Kaal Bhairav Ashtami 2025: भय से मुक्ति दिलाएंगे भगवान कालभैरव, जानें पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और मंत्र!

Kaal Bhairav 2025: कालभैरव को भगवान शिव का तीसरा रूद्र अवतार माना जाता है. पुराणों के अनुसार, मार्गशीर्ष महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन भगवान कालभैरव प्रकट हुए थे. इस बार कालभैरव अष्टमी 12 नवंबर 2025 को है. इस कृष्णाष्टमी को मध्याह्न काल यानी दोपहर में भगवान शंकर से भैरव रूप की उत्पत्ति हुई थी. भगवान भैरव से काल भी डरता है, इसलिए उन्हें कालभैरव कहा जाता है. ज्योतिषाचार्य डॉ. अनीष व्यास ने बताया कि 12 नवंबर को भैरव अष्टमी मनाई जाएगी. इस दिन भगवान शिव के रौद्र रूप कालभैरव की पूजा की जाती है. भैरव अष्टमी का व्रत करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है. विधि-विधान के साथ इस दिन प्रातः व्रत का संकल्प लेकर रात्रि में कालभैरव भगवान की पूजा की जाती है. कालभैरव का पौराणिक महत्व: शिवपुराण के अनुसार, भगवान शंकर के अंश से कालभैरव की उत्पत्ति हुई थी. अपने अहंकार में चूर अंधकासुर ने भगवान शिव पर हमला किया था. उसके संहार के लिए भगवान शिव के रक्त से भैरव का जन्म हुआ. इसलिए कालभैरव शिव का ही स्वरूप हैं. उनकी आराधना करने से समस्त दुख और परेशानियाँ दूर हो जाती हैं. भैरव अष्टमी का शुभ मुहूर्त: मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी 11 नवंबर को रात्रि 11:08 बजे शुरू होगी और 12 नवंबर को रात्रि 10:58 बजे समाप्त होगी. कालभैरव की पूजा निशा काल यानी रात्रि में की जाती है. पूजा और व्रत विधि: प्रातः स्नान के पश्चात व्रत का संकल्प लें. शाम को किसी मंदिर में जाकर भगवान भैरव की प्रतिमा के सामने चौमुखा दीपक जलाएं. फूल, इमरती, जलेबी, उड़द, पान, नारियल आदि अर्पित करें. 108 बार “ॐ कालभैरवाय नम:” मंत्र का जाप करें. पूजा के बाद भगवान भैरव को जलेबी या इमरती का भोग लगाएं. जरूरतमंदों को दो रंग का कंबल दान करें. इस दिन कुत्तों को जलेबी और इमरती खिलाना पारंपरिक अनुष्ठान का हिस्सा है. स्वास्थ्य और जीवन पर लाभ: कालभैरव का अर्थ है भय को हराने वाला. उनकी पूजा से मृत्यु और हर प्रकार के संकट का डर दूर होता है. नारद पुराण में भी कहा गया है कि कालभैरव की पूजा करने से मनुष्य की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं. दान और शुभ कार्य: अगहन महीने में ऊनी कपड़े और जरूरतमंदों को भोजन या वस्तुएं दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है. इसे भैरव के साथ शनिदेव की कृपा भी मिलती है. रात्रि पूजा का महत्व: भैरव उपासना प्रदोष काल यानी सूर्यास्त के समय या मध्यरात्रि में करनी चाहिए. रात्रि जागरण कर भगवान शिव, माता पार्वती और कालभैरव की पूजा करें. कालभैरव के वाहन काले कुत्ते की भी पूजा की जाती है. कालभैरव जयंती पर इन मंत्रों का जाप करने से जीवन में भय और कष्ट दूर होते हैं: ॐ कालभैरवाय नमः ॐ भयहरणं च भैरव ॐ भ्रां कालभैरवाय फट् ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरू कुरू बटुकाय ह्रीं ॐ हं षं नं गं कं सं खं महाकाल भैरवाय नमः कालभैरव जयंती का महत्व: भैरव अष्टमी पर पूजा करने से साधक को भय से मुक्ति, ग्रह और शत्रु बाधा से रक्षा और जीवन में कल्याणकारी फल प्राप्त होता है. जो व्यक्ति भगवान भैरव के भक्तों का अहित करता है, उसे तीनों लोकों में शरण नहीं मिलती. Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

Nov 8, 2025 - 14:30
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Kaal Bhairav Ashtami 2025: भय से मुक्ति दिलाएंगे भगवान कालभैरव, जानें पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और मंत्र!

Kaal Bhairav 2025: कालभैरव को भगवान शिव का तीसरा रूद्र अवतार माना जाता है. पुराणों के अनुसार, मार्गशीर्ष महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन भगवान कालभैरव प्रकट हुए थे. इस बार कालभैरव अष्टमी 12 नवंबर 2025 को है. इस कृष्णाष्टमी को मध्याह्न काल यानी दोपहर में भगवान शंकर से भैरव रूप की उत्पत्ति हुई थी. भगवान भैरव से काल भी डरता है, इसलिए उन्हें कालभैरव कहा जाता है.

ज्योतिषाचार्य डॉ. अनीष व्यास ने बताया कि 12 नवंबर को भैरव अष्टमी मनाई जाएगी. इस दिन भगवान शिव के रौद्र रूप कालभैरव की पूजा की जाती है. भैरव अष्टमी का व्रत करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है. विधि-विधान के साथ इस दिन प्रातः व्रत का संकल्प लेकर रात्रि में कालभैरव भगवान की पूजा की जाती है.

कालभैरव का पौराणिक महत्व:

शिवपुराण के अनुसार, भगवान शंकर के अंश से कालभैरव की उत्पत्ति हुई थी. अपने अहंकार में चूर अंधकासुर ने भगवान शिव पर हमला किया था. उसके संहार के लिए भगवान शिव के रक्त से भैरव का जन्म हुआ. इसलिए कालभैरव शिव का ही स्वरूप हैं. उनकी आराधना करने से समस्त दुख और परेशानियाँ दूर हो जाती हैं.

भैरव अष्टमी का शुभ मुहूर्त:

मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी 11 नवंबर को रात्रि 11:08 बजे शुरू होगी और 12 नवंबर को रात्रि 10:58 बजे समाप्त होगी. कालभैरव की पूजा निशा काल यानी रात्रि में की जाती है.

पूजा और व्रत विधि:

  • प्रातः स्नान के पश्चात व्रत का संकल्प लें.
  • शाम को किसी मंदिर में जाकर भगवान भैरव की प्रतिमा के सामने चौमुखा दीपक जलाएं.
  • फूल, इमरती, जलेबी, उड़द, पान, नारियल आदि अर्पित करें.
  • 108 बार “ॐ कालभैरवाय नम:” मंत्र का जाप करें.
  • पूजा के बाद भगवान भैरव को जलेबी या इमरती का भोग लगाएं.
  • जरूरतमंदों को दो रंग का कंबल दान करें.
  • इस दिन कुत्तों को जलेबी और इमरती खिलाना पारंपरिक अनुष्ठान का हिस्सा है.

स्वास्थ्य और जीवन पर लाभ: कालभैरव का अर्थ है भय को हराने वाला. उनकी पूजा से मृत्यु और हर प्रकार के संकट का डर दूर होता है. नारद पुराण में भी कहा गया है कि कालभैरव की पूजा करने से मनुष्य की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं.

दान और शुभ कार्य: अगहन महीने में ऊनी कपड़े और जरूरतमंदों को भोजन या वस्तुएं दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है. इसे भैरव के साथ शनिदेव की कृपा भी मिलती है.

रात्रि पूजा का महत्व: भैरव उपासना प्रदोष काल यानी सूर्यास्त के समय या मध्यरात्रि में करनी चाहिए. रात्रि जागरण कर भगवान शिव, माता पार्वती और कालभैरव की पूजा करें. कालभैरव के वाहन काले कुत्ते की भी पूजा की जाती है.

कालभैरव जयंती पर इन मंत्रों का जाप करने से जीवन में भय और कष्ट दूर होते हैं:

  • ॐ कालभैरवाय नमः
  • ॐ भयहरणं च भैरव
  • ॐ भ्रां कालभैरवाय फट्
  • ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरू कुरू बटुकाय ह्रीं
  • ॐ हं षं नं गं कं सं खं महाकाल भैरवाय नमः

कालभैरव जयंती का महत्व:

भैरव अष्टमी पर पूजा करने से साधक को भय से मुक्ति, ग्रह और शत्रु बाधा से रक्षा और जीवन में कल्याणकारी फल प्राप्त होता है. जो व्यक्ति भगवान भैरव के भक्तों का अहित करता है, उसे तीनों लोकों में शरण नहीं मिलती.

Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

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