AMU के तीन PhD छात्रों का कमाल, नोबेल विजेता की रिसर्च टीम का बने हिस्सा
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के तीन पीएचडी रिसर्चर्स ने यूनिवर्सिटी के साथ-साथ भारतीय वैज्ञानिक समुदाय का भी नाम रोशन किया है. भौतिक विज्ञान के रिसर्चर्स अनुज कुमार उपाध्याय, गोपाल गर्ग और कृष्णमूर्ति जयकुमार प्रतिष्ठित आइस क्यूब कोलैबोरेशन का हिस्सा है. इस सहयोग परियोजना के प्रमुख प्रो. फ्रांसिस हाल्जेन को 2026 के भौतिकी के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया. ऐसे में एएमयू के न्यूट्रिनो भौतिक से जुड़े रिसर्च को भी खास पहचान मिली है. आइस क्यूब न्यूट्रिनो पर रिसर्च करने वाला एक बड़ा इंटरनेशनल प्रोजेक्ट है. इसकी शुरुआत प्रो. फ्रांसिस हाल्जेन के उस आइडिया से हुई, जिसमें उन्होंने दक्षिणी ध्रुव के नीचे मौजूद बर्फ का न्यूट्रिनो का पता लगाने के लिए इस्तेमाल करने की बात सोची थी. इसी सोच से अंटार्कटिका के भौगोलिक दक्षिणी ध्रुव पर बर्फ के काफी नीचे आइस क्यूब न्यूट्रिनो ऑब्जर्वेटरी बनाई गई. यहां हाई-एनर्जी न्यूट्रिनो का पता लगाने और उनका रिसर्च करने का काम करती है. इसके निर्माण की शुरुआत करीब 17 साल पहले हुई और यह एक दशक से ज्यादा समय से डेटा जमा कर रही है. नोबेल विजेता प्रो. फ्रांस‍िस हाल्‍जेन ने क्‍या क‍िया? प्रोफेसर फ्रांसिस हाल्जेन के काम ने न्यूट्रिनो के जरिए अंतरिक्ष को समझने की एक नई दिशा खोली. उन्होंने यह विचार दिया कि अंटार्कटिका की विशाल बर्फ को ही न्यूट्रिनो डिटेक्टर की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है. न्यूट्रिनो बहुत छोटे कान होते हैं और इन्हें सीधे पकड़ना आसान नहीं होता. आइस क्यूब में बर्फ की गहराई का इस्तेमाल इन कणों से जुड़े सिग्नल को रिकॉर्ड करने के लिए किया जाता है. इसके जरिए वैज्ञानिक दूर की आकाशगंगाओं से आने वाले हाई एनर्जी न्यूट्रिनो का पर रिसर्च कर रहे हैं. दूसरी आकाशगंगाओं से आने वाले न्यूट्रिनों पर रिसर्च आइस क्यूब के डेटा के जरिए वैज्ञानिक हमारी आकाशगंगा के बाहर से आने वाले हाई-एनर्जी न्यूट्रिनो के फ्लो पर रिसर्च कर पाए हैं. अब रिसर्च का बड़ा हिस्सा यह पता लगाने पर है कि ये न्यूट्रिनो आखिर कहां से आते हैं. रिसर्च में इनके कुछ संभावित सोर्स सक्रिय आकाशगंगा में मौजूद बहुत बड़े ब्लैक होल के आसपास के घने इलाकों की तरफ इशारा करते हैं. इन्हें हाई-एनर्जी कणों के संभावित सोर्स के तौर पर देखा जा रहा है. ये भी पढ़ें-नीट पीजी काउंसलिंग की तारीखें घोषित,12 अक्टूबर से होगा रजिस्ट्रेशन AMU के तीन PhD छात्र भी इस रिसर्च का हिस्सा यह रिसर्च इसलिए भी खास है, क्योंकि एएमयू के अनुज कुमार उपाध्याय, गोपाल गर्ग और कृष्णमूर्ति जयकुमार इसी आइस क्यूब कोलैबोरेशन के सदस्य हैं. तीनों भौतिकी विभाग में न्यूट्रिनो फिजिक्स से जुड़े रिसर्च कर रहे हैं. इनका रिसर्च काम एएमयू के भौतिक विभाग के अध्यक्ष और न्यूट्रिनो फिजिक्स एक्सपर्ट प्रो. मोहम्मद सज्जाद अथर के मार्गदर्शन में चल रहा है. प्रोफेसर अथर ने तीनों रिसर्चर को प्रो. हाल्जेन को नोबेल मिलने पर बधाई दी. उन्होंने कहा कि यह सम्मान एएमयू के न्यूट्रिनो फिजिक्स प्रोग्राम के लिए खास महत्व रखता है. इससे आधुनिक पार्टिकल फिजिक्स के अहम क्षेत्र में एएमयू की लगातार हो रही रिसर्च भी सामने आती है. AMU का रिसर्च प्रोग्राम नोबल से कैसे जुड़ा एएमयू के तीन छात्रों का नाम सीधे उस कोलैबोरेशन से जुड़ा है, जिसकी अगुवाई करने वाले प्रो. फ्रांसिस हाल्जेन को इस साल भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला. इसलिए यह उपलब्धि सिर्फ नोबेल विजेता वैज्ञानिक की नहीं, बल्कि उस पूरी रिसर्च टीम से जुड़े वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के लिए भी खास है. आइस क्यूब के जरिए न्यूट्रिनो का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों को अंतरिक्ष में होने वाली हाई-एनर्जी घटनाओं को समझने में मदद मिल रही है. एएमयू के तीनों पीएचडी छात्र भी इसी काम का हिस्सा है. ये भी पढ़ें-SSC CHSL 2025 का फाइनल रिजल्ट जारी, जानें पोस्ट वाइज कट ऑफ
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के तीन पीएचडी रिसर्चर्स ने यूनिवर्सिटी के साथ-साथ भारतीय वैज्ञानिक समुदाय का भी नाम रोशन किया है. भौतिक विज्ञान के रिसर्चर्स अनुज कुमार उपाध्याय, गोपाल गर्ग और कृष्णमूर्ति जयकुमार प्रतिष्ठित आइस क्यूब कोलैबोरेशन का हिस्सा है. इस सहयोग परियोजना के प्रमुख प्रो. फ्रांसिस हाल्जेन को 2026 के भौतिकी के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया. ऐसे में एएमयू के न्यूट्रिनो भौतिक से जुड़े रिसर्च को भी खास पहचान मिली है.
आइस क्यूब न्यूट्रिनो पर रिसर्च करने वाला एक बड़ा इंटरनेशनल प्रोजेक्ट है. इसकी शुरुआत प्रो. फ्रांसिस हाल्जेन के उस आइडिया से हुई, जिसमें उन्होंने दक्षिणी ध्रुव के नीचे मौजूद बर्फ का न्यूट्रिनो का पता लगाने के लिए इस्तेमाल करने की बात सोची थी. इसी सोच से अंटार्कटिका के भौगोलिक दक्षिणी ध्रुव पर बर्फ के काफी नीचे आइस क्यूब न्यूट्रिनो ऑब्जर्वेटरी बनाई गई. यहां हाई-एनर्जी न्यूट्रिनो का पता लगाने और उनका रिसर्च करने का काम करती है. इसके निर्माण की शुरुआत करीब 17 साल पहले हुई और यह एक दशक से ज्यादा समय से डेटा जमा कर रही है.
नोबेल विजेता प्रो. फ्रांसिस हाल्जेन ने क्या किया?
प्रोफेसर फ्रांसिस हाल्जेन के काम ने न्यूट्रिनो के जरिए अंतरिक्ष को समझने की एक नई दिशा खोली. उन्होंने यह विचार दिया कि अंटार्कटिका की विशाल बर्फ को ही न्यूट्रिनो डिटेक्टर की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है. न्यूट्रिनो बहुत छोटे कान होते हैं और इन्हें सीधे पकड़ना आसान नहीं होता. आइस क्यूब में बर्फ की गहराई का इस्तेमाल इन कणों से जुड़े सिग्नल को रिकॉर्ड करने के लिए किया जाता है. इसके जरिए वैज्ञानिक दूर की आकाशगंगाओं से आने वाले हाई एनर्जी न्यूट्रिनो का पर रिसर्च कर रहे हैं.
दूसरी आकाशगंगाओं से आने वाले न्यूट्रिनों पर रिसर्च
आइस क्यूब के डेटा के जरिए वैज्ञानिक हमारी आकाशगंगा के बाहर से आने वाले हाई-एनर्जी न्यूट्रिनो के फ्लो पर रिसर्च कर पाए हैं. अब रिसर्च का बड़ा हिस्सा यह पता लगाने पर है कि ये न्यूट्रिनो आखिर कहां से आते हैं. रिसर्च में इनके कुछ संभावित सोर्स सक्रिय आकाशगंगा में मौजूद बहुत बड़े ब्लैक होल के आसपास के घने इलाकों की तरफ इशारा करते हैं. इन्हें हाई-एनर्जी कणों के संभावित सोर्स के तौर पर देखा जा रहा है.
ये भी पढ़ें-नीट पीजी काउंसलिंग की तारीखें घोषित,12 अक्टूबर से होगा रजिस्ट्रेशन
AMU के तीन PhD छात्र भी इस रिसर्च का हिस्सा
यह रिसर्च इसलिए भी खास है, क्योंकि एएमयू के अनुज कुमार उपाध्याय, गोपाल गर्ग और कृष्णमूर्ति जयकुमार इसी आइस क्यूब कोलैबोरेशन के सदस्य हैं. तीनों भौतिकी विभाग में न्यूट्रिनो फिजिक्स से जुड़े रिसर्च कर रहे हैं. इनका रिसर्च काम एएमयू के भौतिक विभाग के अध्यक्ष और न्यूट्रिनो फिजिक्स एक्सपर्ट प्रो. मोहम्मद सज्जाद अथर के मार्गदर्शन में चल रहा है. प्रोफेसर अथर ने तीनों रिसर्चर को प्रो. हाल्जेन को नोबेल मिलने पर बधाई दी. उन्होंने कहा कि यह सम्मान एएमयू के न्यूट्रिनो फिजिक्स प्रोग्राम के लिए खास महत्व रखता है. इससे आधुनिक पार्टिकल फिजिक्स के अहम क्षेत्र में एएमयू की लगातार हो रही रिसर्च भी सामने आती है.
AMU का रिसर्च प्रोग्राम नोबल से कैसे जुड़ा
एएमयू के तीन छात्रों का नाम सीधे उस कोलैबोरेशन से जुड़ा है, जिसकी अगुवाई करने वाले प्रो. फ्रांसिस हाल्जेन को इस साल भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला. इसलिए यह उपलब्धि सिर्फ नोबेल विजेता वैज्ञानिक की नहीं, बल्कि उस पूरी रिसर्च टीम से जुड़े वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के लिए भी खास है. आइस क्यूब के जरिए न्यूट्रिनो का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों को अंतरिक्ष में होने वाली हाई-एनर्जी घटनाओं को समझने में मदद मिल रही है. एएमयू के तीनों पीएचडी छात्र भी इसी काम का हिस्सा है.
ये भी पढ़ें-SSC CHSL 2025 का फाइनल रिजल्ट जारी, जानें पोस्ट वाइज कट ऑफ
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