पैदा होने के तुरंत बाद जरूर कराएं अपने बच्चे का NBS, वरना ताउम्र पछताएंगी आप

पेरेंट्स बनना हर इंसान के जीवन का सबसे खूबसूरत एक्सपीरियंस होता है. जब घर में एक नन्हा सा मेहमान आता है, तो उसके साथ ढेर सारी खुशियां, सपने और जिम्मेदारियां भी आती हैं. हर माता-पिता यही चाहते हैं कि उनका बच्चा पूरी तरह स्वस्थ रहे, उसे किसी तरह की बीमारी या परेशानी न हो और वह बिना किसी रुकावट के अच्छा जीवन जिए. लेकिन कई बार कुछ बीमारियां ऐसी होती हैं, जो बच्चे के जन्म के समय बाहर से दिखाई नहीं देतीं, बच्चा देखने में बिल्कुल सामान्य लगता है, लेकिन अंदर ही अंदर कोई गंभीर समस्या पनप रही होती है. यही वजह है कि आज के समय में न्यू बॉर्न स्क्रीनिंग टेस्ट (NBS) को बेहद जरूरी माना जाता है. यह एक साधारण लेकिन बहुत ही अहम जांच है, जो बच्चे के जन्म के तुरंत बाद की जाती है. इस टेस्ट की मदद से उन बीमारियों का पता लगाया जा सकता है, जिनके लक्षण शुरू में नजर नहीं आते, लेकिन अगर समय रहते इलाज न मिले तो आगे चलकर ये बच्चे की सेहत और ग्रोथ पर गहरा असर डाल सकती हैं. कई मामलों में पेरेंट्स को बाद में यह एहसास होता है कि काश उन्होंने समय पर यह टेस्ट करवा लिया होता.  बच्चे के जन्म के शुरुआती घंटे क्यों होते हैं सबसे अहम? बच्चे के जन्म के बाद के पहले 1,000 मिनट (करीब 16–17 घंटे) बहुत ही जरूरी होते हैं. इस समय के दौरान अगर न्यू बॉर्न स्क्रीनिंग टेस्ट करवा लिया जाए, तो कई गंभीर बीमारियों को शुरुआत में ही पकड़ लिया जाता है. इससे डॉक्टर तुरंत इलाज शुरू कर सकते हैं और बच्चे को एक स्वस्थ भविष्य दिया जा सकता है. अफसोस की बात यह है कि जानकारी की कमी या लापरवाही के कारण कई पेरेंट्स इस टेस्ट को जरूरी नहीं समझते और बाद में उन्हें इसका पछतावा होता है. अगर दुनिया भर के आंकड़ों पर नजर डालें, तो यह समस्या और भी गंभीर नजर आती है. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (WHO) के अनुसार, हर दिन लगभग 6,500 नवजात बच्चों की मौत हो जाती है. पांच साल से कम उम्र के बच्चों की कुल मौतों में से करीब 47 प्रतिशत मौतें नवजात शिशुओं की होती हैं. ये आंकड़े साफ बताते हैं कि जन्म के तुरंत बाद बच्चों की सेहत पर खास ध्यान देना कितना जरूरी है.  भारत में भी जरूरी है न्यू बॉर्न स्क्रीनिंग भारत में भी शिशु मृत्यु दर अब भी एक बड़ी चिंता का विषय बनी हुई है. कई ऐसी बीमारियां हैं, जिन्हें अगर समय रहते पहचान लिया जाए, तो पूरी तरह कंट्रोल किया जा सकता है. ऐसे में नवजात शिशुओं की शुरुआती स्क्रीनिंग एक बहुत ही असरदार कदम है. इससे न सिर्फ बच्चे की जान बचाई जा सकती है, बल्कि उसे आगे चलकर होने वाली शारीरिक और मानसिक परेशानियों से भी बचाया जा सकता है.  NBS टेस्ट से किन बीमारियों का चलता है पता? न्यू बॉर्न स्क्रीनिंग टेस्ट के जरिए जन्म के समय ही कई गंभीर बीमारियों की पहचान की जा सकती है, जैसे जन्मजात हाइपोथायरायडिज्म, जन्मजात एड्रेनल हाइपरप्लासिया (CAH), G6PD की कमी, गैलेक्टोसेमिया, बायोटिनिडेज की कमी, जन्म से सुनने में कमी, गंभीर जन्मजात हार्ट डिजीज. इन बीमारियों के लक्षण शुरुआत में नजर नहीं आते, लेकिन समय के साथ ये बच्चे के ग्रोथ में रुकावट डाल सकती हैं.  न्यू बॉर्न बेबी स्क्रीनिंग (NBS) टेस्ट को कभी भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. यह टेस्ट बच्चे के जन्म के तुरंत बाद करवा लेना चाहिए, ताकि किसी भी छुपी हुई बीमारी का समय रहते पता लगाया जा सके. सही समय पर जांच और इलाज से बच्चे को एक स्वस्थ, सुरक्षित और बेहतर जीवन दिया जा सकता है.  यह भी पढ़ें - Bronchial Asthma: सर्दियों में क्यों बढ़ जाती है सांस की तकलीफ? जानें ब्रोन्कियल अस्थमा के कारण और राहत पाने के असरदार घरेलू उपाय Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Jan 7, 2026 - 13:30
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पैदा होने के तुरंत बाद जरूर कराएं अपने बच्चे का NBS, वरना ताउम्र पछताएंगी आप

पेरेंट्स बनना हर इंसान के जीवन का सबसे खूबसूरत एक्सपीरियंस होता है. जब घर में एक नन्हा सा मेहमान आता है, तो उसके साथ ढेर सारी खुशियां, सपने और जिम्मेदारियां भी आती हैं. हर माता-पिता यही चाहते हैं कि उनका बच्चा पूरी तरह स्वस्थ रहे, उसे किसी तरह की बीमारी या परेशानी न हो और वह बिना किसी रुकावट के अच्छा जीवन जिए. लेकिन कई बार कुछ बीमारियां ऐसी होती हैं, जो बच्चे के जन्म के समय बाहर से दिखाई नहीं देतीं, बच्चा देखने में बिल्कुल सामान्य लगता है, लेकिन अंदर ही अंदर कोई गंभीर समस्या पनप रही होती है.

यही वजह है कि आज के समय में न्यू बॉर्न स्क्रीनिंग टेस्ट (NBS) को बेहद जरूरी माना जाता है. यह एक साधारण लेकिन बहुत ही अहम जांच है, जो बच्चे के जन्म के तुरंत बाद की जाती है. इस टेस्ट की मदद से उन बीमारियों का पता लगाया जा सकता है, जिनके लक्षण शुरू में नजर नहीं आते, लेकिन अगर समय रहते इलाज न मिले तो आगे चलकर ये बच्चे की सेहत और ग्रोथ पर गहरा असर डाल सकती हैं. कई मामलों में पेरेंट्स को बाद में यह एहसास होता है कि काश उन्होंने समय पर यह टेस्ट करवा लिया होता. 

बच्चे के जन्म के शुरुआती घंटे क्यों होते हैं सबसे अहम?

बच्चे के जन्म के बाद के पहले 1,000 मिनट (करीब 16–17 घंटे) बहुत ही जरूरी होते हैं. इस समय के दौरान अगर न्यू बॉर्न स्क्रीनिंग टेस्ट करवा लिया जाए, तो कई गंभीर बीमारियों को शुरुआत में ही पकड़ लिया जाता है. इससे डॉक्टर तुरंत इलाज शुरू कर सकते हैं और बच्चे को एक स्वस्थ भविष्य दिया जा सकता है. अफसोस की बात यह है कि जानकारी की कमी या लापरवाही के कारण कई पेरेंट्स इस टेस्ट को जरूरी नहीं समझते और बाद में उन्हें इसका पछतावा होता है. अगर दुनिया भर के आंकड़ों पर नजर डालें, तो यह समस्या और भी गंभीर नजर आती है. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (WHO) के अनुसार, हर दिन लगभग 6,500 नवजात बच्चों की मौत हो जाती है. पांच साल से कम उम्र के बच्चों की कुल मौतों में से करीब 47 प्रतिशत मौतें नवजात शिशुओं की होती हैं. ये आंकड़े साफ बताते हैं कि जन्म के तुरंत बाद बच्चों की सेहत पर खास ध्यान देना कितना जरूरी है. 

भारत में भी जरूरी है न्यू बॉर्न स्क्रीनिंग

भारत में भी शिशु मृत्यु दर अब भी एक बड़ी चिंता का विषय बनी हुई है. कई ऐसी बीमारियां हैं, जिन्हें अगर समय रहते पहचान लिया जाए, तो पूरी तरह कंट्रोल किया जा सकता है. ऐसे में नवजात शिशुओं की शुरुआती स्क्रीनिंग एक बहुत ही असरदार कदम है. इससे न सिर्फ बच्चे की जान बचाई जा सकती है, बल्कि उसे आगे चलकर होने वाली शारीरिक और मानसिक परेशानियों से भी बचाया जा सकता है. 

NBS टेस्ट से किन बीमारियों का चलता है पता?

न्यू बॉर्न स्क्रीनिंग टेस्ट के जरिए जन्म के समय ही कई गंभीर बीमारियों की पहचान की जा सकती है, जैसे जन्मजात हाइपोथायरायडिज्म, जन्मजात एड्रेनल हाइपरप्लासिया (CAH), G6PD की कमी, गैलेक्टोसेमिया, बायोटिनिडेज की कमी, जन्म से सुनने में कमी, गंभीर जन्मजात हार्ट डिजीज. इन बीमारियों के लक्षण शुरुआत में नजर नहीं आते, लेकिन समय के साथ ये बच्चे के ग्रोथ में रुकावट डाल सकती हैं.  न्यू बॉर्न बेबी स्क्रीनिंग (NBS) टेस्ट को कभी भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. यह टेस्ट बच्चे के जन्म के तुरंत बाद करवा लेना चाहिए, ताकि किसी भी छुपी हुई बीमारी का समय रहते पता लगाया जा सके. सही समय पर जांच और इलाज से बच्चे को एक स्वस्थ, सुरक्षित और बेहतर जीवन दिया जा सकता है. 

यह भी पढ़ें - Bronchial Asthma: सर्दियों में क्यों बढ़ जाती है सांस की तकलीफ? जानें ब्रोन्कियल अस्थमा के कारण और राहत पाने के असरदार घरेलू उपाय

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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