कच्चे तेल की कीमत, LPG संकट, इंपोर्ट बिल में बढ़ोत्तरी... इजरायल-ईरान युद्ध का भारत पर क्या पड़ा असर?
ईरान में जारी युद्ध और उससे पैदा हुए भू-राजनीतिक तनाव का असर अब वैश्विक ऊर्जा बाजार पर साफ दिखाई देने लगा है. कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल ने भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देशों की चिंता बढ़ा दी है. भारत अपनी कुल तेल जरूरतों का लगभग 88 प्रतिशत आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में थोड़ी-सी भी बढ़ोतरी का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था और आम लोगों की जेब पर पड़ता है. कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल PPAC की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की ओर से खरीदे जाने वाले कच्चे तेल की औसत कीमत में पिछले कुछ महीनों में बड़ी बढ़ोतरी देखी गई है. आंकड़ों में बात करें, तो जनवरी 2026 में भारत ने औसतन 63.08 डॉलर प्रति बैरल की कीमत पर कच्चा तेल खरीदा था. फरवरी में यह बढ़कर 69.01 डॉलर प्रति बैरल हो गया. जबकि मार्च 2026 के पहले 16 दिनों यानी 16 मार्च, 2026 तक औसत कीमत 108.23 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई, लेकिन यह स्थिति तब और गंभीर हो गई जब 16 मार्च, 2026 को भारत ने कच्चा तेल 142.69 डॉलर प्रति बैरल की कीमत पर खरीदा. अगर सिर्फ मार्च महीने में कच्चे तेल की कीमत में बढ़ोत्तरी को देखें, तो 4 मार्च को कीमत 85.24 डॉलर थी, 6 मार्च को 99.12 डॉलर, 10 मार्च को 120.28 डॉलर, 12 मार्च को 127.22 डॉलर और 16 मार्च, 2026 को 142.69 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई. ईरान के 18 दिनों के युद्ध के दौरान भारत फरवरी 2026 की तुलना में करीब दोगुनी कीमत पर कच्चा तेल खरीद रहा है. जबकि निकट भविष्य में पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ने की संभावना है. भारत के आयात बिल पर भारी दबाव रिपोर्ट के मुताबिक, कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोत्तरी का सबसे बड़ा असर भारत के आयात बिल पर पड़ता है. अगर कच्चे तेल की कीमत में 10 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि होती है, तो भारत का आयात बिल करीब 15,000 करोड़ रुपये सालाना बढ़ सकता है. अगर कीमत 69 डॉलर से बढ़कर 142 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचती है, तो देश का आयात बिल करीब 1.05 लाख करोड़ रुपये सालाना बढ़ सकता है. यानी भारत को हर रोज लगभग 288 करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च करना पड़ सकता है. दरअसल, फरवरी 2026 में भारत जितना खर्च कर रहा था, 16 मार्च, 2026 को उससे करीब 288 करोड़ रुपये ज्यादा भुगतान करना पड़ा. दुनिया के अन्य देशों में पेट्रोल की कीमत ग्लोबल पेट्रोल प्राइसेज की रिपोर्ट के मुताबिक, 23 फरवरी और 11 मार्च के आंकड़ों की तुलना करें तो दुनिया के कम से कम 85 देशों में पेट्रोल की कीमत बढ़ी है. 7 मार्च, 2026 को ईरान युद्ध शुरू होने के तुरंत बाद पूरे भारत में घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमत 60 रुपये का इजाफा हुआ, जबकि कमर्शियल 19 किलो वाले सिलेंडर की कीमत लगभग 115 रुपये बढ़े. भारत की अर्थव्यवस्था पर क्या पड़ेगा असर? अगर कच्चे तेल की औसत कीमत करीब 140 डॉलर प्रति बैरल रहती है तो पूरे वित्तीय वर्ष 2026-27 में, महंगाई- करीब 5.6% GDP वृद्धि- करीब 5.8% करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD)- करीब (माइनस) 3% हो जाएगा. लेकिन अब कच्चे तेल की कीमत 200 डॉलर प्रति बैरल के नजदीक पहुंच गया है, जिसका असर भारत के लिए बहुत गंभीर होगा, क्योंकि भारत अपनी 88% तेल जरूरतों का आयात करता है. ऐसे में, महंगाई- 7-8% से ऊपर जा सकती है. करंट अकाउंट डेफिसिट- आयात बिल 300 अरब डॉलर (करीब 27.6 लाख करोड़ रुपये) से ज्यादा हो सकता है GDP वृद्धि- भारत की आर्थिक वृद्धि 1–2 प्रतिशत अंक तक गिर सकती है. अगर, अनुमानित वृद्धि दर 6.5% थी, तो यह घटकर 4.5–5% रह सकती है. कच्चे तेल की कीमत में हर 10 डॉलर की कीमत बढ़ने से महंगाई बढ़ती है, GDP वृद्धि धीमी होती है, भारत का करंट अकाउंट डेफिसिट बढ़ता है. भारतीय अर्थव्यवस्था के तीन महत्वपूर्ण पहलू अगर महंगाई बढ़ती है तो इसका सीधा असर आम आदमी के खरीदने की क्षमता पर पड़ेगा. यानी आम आदमी बाजार से सामग्री और सेवा की खरीदारी कम करेगा. अगर महंगाई 4 से 5 प्रतिशत बढ़ता है, तो आम आदमी पहले जिस सामान को खरीदने में 10 हजार रुपये में खरीदता था, उसे अब 10,100 से 10,500 रुपये तक हो सकता है. अगर GDP घटती है, तो इससे नौकरी के मौके कम हो जाएंगे, लोगों की सैलरी बढ़ने की गति धीमी हो जाएगी, नौकरी जाने का खतरा बढ़ेगा, सरकारी खर्च कम होगा और व्यापारिक गतिविधियां कमजोर पड़ जाएंगी. करंट अकाउंट डेफिसिट बढ़ने का असर- रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हो सकता है. पेट्रोल, गैस और आयातित सामान महंगे हो जाएंगे. महंगाई बढ़ेगी, विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ेगा और आर्थिक स्थिरता को खतरा हो सकता है. अन्य महत्वपूर्ण पहलू भारतीय शेयर बाजार में गिरावट ईरान युद्ध शुरू होने के बाद 400 से ज्यादा शेयरों में दो अंकों की गिरावट दर्ज हुई है. इसके अलावा, निवेशकों की लगभग 33 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति घट गई LNG (Liquefied Natural Gas) ईरान युद्ध का असर भारत के LPG बाजार पर पड़ा है. साथ ही अब पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) की आपूर्ति को लेकर भी चिंता बढ़ रही है. पेट्रोल के बाद भारत का दूसरा सबसे बड़ा ऑटो फ्यूल CNG है. 2025 में भारत ने करीब 24-25 मिलियन टन LNG का आयात किया. भारत के 50-55% LNG आयात स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) से होकर आते हैं. भारत के पास LNG का रणनीतिक भंडार नहीं है. अगर होर्मुज में दिक्कतें जारी रहीं, तो गैस की कीमतें बढ़ेंगी, औद्योगिक मांग घट सकती है. यह भी पढ़ेंः TMC Candidate List 2026: टीएमसी ने उतारे 291 उम्मीदवार, नंदीग्राम से नहीं लड़ेंगी ममता बनर्जी, इस पार्टी के लिए छोड़ी 3 सीट
ईरान में जारी युद्ध और उससे पैदा हुए भू-राजनीतिक तनाव का असर अब वैश्विक ऊर्जा बाजार पर साफ दिखाई देने लगा है. कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल ने भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देशों की चिंता बढ़ा दी है. भारत अपनी कुल तेल जरूरतों का लगभग 88 प्रतिशत आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में थोड़ी-सी भी बढ़ोतरी का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था और आम लोगों की जेब पर पड़ता है.
कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल
PPAC की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की ओर से खरीदे जाने वाले कच्चे तेल की औसत कीमत में पिछले कुछ महीनों में बड़ी बढ़ोतरी देखी गई है. आंकड़ों में बात करें, तो जनवरी 2026 में भारत ने औसतन 63.08 डॉलर प्रति बैरल की कीमत पर कच्चा तेल खरीदा था. फरवरी में यह बढ़कर 69.01 डॉलर प्रति बैरल हो गया. जबकि मार्च 2026 के पहले 16 दिनों यानी 16 मार्च, 2026 तक औसत कीमत 108.23 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई, लेकिन यह स्थिति तब और गंभीर हो गई जब 16 मार्च, 2026 को भारत ने कच्चा तेल 142.69 डॉलर प्रति बैरल की कीमत पर खरीदा.
अगर सिर्फ मार्च महीने में कच्चे तेल की कीमत में बढ़ोत्तरी को देखें, तो 4 मार्च को कीमत 85.24 डॉलर थी, 6 मार्च को 99.12 डॉलर, 10 मार्च को 120.28 डॉलर, 12 मार्च को 127.22 डॉलर और 16 मार्च, 2026 को 142.69 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई.
ईरान के 18 दिनों के युद्ध के दौरान भारत फरवरी 2026 की तुलना में करीब दोगुनी कीमत पर कच्चा तेल खरीद रहा है. जबकि निकट भविष्य में पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ने की संभावना है.
भारत के आयात बिल पर भारी दबाव
रिपोर्ट के मुताबिक, कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोत्तरी का सबसे बड़ा असर भारत के आयात बिल पर पड़ता है. अगर कच्चे तेल की कीमत में 10 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि होती है, तो भारत का आयात बिल करीब 15,000 करोड़ रुपये सालाना बढ़ सकता है.
अगर कीमत 69 डॉलर से बढ़कर 142 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचती है, तो देश का आयात बिल करीब 1.05 लाख करोड़ रुपये सालाना बढ़ सकता है. यानी भारत को हर रोज लगभग 288 करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च करना पड़ सकता है. दरअसल, फरवरी 2026 में भारत जितना खर्च कर रहा था, 16 मार्च, 2026 को उससे करीब 288 करोड़ रुपये ज्यादा भुगतान करना पड़ा.
दुनिया के अन्य देशों में पेट्रोल की कीमत
ग्लोबल पेट्रोल प्राइसेज की रिपोर्ट के मुताबिक, 23 फरवरी और 11 मार्च के आंकड़ों की तुलना करें तो दुनिया के कम से कम 85 देशों में पेट्रोल की कीमत बढ़ी है.
7 मार्च, 2026 को ईरान युद्ध शुरू होने के तुरंत बाद पूरे भारत में घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमत 60 रुपये का इजाफा हुआ, जबकि कमर्शियल 19 किलो वाले सिलेंडर की कीमत लगभग 115 रुपये बढ़े.
भारत की अर्थव्यवस्था पर क्या पड़ेगा असर?
अगर कच्चे तेल की औसत कीमत करीब 140 डॉलर प्रति बैरल रहती है तो पूरे वित्तीय वर्ष 2026-27 में,
- महंगाई- करीब 5.6%
- GDP वृद्धि- करीब 5.8%
- करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD)- करीब (माइनस) 3% हो जाएगा.
लेकिन अब कच्चे तेल की कीमत 200 डॉलर प्रति बैरल के नजदीक पहुंच गया है, जिसका असर भारत के लिए बहुत गंभीर होगा, क्योंकि भारत अपनी 88% तेल जरूरतों का आयात करता है. ऐसे में,
- महंगाई- 7-8% से ऊपर जा सकती है.
- करंट अकाउंट डेफिसिट- आयात बिल 300 अरब डॉलर (करीब 27.6 लाख करोड़ रुपये) से ज्यादा हो सकता है
- GDP वृद्धि- भारत की आर्थिक वृद्धि 1–2 प्रतिशत अंक तक गिर सकती है. अगर, अनुमानित वृद्धि दर 6.5% थी, तो यह घटकर 4.5–5% रह सकती है.
कच्चे तेल की कीमत में हर 10 डॉलर की कीमत बढ़ने से महंगाई बढ़ती है, GDP वृद्धि धीमी होती है, भारत का करंट अकाउंट डेफिसिट बढ़ता है.
भारतीय अर्थव्यवस्था के तीन महत्वपूर्ण पहलू
- अगर महंगाई बढ़ती है तो इसका सीधा असर आम आदमी के खरीदने की क्षमता पर पड़ेगा. यानी आम आदमी बाजार से सामग्री और सेवा की खरीदारी कम करेगा. अगर महंगाई 4 से 5 प्रतिशत बढ़ता है, तो आम आदमी पहले जिस सामान को खरीदने में 10 हजार रुपये में खरीदता था, उसे अब 10,100 से 10,500 रुपये तक हो सकता है.
- अगर GDP घटती है, तो इससे नौकरी के मौके कम हो जाएंगे, लोगों की सैलरी बढ़ने की गति धीमी हो जाएगी, नौकरी जाने का खतरा बढ़ेगा, सरकारी खर्च कम होगा और व्यापारिक गतिविधियां कमजोर पड़ जाएंगी.
- करंट अकाउंट डेफिसिट बढ़ने का असर- रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हो सकता है. पेट्रोल, गैस और आयातित सामान महंगे हो जाएंगे. महंगाई बढ़ेगी, विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ेगा और आर्थिक स्थिरता को खतरा हो सकता है.
अन्य महत्वपूर्ण पहलू
- भारतीय शेयर बाजार में गिरावट
ईरान युद्ध शुरू होने के बाद 400 से ज्यादा शेयरों में दो अंकों की गिरावट दर्ज हुई है. इसके अलावा, निवेशकों की लगभग 33 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति घट गई
- LNG (Liquefied Natural Gas)
ईरान युद्ध का असर भारत के LPG बाजार पर पड़ा है. साथ ही अब पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) की आपूर्ति को लेकर भी चिंता बढ़ रही है. पेट्रोल के बाद भारत का दूसरा सबसे बड़ा ऑटो फ्यूल CNG है. 2025 में भारत ने करीब 24-25 मिलियन टन LNG का आयात किया. भारत के 50-55% LNG आयात स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) से होकर आते हैं. भारत के पास LNG का रणनीतिक भंडार नहीं है. अगर होर्मुज में दिक्कतें जारी रहीं, तो गैस की कीमतें बढ़ेंगी, औद्योगिक मांग घट सकती है.
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