CJI salary India: सुप्रीम कोर्ट के जज को कितनी मिलती है सैलरी, आजादी के वक्त कितनी थी पगार?

CJI salary India: भारत में जजों की कुल स्वीकृत संख्या 25,000 से ज्यादा है, जबकि अलग-अलग राज्य बार काउंसिल में 20 लाख से अधिक वकील पंजीकृत हैं. ऐसे में हर  एडवोकेट का एक ही सपना होता है कि वे जज बने. साथ ही देश की सबसे बड़ी अदालत यानी Supreme Court of India के जजों की सैलरी हमेशा लोगों के बीच चर्चा का विषय रहती है. ऐसे में चलिए आपको बताते हैं कि एक सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीश को कितनी सैलरी मिलती है.और आजादी के वक्त यह कितनी थी.  सुप्रीम कोर्ट के जजों को अब कितनी मिलती है सैलरी? देश के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को कानून मंत्रालय की ओर से सैलरी प्रदान की जाती है. वर्तमान  के समय में भारत के चीफ जस्टिस यानी CJI को हर महीने करीब 2.80 लाख रुपये सैलरी मिलती है, जबकि सुप्रीम कोर्ट के बाकी जजों की तनख्वाह लगभग 2.50 लाख रुपये महीना है. इसके अलावा उन्हें रहने के लिए सरकार की ओर से एक आवास प्रदान किया जाता है. साथ ही सीजेआई को कार, सुरक्षाकर्मी, कर्माचारी और उनके आवास का बिजली का खर्च सहित कई सुविधाएं सरकार की ओर से दी जाती है. इन  सब के अलावा मुख्य न्यायाधीश को 45 हजार रुपये का सत्कार भत्ता भी दिया जाता है. वही जब सीजेआई रिटायर होते हैं तो उन्हें 16.80 लाख रुपये की सालाना पेंशन भी दी जाती है. यही वजह है कि देश में जज की नौकरी को सबसे सम्मानित और सुरक्षित सरकारी पदों में गिना जाता है. कई युवा जो कानून की पढ़ाई कर रहे हैं, उनके लिए यह नौकरी आज भी एक बड़ा सपना बनी हुई है. यह भी पढ़ेंः UGC Net 2026 : बंद होने वाली है UGC Net 2026 की रजिस्ट्रेशन विंडो, फटाफट करें अप्लाई आजादी के वक्त कितनी थी जजों की पगार? आजादी के बाद जब देश ने अपना संविधान अपनाया और 26 जनवरी 1950 को सुप्रीम कोर्ट की स्थापना हुई, तब न्याय के एक नए दौर की शुरुआत हुई. इसी ऐतिहासिक दिन भारत को मिले उसके पहले मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एच जे कनिया. 1915 में उन्होंने बॉम्बे हाई कोर्ट में वकालत शुरू की.  अपनी मेहनत और कानून की समझ से वे जल्दी ही प्रसिद्ध हो गए. 1930 में वे एक्टिंग जज बने, 1931 में एडिशनल जज और 1933 में स्थायी जज के रुप में नियुक्त हुए. साथ ही 1944-45 में वे एक्टिंग चीफ जस्टिस भी रहे. 1950 में जब सुप्रीम कोर्ट बना, तब पहले CJI की सैलरी 5,000 रुपये प्रति माह तय हुई.  उस समय यह अच्छी रकम मानी जाती थी, लेकिन यह पद की सादगी को भी दिखाती थी. साथ ही  जस्टिस कानिया अपने शांत स्वभाव, सादगी और न्यायप्रियता के लिए प्रसिद्ध थे.  क्यों बढ़ती रहती है जजों की सैलरी और यह जरूरी क्यों? कानूनी जानकारों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के जजों पर देश के सबसे बड़े फैसलों की जिम्मेदारी होती है. संविधान की रक्षा से लेकर बड़े राजनीतिक और सामाजिक मामलों तक, हर अहम फैसला इन्हीं के हाथ में होता है.  इसी वजह से सरकार समय-समय पर उनकी सैलरी और सुविधाओं में बदलाव करती रहती है.  साल 2018 में जजों की सैलरी में बड़ा इजाफा किया गया था और उसके बाद से यह चर्चा लगातार बनी रहती है.  यही कारण है कि जजों की सैलरी सिर्फ तनख्वाह नहीं, बल्कि देश की न्याय व्यवस्था की मजबूती से भी जुड़ी मानी जाती है.  यह भी पढ़ेंः कॉपी चेकिंग विवाद के बीच CBSE का बड़ा फैसला, आंसरशीट देखने की फीस 700 से घटाकर 100 रुपये की

May 19, 2026 - 17:30
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CJI salary India:  सुप्रीम कोर्ट के जज को कितनी मिलती है सैलरी, आजादी के वक्त कितनी थी पगार?

CJI salary India: भारत में जजों की कुल स्वीकृत संख्या 25,000 से ज्यादा है, जबकि अलग-अलग राज्य बार काउंसिल में 20 लाख से अधिक वकील पंजीकृत हैं. ऐसे में हर  एडवोकेट का एक ही सपना होता है कि वे जज बने. साथ ही देश की सबसे बड़ी अदालत यानी Supreme Court of India के जजों की सैलरी हमेशा लोगों के बीच चर्चा का विषय रहती है. ऐसे में चलिए आपको बताते हैं कि एक सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीश को कितनी सैलरी मिलती है.और आजादी के वक्त यह कितनी थी. 

सुप्रीम कोर्ट के जजों को अब कितनी मिलती है सैलरी?

देश के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को कानून मंत्रालय की ओर से सैलरी प्रदान की जाती है. वर्तमान  के समय में भारत के चीफ जस्टिस यानी CJI को हर महीने करीब 2.80 लाख रुपये सैलरी मिलती है, जबकि सुप्रीम कोर्ट के बाकी जजों की तनख्वाह लगभग 2.50 लाख रुपये महीना है. इसके अलावा उन्हें रहने के लिए सरकार की ओर से एक आवास प्रदान किया जाता है. साथ ही सीजेआई को कार, सुरक्षाकर्मी, कर्माचारी और उनके आवास का बिजली का खर्च सहित कई सुविधाएं सरकार की ओर से दी जाती है.

इन  सब के अलावा मुख्य न्यायाधीश को 45 हजार रुपये का सत्कार भत्ता भी दिया जाता है. वही जब सीजेआई रिटायर होते हैं तो उन्हें 16.80 लाख रुपये की सालाना पेंशन भी दी जाती है. यही वजह है कि देश में जज की नौकरी को सबसे सम्मानित और सुरक्षित सरकारी पदों में गिना जाता है. कई युवा जो कानून की पढ़ाई कर रहे हैं, उनके लिए यह नौकरी आज भी एक बड़ा सपना बनी हुई है.

यह भी पढ़ेंः UGC Net 2026 : बंद होने वाली है UGC Net 2026 की रजिस्ट्रेशन विंडो, फटाफट करें अप्लाई

आजादी के वक्त कितनी थी जजों की पगार?

आजादी के बाद जब देश ने अपना संविधान अपनाया और 26 जनवरी 1950 को सुप्रीम कोर्ट की स्थापना हुई, तब न्याय के एक नए दौर की शुरुआत हुई. इसी ऐतिहासिक दिन भारत को मिले उसके पहले मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एच जे कनिया. 1915 में उन्होंने बॉम्बे हाई कोर्ट में वकालत शुरू की.  अपनी मेहनत और कानून की समझ से वे जल्दी ही प्रसिद्ध हो गए. 1930 में वे एक्टिंग जज बने, 1931 में एडिशनल जज और 1933 में स्थायी जज के रुप में नियुक्त हुए. साथ ही 1944-45 में वे एक्टिंग चीफ जस्टिस भी रहे.

1950 में जब सुप्रीम कोर्ट बना, तब पहले CJI की सैलरी 5,000 रुपये प्रति माह तय हुई.  उस समय यह अच्छी रकम मानी जाती थी, लेकिन यह पद की सादगी को भी दिखाती थी. साथ ही  जस्टिस कानिया अपने शांत स्वभाव, सादगी और न्यायप्रियता के लिए प्रसिद्ध थे. 

क्यों बढ़ती रहती है जजों की सैलरी और यह जरूरी क्यों?

कानूनी जानकारों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के जजों पर देश के सबसे बड़े फैसलों की जिम्मेदारी होती है. संविधान की रक्षा से लेकर बड़े राजनीतिक और सामाजिक मामलों तक, हर अहम फैसला इन्हीं के हाथ में होता है.  इसी वजह से सरकार समय-समय पर उनकी सैलरी और सुविधाओं में बदलाव करती रहती है.  साल 2018 में जजों की सैलरी में बड़ा इजाफा किया गया था और उसके बाद से यह चर्चा लगातार बनी रहती है.  यही कारण है कि जजों की सैलरी सिर्फ तनख्वाह नहीं, बल्कि देश की न्याय व्यवस्था की मजबूती से भी जुड़ी मानी जाती है. 

यह भी पढ़ेंः कॉपी चेकिंग विवाद के बीच CBSE का बड़ा फैसला, आंसरशीट देखने की फीस 700 से घटाकर 100 रुपये की

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