हवा में घुले PM2.5 बढ़ा सकते हैं अस्पताल जाने का खतरा, 21 दिन तक असर

हवा में प्रदूषण बढ़ने पर अक्सर लोगों को आंखों में जलन, खांसी और सांस लेने में परेशानी होने लगती है, लेकिन हवा में मौजूद बारीक प्रदूषित कणों का असर इससे कहीं ज्यादा होता है. एक स्टडी में पाया गया कि PM2.5 के बढ़े स्तर का संबंध कई तरह की बीमारियों के कारण अस्पताल में भर्ती होने के जोखिम से भी है.  इससे साफ होता है कि खराब हवा को केवल कुछ दिनों की परेशानी समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. लाखों नहीं, करोड़ों रिकॉर्ड के आधार पर हुआ विश्लेषण शोधकर्ताओं ने छह देशों और क्षेत्रों के अस्पतालों में भर्ती होने से जुड़े करीब 34.65 करोड़ रिकॉर्ड का अध्ययन किया. इसमें ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, कनाडा, चिली, न्यूजीलैंड और ताइवान के वर्ष 2000 से 2019 तक के आंकड़े शामिल थे. विश्लेषण में PM2.5 के स्तर और अस्पताल में भर्ती होने के मामलों के बीच संबंध देखा गया. अध्ययन के अनुसार, हवा में PM2.5 की मात्रा हर 10 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर बढ़ने पर अगले 21 दिनों में किसी भी कारण से अस्पताल में भर्ती होने का जोखिम औसतन 8 प्रतिशत अधिक पाया गया. यह भी पढ़ें : Epilepsy Symptoms: मिर्गी के साथ कैसे जिएं सामान्य जिंदगी? एक्सपर्ट से जानें सच अलग-अलग बीमारियों में भी दिखा संबंध अध्ययन में केवल सांस से जुड़ी बीमारियों पर ध्यान नहीं दिया गया, बल्कि दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं को भी शामिल किया गया. कैंसर से संबंधित अस्पताल भर्ती के जोखिम में 10.8 प्रतिशत, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी स्थितियों में 10 प्रतिशत और तंत्रिका तंत्र की बीमारियों में 8.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी का संबंध दर्ज किया गया. सांस संबंधी बीमारियों के मामलों में यह आंकड़ा 6.7 प्रतिशत था. ये प्रदूषण के स्तर और अस्पताल में भर्ती होने के जोखिम के बीच मिले सांख्यिकीय संबंध को दर्शाते हैं.  PM2.5 को खतरनाक क्यों माना जाता है? PM2.5 हवा में मौजूद बेहद छोटे कण होते हैं, जिनका आकार 2.5 माइक्रोमीटर या उससे कम होता है. अपने छोटे आकार के कारण ये सांस के साथ फेफड़ों के भीतर तक पहुंचते हैं. इनके संपर्क से शरीर में सूजन और दूसरी जैविक प्रतिक्रियाएं होने की आशंका रहती है. प्रदूषण का असर हर व्यक्ति पर एक जैसा नहीं होता. पहले से हृदय, फेफड़ों या दूसरी गंभीर बीमारियों से जूझ रहे लोगों को खराब हवा के दौरान ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए. प्रदूषण के दिनों में क्या सावधानी रखें? हवा की गुणवत्ता खराब होने पर बाहर की गतिविधियों को सीमित करना और स्थानीय वायु गुणवत्ता सूचकांक  AQI पर नजर रखना मददगार होता है. जरूरत पड़ने पर अच्छी गुणवत्ता वाला, सही फिटिंग का N95 मास्क इस्तेमाल किया जा सकता है. अस्थमा या दूसरी पुरानी बीमारी वाले लोग अपनी दवाएं और डॉक्टर की सलाह का पालन करें. अगर सांस लेने में अचानक परेशानी, सीने में दर्द या गंभीर लक्षण दिखाई दे तो तुरंत चिकित्सा सहायता लें. अध्ययन छह देशों और क्षेत्रों के आंकड़ों पर आधारित था, इसलिए इसके नतीजों को भारत की आबादी पर बिल्कुल उसी तरह लागू नहीं किया जा सकता. यह भी पढ़ें : कितनी आवाज सह सकते हैं हमारे कान, कितने डेसीबल पर हो सकती है मौत?

Oct 17, 2026 - 21:30
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हवा में घुले PM2.5 बढ़ा सकते हैं अस्पताल जाने का खतरा, 21 दिन तक असर

हवा में प्रदूषण बढ़ने पर अक्सर लोगों को आंखों में जलन, खांसी और सांस लेने में परेशानी होने लगती है, लेकिन हवा में मौजूद बारीक प्रदूषित कणों का असर इससे कहीं ज्यादा होता है. एक स्टडी में पाया गया कि PM2.5 के बढ़े स्तर का संबंध कई तरह की बीमारियों के कारण अस्पताल में भर्ती होने के जोखिम से भी है.  इससे साफ होता है कि खराब हवा को केवल कुछ दिनों की परेशानी समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.

लाखों नहीं, करोड़ों रिकॉर्ड के आधार पर हुआ विश्लेषण

शोधकर्ताओं ने छह देशों और क्षेत्रों के अस्पतालों में भर्ती होने से जुड़े करीब 34.65 करोड़ रिकॉर्ड का अध्ययन किया. इसमें ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, कनाडा, चिली, न्यूजीलैंड और ताइवान के वर्ष 2000 से 2019 तक के आंकड़े शामिल थे. विश्लेषण में PM2.5 के स्तर और अस्पताल में भर्ती होने के मामलों के बीच संबंध देखा गया. अध्ययन के अनुसार, हवा में PM2.5 की मात्रा हर 10 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर बढ़ने पर अगले 21 दिनों में किसी भी कारण से अस्पताल में भर्ती होने का जोखिम औसतन 8 प्रतिशत अधिक पाया गया.

यह भी पढ़ें : Epilepsy Symptoms: मिर्गी के साथ कैसे जिएं सामान्य जिंदगी? एक्सपर्ट से जानें सच

अलग-अलग बीमारियों में भी दिखा संबंध

अध्ययन में केवल सांस से जुड़ी बीमारियों पर ध्यान नहीं दिया गया, बल्कि दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं को भी शामिल किया गया. कैंसर से संबंधित अस्पताल भर्ती के जोखिम में 10.8 प्रतिशत, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी स्थितियों में 10 प्रतिशत और तंत्रिका तंत्र की बीमारियों में 8.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी का संबंध दर्ज किया गया. सांस संबंधी बीमारियों के मामलों में यह आंकड़ा 6.7 प्रतिशत था. ये प्रदूषण के स्तर और अस्पताल में भर्ती होने के जोखिम के बीच मिले सांख्यिकीय संबंध को दर्शाते हैं.

 PM2.5 को खतरनाक क्यों माना जाता है?

PM2.5 हवा में मौजूद बेहद छोटे कण होते हैं, जिनका आकार 2.5 माइक्रोमीटर या उससे कम होता है. अपने छोटे आकार के कारण ये सांस के साथ फेफड़ों के भीतर तक पहुंचते हैं. इनके संपर्क से शरीर में सूजन और दूसरी जैविक प्रतिक्रियाएं होने की आशंका रहती है. प्रदूषण का असर हर व्यक्ति पर एक जैसा नहीं होता. पहले से हृदय, फेफड़ों या दूसरी गंभीर बीमारियों से जूझ रहे लोगों को खराब हवा के दौरान ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए.

प्रदूषण के दिनों में क्या सावधानी रखें?

हवा की गुणवत्ता खराब होने पर बाहर की गतिविधियों को सीमित करना और स्थानीय वायु गुणवत्ता सूचकांक  AQI पर नजर रखना मददगार होता है. जरूरत पड़ने पर अच्छी गुणवत्ता वाला, सही फिटिंग का N95 मास्क इस्तेमाल किया जा सकता है. अस्थमा या दूसरी पुरानी बीमारी वाले लोग अपनी दवाएं और डॉक्टर की सलाह का पालन करें. अगर सांस लेने में अचानक परेशानी, सीने में दर्द या गंभीर लक्षण दिखाई दे तो तुरंत चिकित्सा सहायता लें. अध्ययन छह देशों और क्षेत्रों के आंकड़ों पर आधारित था, इसलिए इसके नतीजों को भारत की आबादी पर बिल्कुल उसी तरह लागू नहीं किया जा सकता.

यह भी पढ़ें : कितनी आवाज सह सकते हैं हमारे कान, कितने डेसीबल पर हो सकती है मौत?

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