I-PAC रेड में ममता बनर्जी की दखलअंदाजी पर बंगाल के वकील और ED में हो गई तगड़ी बहस, SG मेहता बोले- तो आप खुद कैसे...

पॉलिटिकल कंसल्टेंसी फर्म I-PAC के ऑफिस और उसके को-फाउंडर प्रतीक जैन के आवास पर रेड मामले में दाखिल प्रवर्तन निदेशालय की याचिका पर पश्चिम बंगाल सरकार ने सवाल खड़े किए हैं. याचिका में दावा किया गया है कि रेड के वक्त पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी आला पुलिस अधिकारियों के साथ वहां पहुंचीं और छापेमारी में बाधा डाली और सबूत नष्ट किए. याचिका में रेड में बाधा डालने और सबूत नष्ट करने के लिए ममता बनर्जी और सीनियर पुलिस अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर सीबीआई जांच की मांग की गई है. बुधवार (18 मार्च, 2026) को पश्चिम बंगाल सरकार के वकील श्याम दीवान ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि ईडी अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दाखिल नहीं कर सकती है, यह अनुच्छेद मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए है और ईडी कोई व्यक्ति नहीं है इसलिए उसके मौलिक अधिकार नहीं हो सकते. बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार श्याम दीवान ने कहा कि क्या ईडी अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दाखिल कर सकती है, यह एक संवैधानिक प्रश्न है. उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 145 के तहत ऐसे मामलों की सुनवाई कम से कम 5 जजों की बेंच में होनी चाहिए. उन्होंने कहा कि ईडी केंद्र सरकार का संगठनात्मक अंग है, इससे ज्यादा और कुछ नहीं. उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दाखिल करने का अधिकार किसी व्यक्ति को है और ईडी न तो न्यायिक और न ही कोई प्राकृतिक व्यक्ति है तो उसको ये अधिकार नहीं है.  एडवोकेट श्याम दीवान ने ईडी की रेड और जब्त करने की शक्तियों के बारे में भी बताया. उन्होंने कहा कि सबसे पहले कार्यकारी अधिनियम से ईडी का गठन किया गया था और यह सरकार के आर्थिक विभाग के मामलों की प्रवर्तन ईकाई थी. उन्होंने कहा कि बाद में ईडी का प्रशासनिक नियंत्रण आर्थिक विभाग के मामलों से राजस्व विभाग में चला गया. उन्होंने बताया कि 1973-77 के बीच थोड़े समय के लिए ईडी का नाम बदला गया और यह कार्मिक और प्रशासनिक सुधार विभाग के अंतर्गत आ गया. श्याम दीवान ने कहा कि ईडी केंद्र सरकार का विभाग है इसलिए उसको मुकदमा दाखिल करने का अधिकार नहीं है. ऐसा ही विभाग राज्य में भी हो सकता है, जो राज्य सरकार का विभाग है. उन्होंने कहा कि तो इस तरह जो याचिका दाखिल की जा रही है वो केंद्र सरकार की तरफ से दाखिल हुई. उन्होंने संविधान के पार्ट III के तहत राहत की मांग करते हुए कहा कि यह व्यक्ति के मौलिक अधिकारों की गारंटी देता है और संविधान खुद ये कहता है कि इस तरह के मामलों को पांच जजों की बेंच को सुनना चाहिए इसलिए इस मामले को आगे भेजा जाना चाहिए. बंगाल सरकार की दलीलों पर ईडी की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि पश्चिम बंगाल सरकार खुद आर्टिकल 32 के तहत रिट पिटीशन दाखिल कर चुकी है और केरल सरकार भी ऐसा कर चुकी है. इन्होंने राज्य के तौर पर याचिका दाखिल की थी. एसजी तुषार मेहता ने कोर्ट में कहा, 'यह मेरी याचिका है और मैं आपको संतुष्ट जवाब दूंगा कि हमने क्यों अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दाखिल की है.' एसजी ने कहा कि हैरानी वाली बात है कि मुख्यमंत्री ने पहले ईडी की जांच में बाधा डाली और अब राज्य सरकार मामले पर सुनवाई में देरी कर रही है.   यह भी पढ़ें:-ममता बनर्जी ने इस बार कितने मुस्लिम नेताओं को दिया टिकट? हुमायूं कबीर वाली सीट पर किसे मिला मौका

Mar 18, 2026 - 14:30
 0
I-PAC रेड में ममता बनर्जी की दखलअंदाजी पर बंगाल के वकील और ED में हो गई तगड़ी बहस, SG मेहता बोले- तो आप खुद कैसे...

पॉलिटिकल कंसल्टेंसी फर्म I-PAC के ऑफिस और उसके को-फाउंडर प्रतीक जैन के आवास पर रेड मामले में दाखिल प्रवर्तन निदेशालय की याचिका पर पश्चिम बंगाल सरकार ने सवाल खड़े किए हैं. याचिका में दावा किया गया है कि रेड के वक्त पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी आला पुलिस अधिकारियों के साथ वहां पहुंचीं और छापेमारी में बाधा डाली और सबूत नष्ट किए. याचिका में रेड में बाधा डालने और सबूत नष्ट करने के लिए ममता बनर्जी और सीनियर पुलिस अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर सीबीआई जांच की मांग की गई है.

बुधवार (18 मार्च, 2026) को पश्चिम बंगाल सरकार के वकील श्याम दीवान ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि ईडी अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दाखिल नहीं कर सकती है, यह अनुच्छेद मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए है और ईडी कोई व्यक्ति नहीं है इसलिए उसके मौलिक अधिकार नहीं हो सकते.

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार श्याम दीवान ने कहा कि क्या ईडी अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दाखिल कर सकती है, यह एक संवैधानिक प्रश्न है. उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 145 के तहत ऐसे मामलों की सुनवाई कम से कम 5 जजों की बेंच में होनी चाहिए. उन्होंने कहा कि ईडी केंद्र सरकार का संगठनात्मक अंग है, इससे ज्यादा और कुछ नहीं. उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दाखिल करने का अधिकार किसी व्यक्ति को है और ईडी न तो न्यायिक और न ही कोई प्राकृतिक व्यक्ति है तो उसको ये अधिकार नहीं है. 

एडवोकेट श्याम दीवान ने ईडी की रेड और जब्त करने की शक्तियों के बारे में भी बताया. उन्होंने कहा कि सबसे पहले कार्यकारी अधिनियम से ईडी का गठन किया गया था और यह सरकार के आर्थिक विभाग के मामलों की प्रवर्तन ईकाई थी. उन्होंने कहा कि बाद में ईडी का प्रशासनिक नियंत्रण आर्थिक विभाग के मामलों से राजस्व विभाग में चला गया. उन्होंने बताया कि 1973-77 के बीच थोड़े समय के लिए ईडी का नाम बदला गया और यह कार्मिक और प्रशासनिक सुधार विभाग के अंतर्गत आ गया.

श्याम दीवान ने कहा कि ईडी केंद्र सरकार का विभाग है इसलिए उसको मुकदमा दाखिल करने का अधिकार नहीं है. ऐसा ही विभाग राज्य में भी हो सकता है, जो राज्य सरकार का विभाग है. उन्होंने कहा कि तो इस तरह जो याचिका दाखिल की जा रही है वो केंद्र सरकार की तरफ से दाखिल हुई. उन्होंने संविधान के पार्ट III के तहत राहत की मांग करते हुए कहा कि यह व्यक्ति के मौलिक अधिकारों की गारंटी देता है और संविधान खुद ये कहता है कि इस तरह के मामलों को पांच जजों की बेंच को सुनना चाहिए इसलिए इस मामले को आगे भेजा जाना चाहिए.

बंगाल सरकार की दलीलों पर ईडी की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि पश्चिम बंगाल सरकार खुद आर्टिकल 32 के तहत रिट पिटीशन दाखिल कर चुकी है और केरल सरकार भी ऐसा कर चुकी है. इन्होंने राज्य के तौर पर याचिका दाखिल की थी. एसजी तुषार मेहता ने कोर्ट में कहा, 'यह मेरी याचिका है और मैं आपको संतुष्ट जवाब दूंगा कि हमने क्यों अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दाखिल की है.' एसजी ने कहा कि हैरानी वाली बात है कि मुख्यमंत्री ने पहले ईडी की जांच में बाधा डाली और अब राज्य सरकार मामले पर सुनवाई में देरी कर रही है.

 

यह भी पढ़ें:-
ममता बनर्जी ने इस बार कितने मुस्लिम नेताओं को दिया टिकट? हुमायूं कबीर वाली सीट पर किसे मिला मौका

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow