LED Light Side Effects: कमरे में लगी हैं LED लाइट्स तो हो जाइए सावधान, जानें कैसे कर रहीं दिमाग को कंफ्यूज
How Blue Light Affects Biological Clock: भले ही LED और दूसरी आर्टिफिशियल लाइट्स को पर्यावरण के अनुकूल माना जाता हो, लेकिन इनसे निकलने वाली ब्लू लाइट नींद पर बुरा असर डाल सकती है और बीमारियों का खतरा बढ़ा सकती है. हॉर्वर्ड मेडिकल स्कूल में पब्लिश एक रिसर्च पेपर के अनुसार, आर्टिफिशियल रोशनी के आने से पहले सूर्य ही रोशनी का मुख्य सोर्स था और लोग शाम के समय काफी हद तक अंधेरे में रहते थे, आज हालात बदल चुके हैं शाम होते ही चारों तरफ रोशनी रहती है और हम इसे सामान्य मान लेते हैं. लेकिन इस रोशनी की कीमत हमें सेहत के रूप में चुकानी पड़ सकती है. रात के समय रोशनी शरीर की बायोलॉजिकल क्लॉक यानी सर्केडियन रिदम को बिगाड़ देती है. इससे नींद प्रभावित होती है और रिसर्च बताती है कि आगे चलकर यह कैंसर, डायबिटीज़, हार्ट डिजीज और मोटापे जैसी समस्याओं का भी कारण बन सकती है. ब्लू लाइट क्या है? हर रंग की रोशनी का असर एक जैसा नहीं होता. ब्लू वेवलेंथ दिन के समय फायदेमंद होती हैं, ये ध्यान, रिएक्शन टाइम और मूड को बेहतर बनाती हैं. लेकिन रात में यही ब्लू लाइट सबसे ज्यादा नुकसानदायक साबित होती है. स्क्रीन वाले इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस और एनर्जी-एफिशिएंट लाइटिंग के बढ़ते इस्तेमाल से सूर्यास्त के बाद ब्लू लाइट के संपर्क में रहने का समय लगातार बढ़ रहा है. रोशनी और नींद हर व्यक्ति की सर्केडियन रिदम थोड़ी अलग होती है, लेकिन औसतन यह लगभग 24 घंटे 15 मिनट की होती है. देर रात तक जागने वालों की बायोलॉजिकल क्लॉक थोड़ी लंबी होती है, जबकि जल्दी सोने-जागने वालों की थोड़ी छोटी. हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के डॉ. चार्ल्स जाइस्लर ने 1981 में दिखाया था कि दिन की प्राकृतिक रोशनी शरीर की अंदरूनी घड़ी को वातावरण के साथ तालमेल में रखती है. क्या रात की रोशनी वाकई नुकसानदायक है? कुछ स्टडीज में यह संकेत मिला है कि रात में रोशनी के संपर्क में रहना, जैसे नाइट शिफ्ट में काम करना, डायबिटीज, हार्ट रोग और मोटापे से जुड़ा हो सकता है. हालांकि, यह पूरी तरह साबित नहीं हुआ है कि रात की रोशनी ही इन बीमारियों की सीधी वजह है, और इसके पीछे के कारणों पर अभी और शोध की जरूरत है. एलईडी से क्या होती है दिक्कत Vision Lighting के अनुसार, LED लाइट्स में बहुत तेजी से ऑन-ऑफ होने वाला फ्लिकर होता है, जिसे आंखें भले न देखें, लेकिन दिमाग महसूस करता है. इससे आंखों में थकान, सिरदर्द, चिड़चिड़ापन और रात में बेचैनी बढ़ सकती है. दूसरी ओर, नीली रोशनी दिमाग को दिन होने का संकेत देती है और मेलाटोनिन हार्मोन को दबा देती है. रिसर्च बताती है कि रात में नीली रोशनी के संपर्क से नींद देर से आती है. यही वजह है कि आधुनिक घरों की तेज LED लाइटें नींद की समस्याओं को बढ़ा रही हैं. ये भी पढ़ें-कुछ लोग बिना डाइट और जिम जाए भी क्यों होते हैं पतले? जान लें कारण Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
How Blue Light Affects Biological Clock: भले ही LED और दूसरी आर्टिफिशियल लाइट्स को पर्यावरण के अनुकूल माना जाता हो, लेकिन इनसे निकलने वाली ब्लू लाइट नींद पर बुरा असर डाल सकती है और बीमारियों का खतरा बढ़ा सकती है. हॉर्वर्ड मेडिकल स्कूल में पब्लिश एक रिसर्च पेपर के अनुसार, आर्टिफिशियल रोशनी के आने से पहले सूर्य ही रोशनी का मुख्य सोर्स था और लोग शाम के समय काफी हद तक अंधेरे में रहते थे, आज हालात बदल चुके हैं शाम होते ही चारों तरफ रोशनी रहती है और हम इसे सामान्य मान लेते हैं.
लेकिन इस रोशनी की कीमत हमें सेहत के रूप में चुकानी पड़ सकती है. रात के समय रोशनी शरीर की बायोलॉजिकल क्लॉक यानी सर्केडियन रिदम को बिगाड़ देती है. इससे नींद प्रभावित होती है और रिसर्च बताती है कि आगे चलकर यह कैंसर, डायबिटीज़, हार्ट डिजीज और मोटापे जैसी समस्याओं का भी कारण बन सकती है.
ब्लू लाइट क्या है?
हर रंग की रोशनी का असर एक जैसा नहीं होता. ब्लू वेवलेंथ दिन के समय फायदेमंद होती हैं, ये ध्यान, रिएक्शन टाइम और मूड को बेहतर बनाती हैं. लेकिन रात में यही ब्लू लाइट सबसे ज्यादा नुकसानदायक साबित होती है. स्क्रीन वाले इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस और एनर्जी-एफिशिएंट लाइटिंग के बढ़ते इस्तेमाल से सूर्यास्त के बाद ब्लू लाइट के संपर्क में रहने का समय लगातार बढ़ रहा है.
रोशनी और नींद
हर व्यक्ति की सर्केडियन रिदम थोड़ी अलग होती है, लेकिन औसतन यह लगभग 24 घंटे 15 मिनट की होती है. देर रात तक जागने वालों की बायोलॉजिकल क्लॉक थोड़ी लंबी होती है, जबकि जल्दी सोने-जागने वालों की थोड़ी छोटी. हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के डॉ. चार्ल्स जाइस्लर ने 1981 में दिखाया था कि दिन की प्राकृतिक रोशनी शरीर की अंदरूनी घड़ी को वातावरण के साथ तालमेल में रखती है.
क्या रात की रोशनी वाकई नुकसानदायक है?
कुछ स्टडीज में यह संकेत मिला है कि रात में रोशनी के संपर्क में रहना, जैसे नाइट शिफ्ट में काम करना, डायबिटीज, हार्ट रोग और मोटापे से जुड़ा हो सकता है. हालांकि, यह पूरी तरह साबित नहीं हुआ है कि रात की रोशनी ही इन बीमारियों की सीधी वजह है, और इसके पीछे के कारणों पर अभी और शोध की जरूरत है.
एलईडी से क्या होती है दिक्कत
Vision Lighting के अनुसार, LED लाइट्स में बहुत तेजी से ऑन-ऑफ होने वाला फ्लिकर होता है, जिसे आंखें भले न देखें, लेकिन दिमाग महसूस करता है. इससे आंखों में थकान, सिरदर्द, चिड़चिड़ापन और रात में बेचैनी बढ़ सकती है. दूसरी ओर, नीली रोशनी दिमाग को दिन होने का संकेत देती है और मेलाटोनिन हार्मोन को दबा देती है. रिसर्च बताती है कि रात में नीली रोशनी के संपर्क से नींद देर से आती है. यही वजह है कि आधुनिक घरों की तेज LED लाइटें नींद की समस्याओं को बढ़ा रही हैं.
ये भी पढ़ें-कुछ लोग बिना डाइट और जिम जाए भी क्यों होते हैं पतले? जान लें कारण
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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