Explained: अमेरिका में भारतीय पेशेवरों को बड़ा झटका, हजारों कर्मचारियों पर पड़ेगा बुरा असर? जानिए क्या हुआ

18 सितंबर 2026 को हस्ताक्षर किए गए एक नए एग्जीक्यूटिव ऑर्डर के तहत अमेरिकी सरकार ने उन कंपनियों पर नियम कड़े कर दिए हैं जो एक तरफ अमेरिकी कर्मचारियों की छंटनी कर रही हैं और दूसरी तरफ विदेशी कर्मचारियों को H-1B वीजा पर स्पॉन्सर कर रही हैं. इस नीति का मुख्य उद्देश्य विदेशी कार्यबल द्वारा घरेलू अमेरिकी कर्मचारियों के विस्थापन को रोकना है. आइए समझते हैं कि इस निर्णय से भारतीय आईटी पेशेवरों और टेक वर्कर्स पर सबसे ज़्यादा असर क्यों पड़ने वाला है. नई नीति में क्या बड़े बदलाव हुए हैं? कड़ी जांच और स्क्रूटनी: होमलैंड सिक्योरिटी, श्रम और स्टेट डिपार्टमेंट जैसी फेडरल एजेंसियों को अब यह अनिवार्य रूप से जांच करानी होगी कि क्या स्पॉन्सर करने वाली कंपनी ने पिछले 12 महीनों के भीतर उसी पद या भूमिका वाले अमेरिकी कर्मचारियों को नौकरी से निकाला है या भविष्य में ऐसी छंटनी की कोई योजना है. प्रशासन का कड़ा रुख: अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इस बात पर जोर दिया है कि कंपनियां एक तरफ हजारों अमेरिकी नौकरियों में कटौती कर दूसरी तरफ कर्मचारियों की भारी कमी होने का दावा नहीं कर सकती. आउटसोर्सिंग पर रोक: अमेरिकी प्रशासन का स्पष्ट मकसद कंपनियों को H-1B प्रोग्राम का इस्तेमाल केवल असली "हाई-स्किल टैलेंट" की कमी पूरा करने के लिए करने देना है, न कि इसे सस्ते आउटसोर्सिंग के ज़रिए के रूप में इस्तेमाल करने देना. भारतीय प्रोफेशनल्स पर क्यों पड़ेगा सबसे बुरा असर? वीजा आवंटन में बड़ा हिस्सा: कुल स्वीकृत H-1B वीज़ा में 70% से अधिक हिस्सेदारी भारतीय नागरिकों की होती है. इसके अलावा, टेक और स्पेशलाइज़्ड सेक्टर में भारतीय कर्मचारियों की संख्या सबसे अधिक है. कॉर्पोरेट स्पॉन्सरशिप में कमी: छंटनी के बाद लेबर कंडीशन एप्लीकेशन (LCA) दाखिल करते समय कंपनियों को अब बेहद कड़े अनुपालन और संभावित ऑडिट का सामना करना पड़ेगा, जिससे कंपनियाँ विदेशी कर्मचारियों को स्पॉन्सर करने से बच सकती हैं. 60 दिनों का तनावपूर्ण समय: हालांकि यह कार्यकारी आदेश पहले से मौजूद व्यक्तिगत वीजा धारकों को सीधे दंडित नहीं करता, बल्कि कंपनियों के कम्प्लायंस पर ध्यान देता है; फिर भी, टेक सेक्टर में जारी छंटनी के बीच नौकरी गंवाने वाले भारतीय पेशेवरों के लिए 60 दिनों के भीतर नया स्पॉन्सर ढूंढना या देश छोड़ना एक बड़ी चुनौती बन गया है. पिछले छह महीनों में लागू हुए अन्य कड़े नियम पिछले छह महीनों के दौरान अमेरिकी सरकार ने कई ऐसे नीतिगत बदलाव और पाबंदियां लागू की हैं, जिनका सीधा असर भारतीय टेक कार्यबल पर पड़ रहा है. $100,000 की पेमेंट शर्त का विस्तार: अमेरिका के बाहर से नियुक्त होने वाले कुछ नए H-1B कर्मचारियों के लिए $100,000 की पेमेंट शर्त वाली पाबंदी को एक और साल के लिए 21 सितंबर 2027 तक बढ़ा दिया गया है. इससे भारत से सीधे कर्मचारियों की हायरिंग काफी महंगी हो जाएगी. 60 दिन का ग्रेस पीरियड खत्म करने का प्रस्ताव: सितंबर 2026 में डिपार्टमेन्ट ऑफ़ होमलैंड सिक्योरिटी (DHS) ने एक बड़ा प्रस्ताव पेश किया है, जिसके तहत H-1B, L-1 और O-1 वीज़ा धारकों के लिए नौकरी छूटने के बाद मिलने वाले 60 दिन के ग्रेस पीरियड को समाप्त करने की योजना है. यदि यह नियम लागू होता है, तो नौकरी गंवाने वाले कर्मचारियों को नया स्पॉन्सर खोजने का समय मिलने के बजाय तुरंत अमेरिका छोड़ना होगा. IT कंसल्टिंग फर्मों पर धोखाधड़ी की जांच: अमेरिकी श्रम विभाग (DOL) ने डलास जैसे प्रमुख टेक हब्स में सर्च वारंट और फील्ड चेक के ज़रिए व्यापक जांच शुरू की है. इसमें फ़र्जी आवेदनों, वेतन में हेराफेरी और गलत भर्ती तरीकों पर शिकंजा कसा जा रहा है. वेतन-स्तर के आधार पर लॉटरी सिस्टम: प्रशासन अब H-1B लॉटरी प्रणाली को लॉटरी के बजाय वेतन-स्तर के आधार पर प्राथमिकता देने पर काम कर रहा है. इससे कम वेतन वाली एंट्री-लेवल नौकरियों की तुलना में उच्च वेतन वाले पदों को वरीयता मिलेगी. सख्त 'पब्लिक चार्ज' नियम: सितंबर 2026 से USCIS ने सार्वजनिक वित्तीय बोझ के आधार पर अयोग्यता तय करने के कड़े नियम लागू किए हैं. अब अधिकांश ग्रीन कार्ड आवेदकों को यह साबित करना होगा कि वे पूरी तरह से आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हैं और सरकारी वित्तीय सहायता पर निर्भर नहीं रहेंगे. सोशल मीडिया प्रोफाइल की अनिवार्य जांच: 1 अक्टूबर 2026 से लागू होने वाले नियम के तहत, I वीज़ा के लिए आवेदन करने वाले भारतीय मीडिया पेशेवरों और TN/TD वीज़ा आवेदकों को वीज़ा स्क्रूटनी के दौरान अपने सभी सोशल मीडिया प्रोफ़ाइल सार्वजनिक (Public) रखने होंगे.

Sep 29, 2026 - 11:30
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Explained: अमेरिका में भारतीय पेशेवरों को बड़ा झटका, हजारों कर्मचारियों पर पड़ेगा बुरा असर? जानिए क्या हुआ

18 सितंबर 2026 को हस्ताक्षर किए गए एक नए एग्जीक्यूटिव ऑर्डर के तहत अमेरिकी सरकार ने उन कंपनियों पर नियम कड़े कर दिए हैं जो एक तरफ अमेरिकी कर्मचारियों की छंटनी कर रही हैं और दूसरी तरफ विदेशी कर्मचारियों को H-1B वीजा पर स्पॉन्सर कर रही हैं. इस नीति का मुख्य उद्देश्य विदेशी कार्यबल द्वारा घरेलू अमेरिकी कर्मचारियों के विस्थापन को रोकना है.

आइए समझते हैं कि इस निर्णय से भारतीय आईटी पेशेवरों और टेक वर्कर्स पर सबसे ज़्यादा असर क्यों पड़ने वाला है.

नई नीति में क्या बड़े बदलाव हुए हैं?

कड़ी जांच और स्क्रूटनी: होमलैंड सिक्योरिटी, श्रम और स्टेट डिपार्टमेंट जैसी फेडरल एजेंसियों को अब यह अनिवार्य रूप से जांच करानी होगी कि क्या स्पॉन्सर करने वाली कंपनी ने पिछले 12 महीनों के भीतर उसी पद या भूमिका वाले अमेरिकी कर्मचारियों को नौकरी से निकाला है या भविष्य में ऐसी छंटनी की कोई योजना है.

प्रशासन का कड़ा रुख: अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इस बात पर जोर दिया है कि कंपनियां एक तरफ हजारों अमेरिकी नौकरियों में कटौती कर दूसरी तरफ कर्मचारियों की भारी कमी होने का दावा नहीं कर सकती.

आउटसोर्सिंग पर रोक: अमेरिकी प्रशासन का स्पष्ट मकसद कंपनियों को H-1B प्रोग्राम का इस्तेमाल केवल असली "हाई-स्किल टैलेंट" की कमी पूरा करने के लिए करने देना है, न कि इसे सस्ते आउटसोर्सिंग के ज़रिए के रूप में इस्तेमाल करने देना.

भारतीय प्रोफेशनल्स पर क्यों पड़ेगा सबसे बुरा असर?

वीजा आवंटन में बड़ा हिस्सा: कुल स्वीकृत H-1B वीज़ा में 70% से अधिक हिस्सेदारी भारतीय नागरिकों की होती है. इसके अलावा, टेक और स्पेशलाइज़्ड सेक्टर में भारतीय कर्मचारियों की संख्या सबसे अधिक है.

कॉर्पोरेट स्पॉन्सरशिप में कमी: छंटनी के बाद लेबर कंडीशन एप्लीकेशन (LCA) दाखिल करते समय कंपनियों को अब बेहद कड़े अनुपालन और संभावित ऑडिट का सामना करना पड़ेगा, जिससे कंपनियाँ विदेशी कर्मचारियों को स्पॉन्सर करने से बच सकती हैं.

60 दिनों का तनावपूर्ण समय: हालांकि यह कार्यकारी आदेश पहले से मौजूद व्यक्तिगत वीजा धारकों को सीधे दंडित नहीं करता, बल्कि कंपनियों के कम्प्लायंस पर ध्यान देता है; फिर भी, टेक सेक्टर में जारी छंटनी के बीच नौकरी गंवाने वाले भारतीय पेशेवरों के लिए 60 दिनों के भीतर नया स्पॉन्सर ढूंढना या देश छोड़ना एक बड़ी चुनौती बन गया है.

पिछले छह महीनों में लागू हुए अन्य कड़े नियम

पिछले छह महीनों के दौरान अमेरिकी सरकार ने कई ऐसे नीतिगत बदलाव और पाबंदियां लागू की हैं, जिनका सीधा असर भारतीय टेक कार्यबल पर पड़ रहा है.

$100,000 की पेमेंट शर्त का विस्तार: अमेरिका के बाहर से नियुक्त होने वाले कुछ नए H-1B कर्मचारियों के लिए $100,000 की पेमेंट शर्त वाली पाबंदी को एक और साल के लिए 21 सितंबर 2027 तक बढ़ा दिया गया है. इससे भारत से सीधे कर्मचारियों की हायरिंग काफी महंगी हो जाएगी.

60 दिन का ग्रेस पीरियड खत्म करने का प्रस्ताव: सितंबर 2026 में डिपार्टमेन्ट ऑफ़ होमलैंड सिक्योरिटी (DHS) ने एक बड़ा प्रस्ताव पेश किया है, जिसके तहत H-1B, L-1 और O-1 वीज़ा धारकों के लिए नौकरी छूटने के बाद मिलने वाले 60 दिन के ग्रेस पीरियड को समाप्त करने की योजना है. यदि यह नियम लागू होता है, तो नौकरी गंवाने वाले कर्मचारियों को नया स्पॉन्सर खोजने का समय मिलने के बजाय तुरंत अमेरिका छोड़ना होगा.

IT कंसल्टिंग फर्मों पर धोखाधड़ी की जांच: अमेरिकी श्रम विभाग (DOL) ने डलास जैसे प्रमुख टेक हब्स में सर्च वारंट और फील्ड चेक के ज़रिए व्यापक जांच शुरू की है. इसमें फ़र्जी आवेदनों, वेतन में हेराफेरी और गलत भर्ती तरीकों पर शिकंजा कसा जा रहा है.

वेतन-स्तर के आधार पर लॉटरी सिस्टम: प्रशासन अब H-1B लॉटरी प्रणाली को लॉटरी के बजाय वेतन-स्तर के आधार पर प्राथमिकता देने पर काम कर रहा है. इससे कम वेतन वाली एंट्री-लेवल नौकरियों की तुलना में उच्च वेतन वाले पदों को वरीयता मिलेगी.

सख्त 'पब्लिक चार्ज' नियम: सितंबर 2026 से USCIS ने सार्वजनिक वित्तीय बोझ के आधार पर अयोग्यता तय करने के कड़े नियम लागू किए हैं. अब अधिकांश ग्रीन कार्ड आवेदकों को यह साबित करना होगा कि वे पूरी तरह से आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हैं और सरकारी वित्तीय सहायता पर निर्भर नहीं रहेंगे.

सोशल मीडिया प्रोफाइल की अनिवार्य जांच: 1 अक्टूबर 2026 से लागू होने वाले नियम के तहत, I वीज़ा के लिए आवेदन करने वाले भारतीय मीडिया पेशेवरों और TN/TD वीज़ा आवेदकों को वीज़ा स्क्रूटनी के दौरान अपने सभी सोशल मीडिया प्रोफ़ाइल सार्वजनिक (Public) रखने होंगे.

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