियल डिसेबिलिटी का कोई क्लिनिकली महत्वपूर्ण खतरा नहीं बढ़ता. इस स्टडी में अब तक हुए रिसर्च की गहराई से रिव्यू की गई. रिसर्चर का कहना है कि पहले जो स्टडी पैरासिटामोल को दिमागी बीमारियों से जोड़ती थीं, उनमें कई तरह की खामियां थीं. इनमें डेटा कन्फ्यूज़न, गलत याददाश्त पर आधारित जानकारी और दूसरे हेल्थ फैक्टर्स का असर शामिल था, जिससे नतीजे भरोसेमंद नहीं माने जा सकते.
इस नई रिव्यू के मुताबिक, बच्चों में ऑटिज़्म या न्यूरोडेवलपमेंटल समस्याओं की वजह पारिवारिक और जेनेटिक फैक्टर्स ज्यादा हो सकते हैं. यानी एक ही परिवार में पीढ़ी दर पीढ़ी ऐसे लक्षण दिखना ज्यादा तर्कसंगत वजह है, न कि पैरासिटामोल का सीधा असर. रिसर्च में उन स्टडीज को ज्यादा अहमियत दी गई, जिनमें एक ही मां की दो प्रेग्नेंसी की तुलना की गई. एक में पैरासिटामोल लिया गया और दूसरी में नहीं. ऐसे स्टडी जेनेटिक्स और घर के माहौल जैसे फैक्टर्स को बेहतर तरीके से अलग कर पाते हैं.
तीन स्टेप में बांटा गया है
रिसर्चर ने पैरासिटामोल और प्रेग्नेंसी से जुड़े स्टडीज को तीन स्टेप्स में जांचा. पहले स्टेप में गर्भवती महिलाओं द्वारा पैरासिटामोल के इस्तेमाल से जुड़ी 4,147 स्टडी को देखा गया, जिनमें से 4,092 को इसलिए बाहर कर दिया गया क्योंकि उनके नतीजे इस विषय से सीधे तौर पर जुड़े नहीं थे. दूसरे स्टेप में 55 फुल टेक्स्ट रिसर्च पेपर्स की गहराई से रिव्यू की गई. इनमें से भी 12 स्टडी को डिजाइन की कमी, डेटा अधूरा होने या विषय से मेल न खाने की वजह से हटा दिया गया.
अंतिम स्टेप में 43 स्टडी को व्यवस्थित तरीके से रिव्यू किया गया. इनमें से 17 हाई क्वालिटी वाली रिसर्च को डिटेल स्टैटिक्स एनालिसिस के लिए चुना गया, जिसमें खासतौर पर भाई-बहनों की तुलना वाले स्टडीज को प्राथमिकता दी गई, ताकि जेनेटिक और पारिवारिक प्रभाव को अलग किया जा सके.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
स्टडी की सीनियर राइटर प्रोफेसर अस्मा खलील का कहना है कि बिना पुख्ता सबूत ऐसे दावे करना गर्भवती महिलाओं में बेवजह डर पैदा कर सकता है. मौजूदा साइंटफिक साक्ष्य इन दावों का समर्थन नहीं करते. एक्सपर्ट ने दोहराया है कि मौजूदा मेडिकल गाइडलाइंस के तहत डॉक्टर की सलाह से लिया गया पैरासिटामोल प्रेग्नेंसी में सुरक्षित माना जाता है, दर्द या बुखार जैसी स्थिति में यह अब भी एक भरोसेमंद विकल्प है.
ये भी पढ़ें-&amp;nbsp;गर्दन चटकाने की आदत कहीं स्ट्रोक का खतरा तो नहीं, फिजिशियन ने बताया- कब बढ़ जाती है यह परेशानी?
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 22 Jan 2026 17:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>डाइट और एक्सरसाइज के बावजूद नहीं घट रहा वजन? आप भी तो नहीं कर रहे ये 5 बड़ी गलतियां</title>
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        <pubDate>Thu, 22 Jan 2026 13:30:14 +0530</pubDate>
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        <title>Breast Cancer: सावधान!  क्या आप भी रात भर जागती हैं? सिर्फ गांठ ही नहीं, ये भी हैं ब्रेस्ट कैंसर के बड़े कारण</title>
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        <pubDate>Thu, 22 Jan 2026 13:30:13 +0530</pubDate>
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        <title>हर आठ मिनट में सर्वाइकल कैंसर ले रहा एक महिला की जान, जानें क्या है कारण और इसका इलाज?</title>
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        <description><![CDATA[ भारत में महिलाओं की सेहत से जुड़ी एक गंभीर और चिंताजनक सच्चाई सामने आ रही है. एक ऐसी बीमारी, जिसके बारे में आज भी बहुत सी महिलाएं खुलकर बात नहीं कर पाती हैं, हर साल हजारों जिंदगियों को निगल रही है. यह बीमारी सर्वाइकल कैंसर है, जिसे हिंदी में गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर कहा जाता है.&amp;nbsp;
आंकड़े बताते हैं कि देश में हर आठ मिनट में एक महिला की मौत सिर्फ इसी बीमारी के कारण हो रही है. यह स्थिति इसलिए और भी दुखद है क्योंकि विशेषज्ञों का कहना है कि अगर समय रहते जांच और टीकाकरण हो जाए, तो इस कैंसर को काफी हद तक रोका जा सकता है. &amp;nbsp;
कितनी गंभीर है स्थिति?
एम्स और भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में हर साल करीब 1.23 लाख महिलाओं में सर्वाइकल कैंसर के नए मामले सामने आते हैं, जिनमें से लगभग 77 हजार महिलाओं की जान चली जाती है. यह कैंसर महिलाओं में कैंसर से होने वाली मौतों के प्रमुख कारणों में से एक बन चुका है. खासतौर पर इसका असर ग्रामीण इलाकों और गरीब परिवारों की महिलाओं पर ज्यादा देखा जा रहा है, जहां जागरूकता और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी है.&amp;nbsp;
सर्वाइकल कैंसर क्या है और क्यों होता है?
सर्वाइकल कैंसर मुख्य रूप से ह्यूमन पैपिलोमा वायरस (HPV) नामक वायरस के संक्रमण के कारण होता है. यह वायरस लंबे समय तक शरीर में रहने पर आर्ट्स की सर्विस के सेल्स को नुकसान पहुंचाता है, जिससे कैंसर विकसित हो सकता है. ज्यादातर मामलों में शुरुआती दौर में इसके लक्षण दिखाई नहीं देते, इसलिए महिलाएं समय पर डॉक्टर तक नहीं पहुंच पाती हैं.&amp;nbsp;
इसके लक्षण जिन पर ध्यान देना जरूरी
सर्वाइकल कैंसर के लक्षण में असामान्य योनि से इंटरनल ब्लीडिंग, पीरियड्स के बीच या संबंध के बाद खून आना, पेट या कमर में लगातार दर्द, खराब स्मैल डिस्चार्ज, थकान और कमजोरी शामिल हैं. अगर इनमें से कोई भी लक्षण लंबे समय तक बना रहे, तो तुरंत जांच कराना जरूरी है.&amp;nbsp;
इसका इलाज क्या है?
विशेषज्ञों का कहना है कि सर्वाइकल कैंसर को टीकाकरण और नियमित जांच से रोका जा सकता है. HPV टीकाकरण में 9 से 14 साल की लड़कियों को दो डोज, 15 साल से अधिक उम्र में तीन डोज. यह टीका HPV वायरस से बचाव करता है. भारत में विकसित स्वदेशी वैक्सीन सर्वाविक कुछ राज्यों में सरकार से मुफ्त या 200&amp;ndash;400 रुपये प्रति डोज की दर से उपलब्ध कराई जा रही है, जबकि निजी अस्पतालों में इसकी कीमत ज्यादा होती है. राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत अब तक 10 करोड़ से ज्यादा महिलाओं की जांच की जा चुकी है.&amp;nbsp;
अब पारंपरिक जांच की जगह HPV डीएनए टेस्ट को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंचाने पर जोर दिया जा रहा है, ताकि दूर-दराज की महिलाएं भी लाभ उठा सकें. स्क्रीनिंग के बाद इलाज तक महिला को पहुंचाना एक बड़ी चुनौती रही है. इसे दूर करने के लिए सरकार ने मानक संचालन प्रक्रिया (SOP), हब और स्पोक मॉडल, इलाज और फॉलोअप की मजबूत व्यवस्था लागू की है, ताकि जांच में पॉजिटिव पाई गई कोई भी महिला इलाज से वंचित न रह जाए.&amp;nbsp;
सामाजिक मुद्दा भी है यह बीमारी
विशेषज्ञों का मानना है कि सर्वाइकल कैंसर सिर्फ एक बीमारी नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का मुद्दा भी है. क्योंकि इसका सबसे ज्यादा असर उन महिलाओं पर पड़ता है, जो आर्थिक, सामाजिक या भौगोलिक कारणों से अस्पताल नहीं पहुंच पाती है.&amp;nbsp;
ये भी पढ़ें: बार-बार मुंह में हो रहे हैं छाले तो न करें नजरअंदाज, हो सकती है यह लाइलाज बीमारी
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 20 Jan 2026 17:30:11 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Mohan Lal Dwivedi Rewa: मेडिकल साइंस भी फेल? 50 साल से नहीं सोया यह रिटायर्ड अफसर, क्या ऐसा सच में पॉसिबल?</title>
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        <description><![CDATA[ Can A Human Survive Without Sleep For 50 Years: कुछ चीजें न सिर्फ इंसान को हैरान कर देती हैं, बल्कि साइंस भी इससे चकित हो जाता है. अगर आप भारत में हैं, तो आप इस तरह के दावों और सच्चाई से हर कुछ न कुछ दिन में रूबरू होते रहते होंगे. ऐसा ही मानव के साथ-साथ मेडिकल साइंस को चकित कर देने वाला दावा मध्य प्रदेश में किया गया है. एमपी के रीवा के रहने वाले 75 साल के रिटायर्ड ज्वाइंट कलेक्टर मोहन लाल द्विवेदी ने बताया कि उनको पिछले 50 सालों से नींद नहीं आई है. सबसे हैरानी की बात यह है कि जहां मेडिकल एक्सपर्ट और रिसर्च यह बताते रहते हैं कि इंसान के लिए नींद कितनी जरूरी है, और अगर प्रॉपर नींद न मिले तो तमाम तरह की बीमारियां और दिक्कतें होने लगती हैं, वहीं मोहन लाल बिना सोए एक सामान्य, सक्रिय और स्वस्थ जीवन जी रहे हैं. चलिए आपको बताते हैं कि आखिर कैसे यह संभव है.
मोहन लाल का क्या है दावा?
एबीपी न्यूज से बात करते हुए एमपी के रीवा जिले की चाणक्यपुरी कॉलोनी में रहने वाले मोहनलाल द्विवेदी का कहना है कि उनके साथ यह समस्या साल 1973 के आसपास शुरू हुई थी. तभी से उन्हें नींद नहीं आती. दूसरी तरफ मेडिकल साइंस में बड़े-बड़े और मोटे-मोटे शब्दों में लिखा जाता है कि &quot;Sleep is the Best Medicine&quot;. एक हेल्दी और फिट इंसान को रोजाना 6 से 8 घंटे की नींद जरूरी होती है. अगर वह लंबे समय तक नींद न ले, तो उसके शरीर में इसका असर दिखना शुरू हो जाता है. उनके दावे के अनुसार, उन्हें न तो नींद महसूस होती है और न ही चोट लगने पर सामान्य लोगों जैसी पीड़ा होती है. रातभर जागने के बावजूद उन्हें आंखों में जलन, थकान या काम करने की क्षमता में कोई कमी महसूस नहीं होती.
उन्होंने अपने करियर की शुरुआत 1973 में लेक्चरर के तौर पर की थी. 1974 में मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षा पास कर डिप्टी तहसीलदार बने और 2001 में संयुक्त कलेक्टर के पद से रिटायर हुए. मोहन लाल बताते हैं कि वे अपना ज्यादा समय किताबें पढ़ने में बिताते हैं और अक्सर रात में छत पर टहलते हुए नजर आते हैं. इसमें एक हैरानी वाली बात यह है कि उनकी पत्नी भी 3 से 4 घंटे की नींद लेती हैं.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
आजमगढ़ जिला चिकित्सालय के वरीय फिजिशियन डॉ. आरेश सिंह का साफ कहना है कि &quot;मेडिकल साइंस के हिसाब से यह संभव नहीं माना जाता कि कोई इंसान 50 साल तक बिल्कुल भी न सोया हो.&quot; वे बताते हैं कि इंसान का दिमाग बिना नींद के कुछ ही दिनों में गंभीर रूप से प्रभावित होने लगता है. इसके अलावा लंबे समय तक नींद न मिलने से याददाश्त, सोचने की क्षमता, हार्मोन, दिल और इम्युनिटी पर असर पड़ता है.
नींद न लेने से शरीर पर क्या असर पड़ता है?
ब्रेन पर असर

याददाश्त कमजोर होने लगती है
ध्यान लगाने और फैसले लेने में दिक्कत
चिड़चिड़ापन, तनाव, एंग्जायटी और डिप्रेशन का खतरा
लंबे समय में भ्रम और सोचने की क्षमता कम हो सकती है

हार्ट और ब्लड प्रेशर

हाई ब्लड प्रेशर का खतरा बढ़ता है
हार्ट अटैक और स्ट्रोक का जोखिम
हार्ट पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है

इम्युनिटी कमजोर

शरीर की रोगों से लड़ने की ताकत घटती है
बार-बार सर्दी, खांसी और इंफेक्शन
घाव भरने में ज्यादा समय लगता है

वजन और हार्मोन

भूख बढ़ाने वाले हार्मोन एक्टिव हो जाते हैं
मोटापा और डायबिटीज का खतरा
हार्मोनल बैलेंस बिगड़ सकता है

ये भी पढ़ें:&amp;nbsp;गर्दन चटकाने की आदत कहीं स्ट्रोक का खतरा तो नहीं, फिजिशियन ने बताया- कब बढ़ जाती है यह परेशानी?
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 20 Jan 2026 13:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
        <media:keywords>Mohan, Lal, Dwivedi, Rewa:, मेडिकल, साइंस, भी, फेल, साल, से, नहीं, सोया, यह, रिटायर्ड, अफसर, क्या, ऐसा, सच, में, पॉसिबल</media:keywords>
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        <title>Child Mobile Phone Effects: छोटे बच्चों को बात&amp;बात पर पकड़ा देते हैं मोबाइल, जानें आगे चलकर क्या होती हैं दिक्कतें?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/child-mobile-phone-effects-छोटे-बच्चों-को-बात-बात-पर-पकड़ा-देते-हैं-मोबाइल-जानें-आगे-चलकर-क्या-होती-हैं-दिक्कतें</link>
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        <pubDate>Mon, 19 Jan 2026 13:30:14 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>आपके पैरों में भी दिखने लगी हैं मकड़ी के जाले जैसी नसें, जानिए क्यों होती है ये समस्या?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/आपके-पैरों-में-भी-दिखने-लगी-हैं-मकड़ी-के-जाले-जैसी-नसें-जानिए-क्यों-होती-है-ये-समस्या</link>
        <guid>https://hindi.attentionindia.com/आपके-पैरों-में-भी-दिखने-लगी-हैं-मकड़ी-के-जाले-जैसी-नसें-जानिए-क्यों-होती-है-ये-समस्या</guid>
        <description><![CDATA[ क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि पैरों या टखनों की स्किन पर बारीक नीली, लाल या बैंगनी रंग की नसें जाल की तरह फैलती दिख रही हैं. कई लोग इन्हें मामूली स्किन प्रॉब्लम समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, तो कुछ इसे सिर्फ सुंदरता से जुड़ी समस्या मानते हैं. लेकिन सच्चाई यह है कि पैरों पर दिखने वाले ये मकड़ी जैसे जाले, जिन्हें मेडिकल भाषा में स्पाइडर वेन्स या वैरिकोज वेन्स कहा जाता है, शरीर के अंदर चल रही किसी गड़बड़ी का संकेत हो सकते हैं.
आज की तेज रफ्तार जिंदगी, घंटों कुर्सी पर बैठकर काम करना, फिजिकल एक्टिविटी की कमी, गलत खानपान और बढ़ता वजन ये सभी मिलकर शरीर को धीरे-धीरे कमजोर करते हैं. शरीर ऐसे ही संकेतों के जरिए हमें सावधान करता है. पैरों पर उभरने वाली ये नसें भी ऐसा ही एक इशारा हो सकती हैं. ऐसे में आइए जानते हैं कि आपके पैरों में भी मकड़ी के जाले जैसी नसें दिखने लगी ये समस्या क्यों होती है.&amp;nbsp;
क्या होती हैं स्पाइडर वेन्स?
स्पाइडर वेन्स स्किन की ऊपरी सतह के ठीक नीचे दिखाई देने वाली छोटी-छोटी फैली हुई नसें होती हैं. ये अक्सर लाल, नीली या बैंगनी रंग की होती हैं और देखने में मकड़ी के जाले जैसी लगती हैं. शुरुआत में इनमें दर्द नहीं होता, इसलिए लोग इन्हें गंभीरता से नहीं लेते. लेकिन समय के साथ यही समस्या आगे चलकर दर्द, सूजन और चलने-फिरने में परेशानी का कारण बन सकती है.&amp;nbsp;
डॉक्टरों के अनुसार, यह समस्या तब होती है जब पैरों की नसों के अंदर मौजूद वाल्व कमजोर हो जाते हैं. ये वाल्व खून को नीचे से ऊपर, यानी दिल की तरफ ले जाने का काम करते हैं. जब ये सही से काम नहीं करते, तो खून पैरों में जमा होने लगता है और नसें फैल कर जाल की तरह दिखने लगती हैं.&amp;nbsp;
ये समस्या क्यों होती है?
1. खराब ब्लड सर्कुलेशन - लंबे समय तक एक ही जगह बैठना या खड़े रहना.&amp;nbsp;&amp;nbsp;2. हार्मोनल बदलाव - प्रेगनेंसी, मेनोपॉज या यौवन के समय.&amp;nbsp;&amp;nbsp;3. जेनेटिक कारण - &amp;nbsp;अगर परिवार में पहले से किसी को यह समस्या रही हो.&amp;nbsp;&amp;nbsp;4. मोटापा - &amp;nbsp;बढ़ा हुआ वजन नसों पर अतिरिक्त दबाव डालता है.&amp;nbsp;&amp;nbsp;5. लिवर की समस्या - &amp;nbsp;कुछ मामलों में जिगर की गड़बड़ी से भी स्किन पर नसें उभरने लगती हैं.&amp;nbsp;&amp;nbsp;6. धूप में ज्यादा रहना - इससे स्किन के नीचे की नाज़ुक नसें कमजोर हो सकती हैं.&amp;nbsp;&amp;nbsp;विटामिन B12 की कमी से भी हो सकती है समस्या
कई मामलों में पैरों पर स्पाइडर वेन्स का दिखना विटामिन B12 की कमी से भी जुड़ा हो सकता है. यह विटामिन नसों को मजबूत रखने और ब्लड सर्कुलेशन को सही बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है. जब शरीर में B12 की कमी हो जाती है, तो नसों की कार्यक्षमता प्रभावित होती है, खून का प्रवाह सही नहीं हो पाता और इसका असर स्किन पर साफ दिखाई देने लगता है.&amp;nbsp;
कब बन जाती है यह समस्या गंभीर?
शुरुआत में स्पाइडर वेन्स सिर्फ देखने में खराब लगती हैं, लेकिन अगर इन्हें नजरअंदाज किया जाए तो यह वैरिकोज वेन्स का रूप ले सकती हैं. इस स्थिति में नसें ज्यादा फूल जाती हैं और दर्द भी होने लगता है. वैरिकोज वेन्स में पैरों में दर्द या जलन, ऐंठन और भारीपन, पैरों में सूजन या लालिमा, स्किन का रंग बदलना,त घाव का देर से भरना, लंबे समय तक खड़े रहने पर परेशानी होती है. कुछ डॉक्टरों का कहना है कि गंभीर मामलों में यह समस्या आगे चलकर खून के थक्के (ब्लड क्लॉट) बनने का कारण भी बन सकती है.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 18 Jan 2026 13:30:10 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>China Norovirus: कोरोना के बाद चीन में नई आफत, नोरोवायरस की चपेट में 103 बच्चे; जानें लक्षण और बचाव के तरीके</title>
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        <description><![CDATA[ Norovirus Outbreak In China School: कोरोना के बाद चीन में अब एक दूसरे वायरस ने दस्तक दी है. दक्षिण चीन के ग्वांगडोंग प्रांत के फोशान शहर स्थित एक सीनियर हाई स्कूल में 103 छात्र नॉरोवायरस से इंफेक्टेड पाए गए हैं. स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारियों ने शनिवार को बताया कि सभी छात्र सुरक्षित हैं और कोई भी मामला गंभीर या जानलेवा नहीं है. नॉरोवायरस एक वायरस है, जो अक्यूट गैस्ट्रोएंटेराइटिस का कारण बनता है. इसमें आमतौर पर उल्टी, दस्त, पेट दर्द और कमजोरी जैसे लक्षण दिखाई देते हैं. शिन्हुई मिडिल स्कूल के इन छात्रों में हाल ही में ऐसे ही लक्षण सामने आए थे, जिनकी शुरुआती जांच में नॉरोवायरस इंफेक्शन की पुष्टि हुई.
मेडिकल डिपार्टमेंट ने क्या कहा?
स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, सभी 103 छात्रों की हालत स्थिर है. एहतियात के तौर पर स्कूल परिसर को पूरी तरह डिसइन्फेक्ट कर दिया गया है. छात्रों की सेहत पर लगातार नजर रखी जा रही है और उनकी उपस्थिति की भी निगरानी की जा रही है. इसके अलावा, इंफेक्शन के सोर्स का पता लगाने के लिए महामारी साइंस सर्वे जारी है. ग्वांगडोंग प्रांत के डिजीज कंट्रोल अधिकारियों ने बताया कि यहां हर साल अक्टूबर से मार्च के बीच नॉरोवायरस के मामले बढ़ जाते हैं. यह वायरस खासतौर पर ठंड के मौसम में तेजी से फैलता है.
क्या है नॉरोवायरस?
नॉरोवायरस दुनिया भर में बहुत आम है वायरस माना जाता है. हर साल इसके करीब 68.5 करोड़ मामले सामने आते हैं, जिनमें लगभग 5 साल से कम उम्र के 20 करोड़ बच्चे शामिल होते हैं. दुनियाभर में यह वायरस हर साल लगभग 2 लाख लोगों की जान लेता है, जिनमें करीब 50 हजार बच्चे होते हैं. इसका सबसे ज्यादा असर कम आय वाले देशों में देखा जाता है. स्वास्थ्य सेवाओं और आर्थिक नुकसान को मिलाकर नॉरोवायरस से होने वाला वैश्विक खर्च लगभग 60 अरब डॉलर आंका गया है. नॉरोवायरस का पहला प्रकोप 1968 में अमेरिका के ओहायो राज्य के नॉरवॉक शहर में दर्ज किया गया था. इसी वजह से इसके शुरुआती स्ट्रेन को &amp;ldquo;नॉरवॉक वायरस&amp;rdquo; कहा गया.
कैसे फैलता है यह वायरस?
यह वायरस गैस्ट्रोएंटेराइटिस करता है, जिसे आम भाषा में कई लोग स्टमक फ्लू कह देते हैं. हालांकि, यह फ्लू से अलग है, क्योंकि इन्फ्लूएंजा वायरस सांस की बीमारी करता है, पेट की नहीं. नॉरोवायरस आमतौर पर गंदे भोजन या पानी के जरिए फैलता है. इंफेक्टेड व्यक्ति के हाथों से छुए गए खाने, अधपके शेलफिश या गंदे पानी से धुली सब्जियों और फलों से इसका खतरा बढ़ जाता है. यह वायरस दरवाजों के हैंडल, नल, काउंटर जैसी सतहों पर दो हफ्ते तक जीवित रह सकता है.
कैसे कर सकते हैं बचाव?
NYT की रिपोर्ट के अनुसार, इसके लिए कोई असरदार वैक्सीन नहीं है, तो बचाव ही इसके लिए सबसे बड़ा वैक्सीन है. बचाव के लिए सबसे जरूरी है साबुन और पानी से बार-बार हाथ धोनाय सिर्फ हैंड सैनिटाइजर इस वायरस पर असरदार नहीं होता. साथ ही, बाथरूम और बार-बार छुई जाने वाली जगहों को ब्लीच मिले पानी से साफ करना चाहिए। अगर कोई इंफेक्टेड हो जाए, तो उसे घर पर आराम करना चाहिए और खूब तरल पदार्थ लेना चाहिए, पानी, सूप और इलेक्ट्रोलाइट ड्रिंक फायदेमंद होते हैं.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 18 Jan 2026 13:30:09 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>One&amp;Sided Workout: एक ही मसल की एक्सरसाइज करना कितना खतरनाक, रीढ़ की हड्डी पर कितना पड़ता है असर?</title>
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        <description><![CDATA[ What Happens If You Train One Muscle Only: पिछले 300 से ज्यादा दिनों से एक शख्स, जो खुद को &quot;द क्रूक्ड मैन&quot; कहता है, ऐसा काम कर रहा है जिसे ज्यादातर फिटनेस ट्रेनर गलत मानेंगे. वह अपने शरीर के बाकी हिस्सों को लगभग नजरअंदाज करते हुए सिर्फ एक ट्रैपेज़ियस मसल की एक्सरसाइज कर रहा है. नतीजा बेहद चौंकाने वाला है, एक कंधा और ऊपरी पीठ की मसल असामान्य रूप से बड़ी हो गई है, जबकि दूसरी तरफ का हिस्सा लगभग वैसा ही है. उसका कहना है कि यही उसका मकसद था.
सोशल मीडिया पर टिप्स
यह शख्स सोशल मीडिया पर अपने इस एक्सपेरिमेंट को लगातार शेयर कर रहा है. वह इसे TikTok पर चल रहे &amp;ldquo;लुक्समैक्सिंग&amp;rdquo; ट्रेंड के खिलाफ प्रतिक्रिया बताता है, जहां लोग अपनी शक्ल-सूरत को परफेक्ट बनाने में लगे रहते हैं. उसकी सोच इसके उलट है, जिसे वह &amp;ldquo;लुक्स मिनिमाइजिंग&amp;rdquo; कहता है. एक वीडियो में अपनी सोच समझाते हुए द क्रूक्ड मैन ने कहा कि यह आइडिया उसे सोशल मीडिया स्क्रॉल करते वक्त आया. &quot;लोग पूछते हैं कि कोई एक ही ट्रैप क्यों ट्रेन करता है? बात सीधी है&quot; उसने कहा कि &quot;मैं अपनी फेरारी में TikTok स्क्रॉल कर रहा था और बार-बार लुक्समैक्सिंग वाले वीडियो आ रहे थे. वे कह रहे थे कि ये करो, वो करो, ज्यादा अट्रैक्टिव बन जाओ, ज्यादा महिलाएं मिलेंगी. और मैं सोच रहा था कि लोगों को ये समस्या होती है? मुझे तो उलटी समस्या है.&quot;
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लुक्स मिनिमाइज&amp;nbsp;
उसका समाधान था जानबूझकर शरीर को असंतुलित बनाना. उसने कहा, &quot;लुक्स मिनिमाइज करने का सबसे अच्छा तरीका क्या है? खुद को ज्यादा असिमेट्रिकल बनाना. एक ही ट्रैप की एक्सरसाइज करो और सच कहूं तो यह कमाल का काम कर गया.&quot; तब से वह रोजाना सिर्फ एक तरफ की ट्रैपेजियस मसल को ट्रेन कर रहा है. लगभग एक साल बाद फर्क साफ दिखता है. एक कंधा साफ तौर पर ऊंचा और मोटा नजर आता है, जबकि दूसरा अपेक्षाकृत कमजोर है. एक्सपेरिमेंट से पहले की तस्वीरों में उसका शरीर संतुलित दिखता है, लेकिन अब उसका ऊपरी शरीर फिट होने के बावजूद बाईं तरफ कहीं ज्यादा उभरा हुआ नजर आता है. यह दिखाता है कि लगातार टार्गेटेड ट्रेनिंग से मसल्स कितनी तेजी से बदल सकती हैं.
क्या लेता है डाइट में?
उसने अपनी डेली डाइट भी शेयर की है, जिसमें प्रोटीन की मात्रा काफी ज्यादा है. वह सार्डिन मछली, बकरी का दही, प्रोटीन पाउडर, ग्राउंड बीफ और अंडे खाता है, ताकि जिस मसल को वह ट्रेन कर रहा है, उसकी ग्रोथ तेजी से हो सके.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
हालांकि, डॉक्टर इस तरह की ट्रेनिंग को लेकर गंभीर चेतावनी दे रहे हैं. पहले LADbible से बात करते हुए डॉक्टर सुहैल हुसैन ने कहा कि जो थोड़े-बहुत फायदे दिख रहे हैं, वे लंबे समय के नुकसान के आगे कुछ भी नहीं हैं. उनके मुताबिक &quot;शॉर्ट टर्म में कुछ पॉजिटिव असर हो सकता है, लेकिन इस शख्स के शरीर में साफ तौर पर मस्कुलोस्केलेटल असंतुलन पैदा हो रहा है&quot; डॉ. हुसैन ने चेताया कि एकतरफा एक्सरसाइज से रीढ़ की हड्डी का असंतुलन, जोड़ों पर दबाव, आसपास की मसल्स में चोट और लंबे समय तक रहने वाला दर्द हो सकता है. उन्होंने कहा, &amp;ldquo;शरीर संतुलन और समानता के लिए बना है. इसे इस तरह बिगाड़ना लंबे समय में गंभीर ऑर्थोपेडिक समस्याएं पैदा कर सकता है.&quot;&amp;nbsp;कोई असली फायदा नहीं
हालांकि उन्होंने माना कि एक मसल को ज्यादा ट्रेन करने से उसमें ताकत बढ़ सकती है, लेकिन उनका कहना था कि इसका कोई असली फायदा नहीं है. &quot;ट्रैपेज़ियस मसल का काम सपोर्ट और स्टेबिलिटी देना होता है, न कि अकेले ताकत दिखाना. सिर्फ साइज बढ़ाने का कोई फंक्शनल फायदा नहीं है.&quot;&amp;nbsp;
इसे भी पढ़ें:&amp;nbsp;Lung Cancer Symptoms: बच्चे तो नहीं करते स्मोकिंग फिर उन्हें क्यों हो जाता है लंग कैंसर, क्या हैं इसके कारण?
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 18 Jan 2026 13:30:08 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Processed Food vs Ultra&amp;Processed Food: प्रोसेस्ड और अल्ट्रा&amp;प्रोसेस्ड फूड में कितना फर्क, कौन&amp;सा आपकी सेहत के लिए ज्यादा खतरनाक?</title>
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        <description><![CDATA[ Is Ultra-Processed Food Bad for Health: अक्सर लोग प्रोसेस्ड और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड को एक ही मान लेते हैं, लेकिन सेहत के लिहाज से दोनों में बड़ा अंतर है. सच यह है कि कुछ प्रोसेस्ड फूड नुकसानदेह नहीं होते, जबकि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का ज्यादा सेवन गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ा सकता है. चलिए आपको बताते हैं कि दोनों में क्या अंतर होता है और आप इसको कैसे पता कर सकत हैं.&amp;nbsp;
प्रोसेस्ड फूड क्या होता है?
यूएस डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर के मुताबिक, किसी प्राकृतिक खाने वाली चीजों में थोड़ा-बहुत बदलाव, जैसे कि पकाना, फ्रीज करना, काटना या जूस निकालना,उसे प्रोसेस्ड बना देता है. इस कैटेगरी में कई हेल्दी चीजें भी आती हैं, जैसे कटे हुए बेबी कैरट, फ्रोजन सब्ज़ियां या फ्लोरेट्स में कटी ब्रोकली. यानी हर प्रोसेस्ड फूड खराब नहीं होता.
अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड क्या है?
अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड एक कदम आगे होता है. इसमें ऐसे प्रोडक्ट शामिल हैं जो ज्यादातर फूड से निकले तत्वों या रसायनों से बनाए जाते हैं और जिनमें असली, साबुत भोजन बहुत कम या न के बराबर होता है. उदाहरण के तौर पर पैकेट वाले चिप्स, सॉफ्ट ड्रिंक्स, कैंडी, इंस्टेंट नूडल्स, रेडी-टू-ईट राइस या पास्ता. इन्हें बस गरम करना या पानी डालना होता है काम लगभग खत्म.
ये क्यों हो सकते हैं खतरनाक?
अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड सस्ते, स्वादिष्ट और सुविधाजनक ज़रूर होते हैं, लेकिन इनमें अक्सर-

रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट
ज्यादा नमक
सैचुरेटेड फैट
&amp;nbsp;बहुत ज्यादा कैलोरी

ऐसी चीजें जल्दी पेट नहीं भरतीं, जिससे इंसान जरूरत से ज्यादा खा लेता है, जो बाद में सेहत को नुकसान करती है.&amp;nbsp;
फूड एंड ड्रग्स एडमिनिस्ट्रेशन के मुताबिक फूड में इस्तेमाल होने वाले एडिटिव्स सुरक्षित माने जाते हैं, लेकिन कई एक्सपर्ट का कहना है कि इनके लंबे समय के असर अभी पूरी तरह समझे नहीं गए हैं. ज्यादा प्रोसेसिंग से फाइबर भी निकल जाता है, जिससे पाचन और आंतों के अच्छे बैक्टीरिया पर असर पड़ सकता है।
रिसर्च में क्या निकला
रिसर्च बताते हैं कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर, कैंसर और समय से पहले मौत के खतरे से जुड़े हो सकते हैं. एक अध्ययन में यह भी पाया गया कि जो लोग अल्ट्रा-प्रोसेस्ड डाइट लेते हैं, वे ज्यादा खाते हैं और तेजी से वजन बढ़ाते हैं.
क्या हर अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड बुरा है?
अमेरिकन हार्ट एसोसिएसन से जुड़े एक्सपर्ट मानते हैं कि आज के दौर में प्रोसेस्ड और कुछ हद तक अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड से पूरी तरह बचना मुश्किल है. समस्या यह है कि ज्यादातर ऐसे प्रोडक्ट सेहत को ध्यान में रखकर नहीं, बल्कि स्वाद, कीमत और शेल्फ-लाइफ को प्राथमिकता देकर बनाए जाते हैं.एक्सपर्ट का कहना है कि जरूरत इस बात की है कि कंपनियां ज्यादा हेल्दी प्रोसेस्ड फूड बनाएं, और लोग समझदारी से चुनाव करें. एक बात का ध्यान रखना चाहिए कि पूरी तरह प्रोसेस्ड या अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड छोड़ना हर किसी के लिए आसान नहीं है, लेकिन जानकारी और समझदारी से चुनाव करके नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 16 Jan 2026 21:30:11 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Delhi Death Rate: दिल्ली में प्रदूषण छीन रहा सांसें, तीन साल में हुईं मौतों का आंकड़ा देख बैठ जाएगा आपका दिल!</title>
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        <description><![CDATA[ दिल्ली की हवा में घुलते जहर का असर अब आंकड़ों में साफ-साफ नजर आने लगा है. साल-दर-साल सांस की बीमारियों से मरने वालों की तादाद बढ़ती जा रही है. &amp;nbsp;ये कोई अफवाह नहीं, बल्कि दिल्ली सरकार के आधिकारिक दस्तावेज से निकला कड़वा सच है. अर्थ एवं सांख्यिकी निदेशालय की दिल्ली सांख्यिकीय हैंडबुक 2025 में दर्ज वाइटल स्टैटिस्टिक्स के चैप्टर IV में यह डेटा बिल्कुल साफ दिया है कि मेडिकली सर्टिफाइड मौत के ब्रेकडाउन में रेस्पिरेटरी डिजीजेज को अलग कैटेगरी में रखा गया है और पिछले चार साल का ट्रेंड देखकर किसी का भी दिल सहम सकता है.
जानें कब कितनी हुईं मौतें?
2024 में सांस की बीमारियों जैसे अस्थमा, ब्रॉन्काइटिस, निमोनिया या फेफड़ों से जुड़ी अन्य समस्याएं से 9,211 मौतें दर्ज हुईं. ये 2023 के 8,801 से करीब 4.7% ज्यादा है, और 2022 के 7,432 से तो 24% ऊपर है. वहीं, सबसे चौंकाने वाला फिगर 2021 का है, उस साल कोविड-19 की दूसरी लहर ने देश में कोहराम मचा दिया था और रेस्पिरेटरी डेथ्स 14,442 तक पहुंच गई थीं. हालांकि, महामारी के बाद थोड़ी राहत जरूर मिली, लेकिन अब यह आंकड़ा दोबारा बढ़ रहा है, जो साफ बताता है कि दिल्ली की एयर क्वालिटी और हेल्थ सिस्टम में अब भी बड़ी कमियां हैं.
क्या बता रहा सरकारी आंकड़ा?
office of the Chief Registrar (Births &amp;amp; Deaths) की ओर से जारी डेटा MCD, NDMC और अन्य बॉडीज से कलेक्ट किए गए रजिस्ट्रेशन पर आधारित है. कुल मेडिकली सर्टिफाइड डेथ्स में रेस्पिरेटरी का शेयर देखें तो 2024 में ये कुल 90,883 certified deaths का करीब 10% है, जबकि 2021 में ये 14.6% था. हालांकि, कुल मौतों (certified + non-certified) की बात करें तो 2024 में दिल्ली में कुल 1,39,480 मौतें दर्ज हुईं, जिनमें से 85,391 पुरुष, 54,051 महिलाएं और 38 अन्य थे.
इस वजह से होती हैं सबसे ज्यादा मौतें
अब जरा दूसरे कारणों से तुलना करें तो तस्वीर और साफ हो जाती है. सर्कुलेटरी डिजीज (जैसे हार्ट अटैक, स्ट्रोक) अब भी सबसे बड़ी किलर हैं. 2024 में 21,262 मौतें सर्कुलेटरी डिजीज से हुईं, जो 2023 के 15714 से 35 पर्सेंट ज्यादा थीं. वहीं इंफेक्शन और पैरासाइटिक डिजीज में गिरावट आई है. 2024 में 16,060 मौतों की वजह यही बीमारियां थीं, जबकि 2023 में 20,781 लोगों ने इन बीमारियों के कारण जान गंवाई थी. कैंसर जैसी neoplasms बीमारियों की वजह से 5,960 लोगों की मौत हुई तो डाइजेस्टिव डिजीज के कारण 5,200 और अन्य कारणों से 33,190 लोगों की मौत हुई. कुल मिलाकर, सर्टिफाइड डेथ्स 2024 में 90,883 पहुंच गईं, जो 2023 के 88,628 से ज्यादा हैं. यह ट्रेंड बताता है कि जहां इंफेक्शंस डिजीज पर काबू पाया जा रहा है. वहीं, रेस्पिरेटरी और सर्कुलेटरी प्रॉब्लम्स बढ़ रहे हैं और इसके पीछे पॉल्यूशन, लाइफस्टाइल और एजिंग पॉपुलेशन जैसे फैक्टर भी हो सकते हैं.
दिल्ली में कैसे हैं हालात?
दिल्ली में हर साल नवंबर-दिसंबर के दौरान AQI 400-500 पार कर जाता है और PM2.5 जैसे पार्टिकल्स फेफड़ों को चीरते हैं. हेल्थ एक्सपर्ट्स काफी समय से इस बारे में चेता रहे हैं कि दिल्ली में क्रॉनिक रेस्पिरेटरी समस्या बढ़ रही हैं, खासकर बच्चों और बुजुर्गों में. रेस्पिरेटरी मौत पर ये आंकड़े पॉलिसी मेकर्स के लिए wake-up call हैं. एक्सपर्ट्स के अनुसार, सरकार को चाहिए कि प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड को और मजबूत करें, ग्रीन कॉरिडोर्स बढ़ाए और अस्पताल में रेस्पिरेटरी यूनिट्स को भी अपग्रेड करें. वरना, ये संख्या और ऊपर चढ़ती रहेगी और दिल्लीवासियों की सांसें और छोटी होती जाएंगी.
यह भी पढ़ें:&amp;nbsp;धूप न मिलने का सीधा असर हड्डियों पर, दिखें ये लक्षण तो रहें सावधान
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 16 Jan 2026 21:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>गर्म या ठंडा पानी, जानें सर्दियों में कैसे पानी से धोना चाहिए चेहरा?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/गर्म-या-ठंडा-पानी-जानें-सर्दियों-में-कैसे-पानी-से-धोना-चाहिए-चेहरा</link>
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        <description><![CDATA[ सर्दियों में लोगों के मन में अक्सर यह सवाल जरूर होता है कि अपने चेहरे को गर्म पानी से धोएं या फिर ठंडे पानी से. दरअसल, सुबह का वक्त हमारी स्किन के लिए बेहद अहम होता है. नींद के दौरान स्किन खुद को रिचार्ज करती है और दिन की शुरुआत सही तरीके से करने से स्किन काफी समय तक हेल्दी और चमकदार बनी रहती है. आयुर्वेद और विज्ञान दोनों मानते हैं कि पानी का तापमान हमारी स्किन के पोर्स, तेल और नमी पर सीधा असर डालता है, इसलिए सर्दियों में चेहरे को धोने का सही तरीका जानना बेहद जरूरी है.
गर्म पानी अच्छा या खराब?
सबसे पहले बात करते हैं गर्म पानी की. शुरुआत में यह ताजगी और आराम देने वाला लगता है, लेकिन अगर बहुत गर्म पानी का इस्तेमाल चेहरा धोने के लिए करते हैं तो यह स्किन के लिए नुकसानदायक हो सकता है. आयुर्वेद में बताया गया है कि बहुत गर्म पानी स्किन की नैचुरल ऑयली लेयर को हटा देता है, जिससे स्किन रूखी और लाल होने लगती है. विज्ञान के अनुसार, गर्म पानी स्किन के ऊपर मौजूद नेचुरल बैरियर सेबम को खत्म कर देता है, जो स्किन को नमी और इंफेक्शन से बचाता है. लगातार गर्म पानी का इस्तेमाल करने से चेहरे पर खुजली, रूखापन और कभी-कभी मुंहासे जैसी समस्याएं भी बढ़ सकती हैं. ऐसे में मौसम ठंडा हो या गर्म, ज्यादा गर्म पानी से चेहरे को धोना ठीक नहीं है.
ठंडा पानी फायदेमंद या नुकसानदायक?
अब बात करें ठंडे पानी की तो ठंडा पानी चेहरे को तरोताजा महसूस कराता है. आयुर्वेद के अनुसार, ठंडा पानी वात दोष को संतुलित करता है और स्किन में ब्लड सर्कुलेशन को बढ़ाकर ताजगी देता है. यह सूजन और लालिमा को कम करने में मदद करता है और चेहरे की पोर्स को अस्थायी रूप से सिकोड़ देता है. हालांकि, साइंस कहता है कि सिर्फ ठंडे पानी से स्किन की गहराई से सफाई पूरी तरह नहीं होती, क्योंकि ठंडा पानी ऑयल और गंदगी को पूरी तरह हटाने में कम असरदार होता है. लगातार ठंडे पानी का इस्तेमाल करने से स्किन रूखी हो सकती है. ऐसे में मुख्य सफाई के लिए ठंडा पानी इस्तेमाल करने से बचना चाहिए.
सर्दियों में क्या ऑप्शन ज्यादा बेस्ट?
सर्दियों में चेहरा धोने के लिए गुनगुने पानी का इस्तेमाल सबसे अच्छा तरीका है. आयुर्वेद इसे संतुलित और सौम्य पानी मानता है, जो स्किन को नुकसान पहुंचाए बिना सफाई करता है. गुनगुना पानी चेहरे की गंदगी, तेल और पसीने को धीरे-धीरे हटा देता है और स्किन के नेचुरल ऑयल को बरकरार रखता है. विज्ञान के अनुसार, गुनगुना पानी पोर्स को खोलकर गंदगी और डेड स्किन को बाहर निकालता है, जिससे स्किन नरम, ताजा और चमकदार बनती है. साथ ही, यह स्किन को ड्राई या इरिटेट होने से बचाता है.
यह ऑप्शन भी बेहद कारगर
स्किन को साफ करने का एक और तरीका है बर्फ या आइस वॉटर का. यह स्किन को तुरंत ताजगी देने वाला लगता है और खून की धमनियों को सिकोड़कर सूजन और लालिमा कम करता है. आयुर्वेद के हिसाब से यह वात को शांत करता है और चेहरे को ठंडक पहुंचाता है. हालांकि, लंबे समय तक आइस वॉटर का इस्तेमाल करने से त्वचा की नमी कम हो सकती है और यह रूखी बन सकती है. ऐसे में बर्फ के पानी का इस्तेमाल हमेशा सावधानी के साथ करना चाहिए. वहीं, चेहरा धोने के बाद मॉइस्चराइजर लगाना चाहिए.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 16 Jan 2026 17:30:14 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Two Vaginas Condition: क्या किसी के जन्म से हो सकते हैं दो यूट्रस और दो प्राइवेट पार्ट, लखनऊ में सामने आया अनोखा मामला?</title>
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        <description><![CDATA[ Congenital Reproductive System Disorder: लखनऊ में सामने आए एक बेहद रेयर मेडिकल केस ने सभी को हैरान कर दिया है. डॉक्टरों ने एक ऐसी युवती का सफल इलाज किया है, जो जन्म से ही दो यूट्रस और दो वेजाइना &amp;nbsp;के साथ पैदा हुई थी. यह जन्मजात समस्या बचपन से ही उसकी जिंदगी को मुश्किल बना रही थी. बलिया जिले की रहने वाली इस युवती को बचपन से यूरिन पर कोई नियंत्रण नहीं था. वह सालों तक डायपर पर निर्भर रही। उम्र बढ़ने के साथ स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ. इसके साथ ही उसे शौच से जुड़ी गंभीर दिक्कतों का भी सामना करना पड़ता था, जिससे उसका रोजमर्रा का जीवन और सामाजिक जीवन दोनों प्रभावित हो रहे थे.
कई अस्पतालों में इलाज, लेकिन समाधान नहीं
परिवार ने वर्षों तक स्थानीय अस्पतालों में इलाज कराया, लेकिन कहीं से स्थायी राहत नहीं मिली. आखिरकार, उसे लखनऊ के डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान लाया गया, जहां डॉक्टरों ने विस्तार से जांच शुरू की. मेडिकल जांच में सामने आया कि युवती के शरीर में तीन गंभीर जन्मजात दिक्कतें थीं. डॉक्टरों ने पाया कि उसके दो पूरी तरह विकसित यूट्रस और दो वेजाइना थीं. इसके अलावा, यूरिन की नलियां गलत जगह खुल रही थीं, जिससे लगातार यूरिन रिसता रहता था. वहीं, एनल ओपनिंग भी असामान्य रूप से विकसित थी और वेजाइना के बहुत पास स्थित थी.
डॉक्टरों की टीम ने बनाई तीन चरणों की सर्जरी योजना
यूरोलॉजी एक्सपर्ट प्रोफेसर ईश्वर राम धायल की अगुवाई में डॉक्टरों की टीम ने केस संभाला. स्थिति की जटिलता को देखते हुए तीन चरणों में सर्जरी करने का फैसला लिया गया. पहले चरण में शौच मार्ग को सही किया गया, ताकि मल त्याग की समस्या दूर हो सके. इसके बाद दो अलग-अलग सर्जरी के जरिए यूरिन की नलियों की गलत पोजीशन को ठीक किया गया. ये सर्जरी बेहद चुनौतीपूर्ण थीं, लेकिन डॉक्टरों की सावधानी और अनुभव से सभी चरण सफल रहे.
क्या पहले भी ऐसे मामले आ चुके हैं?
डॉक्टरों के मुताबिक, अब युवती को पेशाब पर नियंत्रण मिल गया है और शौच से जुड़ी समस्याएं भी काफी हद तक ठीक हो चुकी हैं. यह प्रदेश का पहला मामला था. Mayo Clinic और अन्य मेडिकल रिपोर्ट्स के अनुसार, यह काफी रेयर होता है और यह स्थिति जन्म से ही होती है,कई महिलाएं इसके साथ सामान्य जीवन भी जीती हैं. साल 2022 में स्टेफनी हैक्सटन नाम की महिला का मामला सामने आया था, जो स्टेफनी अलास्का की रहने वाली हैं.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ें:&amp;nbsp;धूप न मिलने का सीधा असर हड्डियों पर, दिखें ये लक्षण तो रहें सावधान
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 16 Jan 2026 17:30:12 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>क्या आप भी यूटीआई से बार&amp;बार रहती हैं परेशान? आयुर्वेद के ये तरीके तुरंत देते हैं राहत</title>
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        <description><![CDATA[ महिलाओं में बार-बार होने वाला यूटीआई (Urinary Tract Infection) कोई आम समस्या नहीं है. चिकित्सा जगत में इसे एक &#039;साइलेंट एपिडेमिक&#039; भी कहा जाता है. आंकड़ों के मुताबिक, हर दो में से एक महिला अपने जीवनकाल में कम से कम एक बार इस इंफेक्शन का शिकार होती है और लगभग 25 प्रतिशत महिलाओं को यह इंफेक्शन बार-बार भी होता है. आइए आपको इससे बचने आयुर्वेदिक तरीके बताते हैं.
क्यों होता है यूटीआई?
महिलाओं में यूटीआई होने की वजह सिर्फ बैक्टीरिया नहीं हैं, बल्कि महिलाओं के शरीर की बनावट और लाइफस्टाइल भी इसमें अहम भूमिका निभाती है. महिलाओं में मूत्रमार्ग पुरुषों की तुलना में छोटा होता है, इसलिए बैक्टीरिया को पेशाब की थैली (ब्लैडर) तक पहुंचने में ज्यादा दूरी तय नहीं करनी पड़ती.
यह वजह भी जिम्मेदार
इसके अलावा मूत्रमार्ग का गुदा के पास होना भी इंफेक्शन को आसान बना देता है. मेनोपॉज के दौरान एस्ट्रोजन हार्मोन कम होने से वजाइना के सुरक्षात्मक बैक्टीरिया खत्म हो जाते हैं, जिससे इंफेक्शन का खतरा और बढ़ जाता है. साथ ही, पानी कम पीना, पेशाब देर तक रोकना, सार्वजनिक टॉयलेट का इस्तेमाल और माहवारी के दौरान स्वच्छता का ध्यान न रखना भी इस समस्या को आम बनाते हैं.
आयुर्वेद में क्या है यूटीआई का मतलब?
आयुर्वेद में यूटीआई को केवल बैक्टीरिया का हमला नहीं माना जाता, बल्कि इसे मूत्रकृच्छ्र या मूत्राघात कहा गया है और इसे शरीर के पित्त दोष के असंतुलन से जोड़ा गया है. ज्यादा गर्म, तीखा, नमकीन या खट्टा भोजन और अपच या अजीर्ण की स्थिति पित्त को बढ़ा देती है, जिससे मूत्राशय में जलन, बार-बार पेशाब, पेट या कमर में दर्द जैसी समस्याएं शुरू हो जाती हैं.
आयुर्वेद में बताया गया यह इलाज
आयुर्वेद में इसका स्थायी और सुरक्षित समाधान बताया गया है. चंद्रप्रभा वटी मूत्राशय की मांसपेशियों को मजबूत करती है और जलन को कम करती है. गोक्षुरादि गुग्गुल पेशाब की मात्रा बढ़ाकर बैक्टीरिया को बाहर निकालता है. नीरी तुरंत राहत देती है और इंफेक्शन को किडनी तक पहुंचने से रोकती है.&amp;nbsp;इसके अलावा चन्दनासय शरीर की गर्मी शांत करता है और पेशाब में जलन को जड़ से खत्म करता है. जड़ी-बूटियां जैसे पुनर्नवा, वरुण और गिलोय भी शरीर की सुरक्षा बढ़ाती हैं.&amp;nbsp;साथ ही, आयुर्वेद में तुरंत राहत के लिए सुबह धनिया और मिश्री का पानी पीने की सलाह दी जाती है. पर्याप्त पानी पीना, स्वच्छता का ध्यान रखना और तीखे या भारी भोजन से परहेज करना भी यूटीआई से बचाव में मदद करता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 16 Jan 2026 13:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>किस उम्र तक एग फ्रीजिंग करवा सकती हैं महिलाएं, इसमें कितना खर्चा आता है?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/किस-उम्र-तक-एग-फ्रीजिंग-करवा-सकती-हैं-महिलाएं-इसमें-कितना-खर्चा-आता-है</link>
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        <description><![CDATA[ आजकल की लाइफस्टाइल में महिलाएं अपने करियर, पढ़ाई या पर्सनल कारणों से मां बनने का समय थोड़ा आगे बढ़ाना चाहती हैं. इसी वजह से एग फ्रीजिंग (Egg Freezing) का चलन तेजी से बढ़ रहा है. यह एक ऐसा ऑप्शन है जो आपको अपने भविष्य की फर्टिलिटी सुरक्षित रखने में मदद करता ह यानी, अगर आप अभी बच्चे की प्लानिंग नहीं करना चाहती हैं, तो भी बाद में आप अपनी खुशियों की राह आसान बना सकती हैं. तो ऐसे में आइए जानते हैं कि एग फ्रीजिंग करवाने की सही उम्र क्या है, कितना खर्चा आएगा और इसके फायदे क्या हैं.&amp;nbsp;
एग फ्रीजिंग क्यों जरूरी हो सकती है?
एग फ्रीजिंग का मुख्य उद्देश्य &amp;nbsp;भविष्य में बच्चे की प्लानिंग को आसान बनाना है. अगर आप अपनी पढ़ाई पूरी करना चाहती हैं या करियर में आगे बढ़ना चाहती हैं, तो अंडे फ्रीज करवा लेना फायदेमंद होता है. कुछ बीमारियों या ट्रीटमेंट, जैसे कैंसर के इलाज से पहले, महिलाएं अपने अंडों को सुरक्षित करवा सकती हैं. अगर आपको भविष्य में IVF (In-Vitro Fertilization) करना पड़े, तो फ्रीज किए हुए अंडे मददगार होते हैं. &amp;nbsp;एग फ्रीजिंग आपको अपने फर्टिलिटी विकल्पों की सुरक्षा देती है.&amp;nbsp;
एग फ्रीजिंग के लिए सबसे अच्छा समय कौन सा है?
आम तौर पर 25 से 35 साल की उम्र को एग फ्रीजिंग के लिए बेस्ट माना जाता है. इस उम्र में अंडों की संख्या और क्वालिटी सबसे अच्छी होती है. जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, अंडों की संख्या और उनकी क्वालिटी कम होने लगती है. &amp;nbsp;30-35 की उम्र में फ्रीज किए अंडों से मां बनने के चांस ज्यादा होते हैं. 35 की उम्र के बाद अंडों में जेनेटिक प्रॉब्लम्स होने का खतरा बढ़ जाता है. इसलिए जितनी जल्दी संभव हो, अंडे फ्रीज करवा लेना बेहतर रहता है.&amp;nbsp;
किस उम्र तक एग फ्रीजिंग करवा सकती हैं महिलाएं
आमतौर पर 38 साल से पहले एग फ्रीज करना सबसे सही माना जाता है. 40 साल के बाद भी एग फ्रीज करना संभव है, लेकिन इसमें कुछ मुश्किलें हैं. जैसे सक्सेस रेट कम हो जाता है. कई साइकल्स की जरूरत पड़ सकती है, जिससे खर्चा बढ़ता है. प्रेग्नेंसी से जुड़े हेल्थ रिस्क बढ़ जाते हैं. इसलिए 40 के बाद फ्रीज करवाने से पहले डॉक्टर से अच्छे से सलाह लेना जरूरी है.&amp;nbsp;
एग फ्रीजिंग का प्रोसेस
एग फ्रीजिंग का प्रोसेस लगभग 10-14 दिनों में पूरा होता है और इसमें मुख्य रूप से चार स्टेप्स होते हैं. जिसमें सबसे पहले &amp;nbsp;कंसल्टेशन, फर्टिलिटी एक्सपर्ट से मिलकर आपकी हेल्थ और विकल्पों पर चर्चा होती है. इसके बाद ओवेरियन स्टिमुलेशन यानी हार्मोन इंजेक्शन देकर अंडों की संख्या बढ़ाई जाती है. अब एग रिट्रीवल, एक छोटा ऑपरेशन करके अंडों को निकाला जाता है. &amp;nbsp;लास्ट में फ्रीजिंग अंडों को बहुत तेजी से फ्रीज किया जाता है ताकि उनकी क्वालिटी सुरक्षित रहे.&amp;nbsp;
एग फ्रीजिंग का खर्चा
एग फ्रीजिंग का खर्चा कई फैक्टर्स पर निर्भर करता है, जैसे कि क्लिनिक, स्थान और कितने साइकल्स की जरूरत है. आम तौर पर भारत में यह खर्चा लगभग 1.5 लाख से 3 लाख प्रति साइकल होता है. 1 साइकल में आमतौर पर 8-15 अंडे फ्रीज किए जा सकते हैं. उम्र जितनी ज्यादा होगी, उतनी ज्यादा साइकल्स की जरूरत पड़ सकती है, जिससे खर्चा बढ़ जाता है.इसमें डॉक्टर की फीस, लैब टेस्ट, दवाइयां और हॉस्पिटल खर्च शामिल होते हैं.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Fri, 16 Jan 2026 09:30:07 +0530</pubDate>
        <dc:creator>Attention Desk</dc:creator>
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        <title>Leg Fracture Treatment: फ्रैक्चर के बाद टूटे हुए पैर में क्यों लटकाते हैं ईंट? 99% लोग नहीं जानते सही जवाब</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/leg-fracture-treatment-फ्रैक्चर-के-बाद-टूटे-हुए-पैर-में-क्यों-लटकाते-हैं-ईंट-99-लोग-नहीं-जानते-सही-जवाब</link>
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        <description><![CDATA[ Why Doctors Hang Weights After Fracture: स्केलेटल ट्रैक्शन टूटी हुई हड्डियों के इलाज की एक खास तकनीक है. इसमें पिन, पुली और वज़न की मदद से टूटी हड्डियों को सही स्थिति में लाया जाता है, ताकि वे ठीक से जुड़ सकें. आमतौर पर इस पद्धति का इस्तेमाल शरीर के निचले हिस्से, जैसे पैर या कूल्हे की हड्डियों के फ्रैक्चर में किया जाता है. चलिए आपको बताते हैं कि आखिर ऐसा क्यों किया जाता है और इसका इस्तेमाल कब से होता आ रहा है, जिसके बारे में 99 प्रतिशत लोगों को नहीं पता है.&amp;nbsp;
क्या होता है इस प्रक्रिया में?
इस प्रक्रिया में डॉक्टर हड्डी के अंदर एक पिन डालते हैं. यही पिन पुली सिस्टम का आधार बनता है, जिस पर वज़न लगाया जाता है. धीरे-धीरे खिंचाव देकर टूटी हुई हड्डियों को सीधा किया जाता है, जिससे वे अपनी सही जगह पर आ सकें और भरने की प्रक्रिया बेहतर हो. ट्रैक्शन के दो आम प्रकार होते हैं स्किन ट्रैक्शन और स्केलेटल ट्रैक्शन. स्किन ट्रैक्शन में त्वचा पर पट्टी या स्प्लिंट लगाकर खिंचाव दिया जाता है, जबकि स्केलेटल ट्रैक्शन में पिन सीधे हड्डी में डाला जाता है. दोनों में फर्क इस बात का होता है कि खिंचाव का आधार कहां बनाया गया है.
स्केलेटल ट्रैक्शन का इस्तेमाल सदियों से होता आ रहा है, लेकिन आज के समय में इसे ज़्यादातर इमरजेंसी ट्रॉमा केस में अस्थायी इलाज के तौर पर अपनाया जाता है. इसका मकसद सर्जरी से पहले हड्डियों को स्थिर करना होता है. कई बार मरीज की हालत ऐसी होती है कि तुरंत ऑपरेशन संभव नहीं होता, ऐसे में ट्रैक्शन समय देने का काम करता है.यह तकनीक आमतौर पर फीमर, टिबिया, ह्यूमरस, हिप, पेल्विस और कभी-कभी गर्दन की रीढ़ के फ्रैक्चर में इस्तेमाल की जाती है. कुछ मामलों में उंगली के जोड़ के पास की हड्डी में भी इसका प्रयोग किया जाता है.
डॉक्टर रखते हैं निगरानी&amp;nbsp;
webmd की रिपोर्ट के अनुसार, इलाज के दौरान ऑर्थोपेडिक सर्जन स्थानीय एनेस्थीसिया देकर हड्डी में पिन डालते हैं. इसके बाद पुली से जुड़ा वज़न लगाया जाता है, जो हड्डी को धीरे-धीरे सही स्थिति में लाता है. अस्पताल में रहते हुए नर्स और डॉक्टर पिन वाली जगह पर इंफेक्शन के लक्षण, जैसे सूजन, लालिमा या दर्द, पर नजर रखते हैं और समय-समय पर एक्स-रे से हड्डी की स्थिति जांचते हैं.&amp;nbsp;
क्या यह प्रक्रिया दर्दनाक होती है?
कई लोगों को लगता है कि यह प्रक्रिया बहुत दर्दनाक होगी, लेकिन पिन लगाने के समय एनेस्थीसिया दिया जाता है. जब हड्डियां सही स्थिति में आने लगती हैं, तो दर्द अक्सर कम हो जाता है. सर्जरी के बाद पिन को भी एनेस्थीसिया देकर ही निकाला जाता है. हालांकि इसके फायदे हैं जैसे हड्डी को स्थिर करना, मांसपेशियों के खिंचाव को कम करना और दर्द में राहत. लेकिन लंबे समय तक ट्रैक्शन में रहने से कुछ जोखिम भी होते हैं. इनमें पिन वाली जगह पर इंफेक्शन, लंबे समय तक एक ही पोज़िशन में रहने से बेडसोर्स, नसों को नुकसान और मांसपेशियों की कमजोरी शामिल है. इसी वजह से आजकल डॉक्टर स्केलेटल ट्रैक्शन को अस्थायी उपाय के तौर पर ही इस्तेमाल करते हैं और जल्द से जल्द ऐसे इलाज की ओर बढ़ते हैं, जिससे मरीज जल्दी चल-फिर सके और अस्पताल में कम समय बिताना पड़े.
इसे भी पढ़ें-&amp;nbsp;Diabetes Treatment Cost: डायबिटीज की दवाओं पर कौन-सा देश सबसे ज्यादा पैसा करता है खर्च, किस पायदान पर भारत?
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 15 Jan 2026 17:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>Kidney Stones: क्या बियर पीने से निकल जाता है किडनी में फंसा स्टोन, जानें क्या कहते हैं डॉक्टर्स?</title>
        <link>https://hindi.attentionindia.com/kidney-stones-क्या-बियर-पीने-से-निकल-जाता-है-किडनी-में-फंसा-स्टोन-जानें-क्या-कहते-हैं-डॉक्टर्स</link>
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        <description><![CDATA[ Drinking Beer For Kidney Stones: हमारी बदलती लाइफस्टाइल के चलते हमें जिन बीमारियों का खतरा सबसे ज्यादा रहता है, उनमें से एक है किडनी स्टोन का. &amp;nbsp;यह एक आम लेकिन बेहद दर्दनाक समस्या है. इसे लेकर लोगों के बीच कई तरह की गलतफहमियां फैली हुई हैं. इन्हीं में से एक सबसे प्रचलित धारणा यह है कि बियर पीने से किडनी में फंसे स्टोन अपने आप निकल जाते हैं, क्योंकि बियर पेशाब की मात्रा बढ़ाती है. हालांकि सच्चाई यह है कि बियर को इलाज के तौर पर इस्तेमाल करना न तो सुरक्षित है और न ही भरोसेमंद. उल्टा, इससे दर्द बढ़ सकता है. चलिए आपको इशके बारे में विस्तार से बताते हैं.&amp;nbsp;
बियर पीने से हर तरह का किडनी स्टोन निकल जाता है?
कई लोग मानते हैं कि बियर पीने से स्टोन अपने आप बाहर आ जाते हैं. यह सोच इस वजह से बनी क्योंकि बियर यूरिन आउटपुट बढ़ाती है और माना जाता है कि इससे छोटे स्टोन खिसक सकते हैं. लेकिन सच्चाई यह है कि बियर सिर्फ पेशाब बढ़ाती है, लेकिन इससे बने हुए स्टोन सुरक्षित तरीके से नहीं निकलते. 5 मिमी से छोटे स्टोन कभी-कभी खुद निकल सकते हैं, लेकिन बड़े स्टोन जबरदस्ती खिसकाने पर तेज दर्द और रुकावट पैदा कर सकते हैं. कुछ स्टडी में बियर को स्टोन बनने के जोखिम को कम करने से जोड़ा गया है, लेकिन यह बचाव के लिए है, इलाज के लिए नहीं.
क्या बियर सुरक्षित घरेलू उपाय?
कई लोग दवाओं या सर्जरी की बजाय बियर को आसान और नुकसानरहित उपाय मानते हैं. लेकिन सच्चाई यह है कि बियर में ऑक्सलेट की मात्रा होती है, जो स्टोन बनने का बड़ा कारण है. लंबे समय तक बियर पीने से शरीर डिहाइड्रेट हो सकता है और नए स्टोन बनने का खतरा बढ़ सकता है. इसके अलावा इलेक्ट्रोलाइट बैलेंस बिगड़ना, किडनी पर दबाव और दूसरी स्वास्थ्य समस्याएं भी हो सकती हैं.
ज्यादा बियर पीने से स्टोन जल्दी निकल जाएगा?
यह भी आम सोच है कि ज्यादा बियर पीने से स्टोन जल्दी फ्लश हो जाएगा. लेकिन सच्चाई यह है कि अचानक ज्यादा यूरिन बनने से स्टोन निकलना जरूरी नहीं है. अगर यूरिटर में रुकावट है, तो दर्द, मतली और जटिलताएं बढ़ सकती हैं. आजकल ऐसी दवाएं मौजूद हैं जो यूरिटर की मांसपेशियों को रिलैक्स करके स्टोन को सुरक्षित तरीके से निकलने में मदद करती हैं.
बियर मेडिकल इलाज से बेहतर है?
कुछ लोग इलाज को महंगा या झंझट भरा मानकर बियर को विकल्प समझते हैं. हालांकि सच्चाई यह है कि मेडिकल ट्रीटमेंट कहीं ज्यादा सुरक्षित और असरदार है. दवाओं से छोटे स्टोन निकल सकते हैं और जरूरत पड़ने पर आधुनिक, मिनिमली इनवेसिव प्रक्रियाओं से स्टोन आसानी से निकाले जा सकते हैं.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
डॉ. दीपेश कालरा, एम.एस., एम.सी.एच. (यूरोलॉजी), डॉ.एन.बी. (यूरोलॉजी) ने इसको लेकर अपने वीडियो में बताया है कि &quot;अक्सर लोगों को कहते सुना गया है कि पेट में पथरी हो तो बियर पीना शुरू कर दो. यह भी कहा जाता है कि बियर पीने से किडनी स्टोन निकल जाता है और बियर पथरी को काट-काटकर बाहर निकाल देती है. लेकिन स्वास्थ्य एक्सपर्ट के मुताबिक यह सबसे बड़ा मिथक है.&quot;&amp;nbsp;
इसे भी पढ़ें-&amp;nbsp;Diabetes Treatment Cost: डायबिटीज की दवाओं पर कौन-सा देश सबसे ज्यादा पैसा करता है खर्च, किस पायदान पर भारत?
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 15 Jan 2026 17:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>बाबा रामदेव बोले&amp; जेनेटिक और लाइफस्टाइल बीमारियों का समाधान है &amp;apos;परम औषधि&amp;apos;, दी ये सलाह</title>
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        <description><![CDATA[ Yoga Guru Swami Ramdev: योग गुरु स्वामी रामदेव ने हाल ही में एक फेसबुक लाइव सत्र के माध्यम से आधुनिक स्वास्थ्य चुनौतियों पर अपने विचार साझा किए. उन्होंने स्पष्ट किया कि जेनेटिक (आनुवंशिक), पर्यावरणीय और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों का समाधान केवल दवाओं में नहीं, बल्कि &#039;परम औषधि&#039; और अनुशासित जीवन पद्धति में निहित है.
जड़ से इलाज की आवश्यकता
स्वामी रामदेव के मुताबिक, आधुनिक चिकित्सा पद्धति का अपना महत्व है, लेकिन वह अक्सर केवल लक्षणों का इलाज करती है. उन्होंने भारतीय पारंपरिक ज्ञान का उल्लेख करते हुए &#039;औषधि&#039; और &#039;परम औषधि&#039; के बीच का अंतर समझाया. उनके मुताबिक, &#039;परम औषधि&#039; वह समग्र दृष्टिकोण है जो रोग के लक्षणों के बजाय उसके मूल कारण (Root Cause) को ठीक करने पर केंद्रित होता है.
जेनेटिक और पर्यावरणीय चुनौतियों पर प्रहार
आज के दौर में बढ़ती बीमारियों पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि कई स्वास्थ्य समस्याएं जेनेटिक पूर्वाग्रह, प्रदूषण और तनावपूर्ण जीवनशैली का परिणाम हैं. उन्होंने विशेष रूप से &#039;प्रालब्ध दोष&#039; (भाग्य या कर्म से जुड़े दोष) का जिक्र करते हुए कहा कि जिन्हें अक्सर लाइलाज मान लिया जाता है, उन्हें भी निरंतर योग, प्राणायाम और संतुलित पोषण के माध्यम से काफी हद तक प्रबंधित किया जा सकता है.
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सिंथेटिक उत्पादों से दूरी बनाने की सलाह
स्वामी रामदेव ने बढ़ते पर्यावरणीय रोगों के प्रति आगाह किया. उन्होंने कहा कि वायु, जल और भोजन के संदूषण ने मानव स्वास्थ्य को खतरे में डाल दिया है. उन्होंने रसायनों और सिंथेटिक उत्पादों पर अत्यधिक निर्भरता को कम करने का आह्वान किया. उनके मुताबिक, रसायनों का दीर्घकालिक उपयोग न केवल मानव शरीर बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के लिए हानिकारक है.
स्वदेशी और समग्र जीवन शैली का आह्वान
पतंजलि के माध्यम से पारंपरिक प्रणालियों को बढ़ावा देने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हुए उन्होंने कहा कि मधुमेह, मोटापा और उच्च रक्तचाप जैसी जीवनशैली की बीमारियों को आत्म-अनुशासन और शारीरिक सक्रियता से रोका जा सकता है. उन्होंने अंत में दर्शकों से अपील की कि वे दीर्घकालिक स्वास्थ्य लाभ के लिए आयुर्वेद, योग और नैतिक जीवन को अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाएं. ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 15 Jan 2026 17:30:09 +0530</pubDate>
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        <title>धूप न मिलने का सीधा असर हड्डियों पर, दिखें ये लक्षण तो रहें सावधान</title>
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        <pubDate>Thu, 15 Jan 2026 13:30:07 +0530</pubDate>
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        <title>वजन घटाने के चक्कर में सेहत न बिगाड़ें, फिटनेस एक्सपर्ट ने बताए वेट लॉस के 4 सही मॉडल</title>
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        <pubDate>Thu, 15 Jan 2026 09:30:10 +0530</pubDate>
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        <title>बिना दवा गर्दन की जकड़न दूर करें, अपनाएं ये 5 आसान एक्सरसाइज</title>
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        <pubDate>Wed, 14 Jan 2026 09:30:06 +0530</pubDate>
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        <title>Skipping Breakfast And Lunch Side Effects: बिजी लाइफस्टाइल में स्किप करते हैं ब्रेकफास्ट और लंच, यह आदत कैसे बन जाती है ओवरईटिंग का कारण?</title>
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        <pubDate>Tue, 13 Jan 2026 17:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>Sugar Health Risks: शरीर ही नहीं आपके दिमाग पर भी असर डालती है शुगर, जानें किन बीमारियों का रहता है खतरा?</title>
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        <pubDate>Tue, 13 Jan 2026 13:30:14 +0530</pubDate>
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        <title>Diabetes Skin Symptoms: ये 7 लक्षण नजर आएं तो समझ लें अनकंट्रोल हो रहा डायबिटीज, डॉक्टर को तुरंत करें कॉल</title>
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        <description><![CDATA[ Warning Signs Of High Blood Sugar On Skin: डायबिटीज दुनिया भर में सबसे आम क्रॉनिक मेटाबॉलिक बीमारियों में से एक है. यह न सिर्फ रोजमर्रा की ज़िंदगी को प्रभावित करती है, बल्कि लंबे समय में गंभीर परेशानियों का कारण भी बन सकती है. हाई ब्लड शुगर के संकेत कई बार त्वचा पर साफ दिखाई देने लगते हैं. इन लक्षणों को समय पर पहचान लेना जरूरी है, ताकि बीमारी के गंभीर रूप लेने से पहले इलाज शुरू किया जा सके. चलिए जानते हैं डायबिटीज से जुड़े ऐसे 7 स्किन संकेत, जो अनकंट्रोल्ड शुगर की ओर इशारा करते हैं.
शिन स्पॉट्स
शिन स्पॉट्स या डायबिटिक डर्मोपैथी, डायबिटीज से जुड़ी सबसे आम त्वचा समस्याओं में से एक है. इसे स्पॉटेड लेग सिंड्रोम भी कहा जाता है. ये गोल या अंडाकार धब्बे होते हैं, जिनका रंग भूरा या लाल-भूरा हो सकता है. आमतौर पर ये नुकसानदेह नहीं होते, लेकिन इनका दिखना ब्लड शुगर जांच की ज़रूरत का संकेत देता है. दर्द या खुजली न होने की वजह से कई लोग इन्हें उम्र के धब्बे समझकर नजरअंदाज कर देते हैं.
&amp;nbsp;त्वचा का सख्त या मोटा होना
लंबे समय तक हाई ब्लड शुगर रहने से त्वचा में कोलेजन का असामान्य जमाव हो सकता है, जिससे स्किन की इलास्टिसिटी कम हो जाती है और त्वचा मोटी लगने लगती है. इस स्थिति को मेडिकल भाषा में स्क्लेरिडेमा डायबिटिकोरम कहा जाता है. यह आमतौर पर गर्दन, कंधों या ऊपरी पीठ पर दिखती है. यह बिना दर्द के होती है और ज्यादातर कॉस्मेटिक समस्या मानी जाती है.
खुले घाव और जख्म
डायबिटीज शरीर की घाव भरने की क्षमता को प्रभावित करती है. लंबे समय तक हाई शुगर से ब्लड सर्कुलेशन खराब हो जाता है और नर्व डैमेज भी हो सकता है. इसकी वजह से खासकर पैरों में बने घाव जल्दी ठीक नहीं होते, &amp;nbsp;इन्हें डायबिटिक अल्सर कहा जाता है. समय पर इलाज न हो तो स्थिति गंभीर हो सकती है और अंग काटने तक की नौबत आ सकती है.
त्वचा पर छोटे-छोटे दाने
अगर अचानक त्वचा पर छोटे-छोटे दाने निकलने लगें, तो यह भी चेतावनी हो सकती है. अनकंट्रोल्ड डायबिटीज में ट्राइग्लिसराइड्स का स्तर बहुत ज्यादा बढ़ सकता है. शुरुआत में ये दाने दिखाई देते हैं और बाद में हल्की त्वचा पर पीले रंग के हो सकते हैं. शुगर कंट्रोल में आते ही ये दाने आमतौर पर गायब हो जाते हैं.
कुछ हिस्सों में त्वचा का काला पड़ना
गर्दन, बगल या जांघों के पास त्वचा का काला और मोटा होना डायबिटीज या प्रीडायबिटीज का संकेत हो सकता है. इस स्थिति को एकैंथोसिस नाइग्रिकन्स कहा जाता है और यह इंसुलिन रेजिस्टेंस से जुड़ी होती है. ज्यादातर मामलों में यह किसी गंभीर बीमारी का संकेत नहीं होती.
पलकों के आसपास पीले धब्बे
पलकों के आसपास पीले रंग के चिकने धब्बे या उभार दिखना खून में फैट का स्तर ज्यादा होने का संकेत हो सकता है. इन्हें जैंथेलाज़्मा कहा जाता है. ऐसे लोगों में कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स अक्सर ज्यादा पाए जाते हैं.
स्किन टैग्स
स्किन टैग्स आमतौर पर हानिरहित होते हैं, लेकिन अगर ये ज्यादा संख्या में हों, खासकर गर्दन, बगल, जांघों या पलकों के पास हो, तो यह टाइप-2 डायबिटीज से जुड़ा संकेत हो सकता है. मेडिकल भाषा में इन्हें एक्रोकोर्डन्स कहा जाता है. रिसर्च बताती है कि जिन लोगों में स्किन टैग्स ज्यादा होते हैं, उनमें डायबिटीज का खतरा भी ज्यादा होता है.
यह भी पढ़ें:&amp;nbsp;ब्रश करते वक्त हो सकता है ये हादसा, दुनियाभर में ऐसे सिर्फ 10 मामले
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 12 Jan 2026 17:30:12 +0530</pubDate>
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        <title>Cancer Myths: क्या आपको भी लगता है कि इन 9 चीजों से होता है कैंसर, जानें कितना गलत सोचते हैं आप?</title>
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        <pubDate>Mon, 12 Jan 2026 17:30:11 +0530</pubDate>
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        <title>Blood Pressure: क्या बार&amp;बार ब्लड प्रेशर चेक करने से जल्दी बीमार पड़ते हैं आप, जान लें क्या कहते हैं डॉक्टर?</title>
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        <description><![CDATA[ Is It Bad To Check Blood Pressure Frequently: कई लोग बार-बार अपना ब्लड प्रेशर चेक करते रहते हैं, लेकिन सवाल यह है कि कितनी बार जांच करना ठीक है और कब यह आदत नुकसानदेह हो सकती है. यही सवाल हाल ही में क्वोरा पर भी सामने आया क्या बार-बार ब्लड प्रेशर चेक करना गलत है? इसको लेकर इंडियन एक्सप्रेस से जुबिटर हॉस्पिटल, ठाणे में इंटरनल मेडिसिन के डायरेक्टर डॉक्टर अमित सराफ ने बात की. उन्होंने बताया कि नियमित रूप से ब्लड प्रेशर मापना अपने आप में नुकसानदेह नहीं है, लेकिन इसे किस तरह और किस वजह से किया जा रहा है, यह ज्यादा मायने रखता है. कुछ लोगों के लिए बार-बार मापने से तसल्ली मिलती है और बीमारी को संभालने में मदद मिलती है, जबकि कुछ लोगों में यही आदत चिंता बढ़ा देती है, जिससे रीडिंग भी अस्थायी रूप से ज्यादा आ सकती है.
कब नहीं होता है यह फायदेमंद?
डॉक्टर के मुताबिक, समस्या तब शुरू होती है जब लोग बिना डॉक्टर की सलाह के दिन में कई बार ब्लड प्रेशर मापने लगते हैं. हर तनावपूर्ण स्थिति, हर खाने के बाद या हल्के-फुल्के लक्षणों पर तुरंत मशीन निकाल लेना फायदेमंद नहीं होता. ऐसा करने से मेजरमेंट एंग्जायटी हो सकती है, यानी रीडिंग को लेकर तनाव इतना बढ़ जाता है कि ब्लड प्रेशर अस्थायी रूप से बढ़ा हुआ दिखने लगता है. यह जरूरी नहीं कि व्यक्ति का असली ब्लड प्रेशर हाई हो, कई बार यह सिर्फ मानसिक तनाव का असर होता है.
होम ब्लड प्रेशर मॉनिटरिंग उन लोगों के लिए ज्यादा उपयोगी मानी जाती है, जिन्हें पहले से हाई ब्लड प्रेशर की समस्या है, जो ब्लड प्रेशर की दवाइयां ले रहे हैं, खासतौर पर तब, जब हाल ही में दवा की डोज बदली गई हो या फिर जिन्हें डायबिटीज, किडनी की बीमारी या दिल से जुड़ी समस्याएं हों. वहीं, जिन लोगों को हाई ब्लड प्रेशर नहीं है और जो सामान्य तौर पर स्वस्थ हैं, उनके लिए रोज़ाना ब्लड प्रेशर चेक करना जरूरी नहीं होता.
कब मापना चाहिए ब्लड प्रेशर?
अगर जांच की सही फ्रीक्वेंसी की बात करें, तो डॉक्टर बताते हैं कि ज्यादातर हाई ब्लड प्रेशर के मरीजों के लिए कुछ दिनों तक सुबह और शाम एक-एक बार ब्लड प्रेशर मापना पर्याप्त होता है, वह भी डॉक्टर की सलाह के अनुसार. लंबे समय में हफ्ते में कुछ बार या डॉक्टर से मिलने से पहले रीडिंग लेना काफी माना जाता है. इसके अलावा, अगर लगातार सिरदर्द, चक्कर, सीने में भारीपन, असामान्य थकान या दिल की धड़कन तेज महसूस हो, तो उस समय ब्लड प्रेशर जांचना मददगार हो सकता है. इससे डॉक्टर को यह समझने में आसानी होती है कि रीडिंग का मरीज की मौजूदा स्थिति से क्या संबंध है.
किन चीजों का ध्यान रखना चाहिए?
घर पर ब्लड प्रेशर मापते समय सटीकता का ध्यान रखना बेहद जरूरी है. मापने से पहले कम से कम पांच मिनट तक शांति से बैठना चाहिए. जांच से आधे घंटे पहले कैफीन, धूम्रपान या एक्सरसाइज से बचना बेहतर होता है. हाथ को दिल के स्तर पर सहारा देकर रखना चाहिए और भरोसेमंद डिजिटल ब्लड प्रेशर मशीन का इस्तेमाल करना चाहिए. बेहतर नतीजों के लिए दो रीडिंग लेकर उनका औसत नोट करना सही रहता है. डॉक्टर कहते हैं कि समझदारी से किया गया ब्लड प्रेशर मॉनिटरिंग डॉक्टरों को सही फैसले लेने में मदद करता है, लेकिन अगर यह आदत जरूरत से ज्यादा और बिना कारण की हो जाए, तो यह उलझन और तनाव ही बढ़ाती है. मकसद जागरूक रहना होना चाहिए, घबराना नहीं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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