IVF Success Factors: मां बनने की राह में 'स्ट्रेस' बड़ा रोड़ा... तनाव-एंग्जायटी से घट रहा IVF का सक्सेस रेट
IVF Success Factors: मां बनने का सपना हर महिला के लिए खास होता है, लेकिन जब यह सपना आसानी से पूरा नहीं होता तो IVF जैसे इलाज उम्मीद की एक नई किरण बनकर सामने आती है. इसी बीच एक नई स्टडी ने इस सफर से जुड़ी एक अहम सच्चाई को सामने लाया है. रिपोर्ट के अनुसार IVF ट्रीटमेंट के दौरान महिलाओं का मानसिक स्वास्थ्य और भावनात्मक स्वास्थ्य यानी उनका स्ट्रेस और एंग्जायटी लेवल, इसके परिणामों को प्रभावित कर सकता है. वही जिन महिलाओं में तनाव कम पाया गया, उनमें IVF के सफल होने की संभावना अधिक देखी गई है. इससे साफ होता है कि इलाज के साथ-साथ मानसिक संतुलन भी बेहद जरूरी है. स्टडी में क्या सामने आया? पुणे के एक IVF सेंटर में की गई इस स्टडी में लगभग 120 महिलाओं को शामिल किया गया. इस दौरान उनके स्ट्रेस और एंग्जायटी लेवल को मापा गया और फिर IVF के नतीजों से तुलना किया गया. आंकड़ों के अनुसार करीब 40 प्रतिशत महिलाओं का IVF सफल रहा. इन महिलाओं का एंग्जायटी स्कोर औसतन 5.5 था, जबकि जिनका IVF सफल नहीं हुआ उनका स्कोर 6.7 तक पाया गया. इसी तरह स्ट्रेस स्कोर में भी अंतर देखा गया, जहां सफल मामलों में यह 7.4 था और असफल मामलों में 8.7 तक पहुंच गया. यह साफ संकेत देता है कि ज्यादा तनाव ट्रीटमेंट के नतीजों को प्रभावित कर सकता है. यह भी पढ़ेंः बिना वजह मोबाइल फोन स्क्रॉल करने की पड़ गई आदत, जानिए इसका दिमाग पर क्या पड़ता है असर? एक्सपर्ट्स की क्या है राय? फर्टिलिटी एक्सपर्ट्स का कहना है कि स्ट्रेस केवल मानसिक समस्या नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर शरीर पर भी पड़ता है. डॉक्टरों के अनुसार लंबे समय तक रहने वाला तनाव शरीर में कोर्टिसोल हार्मोन को बढ़ा देता है, जिससे हार्मोनल बैलेंस बिगड़ सकता है. इंडिया आईवीएफ फर्टिलिटी की डॉक्टर ऋचिका सहाय शुक्ला के अनुसार, आईवीएफ कराने वाली बहुत सी महिलाएं सिर्फ शारीरिक रूप से ही नहीं, बल्कि सालों की चिंता और बार-बार नाकामयाब होने की वजह से मन से भी बहुत थक चुकी होती हैं. इसका असर एग क्वालिटी पर पड़ता है और IVF के रिजल्ट को भी प्रभावित कर सकता है. एक्सपर्ट्स यह भी बताते हैं कि IVF की प्रक्रिया भावनात्मक रूप से काफी चुनौतीपूर्ण होती है, क्योंकि इसमें महिलाओं को अनिश्चितता और कई बार असफलता का सामना करना पड़ता है. भारत में करीब 2.8 करोड़ लोग बांझपन की समस्या से जूझ रहे हैं, और हर साल लगभग 3 से 3.5 लाख आईवीएफ उपचार किए जाते हैं. इन्फर्टिलिटी और स्ट्रेस का संबंध इन्फर्टिलिटी को मेडिकल तौर पर तब माना जाता है जब 12 महीने तक नियमित और असुरक्षित संबंध के बाद भी गर्भधारण न हो. स्टडी के अनुसार लगभग 9 प्रतिशत कपल्स इस समस्या से जूझ रहे हैं. इसे जिंदगी के सबसे बड़े तनावों में से एक माना जाता है, जो लोगों को मानसिक रूप से काफी परेशान कर सकता है. इससे प्रभावित लोगों में चिंता, उदासी और ज्यादा तनाव जैसी समस्याएं अक्सर देखने को मिलती हैं. रिसर्च में यह भी सामने आया है कि IVF ट्रीटमेंट के दौरान मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना उतना ही जरूरी है जितना मेडिकल इलाज, क्योंकि दोनों मिलकर ही बेहतर परिणाम देने में मदद करते हैं. डॉ. शुक्ला के मुताबिक, जिन महिलाओं को सही जानकारी दी जाती है, उन्हें भरोसा दिलाया जाता है और भावनात्मक सहारा मिलता है, वे अक्सर इलाज में बेहतर परिणाम दिखाती हैं. यह भी पढ़ेंः माउथवॉश का ज्यादा इस्तेमाल बढ़ा सकता है ब्लड प्रेशर, डॉक्टर ने बताए इसके चौंकाने वाले असर
IVF Success Factors: मां बनने का सपना हर महिला के लिए खास होता है, लेकिन जब यह सपना आसानी से पूरा नहीं होता तो IVF जैसे इलाज उम्मीद की एक नई किरण बनकर सामने आती है. इसी बीच एक नई स्टडी ने इस सफर से जुड़ी एक अहम सच्चाई को सामने लाया है. रिपोर्ट के अनुसार IVF ट्रीटमेंट के दौरान महिलाओं का मानसिक स्वास्थ्य और भावनात्मक स्वास्थ्य यानी उनका स्ट्रेस और एंग्जायटी लेवल, इसके परिणामों को प्रभावित कर सकता है. वही जिन महिलाओं में तनाव कम पाया गया, उनमें IVF के सफल होने की संभावना अधिक देखी गई है. इससे साफ होता है कि इलाज के साथ-साथ मानसिक संतुलन भी बेहद जरूरी है.
स्टडी में क्या सामने आया?
पुणे के एक IVF सेंटर में की गई इस स्टडी में लगभग 120 महिलाओं को शामिल किया गया. इस दौरान उनके स्ट्रेस और एंग्जायटी लेवल को मापा गया और फिर IVF के नतीजों से तुलना किया गया. आंकड़ों के अनुसार करीब 40 प्रतिशत महिलाओं का IVF सफल रहा. इन महिलाओं का एंग्जायटी स्कोर औसतन 5.5 था, जबकि जिनका IVF सफल नहीं हुआ उनका स्कोर 6.7 तक पाया गया. इसी तरह स्ट्रेस स्कोर में भी अंतर देखा गया, जहां सफल मामलों में यह 7.4 था और असफल मामलों में 8.7 तक पहुंच गया. यह साफ संकेत देता है कि ज्यादा तनाव ट्रीटमेंट के नतीजों को प्रभावित कर सकता है.
यह भी पढ़ेंः बिना वजह मोबाइल फोन स्क्रॉल करने की पड़ गई आदत, जानिए इसका दिमाग पर क्या पड़ता है असर?
एक्सपर्ट्स की क्या है राय?
फर्टिलिटी एक्सपर्ट्स का कहना है कि स्ट्रेस केवल मानसिक समस्या नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर शरीर पर भी पड़ता है. डॉक्टरों के अनुसार लंबे समय तक रहने वाला तनाव शरीर में कोर्टिसोल हार्मोन को बढ़ा देता है, जिससे हार्मोनल बैलेंस बिगड़ सकता है. इंडिया आईवीएफ फर्टिलिटी की डॉक्टर ऋचिका सहाय शुक्ला के अनुसार, आईवीएफ कराने वाली बहुत सी महिलाएं सिर्फ शारीरिक रूप से ही नहीं, बल्कि सालों की चिंता और बार-बार नाकामयाब होने की वजह से मन से भी बहुत थक चुकी होती हैं. इसका असर एग क्वालिटी पर पड़ता है और IVF के रिजल्ट को भी प्रभावित कर सकता है. एक्सपर्ट्स यह भी बताते हैं कि IVF की प्रक्रिया भावनात्मक रूप से काफी चुनौतीपूर्ण होती है, क्योंकि इसमें महिलाओं को अनिश्चितता और कई बार असफलता का सामना करना पड़ता है. भारत में करीब 2.8 करोड़ लोग बांझपन की समस्या से जूझ रहे हैं, और हर साल लगभग 3 से 3.5 लाख आईवीएफ उपचार किए जाते हैं.
इन्फर्टिलिटी और स्ट्रेस का संबंध
इन्फर्टिलिटी को मेडिकल तौर पर तब माना जाता है जब 12 महीने तक नियमित और असुरक्षित संबंध के बाद भी गर्भधारण न हो. स्टडी के अनुसार लगभग 9 प्रतिशत कपल्स इस समस्या से जूझ रहे हैं. इसे जिंदगी के सबसे बड़े तनावों में से एक माना जाता है, जो लोगों को मानसिक रूप से काफी परेशान कर सकता है. इससे प्रभावित लोगों में चिंता, उदासी और ज्यादा तनाव जैसी समस्याएं अक्सर देखने को मिलती हैं. रिसर्च में यह भी सामने आया है कि IVF ट्रीटमेंट के दौरान मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना उतना ही जरूरी है जितना मेडिकल इलाज, क्योंकि दोनों मिलकर ही बेहतर परिणाम देने में मदद करते हैं. डॉ. शुक्ला के मुताबिक, जिन महिलाओं को सही जानकारी दी जाती है, उन्हें भरोसा दिलाया जाता है और भावनात्मक सहारा मिलता है, वे अक्सर इलाज में बेहतर परिणाम दिखाती हैं.
यह भी पढ़ेंः माउथवॉश का ज्यादा इस्तेमाल बढ़ा सकता है ब्लड प्रेशर, डॉक्टर ने बताए इसके चौंकाने वाले असर
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