33 साल पहले आज ही के दिन राजीव गांधी को देना पड़ा था इस्तीफा, जानें क्या था पूरा मामला

साल 1989 में आज ही (29 नवंबर) के दिन उस वक्त भारतीय राजनीति में ऐतिहासिक मोड़ आ आया, जब देश के सबसे युवा प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था. उन्होंने बिना वोटों की गिनती के ही पद छोड़ने की घोषणा कर दी थी. राजीव गांधी ने अपनी हार को पूरी विनम्रता के साथ स्वीकार किया था.  1984 के चुनाव में 404 सीटों की ऐतिहासिक जीत के 5 साल बाद ही कांग्रेस को करारा झटका लगा. आजादी के बाद लगभग 40 साल तक कांग्रेस का भारतीय राजनीति पर दबदबा रहा. 1984 में अपनी मां इंदिरा गांधी की दुखद हत्या के बाद राजीव गांधी ने 415 सीटों के भारी बहुमत से सरकार बनाई. यह कांग्रेस की अब तक की सबसे बड़ी जीत थी. राजीव गांधी ने सत्ता छोड़ने का फैसला कियाउनकी सरकार केवल 5 साल बाद ही सरकारी भ्रष्टाचार के आरोपों से घिर गई थी. आम चुनावों में कांग्रेस पार्टी को करारा झटका लगा था. 544 सीटों वाली संसद में कांग्रेस पार्टी बहुमत से बहुत दूर सिर्फ 197 सीटों पर सिमट गई थी. हालांकि कांग्रेस सबसे बड़ी अकेली पार्टी बनकर उभरी थी, इसके बावजूद राजीव गांधी ने सत्ता पर दावा छोड़ने का फैसला किया. राष्ट्रपति को सौंपा इस्तीफाराजीव गांधी ने राष्ट्रपति रामास्वामी वेंकटरमण को अपना इस्तीफा सौंप दिया और अनुरोध किया कि जब तक नई सरकार नहीं बनती, तब तक उन्हें कार्यवाहक सरकार का नेतृत्व करने दिया जाए. कांग्रेस की इस करारी हार और राजीव गांधी के इस्तीफे के पीछे सबसे बड़ा कारण बोफोर्स घोटाला था. ये घोटाला स्वीडन की हथियार कंपनी एबी बोफोर्स से 155 एमएम की हॉवित्जर तोपों की खरीद से जुड़ा था. राजीव गांधी का भावुक भाषणइस रक्षा सौदे में बड़े पैमाने पर रिश्वतखोरी के आरोप लगे थे. कांग्रेस ने दक्षिणी राज्यों जैसे तमिलनाडु में अच्छा प्रदर्शन किया था लेकिन उत्तर और पश्चिम भारत के अधिक आबादी वाले क्षेत्रों में पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा. प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद राजीव गांधी ने टीवी पर एक भावुक भाषण दिया. उन्होंने अपने बयान में कहा कि मैं अपनी पूरी ताकत से भारत के लोगों की सेवा करता रहूंगा. राजीव गांधी ने कहा था कि चुनाव जीतने और हारने के बारे में होते हैं, लेकिन देश का काम कभी नहीं रुकता. उन्होंने नई बनने वाली सरकार को रचनात्मक सहयोग देने का वादा किया था. यह एक ऐसा भावनात्मक क्षण था, जिसने भारतीय राजनीति में एक नया शिष्टाचार स्थापित किया. ये भी पढ़ें ब्रेकफास्ट मीटिंग आज, सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार बैठेंगे आमने-सामने, क्या खत्म होगी रार?

Nov 29, 2025 - 15:30
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33 साल पहले आज ही के दिन राजीव गांधी को देना पड़ा था इस्तीफा, जानें क्या था पूरा मामला

साल 1989 में आज ही (29 नवंबर) के दिन उस वक्त भारतीय राजनीति में ऐतिहासिक मोड़ आ आया, जब देश के सबसे युवा प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था. उन्होंने बिना वोटों की गिनती के ही पद छोड़ने की घोषणा कर दी थी. राजीव गांधी ने अपनी हार को पूरी विनम्रता के साथ स्वीकार किया था. 

1984 के चुनाव में 404 सीटों की ऐतिहासिक जीत के 5 साल बाद ही कांग्रेस को करारा झटका लगा. आजादी के बाद लगभग 40 साल तक कांग्रेस का भारतीय राजनीति पर दबदबा रहा. 1984 में अपनी मां इंदिरा गांधी की दुखद हत्या के बाद राजीव गांधी ने 415 सीटों के भारी बहुमत से सरकार बनाई. यह कांग्रेस की अब तक की सबसे बड़ी जीत थी.

राजीव गांधी ने सत्ता छोड़ने का फैसला किया
उनकी सरकार केवल 5 साल बाद ही सरकारी भ्रष्टाचार के आरोपों से घिर गई थी. आम चुनावों में कांग्रेस पार्टी को करारा झटका लगा था. 544 सीटों वाली संसद में कांग्रेस पार्टी बहुमत से बहुत दूर सिर्फ 197 सीटों पर सिमट गई थी. हालांकि कांग्रेस सबसे बड़ी अकेली पार्टी बनकर उभरी थी, इसके बावजूद राजीव गांधी ने सत्ता पर दावा छोड़ने का फैसला किया.

राष्ट्रपति को सौंपा इस्तीफा
राजीव गांधी ने राष्ट्रपति रामास्वामी वेंकटरमण को अपना इस्तीफा सौंप दिया और अनुरोध किया कि जब तक नई सरकार नहीं बनती, तब तक उन्हें कार्यवाहक सरकार का नेतृत्व करने दिया जाए. कांग्रेस की इस करारी हार और राजीव गांधी के इस्तीफे के पीछे सबसे बड़ा कारण बोफोर्स घोटाला था. ये घोटाला स्वीडन की हथियार कंपनी एबी बोफोर्स से 155 एमएम की हॉवित्जर तोपों की खरीद से जुड़ा था.

राजीव गांधी का भावुक भाषण
इस रक्षा सौदे में बड़े पैमाने पर रिश्वतखोरी के आरोप लगे थे. कांग्रेस ने दक्षिणी राज्यों जैसे तमिलनाडु में अच्छा प्रदर्शन किया था लेकिन उत्तर और पश्चिम भारत के अधिक आबादी वाले क्षेत्रों में पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा. प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद राजीव गांधी ने टीवी पर एक भावुक भाषण दिया. उन्होंने अपने बयान में कहा कि मैं अपनी पूरी ताकत से भारत के लोगों की सेवा करता रहूंगा.

राजीव गांधी ने कहा था कि चुनाव जीतने और हारने के बारे में होते हैं, लेकिन देश का काम कभी नहीं रुकता. उन्होंने नई बनने वाली सरकार को रचनात्मक सहयोग देने का वादा किया था. यह एक ऐसा भावनात्मक क्षण था, जिसने भारतीय राजनीति में एक नया शिष्टाचार स्थापित किया.

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