मनरेगा योजना में बड़ा बदलाव, अब साल में 100 की जगह मिलेगा 150 दिन का रोजगार
ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए रोजगार से जुड़ी सरकारी योजनाएं आजीविका का एक बड़ा सहारा हैं. पहले मनरेगा के तहत पात्र ग्रामीण परिवारों को एक साल में 100 दिन के रोजगार की गारंटी दी जाती थी. लेकिन अब केंद्र सरकार ने मनरेगा की जगह नया ग्रामीण रोजगार कानून लागू किया है, जिसके तहत पात्र ग्रामीण परिवारों को साल में 125 दिन के रोजगार की गारंटी दी गई है. हालांकि, वन क्षेत्रों में रहने वाले कुछ पात्र आदिवासी परिवारों को मिलने वाले अतिरिक्त 50 दिनों के रोजगार को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं. दरअसल, जनवरी 2014 में केंद्र सरकार ने वन अधिकार अधिनियम (FRA) के तहत जमीन का अधिकार पाने वाले कुछ पात्र अनुसूचित जनजाति परिवारों को मनरेगा के 100 दिनों के अलावा 50 दिन का अतिरिक्त रोजगार दिया जाता था. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या इन परिवारों को अब भी साल में 150 दिन रोजगार मिल सकेगा. क्या है नए रोजगार कानून में बदलाव? केंद्र सरकार ने विकसित भारत-रोजगार एवं आजीविका मिशन (ग्रामीण) अधिनियम 2025 को 1 जुलाई 2026 से लागू किया है. इसके तहत पात्र ग्रामीण परिवारों को एक वित्तीय वर्ष में कम से कम 125 दिनों के रोजगार की गारंटी दी गई है. पहले मनरेगा के तहत यह सीमा 100 दिन थी. यानी नए कानून में रोजगार की गारंटी 25 दिन बढ़ा दी गई है. वन अधिकार धारकों को क्या होगा फायदा? जनवरी 2014 में ग्रामीण विकास मंत्रालय ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया था कि वन क्षेत्रों में रहने वाले कुछ पात्र अनुसूचित जनजाति परिवारों को मनरेगा के तहत मिलने वाले 100 दिनों के अलावा 50 दिन का अतिरिक्त मजदूरी रोजगार देने का निर्देश दिया था. यह सुविधा उन परिवारों के लिए थी, जिनके पास वन अधिकार अधिनियम के तहत मिली जमीन के अलावा दूसरी निजी जमीन नहीं थी. क्या अब भी मिलेंगे 50 दिन के अतिरिक्त रोजगार? इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या नया कानून लागू होने के बाद भी पात्र वन अधिकार धारकों को अतिरिक्त 50 दिन का रोजगार पाने का अधिकार है. नए कानून की धारा 5 के तहत पात्र ग्रामीण परिवारों को 125 दिनों के रोजगार की गारंटी दी गई है. हालांकि, नए रोजगार कानून में अतिरिक्त 50 दिनों के रोजगार का साफ तौर पर जिक्र नहीं किया गया है. रूस से तेल आयात पर भारत का बड़ा फैसला, ट्रंप की छूट के बाद भी नहीं बदलेगी रणनीति
ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए रोजगार से जुड़ी सरकारी योजनाएं आजीविका का एक बड़ा सहारा हैं. पहले मनरेगा के तहत पात्र ग्रामीण परिवारों को एक साल में 100 दिन के रोजगार की गारंटी दी जाती थी. लेकिन अब केंद्र सरकार ने मनरेगा की जगह नया ग्रामीण रोजगार कानून लागू किया है, जिसके तहत पात्र ग्रामीण परिवारों को साल में 125 दिन के रोजगार की गारंटी दी गई है. हालांकि, वन क्षेत्रों में रहने वाले कुछ पात्र आदिवासी परिवारों को मिलने वाले अतिरिक्त 50 दिनों के रोजगार को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं.
दरअसल, जनवरी 2014 में केंद्र सरकार ने वन अधिकार अधिनियम (FRA) के तहत जमीन का अधिकार पाने वाले कुछ पात्र अनुसूचित जनजाति परिवारों को मनरेगा के 100 दिनों के अलावा 50 दिन का अतिरिक्त रोजगार दिया जाता था. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या इन परिवारों को अब भी साल में 150 दिन रोजगार मिल सकेगा.
क्या है नए रोजगार कानून में बदलाव?
केंद्र सरकार ने विकसित भारत-रोजगार एवं आजीविका मिशन (ग्रामीण) अधिनियम 2025 को 1 जुलाई 2026 से लागू किया है. इसके तहत पात्र ग्रामीण परिवारों को एक वित्तीय वर्ष में कम से कम 125 दिनों के रोजगार की गारंटी दी गई है. पहले मनरेगा के तहत यह सीमा 100 दिन थी. यानी नए कानून में रोजगार की गारंटी 25 दिन बढ़ा दी गई है.
वन अधिकार धारकों को क्या होगा फायदा?
जनवरी 2014 में ग्रामीण विकास मंत्रालय ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया था कि वन क्षेत्रों में रहने वाले कुछ पात्र अनुसूचित जनजाति परिवारों को मनरेगा के तहत मिलने वाले 100 दिनों के अलावा 50 दिन का अतिरिक्त मजदूरी रोजगार देने का निर्देश दिया था. यह सुविधा उन परिवारों के लिए थी, जिनके पास वन अधिकार अधिनियम के तहत मिली जमीन के अलावा दूसरी निजी जमीन नहीं थी.
क्या अब भी मिलेंगे 50 दिन के अतिरिक्त रोजगार?
इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या नया कानून लागू होने के बाद भी पात्र वन अधिकार धारकों को अतिरिक्त 50 दिन का रोजगार पाने का अधिकार है. नए कानून की धारा 5 के तहत पात्र ग्रामीण परिवारों को 125 दिनों के रोजगार की गारंटी दी गई है. हालांकि, नए रोजगार कानून में अतिरिक्त 50 दिनों के रोजगार का साफ तौर पर जिक्र नहीं किया गया है.
रूस से तेल आयात पर भारत का बड़ा फैसला, ट्रंप की छूट के बाद भी नहीं बदलेगी रणनीति
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